Uttar Pradesh Honor Killing. संगीता भले ही 17 साल की नाबालिग थी, लेकिन मानसिक और शारीरिक रूप से हृष्टपुष्ट थी. स्कूल में ही पढऩे वाले आदित्य चौरसिया (19 साल) से उस की गहरी दोस्ती थी. दोनों ही एकदूसरे को जान से ज्यादा प्यार करते थे, लेकिन झूठी शान की खातिर मथुरा गुप्त को बेटी संगीता के प्यार से नफरत थी. फिर एक दिन मथुरा गुप्त बेटी के प्यार का ऐसा दुश्मन बन बैठा कि…
मथुरा गुप्त बेटी संगीता के प्रेमी आदित्य चौरसिया को ले कर महीनों से परेशान था. 50 वर्षीय मथुरा गुप्त उत्तर प्रदेश के जिला महराजगंज के थाना फरेंदा स्थित लेजार महादेवा के टोला लीलाछापर का रहने वाला था. परेशान इसलिए नहीं था कि आदित्य उस की बेटी संगीता से प्यार करता था, बल्कि इसलिए था कि गांवसमाज में उस की खूब बदनामी हो रही थी.
बदनामी की जलालत की आग में जलता हुआ मथुरा गुप्त कई दिनों से उसे रास्ते से हटाने की फिराक में था, लेकिन अकेले कुछ करने में उस का दिल और दिमाग दोनों साथ नहीं दे रहे थे. इसीलिए उस ने अपने घर पर अपने चचेरे भाई प्रदीप गुप्त और पड़ोसी चंदन व अजय को बुलाया था. अजय झाडफ़ूंक का काम करता था.
”देखो भाई, आदित्य नाम का पानी सिर के बहुत ऊपर से बहने लगा है.’’ मथुरा के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ झलक रही थीं, ”अगर समय रहते धारा की दिशा को बदला नहीं गया तो आज मेरी बेटी के साथ नैन मटक्का करता फिरता है, हो सकता है कल तुम्हारी बहनबेटियों के साथ भी ऐसे ही करे, तब मेरे दर्द को समझोगे.’’ मथुरा की आवाज में काफी दर्द था.
”भाई, आप कह तो सही ही रहे हो.’’ प्रदीप ने आगे कहा, ”इस हरामी के पिल्ले की इतनी औकात हो गई है कि हमारे घर की बहूबेटियों पर बुरी नजर डालता है. इसे तो सजा मिलनी ही चाहिए.’’
”बात तो ठीक कहते हो प्रदीप भाई,’’ बीच में अजय बोला था, ”इस से पहले कि यह किसी और हांडी में मुंह मारे, साले की गरदन ही उड़ा देते हैं. न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी.’’
”पहले उसे समझाते हैं, अगर समझाने पर वह नहीं मानता तो फिर एक बार और समझाने की कोशिश करेंगे. फिर भी नहीं मानेगा तो जैसा आप सब उचित समझेंगे, वैसा करने को तैयार हूं.’’
”नाहक टेंशन लेते हो भैया.’’ इस बार प्रदीप बोला था, ”इतना रायता फैलाने की क्या जरूरत है? उसे जितना मौका देंगे, सिर पर सवार हो कर उतना ही वह तांडव करेगा. पर्सनली मेरा तो मानना है कि गंदगी को जितनी देर तक खुले में रखो, वो उतना ही बदबू फैलाती है, इसलिए गंदगी को तुरंत साफ कर देना चाहिए. अगर आप बदबू बरदाश्त कर सकते हो तो करो वरना…’’
मथुरा को प्रदीप की बातों में दम लगा था. मथुरा कुछ सोचने लगा. फिर पल भर बाद बोला, ”तुम्हारी बातें असरदार हैं भाई. गंदगी जितनी देर तक खुली जगह में रहती है, उतनी ही बदबू फैलती है, इसलिए तुरंत साफ करने में भलाई होता है. तो बताओ क्या करूं मैं?’’
”रास्ते से हटा दें.’’ ”तो ठीक है, रास्ते से हटाने की प्लानिंग करते हैं. सुनो.’’ ”बताओ भैया, क्या करना है?’’ ”बताता हूं, थोड़ा सोचने दो.’’
यह घटना से करीब महीना भर पहले की बात थी. आदित्य को मारने की योजना बनाने के लिए मीटिंग मथुरा गुप्त के घर पर हुई थी. उस दिन की मीटिंग बीच में ब्रेक कर आगे की योजना के लिए बाद में मीटिंग करने की बाद कह कर मथुरा ने सभी को अपनेअपने घर भेज दिया था.
प्राइवेट जौब करने वाले मथुरा गुप्त के 3 बच्चे थे, जिन में एक बेटी संगीता और 2 बेटे सन्नी और चंदन थे. सन्नी सब से बड़ा बेटा था, जबकि चंदन (18 साल) और संगीता (17 साल) थी. जौब के अलावा वह अपनी खेतीकिसानी भी करता था.
बात गांव की थी. दबी जुबान में संगीता और आदित्य के इश्क की चर्चाएं हो रही थीं. मथुरा घर से जब भी बाहर निकलता था तो उसे गांव वाले अजीब सी नजरों से घूर कर देखते थे. उस की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि उस से ऐसा क्या गुनाह हो गया था, जो वे उसे जातेआते घूरते थे? उसे बात कुछ समझ में आ नहीं रही थी.
पागल फिजाओं ने आदित्य और संगीता के प्यार का संदेश आखिरकार मथुरा गुप्त के कानों तक पहुंचा ही दिया. बेटी के इश्क के संदेशों ने मानो उस के कानों में खौलता हुआ शीशा उड़ेल दिया हो.
उस की आंखों में लाल अंगारे दहक रहे थे. गुस्से के मारे चेहरा लाल हो गया था. मानो बेटी का प्रेमी सामने आ जाए तो सूखी लकड़ी की तरह उसे चीर देगा. गुस्से से बदन थरथर कांप रहा था.
बेटी संगीता को तो उस ने आड़ेहाथों लिया ही, आदित्य से दूरियां बना कर रहने की सख्त हिदायत भी दी. लेकिन बाप के समझाने का उस पर तनिक भी असर नहीं हुआ और न ही उस का प्रेमी से मिलनाजुलना कम हुआ. यह बात उसे काफी नागवार लगी थी. इसी के बाद उस ने बेटी के प्रेमी आदित्य को रास्ते से हटाने की योजना को अंतिम रूप दिया.
19 साल का आदित्य चौरसिया महराजगंज जिले के थाना फरेंदा के बैकुंठपुर का रहने वाला था. वह इंटरमीडिएट का छात्र था. जिस स्कूल में वह पढ़ता था, उसी में मथुरा की बेटी संगीता भी दसवीं क्लास में पढ़ती थी.
स्कूल लाइफ के दौरान दोनों की आंखें चार हुई थीं. आंखें चार होते ही दोनों में प्यार हो गया था. हालांकि आदित्य और संगीता के घर के बीच 7 किलोमीटर का फासला था, लेकिन जब से संगीता से प्यार हुआ था, उस से मिलने अकसर वह लीलाछापर पहुंच जाता था.
मथुरा गुप्त की आंखों से आदित्य को ले कर नींद पहले ही उड़ी हुई थी. उसे जल्द से जल्द वह रास्ते से हटा देना चाहता था, इसीलिए उस ने घटना से करीब सप्ताह भर पहले एक बार फिर अपने परिचित प्रदीप और दोनों बेटों सन्नी तथा चंदन के साथ कमरे में बैठ कर योजना को अंतिम रूप दिया, ”बोलो, क्या कहते हो?’’ प्रदीप और चंदन से सपाट सवाल किया.
”कहना क्या है, जो करना है हम पहले ही तय कर चुके हैं.’’ प्रदीप ने उत्तर दिया..
”तो ठीक है, 2 फरवरी को यहां तिलक का प्रोग्राम है, किसी बहाने से उसे यहां ले आओ. यह जिम्मेदारी मैं तुम्हें सौंपता हूं प्रदीप. बोलो, तैयार हो?’’
”हां, मैं तैयार हूं. तैयार ही नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी भी अच्छे से निभाऊंगा.’’ गर्व से प्रदीप ने जवाब दिया.
”तो ठीक है, इस बारे में किसी को कानोंकान खबर नहीं होनी चाहिए.’’ मथुरा ने आगे कहा, ”अगर बात लीक हुई तो याद रखना आदित्य से पहले उसी का काम तमाम होगा. और हां, आज के बाद हम न तो किसी से मिलेंगे और न ही बात करेंगे, समझना आज से पहले न तो हम मिले थे और न ही यहां आए थे.’’
”निश्चिंत रहो, भैया.’’ प्रदीप आगे बोला, ”हमारी योजना की किसी को भी भनक तक नहीं लगेगी. यह मेरा वायदा है आप से, गद्ïदारी कभी नहीं करेंगे. सौंगंध खाते हैं.’’
”ठीक है, ठीक है. हमें पूरा यकीन है कि कोई मेरे साथ गद्ïदारी नहीं करेगा और हर आदमी अपना काम पूरी ईमानदारी से निभाएगा. और हां, तुम दोनों यहां से अलगअलग दिशाओं से हो कर अपने घरों को जाओगे, ताकि किसी को तुम पर शक न हो पाए. चलो, अब यहां से निकलो, रात काफी हो चली है.’’
प्रदीप और सन्नी तथा चंदन ने वैसा ही किया, जैसा मथुरा ने उन्हें आदेश दिया था. दोनों अलगअलग दिशाओं से हो कर अपनेअपने घरों को गए और खापी कर सो गए.
मथुरा गुप्त की योजना परफैक्ट तरीके से चल रही थी. 2 फरवरी, 2026 को रात के समय लीलाछापर में तिलक का प्रोग्राम था. इस में डीजे का इंतजाम किया गया था और एक युवती नृत्यांगना थी.
उसी गांव (बैकुंठपुर) का रहने वाला प्रदीप, जो आदित्य को जानता और पहचानता था, शाम साढ़े 6 बजे अपनी बाइक से उसे बुलाने उस के घर पहुंचा था.
आदित्य आधा घंटा पहले ही खेत में पानी लगा कर घर लौटा था. हाथमुंह धो कर चाय की चुस्की लेने जा ही रहा था कि प्रदीप उसे बुलाने आ गया. बाइक पर सवार वह हौर्न पर हौर्न बजाए जा रहा था.
हौर्न की आवाज सुन कर उस की मम्मी फूलमती बाहर निकली और बोली, ”क्यों इतना हौर्न पर हौर्न बजाए जा रहे हो? क्या बात है बेटा?’’ उन की आवाज में नाराजगी झलक रही थी.
”आदित्य से मिलना था, चाची. उसे भेज दो.’’ प्रदीप बोला. ”बेटा, वो तो अभीअभी खेत से लौटा है, चाय पी रहा है, तनिक सब्र करो, भेजती हूं अभी.’’ ”2 मिनट बात करनी है चाची, उसे भेज दो, बात कर के चला जाऊंगा.’’ प्रदीप ने हाथ जोड़ कर रिक्वेस्ट की.
”देखो बाबू, आदित्य थका हुआ है, उसे आराम करने दो. बाद में आ कर मिल लेना. अभी जाओ यहां से.’’ ”चाची, प्लीज 2 मिनट की ही तो बात है, भेज दो न. मिल कर चला जाऊंगा.’’
प्रदीप को लगा कि उस की योजना पर पानी फिरने वाला है. कहीं चाची ने उसे जाने नहीं दिया तो उस की तो लुटिया डूब जाएगी. चाहे जैसे भी कर के उसे अपने साथ ले जाना है, इसलिए वह अपनी जिद पर अड़ा रहा और चाची के सामने जिद करने लगा.
आदित्य काफी देर से दोनों की बातें सुन रहा था. जब उस से रहा नहीं गया तो चाय की प्याली ले कर बाहर आया. दरवाजे पर प्रदीप खड़ा था. उसे देखते ही उस के चेहरे पर मुसकान छा गई थी. वह उस के पास पहुंचा तो फूलमती भीतर कमरे में चली गईं. उन के भीतर जाते ही प्रदीप चहक उठा, ”यार आदित्य, तुम से एक बात करनी है?’’
”हां…हां…बता, क्या बात है?’’ आदित्य ने जल्दी से पूछा. ”लीलाछापर में डीजे आया है, रात में आर्केस्टा भी होगा, टौप क्लास की डांसर आ रही हैं. चल ना, बड़ा मजा आएगा.’’ प्रदीप ने उसे उकसाया.
”नहीं यार, आज मैं बहुत थका हूं, फिर वहां जाने का मेरा मूड नहीं हो रहा है. तू अकेले चला जा या किसी और को साथ ले ले.’’ असमर्थता जताते हुए आदित्य ने जवाब दिया.
”क्या लड़कियों की तरह नखरे दिखा रहा है तू. तू तो यार है मेरा, चल न. थोड़ी देर मजे करते हैं फिर लौट आएंगे.’’
”जिद मत कर मेरे भाई, सचमुच मैं बहुत थक चुका हूं, एक कदम भी चलने को मेरा मन नहीं हो रहा है, प्लीज.’’
”प्लीज कह कर मेरे को शर्मिंदा मत कर भाई. थोड़ी देर की तो बात है. तेरे से वायदा करता हूं जैसे ले जाऊंगा, वैसे ही घर भी छोड़ जाऊंगा. प्लीज, अब तो मेरी बात मान ले.’’
”ओफ्फोह! तू तो मेरे पीछे ऐसे पड़ गया जैसे…’’ कहतेकहते वह रुक गया. फिर आगे बोला, ”बिना मुझे साथ लिए तू यहां से जाने वाला नहीं है. तो ठीक है, मैं कपड़े पहन कर आता हूं. तू यहीं रुक.’’
”ठीक है, जल्दी आना, मैं तेरा वेट करता हूं.’’ आदित्य को मना कर प्रदीप ने पहली बाजी जीत ली थी.
आदित्य के वहां से पलटते ही प्रदीप के चेहरे पर एक कुटिल मुसकान थिरक उठी थी और शिकार के फंसने पर मन ही मन खुश हो रहा था. इधर आदित्य तेजी से कमरे की ओर बढ़ा और कपड़े पहन कर तैयार हुआ. इसी बीच मौका देख कर प्रदीप ने मथुरा को फोन कर के बता दिया था कि शिकार जाल में फंस चुका है.
बेटे को तैयार होता देख मम्मी फूलमती ने जिज्ञासावश पूछा, ”तुम कहां जा रहे हो?’’ तो उस ने मां को बता दिया, ”प्रदीप के साथ लीलाछापर आर्केस्टा देखने जा रहा हूं. जल्द ही लौट आऊंगा.’’
इतना कह कर वह कमरे से बाहर निकला और बाइक पर पीछे बैठ गया तो प्रदीप हवा से बातें करने लगा.
बैकुंठपुर से लीलाछापर की कुल दूरी 7 किलोमीटर थी. प्रदीप और आदित्य ने मस्ती करते हुए यह दूरी करीब 2 घंटे में जानबूझ कर पूरी की. रात के करीब साढ़े 8 बजे दोनों लीलाछापर पहुंचे थे, जहां तिलक का कार्यक्रम अपने शबाब पर था और लोग पार्टी का आनंद उठा रहे थे.
पार्टी में गांव वालों के साथसाथ मथुरा गुप्त और उस का परिवार भी शामिल था. वह भी पार्टी का आनंद ले रहा था, लेकिन उस की नजरें आदित्य पर गड़ी हुई थीं.
डीजे पर डांस कर रही डांसर को देख कर आदित्य के जिस्म के तार बजने लगे तो वह खुद को रोक नहीं सका और वह भी डांस करने लगा. वह पूरी मस्ती के साथ झूम रहा था. उसे मस्ती में झूमता देख प्रदीप वहां से अपने घर बैकुंठपुर के लिए चल दिया.
प्रदीप के जाते ही मथुरा चौकन्ना हो गया और पार्टी में पहले से मौजूद बेटे सन्नी व चंदन और अजय को इशारा कर के आदित्य पर निगरानी बढ़ा दी. थोड़ी देर बाद जब गाना बंद हुआ तो आदित्य के सिर से नाच का भूत उतर गया और वह चारों ओर नजर दौड़ा कर प्रदीप को ढूढने लगा. लेकिन वह उसे कहीं नहीं दिखाई नहीं दिया.
उस ने कलाई पर नजर दौड़ा कर देखा, उस समय रात के साढ़े 11 बज रहे थे. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि प्रदीप उसे छोड़ कर कहां चला गया. उसे फोन मिलाया तो रिंग बजने के बावजूद कौल रिसीव नहीं हुई तो वह परेशान हो गया.
इतने में चंदन और अजय उस के नजदीक आए और उसे अपनी बातों में उलझा कर पार्टी से बाहर ले कर निकल आए, जहां मथुरा पहले से उस का इंतजार कर रहा था. मथुरा को देख कर आदित्य बुरी तरह डर गया और वहां से जाने लगा तो दोनों ने उसे कस कर जकड़ लिया.
यह देख कर वह और बुरी तरह घबरा गया और उन की पकड़ से छूटने की कोशिश करने लगा, लेकिन लाख कोशिश के बावजूद वह आजाद नहीं हो सका.
दोनों उसे मथुरा के घर ले आए तथा एक कमरे में बंद कर दिए. चंदन और अजय भी कमरे के भीतर ही थे.
”साले, हरामखोर, तेरी वजह से गांव में मेरी कितनी बदनामी हुई है, तुझे पता भी है?’’ मथुरा गुर्राते हुए उस पर जानवरों की तरह टूट पड़ा और भद्ïदीभदï्दी गालियां भी बकता रहा, ”तुझे कई बार समझाया था कि मेरी बेटी से दूर रह, लेकिन तूने मेरी एक न सुनी और नैनमटक्का करता रहा. मेरा जीना मुहाल कर दिया तूने.’’ कह कर लातघूंसों से मारने लगा.
चंदन और अजय भी अपना हाथ साफ करते रहे. रात भर तीनों उसे लातघूसों से मारते रहे. आदित्य उन के सामने हाथ जोड़े जान की सलामती की भीख मांगता रहा, लेकिन इंसान से हैवान बने उन का दिल जरा भी नहीं पसीजा और उसे मारते रहे.
इधर, रात 2 बजे जब फूलमती की नींद टूटी तो उस ने कमरे में नजर दौड़ा कर देखा. उसे बेटा आदित्य कमरे में कहीं नजर नहीं आया तो वह परेशान हो गई और उसी समय बड़ी बेटी रेनू को उठा कर आदित्य के बारे में पूछा. उस ने भी अनभिज्ञता जाहिर की.
इस पर उस के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं और वह और भी ज्यादा परेशान हो गई. उस ने उसी समय बेटी से प्रदीप के घर चलने और आदित्य के बारे में पता लगाने की बात कही.
रेनू कपड़े संभालते हुए मम्मी के साथ प्रदीप के घर जा पहुंची और उस का दरवाजा खटखटाया. दरवाजा खटखटाने की आवाज सुन कर प्रदीप के पापा बुदबुदाए, ”इतनी रात गए कौन आया है? चल कर देखूं तो सही.’’
कहते हुए वह उठे और पांव में हवाई चप्पल डालते हुए दरवाजे की ओर बढ़े. दरवाजा खोलने पर सामने फूलमती और उस की बेटी को देख कर चौंक गए, ”क्या बात है फूलमती, इतनी रात गए तुम यहां क्या कर रही हो?’’
”प्रदीप कहां है, डौक्टर साहब?’’ उस ने सपाट लहजे में सवाल किया. ”क्या मतलब, प्रदीप कहां है? और कहां होगा, अपने कमरे में सो रहा है.’’ ”अपने कमरे में सो रहा है?’’ सुन कर वह चौंकी.
”ऐसा कैसे हो सकता है कि वह अपने कमरे में सो रहा हो और मेरे आदित्य का पता ही न हो. उसे जगा कर हमारे पास ले तो आइए जरा. मैं पूछंू कि मेरे बेटे आदित्य को उस ने कहां छोड़ दिया?’’
”क्या कहना चाहती हो? तुम्हारे आदित्य को कहां छोड़ा? क्या मतलब है तुम्हारा?’’ ”अभी सब पता चल जाएगा, उसे जगा कर मेरे पास ले तो आइए.’’
”ठीक है, यहीं ठहरो तुम, उसे जगा कर साथ लाता हूं.’’ कह कर वह बेेटे को जगाने कमरे की ओर बढ़े और उसी क्षण उसे जगा कर अपने साथ ले आए और उसे फूलमती के सामने खड़ा कर दिया, ”लो, तुम्हारे सामने खड़ा है. पूछो, क्या पूछना चाहती हो?’’ ”अपने साथ मेरे बेटे को साथ ले कर गए थे. तुम आ गए, उसे कहां छोड़ दिया?’’
”मुझे क्या पता तुम्हारा बेटा कहां है?’’ प्रदीप अकड़ते हुए बोला, ”पार्टी में साथ था, उस के बाद कहां गया, मुझे नहीं पता. और हां, मुझे परेशान करने की भूल मत करना वरना बहुत बुरा होगा. अब जाओ यहां से, कहीं और जा कर अपने बेटे को ढूंढना, समझी.’’ कह कर प्रदीप ने जोर से दरवाजा बंद किया और फिर सो गया.
प्रदीप का जवाब सुन कर फूलमती को काटो तो खून नहीं ऐसी हालत हो गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि रात गहरा गई है, इतनी रात बेटे को कहां तलाशूं.
जब कुछ समझ नहीं आया तो हारे हुए जुआरी की तरह लडख़ड़ाते कदमों के साथ बेटी को साथ ले कर वापस घर लौट आई. फूलमती ने जवान बेटे के वापस घर लौटने की आस में पूरी रात आंखों में बिता दी, लेकिन आदित्य नहीं लौटा.
अगले दिन 3 फरवरी को भी फूलमती बेटे का पता लगाती रही. उस के जहांजहां होने की उम्मीद थी, वहांवहां उस ने पता लगा लिया था, लेकिन कहीं पता नहीं चला. और तो और उस का मोबाइल भी लगातार बंद आ रहा था. इस से वह और भी ज्यादा परेशान हो गई थी.
चारों ओर से जब थक गई और आदित्य का कहीं पता नहीं चला तो 4 फरवरी, 2026 को गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर फरेंदा थाने पहुंची. वहां बेटे की गुमशुदगी दर्ज कराई.
फरेंदा थाने के इंसपेक्टर योगेंद्र राय ने बीएनएस की धारा 137(2) (गुमशुदगी) रोजनामचे पर दर्ज कर उस की तलाश में जुट गए.
बात 3 फरवरी की थी. मथुरा गुप्त को पता चल चुका था कि आदित्य की मम्मी फूलमती अपने बेटे की तलाश में जोरों से जुटी हुई है और एड़ीचोटी का जोर लगा रही है. जबकि मथुरा, चंदन और अजय ने उसे मारमार कर अधमरा कर दिया था. अभी भी उस के जिस्म में थोड़ीथोड़ी सांस बची थी.
मथुरा जानता था कि अगर उसे छोड़ दिया गया तो वह उन के गले की हड्ïडी बन जाएगा. फिर क्या था? जैसे ही मुकदमे की काररवाई हुई, उसी रात यानी 4 फरवरी की रात मथुरा, चंदन और अजय की मदद से उसे एक बाइक पर बीच में बैठा कर घर से एक किलोमीटर दूर तालाब किनारे स्थित गेहूं के खेत में ले जा कर गला घोंट कर मार दिया. आदित्य की पहचान छिपाने के लिए वापस लौटते हुए उस का मोबाइल फोन और जूता अपने साथ लेते गए.
इधर मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस सक्रिय हो गई थी और आदित्य की तलाश में जुटी हुई थी. इस बीच आदित्य की बहन रेनू ने मथुरा की बेटी संगीता को यह पता लगाने के लिए फोन किया कि आदित्य के बारे में कुछ जानती हो तो बता दो, बीते कई दिनों से वह लापता है.
यह सुन कर वह रोने लगी और बता दिया कि आदित्य को उस के पापा, भाई चंदन, अजय और प्रदीप ने मिल कर मार डाला है.
यह सुन कर रेनू बदहवास हो गई और मम्मी को सारी बात बता दी. दरअसल, आदित्य और संगीता के प्यार वाली बातें फूलमती और उस के सभी बच्चे जानते थे.
रेनू के मुंह से सच जान कर अगले दिन पूरे गांव वाले एकजुट हो गए और पुलिस को सच्चाई बता कर मथुरा और उस के परिवार के खिलाफ सख्त काररवाई करने की मांग करने लगे, लेकिन पुलिस की सुस्ती ने सब मटियामेट कर दिया.
अगले दिन यानी 6 फरवरी को सुबह करीब 7 बजे लेजार महादेव गांव के संतोष के गेहूं के खेत में एक लाश पाए जाने की सूचना पुलिस को मिली तो बगैर समय गंवाए इंसपेक्टर योगेंद्र राय दलबल के साथ घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.
थाने से घटनास्थल की दूरी तकरीबन 9 किलोमीटर थी. थोड़ी देर बाद वे मौके पर पहुंच गए थे. लाश की सूचना पा कर गांव वाले भारी संख्या में तमाशबीन बने खड़े थे.
लेजार महादेवा में एक युवक की लाश पाए जाने की सूचना फूलमती को भी मिल चुकी थी. वह भी वच्चों के साथ मौके के लिए रवाना हो चुकी थी.
हत्यारों ने युवक के साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दी थीं. मृतक के एक पैर में नायलौन की मोटी रस्सी बंधी हुई थी. उसी रस्सी के सहारे हत्यारे उसे घसीटते हुए गेहूं के खेत में लाए थे, जिस के निशान मौजूद थे.
मौके की नजाकत को भांप कर इंसपेक्टर योगेंद्र राय ने एसपी सोमेंद्र मीणा, एएसपी सिद्धार्थ कुमार, सीओ (फरेंदा) अनिरुद्ध कुमार और फरेंदा के तहसीलदार वरिष्ठ वर्मा को सूचना दे दी थी. इन्हीं के साथ डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम को भी सूचना दे कर घटनास्थल पर बुला लिया गया था.
सूचना मिलते ही सभी अधिकारी मौके पर पहुंच गए थे. स्थिति काफी तनावपूर्ण हो चुकी थी, इसलिए एसपी मीणा ने बृजमनगंज थाने के एसएचओ सत्यप्रकाश सिंह और पुरंदरपुर थाने के इंचार्ज मनोज कुमार राय को भी फोर्स के साथ बुला लिया ताकि स्थिति को संभाला जा सके.
इधर फूलमती भी मौके पर पहुंच गई थी. घर से निकलते वक्त रास्ते भर प्रार्थना करती रही कि उस का बेटा जहां कहीं भी हो, सहीसलामत हो. खैर, भीड़ को चीरती हुई वह लाश के करीब पहुंची और बेटे की लाश देखते ही वह गश खा कर जमीन पर गिर गई.
किसी तरह फूलमती को होश में लाया गया. होश में आते ही वह दहाड़ मारमार कर रोने लगी. लाश की पहचान आदित्य चौरसिया के रूप में हो चुकी थी. फूलमती चीखचीख कर बेटे की हत्या के लिए प्रदीप गुप्त को दोषी ठहरा रही थी कि वही उन के बेटे को अपने साथ ले कर गया था.
चीखपुकार से वहां का माहौल इतना कारुणिक हो गया था मौके पर खड़े ग्रामीणों का दिल पसीज गया. बैकुंठपुर के ग्रामीण फूलमती के पक्ष में खड़े हो गए और हत्यारों को तुरंत गिरफ्तार करने के लिए पुलिस पर दबाव बनाने लगे.
उन में भारी आक्रोश था. ग्रामीणों को गुस्से में देख पुलिस सतर्क हो गई और बाद में कई थानों की पुलिस मौके पर बुला ली गई.
खोजी कुत्ते को आदित्य की बौडी सुंघा कर छोड़ा गया. खोजी कुत्ता घटनास्थल को सूंघता हुआ पगडंडियों से होते हुए मथुरा गुप्त के घर जा कर रुक गया. यह क्रिया उस ने 3 बार की थी.
मामला शीशे की तरह साफ हो चुका था. आदित्य की हत्या इसी घर में हुई थी. शक के आधार पर पुलिस ने मथुरा गुप्त और उस के बेटे चंदन गुप्त व प्रदीप गुप्त को हिरासत में ले लिया. तीनों को साथ ले कर थाना फरेंदा ले आई.
सख्ती से पूछताछ में तीनों ने आदित्य की हत्या करने का अपना जुर्म कुबूल कर लिया. इस के बाद पुलिस ने गुमशुदगी की धारा 137(2) को तरमीम कर के धारा 131(1), 238, 3(5), 61(2) बीएनएस तीनों को रोजनामचे के पटल पर नामजद कर न्यायालय के समक्ष पेश किया, जहां से तीनों को 14 दिनों के न्यायिक हिरासत में भेज कर महराजगंज जेल भेज दिया गया.
पुलिस पूछताछ में आदित्य की हत्या किए जाने की बात स्वीकारी थी. कहानी कुछ ऐसे सामने आई—
19 साल का आदित्य चौरसिया मूलरूप से महराजगंज जिले के थाना फरेंदा स्थित बैकुंठपुर गांव का रहने वाला था. उस के पापा प्रयाग चौरसिया एक किसान थे. उन की कई साल पहले मौत हो चुकी थी. परिवार की जिम्मेदारी फूलमती देवी के कंधों पर आ गई थी. इन के परिवार में 4 बच्चे थे, जिन में 2 बेटियां रेनू और साधना और 2 बेटे आदित्य और अभिषेक थे.
फूलमती की चारों संतानों में आदित्य तीसरे नंबर पर था. उम्र के हिसाब से वह भले ही किशोर था, परंतु इसी उम्र में हालात की भट्ठी में पक कर परिपक्व हो चुका था. फूलमती को अपने बेटे पर फख्र था. वह बेटे की समझदारी पर फूली नहीं समाती थी.
आदित्य की 2 बड़ी बहनें उस की जिम्मेदारी थीं. समय पर उन की शादी भी करनी थी. तमाम ऐसे अनगिनत और ज्वलंत सवाल उस के मन में गोते लगा रहे थे, इसीलिए वह चाहता था कि पढ़लिख कर एक योग्य इंसान बने और अपने पैरों पर खड़े हो कर परिवार का मजबूत सहारा बने. इसलिए बड़ी लगन और परिश्रम से पढ़ता था. इस साल वह इंटरमीडियट यानी 12वीं क्लास में गया था.
जिस स्कूल में आदित्य पढ़ता था, उसी में महराजगंज जिले के ही लेजार महादेवा के लीलाछापर के रहने वाले मथुरा गुप्त की 15 वर्षीया बेटी संगीता भी 10वीं में पढ़ती थी. औसत कदकाठी, गोरी रंगत, गोलमटोल चेहरा, उस पर नागिन से लहराते केश, उस की सुंदरता को चार चांद लगा रहे थे.
2 साल पहले तब आदित्य 17 साल का था और संगीता 13 की थी, रिसेस का समय हुआ था. छात्र अपने क्लास से बाहर निकले थे. कुछ मौजमस्ती की नीयत से बाहर निकले तो कुछ खानेपीने का सामान खरीदने के लिए, लेकिन संगीता मैदान में स्थित हैंडपंप पर हाथ धोने निकली थी.
आदित्य की पहली बार जब नजर उस पर पड़ी तो वह अपलक उसे निहारता रहा. उसे देख कर वह एकदम मुग्ध हो गया था. उसे होश तब आया, जब अपने इर्दगिर्द दोस्तों को हंसते पाया. तब तक संगीता अपने क्लास में जा चुकी थी और आदित्य शरम से पानीपानी हो गया था.
भले ही संगीता किशोरी थी, लेकिन आदित्य के अंदाज से समझ गई थी कि वह उसे ही देख रहा था. उस का इस तरह देखना उसे अच्छा भी लग रहा था और मन को सुकून भी दे रहा था. उस दिन के बाद से आदित्य हमेशा रिसेस के समय क्लास से बाहर निकल कर संगीता के आने का बेसब्री से इंतजार करता था.
संगीता भी आंखें चार करने के लिए बाहर निकल ही आती थी. उसे देखते ही अपने सुर्ख होंठों पर एक मीठी मुसकान छोड़ देती थी. इसी के बाद दोनों के बीच में प्यार के बीज अंकुरित हुए. एकदूसरे के नाम और गांव जान गए. उस के बाद प्यार का सिलसिला आगे बढऩे लगा.
संगीता और आदित्य के प्यार के चर्चे दबी जुबान से स्कूल में होने लगे थे. स्कूल के फिजाओं से होती हुई यह खबर लीलाछापर निवासी मथुरा गुप्त तक पहुंची तो वह गुस्से से जलभुन उठा. वह तब और परेशान हो उठा था, जब गांव वाले बेटी के प्यार के चर्चे चटखारे लेले कर करते थे. वह जिधर भी जाता, उसी तरफ संगीता और आदित्य के प्यार के चर्चे होने लगते.
परेशान मथुरा ने बेटी के चालचलन के बारे में पत्नी को बताया तो वह भी अवाक रह गई. उचित मौका देख कर उस ने बेटी को बड़े प्यार से समझाया, ”मैं ने कुछ सुना है, क्या वह सच है बेटी?’’
”किस बारे में मम्मी?’’ संगीता ने अनजान बनते हुए सवाल किया. ”बात तेरे बारे में है, बेटी.’’
”कैसी बात मम्मी? जलेबी की तरह यूं गोलगोल मत घुमाओ, बात जो भी हो साफसाफ कह दो. छू कर महसूस करो, मेरी धड़कनें कितनी बढ़ गई हैं.’’
”तो सुन. तेरे पापा मुझ पर काफी नाराज हो रहे थे. कह रहे थे कि आजकल संगीता के पांव बहक गए हैं. किसी से नैनमटक्का करती फिर रही है. समझा दो उसे, घर की मानमर्यादा को लांघने की कोशिश न करे.’’
मम्मी की जुबान से अपने प्यार की कहानी सुन कर वह दंग रह गई. उस की जुबान से एक बोल तक नहीं फूटा. वह एकदम चुप रही. ”मैं ने कुछ कहा, बेटा. बोलो, इस में कितनी सच्चाई है?’’
”मम्मी, गलती हो गई मुझ से.’’ मां की ओर दया भाव से देखती हुई संगीता बोली, ”फिर ऐसी गलती नहीं होगी. मुझे माफ कर दो. अब कभी भी उस से नहीं मिलूंगी, प्रौमिस मम्मी. बस एक बार मुझे माफ कर दो. पापा को समझा देना, वो मुझे मारेंगे नहीं.’’ मां के पल्लू से लिपट कर वह गिड़गिड़ाने लगी.
”इज्जत ही बेटियों का पवित्र गहना होता है, एक बार नीलाम हो जाए तो दोबारा नहीं मिलता. उस के लिए समाज में जीना बहुत मुश्किल हो जाता है. फिर भी वह सम्मान लौट कर दोबारा नहीं आता,’’ मम्मी ने संगीता को समझाने की कोशिश की, ”इसलिए तुम्हें समझा रही हूं, अभी भी वक्त है, खुद को बचा लो, नहीं तो अपने पापा का गुस्सा जानती हो. जितना दुलारते हैं, उतना ही मारते हैं. आज तो मैं उन के कहर से तुम्हें बचा लूंगी, लेकिन इस के बाद नहीं.’’
उस समय खुद को बचाने के लिए संगीता ने मम्मी से झूठमूठ वादा कर दिया. अगले दिन बचतेबचाते वह आदित्य से मिली और सारी बातें उसे बताते हुए आगाह कर दिया कि हमारे प्यार के बारे में हमारे घर वालों को खबर हो गई है. हमारे प्यार के खिलाफ हमारे घर वाले हो चुके हैं. और वे हमें एक नहीं होने देंगे. लगता है हमारा मिलना अब कठिन हो सकता है.
संगीता और आदित्य का सोचना जायज था. अपने जीते जी मथुरा गुप्त बेटी के प्यार पर स्वीकृति की मुहर नहीं लगा सकता था. वह आत्मसम्मान के लिए जीता था और सम्मान के लिए ही मरता भी था. कोई उस के मानसम्मान या बहूबेटी की इज्जत के साथ खेले, वह हरगिज बरदाश्त नहीं कर सकता था.
मथुरा गुप्त बेटी के प्यार के खिलाफ हो चुका था. उस ने बेटी को कुछ समय के लिए स्कूल भेजना बंद कर दिया था ताकि उस के सिर से इश्क का भूत उतर जाए. यही नहीं, उस ने उस पर कड़ा पहरा भी लगा दिया था. कुछ सोचने के बाद उस ने बेटी को स्कूल जाने की परमिशन दे दी थी.
इसी दौरान एक दिन उस ने आदित्य को स्कूल से घर वापस आते समय बीच रास्ते में रोक कर धमकाया, ”अगर बेटी से दूर नहीं हुए तो दुनिया से दूर हो जाओगे, फिर तुम्हें कोई बचाने वाला नहीं होगा. तेरे कारण समाज बिरादरी में मेरी नाक कट गई. घर से निकलना मेरा मुश्किल हो गया, लोग मुझ पर हंसते हैं. अगर तूने बेटी का पीछा करना नहीं छोड़ा तो अंजाम बुरा होगा, मेरी बात याद रखना.’’
मथुरा गुप्त के समझाने का आदित्य पर कोई असर नहीं हुआ. पहले जैसे ही दोनों छिपछिप कर मिलते रहे. धीरेधीरे यह बात फिर से मथुरा के कानों तक पहुंची तो वह आगबबूला हो गया और आदित्य को रास्ते से हटाने की योजना बनाई.
इस योजना में वह खुद तो शामिल था ही, अपने बेटे चंदन कुमार, चचेरे भाई प्रदीप कुमार और अजय को भी शामिल किया. चूंकि प्रदीप का आदित्य के साथ गहरा याराना था, इसलिए उसे आदित्य को अपने साथ लाने के लिए भेजा था ताकि किसी को कोई शक न हो.
और फिर योजना बना कर 4 फरवरी, 2026 को हत्या कर के उस की लाश गेहूं के खेत में फेंक दिया. इधर आदित्य की मम्मी फूलमती को बेटे के मथुरा की बेटी संगीता से प्यार के बारे में बहुत पहले ही पता चल चुका था. 2 फरवरी को फूलमती की बेटी रेनू ने संगीता से उस के फोन पर बात की तो संगीता ने रेनू को सारा सच बता दिया कि आदित्य उसी के घर में रखा गया है और उस के साथ मारपीट की जा रही है.
मेरे आदित्य को बचा लो, नहीं तो वे उस की जान ले लेंगे. लेकिन वह अपने बेटे को नहीं बचा सकी. और वह असमय काल के गाल में समा गया.
कथा लिखे जाने तक आदित्य हत्याकांड के सभी आरोपी मथुरा गुप्त, सन्नी, चंदन (बाल सुधार गृह) प्रदीप और अजय जेल की सलाखों के पीछे थे. हत्या में इस्तेमाल की गई बाइक, पैर में बंधी नायलौन की मोटी रस्सी, आदित्य के जूते और गायब मोबाइल फोन आरोपितों से हासिल कर पुलिस ने साक्ष्य के तौर पर अपने कब्जे में ले लिया था.
पुलिस सभी आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है.
—कथा में संगीता परिवर्तित नाम है.






