Revenge Crime. जिस तरह एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं, उसी तरह अपराध के मामले में भी होता है. उस के बाद अपराधी ऐसे दलदल में धंसता चला जाता है कि जल्दी निकल नहीं पाता.
शाम के 6 बजने वाले थे, तभी टेलीफोन की घंटी बजी. सफदर खान कमरे में बैठा टीवी पर अंगरेजी फिल्म देख रहा था, जबकि उस की बीवी हमीदा किचन में काम कर रही थी. हमीदा ने किचन से ही आवाज लगाई, ‘‘सफदर देखना, किस का फोन है?’’
सफदर ने टीवी की आवाज कम की और रिसीवर उठा कर जैसे ही हैलो कहा, दूसरी तरफ से टेलीफोन औपरेटर की आवाज आई, ‘‘क्या आप फरहान खां बोल रहे हैं?’’
यह सुन कर सफदर कांपने लगा. उस के दिल की धड़कन बढ़ गई. वह समझ गया कि यह ट्रंककाल थी. यही उस की परेशानी की वजह भी थी. उस ने जवाब देने की कोशिश की, पर उस की आवाज हलक में फंस कर रह गई.
‘‘हैलो, हैलो, आप मेरी आवाज सुन रहे हैं न?’’ औपरेटर की आवाज कानों में आई. ‘‘हां, सुन रहा हूं. पर आवाज साफ नहीं आ रही है.’’ ‘‘देखिए, आप के लिए करांची से काल है. आप फरहान खां ही हैं न?’’ औपरेटर ने अपनी बात दोहराई. ‘‘नहीं, रांग नंबर.’’ कह कर सफदर ने फोन रख दिया.
अब तक हमीदा कमरे में आ चुकी थी. शौहर की घबराहट देख कर वह परेशान हो गई. उस का हाथ पकड़ कर प्यार से बोली, ‘‘क्या बात है सैफी? तुम इतने परेशान क्यों हो रहे हो? मुझे बताओ, क्या बात है?’’ ‘‘कोई फरहान खां के बारे में पूछ रहा था. करांची से काल आई थी. मैं ने उसे रांग नंबर कह कर काट दी.’’
यह सुन कर हमीदा डर कर पीछे हट गई. वह भी घबरा कर बोली, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है, क्योंकि यहां कोई तुम्हें फरहान खां के नाम से नहीं जानता. तुम घबराओ मत.’’
हमीदा उस की हिम्मत बढ़ा रही थी, तभी एक बार फिर फोन की घंटी बज उठी. इस बार भी फोन सफदर ने ही उठाया. दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘जनाब, क्या यह फरहान खां का नंबर नहीं है?’’ ‘‘नहीं, यह फरहान खां का नंबर नहीं है. यहां कोई फरहान खां नहीं रहता.’’ सफदर की आवाज में गुस्सा साफ झलक रहा था.
‘‘जनाब काल बुक कराने वाले को पूरा यकीन है कि यह नंबर फरहान खां का ही है.’’ टेलीफोन औपरेटर ने कहा. ‘‘मैं ने कह दिया न कि यहां कोई फरहान खां नहीं रहता. अब तुम इस नंबर पर आइंदा फोन मत करना.’’ कह कर सफदर ने फोन रख दिया.
उस समय सफदर का चेहरा पसीने से भीग गया था, हाथ कांप रहे थे. हमीदा उस की परेशानी समझ रही थी. उस ने कहा, ‘‘सफदर, हम ने बरसों पहले अपने नाम बदल लिए थे. अब तुम फरहान खां से सफदर खां और मैं आमना से हमीदा हो गई हूं. इस बात का हमारे अलावा किसी और को पता नहीं है. हम 5 साल पहले कराची छोड़ कर ऐटाबाद आ गए थे. फिर यह कौन है, जो फरहान खां के बारे में पूछ रहा है?’’
‘‘न जाने कौन था? मैं ने फोन ही बंद कर दिया. हमीदा, अब सवाल यह है कि आगे क्या किया जाए?’’ सफदर ने कहा. ‘‘सफदर, तुम अपने आप को संभालो. इस तरह परेशान होने से बात नहीं बनेगी. उस घटना को 5 साल से ज्यादा हो चुके हैं.’’ हमीदा ने कहा. ‘‘हमीदा, मैं ने जिस एकाउंटैंट का कत्ल किया था, मुझे उसी का डर है.’’
दरअसल, सफदर का पहले का नाम फरहान था, जो एक बड़े ज्वैलर्स के यहां नौकरी करता था. फरहान ने किसी तरह वहां से 20 लाख रुपए के हीरे उड़ा दिए थे. इस बात की जानकारी उस ज्वैलर के एकांउटैंट को हुई तो उस ने फरहान से चोरी के हीरों में अपना हिस्सा मांगा. तब फरहान ने उसे हिस्सा देने के बजाय उस का कत्ल कर दिया था. इस के बाद वह पत्नी आमना को ले कर कराची से ऐटाबाद आ गया. यहां आ कर दोनों ने अपने नाम बदल लिए थे.
‘‘सफदर, हमें कराची से यहां नहीं आना चाहिए था. मुल्क से बाहर निकल जाते तो अच्छा रहता. खैर, कोई बात नहीं, यहां पर सब लोग हमें सफदर खां और हमीदा के नाम से ही जानते हैं. जरूरत पड़ने पर सब हमारे इन्हीं नामों की गवाही देंगे.’’
‘‘हमें यहां के लोग नए नामों से जानते हैं, पर यह आदमी जिस ने करांची से फोन किया था, वह तो हमारा असली नाम ले रहा था.’’ ‘‘तुम इस बात को भूल जाओ. बस इतना याद रखो कि तुम्हारा असली नाम सफदर खां है. अब अपने दिमाग से हर तरह का डर निकाल दो.’’ बीवी ने समझाया.
‘‘कराची से फोन आया है, टेलीफोन औपरेटर बारबार यही कह रहा था कि यह फरहान खां का ही नंबर है. इस का क्या किया जाए?’’ हमीदा ने कहा. ‘‘सफदर इन बातों को भूल जाओ. चलो तैयार हो जाओ, कहीं घूमने चलते हैं. घूमने से मूड थोड़ा फ्रैश हो जाएगा.’’ हमीदा ने कहा.
लेकिन सफदर के दिमाग से डर निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था. उस ने कहा, ‘‘हमीदा, मैं ने जिस एकाउंटैंट याकूब अली का खून किया था, उस का एक बेटा था शमशेर. उस वक्त उस की उम्र यही कोई 16-17 साल थी. अब वह 22 साल का हो चुका होगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मुझ से अपने बाप के कत्ल का बदला लेना चाहता हो?’’ ‘‘सफदर, तुम इतनी दूर तक की मत सोचो, ऐसा कुछ नहीं है. यह तुम्हारा वहम है. अच्छा अब फोन आएगा तो मैं बात करूंगी.’’
इस के बाद हमीदा पति को ले कर घूमने चली गई. रात को वे घूम कर लौटे तो काफी खुश थे. उन्हें अपने दरवाजे के नीचे एक लिफाफा पड़ा मिला, जो टेलीग्राम था. उसे देखते ही सफदर घबरा गया. हमीदा ने लिफाफा खोला तो उस में लिखा था, ‘‘ज्यादा चालाक बनने की कोशिश मत करो. मैं फिर फोन करूंगा. अगर इस बार तुम ने बात नहीं की तो नतीजे के जिम्मेदार तुम खुद होगे.’’
टेलीग्राम के आखिर में शमशेर लिखा था. मरने वाले एकाउंटैंट के बेटे का नाम भी यही था. सफदर ने कहा, ‘‘अब बताओ क्या कहती हो तुम?’’ ‘‘हां, तुम्हारा अंदाजा सही निकला. यह तो वही एकाउंटैंट का बेटा है, पर अब किया क्या जाए?’’ हमीदा ने भी परेशान हो कर कहा.
दोनों ही देर तक मसले का हल ढूंढ़ते रहे. दूसरे दिन नाश्ते की मेज पर हमीदा ने सफदर से कहा, ‘‘मुझे लगता है, पुलिस खुफिया तरीके से हमारे पीछे लग गई है. अगर तुम ने डर कर भागने की कोशिश की तो उन का शक यकीन में बदल जाएगा.’’ ‘‘हम टेलीग्राम औफिस जा कर यह तार वापस कर आएंगे और शिकायत दर्ज कराएंगे. अभी हमें हालात का मुकाबला बड़े सुकून से करना है.’’
दूसरे दिन सुबह 5 बजे फोन की घंटी बजी. सफदर ने फोन रिसीव किया तो दूसरी तरफ से जो आवाज आई, वह किसी लड़के की थी. उस ने कहा, ‘‘मुझे फरहान खां से बात करनी है.’’ इस बार आवाज बिलकुल साफ थी. ऐसा लग रहा था, जैसे वह इसी शहर से बोल रहा था.
‘‘सौरी रांग नंबर.’’ सफदर ने भारी आवाज में कहा. उस की आवाज सुन कर हमीदा भी उठ गई. वह हैरानी से सफदर को देख रही थी. सफदर ने हमीदा से कहा, ‘‘वह कमीना अब इसी शहर में आ चुका है. यह लोकल काल है. आवाज बिलकुल साफ थी. एक दिन सुकून से गुजरा था कि अब फिर मुसीबत आ गई. अब क्या करें?’’
इस से पहले कि हमीदा कोई जवाब देती, फिर से फोन की घंटी बज उठी. सफदर ने चीख कर कहा, ‘‘यह फोन बंद कर दो, तोड़ दो. तुम इसे मत सुनना.’’
‘‘सफदर शांत रहो, मुझे सुनने दो. खुद पर काबू रखो.’’ कह कर हमीदा ने रिसीवर कान से लगाया तो दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘फरहान खां, मेरी बात सुनो. इस तरह मुझ से भागो मत, तुम्हें मेरी बात सुननी ही पड़ेगी. यह फालतू का ड्रामा बंद करो… हैलो… हैलो…’’
हमीदा ने बिना कुछ कहे रिसीवर रख दिया. इस के बाद उस ने टेलिफोन एक्सचेंज का नंबर लगाया. शिकायत की, ‘‘हमारे नंबर पर कोई आदमी बारबार धमकी भरे फोन कर के फरहान खां को पूछ रहा है. यहां कोई फरहान खां नहीं रहता.’’
‘‘देखिए मैडम, इस तरह की काल्स रोकना हमारे लिए संभव नहीं है. फिर भी हम कोशिश करेंगे.’’ टेलीफोन एक्सचेंज से किसी ने कहा.
अगले दिन सफदर खां के दरवाजे पर फिर एक लिफाफा पड़ा मिला. हमीदा ने लिफाफा खोलने नहीं दिया. ऊपर लाइन खींच कर लिख दिया, ‘‘यहां कोई फरहान खां नहीं रहता.’’ इस के बाद वह उसे पोस्ट औफिस ले गई.
अब सफदर बहुत डर गया था. रात को डर की वजह से सो भी नहीं सका. चेहरे पर अजब दहशत टपक रही थी. उस की आंखें सूज आई थीं. भूख तो छूमंतर हो चुकी थी. उस की हालत पागलों जैसी हो रही थी. हमीदा ने अपने हाथों से उसे खिलाने की कोशिश की, पर उस ने एक निवाला भी नहीं खाया. वह किसी मासूम बच्चे की तरह उस की शक्ल देखता रहा.
हमीदा ने समझाया, ‘‘देखो सफदर, वे लोग चाहते यही हैं कि तुम हार कर उन के कदमों में सिर झुका दो. शायद यही उन की प्लानिंग है. लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगी. तुम हिम्मत से काम लो, वे लोग खुद पीछे हट जाएंगे.’’ ‘‘नहीं, वे मेरा पीछा नहीं छोड़ेंगे, मुझे बरबाद कर देंगे.’’ वह बदहवास हो कर बोला. ‘‘अच्छा, तुम अभी आराम करो, शाम को डाक्टर से दवा लाएंगे.’’
शाम को जब वे डाक्टर के यहां से लौट रहे थे तो हमीदा ने महसूस किया कि एक गाड़ी उन का पीछा कर रही है. सफदर ने भी गाड़ी को देख लिया था. वैसे भी वह बेहद परेशान था, खामोश बैठा रहा. जब वे घर पहुंचे तो फोन की घंटी बज रही थी.
सफदर ने झपट कर फोन उठाया. उस ने चीख कर कहा, ‘‘कमीने, खबीस, मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगा. तेरी समझ में क्यों नहीं आता कि यहां कोई फरहान खां नहीं रहता.’’ गुस्से से उस ने टेलिफोन पटक दिया और सोफे पर बैठ कर जोरजोर से रोने लगा.
हमीदा ने उसे रोने दिया, ताकि उस के दिल का बोझ कुछ कम हो जाए. कुछ देर बाद उस ने उसे दवा खिलाई और आराम करने के लिए लिटा दिया. थोड़ी देर बाद वह जोरजोर से हंसने लगा. कहने लगा, ‘‘पागल का बच्चा, मैने फोन इतने जोर से पटका था कि उस का कान का परदा फट गया होगा.’’
हमीदा समझ गई कि उस पर पागलपन के दौरे पड़ रहे हैं. टेंशन और परेशानी ने उस के दिमाग पर असर कर दिया है. उस ने बेचारगी से कहा, ‘‘मैं क्या करूं? वह मेरे दिलोदिमाग पर छाया हुआ है. मैं किस से फरियाद करूं? अब मामला बरदाश्त के बाहर हो गया है. क्या मैं उस के खिलाफ पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा दूं?’’
‘‘ऐसी गलती करना भी मत. हम दोनों इस मामले में फंसे हुए हैं. कहीं पुलिस हमारे राज के पीछे पड़ गई तो… मुझे जेल से बहुत डर लगता है.’’ सफदर ने उदासी से कहा, ‘‘हमीदा मैं सोना चाहता हूं.’’
हमीदा ने उसे दवा दे दी, वह सो गया. हमीदा बेचारगी से अपने शौहर को देखने लगी. वह भी थक चुकी थी. एक तरफ नामालूम दुश्मन का खौफ, दूसरी तरफ पति की पागलों जैसी हरकतें. 10 बजे सफदर बिस्तर से एकदम से उठ खड़ा हुआ. वह काफी फ्रेश लग रहा था. उस ने कहा, ‘‘मैं कुछ देर बाहर खुली हवा में टहलना चाहता हूं. तुम फिक्र मत करो, मैं ठीक हूं. थोड़ी देर में आता हूं.’’
इस के बाद वह पीछे के दरवाजे से बाहर निकल गया. बहुत तेजी से कार के गेट से बाहर निकलने की आवाज आई. हमीदा दौड़ कर बाह गई. सफदर बहुत तेजी से कार ले कर निकल चुका था. उस की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे? परेशानी में वह सड़क को देखती रह गई.
रात को लगभग साढ़े 12 बजे उस के घर की घंटी बजी. उस ने दरवाजा खोला तो सामने पुलिस की गाड़ी देख कर वह डर गई. वह समझ गई कि सफदर ने अपने जुर्म की सारी कहानी पुलिस को सुना दी है. जुर्म में साथ देने के इल्जाम में पुलिस उसे भी पकड़ने आई है. उस से बड़ी गलती हुई, जो सफदर को अकेले बाहर जाने दिया. पुलिस इंसपेक्टर ने उस के करीब आ कर पूछा, ‘‘आप के शौहर की सफेद रंग की कार थी.’’
हमीदा ने हां में सिर हिला कर कार का नंबर बता दिया. इंसपेक्टर ने कहा, ‘‘शहर से बाहर जाने वाली सड़क पर उस गाड़ी का जबरदस्त ऐक्सीडेंट हुआ है, आप के शौहर की मौत घटनास्थल पर ही हो गई है.’’
यह सुन कर हमीदा चीख मार कर रोने लगी. उस से कुछ बोला नहीं गया. सफदर की ऐक्सीडेंट में मौत के एक हफ्ते बाद एक टैक्सी हमीदा के घर के सामने आ कर रुकी. उस में से एक खूबसूरत नौजवान उतरा. उस के हाथ में एक बैग था. सफदर की मौत के बाद मोहल्ले वाले उस का बहुत खयाल रख रहे थे. वह जवान बेवा थी और बहुत खूबसूरत थी. अपने घर में अकेली रहती थी, इसलिए पड़ोसन हिना ज्यादा वक्त उस के साथ गुजारती थी.
घर के सामने टैक्सी रुकते देख कर हिना जघ्ल्दी से बाहर आई. उस ने नौजवान से पूछा, ‘‘तुम्हें किस से मिलना है?’’ ‘‘मैं जमील हूं. दुबई से आया हूं. वैसे मैं करांची में रहता हूं, हमीदा का चचाजाद भाई हूं.’’ युवक ने कहा.
इस बीच हमीदा भी बाहर आ गई. उस युवक को देख कर वह खुश हो गई. उस ने कहा, ‘‘हिना, यह मेरे कजिन हैं. इन्हें आने दो.’’ हिना वापस चली गई. उस ने जमील से कहा, ‘‘आओ, अंदर आ जाओ.’’
जमील के अंदर आते ही हमीदा ने दरवाजा बंद कर दिया. जमील ने बैग एक तरफ फेंका और बेकरारी से हमीदा को बांहों में भर लिया. हमीदा बोली, ‘‘अरे यह क्या कर रहे हो, जरा सब्र से काम लो?’’ ‘‘और कितना सब्र करूं? तुम ने मुझे बहुत तड़पाया है, तुम से मिलने को तरस गया था.’’ ‘‘मैं ने भी तो तुम्हारी जुदाई के दिन कांटो पर गुजारे हैं. एक पल एक सदी के बराबर था.’’
मेरा हाल भी तुम्हारी तरह ही था. खैर, हम ने जो मंसूबा बनाया था, वह कामयाबी से पूरा हो गया. तुम्हारा आना इस प्लान की आखिरी कड़ी थी. वह भी पूरी हो गई. आज मैं बहुत खुश हूं.’’
हमीदा किसी नौजवान लड़की की तरह खिली दिख रही थी. जमील ने मुसकरा कर कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें एक पिस्तौल भी तो दी थी. वह इसलिए दी थी कि जब सफदर बहुत तनाव में हो तो खुद को गोली मार लेगा. पर उस ने ऐसा नहीं किया. वह पिस्तौल कहां है?’’ जमील ने पूछा.
‘‘उसे मैं ने दराज के खाने में ऊपर ही रख दिया था, ताकि दराज खोलते ही उसे ऊपर ही नजर आ जाए, लेकिन वह इस कदर परेशान था कि उसे मेज की दराज खोलने की सुध ही नहीं रही. खैर, उस ने पिस्तौल का इस्तेमाल नहीं किया तो क्या फर्क पड़ा? हमारा मकसद था कि वह खुदकुशी कर ले, वह उस ने कर ली. खुद को शूट न किया, गाड़ी का ऐक्सीडेंट कर लिया. अब सफदर की सारी जमापूंजी, यह घर, सब मेरा है. और जहांजहां उस ने पैसे इनवैस्ट कर रखे हैं, वह भी सब वापस ले लेंगे और यह शहर छोड़ देंगे.’’ हमीदा उर्फ आमना ने चहकते हुए कहा.
‘‘हां, यह ठीक है. हम किसी ऐसे शहर में जा कर आबाद हो जाएंगे, जहां हमें कोई नहीं जानता होगा. फिर शादी कर के ऐश करेंगे.’’ जमील ने कहा. ‘‘बिलकुल ठीक.’’ हमीदा खिलखिलाते हुए बोली. ‘‘वैसे वे फोन मैं ने बिलकुल सही वक्त पर किए थे न, मेरी आवाज कैसी थी?’’ जमील ने पूछा.
‘‘एकदम सही वक्त पर किए थे. फोन पर बात कर के सफदर की हालत बिगड़ती चली गई. करांची की काल ने ज्यादा काम किया. काल महंगी तो थी, पर काम उसी ने किया था.’’
‘‘अरे, तुम्हारी खातिर क्या महंगा क्या सस्ता. जब से तुम से इश्क किया था, तभी से सोच लिया था कि राह में आने वाली हर मुश्किल हटा दूंगा. अब यह बताओ कि आगे क्या करना है, तुम्हारा क्या प्रोग्राम है?’’ जमील ने पूछा.
‘‘तुम मेरे कजिन बन कर आए हो अब वापस चले जाओ. मेरी इद्दत (शौहर के इंतकाल के बाद औरत साढ़े 4 महीने शादी नहीं कर सकती) पूरी हो जाएगी तो मैं यहां सब से कराची जाने को कहूंगी. यह घर बेच दूंगी, यहां इन्वैस्ट किया पैसा भी निकाल लूंगी. सब से यही कहूंगी कि मैं हमेशा के लिए कराची जा रही हूं. फिर हम दोनों वहां से किसी और शहर को रवाना हो जाएंगे.’’ हमीदा यह सब कह ही रही थी, तभी फोन की घंटी बज उठी. उस ने फोन उठा कर कहा, ‘‘हैलो.’’
जमील ने गौर से उस के हसीन चेहरे को देखा. उस का चेहरा सफेद पड़ गया, जैसे उस ने मौत की आवाज सुन ली हो. वह बेहद डरी हुई लग रही थी. उस की आंखें फैल गईं थी. जमील समझ नहीं पाया किस का फोन है, जो हमीदा की अचानक यह हालत हो गई.
वह उस के पास पहुंचा. उस ने हमीदा से रिसीवर ले कर कान से लगाया. तभी दूसरी ओर से किसी शख्स की खरखरी आवाज आई, ‘‘मुझे फरहान खां की बेवा आमना से बात करनी है.’’ जमील के मुंह से एक लफ्ज नहीं निकला तो दूसरी तरफ से फिर आवाज आई, ‘‘हैलो… हैलो…’’
अब जमील का हाथ कांपने लगा. वह सोचने लगा कि क्या हमारे जुर्म के प्लान को कोई और भी जान गया था या यह कुदरत का इंसाफ था. Revenge Crime






