Kerala News: 19 साल बाद पकड़े कुंवारी मां के हत्यारे

Kerala News: रंजिनी फौजी प्रेमी दिविल के सामने बहुत गिड़गिड़ाई, लेकिन वह उस से शादी करने के लिए तैयार नहीं हुआ, बल्कि उस पर अबौर्शन कराने का दबाव बनाने लगा. रंजिनी ने उस की बात नहीं मानी और 2 बेटियों को जन्म दिया. इस के बाद इस कुंवारी मां और उस की बच्चियों का ऐसा हश्र हुआ कि…

केरल के कोल्लम जिले के आंचल गांव की रहने वाली 70 साल की सांथम्मा मंदिर के बरामदे में बैठी फूल बेच रही थी. 4 जनवरी को उसी दौरान उस के सस्ते मोबाइल की घंटी बजी. सांथम्मा ने फोन की स्क्रीन पर नंबर देखा. नंबर एकदम अनजान था. फिर भी उस ने फोन उठाया. दूसरी ओर से फोन करने वाले की भारी और रौबदार आवाज सुनाई दी. यह आवाज पुलिस अधिकारी की थी.

हमेशा कानूनी दांवपेंच और रौब से बात करने वाले पुलिस अधिकारी की आवाज में उस समय स्नेह का पुट था. उस ने कहा, ”अम्मा, आप की प्रार्थना और हमारी मेहनत सफल हुई. देर भले हुई, पर 19 साल की जहमत के बाद हम ने उन दोनों नराधमों को पकड़ लिया है.’’

यह सुन कर अनायास ही बूढ़ी सांथम्मा के गाल आंसुओं से भीग रहे थे. गांव के किसी आदमी ने यह समाचार टीवी पर देखा था, इसलिए पूरे गांव में यह बात फैल गई थी, जिस से गांव वाले सांथम्मा के पास दौड़े आए थे. पुलिस की यह बड़ी उपलब्धि थी, इसलिए थोड़ी देर में मीडिया वाले भी सांथम्मा का इंटरव्यू लेने आ गए थे. सांथम्मा ने कांपती आवाज में सब से पहले यही कहा था, ”मैं अदालत से यही प्रार्थना करती हूं कि वे दोनों हत्यारे जब तक जिंदा रहें, तब तक वे सूरज का उजाला न देख पाएं.’’

आखिर क्या है यह पूरा मामला? अब इस के बारे में विस्तार से जानते हैं. केरल के कोल्लम जिला के अलायमोन गांव में सांथम्मा अपनी बेटी रंजिनी के साथ रहती थी. मांबेटी काफी गरीब थीं. मामूली वेतन पर सांथम्मा गांव के मंदिर में नौकरी करती थी. रंजिनी लोगों के घर छोटेमोटे काम करती थी. गांव का ही एक बढ़ई युवक दिविल कुमार सेना में नौकरी करता था. साल में 2-3 बार वह सेना से छुट्टी मिलने पर गांव आता था. उसी दौरान उस की रंजिनी से मुलाकात होती थी. दोनों जवान थे. परिणामस्वरूप दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गया. इस के बाद तो दिविल बारबार गांव आने लगा. प्रेम के आवेश में दोनों तमाम मर्यादाएं लांघ गए.

इस के बाद दिविल गांव आया तो रंजिनी उस से मिली. इस बार रंजिनी काफी गंभीर थी. उस ने दिविल के कंधे पर सिर रख कर कहा, ”दिविल, अभी मैं ने अपनी मम्मी को कुछ नहीं बताया है. मैं गर्भवती हूं और जनवरी महीने में हमारे बच्चे को जन्म देने वाली हूं, इसलिए उस के पहले हमें विवाह कर लेना चाहिए.’’

इस के बाद रंजिनी ने रुआंसी आवाज में कहा, ”अगर हम विवाह नहीं करते हैं तो एक कुंवारी मां के रूप में मेरा गांव में रहना मुश्किल हो जाएगा. इसलिए तुम तय कर लो कि हमें विवाह कब करना है.’’

रंजिनी की बात सुन कर दिविल चौंक उठा. उस ने कहा, ”अभी तो विवाह करना मुमकिन नहीं है. पर इस समस्या के हल का एक सरल उपाय है. तुम अबौर्शन करा लो.’’

दिविल का जवाब सुन कर रंजिनी परेशान हो उठी. उस के सामने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगी कि वह उस के साथ ऐसा व्यवहार न करे. जितनी जल्दी हो सके विवाह कर ले और उस के गर्भ में पल रहे अपने बच्चे को इस दुनिया में आने दे. पर दिविल तो गर्भपात की जिद पकड़े बैठा रहा. दिविल की जिद पर रंजिनी खीझ उठी. उस ने गुस्से में कहा, ”दिविल, चाहे कुछ भी हो, मेरा निर्णय अटल है. किसी भी संयोग में अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को मैं हरगिज नहीं मरने दूंगी. मैं इसे जन्म दूंगी और इस के पिता के रूप में तुम्हारा नाम लिखाऊंगी.’’

”अगर तुम्हें मेरी बात नहीं माननी तो फिर तुम्हारी जो मरजी हो, वह करो.’’ इतना कह कर दिविल उठा और चला गया. अगले दिन वह पठानकोट चला गया, क्योंकि उन दिनों उस की तैनाती वहीं थी. इस के बाद वह फिर कभी गांव नहीं आया.

स्वाभिमानी रंजिनी अपने फैसले पर अटल रही. दिविल तो धोखा दे कर भाग निकला था. इस के बावजूद हिम्मत हारे बगैर रंजिनी ने रोते हुए सारी बात अपनी मम्मी को बता कर अपना फैसला भी सुना दिया. धर्मकर्म को मानने वाली सांथम्मा को झटका तो लगा, फिर भी उसने बेटी से कहा कि वह चिंता न करे. वह भ्रूण हत्या नहीं होने देगी. वह उस के साथ है.

पैदा हुईं जुड़वां बेटियां

अलायमोन गांव के कुछ लोगों से रुपए उधार ले कर जनवरी, 2006 में मांबेटी त्रिवेंद्रम आ गईं. वहां के सरकारी श्री अवित्तम थिरुनल अस्पताल में रंजिनी को दिखाया. वहां के डाक्टरों ने रंजिनी की जांच करने के बाद सांथम्मा को शुभकामनाएं देते हुए कहा, ”अम्मा, आप एक नहीं, 2 बच्चों की नानी बनने वाली हैं.’’

22 जनवरी, 2006 को रंजिनी को अस्पताल में भरती कराया गया. एकदम अंजान शहर और अस्पताल का मामला था. इसलिए सांथम्मा परेशान थी, पर अस्पताल में उस के पास एक मददगार आ गया. अनिल कुमार नाम के उस युवक ने सांथम्मा के पास आ कर कहा, ”अम्मा, आप किसी बात की चिंता न करें. मैं यहां गरीब रोगियों की सेवा करने का काम करता हूं. आप का कोई भी काम हो या जरूरत हो, आप मुझ से कहिएगा. अगर सीजेरियन औपरेशन होगा तो खून की भी जरूरत पड़ेगी. जरूरत पडऩे पर मैं खून का भी इंतजाम करवा दूंगा.’’

सांथम्मा ने अनिल कुमार नाम के उस देवदूत का आभार व्यक्त किया. अस्पताल में अनिल कुमार उस के आसपास ही रहता था. जरूरत पडऩे पर छोटेमोटे काम कर देता था. खून की जरूरत तो नहीं पड़ी. 24 जनवरी, 2006 को रंजिनी ने 2 स्वस्थ बेटियों को जन्म दिया. अस्पताल से छुट्टी मिलती, उस के पहले ही रंजिनी को अपनी दोनों बेटियों के भविष्य की चिंता सताने लगी. उन दोनों का पालनपोषण के अलावा उन की पढ़ाईलिखाई की भी व्यवस्था करनी अनिवार्य थी. आंचल गांव में रह कर मांबेटी मुश्किल से अपना गुजारा कर रही थीं, उस में 2 लोग और जुड़ गए थे.

पिता के रूप में दिविल अपनी जिम्मेदारी से भाग न सके, इस के लिए उन दोनों के लिए उस से एक निश्चित रकम लेनी चाहिए. इस के लिए रंजिनी ने केरल के महिला आयोग में अपनी शिकायत दर्ज कराई कि उस की इन दोनों बेटियों का बाप दिविल है. इस के लिए उस ने उन का डीएनए टेस्ट कराने की भी मांग की. राज्य महिला आयोग ने दिविल को डीएनए टेस्ट कराने का आदेश भी दे दिया. अस्पताल से छुट्टी मिलने वाली थी तो मांबेटी दुविधा में थीं कि वे कहां जाएंगी. कुंवारी रंजिनी अपनी 2 बच्चियों को ले कर गांव जाएगी तो गांव वाले उस पर थूकेंगे.

उन की चिंता का अंदाजा लगा कर अनिल कुमार ने कहा, ”मैं आप लोगों को आंचल गांव में एक कमरा किराए पर दिला देता हूं. वहां कोई आप लोगों के बारे कुछ नहीं जानता, इसलिए कोई कुछ कहेगा भी नहीं. इस तरह आप लोग बेइज्जती कराने से बची रहेंगी.’’

अनिल कुमार ने अगले ही दिन आंचल गांव में सांथम्मा और रंजिनी को एक छोटा सा घर किराए पर दिला दिया. इस के बाद सांथम्मा रंजिनी और उस की दोनों बेटियों को ले कर उस घर में रहने आ गई. नामकरण की रस्म बाकी थी, पर रंजिनी ने दोनों बेटियों का मुंह ताकते हुए उन के नाम तय कर लिए थे— आनंदा और अक्षया. अनिल कुमार जबतब आ कर हालचाल पूछ लेता था. एक दिन आ कर उस ने सांथम्मा से कहा, ”बच्चियों के जन्म प्रमाणपत्र के लिए अस्पताल के कागज ले कर कल सुबह आप को पंचायत के औफिस जाना है.’’

किस ने किए 3 मर्डर

अगले दिन 10 फरवरी, 2006 को सांथम्मा 11 बजे पंचायत औफिस गई. एक घंटे बाद वह वापस आई तो घर का दरवाजा केवल अटका कर बंद किया हुआ था. सांथम्मा ने दरवाजा खोल कर जैसे ही कदम अंदर रखा, उसके मुंह से चीख निकल गई. वह तुरंत बाहर आ गई और रोते हुए गिर पड़ी. आसपास वाले इकट्ठा हो गए. लोगों ने अंदर कमरे में झांक कर देखा. कमरे के फर्श पर खून से लथपथ 28 साल की रंजिनी की लाश पड़ी थी और 19 दिन की दोनों बच्चियों की लाशें चारपाई पर पड़ी थीं. तीनों की गरदन बड़ी बेरहमी से काटी गई थी.

किसी ने इस की सूचना पुलिस को दे दी थी. सूचना पा कर पुलिस आ गई थी. रंजिनी और उस की 2 नवजात बेटियों की हत्या किस ने की, पुलिस ने जांच शुरू कर दी. पूछताछ में पड़ोसियों ने बताया था कि जबतब एक युवक इन के यहां आता था. पर उस का नाम कोई नहीं बता सका था. जब उस युवक के बारे में सांथम्मा से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उस का नाम अनिल कुमार था. उस ने यहां उन की काफी मदद की थी. किसी होशियार पड़ोसी ने अनिल की बाइक का नंबर देख लिया था, जो उसे याद था. उस ने पुलिस को उस की बाइक का नंबर बता दिया था.

इस जानकारी के आधार पर पुलिस ने अपनी जांच आगे बढ़ाई. पुलिस ने बाइक के मालिक के बारे में पता किया. उस का नाम अनिल कुमार नहीं, बल्कि राजेश था. सांथम्मा ने पुलिस को दिविल के खिलाफ रंजिनी द्वारा महिला आयोग में की गई शिकायत के बारे में बता कर रंजिनी और उस की दोनों बच्चियों की हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी थी.

पुलिस ने जब राजेश के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि राजेश तो दिविल का जिगरी दोस्त था. वह अनिल कुमार के नाम से इस परिवार के नजदीक आ कर मदद का नाटक कर रहा था. राजेश भी दिविल के साथ सेना में नौकरी करता था. वह भी उसी रेजिमेंट में था, जिस में दिविल था. दोनों पठानकोट के एक ही कैंप में रहते भी थे.

केरल पुलिस पठानकोट पहुंची तो दिविल और राजेश फरार हो चुके थे. पुलिस ने सेना के अधिकारियों से बात की तो अधिकारियों ने दोनों को डेजर्टर घोषित कर दिया. दोनों के बारे में पता करने के लिए पुलिस ने रातदिन एक कर दिया, एड़ीचोटी का जोर लगा दिया, दोनों की सूचना देने वाले को एक लाख रुपए का इनाम देने की भी घोषणा की गई, पर उन का कुछ पता नहीं चला. 3 हत्याएं करने वाले आरोपियों के खिलाफ लोगों को गुस्सा तो था ही, अब उनके न पकड़े जाने से लोगों को पुलिस पर भी गुस्सा आने लगा था, पर पुलिस की लाख कोशिश के बावजूद आरोपी पकड़े नहीं जा सके. तब हाईकोर्ट के आदेश पर हत्याओं के इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई.

सीबीआई ने इस मामले की जांच शुरू की. आरोपी तो नहीं पकड़े जा सके, पर सीबीआई ने अपनी जांच के बाद दोनों को आरोपी बना कर चार्जशीट दाखिल कर दी तो चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रैट, अर्नाकुलम की अदालत ने दिविल कुमार और राजेश कुमार को आरोपी घोषित कर दिया. परंतु ट्रिपल मर्डर के इस मामले में हत्यारे अब तक पकड़े नहीं जा सके थे. सीबीआई की भी काररवाई फाइलों तक सिमट कर रह गई थी. सभी ने यही सोच लिया था कि अब रंजिनी को न्याय नहीं मिल पाएगा.

परंतु केरल पुलिस के एडीजीपी (ला एंड और्डर) मनोज अब्राहम ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी. साल 2024 के शुरू से ही उन की टैक्निकल इंटेलिजेंस विंग के अधिकारी आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से हल न होने वाले पुराने मामलों की डिजिटल कुशलता से हल करने की कोशिश शुरू कर दी थी.

एआई से मिली हेल्प

दिविल और राजेश के साल 2006 में मिले फोटो पर उन्होंने आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से काम शुरू किया. इतने सालों बाद उन की स्थिति (हालत) कैसी होगी? चेहरा, हेयरस्टाइल और शरीर में होने वाले बदलाव से वे कैसे दिखाई देते होंगे, उन की फोटो तैयार की गई. इस के बाद दुनिया भर के सोशल मीडिया पर जितने भी फोटो थे, उन से मिलाया जाने लगा. अत्यंत धैर्य और होशियारी से उन की टीम द्वारा की गई मेहनत अंत में दिसंबर, 2024 में रंग लाई.

पुडुचेरी के एक वैवाहिक समारोह में दिखाई देने वाला एक चेहरा राजेश के चेहरे से 90 प्रतिशत मेल खा रहा था. मनोज अब्राहम ने सीबीआई अधिकारियों से मिल कर वह फोटो उन्हें दे कर बताया कि रंजिनी की हत्या वाला यह एक आरोपी पुडुचेरी में है. फिर तो सीबीआई की टीम उत्साह में आ गई. राजेश की तलाश में सीबीआई टीम पुडुचेरी पहुंच गई. इस के बाद उस फोटो वाले व्यक्ति को खोज कर उस पर नजर रखने लगी. जब टीम को विश्वास हो गया कि प्रवीण नाम का यह आदमी राजेश ही है तो 4 जनवरी, 2025 को प्रवीण उर्फ राजेश को हिरासत में ले लिया गया.

इस के बाद उस से दिविल कुमार के बारे में भी उगलवा लिया गया. दिविल कुमार ने पुडुचेरी में अपना नाम विष्णु रख लिया था. राजेश से नामपता मिलने के बाद सीबीआई टीम ने उसे भी दबोच लिया. साल 2006 में रंजिनी और उस की दोनों नवजात बेटियों की हत्या कर के राजेश और दिविल पठानकोट जा कर वहां से भाग कर पुडुचेरी आ गए थे. 2006 से 2025 तक दोनों ने पार्टनरशिप में इंटीरियर डिजाइनर का काम कर के अपना अच्छा धंधा जमा लिया था. बढ़ई के काम के साथ उन में महिलाओं को पटाने का भी हुनर था, इसलिए वहां 2 अध्यापिकाओं को पटा कर उन से विवाह कर के अपना घरसंसार बसा लिया था. रहने के लिए दोनों ने फ्लैट भी खरीद लिए थे.

हत्या के 19 साल बीत चुके थे. नए नाम से नए शहर में इन दोनों हत्यारों ने नई जिंदगी शुरू की थी. नए नाम का आधार कार्ड भी बनवा लिया था. इसलिए दोनों पूरी तरह निश्चिंत थे कि अब वे कभी पकड़े नहीं जाएंगे. परंतु आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से पुलिस ने असंभव लगने वाला काम कर दिखाया और दोनों हत्यारे पकड़ लिए गए थे.

यह समाचार सुन कर बूढ़ी सांथम्मा की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले थे. उस ने पत्रकारों से कहा कि जब उनकी बेटी रंजिनी ने उन से प्रेग्नेंसी की बात बताई थी तो उन्हें झटका सा लगा था. बाप के रूप में आने वाली संतान का खर्च या जिम्मेदारी उठाने को दिविल तैयार नहीं था, इसलिए उस ने रंजिनी को अबौर्शन कराने की सलाह दी थी.

पर रंजिनी इस के लिए तैयार नहीं थी. वह अपनी जिद पर अड़ी थी कि कुछ भी हो जाए, वह अपने बच्चे को जन्म देगी. तब एक मां होने के नाते सांथम्मा ने उस का साथ दिया था. उन्होंने अपनी जवान बेटी और उस की 19 दिन की नवजात बेटियों की खून में लथपथ लाशें देखी थीं. यह दृश्य जब भी उन की आंखों के सामने आता था, उस रात उन्हें नींद नहीं आती. पुलिस ने उन दोनों आरोपियों दिविल कुमार और प्रवीण उर्फ राजेश से 3 हत्याओं के बारे में विस्तार से पूछताछ कर जेल भेज दिया. Kerala News

 

19 साल बाद खुला हत्या का राज

छठी क्लास में पढ़ने वाले महादेवन का स्कूल घर से कई किलोमीटर दूर था. वह पैदल ही स्कूल आताजाता था, जबकि उस के साथ पढ़ने वले कई छात्र साइकिल से आतेजाते थे. उस का मन करता था कि उस के पास भी साइकिल हो. उस ने अपने पिता विश्वनाथन आचारी से कई बार साइकिल दिलाने का अनुरोध किया, लेकिन वह अभी उसे साइकिल दिलाना नहीं चाहते थे.

इस की वजह यह थी कि महादेवन की उम्र अभी केवल 13 साल थी. 3 बेटियों के बीच वह उन का अकेला बेटा था, इसलिए वह कोई रिस्क नहीं उठाना चाहते थे. वह चाहते थे कि 2-3 साल में बेटा जब थोड़ा बड़ा और समझदार हो जाएगा तो उसे साइकिल खरीदवा देंगे.

मगर महादेवन को पिता की बात अच्छी नहीं लगी. उस ने साइकिल खरीदवाने की जिद पकड़ ली. वैसे विश्वनाथन आचारी के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. उन की केरल के चंगनाशेरी के निकट मडुमूला में उदया स्टोर्स के नाम से एक दुकान थी. दुकान से उन्हें अच्छीखासी आमदनी हो रही थी और परिवार भी उन का कोई ज्यादा बड़ा नहीं था. परिवार में पत्नी विजयलक्ष्मी के अलावा 3 बेटियां और एक बेटा महादेवन था.

चूंकि वह एकलौता बेटा था, इसलिए घर के सभी लोग उसे बहुत प्यार करते थे. सभी का लाडला होने की वजह से उस की हर मांग पूरी की जाती थी. विश्वनाथन ने उस के जन्मदिन पर एक तोला सोने की चेन गिफ्ट की थी, जिसे वह हर समय पहने रहता था. वह उसे साइकिल खरीदवाने के पक्ष में तो थे, लेकिन अभी उस की उम्र कम होने की वजह से फिलहाल मना कर रहे थे.

लेकिन बेटे की जिद और मायूसी के आगे विश्वनाथन को झुकना पड़ा. आखिर उन्होंने बेटे को एक साइकिल खरीदवा दी. साइकिल पा कर महादेवन की खुशी का ठिकाना न रहा. यह बात सन 1995 की है. इस के बाद महादेवन दोस्तों के साथ साइकिल चलाने लगा. जब वह अच्छी तरह से साइकिल चलाना सीख गया तो उसी से स्कूल आनेजाने लगा.

महादेवन 2 सितंबर, 1995 को भी घर से साइकिल ले कर निकला था, लेकिन तब से आज तक वह वापस नहीं लौटा. दरअसल स्कूल से लौटने के कुछ समय बाद महादेवन साइकिल ले कर निकल गया. ऐसा वह रोजाना करता था और 1-2 घंटे में घर लौट आता था.

उस दिन वह कई घंटे बाद भी घर नहीं लौटा तो मां विजयलक्ष्मी को चिंता हुई. उन्होंने उसे उन जगहों पर जा कर देखा, जहां वह साइकिल चलाता था. महादेवन नहीं मिला तो विजयलक्ष्मी ने दुकान पर बैठे पति के पास बेटे के गायब होने की खबर भिजवा दी.

बेटे के घर न लौटने की बात सुन कर विश्वनाथन आचारी दुकान से सीधे घर चले आए. उन्होंने बेटे को इधरउधर ढूंढना शुरू किया और उस के यारदोस्तों से पूछा, परंतु उन्हें बेटे के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली.

एकलौते बेटे का कोई पता न चलने से मां का रोरो कर बुरा हाल था. चारों तरफ से हताश होने के बाद विश्वनाथन पत्नी के साथ थाना चंगनाशेरी पहुंचे और थानाप्रभारी को बेटे के गुम होने की बात बताई. लेकिन थानाप्रभारी ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया. उन्होंने बस उस की गुमशुदगी दर्ज कर ली.

थाने में बच्चे के गुम होने की सूचना दर्ज कराने के बाद भी आचारी अपने स्तर से बेटे को ढूंढते रहे. काफी खोजने के बाद भी उन के हाथ निराशा ही लगी. बच्चे के गायब होने के 4-5 दिनों बाद आचारी के घर पर एक चिट्ठी आई. चिट्ठी पढ़ कर वह सन्न रह गए. उस चिट्ठी में लिखा था, ‘‘तुम्हारा बेटा महादेवन हमारे कब्जे में है. अगर तुम्हें वह जिंदा चाहिए तो मोटी रकम का इंतजाम कर लो.’’

पैसे पहुंचाने के लिए चिट्ठी में एक पता लिखा था. आचारी बेटे के लिए कुछ भी करने को तैयार थे. उन्होंने तय कर लिया कि अपहर्त्ता उन से चाहे जितने पैसे ले लें, लेकिन उन्हें बेटा सही सलामत मिले. मामला कहीं उलटा न हो जाए, इसलिए उन्होंने चिट्ठी वाली बात पुलिस को नहीं बताई.

पैसे इकट्ठे करने के बाद वह अकेले ही चिट्ठी में दिए पते पर नियत समय पर पहुंच गए. जिस कलर के कपड़े पहने हुए व्यक्ति को पैसे सौंपने की बात पत्र में लिखी थी, उस कलर के कपड़े पहने वहां कोई भी नहीं दिखा. आचारी ने चारों तरफ नजरें घुमा कर देखा. फिर भी उन्हें उस रंग के कपड़े पहने कोई शख्स नहीं दिखा. उन्होंने वहां कुछ देर इंतजार किया. इस के बाद भी उस कलर के कपड़े पहने कोई शख्स नहीं आया तो वह निराश हो कर घर लौट आए.

फिर आचारी ने अगले दिन अपहर्त्ताओं द्वारा भेजी गई चिट्ठी के बारे में पुलिस को बता दिया. पत्र से पुलिस को भी यकीन हो गया कि महादेवन का किसी ने पैसों के लिए अपहरण किया है. पत्र द्वारा पुलिस ने अपहर्त्ताओं तक पहुंचने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली.

इधरउधर हाथ मारने के बाद पुलिस को कामयाबी नहीं मिली तो उस ने इस संवेदनशील मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया. आचारी थाने के चक्कर लगाते रहे, लेकिन पुलिस ने उन की बातें पर तवज्जो नहीं दी.

13 वर्षीय महादेवन को घर से गए हुए महीने, साल बीत गए. बेटे की याद में रोतेरोते विजयलक्ष्मी की आंखों के आंसू सूख चुके थे तो पुलिस अधिकारियों के पास चक्कर लगाते लगाते आचारी के जूते घिस चुके थे. इस के बाद भी आचारी ने हिम्मत नहीं हारी. वह बेटे को खोजने का दबाव पुलिस पर बनाए रहे.

आचारी को जब लगा कि पुलिस बेटे को ढूंढने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही तो उन्होंने उच्च न्यायालय की शरण ली. हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया और इस केस की जांच क्राइम ब्रांच से कराने के आदेश दिए. हाईकोर्ट के आदेश पर क्राइम ब्रांच के एडीजीपी विल्सन एम. पौल ने पुलिस अधीक्षक के.जी. साइमन के नेतृत्व में एक जांच टीम बनाई. इस टीम में एसआई के. एफ. जोब, ए.बी. पोन्नयम, नंगराज आदि को शामिल किया गया.

इस के बाद क्राइम ब्रांच ने महादेवन के रहस्यमय तरीके से गायब होने की तफ्तीश शुरू की. चूंकि उस को गायब हुए कई साल बीत चुके थे, इसलिए काफी मशक्कत के बाद भी क्राइम ब्रांच को ऐसा कोई सूत्र नहीं मिल सका, जिस से पता चल सकता कि महादेवन कहां गया था?

अपने एकलौते बेटे के गम में विश्वनाथन आचारी की हालत ऐसी हो गई थी कि सन 2006 में उन्होंने दम तोड़ दिया. 54 साल की उम्र में पति के गुजर जाने के बाद विजयलक्ष्मी के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. बेटे के गम में वह पहले से ही काफी कमजोर हो गई थी. बाद में उस की भी तबीयत खराब रहने लगी और सन 2009 में उस ने भी दम तोड़ दिया.

महादेवन को गायब हुए 14 साल हो चुके थे. उस की चिंता में मांबाप चल बसे थे और जो 3 बहनें थीं, वे भी भाई के गम में अकसर रोती रहती थीं. उधर क्राइम ब्रांच के लिए यह केस एक चुनौती के रूप में था. क्राइम ब्रांच ने एक बार फिर केस की जांच महादेवन के घर से ही शुरू की.

इस बार क्राइम ब्रांच की टीम ने यह जानने की कोशिश की कि आचारी की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी. फिर यह पता लगाया कि महादेवन जब साइकिल ले कर घर से निकला था तो उस के साथ कौन था.

इस बारे में टीम ने उस के दोस्तों और मोहल्ले के लोगों से भी बात की. इस पर मोहल्ले के कुछ लोगों ने बताया कि उस दिन महादेवन को हरि कुमार की साइकिल की दुकान पर देखा गया था. इस बात की पुष्टि महादेवन की दुकान पर काम करने वाले एक युवक ने भी की.

इस से क्राइम ब्रांच के शक की सुई हरि कुमार की तरफ घूम गई. हरि कुमार की मडुमूला जंक्शन के पास साइकिल रिपेयरिंग की दुकान थी. क्राइम ब्रांच टीम ने पूछताछ के लिए हरि कुमार को बुलवा लिया. लेकिन उस ने टीम को यही बताया कि महादेवन अपनी साइकिल ठीक कराने अकसर उस की दुकान पर आता रहता था. उस दिन भी उस की साइकिल खराब हो गई थी. साइकिल ठीक करा कर वह उस के यहां से चला गया था.

पुलिस टीम को लग रहा था कि हरि कुमार सही बात नहीं बता रहा था. लिहाजा उस दिन उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया. इसी बीच टीम ने हरि कुमार की लिखावट का नमूना ले लिया था. आचारी के पास फिरौती का जो लैटर आया था, वह पुलिस फाइल में लगा हुआ था. क्राइम ब्रांच ने उस पत्र की राइटिंग और हरि कुमार की राइटिंग को जांच के लिए फोरैंसिक लैबोरेटरी भेजा.

फोरैंसिक जांच में दोनों राइटिंग एक ही व्यक्ति की पाई गईं. इस से स्पष्ट हो गया कि आचारी के पास फिरौती का जो पत्र आया था, वह हरि कुमार ने ही भेजा था. इस का मतलब हरि कुमार ने ही महादेवन का अपहरण किया था. हरि कुमार के खिलाफ पक्का सुबूत मिलने पर क्राइम ब्रांच ने उसे पूछताछ के लिए फिर उठा लिया.

चूंकि टीम को अब पुख्ता सुबूत मिल चुका था, इसलिए टीम ने इस बार उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार किया कि उस ने महादेवन की हत्या कर दी थी. 19 साल पहले उस ने एक नहीं, बल्कि 2-2 हत्याएं की थीं. 2-2 हत्याएं करने का राज उस ने उगल दिया था. दूसरा कत्ल उस ने अपने एक नजदीकी दोस्त का किया था. उस दोस्त की गुमशुदगी भी आज तक रहस्यमय बनी हुई थी.

महादेवन की हत्या की उस ने जो कहानी बताई, वह हैरान कर देने वाली थी.

विश्वनाथन ने बेटे की जिद के आगे झुक कर उसे साइकिल दिला तो दी थी, लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि यही साइकिल हमेशा के लिए बेटे को उन से दूर कर देगी.

महादेवन की मुराद पूरी हो चुकी थी, इसलिए वह फूला नहीं समा रहा था. स्कूल भी वह साइकिल से ही आनेजाने लगा. इस के अलावा स्कूल से लौटने के बाद वह यार दोस्तों के साथ साइकिल चलाता था. मडुमूला जंक्शन के पास हरि कुमार की साइकिल रिपेयरिंग की दुकान थी. जब कभी महादेवन की साइकिल खराब होती, वह हरि कुमार की दुकान पर जा कर ठीक कराता था.

महादेवन एक खातेपीते परिवार से था. वह हर समय गले में सोने की चेन पहने रहता था. जबकि हरि कुमार आर्थिक परेशानी झेल रहा था. साइकिल रिपेयरिंग की दुकान से उसे कोई खास आमदनी नहीं होती थी. 13 साल के महादेवन के गले में सोने की चेन देख कर हरि कुमार के मन में लालच आ गया. उस पर अपना विश्वास जमाने के लिए हरि कुमार उस से बड़े प्यार से बात करनी शुरू कर दी.

2 सितंबर, 1995 को स्कूल से घर लौटने के बाद महादेवन ने खाना खाया और साइकिल ले कर घर से निकल गया. ऐसा वह रोजाना करता था और 1-2 घंटे बाद लौट आता था. उस दिन घर से निकलने के बाद महादेवन की साइकिल खराब हो गई. वह साइकिल ठीक कराने हरि कुमार की दुकान पर गया. चूंकि उस समय दुकान पर कई ग्राहक पहले से बैठे थे, इसलिए हरि कुमार ने साइकिल अपने यहां खड़ी कर ली और उस से थोड़ी देर बाद आने को कहा.

कुछ देर बाद महादेवन साइकिल लेने पहुंचा तो उस समय हरि कुमार दुकान पर अकेला था. महादेवन से सोने की चेन छीनने का अच्छा मौका देख कर हरि कुमार ने उसे दुकान में बुला लिया. जैसे ही महादेवन दुकान में घुसा, हरि कुमार ने उस के गले से चेन निकालने की कोशिश की. महादेवन ने इस का विरोध किया और चीखने लगा. तभी हरि कुमार ने दुकान बंद कर दी और उस का गला दबाने लगा.

गले पर दबाव बढ़ा तो महादेवन का दम घुटने लगा. कुछ ही पलों में दम घुटने से उस बच्चे की मौत हो गई. उस की हत्या करने के बाद हरि ने उस के गले से एक तोला वजन की सोने की चेन निकाल ली.

उस का मकसद पूरा हो चुका था. अब उस के सामने समस्या लाश को ठिकाने लगाने की थी. इस के लिए उस ने अपने दोस्त कोनारी सली और साले प्रमोद को दुकान पर ही बुला लिया.

महादेवन की हत्या की बात उस ने उन्हें बता दी. तीनों ने लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. योजना के बाद उन्होंने लाश को एक बोरे में भरा और आटो में रख कर उसे कोट्टायम के निकट एक तालाब में डाल आए. लाश ठिकाने लगा कर हरि कुमार निश्चिंत हो गया. लेकिन यह उस की भूल थी.

उस के दोस्त कोनारी सली ने ही उसे ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया. पुलिस को हत्या की बात बताने की धमकी दे कर वह उस से पैसे ऐंठने लगा. हरि कुमार उस का मुंह बंद करने के लिए उस की डिमांड पूरी करता रहा.

उसी दौरान हरि कुमार ने सवा लाख रुपए में अपनी जमीन बेची. कोनारी सली को जब यह बात पता लगी तो उस ने हरि कुमार से 50 हजार रुपए की मांग की. अब हरि कुमार उसे कोई पैसा नहीं देना चाहता था. वह जानता था कि अगर उसे पैसे देने को साफ मना कर देगा तो कोलारी पुलिस के सामने हत्या का राज खोल सकता है. इस बारे में हरि ने अपने साले प्रमोद से बात की और दोनों ने कोनारी सली से हमेशा के लिए छुटकारा पाने का प्लान बना लिया.

योजना के अनुसार, हरि ने वाशपल्लि में त्यौहार के दिन शाम 7 बजे कोनारी सली को शराब पीने के लिए अपनी दुकान में बुला लिया. लालच में कोनारी सली वहां पहुंच गया. दुकान में ही तीनों ने शराब पीनी शुरू की. उसी दौरान उन्होंने कोनारी सली के पैग में साइनाइड मिला दिया. जहर मिली शराब पीने से कुछ ही देर मे कोनारी सली की मौत हो गई.

दोनों उस की लाश को बोरे में भर कर एक आटो से कोट्टायम मरयपल्लि के पास ले गए. यहां पास में ही कोनारी सली का घर था. वहीं पास में स्थित एक पानी भरे गहरे तालाब में वह बोरी डाल दी. इसी तालाब में इन्होंने महादेवन की भी लाश डाली थी. इस तालाब को लोग प्रयोग नहीं करते थे.

उस की लाश ठिकाने लगाने के बाद दोनों अपनेअपने काम में जुट गए. कोनारी सली की हत्या महादेवन की हत्या के करीब डेढ़ साल बाद की गई थी.

उधर जब कोनारी सली कई दिनों बाद भी घर नहीं लौटा तो उस के घर वालों ने थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई. काफी छानबीन के बाद भी जब वह घर नहीं आया तो घर वालों ने यही सोचा कि वह बिना बताए घर छोड़ कर कहीं भाग गया है. इस के कुछ दिनों बाद हरि कुमार के साले प्रमोद की भी बाथरूम में फिसल जाने के बाद मौत हो गई. उस की मौत भी एक रहस्य बन कर रह गई.

जुर्म के दोनों राजदारों की मौत के बाद हरि कुमार बेखौफ हो गया. अब उसे किसी का कोई डर नहीं रहा.

इस पूछताछ के बाद जब लोगों को पता चला कि हरि कुमार ने न केवल महादेवन की, बल्कि अपने दोस्त कोनारी सली की भी हत्या की थी, सैकड़ों की संख्या में लोग थाने पर जमा हो गए. वे हरि कुमार को सौंप देने की मांग कर रहे थे, ताकि वे अपने हाथों से उसे सजा दे सकें. लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया.

महादेवन को खोजते खोजते उस के मांबाप गुजर चुके थे. अब उस की 3 बहनें सिंघु, स्वप्ना और स्मिता ही बची थीं. भाई की हत्या का राज खुलने के बाद वे भी थाने गईं. उन्होंने पुलिस से अनुरोध किया कि उन के घर को तबाह करने वाले हत्यारे हरि कुमार के खिलाफ सख्त से सख्त काररवाई की जाए.

पुलिस हत्यारे हरि कुमार को उस जगह भी ले गई थी, जहां उस ने दोनों लाशें ठिकाने लगाई थीं. चूंकि हत्याएं किए हुए 18-19 साल बीत चुके थे, जिस से वहां से लाशों से संबंधित कोई चीज नहीं मिली.

अपराधी चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो, अगर पुलिस कोशिश करे तो अपराधी तक पहुंच ही जाती है. सुबूत खत्म करने के बाद हरि कुमार भले ही पुलिस से 19 साल तक बचता रहा, लेकिन पुलिस के हाथ उस तक पहुंच ही गए. लाख कोशिश करने के बाद भी हत्यारा पुलिस से बच नहीं सका.

क्राइम ब्रांच ने उसे गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

-आर. जयदेवान/  डा. अनुराधा पी. के.