Uttarakhand Crime: 2 बार राष्ट्रपति पदक से सम्मानित, उत्तराखंड और पूरे देश में इंस्टाग्राम अकाउंट पर ‘सिंगर इन खाकी’ नाम से मशहूर सिंगर और उत्तराखंड होमगार्ड सेवा में निदेशक होमगार्ड (डिप्टी कमांडेंट जनरल) अमिताभ श्रीवास्तव पर वरदी घोटाले का गंभीर आरोप लगा है. आखिर कौन हैं अमिताभ श्रीवास्तव और क्या है उत्तराखंड का बहुचर्चित होमगार्ड वरदी घोटाला?
उत्तराखंड राज्य की पहचान के कुछ प्रमुख स्तंभ हैं. इसे आध्यात्मिक केंद्र भी कहा जाता है. यहां पर हिंदुओं के 4 प्रमुख धाम केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री स्थित हैं. उत्तराखंड अपनी ऊंची हिमालय चोटियों, ग्लेशियरों और फूलों की घाटी के लिए भी जाना जाता है. यहां का ऋषिकेश शहर विश्व की योग राजधानी के रूप में प्रसिद्ध है. उत्तराखंड भारत की नदियों गंगा और यमुना का उद्गम स्थल भी है. इन्हीं सभी विशेषताओं के लिए उत्तराखंड को मुख्यरूप से ‘देवभूमि’ के रूप में भी जाना जाता है.
24 जनवरी, 2026 को जब प्रदेश के होमगार्ड एवं सिविल डिफेंस डिपार्टमेंट में होमगाड्र्स के लिए वरदी सामग्री की खरीद प्रक्रिया में 2 करोड़ रुपए के घोटाले की खबर सामने आई तो पूरे उत्तराखंड में हड़कंप सा मच गया था. यह बड़ा घोटाला वर्ष 2024-25 और 2025-26 के दौरान होमगाड्र्स की वरदी सामग्री की खरीद में अनियमितताओं से संबंधित था.
इस में तत्कालीन होमगाड्र्स एवं सिविल डिफेंस डिपार्टमेंट के निदेशक (डिप्टी कमांडेंट जनरल) अमिताभ श्रीवास्तव पर सीधासीधा आरोप लगाया गया था कि होमगार्ड की वरदी, जूते, जैकेट और डंडे जैसी सामग्रियों को बाजार दर से लगभग 3 गुना अधिक दाम पर खरीदा गया था, जिस से सरकारी खजाने को करीब 2 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था. उत्तराखंड के गृह सचिव शैलेश बगौली के अनुसार, इस गंभीर मामले में 15 दिन पहले कमांडेंट जनरल होमगार्ड का पत्र उन्हें प्राप्त हुआ था, जिस में बताया गया था कि होमगार्ड के डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए कई गंभीर अनियमितताएं की थीं.
गृह सचिव के अनुसार इस वित्तीय घोटाले की विस्तृत जांच के लिए शासन स्तर के अधिकारियों की एक विशेष टीम का गठन कर जांच शुरू कर दी गई है. इस मामले में होमगार्ड के कमांडेंट जनरल डा. पी.वी.के. प्रसाद ने दोषी अधिकारी के खिलाफ केस दर्ज कराने, 2 करोड़ रुपए की रिकवरी कराने के साथसाथ दोषी अधिकारी अमिताभ श्रीवास्तव को बरखास्त करने की रिपोर्ट भी शासन को भेजी है.
पटवारी भरती घोटाला
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद सब से पहला और चर्चित घोटाला पटवारी भरती घोटाला माना जाता है, जो पूर्व और दिवंगत मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी (2002-2007) के कार्यकाल में शुरुआती वर्षों में हुआ था. यह घोटाला मुख्यरूप से वर्ष 2002 में सामने आया था, इस में राजस्व विभाग में पटवारियों की भरती में बड़े पैमाने पर धांधली और भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे.

उत्तराखंड राज गठन के बाद पहला और चर्चित घोटाला पटवारी भरती का माना जाता है जो दिवंगत मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में हुआ था.
यह नवगठित राज्य के प्रशासनिक ढांचे पर पहला बड़ा दाग माना गया. इस मामले में पौड़ी के एक वरिष्ठ नौकरशाह (ब्यूरोक्रेट) की सेवाएं 2002 में ही समाप्त कर दी गई थीं. घोटाले की जांच के बाद कई नियुक्तियों को संदिग्ध पाया गया और प्रशासनिक स्तर पर काररवाई की गई. हालांकि समय गुजरने के साथसाथ यह मामला राजनीतिक आरोपोंप्रत्यारोपों में उलझ कर रह गया.
स्टर्डिया भूमि घोटाला
यह मामला वर्ष 2010 में पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के मुख्यमंत्री काल के दौरान सामने आया था. ऋषिकेश के वीरभद्र रोड पर स्थित 50.47 एकड़ जमीन 1960 में स्टर्डिया कैमिकल्स लिमिटेड को कैल्शियम कार्बोनेट फैक्ट्री लगाने को दी गई थी. इस में विवाद की वजह तब बनी, जब 1990 के दशक में फैक्ट्री बंद हो गई और कंपनी को बीमार घोषित कर दिया गया. इस के बाद इस औद्योगिक भूमि को स्टर्डिया डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड (एक बिल्डर कंपनी) को हस्तांतरित कर दिया गया.
इस में यह आरोप लगाया गया कि औद्योगिक उपयोग के लिए आवंटित इस बेशकीमती जमीन का उपयोग बदल कर इसे आवासीय और व्यावसायिक कौंप्लेक्स बनाने की गलत अनुमति दी गई और आवश्यक शुल्क में भी काफी भारी छूट दी गई, जिस के कारण सरकारी खजाने को कथित तौर पर 400 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था. इस के बाद उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इस हाउसिंग प्रोजेक्ट को रद्ïद कर दिया था और सरकार को इस जमीन को वापस अपने कब्जे में लेने का आदेश जारी किया.
बढ़ते विवाद और अदालती आदेशों के बाद राज्य सरकार ने इस मामले की जांच के लिए जस्टिस बी.सी. कांडपाल की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग का गठन किया, लेकिन चौतरफा दबाव के बाद तत्कालीन बीजेपी सरकार ने कंपनी को दी गई रियायतों और अनुमतियों को आखिरकार नोटिस जारी किया था. बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के मुख्यमंत्री काल (2009-2011) के दौरान जल विद्युत परियोजनाओं के आवंटन में कथित अनियमितताओं का मामला भी उत्तराखंड में काफी चर्चित रहा था.

उत्तराखंड राज गठन के बाद पहला और चर्चित घोटाला पटवारी भरती का माना जाता है जो दिवंगत मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में हुआ था.
इस में सरकार पर यह आरोप था कि सरकार ने वर्ष 2010 की शुरुआत में लगभग 56 लघु जल विद्युत परियोजनाओं का आवंटन निजी कंपनियों को नियमों को ताक पर रख कर किया था. इस में विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि आवंटन में ‘सेल्फ आइडेंटिफाइड’ रूट का गलत इस्तेमाल किया गया. यह भी आरोप लगाया गया कि कंपनी की वित्तीय क्षमता की जांच किए बिना और उचित नीलामी प्रक्रिया का पालन किए बिना आवंटन किया गया, जिस से सरकारी खजाने को करोड़ों का नुकसान हुआ.
चौतरफा राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद जुलाई 2010 में निशंक सरकार ने खुद ही इन 56 परियोजनाओं के आवंटन को रद्द कर दिया था.
एनएच-74 घोटाला
यह मुख्य घोटाला कांग्रेस पार्टी की हरीश रावत सरकार (2014-2017) के कार्यकाल के दौरान सामने आया था. यह घोटाला वर्ष 2011 से 2016 के बीच सितारगंज से हरिद्वार के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग-74 के चौड़ीकरण के दौरान हुआ. इस में कृषि भूमि को अवैध रूप से अकृषि (सेक्शन 43) दिखा कर मुआवजे की राशि को 8 से 10 गुना तो कहीं पर 20 गुना तक बढ़ा दिया गया था.

जिम कार्बेट की पाखरो रेंज में पर्यावरणीय भ्रष्टाचार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व वनमंत्री हरक सिंह रावत और तत्कालीन डीएफओ किशन चंद की भूमिका की कड़ी निंदा करते हुए इसे ‘सार्वजनिक विश्वास के सिद्धांत’ का उल्लंघन बताया था
इस घोटाले की जांच में लगभग 300 से 500 करोड़ रुपए की वित्तीय अनियमितता पाई गई थी. इस में आरोपी राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के अधिकारी, राजस्व विभाग के कर्मचारी, किसान और बिचौलिए सामने आए थे. इस मामले में 2 वरिष्ठ आईएएस अधिकारी पंकज कुमार पांडेय और चंद्रेश यादव को सितंबर 2018 में निलंबित किया गया था, हालांकि बाद में क्लीन चिट दे दी गई. इस घोटाले में 8 पीसीएस अधिकारी और 20 से अधिक राजस्व अधिकारियों को निलंबित या गिरफ्तार किया गया था.
सीबीआई ने इस मामले में जांच की और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लांडिंग के तहत केस दर्ज किया. जून, 2025 में ईडी ने वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी दिनेश प्रताप सिंह के ठिकानों पर छापेमारी कर 24.70 लाख रुपए नकद व अन्य दस्तावेज बरामद किए. गिरफ्तारी के डर से कई किसानों और भूस्वामियों ने अनुचित तरीके से प्राप्त अतिरिक्त मुआवजे की राशि प्रशासन को वापस करना शुरू कर दी थी. अभी भी इस केस में ईडी की छापेमारी जारी है, जिस में नए सबूत जुटाए जा रहे हैं.
जिम कार्बेट घोटाला
उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध जिम कार्बेट नैशनल पार्क को कौन नहीं जानता, लेकिन इस नैशनल पार्क की पाखरों रेंज में हुआ घोटाला देश के सब से चर्चित पर्यावरणीय और प्रशासनिक भ्रष्टाचारों में से एक रहा है. इस में नियमों को ताक पर रख कर अवैध निर्माण और जंगलों के अवैध कटान का गंभीर आरोप है. इस में टाइगर सफारी प्रोजेक्ट के नाम पर केवल 163 पेड़ों को काटने की अनुमति मिली थी, लेकिन जांच में पाया गया कि यहां पर 6 हजार से भी अधिक पेड़ अवैध रूप से काट दिए गए थे.
दूसरा गंभीर आरोप यह था कि बिना किसी वित्तीय या वैधानिक स्वीकृति के कंक्रीट के अवैध भवन, गेस्टहाउस और सड़कों का अवैध रूप से निर्माण कराया गया था. इस गंभीर घोटाले में लगभग 215 करोड़ रुपए के फंड के दुरुपयोग और मनी लांड्रिंग के आरोप लगे. इस घोटाले में उच्चतम न्यायालय ने पूर्व वनमंत्री हरक सिंह रावत और तत्कालीन डीएफओ किशन चंद की भूमिका की कड़ी निंदा करते हुए इसे ‘सार्वजनिक विश्वास के सिद्धांत’ का उल्लंघन बताया.
सीबीआई इस मामले में सितंबर 2023 से जांच कर रही है. सीबीआई ने इस मामले में 5 अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए शासन से अनुमति मांगी है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नवंबर 2025 को निर्देश दिया कि पार्क के भीतर सभी अवैध कंक्रीट संरचनाओं को 3 महीने के भीतर ढहा दिया जाए और पर्यावरणीय क्षति की भरपाई की जाए. ईडी ने मनी लांड्रिंग की जांच करते हुए डीएफओ रहे किशन चंद की 31.8 करोड़ की संपत्ति कुर्क की है और चार्जशीट भी दाखिल कर दी है.
इस मामले में पूर्व वनमंत्री हरक सिंह रावत के ठिकानों पर फरवरी, 2024 में ईडी ने छापेमारी की और हाल ही में जनवरी 2026 में ईडी ने इस मामले से जुड़ी करोड़ों की संपत्ति भी अटैच की है.
पेपर लीक घोटाला
उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूकेएसएसएससी) पेपर लीक घोटाला मुख्यरूप से 2025 की स्नातक स्तरीय भरती परीक्षा में हुई धांधली से जुड़ा हुआ है. 21 सितंबर, 2025 को आयोजित स्नातक स्तरीय भरती परीक्षा जिस में 416 पदों के लिए आवेदन किए गए थे, इसी दौरान हरिद्वार के एक केंद्र से प्रश्नपत्र के 3 पन्ने वाट्सऐप पर वायरल हो गए थे. इस की जांच में यह बात सामने आई कि मुख्य आरोपी खालिद मलिक ने परीक्षा हौल से अपने मोबाइल फोन के जरिए प्रश्नपत्र की फोटो खींची और अपनी बहन साबिया को भेजी. यह प्रश्नपत्र इस के बाद टिहरी की असिस्टेंट प्रोफेसर सुमन चौहान को भेजा गया, जिन्होंने प्रश्नों को हल कर के वापस भेजा था.

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत (बाएं) स्टिंग औपरेशन केवल उत्तराखंड राज्य में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में चर्चित रहा था. यह स्टिंग औपरेशन उमेश कुमार (दाहिने- समाचार प्लस चैनल के तत्कालीन सीईओ और वर्तमान में खानपुर से निर्दलीय विधायक) द्वारा किया गया था.
इस के बाद भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद यूकेएसएसएससी ने 11 अक्तूबर, 2025 को इस परीक्षा को निरस्त कर दिया और घोषणा की थी कि अगले 3 महीनों के भीतर यह परीक्षा पुन: आयोजित की जाएगी. इस के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी की सिफारिश पर यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया. सीबीआई ने इस मामले में अक्तूबर 2025 के अंत में आधिकारिक रूप से अपनी जांच शुरू की थी. इस प्रकरण में अब तक मुख्य मास्टरमाइंड खालिद मलिक और उस की बहन साबिया को गिरफ्तार किया जा चुका है.
असिस्टेंट प्रोफेसर सुमन चौहान को सीबीआई नवंबर 2025 में गिरफ्तार कर चुकी है. पुराने पेपर लीक मामलों के आरोपी रहे हाकम सिंह को भी इस साजिश में संलिप्तता के संदेह में गिरफ्तार किया जा चुका है. इस प्रकरण में ड्यूटी पर लापरवाही बरतने के आरोप में सेक्टर मजिस्ट्रैट के.एन. तिवारी और 2 पुलिसकर्मियों को भी निलंबित किया जा चुका है. प्रदेश सरकार ने राज्य में कड़ा नकल विरोधी कानून (एंटी चीटिंग एक्ट) लागू कर दिया है, जिस के तहत दोषियों को उम्रकैद और करोड़ों रुपए के जुरमाने का प्रावधान किया गया है.
रावत स्टिंग औपरेशन
उत्तराखंड का बहुचर्चित मुख्यमंत्री हरीश रावत स्टिंग औपरेशन केवल उत्तराखंड राज्य में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में चर्चित रहा था. यह स्टिंग औपरेशन 2016 के राजनीतिक संकट से जुड़ा हुआ है, जब कांग्रेस के 9 विधायकों ने बगावत कर दी थी. इस प्रकरण में एक वीडियो सार्वजनिक रूप से सामने आया था, जिस में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत कथित तौर पर अपनी सरकार बचाने के लिए बागी विधायकों को रिश्वत के तौर पर (करीब 5 से 7 करोड़ रुपए) देने और ‘हौर्स ट्रेडिंग’ (विधायकों की खरीदफरोख्त) की बात स्पष्ट रूप से करते नजर आए थे.
इस मामले के सामने आने के तुरंत बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था, हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से हुए शक्ति परीक्षण (फ्लोर टेस्ट) में कांग्रेस के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बहुमत साबित कर दिया और उन की सरकार फिर से बहाल हो गई थी. यह स्टिंग औपरेशन उमेश कुमार (समाचार प्लस चैनल के तत्कालीन सीईओ और वर्तमान में खानपुर से निर्दलीय विधायक) द्वारा किया गया था. इस वीडियो को कांग्रेस के बागी विधायकों में से हरक सिंह रावत ने सार्वजनिक किया था.
यह मामला अभी भी पूरी तरह से निस्तारित नहीं हुआ है और सीबीआई अभी भी इस प्रकरण की जांच कर रही है. सीबीआई ने सितंबर 2025 में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को एक और नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए तलब किया था. यह गंभीर मामला अभी भी अदालत और जांच एजेंसी के बीच लंबित है. पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत इसे राजनीति से प्रेरित बताते हैं और उन्होंने अपने बयानों में कहा भी है कि चुनाव नजदीक आते ही उन्हें नोटिस थमा दिए जाते हैं.
पकड़ में आया घोटाला
डा. पी.वी.के. प्रसाद (पालोली वेंकट कृष्ण प्रसाद) भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के एक अत्यंत विनम्र, कर्मठ, वरिष्ठ और ईमानदार पुलिस अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं. डा. पी.वी.के. प्रसाद मूलरूप से आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं और वह 1995 बैच के उत्तराखंड कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं. 8 जनवरी, 2025 से वह उत्तराखंड के कमांडेंट जनरल (होमगार्ड और नागरिक सुरक्षा) के पद पर कार्यरत हैं.
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बौलीवुड के चर्चित कलाकारों के साथ तथा किसी अवसर पर अपनी गायिकी का जलवा बिखेरते अभिताभ श्रीवास्तव
दिसंबर 2014 में उन्हें उत्तराखंड का पहला आईजी (जेल) नियुक्त किया गया था. वह उत्तराखंड के विभिन्न जिलों, पिथौरागढ़ आदि में एसपी के रूप में सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने एडीजी सीबीसीआईडी और एडीजी पीएसी जैसे प्रमुख पदों पर भी कार्य किया है. डा. पी.वी.के. प्रसाद को अपनी सख्त छवि और पारदर्शी कार्यशैली के रूप में भी जाना जाता है. उन की विशिष्ट सेवाओं के लिए उन्हें 2021 में प्रतिष्ठित राष्ट्रपति पुलिस पदक से भी सम्मानित किया जा चुका है.
डा. पी.वी.के. प्रसाद ने होमगार्ड और नागरिक सुरक्षा विभाग का कार्यभार संभालने के बाद वरदी खरीद की फाइलों की समीक्षा की तो उन का माथा ठनका कि वरदी के दाम तो काफी ऊंची दर पर खरीदे गए थे. उन्होंने पाया कि वित्तीय वर्ष 2024-25 एक करोड़ रुपए की वरदी और सामग्री को लगभग 3 करोड़ रुपए के ऊंचे दामों पर खरीदा गया था.
उस के बाद जब वर्ष 2025-26 के लिए उसी महंगी दर पर टेंडर जारी किए गए तो उन्होंने बाजार भाव और टेंडर दरों में भारी अंतर देखा. इसी अंतर पर कमांडेंट जनरल को संदेह हो गया और उन्होंने तुरंत टेंडर निरस्त कर दिए और इस पर जांच के आदेश दे दिए. जब बाजार से कोटेशन मंगाए गए तो घोटाले की पूरी तसवीर ही साफ हो गई. बाजार भाव और टेंडर की राशि को देख कर सब की आंखें खुली की खुली रह गई थीं. होमगार्ड के सिपाही का लकड़ी का डंडा जोकि बाजार भाव में 130 रुपए का था, उसे 375 रुपए में खरीदा गया था.
होमगार्ड के 500 रुपए के जूते 1500 रुपए में खरीदे गए थे. पैंट शर्ट जोकि बाजार भाव में 1200 रुपए की थी, उस वरदी को 3000 रुपए में खरीदा गया था. 500 रुपए की जैकेट को 1580 रुपए में खरीदा गया था. बाजार भाव और खरीद मूल्य के बीच का अंतर इतना बड़ा था कि भ्रष्टाचार की पुष्टि हो गई. जांच टीम की रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई कि यह घोटाला अकेले किसी एक व्यक्ति का नहीं था, बल्कि ठेकेदार और अधिकारियों की मिलीभगत से किया गया था.
कमांडेंट जनरल डा. पी.वी.के. प्रसाद ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंपी, जिस में डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव की संलिप्तता का उल्लेख किया गया था. डा. पी.वी.के. प्रसाद की सिफारिश पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया.
कौन हैं अमिताभ
उत्तराखंड और देश में ‘सिंगर इन खाकी’ नाम से मशहूर पूर्व डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव होमगार्ड का विवादों से पुराना नाता रहा है. अमिताभ श्रीवास्तव जो होमगार्ड सेवा में डिप्टी कमांडेंट जनरल के पद पर थे, उन पर यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अपनी निजी गाड़ी पर पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) स्तर के स्टार और चिह्न लगाए थे. यह विवाद मुख्यरूप से उन के पद और उन के अनुरूप मिलने वाले आधिकारिक विशेषाधिकारों के उल्लंघन से जुड़ा था.
नियमों के अनुसार, होमगार्ड और नागरिक सुरक्षा सेवा के अधिकारियों के लिए रैंक और गाड़ी पर चिह्नï लगाने का अलग से प्रावधान किया गया है. उन पर आरोप लगा था कि वह खुद को पुलिस के डीआईजी के समान दर्शा रहे थे, जोकि सेवा नियमावली के खिलाफ था. उच्च अधिकारियों जैसे कमांडेंट जनरल के सरकारी वाहनों के आगे और पीछे काली प्लेट पर एक 5 कोने का सफेद धातु का स्टार लगाया जाता है. वाहन के बोनट पर लालकाले रंग में राज्य सरकार के मोनोग्राम के साथ झंडा लगाने का प्रावधान है. इस का आकार पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) के वाहन पर लगाए जाने वाले झंडे के समान होता है.
मोटर वाहन अधिनियम 1988 और सेना/पुलिस के विभिन्न आदेशों के अनुसार, किसी भी अधिकारी को अपनी निजी गाड़ी पर विभाग का नाम (जैसे होमगाड्र्स), पद का नाम या सरकारी प्रतीक चिह्न लगाने की अनुमति नहीं है. उत्तराखंड होमगार्ड के पूर्व डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव, जिन्हें सोशल मीडिया पर ‘सिंगर इन खाकी’ के नाम से जाना जाता है. वह अपनी सुरीली गायकी के लिए काफी प्रसिद्ध रहे हैं.
अमिताभ श्रीवास्तव का संगीत के प्रति जुनून काफी पुराना रहा है और वह काफी लंबे समय से मंचों पर अपनी गायकी का प्रदर्शन करते रहे हैं. उन की शैली रोमांटिक और भावुक गाने की रही है, उन्होंने 15 अगस्त, 2024 को अपना पहला आधिकारिक कवर सांग रिलीज किया था. अमिताभ श्रीवास्तव का पहला ओरिजिनल गाना ‘दुआ न दो’ रिलीज हो चुका है. अगस्त 2025 उन का नया गाना ‘ये बारिश’ गीत उन सभी के लिए एक खूबसूरत सौगात है, जो अपने पुराने प्यार की यादों में खोए रहते हैं.
सोशल मीडिया पर अमिताभ श्रीवास्तव काफी ऐक्टिव भी रहते हैं और अकसर अपने गाने के वीडियो शेयर करते रहते हैं. ऐसा पहली बार सामने आया था कि वह किसी बड़े बैनर के तहत गाना गा रहे थे. इस के अतिरिक्त निलंबित डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव को वर्ष 2017 में मेधावी सेवा के लिए ‘राष्ट्रपति होमगार्ड पदक’ और जनवरी 2023 मे विशिष्ट सेवा के लिए ‘राष्ट्रपति होमगार्ड पदक’ से भी सम्मानित किया जा चुका है.
घोटाले में छिपे हैं राज
इधर इस प्रकरण के सामने आने के बाद होमगार्ड के डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव को निलंबित भी कर दिया गया है. अब इस निलंबन के बाद कई सवाल सामने आ कर खड़े हो गए हैं, जिन का जबाब अभी भी एक पहेली सी बना हुआ है. अब मीडिया और जनता के सामने सवाल तैर रहे हैं कि होमगार्ड विभाग में वरदी घोटाला सच है या फिर कोई गहरी साजिश है? उत्तराखंड अधिप्राप्ति नियमावली में 5 लाख से अधिक मूल्य की समस्त सामग्रियों की अधिप्राप्ति हेतु शासकीय पद्धति का पालन करना सभी इकाइयों के लिए अनिवार्य किया गया है.
अब सवाल यह उठता है कि ई टेंडर निकालने की लिखित स्वीकृति विभागाध्यक्ष द्वारा दी जाती है तो यह पता चला कि इस केस में भी ऐसा ही हुआ था. बात यह है कि क्या ई टेंडर को लोग अधिप्राप्ति पोर्टल और 2 समाचार पत्रों में निकाला जाता है. ई टेंडर में इन्हीं निविदादाताओं के प्रकरणों पर विचार किया जाता है, जिन के द्वारा उस में प्रतिभाग किया गया था. पता चला है कि यहां पर भी कुछ ऐसा ही हुआ था. ध्यान देने वाली बात यह भी है कि क्या तकनीकी और वित्तीय निविदा मूल्यांकन रिपोर्ट को मूल्यांकन समीक्षा समिति के सभी सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर भी किए जाने का प्रावधान है? यहां पर इस केस में भी ऐसा ही हुआ भी था.
इस प्रकरण में गोपनीय जांच का उजागर होना भी सवाल के घेरे में है. साथ ही इस की वजह से विभाग, शासन और सरकार की छवि भी कहीं न कहीं धूमिल भी हुई है. अब यह बात भी उठ रही है कि यदि सरकार के मुखिया इस मामले की जांच कुछ बड़े ईमानदार छवि वाले अधिकारियों की एसआईटी बना कर कराएं तो उस से और भी कई अन्य काले सच उजागर हो सकते हैं. Uttarakhand Crime






