Ayodhya Donation Scam. राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी से जुड़ा विवाद आम जनता की आस्था से जुड़ा एक संवेदनशील और गंभीर मुद्दा है. इन आरोपों ने देश भर में हलचल मचा दी है. यह मामला सिर्फ चोरी का नहीं, बल्कि धार्मिक संस्थानों में दान प्रबंधन, पारदर्शिता, औडिट व्यवस्था और जवाबदेही का भी प्रश्न बन गया है. अब देखना यह है कि एसआईटी की रिपोर्ट के बाद गुनहगारों को सजा मिल पाती है?
उत्मेंतर राम मंदिर के निर्माण और मूर्ति स्थापना की गाथा किसी से छिपी नहीं है, जिस में दशकों का संघर्ष, कानूनी लड़ाई, अनगिनत लोगों का बलिदान शामिल है. जब इस का भव्य स्वरूप साकार हुआ, तब मंदिर में चढ़ावे की बौछार लग गई. किंतु चढ़ावे के लुटेरे भी मंदिर के कर्ताधर्ता थे. चढ़ावा उन की लालची निगाहों की भेंट चढऩे लगा. एक वक्त ऐसा आया, जब मंदिर से जुड़े लोगों की आंखों का पानी उतर गया और वे दान के पैसे की हेराफेरी करने लगे.
यह सही तरह से नहीं कहा जा सकता कि चढ़ावे में चोरी कब से हो रही थी, लेकिन इस पर पहली नजर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव की गई. उन्होंने इसे सार्वजनिक किया. इसे गंभीर मुद्दा बना दिया.
हुआ चोरी का खुलासा
बीते 4 मई की बात है. यात्री सुविधा केंद्र के बेसमेंट में चढ़ावे के पैसे की काउंटिंग हो रही थी. वहां काउंटिंग खत्म होने के बाद साफसफाई का काम चल रहा था. सफाई कर्मचारी को काउंटिंग सेंटर में बने टायलेट से एक बैग मिला. इस बैग में सिक्के भरे थे. कर्मचारी ने तुरंत इस की जानकारी श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय को दी. इस के बाद चंपत राय ने अपने स्तर पर तुरंत जांच की. जो लोग उस दिन काउंटिग में थे, उन में से 6 लोगों पर शक की सूई टिक गई.
चंपत राय ने लोकल पुलिस की मदद से आगे की तफ्तीश की. इन 6 लोगों के घरों में छापेमारी हुई. जिस शख्स के घर में सब से पहले रेड हुई, उस के यहां 80 लाख कैश बरामद हुआ. इस के बाद दूसरे व्यक्ति के घर में पुलिस पहुंची. वहां कैश तो नहीं मिला, लेकिन इस व्यक्ति ने बताया कि वह हर महीने अपनी पत्नी के नाम पर बैंक में 2 लाख रुपए जमा करवाता है. ये पैसे चढ़ावे में चोरी से आते हैं.
इस आरोपी ने अकाउंट से सारा पैसा निकलवा कर ट्रस्ट के हवाले कर दिया. फिर तीसरे संदिग्ध से पूछताछ हुई, उस ने बताया कि उस के पास भी 50 लाख हैं. सारी रकम चढ़ावे में चोरी की है. उस ने भी सारा पैसा वापस कर दिया. इस तरह ट्रस्ट ने डेढ़ करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम बरामद कर ली.
मंदिर से जुड़े छोटेछोटे लोगों से बड़ी रकम मिलने पर मंदिर प्रशासन से ले कर पुलिस महकमे तक के कान खड़े हो गए. यह आशंका बन गई कि इस खेल में और भी लोग शामिल हो सकते हैं. चढ़ावे के पैसे की गिनती पर निगरानी रखने के लिए एसबीआई (स्टेट बैंक औफ इंडिया) ने जिन लोगों की ड्यूटी लगाई थी, वे सारे के सारे स्थानीय लोग थे.
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
सभी ट्रस्ट के लोगों के जानपहचान वाले थे. उन के पास गिनती का काम करने के लिए महज मौखिक आर्डर था. इन्हें ट्रस्ट के लोगों की सिफारिश पर ही रखा गया था. ट्रस्ट के वित्तीय मामले का काम अनिल मिश्रा के जिम्मे था. चढ़ावे की रकम की गिनती से ले कर बैंक में जमा करने तक और ट्रस्ट के खर्चों का सारा हिसाबकिताब अनिल मिश्रा ही देख रहे थे. इसलिए अनिल मिश्रा की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई.
जैसेजैसे चढ़ावा चोरी का विवाद तूल पकडऩे लगा, वैसेवैसे इस की निष्पक्ष जांच की मांग भी तेज हो गई. इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई. याचिका में मांग की गई है कि राम जन्मभूमि ट्रस्ट से जुड़े वित्तीय अनियमितताओं और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया जाए. यह याचिका वकील अजय कुमार राय और दिनेश कुमार यादव द्वारा दायर की गई थी.
याचिकाकर्ताओं ने इस मामले में तुरंत एक एफआईआर दर्ज कर कानूनी काररवाई शुरू करने का अनुरोध किया. कोर्ट से यह अपील भी की गई कि सीबीआई एसआईटी को एक निश्चित समय सीमा के भीतर पूरी पारदर्शिता के साथ जांच करने के निर्देश दिए जाएं.
याचिकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि वह केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और ट्रस्ट को एक ऐसी मजबूत नियामक, पर्यवेक्षी और औडिट प्रणाली बनाने का निर्देश दे, जिस से जनता और लाखों श्रद्धालुओं का भरोसा बना रहे.
याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाई गई मौजूदा एसआईटी ने बिना किसी एफआईआर या नियमित आपराधिक मामले के ही जांच शुरू कर दी है. प्रशासनिक अधिकारियों वाली इस एसआईटी के पास जटिल वित्तीय और आपराधिक मामलों को संभालने की विशेष योग्यता नहीं हो सकती.
यह तर्क दिया गया कि इस मामले की जांच एक ऐसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए, जिस के पास जटिल वित्तीय घोटालों से निपटने के लिए आवश्यक विशेषज्ञता, संसाधन और संस्थागत तंत्र मौजूद हों.
याचिका में यह भी कहा गया कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़ी रकम गायब होने और दूसरी कथित अनियमितताओं की रिपोर्ट सच साबित हो या न हो, लेकिन ऐसी रिपोर्ट ने उन पीढिय़ों के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है, जिन्होंने अयोध्या की शान को फिर से बहाल करने के लिए संघर्ष किया था.
मजबूर बैंक अधिकारी
घोटाले की जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए. खासकर दान के पैसे के हिसाबकिताब के मामले में ट्रस्ट पदाधिकारियों की चलती थी. उन के आगे बैंक के कर्मचारी नतमस्तक थे. जबकि बैंककर्मियों की नकदी गिनती प्रक्रिया में अहम भूमिका थी. इस संबंध में लापरवाही के साक्ष्य मिले हैं.
गिनती प्रक्रिया की निर्धारित गाइडलाइन में से केवल 10 प्रतिशत का ही पालन किया गया था. हकीकत यह थी कि बैंककर्मियों को ट्रस्ट के पदाधिकारियों और कर्मचारियों के निर्देश पर ही काम करना होता था. बैंककर्मी जानते थे कि ट्रस्ट के पदाधिकारियों की पहुंच और प्रभाव काफी ऊंची है.
इस बारे में श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने भी अपने एक साक्षात्कार में सवाल उठाए थे. एसआईटी को बैंक अधिकारियों व कर्मचारियों की लापरवाही और संभावित मिलीभगत के भी कुछ साक्ष्य मिले हैं.
दरअसल, गिनती प्रक्रिया में जितनी भूमिका ट्रस्ट के पदाधिकारियों और कर्मचारियों की होती है, उतनी ही संबंधित बैंक के कर्मियों की भी रहती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि गिनती के दौरान किसी तरह की गड़बड़ी न हो. मगर ऐसा नहीं हुआ बताया जाता है. बैंक के कर्मचारी हमेशा गड़बड़ी के समय आंखें मूंदे रहे.
बताते हैं कि बैंक ने यह काम एक निजी कंपनी को सौंप रखा था. कंपनी आउटसोर्सिंग के जरिए कर्मचारियों की भरती कर उन्हें गणना प्रक्रिया में लगाती थी.
चूंकि ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने ही अपने सगेसंबंधियों, परिचितों और उन के करीबियों को आउटसोर्सिंग के माध्यम से भरती कराया था, इसलिए बैंक अधिकारी भी खामोश रहे. एक तरह से ट्रस्टी और उन के कर्मचारी जो चाहते थे, वही होता था.
इस संबंध में एसआईटी को सुबूत जुटाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है. सब से अहम सुबूत सीसीटीवी फुटेज हैं, लेकिन उस में छेड़छाड़ के सुबूत पाए गए. उल्लेखनीय है कि वहां लगे कैमरों का बैकअप केवल 45 दिनों का ही है. ऐसे में कई वर्षों की फुटेज जुटाना संभव नहीं है.
हालांकि एसआईटी मामले की फोरैंसिक जांच कराएगी, जिस में प्रयास होगा कि अधिक से अधिक दिनों की फुटेज रिकवर हो जाए. यही वजह है कि पूछताछ में आए तथ्य मामले में बेहद अहम होने वाले हैं.
नृपेंद्र मिश्रा ने एक साक्षात्कार में बताया है कि कर्मचारी रुपयों की गड्डियां रख कर गए, इस के सुबूत मिले हैं. कैमरों का बैकअप डेढ़ महीने का है. ऐसे में पुराने फुटेज जुटा पाना मुश्किल होगा. इसलिए स्पष्ट रूप से पता कर पाना कि चोरी कब से हो रही थी, इस का सटीक समय मिलना आसान नहीं होगा.
35 दान पेटियां, 2 शिफ्ट
ट्रस्ट के पूर्व पदाधिकारी महिपाल सिंह ने भी आरोप लगाया था कि 8 महीने की फुटेज डिलीट की गई. ये फुटेज काफी पहले की हैं. ऐसे में उन का बैकअप उपलब्ध नहीं है. इसलिए आरोप की सच्चाई को साबित करना बेहद कठिन होगा.
नृपेंद्र मिश्र ने एक और खुलासा किया. वह यह कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान व्यक्तिगत तौर पर नकद दान नहीं किया था, लेकिन मुख्य यजमान के रूप में चांदी की छत्र व लाल रंग के वस्त्र अर्पित किए थे. अब दान की गिनती और हिसाबकिताब की जिम्मेदारी बैंक की थी, लेकिन शुरुआती तथ्यों से लगता है कि बैंक ने अपनी जिम्मेदारियां नहीं निभाईं.
अयोध्या में राम मंदिर के चंदे को ले कर चल रहे विवाद के केंद्र में एक साधारण से नाम वाला ‘तीर्थयात्री सुविधा केंद्र’ है. मुख्य मंदिर से 200 मीटर की दूरी पर स्थित और उसी की वास्तुकला से प्रेरित इस इमारत के तहखाने में एक गिनती कक्ष है. मंदिर परिसर में लगे लगभग 35 दान पेटियों से प्राप्त चंदे को इसी कक्ष में लाया जाता है और गिना जाता है.
मंदिर में प्रतिदिन लगभग एक लाख श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं, इसलिए गिनती 2 शिफ्टों में की जाती है. सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक और दोपहर 2 बजे से रात 8 बजे तक. प्रत्येक शिफ्ट में लगभग 20 गिनतीकर्ता होते हैं.
रोजाना मिलने वाले दान की अनुमानित राशि 8 लाख से 13 लाख रुपए होती है. लेकिन मतगणना कक्ष में तैनात राम जन्मभूमि क्षेत्र तीर्थ ट्रस्ट के एक कर्मचारी के अनुसार, ”कुछ दिन ऐसे भी होते हैं जब यह राशि 50 से 60 लाख रुपए तक पहुंच जाती है.’’
राम मंदिर का प्रबंधन ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ द्वारा किया जाता है. यह एक 15 सदस्यीय निकाय है, जो मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था, वित्त (दान और चढ़ावा), निर्माण और भविष्य के विकास से जुड़े सभी प्रमुख निर्णय लेता है.
इस पूरे संगठन में सब से ऊपर राम जन्मभूमि क्षेत्र तीर्थ ट्रस्ट के प्रमुख सदस्य अनिल मिश्रा हैं, जो दान की पूरी प्रक्रिया के प्रभारी हैं. जिस में धन के भंडारण से ले कर गिनती और उपयोग तक सब कुछ शामिल है. वह गिनती कक्ष से सटे एक कार्यालय से अपना काम करते हैं.
इस की सीधी देखरेख सुभाष श्रीवास्तव कर रहे हैं, जो एक सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी हैं और मिश्रा के अधीन काम करते हैं. प्रत्येक शिफ्ट के लिए अलगअलग शिफ्ट इंचार्ज होते हैं, जो श्रीवास्तव के अधीन काम करते हैं. अंत में हर 4-5 कैशियर के लिए एक सुपरवाइजर होता है.
इस काम में शामिल सभी कर्मचारी स्टेट बैंक औफ इंडिया (एसबीआई) के कर्मचारी हैं, जिन्हें बैंक द्वारा आउटसोर्स किया गया है. उन का चयन अकसर ट्रस्ट के पदाधिकारियों द्वारा होता है. वे ट्रस्ट के सदस्य और स्थानीय आरएसएस नेता हैं.
दान पेटियां भर जाने पर उन्हें खाली कर दिया जाता है. इस प्रक्रिया के दौरान ट्रस्ट के कर्मचारियों और एसबीआई के एक कर्मचारी सहित कम से कम 4 लोगों का उपस्थित होना अनिवार्य है. धन को लोहे के बक्सों में भर कर, ताला लगा कर, गाडिय़ों में रख कर गणना कक्ष तक ले जाया जाता है, जहां सीसीटीवी कैमरों से उन पर नजर रखी जाती है.
गणना केंद्र पर करेंसी नोट, सिक्के और आभूषण जैसी अन्य वस्तुओं को अलगअलग किया जाता है, फिर उन्हें अलगअलग काउंटरों पर तैनात कर्मचारियों को सौंपा जाता है, जो हौल में स्थित काउंटरों पर गिनती करते हैं. कर्मचारी केवल शौचालय जाने और भोजन करने के लिए ही गणना कक्ष से बाहर निकल सकते हैं, जो हौल के ठीक बाहर उपलब्ध है.
ड्यूटी के दौरान कोई भी व्यक्ति भवन से बाहर नहीं जा सकता. गिनती पूरी होने के बाद नकदी को फिर से बैंक के डिब्बों या बक्सों में पैक किया जाता है और निगरानी में सील कर दिया जाता है, जिस के बाद इसे सुबह एसबीआई शाखा में ले जाया जाता है. बैंक द्वारा सत्यापन के बाद, नकदी को ट्रस्ट के खाते में जमा कर दिया जाता है. एसबीआई ट्रस्ट को जमा की गई राशि की सूचना भी देता है और खाते के रिकौर्ड को अपडेट करता है.
बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, यह खाता ‘बिना चैकबुक वाला’ है. किसी भी खर्च, बिल का भुगतान, जैसे कि विक्रेताओं, ठेकेदारों या सेवा प्रदाताओं को किए जाने वाले भुगतान के लिए पैसा एक खाते से दूसरे खाते में डिजिटल रूप से ट्रांसफर किया जाता है.
राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने कहा कि मंदिर के निर्माण के लिए जो धन जुटाया गया था, वह पूरी तरह से एक अलग प्रक्रिया थी, जिस में उस समय लगभग 3,500 करोड़ रुपए अलग से जमा किए गए थे और उस का हिसाबकिताब भी अलग से रखा गया था.
गणना केंद्र के कर्मचारियों के अलावा, राम जन्मभूमि क्षेत्र तीर्थ ट्रस्ट में सुरक्षा गार्ड, रसोइया और सफाईकर्मियों सहित हजारों लोग कार्यरत हैं. कर्मचारियों में लगभग 40 पूर्व सैनिक भी शामिल हैं.
एसआईटी रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 14 जून को गठित 3 सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) ने तेजी से जांच की. जांच टीम ने दान रिकौर्ड को देखने के साथसाथ सीसीटीवी फुटेज खंगालने, बैंकिंग प्रक्रिया को समझने और इस काम में लगे संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की समीक्षा की. करीब 150 से अधिक लोगों से गहन पूछताछ के बाद 20 पन्ने की रिपोर्ट तैयार की गई.

इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया, किंतु इस में 17 लोगों को आरोपी बनाया गया है. इन में मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय समेत कई पदाधिकारी और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई. मंदिर में कर्मचारियों की नियुक्ति में भी गड़बड़ी मिली.
रिपोर्ट में संदिग्ध लोगों पर एफआईआर दर्ज करने और ट्रस्ट का पुनर्गठन करने की सिफारिश की गई है. साथ ही किसी वरिष्ठ अधिकारी को मंदिर का सीईओ नियुक्त करने का सुझाव भी दिया गया है. हालांकि सरकार के अनुसार जांच की काररवाई लिखे जाने तक जारी थी.
जांच की रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को सौंप दी गई है, जिस में कई गड़बडिय़ों का जिक्र किया गया है. उल्लेखनीय है कि राम मंदिर में चढ़ावा मुख्यरूप से 3 माध्यमों से मिलता है. दान पात्र, औनलाइन दान और कैश काउंटर पर रसीद के माध्यम से जमा राशि.
जांच के दौरान ट्रस्ट के बैंक खातों, वित्तीय दस्तावेजों और संबंधित अधिकारियों से पूछताछ के आधार पर चढ़ावे की प्रक्रिया का अध्ययन किया गया. एसआईटी को राम मंदिर ट्रस्ट के बैंक खाते और पूछताछ से पता चला कि हर महीने औसतन 25 लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन कुंभ के दौरान वहां सिर्फ एक महीने में ही एक करोड़ श्रद्धालु आए.
जांच में पता चला कि औसतन प्रति श्रद्धालु 15-18 रुपए चढ़ावा आता है, लेकिन इस चढ़ावे में अनाज, तेल और घी के साथ सोनेचांदी के आभूषण का चढ़ावा नहीं जोड़ा गया है, क्योंकि इन के दान का कोई ठोस सबूत और साक्ष्य नहीं मिला. रिपोर्ट में जिक्र है कि बैंक स्टेटमेंट और श्रद्धालुओं की संख्या को देख कर चढ़ावे में बड़ा उतारचढ़ाव पाया गया.
जांच टीम के सामने बड़ा सवाल तब बन गया, जब पाया कि श्रद्धालुओं के अधिक आने के बावजूद चढ़ावे में औसतन कमी कैसे आई? यह हाल के कई महीने तक रहा, जिस में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी, लेकिन चढ़ावा कम दिखा. इसे ले कर पूछताछ में एसआईटी को बताया गया कि उस दौरान नोट कम सिक्के ज्यादा चढ़ाए गए.
यह भी हैरान करने वाली बात थी कि राम मंदिर में कई कर्मचारी ऐसे काम कर रहे थे, जिन के पास ट्रस्ट की तरफ से कोई आधिकारिक लिखित आदेश नहीं था.
रिपोर्ट में कई कर्मचारियों की संपत्ति और आमदनी पिछले 5 सालों में तेजी से बढ़ी पाई गई. इस की जानकारी टीम को लोगों से पूछताछ के सिलसिले में मिली. टीम ने सीसीटीवी फुटेज का भी जिक्र करते हुए कई गंभीर सवाल खड़े किए, जिस में फुटेज को 45 दिनों के बाद नष्ट कर दिया जाना भी था.
चढ़ावा कितना आया और किस स्रोत से आया, इस का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला. इसलिए चढ़ावा चोरी हुआ, कितना चोरी हुआ, इसे सबूतों के साथ बता पाना संभव नहीं है. फिर भी एक अनुमान के मुताबिक चोरी 200 करोड़ रुपए से ज्यादा की हो सकती है. साथ ही इस चोरी के मामले में 5 आरोपियों की निशानदेही पर 2 करोड़ की रिकवरी की गई. आरोपियों में लवकुश, अवनीश, अनुकल्प, करुणे और रामशंकर उर्फ टिन्नू शामिल हैं. सोना चंपत राय के करीबी टिन्नू के घर से मिला था.
चोरी का पता लगने के ठीक पहले 4 जून को भी लखनऊ के कमिश्नर विजय विश्वास पंत (आईएएस), आईजी (लखनऊ रेंज) किरण शिवकुमार और यूपी फाइनैंस ऐंड अकाउंट्स सर्विस के विशेष सचिव (वित्त) नीलरतन कुमार को शामिल कर एक एसआईटी का गठन किया गया था.
इस टीम ने राम मंदिर की 6 दिनों तक जांच की थी. उस के बाद राम मंदिर ट्रस्ट की सिफारिश पर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने 14 जून को दूसरी टीम का गठन किया था.
चोरी पर सवाल
राम मंदिर के चढ़ावा चोरी मामले में श्रीराम सेना ने राम जन्मभूमि थाना पहुंच कर दोषियों के खिलाफ कठोर काररवाई की मांग की. संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष दिनेश सिंह ने एसएचओ को ज्ञापन सौंपते हुए सेवादार अनिल मिश्रा समेत अन्य संदिग्धों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और नारको टेस्ट कराए जाने की मांग की.
विश्व सिंधी समाज ने सवाल उठाया कि 200 किलो चांदी की ईंटें कहां हैं? इस संगठन के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष डा. राजू मनवानी ने दावा किया है कि 26 जनवरी, 2021 को दुनियाभर के सिंधी समाज की ओर से करीब 1.5 करोड़ रुपए मूल्य की 200 किलो चांदी, 1-1 किलो की 200 ईंटों के रूप में अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को सौंपी गई थी.
दान की गई चांदी की ईंटों की न तो कोई रसीद दी गई और न ही बाद में यह जानकारी दी गई कि उन का उपयोग कहां किया गया. उन का कहना है कि हाल के दान विवादों के बाद सिंधी समाज के दानदाताओं के बीच यह जानने की उत्सुकता बढ़ गई है कि उन की ओर से दी गई चांदी का क्या हुआ.
अब सिंधी समाज की मांग है कि दान की गई 200 किलो चांदी का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए और पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए.
राम मंदिर को मिले दान विवाद में कई हैरान करने वाले खुलासे सामने आए हैं. साल 2020 में ही मंदिर में मिले चढ़ावे, आभूषण और दान में गड़बड़ी के संकेत मिल गए थे. इस के बावजूद ट्रस्ट ने इस पर ध्यान नहीं दिया. इसे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की कथित लापरवाही माना गया है.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ट्रस्ट बनने के कुछ ही महीनों बाद एक प्राइवेट औडिट फर्म ने अपनी रिपोर्ट में ट्रस्ट की कमियों को उजागर किया था.
फंड्स मैनेजमेंट में गैरपेशेवर रवैए की बात की थी. बताया था कि चंदे का सही रिकौर्ड नहीं रखा जा रहा है. साथ ही फर्म ने इन्हें ठीक करने के लिए कुछ तरीके भी बताए थे.
इस के बावजूद ट्रस्ट ने सिस्टम में कोई सुधार नहीं किया. बताते हैं कि इसी अनदेखी का परिणाम है जो राम मंदिर को मिले दान में बड़े पैमाने पर चोरी का आरोप लगा है.
औडिट फर्म ने जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करने के लिए लेनदेन, डेटा मैनेजमेंट, स्टाफ और दूसरे रिसोर्स के हर लेवल पर भरोसेमंद एसओपी (सिस्टेमैटिक औपरेटिंग प्रोसेस) बनाने की जरूरत का सुझाव दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने जब 9 नवंबर, 2019 के अपने आदेश में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ कर दिया था, तब मंदिर के निर्माण और प्रबंधन की देखरेख के लिए 5 फरवरी, 2020 को ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट का गठन किया गया. तब से अब तक लगभग 3,500 करोड़ रुपए के कैश डोनेशन के अलावा दान में गहने भी मिले हैं. राम मंदिर को मिले कुछ दान और गहनों का रिकौर्ड नहीं होने को ले कर ही अब आरोप लग रहे हैं.
प्राइवेट औडिट फर्म के 2020 की रिपोर्ट जमा होने के 6 साल बाद भी उस के बताए तरीके पर कोई काम नहीं हुआ. एसओपी बनाने पर कोई अमल नहीं हुआ. नतीजा, राम मंदिर समिति अब चढ़ावे में चोरी के आरोपों का सामना कर रही है.
6 साल पहले ही मिले थे गड़बड़ी के संकेत
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ट्रस्ट बनने के कुछ ही महीनों बाद एक प्राइवेट औडिट फर्म ने अपनी रिपोर्ट में ट्रस्ट की कमियों को उजागर किया था. फर्म ने 2020 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि कामकाजी लेवल पर मैनेजमेंट का ढांचा तय नहीं है और यह तरीका बहुत ही
गैरपेशेवर है. फाइनैंशियल रिपोर्टिंग के लिए दान का कोई सिस्टेमैटिक रिकौर्ड मौजूद नहीं है. लेनदेन और डेटा एंट्री के किसी भी स्टेज पर कोई दूसरी या तीसरी बार चैकिंग नहीं होती. एक व्यवस्थित संगठित ढांचे में जवाबदेही तय करने की जरूरत है. डेटा की सटीकता और बेहतर मैनेजमेंट के लिए लेनदेन से जुड़े वर्कफ्लो के बीच तालमेल होना बहुत जरूरी है.
तभी औडिट फर्म ने डोनेशन में मिली ज्वैलरी के खराब हिसाबकिताब पर चिंता जता दी थी. फर्म ने कहा था कि ऐसी लेनदेन के लिए तो एक बिलकुल सटीक स्टाक रजिस्टर बनाया जाना चाहिए. फर्म ने सवाल उठाया था कि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने कई हजार कर्मचारियों को काम पर लगा रखा है, लेकिन वहां एक ढंग का ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट नहीं है. औडिट फर्म ने समयसमय पर बैंक मिलान, अकाउंटिंग डेटा एंट्री और मैनेजमेंट इनफारमेशन सिस्टम के लिए काबिल स्टाफ की जरूरत का भी जिक्र किया था.
डेटा मैनेजमेंट के बारे में रिपोर्ट में कहा गया था कि ट्रस्ट से जुड़ी आईटी मैनेजमेंट कंपनी का सेंसेटिव डेटा मैनेजमेंट सर्विस, सर्वर, डेटा सिक्योरिटी और डेटा चोरी के रिस्क को कंफर्म करने वाला कोई रिकौर्ड नहीं मिला. आईटी सर्विस प्रोवाइडर की डेटा एंट्री और डेटाबेस को वेरिफाई, मौनिटर और जांचने के लिए कोई इंटरनल कंट्रोल सिस्टम नहीं है. इनफारमेशन और रिपोर्ट की सिक्योरिटी और ईमानदारी बनाए रखने के लिए ट्रस्ट के पास अपना कोई इंटरनल सिस्टम भी नहीं है.
8 गिरफ्तार, किस पर क्या आरोप
राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मामले में आखिरकार 20वें दिन 8 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर सभी को गिरफ्तार कर लिया गया. आरोपियों में रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव, अनुकल्प मिश्र, अविनाश शुक्ला, करुणेश पांडेय, लवकुश मिश्र, रमाशंकर मिश्र, सुभाष श्रीवास्तव और मनीष यादव हैं. सभी श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के हैं. इन पर ट्रस्ट के सदस्य कृष्णमोहन की लिखित शिकायत पर श्रीराम जन्मभूमि थाने में मामला दर्ज किया गया है.
- रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू: श्रीराम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का बेहद करीबी है. इस का काम दानपात्रों की देखरेख करना और उन्हें बेसमेंट तक पहुंचाने का था. गणना प्रक्रिया की देखभाल और मंदिर की हर व्यवस्था में उस का हस्तक्षेप होता था. यहां तक कि गणना किए जाने वाले कक्ष की चाबी भी उसी के पास रहती थी. टिन्नू यादव पर करोड़ों के गबन का आरोप है. अयोध्या के आसपास कई जिलों में हाल के दिनों में जमीन, होटल, मकान आदि बनाए हैं. टिन्नू चंपत राय का वाहन चालक था.
- लवकुश मिश्र: वह अनिल मिश्रा का रिश्तेदार है. राम मंदिर में आने वाले चढ़ावा, नकदी को गिनने वाली टीम में शामिल था. चढ़ावा गिनती में उस की ड्यूटी होती थी. लवकुश मिश्र पर आरोप है कि चढ़ावा चोरी कर निजी संपत्ति बनाई. लवकुश मिश्र के घर से 12 लाख रुपए बरामद हुए हैं.
- अनुकल्प मिश्र: गणना कक्ष में नकदी गिनने की जिम्मेदारी अनुकल्प मिश्र पर थी. वह अनिल मिश्रा का रिश्तेदार था. इस पर आरोप है कि गिनती के दौरान रुपए निकाल कर बाथरूम में छिपाए. इस के पास से भी चोरी की रकम बरामद की गई थी.
- मनीष यादव: वह टिन्नू यादव का भतीजा है. मनीष यादव पर दानपात्रों में चढ़े नकदी निकालने और उसे गिन कर अलग रखने की जिम्मेदारी थी. मनीष पर भी चढ़ावा चोरी का आरोप है. पुलिस का दावा है कि मनीष यादव के यहां से 36 लाख रुपए बरामद हुए.
- करुणेश पांडेय: करुणेश पर राम मंदिर में चढ़े चढ़ावों को गणना कक्ष तक पहुंचाने की जिम्मेदारी थी. करुणेश पर भी आरोप है कि इस ने दानराशि चुरा कर संपत्ति अर्जित की है.
- अविनाश शुक्ला: दान पात्रों में मिली धनराशि को गणना कक्ष तक ले जाने और वहां गिनती करने वाली टीम में शामिल अविनाश शुक्ला पर आरोप है कि इस ने दान राशि चुरा कर संपत्ति बनाई.
- सुभाष श्रीवास्तव: गणना इंचार्ज था. सुभाष की भूमिका कैश काउंटिंग सेंटर के स्टाफ की निगरानी करना था. सुभाष कैश काउंटिंग सेंटर के स्टाफ का प्रभारी था. इस पर निगरानी में लापरवाही का आरोप है.
- रमाशंकर मिश्र: राम मंदिर में आए चढ़ावों को जहां रखा जाता है, उन दानपात्रों की निगरानी और उस के संचालन की जिम्मेदारी रमाशंकर मिश्र पर थी. इस पर दान व्यवस्था में रहते हुए वित्तीय गबन और हेराफेरी का आरोप है. वह अनुकल्प और लवकुश के साथ साजिश में शामिल था.
– शंभू सुमन






