SBI Bank Robbery. पटना की जेल में बंद कुंदन भगत ऐसा शातिर बदमाश है, जो जेल से ही लूट की वारदातों को अंजाम दिलाता है. उस के ही गैंग ने देहरादून में स्थित रिलायंस ज्वैलरी शोरूम में 12 करोड़ की लूट की. अब उसी के गैंग ने सूरत की एसबीआई ब्रांच में मात्र 15 मिनट में 50 लाख रुपए की लूट इतनी आसानी से कर ली कि…
गुजरात के सूरत शहर के वराछा के एचएल रोड स्थित शक्ति बिल्डिंग स्थित भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) में 27 अप्रैल, 2026 को जो 50 लाख की लूट हुई, उस की योजना बिहार के पटना की आदर्श सेंट्रल जेल बेऊर में बंद कुंदन कुमार
उर्फ कुंदन भगत ने बनाई थी. जेल में बंद होने के बावजूद उस ने गैंग के सदस्यों से संपर्क बनाए रखा और सूरत में स्थित स्टेट बैंक की इस ब्रांच में 50 लाख रुपए की लूट करा दी.
इस के पहले कुंदन भगत देहरादून में हुई 12 करोड़ की रिलायंस ज्वैलरी लूट में भी शामिल था. जेल में होने के बावजूद कुंदन एक विशेष ऐप के माध्यम से बैंक लूटने वाले साथियों को निर्देश देता रहा था.
कुंदन द्वारा दिए गए निर्देश के अनुसार ही उस के साथियों ने सूरत की 10 बैंक शाखाओं की रेकी करने के बाद वराछा की एसबीआई की शाखा को चुना था. इस की वजह यह थी कि बैंक के सामने वाली सड़क पर मेट्रो का काम चल रहा था, जिस से उधर ट्रैफिक कम रहता था. इसलिए लूट करने के बाद भागने में आसानी रहेगी.
उन्होंने लूट के लिए समय भी ऐसा चुना, जब सूरत नगर निगम (मनपा) के चुनाव हो रहे थे. इस के लिए उन्होंने चुनाव का दूसरा दिन चुना था, क्योंकि अगले दिन पुलिस बल क्षेत्र में कम रहेगा और लूट को आसानी से अंजाम दे कर वे फरार हो जाएंगे.
योजना के अनुसार, 27 अप्रैल, 2026 की दोपहर को 1.11 बजे गैंग का एक बदमाश बैंक में आम ग्राहक की तरह आया. उस ने सर्विस मैनेजर किरण भोगे के पास जा कर कहा कि उसे करंट अकाउंट खुलवाना है.
सर्विस मैनेजर किरण भोगे ने मुसकराते हुए कहा, ”बिलकुल खुलवाइए. हम इसी के लिए तो यहां बैठे हैं. आप को अपना अकाउंट खुलवाना है या किसी और का?’’
”मैं अपना नहीं, पिताजी के नाम अकाउंट खुलवाना चाहता हूं. क्या उन की जगह मैं हस्ताक्षर कर सकता हूं?’’ सामने बैठे युवक ने इधरउधर देखते हुए कहा.
युवक बैठा तो सर्विस मैनेजर के सामने था, लेकिन वह पूरी बैंक को इस तरह देख रहा था, जैसे निरीक्षण कर रहा हो या किसी की राह देख रहा हो. वह युवक सर्विस मैनेजर के सामने करीब 40 मिनट तक बैठा हिंदी में इधरउधर की बातें करता रहा.
1 बज कर 54 मिनट पर 5 अन्य युवक हिंदी में ही बातचीत करते हुए जैसे ही बैंक में घुसे, वह युवक उठ कर अपनी जगह पर खड़ा हो गया. उस ने झट से पैंट में खोंसी पिस्तौल निकाली और सर्विस मैनेजर को कब्जे में ले लिया. एक भी क्षण की देर किए बिना अन्य युवकों ने भी अपना काम शुरू कर दिया.
उन में से किसी ने बैंक के अंदर आए ग्राहकों को कब्जे में ले लिया तो किसी ने बैंक कर्मचारियों को. सब से पहले तो उन्होंने सभी के मोबाइल फोन छीन लिए. उस के बाद जिस लुटेरे ने मैनेजर को कब्जे में लिया था, उस ने उन्हें जान से मारने की धमकी दे कर लौकर की चाबी मांगी.
लूटे 50 लाख रुपए
बैंक मैनेजर कुछ कहते, उस के पहले ही दूसरे युवक ने कैशियर से लौकर खुलवा कर उस में रखे 12 लाख रुपए लूट कर अपने साथ लाए थैले में रख लिए. संयोग से उसी समय कैश वैन ले कर आए कर्मचारी भी 38 लाख रुपए ले कर अंदर आए तो लुटेरों ने उन रुपयों को भी लूट लिया. इस तरह उन के हाथ 50 लाख रुपए लग गए.
बैंक लूटने के बाद सभी लुटेरे जिन 3 बाइकों (अपाचे, पल्सर और स्पलेंडर) से आए थे, उन्हीं से भाग निकले.
बैंक लूट की सूचना पाते ही शहर भर के पुलिस अधिकारियों का काफिला बैंक आ पहुंचा और सीसीटीवी के आधार पर आरोपियों को पकडऩे की कवायद शुरू कर दी. सब से पहले तो पूरे शहर की नाकेबंदी करा दी गई. पुलिस ने जांच शुरू की.
सीसीटीवी की फुटेज चैक की गई तो मजे की बात यह थी कि किसी भी लुटेरे ने अपना चेहरा नहीं ढंका था. सभी के चेहरे स्पष्ट दिखाई दे रहे थे, जिस से उन के अंदर आने पर उन पर शक होता. आम आदमी की तरह वे इधरउधर घूमते रहे और बैंक के एकएक कर्मचारी पर नजर रखते रहे.
दरअसल, उन्हें कैश ले कर आने वाली वैन का इंतजार था. इसीलिए उन्होंने वह समय चुना था. लुटेरे इतने बेखौफ थे कि लूट के समय उन्होंने चेहरे भी नहीं छिपाए थे, जिस के चलते केंद्रीय एजेंसियों के विशेष पोर्टल में मौजूद अपराधियों के डेटा के साथ सीसीटीवी फुटेज का मिलान करते ही एकएक कर सभी लुटेरों की पहचान हो गई थी.
पता चला कि यह गैंग अत्यंत प्रोफेशनल था और अंतरराज्यीय लूट में माहिर था. पुलिस ने उन के फिंगरप्रिंट और बोलीभाषा का भी अध्ययन किया. इस से पता चला कि लुटेरे पूर्वांचल और बिहार की भाषा में बात कर रहे थे यानी लुटेरे पूर्वांचल या बिहार के थे.
सीसीटीवी फुटेज से ही पता चला कि लुटेरे थाना रांदेर के अंतर्गत इंडस्ट्रियल एरिया में डेढ़ महीने से एक छोटे से कमरे में किराए पर रह रहे थे. वहीं रह कर लुटेरे वराछा स्थित एसबीआई बैंक की रेकी करते रहे.
लूट की घटना को अंजाम देने के बाद लुटेरों को पता था कि पुलिस तुरंत नाकाबंदी करेगी. शहर के हर रोड के सीसीटीवी चैक करेगी. इसलिए ट्रेस से बचने के लिए उन्होंने एक साथ भागने के बजाय अलगअलग रास्ता चुना. यही नहीं, लूट के बाद भाग कर वे ग्रामीण इलाके में कहां मिलेंगे, यह पहले से ही तय था.
इस के अलावा लुटेरों ने पुलिस को भ्रमित करने के लिए बैंक कर्मचारियों और ग्राहकों के जो मोबाइल फोन छीने थे, उन्हें अलगअलग इलाकों में फेंका.
पुलिस को पता ही था कि लुटेरों ने जिन बाइकों का उपयोग किया था, वे चोरी की होंगी और उन के नंबर भी फरजी होंगे, जिन्हें वेबसाइट से लिया गया होगा. लुटेरे अलगअलग रास्तों से भाग कर सूरत के ग्रामीण इलाके में पहुंचे थे.
पुलिस जांच करते हुए जब कन्यासी गांव से डेढ़ किलोमीटर दूर उन के ठिकाने पर पहुंची तो वहां तीनों बाइकें बरामद हो गईं. उन बाइकों को देख कर पुलिस हैरान रह गई. लुटेरे इतने शातिर और चालाक थे कि किसी भी हालत में अपनी पहचान उजागर नहीं करना चाहते थे.
पुलिस वाहन और उस के मालिक तथा अपराधी की पहचान चेसिस नंबर और इंजन नंबर से करती है. पर इस मामले में आरोपियों ने चेसिस और इंजन के नंबर ही मिटा दिए थे. बाइकों में जिन फरजी नंबरों का उपयोग किया गया था, वे अहमदाबाद, बड़ौदा और वलसाड के लोगों के थे.
मामले की गंभीरता को देखते हुए वराछा पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच को भी जांच में लगा दिया गया था. क्राइम ब्रांच की जांच में सामने आया कि सभी आरोपियों के पहचान पत्र मध्य प्रदेश से बनवाए गए थे.
इन फरजी दस्तावेजों में केवल तसवीर ही असली थी, बाकी नाम, पता और नंबर सब कुछ नकली था. इन सभी आरोपियों के डाक्यूमेंट्स एक ही जगह से तैयार कराए गए थे.
लूट करने के बाद सभी आरोपी बाइक छोड़ कर हिम्मतनगर पहुंचे थे और वहां से अलगअलग दिशाओं में चले गए थे. पुलिस ने लगभग 1000 सीसीटीवी चैक किए थे.
अपराध की गंभीरता को देखते हुए सूरत क्राइम ब्रांच के 7 पुलिस इंसपेक्टर और 100 पुलिस जवानों की टीमें बनाई गई थीं. सीसीटीवी फुटेज से ही पता चला था कि लूट में इस्तेमाल की गई तीनों बाइकों (स्प्लेंडर, पल्सर, अपाचे) पर नकली नंबर प्लेट लगी थी.
टैक्निकल सर्विलांस की मदद से पुलिस को कुंदन भगत गैंग के सदस्य शुभम कुमार ठाकुर का सुराग मिला. पुलिस की एक टीम उत्तर प्रदेश पहुंची और लगातार 3 दिनों तक लोकेशन बदल रहे शुभम कुमार को अयोध्या से दबोच लिया.
एक महीने की रेकी
पुलिस जांच में चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ है कि इस गैंग ने लूट से पहले 2 महीने तक सूरत में शरण ली थी. आरोपियों ने जहांगीरपुरा, रांदेर और वेड रोड इलाके में नकली आधार कार्ड का उपयोग कर के किराए पर मकान लिए थे.
इस दौरान उन्होंने बैंक और आनेजाने वाले रास्तों की बारबार रेकी की थी. लूट के लिए इस्तेमाल की गई एक बाइक खटोदरा से चोरी की गई थी, जबकि दूसरी तेलंगाना से ला कर उस पर नकली नंबर प्लेट लगाई गई थी.
हालांकि वहां के स्थानीय लोगों को उन की गतिविधियों पर शक होने पर लूट से एक महीने पहले ही उन्होंने मकान खाली करा दिया था. उस के बाद वे वेड रोड इलाके में रहने चले गए थे.
मकान मालिक और पड़ोसियों को उन्होंने बताया था कि वे टेक्सटाइल और डायमंड उद्योग में व्यापार-नौकरी के लिए यहां आए हैं. जहांगीरपुरा में तो जागरूक नागरिकों ने उन की आवाजाही की तसवीरें भी खींच ली थीं.
शुभम कुमार ठाकुर की मदद करने वाले साथी विकास सिंह को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. वह अयोध्या में साधु बन कर छिपा था. वह मूलरूप से गोंडा का रहने वाला था और रायबरेली में चप्पल की दुकान चलाता था.
विकास के साथ ही गिरफ्तार किया गया शुभम कुमार ठाकुर बिहार का रहने वाला था. वह रायबरेली में विकास की ही दुकान की बगल वाली दुकान में पहले नौकरी करता था. पुलिस ने इन्हें मोबाइल डाटा के मूवमेंट के आधार पर गिरफ्तार किया था.
सीसीटीवी फुटेज से लुटेरों के भागने की जो जानकारी मिली थी, उन रास्तों के मोबाइल टावरों के डाटा का टैक्निकल एनालिसिस करने पर 3 नंबर ऐसे मिले थे, जो लुटेरों के मूवमेंट से मैच कर रहे थे. इसी के माध्यम से पुलिस लुटेरों तक पहुंची थी और 2 लुटेरे विकास सिंह और शुभम कुमार ठाकुर पकड़े गए थे.
दोनों लुटेरों विकास और शुभम को सूरत लाने के लिए पुलिस ने गोंडा की अदालत में पेश कर ट्रांजिट रिमांड पर लिया और मामले की जांच के लिए सूरत लाया गया. जिस दिन विकास को पुलिस हिरासत में ले कर सूरत आई, उस के एक दिन पहले उस की सगाई हुई थी. उस के गिरफ्तार होने से सगाई की खुशियों पर पानी फिर गया था.
क्राइम ब्रांच की पूछताछ में पता चला कि इतनी बड़ी रकम की लूट के मास्टरमाइंड शुभम को मात्र 55 हजार रुपए ही मिले थे. बाकी रुपए बाद में देने को कह कर मुख्य सूत्रधार लूट की सारी रकम ले कर बिहार भाग गया था.
पूछताछ में यह भी पता चला है कि बैंक लूटने वाले लुटेरे एकदूसरे को जानतेपहचानते नहीं थे. इन की पहचान छिपाने के लिए अलगअलग 4 से 5 उपनाम दिए गए थे. सूरत के ही एक आदमी चंदन उर्फ जेके को इन्हें ले आने और ले जाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.
पहचान के लिए रिसीवर को लुटेरे की पूरी फोटो देने के बजाय सिर्फ उस के सिर के नीचे के हिस्से की तस्वीर भेजी गई थी, जिस के आधार पर उन्हें रिसीव किया जाना था.
लूट के दिन लुटेरे 45 मिनट पहले ही बैंक पहुंच गए थे. उन्होंने ग्राहक होने का ढोंग किया और अंदर बैठे तमाम कर्मचारियों की तसवीरें लीं. कौन कहां बैठता है, इस का निरीक्षण किया. आश्चर्य की बात यह थी कि जिन के फोन चालू नहीं थे, वे भी फोन पर बात करने का दिखावा कर के बैंक के अंदर रेकी कर रहे थे.
लूट करने के बाद तमाम आरोपी बाइक छोड़ कर हिम्मतनगर गए और वहां से अलगअलग दिशाओं में बिखर गए. आरोपी शुभम यूपी के रायबरेली पहुंचा था और वहां विकास सिंह ने लूट की रकम ठिकाने लगाने तथा लुटेरों को छिपने की व्यवस्था की थी.
पकड़ा गया आरोपी शुभम ठाकुर बिहार का नामी अपराधी है. उस के खिलाफ बिहार के बाऊगंज और ब्रह्मपुरा पुलिस स्टेशन में हत्या, लूट और आम्र्स ऐक्ट के तहत गंभीर मामले दर्ज हैं.
बड़े खुलासे की उम्मीद
सूरत क्राइम ब्रांच अब बिहार की जेल में बंद मास्टरमाइंड कुंदन भगत को कब्जे में लेने के लिए कानूनी प्रक्रिया कर रही है. लूट के बाकी 49 लाख रुपए रिकवर करने और गैंग के अन्य सदस्यों की लोकेशन प्राप्त करने के लिए पुलिस गहन पूछताछ कर रही है. आगामी दिनों में इस केस में और भी बड़े खुलासे होने की संभावना है.
लुटेरे मात्र 50 लाख नहीं, बल्कि 2 से 3 करोड़ रुपए लूटने के इरादे से बैंक में घुसे थे. लुटेरों के पास 2 नहीं, बल्कि 5 बड़े बैग थे. हालांकि किस्मत से उस समय कैश काउंटर और कैश वैन में उम्मीद से कम रकम होने के कारण उन्हें मात्र 50 लाख रुपयों से ही संतोष करना पड़ा था. लूट के बाद भागते समय अतिरिक्त खाली बैग उन के लिए बोझ बन गए थे, इसलिए उन्होंने वह बाइक के पास ही फेंक दिए थे.
एसबीआई की यह शाखा सूरत में गोल्ड लोन देने के मामले में दूसरे नंबर पर है, जिस का सीधा अर्थ यह था कि वहां हमेशा करोड़ों का सोना तिजोरी में सुरक्षित रहता है. लूट के समय तिजोरी में लगभग डेढ़ से 2 करोड़ रुपए की गोल्ड ज्वैलरी रखी थी.
लुटेरों ने कर्मचारी से तिजोरी की चाबी मांगी थी, लेकिन कर्मचारी ने चालाकी से जवाब दिया कि चाबी मैनेजर के पास है और वह अभी बैंक में नहीं हैं.
यह सुन कर लुटेरों ने केवल सामने दिख रही नकदी ले कर भागने का फैसला किया. इस के अलावा कैश वैन में भी लाखों रुपए पड़े थे, जो लुटेरों की जल्दबाजी के कारण बच गए.
लूट की पूरी घटना मात्र 15 मिनट में निपटा ली गई थी. लेकिन आरोपी बैंक के अंदर पिछले 40 मिनट से मौजूद थे. इस दौरान वे सामान्य ग्राहकों की तरह व्यवहार करते रहे और बैंक के प्रत्येक कर्मचारी की हलचल पर पैनी नजर रख रहे थे.
इतना लंबा समय बैंक में होने के बावजूद बैंक के अन्य ग्राहकों या स्टाफ को भनक तक नहीं लगी थी कि उन के बीच बैठे लोग कुछ ही क्षणों में मौत का खेल खेलने वाले हैं. जांच में सामने आया है कि यह गैंग पिछले 2 महीनों से इस लूट की प्लानिंग कर रहा था.
लुटेरे इतने आत्मविश्वास में थे कि उन्हें पुलिस का जरा भी डर नहीं था. यही कारण है कि तमाम लुटेरों ने अपने चेहरे नहीं ढंके थे. वे जानते थे कि बैंक में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और उन की तसवीर कैद हो जाएगी, फिर भी उन्होंने पहचान छिपाने का प्रयास नहीं किया.
उन्हें यकीन था कि उन का नेटवर्क इतना मजबूत है कि पुलिस उन तक नहीं पहुंच पाएगी. लूट में इस्तेमाल किए गए हथियार देशी होने की बात भी सामने आई है, जो स्पष्ट करता है कि यह गैंग पेशेवर अपराधियों की बना हुआ है.
लूट करने के बाद लुटेरों ने भागने के लिए पहले से तय रास्तों का उपयोग किया. वे अलगअलग रास्तों से हो कर कीम के पास नेशनल हाइवे-48 पर पहुंचे. हाइवे पर पुलिस की चैकिंग हो सकती है, यह सोच कर वे हाइवे से 3 किलोमीटर अंदर ग्रामीण क्षेत्र में घुस गए.
कन्यासी गांव के सुनसान खेत में उन्होंने अपनी बाइक छोड़ दीं और वहां से वाहन बदल कर अलगअलग दिशाओं में बंट गए. इस रास्ते को चुनने के पीछे उन का उद्ïदेश्य पुलिस को गुमराह करना और सीसीटीवी फुटेज में ट्रैक न होना था.
मिली सटीक लोकेशन
सूरत क्राइम ब्रांच ने इस केस में टैक्निकल सर्विलांस और ह्यूमन इंटेलिजेंस की मदद से बड़ी सफलता हासिल की. आरोपी शुभम और विकास की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को लूट में शामिल अन्य 5 आरोपियों के सटीक लोकेशन भी मिल गई.
इस हाईप्रोफाइल लूट केस में अब क्राइम ब्रांच की विभिन्न टीमें एक्शन मोड में आ गईं. यूपी में पकड़े गए आरोपियों की पूछताछ में पता चला है कि इस गैंग के तार अन्य राज्यों से भी जुड़े हुए हैं. वर्तमान में सूरत पुलिस की 4 अलगअलग टीमें उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और हरियाणा में डेरा डाले हुए हैं.

पुलिस को उम्मीद है कि जल्दी ही गैंग के बाकी सदस्यों को भी नकदी के साथ पकड़ लिया जाएगा. जिस तरह से आरोपी आश्रम में छिपे थे, उसे देखते हुए पुलिस अब धार्मिक स्थलों और धर्मशालाओं पर भी नजर रख रही है.
लूट में शामिल 7 दिन के रिमांड पर रहे आरोपी शुभम और विकास को ले कर क्राइम ब्रांच की टीम जांच के लिए कन्यासी गांव पहुंची थी. पूछताछ में शुभम ने स्वीकार किया था कि लूट में इस्तेमाल की गई पिस्तौल और मोबाइल उस ने खेत के पास छिपाए हैं.
पुलिस जब झाडिय़ों के पास से उन चीजों को रिकवर कर रही थी, तभी मौके का फायदा उठा कर शुभम ने अचानक पुलिस से पिस्तौल छीन ली और अचानक थाना वराछा के इंसपेक्टर ए.आर. वाला पर फायरिंग शुरू कर दी.
आरोपी ने पुलिसकर्मियों पर एक राउंड फायरिंग की थी. तभी सूरत क्राइम ब्रांच के डीसीपी भावेश रोजिया और एसीपी किरण मोदी ने तुरंत आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग की. इस एनकाउंटर में आरोपी के पैर में गोली लगने से वह जमीन पर गिर पड़ा.
बाद में पता चला कि वह कोई सामान्य हथियार नहीं, बल्कि एक आधुनिक औटोमैटिक पिस्तौल थी, जो लूट के वारदात में भी इस्तेमाल की गई थी. आरोपी के बताए अनुसार, उस ने हथियार और मोबाइल फोन पुलिस को गुमराह करने के लिए सुनसान जगह पर फेेंके थे. हालांकि हकीकत में उस ने हथियार हमला करने के इरादे से तैयार रखा था.
पुलिस ने तुरंत घायल आरोपी को दबोच लिया था और इलाज के लिए सूरत के नए सिविल अस्पताल भेज दिया था. सूरत क्राइम ब्रांच ने इस घटना के बाद पूरे इलाके में कड़ा बंदोबस्त कर के मामले की आगे की जांच शुरू की थी.
आगे की जांच में पता चला कि कुंदन भगत ने 2 महीने पहले सभी को सूरत रेलवे स्टेशन पर इकट्ठा होने को कहा था. कोई एकदूसरे को पहचानता नहीं था. सभी के चेहरे को छोड़ कर नीचे के फोटो भेजे गए थे.
चंदन उर्फ जेके ने आरोपियों के रहने के लिए मकान किराए पर लिया था. आरोपी वेड रोड और उगत कैनाल के पास मकान में एक महीने रहे.
सूरत के वराछा में 50 लाख की लूट कराने वाला कुंदन भगत मूलरूप से बिहार के मुजफ्फरपुर का निवासी है. इस के पहले उस ने देहरादून में रिलायंस ज्वैलरी में 12 करोड़ की लूट की थी. एके-47 सहित हथियारों की तस्करी के मामले में एनआईए ने उस पर मुकदमा किया है. वर्तमान में वह आदर्श सेंट्रल जेल बेऊर (पटना) में बंद है.
विकास सिंह से पूछताछ में पता चला है कि उस ने अपने हिस्से के और शुभम के हिस्से के कुल 90,000 रुपए अपने दोस्त अफजल के बैंक खाते में मंगवाए थे.
पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि यह अफजल कौन है और इस लूट की साजिश में उस की क्या भूमिका है, जिस के लिए बैंक विवरण निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. इस लूट के किसी संगठित अपराध गिरोह का काम होने की पूरी संभावना है. SBI Bank Robbery






