UP Crime Story: फैशन डिजाइनर शिप्रा मलिक मनमुटाव व पारिवारिक तनाव से परेशान थी. इसी तनाव के चलते उस ने क्राइम सीरियल से आइडिया ले कर अपने अपहरण का सफल ड्रामा रचा. उस का मामला इतना चर्चित हुआ कि पुलिस ने सारे काम छोड़ दिए और उस की बरामदगी के लिए जमीनआसमान एक कर दिया.
पुलिस हिरासत में बैठी वह फैशन डिजाइनर खूबसूरत युवती पुलिस अधिकारियों के लिए किसी अजूबे की तरह थी. पुलिस उस से घुमाफिरा कर पूछताछ कर रही थी. वह दुखी भी थी और परेशान भी. इस की वजह यह थी कि वह अपने अपहरण की ऐसी घटना से रूबरू हुई थी, जिस ने उस के दिलोदिमाग पर डरावनी छाप छोड़ी थी. गनीमत बस यही थी कि अपहर्त्ताओं ने उसे कोई जिस्मानी चोट नहीं पहुंचाई थी. अपनी मौत को चूंकि उस ने बेहद करीब से देखा था, लिहाजा मानसिक तौर पर वह काफी परेशान थी.
पुलिस के लिए वह अजूबा इसलिए थी, क्योंकि उस के अपहरण की घटना ने पूरे पुलिस तंत्र को हिला कर रख दिया था. इस हाईप्रोफाइल केस ने इतना तूल पकड़ा था कि पुलिस ने उच्चाधिकारियों के निर्देश पर उस की खोज में जमीनआसमान एक कर दिया था. स्पैशल टास्क फोर्स (एसटीएफ), क्राइम ब्रांच, साइबर एक्सपर्ट और पुलिस सभी काम छोड़ कर दिनरात सिर्फ उसे खोज रही थी. उस की तलाश में पुलिस की 1-2 टीमें नहीं, बल्कि 200 से ज्यादा पुलिसकर्मी लगे हुए थे. उस का परिवार गंभीर आशंकाओं से ग्रस्त था और पुलिस की कार्यप्रणाली पर नाकामी और लापरवाही के आरोप लगाए जा रहे थे.
पुलिस के लिए उस की बरामदगी चुनौती बनी हुई थी, परंतु अपहरण के पांचवे दिन 4 मार्च, 2016 की सुबह वह नाटकीय अंदाज में मिल गई थी. यूं तो पुलिस के लिए यह एक बड़ी राहत की बात थी, पर पुलिस अपहरण की उस कहानी पर अटक कर रह गई थी, जो युवती सुना रही थी. उस युवती का नाम शिप्रा मलिक था. 29 वर्षीया शिप्रा उत्तर प्रदेश के दिल्ली से सटे नोएडा के सैक्टर-37 के मकान नंबर-42 निवासी प्रौपर्टी कारोबार से जुड़े चेतन मलिक की पत्नी थी. शिप्रा मूलत: दिल्ली की रहने वाली थी. सन 2010 में उस का विवाह चेतन के साथ हुआ था. उस का करीब डेढ़ साल का बेटा अर्नव था.
शिप्रा घर पर ही डिजाइनर कपड़ों का बुटीक चलाती थी. 29 फरवरी को शिप्रा अपनी कार से दिल्ली जाने के लिए निकली थी कि तभी रहस्यमय स्थितियों में उस का अपहरण हो गया था. उस के अपहरण ने नोएडा से ले कर दिल्ली और दिल्ली से लखनऊ तक हड़कंप मचा दिया था. मामला संज्ञान में आने पर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पुलिस महानिदेशक जावीद अहमद को अविलंब शिप्रा को बरामद करने के निर्देश दिए थे. मामला मीडिया की सुर्खियां बन गया था. पुलिस अपनी पूरी ताकत लगा कर भी किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही थी.
मेरठ जोन के आईजी सुजीत पांडेय, रेंज की डीआईजी लक्ष्मी सिंह को नोएडा कैंप करना पड़ा था. डीआईजी जांच में जुटी पुलिस टीमों की खुद मौनिटरिंग कर रही थीं. इसी बीच शिप्रा ने हरियाणा से अपने पति को फोन कर के अपने सकुशल होने की जानकारी दी थी, जिस के बाद पुलिस व उस के पति जा कर 4 मार्च की तड़के करीब 5 बजे उसे घर ले आए थे. शिप्रा ने अपने साथ हुई सनसनीखेज वारदात का खुलासा किया था, लेकिन उस की बात पर पुलिस को विश्वास नहीं था. यही वजह थी कि एसएसपी किरन एस. व एसपी (सिटी) दिनेश यादव उस से खुद पूछताछ कर रहे थे.
दरअसल, शिप्रा का अपहरण ही इतना सनसनीखेज और चर्चित था कि उस की तह तक जा कर हकीकत को सामने लाना जरूरी था. शिप्रा अपने पति चेतन, उस के मातापिता व देवर शरद मलिक के साथ रहती थी. उस ने विवाह के बाद एक प्लाजा में अपना बुटीक खोल लिया था. उस का काम ठीक चलने लगा था, लेकिन उसी बीच सन 2014 में दुकान को ले कर उस का दुकान मालिकों राहुल और गुलशन से विवाद हो गया था. इस मामले में शिप्रा ने दोनों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज करा दिया था. फिर भी शिप्रा को दुकान छोड़नी पड़ी थी. इस वजह से उसे लाखों का नुकसान हुआ था. इस के बाद शिप्रा ने अपना बुटीक घर में ही खोल लिया था.
29 फरवरी, 2016 की दोपहर में तकरीबन एक बजे शिप्रा अपनी स्विफ्ट डिजायर कार नंबर-डीएल1सी 1905 से दिल्ली जाने के लिए निकली. अपने बुटीक के काम से वह अक्सर दिल्ली के चांदनी चौक जाती रहती थी. वह सेक्टर-29 के ब्रह्मपुत्रा मार्केट की तरफ से निकली तो उस की मुलाकात अपने पति चेतन से हो गई. चेतन को चूंकि किसी काम से कनाटप्लेस जाना था, इसलिए कुछ देर बातचीत कर के दोनों अपनीअपनी राह चले गए. करीब साढ़े 3 बजे चेतन अपने काम से फ्री हो गया. उस ने यह सोच कर शिप्रा का मोबाइल नंबर डायल किया कि दोनों नोएडा एकसाथ वापस चले जाएंगे, लेकिन उस का मोबाइल स्विच औफ था.
शाम के करीब 5 बजे चेतन नोएडा वापस आ गए. वह जीआईपी मौल की तरफ से घर जा रहे थे, तभी उन की नजर सड़क किनारे खड़ी शिप्रा की कार पर पड़ी. चेतन को आश्चर्य हुआ, क्योंकि शिप्रा दिल्ली जाने की बात कह कर गई थी. फिर उस की कार वहां कैसे आ गई? वह कार के नजदीक पहुंचे तो कार में कोई नहीं था. कार का लौक चैक करने के लिए उन्होंने ड्राइविंग सीट की तरफ दरवाजे का हैंडल चैक किया तो वह खुल गया. कार अनलौक थी. इतना ही नहीं, कार की चाबी भी स्टीयरिंग के ठीक नीचे पायदान पर पड़ी थी.
यह देख कर चेतन को आश्चर्य भी हुआ और आशंका भी. उन्होंने एक बार फिर शिप्रा का नंबर मिलाया, लेकिन उस का मोबाइल अभी भी औफ था. चेतन ने अपने घर व शिप्रा के मायके वालों को इस की सूचना दी तो सभी परेशान हो उठे. शिप्रा का मोबाइल चूंकि बंद था, इस से अनहोनी की आशंका सताने लगी. विचारविमर्श के बाद घर वाले लावारिस मिली कार को ले कर थाना सैक्टर-20 पहुंचे.
पुलिस ने मामला दिल्ली का होना बताया. घर वाले दिल्ली के थाना लाजपतनगर पहुंचे तो वहां से उन्हें घटना की शुरुआत नोएडा से होने की बात कह कर चलता कर दिया गया. इस मामले में उन्होंने अपनी राजनैतिक पहुंच का इस्तेमाल किया तो मामला एकाएक दिल्ली से ले कर लखनऊ तक पहुंच गया. बात सरकार तक पहुंची तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पुलिस महानिदेशक को जल्द काररवाई के निर्देश दे दिए. इस के बाद पुलिस तंत्र बिजली की गति से सक्रिय हो गया. थाना सेक्टर-20 पुलिस ने पहले गुमशुदगी दर्ज की, फिर उस के परिजनों की तहरीर पर अपहरण का मुकदमा दर्ज कर लिया.
थानाप्रभारी अमरनाथ यादव जांच में जुट गए. आननफानन में मेरठ जोन के आईजी सुजीत पांडेय व डीआईजी लक्ष्मी सिंह नोएडा पहुंच गए. दोनों अधिकारियों ने अधीनस्थों को शिप्रा की तलाश करने को कहा. डीआईजी लक्ष्मी सिंह के निर्देशन में एसएसपी किरन एस. ने पुलिस की कई टीमों क ा गठन करने के साथ ही क्राइम ब्रांच व साइबर सेल को भी सक्रिय कर दिया.
साइबर यूनिट ने शिप्रा के मोबाइल की काल डिटेल्स के साथ ही उस की लोकेशन भी हासिल कर ली. शिप्रा के मोबाइल से अंतिम काल 29 फरवरी की दोपहर 2 बज कर 50 मिनट पर दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम को की गई थी. यह काल 9 सैकेंड की थी. इस से इस बात को बल मिला कि शिप्रा जरूर किसी बड़ी मुसीबत में थी. दिल्ली पुलिस के रिकौर्ड की जांच की गई तो पता चला कि उन 10 सैकेंड में कोई बात नहीं हो सकी थी. जबकि उस के मोबाइल की अंतिम लोकेशन दिल्ली के लाजपतनगर क्षेत्र की पाई गई थी. इन सब तथ्यों के प्रकाश में आने से उस के अपहरण की आशंका को बल मिला.
इस के बाद पुलिस ने शिप्रा की तलाश के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा दिया. पुलिस ने शिप्रा के पति चेतन व अन्य से कई दौर की पूछताछ की. पुलिस ने शिप्रा के पिता सतीश कटारिया व भाई शिवांग से भी पूछताछ की. पुलिस के सामने यक्ष प्रश्न यह था कि शिप्रा का अपहरण क्यों और किस ने किया? दूसरे शिप्रा को यदि चांदनी चौक जाना था तो उस की कार सैक्टर-29 कैसे पहुंची? इस दौरान फिरौती के लिए कोई फोन या पत्र भी उस के घर वालों को नहीं मिला था.
देखतेदेखते 2 दिन बीत गए. पुलिस अपने स्तर से छानबीन कर रही थी. इस जांच में एसटीएफ को भी लगा दिया गया था. शिप्रा के पति चेतन ने उन दुकानदारों पर भी शक जाहिर किया, जिन से कुछ समय पहले शिप्रा का झगड़ा हुआ था. पुलिस ने उन से भी गहराई से पूछताछ की, लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. इस के अलावा शिप्रा के घर वाले किसी भी रंजिश की बात से इंकार कर रहे थे.
शिप्रा अपनी मर्जी से कहीं न चली गई हो, इस आशंका में पुलिस ने दिल्ली एयरपोर्ट से 29 फरवरी को 3 बजे के बाद विदेश गए यात्रियों की लिस्ट हासिल कर ली, लेकिन उस में शिप्रा का नाम नहीं था. एक बात यह भी लग रही थी कि शिप्रा का अपहरण करने वाला कोई उस का जानकार रहा होगा. उस की काल डिटेल्स की छानबीन की जा रही थी.
उस के मोबाइल पर काल के साथ इंटरनेट का भी इस्तेमाल हुआ था. जांच के दौरान पुलिस को उस में कोई संदिग्ध नंबर नहीं मिला. साइबर यूनिट उस का मैसेंजर व्हाट्सएप डाटा जुटाने का प्रयास कर रही थी. पुलिस के लिए अपहरण का यह केस एक तरह से चुनौती बन गया था. अंदेशा था कि शिप्रा को रास्ते से अपहृत कर के दिल्ली ले जाया गया होगा. लाजपतनगर में मिली उस के मोबाइल की अंतिम लोकेशन भी इस आशंका को पुख्ता कर रही थी.
पुलिस ने कई सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग की जांच की, लेकिन उन से भी कोई सुराग नहीं मिला. पुलिस चांदनी चौक की उस दुकान पर भी पहुंची, जहां से वह कपड़े लाया करती थी. वहां पता चला कि शिप्रा दुकान पर पहुंची ही नहीं थी. पुलिस ने शहर भर में शिप्रा के पोस्टर चस्पा कर दिए, ताकि कोई सुराग मिल सके.
इस के साथ ही विभिन्न सैक्टरों में नौकरी करने वाले 40 से ज्यादा सुरक्षागार्डों से भी पुलिस ने पूछताछ की. पुलिस की अलगअलग टीमें एसपी (सिटी) दिनेश यादव, एसपी (क्राइम) विश्वजीत श्रीवास्तव, एएसपी डा. गौरव ग्रोवर व सीओ अनूप कुमार के नेतृत्व में काम कर रही थीं. इस के बावजूद पुलिस की काबिलियत पर सवाल उठने लगे थे. 3 मार्च को पुलिस को शिप्रा का एक सुराग मिला. सीसीटीवी रिकौर्डिंग में शिप्रा सैक्टर-18 में कार चलाती दिखी. इस रूट पर वह एक बैंक में गई थी. सवा से 2 बजे के बीच बैंक के एंट्री गेट पर वह अंदर जाती दिखाई दी. उस ने कान पर मोबाइल लगाया हुआ था और वह एकदम सामान्य लग रही थी.
पूछताछ में पता चला कि बैंक में शिप्रा का जौइंट लौकर था. सवाल यह था कि शिप्रा बैंक किस लिए गई थी? शिप्रा के पति चेतन ने इस बात से इनकार कर दिया कि उसे इस संबंध में कोई जानकारी है. पुलिस अपहरण की गुत्थी सुलझाने में दिनरात उलझी हुई थी कि इसी बीच एक ऐसा मोड़ आया, जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी. 4 फरवरी की देर रात करीब सवा बजे एक अंजान नंबर से चेतन के मोबाइल पर शिप्रा का फोन आया. उस ने बताया कि वह गुड़गांव, हरियाणा के गांव सुल्तानपुर में सरपंच राकेश चौहान के घर है. वह उसे लेने के लिए आ जाए. यह सुन कर चेतन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने यह बात पुलिस को बताई तो एसएसपी किरन एस. के नेतृत्व में गया पुलिस दल उसे अपने साथ नोएडा ले आया.
बरामदगी के बाद शिप्रा ने पुलिस को जो कहानी बताई, उस के अनुसार वह बैंक में अपना लौकर चैक करने गई थी, लेकिन बाद में उस ने इरादा बदल दिया था. बैंक से निकल कर वह कुछ दूर पहुंची तो वैन में सवार 4 लोगों ने उसे रोक कर वैन की पिछली सीट पर डाल लिया. उन्होंने उस का मोबाइल व पर्स छीन लिया और उस के ऊपर एक कंबल डाल कर एक बदमाश ने उसे धमकी दी, ‘‘चुपचाप पड़ी रहना. अगर जरा भी चीखनेचिल्लाने की कोशिश की तो गोली मार दूंगा.’’
शिप्रा बुरी तरह घबरा गई. वह शांत पड़ी रही. उस की समझ नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे. वैन कहां जा रही थी, उसे कुछ नहीं पता था. उसी बीच बदमाशों ने उस का मोबाइल पिछली सीट पर फेंका तो वह उस के हाथ आ गया. इस से उसे उन के चंगुल से बचने की उम्मीद की किरन नजर आई. सोचविचार कर उस ने पुलिस का सौ नंबर डायल कर दिया. लेकिन नजर पड़ते ही बदमाशों ने उस से मोबाइल छीन कर स्विच्ड औफ कर दिया.
बदमाशों ने उस की आंखों पर पट्टी बांध दी. वह उसे गुड़गांव ले गए. पहले उसे खेतों और बाद में एक कमरे में बंधक बना कर रखा गया. मीडिया में मामला उछला तो बदमाश घबरा गए. एक रात वह उसे सुल्तानपुर गांव के पास सड़क पर फेंक कर फरार हो गए. इस के बाद उस ने दरवाजा बजा कर गांव वालों से मदद की गुहार की और जैसेतैसे चेतन के मोबाइल पर सूचना दी.
पुलिस शिप्रा के बयानों से संतुष्ट नहीं थी. इस की कई वाजिब वजहें भी थीं. बदमाशों ने सरेआम उस का अपहरण किया था तो उस ने शोर क्यों नहीं मचाया था? बदमाशों ने उस का अपहरण क्यों किया था? इस की भी कोई ठोस वजह वह नहीं बता पा रही थी. कार से फेंके जाने पर भी उस के जिस्म पर कोई खरोंच नहीं आई थी.
उस ने रस्सी से हाथपैर बांधे जाने की बात की थी, लेकिन ऐसे कोई निशान मौजूद नहीं थे. मामला चूंकि चर्चित था, इसलिए पुलिस के लिए हकीकत से पर्दा उठाना जरूरी था. पहले ही अपनी कार्यप्रणाली को ले कर सवालों में उलझी पुलिस इस मामले में अब ऐसे सवालों का शिकार नहीं होना चाहती थी, जिन का जवाब उस के पास न हो.
शिप्रा चाहती थी कि वह जो बता रही है, पुलिस सिर्फ उसी पर भरोसा करे. जबकि पुलिस चाहती थी कि जो सवाल वह पूछ रही है, उन का उसे सटीक जवाब मिले, ताकि अपहरण से ले कर सकुशल वापसी तक की तसवीर आईने की तरह साफ हो जाए. शिप्रा का अपहरण और उस का मिलना, दोनों ही नाटकीय व रहस्यमयी थे. उन के इर्दगिर्द सवालों का जाल फैला था.
पूछताछ से विचलित हो चुकी शिप्रा अधिकारियों से बोली, ‘‘सर, प्लीज मेरे साथ जो हुआ, अब मैं उसे याद कर के परेशान नहीं होना चाहती. मैं यह भी नहीं चाहती कि अपहर्ता पकड़े जाएं. उन्होंने मेरी जान बख्श दी, यही बड़ी बात है. क्या मैं अब घर जा सकती हूं?’’
‘‘जा सकती हो, लेकिन पूरा सच बताने के बाद.’’ एक अधिकारी ने कहा तो उस ने उलटा सवाल दाग दिया, ‘‘मैं भला झूठ क्यों बोलूंगी? मैं ने सच ही तो बताया है.’’
‘‘सच बताया होता तो हम तुम्हारे साथ इतनी माथापच्ची न करते.’’
‘‘अपने अपहरण की कहानी का वह सच बता दो, जिसे हर कोई जानना चाहता है.’’
शिप्रा की बरामदगी की सूचना पर डीआईजी लक्ष्मी सिंह भी 8 बजे तक वहां पहुंच गईं. उन्होंने करीब आधा घंटे शिप्रा से घुमाफिरा कर मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की तो अपहरण के उस सच से पर्दा उठ गया, जिस में पुलिस उलझी हुई थी. विस्तृत पूछताछ में पुलिस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. हैरतअंगेज बात यह थी कि शिप्रा अपने अपहरण की खुद ही सूत्रधार थी. वह खुद अपहृत हुई थी और खुद ही बरामद. उस ने क्राइम सीरियल देख कर उसी की तर्ज पर जिस अंदाज में अपने अपहरण की पटकथा से पुलिस को नचाया था, वह न सिर्फ चौंकाने वाली थी, बल्कि हैरतअंगेज भी थी.
दरअसल, शिप्रा पारिवारिक मनमुटाव की वजह से मानसिक तनाव में चल रही थी. यूं तो उस की जिंदगी में सभी कुछ था, पर वह अपना फैशन डिजाइनिंग का बड़ा शोरूम खोलना चाहती थी. लेकिन इस के लिए उस की आर्थिक स्थिति गवाही नहीं दे रही थी. शिप्रा के पिता और पति के बीच भी पैसों के लेनदेन को ले कर तनाव था. शिप्रा ने बचपन से बेहतर स्टाइल में जिंदगी को जिया था. अब भी वह ऐसा ही चाहती थी. यह बात अलग थी कि आर्थिक स्थिति अब इस की इजाजत नहीं दे रही थी.
इंसान को विपरीत हालात का सामना कर के उन्हें अपने अनुकूल बनाना चाहिए, लेकिन शिप्रा पारिवारिक कलह, आर्थिक परेशानी व मनमुटाव में घुटन महसूस करने लगी थी. इस का नतीजा यह निकला कि वह धीरेधीरे तनावग्रस्त हो गई. आदतन उस ने क्राइम स्टोरी आधारित टीवी सीरियल देखे. उन में से एक सीरियल ने उस के दिमाग पर विशेष छाप छोड़ी. तनाव से निकलने के लिए उस ने हमेशा के लिए परिवार को छोड़ने और क्राइम सीरियल के आधार पर अपने अपहरण का ड्रामा रचने की सोची. कुछ दिन की सोच के बाद उस ने घर को अलविदा करने का मन बना लिया.
29 फरवरी को वह कार से घर से निकल कर बैंक गई, लेकिन वहां उस ने कुछ किया नहीं. योजना के तहत उस ने अपनी कार सेक्टर-29 में जानबूझ कर ऐसी जगह पार्क कर दी, ताकि उस के पति को मिल जाए. चेतन उस रास्ते से आतेजाते थे, इस बात को वह बखूबी जानती थी. कार की चाबी भी उस ने कार में ही छोड़ दी. वहां से वह पैदल चल कर बौटेनिकल गार्डन गई.
वहां से उस ने धौला कुआं जाने वाली बस पकड़ी. जब वह लाजपतनगर फ्लाईओवर पर पहुंची तो उस ने पुलिस कंट्रोल रूम को यह बताने के लिए काल की कि वह अपनी मर्जी से जा रही है, इसलिए बाद में उस के घर वालों को परेशान न किया जाए. लेकिन चंद सैकेंड में ही उस का इरादा बदला तो उस ने काल डिसकनेक्ट कर दी. इस के बाद मोबाइल का भी उस ने स्विच औफ कर दिया. धौला कुआं पहुंच कर वह पहले गुड़गांव गई, फिर जयपुर जाने वाली बस में सवार हो गई और खाटू श्यामजी के आश्रम जा पहुंची. वहां वह पहले भी जाती रही थी. आश्रम में आने वाले लोगों के लिए ठहरने की पर्याप्त व्यवस्था थी.
आश्रम का चुनाव उस ने इसलिए किया, क्योंकि वहां सैंकड़ों लोग आतेजाते थे. उस ने सोचा कि अगर उस की खोजबीन हुई तो आसानी से कोई उस का पता नहीं लगा सकेगा. 3 दिन वह आश्रम में ही रही. इस बीच उस ने अपना मोबाइल फोन और पर्स फेंक दिया था. शिप्रा के पास 5 हजार रुपए थे. उस ने टीवी पर अपने अपहरण की खबर देखी तो उसे अपने बच्चे की याद सताने लगी. अर्नव की याद से उस का ममत्व हिलोरें लेने लगा. उस की मनोदशा बदली और उस ने वापस जाने का फैसला कर लिया.
उस ने मन ही मन सोच लिया कि अब वह अपने अपहरण की कहानी को अमलीजामा पहनाएगी. शाम को जयपुर से चल कर देर रात वह गुड़गांव पहुंची. पैदल चल कर वह फर्रुखनगर रोड स्थित सुल्तानपुर गांव गई. उस ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक दी. यह घर नरेंद्र सैनी का था. नरेंद्र को उस ने रोते हुए अपने अपहरण की झूठी कहानी सुनाई. नरेंद्र उसे सरपंच राकेश के पास ले गए. वहां से उस ने चेतन को फोन किया. इस बीच सरपंच ने क्षेत्रीय पुलिस को भी खबर कर दी. स्थानीय पुलिस ने भी पहुंच कर उस से पूछताछ की.
शिप्रा ने नोएडा आ कर पुलिस को भी यही कहानी बताई थी, लेकिन पुलिस ने गहराई से पूछताछ की तो वह टूट गई. मानवीय आधार पर बिना किसी काररवाई के पुलिस ने शिप्रा को मैडिकल परीक्षण के बाद उस के घर वालों के हवाले कर दिया. विस्तृत पूछताछ के बाद डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने दोपहर में प्रैसवार्ता कर के शिप्रा के अपहरण के ढोंग का खुलासा मीडिया के सामने कर दिया. पुलिस के जितने समय, पैसे और संसाधनों की बर्बादी उसे ले कर हुई, उतने में कई केस सुलझ सकते थे. कथा लिखे जाने तक नोएडा पुलिस बिना वजह परेशान करने वाली शिप्रा के बयानों की पुष्टि के लिए और गहराई से जांचपड़ताल कर रही थी. पुलिस उस का मोबाइल व पर्स बरामद नहीं कर सकी थी.
शिप्रा चाहती तो संयम व विवेक का परिचय दे कर परिस्थितियों से कदमताल मिला सकती थी, लेकिन उस ने तनाव से निकलने का जो खुराफाती आइडिया सोचा, उसे अफसोसजनक ही कहा जाएगा. पुलिस का कहना था कि अपहरण का मुकदमा खत्म किया जाएगा. जरूरी हुआ तो सभी तथ्यों की पड़ताल के बाद शिप्रा के खिलाफ काररवाई करने की बात सोची जाएगी. UP Crime Story
—कथा पुलिस सूत






