Gujarat Fraud Case: संजय शर्मा ने अपने भाई और अन्य लोगों के साथ मिल कर ठगी की एक कंपनी बना रखी थी. जिस के माध्यम से उन्होंने न जाने कितने लोगों को तो ठगा ही, अपने रिश्तेदार नरेश शर्मा से भी 400 करोड़ लोन दिलाने के नाम पर साढ़े 12 करोड़ रुपए ठग लिए. लेकिन इस बार ऐसे फंसे कि…

गुजरात के कच्छ जिले के रहने वाले नरेश कुमार शर्मा का कोयले का बहुत बड़ा व्यापार है. कच्छ के ही गांधीधाम में उन की बालाजी कोक इंडस्ट्री प्रा.लि., श्री कोक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी प्रा.लि. और तिरुपति फ्यूल्स प्रा.लि. नाम की कंपनियां हैं. इन कंपनियों को वह अपने भाई रमेश शर्मा के साथ देखते हैं. 200-250 करोड़ रुपए के टर्नओवर वाली तीनों कंपनियों में करीब 80-90 लोग काम करते हैं. नरेश शर्मा का कारोबार पहले तो अच्छा चल रहा था, लेकिन पिछले कई सालों से उन के कारोबार में अचानक गिरावट आने लगी थी, जिस की वजह से दोनों भाई परेशान रहने लगे थे.

कारोबार में उतारचढ़ाव आना स्वभाविक बात है, लेकिन ज्यादा दिनों तक गिरावट इंडस्ट्री के लिए ठीक नहीं रहती. इसलिए दोनों भाई परेशान रहने लगे थे. ऐसी हालत में उन्होंने स्थानीय बैंकों से लोन ले कर अपनी कंपनियों को पहले की स्थिति में लाने की कोशिश की. लेकिन काफी कोशिश के बावजूद भी उन की तीनों कंपनियों की दशा नहीं सुधर रही थी. उन की इंडस्ट्रीज में जो मशीनें लगी थीं, वे पुरानी हो चुकी थीं. वे उन का आधुनिकीकरण करना चाहते थे. इस के लिए भी पैसों की जरूरत थी, जो उन के पास नहीं था. वे चाह रहे थे कि अगर उन्हें कहीं से 400-500 करोड़ का लोन मिल जाए तो उन की कंपनियां फिर से लाइन पर आ जाएं. बैंकों से वह पहले ही लोन ले चुके थे, इसलिए वहां से लोन मिलने की उम्मीद उन्होंने छोड़ दी थी.

रमेश शर्मा संजय शर्मा भारद्वाज नाम के एक आदमी को जानता था. वह रमेश शर्मा के साले का बेटा था. वह पूर्वी मुंबई के कांदिवली इलाके में रहता था और कारपोरेट लोन दिलाने का काम करता था. रमेश शर्मा ने संजय शर्मा के बारे में अपने भाई नरेश शर्मा को बताया. चूंकि नरेश शर्मा को पैसों की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने अपने भाई से कह दिया कि वह संजय शर्मा से इस बारे में बात कर लें. इस के बाद रमेश शर्मा ने फोन पर संजय शर्मा से बात की तो उस ने कहा, ‘‘फूफाजी, हमारी डेल्टा फिनलीज नाम की एक कंपनी है, जिस का औफिस दहिसर (पूर्वी), मुंबई में है. इस कंपनी द्वारा हम बड़ीबड़ी कंपनियों को लोन दिलाते हैं. लोन की राशि कम से कम 100 करोड़ रुपए होनी चाहिए.’’

संजय की बात सुन कर रमेश शर्मा खुश हुए, क्योंकि उन्हें 100 करोड़ से ज्यादा की जरूरत थी. इसलिए उन्होंने संजय शर्मा से कहा, ‘‘हमें 400 करोड़ के लोन की जरूरत है. यह तुम हमें दिलवा दो.’’

इस बातचीत के कुछ दिनों बाद ही संजय शर्मा की बहन के बच्चे का मुंडन था. उस की बहन दक्षिणी दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाके में रहती थी. इस कार्यक्रम में संजय शर्मा के अलावा नरेश शर्मा के परिवार वालों को भी आमंत्रित किया गया था. नरेश शर्मा को चूंकि संजय शर्मा से लोन के बारे में बातचीत करनी थी, इसलिए वह भी अपने परिवार के साथ इस मुंडन में शामिल हुए.

वहीं पर नरेश शर्मा ने संजय शर्मा भारद्वाज से लोन के सिलसिले में डिटेल में बात की. उस समय संजय का भाई साकेत शर्मा भारद्वाज और उस के पिता ओमप्रकाश भारद्वाज भी मौजूद थे. संजय ने कहा, ‘‘फूफाजी, हमारी कंपनी का ग्लोबल फाइनैंशियल कारपोरेशन के नाम की कंपनी के साथ टाईअप है. यह कपंनी थाईलैंड के रहने वाले डेविड वेल्हम की है. भारत में इस कंपनी की फ्रेंचाइजी हमारे पास है. मैं आप की कंपनी के पदाधिकारियों के साथ मीटिंग करा दूंगा.’’

‘‘आप जल्द से जल्द हमारी उन से मीटिंग करा दें.’’ नरेश शर्मा ने कहा.

‘‘आप चिंता न करें. मैं डेविड वेल्हम से कहता हूं कि वह समय निकाल कर जल्द ही इंडिया आ कर मीटिंग कर लें.’’ संजय शर्मा भारद्वाज ने कहा.

संजय शर्मा ने डेविड से बात करने के बाद 3 मई, 2012 को मीटिंग का कार्यक्रम निश्चित कर लिया. मीटिंग के लिए दक्षिणी दिल्ली के ओखला स्थित पांच सितारा होटल क्राउन प्लाजा को चुना गया. निर्धारित समय पर नरेश शर्मा अपने भाई और कंपनी के महत्वपूर्ण कागजातों के साथ होटल क्राउन प्लाजा पहुंच गए. संजय शर्मा भारद्वाज और उस के भाई साकेत शर्मा भारद्वाज ने नरेश शर्मा और रमेश शर्मा की मुलाकात डेविड वेल्हम से कराई. डेविड वेल्हम के साथ और भी कई लोग थे. डेविड ने उन का परिचय राज मल्होत्रा, पूजा कक्कड़ और एडवोकेट नीरज गुप्ता के रूप में कराया.

डेविड ने बताया कि उन की कंपनी का कारोबार पूरे संसार में फैला है, जिसे कंपनी के 70 प्रबंधकीय सदस्य देख रहे हैं. दिल्ली में कंपनी का काम राज मल्होत्रा, पूजा कक्कड़ और एडवोकेट नीरज गुप्ता देख रहे हैं. डेविड की बात की पुष्टि संजय शर्मा भारद्वाज ने भी की. लोन के बारे में बात हुई तो एडवोकेट नीरज गुप्ता ने कहा कि आप जो 400 करोड़ का लोन लेना चाहते हैं, उस में 300 करोड़ रुपए पर साढ़े 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज और शेष 100 करोड़ रुपए पर 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगेगा. यह लोन उन्हें 9 साल के अंदर अदा करना होगा. लेकिन कंपनी के नियम के अनुसार, उन्हें 400 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की संपत्ति कंपनी के पास गिरवी रखनी होगी. लोन की साढ़े 3 प्रतिशत प्रौसेसिंग फीस उन्हें अलग से देनी होगी.

डील तय हो जाने के बाद डेविड वेल्हम ने कहा, ‘‘मिस्टर नरेश शर्मा, यह काररवाई आगे बढ़ने से पहले कुछ कागजी औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी. उस के लिए हमारे सीए वगैरह आप की कंपनी का दौरा कर के कुछ कागजों को देखेंगे. इसलिए हम चाहते हैं कि आप जल्द से जल्द यह काम करा दें, ताकि आप की फाइल आगे बढ़ सके.’’

नरेश शर्मा चाहते थे कि सारी औपचारिकताएं जल्दी पूरी हो जाएं, जिस से उन्हें जल्दी लोन मिल जाए. इसलिए उन्होंने कह दिया, ‘‘बेशक, आप को जो भी डाक्यूमेंट्स देखने हैं, देख लीजिए. हमारे सभी डाक्यूमेंट्स तैयार हैं.’’

इस के बाद जून में ग्लोबल फाइनैंशियल कारपोरेशन की एक टीम नरेश शर्मा की कंपनियों की जांच के लिए कच्छ पहुंच गई. टीम में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स और वकीलों के अलावा कुछ विशेषज्ञ भी शामिल थे. कंपनी ने उन की तीनों कंपनियों के स्टाक, इनकम टैक्स रिटर्न की फाइलों को देखा. टीम ने यह भी देखा कि मौजूदा समय में उन की तीनों कंपनियों की संपत्ति की वैल्यू क्या है. नरेश शर्मा लोन के एवज में जिस संपत्ति को गिरवी रख रहे थे, उस के कागजों की भी जांच की गई. इस के अलावा आसपास की बैंकों से भी यह जानने की कोशिश की गई कि उन कंपनियों पर कितना लोन बकाया है. सारी जांचें पूरी करने के बाद टीम ने अपनी रिपोर्ट कंपनी को दे दी.

टीम ने अपनी जो रिपोर्ट कंपनी को दी थी, उस में बताया गया था कि नरेश शर्मा की तीनों कंपनियों की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है. इस के अलावा उन कंपनियों पर पहले से ही बैंकों का करोड़ों रुपए बकाया है. गिरवी के जो पेपर हैं, वे भी पूरे नहीं हैं. इस स्थिति में इन कंपनियों को 400 करोड़ रुपए का लोन नहीं दिया जा सकता. संजय शर्मा भारद्वाज ने यह खबर अपने फूफा नरेश शर्मा को दी तो वह परेशान हो गए. परेशान होने की बात भी थी, क्योंकि उन्हें संजय के ऊपर भरोसा था कि वह उन का लोन मंजूर करा देगा. लोन का पैसा किसकिस मद में कितना खर्च करना है, वह इस की योजना भी बना चुके थे. इसलिए उन्होंने संजय से कहा कि लोन के कागजात पूरे करने के लिए जो भी पैसे खर्च होंगे, वह खर्च करने को तैयार हैं. किसी भी तरह वह उन्हें लोन दिला दे.

‘‘फूफाजी, टीम ने जो रिपोर्ट दी है, उस में सब से ज्यादा महत्वपूर्ण गिरवी के कागजात हैं. बस वे कागज पूरे हो जाएं तो आगे की काररवाई मैं करा दूंगा. आप जो लोन ले रहे हैं, उस की प्रौसेसिंग फीस साढ़े 3 प्रतिशत के हिसाब से 14 करोड़ रुपए होती है. ऐसा कीजिए, आप उस में से एक करोड़ रुपए जमा करा दीजिए. गिरवी के कागजों के लिए मैं किसी और से बात करता हूं.’’ संजय शर्मा भारद्वाज ने कहा.

नरेश को प्रौसेसिंग फीस देनी ही थी, इसलिए उन्होंने संजय शर्मा के कहने पर एक करोड़ का चैक परवेज के नाम से काट दिया. परवेज फरीदाबाद में रहता था और संजय का साथी था. कुछ दिनों बाद संजय शर्मा ने कहा कि उस की नोएडा के धर्मजीत नाम के एक आदमी से बात हुई है, वह अपनी प्रौपर्टी के कागज आप के लोन के लिए गिरवी रख देगा. लेकिन इस में करीब 10 करोड़ रुपए खर्च होंगे. नरेश शर्मा तैयार हो गए. उन्होंने ओखला के उसी क्राउन प्लाजा होटल में फिर से संजय शर्मा, डेविड वेल्हम, राज मल्होत्रा, पूजा कक्कड़, नीरज गुप्ता आदि के साथ मीटिंग की और 10 करोड़ रुपए गिरवी पेपरों के एवज में दे दिए.

लोन की सारी औपचारिकताएं लगभग पूरी हो चुकी थीं. नरेश शर्मा को उम्मीद थी कि अब उन्हें लोन मिल जाएगा. संजय शर्मा ने उन से 2 करोड़ रुपए और ले लिए. साथ ही यह भी कहा कि प्रौसेसिंग फीस के जो 11 करोड़ रुपए बचे हैं, वे लोन मिलने के बाद दे देना. संजय की यह बात सुन कर नरेश शर्मा खुश हुए, क्योंकि हर एक कंपनी अपनी प्रौसेसिंग फीस पहले लेती है, लेकिन ग्लोबल फाइनैंशियल कारपोरेशन कंपनी उन से प्रौसेसिंग फीस केवल संजय शर्मा की वजह से बाद में लेने की बात कह रही थी. नरेश शर्मा इस के लिए संजय शर्मा को धन्यवाद दे रहे थे.

नरेश शर्मा का कोई मामला आस्ट्रेलिया के न्यायालय में चल रहा था. चूंकि डेविड वेल्हम का अपनी कंपनी के काम की वजह से अलगअलग देशों में जाना लगा रहता था, इसलिए डेविड से अपने आस्ट्रेलिया वाले मामले पर बात की. डेविड ने भरोसा दिया कि वह इस मामले को निपटवा देगा, लेकिन दूसरे पक्ष को तैयार करने के लिए कुछ खर्चा करना होगा. नरेश शर्मा आस्ट्रेलिया वाले मामले को निपटवाना चाहते थे. उन्होंने डेविड से बात कर के उसे 50 लाख रुपए दे दिए. वह इन लोगों को कुल मिला कर साढ़े 12 करोड़ रुपए दे चुके थे. उन की संजय और अन्य लोगों से फोन पर बातचीत होती रहती थी. संजय बताता रहता था कि लोन की फाइल पर किसकिस के हस्ताक्षर होने बाकी हैं, उन का यह काम जल्द हो जाएगा.

एक दिन संजय ने उन्हें फोन कर के उन का लोन मंजूर होने की जानकारी दी, साथ ही यह भी बता दिया कि बड़ौदा की किसी कंपनी ने उन की कंपनी से लोन ले रखा था, वह उस लोन के 50 करोड़ रुपए कैश के रूप में दे रही है. जैसे ही वहां से पैसे मिलेंगे, आप के पास पहुंचा दिए जाएंगे, बाकी के पैसे आप की बालाजी कोल इंडस्ट्री के बैंक खाते में पहुंच जाएंगे. यह खबर सुन कर नरेश शर्मा और रमेश शर्मा बेहद खुश हुए. उन्होंने अपनी इंडस्ट्री के आधुनिकीकरण की जो योजना बना रखी थी, उस के साकार होने की शुरुआत होने वाली थी. अब केवल उन्हें पैसे आने का इंतजार था. पैसे मिलते ही वह यह काम कराने को आतुर थे.

लोन मंजूर होने के करीब 15 दिनों बाद भी नरेश शर्मा की कंपनी के खाते में पैसे नहीं पहुंचे, वह नकदी भी नहीं आई, जो बड़ौदा से आनी थी. तब उन्होंने संजय शर्मा से फोन पर बात की. संजय शर्मा उन्हें कोई न कोई बहाना बना कर टालता रहा. इसी तरह कई महीने बीते गए. नरेश शर्मा समझ नहीं पा रहे थे कि जब उन का लोन मंजूर हो गया है तो उसे देने में देर क्यों की जा रही है. चूंकि संजय शर्मा उन का रिश्तेदार था, इसलिए वे उस से अपनी नाराजगी भी नहीं जता पा रहे थे. किसी तरह वे उस की बातों पर विश्वास करते रहे.

शक तो उन्हें तब हुआ, जब दिसंबर, 2013 में एक दिन उस का मोबाइल स्विच्ड औफ हो गया. फोन के लगातार स्विच्ड औफ होने पर रमेश शर्मा भी परेशान हुए, क्योंकि संजय उन के साले ओमप्रकाश भारद्वाज का बेटा था. उन्होंने ओमप्रकाश और उन के दूसरे बेटे साकेत शर्मा को फोन मिलाया तो उन के फोन भी बंद पाए गए. नरेश शर्मा ने संजय के साथियों के फोन पर बात करनी चाही तो उन के नंबर भी स्विच्ड औफ या पहुंच से दूर बताए गए. इस से उन्हें अपने साथ धोखाधड़ी होने का अहसास हुआ.

नरेश शर्मा उन लोगों को साढ़े 12 करोड़ रुपए से अधिक दे चुके थे. यह रकम कोई मामूली रकम नहीं थी, लिहाजा उन्होंने उन लोगों की पहले तो अपने स्तर से खोजबीन की, लेकिन जब उन्हें कोई सफलता नहीं मिली तो उन्होंने सन 2014 में दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त सतीश गोलचा से मुलाकात कर अपने साथ की गई धोखाधड़ी की जानकारी विस्तार से दी.

संजय शर्मा भारद्वाज, सकेत शर्मा भारद्वाज, आदि के नाम सुन कर संयुक्त आयुक्त चौंके, क्योंकि इन्हीं लोगों के खिलाफ सन 2009 में विन पौवर मार्केटिंग प्रा.लि. और सिंधी केबल एंड कंडक्टर्स प्रा.लि. नाम की कंपनियों के निदेशक अशोक कुमार अग्रवाल ने आर्थिक अपराध शाखा में रिपोर्ट दर्ज कराई थी. अशोक कुमार अग्रवाल का कहना था कि उन की कंपनी को पौवर ग्रिड कारपोरेशन औफ इंडिया, आसाम स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड, डिपार्टमेंट औफ पौवर नागालैंड की विभिन्न परियोजनाओं का कौन्ट्रैक्ट मिलना था.

इस कौन्ट्रैक्ट के लिए इन कंपनियों ने 33 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी मांगी थी. यह गारंटी उन्हें 15 से 30 दिनों के अदंर देनी थी. इतनी जल्दी यह गारंटी उपलब्ध कराना उन के लिए आसान नहीं था. फिर भी वह किसी तरह से बैंक गारंटी उपलब्ध कराने की कोशिश करने लगे. उन्हीं दिनों 22 फरवरी, 2009 को उन्होंने अंगरेजी समाचार पत्र ‘द टाइम्स औफ इंडिया’ में एसएस कैपिटल एंड फाइनैंशियल सर्विस का एक विज्ञापन देखा, जिस में हर तरह के लोन, बैंक गारंटी आदि उपलब्ध कराने को कहा गया था. इस विज्ञापन में दिए गए पते पर अशोक कुमार अग्रवाल ने संपर्क किया तो उन की ओमप्रकाश भारद्वाज से बात हुई. उन्होंने ही अशोक कुमार अग्रवाल को कंपनी के औफिस में बात करने के लिए बुलाया.

इस कंपनी का औफिस दक्षिणपूर्व दिल्ली के खानपुर स्थित देवली रोड पर था. अशोक कुमार अग्रवाल औफिस पहुंचे तो वहां पर ओमप्रकाश भारद्वाज और उन के दोनों बेटे संजय शर्मा भारद्वाज और साकेत शर्मा भारद्वाज मिले. इन लोगों से उन्होंने बैंक गारंटी के संबंध में बात की तो उन लोगों ने बैंक गारंटी उपलब्ध कराने के नाम पर उन से 1,09,22,380 रुपए मांगे. रुपए मिलने के बाद उन्होंने विभिन्न 27 बैंकों की गारंटी के पेपर अशोक कुमार अग्रवाल को दे दिए.

जिन कंपनियों से अशोक कुमार अग्रवाल की कंपनी के लिए कौंट्रैक्ट की बात चल रही थी, वहां पर उन्होंने ओमप्रकाश भारद्वाज से मिले बैंक गांरटी के पेपर जमा करा दिए. बैंक गारंटी के पेपरों की जांच की गई तो वे फरजी पाए गए. उन्होंने शिकायत के लिए ओमप्रकाश भारद्वाज से संपर्क करना चाहा तो उन का और उन के बेटों का फोन बंद मिला, साथ ही खानपुर के औफिस पर भी ताला लग गया था. ठगी का अहसास होने पर अशोक कुमार अग्रवाल ने इस की शिकायत संयुक्त आयुक्त सतीश गोलचा से की. इस के बाद नामजद आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धारा 406/420/467/468/471/120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया और मामले की जांच सबइंसपेक्टर उमेश शर्मा को सौंप दी गई थी.

धोखाधड़ी का यह मामला भी संजय शर्मा भारद्वाज और उस के साथियों द्वारा अंजाम दिया गया था, इसलिए संयुक्त आयुक्त सतीश गोलचा ने नरेश शर्मा वाले मामले को भी आर्थिक अपराध शाखा को सौंप दिया. उन के आदेश पर 17 दिसंबर, 2014 को आर्थिक अपराध शाखा में संजय शर्मा भारद्वाज, साकेत शर्मा भारद्वाज, डेविड वेल्हम, नीरज गुप्ता, राज मल्होत्रा उर्फ अरुण शर्मा आदि के खिलाफ भादंवि की धारा 406/420/120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस मामले की भी जांच सबइंसपेक्टर उमेश शर्मा को सौंपी गई.

पुलिस आयुक्त ने इन की गिरफ्तारी पर 50 हजार का इनाम भी घोषित कर दिया था. आरोपियों ने बेहद शातिराना तरीके से करोड़ों रुपए की ठगी की थी, इसलिए जाहिर था कि वे शातिर दिमाग के थे. संयुक्त आयुक्त के निर्देश पर आर्थिक अपराध शाखा के डीसीपी मंगेश कश्यप ने इन धोखेबाजों की तलाश के लिए एसीपी एम.एस. शेखावत की देखरेख में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में सबइंसपेक्टर उमेश शर्मा, अवधेश कुमार, एएसआई हरजीत सिंह, हैडकांस्टेबल रविंद्र त्यागी, बिट्टू तोमर, अजीब कुमार, कांस्टेबल संजय, धर्मेंद्र आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने नामजद आरोपियों की तलाश शुरू की. उसी बीच पता चला कि संजय शर्मा भारद्वाज के खिलाफ मुंबई, मध्य प्रदेश, जयपुर में भी धोखाधड़ी के एक दर्जन से ज्यादा मामले दर्ज हैं. इन के बैंक खातों में जो पते दर्ज थे, पुलिस उन पतों पर गई तो वहां कोई नहीं मिला. इस के बाद पुलिस ने उन के फोन नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया. फोन के लोकेशन के आधार पर पुलिस ने 24 जून, 2015 को फरीदाबाद के सेक्टर-31 से राज मल्होत्रा उर्फ अरुण शर्मा और परवेज को गिरफ्तार कर लिया. अरुण शर्मा उर्फ राज मल्होत्रा वहां कोठी किराए पर ले कर रह रहा था.

पुलिस ने दोनों से संजय शर्मा भारद्वाज और अन्य लोगों के बारे में पता किया तो वे किसी के बारे में कुछ भी नहीं बता पाए. पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. बाकी अभियुक्तों को पुलिस तलाशती रही. इसी बीच 3 महीने बाद राज मल्होत्रा उर्फ अरुण शर्मा और परवेज जमानत पर छूट कर जेल से बाहर आ गए. पुलिस इन दोनों की गतिविधियों पर निगरानी रखने लगी. क्योंकि उसे उम्मीद थी कि गैंग के बाकी साथी इन लोगों से मिलने जरूर आएंगे. पुलिस सर्विलांस के जरिए संजय शर्मा भारद्वाज के फोन पर होने वाली बातों को सुन रही थी. उस का मोबाइल फोन उदयपुर के पास सुखेर कस्बे में ऐक्टिव था.

पुलिस टीम वहां पहुंची तो पता चला कि उस मोबाइल का उपयोग पवन नाम का एक ज्वैलर कर रहा था. पूछताछ में पवन ने बताया कि उस ने यह मोबाइल किसी से खरीदा था, जिस का नाम वह नहीं जानता, लेकिन वह 1-2 दिन बाद मार्केट में घूमता दिखाई दे जाता है. पुलिस के पास संजय का फोटो था ही, इसलिए टीम ने सुखेर कस्बे में डेरा डाल दिया. 10 सितंबर, 2015 को संजय अपनी एसेंट कार से बाजार आया तो कार में बैठे होने के बावजूद उसे पवन ज्वैलर ने पहचान लिया. पुलिस ने अपनी प्राइवेट गाड़ी उस की कार के पीछे लगा दी. कुछ देर बाद उस की कार सुखेर में ही कृष्णा अपार्टमेंट के आगे रुकी. जैसे ही वह कार से उतर कर अपने फ्लैट में घुसा, पुलिस ने उसे पकड़ लिया. वहां उस का कोई साथी नहीं मिला. पूछताछ में उस ने अपने किसी साथी का ठिकाना नहीं बताया.

पुलिस संजय शर्मा भारद्वाज को ले कर दिल्ली आ गई. अगले दिन उसे मुख्य महानगर दंडाधिकारी वीना रानी की अदालत में पेश कर के 4 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि के दौरान पुलिस उस से उस के अन्य साथियों के बारे में पता नहीं कर सकी. लिहाजा रिमांड खत्म होने पर उसे न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक पुलिस अन्य अभियुक्तों को गिरफ्तार नहीं कर सकी थी. Gujarat Fraud Case

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

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