17 साल बाद खुला मर्डर मिस्ट्री का राज

जिस के लिए घर छोड़ा उसी ने दिल तोड़ा

प्रेम में डूबी जब प्रेमलता

17 साल बाद खुला मर्डर मिस्ट्री का राज – भाग 3

जांच के शिकंजे में आ ही गए जनार्दन नायर

इस के बाद नायर साहब को बुलाया गया. एक बार उन से फिर अपना वही बयान दोहराने के लिए कहा गया, जिसे उन्होंने 26 मई, 2006 को पत्नी रमादेवी की हत्या के बाद दिया था. नायर साहब को अपना बयान दोहराने में भला क्या ऐतराज होता. उन्होंने अपना पूरा बयान इंसपेक्टर सुनील राज के सामने दोहरा दिया.

इस के बाद जब उन्हें उस दरवाजे के पास ले जाया गया, जिसे सुनील राज ने तैयार कराया था तो वह दरवाजा देख कर चौंके.

इस के बाद सुनील राज ने कहा, “यह दरवाजा भी ठीक उसी तरह है, जैसे आप के घर में लगा था. उस के ऊपर वाली जाली भी उतने ही अंतर पर लगी है. उस में अंदर जो कुंडी लगी थी, ठीक ही वैसी कुंडी उसी जगह लगी है, जहां आप के घर के दरवाजे में लगी थी. पत्नी की हत्या वाले दिन आप ने जिस तरह जाली से हाथ डाल कर दरवाजा खोला था, उसी तरह आज यहां हाथ डाल कर कुंडी खोलिए.”

नायर साहब ने हाथ डाल कर अंदर लगी कुंडी खोलने की बहुत कोशिश की, पर कुंडी खोलने की कौन कहे, उन का हाथ कुंडी तक भी नहीं पहुंचा. पुलिस ने देखा, जाली से हाथ डालने पर उन के हाथ और कुंडी के बीच करीब एक फुट का अंतर था.

नायर साहब कुंडी नहीं खोल पाए. इंसपेक्टर समझ गए कि यह दरवाजा उतनी ऊंचाई से खुल ही नहीं सकता. इस का मतलब रमादेवी का पति झूठ बोल रहा है. इसलिए अब उन्हें हत्या का शक उसी पर होने लगा. पुलिस ने उन्हें घर जाने के लिए कह दिया.

इस के बाद इंसपेक्टर सुनील राज ने फोरैंसिक रिपोर्ट की जांच की. इस से उन्हें चौंकाने वाली जानकारी मिली. दरअसल, रमादेवी जब मृत मिली थीं, तब उन के हाथों में बाल मिले थे, जो किसी आदमी के थे. जिसे पुलिस ने कब्जे में ले कर जांच के लिए भेज दिया था. लेकिन उस की डीएनए रिपोर्ट 4 साल बाद आई थी.

चूंकि हत्या के इस मामले में पुलिस को पूरा यकीन था कि हत्या उसी मजदूर ने की है, इसलिए पुलिस यही सोचती रही कि जब वह मजदूर मिलेगा, तब उस का डीएनए करा कर इस रिपोर्ट से मिलाया जाएगा.

जनार्दन नायर ही निकले पत्नी के हत्यारे

सुनील राज ने डीएनए रिपोर्ट निकलवाई और चूंकि अब रमादेवी के पति जनार्दन नायर शक के घेरे में आ गए थे, इसलिए उन का डीएनए सैंपल लिया और जांच के लिए भिजवा दिया. इस के बाद जो डीएनए रिपोर्ट आई, उस में रमादेवी की हत्या का रहस्य खुल गया. क्योंकि रमादेवी के हाथों में मिले बालों का डीएनए जनार्दन के डीएनए सैंपल से मैच कर गया था.

इस का मतलब हत्या के समय रमादेवी ने दोनों हाथों से पकड़ कर, जिस आदमी के बाल खींचे थे, वह आदमी मजदूर चुटला मुथु नहीं, खुद उस का पति जनार्दन नायर था. इस के बाद पुलिस ने 75 साल के जनार्दन नायर को गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में उन्होंने पत्नी की हत्या का अपना अपराध स्वीकार भी कर लिया. इस तरह 17 सालों बाद रमादेवी का असली कातिल गिरफ्तार हो गया, जिस ने हाईकोर्ट तक में अपील की थी कि उस की पत्नी के कातिल को जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाए.

अब आइए यह जानते हैं कि जनार्दन ने अपनी पत्नी का कत्ल क्यों और कैसे किया था.

जनार्दन नायर को अपनी पत्नी रमादेवी के चरित्र पर शक था. उन्हें लगता था कि उन के औफिस जाने के बाद उस के घर लडक़े आते हैं, जिन से उन की पत्नी के गलत संबंध हैं. इसी शक को ले कर पतिपत्नी में अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था.

घटना वाले दिन यानी 26 मई, 2006 को भी इसी बात को ले कर दोनों में झगड़ा हुआ था. पतिपत्नी में मारपीट होने लगी थी. दोनों ही एकदूसरे को पीट रहे थे. इसी मारपीट में रमादेवी ने दोनों हाथों से जनार्दन नायर के बाल पकड़ कर खींचे तो नायर साहब ने घरेलू चाकू से हमला कर के उन की हत्या कर दी थी. इस के बाद चुपके से घर से निकल गए थे. लेकिन हत्या के समय रमादेवी के हाथों की मुट्ठी में पति के जो बाल थे, वे उसी तरह मुट्ठी मे दबे रह गए थे.

क्राइम थ्रिलर फिल्मों से मिला बचने का आइडिया

पत्नी की हत्या करने के कई घंटे बाद जनार्दन नायर घर वापस आए तो दरवाजा अंदर से बंद नहीं था. उन्होंने सब से झूठ बोला था. दरवाजा खोल कर वह घर में घुसे और उस के बाद पत्नी की हत्या होने का शोर मचा दिया.

पुलिस से बचने के लिए उन्होंने दरवाजा बाहर से खोलने वाली कहानी गढ़ ली. संयोग से पड़ोस की एक महिला ने मजदूर वाली कहानी सुना दी, जिस से पुलिस का पूरा ध्यान उसी मजदूर चुटला मुथु की ओर चला गया और नायर साहब बच गए.

पुलिस ने नायर साहब से पूछा कि जब वह खुद ही कातिल थे, तब वह धरनाप्रदर्शन कर के कातिल को पकडऩे के लिए पुलिस पर दबाव क्यों बना रहे थे?

जवाब में जनार्दन नायर ने कहा, “धरनाप्रदर्शन तो मैं ने पड़ोसियों के कहने पर किया था. अगर मैं वैसा न करता तो पड़ोसी मेरे ऊपर शक करने लगते.”

“तो फिर हाईकोर्ट क्यों चले गए?” इंसपेक्टर सुनील राज ने पूछा.

“यह आइडिया मुझे क्राइम थ्रिलर फिल्मों से मिला था. दरअसल, कुछ लोगों को शक होने लगा था कि पत्नी की हत्या कहीं मैं ने तो नहीं की है? इसलिए मुझे लगा कि अगर मैं कातिल को पकडऩे के लिए कुछ नहीं करता तो इन लोगों का शक विश्वास में बदल जाएगा. अगर मैं कोर्ट में अपील कर दूंगा तो इन लोगों को लगेगा कि मजदूर ने ही रमादेवी की हत्या की है.”

लेकिन जनार्दन नायर के इसी कदम ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया. अंत में उन्होंने कहा भी कि उन्हें पता था कि एक न एक दिन वह जरूर पकड़े जाएंगे, लेकिन पकड़े जाने में इतना समय लगेगा, यह उन्होंने नहीं सोचा था.

पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से वह अपनी सही जगह जेल पहुंच गए हैं, जहां उन्हें बहुत पहले पहुंच जाना चाहिए था.

जिस के लिए घर छोड़ा उसी ने दिल तोड़ा – भाग 4

प्रशांत रेलवे स्टेशन से उस के लिए माजा की बोतल ले आया. प्रशांत भागभाग कर सामान लाता रहा और वह बैठी फोन पर बातें करती रही. माजा पीने के बाद अनुराधा ने प्रशांत से बड़ी सौंफ लाने को कहा. इस पर प्रशांत को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन घर का माहौल खराब न हो, इसलिए वह बड़ी सौंफ लाने के लिए पूना रेलवे स्टेशन चला गया.

तब तक रात के साढ़े 12 बज गए थे. प्रशांत जब बड़ी सौंफ ले कर लौटा, तब भी अनुराधा फोन पर बातें कर रही थी. इस बार प्रशांत सीधे घर के अंदर आने के बजाय दरवाजे की ओट में खड़ा हो कर उस की बातें सुनने लगा कि वह किस से क्या बातें कर रही है. अनुराधा फोन पर कह रही थी, ‘‘ठीक है, कल सुबह हम निकल चलेंगे.’’

इस के बाद अनुराधा चुप हो गई, शायद वह सामने वाले का जवाब सुन रही थी. थोड़ी देर बाद उस ने कहा, ‘‘किसी बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है. प्रशांत को मैं संभाल लूंगी. अगर उस ने कोई नौटंकी की तो उस के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा दूंगी. कहूंगी कि 3 सालों से मुझे बंधक बना कर मेरे साथ बलात्कार कर रहा है. उस के बाद उसे जेल जाने से कोई नहीं रोक पाएगा. वह वहीं पड़ा सड़ता रहेगा, क्योंकि यहां उसे कोई छुड़ाने वाला भी नहीं है.’’

अनुराधा की ये बातें सुन कर प्रशांत हैरान रह गया. जिसे उस ने तनमन से प्यार किया, जिस के लिए घरपरिवार छोड़ा, जिस की सुखसुविधा का हर तरह से खयाल रखा, आज वही न जाने किस के साथ उसे छोड़ कर भाग जाना चाहती थी और झूठी शिकायत कर के उसे जेल तक भिजवाने को तैयार थी. अनुराधा की इन बातों से उसे बहुत दुख हुआ.

अंदर आ कर उस ने कहा, ‘‘इतनी देर से तुम किस से बातें कर रही थी? कौन है वह, जिस के लिए तुम मुझे जेल भिजवा रही हो?’’

प्रशांत के सवालों का जवाब देने के बजाय अनुराधा आपा खो बैठी. उस ने कहा, ‘‘मैं किस से क्या बातें कर रही हूं, तुम से क्या मतलब? तुम अपना देखो, यह देखने की कोई जरूरत नहीं है कि मैं क्या कर रही हूं.’’

‘‘क्यों जरूरत नहीं है. तुम मेरी पत्नी हो, इसलिए मेरा हक बनता है तुम से पूछने का.’’ प्रशांत ने कहा तो अनुराधा गुस्से में उस का कौलर पकड़ झकझोरते हुए चिल्लाने लगी, ‘‘हक की बात करते हो, कभी शीशे में अपनी शक्ल देखी है. तुम ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी और अब हक जमा रहे हो. तुम्हें प्यार कर के मैं ने बहुत बड़ी गलती की. तुम्हारी वजह से मां को छोड़ा. लेकिन अब मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगी. तुम मेरे लायक नहीं हो.’’

अनुराधा ने प्रशांत के कौलर को इस तरह पकड़ रखा था कि वह छुड़ाने से भी नहीं छोड़ रही थी. काफी कोशिश के बाद भी जब अनुराधा ने प्रशांत का कौलर नहीं छोड़ा तो उसे भी गुस्सा आ गया. वह अनुराधा का गला पकड़ कर दबाने लगा, ताकि वह वह उस का कौलर छोड़ दे. लेकिन दबाव बढ़ने की वजह से अनुराधा की सांसें रुक गईं और उस के प्राणपखेरू उड़ गए.

जब प्रशांत को पता चला कि अनुराधा मर गई है तो उस के होश उड़ गए. वह सिर थाम कर बैठ गया. उस ने कभी सोचा भी नहीं था कि वह इस तरह हत्यारा बन जाएगा. कुछ देर तक वह उसी तरह बैठा रहा. इस के बाद वह बाहर आ कर अनुराधा की लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. इसी चक्कर में वह उस पूरी रात सो नहीं सका.

सुबह उस ने अनुराधा के गले से सोने की चैन उतारी और 8 बजे के आसपास आटोस्टैंड हड़पसर पहुंचा, जहां उस की मुलाकात उस के दोस्त महेश रंगोजी से हुई. उस के साथ चायनाश्ता कर के वह उसे ले कर वीटी कवडे रोड स्थित धनलक्ष्मी ज्वैलर्स के यहां गया, जहां उस ने वह चैन 16,900 रुपए में यह कह कर बेच दी कि उस की पत्नी की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है. इस समय वह लातूर स्थित उस के गांव में है. उस के इलाज के लिए उसे पैसों की सख्त जरूरत है.

चैन बेचने के बाद महेश रंगोजी तो चला गया, प्रशांत ने वहीं बाजार से लाल रंग का एक बड़ा सा बैग खरीदा और घर आ गया. उस ने अनुराधा की लाश को उसी में ठूंस कर भरा और आटोरिक्शा से ले जा कर खराड़ी गांव के पास फेंक आया.

प्रशांत को विश्वास था कि पुलिस उस तक पहुंच नहीं पाएगी. लेकिन जब पुलिस ने तेजी से जांच शुरू की तो वह डर गया. उस ने सोचा कि अब उस का पूना में रहना ठीक नहीं है. पुलिस कभी भी उस तक पहुंच सकती, इसलिए वह अपना समान और पैसे समेटने लगा.

2 जुलाई को प्रशांत ने अपने मकान मालिक दीपक जाधव से कहा कि उस की पत्नी गांव चली गई है, अब वह भी हमेशा के लिए गांव जाना चाहता है. इसलिए वह एक महीने का किराया काट कर उस का डिपाजिट वापस कर दें. मकान मालिक से बात करने के बाद उस ने अपना सारा सामान अपने दोस्त पिंटू के यहां पहुंचा दिया.

उसी बीच अनुराधा शोरूम पर नहीं गई तो प्रशांत के पास फोन आया. प्रशांत ने उन्हें बताया कि अनुराधा की बहन की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है, इसलिए वह गांव चली गई है. अब उस का काम करने का कोई इरादा नहीं है. उसे पैसों की सख्त जरूरत है, इसलिए वे उस का बकाया वेतन दे दें तो बड़ी कृपा होगी.

शोरूम की ओर से पैसे देने के लिए कहा गया तो प्रशांत ने अपने दोस्त पिंटू को फोन किया. लेकिन पिंटू उस समय बारामती में था, इसलिए अनुराधा का वेतन लाने के लिए उस ने महेश रंगोजी को फोन किया.

महेश जा कर अनुराधा का बकाया वेतन ले आता, उस के पहले ही वाट्स ऐप पर अनुराधा की लाश का फोटो आ जाने से शोरूम वालों को सच्चाई का पता चल गया और उन्होंने महेश को पकड़ कर लश्कर पुलिस के हवाले कर दिया, जिस की वजह से पत्नी की हत्या करने वाला प्रशांत भी पकड़ा गया.

प्रशांत सूर्यवंशी के बयान के आधार पर अनुराधा की हत्या का मुकदमा उस के खिलाफ दर्ज कर के अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. महेश निर्दोष था, इसलिए पुलिस ने उसे छोड़ दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

17 साल बाद खुला मर्डर मिस्ट्री का राज – भाग 2

चुटला मुथु की तलाश में केरल पुलिस तमिलनाडु भी गई थी. वहां से भी उसे निराश हो कर ही लौटना पड़ा था. पुलिस अपना काम कर रही थी, पर सफलता न मिलने से लोगों को यही लग रहा था कि पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है. जबकि पुलिस अधिकारी हत्या के इस केस को हल करने के लिए नईनई टीमें बना कर नए जांच अधिकारी नियुक्त कर किसी भी तरह से हत्यारे को गिरफ्तार करना चाहते थे. लेकिन कोई भी हत्यारे तक पहुंच नहीं सका.

इस के बाद जनार्दन नायर ने अधिकारियों से मांग की कि जब थाना पुलिस कुछ नहीं कर पा रही है तो इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच से कराई जाए. इस के बाद यह मामला क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया. क्राइम ब्रांच ने भी इस मामले में अपने नजरिए से जांच शुरू की. पर वह भी कुछ नहीं कर पाई.

इस की वजह यह थी कि सभी उसी मजदूर को कातिल मान रहे थे और उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. जो भी नया अधिकारी आता, फाइल देखता, दोचार दिन इधरउधर करता, उस के बाद रमादेवी मर्डर केस की फाइल फिर नीचे दब जाती. इसी तरह समय बीतता गया. गांव वालों का धरनाप्रदर्शन और घेराव भी कुछ नहीं कर पाया था.

जनार्दन नायर पहुंचे हाईकोर्ट

साल बीततेबीतते कुछ लोगों को शक होने लगा था कि रमादेवी की हत्या उस के पति जनार्दन नायर ने तो नहीं की है. दबी जुबान से लोग यह बात कहने भी लगे थे. यह नायर साहब के लिए परेशान करने वाली और अपमानित करने वाली बात थी.

ऐसे में ही अचानक इस मामले में एक नया मोड़ आ गया. साल 2007 में हत्या में मारी गई रमादेवी के पति जनार्दन नायर केरल हाईकोर्ट पहुंच गए. उन्होंने हाईकोर्ट से अपील की कि उन की पत्नी की हत्या के मामले में कातिल का पता लगाने के लिए जांच में तेजी लाई जाए. इस मामले में थाना पुलिस की तो छोड़ो, स्पैशल क्राइम ब्रांच भी कुछ नहीं कर सकी. एक साल बीत जाने के बाद भी न तो कोई सुराग मिला है और न कातिल का पता चल सका.

इस के बाद हाईकोर्ट ने क्राइम ब्रांच को फटकार लगाई. क्राइम ब्रांच ने जांच में तेजी लाई. पर फिर बात उसी मजदूर पर जा कर अटक गई थी, क्योंकि उस के बारे में कुछ पता ही नहीं चल रहा था. जब भी नया अफसर आता, अनसुलझे मामलों की फाइल निकलवाता तो उस में रमादेवी हत्याकांड की भी फाइल निकलती. फाइल पढ़ता, अपने शागिर्दों को इधरउधर दौड़ाता और महीने, 2 महीने बाद शांत हो जाता. इसी तरह एकएक कर के 17 साल बीत गए.

इन 17 सालों में रमादेवी हत्याकांड मामले की जांच क्राइम ब्रांच की 15 टीमों ने की. ये सभी टीमें रमादेवी की हत्या के लिए उसी मजदूर को जिम्मेदार मान रही थीं और उसी को खोज रही थीं. जबकि उस मजदूर का कुछ पता नहीं चल रह रहा था. जबकि उस की तलाश में ये टीमें तमिलनाडु, बिहार और उत्तर प्रदेश तक जा चुकी थीं.

रमादेवी हत्याकांड की फाइल कभी खुलती तो कभी धूल खाती पड़ी रहती. कोई पुलिस अधिकारी थोड़ी बहुत कोशिश कर लेता तो कोई उसे देख कर ऐसे ही रख देता. इसी तरह समय बीतता रहा. इस फाइल को धक्के खाते पूरे 17 साल बीत गए.

17 साल में बदल गए 15 जांच अधिकारी

इसी साल जुलाई में क्राइम ब्रांच में एक नए अधिकारी आए इंसपेक्टर सुनील राज. उन्होंने जब पुरानी फाइलें ले कर देखना शुरू किया तो उन्हें रमादेवी हत्याकांड की फाइल में कुछ ज्यादा ही रुचि जागी. उन्होंने पूरी फाइल को ध्यान से पढ़ा. उन्होंने देखा कि इस पर हाईकोर्ट का भी और्डर है, पर अभी तक इस में कुछ हुआ नहीं है.

जिन जिन अधिकारियों ने इस मामले की जांच की थी, उन सब की टिप्पणियां पढ़ीं. सभी ने उसी मजदूर चुटला मुथु को दोषी मान कर उसी की तलाश की बात की थी. पर उस का कुछ पता नहीं चला था. इंसपेक्टर सुनील राज ने तय किया कि वह इस मामले की जांच अपने हिसाब से करेंगे.

उन्होंने हत्या के इस मामले को अपने नजरिए से देखा और इस की जांच शुरू से करने का विचार किया. उन्हें लगा कि रमादेवी का हत्यारा वह मजदूर नहीं, कोई और ही है. क्योंकि दरवाजा अंदर से बंद था तो मजदूर ने हत्या कैसे की थी?

हत्या करने के बाद मजदूर जब बाहर आ गया तो उसे अंदर से दरवाजा बंद करने की क्या जरूरत पड़ी? कोई भी हत्या करने के बाद घटनास्थल से जल्दी से जल्दी भागना चाहेगा न कि बाहर खड़े हो कर अंदर से दरवाजा बंद करने की कोशिश करेगा?

इंसपेक्टर सुनील ने लीक से हट कर की जांच

सुनील राज पहले अफसर थे, जिन्होंने मजदूर को बाहर कर के इस मामले में सोचना शुरू किया. क्योंकि उन्हें लगा कि वह मजदूर इस घटना के बाद दोबारा दिखाई नहीं दिया. इस तरह की कोई दूसरी घटना भी नहीं घटी. जब उन्होंने सोचा कि हम यह मान कर चलें कि मजदूर कातिल नहीं है, कातिल कोई और भी सकता है तो इस के लिए सब से पहले उन्हें यह साबित करने के लिए सबूत की जरूरत थी.

यही सब सोच कर उन्होंने इस घटना की जांच हत्या होने वाले दिन से शुरू करने का निश्चय किया. उन्होंने सब से पहले उन बयानों का ध्यान से अध्ययन किया, जो पहले दिन जनार्दन नायर और उन के पड़ोसियों ने दिए थे. फिर मुखबिरों की खोज के बारे में अध्ययन किया.

सारे बयानों को पढऩे के बाद सुनील राज का ध्यान जनार्दन नायर के बयान पर गया, जिस में उन्होंने कहा था कि उस दिन वह पूरा दिन औफिस में थे. शाम को घर लौटे तो घर की कुंडी अंदर से बंद थी. कई बार आवाज देने पर भी दरवाजा नहीं खुला तो उन्हें लगा कि पत्नी को कुछ हो तो नहीं गया. तब दरवाजे के ऊपर लगी जाली से हाथ डाल कर उन्होंने अंदर लगी कुंडी खोली और दरवाजा खोल कर अंदर गए तो अंदर पत्नी की लाश पड़ी थी.

उन्हें जनार्दन नायर के बयान में ही कुछ झोल नजर आया. उन के मन में आया कि वह जा कर उस जाली और दरवाजे को देखें कि क्या जाली से हाथ डाल कर अंदर से कुंडी खोल कर दरवाजा खोला जा सकता है? लेकिन जब वह पोलाद गांव स्थित जनार्दन के घर पहुंचे तो पता चला कि वहां तो वह पुराना घर गिरवा कर नया घर बन गया है.

यह उन के लिए एक खराब अनुभव था. क्योंकि जब दरवाजा और वह जाली ही नहीं है तो वह यह कैसे पता करें कि जाली से हाथ डाल कर दरवाजा खुल सकता था या नहीं? उन्हें गहरा धक्का लगा कि यह क्या मामला है. वह वापस आ गए और फाइल में लगी क्राइम सीन की सारी तसवीरें निकलवाईं.

अलगअलग ऐंगल से ली गई एकएक तसवीर को वह ध्यान से देखने लगे. उन्होंने दरवाजे और जाली वाली तसवीरों पर कुछ ज्यादा ही गौर किया. दरवाजे की ऊंचाई और उस के ऊपर लगी जाली को ध्यान से देखा. इस के बाद नायर साहब के पड़ोसियों को बुला कर दरवाजे, जाली और घर के बारे में विस्तार से चर्चा की.

इस के बाद उन्होंने पुलिस वालों से कहा कि एक बिलकुल इसी तरह का दरवाजा, जाली और दीवार तैयार कराओ, जिस की लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई वैसी ही होनी चाहिए, जैसी जनार्दन नायर के घर में लगे दरवाजे, जाली और दीवार की थी. साहब का आदेश होते ही पुलिस वाले काम पर लग गए.

एक खाली प्लौट पर वैसी ही दीवार बनाई गई, जिस में ठीक उतना ही लंबा, चौड़ा और ऊंचा लकड़ी का दरवाजा लगवाया गया, जैसा नायर साहब के घर में लगा था. फोटो से देख कर वैसी ही, उतनी ऊंचाई पर जाली भी लगवाई गई. फोटो में कुंडी भी थी. दरवाजे में ठीक वैसी ही और उसी जगह कुंडी भी लगवाई गई, जहां फोटो में लगी थी.

दोस्ती में विश्वास की हत्या

दीपक कई दिनों से घरवालों से पहले की तरह ज्यादा बात नहीं कर रहा था. इस बात को उस की मां राजबाला अच्छे से समझ रही थीं. उन्होंने उस से कई बार  परेशानी की वजह जाननी भी चाही लेकिन वह कोई न कोई बहाना बना कर मां की बात टाल जाता था.

एक दिन दोपहर के समय दीपक घर लौटा तो राजबाला ने उस से बड़े प्यार से कहा, ‘‘क्या बात है बेटा, मैं कई दिनों से देख रही हूं कि आजकल तू किसी से ज्यादा बात भी नहीं करता और खोयाखोया सा रहता है.’’

‘‘नहीं मां, कोई खास बात नहीं है.’’ दीपक ने टालने वाले अंदाज में कहा. फिर वह विषय को बदलते हुए बोला, ‘‘मां मुझे तेज भूख लगी है. खाना लगा दो.’’

राजबाला ने भी सोचा कि जब यह खाना खा लेगा उस के बाद परेशानी की वजह बूझेगी. बेटे को खाना लाने के लिए रसोई में चली गईं और खाना परोस कर उसे दे दिया. दीपक ने खाना खाना अभी शुरू ही किया था कि उस के मोबाइल की घंटी बजी. दीपक ने मोबाइल स्क्रीन पर देखा तो वह नंबर उसे अनजाना लगा. इसलिए काल रिसीव करने के बजाय काट दी.

उस ने एकदो निवाले ही खाए थे कि फोन की घंटी फिर बजी. फोन उसी नंबर से था जिस से कुछ पल पहले आया था. दीपक झुंझला रहा था कि पता नहीं कौन है, जो ठीक से खाना भी नहीं खाने दे रहा. झुंझलाहट में उस ने काल रिसीव की.

दूसरी ओर से न मालूम किस की आवाज आई कि उसे सुनने के बाद उस का गुस्सा उड़न छू हो गया और बोला, ठीक है, मैं थोड़ी देर बाद पहुुंचता हूं.’’ कह कर फोन काट दिया.

उस समय राजबाला वहीं बैठी थीं. उन्होंने बेटे से मालूम भी किया कि किस का फोन था लेकिन दीपक ने नहीं बताया. फोन पर बात करने के बाद दीपक ने फटाफट खाना खाया और घर से बाहर की ओर निकल गया.

‘‘तू, मेरा मोबाइल लाने वाला था, क्या हुआ?’’ जाते समय मां ने पीछे से आवाज लगाई.

‘‘मम्मी, मुझे ध्यान है. आज वो भी ले लूंगा. पैसे मेरे पास ही हैं.’’ कह कर दीपक चला गया. यह बात 11 फरवरी की है.

दोपहर को घर से निकला दीपक जब देर शाम तक घर नहीं लौटा, तो राजबाला को चिंता हुई. उन्होंने उस का फोन मिलाया तो वह भी बंद आ रहा था, उन का बड़ा बेटा नितिन उस समय अपने काम पर गया हुआ था. राजबाला ने फोन कर के सारी बात नितिन को बता दी.

कुछ देर बाद वह भी घर आ गया. घर पहुंच कर नितिन ने सभी संभावित जगहों पर दीपक की तलाश की, लेकिन देर रात तक भी कोई नतीजा सामने नहीं आया. जवान बेटे के गायब हो जाने पर घर के सभी लोग परेशान थे. पिता जसवंत अग्रवाल थाना मुरादनगर पहुंचे और थानाप्रभारी को 25 वर्षीय बेटे दीपक अग्रवाल के गायब होने की जानकारी दी.

पुलिस ने भी सोचा कि दीपक कोई नासमझ तो है नहीं जो कहीं खो जाएगा. यारदोस्तों के साथ कहीं चला गया होगा और 2-4 दिन में घूमघाम कर लौट आएगा. यही सोच कर पुलिस ने उस की गुमशुदगी को गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन दीपक के मांबाप के दिलों पर क्या गुजर रही थी. इस बात को केवल वे ही महसूस कर रहे थे. बेटे की चिंता में एकएक दिन बड़ी मुश्किल से गुजर रहा था.

जसवंत अग्रवाल थाने के चक्कर लगातेलगाते परेशान हो रहे थे मगर पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी थी. इस के 3 दिन बाद 14 फरवरी को मुरादनगर पुलिस को सूचना मिली कि एनटीपीसी के जंगलों के पास खुर्रमपुर गांव के रहने वाले टीटू के गन्ने के खेत में एक लाश पड़ी है. यह इलाका थाना मुरादनगर क्षेत्र में ही आता है इसलिए खबर मिलते ही थानाप्रभारी अवधेश प्रसाद उस जगह पर पहुंच गए जहां लाश पड़ी होने की सूचना मिली थी.

उन्होंने देखा कि खेत में 25-30 साल के युवक की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. जितनी तादाद में वहां खून फैल कर जम चुका था, उस से लग रहा था कि उस की हत्या वहीं पर की होगी. उस के गले पर गोली का निशान दिख रहा था.

निरीक्षण में पता चला कि हत्यारों ने उस की पहचान मिटाने के लिए उस के चेहरे और लिंग को जला दिया था. इस से ऐसा लगा कि मारने वालों को उस से गहरी खुन्नस रही होगी. लाश विकृत अवस्था में थी, थानाप्रभारी ने वहां मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त करानी चाही लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका.

चूंकि मामला मर्डर का था इसलिए थानाप्रभारी ने जिले के आलाअधिकारियों को भी यह सूचना दे दी, तो जिले से एसएसपी और एसपी (आरए) भी घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश और घटनास्थल का मुआयना करने के बाद उन्होंने वहां मौजूद लोगों से बात की और थानाप्रभारी को कुछ निर्देश दे कर चले आए. थानाप्रभारी अवधेश प्रसाद ने लाश का पंचनामा करने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए गाजियाबाद में हिंडन स्थित मोर्चरी भेज दिया.

हत्या के इस मामले की जांच थाना प्रभारी अवधेश प्रसाद ने शुरू कर दी. थानाप्रभारी के सामने सब से बड़ी समस्या यह थी कि लाश की शिनाख्त न होने की वजह से उन्हें ऐसा कोई क्लू नहीं मिल पा रहा था, जिस से जांच आगे बढ़ सके. फिर उन्होंने इस काम में मुखबिरों को भी लगा दिया. इस से पहले कि उन्हें अज्ञात लाश के बारे में कहीं से कोई क्लू मिलता उन का वहां से तबादला हो गया.

इधर जसवंत अग्रवाल अपने लापता बेटे का पता लगवाने के लिए थाने के चक्कर लगाते रहे. पुलिस ने टीटू के गन्ने के खेत से जिस अज्ञात युवक की लाश बरामद की थी उस के बारे में भी जसवंत को कुछ नहीं बताया. जबकि अज्ञात लाश का हुलिया जसवंत के गायब बेटे दीपक से मिलताजुलता था.

जसवंत अग्रवाल ने भी हिम्मत नहीं हारी. उस ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के सामने अपना दुखड़ा रोया. इस का नतीजा यह निकला कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के आदेश पर मुरादनगर के नए थानाप्रभारी ने 19 फरवरी को दीपक की गुमशुदगी के मामले को भांदंवि की धारा 364 के तहत दर्ज कर लिया और इस मामले की जांच के लिए एक पुलिस टीम बनाई गई. टीम में एसआई राजेश शर्मा, कांस्टेबल पुष्पेंद्र, कुंवर पाल, अवश्री आदि को शामिल किया गया.

सबइंस्पेक्टर राजेश शर्मा ने सब से पहले दीपक के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. इस से पता चला कि दीपक के मोबाइल पर आखिरी काल जिस नंबर से आई थी, वह नंबर एक पीसीओ का था. पुलिस ने उस पीसीओ के मालिक का पता लगा कर उसे पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया.

उस से पूछा गया कि 11 फरवरी को दोपहर के समय उस के यहां से किस ने काल की थी. उस के पीसीओ पर रोजाना तमाम लोग काल करने आते हैं. उन में से कुछ परिचित होते हैं, कुछ अपरिचित. अब 8-10 दिन पहले दोपहर को किनकिन लोगों ने बात की. उस के लिए यह बताना आसान नहीं था. उस से पूछताछ में कोई सफलता नहीं मिली तो पुलिस ने उसे घर भेज दिया.

पुलिस को गन्ने के खेत से मिली लाश के बारे में भी कोई जानकारी नहीं मिल रही थी. हत्या के इस केस की तरह पुलिस टीम को दीपक के अपहरण के बारे में भी कोई सुराग न मिला तो पुलिस ने इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया. थाने के चक्कर लगातेलगाते जसवंत भी थकहार गए.

7-8 महीने बीत गए पुलिस न तो उस अज्ञात लाश की ही शिनाख्त करा पाई और न ही दीपक के बारे में पता लगा पाई. इसी दौरान नए थानाप्रभारी रामप्रकाश शर्मा से जसवंत अग्रवाल ने मुलाकात की और बेटे का पता लगाने की अपील की.

थानाप्रभारी दीपक ने फोन की काल डिटेल्स का अध्ययन किया. जांच करने पर उन्हें यह पता चला कि दीपक की दोस्ती मोहित शर्मा नाम के एक युवक से थी. वह कृष्णा कालोनी में रहता था. वह एक अपराधी किस्म का व्यक्ति था. उस से खिलाफ थाना मुरादनगर में ही हत्या और आर्म्स एक्ट के तहत 2 मुकदमे दर्ज थे. जबकि दीपक एक शरीफ लड़का था.

अब थानाप्रभारी के दिमाग में यह बात घूम गई कि एक अपराधी के साथ दीपक का क्या रिश्ता हो सकता है? उन्हें लग रहा था कि तफ्तीश अब कुछ आगे बढ़ सकती है. उन्होंने मोहित शर्मा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई.

इस का अध्ययन करने पर पता चला कि मोहित 2 और फोन नंबरों पर ज्यादा बातें करता था. जिन नंबरों पर उस की ज्यादा बातें होती थीं. जांच में वह शशि और लक्ष्मण नाम के शख्स के पाए गए, जोकि मुरादनगर में ही रहते थे. उन दोनों के खिलाफ भी थाना मुरादनगर में कई मुकदमे दर्ज थे.

पुलिस ने मोहित शर्मा, शशि और लक्ष्मण को पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया. तीनों से दीपक के बारे में मालूमात की तो उन्होंने दीपक के बारे मे अनभिज्ञता जताई. जिस दिन मोहित गायब हुआ था उस दिन की इन तीनों के मोबाइल फोनों की लोकेशन जांची तो वह कहीं और की पाई गईं. इस से पुलिस को वे बेकुसूर लगे. उन के खिलाफ कोई सुबूत न मिला तो पुलिस ने तीनों को छोड़ दिया.

थानाप्रभारी ने दीपक के फोन की काल डिटेल्स का फिर से अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि जिन नंबरों पर दीपक की अकसर बात होती थी उन में से एक नंबर दीपक के गुम होने के बाद से लगातार बंद आ रहा था. अब पुलिस ने यह पता लगाने की कोशिश की कि जिस फोन में वह नंबर चल रहा था. उस में अब कौन सा नंबर चल रहा है.

फोन के आईएमईआई नंबर के सहारे थानाप्रभारी को इस काम में सफलता मिल गई. उस फोन में जो नंबर चल रहा था वह कनक नाम की एक लड़की की आईडी पर लिया गया था. पुलिस ने कनक को पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया.पू छताछ में पता चला कि वह दीपक की दोस्त है लेकिन उस ने दीपक के बारे में कोई भी जानकारी होने से इंकार कर दिया. जब सिम बदलने की वजह पूछी तो वह कोई उचित जवाब ना दे सकी और घबराहट में इधरउधर देखने लगी.

थानाप्रभारी को लगा कि दाल में जरूर कुछ काला है, इसलिए उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की तो वह अधिक देर ना टिक सकी और बोली कि दीपक अब इस दुनिया में नहीं है. उस के दोस्तों मोहित, लक्ष्मण और शशि ने उस की हत्या कर दी है.

कनक ने जिन लोगों के नाम बताए थे पुलिस ने उन के ठिकानों पर दविशें डालीं लेकिन वे फरार हो चुके थे और उन्होंने अपने मोबाइल फोन भी बंद कर दिए थे. फिर पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर 29 दिसंबर को तीनों को पाइपलाइन रोड से हथियार सहित गिरफ्तार कर लिया. उन सभी से पूछताछ करने पर ऐसे 2 मामलों का खुलासा हो गया जो पिछले 9 महीने से पुलिस के गले की फांस बने हुए थे. उन से पूछताछ के बाद दीपक की हत्या की जो कहानी सामने आई वह इस प्रकार निकली.

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले का एक थाना है मुरादनगर. मुरादनगर की ही कृष्णा कालोनी में जसवंत अग्रवाल अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी राजबाला के अलावा 4 बच्चे थे. 2 बेटे व 2 बेटियां. बेटियों की शादी वह अपनी नौकरी के दौरान ही कर चुके थे. बेटा नितिन फरीदाबाद में स्थित प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. जबकि छोटे बेटे दीपक को फरीदाबाद में जूतों की दुकान खुलवा दी थी.

कुछ समय बाद ही दीपक का मन इस दुकान से उचट गया, तो अपने घर वालों से बात कर के वह औनेपौने दामों में दुकान का सारा सामान बेच कर अपने घर मुरादनगर आ गया. दीपक मुरादनगर में ही रह कर कोई ऐसा काम करना चाहता था जिस से अच्छी आमदनी हो. मुरादनगर में ही कनक नाम की एक लड़की रहती थी उसी से जफर और लक्ष्मण के अवैध संबंध थे.

दीपक की लक्ष्मण और जफर से दोस्ती थी. इसलिए उसे कनक के अवैध संबंधों की जानकारी थी. चूंकि कनक के कदम बहक चुके थे, इसलिए उस ने दीपक से भी नजदीकी बना ली थी. बाद में उस ने लक्ष्मण और जफर को किनारे कर के 25 वर्षीय दीपक से अवैध संबंध बना लिए.

लक्ष्मण और जफर ने जब प्रेमिका की तरफ से बेरुखी महसूस की तो उन्होंने इस की वजह खोजनी शुरू कर दी. तब उन्हें पता चला कि इस की असली वजह दीपक है. यानी दीपक ने उन के प्यार में सेंध लगा दी है. ऐसे विश्वासघाती दोस्त को उन्होंने सबक सिखाने की योजना बना ली और तय कर लिया कि वह उसे ठिकाने लगा कर ही रहेंगे, इस योजना में उन्होंने अपने एक और दोस्त शशि को भी शामिल कर लिया.

फरीदाबाद की जूतों की दुकान बंद कर के दीपक बेरोजगार हो गया था. घर का खर्चा उस का बड़ा भाई नितिन ही चला रहा था. दीपक अकसर अपने कामधंधे को ले कर तनाव में रहने लगा था. इस बात को घर वाले भी महसूस कर रहे थे.

योजनानुसार 11 फरवरी को मोहित ने पीसीओ से दीपक को फोन किया और एक जरूरी काम का बहाना कह कर घर से बुला लिया. बाइक पर बिठा कर वह उसे एनटीपीसी के जंगल में ले गया. वहां पहले से ही लक्ष्मण, शशि के साथ जफर भी मौजूद था. इन सभी ने पहले वहां बैठ कर जम कर शराब पी. जब दीपक को अधिक नशा हो गया तो वे उसे पास ही के गन्ने के खेत में ले गए.

वहां पहुंचते ही जफर ने उस की गरदन पर  तमंचा सटा कर गोली चला दी. गोली लगते ही दीपक नीचे गिर गया. कुछ देर बाद उस की मौत हो गई. पहचान मिटाने के लिए उन्होंने उस के चेहरे और गुप्तांग पर पैट्रोल डाल कर आग लगा दी और वहां से चले गए. इस से पहले उन्होंने उस की जेब में रखे 10 हजार रुपए निकाल लिए. वह पैसे उस की मां ने फोन खरीदने के लिए दिए थे.

दीपक की हत्या के बाद जफर और शशि ने बिजनौर के पास दिल्ली के एक कार ड्राइवर से 2 लाख रुपए लूट लिए. विरोध करने पर उन्होंने उस की हत्या कर दी. बाद में जब यह मामला खुला तो बिजनौर पुलिस ने जफर और शशि को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

कुछ समय बाद शशि जमानत पर बाहर आ गया. जबकि जफर की जमानत नहीं हो सकी. उन से पूछताछ के बाद पता चला कि पुलिस ने 14 फरवरी को खुर्रमपुर के टीटू के खेत से जो अज्ञात लाश बरामद की थी, वह दीपक अग्रवाल की ही थी.

हत्याकांड की हर बिखरी कड़ी अब जुड़ चुकी थी. सो सभी अभियुक्तों से पूछताछ के बाद उन्हें भादंवि की धारा 364, 302, 201, 34, 120बी के तहत गिरफ्तार कर गाजियाबाद की जिला अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें डासना जेल भेज दिया गया.

पुलिस हत्या में शामिल चौथे अभियुक्त जफर को अदालत में प्रार्थना पत्र दे कर, ट्रांजिट रिमांड पर लाने की तैयारी कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों एवं जनचर्चा पर आधारित. कनक परिवर्तित नाम है

जिस के लिए घर छोड़ा उसी ने दिल तोड़ा – भाग 3

अनुराधा गर्भवती हुई तो प्रशांत बहुत खुश हुआ. लेकिन अनुराधा इस बात से परेशान हो उठी. वह बच्चे को जन्म देने के बजाय गर्भपात करना चाहती थी. प्रशांत ने उसे बहुत समझाया कि यह उन के प्रेम की निशानी है, लेकिन अनुराधा नहीं मानी. वह बच्चा पैदा कर के उसे पालनेपोसने के झंझट में नहीं फंसना चाहती थी. उसे बच्चा बोझ लगता था. उसे यह भी लगता था कि बच्चा हो जाने के बाद उस का क्रेज खत्म हो जाएगा.

यही सब सोच कर अनुराधा ने बच्चे के पालनपोषण और घर खर्च का हवाला दे कर प्रशांत पर ऐसा दबाव बनाया कि उसे झुकना पड़ा. इस तरह पति को राजी कर के अनुराधा ने गर्भपात करवा दिया.

समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा. गर्भपात करवा कर अनुराधा बहुत खुश थी. वह बच्चे के झंझट में फंस कर अपने सपनों को बिखरने नहीं देना चाहती थी. वह अपनी बौडी और सुंदरता को कायम रख कर उस की बदौलत ऐशोआराम की जिंदगी जीना चाहती थी. स्वयं को स्मार्ट दिखाने के लिए वह अपना पूरा वेतन अपने शरीर पर खर्च कर रही थी.

यही नहीं बाजार में इलेक्ट्रौनिक का जो भी नया सामान आता था, वह उस से इस तरह प्रभावित होती थी कि उसे खरीद कर लाने के लिए घर में रखा अच्छे से अच्छा सामान बदल देती थी. खासकर मोबाइल और टेलीविजन. प्रशांत उस की इस आदत से काफी परेशान था. लेकिन वह अनुराधा को इतना प्यार करता था कि कुछ नहीं कह पाता था.

प्रशांत अनुराधा को अपने आटो से उस के शोरूम पर सुबह पहुंचाने जाता था और शाम को ले आता था. वह अपनी सारी कमाई भी उसी के हाथों पर रख देता था. उस के बाद यह भी नहीं पूछता था कि उस ने पैसे कहां खर्च कर दिए.

प्रशांत के इस प्यार की नींव तब हिल गई, जब दूसरी बार गर्भवती होने पर अनुराधा ने बच्चे को जन्म देने से मना कर दिया. जबकि प्रशांत चाहता था कि इस बार अनुराधा बच्चे को जन्म दे. लेकिन प्रशांत के चाहने से क्या होता, बच्चा तो अनुराधा को पैदा करना था और वह इस के लिए तैयार नहीं थी. अंतत: चली भी अनुराधा की. इस बार भी उस ने गर्भपात करा दिया. अनुराधा के दोबारा गर्भपात कराने से प्रशांत का मन अशांत रहने लगा. अब वह अनुराधा से थोड़ा खिंचाखिंचा सा रहने लगा था.

अनुराधा का व्यवहार भी अब प्रशांत के प्रति काफी बदल गया था. वह प्रशांत का खयाल रखने के बजाय हमेशा उसे खरीखोटी सुनाती रहती थी. साथ ही प्रशांत से बातचीत करने के बजाय हरदम मोबाइल पर लगी रहती. अगर प्रशांत मना करता तो वह उस पर विफर उठती. वह यहां तक कह देती कि, ‘फोन मेरा है, पैसा भी मेरा खर्च हो रहा है, तुम्हें इस से क्या मतलब? मेरा जब तक मन करेगा, बातें करूंगी.’

इधर अनुराधा छोटीछोटी बातों में प्रशांत से उलझने लगी थी. पत्नी के इस व्यवहार से प्रशांत काफी परेशान रहने लगा था. दोनों के बीच दूरियां भी बढ़ने लगी थीं. अनुराधा की बेरुखी की वजह से प्रशांत का विश्वास डगमगाने लगा था. उसे अनुराधा के चरित्र पर भी संदेह होने लगा था. क्योंकि उस का स्वभाव काफी बदल गया था. छुट्टी के दिन भी वह घर पर नहीं रहती थी.

प्रशांत को लगता था कि अनुराधा का उस से मन भर गया है. इसीलिए वह उस से छल कर रही है. पूना आने के बाद अनुराधा में जिस तरह बदलाव आया था, प्रशांत स्वयं को उस तरह नहीं बदल सका था.

25 जून को अनुराधा ने प्रशांत से अपने लिए एक नई सोने की चेन बनवाने को कहा. प्रशांत ने यह कह कर मना कर दिया कि अभी उस के पास पैसे नहीं हैं. लेकिन अनुराधा जिद पर अड़ गई. उस ने कहा कि वह पैसे के लिए अपना मंगलसूत्र गिरवी रख देगी. प्रशांत को पत्नी की यह बात अच्छी नहीं लगी. लेकिन उस की जिद के आगे वह हार गया और उस के साथ गहनों की दुकान पर जाना पड़ा.

अनुराधा ने दुकान पर मंगलसूत्र गिरवी रख कर चेन खरीद ली. उस की इस हरकत से प्रशांत को बहुत दुख हुआ, क्योंकि वह उस की बात को न समझती थी न महत्त्व देती थी. मंगलसूत्र जिसे सुहागिनें हमेशा गले से लगाए रहती हैं, चेन के लिए उसे गिरवी रख दिया था. प्रशांत अपमान का घूंट पी कर रह गया. अनुराधा से उस ने कुछ इसलिए नहीं कहा क्योंकि इस से घर का माहौल खराब होता.

प्रशांत 2 सौ रुपए प्रति शिफ्ट किराए पर ले कर आटो चलाता था. अगले दिन 10 बजे उस ने अनुराधा को शोरूम पहुंचाया और रात 10 बजे घर ले आया. अनुराधा के व्यवहार से पेरशान प्रशांत उस दिन ठीक से कमाई नहीं कर सका, जिस की वजह से आटो का किराया नहीं दे पाया. किराया जमा न होने की वजह से अगले दिन मालिक ने उसे आटो चलाने के लिए नहीं दिया.

अगले दिन रात साढ़े 8 बजे अनुराधा ने प्रशांत को फोन किया कि वह अरोरा टावर के पास खड़ी है आटो ले कर आ जाए. प्रशांत को उस दिन आटो मिला ही नहीं था. इस के बावजूद उस ने कुछ नहीं कहा और अपने एक दोस्त पिंटू के आटो से अनुराधा को लेने जा पहुंचा.

प्रशांत को पिंटू के साथ देख कर अनुराधा भड़क उठी, ‘‘तुम्हारा आटो कहां है, जो तुम दूसरे का आटो ले कर आए हो?’’

प्रशांत तो कुछ नहीं बोला, लेकिन पिंटू ने कहा, ‘‘धंधा न होने की वजह से प्रशांत आटो का किराया नहीं जमा कर पाया, इसलिए मालिक ने आटो नहीं दिया है.’’

लेकिन अनुराधा को उस की बातों पर विश्वास नहीं हुआ और उस ने प्रशांत को खूब खरीखोटी सुनाई. प्रशांत ने अनुराधा से काफी मिन्नतें कीं कि वह झगड़ा न करे, लेकिन अनुराधा ने उस की एक नहीं सुनी. वह पूरे रास्ते प्रशांत को उस के दोस्त पिंटू के सामने ही अपमानित करती रही.

प्रशांत ने अनुराधा को घर छोड़ा और पिंटू के साथ वीटी कवड़े रोड स्थित कमला शंकर होटल गया और वहां से अपने तथा अनुराधा के लिए खाना ले आया. खाना खाने के बाद अनुराधा फोन पर बातें करने लगी. उस समय रात के 11 बज रहे थे. फोन पर बातें करतेकरते उस ने प्रशांत से आइसक्रीम लाने को कहा. लेकिन आइसक्रीम की दुकान बंद थी. तब अनुराधा ने उसे कोल्डड्रिंक लाने के लिए पूना रेलवे स्टेशन भेजा.

मां के प्रेम का जब खुला राज

17 साल बाद खुला मर्डर मिस्ट्री का राज – भाग 1

यह कहानी आज से 17 साल पुरानी साल 2006 की है. केरल का एक जिला पथानाममथिट्टा. इसी जिले का एक गांव है पोलाद. इसी गांव में एक परिवार रहा करता था, जिस के मुखिया थे जनार्दन नायर. उन की पत्नी थी रमादेवी. उन्हीं के साथ वह रहते थे. उन की कोई औलाद नहीं थी यानी इस परिवार में केवल 2 ही लोग थे. नायर साहब डाक तार विभाग यानी पोस्टल डिपार्टमेंट में सीनियर एकाउंटेंट थे. दोनों की जिंदगी आराम से कट रही थी.

जनार्दन नायर रिटायर होने वाले थे. 26 मई, 2006 की शाम को जनार्दन नायर औफिस की छुट्टी होने पर अपने घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि घर का दरवाजा अंदर से बंद है. शाम के समय ऐसा होता नहीं था. चूंकि दरवाजा बाहर से बंद होता तो वह समझते कि पत्नी कहीं बाहर गई हैं, लेकिन दरवाजा अंदर से बंद था, इस का मतलब यह था पत्नी को अंदर ही होना चाहिए.

दरवाजे के ऊपर जाली लगी थी. उसी से उन्होंने पत्नी को कई आवाजे दीं, लेकिन दरवाजा नहीं खुला. वह खीझे कि एक ओर वह चिल्ला रहे हैं और घर के अंदर पत्नी किस में व्यस्त है कि दरवाजा नहीं खोल रही है. उन्होंने दरवाजा खुलवाने की काफी कोशिश की, पर जब दरवाजा नहीं खुला. तब उन्होंने ऊपर लगी जाली से अंदर हाथ डाल कर खुद ही अंदर लगी कुंडी खोल कर दरवाजा खोला.

दरवाजा खोल कर जैसे ही जनार्दन नायर अंदर घुसे, चीखते हुए तुरंत बाहर आ गए. घर के अंदर उन की 50 साल की पत्नी रमादेवी की खून से सनी लाश पड़ी थी. पत्नी की लाश देख कर वह चीखनेचिल्लाने लगे. उन की चीखपुकार सुन कर पड़ोसी इकट्ठा हो गए.

रमादेवी के मर्डर की बात सुन कर पड़ोसी भी हैरानपरेशान हो गए. दिनदहाड़े किसी के घर में घुस कर इस तरह हत्या कर देने वाली बात हैरान करने वाली तो थी ही, डराने वाली भी थी. सभी लोग सहम उठे थे. महिलाएं कुछ ज्यादा ही डरी हुई थीं. क्योंकि दिन में वही घर में अकेली रहती हैं.

जनार्दन नायर के पड़ोसियों ने इस घटना की सूचना पुलिस को दी. फोरैंसिक टीम के साथ थाना पुलिस ने आ कर अपनी औपचारिक काररवाई की और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. रमादेवी की हत्या चाकू से गोद कर की गई थी. फोरैंसिक टीम ने भी आ कर सारे साक्ष्य जुटाए थे, जिन्हें जांच के लिए भिजवा दिया गया था.

इस के बाद पूछताछ शुरू हुई. सब से पहले जनार्दन नायर का बयान लिया गया. क्योंकि सब से पहले उन्हें ही हत्या की जानकारी हुई थी. नायर साहब ने वह सब बता दिया, जिस तरह औफिस से आने के बाद उन्हें पत्नी की हत्या का पता चला था. उस के बाद पड़ोसियों से पूछताछ हुई.

चूंकि शाम का समय था, इसलिए उस समय ज्यादातर लोग घरों के अंदर थे, पर नायर साहब के बिलकुल पड़ोस में रहने वाली एक महिला ने पुलिस को बताया कि जिस समय यह घटना घटी थी यानी नायर साहब के आने से थोड़ी देर पहले उस ने नायर साहब के घर के सामने एक आदमी को टहलते देखा था. टहलते हुए वह इधरउधर देख रहा था. वह कुछ बेचैन सा भी लग रहा था.

उस महिला ने आगे बताया कि उस ने उस से पूछना चाहा कि वह यहां क्यों इस तरह टहल रहा है? लेकिन वह उस से यह बात पूछ पाती, उस से पहले ही वह यहां से चला गया था.

मजदूर पर क्यों हुआ शक?

पुलिस ने जब पूछा कि वह आदमी कौन था? तब उस महिला ने बताया कि वह सामने जो बिल्डिंग बन रही है, वह आदमी शायद उसी में काम करता था. महिला द्वारा दिए गए बयान के अनुसार वह आदमी शक के दायरे में आ गया था, इसलिए पुलिस उस आदमी के बारे में पता करने वहां जा पहुंची, जहां बिल्डिंग का निर्माण कार्य चल रहा था.

पुलिस उस महिला को भी साथ ले गई थी, जिस से वह उस आदमी को पहचान सके. लेकिन जब वह आदमी वहां नहीं दिखाई दिया तो पुलिस ने उस आदमी का हुलिया बता कर उस के बारे में पूछा.

वहां काम करने वाले मजदूरों ने बताया कि वह आदमी यहां काम करता जरूर था, लेकिन वह बिना कुछ बताए ही आज सुबह ही यहां से चला गया है. इस के बाद पुलिस को उस आदमी पर शक और गहरा गया. क्योंकि घटना के अगले दिन ही वह बिना बताए गायब हो गया था.

पुलिस ने जब वहां काम करने वाले मजदूरों और ठेकेदार से उस का पता यानी वह कहां का रहने वाला था, यह जानना चाहा तो वे सिर्फ इतना ही बता सके कि वह कहीं बाहर से यहां काम करने आया था. वह कहां का रहने वाला था, यह निश्चित रूप से किसी को पता नहीं था. उस का नाम जरूर पता चल गया था. उस का नाम था चुटला मुथु. इसी के साथ पुलिस को उस की पत्नी का पता जरूर मिल गया था.

उस मजदूर के इस तरह अचानक गायब हो जाने से पुलिस को अब यही लगने लगा था कि हो न हो, यह हत्या उसी ने की होगी. क्योंकि जैसे ही लोगों ने उस पर शक जाहिर किया था, वह गायब हो गया था. अब पुलिस उस की खोज में लग गई.

पुलिस उस पते पर पहुंची, जहां उस की पत्नी रहती थी. लेकिन पत्नी ने कहा कि अब उस का उस आदमी से कोई संबंध नहीं. दोनों में पटी नहीं, इसलिए वह उस से अलग रहने लगी. उसे यह भी पता नहीं है कि इस समय वह कहां है. लेकिन उस महिला ने यह जरूर कह दिया कि वह आदमी ठीक है.

पुलिस चुटला मुथु की तलाश में दिनरात एक किए हुए थी, पर उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. धीरेधीरे एक साल बीत गया. अब जनार्दन नायर और लोगों का धैर्य जवाब देने लगा. एक साल हो गया और कातिल पकड़ा नहीं गया.

केरल के लोग पढ़ेलिखे हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी हैं. उन्हें लगा कि पुलिस इस मामले में लापरवाही कर रही है, इसीलिए कातिल पकड़ा नहीं जा रहा है. पुलिस अपनी काररवाई में तेजी लाए, इस के लिए रमादेवी के हत्यारे को कैसे भी गिरफ्तार किया जाए, इस के लिए सभी ने मिल कर आंदोलन किया, रैली निकाली. इतना ही नहीं, तत्कालीन मुख्यमंत्री और अधिकारियों से लिखित शिकायतें भी की गईं, पर इस का भी कोई नतीजा निकला.

पुलिस के खिलाफ धरनाप्रदर्शन का दौर शुरू

अब तक रमादेवी हत्याकांड को एक साल बीत चुका था. फिर भी पुलिस को अब तक कातिल का कोई सुराग नहीं मिला था. इस बीच कातिल को गिरफ्तार करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा रैली भी निकाली जा चुकी थी और धरनाप्रदर्शन भी हो चुका था यानी आंदोलन हो चुके थे, लेकिन पुलिस कुछ नहीं कर सकी थी. जिस मजदूर पर लोगों को ही नहीं, पुलिस को भी शक था, वह फरार था. उस का कहीं अतापता नहीं चला.

इस बीच पुलिस को पता चला कि उसी तरह का एक मजदूर कानपुर में देखा गया है. केरल पुलिस कानपुर पहुंची, लेकिन वह मजदूर पुलिस को वहां भी नहीं मिला. केरल पुलिस उस की तलाश में बिहार भी गई. क्योंकि कुछ लोगों का कहना था कि वह बिहार से आया था. लेकिन उस के नाम से ही पता चलता था कि वह बिहार का रहने वाला नहीं था. क्योंकि बिहार में ऐसे नाम नहीं रखे जाते. इस के बावजूद केरल पुलिस बिहार गई और खाली हाथ लौट आई.