
उन्हीं दिनों सालों से पुराने स्टांप इकट्ठा करने वाले एक माफिया के.पी. सिंह से जुड़ा मामला भी उजागर हो गया था. इस धंधे में उस ने करोड़ों रुपए कमाए थे और मालामाल बन गया था. सहारनपुर का एक भूमाफिया इस फरजीवाड़े के लिए लंबे समय से पुराने स्टांप इकट्ठा कर रहा था. वह इन स्टांपों को देहरादून और सहारनपुर के स्टांप वेंडरों से खरीदता था. इस के लिए एक स्टांप के लाखों रुपए तक अदा किए गए थे. जबकि, इन का इस्तेमाल कर वह करोड़ों कमा कर मालामाल हो गया था.
इन्हीं के आधार पर पुराने मूल बैनामों की प्रतियां जला कर नष्ट कर दी गई थीं और इन के बदले स्टांप को लगा कर नए दस्तावेज बना लिए गए थे. इतनी बड़ी संख्या में 1970 से 1990 के बीच प्रचलन में रहे ये स्टांप कहां से खरीदे थे, इस की जानकारी गिरफ्तार किए गए के.पी. सिंह से मिली थी.
के.पी. सिंह को कोतवाली ला कर पूछताछ की गई थी. पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया कि उस ने किसी एक वेंडर से स्टांप नहीं खरीदे थे, बल्कि इस के लिए वह सालों से प्रयास करता रहा था. उसे जैसे ही पता चलता था कि किसी के पास पुराने स्टांप हैं, वह उस से ऊंचे दाम दे कर पुराने स्टांप को खरीद लेता था. ये स्टांप उसे आसानी से सहारनपुर में भी मिल गए थे.
इस के अलावा उस ने देहरादून के स्टांप वेंडरों से भी ये स्टांप खरीदे थे. हालांकि, पुलिस अब भी यह मान कर चल रही है कि कहीं न कहीं स्टांप को फरजी तरीके से बनवाया भी गया होगा. हो सकता है उस ने फरजी स्टांप घोटाले के सरगना अब्दुल करीम तेलगी के नकली स्टांप भी इस्तेमाल किए हों. लेकिन के.पी. सिंह से इस बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई थी.
इस सिलसिले में पूरणचंद नाम के स्टांप वेंडर का नाम भी सामने आया. जिन स्टांप का इस्तेमाल हुआ था, उन पर पूरणचंद नाम के स्टांप वेंडर की मुहर और रजिस्ट्रैशन संख्या दर्ज पाई गई थी. उस के बारे में तहकीकात करने पर मालूम हुआ कि पूरणचंद नाम का स्टांप वेंडर कभी देहरादून में रहा ही नहीं था. ऐसे में ही स्टांप के फरजी बनाए जाने की आशंका बनी थी.
—कथा एसआईटी सूत्रों पर आधारित
देहरादून में जमीन हड़पने की होड़ में भूमाफिया के साथसाथ वकील भी सक्रिय थे. एसआईटी के शिकंजे में आने वाले 3 वकीलों में एक की गिद्धदृष्टि सरकारी जमीनां पर बनी हुई थी. पिछले दिनों 16 नवंबर को गिरफ्तार वकील देवराजा तिवारी ने रक्षा मंत्रालय की जमीन का फरजी बैनामा बना लिया था. वह देहरादून कचहरी में प्रैक्टिस करते थे. हालांकि एसआईटी रजिस्ट्री फरजीवाड़े में लिखे जाने तक 3 अधिवक्ताओं को गिरफ्तार कर चुकी है. इस में और कई गिरफ्तारियां हो सकती हैं.
जांच में पाया गया कि आरोपी वकील रक्षा मंत्रालय की जमीन का फरजी बैनामा अंगरेजी में ड्राफ्ट करवाया था. इस के बाद जमीन पर कब्जे के लिए एसडीएम कोर्ट और हाईकोर्ट में मुकदमा भी दायर किया गया था. इस मामले में एसएसपी अजय सिंह के अनुसार माजरा स्थित रक्षा मंत्रालय की 55 बीघा जमीन का फरजी बैनामा बनवाने के आरोप में नगीना (बिजनौर) के रहने वाले हुमायूं परवेज भी गिरफ्तार किया गया था.
एसआईटी से पूछताछ में उसी ने तिवारी का नाम ले लिया था. इस के बाद ही देवराज तिवारी गिरफ्तार किया गया था. वह मधुर विहार फेजटू, बंजारावाला का रहने वाला है.
पूछताछ में तिवारी ने बताया कि वह वर्ष 2014 में मदन मोहन शर्मा निवासी दूधली की ओर से माजरा स्थित इस जमीन का मुकदमा लड़ रहा था. वर्ष 2017 में शर्मा ने इस मुकदमे को वापस ले लिया था. इस दरम्यान वह समीर कामयाब के गोल्डन फौरेस्ट का केस भी अपने हाथ में ले लिया था. उन्हीं दिनों एक दिन समीर कामयाब और हुमायूं परवेज ने देवराज तिवारी से माजरा की इस जमीन का फरजी बैनामा बनाने की बात कही. समीर की सहारनपुर में रजिस्ट्रार औफिस में पहचान थी. उस ने ही वहां से जरूरी जानकारी जुटाई थी.
इस के बाद इन लोगों ने जमीन के असली मालिक लाला सरनीमल और लाला मणिराम के नाम से 1958 का एक फरजी बैनामा तैयार कर लिया था. इसे हुमायूं के पिता जलीलुह रहमान और समीन के पिता अर्जुन प्रसाद के नाम करवा लिया. इसी बैनामे की अंगरेजी में ड्राफ्टिंग अधिवक्ता देवराज तिवारी ने की थी.
रजिस्ट्री के कागजों में नकल सना ने की थी. उस की पहुंच रिकौर्ड रूप में थी. इस बारे में बताया कि उस ने कैसे सहारनपुर के रिकौर्ड रूम में जिल्द चिपकाने के लिए वहां तैनात देव कुमार का सहारा लिया था और उसे इस काम के 3 लाख रुपए दिए थे. 3-4 दिन बाद वहां से नकल ले कर इस पर कब्जा के लिए मामले को एसडीएम कोर्ट में दायर कर दिया था.
यही नहीं फरजी रजिस्ट्री बनाने के लिए समीर सहारनपुर में अब्दुल गनी नाम के कबाड़ी की दुकान पर भी गया था. वहां से बहुत से पुराने कागजों के ढेर में से समीर ने पेपर की साइज में कटिंग और लाइनिंग की थी. इस पर छपाई कार्ड वालों के यहां करवाई गई थी. फरजी रजिस्ट्री के पेपर को पुराना दिखाने के लिए कौफी या चाय के पानी में डुबो कर उन्हें सुखाया जाता था, फिर उन पर प्रेस की जाती थी.
जांच में पता चला कि इस गिरोह के लोग देहरादून में काफी समय से खाली पड़ी जमीनों पर नजर रखते थे. ऐसी जमीनों के जो मालिक विदेशों में होते थे, सब से पहले वह उन्हीं को अपना निशाना बनाते थे. इस के बाद मौका मिलते ही जमीनों के फरजी कागजात तैयार कर लिए जाते थे. उन कागजों को दिखा कर जमीन अन्य लोगों को बेच दिया करते थे.
रजिस्ट्री में फरजीवाड़ा करने के लिए 30 से 50 साल पुराने स्टांप पेपरों का इस्तेमाल किया जाता था. ताकि इन्हें उसी वक्त के बैनामे के तौर पर दर्शाया जा सके.
इस के बाद रजिस्ट्रार कार्यालय में फरजी व्यक्तियों के नाम पर इन जमीनों को दर्ज किया गया. इस बाबत कोतवाली (नगर) देहरादून में 9 मुकदमे दर्ज किए जा चुके थे. जब इस की जांचपड़ताल हुई, तब 6 अक्तूबर को एक आरोपी अजय मोहन पालीवाल गिरफ्तार कर लिया गया. उस के बारे में बड़ा खुलासा हुआ.
उस ने बताया कि अजय मोहन फोरैंसिक एक्सपर्ट था. उस ने आरोपी कमल विरमानी, के.पी. सिंह आदि के साथ मिल कर कई बड़े फरजीवाड़े किए थे. जमीनों के फरजी बैनामों में फरजी राइटिंग और सिग्नेचर बनाए गए थे.
इन्होंने ही एनआरआई महिला रक्षा सिन्हा की राजपुर रोड पर स्थित जमीन का फरजी बैनामा तैयार किया था. इस जमीन के कागज को रामरतन शर्मा के नाम से बनाया गया था. पहले भी कई विवादित जमीनों में इस की संलिप्तता रही है.
जांच में जब फरजीवाड़ा सही पाया गया, तब संदीप श्रीवास्तव ने एसआईटी में इस फरजीवाडे का मुकदमा अपराध क्रमांक 281/2023 पर आईपीसी की धाराओं 120बी, 420, 467, 468 व 471 के तहत दर्ज करा दिया था. इस के बाद ही जिले के नए एसएसपी अजय सिंह ने एसआईटी की 4 टीमों का गठन किया था और उन्हें इन भूमाफियाओं को गिरफ्तार करने के लिए लगा दिया था.
संदीप श्रीवास्तव ने एसआईटी को बताया था कि सबरजिस्ट्रार कार्यालय के कुछ दस्तावेजों पर जो मोहरें व स्याही लगी हुई थी, उन मोहरों का साइज सबरजिस्ट्रार कार्यालय की मोहरों के साइज से मेल नहीं खा रहा था. साथ ही स्याही के रंग में भी काफी अंतर था.
जिलाधिकारी देहरादून के जनता दरबार में भी अकसर सबरजिस्ट्रार कार्यालय में जमीनों के फरजी नाम परिवर्तन की शिकायतें ज्यादा आने के बाद ही एसआईटी ने जमीनों के फरजीवाड़े के मुकदमे दर्ज किए गए थे.
7 अक्तूबर, 2023 को टीम ने आरोपियों संजय शर्मा, ओमवीर तोमर और सतीश को गिरफ्तार किया था. टीम ने जब इन तीनों से इस फरजीवाड़े की बाबत पूछताछ की, तब कुछ फरजी दस्तावेजों पर अजय मोहन पालीवाल द्वारा बनाए गए हस्ताक्षर के बारे में भी जानकारी मिली.
पता चला कि ओमवीर तोमर की जानपहचान सहारनपुर निवासी के.पी. सिंह से थी. उसे के.पी. सिंह से जानकारी मिलती थी कि किस की जमीनें कहां हैं और वे कहां रहते हैं. इस के बाद ये लोग उस जमीन के फरजी कागजात तैयार करते थे. इस काम में एडवोकेट कमल विरमानी द्वारा उन दस्तावेजों को सबरजिस्ट्रार कार्यालय में भेजा जाता था.
तीनों आरोपियों से पूछताछ करने के बाद एसएसपी अजय सिंह ने इन्हें 8 अक्तूबर, 2023 को मीडिया के सामने पेश कर दिया था. तीनों कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिए गए थे. इन्हें गिरफ्तार करने वाली टीम में एसआईटी के इंसपेक्टर राकेश गुसाईं, एसओजी के इंसपेक्टर नंद किशोर भट्ट, एसएसआई प्रदीप रावत, एसआईटी के थानेदार मनमोहन नेगी, थानेदार हर्ष अरोड़ा, अमित मोहन ममगई और सिपाही किरण, ललित, देवेंद्र, पंकज आदि ने अहम भूमिका निभाई थी.
आरोपियों का आपराधिक इतिहास खंगाले जाने के बाद पाया कि आरोपी ओमवीर तोमर के खिलाफ देहरादून के थाना क्लेमेंटाउन में वर्ष 2014 में धोखाधडी का मुकदमा दर्ज हुआ था. इस के बाद उस के खिलाफ वर्ष 2015 में अपहरण व हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज हुआ था तथा वर्ष 2017 में उस के खिलाफ जालसाजी, मारपीट करने व धमकी देने के मुकदमे दर्ज हुए थे.
इस के बाद जांच टीम ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड में जा कर भूमाफियाओं और जालसाजों के ठिकानों पर दबिशें देनी शुरू कर दी थीं. इस बारे में प्रशासन और सबरजिस्ट्रार कार्यालय के आला अधिकारियों का कहना था कि सबरजिस्ट्रार कार्यालय का रिकौर्ड स्थाई किस्म का है तथा वह संपत्ति स्वामित्व का मूल आधार है.
भूमाफियाओं और जालसाजों द्वारा उक्त रिकौर्ड के साथ छेड़छाड़ करना और उन के प्रपत्रों के माध्यम से मूल विलेख को बदलना गंभीर अपराध है. भूमाफियाओं का यह कृत्य भूस्वामियों के अधिकार का तो हनन करता ही है साथ ही यह अनावश्यक विवाद को जन्म भी देता है.
एसआईटी ने इस मामले में जिन्हें गिरफ्तार किया था, उन के नामपते इस प्रकार हैं—
इस फरजीवाड़े की कहानी लिखे जाने तक एसआईटी की जमीनों के घोटाले की लगभग 81 शिकायतें प्राप्त हो चुकी थीं. शिकायतों की जांच उन की प्रकृति के अनुसार की जा रही थी.
टीम का कार्यकाल नवंबर माह तक का था. जबकि यह अनुमान लगाया गया कि शिकायतों की संख्या में और भी बढ़ोत्तरी हो सकती है. फरजीवाड़े के बड़े रूप को देखते हुए टीम आम जनता से सीधे भी शिकायतें प्राप्त करने लगी थी.
स्टांप एवं रजिस्ट्रैशन मुख्यालय स्थित एसआईटी के कार्यालय में एस.एस. रावत जमीनों के फरजीवाड़े की शिकायतें प्राप्त करने के लिए मौजूद होते थे. प्राप्त शिकायतों को उस की प्रकृति और श्रेणी के अनुसार जांच हेतु तहसील अथवा उपजिलाधिकारी कार्यालय भेजा जाता है.
कथा लिखे जाने तक जमीनों के फरजीवाड़े में पकड़े गए 19 आरोपी अभी तक जेल में थे तथा एसआईटी द्वारा जांच जारी थी. एसआईटी द्वारा गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट लगाने के बाद अब एसआईटी उन के खिलाफ गैंगस्टर ऐक्ट लगाने पर भी विचार कर रही थी.
जांच टीम ने अगले ही पल फरजीवाड़े की जांच शुरू कर दी थी. जांच की शुरुआत जमीनों के दस्तावेज तैयार करने वालों पर नजर रखने से की गई. दस्तावेज में जमीन के नकली मालिक और खरीदारों के नाम आदि की जांच करना, वह भी बगैर किसी सबूत के एक बड़ी चुनौती थी.
एसआईटी जांच में तेजी लाने के लिए एसएसपी ने जिले के सभी थानों के एसएचओ को जमीन से जुड़ी किसी भी तरह की शिकायत की डिटेल्स मांगी थी. जल्द ही टीम को दिल्ली के पंजाबी बाग के रहने वाले दीपांकुर मित्तल की शिकायत भी मिल गई. मित्तल ने अपनी शिकायत 16 मार्च, 2023 को की थी
उन्होंने अपनी शिकायत में लिखा था, ‘‘नवादा में मेरी एक जमीन है, जो मुझे पिता की 2 साल पहले देहांत के बाद मिल गई थी. यह मेरी पुश्तैनी जमीन है. उस जमीन पर हम खेती करते हैं. हालांकि मेरा उसी जमीन को ले कर ताऊ रवि मित्तल के साथ अदालत में एक विवाद भी चल रहा है.’’
उन्होंने आगे लिखा कि देहरादून तहसील में मेरी उसी जमीन का दाखिल खारिज अपने नाम कराने के लिए सुखदेव सिंह पुत्र बलवीर सिंह ने आवेदन दिया हुआ है. सुखदेव सिंह ने इस के लिए जो कागजात बनाए हैं, वे नकली और मनगढ़ंत हैं. जबकि यह जमीन काफी समय से मेरे परिवार वालों के नाम ही चली आ रही है.
मित्तल ने अपनी शिकायत में यह भी लिखा कि हम में से किसी ने भी सुखदेव को कोई जमीन नहीं बेची है. एक समय में हम ने इस जमीन पर ईंटभट्ठा भी शुरू किया था. इस जमीन पर चल रहे बिजली और पानी के कनेक्शन पहले से ही हमारे परिवार वालों के नाम हैं.
इसी के साथ मित्तल ने आशंका जताते हुए लिखा, ‘‘मुझे लगता है कि देहरादून में सक्रिय कुछ भूमाफियाओं द्वारा हमारी जमीन के फरजी स्टांप बनवा लिए गए हैं और सुखदेव हमारी जमीन हड़पना चाहता है.’’
इसी शिकायत के साथ मित्तल ने एसएचओ से मांग की कि आप मुझे सुरक्षा प्रदान करते हुए मेरी प्राथमिकी दर्ज कर भूमाफियाओं और जालसाजों के खिलाफ काररवाई करने की कृपा करें.
दीपांकुर मित्तल द्वारा कोतवाली (नगर) में आईपीसी की धाराओं 420, 467, 468 व 471 के तहत दर्ज शिकायत की जांच के लिए एसआईटी ने कोतवाल राकेश गुसाईं और थानेदार नवीन जुराल को लगा दिया.
जांच के दौरान मित्तल के बयान के साथसाथ उन से मालिकाना हक के कागजों की फोटोकौपी भी ली गई. टीम ने मित्तल के प्रपत्रों को सबरजिस्ट्रार कार्यालय और सरकारी वकील को दिखाया. इसी के साथ सुखदेव के मालिकाना कागजों की फोटोकौपी तहसील से हासिल की गई.
जब दोनों दस्तावेजों की जांच की गई, तब टीम ने पाया कि मित्तल के दस्तावेज सही हैं. सुखदेव के दस्तावेज ही संदिग्ध पाए गए. उस के बाद टीम सुखदेव के बारे में अन्य जानकारी मालूम करने में जुट गई. टीम ने पाया कि सुखदेव मूलरूप से पंजाब में लुधियाना स्थित कोटला, अफगान रोड, निहाल फील्ड, साहनेवाल जिले का रहने वाला है. इस के बाद पुलिस सुखदेव की तलाश में जुट गई.
मित्तल की शिकायत और जांच की शुरुआत के बाद एसआईटी ने भूमाफियाओं के फरजीवाड़े पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया था. इसी दौरान एक नया मामला एक एनआरआई महिला रक्षा सिन्हा का भी आ गया. उन की देहरादून की राजपुर रोड पर मधुबन होटल के सामने ढाई बीघा जमीन थी.
रक्षा सिन्हा इंगलैंड में रहती हैं, जबकि उन के पिता पी.सी. निश्चल देहरादून में ही रहते थे. उन की मृत्यु हो चुकी है. रक्षा सिन्हा काफी सालों से देहरादून नहीं आई थीं. रक्षा सिन्हा को जब पता चला कि उस की जमीन को कोई अपना बता कर बेचने वाला है, तब वह सतर्क हो गई थीं.
टीम ने उन के जमीन के कागजातों की भी जांच की. साथ ही सबरजिस्ट्रार कार्यालय में भी कागजों की जांच की. रक्षा सिन्हा द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, उन की जमीन मुजफ्फरनगर निवासी रामरतन शर्मा के नाम हो गई है. जबकि सबरजिस्ट्रार कार्यालय के रिकौर्ड में भी रक्षा सिन्हा के पिता पी.सी. निश्चल द्वारा वर्ष 1979 में रामरतन शर्मा को बेचने के कागज लगे थे.
इस के बाद एसआईटी को यह जानकारी मिली कि सबरजिस्ट्रार कार्यालय में ही इन भूमाफियाओं के गुर्गे तैनात हैं और वे यहीं से भूमाफियाओं के लिए काम कर रहे हैं. इस सिलसिले में जब एसआईटी ने रक्षा सिन्हा की जमीन के बारे में जानकारी मालूम की कि कौन उन की जमीन को अपना बता कर बेच रहा है तो 3 जालसाजों के नाम सामने आ गए.
उन में एक नाम संजय पुत्र रामरतन शर्मा निवासी पंचेडा रोड, मुजफ्फरनगर का था. दूसरा नाम ओमवीर तोमर पुत्र ओम प्रकाश, निवासी डिफेंस कालोनी देहरादून का था, जबकि तीसरा नाम सतीश कुमार पुत्र फूल सिंह निवासी जनकपुरी, मुजफ्फरनगर था.
यहां इंगलैंड निवासी एनआरआई महिला की करोड़ों की भूमि के फरजी दस्तावेज बनाए गए थे. आखिरकार पुलिस ने फरजी दस्तावेज बनाने वाले गिरोह का पता लगा ही लिया.
इस सिलसिले में यह कहानी लिखे जाने तक 16 शातिर आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया था. गिरोह के सदस्य ओमवीर सिंह के खिलाफ जमीन धोखाधड़ी के कई मुकदमे पहले से दर्ज थे.
उस का जमीनों के फरजीवाड़े का आपराधिक इतिहास रहा है. पहले भी कई विवादित जमीनों में इस की संलिप्तता पाई गई. इस जांच के बाद ही टीम ने कुछ वैसे जालसाजों को चिह्निïत किया था, जो इस फरजीवाड़े में शामिल थे. 6 अक्तूबर, 2023 को टीम के हत्थे एक जालसाज अजय मोहन पालीवाल चढ़ गया था. वह पहले विधि विज्ञान प्रयोगशाला में फोरैंसिक एक्सपर्ट था.
उस ने एडवोकेट कमल विरमानी, के.पी. सिंह आदि कई जालसाजों के साथ मिल कर कई जमीनों के कूट रचित विलेख फरजी हैंडराइटिंग के आधार पर तैयार किए थे. उन फरजी प्रपत्रों को सबरजिस्ट्रार कार्यालय के बाइंडर सोनू द्वारा रिकौर्ड में चस्पा कर दिया जाता था.
रजिस्ट्रार कार्यालय के रिकौर्ड में फरजी विलेख लग जाने के कारण रिकौर्ड फरजी भूस्वामियों के नामपते शो करने लगे थे. इस से असली भूस्वामी परदे के पीछे चले गए थे, जबकि फरजी लोग प्रौपर्टी मालिक बन गए थे. इस के बाद इन भूमाफियाओं व जालसाजों ने अब उन जमीनों को आगे बेचना शुरू कर दिया था.
भूमाफियाओं द्वारा सबरजिस्ट्रार कार्यालय में फरजीवाड़ा करने की जानकारी जब एडीएम (वित्त) देहरादून व सहायक महानिरीक्षक निबंधन संदीप श्रीवास्तव को मिली तो सब से पहले उन्होंने ही इस बाबत जांच की थी.
जमीन हड़पने वाले गिरोह के लोग देहरादून में काफी समय से खाली पड़ी जमीनों पर नजर रखते थे. जिन जमीनों के मालिक विदेशों में होते थे, सब से पहले वे उसी जमीन को अपना निशाना बनाते थे. उस के बाद मौका मिलते ही जमीनों के फरजी कागजात तैयार कर लिए जाते थे. उन कागजों को दिखा कर जमीन अन्य लोगों को बेच दिया करते थे.
रजिस्ट्री में फरजीवाड़ा करने के लिए 30 से 50 साल पुराने स्टांप पेपरों का इस्तेमाल किया जाता था, ताकि उन्हें उसी वक्त के बैनामे के तौर पर दर्शाया जा सके. इस के बाद रजिस्ट्रार कार्यालय में फरजी व्यक्तियों के नाम पर उन जमीनों को दर्ज कर दिया जाता था.
उन्हीं दिनों सालों से पुराने स्टांप इकट्ठा करने वाले एक माफिया के.पी. सिंह से जुड़ा मामला भी उजागर हो गया था. इस धंधे में उस ने करोड़ों रुपए कमाए थे और मालामाल हो गया था. सहारनपुर का एक भूमाफिया इस फरजीवाड़े के लिए लंबे समय से पुराने स्टांप इकट्ठा कर रहा था. वह इन स्टांपों को देहरादून और सहारनपुर के स्टांप वेंडरों से खरीदता था. इस के लिए एक स्टांप के लाखों रुपए तक अदा किए गए थे. इन्हीं के आधार पर पुराने मूल बैनामों की प्रतियां जला कर नष्ट कर दी गई थीं और इन के बदले स्टांप को लगा कर नए दस्तावेज बना लिए गए थे.
उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी सरकार ने 16 जुलाई, 2022 को अचानक एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाते हुए देहरादून के डीएम और एसएसपी का तबादला कर दिया था. प्रशासनिक स्तर पर डा. आर. राजेश कुमार की जगह सोनिका को जिला मजिस्ट्रैट बनाए जाने की काफी चर्चा हुई थी. कारण सोनिका अपर सचिव के पद पर तैनात थीं और उन्हें अतिरिक्त जिम्मेदारी के तौर पर जिलाधिकारी का कार्यभार सौंपा गया था.
यह कदम अपने आप में बेहद हैरानी भरा इसलिए था, क्योंकि जिला मजिस्ट्रैट की जिम्मेदारियां आमतौर पर एक पूर्णकालिक कार्य माना जाता है और इन्हें अतिरिक्त सचिव जैसी जिम्मेदारियों के साथ मिलाना सामान्य तौर पर नहीं देखा जाता है.
इस चर्चा के बीच सोनिका के सामने चुनौती दोहरी जिम्मेदारी के निर्वहन की आ गई थी, लेकिन तब तक उन्हें शायद ही मालूम हो पाया था कि उन के सामने भूमाफियाओं का मकडज़ाल है और उन के कारनामों से निपटने की भी नई चुनौती आने वाली है.
पद संभालते ही जमीन की खरीदबिक्री में हेराफेरी और फरजीवाड़े की शिकायतें मिलने लगी थीं. कुछ शिकायतें पहले की भी थीं. वे शिकायतें न केवल थानों में दर्ज नई पुरानी एफआईआर की थीं, बल्कि कार्यालय के फोन पर भी पीडि़त मोटी रकम ठगे जाने को ले कर इंसाफ की गुहार करने लगे थे.
शिकायतों में गलत प्लौट बता कर पैसे ठग लेना या फिर एक ही प्लौट को कई लोगों के हाथों बेचने के साथसाथ नकली कागजात बनाने की भी थीं. डीएम सोनिका को यह जान कर आश्चर्य तब हुआ, जब उन्हें मालूम हुआ कि इस धंधे में न केवल भूमाफिया, बल्कि राजस्व अधिकारी, स्टांप वेंडर और दूसरे छोटेबड़े चपरासी से ले कर क्लर्क तक शामिल हैं.
जब उन्होंने पीडि़तों की शिकायतें पढ़ीं, तब वह हैरान रह गईं कि बेची और खरीदी जाने वाली अधिकतर जमीनों के मालिक विदेशों में बसे हुए थे और उन्हें पता ही नहीं था कि उन की पुश्तैनी जमीन भूमाफियाओं के लिए दुधारू गाय बन चुकी है.
साल 2023 के शुरुआत के महीनों में डीएम सोनिका की टेबल पर जमीन से संबंधित शिकायतों का पुलिंदा और भी मोटा हो गया था. इस संबंध में वह कई दफा अपने अधीनस्थ उपजिलाधिकारियों, तहसीलदारों और राजस्व अधिकारियों की बैठकें कर चुकी थीं. उन्हें उन की जिम्मेदारियों से अवगत करवाते हुए आवश्यक निर्देश और जांच के आदेश भी दे चुकी थीं. फिर भी काररवाई के नाम पर कोई नतीजा नहीं आ रहा था.
इसी सिलसिले में डीएम कार्यालय में एक दिन अंकुर शर्मा नाम के व्यक्ति का फोन आया. शर्मा ने अपनी बात डीएम साहिबा से करवाने की जिद की. उस ने कहा कि उस के पास जमीन फरजीवाड़े के संबंध में कई महत्त्वपूर्ण गोपनीय जानकारियां हैं. डीएम औफिस के कर्मचारी ने उस के आग्रह को गंभीरता से लिया और सीधे डीएम सोनिका से ही बात करवा दी.
शर्मा ने अपना परिचय एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में दिया. उन्हें बताया कि रजिस्ट्रार औफिस में फरजीवाड़े का गोरखधंधा काफी समय से चल रहा है. वहां के अधिकारियों और शहर के भूमाफिया की जबरदस्त सांठगांठ बनी हुई है. एक भूमाफिया गिरोह देहरादून में आसपास की खाली पड़ी उन जमीनों पर नजर रखे हुए है, जिन के मालिक शहर से बाहर या विदेशों में रहते हैं.
यह गिरोह सबरजिस्ट्रार कार्यालय में अधिकारियों और दूसरे कर्मचारियों से मिल कर जमीन के दस्तावेज से असली मालिक का नाम ही बदलवा लेता है. उस के बाद उस जमीन को नए ग्राहक के हाथों बेच देते हैं. इस काम में कई ग्राहक ठगे भी जा चुके हैं. उन्हें लाखों का चूना लग चुका है.
इसी के साथ शर्मा ने बताया कि यह धंधा देहरादून को साल 2000 में उत्तराखंड के नए राज्य की राजधानी बनने के बाद ही शुरू हो गया था. तब से गिरोह की जड़ें काफी मजबूत हो चुकी हैं. पहले वे बेशकीमती जमीनों पर कब्जा करने के लिए सबरजिस्ट्रार कार्यालय से किसी भी प्रौपर्टी के मालिकाना हक की सत्यापित नकल निकाल लेते हैं. उसे खरीदार को दिखा कर जमीन बेच देते हैं.
डीएम सोनिका के लिए यह जानकारी काफी चौंकाने वाली थी. उसी दिन उन्होंने अपने आला अधिकारियों और आयुक्त गढ़वाल रेंज से इस बारे में विचारविमर्श किया. काफी विचारविमर्श के बाद फरजीवाडे की जांच और जालसाज भूमाफियाओं को पकडऩे के लिए एसआईटी गठन करने की योजना बनाई गई.
डीएम द्वारा जल्द ही इस के गठन का निर्देश जारी कर दिया गया और उसे एसएसपी दिलीप सिंह कुंवर के दिशानिर्देश पर एसआईटी गठित भी कर दी गई. टीम में सर्वेश पंवार एसपी (ट्रैफिक) प्रभारी बनाया गया, जबकि सीओ नीरज सेमवाल, कोतवाल (नगर) राकेश गुसाईं, एसआई नवीनचंद जुराल, एसआई प्रदीप रावत और एसओजी के एसआई हर्ष अरोड़ा शामिल कर लिए गए.
चूंकि पीडि़त परिवार की मांगें तत्काल मान लेना संभव न था, अत: अधिकारियों ने पीडि़त परिवार को समझाया और उनकी मांगों को शासन तक पहुंचाने की बात कही, लेकिन परिजन अपनी बात पर अड़े रहे. उन्होंने राज्यमंत्री प्रतिभा शुक्ला की भी बात नहीं मानी. लाचार अधिकारी मौके पर ही डटे रहे और मानमनौवल करते रहे.
14 फरवरी, 2023 की सुबह कानपुर नगर/देहात से प्रकाशित समाचार पत्रों में जब मांबेटी की जल कर मौत होने की खबर सुर्खियों में छपी तो पूरे प्रदेश में राजनीतिक भूचाल आ गया. कांग्रेस पार्टी प्रमुख राहुल गांधी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव तथा बसपा प्रमुख मायावती ने जहां ट्वीट कर योगी सरकार की कानूनव्यवस्था पर तंज कसा तो दूसरी ओर इन पार्टियों के नेता घटनास्थल पर पहुंचने को आमादा हो गए. लेकिन सतर्क पुलिस प्रशासन ने इन नेेताओं को घटनास्थल तक पहुंचने नहीं दिया. किसी विधायक को उन के घर में नजरबंद कर दिया गया तो किसी को रास्ते में रोक लिया गया.
एसआईटी के हाथ में पहुंची जांच…
इधर 24 घंटे बीत जाने के बाद भी जब घर वालों तथा गांववालों ने मांबेटी के शवों को नहीं उठने दिया तो कमिश्नर डा. राजशेखर ने प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक से वीडियो काल कर पीडि़तों की बात कराई. उपमुख्यमंत्री ने मृतका के बेटे शिवम दीक्षित से कहा कि आप हमारे परिवार के सदस्य हो. पूरी सरकार आप के साथ खड़ी है. दोषियों के खिलाफ केस दर्ज हो गया है और कड़ी से कड़ी काररवाई होगी. उन्हें ऐसी सख्त सजा दिलाएंगे कि पुश्तें याद रखेंगी.
डिप्टी सीएम बात करतेकरते भावुक हो गए. उन्होंने शिवम से कहा कि आप कतई अकेला महसूस न करें, जिन्होंने तुम्हारी मांबहन को तुम से छीना है, उन्हें इस का खामियाजा भुगतना पड़ेगा. इस घटना से हम सभी द्रवित है. इस के बाद उन्होंने शिवम की पत्नी शालिनी तथा भाई अंशु से भी बात की और उन्हें धैर्य बंधाया. डिप्टी सीएम से बात करने के बाद पीडि़त परिवार शव उठाने को राजी हो गया. इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने मांबेटी के शवों के पोस्टमार्टम हेतु माती भेज दिया. शाम साढ़े 6 से साढ़े 7 बजे के बीच 3 डाक्टरों (डा. गजाला अंजुम, डा. शिवम तिवारी तथा डा. मुनीश कुमार) के पैनल ने वीडियोग्राफी के बीच पोस्टमार्टम किया.
मांबेटी के अंतिम संस्कार के बाद पुलिस ने आरोपी अशोक दीक्षित के घर रात 2 बजे छापा मारा, लेकिन घर पर महिलाओं के अलावा कोई नहीं मिला. पुलिस टीम ने महिलाओं से पूछताछ की तो गौरव की पत्नी रुचि दीक्षित ने बताया कि उन के परिवार का इस केस से कोई लेनादेना नहीं है. उन के पति गौरव दीक्षित फौज में है. वह श्रीनगर में तैनात है. उन का देवर अभिषेक दीक्षित राजस्थान में फौज में है. छोटा देवर अखिल 29 जुलाई से घर से लापता है. उन के ससुर अशोक दीक्षित खेती करते हैं. रुचि ने पुलिस टीम की अपने पति गौरव से फोन पर बात भी कराई.
आरोपी अशोक दीक्षित की पत्नी सुधा दीक्षित ने पुलिस को बताया कि उन के पति व बेटों को इस मामले में साजिशन फंसाया जा रहा है. इधर शासन ने भी मांबेटी की मौत को गंभीरता से लिया और जांच के लिए अलगअलग 2 विशेष जांच टीमों (एसआईटी) का गठन किया. पहली टीम का गठन डीजीपी हाउस लखनऊ द्वारा किया गया.5 सदस्यीय इस टीम में हरदोई के एसपी राजेश द्विवेदी को अध्यक्ष, हरदोई सीओ (सिटी) विकास जायसवाल को विवेचक बनाया गया. जबकि हरदोई के कोतवाल संजय पांडेय, हरदोई महिला थाने की एसएचओ राम सुखारी तथा क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर रमेश चंद्र पांडेय को शामिल किया गया.
दूसरी विशेष जांच टीम (एसआईटी) का प्रमुख कमिश्नर डा. राजशेखर व एडीजी आलोक सिंह को बनाया गया और विवेचक कन्नौज के एडीएम (वित्त एवं राजस्व) राजेंद्र कुमार को बनाया गया. इस टीम को भी तत्काल प्रभाव से जांच के आदेश दिए. एसआईटी की दोनों टीमें मड़ौली गांव पहुंची और जांच शुरू की. एसपी राजेश द्विवेदी की टीम ने घटनास्थल का निरीक्षण किया फिर पीडि़त परिवार के लोगों से पूछताछ कर बयान दर्ज किए. टीम ने गांव के प्रधान व कुछ अन्य लोगों से भी जानकारी जुटाई. टीम ने थाना अकबरपुर व रूरा में पीडि़तों के खिलाफ दर्ज रिपोर्ट का भी अध्ययन किया. टीम ने उन 15 लोगों को भी नोटिस जारी किया जो गवाह के रूप में दर्ज थे.
दूसरी विशेष जांच टीम ने भी जांच शुरू की. डा. राजशेखर की टीम ने लगभग 60 लोगों की लिस्ट तैयार की और उन्हें जिला मुख्यालय पर शिविर कार्यालय निरीक्षण भवन में बयान दर्ज कराने को बुलाया. टीम ने कुछ मोबाइल फोन नंबर भी जारी किए, जिस पर कोई भी व्यक्ति घटना से संबंधित बयान दर्ज करा सके.
बहरहाल, कथा लिखने तक एसआईटी की जांच जारी थी. रूरा पुलिस ने गिरफ्तार आरोपी लेखपाल अशोक सिंह चौहान व चालक दीपक चौहान को माती कोर्ट में पेश किया, जहां से उन दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. आरोपी एसएचओ दिनेश गौतम व एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद भूमिगत हो चुके थे. अन्य आरोपियों को पकडऩे के लिए पुलिस प्रयासरत थी. मृतका प्रमिला के दोनों बेटों शिवम व अंशु को 5-5 लाख रुपए की सहायता राशि शासन द्वारा प्रदान कर दी गई थी तथा उन्हें सुरक्षा भी मुहैया करा दी गई थी.
-कथा पुलिस सूत्रों तथा पीडि़त परिवार से की गई बातचीत पर आधारित
कृष्ण गोपाल व उन का बेटा शिवम मां व बहन को बचाने किसी तरह झोपड़ी में घुस तो गए. लेकिन वे उन दोनों तक नहीं पहुंच पाए. आग की लपटों ने उन दोनों को भी झुलसा दिया था. शिवम बाहर खड़ा चीखता रहा, ‘‘हाय दइया, कोउ हमरी मम्मी बहना को बचा लेऊ.’’ पर उस की चीख अफसरों ने नहीं सुनी. वे आंखें मूंदे खतरनाक मंजर देखते रहे.
इधर मड़ौली गांव के लोगों ने कृष्ण गोपाल के बगीचे में आग की लपटें देखीं तो वे उस ओर दौड़ पड़े. वहां का भयावह दृश्य देख कर ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा और वे पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों पर पथराव करने लगे. ग्रामीणों का गुस्सा देख कर पुलिस व अफसर किसी तरह जान बचा कर वहां से भागे. ग्रामीणों का सब से ज्यादा गुस्सा लेखपाल पर था. उन्होंने उस की कार पलट दी और तोड़ डाली. वे कार को फूंकने जा रहे थे, लेकिन कुछ समझदार ग्रामीणों ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया.
सूर्यास्त होने से पहले ही मांबेटी के जिंदा जलने की खबर जंगल की आग की तरह मड़ौली व आसपास के गांवों में फैल गई. कुछ ही देर बाद सैकड़ों की संख्या में लोग घटनास्थल पर आ पहुंचे. लोगों में भारी गुस्सा था और वह शासनप्रशासन मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे थे. शिव चबूतरा तोड़े जाने से लोगों में कुछ ज्यादा ही रोष था. इस बर्बर घटना की जानकारी पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को हुई तो चंद घंटों बाद ही एसपी (देहात) बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति, एएसपी घनश्याम चौरसिया, एडीजी आलोक सिंह, आईजी प्रशांत कुमार, कमिश्नर डा. राजशेखर तथा डीएम (कानपुर देहात) नेहा जैन आ गईं और उन्होंने घटनास्थल पर डेरा जमा लिया.
कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस अधिकारियों ने भारी संख्या में पुलिस व पीएसी बल बुलवा लिया. कमिश्नर डा. राजशेखर, एडीजी आलोक सिंह तथा आईजी प्रशांत कुमार ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा कृष्ण गोपाल व उन के बेटों को धैर्य बंधाया. निरीक्षण के बाद अधिकारियों ने मृतक मांबेटी के घर वालों से पूछताछ की. मृतका प्रमिला के पति कृष्ण गोपाल ने अफसरों को बताया कि एसडीएम (मैथा), कानूनगो व लेखपाल बुलडोजर ले कर आए थे. उन के साथ गांव के अशोक दीक्षित, अनिल, निर्मल व बड़े बउआ और गांव के कई अन्य लोग भी थे. ये लोग अधिकारियों से बोले कि आग लगा दो तो अफसरों ने आग लगा दी. हम और हमारा बेटा उन दोनों को बचाने में झुलस गए. लेकिन उन्हें बचा नहीं पाए और वे आग में जल कर खाक हो गईं. कृष्ण गोपाल के बेटे शिवम दीक्षित ने भी इसी तरह का बयान दिया.
दोषियों को बचाने में जुटा प्रशासन…
अधिकारियों ने कुछ ग्रामीणों से भी पूछताछ की. राजीव द्विवेदी नाम के व्यक्ति ने बताया कि अशोक दीक्षित का बेटा गौरव दीक्षित फौज में है. वह दबंग है. उसी ने पूरी साजिश रची. उस के साथ गांव के कुछ लोग हैं. इस में एसडीएम, एसएचओ और लेखपाल भी मिले हैं. डीएम साहिबा अपने कर्मचारियों को बचा रही हैं. ग्रामीणों ने बताया कि इस पूरे मामले में प्रशासन दोषी है. अफसरों ने पैसा लिया है. वह जबरदस्ती कब्जा हटाने पर अड़े हुए थे. उन्होंने कहा मृतका प्रमिला की बेटी नेहा की शादी तय हो गई थी. उस की अब डोली की जगह अर्थी उठेगी. प्रमिला भी समझदार महिला थी. उस ने कभी किसी का अहित नहीं सोचा.
ग्रामीण व मृतका के परिजन जहां अफसरों को दोषी ठहरा रहे थे, वहीं प्रशासनिक अफसर उन का बचाव कर रहे थे. जिलाधिकारी नेहा जैन ने इस मामले पर सफाई देते हुए कहा कि अतिक्रमण हटाने के लिए राजस्व टीम पुलिस के साथ मौके पर पहुंची थी. महिलाएं आईं और रोकने का प्रयास किया. लेखपाल पर हंसिया से अटैक भी किया. इस के बाद मांबेटी ने झोपड़ी के अंदर जा कर आग लगा ली.
कानपुर (देहात) के एसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति ने कहा, ‘‘एसडीएम व अन्य कर्मचारी अवैध कब्जा हटाने गए थे. इस दौरान कुछ लोग विरोध कर रहे थे. महिला व उन की बेटी भी विरोध में शामिल थी. विरोध करतेकरते उन दोनों ने खुद को झोपड़ी के अंदर बंद कर लिया. थोड़ी देर बाद झोपड़ी के अंदर आग लग गई. इस में महिला व उन की बेटी की मौत हो गई. आग लगी या लगाई गई, इस की जांच होगी.’’
पूछताछ के बाद रूरा पुलिस थाने में मृतका प्रमिला के बेटे शिवम दीक्षित की तहरीर के आधार पर मुअसं 38/2023 पर भादंवि की धारा 302/307/429/436/323 व 34 के तहत 11 नामजद, 15 पुलिसकर्मियों व 13 अन्य के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई. नामजद आरोपियों में एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद, लेखपाल अशोक कुमार सिंह चौहान, रूरा प्रभारी निरीक्षक दिनेश गौतम, कानूनगो नंद किशोर, जेसीबी चालक दीपक चौहान, मड़ौली गांव के अशोक दीक्षित, अनिल दीक्षित, निर्मल दीक्षित, गेंदन लाल, गौरव दीक्षित व बढ़े बउआ के नाम थे. मामले की जांच थाना अकबरपुर के इंसपेक्टर प्रमोद कुमार शुक्ला को सौंपी गई.
रिपोर्ट दर्ज होने के बाद शासन ने एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद को सस्पेंड कर दिया तथा 2 आरोपियों जेसीबी चालक दीपक चौहान व लेखपाल अशोक सिंह चौहान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. सस्पेंड एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद व थाना रूरा के एसएचओ दिनेश गौतम भूमिगत हो गए. अन्य आरोपियों की धरपकड़ के लिए 5 पुलिस टीमें लगा दी गईं. इधर जल कर खाक हुई मांबेटी का मामला प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक पहुंचा तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भावुक हो उठे. उन्होंने पीडि़त परिवार को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया तथा अपनी टीम को लगा दिया. यही नहीं, उन्होंने पूरे घटनाक्रम की जानकारी अफसरों से ली और सख्त काररवाई का आदेश दिया.
इसी कड़ी में भाजपा की क्षेत्रीय विधायक व राज्यमंत्री प्रतिभा शुक्ला देर रात घटनास्थल मड़ौली गांव पहुंचीं. उन्होंने पीडि़त परिवार को धैर्य बंधाया फिर कहा, ‘‘मैं इस क्षेत्र की विधायक हूं और यहां ऐसी बर्बर घटना घट गई. महिलाओं के साथ अत्याचार हुआ. ऐसे में मेरा कल्याण विभाग में होना बेकार है. जब हम अपनी बेटी और मां को नहीं बचा पा रहे. पहले घर के बाहर निकालते फिर गिराते. जमीन तो यूं ही पड़ी है. आगे भी पड़ी रहेगी. कोई कहीं नहीं ले जा रहा है.’’
गांव वालों का फूटा आक्रोश…
पुलिस अधिकारी मांबेटी के शवों को रात में ही पोस्टमार्टम हाउस भेजने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन पीडि़त घर वालों व गांव वालों ने शव नहीं उठाने दिए. उन्होंने एक मांग पत्र कमिश्नर डा. राजशेखर को सौंपा और कहा कि जब तक उन की मांगें पूरी नहीं होती वह शव नहीं उठने देंगे. उन्होंने मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री को भी घटनास्थल पर आने की शर्त रखी. पीडि़त परिजनों ने जो मांग पत्र कमिश्नर को सौंपा था, उन में 5 मांगें थी.
1- मृतक परिवार को 5 करोड़ रुपए का मुआवजा,
2-मृतका के दोनों बेटों को सरकारी नौकरी,
3-मृतका के दोनों बेटों को आवास,
4- परिवार को आजीवन पेंशन तथा
5- दोषियों को कठोर सजा.
लेखपाल अशोक सिंह चौहान घूसखोर था. वह कोई भी काम बिना घूस के नहीं करता था. उस की निगाह अवैध कब्जेदारों पर ही रहती थी. जो उसे पैसा देता, उस का कब्जा बरकरार रहता, जो नहीं देता उन को धमकाता. मड़ौली के ग्राम प्रधान मानसिंह की भी उस से कहासुनी हो चुकी थी. उन्होंने उस की शिकायत भी डीएम साहिबा से की थी. लेकिन उस का बाल बांका नहीं हुआ. उस ने अधिकारियों को गुमराह कर अपना उल्लू सीधा कर लिया था. मैथा ब्लाक में एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद भी उस के जायजनाजायज काम में लिप्त रहते थे.
13 जनवरी, 2023 को बिना किसी नोटिस के एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद की अगुवाई में राजस्व विभाग की एक टीम कृष्ण गोपाल के यहां पहुंची और ग्राम समाज की भूमि पर बना उस का कमरा ढहा दिया. कमरा ढहाए जाने के पहले कृष्ण गोपाल ने एसडीएम (मैथा) के पैरों पर गिर कर ध्वस्तीकरण रोकने की गुहार लगाई, लेकिन वह नहीं पसीजे. लेखपाल अशोक सिंह चौहान तो उन्हें बेइज्जत ही करता रहा. एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद ने कृष्ण गोपाल से कहा कि 5 दिन के अंदर वह अपनी झोपड़ी भी हटा ले, वरना इसे भी ढहा दिया जाएगा. काररवाई के दौरान एक मैमो भी बनाया गया, जिस में गवाह के तौर पर 15 ग्रामीणों के हस्ताक्षर कराए गए.
14 जनवरी, 2023 को पीडि़त कृष्ण गोपाल दीक्षित व उन के घर के अन्य लोग लोडर से बकरियां ले कर माती मुख्यालय धरना देने पहुंच गए. समर्थन में विहिप नेता आदित्य शुक्ला व गौरव शुक्ला भी पहुंच गए. पीडि़त परिजनों ने आवास की मांग की तो अफसरों ने उन्हें माफिया बताया. माफिया बताने पर विहिप नेताओं का पारा चढ़ गया. उन्होंने सर्दी में गरीब का घर ढहाने व प्रशासन की संवेदनहीनता पर नाराजगी जताई. उन की एडीएम (प्रशासन) केशव गुप्ता से झड़प भी हुई.
दूसरे दिन पीडि़तों की आवाज दबाने के लिए तहसीलदार रणविजय सिंह ने अकबरपुर कोतवाली में शांति भंग की धारा में कृष्ण गोपाल दीक्षित, उन की पत्नी प्रमिला, बेटों शिवम व अंशु, बेटी नेहा व बहू शालिनी तथा सहयोग करने वाले विहिप नेता आदित्य व गौरव शुक्ला के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया.
14 जनवरी, 2023 को ही लेखपाल अशोक सिंह चौहान ने थाना रूरा में कृष्ण गोपाल व उन के दोनों बेटों के खिलाफ एक मुकदमा दर्ज कराया, जिस में उस ने लिखा, ‘13 जनवरी को प्रशासन अवैध कब्जा हटाने गया था. उस वक्त कृष्ण गोपाल व उन के बेटे शिवम व अंशु प्रशासन से गालीगलौज करते हुए मारपीट पर उतारू हो गए थे. जोरजोर से झगड़ा करने लगे थे. गांव के लोगों को सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने के लिए उकसाने लगे थे. वह कहने लगे कि यहां से भाग जाओ वरना बिकरू वाला कांड अपनाएंगे.’
लेखपाल की तहरीर के आधार पर रूरा पुलिस ने रिपोर्ट तो दर्ज कर ली थी, लेकिन किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया. दूसरी तरफ इस मामले के खिलाफ पीडि़त कृष्ण गोपाल ने तहसील अकबरपुर में वाद दायर किया, जिस की सुनवाई की तारीख 20 फरवरी निर्धारित की गई.
बदले की भावना से चलाया बुलडोजर…
मड़ौली गांव में दरजनों लोग ग्रामसमाज की भूमि पर काबिज थे, उन की भूमि पर प्रशासन का बुलडोजर नहीं चला, लेकिन बदले की भावना से तथा मुट्ïठी गर्म होने पर कृष्ण गोपाल को निशाना बनाया गया. पर कृष्ण गोपाल भी जिद्ïदी था. उस ने कमरा ढहाए जाने के बाद उसी जगह पर ईंटों का पिलर खड़ा कर उस पर घासफूस की झोपड़ी बना ली थी. यही नहीं, उस ने हैंडपंप को ठीक करा लिया था और शिव चबूतरे को भी नया लुक दे दिया था.
कृष्ण गोपाल दीक्षित को 5 दिन में जगह को कब्जामुक्त करने का अल्टीमेटम प्रशासनिक अधिकारियों ने दिया था, लेकिन 2 सप्ताह बीत जाने के बावजूद भी उस ने जगह खाली नहीं की थी. दरअसल, कृष्ण गोपाल ने तहसील में वाद दाखिल किया था और सुनवाई 20 फरवरी को होनी थी. इसलिए वह निश्चिंत था और जगह खाली नहीं की थी. लेखपाल अशोक सिंह चौहान व अन्य प्रशासनिक अधिकारी जमीन कब्जा मुक्त न होने से खफा थे. लेखपाल उन के कान भी भर रहा था और उन्हें गुमराह भी कर रहा था. अत: प्रशासनिक अधिकारियों ने कृष्ण गोपाल की झोपड़ी भी ढहाने का मन बना लिया.
13 फरवरी, 2023 की शाम 3 बजे एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद, कानूनगो नंदकिशोर, लेखपाल अशोक सिंह चौहान और एसएचओ दिनेश कुमार गौतम बुलडोजर ले कर मड़ौली गांव पहुंचे. साथ में 15 महिला, पुरुष पुलिसकर्मी भी थे. लोडर चालक दीपक चौहान था. अचानक इतने अधिकारियों और पुलिस को देख कर झोपड़ी में आराम कर रहे कृष्ण गोपाल और उन की पत्नी प्रमिला बाहर निकले. प्रशासनिक अधिकारियों ने जमीन पर अवैध कब्जा बताते हुए उन से तुरंत जगह खाली करने को कहा.
इस पर प्रमिला, उन के बेटे शिवम व बेटी नेहा ने कहा कि कोर्ट में उन का वाद दाखिल है और सुनवाई 20 फरवरी को है. लेकिन पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी नहीं माने. उन्होंने जगह को तुरंत खाली करने की चेतवनी दी. इस के बाद शिवम अपने पिता के साथ झोपड़ी का सामान निकाल कर बाहर रखने लगा. इसी समय एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद ने बुलडोजर चालक दीपक चौहान को संकेत दिया कि वह काररवाई शुरू करे. बुलडोजर शिव चबूतरा ढहाने आगे बढ़ा तो एसएचओ (रूरा) दिनेश गौतम ने उसे रोक दिया. वह चबूतरे पर चढ़े. उन्होंने शिवलिंग व नंदी को प्रणाम कर माफी मांगी फिर चबूतरे से उतर आए. उन के उतरते ही बुलडोजर ने चबूतरा ढहा दिया और मार्का हैंडपंप को उखाड़ फेंका.
जीवित भस्म हो गईं मांबेटी…
अब तक प्रमिला के सब्र का बांध टूट चुका था. उन्हें लगा कि अधिकारी उन की झोपड़ी नेस्तनाबूद कर देंगे. वह पुलिस व लेखपाल से भिड़ गईं. उस ने लेखपाल अशोक सिंह चौहान के माथे पर हंसिया से प्रहार कर दिया. फिर वह बेटी नेहा के साथ चीखती हुई बोली, ‘‘मर जाऊंगी, लेकिन कब्जा नहीं हटने दूंगी.’’
इस के बाद वह नेहा के साथ झोपड़ी के अंदर चली गई और दरवाजा बंद कर लिया. महिला पुलिसकर्मियों ने दरवाजा खुलवाने का प्रयास किया, लेकिन दरवाजा नहीं खुला. इधर प्रशासनिक अधिकारियों को लगा कि मांबेटी ध्वस्तीकरण रोकने के लिए नाटक कर रही हैं. उन्होंने झोपड़ी गिराने का आदेश दे दिया. बुलडोजर ने छप्पर ढहाया तो झोपड़ी में आग लग गई. हवा तेज थी. देखते ही देखते आग ने विकराल रूप धारण कर लिया.
आग की लपटों के बीच मांबेटी धूधू कर जलने लगी. कृष्ण गोपाल चिल्लाता रहा कि पत्नी और बेटी झोपड़ी के अंदर है. परंतु अफसरों ने नहीं सुनी और जलता छप्पर जेसीबी से और दबवा दिया. इस से उन का निकल पाना तो दूर, दोनों को हिलने तक का मौका नहीं मिला और दोनों जल कर भस्म हो गईं.
उत्तर प्रदेश के कानपुर (देहात) जनपद के रूरा थाने से 5 किलोमीटर दूर मैथा ब्लौक के अंतर्गत एक बड़ी आबादी वाला गांव है मड़ौली. अकबरपुर और रूरा 2 बड़े कस्बों के बीच लिंक रोड से जुड़े ब्राह्मण बाहुल्य इसी गांव में कृष्ण गोपाल दीक्षित सपरिवार रहते थे. उन के परिवार में पत्नी प्रमिला के अलावा 2 बेटे शिवम, अंश तथा एक बेटी नेहा थी. कृष्ण गोपाल दीक्षित के पास मात्र 2 बीघा जमीन थी. इसी जमीन पर खेती कर और बकरी पालन से वह अपना परिवार चलाते थे. बेटे जवान हुए तो वह भी पिता के काम में सहयोग करने लगे.
कृष्ण गोपाल के घर के ठीक सामने अशोक दीक्षित का मकान था. अशोक दीक्षित के परिवार में पत्नी सुधा के अलावा 3 बेटे गौरव, अखिल व अभिषेक थे. अशोक दीक्षित दबंग व संपन्न व्यक्ति थे. उन के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. इस के अलावा उन के 2 बेटे गौरव व अभिषेक फौज में थे. संपन्नता के कारण ही गांव में उन की तूती बोलती थी. उन के बड़े बेटे गौरव का विवाह रुचि दीक्षित के साथ हो चुका था. रुचि खूबसूरत थी. वह अपनी सास सुधा के सहयोग से घर संभालती थी.
घर आमनेसामने होने के कारण अशोक व कृष्ण गोपाल के बीच बहुत नजदीकी थी. दोनों परिवारों का एकदूसरे के घर आनाजाना था. अशोक की पत्नी सुधा व कृष्ण गोपाल की पत्नी प्रमिला की खूब पटती थी, लेकिन दोनों के बीच अमीरीगरीबी का बढ़ा फर्क था. कृष्ण गोपाल व उस के परिवार के मन में सदैव गरीबी की टीस सताती रहती थी.
मड़ौली गांव से लगभग एक किलोमीटर दूर सडक़ किनारे ग्राम समाज की भूमि पर कृष्ण गोपाल दीक्षित का पुश्तैनी कब्जा था. सालों पहले इस वीरान पड़ी भूमि पर कृष्ण गोपाल के पिता चंद्रिका प्रसाद दीक्षित व बाबा ने पेड़ लगा कर कब्जा किया था. बाद में पेड़ों ने बगीचे का रूप ले लिया. इसी बगीचे में कृष्ण गोपाल ने एक कमरा बना लिया था और सामने झोपड़ी डाल ली थी. इसी में वह रहते थे और पशुपालन करते थे.
भू अभिलेखों में ग्राम समाज की यह जमीन गाटा संख्या 1642 में 3 बीघा दर्ज है, जिस में से एक बीघा भूमि पर कृष्ण गोपाल का कब्जा था. लेकिन जो 2 बीघा जमीन थी, उस पर कृष्ण गोपाल किसी को भी कब्जा नहीं करने देता था. उस पर भी वह अपना अधिकार जमाता था. कृष्ण गोपाल ही नहीं, गांव के दरजनों लोग ग्राम समाज की जमीन पर काबिज हैं. किसी ने खूंटा गाड़ कर कब्जा किया तो किसी ने कूड़ाकरकट डाल कर. किसी ने कच्चापक्का निर्माण करा कर कब्जा किया तो किसी ने सडक़ किनारे दुकान बना ली. इस काबिज ग्राम समाज की भूमि पर किसी ने अंगुली नहीं उठाई और आज भी काबिज हैं.
सिपाही लाल ने शुरू किया विवाद…
लेकिन कृष्ण गोपाल की काबिज भूमि पर आंच तब आई, जब गांव के ही सिपाही लाल दीक्षित ने गाटा संख्या 1642 की 2 बीघा में से एक बीघा जमीन अपनी बेटी रानी के नाम तत्कालीन ग्रामप्रधान के साथ मिलीभगत कर पट्टा करा दी. रानी का विवाह रावतपुर (कानपुर) निवासी रामनरेश के साथ हुआ था. लेकिन उस की अपने पति से नहीं पटी तो वह मायके आ कर रहने लगी थी. उस का पति से तलाक हुआ या नहीं, यह तो पता नहीं चला, पर उस का पति से लगाव खत्म हो गया था.
यह बात सन 2005 की है. सिपाही लाल ने बेटी के नाम पट्ïटा तो करा दिया, लेकिन वह कृष्ण गोपाल के विरोध के कारण उस पर कब्जा नहीं कर पाया. बस यही बात कृष्ण गोपाल के पड़ोसी अशोक दीक्षित को चुभने लगी. दरअसल, रानी रिश्ते में अशोक की बहन थी. वह चाहते थे कि रानी पट्टे वाली जमीन पर काबिज हो. इस मामले को ले कर अशोक दीक्षित ने परिवार के अनिल दीक्षित, निर्मल दीक्षित, गेंदनलाल व बढ़े बउआ को भी अपने पक्ष में कर लिया. अब ये लोग कृष्ण गोपाल के विपक्षी बन गए और मन ही मन रंजिश मानने लगे.
अशोक दीक्षित का बेटा गौरव दीक्षित फौज में था. उसे भी इस बात का मलाल था कि उस के पिता रानी बुआ को पट्टे वाली जमीन पर काबिज नहीं करा पाए. वह जब भी छुट्टी पर गांव आता, वह कृष्ण गोपाल के परिवार को नीचा दिखाने की कोशिश करता. एक बार उस ने शिवम की बहन नेहा के फैशन को ले कर भद्दी टिप्पणी कर दी. इस पर नेहा और उस की मां प्रमिला ने उसे तीखा जवाब दिया, जिस से वह तिलमिला उठा.
कृष्ण गोपाल दीक्षित के दोनों बेटे शिवम व अंशु भी दबंगई में कम न थे. दोनों विश्व हिंदू परिषद के सक्रिय सदस्य थे. विहिप के धरनाप्रदर्शन में दोनों भाग लेते रहते थे. दोनों भाई आर्थिक रूप से भले ही कमजोर थे, लेकिन खतरों के खिलाड़ी थे. अब तक शिवम की शादी शालिनी के साथ हो गई थी. वह पुश्तैनी मकान में रहता था. दिसंबर, 2022 में गौरव छुट्टी पर आया तो एक रोज सडक़ किनारे एक दुकान पर किसी बात को ले कर उस की अंशु से तकरार होने लगी. तकरार बढ़ती गई और दोनों एकदूसरे को देख लेने की धमकी देने लगे.
इस घटना के बाद गौरव ने फैसला कर लिया कि वह कृष्ण गोपाल व उस के बेटों को सबक जरूर सिखाएगा और उन की अवैध कब्जे वाली ग्राम समाज की भूमि को मुक्त करा कर ही दम लेगा. इस के बाद गौरव ने अपने पिता अशोक दीक्षित व परिवार के अन्य लोगों के साथ कान से कान जोड़ कर सलाह की और पूरी योजना बनाई. योजना के तहत गौरव ने लेखपाल अशोक सिंह चौहान से मुलाकात की. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे से प्रभावित हुए. कारण, अशोक सिंह चौहान भी पहले फौज में था. रिटायर होने के बाद उसे लेखपाल की नौकरी मिल गई थी.
चूंकि दोनों फौजी थे, अत: जल्द ही उन की दोस्ती हो गई. इस के बाद गौरव ने लेखपाल को पैसों का लालच दे कर उसे अपनी मुट्ठी में कर लिया. योजना के तहत ही गौरव ने अपने पिता अशोक दीक्षित के मार्फत परिवार के एक व्यक्ति गेंदनलाल दीक्षित को उकसाया और उसे शिकायत करने को राजी कर लिया. गेंदन लाल ने तब दिसंबर के अंतिम सप्ताह में एक प्रार्थनापत्र कानपुर (देहात) की डीएम नेहा जैन को दिया. इस प्रार्थना पत्र में उस ने लिखा कि मड़ौली गांव के निवासी कृष्ण गोपाल दीक्षित व उस के बेटों ने ग्राम समाज की भूमि पर अवैध कब्जा कर कमरा बना लिया है व झोपड़ी भी डाल ली है. इस जमीन को खाली कराया जाए.
गेंदन लाल को बनाया मोहरा…
गेंदन लाल के इस शिकायती पत्र पर डीएम नेहा जैन ने काररवाई करने का आदेश एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद को दिया. ज्ञानेश्वर प्रसाद ने इस संबंध में जानकारी लेखपाल अशोक सिंह चौहान से जुटाई तो पता चला कि कृष्ण गोपाल जिस जमीन पर काबिज है, वह जमीन ग्राम समाज की है.