Kidnaping Case: अपहरण कांड के खुलासे के लिए पुलिस की 15 टीमों ने लगभग 7 सौ लोगों से पूछताछ की और 3 लाख रुपए के इनाम की भी घोषणा की. आखिर 2 महीने बाद जब मामला खुला तो पता चला कि अपहर्त्ता पेशेवर नहीं, नौसिखिए थे, जिन्होंने टीवी शो देख कर योजना बनाई थी.

अंकित गुप्ता उत्तरपूर्वी दिल्ली के विक्टोरिया पब्लिक स्कूल में 12वीं में पढ़ता था. 11 फरवरी, 2016 को उस का फिजिकल एजुकेशन का प्रैक्टिकल था. प्रैक्टिकल देने के लिए वह नियत समय से पहले बाबरपुर स्थित अपने घर से बाइक ले कर स्कूल के लिए निकला. जैसे ही वह स्कूल पहुंचा, उसे जानकारी मिली कि स्कूल की टीचर चांदनी के पति की मौत हो गई है.

चांदनी अंकित की प्रिय टीचर थीं, इसलिए दोपहर एक बजे प्रैक्टिकल खत्म हो जाने के बाद वह अपने एक दोस्त के साथ शालीमार गार्डन स्थित चांदनी के घर चला गया. उसी समय उस के पिता अनिल गुप्ता को बाइक से कहीं जाना था. उन्होंने अंकित को फोन कर के पूछा कि वह कितनी देर में घर पहुंच रहा है. तब अंकित ने बताया कि वह शाम 4 बजे तक घर पहुंच जाएगा.

अपनी टीचर के यहां संवेदना प्रकट करने के बाद अंकित शाम 4 बजे अपने घर पहुंच गया. स्कूल की ड्रैस चेंज करने के बाद वह खाना खा रहा था, तभी उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया. फोन पर बात करने के बाद अंकित ने फटाफट खाना खाया और अपनी मां मीरा गुप्ता से बोला, ‘‘मम्मी, मैं कहीं जा रहा हूं और एकडेढ़ घंटे में आ जाऊंगा.’’ इतना कह कर वह खुश होता हुआ पैदल ही घर से निकल गया.

उत्तरपूर्वी दिल्ली के बाबरपुर की गली नंबर 2 में रहने वाले अनिल गुप्ता के 4 बेटों और एक बेटी में अंकित सब से छोटा था. अनिल गुप्ता स्क्रैप व्यापारी थे. उन की अच्छीखासी आमदनी थी, इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाया. उन के परिवार का रहनसहन भी अच्छा था. अनिल एकडेढ़ घंटे में घर आने की बात कह कर गया था, लेकिन वह रात 9 बजे तक नहीं आया. वैसे भी वह अपने दोस्तों के साथ कहीं जाता था तो 8-9 बजे तक घर आ जाता था. पर उस दिन वह नहीं आया तो उस की मां ने उस का नंबर मिलाया तो नंबर नहीं मिला. उस का फोन कंप्यूटर द्वारा बंद बताया. अंकित के पास 2 फोन थे, जिन में 3 सिमकार्ड थे. उन्होंने उस के तीनों नंबरों पर बात करने की कोशिश की, लेकिन तीनों ही नंबर स्विच्ड औफ मिले.

अनिल गुप्ता उस समय सोनिया विहार स्थित अपनी दुकान पर थे. मीरा ने फोन कर के उन्हें भी अंकित के घर न लौटने की जानकारी दे दी. अनिल गुप्ता ने इस बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया. उन्होंने कहा कि अपने यारदोस्तों के साथ कहीं गपशप मार रहा होगा, जिस की वजह से उस ने अपने फोन बंद कर दिए होंगे या फिर बैटरी डिस्चार्ज हो गई होगी. पति से बात करने के बाद मीरा ने भी सोचा कि अंकित इतना नासमझ नहीं है. थोड़ीबहुत देर में आ ही जाएगा.

अनिल गुप्ता अपनी दुकान बंद कर के घर लौट आए. तब तक अंकित घर नहीं लौटा था. उन्होंने बेटे को कई बार फोन किए, लेकिन उस के फोन बंद ही आ रहे थे. पता नहीं वह कहां चला गया, जो अभी तक नहीं आया, वह बुदबुदा रहे थे. बेटे के जितने दोस्तों को वह जानते थे, उन में से जिनजिन के फोन नंबर उन्हें मिले, उन से उन्होंने बात की. दोस्तों ने यही बताया कि अंकित उन्हें स्कूल में ही मिला था, उस के बाद उन्होंने उसे नहीं देखा. अब तक रात काफी हो चुकी थी. लिहाजा उन्होंने उसे सुबह ढूंढने का फैसला लिया.

अनिल और उन की पत्नी को बेटे की चिंता में रात भर नींद नहीं आई. वह यही सोचते रहे कि पता नहीं अंकित कहां और किस हालत में होगा. सुबह होते ही अनिल अपने छोटे भाई संजीव के साथ बेटे को ढूंढने निकल गए. घरपरिवार के लोग उसे संभावित जगहों पर तलाश करने लगे. दोपहर हो गई लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

दोपहर बाद 2 बजे के करीब अनिल गुप्ता संजीव को ले कर थाना वेलकम पहुंच गए. थानाप्रभारी प्रशांत कुमार को उन्होंने बेटे के गायब होने की बात बताई. अनिल गुप्ता थानाप्रभारी से बात कर ही रहे थे कि उसी समय उन के फोन की घंटी बजी. जैसे ही उन्होंने काल रिसीव की, दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘तुम्हारा लड़का हमारे कब्जे में है. यदि उसे जिंदा चाहते हो तो एक करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो.’’ कहने के बाद उस ने फोन काट दिया.

बेटे के अपहरण की बात सुन कर अनिल घबरा गए. उन्होंने कई बार ‘हैलोहैलो’ कहा, लेकिन वह काल डिसकनेक्ट की चुकी थी. जिस नंबर से वह काल आई थी, अनिल ने वह नंबर मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. घबराते हुए उन्होंने थानाप्रभारी को बताया, ‘‘सर, मेरे बेटे का किसी ने अपहरण कर लिया है. अभीअभी किसी ने फोन कर के मुझ से एक करोड़ रुपए मांगे हैं. मेरे बेटे को उन लोगों के चंगुल से छुड़ा लीजिए सर.’’

अनिल गुप्ता की बात सुन कर थानाप्रभारी प्रशांत कुमार भी हैरान रह गए. उन्होंने तुरंत उन का मोबाइल ले कर उस फोन नंबर को नोट किया, जिस से उन्हें फोन किया गया था. वह नंबर 750363333 एयरसेल कंपनी का था. मामला बेहद गंभीर था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसीपी शाहदरा और डीसीपी ए.के. सिंगला को दी. उन के निर्देश पर थानाप्रभारी ने अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 363 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी.

डीसीपी ए.के. सिंगला ने शाहदरा क्षेत्र के एसीपी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी प्रशांत कुमार, अतिरिक्त थानाप्रभारी हरेंद्र सिंह, एसआई तेजबीर सिंह, हेडकांस्टेबल पूनमरानी, कांस्टेबल रामप्रसाद आदि को शामिल किया गया.

अपहरण के मामले बड़े ही संवेदनशील होते हैं. इस में पुलिस की यही कोशिश रहती है कि किसी भी तरह अपहृत शख्स को सुरक्षित बरामद किया जाए. पुलिस टीम ने सब से पहले एयरटेल के उस नंबर की जांच करवाई, जिस से फिरौती की काल की गई थी. जांच में पता चला कि वह नंबर वेस्ट ज्योतिनगर के किसी आदमी के नाम से लिया गया था और फिरौती की काल वैशाली, गाजियाबाद इलाके से की गई थी. तुरंत ही 2 पुलिस टीमें उक्त दोनों जगहों पर भेज दी गईं.

वहां जा कर पता चला कि जिस व्यक्ति के नाम पर यह सिमकार्ड खरीदा गया था, उस नाम का कोई शख्स वेस्ट ज्योतिनगर वाले पते पर नहीं रहता था. इस का मतलब अपहर्त्ता ने फरजी आईडी पर वह नंबर खरीदा था. लिहाजा यह टीम वापस आ गई. जो टीम वैशाली गई थी, उसे भी कोई सफलता नहीं मिली, लिहाजा वह भी लौट आई. जिस वक्त पुलिस जांच में लगी थी, उसी दौरान सवा 2 और ढाई बजे के बीच अनिल गुप्ता के मोबाइल पर अपहर्त्ताओं ने 2 बार और फोन किए. उन में भी यही कहा कि पैसों का इंतजाम जितनी जल्दी कर लोगे, उतना ही अच्छा रहेगा. अनिल ने अपहर्त्ता से कहा कि यह रकम बहुत बड़ी है, इंतजाम करने में टाइम तो लगेगा ही. उन्होंने उस से अनुरोध किया कि वह पैसों का इंतजाम कर देंगे, लेकिन बेटे को कुछ न कहें.

अनिल ने यह जानकारी भी पुलिस को दे दी. अपहर्त्ताओं के पास जाने का पुलिस के पास कोई जरिया नहीं था. पुलिस ने अंकित के मांबाप से फिर से बात की. पुलिस ने उन से अंकित के दोस्तों के बारे में जानकारी हासिल की. पता चला कि अंकित स्कूल से लौटने के बाद दोस्तों के साथ क्रिकेट और मौल में पूल खेलने जाता था. जिन दोस्तों के साथ वह यह खेल खेलता था, पुलिस ने उन दोस्तों की भी लिस्ट बनाई. इस के अलावा उन्होंने अनिल से यह भी मालूम किया कि उन्हें किसी पर कोई शक तो नहीं है.

अनिल गुप्ता ने किसी पर कोई शक नहीं जताया, तब पुलिस ने अंकित के दोस्तों से ही जांच शुरू की. एकएक कर उस के साथ पूल और क्रिकेट खेलने वाले बच्चों से पूछताछ की गई, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. अंकित के पास जो 3 फोन नंबर थे, उन तीनों की काल डिटेल्स निकलवाई गई. इस से पता चला कि उस के पास आखिरी बार 880233333 नंबर से काल आई थी. इसी नंबर से आई काल के बाद वह घर से गया था. इतना ही नहीं, इस फोन नंबर पर अंकित की 11 फरवरी को 7 बार और 8 फरवरी को 3 बार बात हुई थी. इस से पहले इस नंबर से अंकित को कोई काल नहीं आई थी.

फोन नंबर हासिल होने पर पुलिस को उम्मीद की किरण दिखाई दी. जांच करने पर पता चला कि यह नंबर अशोकनगर के किसी आदमी का है. फौरन एक टीम अशोकनगर में उस पते पर भेज दी गई. लेकिन वहां जा कर पता चला कि यह सिम भी फरजी आईडी से लिया गया था. लिहाजा पुलिस टीम बैरंग लौट आई. पुलिस उस डीलर के पास पहुंची, जिस की मार्फत इस नंबर को एक्टिवेट कराया गया था. वह दुकानदार कबीरनगर का दानिश था. दानिश से पूछताछ के बाद पता चला कि उस ने फरजी आईडी से यह फोन नंबर एक्टिवेट करा रखा था. लेकिन इस नंबर को उस ने किसे बेचा, यह नहीं बता पाया. चूंकि उस ने फरजी आईडी से सिम एक्टिवेट करा कर के गैरकानूनी काम किया था, इसलिए पुलिस ने उस के खिलाफ काररवाई कर के उसे जेल भेज दिया.

अगले दिन दोपहर बाद 2 बजे अनिल के मोबाइल पर अपहर्त्ता का फिर फोन आया. इस बार उस ने धमकी दी, ‘‘पैसे जल्दी इकट्ठे कर लो, वरना तुम्हारे बेटे को मार दिया जाएगा.’’

‘‘नहीं…नहीं, बेटे को कुछ नहीं कहना, मैं पैसों का जुगाड़ कर रहा हूं.’’ अनिल गुप्ता ने अनुरोध करते हुए कहा, लेकिन उन की बात सुनने से पहले ही अपहर्त्ता ने फोन काट दिया. अपहर्त्ता अपनी बात कहने के बाद फोन काट देता था. पुलिस ने जांच की तो पता चला कि इस बार अपहर्त्ता के फोन की लोकेशन नवीन शाहदरा की आ रही थी. नवीन शाहदरा में किस जगह से उस ने काल की थी, यह पता लगाना आसान नहीं था.

उधर अंकित की चिंता में घर वाले तो परेशान हो ही रहे थे, साथ ही पुलिस की चिंता भी बढ़ती जा रही थी. क्योंकि उसे ऐसा कोई क्लू नहीं मिल रहा था, जिस से अपहर्त्ताओं के पास पहुंचा जा सके. फिर भी पुलिस अपने हिसाब से काररवाई कर रही थी.

उसी दिन शाम 7 बजे अंकित के ही मोबाइल पर अपहर्त्ता ने फिर से फोन किया, ‘‘पैसों का इंतजाम हुआ या नहीं?’’

‘‘कर रहे हैं. अभी भी मैं पैसों के लिए ही किसी के पास जा रहा हूं.’’ अनिल ने कहा.

‘‘पुलिस को खबर करने की भूल मत करना, वरना…’’ अपहर्त्ता ने चेतावनी दी.

‘‘नहीं, मैं पुलिस को कुछ नहीं बताऊंगा. लेकिन मेरे बेटे को कुछ नहीं होना चाहिए.’’ अनिल ने कहा पर अपहर्त्ता ने जवाब दिए बिना ही फोन काट दिया.

इस बार अपहर्त्ता के फोन की लोकेशन जीटी रोड, शाहदरा की आ रही थी. पुलिस ने जीटी रोड शाहदरा और नवीन शाहदरा में सड़कों के किनारे जहांजहां सीसीटीवी कैमरे लगे थे, उन सभी की फुटेज निकलवा कर फोन करते हुए अपहर्त्ता की रिकौर्डिंग ढूंढनी चाही. इस काम में कई पुलिसकर्मियों को लगाया गया, पर पुलिस को ऐसी फुटेज नहीं मिली.

14 फरवरी की शाम को अपहर्त्ता ने अनिल को फोन कर के पैसों के इंतजाम के बारे में पूछा तो अनिल ने बताया कि अभी तक 20 लाख का ही इंतजाम हो पाया है. इस पर अपहर्त्ता ने कहा कि एक बैग में पैसे रख कर बाइक से भजनपुरा रेडलाइट पहुंच जाओ. ध्यान रखना कि साथ में पुलिस न हो.

अपहर्त्ता का जब भी फोन आता, अनिल उस की सूचना पुलिस को जरूर दे देते थे. इस काल की जानकारी के बाद पुलिस ने अपहर्त्ताओं को जाल में फांसने का पुख्ता इंतजाम कर लिया. भजनपुरा रेडलाइट और उस के आसपास सादा कपड़ों में पुलिस तैनात कर दी गई. एक बैग में जीपीएस चिप लगा कर उस में नोटों के आकार की कागज की गड्डियां, फिर उन के ऊपर असली नोट रख कर बाइक से अनिल गुप्ता को रवाना कर दिया गया. उन के पीछे पुलिस टीम की गाड़ी भी लग गई. टीम के सभी लोग सादा लिबास में थे.

भजनपुरा रेडलाइट पर अनिल गुप्ता काफी देर तक खड़े रहे, लेकिन उन के पास बैग लेने कोई नहीं आया. करीब 2-3 घंटे बाद उन के पास अपहर्त्ता का फोन आया, ‘‘मैं ने तुम से पुलिस साथ में लाने को मना किया था ना, पर तुम नहीं माने. अब मूड खराब है, इसलिए घर जाओ बाद में बात करूंगा.’’

अनिल की बात सुने बिना ही उस ने फोन काट दिया था. अनिल से इस बार भी अपनी बात कहने के लिए अपहर्त्ता को फोन लगाया, लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ था. अपहर्त्ता ने गुस्से में बात की थी, इसलिए बेटे की सलामती को ले कर उन की चिंता बढ़ने लगी. इस के बाद 14 फरवरी को अलगअलग जगहों से 6 बार काल आई. इन सब बातों से पुलिस को यकीन हो गया कि अपहर्त्ता बेहद शातिर है. पुलिस ने इस तरह की वारदातों में शामिल रहे अनेक बदमाशों को हिरासत में ले कर पूछताछ की, पर नतीजा कुछ नहीं निकला.

अपहर्त्ता बात करने के लिए केवल एयरटेल के 7503633333 नंबर का ही उपयोग कर रहा था और बात करते ही वह फोन स्विच्ड औफ कर देता था. इस के अलावा इस नंबर से किसी और से बात नहीं करता था. इसलिए पुलिस अपहर्त्ता के पास नहीं पहुंच पा रही थी. 15 फरवरी को अनिल के पास अपहर्त्ता का फिर फोन आया, उस में उन्हें पैसे ले कर एकडेढ़ बजे मोहननगर की रेडलाइट के पास बुलाया गया. अनिल निर्धारित समय से पहले ही बाइक से मोहननगर की रेडलाइट के पास जा कर खड़े हो गए. उन के आसपास दिल्ली पुलिस थी. वहां खड़े हो कर काफी देर इंतजार करने के बाद भी उन से पैसों का बैग लेने तो कोई नहीं आया, पर अपहर्त्ता का फोन जरूर आ गया. उस ने कहा, ‘‘यहां से तुम मेरठ रोड पर आ जाओ.’’

अनिल उस के कहे अनुसार, मेरठ रोड पहुंच गए. वहां भी उन के पास पैसे लेने कोई नहीं आया. अनिल के साथसाथ पुलिस टीम भी परेशान हो रही थी.

एकडेढ़ घंटा इंतजार करने के बाद अपहर्त्ता का फोन आया, ‘‘गुप्ताजी, लगता है तुम्हें अपना बेटा जिंदा नहीं चाहिए, इसलिए तुम हर बार पुलिस को साथ ला रहे हो.’’

‘‘मेरे साथ पुलिस नहीं है. मैं बिलकुल अकेला आया हूं. आप मुझ से पैसे ले लीजिए और बेटे को छोड़ दीजिए.’’ अनिल ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘अब तुम जाओ. आज शाम को बता देंगे कि पैसे कहां पहुंचाने हैं. अबकी बार चालाकी दिखाने की कोशिश मत करना.’’ कह कर अपहर्त्ता ने फोन काट दिया.

अनिल उदास चेहरा ले कर घर लौट गए. जैसे ही वह घर जाते, उन की पत्नी उन से मालूम करतीं कि अपहर्त्ताओं से क्या बात हुई और बेटा घर कब आएगा, तब अनिल पत्नी को भरोसा दे देते कि चिंता मत करो, बेटा जल्दी ही आ जाएगा. पुलिस जांच में पता चला कि अपहर्त्ता ने उस दिन गाजियाबाद के अलगअलग इलाके से फोन किए थे.15 फरवरी को ही रात 8 बजे फोन कर के अपहर्त्ता ने कहा, ‘‘एक कट्टे (बोरे) में पैसे रख कर उस पर कूड़ा भर कर उसे कर्दमपुरी के कूड़ाघर में रात 9 बजे फेंक आना.’’

‘‘ठीक है, मैं ऐसा ही करूंगा, पर आप कम से कम एक बार मेरे बच्चे से मेरी बात तो करा दीजिए.’’ अनिल ने कहा. लेकिन उन की बात का जवाब दिए बिना ही उस ने फोन काट दिया.

बेटे को ले कर अनिल गुप्ता की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उन की पत्नी मीरा की तो रोरो कर आंखें सूज आई थीं. अपहर्त्ता से बात होते ही अनिल ने चावल के एक खाली कट्टे में केवल कुछ कूड़ा भरा. उन्होंने इस बार उस में रुपए नहीं रखे. फिर उस कट्टे को अपने भाई राजीव के साथ ले जा कर कर्दमपुरी के कूड़ाघर में डाल आए. योजना के अनुसार, पुलिस पहले से उस जगह पर निगाह रख रही थी. कट्टा डालने के कई घंटे बाद भी न तो किसी ने उस बोरे को उठाया और न ही अनिल के पास कोई फोन आया.

अगले दिन सुबह के समय अपहर्त्ता का फोन आया, ‘‘तुझे कई बार मना किया था न कि पुलिस के चक्कर में मत पड़, मगर तू नहीं माना. तू बहुत सयाना बन रहा है, अब तू पुलिस से ही ऐसीतैसी कराते रहना. तू पैसे नहीं दे रहा तो कोई बात नहीं.’’

अनिल ने सफाई देनी चाही, लेकिन उन की बात सुनने से पहले उस ने फोन काट दिया. इस के बाद अनिल के पास अपहर्त्ता का कोई फोन नहीं आया. अनिल ने बेटे का पता लगाने वाले को 2 लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा कर दी. उन्होंने पूरे यमुनापार इलाके में इस तरह के 10 हजार पोस्टर भी छपवा कर चस्पा करवा दिए. पुलिस को भी अंकित के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली.

इस बीच दिल्ली और एनसीआर में अंकित की उम्र के किसी लड़के की अज्ञात लाश बरामद होती तो पुलिस उस के फोटो अनिल गुप्ता को दिखाती. उन में किसी में अंकित की लाश नहीं मिली. ऐसी उन्हें 26 लाशें दिखाई गईं. 14 फरवरी को नोएडा के दादरी क्षेत्र में एक लड़के की डैडबौडी मिली. इस की सूचना दिल्ली पुलिस को मिली तो पुलिस ने उस लाश के फोटो भी अनिल को दिखाए. वह फोटो कुछकुछ अंकित की तरह लग तो रही थी. लेकिन कपड़ों की वजह से उन्होंने उस लाश को पहचानने से इनकार कर दिया. मरने वाला लड़का कत्थई रंग की शर्ट पहने हुए था, जबकि अंकित घर से निकलने समय लाल रंग की शर्ट पहन कर गया था.

तत्कालीन पुलिस आयुक्त बी.एस. बस्सी भी इस केस पर बराबर निगाह रखे हुए थे. वह केस की रोजाना की प्रोग्रैस रिपोर्ट देखते थे. उन्होंने इस केस को सुलझाने के लिए उत्तरपूर्वी दिल्ली के स्पैशल स्टाफ, एएटीएस, एसटीएफ के अलावा क्राइम ब्रांच की एंटी किडनैपिंग सेल, स्पैशल सेल को भी लगा दिया. डीसीपी ए.के. सिंगला के ही निर्देशन में 15 पुलिस टीमें इस केस को सुलझाने में जुट गईं. सभी टीमें अलगअलग दृष्टिकोण से केस को सुलझाने में लगी थीं. इतना ही नहीं, पुलिस आयुक्त ने भी अंकित का पता बताने वाले को एक लाख रुपए इनाम देने की घोषणा कर दी.

एसीपी वाई.के. त्यागी अपनी टीम के इंसपेक्टर के.जी. त्यागी, एसआई मुकेश कुमार, प्रदीप कुमार, नीरज कुमार, पंकज, अमर सिंह, एएसआई ओमेंद्र सिंह, कांस्टेबल नितिन के साथ लगे हुए थे. इस टीम ने अपहृत अंकित के तीनों फोन नंबरों की फिर से जांच की. टीम ने पता लगाया कि वह पूल खेलने कहां जाता था और क्रिकेट किन के साथ खेलता था. टीम को यह पता चला कि वह डांस का भी शौकीन था. वह गोकलपुरी में डांस सीखने जाता था.

पुलिस टीम ने उस के स्कूल के दोस्तों, गली के दोस्तों, रिश्तेदारों के अलावा दुश्मनों की भी लिस्ट बनाई. इस के बाद इन सभी से एकएक कर के पूछताछ करनी शुरू कर दी. टीम ने जिले के आपराधिक तत्वों को भी निशाने पर लिया. करीब 6-7 सौ लोगों से पूछताछ की, लेकिन उन से कोई क्लू नहीं मिला. अंकित को घर से निकलने के बाद किसी ने किसी के साथ जाते हुए नहीं देखा था, इसलिए पुलिस को केस खोलने में सफलता नहीं मिल रही थी.

इंसपेक्टर के.जी. त्यागी ने अब उस फोन नंबर पर अपना ध्यान लगाया, जिसे अपहर्त्ता ने प्रयोग किया था. पता चला कि वह फोन जनवरी, 2016 में एक्टिवेट हुआ था. अंकित जब 11 फरवरी को घर से निकला था, यह कह कर गया था कि वह कहीं जा रहा है और थोड़ी देर में लौट आएगा. इस से उन्होंने यही अनुमान लगाया कि जिस का फोन सुन कर वह घर से निकला था, वह व्यक्ति केवल अंकित का ही परिचित था. उसे अंकित की मां नहीं जानती थीं. अगर वह मां का भी जानने वाला होता तो अंकित सीधे कहता कि मैं फलां के साथ जा रहा हूं. पुलिस ने काफी घोड़े दौड़ाए, पर वह उस व्यक्ति को नहीं पहचान पाई, जिस ने अंकित को फोन कर के बुलाया था.

घूमफिर कर पुलिस उसी फोन नंबर की जांच में लग गई, जिसे अपहर्त्ता ने प्रयोग किया था. इस के अलावा अंकित के तीनों फोन नंबरों की काल डिटेल्स का अध्ययन कर के उन नंबरों को छांटा, जिन से अंकित की कभीकभार बात होती थी. ऐसे 50-60 संदिग्ध नंबर पुलिस के सामने आए. इन 50-60 नंबरों में पुलिस को एक नंबर ऐसा मिला, जिस से अंकित की केवल 6 फरवरी, 2016 को ही बात हुई थी. वह फोन नंबर एयरसेल कंपनी का था.

जांच में पता चला कि एयरसेल का यह नंबर अंकित के दोस्त जीशान का था. जीशान विजय पार्क, मौजपुर का रहने वाला था. पुलिस ने जीशान से अभी कुछ नहीं कहा, बल्कि यह पता लगाया कि अपहर्त्ता ने जिन जगहों से फिरौती की काल की थी, उन में से किसी जगह पर एयरसेल का यह नंबर मौजूद था या नहीं. टीम ने आखिर यह पता लगा ही लिया. काल डिटेल्स से इस बात की पुष्टि हो गई कि कई जगहों पर एयरसेल का यह नंबर और अपहर्त्ता के नंबर की लोकेशन एक ही थी. इस से यह बात पता लगी कि दोनों फोन नंबर साथसाथ ही थे. इस जांच से जीशान पुलिस के शक के दायरे में आ गया. फिर 4 अप्रैल, 2016 को उसे उस के घर से पूछताछ के लिए उठा लिया गया.

19 साल के जीशान से पुलिस ने सख्ती के साथ अंकित के बारे में पूछताछ की तो वह पुलिस के सामने ज्यादा देर टिक नहीं पाया. उस ने बताया कि उस ने अपने दोस्त इलियास (17) के साथ मिल कर अंकित का अपहरण किया था और 11 फरवरी को ही उस की हत्या कर लाश दादरी थाने के बादलपुर इलाके में डाल दी थी. हत्या की बात सुन कर पुलिस सन्न रह गई. फिर पुलिस ने उस की निशानदेही पर उसी दिन यमुनाविहार के रहने वाले इलियास को भी हिरासत में ले लिया.

पुलिस दोनों अभियुक्तों को उसी जगह पर ले गई, जहां उन्होंने लाश फेंकी थी. संपर्क करने पर दादरी पुलिस ने बताया कि 14 फरवरी, 2016 को सुबह करीब 8 बजे बादलपुर से जूट के बोरे में एक लड़के की लाश बरामद की थी, जिस के हाथपैर बंधे हुए थे. शिनाख्त न होने पर पोस्टमार्टम के बाद 16 फरवरी को उस का अंतिम संस्कार करा दिया था. दिल्ली पुलिस ने अनिल गुप्ता को दादरी ले जा कर उस लाश के फोटो दिखाए. उन फोटो को वह पहले भी देख चुके थे. तब उन्होंने शर्ट का रंग दूसरा होने और लाश के फूले होने की वजह से शिनाख्त नहीं की थी. अब गौर से देखा तो लाश उन के बेटे अंकित की ही निकली.

लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने 5 अप्रैल को अभियुक्त जीशान और इलियास को न्यायालय में पेश कर 3 दिनों का पुलिस रिमांड लिया. रिमांड अवधि में पूछताछ करने पर अंकित के अपहरण की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली. 19 वर्षीय जीशान एक ड्राइवर था. पास के ही रहने वाले इलियास से उस की दोस्ती थी. इलियास नाबालिग था. उस ने 7वीं तक पढ़ाई की थी. दोनों ही आवारा थे. वे जल्द से जल्द मोटा पैसा कमाना चाहते थे. इस के लिए कुछ भी करने को तैयार थे. दोनों यह जानते थे कि ज्यादा पैसा कमाने के लिए कोई न कोई उल्टासीधा काम तो करना ही पड़ेगा. वह काम कौन सा और क्या किया जाए, इस के लिए वे टीवी पर प्रसारित होने वाले क्राइम पैट्रोल कार्यक्रम को बड़े गौर से देखते थे.

यह कार्यक्रम देखने के बाद उन्होंने किसी का अपहरण करने की योजना बनाई. अब समस्या यह आई कि अपहरण किस का किया जाए. उसी समय इलियास के दिमाग में अपने दोस्त अंकित का चेहरा घूम गया. अंकित बहुत बनठन कर रहता था और दोस्तों पर खुले हाथों से पैसे खर्च करता था. अंकित के अलावा उन्होंने एक और लड़के को टारगेट में रखा. योजना के अनुसार, उन्होंने एक दुकानदार से किसी बहाने से ऐसे 3 सिमकार्ड खरीदे, जो पहले से ही एक्टिवेट थे. कई महीने की प्लानिंग के बाद इलियास ने फरवरी के पहले हफ्ते में अपने एक नाबालिग दोस्त का अपहरण करने के लिए उसे फोन कर के बुलाया, पर वह किसी वजह से नहीं आया तो इलियास ने दूसरे दोस्त अंकित को 11 फरवरी, 2016 को साढ़े 4 बजे दूसरे फोन नंबर 7503633333 से फोन कर के 100 फुटा रोड पर बुलाया.

इलियास अंकित के साथ 7वीं कक्षा तक पढ़ा था. पढ़ाई छोड़ने के बाद भी दोनों मिलते रहते थे. उन की दोस्ती बरकरार थी. इलियास अंकित के घर नहीं जाता था, तभी तो उसे अंकित के घर वाले नहीं जानते थे. इलियास के बात करने के बाद अंकित फटाफट खाना खा कर घर के बाहर आ गया. 100 फुटा रोड पर जीशान और इलियास मारुति आल्टो कार नंबर डीएल9सीएस 9715 में उस का इंतजार कर रहे थे. यह कार जीशान के एक परिचित की थी. जैसे ही अंकित उन के पास पहुंचा, इलियास ने उस का जीशान से परिचय कराया और कहा कि आज एक खुशी है, इसलिए साथ खाएंगेपिएंगे.

तीनों उस आल्टो कार से भजनपुरा पहुंचे. वहां से जीशान ने शराब खरीदी. भजनपुरा के सुभाष मोहल्ले में जीशान के बहनोई का एक फ्लैट था. वह अकसर खाली रहता था. उस की चाबी जीशान के पास ही रहती थी. जीशान अंकित को उसी फ्लैट पर ले आया. वहां उन्होंने अंकित को जम कर शराब पिलाई. जब वह नशे में धुत हो गया तो साथ लाई रस्सी से उन्होंने उस का गला घोंट दिया. उस की पहचान न हो, इसलिए इलियास ने उस की लाल रंग की शर्ट उतार कर अपनी कत्थई रंग की शर्ट पहना दी. उस की जेब में रखा उस का आईडी कार्ड, गले में पड़ा सोने का लौकेट, मोबाइल फोन, जूते, पर्स आदि अपने पास रख लिए.

फिर उस के हाथपैर रस्सी से बांध कर जूट के एक बोरे में भर कर बांध दिया. वह बोरे को ऐसी जगह ठिकाने लगाना चाहते थे, जिस से उस की शिनाख्त न हो. इस के बाद वह उस बोरे को कार में डाल कर गौतमबुद्ध नगर के बादलपुर इलाके में ले गए. उसे दादरी बाईपास के किनारे डाल कर वह रात 11 बजे दिल्ली लौट आए.

लाश ठिकाने लगा कर वे बेफिक्र हो गए थे. अब उन का मकसद उस के घर वालों से फिरौती वसूलना था. अगले दिन से उन्होंने उस के पिता को फोन कर के एक करोड़ रुपए की फिरौती मांगी. वह अलगअलग जगहों से फिरौती की काल करते रहे. उन्होंने उसे पहले इसलिए मार दिया, ताकि उसे बंधक बनाने का झंझट ही न रहे. इन्होंने इतनी फूलप्रूफ योजना बनाई थी कि पुलिस के लिए यह केस एक चुनौती बन गया था. दोनों नौसिखिए एक शातिर अपराधी की तरह पुलिस को करीब 2 महीने तक घुमाते रहे.

दिल्ली पुलिस के तेजतर्रार पुलिस अधिकारी भी उन की शातिराना चाल को नहीं समझ पा रहे थे. बड़ी मशक्कत के बाद आखिर पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार तो कर लिया, लेकिन अंकित के परिजनों का कहना है कि दोनों लड़कों के पीछे किसी शातिर बदमाश का हाथ जरूर रहा होगा. इन की निशानदेही पर पुलिस ने मारुति आल्टो कार, अंकित की शर्ट, पर्स, लौकेट, आईडी कार्ड, जूते, फोन आदि बरामद कर लिए हैं. पुलिस ने 7 अप्रैल को जीशान को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया, जबकि नाबालिग इलियास को बाल न्यायालय में पेश कर बालसुधार गृह भेज दिया. मामले की जांच थानाप्रभारी प्रशांत कुमार कर रहे हैं. Kidnaping Case

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. इलियास परिवर्तित नाम है.

 

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