Organ Trafficking . किडनी किंगपिन टी. राजकुमार राव ने देश के विभिन्न राज्यों में अपना नेटवर्क बना रखा था. इस में दिल्ली के एक मशहूर अस्पताल में काम करने वाले कर्मचारी भी शामिल थे. यदि इस रैकेट के सदस्य देवाशीष का अपनी पत्नी मोमिता से झगड़ा न हुआ होता तो शायद रैकेट का भंडाफोड़ अभी नहीं हो पाता.
सरिता विहार के थानाप्रभारी मनिंदर सिंह अपने औफिस में बैठे थे, तभी उन के पास देवाशीष नाम का एक व्यक्ति आया. उस ने बताया, सर, मैं अपनी पत्नी मोमिता का यहां के एक अस्पताल में इलाज कराने आया था. वह यहां से असीम सिकदर के साथ भाग गई है. हम पहाड़गंज के जिस होटल में ठहरे थे, मैं उस होटल में भी देख आया हूं. वहां उन दोनों में से कोई नहीं है. सर, मेरी पत्नी को ढूंढने में मदद कीजिए.
देवाशीष की बात सुन कर थानाप्रभारी ने उसे एक नजर देखा. उस की उम्र 30 साल के करीब थी. बीवी के भाग जाने से वह काफी परेशान दिख रहा था. थानाप्रभारी ने उस से पूछा, तुम कहां के रहने वाले हो और असीम कहां का रहने वाला है? सर, मैं तो कोलकाता का रहने वाला हूं, जबकि असीम उत्तरी 24 परगना का. देवाशीष ने बताया. तुम्हारी पत्नी को क्या बीमारी थी, जो तुम उसे इलाज के लिए कोलकाता से यहां लाए थे? मनिंदर सिंह ने पूछा. उस की किडनी में प्रौब्लम थी. देवाशीष ने कहा.
मनिंदर सिंह को यह बात थोड़ा अजीब लग रही थी कि यह पत्नी को इलाज के लिए लाया था और वह इलाज कराने के बजाय भाग गई. लेकिन बात एक महिला के गायब होने की थी, इसलिए उन्होंने इस मामले की रिपोर्ट दर्ज करनी जरूरी समझी. उन्होंने देवाशीष से उस का पूरा पता पूछा तो वह पता बताने में आनाकानी करने लगा. तब मनिंदर सिंह ने कहा कि उस की रिपोर्ट दर्ज करनी है, इसलिए उसे अपना पूरा पता तो बताना ही पड़ेगा. नहीं सर, मैं रिपोर्ट नहीं दर्ज कराना चाहता. आप उसे वैसे ही ढुंढ़वा दीजिए. उस ने घबरा कर कहा.
तमाम लोग इस तरह के आरोप लगाते हैं कि पुलिस उन की रिपोर्ट दर्ज नहीं करती, जबकि देवाशीष ऐसा आदमी था, जो खुद रिपोर्ट दर्ज कराने से मना कर रहा था. मनिंदर सिंह ने उस से रिपोर्ट दर्ज न कराने की वजह पूछी तो उस ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया.
वह देवाशीष से रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए जबरदस्ती भी नहीं कर सकते थे. पर उन्हें उस की बातें कुछ संदिग्ध लगीं. इसलिए इस केस की गहराई में जाने के लिए उन के मन में जिज्ञासा जाग उठी. उन्होंने देवाशीष का, उस की पत्नी मोमिता और दोस्त असीम सिकदर का मोबाइल नंबर ले कर उस से कहा कि जैसे ही उस की पत्नी के बारे में जानकारी मिलेगी, उसे फोन कर के सूचना दे दी जाएगी.
देवाशीष के जाने के बाद मनिंदर सिंह ने एसआई नागेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल सतीश, कांस्टेबल अनिल और दिलशाद की एक टीम बना कर कहा कि वे इस बात का पता लगाएं कि आखिर मामला क्या है? यह बात 28 मई, 2016 की है.
देवाशीष ने असीम और मोमिता के जो फोन नंबर दिए थे, पुलिस ने उन नंबरों की जांच कराई तो उन की लोकेशन दिल्ली के पहाड़गंज की ही मिली. पहाड़गंज के जिस होटल में वे ठहरे थे, पुलिस टीम वहां गई तो पता चला कि असीम और मोमिता जा चुके हैं. पहाड़गंज में सैकड़ों होटल हैं. अब यह पता लगाना मुश्किल था कि वे दोनों किस होटल में ठहरे हैं. लेकिन पुलिस ने अपने संपर्कों से पता लगा ही लिया. पता चला कि असीम पहाड़गंज के सिग्नेचर होटल में ठहरा है.
पुलिस ने उस होटल के मैनेजर से बात की तो पता चला कि असीम एक महिला के साथ होटल में ठहरा है. वह महिला शायद उस की पत्नी है. एसआई नागेंद्र सिंह ने यह जानकारी थानाप्रभारी को दी तो उन्हें लगा कि उस के साथ जो महिला है, वह मोमिता ही होगी. उन्होंने कहा कि असीम और मोमिता से कुछ कहने के बजाय गोपनीय तरीके से उन के बारे में जानकारी जुटाएं.
नागेंद्र सिंह ने ऐसा ही किया. उन्होंने जांच की तो पता चला कि असीम ने पहाड़गंज के ही किसी दूसरे होटल में 2 लोगों को और ठहरा रखा है. दोनों शायद किडनी के मरीज हैं, इसलिए वे होटल की लिफ्ट से आतेजाते हैं, जिन का इलाज दिल्ली के एक अस्पताल में चल रहा है.
यह बात नागेंद्र सिंह ने मनिंदर सिंह को बताई तो उन्हें पूरा यकीन हो गया कि यह कोई किडनी बेचने वाला रैकेट है, क्योंकि देवाशीष ने पत्नी मोमिता को भी किडनी का ही मरीज बताया था. इस के बाद थानाप्रभारी ने देवाशीष, असीम सिकदर और मोमिता के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि उन की कानपुर, जयपुर, कोलकाता आदि शहरों के लोगों से अकसर बातचीत होती रहती थी. थाना परिसर में ही डीसीपी औफिस है. थानाप्रभारी को मामला गंभीर लगा तो उन्होंने इस की जानकारी डीसीपी एम.एस. रंधावा को दी.
डीसीपी ने तुरंत ही 3 पुलिस टीमें तैयार कीं. पहली टीम थाना बदरपुर के थानाप्रभारी ऐशवीर सिंह के नेतृत्व में गठित कर के उसे हवाईजहाज से कोलकाता भेज दिया. दूसरी टीम सरिता विहार थाने के अतिरिक्त थानाप्रभारी रामनिवास के नेतृत्व में गठित कर उसे कानपुर रवाना कर दिया. तीसरी टीम की बागडोर सरिता विहार के थानाप्रभारी मनिंदर सिंह के नेतृत्व में गठित कर उन्हें दिल्ली में काररवाई करने के निर्देश दिए. तीनों टीमों का नेतृत्व एसीपी निधिन वल्सन कर रहे थे.
दिल्ली वाली पुलिस टीम उस होटल में पहुंची, जहां असीम सिकदर और मोमिता ठहरे थे. पर ये दोनों वहां नहीं मिले. तब देवाशीष के फोन नंबर पर बात करने की कोशिश की गई तो उस का फोन बंद मिला. अब तक की जांच में एक तय अस्पताल का ही जिक्र हो रहा था, इसलिए मनिंदर सिंह ने उस अस्पताल के आसपास इंसपेक्टर बी.एस. रावत, एसआई शैलेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल मनोज, कांस्टेबल दिलशाद आदि को तैनात कर दिया.
पुलिस टीम चौबीसों घंटे वहां लगी रही. 1-2 जून, 2016 की रात करीब 12 बजे पुलिस टीम ने अस्पताल के पास स्थित पार्क में कुछ लोगों को देखा. पुलिस वहां पहुंची तो उन में देवाशीष भी था. देवाशीष को पुलिस पहचान गई, क्योंकि वह 2-3 दिनों पहले थाने आया था. उस के साथ एक युवक और 2 युवतियां भी थीं.
पुलिस ने उन से पूछताछ की तो युवक ने अपना नाम असीम सिकदर तो युवतियों ने मोमिता व रेखा सिंह बताए. तलाशी लेने पर असीम की जेब से 2 आधार कार्ड निकले, जिन में से एक पर रेखा सिंह पत्नी जयकरन, निवासी फतेहपुर, उत्तर प्रदेश और दूसरे पर मंजू देवी तिवारी पत्नी गजानन तिवारी, निवासी कूचबिहार, बिहार लिखा था. दोनों ही आधार कार्डों पर एक ही तरह के फोटो थे. यह देख कर पुलिस ने पहचान लिया कि इन में से एक फरजी है.
शक होने पर पुलिस उन चारों को थाने ले आई. इन से पूछताछ की गई तो असीम ने स्वीकार कर लिया कि वह रेखा सिंह की किडनी निकलवाने के लिए इस अस्पताल लाया था. वह किडनी कूचबिहार के रहने वाले गजानन तिवारी को लगनी थी, इसलिए उस ने रेखा सिंह को जयकरन की पत्नी मंजू देवी तिवारी नाम से फरजी कागज तैयार कराए थे.
पूछताछ करने पर पता चला कि इन सभी लोगों का एक बड़ा गैंग था, जो इस धंधे को लंबे समय से करता आ रहा था. गैंग का मुखिया टी. राजकुमार राव था. पुलिस का जो शक था, वह सही साबित हुआ. अब पुलिस का मकसद अन्य लोगों तक पहुंचने का था. पुलिस की जो टीम कानपुर गई थी, वह भी कानपुर जिले के बर्रा थाने के गुंजन विहार निवासी सत्यप्रकाश उर्फ आशु को गिरफ्तार कर के ले आई.
उस ने जब थाने में असीम व अन्य लोगों को देखा तो उस के होश उड़ गए. वह समझ गया कि मामले का भंडाफोड़ हो चुका है. इसलिए पूछताछ में उस ने भी आसानी से स्वीकार कर लिया कि वह असीम और टी. राजकुमार राव के लिए काम करता था.
टी. राजकुमार राव वही है, जिस की तलाश में इंसपेक्टर ऐशवीर सिंह टीम के साथ कोलकाता गए थे. फोन कंपनी से उन्हें उस का पता मिल गया था. वह पश्चिम बंगाल के जिला 24 परगना स्थित उस के घर पहुंचे तो पता चला कि वह तिरुपति बालाजी गया है. यह जानकारी उन्होंने डीसीपी को दी तो डीसीपी ने उन्हें हवाई मार्ग से तिरुपति बालाजी पहुंचने के निर्देश दिए. इंसपेक्टर ऐशवीर सिंह टीम के साथ तिरुपति बालाजी पहुंच गए.
उधर असीम, सत्यप्रकाश आदि से पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वीकार किया कि इस धंधे से अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट करने वाले डाक्टरों के पीएस आदित्य सिंह, शैलेश सक्सेना और बृजेश चौहान जुड़े हैं. इन्हें भी हिरासत में ले लिया.
जैसेजैसे पुलिस की जांच आगे बढ़ रही थी, इस धंधे में संलिप्त लोगों की संख्या बढ़ती जा रही थी. डीसीपी ने सरिता विहार थाने में ही इस केस का कंट्रोल रूम बना दिया. एसीपी निधिन वल्सन यहीं से सभी टीमों के संपर्क में थे. सर्विलांस टीम बाहर गई टीमों को उचित जानकारियां उपलब्ध करा रही थी.
एक के बाद एक गिरफ्तारियां होने पर प्रिंट और इलैक्ट्रौनिक मीडिया में यह मामला सुर्खियों में आ गया. उसी दौरान रैकेट के मुख्य मास्टरमाइंड टी. राजकुमार राव ने अपना मोबाइल नंबर बदल दिया. लेकिन मोबाइल नंबर बदलने की जानकारी सर्विलांस टीम को पता चल गई. टीम को यह भी पता लग गया कि अब वह उस फोन में किस कंपनी का सिमकार्ड प्रयोग कर रहा है. सर्विलांस टीम ने यह बात तिरुपति बालाजी पहुंची टीम को दे दी.
टीम राजकुमार को वहां ढूंढ रही थी. तभी पुलिस को पता चला कि राजकुमार सड़क मार्ग से अपने घर के लिए रवाना हो चुका है. पुलिस टीम भी तिरुपति बालाजी से कोलकाता के लिए रवाना हो गई. पुलिस टीम कोलकाता के राजारहाट इलाके में राजकुमार के घर पहुंची तो पता चला कि वह अभी घर नहीं पहुंचा है.
वहीं पर पुलिस को यह जानकारी मिली कि राजकुमार ने उसी इलाके में एक भव्य कोठी बनवाई है. तिरुपति बालाजी से लौटने के बाद वह उसी नई कोठी में गृहप्रवेश कर शादी की सालगिरह भी मनाएगा. इस के लिए उस ने एक भव्य समारोह के आयोजन का भी इंतजाम कर रखा था. पुलिस मौके की तलाश में लग गई. जिस दिन उस की नई कोठी में पार्टी का आयोजन था, उसी दिन दिल्ली पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. स्थानीय न्यायालय में पेश कर पुलिस ट्रांजिट रिमांड पर उसे दिल्ली ले आई.
दिल्ली पहुंचने पर पुलिस ने उसे साकेत कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी अरविंद बंसल की कोर्ट में पेश कर 8 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. किडनी रैकेट के मास्टरमाइंड टी. राजकुमार राव के गिरफ्तार होने की जानकारी मिलने पर विशेष आयुक्त कानून एवं व्यवस्था (दक्षिण) पी. कामराज व दक्षिणपूर्वी रेंज के संयुक्त आयुक्त आर.पी. उपाध्याय भी थाना सरिता विहार पहुंच गए. वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में पुलिस ने सभी अभियुक्तों को आमनेसामने बिठा कर पूछताछ की तो किडनी का धंधा करने वाले रैकेट की यह कहानी सामने आई.
34 वर्षीय टी. राजकुमार राव मूलरूप से हैदराबाद का रहने वाला था. उस का ट्यूबलाइट की चोक बनाने का धंधा था, जबकि उस की पत्नी नयन कोयंबटूर के एक अस्पताल में नर्स थी. राजकुमार का धंधा अच्छा चल रहा था. जिस कंपनी के लिए वह चोक बनाता था, उस के द्वारा तैयार कराया गया माल किसी वजह से कैंसिल हो गया. इस से उसे काफी नुकसान हुआ. धंधा चौपट हो जाने पर वह काफी घाटे में चला गया. उस पर लोगों का कर्ज भी हो गया. कर्ज से उबरने का उसे कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. कर्ज वाले परेशान करने लगे तो वह पत्नी के पास कोयंबटूर चला गया.
जिस अस्पताल में उस की बीवी नर्स थी, उसी अस्पताल के एक कर्मचारी से राजकुमार की दोस्ती हो गई. उस ने उस कर्मचारी को अपनी आर्थिक परेशानी बताई तो उस ने राजकुमार को सुझाव दिया कि वह अपनी एक किडनी बेच कर 2 लाख रुपए पा सकता है. राजकुमार को पैसों की जरूरत थी और एक किडनी निकलवाने पर उसे कोई शारीरिक नुकसान भी नजर नहीं आया, इसलिए उस ने पैसों के लालच में अपनी एक किडनी बेच दी. यह बात सन 2006 की है.
उस दोस्त ने राजकुमार को यह भी सलाह दी कि यदि वह किसी और व्यक्ति को भी किडनी निकलवाने के लिए लाएगा तो इस के बदले में उसे एक से डेढ़ लाख रुपए मिल जाएंगे.
यह सुन कर राजकुमार खुश हो गया. उसे लगा कि इस धंधे से वह मोटी कमाई कर सकता है. ऐसा उस ने किया भी. वह बिहार और पश्चिम बंगाल से पैसों का लालच दे कर लोगों को लाने लगा और किडनी निकलवा कर कमाई करने लगा. बाद में राजकुमार सीधे उन डाक्टरों के संपर्क में आ गया, जो किडनी ट्रांसप्लांट करते थे. सीधे संपर्क में आने पर उस का कमीशन भी बढ़ गई.
शातिर दिमाग राजकुमार ने नएनए लोगों को तलाशने के लिए पश्चिम बंगाल के अखबारों में विज्ञापन देना शुरू कर दिया. विज्ञापन में किडनी के बदले वह पैसे देने की बात भी करता था. विज्ञापन पढ़ कर उस के संपर्क में तमाम लोग आए.
पश्चिम बंगाल के 24 परगना निवासी असीम सिकदर ने भी विज्ञापन पढ़ कर उस से संपर्क किया था. तब राजकुमार ने कोयंबटूर के अस्पताल में उस की किडनी निकलवाई थी. इस के बदले में उसे 2 लाख रुपए दिए थे. बाद में वह भी पैसों के लालच में और लोगों को किडनी निकलवाने के लिए राजकुमार के पास लाने लगा. इस तरह असीम भी उस के गैंग का सदस्य बन गया. कोयंबटूर में उस ने 15 लोगों की किडनी निकलवा कर मोटी कमाई की.
किसी तरह कोयंबटूर पुलिस को इस धंधे की जानकारी हो गई. काररवाई कर पुलिस ने अस्पताल के कई लोगों को गिरफ्तार किया, लेकिन राजकुमार राव पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका. कोयंबटूर से आ कर वह कोलकाता में रहने लगा. चूंकि उसे बिना मेहनत किए मोटी कमाई करने की आदत हो चुकी थी, इसलिए वह अपना धंधा जमाने के लिए दिल्ली आ गया. दिल्ली में उस ने यहां के मशहूर अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट करने वाले डाक्टरों के पीएस से बात कर सेटिंग कर ली.
कोलकाता में ही राजकुमार की मुलाकात दीपककर से हुई. उसे भी पैसों की जरूरत थी. राजकुमार ने 2 लाख रुपए में उस से सौदा पक्का कर लिया. जिस व्यक्ति को किडनी ट्रांसप्लांट होनी थी, वह उस समय अमेरिका में था. वीजा, पासपोर्ट तैयार करा कर दीपककर को अमेरिका भेज दिया गया. अमेरिका से लौटने के बाद दीपककर भी राजकुमार के साथ काम करने लगा. दीपककर को कंप्यूटर क्षेत्र की अच्छी नौलेज थी, इसलिए राजकुमार ने उसे फरजी कागजात तैयार कराने की जिम्मेदारी दे दी.
किडनी मरीज और डोनर के बीच पारिवारिक रिश्ता होने पर किडनी ट्रांसप्लांट में ज्यादा झंझट नहीं पड़ता. करीबी रिश्ता दिखाने के लिए ही राजकुमार डोनर के फरजी कागजात तैयार कराता था. दीपककर यह कागजात इतनी सफाई से तैयार करता था कि किसी को उन कागजातों पर शक भी नहीं होता था.
न्यू जलपाईगुड़ी का रहने वाला देवाशीष मौली भी अखबार में विज्ञापन पढ़ कर राजकुमार के संपर्क में आया था. अपनी किडनी निकलवाने के बाद उस ने अपनी पत्नी मोमिता मौली को भी तैयार कर लिया. उस की किडनी दिल्ली के अस्पताल में पुष्पेंद्र कोटावाला को प्रत्यारोपित की गई थी. मोमिता के कागज पुष्पेंद्र की पत्नी नेहा कोटावाला के नाम से तैयार कराए गए थे.
राजकुमार ने अपना जाल उत्तर प्रदेश, उड़ीसा में भी फैला रखा था. कानपुर के बर्रा इलाके का रहने वाला सत्यप्रकाश उर्फ आशु भी उस के संपर्क में आ गया. सत्यप्रकाश ने उस के मार्फत अपनी किडनी निकलवाई. इस गैंग में जुड़ने वाले लोगों की एक खासियत यह थी कि वे अपनी किडनी बेचने के बाद नए डोनर की तलाश में जुट जाते थे. इस तरह एक चेन बनती चली जाती थी.
ज्यादा पैसे कमाने के लिए सत्यप्रकाश भी ऐसे लोगों की तलाश में जुट गया, जो पैसों के लालच में अपनी किडनी बेचने को तैयार हों. इसी सिलसिले में कानपुर के रतनपुरी इलाके के रहने वाले 42 वर्षीय उमेश से उस की मुलाकात हुई.
दरअसल, उमेश के बेटे के पैर में कोई प्रौब्लम थी. उस के इलाज पर वह लाखों रुपए खर्च कर चुका था. उस पर लोगों का कर्ज भी चढ़ गया था. डाक्टर उस के पैर का औपरेशन करना चाहते थे, लेकिन उस के पास पैसे नहीं थे. उमेश परेशान था कि ऐसे में वह क्या करे? ऊपर से लोग उस के यहां अपना पैसा मांगने आते थे. पैसा न देने पर वह उसे व उस की पत्नी को उल्टीसीधी बातें सुना कर चले जाते थे. दंपति को उन की बेइज्जती का सामना करना पड़ता था. उसी दौरान उमेश की मुलाकात सत्यप्रकाश उर्फ आशु से हुई. सत्यप्रकाश ने उसे किडनी बेचने का सुझाव दिया तो उमेश तैयार हो गया.
अप्रैल, 2016 में सत्यप्रकाश उमेश को कानपुर से दिल्ली ले आया. उस ने उमेश की मुलाकात असीम सिकदर और अस्पताल के डाक्टरों एवं उन के पीएस से कराई. उन के पास किडनी के कई तलबगार थे. उमेश की किडनी गाजियाबाद के आशुतोष को ट्रांसप्लांट करने का फैसला किया गया.
फिर उमेश का फोटो लगा कर आशुतोष के फैमिली मैंबर सुरेशचंद्र के नाम से फरजी कागजात तैयार कर के उस की किडनी आशुतोष को ट्रांसप्लांट कर दी गई. इस के एवज में उमेश को 3 लाख रुपए दिए गए. अपनी किडनी बेचने के बाद भी उमेश का कर्ज नहीं उतर सका.
इस के बाद उस ने अपनी पत्नी नीलू श्रीवास्तव की किडनी बेचने का फैसला किया. पत्नी को समझाबुझा कर उस ने इस के लिए तैयार कर लिया. वह पिछले महीने उसे ले कर सत्यप्रकाश के साथ दिल्ली आ गया. उस समय जम्मू के रहने वाले जियालाल गुप्ता को किडनी की जरूरत थी. तब नीलू की फोटो लगाकर जियालाल गुप्ता की पत्नी बौबी गुप्ता के नाम से फरजी पेपर तैयार कर के उस की किडनी जियालाल गुप्ता को ट्रांसप्लांट कर दी गई. इस के एवज में उसे 4 लाख रुपए मिले थे.
राजकुमार और असीम की अस्पताल में इतनी मजबूत पकड़ थी कि डोनर के विभिन्न तरह के टेस्ट अस्पताल में बहुत जल्दी हो जाते थे, उस की रिपोर्ट भी संबंधित डाक्टरों के पास पहुंच जाती थी. किडनी डोनर के कागजों की जांच अस्पताल के नैफ्रोलौजिस्ट के असिस्टैंट करते थे. इन की जांच के आधार पर ही सर्जन किडनी ट्रांसप्लांट की काररवाई करते थे. उन्हें इस काम के 2 लाख प्रति पेशेंट मिलते थे.
जिस मरीज को किडनी प्रत्यारोपित की जाती थी, उस से 25 से 30 लाख रुपए मिलते थे. इन पैसों में से गैंग के लोगों का अलगअलग हिस्सा होता था. चूंकि राजकुमार को अच्छीखासी कमाई हो रही थी, इसलिए उस ने अपना लाइफस्टाइल भी बदल लिया था. वह खुले हाथों से पैसे खर्च करने लगा था. इस का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि बाल कटाने पर वह हजार रुपए नाई को टिप्स में दे देता था.
कोलकाता के जिस राजारहाट इलाके में वह रहता था, वहीं पर उस ने लगभग एक हजार वर्ग गज जमीन पर बना मकान 30 लाख रुपए में खरीदा था. उसे तोड़ कर उस ने लाखों रुपए खर्च कर के आलीशान कोठी बनवाई. इस कोठी के गृहप्रवेश वाले दिन ही वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया. राजकुमार ने बताया कि वह अब तक अलगअलग अस्पतालों में 50-50 किडनियां ट्रांसप्लांट करा चुका है.
यदि मोमिता मौली का अपने पति से झगड़ा नहीं हुआ होता तो शयाद बड़े पैमाने पर चल रहे इस रैकेट का पर्दाफाश नहीं हो पाता. दरअसल हुआ यह कि साथसाथ रहने से असीम और मोमिता के बीच नजदीकियां बढ़ गई थीं. इस के अलावा मोमिता की किडनी निकलवाने के जो पैसे मिले थे, वे उस के पति देवाशीष ने रख लिए थे. काफी कहने के बाद उस ने पत्नी को केवल एक लाख रुपए दिए थे. जबकि मोमिता सारे पैसे मांग रही थी.
इसी बात को ले कर उस की अस्पताल के बाहर पति से लड़ाई भी हो गई थी. उस समय उस के साथ असीम भी था. तब मोमिता गुस्से में असीम के साथ चली गई थी. देवाशीष को यह बात बहुत बुरी लगी और वह सरिता विहार थाने चला गया. देवाशीष से बात करने के बाद पुलिस ने जांच की तो मामला किडनी रैकेट के रूप में सामने आया.
पुलिस ने अपनी किडनी बेचने वाले कानपुर के उमेश श्रीवास्तव, उस की पत्नी नीलू श्रीवास्तव, भानुप्रताप और मोमिता मौली को भी गिरफ्तार कर लिया है. पुलिस को शक है कि अस्पताल में चल रहे इस रैकेट में अस्पताल के डाक्टर या अन्य स्टाफ भी शामिल हो सकते हैं. यदि उन के खिलाफ सुबूत मिला तो पुलिस उन से भी पूछताछ कर आवश्यक काररवाई करेगी.
रिमांड अवधि पूरी होने पर पुलिस ने सभी अभियुक्तों को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. अब सवाल यह उठता है कि क्या जिन मरीजों ने पैसे दे कर किडनी ट्रांसप्लांट कराई हैं, उन के खिलाफ भी पुलिस कोई काररवाई करेगी? मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी मनिंदर सिंह कर रहे हैं. Organ Trafficking
कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित






