Fiction Story in Hindi. सना बेहद खूबसूरत युवती थी. वह अपनी आपा नुसरत से बहुत प्यार करती थी. नुसरत का देवर शहजाद सना की खूबसूरती पर फिदा था और उस से शादी करना चाहता था, लेकिन सना एक ऐसे अनजाने शख्स के प्यार में मुब्तला थी, जो बहुत मोटा और कुरूप था. क्या उस की फेमिली वाले इस रिश्ते के लिए राजी हुए?
मैंने आज जल्दी बिस्तर छोड़ दिया था. अम्मी ने रात को ही बता दिया था कि कल सुबह तेरी आपा नुसरत अपने शौहर के साथ घर आ रही है, उन के साथ नुसरत का देवर शहजाद भी आ रहा है. आपा नुसरत से मुझे बचपन से ही खासा लगाव रहा था. आपा और मेरी उमर में 2 साल का अंतर था. हम दोनों एक साथ खेलकूद कर बड़ी हुई थीं.
आपा ने ग्रैजुएशन कर लिया तो अब्बू उस के लिए रिश्ता तलाश करने लगे. अब्बू का कहना था, ”जवान लड़की को घर में बिठा कर रखना ठीक नहीं होता, जमाना बहुत खराब है.’’
अब्बू की लखनऊ के बाजार नाका हिंडोला में इलैक्ट्रौनिक्स की दुकान थी. अच्छी आमदनी थी, इसलिए घर में रईसी ठाठ थे. लखनऊ में अब्बू की खूब जानपहचान थी, इस वजह से आपा के लिए रामपुर से अरशद मियां का रिश्ता आ गया.
अरशद का रामपुर में साडिय़ों और जरी के सूटों का कारोबार था. वह अहमदाबाद और मुंबई से साडिय़ां सूट मंगवाते थे और रामपुर-बरेली के थोक व्यापारियों को सप्लाई देते थे. यह कारोबार अरशद के अब्बू अनवर हुसैन ने जमाया था.
उम्र बढऩे की वजह से उन की तबियत खराब रहने लगी तो उन्होंने अरशद को सारा कारोबार सौंप दिया था. अनवर हुसैन का छोटा बेटा शहजाद ला की पढ़ाई कर रहा था, पढ़ाई पूरी कर के वह रामपुर में ही वकालत करने वाला था.
अब्बू को यह रिश्ता इतना पसंद आया कि उन्होंने तुरंत आपा के निकाह की तैयारियां शुरू कर दीं. महीने भर में ही आपा नुसरत दूल्हे भाई अरशद की दुलहन बन कर रामपुर चली गई. इस के बाद 2 बार ही आपा मायके आई, आज उन का मायके के लिए तीसरा फेरा लग रहा था.
मैं बहुत खुश थी. फ्रेश हो कर मैं ने अपना पंसदीदा कुर्ती-शरारा निकाल कर पहना और हल्का सा मेकअप कर के आपा के स्वागत के लिए तैयार हो गई.
अम्मी ने रसोई का काम संभालने वाली सायरा को मेहमानों के लिए लजीज खाना बनाने का हुक्म दे दिया था. सायरा सालों से हमारे घर में रसोई संभालती आ रही थी. उन के हाथ से बना खाना बहुत जायकेदार होता था.
9 बजे थे कि अरशद अपनी बेगम यानी मेरी आपा का हाथ थामे घर की दहलीज पर आ गए. मैं दौड़ कर अपनी आपा से जा लिपटी. आपा ने बड़े लाड़ से मुझे अपने सीने से लगा कर भींचा तो अरशद ने हंसते हुए चुटकी ली, ”बस करो बेगम, नाज वैसे ही दुबलीपतली है, ज्यादा जोर से भींचोगी तो बेचारी की 1-2 हड्डी चटक जाएगी.’’
आपा ने मुसकराते हुए मुझे छोड़ दिया और बोली, ”नाज इतनी दुबलीपतली भी नहीं है जी. अब तो शरीर भर गया है इस का.’’
”अच्छा?’’ अरशद ने फिर ठिठोली की, ”फिर तो इस के लिए मुझे दूल्हा तलाश करना पड़ेगा.’’
मैं शरमा गई, ”जीजू अभी तो मेरे खानेपहनने के दिन हैं, मैं 10 साल से पहले इस घर की दहलीज पार नहीं करने वाली.’’
मेरी बात पर सभी खुल कर हंस पड़े. उसी वक्त शहजाद ने लंबी सांस भरते हुए मेरे कान के पास फुसफुसा कर कहा, ”10 साल का लंबा इंतजार. उफ! इतना जुल्म मत करो नाज.’’
मैं ने चौंक कर शहजाद की ओर कनखियों से देखा. वह मेरे पास सिर झुकाए खड़ा था. मैं ने आपा नुसरत के निकाह के वक्त भी महसूस किया था कि शहजाद मुझ पर लाइन मारने की कोशिश में लगा हुआ है. मेरे करीब आने और मुझ से बोलने का एक भी मौका उस ने नहीं गंवाया था.
मैं उसी वक्त समझ गई थी कि शहजाद मुझ पर मर मिटा है और मुझे अपना बनाने के सपने मन में संजोए हुए है. आज उस ने अपने इरादे को मेरे करीब आ कर बयां कर दिया था. मैं ने उस की बात का जवाब नहीं दिया.
अम्मीअब्बू बाहर आ गए थे. अम्मी ने नुसरत आपा को गले लगाया, फिर सब को ले कर ड्राइंगरूम में आ गईं.
”इन्हें कहां रखना है नाज?’’ शहजाद ने मेरा मुंह खुलवाने की गरज से पूछा.
मैं ने देखा वह कंधे पर 2 सफारी बैग लटकाए हुए था और हाथ में सूटकेस पकड़े हुए खड़ा था.
”इन्हें यहां रख कर आप फ्रेश हो लीजिए. नौकर सामान वहीं पहुंचा देगा, जहां आप लोगों के रुकने की व्यवस्था की गई है.’’ मैं ने कहा और रसोई की तरफ चली गई.
जीजू, आपा और शहजाद एक घंटे में फ्रेश हो गए, तब हम सभी ने एक साथ बैठ कर नाश्ता किया.
यह लोग रात का सफर कर के आए थे. नाश्ता कर के तीनों बैडरूम में आराम करने चले गए. दोपहर में आपा उठ कर आईं और उन्होंने सब के लिए खाना लगवाया. खाने के दौरान आपा ने मुझ से कहा, ”नाज, हम शाम को सिटी मौल चलेंगे, तेरे जीजू तेरे लिए सूट खरीदना चाहते हैं. मुझे भी 2-3 गाउन लेने हैं.’’
”किस खुशी में आपा, मेरे पास ढेरों सूट हैं.’’ मैं ने कहा.
”होंगे. तेरे जीजू रामपुर से कुछ ले कर नहीं आए हैं न इसलिए वह तुझे शौपिंग करवाना चाहते हैं.’’ आपा ने अपनी बात पर जोर दे कर कहा तो मैं ने शाम को सिटी मौल चलने के लिए हां कर दी.
जीजू अपनी कार से लखनऊ आए थे. उसी कार से हम चारों सिटी मौल जाने के लिए शाम को घर से निकले. जीजू और आपा कार की पिछली सीट पर बैठे. रास्ता बताने के लिए मुझे शहजाद के साथ सामने बैठना पड़ा. कार शहजाद ड्राइव कर रहा था. मुझ से बात करने के लिए उसे यह सुनहरा मौका मिल गया था.
”पढ़ाई कैसी चल रही है तुम्हारी नाज?’’ शहजाद ने पूछा.
”ठीक चल रही है,’’ मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया.
”ग्रैजुएशन के बाद क्या सोचा है?’’
”आगे और पढ़ूंगी, अच्छी जौब के लिए जितना पढ़ो, कम ही होता है.’’
”लेकिन हमारे घर में औरतों से काम नहीं करवाया जाता.’’ शहजाद बड़े गंभीर स्वर में बोला, ”अपनी आपा को ही देख लो, ग्रैजुएशन किया है. लेकिन भाईजान इन्हें घर की हुकूमत सौंप कर अपना बिजनैस देख रहे हैं. तुम्हारी आपा बहुत मौज में हैं.’’
मैं बच्ची नहीं थी, शहजाद की मंशा यह सब बताने में क्या है, मैं समझ गई. मैं ने गंभीर स्वर में कहा, ”शहजाद, सपने देखना अच्छी बात होती है, लेकिन सपना पूरा होगा, यह नहीं कहा जा सकता. मेरी जिंदगी पर मेरा अधिकार है, मेरे लिए तुम परेशान मत होओ.’’
”लेकिन मैं तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं नाज.’’
”शहजाद, पीछे जीजू और आपा बैठे हैं. यह समय दिल खोल कर दिखाने का नहीं है.’’ मैं धीरे से फुसफुसाते हुए बोली, ”इस विषय पर फिर कभी बात कर लेंगे, हम सिटी मौल पहुंचने वाले हैं.’’
शहजाद खामोश हो गया. कुछ ही देर में हम सिटी मौल पहुंच गए. मैं जीजू और आपा के साथ कार से उतर गई. शहजाद कार को पार्क करने के लिए पार्किंग में चला गया. वह कार पार्क कर के आया तो हम सिटी मौल में घुस गए.
मौल में काफी भीड़ थी. हम जीजू के साथ मौल की थर्ड फ्लोर पर स्थित रेडीमेड लेडीज सूट की दुकान में आ गए. यहां जीजू ने मेरी पसंद के 4-5 कुरती गरारे और जरी वाले सूट खरीदे. आपा ने 2 गाउन पसंद किए थे.
बिल की पेमेंट जीजू ने की, फिर वह हमें रेस्तरां मे ले कर आए. यहां इडली वडा और कोल्ड कौफी का लुत्फ ले कर हम वापसी के लिए निकले.
जीजू ने अमूल आइसक्रीम के 4 कोन हमारे लिए खरीद लिए थे. मैं देख रही थी शहजाद मौल में आने के बाद से खामोश था, उस ने रेस्तरां में अनमने मन से इडली वडा खाया था. आइसक्रीम उस ने नहीं ली. मुझे शहजाद पर तरस आ रहा था. वह मेरी बात से उदास हो गया था.
शहजाद 5 फुट 7 इंच का लंबा, हैंडसम युवक था. अमीर घराने से भी था, कोई भी लड़की उस की बेगम बनने के लिए तुरंत तैयार हो सकती थी, लेकिन मैं शहजाद को अपने दिल में जगह नहीं देना चाहती थी, शायद इसलिए कि वह मेरी आपा का देवर था. मैं उस की दुलहन बन कर आपा के घर में नहीं जाना चाहती थी. मैं आपा को बेहद प्यार करती थी. उन की देवरानी बनने से रिश्तों में थोड़ी सी भी खटास आ जाने पर हमारे प्यार का अनमोल रिश्ता टूट सकता था.
मेरे एक हाथ में सूट के 2 पौलीबैग थे. दूसरे में आइस कोन थी. तीसरे फ्लोर से नीचे आने के लिए एस्केलेटर का प्रयोग करना था. जीजू और आपा एस्केलेटर पर चढ़ कर नीचे पहुंचने वाले थे. मैं एस्केलेटर के पास पहुंची और मैं ने जैसे ही सीढ़ी पर पांव रखा, मेरा बैलेंस बिगड़ गया. मेरे पैरों में ऊंची एड़ी वाली सैंडल थी, जो सीढ़ी पर फिसल गई.

मेरा शरीर लहराया तो मेरे मुंह से चीख निकल गई. मैं गिरने ही वाली थी कि किसी की मजबूत बांहों ने मेरी कमर थाम कर मुझे गिरने से बचा लिया.
मैं ने खुद को बचाने वाले को देखा. वह सांवले रंग का मोटा व्यक्ति था. उस का चेहरा दागदार था और आंखें लाल थीं. लग रहा था उस ने शराब का नशा कर रखा हो. मुझे अपनी तरफ देखता देख कर वह झेंप गया. उस ने मुझे सावधानी से सीढिय़ों पर उतारते हुए घबराए स्वर में कहा, ”सौरी! आप को बचाने की हड़बड़ाहट में मुझे आप को छूना पड़ गया. आप खुद को संभाल कर एस्केलेटर का सफर पूरा कीजिए.’’
”हां,’’ मैं जल्दी से बोली और एस्केलेटर पर संभल कर नीचे की ओर आने लगी.
जीजू और आपा मेरी चीख सुन कर चौंके थे, किंतु किसी व्यक्ति द्वारा मुझे थाम लेने से उन्होंने चैन की सांस ली थी. मेरे पांव फर्श पर टिके तो दोनों दौड़ कर मेरे पास आ गए.
”तुम ठीक हो न नाज?’’ आपा मेरा शरीर टटोलते हुए बोलीं, ”तुम एस्केलेटर पर फिसल कैसे गईं?’’
”मेरे दोनों हाथ भरे थे आपा, सैंडल फिसलने से यह हादसा हुआ, किंतु उस ने मुझे बचा लिया.’’ कहते हुए मैं ने उस व्यक्ति को देखने के लिए गरदन घुमाई तो वह नजर नहीं आया.
”कहां चला गया वह भला आदमी, मैं उस का शुक्रिया भी अदा नहीं कर पाई.’’ मैं परेशान स्वर में बड़बड़ाई तो आपा ने मेरी पीठ सहलाते हुए कहा, ”अल्लाह का शुक्र है कि तुम बच गई.’’
तभी शहजाद लपकता हुआ आ गया, ”क्या हुआ था नाज, मैं ने तुम्हें फिसलते देखा तो तुम्हें बचाने के लिए लपका, लेकिन किसी मोटे से व्यक्ति ने तुम्हें थाम लिया तो मैं रुक गया. कौन था वह व्यक्ति?’’
”मैं उसे नहीं पहचानती,’’ मैं ने धीरे से कहा.
”चलो, घर लौटते हैं, अम्मी फिक्र कर रही होंगी.’’ आपा ने कहा तो हम सब मौल से बाहर निकल आए. फिर कार से घर की तरफ रवाना हो गए.
3 दिन रुक कर जीजू, आपा और शहजाद रामपुर के लिए लौट गए. 3 दिन हम ने खूब सैरसपाटे किए, शौपिंग की और अच्छे रेस्तरां में मनपसंद खाना खाया. मुझे उसी सिटी मौल में दूसरी बार जाना पड़ गया था, जहां मैं एस्केलेटर से फिसली थी और एक व्यक्ति ने मुझे थाम कर घायल होने से बचा लिया था.
मैं ने यहां उस व्यक्ति को तलाश किया था, लेकिन वह मुझे मौल में प्रवेश करने के बाद कहीं नजर नहीं आया था. मुझे अपनी सोच पर कोफ्त हुई, मुझे यह विचार नहीं आया कि वह व्यक्ति उस दिन यहां शौपिंग करने आया होगा. जरूरी नहीं कि मैं दूसरी बार वहां गई तो वह भी आएगा. मैं ने अपने मस्तिष्क से उस के खयाल को झटक दिया.
आपा को गाउन टाइट थे, वह बदलवा कर हम शौप से निकले थे, तब गैलरी में मुझे वह मोटा व्यक्ति दिखाई दे गया. मैं तेजी से उस की तरफ लपकी, लेकिन मुझे देखते ही वह व्यक्ति फुरती से आगे बढ़ कर गैलरी का मोड़ क्रौस कर के गायब हो गया. मैं ने उसे बहुत आगे जा कर ढूंढा, लेकिन वह फिर नजर नहीं आया. मैं हैरान थी कि वह मुझे देख कर क्यों भागा है. मैं तो सच्चे मन से उस का शुक्रिया अदा करना चाहती थी.
मैं वापस जीजू और आपा के पास लौट कर आई तो काफी परेशान थी. मुझे उदास और परेशान देख कर जीजू अरशद गंभीर स्वर में बोले थे, ”वह सज्जन पुरुष नहीं मिला न तुम्हें, वह मिलेगा भी नहीं, क्योंकि कुछ लोग अहसान कर के बदले में कुछ भी लेना नहीं चाहते. शुक्रिया भी नहीं. चलो, लेकिन एस्केलेटर पर संभल कर पांव रखना. मैं और नुसरत तुम्हारे पीछे रहेंगे.’’
हम उस दिन सिटी मौल से लौट कर घर आए तो मेरे जेहन में उसी व्यक्ति का खयाल था. मैं हैरान थी कि वह मुझे देख कर भाग गया था, क्यों? यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था. अहसान का बोझ मेरे सीने पर था और वह मुझे शुक्रिया कहने का मौका नहीं दे रहा था.
मेहमानों के जाने के बाद मैं शाम को जल्दी सो गई. 3 दिन के सैरसपाटे की थकान मेरे मनमस्तिष्क पर सवार थी. मैं गहरी नींद सोई थी, किंतु हवा के तेज थपेड़े और बादलों की गडग़ड़ाहट ने मेरी नींद तोड़ दी. मैं उठ कर खिड़की की तरफ बढ़ी तो देखा बाहर तेज बारिश हो रही है.
बरसात में भीगना मुझे अच्छा लगता था. मैं खिड़की के पास आ गई. अचानक मुझे सामने सड़क पर वही व्यक्ति खड़ा दिखाई दिया. मैं ने गौर से देखा, यह वही मोटा व्यक्ति था. वह बारिश में भीग रहा था. उस की नजरें मेरी खिड़की की तरफ थीं. दिन का उजाला फैल गया था. मैं ने देखा सड़क पर पानी भी जमा हो गया था, उसी पानी में खड़ा वह भीग रहा था.
मेरे लिए यह हैरान कर देने वाली बात थी. वह मुझ से दूर भी भाग रहा था और मेरा दीदार करने के लिए अब मेरे घर तक आ पहुंचा था. आखिर क्या है इस के दिल में? कहीं यह मुझे चाहने तो नहीं लगा है. अजीब से खयाल मेरे मन में उमडऩे लगे. मैं ने देखा वह 21-22 साल का पुरुष था. रंग सांवला था और शरीर थोड़ा भारी था. चेहरे पर दाग थे, फिर भी वह ज्यादा बदसूरत नहीं लगता था.
न का वह नेक और भला था, जो अहसान के बदले कुछ लेना भी नहीं चाहता था. उस की नजरें मुझे देख चुकी थीं. कुछ सोच कर मैं ने खिड़की से हाथ बाहर निकाल कर हैलो किया, प्रत्युतर में उस ने भी अपना हाथ हिलाया. मैं ने उसे रुकने का इशारा किया और खूंटी पर टंगा रेन कोट उतार कर पहनते हुए मैं बाहर की तरफ लपकी.
अम्मी सो रही थीं. मैं स्लीपर पहन कर तेजी से पीछे की तरफ आई तो जी धक्क से रह गया. वह अपनी जगह से गायब हो गया था. मुझे वह दूरदूर तक नजर नहीं आया तो मैं गहरी सांस भर कर वापस घर लौट आई.
मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि वह मुझ से कतरा क्यों रहा है. यह तो मैं समझ गई थी कि मेरे लिए उस के दिल में लगाव है, लेकिन मेरा वह सामना करने की हिम्मत जुटा नहीं पा रहा है.
मुझे देख कर वह सिटी मौल में भी भागा था और आज यहां मेरे घर तक पहुंचा, जब मैं ने रुकने को कहा तो वह मेरे बाहर आने से पहले फिर भाग गया. उस का यह रवैया मुझे हैरान कर देने वाला था.
दूसरी सुबह मैं जल्दी उठी और यह देखने के लिए खिड़की के पास आई कि क्या वह आज फिर आया है. वह आया हुआ था और उसी जगह पर खड़ा था, जहां कल बारिश में भीगता खड़ा था.
मुझे देख कर उस ने हाथ हिलाया. मैं ने भी हाथ हिलाया तो वह पैदल ही एक तरफ चला गया.
अब यह रोज का सिलसिला बन गया. वह सुबह आता और मेरी एक झलक मिलने के बाद चला जाता. 6 महीने तक यह सिलसिला चलता रहा. हमारे बीच बातचीत नहीं हुई.
मैं ने बीए फाइनल के पेपर दिए और ग्रैजुएशन कर लिया. मैं अब एमबीए करना चाहती थी. आपा को मैं ने ग्रैजुएशन करने की बात फोन पर बता दी थी.
पता नहीं उन के घर क्या प्लान बना, जीजू अरशद सुबहसुबह हमारे घर आ गए. मैं अपने कमरे में थी और सायरा मुझे बैड टी देने आ गई थी, उसी ने बताया कि तुम्हारे जीजू तुम्हारा हाथ अपने भाई शहजाद के लिए मांगने आए हैं.
मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई, क्योंकि घर के अहम फैसले अब्बू लेते थे. यदि उन्होंने जीजू को मेरा निकाह शहजाद से करने की जुबान दे दी तो गजब हो जाने वाला था. मैं शहजाद से कतई निकाह नहीं करने वाली थी.
मैं ने चाय खत्म ही की थी कि अब्बू ने आवाज दे कर मुझे नीचे आने को कहा. मैं खुद को किसी तरह संभाल कर नीचे गई. बैठक में अब्बू और जीजू अरशद बैठे हुए थे. अम्मी नहाने के लिए गई हुई थीं.
मैं ने मुस्करा कर जीजू को आदाब किया और कुरसी पर बैठ गई. अब्बू ने मेरी ओर देख कर गंभीर स्वर में कहा, ”बेटी नाज, तुम्हारे जीजू अपने भाई शहजाद के लिए तुम्हारा रिश्ता मांगने आए हैं. मैं ने इन से कह दिया है कि इस का फैसला नाज ही करेगी. तुम बताओ, क्या कहती हो?’’
”अब्बू अभी मेरा निकाह करने का मन नहीं है. मैं एमबीए करना चाहती हूं, 2-3 साल बाद सोचूंगी, मुझे क्या करना है.’’ मैं ने स्पष्ट शब्दों में कहा तो जीजू का चेहरा लटक गया.
अब्बू ने तुरंत बात को संभालने की कोशिश की. वह बोले, ”बेटा अरशद, नाज के लिए 2-3 साल का इंतजार क्या तुम कर पाओगे? मेरी मानो शहजाद के लिए कहीं और लड़की तलाश कर लो. मैं भी यहां कोई अच्छी खानदानी लड़की ढूंढता हूं.’’
”ठीक है अब्बू,’’ अरशद मियां ने कहा और उठ कर खड़े हो गए, ”मैं चलता हूं, मुझे कल अहमदाबाद जाना है.’’
”अरे! खाना वगैरह तो कर के जाना…’’ अब्बू ने कहा. लेकिन जीजू दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए बोले, ”नहीं अब्बू, फिर आऊंगा तो रुकूंगा.’’
जीजू इतना कह कर तेजी से बाहर निकल गए तो मैं उन के पीछे दौड़ी. मैं समझ चुकी थी कि मेरे उत्तर से वह नाराज हो गए हैं. वह कार में बैठ रहे थे, तब मैं ने वहां पहुंच कर गंभीर स्वर में कहा, ”सौरी जीजू, मेरी बात आप को बुरी लगी है. सच्चाई यह है कि मैं आपा को बहुत प्यार करती हूं. एक ही घर में जा कर मैं उन के प्यार को खोना नहीं चाहती. आप शहजाद के लिए…’’
जीजू ने मेरी बात काट कर प्यार से मेरा कंधा थपथपाया, ”मुझे तुम्हारे फैसले पर कोई ताज्जुब नहीं है नाज. तुम दोनों बहनों का प्यार इसी तरह बना रहे, मैं दिल से यही चाहता हूं. खुश रहो, मैं शहजाद को मना लूंगा.’’ जीजू अरशद मियां ने मुसकराते हुए कहा और कार स्टार्ट कर के आगे बढ़ा दी.
दूसरी सुबह मैं जल्दी उठ कर खिड़की पर आई तो वह व्यक्ति मुझे सड़क पर खड़ा दिखाई नहीं दिया. हां, खिड़की के नीचे एक 9-10 साल का लड़का खड़ा था, वह मुझे इशारे से नीचे आने को कह रहा था. मैं बड़ी हैरान हुई और स्लीपर पहन कर घर के पीछे पहुंच गई.
उस लड़के ने मुझे कागज का एक तह किया हुआ खत थमा दिया और भाग गया. मैं ने अंदाजा लगा लिया कि यह खत उसी व्यक्ति ने इस लड़के के हाथ मुझ तक पहुंचाया है. मैं खत ले कर अपने कमरे में आ गई. धड़कते दिल से मैं ने वह खत खोला. उस में लिखा था—
‘नाज, सलाम!
कल तुम्हारे जीजू अरशद मियां अपने भाई शहजाद का रिश्ता मांगने घर आए थे. तुम ने मना कर दिया, यह मुझे अच्छा नहीं लगा. शायद इस में मेरा ही दोष रहा है, मुझे रोजरोज तुम्हारी खिड़की के सामने आ कर तुम्हारा दीदार करने का क्या अधिकार है. मैं बदसूरत हूं, मुझे यह खयाल क्यों नहीं आया कि तुम जैसी सुंदर लड़की मेरी इस बदसूरती पर क्यों फिदा होगी. वह मुझे अपना हमसफर क्यों बनाएगी.
मुझ से ये गुस्ताखियां हुई हैं नाज, इस के लिए मुझे माफ कर देना. मैं आज के बाद तुम्हारे सामने नहीं आऊंगा. शहजाद हैंडसम है, जवान है, तुम उस से निकाह के लिए हां कर देना और अपने दामन में तमाम खुशियां बटोर लेना. मेरी दुआएं सदा तुम्हारे साथ रहेंगी.
एक बदनसीब इंसान साजिद!’
खत का एकएक अलफाज चौंकाने वाला था. पहली बार उस व्यक्ति ने अपना नाम उजागर किया था. उस का नाम साजिद था. मुझे यह बात चौंका रही थी कि कल घर में हुई एकएक बात उसे मालूम थी. वह जीजू और उन के भाई के नाम भी जानता था. कैसे? क्या घर में उस का कोई भेदिया छिपा बैठा है, जो घर की एकएक बात उस तक पहुंचा रहा है.
घर में अब्बू, अम्मी, मैं और बावर्ची सायरा के अलावा एक बंगाली युवती सबीना आती थी, वह साफसफाई करती थी. सायरा और सबीना विश्वास वाली औरतें थीं. वह घर की बात बाहर नहीं निकाल सकती थी, फिर साजिद तक घर की बात कैसे पहुंची? मैं जितना सोचती उलझती जाती. मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था.
साजिद मेरी खुशी के लिए मुझ से किनारा करने की बात कर रहा है. उसे यह नहीं मालूम कि मैं ने शहजाद के साथ निकाह की बात को ठुकरा दिया है. वह नेकदिल आदमी मुझ पर एक और अहसान करने के लिए मुझ से दूर जा रहा है. उफ! अब मैं क्या उस की एक झलक पाने के लिए भी तरस जाऊंगी. मेरा दिल रो रहा था. मैं अपना एक अच्छा दोस्त खो रही थी.
मेरी आंखें भींग गईं. खत को मैं ने तकिए के नीचे रख दिया और बिस्तर पर गिर कर आंसू बहाने लगी. मेरी जिंदगी में शायद अब ये आंसू ही साथ रहने वाले थे.
साजिद इस के बाद मुझे कभी नजर नहीं आया. मैं उसे भुला नहीं पा रही थी. 5-6 महीनों में ही मुझे साजिद से इतना गहरा लगाव हो गया था कि मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती. मैं रातदिन आंसू बहाती रहती. न मेरा मन घर में लगता था, न बाहर. इतने दिनों बाद मुझे उस का नाम मालूम हुआ था, वह कौन है, क्या काम करता है, कहां रहता है मैं कुछ भी तो नहीं जानती थी. साजिद को खो कर मैं ने अपनी तमाम खुशियां खो दीं.
मैं देर तक सोती रहती, उठती तो फ्रेश हो कर अधूरे मन से नाश्ता करती और स्कूटी ले कर कालेज चली जाती. दोपहर में 3 बजे घर आ कर फिर सो जाती. रात को खाना खा कर कोर्स की किताबें पढ़ती. बस, यही मेरी दिनचर्या बन गई थी. साजिद को देखने के लिए सुबह खिड़की खोलती तो वह नजर नहीं आता. मैं उदास हो जाती.
आज भी मुझे साजिद सड़क पर नजर नहीं आया तो मेरी आंखें भर आईं. जैसेतैसे तैयार हो कर घर से कालेज के लिए निकली तो मन भटक रहा था. मैं स्कूटी ठीक से ड्राइव नहीं कर पा रही थी. एकाएक एक मोड़ पर मेरी स्कूटी एक टैंपो से टकरा गई. मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया. मैं हवा में उछली और मुंह से घुटीघुटी चीख निकल गई. सड़क पर गिरने के बाद मुझे कोई होश नहीं रह गया.
”अल्लाह का लाखलाख शुक्र है मेरी बेटी को होश आ गया.’’ ये शब्द अब्बू के थे, जो मेरे कान में पड़े थे. मैं ने आंखें खोल कर देखा. अब्बू मेरे पास स्टूल पर बैठे हुए थे.
मैं ने इधरउधर नजरें दौड़ाईं. मैं किसी हौस्पिटल में बैड पर पड़ी हुई थी. एक नर्स मेरा बीपी चैक कर रही थी. नर्स चली गई तो मेरे माथे पर किसी ने धीरे से हाथ रखा, ”कैसा महसूस कर रही हो नाज?’’

मैं ने आवाज से ही पहचान लिया. यह मेरी नुसरत आपा थीं. उन के करीब जीजू अरशद और मेरी अम्मी खड़ी थीं.
”आप कब आईं आपा?’’ मैं ने धीरे से पूछा.
”आज 4 दिन हो गए मुझे. तेरी स्कूटी किसी टैंपो से टकरा गई थी. तू सड़क पर गिरी तो सिर फट गया. पुलिस ने तुझे हौस्पिटल पहुंचा कर तेरे फोन से जो नंबर मिलाया, वह अब्बू का था. तेरे एक्सीडेंट की खबर मिलते ही अब्बूअम्मी दौड़ेदौड़े आए. तू बेहोश थी और सीरियस थी.
”तेरा औपरेशन होना था. डौक्टर 3-4 बोतल खून मांग रहे थे. अब्बू ने हमें फोन कर के इत्तला दी थी. हम तुरंत आ गए. तेरे जीजू अहमदाबाद से बीमार हो कर घर लौटे थे, वह खून देने की स्थिति में नहीं थे, शहजाद मियां का बरेली में ला का एग्जाम था, वह वहां चला गया…’’
”मेरी जान से ज्यादा मूल्यवान ला का एग्जाम था क्या आपा?’’ मैं ने शब्दों को चबाते हुए पूछा तो अब्बू मेरे पास झुक गए और गंभीर स्वर में बोले, ”हीरे की परख ऐसे समय में ही तो होती है मेरी बच्ची. जानती हो, 4 बोतल खून कैसे इकट्ठा हुआ?’’
”कैसे इकट्ठा हुआ, मैं क्या जानंू, मैं तो बेहोश थी अब्बू.’’
”हां, तुम होश में नहीं थी.’’ अब्बू सिर हिला कर बोले, ”2 बोतल खून मैं ने रेडक्रास से हासिल किया और 2 बोतल तेरे खिड़की वाले दोस्त ने दिया है. बड़ा ही नेक और सज्जन है वह. कह रहा था नाज की जिंदगी बचाने के लिए मैं अपने जिस्म का कतराकतरा खून देने को तैयार हूं, लेकिन डौक्टर इस की इजाजत ही नहीं दे रहा.’’
”साजिद!’’ मैं हैरानी से बोली, ”अब्बू आप जानते हैं उसे?’’
अब्बू मुस्कराने लगे, ”ये बाल धूप में सफेद नहीं किए हैं मैं ने. मैं सुबह सैर को जाता था तो मैं ने 1-2 बार साजिद और तुम्हें इशारे में बात करते और हाथ हिलाते देख लिया था. तभी तो अरशद मियां शहजाद के लिए तुम्हारा हाथ मांगने आए थे तो मैं ने गेंद तुम्हारे पाले में डाल दी थी, वरना घर के बड़े फैसले आज तक मैं ही तो लेता आया हूं.’’
”ओह अब्बू!’’ मैं शरमा कर बोली, ”आप बड़े खराब हैं.’’
”मैं ऊपर वाले का शुक्रगुजार हूं तुझे सिर में ही लगी, कहीं हाथपांव में फ्रैक्चर हो जाता तो बड़ी मुसीबत हो जाती.’’ अम्मी मेरा हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोली, ”अब तू जल्दी ठीक हो कर घर आ जाए तो मैं घर में शहनाइयां बजवाऊं.’’
”अम्मी बगैर मेरे लिए लड़का देखे ही आप…’’ मैं ने कहना चाहा तो आपा ने हंस कर कहा, ”वह 4 दिन से तेरे लिए हौस्पिटल में पड़ा हुआ है,’’ आपा ने जीजू को कोहनी मारते हुए कहा, ”ऐ जी, साजिद को आप अंदर ले कर आइए. उस से यह मत कहना कि नाज होश में आ गई है नहीं तो वह भाग खड़ा होगा.’’
जीजू मुसकराते हुए बाहर निकल गए तो आपा ने एक आंख दबा कर कहा, ”नाज आंखें बंद कर लो, साजिद आ रहा है.’’
मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई. मैं ने आंखें बंद कर लीं. साजिद काफी कमजोर और उदास लग रहा था. वह मेरे बैड के पास आ कर रुका.
”साजिद, हम ने बहुत कोशिश कर ली, यह होश में ही नहीं आ रही है. तुम इस के कान के पास पुकारो, शायद तुम्हारी आवाज पर नाज को होश आ जाए.’’ आपा ने गंभीर स्वर में कहा.
साजिद मेरे ऊपर झुका और उस ने पुकारा, ”नाज, देखो मैं आ गया हूं, आंखें खोलो…’’
मैं ने तुरंत साजिद के गले में बांहें डाल कर आंखें खोली और शरारत से बोली, ”बहुत भागते हो, अब भाग कर दिखाओ.’’
साजिद घबरा गया. सभी मेरी शरारत और साजिद के हड़बड़ाने पर खुल कर हंसने लगे.
”इसे अभी छोड़ दो नाज.’’ अब्बू हंसते हुए बोले, ”अब हम जल्दी ही इस के पांव में बेडिय़ां डालने वाले हैं. यह फिर कभी भाग नहीं पाएगा.’’
मैं ने साजिद की गरदन से बांहें निकाल दीं तो वह मुसकरा कर बोला, ”मेरे खिलाफ साजिश रची गई, दूल्हे भाई यह आप की शरारत थी.’’
”नहीं साजिद. इन्हें तो मैं ने तुम्हें बुलाने के लिए भेजा था, दोषी तो मैं हूं.’’ आपा हंसते हुए बोली.
”आप हम से बड़ी हैं. आप को तो मैं कुछ कह ही नहीं सकता.’’ साजिद सिर झुका कर बोला.
माहौल बहुत खुशनुमा हो गया था, यहां ही यह तय कर लिया गया कि मेरा निकाह अगले महीने साजिद के साथ कर दिया जाएगा.
हौस्पिटल से मैं 2 हफ्ते बाद घर लौट आई. 15 दिन मैं ने आराम किया, फिर साजिद के साथ मेरे निकाह की तैयारियां शुरू कर दी गईं. मैं अभी तक असमंजस में थी. साजिद के विषय में मैं कुछ भी नहीं जानती थी. वह कौन है, क्या करता है, कहां रहता है, उस के परिवार में कौनकौन है, मुझे कुछ भी तो मालूम नहीं था.
अब्बू मेरी मन की बात जान गए तो मुझे पास बिठा कर बोले, ”साजिद के विषय में जानने को परेशान हो न नाज?’’
अब्बू ने सायरा को आवाज दी. वह आ गई तो अब्बू ने अम्मी को भी बुला लिया, फिर सायरा से बोले, ”सायरा, बेटी नाज को साजिद के विषय में बताओ.’’
सायरा मुसकराई और बताने लगी, ”बेटी नाज, साजिद मेरा छोटा भाई है. हमारा घर लखनऊ में ही था. अच्छे खातेपीते घर के थे हम. अब्बू का मोटर गैराज था. वह मुझ में और साजिद में कोई फर्क नहीं करते थे. दोनों को पढ़ाने के लिए उन्होंने इंग्लिश स्कूल में डाला. मैं ने दसवीं जमात पास कर लिया था कि एक दिन घर लौटते वक्त अब्बू का एक्सीडेंट हो गया. उन के इंतकाल के बाद अम्मी टूट गईं, उन्होंने चारपाई पकड़ ली और जो जमापूंजी थी उस से मेरा निकाह कर दिया.
”मैं मुदस्सिर खान की बीवी बन कर कानपुर आ गई. मेरे निकाह के 5 महीने बाद अम्मी भी अल्लाह को प्यारी हो गईं. हमारा पूरा घर बिखर गया. मैं साजिद को अपने घर ले आई और वहां ही पढऩे डाल दिया.’’
सायरा ने क्षण भर रुक कर सांस दुरुस्त की फिर बताने लगी, ”साजिद के आने से मुदस्सिर का व्यवहार मेरे प्रति रुखा हो गया. वह मुझे बांझ कह कर प्रताडि़त करने लगा. बातबात पर मारता, गालियां देता. साजिद दसवीं पास कर चुका था. समझदार भी हो गया था, वह एक दिन घर से यह कह कर चला गया कि आपा मैं लखनऊ जा रहा हूं. मेरे कारण आप को जीजू परेशान करें, मुझ से यह बरदाश्त नहीं होता.
”साजिद लखनऊ चला गया. मुदस्सिर फिर भी मुझ पर अत्याचार करता रहा. 4 साल तक मैं मुदस्सिर से मार खाती रही. फिर एक दिन शराब के नशे में वह रेल लाइन पर कट कर मर गया. इद्ïदत के बाद मैं मुदस्सिर का घर छोड़ कर लखनऊ आ गई. यहां मालूम हुआ साजिद ने पढ़ाई के लिए घर बेच दिया है और हौस्टल में रह कर बिजनैस मैनेजमेंट का कोर्स कर रहा है. मैं अपने गुजारे के लिए इधरउधर घरों में काम करते हुए यहां तुम्हारे घर रसोई का काम करने के लिए रुक गई. 4 साल से मैं यहां पर हूं.’’
”और साजिद, क्या उस ने बिजनैस मैनेजमेंट का कोर्स पूरा किया?’’ मैं ने बड़ी उत्सुकता से पूछा.
”हां,’’ सायरा ने मुसकरा कर कहा, ”कोर्स पूरा कर के उस ने अपना बिजनैस शुरू किया और इतना कामयाब हुआ कि वह सिटी मौल जिस के एक्सेलेटर पर तुम फिसली थी, वह साजिद का ही है.’’
”क्या कह रही हैं आप?’’ मैं हैरानी से बोली.
”हां नाज. साजिद ने लखनऊ के पौश इलाके आलम बाग में अपना बंगला भी बनवा लिया है. तुम दुलहन बन कर वहीं बंगले में जाओगी.’’
”एक शर्त पर सायरा आपा…’’ मैं गंभीर स्वर में बोली, ”आप को भी वहां हमारे साथ रहना होगा. हमारे घर में कोई उम्रदराज इंसान तो होना ही चाहिए न, क्यों अब्बू?’’
”हां बेटी. सायरा अब आलमबाग में तुम दोनों के साथ रहेगी. हम यहां दूसरी रसोईघर संभालने वाली रख लेंगे.’’ अब्बू ने कहा तो सायरा मान गई.
अब्बू दूसरे ही दिन सायरा को साजिद के बंगले पर छोड़ कर आ गए.
15 दिन बाद बड़ी धूमधाम से मेरा साजिद के साथ निकाह हो गया. अब्बू बहुत खुश थे कि उन्हें अरशद के बाद दूसरा दामाद भी नेक और दौलतमंद मिला.
मैं साजिद की दुलहन बन कर उस के बंगले में आई तो मेरे दिल में एक ही खयाल था, ”सांवली रंगत वाला मेरा साजिद किसी कोहिनूर हीरे से कम नहीं है, मैं ने उस को चुनने में कोई भूल नहीं की है.’’ Fiction Story in Hindi






