Emotional Family Story. सेना में नौकरी करने वाले जिस धर्मवीर उर्फ धर्मा को मृत मान लिया गया था, वह 7 सालों बाद जीवित घर लौटा तो उस के घर में खुशी की लहर दौड़ गई. इस बीच वह कहां रहा, सेना अब इस का पता लगा रही है.

राजस्थान के जिला अलवर की बहरोड़ तहसील का एक गांव है भीठेड़ा. अन्य गांवों की तरह इस गांव के लोग भी आसमान से बरसती आग से परेशान थे. रात में थोड़ी राहत जरूर मिलती थी, लेकिन सूरज चढ़ते ही फिर आग बरसने लगती थी. सभी को बारिश का बेताबी से इंतजार था. गरमी हो, सरदी हो या बरसात हो, किसानों को खेतों में काम करना ही पड़ता है.

कामकाज की वजह से उन की सुबह जल्दी होती है तो रात भी उन्हें जल्दी ही बिस्तर पर पहुंचा देती है. रात 8-9 बजे तक ज्यादातर लोग बिस्तर पर पहुंच जाते हैं. उस दिन जून की 13 तारीख थी. भीठेड़ा गांव के रहने वाले सेना के रिटायर्ड सूबेदार कैलाशचंद्र यादव का परिवार रोजमर्रा की तरह कामकाज निपटा कर रात 9 बजे तक सो गया था.

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रात के 10 बजतेबजते पूरा गांव सन्नाटे में डूब गया. आधी रात बीत चुकी थी. ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की नवमी का चांद आसमान में इधरउधर उड़ रही बदलियों की ओट में कभी खो जाता तो कभी चांदनी बिखेरने लगता था.

रात करीब एक बजे एक तेज आवाज सुन कर सूबेदार कैलाशचंद यादव की पत्नी संतरा देवी की आंखें खुल गईं. बाहर कुत्ते भौंक रहे थे. रात में कुत्तों के भौंकने को सामान्य बात मान कर संतरा देवी ने सोने का प्रयास किया. लेकिन तभी उन के कानों में फिर वही आवाज पड़ी, ‘‘मां, दरवाजा खोलो, देखो तुम्हारा धर्मा आया है.’’

संतरा देवी को आश्चर्य भी हुआ और डर भी लगा, क्योंकि उन का धर्मा तो दुनिया में था ही नहीं. फिर भी उन्होंने उस आवाज पर ध्यान लगाया. आवाज घर के बाहर से ही आ रही थी, ‘‘मां, देख तेरा धर्मा आ गया है, जल्दी दरवाजा खोलो.’’

चूंकि लगातार कुत्ते भौंक रहे थे, इसलिए वह भ्रम की स्थिति में पड़ गईं. वह हिम्मत कर के चारपाई से उठीं और अपने पति सूबेदार कैलाशचंद के पास पहुंचीं. कैलाशचंद गहरी नींद में थे. संतरा ने पहले आवाज दे कर उन्हें जगाने का प्रयास किया, लेकिन खर्राटे भर रहे कैलाशचंद की नींद नहीं खुली तो उन्होंने उन्हें झिंझोड़ कर जगाया. हड़बड़ा कर उठे कैलाशचंद ने घड़ी देखी. रात का एक बज रहा था. इतनी रात में इस तरह जगाने पर उन्होंने पत्नी से पूछा, ‘‘क्या बात है?’’

संतरा ने पति को बाहर से आ रही आवाज के बारे में बताया. पत्नी की बात सुन कर कैलाशचंद के मन में भी एक बार सिहरन सी दौड़ गई. उन्होंने कान लगाए तो घर के बाहर कुत्तों के भौंकने की आवाजें आ रही थीं. उसी बीच फिर आवाज आई, ‘‘गेट खोलो मां, मैं धर्मा हूं तुम्हारा बेटा.’’

कैलाशचंद और संतरा अपने बेटे की आवाज पहचान गए. उन्हें पूरा यकीन हो गया कि आवाज बेटे की है. घर के बाहर कुत्ते लगातार भौंक रहे थे, इस का मतलब साफ था कि घर के बाहर कोई था. कैलाशचंद ने हिम्मत कर के दरवाजा खोला. संतरा भी उन के साथ दरवाजे पर आईं. घर के बाहर अंधेरा था. दरवाजा खुलते ही बाहर खड़े युवक ने कैलाशचंद और संतरा की ओर देख कर अधीरता से कहा, ‘‘मांबापू, मैं आप का बेटा धर्मा हूं. मैं वापस लौट आया हूं.’’

कैलाशचंद और संतरा ने अंधेरे में ही पहचान लिया कि वह उन का धर्मा ही था, उन का बेटा धर्मा. बेटे को देख कर मांबाप की आंखों में आंसू छलक उठे. उन्होंने उसे गले से लगा लिया. इस के बाद बेटे को घर के अंदर ले गए. दरवाजे पर बातचीत की आवाजें सुन कर परिवार के सभी लोग जाग गए थे.

धर्मा को देख कर सभी हैरान तो थे, लेकिन उसे जीवित देख कर सभी खुश भी थे. धर्मा के चेहरे पर थकान साफ नजर आ रही थी. उस के कपड़ों पर धूलमिट्टी लगी थी और वह पसीने से तरबतर था. कैलाशचंद ने उस के हाथमुंह धुलवाए. सफर की थकान और गरमी से परेशान धर्मा ने हाथमुंह धो कर चाय पी.

चाय के साथ मां नाश्ता भी लाई थी. धर्मा को भूख तो लगी थी, लेकिन 7 सालों बाद परिवार के लोगों से मिलने की खुशी ने उस का पेट भर दिया था. फिर भी उस ने मां के कहने पर नाश्ता कर लिया.  कैलाशचंद और संतरा ने धर्मा को पहली ही नजर में पहचान लिया था, फिर भी उन्होंने उस से कई तरह से पूछताछ की थी. जब उस ने हर बात का सटीक जवाब दे दिया था तो यह तय हो गया था कि वह धर्मा ही है.

धर्मा के सहीसलामत घर आने पर पूरे परिवार में खुशी छा गई थी. उस की पत्नी मुकेश यादव अपने पति को जीवित देख कर सब से ज्यादा खुश थी. उस के लौटने से उस की मांग फिर से सज गई थी. 2 बेटियों संगीता और पुष्पा की खुशियों का तो ठिकाना नहीं था. 19 साल की संगीता ने इसी साल 12वीं पास की थी और 17 साल की पुष्पा ने 10वीं.

सूबेदार कैलाशचंद और संतरा के मन में तरहतरह के सवाल उमड़घुमड़ रहे थे. उन्होंने धर्मा से पूछा कि जब उसे 7 साल पहले मृत मान लिया गया था तो अब वह कहां से आ गया? आखिर इतने दिनों तक वह कहां रहा? खानापीना कैसे चला? क्या कभी मांबाप और बीवीबच्चों की याद नहीं आई? धर्मा 7 सालों तक लापता रहने की अपनी कहानी रातभर परिवार वालों को सुनाता रहा.

सुबह होते ही पूरे गांव में यह बात फैल गई कि 7 साल पहले जिस फौजी धर्मा की दुर्घटना में मौत हो गई थी, वह वापस घर लौट आया है. धर्मा के लौटने की बात सुन कर उस के घर गांव वालों और रिश्तेदारों का जमावड़ा लग गया. कुशलक्षेम पूछने के लिए आसपास के कई गांवों के लोग आ पहुंचे.

धर्मा ने अपने लापता होने की जो कहानी अपने परिवार वालों और सेना के अधिकारियों को सुनाई, वह बिलकुल फिल्मी कहानी जैसी थी.

भीठेड़ा के रहने वाले सेवानिवृत्त सूबेदार कैलाशचंद यादव का बेटा धर्मवीर उर्फ धर्मा अप्रैल, 1994 में अहमदनगर में थल सेना की 66 आर्मर्ड कोर में बतौर सिपाही भर्ती हुआ था. ट्रेनिंग के बाद वह देहरादून में इंडियन आर्मी स्कूल में स्पोर्ट्स कोच के पद पर तैनात हो गया था. वहां पदोन्नत हो कर वह हवलदार बन गया.

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Sarita

देहरादून के मिलिट्री स्कूल में 29 नवंबर, 2009 को पासआउट परेड होनी थी. इस में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को शामिल होना था. राष्ट्रपति को रिसीव करने की जिम्मेदारी सेना की जिस टीम को सौंपी गई थी, उस में धर्मवीर यादव भी शामिल था. धर्मवीर यादव जब इस सिलसिले में अपने साथियों को लेने गया हुआ था, देहरादून के चकराता रोड पर 27 नवंबर, 2009 की रात सेना की एंबेसेडर कार डिवाइडर से टकरा कर पलट गई थी.

इस हादसे में सेना के 2 जवान घायल हो गए थे. जबकि धर्मवीर लापता हो गया था. धर्मवीर के लापता होने पर सेना ने भी और उस के परिवार वालों ने भी उस की काफी तलाश की, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल सका. 3 सालों तक जब धर्मवीर का कोई पता नहीं चला तो सेना के अधिकारियों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

इस के साथ ही धर्मवीर का डैथ सर्टिफिकेट जारी कर के उस के घर वालों को उस का पीएफ, ग्रैच्युटी, लीव बैलेंस सैलरी वगैरह स्वीकृत कर के पैसा दे दिया गया. बाद में 1 अप्रैल, 2014 से धर्मवीर यादव की पत्नी मनोज यादव के नाम पेंशन भी स्वीकृत कर दी गई. मनोज को फिलहाल करीब 8600 रुपए पेंशन मिल रही थी. पेंशन का लाभ फरवरी, 2010 से दिया गया था.

धर्मवीर के अनुसार, देहरादून में आर्मी की गाड़ी से दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद क्या हुआ, उसे कोई जानकारी नहीं है. उसे केवल इतना याद है कि देहरादून, रुड़की और हरिद्वार आदि शहरों में वह भिखारी के रूप में पागल की तरह घूमता रहता था. इसी साल जून के पहले सप्ताह में जब वह हरिद्वार में था तो वहां एक मोटरसाइकिल चालक ने उसे पीछे से टक्कर मार दी.

इस से वह अचेत हो गया. लोगों ने उसे अस्पताल पहुंचा दिया. अस्पताल में उस की याददाश्त लौट आई. तभी उसे याद आया कि उस का नाम धर्मवीर है और वह बहरोड़ के भीठेड़ा गांव का रहने वाला है. दुर्घटना के बाद उसी मोटरसाइकिल चालक ने उसे 5 सौ रुपए दे कर हरिद्वार से दिल्ली की बस में बैठा दिया था. दिल्ली पहुंचने के बाद वह बस से बहरोड़ और फिर अपने गांव आ गया था.

धर्मवीर अपने गांव परिवार के पास जरूर आ गया था, लेकिन उस की मानसिक हालत अभी भी कमजोर थी. फिलहाल उस की मानसिक स्थिति की जांच कराई जा रही है. जिला सैनिक कल्याण अधिकारी आर.पी. यादव ने 7 सालों से लापता सेना के जवान धर्मवीर यादव के घर लौटने की सूचना उच्चाधिकारियों को भेज दी है.

घर लौटने के बाद धर्मवीर यादव अब फिर देश की सेवा करना चाहता है. वह दोबरा सेना में जाना चाहता है, इस के लिए वह सेना के अधिकारियों से मिल आया है. जिला सैनिक कल्याण अधिकारी आर.पी. यादव का कहना है कि धर्मवीर की सेना में वापसी के रास्ते खुले हुए हैं.

लेकिन इस के लिए सेना के नियमानुसार काररवाई होगी. सैनिक अस्पताल में उस के स्वास्थ्य की जांच के अलावा उस की  मानसिक जांच भी होगी, साथ ही उस के 7 सालों तक गुम रहने की कोर्ट औफ इंक्वायरी की जाएगी. इस के बाद साक्ष्य और सबूतों के अलावा पूरी तरह फिट होने पर ही उसे फिर सेना में लिया जा सकेगा. यह लंबी प्रक्रिया है.

बहरहाल, धर्मवीर के घर वापस लौटने से उस के परिवार में भले ही खुशियों का माहौल है, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि सेना ने उस का मृत्यु प्रमाणपत्र कैसे जारी कर दिया था? यह मृत्यु प्रमाणपत्र सरकारी कागजातों में हमेशा जीवित रहेगा. Emotional Family Story.

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