Hindi Stories: देवेंद्र अग्रवाल कलयुगी धार्मिक साधुसंतों से दूर रह कर जोधपुर में अपना महेशाश्रम चला रहे हैं, जहां मातापिता द्वारा ठुकराए गए या अवांछित तरीके से फेंके गए बच्चों को पाला जाता है. उन्होंने अब तक सैकड़ों बच्चों को जिंदगियां दे कर वाकई बहुत बड़ा काम किया है.

राजस्थान के मेवाड़ इलाके की वीरता, संघर्ष, त्याग और बलिदान के कितने ही किस्सेकहानियां इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हैं. महाराणा प्रताप, हल्दीघाटी, घोड़ा चेतक और राणा सांगा के बेटे उदय सिंह की धाय की जांबाजी आज भी लोगों की जुबान पर है. उदयपुर भी मेवाड़ के ही इलाके में आता है, यह शहर दुनिया भर में झीलों के लिए प्रसिद्ध है.

उदयपुर शहर के रहने वाले देवेंद्र भी आज त्याग, संघर्ष, जिद, हौसले और समाजसेवा के लिए जाने जाते हैं. बेटी बचाओ की मुहिम में जुटे देवेंद्र राजस्थान ही नहीं, देश भर में पालना वाले बाबा के नाम से जाने जाते हैं. हालांकि उन की उम्र 42-43 साल ही है, लेकिन अधपकी दाढ़ी और संघर्ष के झंझावतों ने उन्हें बाबा बना दिया है. देवेंद्र योग गुरु भी हैं और सरकारी अफसरों के साथ आमजन को योग का प्रशिक्षण देते हैं. इस की वजह यह है कि वह समाज से ठुकराई बेटियों को बचाते ही नहीं, उन्हें नई जिंदगी देते हैं.

8 अगस्त, 1974 को उदयपुर में जयराम अग्रवाल और भगवती देवी के घर जन्मे देवेंद्र पहले पढ़ाईलिखाई और उस के बाद कारोबार में ऐसा व्यस्त हुए कि अपने शरीर पर ध्यान नहीं दे पाए. उसी बीच सन 1996 में हर्षा अग्रवाल से उन का विवाह हो गया. विवाह के बाद बेटा हुआ तो घर में खुशियां आ गईं. पतिपत्नी ही नहीं, मातापिता भी खुश हुए. देवेंद्र की मेहनत से कारोबार तेजी से फलफूल रहा था. उन का मार्केंटिंग का कारोबार था. उन के पास कई नामीगिरामी कंपनियों की एजेंसियां थीं. करोड़ों रुपए का सालाना टर्नओवर था.

कुछ समय बाद उन के घर दूसरे बेटे ने जन्म लिया. घरपरिवार में दोगुना उल्लास छा गया. घर में न पैसे की कमी थी न सुख- सुविधाओं की. उन का परिवार हंसीखुशी जीवन बसर कर रहा था. 2 बेटे होने से भविष्य की भी चिंता नहीं थी. करीब 12 साल पहले की बात है. देवेंद्र अग्रवाल को खांसी हुई. डाक्टरों को दिखाया तो उन्होंने दवा दे दी. दवाइयां खाने से खांसी तो कम हो गई, लेकिन इस का रूप अस्थमा में बदल गया. डाक्टरों की सलाह पर वह अस्थमा की दवाइयां लेने लगे. कारोबार की व्यस्तता और भागदौड़ भरी जिंदगी में कई बार दवाएं नहीं ले पाते थे. वह इन्हेलर लेने लगे. लेकिन कई बार इन्हेलर भी इधरउधर छूट जाता था.

लापरवाही की वजह से देवेंद्र के अस्थमा ने विकराल रूप धारण कर लिया और टीबी हो गई. टीबी का इलाज शुरू हुआ तो दवाओं ने फायदा करने के बजाय नुकसान पहुंचा दिया और उन का लीवर डैमेज हो गया. उदयपुर में इलाज नहीं हो सका तो डाक्टरों ने उन्हें अहमदाबाद भेज दिया, जहां राजस्थान हौस्पिटल में उन्हें भर्ती कराया गया.

7 दिनों बाद वहां के डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए, लेकिन उसी रात से देवेंद्र के स्वास्थ्य में अचानक सुधार होने लगा. धीरेधीरे तबीयत ठीक होने लगी. स्वस्थ होने के बाद देवेंद्र वापस उदयपुर आ गए. उन के इलाज में लाखों रुपए खर्च हो गए थे. कहा जाता है कि दमा दम के साथ जाता है, लेकिन देवेंद्र ने पैसे के दम पर दमा से अपनी जान बचा ली थी. वापस आने पर उन के परिचितों और रिश्तेदारों ने उन्हें योग करने की सलाह दी.

उन्हीं की सलाह पर देवेंद्र योग करने लगे तो उन की जिंदगी बदल गई. कुछ ही दिनों में वह पूरी तरह से स्वस्थ हो गए. एक तरह से योगा ने उन का जीवन ही बदल दिया. उन्हें लगने लगा कि समाज से जो लिया है,  से वापस दिया जाना चाहिए. लेकिन इस के लिए बहुत त्याग की जरूरत थी. देवेंद्र ने मन की बात हर्षा को बता कर कहा कि योग से मेरे जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है, इसलिए अब मैं इसे समाज सेवा के रूप में लोगों को सिखाना चाहता हूं, लेकिन इस के लिए हमें अपना यह कारोबार बंद करना होगा.

ऐसा करने पर आर्थिक संकट खड़ा हो सकता था, इसलिए देवेंद्र ने पत्नी से वादा किया कि कुछ भी हो, वह उन्हें और बच्चों को किसी तरह की परेशानी नहीं होने देंगे. पति की इच्छा थी, भला पत्नी कैसे मना कर सकती थी. पत्नी से इजाजत मिलने के बाद देवेंद्र ने अपने मातापिता को भी इस बात के लिए राजी कर लिया. इस के बाद वह अपने करोड़ो के कारोबार को समेटने लगे. कुछ रकम डूब भी गई, लेकिन उन्होंने उस की चिंता नहीं की.

इस के बाद कारोबारी देवेंद्र और हर्षा नए रूप में सामने आए. हर्षा आयुर्वेदिक चिकित्सालय चलाने लगीं तो देवेंद्र योग सिखाने लगे. धीरेधीरे वह पूरी तरह से योग को समर्पित हो गए. उन्होंने योग में स्नातकोत्तर की उपाधि ली तो जल्दी ही उन की ख्याति योग गुरू के रूप में हो गई. योग से शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक उन्नति हासिल की जा सकती है. यही सोच कर उन्होंने जीवन संरक्षण अभियान के मकसद से सन 2005 में मां भगवती विकास संस्थान की स्थापना की. उन का मुख्य उद्देश्य हर जीवन को सुरक्षा एवं पूरा विकास उपलब्ध कराना था.

योग गुरु देवेंद्र अग्रवाल के जीवन में एक और बड़ा बदलाव तब आया, जब सन 2006 में उदयपुर में सब से ज्यादा कन्या भ्रूण हत्या के मामले सामने आए. आए दिन कोई न कोई पूर्ण परिपक्व कन्या भ्रूण उदयपुर की झीलों के आसपास मिल रहा था. कन्या भ्रूण मिलने की इन घटनाओं ने योग गुरु देवेंद्र को झकझोर कर रख दिया. चिंता की बात यह थी कि राजस्थान में उस समय यानी सन 2001 की जनगणना के अनुसार, 0 से 6 साल के आयु वर्ग में प्रति एक हजार लड़कों पर 909 लड़कियां थीं.

यह देख कर देवेंद्र के मन में आया कि क्यों न अनचाही नवजात कन्याओं को बचा कर उन्हें सुरक्षित जीवन दिया जाए. ये बेटियां किसी परिवार की खुशियां बन सकती हैं. देवेंद्र ने इस बारे में पत्नी हर्षा से बात की तो हर्षा भी सहर्ष तैयार हो गईं. उन का कहना था, ‘‘हमारे 2 बेटे हैं, इन के लिए हम ऐसी बहन लाएंगे, जिसे उस के घर वालों ने ठुकराया होगा.’’

योग गुरु देवेंद्र अग्रवाल ने अप्रैल, 2007 में पालना स्थल एवं महेशाश्रम की स्थापना की. पालनास्थल की स्थापना इसलिए की गई कि ऐसे मातापिता जो अपनी संतान को किसी कारणवश नाले, नदी, कचरापात्र या अन्य स्थानों पर लावारिस हालत में फेंक देते हैं, वे उन्हें उस पालने में डाल जाएं, जिस से उन बेकसूर नवजातों को अकाल मृत्यु से बचाया जा सके. देवेंद्र ने सब से पहले पालना अपने घर के बाहर चौराहे पर रखा. एक सप्ताह के भीतर ही उस पालने में 3 नवजात कन्याएं डाली गईं. इस तरह देवेंद्र जहां अपने 2 बेटों के लिए एक बहन चाहते थे, उन्हें 3 बहनें मिल गई थीं.

इन 3 नवजात बच्चियों ने योग गुरु देवेंद्र को एक नई दिशा दी. इस के बाद उन्होंने अभियान चलाया कि अनचाहे नवजात शिशुओं के सुरक्षित भविष्य के लिए फेंकने के बजाय उन्हें सौंप दिया जाए. पहले सप्ताह में पालने में मिली तीनों लड़कियों को महेशाश्रम ला कर देवेंद्र अग्रवाल के संरक्षण में उन का लालनपालन शुरू कर दिया गया. इस काम के लिए एक आया भी रख ली गई. लेकिन इन तीनों बच्चियों के आश्रम में आते ही देवेंद्र की परेशानियां शुरू हो गईं. पहली परेशानी तो यह थी कि उन्हें पाला कैसे जाए? क्योंकि अब उन की पहली जैसी आर्थिक स्थिति नहीं थी. उस समय तीनों लड़कियों के फार्मूला दूध पर ही 5400 रुपए खर्च हो रहे थे.

दूसरे बच्चे प्रीमैच्योर थे, जिस से उन के इलाज पर भी काफी पैसा खर्च हो रहा था. एक बच्ची को तो डाक्टरों ने एचआईवी ग्रसित घोषित कर दिया था. बच्चों के इलाज के खर्च से वह पिछड़ने लगे. देवेंद्र अग्रवाल ने जैसे ही नवजातों को बचाने का अपना यह अभियान शुरू किया, उन का विरोध होने लगा. तमाम कथित समाजसेवी उन के विरोध में खड़े हो गए. सरकारी नियमकानून भी आड़े आ रहे थे. पुलिस ने उन के खिलाफ मुकदमे दर्ज कर लिए. उदयपुर की सरकारी स्तर पर बनी चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने भी किसी गैर बच्चे को इस तरह अपने पास रखने को गैरकानूनी बताया. कानूनन इस तरह के बच्चे को गोद ले कर ही पाला जा सकता है.

प्रशासन ने कानून का हवाला दे कर तीनों लड़कियों को अपने कब्जे में ले लिया. 2 बार उन के खिलाफ वारंट जारी हो गए, जिस से गिरफ्तारी की नौबत आ गई. वह उन बच्चियों को ले कर अदालत पहुंचे, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली. परेशान हो कर उन्होंने पालना बंद कर दिया. योग गुरु देवेंद्र ने परेशान हो कर भले ही पालना बंद कर दिया, लेकिन उन की ओर से शुरू की गई बच्चियों को बचाने की मुहिम की शुरुआत की अहमियत लोगों की समझ में आ गई. उन की इस मुहिम की जानकारी राजस्थान सरकार को हुई तो सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के अधिकारियों ने उन्हें जयपुर बुला कर कहा कि वह पालना बंद न करें, उसे जारी रखें. अगर कोई कानूनी अड़चनें आएंगी तो वे उसे दूर कराने की कोशिश करेंगे.

देवेंद्र अग्रवाल उदयपुर आए और पालना फिर से रखवा दिया. लेकिन कानूनी परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही थीं. पालने में बच्चा डालने पर पुलिस अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर देती थी, जिस से लोग पालने में बच्चा डालने से कतराने लगे. इस से किसी को अनचाहे नवजात से छुटकारा पाना होता तो वह उसे किसी लावालिस जगह पर या झील में फेंक देता था. इस के अलावा लोग देवेंद्र पर तरहतरह के इल्जाम भी लगाने लगे, जिस से वह परेशान हो गए. एक बार उन का हौसला जरूर टूटने लगा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. क्योंकि पत्नी और मित्रपरिचित उन का हौसला बढ़ा रहे थे.

देवेंद्र अग्रवाल सुप्रीम कोर्ट चले गए और बच्चों के मसले पर कानूनी लड़ाई शुरू की. इस का परिणाम यह निकला कि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पालने में नवजात को सुरक्षित परित्याग करने वाले पर कोई मामला दर्ज नहीं होना चाहिए. इस के बाद देवेंद्र अग्रवाल की पहल पर एडौप्शन के लिए कोई एक कानून न होने का मामला संसद में उठाया गया, जहां इसे अधिसूचना के रूप में एक आधार मिला और केंद्र सरकार ने कारा एक्ट लागू कर दिया. कारा एक्ट में एडौप्शन के लिए दी गई गाइडलाइन में ज्यादातर बातें वही हैं, जो महेशाश्रम ने शुरू की थीं.

सुप्रीम कोर्ट की ओर से नवजात के सुरक्षित परित्याग को गैरकानूनी न मानने से देवेंद्र अग्रवाल में जोश आ गया. अब वह पूरे उत्साह से अपनी इस मुहिम में जुट गए. राज्य सरकार की मदद से उन्होंने अत्याधुनिक पालनागृह खोला. महेशाश्रम के बाहर लगे इलैक्ट्रौनिक पालने में कोई भी व्यक्ति बच्चे को डाल कर बिना किसी शिनाख्त के वहां से जा सकता था. बच्चे को पालने में डालने के 2 मिनट बाद घंटी बजती है, जिस की सूचना मां भगवती विकास संस्थान से जुड़े 3 लोगों के मोबाइल फोन पर पहुंच जाती है.

इस के बाद महेशाश्रम के साधक नवजात को अपने संरक्षण में ले लेते हैं. इस के अलावा कहीं पर भी मिलने वाले बच्चे को कोई भी व्यक्ति महेशाश्रम पहुंचा सकता है. अगर नहीं पहुंचा सकता तो फोन पर सूचना दे सकता है. उस सूचना के आधार पर आश्रम के साधक बच्चे को ले आते हैं. बच्चे को छोड़ने या सूचना देने वाले के खिलाफ कोई कानूनी काररवाई नहीं होगी, इस बात की जिम्मेदारी आश्रम ने ले रखी है.

धीरेधीरे पालनों में नवजात बच्चे डाले जाने लगे, जिन में ज्यादातर बेटियां ही थीं. कुछ बेटे भी आए. पालनों तथा अन्य स्रोतों से मिले बच्चों को आश्रम में पूरे लाडप्यार से पाला जाने लगा. देवेंद्र जहां इन बच्चों को पिता का प्यार देते हैं, वहीं आया उन्हें दूध पिलाती हैं. संस्थान का कोई भी कर्मचारी इन बच्चों की देखरेख में कोई कसर नहीं छोड़ता. बच्चों के इलाज की भी पूरी व्यवस्था रखी गई है. आश्रम की ओर से न्यूबोर्न इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू), ब्रेन डेवलपमेंट लैब, एंबुलैंस आदि की भी व्यवस्था की गई है. इस एनआईसीयू में बहुत कम वजन के यानी मात्र 800 ग्राम तक के बच्चे को बचाया जा सकता है.

देवेंद्र अग्रवाल के महेशाश्रम में बच्चों का शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास किया जाता है, ताकि ये बड़े हो कर मुख्य धारा से जुड़ सकें. लालनपालन के साथ इन बच्चों के संपूर्ण विकास एवं वात्सल्य सुख के लिए महेशाश्रम ने संतान सुख से वंचित मातापिता को संतान सुख देने का फैसला किया. बच्चे गोद दिए जाने लगे तो निस्संतान दंपतियों की लाइन लग गई. लगभग हर महीने यहां कोई न कोई बच्चा गोद लेने आता है. सन 2012 के अगस्त महीने में 2 दिनों में यहां 9 बच्चों को गोद दिया गया. उस समय तक महेशाश्रम 57 परिवारों को बच्चे गोद दे चुका था.

8 अगस्त, 2012 को महेशाश्रम में पल रहे 5 अनाथ बच्चों को मातापिता मिले. इन में 3 लड़कियां और 2 लड़के थे. पाली से आए भव्य और तोषी अग्रवाल अवंतिका को पा कर फूले नहीं समा रहे थे. उन्हें शादी के 12 साल बाद भी कोई संतान नहीं हुई थी. भीलवाड़ा से आए सुरेश और विमल चेचानी ने 3 साल की सूर्यांशी को गोद लिया था. इन की गोद 22 सालों से सूनी थी. बंगलुरु से आए पुनीत और ग्रिंडामेरी ने 6 महीने की योगिनी को गोद लिया था. उस के तालू में छेद था. फिर भी उन्होंने उसे पसंद किया और भरोसा दिलाया कि वे उस का इलाज कराएंगे. जयपुर से आए कौंट्रैक्टर ताज मोहम्मद ने 5 साल के श्याम को गोद लिया था. जबकि झुंझुनूं से आए रेणु एवं श्रीकांत ने 3 साल के अपूर्व को गोद लिया था.

इसी तरह 22 अगस्त, 2012 को चित्रकूटनगर स्थित महेशाश्रम की बदौलत 4 सूनी गोदें भरी थीं. बरसों से बच्चे के लिए तरस रहे दंपतियों की झोली खुशियों से भर गई थीं. उदयपुर के ही रहने वाले जितेंद्र चित्तौड़ा एवं रश्मि को 9 महीने का करण मिला तो ऐसा लगा जैसे उन्हें जिंदगी की सारी दौलत मिल गई. कर सलाहकार जितेंद्र चित्तौड़ा की पत्नी रश्मि की गोद 17 सालों से सूनी थी.

जयपुर के रहने वाले विष्णु एवं कृष्णा की गोद में 3 महीने की मेघा आई तो वे सब कुछ भूल गए. विष्णु व कृष्णा को शादी के 11 सालों बाद यह खुशी मिली थी. कृष्णा का जयपुर में बुटीक है. जवाहर माइंस के रहने वाले जितेंद्र एवं ज्योति ने शादी के 14 सालों बाद 4 महीने के अनन्य को गोद लिया. निजी कंपनी में डिप्टी मैनेजर के पद पर कार्यरत जयपुर के रहने वाले नरेन शर्मा एवं नीरा की गोद को 4 महीने की आनंदिता ने आनंद से भर दिया था.

नवजात बच्चों के लालनपालन में यह स्थिति भी आई है कि जब बीमारी, कम वजन या किसी अन्य कारण से बच्चे को बचाया नहीं जा सका. विशेषज्ञ डाक्टरों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि बच्चे में रोग प्रतिरोधक क्षमता मां के दूध से विकसित होती है. मां के दूध की बात ने एक बार फिर देवेंद्र को झकझोर दिया. उन्हें चित्तौड़गढ़ के राणा सांगा के बेटे उदय सिंह की धाय पन्ना की कहानी याद आ गई. जिस में पन्ना धाय ने अपनी कोख से जन्मे बेटे के साथ राजकुमार उदय को भी अपना स्तनपान कराया था.

मेवाड़ में धाय मां की पुरानी परंपरा रही है. देवेंद्र ने सोचा इस परंपरा को क्यों न दोबारा शुरू किया जाए. उन्होंने बच्चों के लिए मां के दूध की व्यवस्था करने की ठान ली. आवश्यक इंतजाम कर के देवेंद्र ने अप्रैल, 2013 में दिव्य मदर मिल्क बैंक की स्थापना की. कहा जाता है कि उत्तर भारत का यह पहला मदर मिल्क बैंक है. यहां हर बच्चे को मां के दूध की गारंटी दी जाती है.

अगर मां अपना अतिरिक्त दूध का दान कर देती है तो वह कम वजनी और बीमार बच्चों के लिए अमृत है. विशेषज्ञों का कहना है कि स्तनपान से शिशु मृत्यु दर में 22 प्रतिशत कमी की जा सकती है, वहीं धात्री मां (दूध दान करने वाली) के दूध से बच्चों के जीवित रहने की संभावना 6 गुना बढ़ जाती है. यह भी एक तथ्य है कि सामान्य बीमारियों व कुपोषण की वजह से 18 लाख 25 हजार बच्चे हर साल दम तोड़ देते हैं. दिव्य मदर मिल्क बैंक को पहले साल 499 मांओं ने 1203 बार में 3517 यूनिट दूध दान किया. इस में से 286 बच्चों को 3179 यूनिट दूध पिलाया गया. दूसरे साल अप्रैल, 2014 से मार्च, 2015 तक 1258 मांओं ने 2675 बार में 7517 यूनिट दूध दान किया, जिस में से 622 बच्चों को 7083 यूनिट दूध पिलाया गया.

अक्टूबर, 2014 में देवेंद्र ने महेशाश्रम की ओर से उदयपुर के चित्रकूटनगर में देश का पहला जीवनी आश्रय धाम शुरू किया. इस धाम में परिस्थितिवश अपने बच्चे को जन्म देने से डर रही गर्भवती महिलाओं को आश्रय दिया जाता है. जच्चा और बच्चा की सुरक्षा की जाती है. इस धाम को खोलने का उद्देश्य निरपराध व मासूम बच्चों की गर्भ में हो रही हत्या को न केवल रोकना है, बल्कि गर्भपात कराने वाली महिला को भी शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य मुहैया कराना है. यानी कोई बेटी बोझ ना हो और कोई मां मजबूर ना हो.

एक तरह से इस धाम में संकटग्रस्त महिलाओं को शरण दी जाती है. किसी महिला के गर्भ में कन्या है और घर वाले कन्या नहीं चाहते, जबकि महिला बेटी को जन्म देना चाहती है तो ऐसी महिला को यहां आश्रय मिल जाता है, ताकि वह अपनी बच्ची को चैन से जन्म दे सके. इस के अलावा यहां बलात्कार, विश्वासघात और भटक जाने से अथवा किसी हादसे का शिकार हो जाने से गर्भवती हुई महिलाओं को भी सुरक्षा दी जाती है. अगर इस तरह की महिलाओं का कोई पारिवारिक मतभेद होता है तो उसे भी दूर करने के प्रयास किए जाते हैं, जरूरत पड़ने पर कानूनी मदद भी उपलब्ध कराई जाती है.

हर बेटी का जन्म गौरव और उत्सव बने, इस के लिए उदयपुर में देवेंद्र बेटी गार्डन की स्थापना करना चाहते हैं. इस की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. बेटी गार्डन बन जाने के बाद महेशाश्रम में जब भी समाज की ठुकराई किसी नवजात बच्ची का प्रवेश होगा, हर परिवार की तरह यहां उस के जन्म के सारे उत्सव मनाए जाएंगे. कोई आम आदमी भी चाहेगा तो वह भी यहां अपनी बेटी का जन्मोत्सव मना सकेगा.

किसी सार्वजनिक मंच से माला न पहनने और कोई सम्मान न लेने वाले देवेंद्र अग्रवाल फरवरी, 2016 के पहले सप्ताह तक 135 बच्चे पाल चुके हैं. इन में से 112 बच्चों का पुनर्वास हो चुका है. 12 बच्चे अभी महेशाश्रम में हैं. 11 बच्चों की मौत हो चुकी है. एक समय आश्रम में 22 बेटियां आ गई थीं. महेशाश्रम से गए बच्चे राजकुमार और राजकुमारियां बन कर गए हैं. इन में से कई बच्चे साधनसंपन्न, अरबपति, मजिस्ट्रेट, सरकारी अधिकारियों, निजी क्षेत्र में बड़े पदों पर कार्यरत लोगों ने कानूनी रूप से गोद लिए हैं.

आश्रम से बच्चा गोद देने से पहले जन्म, शिक्षा, विवाह, स्वास्थ्य, रोजगार, संपत्ति, मूल निवास और पुलिस सत्यापन के आवश्यक दस्तावेज लिए जाते हैं. इस के बाद बच्चे के इच्छुक दंपति का सायकोलौजिकल टेस्ट लिया जाता है, जिस में सामान्य जीवन से जुड़े भावनात्मक सवाल पूछे जाते हैं. बच्चा गोद देने के लिए आश्रम की ओर से एक भी पैसा नहीं लिया जाता. बच्चा गोद लेने वाले को बच्चे के नाम एफडी करानी होती है. अगर बच्चे को कुछ हो जाए और स्थानीय प्रशासन उसे संदिग्ध माने तो उस रकम का निस्तारण न्यायालय द्वारा होगा, साथ ही वह बच्चा गोद लेने के तुरंत बाद से ही दत्तक मातापिता की अपनी संतान की तरह उन की संपत्ति का उत्तराधिकारी होगा.

फिल्म अभिनेता आमिर खान के टीवी शो ‘सत्यमेव जयते’ के पहले एपिसोड में दिखाए गए राजस्थान के कन्या भ्रूण के मामलों ने पूरे देश की आंखें खोल दी थीं. सन 2011 की जनगणना के आंकड़े भी भयावह स्थिति पेश कर रहे हैं. राजस्थान में एक हजार लड़कों पर 883 लड़कियां हैं. इस में कोई दोराय नहीं कि बेटियों को गर्भ में मारने के लिए राजस्थान सदियों से बदनाम रहा है. लेकिन सरकारी प्रयासों और देवेंद्र अग्रवाल जैसे लोगों के आगे आने से अब हालात काफी बदल गए हैं.

बेटियों को बचाने की मुहिम में जुटे देवेंद्र अग्रवाल के सराहनीय कार्य को देखते हुए 6 महीने पहले राजस्थान सरकार ने उन्हें स्वास्थ्य विभाग में सलाहकार नियुक्त किया है. उन्हें राज्यभर में मदर मिल्क बैंक, पालनागृह की स्थापना और संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है. देवेंद्र हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड में पालनागृह तथा मदर मिल्क बैंक शुरू करना चाहते हैं. उन का कहना है, मेरे 2 बेटे हैं, कोई बेटी नहीं है. फिर भी अब तक सौ से ज्यादा बेटियों का पिता होने का गर्व महसूस करता हूं. यह कोई कन्यादान से कम नहीं है. इतनी बच्चियों को जीवन दे कर मैं अपनी जिंदगी को सफल मानता हूं.

देवेंद्रजी की खास बात यह है कि वह सरकार या किसी व्यक्ति से कोई चंदा नहीं लेते. जिन लोगों को वह योग सिखाते हैं, उन से मिली फीस और उन के सहयोग से ही उन के इस महेशाश्रम का सारा खर्च चलता है. Hindi Stories

(भगवती विकास संस्थान के दस्तावेजों व देवेंद्र अग्रवाल से बातचीत पर आधारित)

 

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