Journalist Death Mystery: पत्रकार पूजा – हत्या या आत्महत्या

Journalist Death Mystery: पूजा की मौत के मामले में पुलिस के शक की सुई भले ही पुलिस इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ की ओर उठ रही हो, लेकिन हकीकत की तह तक वह अभी भी नहीं पहुंच पाई है. क्या हत्या और आत्महत्या के बीच झूलता पूजा की मौत का रहस्य सामने आ सकेगा?

महिला पत्रकार पूजा तिवारी फरीदाबाद के सैक्टर 46 स्थित सद्भावना अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 42 में रहती थी. वह दिल्ली से प्रकाशित होने वाले एक अंग्रेजी अखबार में रिपोर्टर थी. इस अखबार में वह पिछले 3 सालों से काम कर रही थी. फरीदाबाद वाले फ्लैट में पूजा अकेली नहीं बल्कि अपनी रूममेट आफरीन के साथ रहती थी. पूजा अपार्टमेंट की 5वीं मंजिल स्थित जिस फ्लैट में रहती थी, वह उस ने हरियाणा पुलिस के इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ के सहयोग से किराए पर लिया था.

2 मई, 2016 की रात लगभग 11 बजे पूजा के साथ इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ और उस के साथ न्यूजपेपर में काम करने वाली आफरीन फ्लैट में मौजूद थी. रात लगभग साढ़े 11 बजे अपार्टमेंट के एक सिक्योरिटी गार्ड ने धमाके के साथ किसी महिला की चीख सुनी तो वह उस दिशा में दौड़ा, जिधर से आवाज आई थी. कुछ ही दूर आगे सिक्योरिटी गार्ड ने अपार्टमेंट के नीचे फर्श पर एक युवती को खून से लथपथ पड़े देखा. यह हृदय विदारक दृश्य देख कर उस ने शोर मचा दिया. शोर सुन कर अपार्टमेंट में रहने वाले तमाम लोग वहां आ गए. इन में से कुछ लोग मृत युवती को पहचानते थे. वह पत्रकार पूजा तिवारी थी. एक व्यक्ति ने 100 नंबर पर फोन कर के घटना के बारे में पुलिस कंट्रोल रूम को बता दिया.

वह इलाका थाना सूरजकुंड के अंतर्गत आता था. पुलिस नियंत्रण कक्ष ने यह सूचना थाना सूरजकुंड को दे दी. थाना सूरजकुंड के थानाप्रभारी राजेंद्र सिंह सूचना मिलते ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. राजेंद्र सिंह ने डीसीपी एनआईटी पूरनचंद पवार, पुलिस आयुक्त हनीफ कुरैशी तथा सहायक पुलिस आयुक्त गजेंद्र सिंह को भी इस बारे में बता दिया था. पुलिस घटनास्थल पर पहुंची तो वहां काफी भीड़ एकत्र थी. लोग पूजा तिवारी की क्षतविक्षत लाश को घेरे खड़े थे. पुसिल ने उन्हें वहां से हटाया, ताकि काररवाई की जा सके. मृतका के शरीर पर नाइटसूट था. उस की मौत 5वीं मंजिल से गिरने की वजह से हुई थी.

राजेंद्र सिंह लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि डीसीपी पूरनचंद पवार, पुलिस आयुक्त हनीफ कुरैशी, सहायक पुलिस आयुक्त गजेंद्र सिंह, फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट तथा क्राइम टीम के साथ मौके पर आ गए. सभी अपनीअपनी काररवाई में लग गए. पूजा 5वीं मंजिल स्थित फ्लैट की बालकनी से चित अवस्था में नीचे गिरी थी. उस का सिर बुरी तरह फट गया था. आसपास काफी मात्रा में खून फैला था. देखने से ही लग रहा था कि उस की मौत हो चुकी है.

क्राइम टीम ने लाश का मुआयना करने के बाद उस के फ्लैट की तलाशी ली तो वहां से शराब और बीयर की कई खाली बोतलें, मेज पर रखी ऐशट्रे में सिगरेट के टोटे और शीशे के 2 गिलास मिले, साथ ही बैड के नीचे 2 कंडोम भी मिले, जिस में एक इस्तेमाल किया हुआ था. सभी चीजों को क्राइम टीम ने सील कर के अपने कब्जे में ले लिया.

पूजा के साथ वाले फ्लैट में रहने वाली महिला आशा भाटिया लाश के पास खड़ी सिसक रही थीं. डीसीपी पूरनचंद पवार ने आशा से पूछा, ‘‘आप मृतका की रिश्तेदार हैं?’’

‘‘जी नहीं,’’ आशा दुपट्टे से आंसू पोंछते हुए बोली, ‘‘पूजा हमारे साथ वाले फ्लैट में रहती थी. मुझ से उस का काफी अपनत्व था. वह मुझे भाभी कहती थी. मैं भी उसे अपनी ननद की तरह मानती थी.’’

‘‘आप के खयाल से यह हादसा है या खुदकुशी?’’ पूरनचंद पवार ने पूछा तो आशा ने बताया, ‘‘पूजा इतनी लापरवाह नहीं थी कि बालकनी से गिर जाती. रही खुदकुशी करने की बात तो मैं यकीन के साथ कह सकती हूं कि वह खुदकुशी कभी नहीं कर सकती थी.’’

‘‘न हादसा न खुदकुशी,’’ पुलिस आयुक्त हनीफ कुरैशी ने कहा, ‘‘तो फिर आप यह मान रही हैं कि ये हत्या का मामला हो सकता है?’’

‘‘ऐसा मुझे संदेह है, लेकिन यकीनी तौर पर मैं इस बारे में अभी कुछ नहीं कह सकती.’’

‘‘आप पूजा के काफी नजदीक थीं. क्या आप बता सकती हैं कि पूजा के फ्लैट पर कौनकौन आया करता था?’’ डीसीपी पूरनचंद ने पूछा.

‘‘उस के साथ अखबार में काम करने वाली आफरीन, हरियाणा पुलिस का इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ और कभीकभी पूजा की रूममेट रह चुकी मिडी रीबा आया करती थी. अमित वशिष्ठ इस समय यहीं मौजूद है.’’ कह कर आशा ने पास खड़े इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ की ओर इशारा किया. डीसीपी पूरनचंद पवार ने अमित की ओर देखा. उस के चेहरे पर बदहवासी के भाव थे और आंखें आंसुओं से डबडबा रही थीं.

डीसीपी पूरनचंद पवार को सैल्यूट करते हुए अमित बोला, ‘‘सर, मेरा नाम अमित वशिष्ठ है और मैं फरीदाबाद पुलिस लाइन में हूं.’’

‘‘पूजा के रिश्तेदार हो या जानपहचान वाले?’’ पुलिस आयुक्त हनीफ कुरैशी ने अमित वशिष्ठ के चेहरे की ओर देखते हुए पूछा तो वह एकाएक हड़बड़ा गया. फिर उस ने बताया, ‘‘पूजा एक न्यूजपेपर के साथसाथ एक न्यूज चैनल की रिपोर्टर थी. कवरेज के सिलसिले में उस की मुझ से अकसर मुलाकात होती रहती थी. मैं ने उसे छोटी बहन मान रखा था. वह बहुत मासूम और ईमानदार थी.’’

कहतेकहते अमित हथेलियों से चेहरा छिपा कर फफक पड़ा. डीसीपी पूरनचंद पवार ने उसे चुप कराया, फिर सवाल किया, ‘‘आप इतनी रात गए यहां क्यों आए थे?’’

‘‘मैं पूजा के बुलाने पर रात 9 बजे उस के फ्लैट पर आया था. उस वक्त पूजा के साथ आफरीन भी मौजूद थी. पूजा काफी परेशान थी. उस ने 2 साल पहले अवैध रूप से गर्भपात और गर्भ में लिंग परीक्षण करने वाले डाक्टरों का स्टिंग औपरेशन किया था. डाक्टरों ने उस पर ठगी और ब्लैकमेलिंग का मुकदमा दर्ज करा दिया था. उसी वजह से पूजा को नौकरी से निकाल दिया गया था. पता नहीं रात 11 बजे के बाद उसे क्या हुआ कि वह रोरो कर कहने लगी, ‘लोग मुझे जीने नहीं देंगे.’ फिर वह तेजी से बालकनी की तरफ गई और वहां से छलांग लगा दी.’’

‘‘आफरीन कहां है, उस से भी पूछताछ करनी है?’’ हनीफ कुरैशी ने पूछा तो अमित ने कहा, ‘‘मैं 9 बजे पूजा के फ्लैट पर आया था, उस वक्त आफरीन कौफी पी रही थी. कौफी खत्म कर के वह सोने चली गई थी. आफरीन 3 महीने से पूजा के साथ फ्लैट में रह रही थी.’’

अमित वशिष्ठ से पूजा के पिता का फोन नंबर और पता मिल गया. नंबर और पता नोट करने के बाद हनीफ कुरैशी ने पूजा के पिता रवि तिवारी को फोन पर पूजा की मौत की सूचना दे दी. पूजा के मातापिता और भाई सौरभ इंदौर से 9 मई की दोपहर दिल्ली आ गए. तब तक पूजा का शव पोस्टमार्टम हेतु मोर्चरी में भेजा जा चुका था.

पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने पूजा का शव उस के घर वालों को सौंप दिया. बेटी की मौत के गम में डूबे घर वालों ने दिल्ली में ही उस का दाहसंस्कार कर दिया. पूजा के पिता रवि तिवारी ने थाना सूरजकुंड में फरीदाबाद निवासी डा. अनिल गोयल, उन की पत्नी अर्चना गोयल और झोलाछाप डा. धवल सिंह के खिलाफ पूजा को मानसिक रूप से प्रताडि़त करने तथा खुदकुशी के लिए उकसाने के लिए मुकदमा दर्ज करा दिया.

गौरतलब है कि पूजा तिवारी ने इन्हीं डाक्टरों के खिलाफ स्टिंग औपरेशन किया था. लेकिन इन डाक्टरों ने उस पर ठगी तथा ब्लैकमेलिंग का आरोप लगा कर मुकदमा दर्ज करा दिया था. इसी वजह से पूजा को नौकरी से निकाल दिया गया था. फिलहाल वह बेरोजगार थी, जिस से तनावग्रस्त थी. इसी कारण पूजा ने आत्महत्या करने का फैसला किया और 5वीं मंजिल से छलांग लगा कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली.

इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ पूजा के घर वालों का भी काफी करीबी था. वह पूजा के साथ 2-3 बार उस के घर वालों से मिलने इंदौर भी गया था. पूजा के घर वाले उसे अपना फैमिली मैंबर मानते थे. डाक्टरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने से पहले अमित से पूजा के पिता रवि तिवारी की तमाम पहलुओं पर बातचीत हुई थी. उसी के उकसाने पर रवि तिवारी ने डाक्टरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था. उधर मीडिया द्वारा मामले को प्रमुखता से उछालने के कारण पुलिस की छीछालेदर शुरू हुई तो पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेना शुरू किया.

क्राइमटीम ने पूजा के साथ रहने वाली आफरीन खान से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘करीब 8 बजे अमित फ्लैट पर आया था. अमित लगभग रोजाना ही आता था. जब भी वह आता था, मैं उन दोनों को अकेला छोड़ कर सोने चली जाती थी. उस रात भी मैं सोने चली गई थी. मेरे पीछे वहां क्या हुआ, मुझे नहीं पता. हां, मैं ने अमित व पूजा की आवाजें जरूर सुनी थीं. उन की आवाजों से लग रहा था, जैसे दोनों में झगड़ा हो रहा हो?’’

‘‘तुम पूजा के बेहद नजदीक थीं. अमित से रिश्तों को ले कर पूजा ने तुम से कुछ खास बातें तो जरूर शेयर की होंगी?’’ हनीफ कुरैशी ने पूछा तो आफरीन ने पल भर सोचने के बाद कहा, ‘‘पूजा ने बस यही बताया था कि अमित उस का फैमिली मैंबर भी है और सब से खास दोस्त भी.’’

‘‘तुम्हारे खयाल से पूजा खुदकुशी कर सकती थी?’’

‘‘बिलकुल नहीं, उस जैसी हिम्मतवाली लड़की, जिस का जीवन संघर्ष और दुश्वारियों से भरा हुआ था, खुदकुशी का विचार भी मन में नहीं ला सकती थी.’’

‘‘तो फिर यह हादसा…’’

‘‘इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकती.’’

क्राइम टीम ने अपार्टमेंट की जांच के दौरान तीसरी मंजिल स्थित एक फ्लैट की बालकनी की रेलिंग को थोड़ा मुड़ा हुआ पाया. इस से यह अनुमान लगाया गया कि जब पूजा 5वीं मंजिल से नीचे गिरी होगी तो उस के नीचे गिरने से पहले उस का शरीर तीसरी मंजिल की रेलिंग से टकराया होगा. क्राइम टीम ने फोरैंकिस एक्सपर्ट की मदद से क्राइम सीन रीक्रिएट कराने के लिए पूजा की कदकाठी की 3 डमी बनवाईं, फिर 3 बार क्राइमसीन रिक्रिएट किया गया. 2 बार डमी नीचे फर्श पर पेट के बल गिरी, जबकि पूजा की डैडबौडी पीठ के बल पड़ी मिली थी.

फोरैंसिक एक्सपर्ट ने इस बाबत बताया, ‘चूंकि पूजा की डैडबौडी पीठ के बल मिली, इस से यह आशंका बलवती होती है कि अगर कोई उसे गोद में उठा कर नीचे फेंकता तो लाश इसी हालत में मिली होती. लेकिन छलांग लगाने के बाद उस का शरीर तीसरी मंजिल की रेलिंग से टकरा कर नीचे गिरा, ऐसी स्थिति में बौडी पेट के बल गिरी होगी.’ पूजा की मौत के तीसरे दिन यानी 11 मई को अमित वशिष्ठ पूजा के पिता रवि तिवारी से मिला. रवि तिवारी को 4 पन्ने दिखाते हुए अमित ने कहा, ‘‘यह पूजा का सुसाइड नोट है, जो मुझे मेज की दराज में रखा मिला है. इस में पूजा ने डाक्टरों के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए लिखा है, ‘उन्हीं लोगों ने मेरी जिंदगी बर्बाद की है. मेरी मौत के जिम्मेदार यही डाक्टर हैं.’

अमित ने आंसू पोंछते हुए आगे कहा, ‘‘पूजा तो हमें छोड़ कर चली गई. उस की आत्मा को तब तक शांति नहीं मिलेगी, जब तक उसे आत्महत्या करने को मजबूर करने वाले डाक्टर सुकून से रहेंगे. आप साथ दें तो पूजा के इस सुसाइड नोट के जरिए हम 1-2 करोड़ रुपए उन डाक्टरों से वसूल सकते हैं.’’

लेकिन रवि तिवारी इस के लिए राजी नहीं हुए. रवि तिवारी ने पूजा का वह सुसाइड नोट पुलिस के हवाले कर दिया. सुसाइड नोट 4 पन्नों का था. वह पहले काले रंग के पेन से, फिर नीले रंग के पेन से लिखा हुआ था. इस से पुलिस का माथा ठनका. पुलिस ने पूजा की रूम पार्टनर आफरीन खान से इस बाबत पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘पूजा मैजिक पैन से लिखती थी, जिस का रंग ग्रीन था. यह सुसाइड नोट पूजा का लिखा हरगिज नहीं हो सकता.’’

यही बात पूजा के भाई सौरभ ने भी बताई. उस ने रहस्य की एक बात यह भी बताई कि उस ने अमित के पास एक पेन देखा था, जिस में 3 रिफिल थीं. लाल, नीली और काली. यह सुसाइड नोट अमित का लिखा हो सकता है. इस मामले में ट्विस्ट तब आया, जब अरुणाचल प्रदेश की रहने वाली एक युवती मिडी रीबा अखबार में पूजा की मौत की खबर पढ़ कर दिल्ली आई. मिडी रीबा सन 2011 में नोएडा स्थित एक मीडिया हाउस में काम करती थी. वहीं पूजा तिवारी भी काम करती थी, दोनों में गहरी दोस्ती हो गई थी.

सन 2012 में पूजा की नौकरी दिल्ली में लगी तो उस ने साउथ एक्स में किराए पर फ्लैट ले लिया. मिडी रीबा उस की रूममेट बन कर 2 साल तक उस के साथ रही थी. फिर पूजा की नौकरी एक अंगरेजी अखबार में लग गई तो पूजा फरीदाबाद में रहने लगी थी. मिडी रीबा ने क्राइमटीम को बताया, ‘‘सितंबर, 2015 की एक रात मैं फरीदाबाद स्थित पूजा के सद्भावना अपार्टमेंट के फ्लैट में गई थी. उस दिन पूजा मिडी की मुलाकात अमित से कराने वाली थी. पूजा अमित को अपना खास दोस्त बताती थी. रात को अमित आया. वह बहुत ही रूखा इंसान था.

‘‘हम सभी ने बीयर पी, फिर न जाने किस बात को ले कर पूजा व अमित में झगड़ा होने लगा. अमित ने पूजा की बेरहमी से पिटाई कर दी. उस का सिर फट गया और दोनों हाथों में फ्रेक्चर भी हुआ. अमित वहां से चला गया तो मैं उसे एक स्थानीय डाक्टर के पास ले कर गई थी.’’

मिडी रीबा ने आगे कहा, ‘‘पूजा बहुत ही सीधी, सरल स्वभाव की जिंदादिल लड़की थी. वह मीडिया में पौपुलर होना चाहती थी. वह आत्महत्या नहीं कर सकती थी.’’

क्राइम टीम ने पूजा का लैपटौप तथा उस का मोबाइल फोन अमित के पास से बरामद किया है, जो उस ने पंचकूला स्थित घर में रखा हुआ था. पुलिस ने लैपटौप व फोन को खंगाला. पुलिस को उस में से कई ऐसे साक्ष्य मिले, जो यह साबित कर सकते हैं कि पूजा का अमित के साथ कितना गहरा रिश्ता था. बहरहाल पुलिस ने अभी तक इस का खुलासा नहीं किया है.  पूजा तिवारी युवावस्था से ही एक पौपुलर पत्रकार बनने की इच्छुक थी. वह अपनी मां और भाई के काफी करीब थी. सन 2011 में पूजा इंदौर से दिल्ली आई. सब से पहले उसे नोएडा स्थित एक मीडिया हाउस में काम मिला. इस के डेढ़ साल बाद वह दिल्ली में एक न्यूज चैनल से जुड़ी तो अपने सहयोगी अशोक मिश्रा के साथ अवैध रूप से गर्भपात करने वाले डाक्टरों का स्टिंग औपरेशन करने लगी.

अपने जुनून, साहस, लगन और हिम्मत के बूते पर उस ने इस क्षेत्र में काफी नाम व इज्जत कमाई. लेकिन कुछ भ्रष्ट पत्रकारों व डाक्टरों की मिलीभगत से वह ठगी व ब्लैकमेलिंग के झूठे केस में फंस गई. नौकरी छूटने से वह काफी तनाव में रहने लगी थी. पूजा तिवारी की मौत के आठवें दिन पुलिस को फोरैंसिक टीम से घटनास्थल की जांच कराने की याद आई. मधुबन स्थित फोरैंसिक साइंस लैब के एक्सपर्ट्स ने घटनास्थल की जांच करने के बाद पुलिस पर कई सवाल उठाए. एक्सपर्ट ने कहा कि 8 दिनों में साक्ष्य नष्ट भी किए जा सकते हैं और गायब भी.

बहरहाल, एक्सपर्ट ने पूजा के कथित सुसाइड नोट की जांच कर के यह पता लगाने की कोशिश की है कि उस में पूजा की राइटिंग है या किसी और की. जबकि पूजा के घर वाले, मिडी रीबा और आफरीन का कहना है कि वह राइटिंग पूजा की नहीं है. पूजा ने आत्महत्या की या उस की हत्या की गई, इस का सारा दारोमदार उस सुसाइड नोट पर है, जिस की फोरैंसिक साइंस लैब के एक्सपर्ट जांच कर रहे हैं. अगर एक्सपर्ट की रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि सुसाइड नोट में पूजा की राइटिंग नहीं है तो इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ पर पुलिस का शिकंजा कसना लाजिमी है. तभी यह बात सामने आएगी कि पूजा व अमित के रिश्ते किस हद तक थे. बहरहाल अमित को सस्पैंड किया जा चुका है.

पुलिस इस बात पर क्यों गौर नहीं कर रही कि पूजा के बैड के नीचे इस्तेमाल किया एक कंडोम कहां से आया? यदि ऐसा है तो इस मामले में गहरी साजिश होने का प्रबल अंदेशा है. अमित के अलावा शक की सुई आफरीन की तरफ भी उठ सकती है. यकीनन सच सामने आने के बाद कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकता है. पूजा के रूम से मिला इस्तेमाल किया हुआ कंडोम चीखचीख कर कह रहा है कि इस मामले में सैक्स भी एक महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है. Journalist Death Mystery

 

Illegal Relationship: हिस्ट्रीशीटर की बहन से आशनाई

Illegal Relationship: प्रदीप उपाध्याय जिस राह पर चल रहा था, वह जहरीले कांटों से भरी हुई थी. प्रेमिका का भाई हिस्ट्रीशीटर है, यह जानने के बाद उसे राधिका से संबंध तोड़ लेने चाहिए थे, लेकिन उस ने जानबूझ कर जो किया उसे तो घातक साबित होना ही था.

उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती के थाना पुरानी बस्ती के थानाप्रभारी रणधीर मिश्र अपने औफिस में बैठे थे, तभी संधौली गांव के चौकीदार बाबूलाल ने उन्हें फोन कर के बताया कि गोरखपुरलखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर डुमरियागंज जाने वाली सड़क के पास एक युवक की लाश पड़ी है. उस की हत्या शायद कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंक दी गई है. जवाब में रणधीर मिश्र ने कहा, ‘‘बाबूलाल, जब तक मैं वहां नहीं पहुंच जाता, तुम लाश के पास रुको. और हां, एक बात का खास खयाल रखना, लाश के पास किसी को जाने मत देना.’’

रणधीर मिश्र ने इस मामले की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी और खुद सहयोगियों को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंच कर पहले उन्होंने वहां मौजूद भीड़ को हटाया, उस के बाद लाश का निरीक्षण करने लगे. मृतक 23-24 साल का नौजवान था. उस के शरीर पर नीले रंग की टीशर्ट, जींस और पैरों में जूते थे. शिनाख्त के लिए लाश की तलाशी ली गई तो उस के पास ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से उस की शिनाख्त हो पाती.

युवक की हत्या गला दबा कर की गई थी. उस के गले पर रस्सी के निशान स्पष्ट नजर आ रहे थे. स्थितियां यही बता रही थीं कि युवक की हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. चूंकि मृतक नौजवान था, इसलिए पुलिस को मामला अवैध संबंधों में हत्या का लगा. घटनास्थल की सारी जरूरी काररवाई पूरी कर के रणधीर मिश्र ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. इस के बाद थाने आ कर उन्होंने चौकीदार बाबूलाल की ओर से हत्या के इस मामले को भादंवि की धारा 302, 201 के तहत अज्ञात के खिलाफ दर्ज करा दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद स्पष्ट हो गया कि हत्या रस्सी से गला घोंट कर की गई थी. परेशानी यह थी कि 2 दिन बीत जाने के बाद भी मृतक की शिनाख्त नहीं हुई थी. दूसरी ओर घटना का खुलासा करने के लिए एसपी जटाशंकर सिंह ने सीओ पंकज सिंह की देखरेख में थानाप्रभारी रणधीर मिश्र, सबइंसपेक्टर मोहम्मद शहाबुद्दीन, प्रशिक्षण के लिए आए एसआई दिनेश सरोज, अरविंद कुमार राय, सिपाही योगेंद्र, रामपाल, इंद्रेश यादव, गिरजेश यादव और राहुल सिंह की एक टीम गठित कर दी थी. इस पुलिस टीम ने युवक की शिनाख्त के लिए जिले के अन्य थानों की पुलिस को मृतक की फोटो भेज कर शिनाख्त की कोशिश की, लेकिन कहीं से भी मृतक के बारे में कोई सूचना नहीं मिली.

इस के बाद रणधीर मिश्र ने मृतक की शिनाख्त के लिए बड़ेबड़े पोस्टर छपवा कर जगहजगह चिपकवाए और उस की कौपी व्हाट्सएप, फेसबुक इलेक्ट्रौनिक और प्रिंट मीडिया के माध्यम से बस्ती समेत कई जनपदों में प्रसारित कराए. यही नहीं, कुछ पोस्टर उन्होंने बसों व ट्रेनों में भी चिपकवाए. 25 मार्च, 2016 को जिला अंबेडकरनगर के गांव नूनशिला के रहने वाले चंद्रमणि उर्फ ननकू किसी काम से बस्ती आए थे. उन्होंने बस स्टेशन पर लगे पोस्टर को देखा तो उन्हें लगा कि यह उन के रिश्तेदार प्रदीप उपाध्याय की फोटो है. इस की वजह यह थी कि उन के रिश्तेदार कृष्णदेव उपाध्याय का बेटा प्रदीप उपाध्याय करीब 20 दिनों से गायब था.

उन्होंने गोरखपुर के थाना में इस बात की रिपोर्ट भी दर्ज करा रखी थी. गोरखपुर में रिपोर्ट दर्ज कराने की वजह यह थी कि प्रदीप गोरखपुर में रह कर आईटीआई कर रहा था. चंद्रमणि ने तुरंत कृष्णदेव उपाध्याय को फोन कर के बताया कि बस्ती जिले के बस स्टेशन पर शिनाख्त के लिए एक युवक का फोटोयुक्त पोस्टर चिपकाया गया है, जिस में छपा फोटो उन्हें उन के बेटे प्रदीप का लग रहा है. संयोग से यह घटना उन के बेटे के गायब होने के एक दिन बाद की है. कृष्णदेव उपाध्याय को उस पोस्टर के बारे में पता चला तो वह अपने परिवार के कुछ लोगों और रिश्तेदारों के साथ बस्ती के बस स्टेशन पर जा पहुंचे.

पोस्टर देखते ही उन लोगों ने उस में छपी फोटो की शिनाख्त प्रदीप कुमार उपाध्याय के रूप में कर दी. इस के बाद सभी लोग रोतेबिलखते थाना पुरानी बस्ती पहुंचे, जहां उन्होंने थानाप्रभारी रणधीर मिश्र को बताया कि जो पोस्टर बस्ती के बस स्टेशन पर चिपकाए गए हैं, उस में छपा फोटो उन के बेटे प्रदीप उपाध्याय का है. रणधीर मिश्र ने उन लोगों को मृतक के कपड़े और जूते दिखाए तो उन्हें देख कर यह बात साफ हो गई कि मृतक मूलरूप से फैजाबाद का रहने वाला था और उस ने गोरखपुर में एल्युमिनियम फैक्ट्री के पास किराए का कमरा ले रखा था. वहीं रहते हुए वह आईटीआई कर रहा था. 8 मार्च को बस्ती में चैनपुरवा ओवरब्रिज के नीचे से जो लाश मिली थी, वह प्रदीप कुमार उपाध्याय की ही थी.

मृतक की शिनाख्त तो हो गई, लेकिन पुलिस के लिए अब भी इस हत्याकांड का पर्दाफाश करना किसी चुनौती से कम नहीं था, क्योंकि हत्यारों ने कोई ऐसा सबूत नहीं छोड़ा था, जिस के आधार पर पुलिस हत्या के कारणों का पता लगा कर हत्यारों तक पहुंच पाती. लाश की शिनाख्त के बाद पुलिस टीम गोरखपुर की एल्युमिनियम फैक्ट्री के पास स्थित मृतक प्रदीप के किराए के कमरे पर पहुंची और आसपास के लोगों से पूछताछ की.

इस पूछताछ में पता चला कि मृतक की नान्हू पांडेय से गहरी मित्रता थी. लेकिन किसी बात को ले कर उस का नान्हू से झगड़ा हुआ था. पुलिस को लगा कि हो सकता है यही झगड़ा प्रदीप की हत्या का कारण बना हो. इस के बाद पुलिस ने मृतक प्रदीप के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला कि उस की जिला गोंडा के थाना मनकापुर के रहने वाले नान्हू से अक्सर बातें होती रहती थीं. इस के अलावा उस की काल डिटेल्स में एक नंबर और मिला, जिस पर सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर एक लड़की का निकला.

इस से पुलिस के सामने हत्या का कारण लगभग स्पष्ट हो गया. यह हत्या आशनाई की वजह से हुई थी, क्योंकि काल डिटेल्स के अनुसार वह लड़की कोई और नहीं, नान्हू पांडेय की बहन थी. इस के बाद पुलिस ने अखिलेश पांडेय उर्फ नान्हू पांडेय के जिला गोंडा थाना मनकापुर के गांव हरसिंहपुरवा स्थित घर छापा मारा. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. इस पर पुलिस ने मुखबिरों का जाल बिछा कर नान्हू की गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए. इस का नतीजा यह निकला कि पुलिस को नान्हू के छिपे होने के स्थान की जानकारी मिल गई. पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर विश्वास कर के जिला बस्ती के थाना पैकोलिया स्थित नान्हू पांडेय की ससुराल में छापा मारा.

पुलिस को आया देख कर उस ने अपने साले नीरज पांडेय और मित्र सुनील सिंह के साथ भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने तीनों को धर दबोचा. गिरफ्तारी के बाद तीनों को पूछताछ के लिए थाना पुरानी बस्ती लाया गया.

पुलिस ने जब नान्हू से प्रदीप की हत्या के बारे में पूछा तो पहले उस ने बहानेबाजी की, लेकिन जब पुलिस ने सबूतों के आधार पर उसे घेरा तो उस ने प्रदीप की हत्या की बात स्वीकार कर ली. उस ने बताया कि प्रदीप की हत्या उस ने अपने साले नीरज पांडेय, दोस्त सुनील सिंह और बृजकिशोर सिंह के साथ मिल कर 7 मार्च की रात को की थी. हत्या करने के बाद उस ने लाश बस्ती में हाईवे पर फेंक दी थी. हत्या की वजह उस ने अपनी बहन से प्रदीप के अवैध संबंध बताए. उस ने प्रदीप की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

फैजाबाद जिले का रहने वाला प्रदीप कुमार उपाध्याय गोरखपुर स्थित एल्युमिनियम फैक्ट्री के पास किराए का मकान ले कर आईटीआई कर रहा था. उस के पिता कृष्णदेव उपाध्याय रेलवे में थे. इस समय वह वाराणसी में हैं. प्रदीप का ज्यादातर समय गोरखपुर में बीतता था. हां, छुट्टियों में वह जरूर घर चला जाता था. गोरखपुर में ही उस की दोस्ती गोंडा जिले के रहने वाले हिस्ट्रीशीटर अखिलेश कुमार पांडेय उर्फ नान्हू पांडेय से हो गई. दोस्ती की वजह से प्रदीप उस के घर भी आनेजाने लगा.

नान्हू के घर जाने पर प्रदीप ने उस की बहन राधिका (काल्पनिक नाम) को देखा तो पहली ही नजर में वह उस के दिल में उतर गई. उसे पाने की तमन्ना लिए वह गोरखपुर वापस तो आ गया, लेकिन उस के लिए बेचैन रहने लगा. इस के बाद वह राधिका के लिए किसी न किसी बहाने अक्सर नान्हू के घर आनेजाने लगा. परिणामस्वरूप दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. एक समय ऐसा भी आया, जब दोनों दुनिया से बेखबर हो कर प्रेम के समंदर में गोते लगाने लगे. प्रेम गहराया तो राधिका ने कहा, ‘‘प्रदीप, मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. अब तुम शादी कर के मुझे अपनी दुलहन बना कर अपने घर ले चलो.’’

प्रदीप ने कहा, ‘‘कुछ दिन सब्र रखो, समय आने पर मैं अपने पिताजी से शादी की बात करूंगा.’’

प्रदीप ने राधिका से शारीरिक संबंध तो बना ही लिए थे, मोबाइल से उस के कुछ अश्लील फोटो भी खींच लिए थे. कहते हैं कि इश्क मुश्क छिपाए नहीं छिपते. इस मामले में भी यही हुआ. आखिर राधिका और प्रदीप के संबंधों की भनक नान्हू को लग गई. वह दोनों पर नजर तो रखने ही लगा, साथ ही उस ने प्रदीप से अपनी बहन से दूर रहने को भी कहा. लेकिन जब उसे पता चला कि प्रदीप और राधिका के संबंध हद से आगे बढ़ गए हैं तो उस ने प्रदीप से कहा कि वह राधिका से शादी कर ले.

प्रदीप ने शादी से तो मना कर ही दिया, साथ ही राधिका के अश्लील चित्रों के आधार पर उसे धमकी भी दी कि अगर उस ने उसे राधिका से मिलने से रोका तो वह उस की बहन के फोटो सार्वजनिक कर देगा. इतना सब होने के बाद भी प्रदीप नान्हू के घर राधिका से मिलने जाता रहा. यह नान्हू की सरासर बेइज्जती थी. उस ने गोरखपुर जा कर प्रदीप से काफी झगड़ा किया और उसे जान से मारने की धमकी दी.

7 मार्च, 2016 को नान्हू ने अपने साले नीरज तथा दोस्त सुनील के साथ मिल कर प्रदीप को ठिकाने लगाने की योजना बनाई और फोन कर के प्रदीप को मिलने के लिए बुलाया. प्रदीप गोरखपुर से बाघ एक्सप्रेस द्वारा मनकापुर आया, जहां पहले से मौजूद नान्हू और उस के साले से प्रदीप की कहासुनी हो गई. इस के बाद नान्हू और नीरज ने प्रदीप को पीटपीट कर अधमरा कर दिया. फिर अपने बदमाश मित्रों सुनील सिंह और बृजकिशोर सिंह को फोन कर के बुलाया और प्रदीप को होंडा सिटी कार में डाल कर बस्ती की ओर चल पड़े. रास्ते में उन्होंने प्रदीप के गले में रस्सी डाल कर कस दी, जिस से उस की मौत हो गई. इस के बाद वे लाश को चैनपुरवा हाईवे ओवरब्रिज के नीचे डाल कर लौट आए. होंडा सिटी कार नान्हू पांडेय की थी.

हत्याभियुक्त अखिलेश पांडेय उर्फ नान्हू पांडेय के ऊपर पहले से ही 12 मुकदमे दर्ज हैं, जिन में लूट, हत्या का प्रयास, छिनैती, गुंडा एक्ट, मारपीट और आर्म्स एक्ट जैसे संगीन अपराध शामिल हैं. उस के साले नीरज पर भी लूट, हत्या का प्रयास, विस्फोटक अधिनियम, धोखाधड़ी सहित दर्जन भर मुकदमे बस्ती जिले के विभिन्न थानों में दर्ज हैं. तीसरे हत्याभियुक्त सुनील सिंह पर भी गोंडा जिले के विभिन्न थानों में हत्या, लूट, गुंडा एक्ट, आर्म्स एक्ट सहित कई मुकदमें दर्ज हैं. चौथा अभियुक्त बृजकिशोर सिंह कथा लिखे जाने तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर था.

जबकि पकड़े गए हत्याभियुक्तों को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया गया था. घटना का परदाफाश करने वाली पुलिस टीम को एसपी ने 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की है. Illegal Relationship

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.

Crime Stories: नामो नामो और भेड़िया

Crime Stories: नामो मर्द का बच्चा था, उस ने गांव में ललकार कर कहा था कि वह अपनी एक टांग के बदले में दुश्मनों की एक लाश जरूर गिराएगा. वह तो ऐसा नहीं कर सका, पर…

एक दिन मैं अपने क्वार्टर में नाश्ता कर रहा था कि थाने से एक कांस्टेबल आया. उस ने आते ही बताया कि थाने से 2 ढाई मील दूर के एक गांव में हत्या हो गई है. मैं चाहता तो अपने हिसाब से आराम से जाता, लेकिन तब थानेदारों की ऐसी आदत नहीं थी. दूसरे अंगरेजों का जमाना था, जो ऐसे मामलों में लापरवाही बरदाश्त नहीं करते थे. इस के अलावा जल्दी पहुंचने का एक फायदा यह होता था कि घटनास्थल पर पैरों के निशान और दूसरे तमाम सबूत आराम से मिल जाते थे.

तैयार हो कर मैं सिपाही के साथ थाने पहुंचा तो वहां 3 आदमी मेरे इंतजार में बैठे थे. उन में से एक को मैं जानता था. वह उस गांव का नंबरदार था, जहां घटना घटी थी. दूसरे 2 लोगों में एक मृतक का भाई था. बातचीत से वह किसी सम्मानित परिवार का लगता था. उस ने अपना नाम मुख्तार बताया था और मरने वाले का नाम बख्तियार.

मुख्तार के बताए अनुसार, घटना कुछ इस तरह घटी थी. बख्तियार अपने खलिहान में सोया हुआ था. वहां सोने की वजह यह थी कि गेहूं की कटी फसल खेत में पड़ी थी. बख्तियार के बारे में उस ने बताया कि वह फौज का रिटायर हवलदार था. उस के पास सिंगल बैरल बंदूक थी, जिसे वह अपने पास रख कर सोता था. सुबह गांव का एक आदमी उधर से गुजरा तो उस ने देखा कि बख्तियार के धड़ का निचला हिस्सा चारपाई पर है और अगला हिस्सा चारपाई से नीचे गिरा पड़ा है.

बख्तियार को उस हालत में देख कर वह आदमी उस के पास तक गया तो उस ने देखा, चारपाई के नीचे खून जमा है. वह आदमी भाग कर मुख्तार के पास आया और उस ने यह बात मुख्तार को बताई तो वह गांव के नंबरदार को साथ ले कर खलिहान पहुंचा. बख्तियार मर चुका था, इसलिए दोनों बख्तियार के लड़के को साथ ले कर थाने आ गए. जब मैं सिपाहियों के साथ मौकाएवारदात पर पहुंचा, वहां काफी लोग इकट्ठा हो चुके थे. हमें देख कर लोग इधरउधर हो गए. मैं ने आगे बढ़ कर लाश का निरीक्षण किया. मृतक चारपाई से आधा लटका हुआ था, उस के दोनों हाथ आगे की ओर कुछ इस तरह फैले थे, जैसे मरने से पहले उस ने किसी चीज को पकड़ने की कोशिश की हो.

उस का चेहरा मिट्टी से लिथड़ा हुआ था. लाश से कुछ दूरी पर एक सिंगल बैरल बंदूक पड़ी थी. मृतक की आंखें खुली थीं. वह सुंदर पट्ठा जवान था. चेहरे से ही लगता था कि वह दबदबे वाला आदमी था. मेरे कहने पर 2 सिपाहियों ने लाश को सीधा कर के चारपाई पर लिटा दिया. मृतक के सीने और पेट पर खून जमा था. चाकू के 2 घाव सीने पर और एक लंबा घाव पेट पर था. सीने के घाव दिल के पास थे. मैं ने अंदाजा लगाया कि चाकू से दिल कट गया होगा, जिस से उस की मौत हो गई है.

सारी बातें नोट कर के मैं आसपास का निरीक्षण करने लगा. मैं ने हर चीज को बहुत बारीकी से देखी, लेकिन मुझे वहां कोई सबूत नहीं मिला. इस के बाद मैं ने पैरों के निशानों पर गौर किया तो एक ओर से एक आदमी के पैरों के निशान चारपाई की ओर आए थे. वे केवल आने के निशान थे, जाने के नहीं. इस से मैं ने अनुमान लगाया कि ये निशान मृतक के होंगे. मैं ने चारपाई की ओर घूम कर देखा तो सिरहाने की ओर मुझे एक जूते का निशान दिखाई दिया. वह दाएं जूते का निशान था. इस का मतलब यह था कि हत्यारा मृतक के सिरहाने की ओर से खेत से हो कर आया था. मैं आगे बढ़ा तो मुझे यह देख कर हैरानी हुई कि केवल दाएं पैर के जूते के निशान थे, बाएं पैर के जूते का कोई निशान नहीं था.

मैं ने बैठ कर ध्यान से देखा तो दाएं पैर के जूते के बराबर एक गोल सा निशान था, जो उस निशान के साथ चल रहा था. यह लाठी या बैसाखी का निशान हो सकता था. इस का मतलब हत्यारा बाईं टांग से लंगड़ा था, जो लाठी या बैसाखी के सहारे चलता था. मैं ने चारपाई के आसपास की जमीन को देखा, इन निशानों के अलावा वहां कोई और निशान नहीं था. इस का मतलब हत्यारा अकेला था. मैं ने कागजी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और मृतक के बड़े भाई मुख्तार को नंबरदार के घर बुलवा लिया. नंबरदार ने बताया कि मृतक अंग्रेजी फौज में हवलदार था. लड़ाई खत्म होने के 3 महीने बाद वह रिटायर हो कर घर आ गया था. वह दबंग आदमी था और गांव में दबदबा रखता था.

संपन्न घराने का बख्तियार फौज में पैसों के लिए नहीं, बल्कि मिलिट्रीमैन कहलाने के लिए भरती हुआ था. मैं नंबरदार से बात कर ही रहा था कि मृतक का बड़ा भाई मुख्तार आ गया. मैं ने नंबरदार को बाहर भेज कर उसे अंदर बुलाया. दुख जताने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘मृतक की किसी से दुश्मनी तो नहीं थी या इधर किसी से उस का झगड़ा तो नहीं हुआ था?’’

मुख्तार ने जवाब दिया, ‘‘हम दुश्मनी रखने वाले लोग हैं जी, हमारे यहां छोटेमोटे लड़ाईझगड़े तो होते ही रहते हैं. असल लड़ाई नहर पार के एक परिवार से है. उन के साथ कई बार लाठीडंडे चल चुके हैं.’’

‘‘क्या यह दुश्मनी इस हद तक है कि हत्या की नौबत आ जाए? क्या उन लोगों में इतनी हिम्मत है कि तुम्हारे घर में आ कर वे हत्या कर सकें?’’ मैं ने पूछा.

उस ने कहा, ‘‘दुश्मनी तो ऐसी ही है जी, वे लोग मारनेमरने से नहीं डरते.’’

‘‘दुश्मनी की वजह?’’

‘‘वास्तव में गलती हमारे ही आदमी की है. हम ने माफी भी मांगी, लेकिन उन लोगों का रवैया इतना बेइज्जती वाला था कि न चाहते हुए भी बात बढ़ गई और लाठियांडंडे और कुल्हाडि़यां तक चल गईं, जिस में कुछ उन के आदमी घायल हुए, कुछ हमारे.’’

‘‘थाने तक बात पहुंची थी?’’ मैं ने यह बात सोच कर पूछी थी कि थाने में उस लड़ाई का रिकौर्ड होगा.

मुख्तार ने बताया कि दोनों पक्षों में से कोई थाने नहीं गया था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या उन लोगों में कोई ऐसा आदमी है, जिस की बाईं टांग कटी हुई हो या बाईं टांग से लंगड़ाता हो.’’

‘‘बिलकुल है मलिकजी, लेकिन आप यह क्यों पूछ रहे हैं?’’ उस ने कहा.

‘‘मौकाएवारदात से पैरों के जो निशान मिले हैं, उन में दाईं टांग के जूते के निशान हैं, जबकि बाईं टांग के जूते की जगह बैसाखी या लाठी के निशान हैं.’’

मुख्तार ने बताया, ‘‘उस लंगड़े का नाम इनामुल्लाह है और वह नामो के नाम से मशहूर है. मुझे यकीन है कि हत्यारा वही है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘यह बात तुम इतने यकीन से पैरों के निशान की वजह से कह रहे हो?’’

‘‘यह बात नहीं है. इस की वजह यह है कि नामो की टांग हमारे साथ हुई लड़ाई में ही कटी थी,’’ मुख्तार ने कहा, ‘‘बड़ा ही जीवट वाला लड़का है, लड़ाई में हमारे किसी आदमी की कुल्हाड़ी उस की टांग में ऐसी लगी कि टांग की हड्डी कट गई. पहले तो वह गांव के झोलाछाप डाक्टरों से इलाज कराता रहा, जब टांग ठीक नहीं हुई तो शहर के अस्पताल गया. तब तक टांग में जहर फैल गया था. मजबूरी में डाक्टरों को उस की टांग काटनी पड़ी. गांव लौट कर उस ने कहा था कि दुश्मनों के एक आदमी को मार कर वह इस का बदला लेगा.’’

मुख्तार, जब्बार और बख्तियार, तीनों भाई संपन्न जमींदार थे. गांव में उन का दबदबा था. मुख्तार सब से बड़ा था, उस से छोटा जब्बार और बख्तियार सब से छोटा. मुख्तार का एक बेटा और 3 बेटियां थीं, जबकि जब्बार का एक बेटा था. जब वह 10 साल का था, तभी जब्बार हैजे से मर गया था. उस के बेटे को दोनों भाइयों ने मिल कर पाला था. उस का नाम गुलाम हुसैन था, लेकिन सब उसे गामो कहते थे, गामो एकदम स्वस्थ और काफी सुंदर था. गामो को शुरू से ही पहलवानी का शौक था. वह गांव की कबड्डी की टीम का लीडर था. आसपास के गांवों में उस की धूम थी. उस की कबड्डी की टीम दूसरे गांवों में भी खेलने जाया करती थी.

नहर पार वालों से उन का कांटेदार मुकाबला होता था. गामो के कारण उस के गांव की टीम का पलड़ा भारी रहता था. एक बार गामो की टीम नहर पार वाले गांव में कबड्डी खेलने गई और मैच जीत लिया. रास्ते में मालटा का एक बाग पड़ता था. जब वे बाग के पास से गुजर रहे थे तो उन्हें बाग की ओर से एक अधेड़ औरत आती दिखाई दी. उस औरत ने गामो के पास आ कर कहा कि वह उस से अकेले में बात करना चाहती है.

वह औरत उसे मालटा के बाग में ले गई. बाग में गहरा अंधेरा था. गामो को एक पेड़ के नीचे कोई खड़ा दिखाई दिया. अंधेरे की वजह से दूर से यह पता नहीं चला कि वह मर्द है या औरत. जब वह पास पहुंचा तो उस ने देखा कि वह एक सुंदर लड़की थी. गामो ने पीछे मुड़ कर उस औरत को देखा तो वह गायब थी.

‘‘तुम्हें मैं ने ही बुलाया है, बुरा तो नहीं लगा?’’ लड़की ने पूछा.

गामो ने कहा, ‘‘बुरा तो नहीं लगा, लेकिन मुझे यहां क्यों बुलाया है?’’

‘‘मेरा नाम फातिमा है, दिल के हाथों मजबूर हो कर मैं तुम से मिलना चाहती थी.’’

गामो ने उसे समझाया कि इस तरह वह बदनाम हो जाएगी, इसलिए वह उस का खयाल दिल से निकाल दे और वापस चली जाए.

‘‘औरत हो कर मैं ने इतना बड़ा कदम उठा लिया और तुम मर्द हो कर भी डर रहे हो. चाहो तो साफसाफ कह दो कि मैं तुम्हें अच्छी नहीं लगी. इस के बाद मैं कभी तुम्हारे रास्ते में नहीं आऊंगी.’’ फातिमा ने कहा.

गामो ने कहा, ‘‘तुम बहुत सुंदर हो फातिमा, मुझे अच्छी भी लगती हो, लेकिन तुम अपनी इज्जत का खयाल करो और वापस चली जाओ.’’

‘‘मुझे गलत मत समझना गामो, मैं तुम से सच्चा प्रेम करती हूं. मैं इस शर्त पर वापस जाऊंगी कि तुम मुझ से दोबारा मिलने का वादा करो, वरना मैं तुम्हारे पीछेपीछे तुम्हारे घर तक पहुंच जाऊंगी.’’

गामों ने उस से मिलने का वादा कर लिया. इस के बाद दोनों रोज मालटा के उसी बाग में मिलने लगे. गामो घोड़ी पर बैठ कर नहर पार से आ कर फातिमा से मिलता था. उन के मिलने की यह बात ज्यादा दिनों तक परदे में नहीं रह सकी. गामो और फातिमा के प्रेम के चर्चे पूरे गांव में फैल गए. जब इस बात की जानकारी फातिमा के घर वालों को हुई तो वे मरनेमारने को तैयार हो गए. उन्होंने फातिमा का घर से निकलना बंद कर दिया. इस के बावजूद फातिमा किसी न किसी तरह गामो से मिलने पहुंच जाती थी. फातिमा के बाप और भाइयों ने उस की पिटाई भी की, लेकिन वह नहीं मानी.

फातिमा की बिरादरी वालों ने ऐलान कर दिया कि अगर गामो उन के गांव के पास भी दिखाई दिया तो वे उस के हाथपांव तोड़ कर उसे हमेशा के लिए अपाहिज बना देंगे. इस पूरे मामले की जानकारी गामो के ताऊ और चाचा को हुई तो उन्होंने उसे समझाया कि वह यह चक्कर छोड़ दे. वह न तो पार वाले गांव में जाए और न ही फातिमा से मिलने की कोशिश करे. उस ने कहा कि अगर उस का रिश्ता फातिमा के घर भेजा जाए तो वह उन की बात मान लेगा.

लेकिन दोनों परिवार एक ही टक्कर के थे, इसलिए गामो की बात नहीं मानी गई. उन्हीं दिनों में बख्तियार फौज से आया था. उस के भाई मुख्तार ने कुछ आदमियों को तैयार कर के उस से कहा कि वह पार के गांव में जा कर गामो के लिए फातिमा के रिश्ते की बात करे. बख्तियार उन लोगों के साथ नहर पार कर के गांव पहुंचा तो गांव वालों ने उन की आवभगत की. सभी ने पूरे मामले पर बात कर के गामो के ताऊ मुख्तार की ओर से माफी मांगी. लेकिन जैसे ही इन लोगों ने फातिमा के रिश्ते की बात की, वे एकदम से बिगड़ गए. फातिमा की बिरादरी वालों ने कहा कि वे फातिमा का नाम भी न लें. सभी वापस आ गए. यह सुन कर गामो ने कहा कि कुछ भी हो, वह फातिमा को हासिल कर के रहेगा. उस के लिए उसे कुछ भी करना पड़े.

कुछ दिनों बाद गामो गांव से गायब हो गया. उसे सब जगह तलाशा गया, लेकिन वह कहीं नहीं मिला. 2 दिन बीत गए तो गामो के घर वालों को लगा कि गामो नहर पार वालों के हत्थे चढ़ गया है. उन्होंने 2 लोगों को नहर पार के गांव भेजा कि चुपके से पता करें कि गामो वहां तो नहीं पहुंचा. उन्होंने वापस आ कर बताया कि वह वहां नहीं है. अब उन के लिए गामो चिंता का विषय बन गया.

चौथे दिन फातिमा के गांव के लोग कुल्हाड़ी, भाले, लाठी और दूसरे हथियार ले कर गामो के गांव आ पहुंचे. उन का कहना था कि गामो को उन के हवाले करो. कुछ मिनटों में गामो की बिरादरी वाले भी हथियार ले कर मैदान में आ गए. बात खुली तो पता चला कि फातिमा रात के किसी वक्त घर से गायब हो गई थी. उन्हें पूरा यकीन था कि फातिमा गामो के साथ ही गई है. मुख्तार ने उन लोगों को बताया कि गामो तो 3 दिनों से गायब है, वे खुद ही उसे तलाश रहे हैं. फातिमा के घर वाले यह बात मानने को तैयार नहीं थे. उन का कहना था कि गामो गांव में ही कहीं छिपा है और फातिमा उसी के साथ है.

बात बढ़ कर मारपीट तक जा पहुंची तो दोनों ओर के 5-6 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. इसी लड़ाई में नामो की टांग पर कुल्हाड़ी लग गई थी, जिस की वजह उसे टांग से हाथ धोना पड़ा था. यहीं से दोनों परिवारों में दुश्मनी हो गई थी. मैं ने इस पर चिंतन किया तो लगा कि हत्या का कारण संभवत: यही है. मैं ने मुख्तार से 2-4 बातें और पूछीं, जो तफ्तीश के लिए जरूरी थीं. मुख्तार ने फातिमा की बिरादरी के एकएक आदमी का नाम ले कर हत्या का शक जताया. मैं ने उस का पूरा बयान लिख लिया. मेरे लिए यह आसान हो गया कि अब इधरउधर देखने के बजाय तफ्तीश एक ओर करनी थी.

कागजी काररवाई पूरी कर के मैं फातिमा के गांव पहुंचा और उस गांव के नंबरदार को ले कर नामो के घर गया. वहां हमें एक बैठक में बिठाया गया. कुछ देर बाद एक आदमी बैसाखी के सहारे चलता हुआ अंदर आया. उसे देख कर ही मैं समझ गया कि यही नामो है. वह बड़ा सुंदर और सजीला जवान था. ऐसे जवान को बैसाखी के सहारे चलते देख मुझे दुख हुआ.

मैं ने कहा, ‘‘सचमुच तुम मर्द हो, तुम ने अपना वचन पूरा कर के दिखा दिया.’’

‘‘कौन सा वचन?’’ उस ने हैरानी से पूछा, ‘‘आप किस वचन की बात कर रहे हैं जी?’’

मैं ने कहा, ‘‘याद करो नामो, जब तुम्हारी एक टांग कटी थी तो तुम ने रोनेधोने के बजाय ललकारते हुए कहा था कि अपनी एक टांग के बदले दुश्मन की एक लाश गिराओगे.’’

उस ने अपनी कनपटी पर अंगुली मारते हुए कहा, ‘‘ओह हां, वह तो मैं ने गुस्से में कह दिया था. लड़ाईझगड़े में घाव तो आते ही रहते हैं. मेरी टांग तो मेरी गलती के कारण कटी थी. शहरी डाक्टर ने कहा था कि अगर गांव के किसी झोलाछाप को न दिखा कर सीधे शहर आ जाते तो टांग ठीक हो सकती थी.’’

‘‘तो तुम ने अपनी टांग का बदला ले ही लिया?’’ मैं ने उस की बात को नजरअंदाज कर के कहा.

‘‘कैसा बदला जी,’’ उस ने परेशान होते हुए कहा, ‘‘मैं ने किस से बदला ले लिया?’’

‘‘इतना परेशान क्यों होते हो नामो, एक टांग वाला होते हुए भी तुम ने दुश्मन के घर में जा कर उस पर वार किया.’’ मैं ने कहा.

नामो की हालत देखने वाली थी. वह आंखें फाड़फाड़ कर मेरी ओर देख रहा था. अगर 2 टांग वाला होता तो शायद एकदम से उठ कर खड़ा हो जाता, लेकिन एक टांग का होने की वजह से वह कुरसी पर बैठेबैठे इधरउधर हिल रहा था.

‘‘आप क्या कह रहे हैं.’’ उस ने सिटपिटा कर कहा, ‘‘मैं ने किसी दुश्मन पर वार नहीं किया. आप किस दुश्नम की बात कर रहे हैं?’’

‘‘तुम अच्छी तरह जानते हो मैं किस दुश्मन की बात कर रहा हूं.’’ मैं ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘गामो को भूल गए, रात को गामो के चाचा की हत्या कर दी गई है. यह बताओ कि यह काम तुम ने अकेले किया या तुम्हारे साथ कोई और भी था?’’

मुझे उम्मीद थी कि मेरी बात सुन कर नामो उछल पड़ेगा और जोरशोर से मना करेगा. लेकिन उस ने कोई विशेष प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. उस ने कहा, ‘‘मैं गामो के चाचा की हत्या क्यों करने लगा? लेकिन हां, अगर कभी गामो सामने आ गया तो उस की हत्या जरूर करूंगा. और हां, हत्या कर के छिपाऊंगा भी नहीं, सीधा आप के पास चला आऊंगा.’’

‘‘अगर तुम मुझे साफसाफ बता दो तो मैं तुम्हारे बचाव के लिए रास्ता निकाल लूंगा. अगर नहीं मानोगे तो फिर मैं खुद ही साबित कर दूंगा कि यह हत्या तुम ने ही की है. उस के बाद मुझ से किसी भलाई की उम्मीद न रखना.’’

अभी मैं नामो से पूछताछ कर रहा था कि कांस्टेबल ने बताया कि नामो की बिरादरी के कुछ लोग मुझ से मिलना चाहते हैं. मैं ने कहा कि अभी किसी को भी अंदर मत आने दो. मैं अपराधी को उस समय कोई छूट नहीं देना चाहता था.

‘‘घटनास्थल पर तुम्हारे पैरों के निशान देखे गए हैं.’’ मैं ने उस के पैरों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘इस तरह के निशान और किसी के हो ही नहीं सकते, दाएं जूते का निशान और बाएं जूते की जगह बैसाखी का निशान. अब भी मना करोगे कि हत्या तुम ने नहीं की?’’

मेरी बात के जवाब में नामो कसम खाखा कर खुद को निर्दोष बताने लगा. लेकिन मैं उस की कोई बात मानने को तैयार नहीं था. पुलिस वाले अगर कसमों पर ऐतबार करने लगें और रोनेधोने से डर जाएं तो अपराधी जेल जा ही नहीं सकते. मैं ने घटनास्थल से मिलने वाले निशानों के मोल्ड बनवा लिए थे. वहां जमीन नर्म थी, निशान बिलकुल साफ दिखाई दे रहे थे. वे देसी जूते के निशान थे, जो देहात में ज्यादातर लोग पहनते थे. अब मुझे नामो के निशान से घटनास्थल पर पाए गए निशानों का मिलान करना था.

‘‘हत्या करने वाला हथियार कहां है, खुद दे दोगे तो ठीक रहेगा, नहीं तो घर की तलाशी ले कर मैं खुद बरामद कर लूंगा.’’

‘‘जब मैं ने हत्या ही नहीं की तो हथियार कहां से बरामद कराऊं.’’ नामो ने लगभग रोनी सूरत बनाते हुए कहा, ‘‘अगर तलाशी लेने का ही शौक है तो ले लो.’’

इस से मैं ने अनुमान लगाया कि हथियार घर में नहीं है. हत्या करने के बाद या तो इस ने नहर में फेंक दिया है या कहीं दबा दिया है. फिर भी मैं ने तलाशी लेने का फैसला किया. मैं ने कांस्टेबल को बुला कर कहा कि नामो के रिश्तेदारों को अंदर भेज दे. 3 आदमी अंदर आए, जो सम्मानित लग रहे थे. उन में से एक फातिमा का पिता था, दूसरा जो उम्र में सब से बड़ा था, वह नामो का पिता था. तीसरा नामो का ससुर था. मैं ने उन्हें पूरी जानकारी दे कर कहा कि वे नामो से कह दें कि वह अपना अपराध स्वीकार कर ले और हत्या का हथियार बरामद करा दे.

नामो ने अपराध स्वीकार करने से मना कर दिया. मैं ने उस के घर की तलाशी लेने के लिए 2 कांस्टेबल लगा दिए. नामो अपने मातापिता से अलग रहता था. एक गली छोड़ कर दूसरी गली में उस के मातापिता का घर था. इस से भी मैं ने अनुमान लगाया कि नामो का बाप झूठ बोल रहा है कि नामो सारा दिन अपने घर से नहीं निकला था. दोनों के घरों में काफी दूरी थी. मैं ने नामो को गिरफ्तार कर लिया, उस के घर की बारीकी से तलाशी ली गई. टीन के एक संदूक से एक बड़ा चाकू निकला, जो एक कपड़े में लपेट कर रखा था. यह कमानीदार चाकू था, जो उन दिनों अपराधी लोग रखा करते थे.

इस के अलावा एक बरछे का फल निकला, जो जरूरत पड़ने पर बांस में लगाया जा सकता था. मैं ने दोनों हथियार अपने कब्जे में ले लिए. मैं नामो को ले कर थाने आ गया. अब मुझे पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था. नामो की काररवाई कर के मैं दूसरे केसों में उलझ गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में हत्या का समय रात ढाई बजे के करीब लिखा था. मौत का कारण वही था, जो मैं ऊपर लिख चुका हूं. चाकू या कटार के वार से मृतक का दिल 2 जगह से कट गया था. पेट में गहरा घाव था, जिस से पेट की आंतें कट गई थीं.

मैं ने चाकू और बरछी मैडिकल टेस्ट के लिए भेज दीं, ताकि पता लग सके कि उन हथियारों पर खून के धब्बे तो नहीं थे. शाम तक रिपोर्ट आ गई, जिसे देख कर मैं चकरा गया. लिखा था कि दोनों हथियारों पर खून का कोई निशान नहीं मिला. शाम तक मृतक की लाश भी आ गई, जो कानूनी काररवाई कर के मृतक के घर वालों को सौंप दी गई. मैं समझ गया कि नामो ने हत्या कर के हथियार कहीं फेंक दिया है. अब उस से उगलवाना था कि हथियार कहां फेंका है? मैं ने एक कांस्टेबल से कहा कि वह नामो को हवालात से निकाल कर मेरे पास ले आए. अचानक मुझे मौकाएवारदात पर पाए गए निशानों का खयाल आ गया. कांस्टेबल उसे ले कर आ गया.

मैं ने कांस्टेबल को समझाया कि वह नामो को थाने के सहन में ले जा कर 10 कदम चलवाए और उस के बाद हवालात में बंद कर दे. कांस्टेबल मेरी बात समझ गया. उस ने उस के पैरों के निशान ले लिए और मुझे आ कर बता दिए. घटनास्थल पर मिले जूते के निशानों में जूते की तली में एड़ी की ओर ऐसा निशान उभरा था, जैसे जूता घिस गया हो और वहां चमड़े का टुकड़ा लगवाया गया हो. मैं ने नामो के खुरों के निशान देखे तो वे घटनास्थल पर पाए जाने वाले खुरों से बिलकुल अलग थे. मैं ने बैसाखी के निशान देखे तो वे भी अलग लगे. मैं ने अपने कमरे में जा कर कांस्टेबल को बुला कर कहा कि वह नामो को मेरे पास ले आए. वह उसे ले आया.

‘‘मैं तुम पर कोई दबाव नहीं बनाऊंगा, लेकिन तुम हत्या करना स्वीकार कर लो तो फायदे में रहोगे. एक बात याद रखो, यह आखिरी मौका है, इस के बाद मुझ से कोई उम्मीद मत रखना. घटनास्थल पर तुम्हारे खुरे मौजूद हैं, हत्या का कारण भी साफ है. तुम्हारे खिलाफ सबूत भी मजबूत हैं, बोलो बयान दोगे या नहीं?’’

‘‘मेरा बयान वही है, जो पहले दिया था. जब मैं ने हत्या की ही नहीं तो क्या बयान दूं. अगर मैं ने हत्या की होती तो मैं खुद थाने आ कर पेश हो जाता. अल्लाह गवाह है, वह मेरी मदद जरूर करेगा.’’

मुझे उस की बात में सच्चाई दिखाई दे रही थी. झूठा आदमी बयान देता है तो पता चल जाता है और सच बोलने वाले का चेहरा अलग ही पहचाना जाता है. मैं अपना शक दूर किए बिना नामो को छोड़ना नहीं चाहता था. मैं ने सोचा कि जरूरी नहीं कि नामो ने हत्या के समय यही जूते पहने हों. मैं ने एक कांस्टेबल से कहा कि वही नामो के घर जा कर उस के सारे जूते ले आए. साढ़े 11 बजे का समय. मुझ से एक कांस्टेबल ने कहा कि नामो का ससुर और बाप मिलना चाहता है. उन्होंने मेरे पास आ कर कहा कि वे नामो से मिल कर मुझ से बात करना चाहते हैं. मैं ने कहा कि अभी तफ्तीश चल रही है, इसलिए वे उस से नहीं मिल सकते.

नामो के बाप ने मेरे आगे हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘नामो पर दया करें मलिकजी. आप जो कहेंगे, आप की सेवा कर देंगे. अल्लाह ने हमें बहुत कुछ दिया है.’’

‘‘सेवा जरूर बताऊंगा, पहले मैं काम पूरा कर लूं. आप ऐसा करें, नामो से कहें मुझे सब कुछ सचसच बता दे. फिर मैं आप को सेवा बताऊंगा.’’

मेरी बात सुन कर वे एकदूसरे का मुंह देखने लगे. इतने में वह कांस्टेबल आ गया, जिसे मैं ने नामो के घर भेजा था. उस ने मुझे इशारे से बताया कि वह काम कर लाया है. मैं ने नामो के बाप और ससुर से कहा कि वे अच्छी तरह सोच लें, उस के बाद बताएं. उस के बाद मैं ने उन्हें भेज दिया. कांस्टेबल एक थैले में डाल कर 5 जोड़ी जूते ले आया था. उन में एक को छोड़ कर सभी जूते नए थे. पुराने जूते की तली में एक तला लगा हुआ था. मैं कांस्टेबल को ले कर उस जगह गया, जहां नामो के जूते के निशान थे. मैं ने कांस्टेबल से कहा कि वह नामो के दाएं पैर का जूता पहन कर कच्ची जमीन पर चले.

वह 8-10 कदम चला. मैं ने उन निशानों को ध्यान से देखा तो वे भी उन निशानों से थोड़े अलग थे. इस से मैं समझ गया कि नामो निर्दोष है. उस के अपराधी न निकलने से मेरी सारी मेहनत बेकार जा रही थी. मैं ने मुखबिरों को बुला कर आसपास के गांवों में ऐसे आदमी को ढूंढ़ने को कहा, जिस का बायां पैर कटा हुआ हो या फिर बाएं पैर की जगह वह बैसाखी के सहारे चलता हो. इस सारी काररवाई के बाद मैं ने नामो को छोड़ दिया. लेकिन उस से कह दिया था कि वह गांव से बाहर न जाए. अगर कहीं जाना हो तो थाने में बता कर जाए. अब मैं मुखबिरों के सहारे था. ऐसे आदमी को ढूंढ़ना कोई मुश्किल काम नहीं था.

मुखबिरों की कोशिश के बावजूद आसपास के गांवों में ऐसा कोई आदमी नहीं मिला. इस तरह 5 दिन बीत गए और मेरी तफ्तीश एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी. मैं हताश हो चला था. मैं अपने एसआई महेंद्र को नामो को लाने के लिए भेजने की सोच ही रहा था कि एक मुखबिर थाने आ गया. वह एक आदमी को साथ लाया था. मुखबिर ने बताया कि यह आदमी साथ वाले गांव में रहता है. जिस रात बख्तियार की हत्या हुई थी, उस की दूसरी सुबह यह एक शादी में गया था. रात को जब यह वापस आया तो इसे बख्तियार की हत्या की खबर मिली.

उसे यह भी पता चला कि पुलिस को एक ऐसे आदमी की तलाश है, जो बाईं टांग से लंगड़ा हो. इस आदमी ने बताया कि उस ने इस तरह का लंगड़ा आदमी घटना से एक दिन पहले देखा था. यह बात मुखबिर के कान में पड़ी तो वह उसे मेरे पास ले आया. मैं ने उस से पूरी बात बताने के लिए कहा. उस का नाम रूपकुमार था. उस के बताए अनुसार, वह घटनास्थल वाले गांव के साथ वाले गांव में रहता था. घटना से एक दिन पहले वह गांव के एक सिरे पर स्थित परचून की दुकान से कुछ सामान लेने गया था. वह दुकान एक रिटायर्ड फौजी की थी, जो विश्वयुद्ध में बर्मा के एक युद्ध क्षेत्र में घायल हो गया था. उस के घाव कुछ इस तरह के थे कि उस का दायां बाजू बेकार हो गया था. सब लोग उसे फौजी दुकानदार कहते थे.

रूपकुमार जब सौदा ले कर दुकान से निकलने लगा तो अचानक फौजी के घर का दरवाजा खुला. एक आदमी बैसाखी के सहारे घर से निकला और रूपकुमार को देख कर तुरंत अंदर चला गया. रूपकुमार ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया. उस से अगले दिन रूपकुमार अपने एक रिश्तेदार की शादी में चला गया. जब वह शादी से लौट कर आया तो उसे पता चला कि पास वाले गांव में एक आदमी की हत्या हो गई है. उस ने जब यह सुना कि पुलिस को एक लंगड़े हत्यारे की तलाश है तो उसे उस फौजी दुकानदार के घर से निकलने वाले लंगड़े की याद आ गई. उस ने लोगों से उस के बारे में बताया. बात फैलतेफैलते मेरे मुखबिर के कान तक पहुंची और वह उसे मेरे पास ले आया.

मैं ने रूपकुमार से कहा, ‘‘अगर वह लंगड़ा तुम्हारे सामने आ जाए तो क्या तुम उसे पहचान लोगे?’’

उस ने कहा, ‘‘मैं ने एक पल के लिए देखा था. लेकिन मैं उसे पहचान लूंगा, क्योंकि उस के चेहरे पर एक लंबा घाव का निशान था.’’

‘‘क्या तुम पूरे विश्वास से कह सकते हो कि उस की बाईं टांग नहीं थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं जी,’’ वह कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘मुझे ऐसा शक है कि वह अपनी दाईं टांग पर खड़ा था और उस की बैसाखी बाईं ओर थी. मैं ने एसआई महेंद्र को बुला कर कहा कि वह फौजी दुकानदार को अपने साथ ले आए.

2 घंटे बाद महेंद्र सिंह फौजी को ले आया. उस का नाम प्रकाश नारायण था, लेकिन लोग उसे फौजी कहते थे. वह मेरे कमरे में आया. सांवले रंग का वह साधारण सा आदमी था. शक्ल से गरीब घराने का लगता था. वह कुछ घबराया हुआ लग रहा था. उस ने हाथ जोड़ कर मुझे प्रणाम किया और एक ओर खड़ा हो गया. मैं ने उसे बैठने के लिए कहा. वह बैठ गया तो उस से इधरउधर की बातें करने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘वह लंगड़ा कहां है?’’

मेरा सवाल सुन कर प्रकाश ऐसा बिदका जैसे किसी ने सुई चुभो दी हो. वह हैरानी से मेरा मुंह देखने लगा. मैं ने सोच लिया कि उसे संभलने का मौका नहीं दूंगा.

उस ने कहा, ‘‘आप किस लंगड़े की बात कर रहे हैं, मैं समझा नहीं?’’

‘‘वही लंगड़ा, जिस के साथ मिल कर तुम ने हवलदार बख्तियार की हत्या की है.’’

यह सुनते ही प्रकाश ऐसे उछला, जैसे मैं ने उस पर बम फेंक दिया हो.

‘‘मेरे सामने झूठ बोलने की कोशिश मत करना प्रकाश, मेरे पास ऐसे कई गवाह हैं, जिन्होंने उस लंगड़े को तुम्हारे घर आतेजाते देखा है. अगर तुम ने झूठ बोला तो मैं तुम्हारा क्या हाल बनाऊंगा, सोच भी नहीं सकते. तुम्हारा एक हाथ तो बेकार है ही, दूसरा भी तोड़ दूंगा. फिर भीख मांगते फिरोगे.’’

वह हकला कर बोला, ‘‘मैं ने हत्या नहीं की है सर.’’

‘तो फिर किस ने की है?’’

‘‘जी, गुल्लू ने की है.’’ प्रकाश ने बड़ी मुश्किल से कहा.

‘‘यह गुल्लू कौन है, सीधी तरह उस का नाम बताओ?’’ मैं ने सख्ती से कहा.

‘‘उस का नाम गुलजार है, उसी को लंगड़ा गुल्लू कहते हैं.’’

‘‘हत्या के समय तुम उस के साथ थे?’’ मैं ने यह बात इसलिए कही कि वह मौके का गवाह हो सकता था..

‘‘नहीं सर,’’ उस ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘आप मुझ से चाहे जैसी कसम ले लें, हत्या के वक्त मैं उस के साथ नहीं था. वह अकेला ही था.’’

मैं ने प्रकाश से पूछा, ‘‘गुल्लू की बख्तियार से क्या दुश्मनी थी?’’

‘‘पुरानी बात है सर, गुल्लू ने अपना बदला लिया है. हवलदार की ही वजह से उस की टांग कटी थी.’’

प्रकाश ने जो बात बताई, उस के अनुसार, गुल्लू भी फौज में था और वह बख्तियार के साथ युद्ध में अगले मोरचे पर तैनात था. गुल्लू हवलदार के अधीनस्थ था. उस जमाने में हवलदार के अधीन 5 जवान हुआ करते थे. जंग जोरों पर थी. प्रकाश गुल्लू और 3 सिपाही बख्तियार के अधीन थे. एक दिन जापानियों का जोरदार हमला हो रहा था, बम बारिश की तरह बरस रहे थे. हवलदार बख्तियार ने गुल्लू को कोई काम बता कर कहा कि वह जा कर उस काम को करे. गुल्लू ने कहा कि हमले का जोर कम हो जाएगा तो वह उस काम को कर देगा.

हवलदार बहुत सख्त फौजी था, अनुशासन में रह कर काम करता था, अपनी बात मनवाने का आदी था. उस ने कहा, ‘‘यह काम अभी करो, मेरा आदेश है, नहीं तो तुम्हारे विरुद्ध काररवाई की जाएगी.’’

गुल्लू न चाहते हुए भी मोर्चे से बाहर चला गया. वह अभी कुछ दूर ही गया होगा कि एक गोला उस के पास आ कर फटा, जिस का एक छोटा टुकड़ा उस के मुंह पर लगा और दूसरा उस के घुटने पर. घाव इतना गहरा था कि डाक्टरों को उस की टांग काटनी पड़ी. गुल्लू को फौज से रिटायर कर दिया गया. इस घटना के लिए गुल्लू बख्तियार को ही जिम्मेदार मानता था. उस ने तभी प्रण कर लिया था कि वह उस से इस का बदला जरूर लेगा. कुछ दिनों बाद प्रकाश भी घायल हो कर गांव आ गया. गुल्लू को पता था कि प्रकाश हवलदार के साथ वाले गांव में रहता है.

प्रकाश और गुल्लू के पत्र के माध्यम से संबंध बने हुए थे. गुल्लू ने उस से कह रखा था कि बख्तियार जब भी गांव आए, उसे सूचित कर दे. जिन दिनों हवलदार बख्तियार गांव आया हुआ था. प्रकाश किसी काम से उस के गांव गया तो उसे पता चला कि वह गांव आया हुआ है. उस ने चिट्ठी लिख कर गुल्लू को हवलदार के गांव आने के बारे में बता दिया. गुल्लू प्रकाश के गांव आ गया और उस के घर में छिप गया. वह इतनी दूर से घोड़ी पर आया था. घटना वाली रात गुल्लू ने प्रकाश को बताया कि वह हवलदार का काम तमाम करने जा रहा है और वहीं से अपने गांव चला जाएगा.

गुल्लू अपनी घोड़ी पर बैठ कर रात को ही चला गया, अगले दिन प्रकाश को पता चला कि बख्तियार की हत्या हो गई है. मैं ने प्रकाश से गुल्लू के गांव का पता पूछा. उस ने जो पता बताया, वह मेरे थाने से 6-7 मील दूर था और मेरे इलाके में नहीं आता था. मैं ने प्रकाश का पूरा बयान लिखा और उसे गिरफ्तार कर के हवालात में बंद कर दिया.

मैं समय नष्ट करना नहीं चाहता था. मैं ने 2 कांस्टेबलों को साथ लिया और गुल्लू को गिरफ्तार करने चल दिया. मैं उस इलाके के थानेदार से मिला. वह एक सिख था. उस का नाम गजेंद्र सिंह था, उस ने मेरी बड़ी आवभगत की. मैं ने उसे अपने आने के बारे में बताया.

‘‘आप जलपान करें मलिकजी, आप का मुलजिम आप को मिल जाएगा.’’ कह कर उस ने एक हैडकांस्टेबल और 2 सिपाहियों को इस आदेश के साथ गुल्लू के गांव भेज दिया कि वे उसे गिरफ्तार कर के थाने ले आएं.

आधे घंटे बाद हैडकांस्टेबल और सिपाही एक आदमी को ले आए. मैं उसे देखते ही समझ गया कि यही गुल्लू है. वह दाईं टांग से बैसाखी पर चल रहा था. वे लोग उसे तांगे पर बिठा कर लाए थे. मैं ने देखा कि उस के चेहरे पर गहरे लंबे घाव का निशान था. गुल्लू ने वैसी ही जूती पहनी हुई थी. मैं ने उस की जूती उतरवा कर देखी तो उस के नीचे तला लगा हुआ था. गजेंद्र सिंह ने कानूनी काररवाई पूरी कर के अपराधी मेरे हवाले कर दिया. मैं उसे ले कर अपने थाने लौट आया.

रात को मैं ने गुल्लू को अपने कमने में बुलाया तो हैडकांस्टेबल ने उसे मेरे सामने ला कर खड़ा कर दिया. उस की आंखें नींद से भारी हो रही थीं. मैं ने हैडकांस्टेबल को इशारा किया कि इसे सोने मत देना. जैसे ही उसे झपकी आती, वह उस के बाल पकड़ कर जोरदार झटका देता. मैं ने उसे खड़ा रखने को कहा.

‘‘तुम अपनी गिरफ्तारी का कारण समझ गए हो गुल्लू,’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें ऐसे ही गिरफ्तार नहीं किया, मेरे पास तुम्हारे खिलाफ पक्के सबूत हैं और गवाह भी. तुम ने हवलदार बख्तियार की हत्या की है, मौकाएवारदात पर तुम्हारी जूतियों के निशान मिले हैं. इस के अलावा तुम्हारे दोस्त प्रकाश ने सब कुछ उगल दिया है और हत्या का कारण भी बता दिया है. अब तुम्हारे पास हत्या की बात स्वीकार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.’’

‘‘हां, उस भेडि़ए की हत्या मैं ने ही की है.’’ उस ने नींद से पीछा छुड़ाने के लिए अपने सिर को झटका देते हुए कहा, ‘‘मैं ने उस से बदला ले लिया है. अब मैं जिंदा नहीं रहना चाहता. पूछो, क्या पूछते हो?’’

मैं ने उसे अपने सामने कुरसी पर बिठा दिया. उस ने अपना काफी लंबा बयान दिया, जिसे मैं यहां छोटा कर के बता रहा हूं.

बात उन दिनों की थी, जब विश्वयुद्ध जोरों पर था. जो भी हृष्टपुष्ट जवान दिखाई देते थे, उसे भरती कर लिया जाता था. गरीब घर का गुल्लू जवान था. उस का बाप दूसरों की जमीन ले कर बटाई पर खेती करता था. गुल्लू को यह काम पसंद नहीं था. गुल्लू भी फौज में भर्ती हो गया. उस ने सोचा कि साल, 2 साल में पैसा इकट्ठा हो जाएगा तो शादी कर लेगा. गुल्लू के 2 बड़े भाई थे, जो विवाहित थे. जब लड़ाई ने जोर पकड़ा तो गुल्लू की यूनिट को अगले मोर्चे पर जाने का आदेश मिला. वह बर्मा का मोर्चा था.

जापानी फौज तेजी से आगे बढ़ती हुई बर्मा तक पहुंच गई थी. प्रकाश भी इसी यूनिट में था. गुल्लू और प्रकाश में दोस्ती हो गई थी. बख्तियार इस यूनिट का हवलदार था. प्रकाश और गुल्लू उस के अधीन सिपाही थे. हवलदार बख्तियार बहुत सख्त था. जब वह गुस्से से बात करता था तो उस की आवाज ऐसी निकलती थी, जैसे कोई भेडि़या गुर्रा रहा हो.

प्रकाश और गुल्लू अकसर उस की सख्ती का निशाना बनते थे. गुल्लू तो उस से इतना तंग आ चुका था कि एक दिन उस ने प्रकाश से कहा कि किसी दिन गोलाबारी के बीच वह इस भेडि़ए को गोली मार देगा. लेकिन उसे इस का मौका कभी नहीं मिला. उस के बाद वह घटना घट गई, जिस में उस की टांग चली गई. गुल्लू बेकार हो कर घर आ गया. लंगड़ा होने के साथसाथ चेहरे पर जो घाव आए थे, उस से वह बदसूरत हो गया था. उस की हालत देख कर उस की बूआ ने उस से रिश्ता तोड़ने के लिए कह दिया. गुल्लू को इस का बहुत दुख हुआ. इतना ही नहीं, उस की मंगेतर ने भी कह दिया कि एक लंगड़े और बदसूरत आदमी के साथ वह पूरा जीवन नहीं गुजार सकती.

गुल्लू इस सब का जिम्मेदार बख्तियार को मानता था. वह उस से इतनी अधिक घृणा करने लगा कि अगर उस का बस चलता तो जंग में ही उसे गोली मार देता. उस के एक महीने बाद प्रकाश भी घायल हो कर घर आ गया. दोनों में पक्की दोस्ती हो गई. खतोखिताबत होने लगी. गुल्लू को पता था कि बख्तियार प्रकाश के साथ वाले गांव में रहता है. उस ने प्रकाश से कह रखा था कि जब भी बख्तियार घर आए, उसे जरूर सूचना दे दे. युद्ध समाप्त हो गया तो हवलदार बख्तियार रिटायर हो कर अपने गांव आ गया. प्रकाश को पता चला तो उस ने गुल्लू को पत्र द्वारा सूचना दे दी.

सूचना मिलते ही गुल्लू एक घोड़ी पर सवार हो कर प्रकाश के घर आ गया. घर से चलते समय उस ने एक लंबा तेज धार वाला चाकू अपने पास रख लिया था. दिन के समय प्रकाश और गुल्लू घोडि़यों पर सवार हो कर बख्तियार के गांव चले गए. वे गांव के अंदर न जा कर बाहर से चक्कर काट कर खेतों की ओर चले गए. प्रकाश ने यह पता कर लिया था कि बख्तियार रात को खेतों में सोता है और उस के पास एक बंदूक भी है, जिसे वह अपने पास रखता है.

प्रकाश ने दूर से गुल्लू को वह खेत दिखा दिए, जहां बख्तियार सोता था. गुल्लू को जगह दिखा कर वह वापस आ गया. अब गुल्लू बेचैनी से रात का इंतजार करने लगा. आधी रात के समय वह प्रकाश के घर से निकला. दोनों के बीच यह तय हुआ था कि अगर गुल्लू हवलदार की हत्या करने में कामयाब हो गया तो वापस नहीं आएगा और अगर कामयाब नहीं हुआ तो फिर प्रकाश के घर आ जाएगा. आधी रात का समय था. जब गुल्लू बख्तियार के गांव के बाहर होता हुआ खेतों की तरफ पहुंचा. उस ने दूर से देखा तो हवलदार एक चारपाई पर सोता दिखाई दिया. वह अपनी घोड़ी को धीरेधीरे चला कर खेत के किनारे पहुंच गया. वहां से वह हवलदार की ओर बढ़ा. हवलदार उस वक्त गहरी नींद सोया हुआ था.

गुल्लू किसी तरह की आहट किए बिना हलवदार के सिर की ओर पहुंच गया. सिर की ओर इसलिए कि अगर उस की आंख खुल भी जाए तो वह दिखाई न दे. उस ने बैसाखी जमीन पर रखी और चाकू निकाल कर हवलदार के सीने में भोंक दिया. चाकू लगने पर हवलदार एक झटके के साथ उठा और उस के मुंह से भयानक चीख निकली. उस ने बाएं हाथ से बंदूक पकड़ी, लेकिन तब तक गुल्लू ने चाकू का दूसरा वार कर दिया. बंदूक हवालादार के हाथ से छूट कर जमीन पर गिर पड़ी. गुल्लू उस समय बदले की भावना से पागल हो गया था. उस ने तीसरा वार हवलदार के पेट पर कर के पेट फाड़ दिया.

हवलदार मुंह के बल आधा चारपाई से नीचे गिर गया, जबकि उस का आधा धड़ चारपाई पर ही रहा. इस से उस की जान निकल गई. गुल्लू ने खून से सना चाकू हवलदार के कपड़ों से साफ कर के अपनी जेब में रख लिया. फिर बैसाखी उठाई और घोड़ी पर सवार हो कर अपने गांव चला गया. मैं ने उस से पूछा कि वह चाकू कहां है, जिस से हवलदार की हत्या की थी? उस ने बताया कि घर में मचान पर फेंक दिया था. मैं ने उस का पूरा बयान लिख कर उस के हस्ताक्षर करा लिए और उसे ले कर चाकू बरामद करने चला गया. उस के गांव पहुंच कर नंबरदार और 2 सम्मानित व्यक्तियों को साथ ले कर गुल्लू के घर गया, जहां गुल्लू ने मचान से चाकू बरामद करा दिया.

मैं ने गुल्लू को मैजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के उस का बयान करा दिया. गुल्लू ने वही बयान मजिस्ट्रैट के सामने भी दिया. मौके का कोई गवाह नहीं था. अगर गुल्लू अपने बयान से पलट जाता तो बच जाता. लेकिन उसे अब जिंदा रहने में कोई रुचि नहीं थी. उस ने बताया कि अपंग होने के कारण उस के भाई और भाभियां उसे बोझ समझते हैं. सेशन जज ने गुल्लू को मृत्युदंड दिया, जबकि प्रकाश को उस का साथ देने के लिए 5 साल के कारावास की सजा दी. हाईकोर्ट में गुल्लू के बाप ने अपील की, जहां उस के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया गया. गुल्लू की जान बचने पर उस के बाप को खुशी हुई, लेकिन गुल्लू को कोई खुशी नहीं हुई थी. Crime Stories

 

Suspicious Death Case: दिल्ली मेट्रो के लेडीज वाशरूम में मिला शव, मची सनसनी

Suspicious Death Case: एक हैरान कर देने वाली घटना ने दिल्ली में सनसनी फैला दी है. मेट्रो स्टेशन के एक लेडीज वाशरूम से एक संदिग्ध हालात में शव मिलने की खबर ने हर किसी को चौंका दिया. सूचना मिलते ही लोगों में डर और जिज्ञासा दोनों फैल गए. आखिर यह व्यक्ति कौन था और वह वहां कैसे पहुंचा, यह सवाल सभी के मन में उठने लगे. आइए जानते हैं इस पूरे मामले की पूरी कहानी विस्तार से.

मामला दिल्ली के इंद्रलोक मेट्रो स्टेशन का है, जहां शनिवार की शाम अचानक हलचल बढ़ गई. स्टेशन के भीतर स्थित लेडीज वाशरूम से एक व्यक्ति का शव बरामद होने की जानकारी सामने आई.
इस घटना के बाद पूरे मेट्रो परिसर में अफरातफरी का माहौल बन गया. मौके पर पहुंची मेट्रो पुलिस ने स्थिति को संभालते हुए जांच प्रक्रिया शुरू कर दी.

पुलिस के अनुसार, 25 अप्रैल, 2026 की शाम लगभग साढ़े 5 बजे मेट्रो थाना नेताजी सुभाष प्लेस (एनएसपी) को एक कौल प्राप्त हुई. कौल करने वाले ने बताया कि इंद्रलोक मेट्रो स्टेशन के वाशरूम का दरवाजा काफी समय से अंदर से बंद है और वहां से तेज बदबू आ रही है. सूचना मिलते ही पुलिस की टीम बिना देर किए मौके पर पहुंच गई और स्थिति का जायजा लिया. जब पुलिस ने जांच की तो पाया कि वाशरूम अंदर से बंद था. काफी प्रयासों के बावजूद दरवाजा नहीं खुला, जिस के बाद उसे तोड़ना पड़ा.

दरवाजा खुलते ही अंदर का दृश्य देखकर सभी सन्न रह गए. करीब 40 साल के एक व्यक्ति का शव फंदे से लटका हुआ पाया गया, जो बेहद चौंकाने वाला था.
शुरुआती जांच में यह बात सामने आई कि मृतक शायद उसी टायलेट कौंप्लेक्स में काम करने वाला केयरटेकर था.

एक व्यक्ति ने पुलिस को बताया कि उस ने उसे आखिरी बार करीब 2 दिन पहले देखा था. इस के बाद से वह नजर नहीं आया था, जिस से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि शव 2 दिन पुराना हो सकता है. मामले की गंभीरता को देखते हुए क्राइम टीम को भी जांच के लिए बुलाया गया.
फिलहाल पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर दिल्ली के बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर हौस्पिटल की मोर्चरी में 72 घंटे के लिए सुरक्षित रखवा दिया है.

मेट्रो प्रशासन की मदद से मृतक की पहचान की कोशिश जारी है. पुलिस ने भारतीय नागरिक संहिता (BNS) की धारा 194 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि यह आत्महत्या का मामला है या इस के पीछे कोई और रहस्य छिपा हुआ है. Suspicious Death Case

Crime Story: सिपाही ने किया खुद का अपहरण

Crime Story: दिल्ली पुलिस का सिपाही रविंद्र एक समृद्ध परिवार से था. लेकिन अपनी बुरी लतों की वजह से उस पर लाखों रुपए का कर्ज हो गया. इस कर्ज को अदा करने और सुखसुविधाओं वाली जिंदगी जीने के लिए उस ने अपने अपहरण का जो ड्रामा रचा, उस से आखिर उसे क्या मिला…

किसी पुलिस वाले के साथ कोई वारदात पेश आ जाए तो पूरा पुलिस विभाग बिजली की सी गति से सक्रिय हो जाता है. इस की 2 प्रमुख वजहें होती हैं. एक तो यह कि वह विभाग का आदमी होता है, दूसरे प्रतिष्ठा दांव पर लगने के साथ कानूनव्यवस्था पर भी सवालिया निशान लग जाते हैं. सिपाही रविंद्र के मामले में भी ऐसा ही हुआ था. उस के अपहरण की खबर से पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया था.

उत्तर प्रदेश के कृषि प्रधान जनपद बागपत के एसएसपी रविशंकर छवि ने एएसपी विद्यासागर मिश्र और सीओ श्वेताभ पांडेय के निर्देशन में आननफानन में पुलिस टीमों का गठन कर उस की तलाश में लगा दिया था. रविंद्र के अपहरण से न सिर्फ उस के परिवार वाले परेशान थे, बल्कि गांव वाले भी हैरान थे. अपहर्त्ताओं ने उसे छोड़ने के बदले 20 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी. सिपाही रविंद्र कुमार जिला बागपत के थाना चांदीनगर के गांव ढिकौली का रहने वाला था. वह दिल्ली पुलिस में था और उस समय दिल्ली के थाना नरेला में तैनात था.

उस का परिवार काफी मजबूत हैसियत और रसूख वाला था. उस के पिता राजकुमार दिल्ली पुलिस से सबइंसपेक्टर सेवानिवृत्त हुए थे. गांव में उन के पास काफी खेतीबाड़ी थी. रविंद्र का एक और भाई था सुधीर, जो गांव में ही रहता था. दिल्ली के थाना नरेला में तैनात रविंद्र, बीचबीच में छुट्टी ले कर घर भी आता रहता था. वह छुट्टी पर घर आया था, तभी 22 फरवरी, 2016 की सुबह रहस्यमय स्थितियों में उस का अपहरण हो गया था. अपहरण की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अमर सिंह पंवार पुलिस बल के साथ उस के घर पहुंच गए थे. मामला चूंकि सिपाही के अपहरण का था, इसलिए एएसपी विद्यासागर मिश्र और सीओ श्वेताभ पांडेय भी पहुंच गए थे.

रविंद्र के घर वालों ने पुलिस को जो बताया, उस के अनुसार रविंद्र सुबह 10 बजे के करीब घर से थोड़ी दूरी पर अपने चचेरे भाई सत्यवीर और पड़ोसी सुकरमपाल से बातें कर रहा था. सत्यवीर और सुकरमपाल अपनेअपने घर चले गए. रविंद्र भी अपने घर की ओर आ रहा था, तभी वह रहस्यमय स्थितियों में गायब हो गया था. वह कहां, किस के साथ गया, इस की किसी को खबर नहीं थी. उस के घर वालों ने सोचा कि वह छुट्टी पर आया है, इसलिए गांव में किसी से मिलने चला गया होगा. लेकिन दोपहर 12 बजे के आसपास सुधीर के मोबाइल पर उस के मोबाइल से फोन आया. सुधीर ने फोन उठा कर पूछा, ‘‘हैलो रविंद्र कहां हो तुम?’’

सुधीर को तब झटका लगा, जब पलभर की खामोशी के बाद दूसरी ओर से रविंद्र के बजाय किसी दूसरे आदमी की आवाज आई, ‘‘रविंद्र हमारे कब्जे में है. अगर तुम उसे सहीसलामत पाना चाहते हो तो बहुत जल्द 20 लाख रुपए का इंतजाम कर लो.’’

यह सुन कर सुधीर के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह सन्न रह गया. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘अ…अ…आप कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘इस बात पर ज्यादा ध्यान मत दो. जितना कहा है, उतना करो.’’ कुछ पल रुक कर फोन करने वाले ने कहा, ‘‘और हां, पुलिस को खबर करने की गलती मत करना, वरना हम रविंद्र को जिंदा नहीं छोड़ेंगे.’’

इतना कह कर फोन करने वाले ने फोन काट दिया. उस ने पलट कर फोन किया तो मोबाइल स्विच्ड औफ हो चुका था. इस से घर वाले घबरा गए. रविंद्र की जान खतरे में थी. अपहर्त्ता उस के साथ कुछ भी कर सकते थे. अपहर्त्ताओं ने पुलिस में न जाने की धमकी दे कर उलझन पैदा कर दी थी. घर वालों ने आपस में विचारविमर्श किया. वे किसी नतीजे पर पहुचं पाते, एक घंटे बाद दोबारा दूसरे नंबर से फोन आया. इस बार उस ने कहा, ‘‘पैसे का इंतजाम जल्द से जल्द करो. पैसा कहां पहुंचाना है, इस के लिए हम दोबारा फोन करेंगे.’’

‘‘रविंद्र को कुछ नहीं होना चाहिए.’’ रविंद्र के घर वालों ने कहा.

‘‘कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर पैसे नहीं मिले और तुम ने पुलिस को खबर कर दी तो हम अपना वादा भूल जाएंगे. फिर वह आप को जिंदा नहीं मिलेगा.’’ अपहर्त्ता ने धमकी भरे लहजे में कह कर फोन काट दिया.

राजकुमार बेटे के अपहरण से बुरी तरह परेशान थे. उन्होंने पुलिस की नौकरी की थी. मामले को छिपाना ठीक नहीं था, इसलिए उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी. इस के बाद पुलिस उन के घर पहुंच गई. पुलिस को उम्मीद थी कि अपहर्त्ताओं ने रविंद्र को आसपास कहीं खेतों में छिपा दिया होगा, इसलिए पुलिस ने आसपास के खेतों में उस की तलाश शुरू कर दी. लेकिन इस का कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस ने गांव के अन्य लोगों से इस उम्मीद में पूछताछ की कि कोई सुराग या चश्मदीद मिल जाए. लेकिन इस का भी कोई फायदा नहीं हुआ. इस बीच थाने में रविंद्र के भाई सुधीर की तहरीर पर अज्ञात अपहर्त्ताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पुलिस अधिकारी पसोपेश में थे. इस बात का अंदेशा था कि रविंद्र का अपहरण किसी बड़े गिरोह ने किया होगा. अपहर्त्ता उसे नुकसान भी पहुंचा सकते थे. क्राइम ब्रांच की टीम को भी इस मामले में लगा दिया गया. अगले दिन रविंद्र के अपहरण की खबर अखबारों में छपी तो जिले में सनसनी फैल गई. थानाप्रभारी अमर सिंह पंवार अपने सहयोगियों एसआई सतबीर सिंह भाटी और कर्मवीर सिंह के साथ सुरागरसी में लगे थे. जिस नंबर से अपहर्त्ताओं का फोन आया था, पुलिस ने उस नंबर की जांच की. उस की लोकेशन गाजियाबाद जिले के लोनी इलाके की पाई गई.

तुरंत एक पुलिस टीम गाजियाबाद भेजी गई. पुलिस के साथ रविंद्र के घर वाले और नातेरिश्तेदार भी अपने स्तर से उस की खोजबीन में जुटे थे. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. दिल्ली पुलिस को भी इस की सूचना दे दी गई थी. अपने सिपाही के अपहरण के बारे में जान कर थाना नरेला पुलिस सन्न रह गई थी. अपहर्त्ताओं ने उस दिन के बाद घर वालों से कोई संपर्क नहीं किया था. इस बात ने पुलिस की चिंता और बढ़ा दी थी. पुलिस रविंद्र की खोजबीन में लगी थी कि एक नाटकीय घटना घट गई. अगले दिन रविंद्र ने शाम को अपने घर वालों को फोन किया कि वह खेकड़ा इलाके में रेलवे स्टेशन के पास है, वे उसे लेने आ जाएं. घर वाले वहां पहुंचे तो रविंद्र डरासहमा खड़ा मिल गया. वे उसे घर ले आए.

इस की सूचना पुलिस को दी गई तो पुलिस उस के घर पहुंच गई. उस की सकुशल रिहाई से घर वाले खुश थे. इस बीच चर्चएं भी चलीं कि घर वाले उसे फिरौती दे कर ले आए हैं. रविंद्र बेहद हताश नजर आ रहा था. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि सुबह जब वह घर की ओर जा रहा था, तभी एक कार उस के पास आ कर रुकी. कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे शख्स ने उस की तरफ एक विजिटिंग कार्ड बढ़ा कर कहा, ‘‘भाईसाहब, यह पता बता देंगे?’’

रविंद्र विजिटिंग कार्ड चेहरे के नजदीक ला कर पढ़ने लगा, तभी उसे चक्कर आ गया. बस उतने में ही कार सवार बदमाशों ने उसे खींच कर कार में डाल लिया. रविंद्र के अनुसार, विजिटिंग कार्ड में कोई ऐसा नशीला पदार्थ था, जो सांसों के जरिए शरीर में गया और उसे चक्कर आ गया. बदमाशों ने उस के साथ मारपीट कर के उस का मोबाइल छीन लिया. एक बदमाश ने कहा, ‘‘हम ने तुम्हारा अपहरण किया है. अब हम तुम्हें तभी छोडेंगे, जब हमें 20 लाख रुपए मिल जाएंगे.’’

रविंद्र ने पूरी ताकत से विरोध किया, छूटने की भी कोशिश की. इस पर बदमाशों ने उस के साथ मारपीट कर के हथियार तान कर कहा, ‘‘जरा भी चालाकी दिखाई तो तुम्हारा काम तमाम कर देंगे.’’

वे कार से उसे कहीं दूर ले गए और खेत में बांध कर बैठा दिया. इस बीच उन्होंने जबरन उसे नशे की गोलियां खिला कर उसे पानी पिला दिया. बीचबीच में उसे होश आता रहा. वह बुरी तरह आतंकित था. अगले दिन बदमाश आपस में बातें कर रहे थे कि मामला पुलिस तक पहुंच गया है. पुलिस एड़ीचोटी का जोर लगा रही है. इसलिए इसे ज्यादा रखा गया तो खतरा बढ़ सकता है. पुलिस एनकाउंटर के डर से शाम के समय वे उसे कार में डाल कर खेखड़ा कस्बे तक लाए और स्टेशन के पास धकेल कर चले गए.

पुलिस ने रविंद्र से बारीकी से पूछताछ करनी चाही तो उस ने कहा, ‘‘सर, मेरी तबीयत अभी ठीक नहीं है. मेरे साथ जो हुआ है, मैं उसे भूलना चाहता हूं. मैं ने कभी सोचा भी नहीं था कि बदमाश मेरा ही अपहरण कर लेंगे.’’

पुलिस को लगा कि इस की मनोस्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन यह साफ हो गया था कि पुलिस के बढ़ते दबाव के चलते अपहर्त्ताओं ने उसे छोड़ दिया था. रविंद्र भले ही अपहर्त्ताओं के चंगुल से छूट कर आ गया था, लेकिन पुलिस अपहर्त्ताओं तक पहुंचना चाहती थी. अपहर्त्ताओं के नंबर के साथ पुलिस ने अगले दिन रविंद्र के मोबाइल की भी लोकेशन हासिल कर ली. उसे देख कर पुलिस को हैरानी हुई, क्योंकि रविंद्र के मोबाइल की लोकेशन उन स्थानों से नहीं मिल रही थी, जहांजहां उस ने अपहर्त्ताओं द्वारा ले जाने की बात बताई थी.

अपहरण के बाद उस के मोबाइल की लोकेशन दिल्ली के नांगलोई की भी थी. यह बड़ी अजीब बात थी. पुलिस ने उस से गहराई से पूछताछ करनी चाही तो वह कन्नी काटते हुए बोला, ‘‘सर, जो होना था, सो हो गया. जांच करने से क्या फायदा. बदमाशों ने मुझे जिंदा छोड़ दिया, यही बहुत बड़ी बात है, वरना वे मेरी जान भी ले सकते थे.’’

यह बात पुलिस अधिकारियों को अजीब लगी. क्योंकि रविंद्र खुद पुलिस वाला था. वह पुलिस जांच में सहयोग देने से न जाने क्यों कतरा रहा था. इस से पुलिस को दाल में काला नजर आने लगा. लेकिन कोई पुख्ता वजह पुलिस के हाथ नहीं लगी. इस बीच पुलिस को पता चला कि अपहर्त्ताओं ने जिस नंबर से फिरौती के लिए फोन किया था, वह सिमकार्ड दिल्ली के नरेला से खरीदा गया था. जांच को दिशा मिली तो पुलिस सिम बेचने वाले तक पहुंच गई. पुलिस ने सिम बेचने वाले अबरार को हिरासत में ले लिया.

अबरार नरेला का ही रहने वाला था और मोबाइल की दुकान चलाता था. पुलिस ने जब उस से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, सुन कर पुलिस चकरा गई. पता चला कि वह सिम सिपाही रविंद्र ने ही खरीदा था. जांच नाटकीय मोड़ पर आ गई. पुलिस ने 25 फरवरी को रविंद्र को हिरासत में ले लिया. पहले तो वह सिम खरीदने वाली बात से इनकार करता रहा, लेकिन जब पुलिस ने मोबाइल लोकेशन दिखा कर अबरार से उस का सामना कराया तो वह टूट गया. पुलिस ने जब उस से विस्तार से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, वह बेहद चौंकाने वाला था.

बुरी लतों के शिकार रविंद्र ने खुद ही अपने अपहरण की ऐसी पटकथा लिखी थी, जिस से वह अपने ही घर वालों से फिरौती के रूप में मोटी रकम वसूल करना चाहता था. दरअसल, रविंद्र महत्वकांक्षी युवक था. उस ने पुलिस की नौकरी जरूर कर ली थी, लेकिन वेतन के रूप में मिलने वाली रकम से वह संतुष्ट नहीं था. वह तमाम सुखसुविधाओं के बीच ऐश की जिंदगी जीना चाहता था. जल्द अमीर बनने की चाहत में वह पुलिस होने के बावजूद जुएसट्टे की लत का शिकार हो गया था. इस तरह की लत इंसान को बर्बादी की ही ओर ले जाती है. रविंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ.

धीरेधीरे वह करीब 5 लाख रुपए का कर्जदार हो गया था. बड़ा झटका तब लगा, जब जनवरी, 2016 के पहले सप्ताह में वह 44 हजार 600 रुपए सट्टे में हार गया. इस से उसे बड़ा झटका लगा. इस बीच एएसआई बनने के लिए वह एग्जाम भी दे चुका था. रविंद्र ने सोचा था कि वहां भी शायद उसे रकम खर्च करनी पडे, जबकि उस के पास कोई जमापूंजी नहीं थी. वह चाहता था कि उस के पास स्विफ्ट डिजायर कार हो. वह चाहता तो सब्र व समय के साथ घर वालों की मदद से उस की ये इच्छाएं पूरी हो सकती थीं, लेकिन सोच फितरती हो जाए तो बेलगाम हो जाती हैं. रविंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ. उस ने सोच लिया कि एक ही झटके में वह अपने सारे सपने पूरे कर लेगा.

कई दिनों की उधेड़बुन के बाद उस ने अपने ही अपहरण का नाटक कर के घर वालों से रुपए वसूलने की योजना बनानी शुरू कर दी. योजना के तहत उस ने अबरार की दुकान से फर्जी पते पर 2 सिमकार्ड खरीद कर एक्टिवेट करा लिए. योजना को अंजाम देने के लिए वह छुट्टी पर घर आ गया. 22 फरवरी की सुबह अपने चचेरे भाई और पड़ोसी से बात करने के बाद वह घर की तरफ चला जरूर, लेकिन उन लोगों के ओझल होते ही चुपचाप गांव से बाहर निकल गया. खेतों के रास्ते से होते हुए उस ने रास्ते से ही आवाज बदल कर अपने मोबाइल से फिरौती के लिए अपने  भाई को फोन कर दिया. आवाज बदलने की वह पहले ही कई दिनों से प्रैक्टिस कर रहा था.

वहां से निकल कर पहले वह लोनी पहुंचा, जहां से नए सिमकार्ड से उस ने एक बार फिर आवाज बदल कर फिरौती की रकम मांगी और धमकाया भी. इस के बाद वह दिल्ली पहुंचा और नांगलोई में रुक गया. रविंद्र को पूरी उम्मीद थी कि उस की जान की कीमत पर घर वाले फिरौती की रकम दे देंगे और उस की धमकी से डर कर पुलिस को सूचना नहीं देंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, घर वालों ने पुलिस को सूचना दे दी. उस ने अगले दिन के अखबार देखे तो अपने अपहरण को ले कर पुलिस की सक्रियता की खबर पढ़ कर उस के होश उड़ गए. इस से उसे अपनी योजना धराशाई होती नजर आई.

वह जानता था कि सर्विलांस के जरिए उस की पोल खुल जाएगी. उस ने अपनी योजना बदल दी. वह नहीं चाहता था कि उस के अपहरण की जांच पुलिस आगे बढ़ाए. उस ने सोचा कि अगर वह सकुशल वापस घर पहुंच जाएगा तो मामला अपने आप ठंडे बस्ते में चला जाएगा. पुलिस जांच को आगे नहीं बढाएगी. इसी सोच के तहत वह अगले दिन खेखड़ा पहुंचा और घर वालों को फोन कर के अपने पास बुला लिया. घर आ कर उस ने पुलिस और घर वालों को मनगढंत कहानी सुना दी. पुलिस बारीकियों में न जाए, इस के लिए उस ने पहले तबीयत खराब होने का बहाना और फिर जांच न करने का आग्रह किया. लेकिन वह अपने ही बुने जाल में उलझ गया. पुलिस ने उस के मोबाइल से वह सिमकार्ड बरामद कर लिया.

पूछताछ के बाद एएसपी विद्यासागर मिश्र ने प्रेसवार्ता कर के उसे पत्रकारों के सामने पेश किया. बाद में रविंद्र और अबरार को अदालत में पेश किया. माननीय अदालत ने दोनों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में थे. उन की जमानतें नहीं हो सकी थीं. योजना में रविंद्र का कोई साथी तो नहीं शामिल था. पुलिस इस की भी जांच कर रही थी. रविंद्र बुरी लत का शिकार न हुआ होता  और अपनी महत्वाकांक्षाओं को काबू में रखा होता तो आज यह नौबत न आती. बागपत पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर दिल्ली पुलिस ने भी उसे सस्पैंड कर दिया था. हालांकि जेल जाने से पूर्व रविंद्र का कहना था कि उस का अपहरण हुआ था और बदमाशों ने ही फिरौती मांगी थी. उस पर लगे आरोप गलत हैं. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: गैरतमंद

Hindi StoriesHindi StoriesHindi Stories: बरकत मसीह दोहरे चरित्र का आदमी था. वह अपनी पत्नी कामिनी से प्रेम भी करता था और नफरत भी. उस की मोहब्बत ही हमेशा नफरत को काबू किए रहती थी, लेकिन एक दिन जब उस की नफरत मोहब्बत पर हावी हुई तो…

बात तब की है, जब मेरी तैनाती पंजाब के एक ऐसे देहाती इलाके में थी, जो काफी हराभरा था. उन दिनो गांवों में बिजली की बात तो दूर, सड़कें भी पक्की नहीं थीं. वह इलाका काफी पिछड़ा हुआ था. गर्मियों के दिन थे. दोपहर को मैं एक पेड़ के नीचे बैठा काम कर रहा था, तभी पास के एक गांव का नंबरदार मुझ से मिलने आया. वह बड़ा ही चापलूस था, लेकिन मेरा मुखबिर था. मैं ने उस से आने की वजह पूछी तो उस ने बताया कि एक घटना घट गई है, वह उसी की सूचना देने आया है.

उस ने बताया कि उस के गांव का बरकत मसीह अपनी घर वाली को साइकिल पर बिठा कर कहीं जा रहा था. जब वह छोटी नहर की पुलिया पर पहुंचा तो सामने से एक बैलगाड़ी बहुत तेज रफ्तार से आ रही थी. बैल भड़के हुए थे, जो गाड़ी वाले से संभल नहीं रहे थे. नहर की पुलिया पर दोनों ओर कोई दीवार नहीं थी, इसलिए बरकत मसीह ने बैलगाड़ी से बचने की कोशिश की तो साइकिल सहित नहर में जा गिरा. जब तक वह संभलता, पत्नी कई गोते लगा चुकी थी. नहर अधिक गहरी नहीं थी. उस ने पास जा कर देखा तो पत्नी अधमरी हो चुकी थी. वह पत्नी को पानी से बाहर निकाल कर ला रहा था, तभी उस ने दम तोड़ दिया.

यह एक साधारण सी घटना थी, जिस में पुलिस का कोई काम नहीं था. फिर भी मैं ने नंबरदार से कुछ बातें पूछ कर तसल्ली कर ली. इस घटना पर कोई रिपोर्ट भी दर्ज नहीं करनी थी. नंबरदार अपना कर्तव्य समझ कर मुझे खबर करने आ गया था. उसे गए कुछ समय ही गुजरा था कि वह दोबारा एक लड़के को ले कर मेरे पास आ गया. उस के चेहरे से ऐसा लग रहा था, जैसे वह कोई नई खबर ले कर आया है. मैं ने उसे बिठा कर आने का कारण पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मलिक साहब, मामला गड़बड़ है.’’

‘‘कौन सा मामला गड़बड़ है?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘वही बरकत मसीह और उस की पत्नी वाला. आप तुरंत मेरे साथ चलिए.’’ उस ने कहा.

‘‘उस में तुम्हें क्या गड़बड़ लगा, जरा मुझे भी तो बताओ?’’

‘‘मैं तो क्या, यह लड़का बताएगा.’’ उस ने लड़के को मेरे सामने करते हुए कहा, ‘‘ओए, तू ने जो कुछ देखा था, साहब को बता दे.’’

पहले तो लड़का झिझका, उस के बाद उस ने जो बताया, उस से मुझे वह मामला हत्या का लगा. वह लड़का नंबरदार के ही गांव का रहने वाला था. जिस समय नहर पर वह घटना घटी थी, वह जामुन के एक पेड़ पर चढ़ कर जामुन तोड़ रहा था. दोपहर का समय था, आसपास कोई आदमी दिखाई नहीं दे रहा था. उस ने देखा कि एक साइकिल सवार साइकिल पर पीछे एक औरत को बैठाए जा रहा था. सामने से एक बैलगाड़ी आ रही थी, जिस के बैल काबू से बाहर थे.

साइकिल वाले ने घबरा कर साइकिल मोड़ी तो वह साइकिल सहित नहर में गिर गया. पानी में गिरते ही औरत हाथपैर मारने लगी. आदमी ने उस की मदद करने के बजाय उस का सिर पकड़ कर पानी में डुबो दिया. कुछ देर तड़प कर औरत ऊपर उभरी तो उस ने उस का गला दबा दिया. इस के बाद उस ने औरत को पानी से बाहर निकाला तो औरत में कोई हलचल नहीं दिखाई दे रही थी. आदमी ने इधरउधर देखा. कुछ दूर खेतों में कुछ किसान काम कर रहे थे. उस ने आवाज दे कर उन किसानों को बुलाया तो 7-8 लोग वहां आ गए. लड़का भी पेड़ से उतर कर उन के पास पहुंच गया.

पता चला कि वह औरत मर चुकी थी. वह उसी आदमी की पत्नी थी. उस ने उन किसानों से पत्नी के डूब कर मरने की बात बताई तो उन लोगों ने दुख प्रकट किया. एक आदमी ने उस की साइकिल नहर से निकाली और एक रेहड़ी का प्रबंध कर के औरत की लाश को गांव भिजवाया. लड़के ने पहली बार हत्या करते देखा था, इसलिए वह इतना डर गया था कि गांव जाने के बजाय इधरउधर घूमता रहा. नंबरदार थाने में रिपोर्ट कर के वापस जा रहा था, तभी रास्ते में वह उसे मिल गया. लड़के को लगा कि सारी बात नंबरदार को बता देनी चाहिए. नंबरदार ने जब यह बात सुनी तो वह लड़के को ले कर थाने आ गया.

मैं ने नंबरदार से नहर के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि नहर दूसरी नहरों से काफी छोटी थी. वह इतनी गहरी भी नहीं थी कि उस में कोई डूब कर मर जाए. पानी से पुलिया की ऊंचाई भी इतनी नहीं थी कि गिरने से चोट लगे. साफ था कि बरकत मसीह ने ही अपनी पत्नी की हत्या की थी. मैं ने नंबरदार से पूछा, ‘‘क्या उन का घर में आपस में झगड़ा होता था, जिस से उस ने पत्नी को मार दिया?’’

‘‘लड़ाईझगड़े का तो सवाल ही नहीं पैदा होता मलिकजी, वह तो अपनी बीवी का दीवाना था. कुछ लोेग तो उसे जोरू का गुलाम कहते थे. उस की पत्नी थी ही इतनी खूबसूरत कि कोई भी उस का दीवाना हो सकता था.’’

नंबरदार की इस बात से लगा कि शायद लड़के के देखने में कोई गलती हो गई है. वह पत्नी को डूबने से बचा रहा होगा, इसे लगा होगा कि वह उसे डुबो रहा है. जल्दी में कोई कदम उठाने के बजाय मैं ने लाश का पोस्टमार्टम कराना उचित समझा. मैं 2 सिपाहियों के साथ बरकत मसीह के घर पहुंच गया. मरने वाली महिला कामिनी के मांबाप पास के गांव के रहने वाले थे, जो आ चुके थे. कामिनी की बुआ के आने का इंतजार हो रहा था. उन के घर में रोनापीटना मचा था. पुलिस देख कर घर में सन्नाटा छा गया. गांव वाले आपस में खुसुरफुसुर करने लगे थे.

मैं ने नंबरदार से कहा कि वह बरकत को बुला कर मेरे पास ले आए. कुछ ही देर में बरकत मसीह आ गया. वह सुंदर और जवान युवक था. मैं ने पुलिसिया नजरों से उसे देखा. उस की आंखें लाल थीं और उन में नमी थी. शायद वह रो रहा था. मैं ने उस से कहा, ‘‘मर्द हो कर औरतों की तरह आंसू बहा रहे हो, धीरज रखो.’’

उस ने घबरा कर मेरी तरफ देखते हुए कहा, ‘‘कुछ नहीं.’’ उस के बाद दोनों हाथों से वह अपनी आंखें साफ करने लगा.

‘‘कामिनी को क्या हुआ, एक बार मैं उस की लाश देखना चाहता हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘सर, वह पानी में डूब कर मर गई.’’ कह कर उस ने मुझे पूरी घटना सुना दी.

‘‘पहले मैं लाश देखूंगा, क्योंकि अगर कहीं कोई नई बात निकल आई तो मैं अपने अधिकारियों को क्या जवाब दूंगा.’’ मैं ने कहा, ‘‘इस में घबराने की कोई बात नहीं है. तुम ऐसा करो, लाश के कमरे से सब को निकाल दो. मैं जा कर लाश देख लूंगा.’’

सब को निकाल कर उस ने मुझे कमरे में बुलाया. कमरे में आ कर मैं ने बरकत को बाहर जाने को कहा, लेकिन वह बाहर जाने को तैयार नहीं था. मैं ने 2 सिपाहियों से उसे बाहर ले जाने को कहा तो वे उसे खींच कर बाहर ले गए. बरकत के जाने के बाद मैं ने लाश की चादर खींची तो लाश देख कर मुझे धक्का सा लगा. वह बहुत सुंदर युवती थी. उस की आंखें इस तरह खुली थीं, जैसे मुझे ही देख रही हो. चेहरे में काफी खिंचाव था. नंबरदार की वह बात मुझे सच लगी कि उस औरत का कोई भी पति होता, वह गुलाम बन कर ही रहता.

मैं ने उस की गरदन की ओर देखा तो मुझे वह चीज दिखाई दे गई, जो मैं देखना चाहता था. गले पर लाल सा निशान था और वह निशान गला दबाने का था. मैं ने दोनों सिपाहियों को बुला कर कहा, ‘‘बरकत को कहीं जाने मत देना.’’

नंबरदार से कहा कि वह लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने की व्यवस्था करे. वह एक तांगा ले आया तो जरूरी काररवाई करने के बाद मैं ने लाश को सिविल अस्पताल भिजवा दिया. शक की बुनियाद पर बरकत को हिरासत में ले कर थाने आ गया. अगले दिन मैं थाने आया तो सिपाही ने कहा कि बरकत मुझ से बात करना चाहता है. मैं ने उसे अपने कमरे में बुलाया तो देखा, उस की आंखें लाल हो रही थीं, जैसे वह सारी रात सोया न हो. उस ने कहा, ‘‘आप ने मुझे हवालात में क्यों बंद कर रखा है? मेरी घरवाली मर गई है, मुझ गरीब से क्या गलती हो गई है?’’

‘‘मुझे कुछ शक है. लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ कह सकूंगा.’’ मैं ने कहा.

शाम करीब 5 बजे पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट के अनुसार, कामिनी की मौत पानी में डूबने और सांस रुकने से हुई थी. उस में लिखा था कि मृतका के फेफड़ों, आंतों और मैदे में इतना पानी नहीं था, जितने पानी में डूब कर मौत होती है. इस के अलावा उस के गले पर दबाव का जो निशान पाया गया था, उस के बारे में कहा गया था कि उस पर कोई वजन पड़ा हो या दबाया गया हो. एक खास बात यह थी कि मृतका 3 महीने की गर्भवती थी.

रिपोर्ट देखने के बाद मुझे लड़के के बयान पर यकीन हो गया. कामिनी की लाश को उस के मातापिता के हवाले कर दिया. बरकत के ससुर ने पूछा कि उसे हवालात में क्यों बंद कर रखा है तो मैं ने कहा, ‘‘मुझे शक है कि तुम्हारी बेटी को बरकत ने गला घोंट कर मारा है? क्या तुम्हारी बेटी बरकत के साथ खुश थी?’’

मेरी इस बात पर वह मुझे हैरानी से देखते हुए बोला, ‘‘जी, वह बहुत खुश रहती थी, हमेशा बरकत की तारीफ करती रहती थी.’’

मैं ने कहा, ‘‘सोच कर बताओ, कभी उन में कोई झगड़ा हुआ था?’’

‘‘नहीं सरकार, शादी के बाद से अब तक उन में कोई झगड़ा नहीं हुआ था.’’ उस ने कहा.

मैं ने उस से बहुत घुमाफिरा कर पूछा, लेकिन कोई काम की बात पता नहीं चली. उस के जाने के बाद मैं ने बरकत को बुलवा कर कहा, ‘‘कामिनी की लाश का पोस्टमार्टम हो गया है और उसे तुम्हारे ससुर और साले ले गए हैं.’’

यह सुन कर वह रोते हुए बोला, ‘‘मुझे भी जाने दीजिए सरकार, मैं अपनी कामिनी को अपने हाथों से दफनाना चाहता हूं.’’

मैं ने कहा, ‘‘इन्हीं हाथों से, जिन से तुम ने उस का गला दबाया था.’’

यह सुन कर वह ऐसा उछला, जैसे उस के पैरों पर बम फोड़ दिया गया हो. उस की आंखें फैल गईं और रंग पीला पड़ गया. गर्मियों में वह ऐसे कांप रहा था, जैसे लोग ठंड में कांपते हैं. वह संभल कर बोला, ‘‘यह क्या कह रहे हैं सरकार, कामिनी तो मेरी जान थी, भला मैं उसे क्यों मारूंगा?’’

‘‘हत्या की वजह भी तुम्हीं बताओगे, वरना मैं तो पता कर ही लूंगा.’’ मैं ने कहा.

‘‘सरकार, आप पूरे गांव में किसी से भी पूछ लें, हम दोनों में कितना प्रेम था,’’ बरकत ने कुछ सोच कर कहा, ‘‘वह मेरे बच्चे की मां भी बनने वाली थी. मैं अपने बच्चे और पत्नी को कैसे मार सकता हूं?’’

बरकत ने जो कहा था, उस में वजन था. लेकिन मैं उस लड़के के बयान और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट को कैसे झुठला सकता था. मैं ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘कामिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफसाफ लिखा था कि उस की हत्या गला दबा कर की गई थी.’’

वह मेरी बात पर घबराने के बजाय दृढ़ता से बोला, ‘‘साहब, हम दोनों एकसाथ नहर में गिरे थे. हो सकता है, साइकिल का कोई पुरजा उस की गरदन पर जा लगा हो.’’

उस ने दलील अच्छी दी थी. लेकिन मैं समझ रहा था कि वह जरूरत से ज्यादा चालाक है और मुझ से झूठ बोल रहा है. मुझे लगा कि यह आसानी से मानने वाला नहीं है, इसलिए मैं ने सख्ती करने का फैसला कर लिया. मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारे लिए यही अच्छा है कि तुम इकबालिया बयान दे दो. हो सकता है मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूं. अगर नहीं देते हो तो मुझे जरूरत भी नहीं है. मेरे पास ऐसा गवाह मौजूद है, जिस ने तुम्हें कामिनी का गला दबाते हुए देखा है. अब बोलो, क्या कहना चाहते हो?’’

मेरी इस बात पर उस की हालत खराब हो गई, उस से कुछ कहते नहीं बन रहा था. मैं उसे और मौका नहीं देना चाहता था, इसलिए मेज पर घूसा मार कर पूछा, ‘‘बोलो, तुम ने हत्या की है?’’

‘‘नहीं सरकार, मैं ने उस की हत्या नहीं की है.’’ वह सहम कर बोला.

मैं ने उसे हवालात में बंद कर दिया और अपने मुखबिरों से कहा कि वे शाम तक यह पता लगा कर बताएं कि कामिनी का चरित्र कैसा था? लेकिन मुखबिरों से कोई काम की बात पता नहीं चली. मैं ने उस लड़के को दोबारा बुला कर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं ने अपनी आंखों से उसे गला दबाते देखा था. कुछ और बातें पूछ कर मैं ने उस लड़के को भेज दिया. उस के जाने के बाद नंबरदार आ गया तो उस ने बरकत के बारे में कुछ बातें बताईं.’’

नंबरदार के बताए अनुसार, बरकत एक हकीम की दुकान पर जड़ीबूटियां कूटने का काम करता था. वह अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था. किसी बात पर दोनों में कभीकभी छोटामोटा झगड़ा जरूर हो जाता था, लेकिन बाद में बरकत उसे मना लेता था. बरकत के घर के बराबर में एक औरत रहती थी, जिस का नाम सरदारा था. लोग उसे दारू कहते थे, उस की कामिनी से बहुत पटती थी. वह उस के बारे में सबकुछ जानती थी. अगर उस से पूछताछ की जाए तो शायद वह उस के बारे में कुछ बता सके.

मैं ने दारू को लाने के लिए तुरंत एक सिपाही को भेज दिया. इसी बीच एक और मुखबिर आ गया. उस ने मुझे जो कुछ बताया, वह मुझे पहले से ही पता था. लेकिन उस ने एक नई बात यह बताई कि बरकत को कोई बीमारी लगी थी, जिस का इलाज वह उसी हकीम से करा रहा था, जिस के यहां काम करता था. मैं ने मुखबिर से कहा कि वह उस की बीमारी का पता लगा कर मुझे बताए. जिस सिपाही को मैं ने दारू को लाने को भेजा था, वह उसे ले कर आ गया. लेकिन उस के साथ उस का पति भी आया था. दोनों काफी घबराए हुए थे. मैं ने दोनों को अपने कमरे में बुलवाया. औरत 35 साल के लगभग थी और मर्द 40 के लपेटे में था. मैं ने देखा, मर्द घबराया हुआ लग रहा था, लेकिन औरत शांत थी.

‘‘हम से क्या गलती हो गई सरकार,’’ मर्द हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘आप ने मेरी घरवाली को क्यों बुलवाया है?’’

मैं ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘घबराने की कोई बात नहीं है. मुझे इन से 2-3 बातें पूछनी हैं.’’

यह कह कर मैं ने पति को बाहर भेज दिया. औरत मेरी ओर देखने लगी. मैं ने कहा, ‘‘सुना है कि तुम्हारी कामिनी से बड़ी गहरी दोस्ती थी. उस के मरने का मुझे बहुत अफसोस है. उस के बारे में मैं तुम से 2-3 बातें पूछना चाहता हूं.’’

‘‘बस जी, अल्लाह को जो मंजूर था, वह हो गया. बड़ी प्यारी लड़की थी,’’ उस ने एक आह भर कर कहा, ‘‘आप जो पूछना चाहें, पूछ लें. मुझे जो पता होगा, जरूर बताऊंगी.’’

‘‘मुझे शक है कि कामिनी की हत्या हुई है,’’ इतना कह कर मैं ने उस के चेहरे को गौर से देखा. मुझे लगा था कि हत्या की बात पर वह उछल पड़ेगी, लेकिन वह सामान्य रही.

‘‘आप का शक ठीक है, मुझे भी यही शक था. लेकिन मैं किसी से कुछ कह नहीं सकी.’’ उस ने कहा.

दारू ने यह बात कह कर मुझे हैरान कर दिया था. मैं ने पूछा, ‘‘शक का कोई कारण तो होगा?’’

‘‘यह लंबी कहानी है,’’ उस ने कहा.

इस के बाद उस ने मुझे जो कहानी सुनाई, उसे मैं यहां संक्षेप में लिख रहा हूं.

कामिनी 2 भाइयों की एकलौती बहन थी, इसलिए घर में सब की लाडली थी. जवान हुई तो इतनी खूबसूरत निकली कि सब के आकर्षण का केंद्र बन गई. ईसाई होने की वजह से उसे घूमनेफिरने की आजादी थी. उस से लड़के बात करने से कतराते थे, क्योंकि वह ऐसा जवाब देती थी कि वे मुंह ताकते रह जाते थे. कामिनी की बिरादरी के कई लड़के उस से शादी करना चाहते थे, लेकिन उसे उन में से कोई भी पसंद नहीं था. वह अपनी ही तरह सुंदर लड़का चाहती थी. उन्हीं दिनों गांव के एक लड़के से उस की दोस्ती हो गई, जो बहुत सुंदर था. उस का नाम कमाले था.

उन की दोस्ती दीवानगी तक जा पहुंची. दोनों रोजाना चोरीछिपे मिलने लगे, लेकिन उन का यह मिलन छिपा नहीं रहा. जल्दी ही उस के भाइयों और पिता को पता चल गया. उन्होंने सख्ती करने के बजाय उस की शादी बरकत से कर दी. कमाले को जब उस की शादी के बारे में पता चला तो उस ने कामिनी से भाग चलने को कहा. लेकिन वह इस के लिए तैयार नहीं हुई. क्योंकि मांबाप, भाइयों ने उसे बहुत लाडप्यार से पाला था, इसलिए वह नहीं चाहती थी कि उस की वजह से उस के घरवालों की बदनामी हो. अपने मांबाप की इज्जत के लिए उस ने अपनी मोहब्बत का गला घोंट दिया. उस दिन वह कमाले से लिपट कर इतना रोई थी कि कमाले को संभालना मुश्किल हो गया था.

इस के बाद कमाले ने कहा, ‘‘अच्छा, ऐसा करता हूं कि मैं तुम से महीने में 2-3 बार मिलने आ जाया करूंगा.’’

‘‘अगर किसी ने देख लिया तो बदनामी होगी.’’ कामिनी ने कहा.

‘‘जरूरी नहीं कि हम मिलें ही, दूर से ही एकदूसरे को देख लिया करेंगे.’’ कमाले ने समझाया.

कामिनी ब्याह कर बरकत के घर आ गई. कमाले महीने में 2-3 बार बरकत के गांव आता रहता था. इस तरह दोनों दूर से ही एकदूसरे को देख कर अपने मन को तसल्ली दे लेते थे. इसी बीच कामिनी ने अपनी पड़ोसन दारू को अपना भेदी बना लिया. उस ने उस से सब कुछ सचसच बता दिया. इस के बाद दारू उस की खबर कमाले तक पहुंचाने लगी. कभीकभी दारू उन का मिलन भी करवा देती थी. शादी को 2 साल हो गए थे, लेकिन उसे कोई बच्चा नहीं हुआ था. उस जमाने में डाक्टरी टैस्ट तो होते नहीं थे, सारी कमी मर्द के बजाय औरत पर डाल दी जाती थी.

कमाले बराबर कामिनी से मिलने आता रहता था, बाद में दोनों एक वीरान कब्रिस्तान के पास रात में मिलने भी लगे थे. उस जगह पर कोई दिन में भी नहीं जाता था. उन दिनों घरों में शौचालय तो होते नहीं थे, लोग खेतों में जाया करते थे. औरतें अंधेरे में जाया करती थीं. कामिनी भी दारू के साथ जाती थी, उधर कमाले आ जाता था. दारू उसे कमाले के पास छोड़ कर इधरउधर हो जाती थी. वे दोनों मिलते जरूर थे, लेकिन रहते अपनी हद में थे.

धीरेधीरे दोनों हदें पार करने लगे. समय गुजरता रहा. शादी के 2 सालों बाद कामिनी ने अपने अंदर कुछ बदलाव देखा तो उस ने दारू से कहा. दारू ने उसे गले से लगा कर कहा, ‘‘बड़ी खुशी की बात है, तू मां बनने वाली है.’’

कामिनी सुन कर बहुत खुश हुई. उस ने बरकत को यह बात बताई तो वह भी खुश हुआ. लेकिन कुछ देर बाद वह बुझ सा गया और सिर झुका कर कुछ सोचने लगा. कामिनी समझ नहीं पाई कि उस के मां बनने की खुशी में उसे खुश होना चाहिए था, जबकि वह बुझ सा क्यों गया. इस के बाद बरकत के मिजाज में चिड़चिड़ापन आ गया.

बरकत को चुप देख कर एक दिन कामिनी ने पूछा तो बरकत ने उसे जो जवाब दिया, उसे सुन कर वह सन्न रह गई. उस ने कहा, ‘‘कामिनी यह बच्चा मेरा नहीं हो सकता, क्योंकि मैं बाप बनने के काबिल नहीं हूं.’’

‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’ कामिनी ने कहा, ‘‘यह बच्चा तुम्हारा ही है. तुम से किस ने कहा कि तुम बाप नहीं बन सकते?’’

‘‘कामिनी हमारी शादी के डेढ़ साल बाद भी जब हमें कोई बच्चा नहीं हुआ तो मैं ने हकीमजी, जिन के यहां मैं काम करता हूं, से पूछा तो उन्होंने मुझे बताया कि तुम्हारी पत्नी बिलकुल ठीक है, कमी मेरे अंदर है. लेकिन घबराने की कोई बात नहीं है, मैं तुम्हें ऐसी दवा दूंगा कि तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे. और वह दवा पूरे छह महीने तक चलेगी. लेकिन अभी दवा लेते हुए मुझे 2 महीने ही हुए हैं.’’

कामिनी ने कहा, ‘‘हो सकता है, तुम 2 महीने में ही ठीक हो गए हो?’’

यह सुन कर उसे कुछ तसल्ली हुई, लेकिन पूरी तरह नहीं. अब उस की हालत ऐसी हो गई कि कभी वह खुश रहता तो कभी कामिनी से लड़नेमरने पर उतारू हो जाता. कामिनी गुस्सा हो जाती तो किसी तरह उसे मना लेता. एक दिन बरकत काम से लौटा तो कामिनी से बहुत लड़ा. उस ने कहा, ‘‘यह जो बच्चा तेरे पेट में पल रहा है, यह हराम का है. मैं ने हकीम से पूछा था कि क्या उन की दवा से मैं 2 महीने में ठीक हो सकता हूं तो उन्होंने कहा कि कभी नहीं, यह जो दवा दी गई है, यह 3 महीने चलेगी, उस के बाद नई दवा दी जाएगी, जो 3 महीने चलेगी. उस के बाद ही तुम पूरी तरह से ठीक हो जाओगे.

उस दिन भी कामिनी ने बरकत को काफी समझाने की कोशिश की, पर बरकत उस की बात मानने को तैयार नहीं था. पति की इस बात पर कामिनी रूठ गई, पर बरकत ने उसे मना लिया. इस घटना के 2-3 दिनों बाद गांव में एक मेला लगा. कामिनी ने बरकत से कहा कि वह उसे मेला दिखा लाए. बरकत की उस दिन छुट्टी थी. वह उसे साइकिल पर बिठा कर मेला दिखाने ले गया. पता चला कि दोनों नहर में गिर गए, जिस में कामिनी की मौत हो गई.

इस के बाद दारू ने कहा, ‘‘अब आप को पता चल गया होगा कि मैं ने क्यों कहा था कि ऐसा तो होना ही था.’’

पूरी कहानी सुनने के बाद मैं ने दारू से कहा कि अब वह घर जाए. फिर जब कभी जरूरत पड़ेगी, उसे बुला लिया जाएगा. उस के जाने के बाद मैं ने अपने एक एएसआई जो पठान था, को बुला कर उसे कमाले का पता दे कर कहा कि वह उसे ले आए. अगर वह न आए तो उस की ठुकाई कर के उसे घसीटता हुआ ले आए. वह तुरंत उसे लेने चला गया. इस के बाद मैं ने बरकत को हवालात से निकाल कर लाने को कहा. अब मेरे पास गवाह भी था और पूरी कहानी भी मैं सुन चुका था. मुझे कमाले का बयान भी लेना था और बरकत का मैडिकल चैकअप भी कराना था, क्योंकि मैं यह साबित करना चाहता था कि वह संतान पैदा करने  के काबिल नहीं है, जबकि उस की पत्नी को 3 महीने का गर्भ था और उस ने शक की बिनाह पर उस की हत्या की थी.

एक सिपाही बरकत को मेरे कमरे में ले आया. वह कुरसी पर बैठने जा रहा था, तभी मैं ने अपने हाथ में थामा बेंत का डंडा जोर से मेज पर पटका, जिस से एक तेज आवाज हुई. वह उछल कर पीछे हट गया. मैं ने डांट कर कहा, ‘‘वहीं खड़े रहो. मैं ने तुम्हें बड़ा सम्मान दिया, लेकिन अब तुम इस के काबिल नहीं रहे, लगातार झूठ बोलते रहे. अब झूठ बोले तो तुम्हें उलटा लटका दूंगा. मैं एक बार और कह रहा हूं कि अगर तुम ने शराफत से इकबालिया बयान दे दिया तो फायदे में रहोगे.’’

‘‘मैं क्या इकबालिया बयान दूं, मैं ने अपनी बीवी की हत्या नहीं की है.’’ उस ने कहा.

वह काफी ढीठ हो रहा था. मैं ने उस पर सीधा हमला करते हुए कहा, ‘‘कामिनी के पेट में किस का पाप पल रहा था?’’

यह सुन कर वह 2 कदम पीछे हट गया, उस का चेहरा पीला पड़ गया. वह मुझे इस तरह देखने लगा, जैसे मैं कोई जादूगर हूं.

‘‘वह मेरी घर वाली थी, उस के पेट में मेरा ही बच्चा होगा न.’’ उस ने कहा.

‘‘तुम बड़े बेशर्म हो. मुझे पता है कि तुम इस काबिल नहीं हो कि बाप बन सको. अगर नहीं मानोगे तो मैं उस हकीम को यहां बुलवा लूंगा जिस की दवा तुम खा रहे थे.’’ मैं ने उसे घेरने की गरज से कहा.

हमला उस की मरदानगी पर हुआ था, इसलिए उसे परेशान तो होना ही था. वह सिर झुका कर खड़ा हो गया. मुझे उस पर दया भी आई. उस ने सिर उठाया तो उस की आंखों में आंसू थे. उस ने कहा, ‘‘सरकार, मैं बश्ेर्म नहीं हूं. मैं ने ही कामिनी को गला घोंट कर मारा है. पूछिए, आप क्या पूछना चाहते हैं, मैं आप की सभी बातों का जवाब दूंगा.’’

इस के बाद उस ने लंबा बयान दिया, जो इस तरह था. बरकत की शादी कामिनी से हुई तो वह बहुत खुश था. कामिनी बहुत सुंदर थी. वह उस की हर बात मानता था. कामिनी ने उस की इस कमजोरी का खूब फायदा उठाया. वह उसे अंगुलियों पर नचाने लगी. लोग उसे जोरू का गुलाम कहने लगे. एक साल बीता तो लोग पूछने लगे कि बच्चा क्यों नहीं हो रहा? दोनों यही जवाब देते कि अभी जल्दी क्या है, हो जाएगा. लेकिन अकेले में जब वे इस बात पर विचार करते तो परेशान हो जाते. मर्द कैसा भी हो, वह यह कतई सहन नही कर सकता कि कोई उसे नपुंसक कहे.

बरकत ने पत्नी से कहा, ‘‘वह गांव की किसी दाई को दिखा कर पूछे कि अभी तक उसे बच्चा क्यों नहीं ठहरा.’’

कामिनी ने एक दाई को दिखाया तो उस ने कहा कि वह बिलकुल ठीक है. मर्द में ही कोई कमी हो सकती है. कामिनी ने बरकत से कहा कि वह हकीम से अपने आप को चैक कराए. बरकत ने ऐसा ही किया. हकीम ने बताया कि वह बच्चा पैदा करने लायक नहीं है. अगर वह बच्चा चाहता है तो उसे 6 महीने तक इलाज कराना होगा. हकीम ने उस का इलाज शुरू कर दिया. उसे दवा खाते 2 महीने ही हुए थे कि कामिनी ने उस से बताया कि वह मां बनने वाली है. यह सुन कर वह बहुत खुश हुआ, लेकिन पलभर बाद उसे लगा कि कामिनी मजाक कर रही है. अगर ऐसा सचमुच है तो उस के किसी से अवैध संबंध हैं.

बरकत ने हकीम से पूछा तो उस ने कहा कि 2 महीने में उस का ठीक होना कतई संभव नहीं है. यह दवा 2 कोर्स में होती है. अभी तो उस का पहला कोर्स चल रहा है. दूसरा कोर्स 3 महीने बाद शुरू होगा, जिस में बच्चा पैदा करने वाले शुक्राणु बढ़ाए जाएंगे. बरकत समझ गया कि कामिनी हराम का बच्चा लिए घूम रही है. उस ने तय कर लिया कि वह इस बात का पता लगाएगा कि कामिनी के किसी के साथ अवैध संबंध तो नहीं हैं? उस ने कई बार दिन में आ कर देखा, वह उसे घर में ही मिली. उसे लगा कि कामिनी रात को दिशामैदान जाती है, तब वह प्रेमी से मिलती होगी. उस ने रात में भी उस का पीछा किया, लेकिन उसे कोई शक वाली बात नहीं दिखाई दी.

लेकिन एक रात वह अचानक कामिनी और दारू का पीछा करता हुआ गया तो उस रात दोनों बहुत दूर निकल गईं. कब्रिस्तान के पास पहुंच कर दारू तो खेत में चली गई, जबकि कामिनी हंसती हुई कब्रिस्तान में गायब हो गई. बरकत ने आगे बढ़ कर वहां जो देखा, अवाक रह गया. कामिनी एक जवान लड़के से लिपटी हुई थी. दोनों की दबीदबी हंसी की आवाजें आ रही थीं. आगे जो हुआ, उसे देख कर बरकत को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन किसी तरह खुद पर नियंत्रण कर के वह वापस घर आ गया.

बस, वहीं से उसे पत्नी से नफरत हो गई, लेकिन कामिनी को देख कर पता नहीं उसे क्या हो जाता था कि वह सब कुछ भूल जाता था. उस ने सोचा कि सब कुछ देख कर भी वह चुप रहेगा. अगर वह कामिनी को तलाक देता है या उस की हत्या करता है तो इतनी सुंदर पत्नी से हाथ धो बैठेगा, इसलिए सब कुछ जानते हुए भी वह चुप रहा.

इस घटना के कुछ दिनों बाद कामिनी ने बरकत से कहा कि वह उसे मेला दिखा लाए. दोनों साइकिल पर मेला देखने जा रहे थे तो रास्ते में बरकत के दिमाग में हलचल मची, वह उसे मारने के बारे में सोच रहा था, लेकिन उस की भोली सूरत देख कर उस का इरादा बदल जा रहा था. यही सोचतेसोचते उस की साइकिल नहर की पुलिया पर पहुंच गई.

उसी बीच सामने से तेजी से बैलगाड़ी को आता देख कर वह संतुलन खो बैठा. बैलगाड़ी से बचने के चक्कर में वह पत्नी के साथ नहर में गिर गया. कामिनी तैरना नहीं जानती थी. वह बारबार पानी से सिर निकाल कर कह रही थी कि मुझे बचा लो. वह उसे बचाने के लिए तेजी से तैर कर गया, लेकिन तभी उसे उस की बेवफाई याद आ गई. उस ने उसे बचाने के बजाय उस की गरदन पकड़ कर दबा दी, जिस से वह मर गई.

बयान देते समय बरकत रो रहा था. मैं समझ रहा था कि उस का रोना असली है. वह दोहरे चरित्र का मालिक था. उसे कामिनी से प्रेम भी था और नफरत भी. उस का बयान सुन कर मैं आंखें बंद किए बैठा था कि तभी मेरे पठान एएसआई ने आ कर कहा, ‘सर, मैं कमाले को ले आया हूं.’ मैं ने उसे अंदर लाने को कहा. मेरे कमरे में एक सुंदर जवान आया, जो कमाले था. उस के पीछे एएसआई खड़ा था.’ मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हें पता है, कामिनी पिछले दिनों नहर में डूब कर मर गई है?’’

उस ने कहा, ‘‘जी पता है, इस की चर्चा आसपास के गांवों में फैल चुकी है.’’

‘‘तुम्हें तो कामिनी के मरने का बहुत दुख होगा?’’ मैं ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

‘‘साहब, मेरा उस से क्या वास्ता? मैं तो उसे जानता तक नहीं, मुझे उस के मरने का क्यों दुख होगा?’’ उस ने कहा.

‘‘मैं ने सुना है कि तुम उस से मिलने बहुत दूर से आते थे. तुम्हारी उस से बहुत गहरी दोस्ती थी.’’

‘‘साहब, आप ने गलत सुना है. मैं तो उस को जानता तक नहीं था.’’

एएसआई, जो उस के पीछे खड़ा था, को मैं ने उसे इशारा किया. उस ने कमाले के बालों को जोर से झटका दिया तो वह नीचे गिर पड़ा. जैसे ही वह उठा, उस के गाल पर तमाचा मारा तो उस के मुंह से खून निकलने लगा.

‘‘तुम से जो पूछा जा रहा है, उसे ठीकठीक बताओ, नहीं तो खाल खींच लूंगा.’’ एएसआई ने कहा.

मैं ने कहा, ‘‘सचसच बताओ, कामिनी से तुम्हारे संबंध थे या नहीं? अगर झूठ बोले तो मैं तुम्हारी अम्मा दारू को भी बुला लूंगा, जो तुम दोनों को मिलवाती थी.’’

इस पर वह टूट गया. उस ने भी वह पूरी कहानी सुना दी, जो ऊपर लिखी गई है. मैं ने उस का बयान लिख कर उस के हस्ताक्षर करा लिए. केस मजबूत हो गया था. कमाले का बयान, बरकत का बयान, जिस लड़के ने बरकत को गला दबाते देखा था, उस की गवाही, दारू की गवाही, हकीम की गवाही. यह सब तैयार कर के मैं ने अदालत में चार्जशीट पेश कर दी.

अपराधी के बयान और सभी गवाहों के बयान से अदालत ने बरकत को मृत्युदंड की सजा दी. बरकत के वकील ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, जिस में उस ने कहा कि बरकत अपनी पत्नी के चरित्र से इतना दुखी हो गया था कि वह हर समय दिमागी तौर से बीमार रहने लगा था. एक दिन इसी तकलीफ के कारण उत्तेजित हो कर उस ने पत्नी की हत्या कर दी. अदालत ने उस की यह अपील मान ली और उस की मृत्युदंड की सजा कम कर के केवल 7 साल की Hindi Stories

Crime News: ट्यूटर ही निकला अपहर्त्ता

Crime News: रवि और उमेश   ने मोटी फिरौती  के लिए रिहान  का अपहरण तो  कर लिया, लेकिन  इस मामले में वे  पूरी तरह से  अनाड़ी थे. यही वजह  थी कि फिरौती पाने की  कौन कहे, वे उस की  हत्या में जेल पहुंच गए.

की नई बस्ती कालोनी में रहने वाले इकरामुल हक एक एनजीओ में मैनेजर थे, जिस की वजह से उन की समाज में अच्छी पकड़ थी. समाज के लोग भी उन का काफी सम्मान करते थे. लेकिन 21 नवंबर, 2015 को उन के परिवार में एक ऐसी घटना घटी कि वही नहीं, उन के घर तथा मोहल्ले वाले भी परेशान हो उठे.

दरअसल, हुआ यह कि उस दिन इकरामुल हक का 11 साल का बेटा रिहानुल हक उर्फ रिहान अचानक अपने घर के मुख्य दरवाजे के पास खेलतेखेलते गायब हो गया था. घर वालों ने उसे गली में इधरउधर देखा, लेकिन वह दिखाई नहीं दिया. दरवाजे के सामने खेलतेखेलते वह कहां गायब हो गया, यह बात किसी की समझ में नहीं आ रही थी.

रिहानुल हक के गायब होने की जानकारी मोहल्ले वालों को हुई तो वे भी उसे ढूंढ़ने में मदद करने लगे. सभी ने मोहल्ले की गलीगली छान मारी, पर बच्चे का पता नहीं चला. इकरामुल हक उस समय नजीबाबाद स्थित संस्था के औफिस में थे. बेटे के लापता होने की जानकारी उन्हें मिली तो वह तुरंत घर के लिए चल पड़े. घर पहुंचने तक शाम हो चुकी थी. उन की पत्नी और घर के अन्य लोग चिंता में बैठे थे. इकरामुल हक ने अपने सभी रिश्तेदारों को फोन कर के बेटे के बारे में पूछा, पर कहीं से भी उस के बारे में कुछ पता नहीं चला. देर रात तक उन्होंने बेटे को संभावित जगहों पर तलाशा, पर कोई नतीजा नहीं निकला.

पूरी रात घर के लोग परेशान होते रहे. सुबह होते ही इकरामुल हक रिश्तेदारों और मोहल्ले के कुछ लोगों के साथ शहर की कोतवाली पहुंचे. थानाप्रभारी डी.आर. आर्य को बच्चे के रहस्यमय ढंग से गायब होने की बात बता कर उस के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराने की मांग की. बच्चे को गायब हुए 20 घंटे से ज्यादा हो चुके थे, इसलिए डी.आर. आर्य ने अज्ञात लोगों के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज कर लिया. उन्होंने इस मामले की जानकारी एसएसपी केवल खुराना को दी तो उन्होंने इस संवेदनशील मामले को सुलझाने के लिए 4 टीमें बनाईं.

पहली टीम में थानाप्रभारी डी.आर. आर्य के नेतृत्व में एसआई योगेंद्र कुमार, मदन सिंह विवट, कांस्टेबल मोहम्मद आसिफ को शामिल किया गया. दूसरी टीम काशीपुर के थानाप्रभारी वी.के. जेठा के नेतृत्व में और तीसरी टीम परतापपुर के चौकीइंचार्ज जसवीर सिंह चौहान के नेतृत्व में बनाई गई. चौथी टीम में एसओजी के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों को भी शामिल किया गया. चारों टीमों का नेतृत्व सीओ (काशीपुर) जी.सी. टम्टा कर रहे थे. एसएसपी ने पूरे केस की कमान एएसपी कमलेश उपाध्याय के हाथों सौंपी थी.

चारों पुलिस टीमें अलगअलग एंगल से इस मामले में लग गईं. चूंकि इकरामुल हक सम्मानित आदमी थे, इसलिए पुलिस को पूरी संभावना थी कि बच्चे का अपहरण फिरौती के लिए किया गया है. इस संभावना को देखते हुए पुलिस ने इकरामुल हक से कह दिया था कि अगर उन के पास किसी का फिरौती के लिए फोन आता है तो उन्हें किस तरह बात करनी है. इकरामुल हक ने पुलिस को बताया था कि उन की किसी से कोई रंजिश नहीं है. इस के बावजूद पुलिस मोहल्ले में और जहां वह नौकरी करते थे, वहां के लोगों से पूछताछ की. रिहान को गायब हुए कई दिन बीत गए, पर पुलिस को उस के बारे में कोई सुराग नहीं मिला, इस से घर वालों की चिंता बढ़ती जा रही थी.

पुलिस रिहान की खोज में लगी थी, तभी जसपुर से एक और बच्चा गायब हो गया. उस बच्चे के गायब होने के बाद शहर में यह अफवाह फैल गई कि शहर में बच्चे उठाने वाला गैंग सक्रिय है. इस के बाद लोगों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया. उन का पुलिस से भी विश्वास उठने लगा. पुलिस ने भी अपनी जांच बच्चा चोरी करने वाले गैंग की ओर मोड़ दी. बिजनौर, धामपुर, नजीबाबाद तक छानबीन की गई, लेकिन बच्चे का कुछ पता नहीं चला. आगे की जांच में पुलिस ने इकरामुल हक के घर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकाली. फुटेज में रिहान घर से निकलते हुए खुश दिखाई दे रहा था. उस के साथ उसे ट्यूशन पढ़ाने वाला रवि कुमार भी था.

पुलिस ने पूछताछ के लिए रवि कुमार को थाने बुला लिया. उस से भी पूछताछ की गई, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला. पुलिस ने उसे दोबारा पूछताछ के लिए बुलाया तो उस ने पुलिस को आत्महत्या की धमकी दे दी.  काफी खोजबीन के बाद भी जब रिहान का कहीं कुछ पता नहीं चला तो 28 नवंबर, 2015 को जसपुर वालों ने एएसपी कमलेश उपाध्याय का घेराव किया, साथ ही रिहान के जल्दी न मिलने पर आंदोलन करने की चेतावनी दी. इस चेतावनी के बाद एसओजी टीम ने जसपुर में डेरा डाल दिया. पुलिस अभी बच्चे की खोज में इधरउधर हाथपांव मार ही रही थी कि उसी बीच 21 दिसंबर, 2015 को रिहान के पिता को फिरौती का एक पत्र मिला. फिरौती के उस पत्र ने जांच की दिशा मोड़ दी.

पत्र में लिखा था, ‘बधाई हो आप का बेटा मिल गया. वह अभी जिंदा है. वह बारबार आप को याद कर रहा है. आप उसे सहीसलामत वापस पाना चाहते हैं तो दोपहर 12 बजे जसपुर से हरिद्वार को जाने वाली रोडवेज बस में एक बैग में 6 लाख रुपए रख दीजिए. जैसे हमें 6 लाख रुपए मिल जाएंगे, आप का बच्चा आप को सहीसलामत मिल जाएगा. अगर आप ने भूल से भी इस बात का जिक्र पुलिस से किया तो अपने बच्चे की मौत के आप खुद जिम्मेदार होंगे. इस पत्र को गंभीरता से लेना, क्योंकि आप के बच्चे की जिंदगी का सवाल है.’

इकरामुल हक नहीं चाहते थे कि उन के इकलौते बेटे की जिंदगी पर कोई आंच आए, इसलिए उन्होंने फिरौती के पत्र के बारे में पुलिस को कुछ नहीं बताया. उन्होंने एक बैग में 6 लाख रुपए भर कर अपने एक निजी संबंधी इकराम को दे दिए. इकराम वह पैसे ले कर दोपहर 12 बजे हरिद्वार जाने वाली परिवहन निगम की एक बस में बैठ गया. हरिद्वार डिपो में पहुंचते ही इकराम नोटों से भरा बैग सीट पर छोड़ कर नीचे उतर गया. काफी देर बाद भी जब कोई उस बैग को लेने नहीं आया तो इकराम ने इकरामुल हक को फोन कर के पूछा कि अब वह क्या करे?

जब पैसे लेने कोई नहीं आया तो इकरामुल हक ने पैसे ले कर उसे घर आने को दिया. इकराम वह बैग ले कर घर लौट आया. उधर पुलिस के शक की सुई बारबार रिहान को ट्यूशन पढ़ाने वाले रवि कुमार पर जा रही थी. लेकिन रिहान के घर वालों को रवि पर इतना विश्वास था कि वे पुलिस से यही कह रहे थे कि वह रवि को परेशान न करे. इस के बाद पुलिस ने रवि के बारे में खुफिया जानकारी इकट्ठी करनी शुरू कर दी. पुलिस को पता चला कि जिस दिन से रिहान लापता हुआ था, रवि का उसी दिन से मोबाइल बंद था. रिहान को रवि से बेहद लगाव था. लेकिन उस के लापता होने के कई दिनों बाद भी रवि रिहान के बारे में पूछने उस के घर नहीं गया.

रवि को जब लगने लगा कि पुलिस उस के पीछे पड़ी हुई है तो वह जसपुर छोड़ कर धामपुर चला गया. इकरामुल हक के घर से कुछ दूरी पर किसी के घर के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगा था. पुलिस ने उस कैमरे की फुटेज देखी तो उस में काले रंग की एक स्कूटी, जिस का नंबर यूपी 020 एएल 9540 था, नजर आई. उस पर 2 लोग सवार थे. रिहान उन दोनों के बीच बैठा था. पुलिस ने वह वीडियो रिहान के घर वालों को दिखाई तो उन्होंने रिहान के आगेपीछे बैठे दोनों लोगों की पहचान रिहान के टीचर रवि कुमार और उस के मौसेरे भाई उमेश के रूप में की. उमेश जसपुर के छिपियान मोहल्ले में रहता था.

इस फुटेज को देखने के बाद पुलिस को पूरा विश्वास हो गया कि रिहान के अपहरण में रवि का ही हाथ है. इस के बाद रिहान के घर वालों को भी रवि कुमार पर शक हो गया था. पुलिस रवि की तलाश करने लगी तो पता चला कि वह धामपुर में किसी कोचिंग सेंटर में पढ़ा रहा है. इस के बाद पुलिस ने कांस्टेबल आसिफ और रिहान के मामा सरफराज को उस के पीछे लगा दिया. दोनों ही धामपुर के उस कोचिंग सेंटर पहुंच गए, जहां रवि पढ़ाता था. वह कोचिंग सेंटर किसी अनिल कुमार का था. रहस्य खुलवाने के लिए आसिफ और सरफराज ने स्टूडेंट बन कर उस कोचिंग सेंटर में 2 दिनों की डैमो क्लास अटैंड करने का फैसला लिया.

कांस्टेबल आसिफ ने क्लास अटैंड करने के बाद पहले दिन ही रवि कुमार से दोस्ती गांठ ली. 2 दिनों में ही वह उस से इतना घुलमिल गया कि आसिफ ने उस के पेट की सारी हकीकत निकाल ली. रवि आसिफ और सरफराज के बारे में नहीं जानता था. वह परेशान नजर आ रहा था, इसी का फायदा दोनों ने उठाया था. कांस्टेबल आसिफ ने सारी बातें थानाप्रभारी डी.आर. आर्य को बता दीं. इस के बाद पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उस की निशानदेही पर उस के मौसेरे भाई उमेश को भी पुलिस ने पकड़ लिया.

दोनों से रिहान के बारे में पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि रिहान का अपहरण उन्होंने ही किया था और अब वह इस दुनिया में नहीं है. उन दोनों से उस की लाश के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उस की लाश आजमगढ़ के जंगल में है. रात में ही उन दोनों को ले कर पुलिस आजमगढ़ पहुंची. उस घने जंगल में रवि और उमेश वह जगह भूल गए, जहां उन्होंने रिहान की लाश छिपाई थी. वह पुलिस को जंगल में घुमाते रहे. सर्च लाइट में कई घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद आखिर एक जगह रिहान के कपड़े मिल गए. जहां पर कपड़े मिले थे उस जगह पर पहुंच कर रवि और उमेश को जगह याद आ गई.

वे पुलिस को जंगल में एक ऐसी जगह ले गए, जहां जमीन में एक बड़ी बिल बनी थी. उसी बिल में ही उन्होंने रिहान की लाश छिपाई थी. पुलिस ने उस बिल की खुदाई कराई तो उस में से एक कंकाल बरामद हुआ. वह कंकाल रिहान का ही हो सकता था. डेढ़ महीने में उस के शरीर को जंगली जानवर खा गए होंगे. 29 दिसंबर की सुबह पुलिस ने घटनास्थल की आवश्यक काररवाई कर के कंकाल और उस के कपड़ों को अपने कब्जे में ले लिया. इस के बाद दोनों अभियुक्तों को ले कर जसपुर लौट आई. रेहान के घर वालों को उस की हत्या का पता चला तो घर में कोहराम मच गया.

पुलिस द्वारा दोनों अभियुक्तों से की गई पूछताछ में रिहान के अपहरण और हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

रवि उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के कस्बा नजीबाबाद निवासी गजराम का बेटा था. गजराम सरकारी स्कूल में अध्यापक थे. उन के 4 बच्चों में रवि सब से छोटा था. रवि ने बिजनौर के वर्धमान डिग्री कालेज से बीएससी की थी. इस के बाद वह नौकरी के लिए तैयारी करने लगा था. काफी कोशिश के बाद भी उसे नौकरी नहीं मिली तो वह अप्रैल, 2015 से जसपुर के एक निजी स्कूल में पढ़ाने लगा. खाली समय में वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दिया करता था. रवि कोई ऐसा काम करना चाहता था, जिस से उसे अच्छी कमाई हो. वह सोचता था कि अगर वह अपना कोचिंग सैंटर खोल ले तो उस से उसे अच्छी कमाई हो सकती है. लेकिन कोचिंग सेंटर खोलने के लिए उस के पास पैसे नहीं थे. पैसे कहां से आएं, इस के लिए वह अपने दिमागी घोड़े दौड़ाने लगा.

उस के दिमाग में आया कि अगर वह किसी बच्चे का अपहरण कर के मोटी फिरौती ले कर अपना कोचिंग सेंटर खोल सकता है. उसे यह उपाय तो सही लगा, लेकिन पकड़े जाने के डर की वजह से वह किसी बच्चे के अपहरण का साहस नहीं कर पा रहा था. उस ने जब भी हिम्मत की, हर बार हिम्मत जवाब दे गई. इस बारे में उस ने अपने मौसेरे भाई उमेश से सलाह की. उमेश जसपुर के मोहल्ला छिपियान में रहता था. उस के पिता राकेश कुमार का कुछ साल पहले निधन हो चुका था. उस के बाद उस के यहां आर्थिक समस्या खड़ी हो गई थी. उस की मां घर का खर्च चलाने के लिए कुछ लोगों के घरों में काम करती थी.

उमेश थोड़ा बड़ा हुआ तो काशीपुर में एक कलर लैब में नौकरी करने लगा. परिवार की सीमित आमदनी थी, जिस से उस के शौक पूरे नहीं हो पाते थे. यही वजह थी कि जब रवि ने उस से किसी बच्चे के अपहरण के बारे में सलाह मांगी तो वह खुद यह काम करने के लिए तैयार हो गया. बिना मेहनत के अमीर बनने की बात आई तो वे सोचने लगे कि किस बच्चे को निशाना बनाया जाए. जिस के अपहरण से उन्हें मोटी रकम मिल जाए. उसी बीच रवि की निगाहों में रिहानुल हक उर्फ रिहान चढ़ गया. वह रिहान को ट्यूशन पढ़ाता ही था. उस के घर में उस की अच्छी पैठ भी थी.

एक तरह से रिहान के घर वाले उसे अपने घर का सदस्य मानते थे. रवि उसे उसी के घर में ट्यूशन पढ़ाने के बाद अपने साथ स्कूल भी ले जाता था. इसी वजह से उसे लगा कि रिहान का अपहरण करने से उस के घर वाले व अन्य लोग उस पर शक नहीं करेंगे. इस के बाद उस ने उमेश से बात की. रिहान के पिता अच्छी हैसियत वाले थे, इसलिए फिरौती में उन से मोटी रकम मिल सकती थी. वह उन का एकलौता बेटा था. योजना बनाने के बाद दोनों मौके की तलाश में लग गए.

21 नवंबर, 2015 को रवि और उमेश ने रिहान के अपहरण की योजना बनाई और स्कूटी ले कर उस के घर की ओर चल पड़े. रिहान अपने दरवाजे पर खड़ा था. उन्हें देखते ही वह उन के पास आ गया. रवि ने उसे स्कूटी पर बैठा लिया. उस के बैठते ही वे तुरंत वहां से निकल गए. रिहान ने उन से पूछा कि वे कहां जा रहे हैं तो रवि ने कह दिया कि वे घूमने जा रहे हैं. बच्चों को घूमना अच्छा लगता है. इसलिए जब वह पतरामपुर वाली रोड से होते हुए जंगल की तरफ चले तो जंगल देख कर रिहान खुश हो गया. उस समय वह अपने घर वालों को भूल गया.

रिहान को घुमातेफिराते उस से बातें करते वे शहर से 20 किलोमीटर दूर कालू सिद्ध की मजार से आगे अमानगढ़ के जंगल में पहुंच गए. यह जंगल जिला बिजनौर में पड़ता है. रवि और उमेश रिहान को नदी तक स्कूटी से ले गए. इस के बाद नदी पार कर के जंगल में चले गए. जंगल में रिहान डरने लगा. वह रोने लगा तो रवि ने उसे समझाने की कोशिश की. लेकिन वह चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था. वह जोरजोर से रोनेचिल्लाने लगा तो कहीं कोई उस के रोनेचिल्लाने की आवाज सुन न ले, रवि और उमेश डर गए.

उन्होंने उस के मुंह पर कपड़ा बांध दिया. वह कहीं भाग न जाए, इस के लिए उन्होंने उसे एक पेड़ से बांध दिया. इस के बाद वहीं बैठ कर आगे की योजना बनाने लगे. उसी बीच दम घुटने से रिहान की मौत हो गई. उस के मरने से दोनों बुरी तरह घबरा गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वे क्या करें. फिरौती मांगने वाली बात उन के दिमाग से उड़ गई. उन्होंने जल्दी से उस के कपड़े उतारे और उसे वहीं किसी जानवर की बिल में डाल दिया. वहां से कुछ दूरी पर उस के कपड़े फेंक दिए.

रिहान को ठिकाने लगाने के बाद रवि ने 6 लाख की फिरौती के लिए इकरामुल हक के पते पर एक पत्र भेजा. उन्होंने फिरौती की रकम एक बैग में रख कर जसपुर से हरिद्वार को दोपहर 12 बजे जाने वाली बस में रखने को कहा. वह बस हरिद्वार करीब 4 बजे पहुंचती थी. इसलिए निर्धारित समय पर वह हरिद्वार के बसअड्डे पर खड़े हो कर जसपुर से आने वाली बस का इंतजार करने लगे. वह बस हरिद्वार बसअड्डे पर पहुंची तो उन्होंने देखा कि उस में से एक आदमी नहीं उतरा था. रवि को लगा कि शायद वह पुलिस वाला है, इसलिए बैग लेने के लिए वह बस में नहीं घुसा और उमेश को ले कर वहां से चला गया.

जब लोगों को पता चला कि रिहान की हत्या किसी और ने नहीं, उस के टीचर ने की है तो लोग हैरान रह गए. गांवसमाज के ही नहीं, राजनैतिक लोग भी सांत्वना देने इकरामुल हक के यहां आने लगे. जिस स्कूल में रिहान पढ़ता था, उस स्कूल की प्रधानाचार्य मीनाक्षी चौहान भी शोक प्रकट करने आईं. शहर के अन्य स्कूलों के बच्चों ने कैंडिल मार्च निकाला. कुमाऊं रेंज के डीआईजी ने मामले का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को 5 हजार रुपए तो एसएसपी केवल खुराना ने ढाई हजार रुपए का पुरस्कार दिया है. इस के अलावा एसएसपी ने कांस्टेबल मोहम्मद आसिफ को 1000 रुपए का नकद पुरस्कार दे कर उस के कार्य की सराहना की.

पूछताछ के बाद दोनों अभियुक्तों को पुलिस ने भादंवि की धारा 364ए/302/201 के तहत गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस ने शव के अवशेष को फोरेंसिक जांच व डीएनए जांच के लिए प्रयोगशाला भेज दिया है. इस केस की जांच एसएसआई एस.सी. जोशी कर रहे हैं. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Delhi Robbery Case: सवा करोड़ के गहनों की लूट

Delhi Robbery Case: देश की राजधानी के भीड़ भरे इलाके से हुई सवा करोड़ रुपए के गहनों की लूट ने दिल्ली पुलिस की नींद उड़ा दी थी. लेकिन पुलिस ने भी ऐसा सूत्र ढूंढ निकाला कि लुटेरों के पूरे गैंग को दबोच लिया, जिस ने और भी कई चौंकाने वाले राज उगले.

सुबह के 8 बजे के करीब पुलिस कंट्रोल रूम से उत्तरी दिल्ली के थाना सदर बाजार पुलिस को सूचना मिली कि कुतुब रोड पर तांगा स्टैंड के पास मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने चाकू मार कर किसी का बैग छीन लिया है. सदर बाजार, खारी बावली और चावड़ी बाजार आसपास हैं. यहां रोजाना बड़ेबड़े व्यापारियों का आनाजाना लगा रहता है. लुटेरे व्यापारियों व अन्य लोगों को यहां अपना निशाना बनाते रहते हैं. यहां ज्यादातर घटनाएं लूट की ही होती हैं.

जिस समय ड्यूटी अफसर को यह सूचना मिली थी, उस समय थानाप्रभारी अनिल कुमार औफिस में ही थे. ड्यूटी अफसर ने लूट की इस घटना के बारे में थानाप्रभारी को बताया तो उन के दिमाग में तुरंत आया कि लुटेरों ने किसी व्यापारी को शिकार बना लिया है. वह तुरंत एसआई संजय कुमार सिंह, प्रकाश और कुछ अन्य स्टाफ को ले कर घटनास्थल की ओर चल पड़े. घटनास्थल थाने से उत्तर दिशा में आधा किलोमीटर दूर था, इसलिए वह 5 मिनट में वहां पहुंच गए. वहां कुछ लोग जमा थे और एक औटो खड़ा था. उस में 30-35 साल का एक आदमी बैठा था, जिस के  दाहिने पैर के घुटने के पास से खून बह रहा था.

औटो के पास एक आदमी खड़ा था, जिस की उम्र 40-42 साल रही होगी. वह बहुत घबराया हुआ था. पूछने पर उस ने अपना नाम भरतभाई बताया. उस ने बताया कि बदमाश उसी का गहनों से भरा बैग ले कर फरार हो गए हैं. गहनों की कीमत कितनी थी, उसे पता नहीं था. उस का कहना था कि लूट का विरोध करने पर एक बदमाश ने उस के साथी प्रवीण को चाकू मार कर घायल कर दिया था.

अनिल कुमार ने घायल प्रवीण को कांस्टेबल सतेंद्र के साथ हिंदूराव अस्पताल भिजवाया और खुद भरतभाई से पूछताछ करने लगे. इस पूछताछ में उस ने बताया कि वह अहमदाबाद में मेसर्स राजेश कुमार अरविंद कुमार आंगडि़या के यहां नौकरी करता है. उन की फर्म अहमदाबाद से दिल्ली और दिल्ली से अहमदाबाद गहने भेजने का काम करती है. दिल्ली के कूचा घासीराम, चांदनी चौक में उन का एक औफिस है, जिसे अमितभाई संभालते हैं.

भरतभाई ने आगे जो बताया, उस के अनुसार, वह अहमदाबाद-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रैस से गहनों का एक बैग ले कर दिल्ली के लिए चला था. यह ट्रेन अहमदाबाद से एक दिन पहले शाम 5 बजे चली थी और उस दिन पौने 8 बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची थी. प्रवीण दिल्ली वाले औफिस में काम करता था. जब भी वह माल ले कर नई दिल्ली स्टेशन पहुंचता था, वही उसे लेने रेलवे स्टेशन पर आता था. उस दिन भी प्रवीण उसे लेने स्टेशन पर आया था. वहां से उन दोनों ने चांदनी चौक जाने के लिए एक औटो किया और बैग ले कर उस में बैठ गए. जैसे ही उन का औटो यहां पहुंचा, तभी पीछे से पल्सर मोटरसाइकिल पर आए 3 लोगों ने उन का औटो रुकवा लिया.

औटो के रुकते ही मोटरसाइकिल से 2 लोग उतरे. उन में से एक ने भरतभाई पर पिस्तौल तान दी, दूसरा चाकू ले कर प्रवीण के पास खड़ा हो गया. तभी एक अपाचे मोटरसाइकिल और आ गई. उस पर भी 3 लोग सवार थे. उस मोटरसाइकिल से भी 2 लोग उतर कर उन के पास आ गए. तभी पिस्तौल वाले ने उस से गहनों से भरा बैग छीनने की कोशिश की. उस ने बैग नहीं छोड़ा तो चाकू वाले ने प्रवीण के पैर में चाकू मार दिया. इसी के साथ औटोचालक को 2 थप्पड़ मार दिए. थप्पड़ लगते ही औटोचालक भाग कर सड़क के उस पार जा कर खड़ा हो गया. उसी समय पिस्तौल वाले ने भरतभाई से बैग छीन कर अपाचे मोटरसाइकिल से आए लड़के को दे दिया. इस के बाद वे सभी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की तरफ तेजी से चले गए.

भरतभाई से पुलिस को यह तो पता नहीं चला कि लूटे गए बैग में कितनी कीमत के गहने थे, पर यह जरूर पता चल गया था कि लुटेरे गहनों से भरा जो बैग लूट कर ले गए थे, उस का वजन 5, साढ़े 5 किलोग्राम था और उस बैग में जीपीएस डिवाइस भी लगा था. जीपीएस डिवाइस की बात सुन कर अनिल कुमार को लगा कि उस के सहारे लुटेरों तक पहुंचा जा सकता है. गहनों के वजन के आधार पर पुलिस ने अंदाजा लगाया कि बैग में लाखों रुपए के गहने होंगे.

लूट का यह मामला बड़ा था, इसलिए अनिल कुमार ने घटनास्थल से ही पुलिस ने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दे दी. डीसीपी मधुर वर्मा ने जिले की मुख्य सड़कों पर बैरिकेड्स लगा कर वाहनों की चैकिंग के आदेश समस्त थानाप्रभारियों को दिए और खुद भी घटनास्थल पर पहुंच गए. भरतभाई ने लूट की सूचना दिल्ली और अहमदाबाद के अपने औफिसों को दे दी थी. यह खबर सुन कर दिल्ली औफिस से अमितभाई घटनास्थल पर पहुंच गए थे. उन्होंने डीसीपी को बताया कि लूटे गए गहनों की कीमत एक करोड़ से अधिक थी. गहने वाले बैग में जो जीपीएस डिवाइस रखा था, पुलिस ने अमित से उस का नंबर ले लिया. वह डिवाइस वोडाफोन कंपनी का था.

दिनदहाड़े हुई इस लूट को सुलझाने के लिए मधुर वर्मा ने 2 पुलिस टीमें बनाईं. पहली टीम थाना सदर के थानाप्रभारी सतीश मलिक के नेतृत्व में बनाई गई, जिस में इंसपेक्टर मनमोहन, कमलेश, एसआई संजय कुमार सिंह, प्रकाश, निसार अहमद, आशीष शर्मा, एएसआई सुरेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल ए.के. वालिया, अवधेश कुमार, अशोक, जितेंद्र सिंह, कांस्टेबल अमित, सुरेश, बलराम, समंद्र आदि को शामिल किया गया.

दूसरी पुलिस टीम औपरेशन सेल के इंसपेक्टर धीरज कुमार के नेतृत्व में बनी, जिस में एसआई सुखवीर मलिक, देवेंद्र, यशपाल, प्रणव, आनंद, एएसआई सतीश मलिक, हैडकांस्टेबल योगेंद्र, राजेंद्र, कांस्टेबल प्रमोद, चंद्रपाल दिनेश को शामिल किया गया था. दोनों टीमों का निर्देशन के एसीपी राजेंद्र प्रसाद गौतम कर रहे थे. दोनों टीमें एसीपी राजेंद्र प्रसाद गौतम की देखरेख में केस की छानबीन में जुट गईं.

पुलिस टीम ने जांच की शुरुआत जीपीएस डिवाइस से की. पुलिस पता करने लगी कि बैग किस क्षेत्र में है. पुलिस ने फर्म के अहमदाबाद औफिस में अरविंदभाई से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि वह जल्द ही दिल्ली पहुंच कर पुलिस से संपर्क करेंगे. डिवाइस के कोड नंबर से पुलिस ने जांच की तो पता चला कि वह डिवाइस अहमदाबाद से निकलने के कुछ देर बाद ही बंद हो गया था. इस से पुलिस को निराशा हुई. गहने वाले बैग में जीपीएस डिवाइस रखी होने की जानकारी भरतभाई को भी थी, इसलिए पुलिस को शक हुआ कि कहीं उसी ने लूट के लिए डिवाइस को बंद नहीं कर दिया था. इस का पता लगाने के लिए पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. प्रवीण का हिंदूराव अस्पताल में इलाज चल रहा था. वहां भी पुलिस का पहरा लगा दिया गया.

भरतभाई को हिरासत में लेने की बात अरविंदभाई को पता चली तो उन्हें हैरानी हुई कि पुलिस लुटेरों को पकड़ने के बजाय उन्हीं के कर्मचारी को परेशान कर रही है. उन्होंने पुलिस से भरतभाई के खिलाफ कोई काररवाई न करने की सिफारिश की. उन्होंने कहा कि भरत पिछले 6 महीने से उन की फर्म में काम कर रहा है. वह बहुत ही ईमानदार और वफादार है. वह उसे अच्छी तरह जानते हैं. इस तरह का काम वह हरगिज नहीं कर सकता. जीपीएस डिवाइस के बारे में उन्होंने बताया कि वह किसी वजह से अपने आप ही कभीकभी बंद हो जाती है.

फर्म मालिक के कहने पर पुलिस ने भरतभाई को छोड़ जरूर दिया, लेकिन उसे यह हिदायत दे दी थी कि जांच में जब भी उस की जरूरत पड़ेगी, वह हाजिर होगा. अब पुलिस टीमों ने दूसरी दिशा में जांच शुरू की. जिस तांगा स्टैंड के पास लूट की गई थी, वहां पर मार्केट एसोसिएशन की ओर से 3 सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. पुलिस को उम्मीद थी कि उन कैमरों में लुटेरों की फोटो जरूर कैद हो गई होगी. लेकिन पुलिस ने उन कैमरों की फुटेज के लिए मार्केट एसोसिएशन से सपंर्क किया तो पता चला कि 31 दिसंबर की रात 8 बजे से किसी वजह से सीसीटीवी सिस्टम बंद हो गया था. पुलिस को यहां भी शक हुआ कि यह सिस्टम इस घटना से कुछ घंटे पहले ही क्यों बंद हुआ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि इस सिस्टम की देखरेख करने वाले की लुटेरों से कोई सांठगांठ रही हो? लुटेरों के कहने पर उस ने सिस्टम को बंद कर दिया हो. पुलिस टीम ने इस बिंदु पर भी जांच की. मार्केट एसोसिएशन की तरफ से जो व्यक्ति सीसीटीवी सिस्टम को देखता था, उस से भी पुलिस ने पूछताछ की. उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स भी खंगाली, पर कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस को जांच में जिस बिंदु पर सफलता की उम्मीद नजर आती, उस पर भी जांच आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

जांच का अगला पड़ाव पुलिस ने काल डिटेल्स पर केंद्रित किया. पुलिस टीम ने पता किया कि घटना वाले दिन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड तांगा स्टैंड तक सुबह 6 बजे से 9 बजे तक कौनकौन से फोन नंबर सक्रिय रहे. यानी उस रूट पर उस दौरान कितने लोगों की फोन पर बातें हुईं. मोबाइल फोन कंपनियों के सहयोग से पुलिस ने यह डाटा इकट्ठा किया. इस डाटा को डंप डाटा कहा जाता है. इस डाटा में कई हजार नंबर निकले. उन हजारों फोन नंबरों से संदिग्ध नंबरों को छांटना आसान नहीं था. यह जिम्मेदारी उत्तरी जिला पुलिस मुख्यालय में कंप्यूटर औपरेटर हेडकांस्टेबल ए.के. वालिया को दी गई.

ए.के. वालिया को डंप डाटा खंगालने का एक्सपर्ट माना जाता है. उन्होंने उस डाटा से करीब 300 संदिग्ध नंबर निकाले. इस के अलावा पुलिस ने अरविंदभाई की फर्म में जितने भी कर्मचारी काम करते थे, उन सभी के फोन नंबर ले कर यह जानने की कोशिश की कि उन में से किसी की डंप डाटा के नंबरों से किसी पर उस समय बात नहीं हुई थी. लेकिन कर्मचारियों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला. उन हजारों फोन नंबरों में जो 3 सौ संदिग्ध नंबर निकाले गए थे, उन में से भी कोई ऐसा सूत्र नहीं मिला, जिस से लुटेरों तक पहुंचा जा सकता. यह जांच भी जहां से चली थी, वहीं ठहर गई.

भरतभाई ने पुलिस को बताया था कि बदमाश पल्सर और अपाचे मोटर- साइकिलों से आए थे. इन के बारे में पता करने के लिए पुलिस ने यह पता लगाया कि घटनास्थल से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बीच कहांकहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. पता चला कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर, स्टेशन के बाहर स्थित कई दुकानों पर और उसी रोड पर रास्ते में पड़ने वाले थाना नबी करीम के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. लुटेरों ने घटना को अचानक अंजाम नहीं दिया होगा. इस से पहले उन्होंने इस रूट पर रेकी की होगी. इसी बात को ध्यान में रख कर पुलिस ने सभी कैमरों की 15 दिन पुरानी फुटेज देखी.

फुटेज में घटना वाले दिन एक औटो के पीछे पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिल जाती दिखाई दी. उस दिन से एक दिन पहले भी वे दोनों मोटरसाइकिलें उसी रूट पर जाती दिखाई दीं, लेकिन फुटेज में उन के नंबर स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहे थे. 4-5 दिन पहले तक दोनों मोटरसाइकिलें उस रूट में कई बार आतीजाती दिखीं. उन मोटरसाइकिलों पर जो लोग बैठे थे, उन की कदकाठी भरतभाई और प्रवीण द्वारा बताए गए हुलिए से मेल खा रही थी.

इस के बाद पुलिस ने अपना ध्यान पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिलों पर लगा दिया. दिल्ली परिवहन विभाग की सभी अथौरिटियों में जितनी भी पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिलें रजिस्टर्ड थीं, पुलिस ने उन की जानकारी निकलवाई. पता चला कि दिल्ली में 40 हजार पल्सर और 20 हजार अपाचे मोटरसाइकिलें रजिस्टर्ड हैं. इतनी मोटरसाइकिलों की जांच करना आसान बात नहीं है. लिहाजा पुलिस ने अपने जिले की अथौरिटी से उक्त दोनों ब्रांड की मोटरसाइकिलों की डिटेल्स निकलवाई.

यहां 400 पल्सर और 150 अपाचे मोटरसाइकिलें रजिस्टर्ड थीं. इन सभी की डिटेल्स हासिल कर पुलिस ने जिन लोगों के नाम से गाडि़यां थीं, उन का उम्र के हिसाब से वर्गीकरण किया. ज्वैलरी का बैग लूटने वाले बदमाशों की जो उम्र थी, उस उम्र के मोटरसाइकिल वालों को छांटा गया. इस तरह के करीब 42 मोटरसाइकिल मालिक मिले. इन सभी के पतों पर जा कर पुलिस ने पता किया कि 2 जनवरी, 2016 को वे सुबह 7 से 9 बजे के बीच वे अपनी मोटरसाइकिल ले कर कहां थे. इस जांच में भी पुलिस के हाथ लुटेरों तक नहीं पहुंच सके.

उधर जिला पुलिस मुख्यालय में कंप्यूटर औपरेटर ए.के. वालिया डंप डाटा को खंगालने में जुटे थे. उस में से वोडाफोन के एक नंबर पर उन की नजर जम गई. वह नंबर उन्होंने एसीपी राजेंद्र प्रसाद गौतम को दिया. वह नंबर पश्चिमी दिल्ली के रघुवीरनगर की रहने वाली गुड्डी के नाम था. सबइंसपेक्टर संजय कुमार सिंह उस नंबर की जांच के लिए गए तो पता चला कि उस पते पर गुड्डी नाम की कोई महिला नहीं रहती. इस से साफ हो गया कि वह नंबर किसी फरजी आईडी पर लिया गया था.

जब किसी भी कंपनी का नया मोबाइल नंबर लिया जाता है तो कंपनियां फार्म पर ग्राहक का एक अल्टरनेट नंबर मांगती हैं. वोडाफोन कंपनी का जो नंबर लिया गया था, उस पर अल्टरनेट नंबर के रूप में रिलायंस कंपनी का एक नंबर लिखा था. वह नंबर महेंद्र सिंह का था, जो बी-492, मीतनगर, ज्योतिनगर, नंदनगरी, दिल्ली का रहने वाला था. एसआई संजय कुमार सिंह हैडकांस्टेबल अवधेश और अशोक को ले कर उस पते पर पहुंचे.

वहां महेंद्र सिंह मिल गया. पुलिस को देखते ही वह घबरा गया. पुलिस ने उसे हिरासत में ले कर सदर बाजार में हुए गहनों की लूट के बारे में पूछा तो उस ने इस लूट से मना करते हुए बताया कि वह तो नंदनगरी की ईएसआई डिसपेंसरी में नौकरी करता है. उसे किसी लूट की कोई जानकारी नहीं है. उस ने भले ही खुद को ईएसआईसी डिसपेंसरी का कर्मचारी बताया था, पर उस के हावभाव से साफ लग रहा था कि वह कुछ छिपा रहा है. पुलिस ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो आखिर उस ने मुंह खोल दिया. उस ने स्वीकार कर लिया कि 2 जनवरी को उसी ने अपने साथियों के साथ लूट की उस घटना को अंजाम दिया था.

पुलिस टीम पूछताछ के लिए उसे थाने ले आई. डीसीपी मधुर वर्मा को जब पता चला कि लूट वाला मामला खुल गया है तो वह भी थाने आ गए. उन के सामने जब महेंद्र सिंह से पूछताछ की गई तो गहनों के बैग की लूट का पूरा रहस्य उजागर हो गया. पता चला, उस में सवा करोड़ के गहने थे. गहनों के बैग की लूट की जो कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली थी. महेंद्र सिंह दिल्ली के ज्योतिनगर के रहने वाले तेजू सिंह का बेटा था. वह नंदनगरी स्थित कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) की डिसपेंसरी में अस्थाई सफाई कर्मचारी था. उसे वहां से जो वेतन मिलता था, उस से उस के परिवार का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था. इसलिए वह हमेशा मोटी कमाई के बारे में सोचा करता था. इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था.

महेंद्र को कहीं से पता चला कि चांदनी चौक में ऐसे तमाम लोग हैं, जो यहां से लाखों रुपए के गहने गुजरात ले जाते हैं और वहां से भी उसी तरह गहने दिल्ली आते हैं. उस ने सोचा कि अगर उन्हीं में से किसी को शिकार बना लिया जाए तो एक ही झटके में लाखों रुपए हाथ लग सकते हैं. इस के बाद वह यह पता लगाने लगा कि यह काम कौनकौन करते हैं. किसी जानकार ने उसे बताया कि दिल्ली के कूचा घासीराम में कई आंगडि़ए हैं, जो दिल्ली से बाहर गहने भेजते हैं. वहीं एक सरजू पंडित नाम का आदमी है, जो उन आंगडि़यों के बारे में अच्छी तरह से जानता है. क्योंकि वह उन्हें चायपानी पिलाता है. अगर सरजू पंडित को विश्वास में ले लिया जाए तो मोटा माल हाथ लग सकता है.

महेंद्र कूचा घासीराम के सरजू पंडित के पास पहुंच गया. उस ने पहले तो किसी जरिए उस से जानपहचान की. इस के बाद वह रोजाना उस से मिलने लगा. धीरेधीरे दोनों के बीच दोस्ती हो गई. जब दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई तो एक दिन महेंद्र ने सरजू को अपनी योजना के बारे में बता कर पैसों का लालच दे कर कि जो भी माल हाथ लगेगा, उस में से एक हिस्सा उसे दिया जाएगा, के बाद आंगडि़ए के बारे में पूछा. सरजू पंडित लालच में आ गया. 60 वर्षीय सरजू पंडित ने महेंद्र को प्रवीण कुमार के बारे में बताया ही नहीं, उसे पहचनवा भी दिया. प्रवीण कूचा घासीराम स्थित राजेश कुमार अरविंद कुमार आंगडि़या की फर्म में काम करता था. यह फर्म गहनों की कूरियर का काम करती थी.

दिल्ली के कुछ ज्वैलर्स इस फर्म द्वारा पुराने गहने अहमदाबाद भेज कर वहां से नए डिजाइन के तैयार गहने मंगाते थे. यह काम इस फर्म का कूरियर बौय भरतभाई करता था. वह हर 2 दिन बाद दिल्ली आता था. सरजू पंडित ने महेंद्र को पूरी बात बता तो दी, लेकिन महेंद्र यह फैसला नहीं कर सका कि कूरियर बौय भरतभाई से माल कैसे झटका जाए. महेंद्र का एक दोस्त था रोशन गुप्ता, जो विवेक विहार की झिलमिल कालोनी में रहता था. वह पेशे से ड्राइवर था. उस के 2 बच्चे थे, जो बड़े हो चुके थे. उन की शादी को ले कर वह काफी परेशान था. कुछ दिनों पहले उस ने मकान बनवाया था, जिस से उस पर ढाई लाख रुपए का कर्ज हो गया था. उसे इस बात की भी चिंता रहती थी कि वह कर्ज कैसे चुकाएगा.

महेंद्र ने लूट की योजना रोशन को समझाई तो पैसों की सख्त जरूरत की वजह से वह भी उस के साथ यह काम करने को तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने एक महीने तक उस रूट की रेकी की, जिस रूट से भरतभाई और प्रवीण माल ले कर नई दिल्ली स्टेशन आतेजाते थे. रेकी में रोशन ने अपनी स्प्लेंडर मोटरसाइकिल का उपयोग किया था. रूट को अच्छी तरह समझने के बाद बात हुई कि वारदात को कैसे अंजाम दिया जाए, क्योंकि इस में रिस्क था, इसलिए हथियारबंद लोगों का भी इस में शामिल होना जरूरी था. रोशन मनीष शर्मा और मोहम्मद आरिफ नाम के बदमाशों को जानता था. दोनों ही गाजियाबाद जिले के साहिबाबाद के रहने वाले थे.

मनीष शार्पशूटर था तो मोहम्मद आरिफ शातिर चाकूबाज. रोशन ने दोनों से बात की. वे राजी हो गए तो उन्हें भी योजना में शामिल कर लिया. दोनों बदमाशों को शामिल करने के बाद उन के दिमाग में बात आई कि ज्वैलरी लूटने के बाद मोटरसाइकिल से तुरंत भागना होगा. इस के लिए उन्हें भीड़भाड़ वाली जगह में भी तेजी से मोटरसाइकिल चलाने वाले 2 लोग चाहिए. इस बारे में आपस में चर्चा हुई तो मनीष शर्मा ने बताया कि वह जसपालदास उर्फ रिंकू को जानता है. वह भी साहिबाबाद में रहता है. पहले वह दिल्ली में क्लस्टर बस चलाता था. कुछ दिनों पहले उस ने नौकरी छोड़ा है. वह एक अच्छा बाइक रेसर है.

जसपाल को एक खतरनाक जानलेवा बीमारी थी, उसी के इलाज के लिए उसे पैसों की जरूरत थी. मनीष ने उसे लूट की योजना बताई तो वह भी तैयार हो गया. उस के पास चोरी की एक पल्सर मोटरसाइकिल भी थी. उन्हें एक मोटरसाइकिल चलाने वाला मिल गया था, एक की अभी और जरूरत थी. इस के लिए जसपाल ने अरुण नागर उर्फ बौबी से बात कराई. अरुण नागर मोटरसाइकिल से स्टंट करता था. वह बेरोजगार था. पैसों के लालच में वह भी उन के साथ काम करने को तैयार हो गया. अरुण ने भी किसी की अपाचे मोटरसाइकिल चुरा रखी थी, जिस की नंबर प्लेट बदल कर वह उसे खुद ही चलाता था.

पूरी टीम तैयार हो गई तो सभी ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कूचा घासीराम बाजार तक का कई बार चक्कर लगाया. इस के बाद इस बात पर विचार किया जाने लगा कि घटना को किस जगह अंजाम दिया जाए, जहां से वे आसानी से भाग सकें. काफी सोचनेविचारने के बाद कुतुब रोड पर तांगा स्टैंड के पास वारदात को अंजाम देना निश्चित किया गया. क्योंकि वहां जो दुकानें बनी थीं, वे सुबह के समय बंद रहती थीं और सामने की पार्किंग भी खाली रहती थी. सुनसान रहने की वजह से वहां से यूटर्न ले कर भागना आसान था. वारदात की जगह निश्चित करने के बाद इस बात का भी कई बार रिहर्सल किया गया कि बैग को छीन कर किस तरह वहां से भागना है.

महेंद्र और रोशन गुप्ता को इस बात की पुख्ता जानकारी मिल गई थी कि अहमदाबाद से माल ले कर भरतभाई अहमदाबाद-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रैस से 2 जनवरी को नई दिल्ली स्टेशन पर उतरेगा. उसे पता ही था कि भरतभाई को लेने प्रवीण कुमार आता है. वहां से दोनों औटो से औफिस जाते हैं. पूरा प्लान तैयार कर के महेंद्र, मनीष शर्मा, अरुण नागर उर्फ बौबी, रोशन गुप्ता, जसपाल उर्फ रिंकू और मोहम्मद आरिफ पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिलों से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए. महेंद्र ने सब से पहले रेलवे स्टेशन की इनक्वायरी से यह पता लगाया कि अहमदाबाद से नई दिल्ली आने वाली राजधानी एक्सप्रैस कब आ रही है.

वहां से उसे पता चला कि ट्रेन स्टेशन पर 8 बजे पहुंचेगी. भरतभाई को लेने के लिए सुबह 7 बज कर 40 मिनट पर प्रवीण स्टेशन पहुंच गया था. महेंद्र प्रवीण को पहचानता था, इसलिए वह कुछ दूरी से उस पर नजर रखने लगा, क्योंकि भरतभाई को ट्रेन से उतर कर उसी के पास आना था. कुछ देर बाद अहमदाबाद से चल कर नई दिल्ली आने वाली राजधानी एक्सप्रैस के दिल्ली पहुंचने की घोषणा हुई, महेंद्र सतर्क हो गया. स्टेशन से बाहर निकलने वाले यात्रियों को महेंद्र गौर से देख रहा था. जब उसे भरतभाई दिखा तो वह खुश हो गया. भरत के हाथ में एक बैग था. भरत को पहले से ही पता था कि प्रवीण कहां खड़ा हो कर उस का इंतजार करता है, इसलिए वह स्टेशन से बाहर सीधे उसी स्थान पर पहुंच गया, जहां प्रवीण खड़ा था.

प्रवीण ने एक औटो तय किया, जिस में दोनों बैठ गए. महेंद्र फुरती से उस जगह आ गया, जहां उस के साथी खड़े थे. महेंद्र ने उन्हें वह औटो दिखा दिया, जिस में भरत और प्रवीण बैठे थे. पल्सर को जसपाल उर्फ रिंकू चला रहा था और उस पर महेंद्र तथा मोहम्मद आरिफ बैठे थे. दूसरी मोटरसाइकिल अपाचे को अरुण नागर उर्फ बौबी चला रहा था, जिस पर मनीष शर्मा और रोशन गुप्ता बैठ गए. वे सभी उस औटो का पीछा करने लगे, जिस में भरतभाई और प्रवीण बैठे थे.

जैसे ही वह औटो तांगा स्टैंड के पास पहुंचा, जसपाल ने उसे ओवरटेक कर के रोक लिया. इस के बाद अरुण नागर ने अपाचे मोटर-साइकिल औटो के बराबर में खड़ी कर दी. औटोचालक सरोज पटेल समझ नहीं पाया कि उन लोगों ने ऐसा क्यों किया, क्योंकि उस से तो कोई गलती भी नहीं हुई थी. औटो रुकते ही आरिफ चाकू ले कर और मनीष शर्मा पिस्तौल ले कर भरतभाई और प्रवीण के पास पहुंच गए. महेंद्र ने भरत के हाथ से बैग छीनना चाहा तो उस ने बैग नहीं छोड़ा. तभी डराने के लिए आरिफ ने प्रवीण के पैर पर चाकू मार दिया. इसी के साथ महेंद्र ने ड्राइवर सरोज पटेल के 2 थप्पड़ जड़ दिए.

थप्पड़ लगते ही औटोचालक वहां से भाग कर सड़क के उस पार चला गया. प्रवीण और भरतभाई भी डर गए थे. महेंद्र ने भरतभाई के हाथ से बैग छीन कर रोशन को पकड़ाया तो वे फुरती से यूटर्न ले कर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर चले गए. वहां से गलियों में होते हुए वे शीला सिनेमा के सामने फ्लाईओवर के पास पहुंचे. जसपाल ने वहां पल्सर मोटरसाइकिल रोकी और एक औटोरिक्शा तय कर के उस में महेंद्र और आरिफ के साथ बैठ कर सीमापुरी बौर्डर चला गया. उन के पीछेपीछे अपाचे मोटरसाइकिल पर मनीष, अरुण और रोशन आ रहे थे.

वहां से वे जनकपुरी, साहिबाबाद पहुंचे. जनकपुरी में मनीष का एक प्लौट था, जिस में एक कमरा बना हुआ था. वह जगह सुनसान थी. वहां उन्होंने बैग खोल कर देखा तो उस में अलगअलग डिब्बों में सोने के गहने भरे थे. कुछ अंगूठियां, टौप्स और पैंडेंट ऐसे थे, जिन में हीरे जड़े थे. हीरे जड़ी सारी ज्वैलरी उन्होंने आपस में बांट ली. अब उन के सामने समस्या यह थी कि उन गहनों को कैसे और कहां बेचा जाए, क्योंकि गहने को बेचने पर पकड़े जाने की आशंका थी, इसलिए वे असमंजस में थे कि उसे कैसे ठिकाने लगाया जाए. तभी जसपाल ने कहा, ‘‘मेरे एक मौसा हैं किशनलाल, जो यहीं शालीमार गार्डन के रहने वाले हैं. अंडमान निकोबार में उन की गहनों की दुकान हैं. इस समय वह किसी परिचित की शादी में दिल्ली आए हुए हैं. गहनों को बेचने में वह मदद कर सकते हैं.’’

इस बात पर सभी तैयार हो गए तो जसपाल उर्फ रिंकू ने किशनलाल से बात की. उसने बताया कि सारे गहनों को पिघला कर अगर छड़ें बना दी जाए तो उन छड़ों को बाजार में आसानी से बेचा जा सकता है. सभी को यह सुझाव पसंद आया तो अगले दिन किशनलाल ज्वैलरी पिघलाने के लिए गैस बर्नर और अन्य सामान ले कर जनकपुरी के उसी प्लौट पर बने कमरे में पहुंच गया. किशनलाल ने पांच साढ़े पांच किलोग्राम सोने की ज्वैलरी को पिघला कर एक गोला बना दिया. वह गोला सोने की तरह चमकता हुआ न हो कर कुछ काले रंग का था. किशनलाल ने बताया कि इसे रिफाइंड कर के छड़ें बनानी पड़ेंगी. तब उन सभी ने किशनलाल से कह दिया कि इस गोले को वह अपने साथ ले जाएं और छड़ें बना दें.

किशनलाल उस गोले को ले गया. 3 दिन बाद आ कर उस ने कहा, ‘‘मैं ने उस गोले से अभी एक छड़ बनाई है, जो साढ़े 12 लाख रुपए की बाजार में बिकी है. जैसेजैसे छड़ें बनती जाएंगी, मैं उन्हें बेच कर तुम लोगों को पैसे देता रहूंगा.’’

किशनलाल से मिले साढ़े 12 लाख रुपयों में से एक लाख रुपए महेंद्र ने सरजू पंडित को दे दिए, जिस की सूचना पर उन्होंने घटना को अंजाम दिया था. बाकी के पैसे उन्होंने आपस में बांट लिए. महेंद्र से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 9 जनवरी को मनीष शर्मा, मोहम्मद आरिफ, अरुण नागर उर्फ बौबी, जसपाल उर्फ रिंकू, रोशन गुप्ता और सरजू पंडित को उन के ठिकानों से गिरफ्तार कर लिया. उन की निशानदेही पर पुलिस ने 2 पिस्तौलें, 7 जीवित कारतूस, साढ़े 12 लाख रुपए नकद, 18 डायमंड रिंग्स, 2 जोड़ी डायमंड टौप्स और एक डायमंड पैंडेंट के अलावा अपाचे मोटरसाइकिल बरामद कर ली थी.

किशनलाल को जब पता चला कि पुलिस ने जसपाल व अन्य लोगों को पकड़ लिया है तो वह फरार हो गया. पुलिस ने उस के ठिकाने पर भी छापा मारा था, लेकिन वह नहीं मिला. सभी अभियुक्तों से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि 6 सितंबर, 2015 को दिल्ली के कमला मार्केट इलाके में भी उन्होंने एक कूरियर बौय से 39 लाख रुपए के गहने लूटे थे. इस के अलावा 2 जुलाई, 2015 को देशबंधु गुप्ता रोड पर ढाई लाख रुपए की नकदी लूटी थी.

इन 2 मामलों के खुलासे के बाद पुलिस को लगा कि इस गैंग ने राजधानी में और भी वारदातें की होंगी, इसलिए पुलिस ने 10 जनवरी, 2016 को इन सभी अभियुक्तों को तीसहजारी कोर्ट में ड्यूटी एमएम श्री आर.के. पांडेय के समक्ष पेश किया. उस समय उन्होंने सभी अभियुक्तों को एक दिन के लिए जेल भेज दिया. अगले दिन सभी अभियुक्तों को महानगर दंडाधिकारी अंबिका सिंह की कोर्ट में पेश किया, जहां से पुलिस ने उन्हें 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. Delhi Robbery Case

कथा लिखे जाने तक पुलिस सभी अभियुक्तों से पूछताछ कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Mumbai Crime Story: प्यार में उजड़ी गृहस्थी

Mumbai Crime Story: अगर कोई किसी पर सब से ज्यादा विश्वास करता है तो पहले नंबर पर आती है पत्नी और उस के बाद दोस्त. लेकिन कभीकभी ये दोनों भी दगा करने से नहीं चूकते.

मुंबई से सटे जिला थाणे की तहसील अंबरनाथ के गांव नेवाली आकृति चाल में रहने वाले कुछ लोग सुबह काम के लिए निकले तो गांव से कुछ दूरी पर घनी झाडि़यों के बीच उन्हें प्लास्टिक का एक सुंदर और बड़ा सा कैरीबैग पड़ा दिखाई दिया. तेज बारिश होने के बावजूद उस पर खून के धब्बे दिखाईं दे रहे थे. इसलिए लोगों को यही लगा कि इस में किसी की लाश भरी है. मामला गंभीर था, इसलिए थोड़ी ही देर में वहां भीड़ लग गई. किसी ने इस बात की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. वह इलाका थाना हिल लाईन के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना थाना हिल लाईन पुलिस को दे दी.

सूचना मिलने के बाद ड्यूटी पर तैनात असिस्टैंट इंसपेक्टर पढ़ार ने काररवाई करते हुए सच्चाई का पता लगाने के लिए नेवाली गांव स्थित पुलिस चौकी पर तैनात सबइंसपेक्टर दंगड़ू शिवराम अहिरे और पुलिस कांस्टेबल शेषराव वाघ को घटनास्थल पर भेज दिया. सबइंसपेक्टर दगड़ू शिवराम अहिरे और कांस्टेबल शेषराव वाघ गांव नेवाली पहुंचे तो गांव से कुछ दूरी पर उन्हें भीड़ लगी दिखाई दी. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि लाश वहीं पर पड़ी है.

उन्होंने वहां जा कर सब से पहले तो उस कैरीबैग को झाडि़यों से बाहर निकलवाया. गांव वालों की मौजूदगी में जब उसे खोला गया तो उस में प्लास्टिक की मोटी थैली में एक युवक की लाश को तोड़मरोड़ कर भरा गया था. लाश बाहर निकाली गई. मृतक 27-28 साल का युवक था. किसी तेज धार वाले चाकू से उस का गला काट कर हत्या की गई थी. सांवले रंग का वह युवक शरीर से ठीकठाक था. इस का मतलब हत्या में एक से अधिक लोग शामिल रहे होंगे.

दगड़ू शिवराम अहिरे और शेषराव वाघ ने इस बात की जानकारी सीनियर इंसपेक्टर मोहन बाघमारे को दी तो वह तुरंत इंसपेक्टर जितेंद्र आगरकर, असिस्टैंट इंसपेक्टर मनोज सिंह चौहान, महिला सबइंसपेक्टर वी.एस. शेलार, कांस्टेबल के.बी. जाधव, दिनेश कुभारे, जी.एस. मोरे और महिला कांस्टेबल पेड़वाजे को ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.  उन के पहुंचने तक प्रैस फोटोग्राफर, डाग स्क्वायड, फिंगरप्रिंट ब्यूरो की टीम के अलावा एडीशनल पुलिस कमिश्नर बसंत जाधव और असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर डी. जगताप वहां पहुंच चुके थे.

डाग स्क्वायड, प्रैस फोटोग्राफर और फिंगर प्रिंट ब्यूरो का काम खत्म हो गया तो घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया गया. इस के बाद लाश की शिनाख्त की बात आई तो भीड़ में मौजूद कुछ लोगों ने मृतक की शिनाख्त कर दी. मृतक का नाम संजय हजारे थे. वह अपनी पत्नी अनुभा, एक बच्ची और दोस्त दीपांकर पात्रा के साथ कुछ दिनों पहले ही वहां रहने आया था. मृतक की शिनाख्त होते ही मोहन बाघमारे ने एक सिपाही भेज कर मृतक की पत्नी अनुभा को घटनास्थल पर बुलवा लिया. अनुभा पति की लाश देखते ही फूटफूट कर रोने लगी. पुलिस ने उसे समझाबुझा कर शांत कराया और वहां की सारी औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला मध्यवर्ती अस्पताल भिजवा दिया.

इस के बाद पुलिस थाने लौट आई थी. थाने लौट कर मोहन बाघमारे ने अपने स्टाफ के साथ सलाहमशविरा कर के हत्या के इस मामले की जांच इंसपेक्टर जितेंद्र आगरकर को सौंप दी. जितेंद्र आगरकर ने सहयोगियों के साथ जांच शुरू की तो उन्हें मृतक संजय हजारे की पत्नी अनुभा और साथ रहने वाले उस के दोस्त दीपांकर पात्रा पर शक हुआ. क्योंकि घटनास्थल पर जब अनुभा रो रही थी तो उन्होंने महसूस किया था कि पति की मौत पर कोई पत्नी जिस तरह रोती है, वैसा दर्द अनुभा के रोने में नहीं था. वह दिखावे के लिए रो रही थी. इसलिए उन्होंने जांच की शुरुआत अनुभा और दीपांकर से शुरू की.

उन्होंने दोनों को थाने बुला कर पूछताछ शुरू कर दी. पुलिस ने जब अनुभा से पूछा कि यह सब कैसे हुआ तो नजरें चुराते हुए उस ने कहा कि कल रात उन का अंडे खाने का मन हुआ तो वह अंडे लेने निकले. लेकिन वह गए तो लौट कर नहीं आए. मुझे लगा कि बारिश तेज हो रही है, इसलिए वह कहीं रुक गए होंगे. रात 12 बजे तक मैं ने उन का इंतजार किया. उतनी रात तक भी वह नहीं आए तो मैं बेटी के साथ सो गई. दीपांकर पात्रा के बारे में पूछा गया तो उस ने उसे अपना मुंहबोला भाई बताया. उस से भी पूछताछ की गई. उस ने अनभिज्ञता जाहिर करते हुए खुद को निर्दोष बताया.

अनुभा का बयान जितेंद्र आगरकर के गले नहीं उतर रहा था. जिस औरत का पति रात को घर न आए, भला वह निश्चिंत हो कर कैसे सो सकती है? इस के अलावा दीपांकर ने पूछताछ में जो बयान दिया था, वह अनुभा के बयान से एकदम अलग था. अनुभा ने उसे मुंहबोला भाई बताया था, जबकि दीपांकर ने खुद को उस का दूर का रिश्तेदार बताया. इसी वजह से अनुभा शक के घेरे में आ गई थी. पुलिस को लग रहा था कि किसी न किसी रूप में अनुभा पति की हत्या में शामिल है. लेकिन पुलिस के पास उस के खिलाफ कोई ठोस सबूत न होने की वजह से पुलिस उस पर सीधा आरोप नहीं लगा पा रही थी.

पुलिस सबूत जुटाने के लिए वहां पहुंची, जहां संजय अनुभा के साथ पहले रहता था. क्योंकि शिनाख्त के दौरान लोगों ने बताया था कि मृतक यहां कुछ दिनों पहले ही रहने आया था. अनुभा और दीपांकर ने पूछताछ में बताया था कि यहां आने से पहले वे अंधेरी (पूर्व) के गौतमनगर में रहते थे. जितेंद्र आगरकर ने अपने सहयोगियों को गौतमनगर भेज कर संजय और उस की पत्नी के बारे में पता किया तो वहां से पता चला कि संजय और उस की पत्नी अनुभा के बीच अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था. झगड़े की वजह थी अनुभा के संजीव शिनारौय के साथ के अवैध संबंध.

संजीव पहले उन के साथ ही रहता था. बाद में उसे अलग कर दिया गया था. इस के बावजूद अनुभा उस से मिलती रहती थी. जांच टीम के लिए यह जानकारी महत्त्वपूर्ण थी. पुलिस ने तुरंत संजीव को हिरासत में ले लिया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो हर अभियुक्त की तरह उस ने भी पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस को पूरा विश्वास था कि हत्या इसी ने की है, इसलिए पुलिस ने उस से सच उगलवा ही लिया. इस के बाद अनुभा को भी गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ में अनुभा और संजीव ने संजय की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस तरह थी.

संजय हजारे पश्चिम बंगाल के जिला 24 परगना के वीरभूम का रहने वाला था. चूंकि उस के यहां सोनेचांदी के गहने बनाने और उन पर नक्काशी करने का काम होता आया था, इसलिए थोड़ीबहुत पढ़ाई कर के वह भी यही काम करने लगा था. गांव में उस की एक छोटी सी दुकान थी, जिस से इतनी आमदनी नहीं होती थी कि परिवार का गुजरबसर आराम से होता. मुंबई मेहनती और महत्त्वाकांक्षी युवकों के सपनों की नगरी है. संजय भी घर वालों से इजाजत ले कर सन 2005 में मुंबई आ गया था.

मुंबई में उस के गांव के कई लड़के पहले से ही रहते थे, इसलिए मुंबई में संजय को किसी तरह की परेशानी नहीं हुई. वह उन्हीं के साथ रह कर सोनेचांदी के गहने बनाने और उन पर नक्काशी का काम करने लगा. कुछ दिनों तक इधरउधर काम करने के बाद बोरीवली की एक बड़ी फर्म में उसे काम मिल गया. यहां उसे ठीकठाक पैसे मिलने लगे. ठीकठाक कमाई होने लगी तो पैसे इकट्ठा कर के उस ने अंधेरी (पूर्व) के गौतमनगर में एक मकान खरीद लिया.

वह अकेला ही रहता था, इसलिए दीपांकर और संजीव को भी उस ने अपने साथ रख लिया. संजीव उसी के गांव का रहने वाला था, जबकि दीपांकर पात्रा दूसरे गांव का रहने वाला था, बाद में दीपांकर ने ही उस की शादी अपनी दूर की रिश्तेदार अनुभा से करा दी. वह उस का रिश्तेदार हो गया. यह सन 2001 की बात है. चूंकि संजय के पास अपना मकान था, इसलिए शादी के बाद वह पत्नी अनुभा को मुंबई ले आया. उस के मकान में 2 कमरे थे. इसलिए अनुभा के आने के बाद भी उस के दोनों दोस्त भी उसी के साथ रहते रहे. साल भर बाद अनुभा ने एक बेटी को जन्म दिया. सभी उस बच्ची को खूब प्यार करते थे. उन के लिए वह खिलौने की तरह थी, इसलिए वे उसे खूब खेलाया करते थे.

कहा जाता है कि आदमी की नीयत कब बदल जाए, कहा नहीं जा सकता है. ऐसा ही संजीव के साथ हुआ. इस की नीयत अनुभा पर बिगड़ने लगी. उस की नीयत खराब हुई तो वह उस के नजदीक जाने की कोशिश करने लगा. देखने में भले ही सब कुछ पहले की तरह ठीकठाक लग रहा था, लेकिन ऐसा था नहीं. अब अनुभा को देखते ही संजीव का मन मचल उठता था. उसे संजय से ईर्ष्या होने लगी थी. जल्दी ही अनुभा को भी संजीव के दिल की बात का आभास हो गया. संजीव उस के ज्यादा से ज्यादा नजदीक आने की कोशिश में लगा था. सभी सुबह काम पर जाते तो शाम को ही आते. सब साथसाथ खाना खाते हंसीमजाक करते और फिर सो जाते.

2 कमरे के उस मकान में एक कमरे में संजय अपनी पत्नी के साथ सोता था तो दूसरे कमरे में दीपांकर और संजीव. संजीव संजय और अनुभा की बातें तथा हंसीठिठोली सुनता तो उस के सीने पर सांप लोटने लगता. उसे संजय से जलन होने लगती. वह सोचता कि काश संजय की जगह अनुभा उस की बांहों में होती. आखिर संजीव का यह सपना पूरा हो ही गया. अनुभा गर्भवती हुई थी तो संजय से ज्यादा संजीव उस का खयाल रखता था. जब कभी संजय काम अधिक होने की वजह से देर में आता तो संजीव समय पर घर आ कर घर के कामों में अनुभा की मदद ही नहीं करता, बल्कि उस के खानेपीने का भी ध्यान रखता.

उस की इस सेवा का अनुभा पर खासा असर पड़ा और न चाहते हुए भी वह उस की ओर खिंचती चली गई. बेटी पैदा होने के बाद कुछ ऐसा संयोग बना कि दोनों के बीच की मर्यादा की दीवार ही ढह गई. पहली बार मर्यादा की दीवार टूटी थी तो दोनों को अपने किए पर पछतावा हुआ था. लेकिन जो नहीं होना चाहिए था, वह हो चुका था. भले ही उन्हें अपने किए पर पछतावा हुआ था, लेकिन उन के कदम यहीं रुके नहीं. आगे भी अनुभा और संजीव को जब भी मौका मिला, वे संजय के साथ विश्वासघात करने से नहीं चूके.

अनुभा और संजीव जो भी करते थे, पूरे चौकस हो कर करते थे, लेकिन उन के ये संबंध ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रह सके. संजय को पत्नी और संजीव के संबंधों के बारे में पता चल ही गया. काम पर तो तीनों साथसाथ जाते थे, लेकिन कोई न कोई बहाना कर के संजीव बीच में आ जाता था. अनुभा के साथ मौजमस्ती कर के वह फिर काम पर पहुंच जाता. ऐसे में पड़ोसियों को शक हुआ तो उन्होंने यह बात संजय को बताई. संजय को उन की बात पर विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि उसे अपने दोस्तों और पत्नी पर पूरा भरोसा था.

अनुभा और संजीव संजय के इसी विश्वास का फायदा 3 सालों तक उठाते रहे. आखिर एक दिन जब उस ने अपनी आंखों से दोनों को एकदूसरे की बांहों में देख लिया तो उसे अनुभा और संजीव की इस बेवफाई से गहरा आघात लगा. उस ने संजीव को खूब खरीखोटी सुनाई और उसी समय घर से निकाल दिया. पत्नी को भी उस ने खूब धिक्कारा. संजीव ने संजय का घर भले छोड़ दिया, लेकिन अनुभा को नहीं छोड़ा. अनुभा से अपने संबंध रखे रहा. मौका मिलते ही वह अनुभा के पास आ जाता और इच्छा पूरी कर के चला जाता. इस में अनुभा भी उस की मदद करती थी.

इस बात को ले कर संजय और अनुभा के बीच अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था. बात बढ़ जाती तो संजय अनुभा की पिटाई भी कर देता था. लेकिन मारनेपीटने और समझाने का अनुभा पर कोई असर नहीं हुआ. तब संजय ने अनुभा को संजीव से अलग करने का दूसरा उपाय सोचा. परिचितों की मदद से उस ने अपना गौतमनगर वाला मकान बेच दिया और अंबरनाथ तहसील के नेवाली गांव की आकृति चाल में एक अच्छा सा मकान खरीद लिया. 12 नवंबर, 2015 को पूजापाठ करा कर वह पत्नी अनुभा, बेटी और दीपांकर के साथ उस में रहने आ गया.

नेवाली आने के बाद संजय को लगा कि अब संजीव अनुभा की जिंदगी से निकल जाएगा. अनुभा भी धीरेधीरे उसे भूल जाएगी. यह सोच कर संजय अपने काम में व्यस्त हो गया. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. न तो संजीव अनुभा को भूल पाया और न अनुभा ही उसे दिल से निकाल पाई. अनुभा से अलग हुए संजीव को 10 दिन भी नहीं हुए थे कि वह उस के लिए तड़प उठा. यही हाल अनुभा का भी था. दीपावली का त्योहार नजदीक था, इसलिए काम ज्यादा था. संजय को रात में भी काम करना पड़ता था. इस बात की जानकारी संजीव को थी ही, इसलिए जब संजय रात को काम के लिए कंपनी में रुक जाता तो संजीव उस के घर पहुंच जाता.

एक रात तबीयत खराब होने पर संजय अचानक घर पहुंचा तो वहां संजीव को देख कर दंग रह गया. संजय को देख कर संजीव और अनुभा के जहां होश उड़ गए, वहीं संजय का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा. उस के गुस्से को देख कर संजीव तो भाग गया, लेकिन अनुभा कहां जाती. संजय ने सारा गुस्सा उसी पर उतार दिया. उस ने उस दिन उस की जम कर पिटाई की. पत्नी को मारपीट कर वह घर से बाहर निकल गया. संजय के घर से बाहर जाने के बाद कुछ देर तक तो अनुभा रोती रही, उस के बाद उसे अपने और संजीव के बीच रोड़ा बनने वाले संजय से इस तरह नफरत हुई कि उस ने तुरंत एक खतरनाक फैसला ले लिया.

उस ने उसी समय संजीव को फोन कर के कहा, ‘‘संजीव, अब बहुत हो चुका. संजय को अपने रास्ते से हटाना ही होगा. हमारे संबंधों को ले कर जब देखो तब वह मुझे मारता रहता है. शहर से ले कर गांव तक मुझे बदनाम भी कर दिया है. मेरा जीना हराम हो गया है. उस ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा है. लोग मुझ पर थूक रहे हैं. इसलिए मैं चाहती हूं इस किस्से को ही खत्म कर दिए जाए.’’

अनुभा की बात सुन कर संजीव का दिमाग घूम गया. उस ने अनुभा को धीरज बंधाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, मैं उस की व्यवस्था कर दूंगा.’’

‘‘तुम कल साढ़े 8 बजे आ जाना. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’ अनुभा ने कहा और फोन काट दिया.

23 नवंबर, 2015 को संजीव ने बाजार जा कर एक तेज धार वाला चाकू खरीदा और ठीक समय पर संजय के घर पहुंच गया. संजय उस समय तक घर नहीं आया था. अनुभा ने उसे पीछे वाले कमरे में छिपा दिया और संजय के आने का इंतजार करने लगी. उस समय दीपांकर घर पर नहीं था. वह अपने एक दोस्त के यहां गया था. रात 10 बजे के करीब संजय घर आया तो अनुभा मुंह फुलाए बैठी थी. संजय ने उस से खाना मांगा तो खाना देने के बजाय वह उस से उलझ पड़ी और उसे कस कर पकड़ लिया. इस के बाद अंदर छिपा बैठा संजीव एकदम से बाहर आया और साथ लाए चाकू से उस के गले पर हमला कर दिया.

चाकू लगने से संजय चीखा और जमीन पर गिर पड़ा. दोनों ने उसे तब तक दबोचे रखा, जब तक वह मर नहीं गया. संजय मर गया तो वे उस की लाश को ठिकाने लगाने की तैयारी करने लगे. संयोग से उसी समय मौसम खराब हो गया और तेज बारिश होने लगी. बरसात की वजह से बस्ती के लोग अपनेअपने घरों में बंद हो गए तो उन्हें लाश को ठिकाने लगाने का अच्छा मौका मिल गया. दोनों ने लाश को एक प्लास्टिक की मोटी थैली में लपेट कर कैरीबैग में भरा और रात करीब 2 बजे उसी बारिश में ले जा कर बस्ती से लगभग 2 सौ मीटर की दूरी पर स्थित घनी झाडि़यों में फेंक दिया.

पूछताछ के बाद जितेंद्र आगरकर ने हत्या के इस मामले को अपराध संख्या 346/2015 पर दर्ज करा कर अनुभा और संजीव को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में बंद थे. Mumbai Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Bhopal Crime News: जब एक मजबूर मर्द से हो गई एक बड़ी गलती

Bhopal Crime News: 21 अप्रैल, 2017 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के थाना मिसरोद के थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह कुशवाह गश्त से लौट कर क्वार्टर पर जाने की तैयारी कर रहे थे कि 35-36 साल का एक आदमी उन के सामने आ खड़ा हुआ. उस के सीने से खून रिस रहा था. ऐसा लग रह था, जैसे उसे चाकू मारे गए हों, पर ठीक से लगे न हों. वहां गहरे घाव के बजाय गहरे खरोंच के निशान थे. उसे देख कर राजबहादुर सिंह को यह आपसी मारपीट का मामला लगा.

उस व्यक्ति ने अपना नाम सौदान सिंह कौरव बताया था. राजबहादुर सिंह ने थाने आने की वजह पूछी तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं कौशलनगर के पास रहता हूं. आज रात 3 बजे 4 लोग मेरे घर में घुस आए और मेरी पत्नी मंगला से जबरदस्ती करने लगे. मैं ने और मेरी पत्नी ने विरोध किया तो उन्होंने हम दोनों की बुरी तरह से पिटाई कर दी. उस मारपीट में मेरी पत्नी को अधिक चोट लगी, जिस से वह बेहोश हो गई है.’’

घायल मंगला की मौत हो सकती थी, इसलिए थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह ने तुरंत एसआई राजकुमार दांगी को कौशलनगर भेजा. वहां पहुंच कर पता चला कि मकान की दूसरी मंजिल पर सौदान सिंह पत्नी मंगला और 2 बच्चों के साथ रहता था. राजकुमार कमरे पर पहुंचे तो देखा सामने पलंग पर मंगला लेटी थी. उन्होंने उसे नजदीक से देखा तो लगा वह मर चुकी है.

उन्होंने इधरउधर देखा तो कमरे की स्थिति देख कर कहीं से नहीं लगता था कि वहां किसी तरह का झगड़ा या मारपीट हुई थी. संदेह हुआ तो उन्होंने फोन द्वारा इस बात की जानकारी थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह को दे दी. मामला लूट और दुष्कर्म की कोशिश के साथ हत्या का था, इसलिए राजबहादुर सिंह ने तुरंत यह बात एसपी सिद्धार्थ बुहुगुणा एवं एसडीओपी अतीक अहमद को बताई और खुद सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. अब तक वहां काफी भीड़ जमा हो चुकी थी.

राजबहादुर सिंह ने एक गहरी नजर सौदान सिंह के चेहरे पर डाली तो उन्हें उस के चेहरे पर छाए दुख के बादल बनावटी लगे. उन्हें अब तक की अपनी पुलिस की नौकरी में इतना तो अनुभव हो ही चुका था कि आदमी पत्नी के मरने पर किस तरह दुखी होता है.

उन्होंने सौदान सिंह के शरीर पर लगे चाकू के घावों को ध्यान से देखा तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि यह आदमी बहुत चालाक और मक्कार है. उस के घाव किसी दूसरे द्वारा मारे गए चाकू के नहीं हैं, इन्हें उस ने खुद चाकू मार कर बनाया है. लेकिन उन्होंने उस पर कुछ जाहिर नहीं होने दिया.

उन्होंने मकान का निरीक्षण किया तो 2 कमरों के उस के मकान में बाहर के कमरे में डबलबैड के आकार का लंबाचौड़ा बिस्तर जमीन पर था. इस के अलावा किचन में भी एक बिस्तर जमीन पर ही लगा था. उस की ओर इशारा करते हुए राजबहादुर सिंह ने पूछा, ‘‘इधर कौन सोया था?’’

‘‘साहब, मैं यहीं सोता हूं.’’ सौदान सिंह ने कहा.

‘‘तुम यहां सोए थे तो तुम्हें घटना के बारे में कैसे पता चला?’’crime news

‘‘साहब, बाहर के कमरे में शोर हुआ तो मेरी आंखें खुल गईं. मैं उठ कर वहां पहुंचा तो देखा 4 युवक मेरी पत्नी के साथ जबरदस्ती कर रहे थे. वह उन का विरोध कर रही थी. मैं ने मंगला को बचाने की कोशिश की तो उन्होंने चाकू से मेरे ऊपर हमला कर दिया. अपने मकसद में सफल होते न देख उन्होंने मंगला पर भी हमला कर दिया.’’ सौदान ने कहा.

‘‘तुम्हारे बच्चे कहां हैं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, वे तो मेरे मातापिता के पास लटेरी में हैं.’’

सौदान सिंह के इतना कहते ही थानाप्रभारी को समझते देर नहीं लगी कि मंगला की हत्या का आरोपी उन के सामने खड़ा है. क्योंकि बच्चे घर में होते तो वह पत्नी की हत्या नहीं कर सकता था. इस के अलावा उस ने जो अलग बिस्तर लगाया था, बच्चों के होने पर माना जाता कि एकांत पाने के लिए लगाया होगा. लेकिन जब बच्चे घर पर नहीं हैं तो अलग बिस्तर लगाने की क्या जरूरत थी?

पड़ोसियों से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि रात में किसी ने किसी तहर का शोरशराबा या चीखपुकार नहीं सुनी थी. राजबहादुर सिंह ने एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा को सारी जानकारी दी तो उन्होंने सौदान सिंह को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया.

राजबहादुर सिंह ने सौदान सिंह के मातापिता तथा मंगला के घर वालों को उस की हत्या की खबर दे दी थी. इस के बाद लाश का बारीकी से निरीक्षण कर घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. मंगला की हत्या की खबर पा कर सौदान सिंह का बड़ा भाई गोपाल सिंह तो भोपाल आ गया था, लेकिन मंगला के मायके से कोई नहीं आया था. राजबहादुर सिंह ने एक बार फिर सौदान सिंह से पूछताछ की, लेकिन मंझे हुए खिलाड़ी की तरह उस ने इस बार भी वही सारी बातें दोहरा दीं, जो वह पहले बता चुका था.

राजबहादुर सिंह ने कमरों के निरीक्षण में देखा था कि जिस कमरे में मंगला सोई थी, उस की कुंडी सहीसलामत थी. उसे बाहर से हाथ डाल कर नहीं खोला जा सकता था. सौदान सिंह ने बताया था कि रात को सोते समय बाहर वाला दरवाज अंदर से बंद था. राजबहादुर सिंह ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘रात को सोते समय दरवाजा अंदर से बंद था न?’’

‘‘जी साहब.’’

‘‘दरवाजा अंदर से बंद था तो वे लोग अंदर कैसे आए, क्या तुम ने दरवाजा खोल कर उन्हें अंदर बुलाया था?’’

‘‘नहीं…नहीं साहब, मैं तो अंदर वाले कमरे में सो रहा था.’’ सौदान सिंह ने घबरा कर कहा.

‘‘तो क्या दरवाजा मंगला ने खोला था?’’

‘‘हो सकता है, उसी ने खोला हो?’’ सौदान सिंह के मुंह से यह जवाब सुन कर राजबहादुर सिंह ने कहा, ‘‘इस का मतलब उन चारों को मंगला ने बुलाया था. अगर उन्हें उस ने बुलाया था तो उस ने शोर क्यों मचाया, उस की रजामंदी से चारों चुपचाप अपना काम कर के जा सकते थे.’’

सौदान सिंह थानाप्रभारी की इस बात का जवाब नहीं दे सका तो उन्होंने डांट कर कहा, ‘‘जो सच्चाई है, उसे खुद ही बता दो, वरना पुलिस सच्चाई उगलवाएगी तो तुम्हारी क्या हालत होगी, शायद तुम नहीं जानते. वैसे सच्चाई का पता हम सभी को चल चुका है. लेकिन हम तुम्हारे मुंह से हकीकत सुनना चाहते हैं कि तुम ने अपनी पत्नी की हत्या क्यों और कैसे की है?’’

सौदान सिंह तुरंत राजबहादुर सिंह के पैरों पर गिर कर रोते हुए बोला, ‘‘साहब, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं ने ही मंगला की हत्या की है. साहब उस ने मुझे इस तरह मजबूर कर दिया था कि हत्या के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय ही नहीं बचा था. मैं मर्द हूं साहब, कितनी बेइज्जती सहता. बेइज्जती से तंग आ कर ही मैं ने उस की हत्या की है.’’

इस के बाद सौदान सिंह ने मंगला की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

सौदान सिंह मध्य प्रदेश के जिला विदिशा के थाना लटेरी के गांव सुनखेड़ा का रहने वाला था. प्राइमरी तक पढ़ा सौदान गांव में पिता के सथ कारपेंटर का काम करता था. इस के अलावा खेती की थोड़ी जमीन भी थी. इस तरह कुल मिला कर उस के परिवार की आराम से गुजरबसर हो जाती थी. सौदान सिंह मातापिता के साथ खुश था. कोई 12 साल पहले उस की शादी भिंड की रहने वाली मंगला के साथ हो गई. पत्नी ने आते ही उस की जिंदगी बदल दी. वह इंटर तक पढ़ी थी. वह थी भी थोड़ी खूबसूरत. इसलिए उस के मित्र उस से जलने लगे थे.

जबकि सौदान उस से शादी कर के पछता रहा था. इस की वजह यह थी कि मंगला स्वच्छंद विचारों वाली थी. वह आजादी में विश्वास करती थी और ऐश की जिंदगी जीने की शौकीन थी. मंगला को अपनी सुंदरता का अहसास तब हुआ, जब गांव के लड़के उस के घर के चक्कर लगाने लगे. अपनी खूबसूरती का अहसास होते ही वह उन्हें अपनी खूबसूरती की झलक दिखा कर परेशान करने लगी थी. तभी घर वालों ने उस की शादी कर दी थी और इस तरह वह ससुराल आ गई.

ससुराल में मंगला सासससुर के रहते बिना सिर ढके से बाहर नहीं निकल सकती थी. जबकि स्वच्छंदता के लिए घर से बाहर जाना जरूरी था. इस के लिए मंगला ने अपने लिए पति के साथ शहर जाने का रास्ता निकाला. सौदान सिंह से ज्यादा पढ़ीलिखी और उस से अधिक सुंदर होने की धौंस दे कर मंगला ने कहा, ‘‘मैं इस गांव में तुम्हारे साथ कब तक रह कर अपनी जिंदगी बेकार करूंगी. शहर चलो, गांव में कुछ नहीं रखा है. यहां रह कर हम न अपने लिए और न बच्चों के लिए 2 पैसे बचा पाएंगे. शहर में कमा कर कुछ जमा कर लेंगे.’’

लेकिन सौदान सिंह गांव में रहने वाले अपने मांबाप को छोड़ कर शहर नहीं जाना चाहता था. पर मंगला की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा. पत्नी के कहने पर 3 साल पहले सौदान सिंह भोपाल आ गया और कौशलनगर में किराए का मकान ले कर रहने लगा. उस ने टाइल्स लगाने का काम सीखा और इसे ही रोजीरोटी का साधन बना लिया.

सौदान सिंह अपने इस काम से इतना कमा लेता था कि उस की गृहस्थी अच्छे से चल रही थी. उस का सोचना था कि गांव से शहर आ कर मंगला सुधर जाएगी, लेकिन हुआ इस का उलटा. मंगला भोपाल आ कर सुधरने की कौन कहे, शहर आ कर उस की चाहतों ने और भी ऊंची उड़ान भरनी शुरू कर दी. उसे यहां कोई कुछ कहने टोकने वाला नहीं था.

2 बच्चों की मां होने के बावजूद उसे जवानी के न याद आ गए थे. एक ही इशारे में वह मनचलों को घायल कर देती थी. वहां भी मंगला ने अपने चाहने वालों की लाइन लगा दी थी. इस तरह की बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रहतीं. सौदान सिंह को जब पत्नी की हरकतों का पता चला तो उस ने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, समझाया भी, पर उस पर न पति के समझाने का असर हुआ न डांटनेफटकारने का. क्योंकि वह तो उसे गंवार, जाहिल और मंदबुद्धि ही नहीं समझती थी, बल्कि बातबात में कम पढ़ेलिखे होने का ताना भी मारती थी.

दरअसल, मंगला पति पर हावी हो कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहती थी. लेकिन सौदान सिंह अकसर मंगला को टोकता रहता था.  आखिर खीझ कर मंगला ने सौदान सिंह को नीचा दिखाने का निर्णय कर अपने आशिकों को उस के सामने ही घर बुलाने लगी. यही नहीं, उस के सामने वह प्रेमियों के साथ बैडरूम में चली जाती थी.

इतने से भी उसे संतोष नहीं होता था. वह उसी के सामने मोबाइल पर अपने चाहने वालों से अश्लील बातें करती थी. सौदान सिंह मर्द था, पत्नी की इन गिरी हुई हरकतों से उसे गुस्सा तो बहुत आता था, पर बच्चों के बारे में सोच कर उस गुस्से को पी जाता था. पहले मंगला पति की ही उपेक्षा करती थी, लेन बाद में वह बच्चों की भी उपेक्षा करने लगी थी. वह सुबह ही काम पर चला जाता था. उस के जाने के बाद मंगला आशिकों के साथ घूमने निकल जाती थी. अगर बाहर नहीं जाती तो मोबाइल पर ही घंटों अपने चाहने वालों से बातें करती रहती थी.

ऐसे में मंगला को बच्चों के खानेपीने की भी चिंता नहीं रहती थी. अगर सौदान सिंह कुछ कहता तो वह उस से मारपीट करने पर उतारू हो जाती थी. कई बार तो उस पर हाथ भी उठा दिया था. मंगला को प्रेमियों से मिलने में किसी तरह की परेशानी न हो, इस के लिए उस ने नौकरी कर  ली. यह नौकरी उस के एक प्रेमी चंदेश ने लगवाई थी.

चंदेश हीरा कटाई की उस कंपनी में पहले से नौकरी करता था, उसी की सिफारिश पर मंगला को यह नौकरी मिली थी. इसी नौकरी की आड़ में मंगला और चंदेश की रासलीला आसानी से चल रही थी.

नौकरी लग जाने के बाद मंगला सौदान सिंह को और भी ज्यादा जलील करने लगी थी. वह उस से कहती थी कि हीरे की कद्र जौहरी ही करते हैं.

इधर मंगला का एक पुराना प्रेमी अमन भी आने लगा था. वह उस का शादी से पहले का प्रेमी था. शादी से पहले ही उस के मंगला से अवैध संबंध थे. अमन जब भी आता था, उस के घर पर ही रुकता था. मंगला के बारे में जब मोहल्ले की महिलाओं को पता चला तो वे उस के बारे में तरहतरह की बातें करने लगीं.

इस बदनामी से बचने के लिए सौदान सिंह ने मंगला से गांव चलने को कहा तो उस ने उसे धकियाते हुए कहा, ‘‘तुझे गांव जाना हो तो जा, मैं अब यहीं रहूंगी. मुझे अब तेरी जरूरत भी नहीं है.’’

धीरेधीरे मंगला की तानाशाही बढ़ती जा रही थी, जिस से सौदान सिंह काफी परेशान रहने लगा था. वह कईकई दिनों तक उसे अपने पास फटकने नहीं देती थी. वह जब भी उस के पास जाता, वह डांट कर कहती, ‘‘गंदे, जाहिल, तेरे शरीर से बदबू आती है. तू मेरे पास मत आया कर.’’crime news

सौदान सिंह को दुत्कार कर उस के सामने ही मंगला अपने प्रेमियों से हंसहंस कर अश्लील बातें करने लगी. पत्नी की इन हरकतों से तंग आ कर सौदान सिंह ने प्रण कर लिया कि अब इसे खत्म कर देगा. क्योंकि अगर अब यह उस की नहीं रही तो वह उसे किसी और के लिए भी नहीं छोड़ेगा. यही सोच कर उस ने 5 दिन पहले बच्चों को दादादादी के पास लटेरी पहुंचा दिया.

20 अप्रैल की रात खाना खा कर पतिपत्नी लेट गए. बच्चे घर पर नहीं थे, इसलिए सौदान सिंह ने मंगला से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की. लेकिन तभी मंगला के किसी प्रेमी का फोन आ गया. सौदान ने मंगला के हाथ से मोबाइल छीन कर फोन काटना चाहा तो उस ने उसे तमाचा मार दिया. पतिपत्नी में झगड़ा होने लगा. सौदान सिंह ने गलती स्वीकार करते हुए एक बार फिर उस से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की. इस पर मंगला ने कहा, ‘‘अपनी औकात देखी है गंदी नाली के कीड़े. मेरे साथ संबंध बनाने के बारे में तूने सोच कैसे लिया. मैं तुझे अपना शरीर अब कभी नहीं छूने दूंगी.’’

मंगला की इस बात से सौदान सिंह हैरान रह गया. उस ने उसी समय तय कर लिया कि आज ही वह उसे खत्म कर देगा. उस ने लेट कर आंखें मूंद लीं. उस के बगल में लेटी मंगला अपने प्रेमी से फोन पर अश्लील बातें करती रही. करीब 45 मिनट तक मंगला ने फोन पर गंदीगंदी बातें कीं, जिन्हें सौदान सिंह सुनता रहा. मंगला फोन काट कर सो गई. करीब 3, साढे़ 3 बजे सौदान उठा और पलंग के नीचे छिपा कर रखी लोहे की रौड निकाल कर पूरी ताकत से उस के सिर पर वार कर दिया. उसी एक वार में वह बेहोश हो गई. उसी बेहोशी की हालत में मंगला के सीने पर बैठ कर उस ने उसी के दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया.

पुलिस से बचने के लिए सौदान सिंह ने सीने पर चाकू मार कर घाव किए और थाने पहुंच कर पुलिस को लूट और जबरदस्ती की झूठी कहानी सुना दी. अपने बचाव के लिए उस ने दूसरे कमरे में खुद ही बिस्तर बिछाया था. थानाप्रभारी ने सौदान सिंह की निशानदेही पर वह रौड बरामद कर ली थी, जिस से मंगला की हत्या की गई थी. पूछताछ और सारे साक्ष्य जुटा कर थाना मिसरौद पुलिस ने पत्नी के हत्यारे सौदान सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Bhopal Crime News