Hindi Stories: लक्ष्य को ध्यान में रख कर अगर मजबूत इरादों के साथ काम किया जाए तो विकलांगता भी बौनी साबित होती है, देखने और सुनने में अक्षम मनीराम शर्मा ने आईएएस अफसर और नेत्रहीन ब्रह्मानंद शर्मा ने जज बन कर यही कर दिखाया.
कहते हैं, आदमी के लिए कुछ भी असंभव नहीं है. अगर वह ठान ले तो कोई भी काम उस के लिए मुश्किल नहीं है. जिन लोगों ने अपनी कमी और कमजोरी को हथियार बना कर मेहनत की, उन्होंने कामयाबी की मंजिल निश्चित रूप से हासिल की. ऐसे अनेक लोगों की कामयाबी के किस्सेकहानियां हमें सुनने को मिलते रहते हैं. जो देख नहीं सकते, सुन नहीं सकते या बोल नहीं सकते थे. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और मन की आवाज को सुनी, जुनून के साथसाथ तब तक पीछे मुड़ कर नहीं देखा, जब तक उन्होंने कामयाबी हासिल नहीं कर ली.
ऐसे दिव्यांग लोगों ने अपनी शारीरिक कमियों को अपनी पढ़ाई या दूसरी विधा पर हावी नहीं होने दिया. अपनी जिद और जज्बे से दुनिया में कामयाबी की कहानी लिखी. शारीरिक रूप से विकलांग ऐसे ही कुछ लोगों की सफलता की कहानी यहां पेश है, जो आज हीरो बन कर समाज को एक नई दिशा दे रहे हैं. सब से पहले हम भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी मनीराम शर्मा के बारे में बताना चाहेंगे. वह इस समय हरियाणा के मेवात के नूंह जिले में जिला परिषद में मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर तैनात हैं. राजस्थान के जिला अलवर की तहसील कठूमर के बदनगढ़ी गांव के रहने वाले मनीराम शर्मा जन्म से ही न तो पूरी तरह बोल सकते थे और न पूरी तरह सुन सकते थे. उन के पिता मजदूरी करते थे और मां बधिर थीं. पूरा परिवार अनपढ़ था.
घर की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर थी. गुजरबसर मुश्किल से होती थी. ऐसे में बच्चे का इलाज कैसे होता? इलाज न होने से 9 साल की उम्र में मनीराम की सुनने की क्षमता पूरी तरह से खत्म हो गई, लेकिन उन में पढ़ने की ललक थी. पढ़ाई के लिए उन्होंने तमाम पापड़ बेले. बदनगढ़ी गांव काफी पिछड़ा था, वहां कोई स्कूल नहीं था. आज भी इस गांव में कोई सरकारी स्कूल नहीं है. मनीराम पढ़ने के लिए 3 किलोमीटर पैदल चल कर या कभी किसी की साइकिल पर बैठ कर पास के गांव अखैगढ़ जाते थे. बाद में खेड़ली कस्बे में पढ़ने जाने लगे.
स्कूल के कुछ बच्चे उन के गूंगाबहरा होने का मजाक उड़ाते थे. लेकिन उन्होंने उन की बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया. अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाए रहा. इस का नतीजा यह निकला कि उन्होंने सन 1990 में दसवीं की परीक्षा न सिर्फ अच्छे अंकों से पास की, बल्कि प्रदेश में उन की पांचवीं रैंक आई. स्कूल में साथी विद्यार्थी और अध्यापक जो उन्हें गूंगाबहरा कहते थे, इस के बाद उन्होंने उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया. अच्छे अंकों से दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद मनीराम के पिता ने सोचा कि बेटे को कहीं चपरासी की नौकरी ही मिल जाए तो अच्छा रहेगा. चार पैसे मिलेंगे तो घर के हालात में कुछ तो सुधार होगा.
यही सोच कर वह मनीराम को अपने परिचित एक खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) के पास ले गए. उन्होंने उन से कहा, ‘‘साहब, बेटा बड़े अच्छे नंबरों से पास हुआ है. इसे कहीं चपरासी ही लगवा दो.’’
बीडीओ को जब पता चला कि मनीराम बोल और सुन नहीं सकता तो उन्होंने कहा, ‘‘यह न तो बोल सकता है और न ही सुन सकता है. ऐसे में इसे कैसे नौकरी पर रखा जा सकता है?’’
बीडीओ की बात सुन कर मनीराम के पिता की आंखों में आंसू आ गए. बापबेटे बीडीओ के औफिस से अपना सा मुंह ले कर लौट आए. घर आ कर मनीराम ने पिता को अपने इशारों से भरोसा रखने को कहा. उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि वह अपनी विकलांगता को सीढ़ी बना कर सफलता का मुकाम हासिल करेंगे. इस के बाद वह जीजान लगा कर पढ़ाई करने लगे. इस का नतीजा यह निकला कि उन्होंने बारहवीं कक्षा में पूरे प्रदेश में सातवीं रैंक हासिल की. बाद में उन्होंने बीए औनर्स में राजस्थान विश्वविद्यालय में टौप किया और गोल्ड मैडलिस्ट बने. ग्रैजुएट होने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी पाने के प्रयास शुरू किए.
राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) की परीक्षा दी. पहली परीक्षा में ही वह पास हो गए. तब उन्हें अलवर जिले के गंडाला गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में नौकरी मिली. मनीराम के परिवार में इस से पहले कोई सरकारी नौकरी में नहीं रहा था, इसलिए उन के लिए यही सब से बड़ी नौकरी थी. मनीराम भले ही सरकारी नौकरी पा गए थे, लेकिन उन के सपनों की उड़ान अभी थमी नहीं थी. स्कूल की नौकरी करते हुए उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और राजनीति विज्ञान से प्राइवेट एमए किया. इस के बाद परीक्षा पास कर के वह राजकीय महाविद्यालय में राजनीति विज्ञान के व्याख्याता बन गए. हालांकि कि उन्हें अब पहले से ज्यादा तनख्वाह मिलने लगी थी, लेकिन वह अभी संतुष्ट नहीं थे.
वह प्रशासनिक सेवा की तैयारी में जुट गए. इस के लिए वह अथक परिश्रम करने लगे, जिस की बदौलत उन्होंने सन 2001 में राजस्थान लोक सेवा आयोग की राजस्थान प्रशासनिक सेवा की एलाइड परीक्षा पास की. इस के बाद देवस्थान विभाग में निरीक्षक के पद पर भरतपुर में उन की नियुक्ति हुई. इस बीच उन्होंने एमफिल, नेट, जेआरएफ करने के साथ पीएचडी भी कर ली थी. बाबू से अफसर बनने के बाद भी मनीराम चैन से नहीं बैठे. उन्हें अपनी मंजिल आगे नजर आ रही थी. हर शिक्षित युवा की तरह मनीराम का सपना भी आईएएस औफिसर बनने का था. नौकरी करते हुए वह संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी करने लगे.
उन्होंने सन 2005 में पहली बार यह परीक्षा दी और पहली बार में ही उन्होंने यह परीक्षा पास कर ली. पूरे देश में उन की 27वीं रैंक आई. वह बहुत खुश हुए. पूरे परिवार में खुशियां छा गईं. लेकिन यह खुशियां ज्यादा दिनों की नहीं रहीं. आईएएस परीक्षा का परिणाम आने के कुछ दिनों बाद सरकार ने उन्हें सौ फीसदी डीफनेस (बहरेपन) की वजह से रिजैक्ट कर दिया. रिजैक्ट होने से मनीराम उदास हो गए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. बल्कि दोगुने उत्साह से फिर आईएएस परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. सन 2006 में उन्होंने फिर आईएएस परीक्षा पास की. अफसरों ने इस बार भी उन्हें डीफनेस के कारण मैडिकल ग्राउंड पर अनफिट घोषित कर दिया.
मनीराम को फिर झटका लगा. उन का बहरापन उन की आईएएस की नौकरी में आड़े आ रहा था. जबकि वह हर हाल में आईएएस की नौकरी करना चाहते थे. यह तभी संभव था, जब उन के कान का इलाज हो यानी कान का औपरेशन. इस औपरेशन में कई लाख रुपए का खर्चा था और उन के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे. अब तक लोग मीडिया द्वारा इस विलक्षण प्रतिभा के बारे में जान चुके थे. मीडिया में खबरें छपने पर लोगों ने उन के इलाज के लिए पैसे देने शुरू कर दिए.
इस अभियान में 8 लाख रुपए इकट्ठा हुए. इस धनराशि से जून, 2007 में उन के कान का औपरेशन कराया गया. औपरेशन के बाद उन्हें आंशिक रूप से सुनाई देने लगा. डाक्टरों के प्रयास से मनीराम ने बुदबुदा कर थोड़ाबहुत बोलना भी शुरू कर दिया. इस के बाद मनीराम शर्मा ने सन 2009 में तीसरी बार आईएएस की परीक्षा पास की. मैडिकल बोर्ड ने उन की जांच की. उन की विलक्षण लिप रीडिंग देख कर सारे अधिकारी दंग रह गए. मैडिकल जांच की मशीनें उन के सौ फीसदी बहरेपन की पुष्टि कर रही थीं. लेकिन उन की कार्यशैली बता रही थी कि बहरापन आंशिक है.
मैडिकल बोर्ड ने शर्मा को आंशिक डीफनेस का प्रमाणपत्र दे दिया. आंशिक डीफनेस के कारण इस बार भी आईएएस की नौकरी मिलने में तमाम तरह की अड़चनें आईं. काफी भागदौड़ के बाद प्रधानमंत्री औफिस की पहल पर मनीराम को आईएएस की नौकरी के योग्य माना गया. इस तरह बधिर होने वाले वह देश के पहले आईएएस बने. मनीराम को मणिपुर त्रिपुरा कैडर मिला. मणिपुर के तमेंगलोंग तथा चुरा चांदपुर में मनीराम शर्मा ने असिस्टैंट कमिश्नर ऐंड सब डिवीजनल मजिस्ट्रैट के पद पर करीब 5 सालों तक नौकरी की.
उस के बाद जनवरी, 2015 में केंद्रीय कैबिनेट की अपौइंटमेंट कमेटी ने उन के कैडर बदलने को स्वीकृति दे दी. कैडर बदलने पर मनीराम हरियाणा आ गए. हरियाणा सरकार ने उन्हें सब से पहले एडिशनल डिप्टी कमिश्नर एंड डिस्ट्रिक्ट रूरल डैवलपमेंट अथौरिटी का चीफ एक्जीक्यूटिव औफिसर नियुक्त किया. मनीराम शर्मा का कहना है कि बहरापन उन के परिवार में वंशानुगत है. उन की नानी बहरी थीं. नानी के कारण मां और मामा भी बहरे थे. उन के भाईबहन भी बहरे हैं. उन का बेटा भी बहरा था. नानी से चले आ रहे बहरेपन के कारण परिवार में 35 लोग बहरे हैं. लेकिन मनीराम ने अपनी इस कमी को दरकिनार कर हिम्मत और हौसलों के जरिए एक प्रेरणादायक इतिहास रच दिया.
हम आगे बात करते हैं, राजस्थान के पहले दृष्टिहीन जज ब्रह्मानंद शर्मा की. नियति भले ही किसी को कमजोर कर दे, लेकिन मन और हौसला मजबूत हो तो किसी को भी मनचाही ऊंचाई छूने से नहीं रोका जा सकता. अपनी कमजोरी को ताकत बना कर आगे बढ़ने वाले ही सफलता की मंजिल हासिल करते हैं. राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मोटरास गांव के रहने वाले ब्रह्मानंद शर्मा ऐसी ही शख्सियत हैं. उन्होंने इसी साल 11 जनवरी को चित्तौड़गढ़ में अतिरिक्त सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रैट का पद संभाला है. दृष्टिहीनता को मात दे कर वह अब न्यायिक क्षेत्र जैसी महत्त्वपूर्ण सेवा में चयनित हो कर लोगों के लिए न्याय की ज्योति जला रहे हैं. वह राजस्थान न्यायिक सेवा के पहले दृष्टिहीन मजिस्ट्रैट हैं.
ब्रह्मानंद शर्मा जन्म से दृष्टिहीन नहीं थे. वह पहले भलेचंगे थे. उन की नेत्र ज्योति भी ठीक थी. उन के सामने किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी. उन्होंने बचपन से ही न्यायाधीश बनने का सपना देखा था. स्कूल और कालेज की पढ़ाई के दौरान वह विभिन्न अदालतों के फैसलों की कतरनें घर ला कर उन का अध्ययन किया करते थे. पिता के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद घर में कुछ आर्थिक परेशानी हुई तो ब्रह्मानंद ने पढ़ाई पूरी कर के सरकारी नौकरी की कोशिश शुरू कर दी. परिणामस्वरूप सन 1996 में राजस्थान के सार्वजनिक निर्माण विभाग में उन्हें कनिष्ठ लिपिक की नौकरी मिल गई.
उन की पहली पोस्टिंग उन के गृह जनपद भीलवाड़ा में हुई. लेकिन अपनी इस नौकरी से वह संतुष्ट नहीं थे. उन का सपना मजिस्ट्रैट बनने का था. अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वह दोगुने उत्साह से जुट गए. इसी बीच कुछ कारणों से उन की आंखों का रेटिना कमजोर होता चला गया, जिस से उन की आंखों की रोशनी कम होती चली गई. आंखों से कम दिखाई देने के कारण उन्हें कामकाज के साथ पढ़ाई करने में परेशानी होने लगी. उन्होंने अपना बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उसी बीच उन्हें तेज बुखार आया. कई दिनों तक बुखार रहने के कारण उन की आंखों की रौशनी पूरी तरह से चली गई. बुखार तो उतर गया, लेकिन उन की आंखों की रौशनी वापस नहीं आ सकी.
आंखों से दिखना बंद होने से ब्रह्मानंद शर्मा की जिंदगी में ही अंधेरा छा गया. उन्हें अपने सपने मिट्टी में मिलते नजर आने लगे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उन्हें एक ही धुन सवार थी कि उन्हें न्यायाधीश बनना है तो बनना है. इस के लिए कानून की पढ़ाई करनी जरूरी थी. उन्होंने एक लौ कालेज में दाखिला ले लिया. चूंकि वह देख नहीं सकते थे, इसलिए अपनी पत्नी और भतीजे की आवाज में कोर्स को रिकौर्ड करवा कर उसे रात में सुनते थे. इसी तरह उन्होंने अपनी कानून की पढ़ाई पूरी की. इस के बाद उन्होंने पहली बार सन 2008 में राजस्थान न्यायिक सेवा (आरजेएस) की परीक्षा दी, लेकिन इस परीक्षा में वह सफल नहीं हो सके.
उन्हें भीलवाड़ा में पढ़ाई के पूरे संसाधन नहीं मिल रहे थे, इसलिए वह जयपुर आ गए. जयपुर में आरजेएस परीक्षा की कोचिंग करने के लिए जब वह एक कोचिंग सेंटर में गए तो दृष्टिहीन होने की वजह से संचालक ने कहा कि वह एडमिशन ले कर क्या करेंगे, घर जाएं, अपना पैसा और समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं? ब्रह्मानंद शर्मा ने उस से एक मौका देने को कहा. उन का हौसला और जज्बा देख कर कोचिंग संचालक ने कहा, ‘‘एक घंटे में सेक्शन 144 याद कर के आओ, उस के बाद तुम्हारे एडमिशन के बारे में सोचेंगे.’’
ब्रह्मानंद शर्मा ने कोचिंग के बाहर ही भतीजे से सेक्शन 144 सुना और करीब 1 घंटे बाद उन्होंने उसे संचालक को ज्यों का त्यों सुना दिया. उन की बुद्धि को देख कर कोचिंग सेंटर का संचालक हैरान रह गया. इस के बाद उन्हें कोचिंग में दाखिला मिल गया. इस बीच ब्रह्मानंद शर्मा ने राजस्थान न्यायिक सेवा भर्ती परीक्षा 2011 के लिए आवेदन कर दिया और जीजान से परीक्षा की तैयारी में जुट गए. उन की मेहनत रंग लाई और परीक्षा परिणाम घोषित हुआ तो ब्रह्मानंद शर्मा की 83वीं रैंक आई. पूरे परिवार में खुशियां छा गईं. उन्हें अपने सपने पूरे होते नजर आने लगे, लेकिन किस्मत को अभी उन की एक परीक्षा और लेनी थी. राजस्थान में शानदार रैंक आने के बावजूद दृष्टिहीन होने की वजह से उन की ट्रेनिंग पर रोक लगा दी गई.
इस के बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा. हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने ब्रह्मानंद शर्मा की नियुक्ति की सिफारिश की. एक साल की ट्रेनिंग के बाद उन्होंने चित्तौड़गढ़ में न्यायिक मजिस्टै्रट का पदभार संभाला. ब्रेल लिपि कंप्यूटर और सहायक की मदद से उन्होंने पहले ही दिन एक अनुभवी जज की तरह सुनवाई कर फैसले भी किए. ब्रह्मानंद शर्मा कहते हैं कि हौसला हो तो हर मंजिल आसान हो जाती है. किसी को भी विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होना चाहिए. हालात से लड़ कर आगे बढ़ें तो सफलता जरूर आप के कदम चूमेगी.
रंगमंच पर कोई रीटेक नहीं होता. उस समय गलतियां सुधारने का भी मौका नहीं मिलता. मंच पर जो अभिनय किया जाता है, उसे सामने बैठा दर्शक सीधे देखता है. कलाकार के पास या फेल होने का फैसला दर्शक करते हैं. लेकिन जयपुर के दृष्टिहीन बच्चे किस तरह अपने अभिनय की प्रस्तुति करते हैं, उसे देख कर आप चौंके बिना नहीं रह सकते. इन बच्चों को तराशा है मशहूर रंगकर्मी भारतरत्न भार्गव ने. राजस्थान यूनिवर्सिटी जयपुर में हिंदी के प्रोफेसर रह चुके भारतरत्न भार्गव संगीत नाटक एकेडमी नई दिल्ली के उपसचिव रहे हैं. थिएटर के क्षेत्र में भारतरत्न भार्गव देशभर की जानीमानी हस्ती हैं. बीबीसी लंदन और आल इंडिया रेडियो के लिए भी वह सेवाएं दे चुके हैं.
आजकल वह कला और रंगमंच को समर्पित जयपुर के संस्थान नाट्यकुलम में कुलगुरु के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. ढेर सारे अवार्ड और पुरस्कारों से सम्मानित भारतरत्न भार्गव ने अनेक नाटकों में अभिनय और निर्देशन किया है. मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर पर उन्होंने एक किताब लिखी है- रंग हबीब, जिसे नैशनल स्कूल औफ ड्रामा ने प्रकाशित किया है.
भारतरत्न भार्गव बताते हैं, ‘मैं करीब डेढ़ साल पहले कुछ दृष्टिबाधित बच्चों के संपर्क में आया. वे खेलखेल में भावभंगिमाएं बना रहे थे. मैं ने तभी ठान लिया कि इन्हें रंगमंच की बारीकियां सिखाऊंगा. शुरुआत की तो लोगों ने मजाक उड़ाया. लोग कहते रहे कि जिन्हें खुद नहीं दिखता, उन्हें देखने कौन आएगा? लेकिन मैं ने हिम्मत नहीं हारी और ये बच्चे मेरी कल्पना से भी आगे निकले. आम रंगकर्मी जो अहसास व्यक्त नहीं कर पाते, वैसा ये बच्चे कर दिखाते हैं. शायद इन का मन ही वह आंख हैं, जो इन्हें सब कुछ सिखा देता है.
‘शुरुआत में मैं इन बच्चों को भावभंगिमाएं सिखाने के लिए अंगुलियों से इन के चेहरों पर भाव उकेरता था. अभिनय करते समय ये दृष्टिहीन बच्चे स्टेज से गिर न जाएं, इस के लिए संगीत की मदद ली. ढोलक, मंजीरे की ताल आदि सुन कर अब ये बच्चे समझ जाते हैं कि मंच पर कब चलना है, कहां रुकना है. इसलिए अब ये अभिनय करते हुए गिरते नहीं हैं. इन्हीं में से कुछ बच्चों को संगीत का क्लू देने के लिए प्रशिक्षित किया. बेजान आंखों को सपने देने से इन्हें एक नई ऊर्जा मिलती है.’
78 साल के भारतरत्न भार्गव जब इन दृष्टिहीन बच्चों को अभिनय सिखाते हैं तो अच्छाभला अभिनेता भी उन का समर्पण देख कर हैरान रह जाता है. चांदी से चमकते सिर व दाढ़ी के बालों के बीच उन के चेहरे पर वह तेज होता है, जिसे उन के दृष्टिहीन शिष्य भले ही नहीं देख पाते, लेकिन उन की सिखाई बातों को तुरंत ग्रहण कर लेते हैं.
फोटोग्राफी एक ऐसी कला है, जिस में आंखों के द्वारा देखे गए नजारों को कैमरे में कैद किया जाता है. जाहिर है, कोई भी फोटोग्राफर उसी वस्तु के फोटो खींचता है, जो उसे उपयोगी लगती है. लेकिन पश्चिम बंगाल के कुछ फोटोग्राफर ऐसे हैं, जो पूरी तरह दृष्टिहीन हैं. इन दृष्टिहीन बच्चों द्वारा की गई फोटोग्राफी देख कर आप हैरान रह जाएंगे. इन दृष्टिहीन बच्चों को फोटोग्राफी में पारंगत किया है जयपुर की फोटोग्राफर पद्मजा शर्मा उर्फ गुनगुन और चंदन एस. राठौड़ ने. गुनगुन तथा चंदन एस. राठौड़ बताते हैं कि पहले यह प्रयास उन्होंने जयपुर के दृष्टिबाधित बच्चों को ले कर करना चाहा, पर अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल सका. बाद में पश्चिम बंगाल के सियराफुली कस्बे की सोसायटी फौर ब्लाइंड के संपर्क में आए. सन 2014 के अप्रैल महीने में गुनगुन व राठौड़ ने मिल कर इस सोसायटी के 5 बच्चों की फोटोग्राफी कार्यशाला की.
यह कार्यशाला 7 दिनों तक चली. इस कार्यशाला का विचार शिप औफ थीसिस फिल्म देख कर आया था. उस फिल्म में एक दृष्टिहीन फोटोग्राफर होती है. इसी विचार को मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने कई ब्लाइंड सेंटरों पर बात की, लेकिन बात नहीं बनी. कुछ लोगों को लगता था कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. कुछ लोग यह कह कर मना कर देते थे कि इस से कोई फायदा नहीं होगा. कुछ लोग कहते थे कि ऐसा हो ही नहीं सकता. कुछ लोग क्राफ्ट या म्यूजिक की क्लास लगवाने की सलाह देते थे. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.
पश्चिम बंगाल के सोसायटी फौर ब्लाइंड सेंटर पर ही कार्यशाला की. इस बीच वह ब्लाइंड फोटोग्राफरों के बारे में भी पढ़ते रहे, उन की तसवीरें देखीं, तसवीरों तक पहुंचने की यात्रा को जानने की कोशिश करते रहे. कार्यशाला में पहले दिन उन्होंने सूरदास को पढ़ा. सूरदासजी देख नहीं सकते थे, लेकिन उन्होंने कितने सारे दृश्य लिखे हैं. इसी तरह बच्चों को ध्वनि और अहसास के सहारे फोटो खींचने के बारे में बताया. उन्होंने इन बच्चों के हाथ में औटो मोड डिजिटल कैमरे दे कर उस की सारी तकनीकी प्रक्रिया समझाई. फिर औब्जेक्ट को छू कर उस से एक निश्चित दूरी बना कर फोटो खींचना सिखाया. इस के बाद आवाज सुन कर उस दिशा में क्लिक करना सिखाया. आवाज के आधार पर फोटो खींचने का उन का प्रयास बेहद उत्साहजनक रहा.
ये बच्चे पहले कैमरे को उसी अंदाज में आंख पर लगाते हैं, जैसे आम लोग करते हैं. इस के बाद बटन पर अंगुली सेट करते हैं और उस के बाद आवाज की दिशा में क्लिक कर के दृश्य को कैमरे में कैद कर लेते हैं. अब तो ये बच्चे फोटोग्राफी में इतने पारंगत हो गए हैं कि कभी मैदान, कभी पहाड़, तो कभी पानी के नजारों तक को कैमरे में अपने अंदाज में उतार लेते हैं. सोसायटी फौर ब्लाइंड के 5 बच्चों फणी पाल, मिलन शर्मा, अंजन शेरेन, टिंकू हाजरा और दुलीचंद राय के खींचे गए फोटोग्राफ्स की प्रदर्शनी जयपुर के जवाहर कला केंद्र में इसी साल 12 से 16 फरवरी तक लगाई गई थी.
दृष्टिहीन बच्चों द्वारा अपनी शब्दभेदी ताकत से केवल आवाज सुन कर खींची गई तसवीरों की प्रदर्शनी जयपुर के हजारों लोगों ने देखी. जो भी इस प्रदर्शनी को देखने आया, वह इन बच्चों की अनूठी पहल को देख कर दंग रह गया. दर्शकों के मन में ढेर सारे सवाल और यह जानने की इच्छा थी कि आखिर इन दृष्टिहीन बच्चों ने कैसे इतनी अच्छी तसवीरें खींची? दर्शकों के इन सवालों के जवाब भी वहां मौजूद इन बच्चों ने ही दिए.
कहानी दृष्टिहीन फोटोग्राफरों की चल रही है तो मुंबई में एक ऐसा शख्स भी है, जो नामी फिल्म कलाकारों को उन की महक के सहारे कैमरे में कैद करता है. इस फोटोग्राफर का नाम है भावेश पटेल. हाल ही में बौलीवुड एक्ट्रैस कैटरीना कैफ का एक वीडियो यू ट्यूब पर आया है, जिस में वह एक परफ्यूम के लिए शूट कर रही हैं. इस में कैटरीना की फोटोग्राफी भावेश ने की है. भावेश नेत्रहीन हैं. वह इस वीडियो में कह रहे हैं, ‘मैं जब भी फोटोग्राफ खींचता हूं, वह महक ही होती है, जो उस की तसवीर मेरे मन में बना देती है और उस के बाद मुझे करना होता है बस एक क्लिक.’
वीडियो में दिखाया गया है कि भावेश के खींचे फोटोग्राफ देख कर कैटरीना कैफ मुसकरा कर कहती हैं, ‘दे आर अमेजिंग’. बहरहाल, ये नेत्रहीन, मूकबधिर अपने जज्बे से एक नई कहानी लिख कर लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं. फिर भी यह चिंता की बात है कि भारत में सन 2011 की जनगणना के अनुसार, 50 लाख 32 हजार 463 नेत्रहीन हैं. इन में पुरुषों की संख्या 26 लाख 38 हजार 516 एवं महिलाओं की संख्या 23 लाख 93 हजार 947 है. सरकार को चाहिए कि इन नेत्रहीनों के समुचित विकास के लिए ठोस नीति बनाए. Hindi Stories






