Indore Love Story. लोगों का कहना है कि प्यार स्वार्थवश किया जाता है, लेकिन इसी के साथ यह भी कहा जाता है कि असली प्यार त्याग मांगता है. सविता ने गौरव से शादी कर के यह बात साबित भी कर दी है.
कंस्ट्रक्शन का काम करने वाला गौरव श्रीवास्तव अपने औफिस में आ कर अभी बैठ भी नहीं पाया था कि उस की मेज पर रखा फोन बज उठा. वह अपने चपरासी को किसी काम के बारे में गंभीरता से समझा रहा था, इसलिए उस समय फोन का बजना उसे अच्छा नहीं लगा. लेकिन औफिस का फोन था, वह भी औफिस टाइम में आया था, इसलिए उठाना तो था ही. उस ने लापरवाही से रिसीवर उठा कर जैसे ही बेमन से हैलो कहा, दूसरी ओर से जो मधुर आवाज उस के कान में पड़ी, उस से उस की सारी खीझ दूर हो जानी चाहिए थी. लेकिन न जाने क्यों ऐसा नहीं हुआ. इसलिए जब दूसरी ओर से उस शहद घुली आवाज में पूछा गया, ‘‘आप कौन बोल रहे हैं?’’ तो उस ने बड़ी बेरुखी से कहा, ‘‘चिडि़याघर से बोल रहा हूं. बताइए, क्या काम है?’’
गौरव ने जिस बेरुखी से जवाब दिया था, फोन कट जाना चाहिए था. लेकिन फोन करने वाली लड़की ने खिलखिला कर हंसते हुए कहा, ‘‘मुझे पहली बार पता चला कि चिडि़याघर में रहने वाले प्राणी फोन पर बात ही नहीं करते बल्कि काम के बारे में भी पूछते हैं.’’
लड़की के इस तरह हंसने और जवाब देने से गौरव भी हंसे बिना नहीं रह सका. उस ने हंसते हुए ही कहा, ‘‘मैडम, मैं गौरव श्रीवास्तव बोल रहा हूं. बताइए, क्या काम है?’’
‘‘लगता है, मेरा फोन गलत जगह लग गया. आप की बातों से यही लगता है कि आप कोई जरूरी काम कर रहे थे. मैं ने आप को डिस्टर्ब किया, इस के लिए माफी चाहती हूं.’’ दूसरी ओर से कहा गया तो गौरव ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘काम जरूरी था, इसलिए थोड़ा गुस्सा आ गया था. इसीलिए मैं थोड़ा बेरुखी से बोल गया. इस पर भी आप ने जिस तरह हंस कर जवाब दिया, उस का मैं कायल हो गया. अब माफी तो मुझे मांगनी चाहिए, आप बेकार ही माफी मांग रही हैं. सचमुच आप जैसे लोगों से सीख लेनी चाहिए.’’
‘‘अरे, मैं इतनी भी अच्छी नहीं हूं, जितनी आप तारीफ कर रहे हैं. मैं भी आप की ही तरह आम इंसान हूं. गलती से आप को डिस्टर्ब किया तो माफी मांगनी ही पड़ेगी.’’ दूसरी ओर से कहा गया.
‘‘मुझे लगता है, आप ने गलती कर के अच्छा ही किया. कम से कम आप से यह सीखने को तो मिला कि आदमी को आपा नहीं खोना चाहिए.’’ गौरव ने कहा.
‘‘ऐसी कोई बात नहीं है, जो आप इतना गंभीर हो गए. आप कोई जरूरी काम कर रहे थे न, उसे करिए. अब मैं फोन रखती हूं.’’
दूसरी ओर से फोन रखा जाता, उस के पहले ही गौरव ने झट से कहा, ‘‘फोन रखने से पहले यह तो बता दीजिए कि मैं किस से बात कर रहा हूं? अगर फिर कभी बात करनी हो तो किस नंबर पर बात करूंगा?’’
‘‘मेरा नाम सविता है, सविता चौबे. आप को फोन करने की जरूरत नहीं है. बताइए, आप कब खाली होते हैं. मैं खुद ही आप को फोन कर लूंगी. आप फोन करें तो पता नहीं मेरे घर में कौन फोन उठा ले. अगर उस ने आप को कुछ कह दिया तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा.’’ सविता ने कहा.
‘‘जैसी आप की मरजी. रही बात खाली होने की तो औफिस समय में आप कभी भी फोन कर सकती हैं. मैं आप के लिए हमेशा खाली हूं.’’ गौरव ने कहा.
इस के बाद उस समय तो फोन कट गया, लेकिन इस के बाद दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया. पहले तो यह बातचीत हालचाल और कामधाम तक ही सीमित रही, लेकिन धीरेधीरे बातें बढ़ती गईं और फिर दोनों में प्यार हो गया. यह 16 साल पहले तब की बात है, जब आज की तरह हर हाथ में मोबाइल नहीं थे. इसलिए फोन पर बातचीत लैंडलाइन फोन से ही होती थी.
सविता यानी सविता चौबे उस समय 12वीं की परीक्षा दे चुकी थी. वह इंदौर के बाईपास रोड पर बौंबे अस्पताल के सामने महालक्ष्मीनगर के रहने वाले गौरीशंकर चौबे की बेटी थी. गौरीशंकर गुजरात के बड़ौदा में अग्रवाल मित्तल ग्रुप में मैनेजिंग डाइरैक्टर थे. इंदौर में उन की पत्नी विमला चौबे बेटी सविता और बेटे बाबू के साथ रहती थीं. क्योंकि उन के दोनों बच्चे यहीं पढ़ रहे थे.
गौरव श्रीवास्तव इंदौर के ही कनोडिया रोड स्थित मनभावन नगर के रहने वाले सतीश श्रीवास्तव का बेटा था. गौरव के अलावा उन की एक बेटी थी नेहा, जिस की उन्होंने शादी कर दी थी. इसलिए घर में पत्नी सुषमा और बेटे गौरव को ले कर कुल 3 लोग ही रह गए थे.
एकलौता और छोटा होने की वजह से गौरव मांबाप का कुछ ज्यादा ही लाडला था. सतीश श्रीवास्तव बीमा एजेंट थे. उम्र होने पर उन्होंने यह काम छोड़ दिया और पाइप ऐंड सैनेटरीवेयर डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बन गए. जबकि गौरव ने पढ़ाई पूरी कर के कंस्ट्रक्शन का काम शुरू कर दिया था.
उस का यह काम बढि़या चल रहा था. इस की वजह यह थी कि सतीश श्रीवास्तव की बाजार में बड़ी इज्जत थी. एसोसिएशन के सदस्य उन पर आंख मूंद कर विश्वास करते थे. उन से कभी किसी भी चीज का हिसाब नहीं लिया जाता था. वह जितना खर्च बता देते थे, सदस्य उसे चुपचाप दे देते थे. भला ऐसे आदमी के बेटे का धंधा क्यों नहीं चल निकलेगा. गौरव और सविता में फोन पर बातचीत करतेकरते प्यार हो गया तो दोनों मिलने भी लगे.
सविता अपनी पढ़ाई कर रही थी, जबकि गौरव अपने व्यवसाय को बढ़ाने में लगा था. समय के साथ दोनों का प्यार बढ़ता गया. एमबीए कर के सविता कालेज में पढ़ाने लगी थी. वह नौकरी करने लगी तो घर वाले उस की शादी के बारे में सोचने लगे. सविता चूंकि गौरव से प्यार करती है, ऐसे में वह किसी दूसरे से शादी कैसे करती. लेकिन इस शादी में परेशानी यह थी कि उस की और गौरव की जाति अलगअलग थी. वह ब्राह्मण थी, जबकि गौरव कायस्थ था.
ब्राह्मण जहां शुद्ध शाकाहारी होते हैं, वहीं ज्यादातर कायस्थ परिवार मांसमछली खाते हैं. ऐसे में सविता के घर वाले उस की शादी गौरव से करने के लिए तैयार होंगे, इस की संभावना कम ही थी. गौरव क्या चाहता है, यह जानने के लिए सविता ने अपने घर वालों से बात करने से पहले गौरव से बात कर लेना उचित समझा.
सविता ने गौरव से शादी की बात की तो उस ने कहा, ‘‘तुम से शादी की बात तो मैं भी सोच रहा था, लेकिन जाति के बारे में मैं ने कभी सोचा ही नहीं. वैसे अभी घर वालों से मैं ने शादी की बात नहीं की है, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे घर वाले मान जाएंगे. क्योंकि मैं उन का एकलौता बेटा हूं. अपने एकलौते बेटे को कोई भी मांबाप नाराज नहीं करना चाहेगा. फिर मेरे मम्मीपापा तो मुझे वैसे भी बहुत प्यार करते हैं. वे कभी मना नहीं करेंगे.’’
‘‘लेकिन मेरे मम्मीपापा तो कभी भी तुम से शादी के लिए तैयार नहीं होंगे. फिर भी मैं उन्हें मनाने की कोशिश करूंगी. अगर नहीं माने तो मैं किसी और से शादी ही नहीं करूंगी.’’ सविता ने कहा.
‘‘बाद में क्या करना है, यह बाद की बात है. पहले हम घर वालों से बात कर के तो देखें. शायद वे तैयार ही हो जाएं.’’ गौरव ने कहा.
उसी दिन शाम को गौरव ने मां को पटाने का विचार बना लिया. इसलिए वह थोड़ा जल्दी घर आ गया. जल्दी घर आने पर उस की मां सुषमा ने कहा, ‘‘क्या बात है भई, आज मेरा बेटा जल्दी घर क्यों आ गया?’’
गौरव ने मां के गले में बांहें डाल कर लाड़ जताते हुए कहा, ‘‘आप से एक जरूरी बात करनी है, इसलिए काम छोड़ कर आ गया.’’
‘‘ऐसी कौन सी जरूरी बात है, जिस के लिए तू काम छोड़ कर आ गया?’’ सुषमा ने पूछा. ‘‘पहले एक कप गरमागरम चाय पिलाओ, उस के बाद बताऊंगा कि क्या बात है.’’ गौरव ने कहा. थोड़ी देर में सुषमा ने चाय ला कर सेंटर टेबल पर रखते हुए कहा, ‘‘अब बताओ, क्या बात है?’’
कप उठा कर एक घूंट चाय पीने के बाद गौरव ने कहा, ‘‘मम्मी, मेरा कामधाम ठीकठाक चल रहा है. काम जम जाने के बाद अब मैं अपनी जिंदगी जमाना चाहता हूं.’’ ‘‘जिंदगी जमाना चाहता हूं, इस का क्या मतलब?’’ सुषमा श्रीवास्तव ने अनजान बनते हुए पूछा.
‘‘अरे मम्मी, अब मेरी शादी की उम्र हो गई है, इसलिए शादी करना चाहता हूं. जिंदगी जमाने का मतलब यही है.’’ गौरव ने मुसकराते हुए कहा. ‘‘पहले ही सीधेसीधे कह देते कि शादी करना चाहता हूं. कहीं कोई लड़की देखी है क्या?’’
‘‘देख ली है, तभी तो कह रहा हूं.’’ गौरव ने कहा, ‘‘पढ़ीलिखी भी है और सुंदर भी है. सब से बड़ी बात तो यह है कि वह बहुत संस्कारी है. उस का घरपरिवार भी ठीकठाक है. बस कमी यही है कि वह हमारी जाति की नहीं है.’’
‘‘भई, इस बारे में तो तुम्हें अपने पापा से बात करनी पड़ेगी. क्योंकि जो करना होगा, वही करेंगे.’’ सुषमा ने कहा. ‘‘लेकिन मम्मी, इस बारे में मैं पापा से कैसे बात कर सकता हूं, इसलिए बात तो तुम्हें ही करनी पड़ेगी.’’
‘‘शादी तुम्हें करनी है, इसलिए बात भी तुम्हें ही करनी पड़ेगी.’’ सुषमा ने कहा तो गौरव का मुंह लटक गया. उस ने मायूस हो कर कहा, ‘‘मम्मी, मेरी हिम्मत नहीं है कि मैं पापा से बात करूं.’’
बेटे को मायूस देख कर सुषमा ने कहा, ‘‘चल, कोई बात नहीं, मैं बात करूंगी तेरे पापा से. मेरा बेटा बहुत समझदार है. उस ने जिस लड़की को पसंद किया है, वह अच्छी ही होगी. हमें अच्छी बहू चाहिए, भले ही वह किसी भी जाति की हो.’’
‘‘मम्मी, वह ब्राह्मण है.’’ ‘‘उस के घर वाले तैयार हैं?’’ ‘‘अभी कुछ कह नहीं सकता. लड़की तैयार है, सिर्फ इतना पता है. लेकिन यह निश्चित है कि लड़की मेरे अलावा किसी और से शादी नहीं करेगी.’’ गौरव ने कहा, ‘‘आप इस की चिंता न करें. आप पापा से बात कर लीजिए. सविता अपने घर वालों को किसी भी तरह राजी कर लेगी.’’
‘‘तो उस का नाम सविता है?’’ सुषमा ने पूछा. ‘‘हां मां, उस का नाम सविता है. वह मां और भाई के साथ यहीं इंदौर में रहती है, जबकि उस के पापा बड़ौदा में रहते हैं. वह अग्रवाल ऐंड मित्तल ग्रुप में मैनेजिंग डाइरैक्टर हैं.’’
‘‘भई, वह कुछ भी हो, लड़की तुम्हें पसंद है, सब ठीक है. अब उस की शादी तुझ से करवानी है बस. वह गरीब घर की होती, तब भी हम मना नहीं करते.’’ सुषमा ने कहा, ‘‘लेकिन एक बार सविता को दिखा देते तो मुझे बात करने में आसानी हो जाती. मैं उन से बता तो देती कि मेरी बहू कैसी है.’’
‘‘अपनी बात कह कर मैं निश्चिंत हो गया. अब आप कैसे और क्या करती हैं, यह आप जानें. मुझे सविता से शादी करनी है बस. रही बात सविता को दिखाने की तो मैं कल ही उसे साथ ले आऊंगा.’’ कह कर गौरव उठा और अपने कमरे की ओर बढ़ गया.
अगले दिन उस ने औफिस से सविता को फोन किया. उस के फोन रिसीव करते ही उस ने कहा, ‘‘सविता, मैं ने तो अपनी मां से तुम से शादी की बात बता दी. उन्होंने वादा भी किया है कि वह किसी भी तरह पापा को मना लेंगी. अब तुम बताओ, तुम ने अपने घर बात चलाई या नहीं?’’
‘‘तुम लड़के हो, तुम्हारे लिए यह सब आसान है. लेकिन मैं लड़की हूं. हमारे यहां तो लड़कियां वैसे भी शादी की बात नहीं करतीं. फिर प्रेम विवाह, वह भी गैरजाति के लड़के से, बात करना आसान है क्या? मुझे पता है, यह सब इतनी आसानी से नहीं होगा. जिस दिन मैं ने विवाह की बात कर दी, हमारे घर हंगामा खड़ा हो जाएगा.’’ सविता ने कहा.
‘‘कुछ भी हो, बात तो करनी पड़ेगी. आज नहीं तो कल, मेरे घर बात चलेगी. मां तो राजी हो गई हैं, अब देखो पापा क्या कहते हैं. वैसे वह जल्दी राजी नहीं होंगे. लेकिन मम्मी साथ हैं तो उन्हें मानना ही पड़ेगा. अब तुम किसी भी तरह अपने घर वालों को राजी करो. और हां, आज तुम्हें मेरे साथ घर चलना होगा. मम्मी ने तुम्हें बुलाया है.’’ गौरव ने कहा.
‘‘ऐसे कैसे चल सकती हूं.’’ सविता ने लजाते हुए कहा. ‘‘भई, मम्मी ने बुलाया है तो चलना ही पड़ेगा.’’ गौरव ने कहा.
उस शाम गौरव सविता को साथ ले कर आया तो उसे देख कर सुषमा बहुत खुश हुईं. सुषमा होने वाली बहू की सेवा में लगी थीं, संयोग से सतीश श्रीवास्तव भी आ गए. सविता का परिचय उन से भी कराया गया, लेकिन उस समय यह नहीं बताया गया कि यह गौरव की मंगेतर यानी उन की होने वाली बहू है. थोड़ी देर रुक कर सविता चली गई. फिर उसी रात गौरव, गौरव के मम्मीपापा और उस की एकलौती बहन नेहा खाने बैठी तो सुषमा ने गौरव की शादी की बात छेड़ दी. तब सतीश श्रीवास्तव ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘वह कौन सी खुशनसीब लड़की है जो हमारी लाडली बहू बनने जा रही है?’’
गौरव ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘सविता चौबे.’’ ‘‘वही सविता जो आज शाम को मिली थी.’’ सतीश श्रीवास्तव ने पूछा. ‘‘जी पापा, मैं उसी सविता की बात कर रहा हूं.’’ गौरव ने कहा.
इस के बाद सब एकदम खामोश हो गए. सतीश श्रीवास्तव के हाथ रुक गए तो अन्य लोगों की नजरें उन पर जम गईं. सुषमा को लगा कि मामला गंभीर हो रहा है तो वह बात संभालने की गरज से धीरे से बोलीं, ‘‘बेटा, हमारी और उन की जाति अलगअलग है. यह कैसे मुमकिन हो सकता है?’’
सतीश ने भी पत्नी की बात का समर्थन किया, ‘‘मान लो, हम तुम्हारी खुशी के लिए तैयार हो भी जाते हैं तो क्या सविता के घर वाले यह शादी करने को तैयार हो जाएंगे?’’
‘‘पापा, पहले आप तो तैयार होइए. सविता के घर वालों से बाद में बात की जाएगी.’’ नेहा ने अपनी राय दी. आखिर काफी बहस के बाद सतीश सविता से गौरव की शादी के लिए इस शर्त पर तैयार हुए कि वह यह शादी तभी करेंगे, जब सविता के घर वाले शादी के लिए खुशीखुशी तैयार होंगे.
गौरव ने यह बात सविता को बताई तो वह बहुत खुश हुई. इस तरह से एक बाधा पार हो गई थी. अब सविता को अपने घर वालों को राजी करना था. उसे पता था कि उस के घर वाले जल्दी राजी नहीं होंगे. फिर भी उसे विश्वास था कि वह किसी न किसी तरह अपने घर वालों को जरूर राजी कर लेगी. लेकिन जब उस ने गौरव श्रीवास्तव से शादी करने की बात मां को बताई तो घर में हंगामा खड़ा हो गया.
सविता पर पाबंदियां लगा दी गईं. पिता तो बाहर रहते थे, मां उस पर नजर रखने लगीं. वह उसे गौरव से मिलने नहीं देना चाहती थीं. मांबाप भले ही उसे गौरव से मिलने से रोक रहे थे, लेकिन उस का भाई बाबू तटस्थ था. वह न शादी के पक्ष में था, न ही विरोध कर रहा था. सविता कोई बच्ची नहीं थी कि डांटनेफटकारने से मान जाती.
वह बालिग थी और अपने पैरों पर खड़ी थी. विमला ने देखा कि वह अपनी जिद पर अड़ी है तो मजबूरन उन्हें शादी के लिए हामी भरनी पड़ी. उन्होंने पति को भी समझाया कि अगर बेटी ने अपने मन से शादी कर ली तो और बदनामी होगी. इसलिए अच्छा है कि हम खुद ही उस की शादी गौरव से कर दें. इस तरह सविता को भी मांबाप की ओर से गौरव से शादी की मंजूरी मिल गई.
दोनों परिवार राजी हो गए तो शादी की बातचीत हुई. बातचीत के दौरान जब दोनों की कुंडली देखी गई तो पता चला कि सविता तो मांगलिक है. दोनों की शादी में यह बहुत बड़ी बाधा थी. गौरव के मातापिता डर गए, क्योंकि कहा जाता है कि अगर लड़की मांगलिक हो तो जिस लड़के के साथ उस की शादी होती है, वह साल के अंदर ही मर जाता है.
सतीश श्रीवास्तव और सुषमा परेशान रहने लगे. क्योंकि गौरव जिद पर अड़ा था कि कुछ भी हो, वह शादी सविता से ही करेगा. ऐसा ही कुछ हाल सविता के घर वालों का भी था. दोनों के ही घर वाले उन्हें समझा रहे थे, लेकिन वे अपनी जिद पर अड़े थे कि शादी करेंगे तो एकदूसरे से ही करेंगे, अन्यथा जीवन भर कुंवारे रहेंगे. जब उन्होंने बताया कि ऐश्वर्य राय बच्चन भी मांगलिक हैं. फिर भी उन का वैवाहिक जीवन सुखी है. तब बच्चों की जिद के आगे एक बार फिर घर वालों को झुकना पड़ा.
मजबूर हो कर उन्होंने दोनों की सगाई कर दी. लेकिन तय हुआ कि शादी एक साल बाद की जाएगी. इस के बाद दोनों ओर से शादी की तैयारियां होने लगीं. गौरव और सविता की सगाई ही नहीं हो गई थी, बल्कि शादी की तारीख भी तय हो गई थी. लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था.
17 अगस्त, 2008 को गौरव अपने 3 दोस्तों के साथ इंदौर से 50 किलोमीटर दूर वांचू पौइंट पर पिकनिक मनाने कार से जा रहा था. वांचू पौइंट वही पहाड़ी है, जिस की ढलान के आखिरी छोर से लगभग 1 हजार मीटर से ज्यादा गहराई पर भारत की नर नदी नर्मदा बहती है. इसे नर नदी इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह नदी उलटी बहती है.
गौरव और उस के दोस्तों की कार जब ढलान पर चल रही थी तो असंतुलित हो कर गहरी खाई में जा गिरी. इस दुर्घटना में हैरानी वाली बात यह थी कि किसी की जान का कोई नुकसान नहीं हुआ था. गौरव के तीनों दोस्त तो साफ बच गए थे, लेकिन गौरव कार के नीचे बुरी तरह से दब गया था. किसी तरह दोस्तों ने उसे कार के नीचे से निकाला तो गौरव ने कहा, ‘‘यार, पता नहीं क्यों मेरे हाथपैर काम ही नहीं कर रहे हैं.’’
दोस्त परेशान हो उठे. उन की समझ में नहीं आया कि गौरव को ऐसा क्या हो गया कि उस के हाथपैर काम नहीं कर रहे हैं. वे भले ही गंभीर रूप से घायल नहीं थे, लेकिन चोटें तो उन्हें भी आई थीं. फिर भी वे अपनी चोटों को भूल कर दोस्त के लिए बेचैन हो उठे. किसी तरह वे गौरव को अस्पताल ले गए, जहां जांच के बाद डाक्टरों ने बताया कि गौरव की स्पाइनल इंजरी होने से शरीर का गरदन के नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया था.
सतीश और सुषमा पर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. उन का एक ही बेटा था, वह भी अपंग हो गया था. दुख की इस घड़ी में उन्हें संभालना मुश्किल हो रहा था. तुरंत उन के दिमाग में सविता का मांगलिक होने का वहम घुस गया, जबकि दिलासा देने वाले ही नहीं, खुद गौरव भी कह रहा था कि यह मात्र एक हादसा है. इस में मांगलिक होने का कोई दोष नहीं है.
गौरव को दिल्ली ले जाया गया, लेकिन वहां भी कोई खास लाभ नहीं हुआ. उस के इलाज में पैसा पानी की तरह बह रहा था, जिस की वजह से सतीश आर्थिक तंगी में आ गए. रिश्तेदारों ने तो मदद की ही, उन की एसोसिएशन ने भी पैसे इकट्ठे कर के एक मोटी रकम गौरव के इलाज के लिए दी. आदमी कभी उम्मीद नहीं छोड़ता. सतीश भी पूरी उम्मीद के साथ बेटे का इलाज करा रहे थे. गौरव ठीक तो नहीं हुआ, लेकिन घर वालों ने उम्मीद नहीं छोड़ी.
गौरव का शरीर भले ही पूरी तरह काम नहीं कर रहा था, लेकिन दिमाग पूरी तरह से सजग था. इसलिए घर में बैठेबैठे वह अपना काम करने लगा था. अपना लैपटौप लिए वह अपने काम में लगा रहता था.
इस हादसे का उस के व्यवसाय पर भी काफी असर पड़ा था. वह एक तरह से लगभग बंद हो गया था, लेकिन इस हालत में भी गौरव ने परिवार और सहयोगियों की मदद से उसे संभाला. उस के व्यवसाय में पहले जैसी बात तो नहीं आईं, लेकिन उस का व्यवसाय चल निकला.
गौरव के साथ एक हादसा तो हुआ ही था, दूसरा हादसा यह हो गया कि सविता के घर वालों ने उस पर गौरव से मिलने ही नहीं, बात करने पर भी पाबंदी लगा दी. यहां तक कि वह गौरव को देखने उस के घर भी नहीं जा सकती थी.
लेकिन लाख पाबंदी के बावजूद सविता नहीं मानी. उस ने घर वालों से साफ कह दिया, ‘‘मैं ने गौरव से साथसाथ मरनेजीने की कसम खाई है तो उस के साथ ही मरूंगीजिऊंगी. मैं उन लड़कियों में नहीं हूं जो सिर्फ सुख में साथ देती हैं. अगर यह शादी के बाद होता या मेरे साथ होता तो आप लोग क्या करते. मैं उस के बिना नहीं रह सकती, इसलिए शादी करूंगी तो उसी से करूंगी अन्यथा पूरा जीवन ऐसे ही बिता दूंगी.’’
सविता की बातों और जिद के आगे एक बार फिर उस के घर वालों को झुकना पड़ा. सविता गौरव से मिलने जाने लगी थी. गौरव को उम्मीद थी कि वह जल्दी ही ठीक हो जाएगा. उस के बाद सविता से शादी कर लेगा.
लेकिन जब उस ने देखा कि उसे कोई खास लाभ नहीं हो रहा है और व्हीलचेयर ही उस की जीवनसाथी बन गई है तो एक दिन उस ने सविता से कहा, ‘‘सविता, तुम देख ही रही हो कि मैं अब किसी लायक नहीं रहा. जो आदमी अपने लिए ही कुछ नहीं कर सकता, वह दूसरों के लिए क्या करेगा. इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम अब किसी और से शादी कर लो.’’
गौरव का इतना कहना था कि सविता रो पड़ी. उस ने रोते हुए कहा, ‘‘मैं ने तुम से वादा किया था कि पूरे जीवन साथ निभाऊंगी. अब मंझधार में छोड़ कर कैसे जा सकती हूं. मैं निराश होने वालों में नहीं हूं. तुम्हें क्या पता कि मैं ने अपने मम्मीपापा से कितनी लड़ाई की है तुम्हारे लिए. मैं ने जो वादा किया है, वह निभाऊंगी. तुम शादी के लिए तैयार हो जाओ, अब मैं तुम से शादी करूंगी.’’
गौरव शादी के लिए तैयार नहीं था, लेकिन सविता ने जिद कर के उसे तैयार कर लिया. इस के बाद दोनों की भावनाओं का खयाल करते हुए शादी की तैयारियां शुरू हो गईं. शादी की तारीख निकलवा ली गई.
17 फरवरी, 2014 को गौरव और सविता ने अपनी शादी मंडप में करने के बजाए कोर्ट में कर ली. 22 फरवरी, 2014 को रिसैप्शन रखा गया. इंदौर के साकेत क्लब में रिसैप्शन होना था. दूल्हादुलहन के स्वागत के लिए मंच सजाया गया था. चकाचौंध रोशनी के बीच दुलहन बनी सविता को नातेरिश्तेदार घेरे हुए थे.
लेकिन उस का हैंडसम दूल्हा घोड़ी के बजाए व्हीलचेयर से आया. जिन लोगों को असलियत पता नहीं थी, उन्हें हैरानी के साथ जिज्ञासा भी थी कि आखिर माजरा क्या है. उन्होंने दुलहन को देखा, वह उन्हें बहुत खुश नजर आ रही थी.
जब लोगों को असलियत का पता चला तो सभी ने दांतों तले अंगुली दबा ली. उन्हें हैरानी हुई कि आज भी लोग इस तरह प्यार करते हैं. फिर तो सभी सविता की सोच और उस के सच्चे प्यार की दाद देने लगे. लोग दिल खोल कर उस की और उस के परिवार की सराहना कर रहे थे.
रिसैप्शन के बाद सविता चौबे सविता श्रीवास्तव हो कर अपनी ससुराल आ गई. गौरव के साथ हुए हादसे के बाद गौरीशंकर चौबे ने सविता के लिए लड़का ही नहीं देख लिया था, बल्कि उस की शादी भी तय कर दी थी. उस लड़के से सविता और गौरव के प्यार के बारे में बता भी दिया गया था, इस के बावजूद वह शादी के लिए तैयार था. लेकिन सविता ने जब उस के साथ शादी करने से स्पष्ट मना कर दिया तो गौरीशंकर और विमला ने सविता को उस के भाग्य पर छोड़ कर गौरव से उस की शादी कर दी.
सतीश और सुषमा को लगता है कि एक न एक दिन गौरव जरूर ठीक हो जाएगा. उन का मानना है कि मनुष्य का शरीर दुनिया का सब से बड़ा अजूबा है. कब, क्या परिवर्तन आ जाए, कहा नहीं जा सकता.
इस उम्मीद की वजह यह है कि एक डाक्टर ने उन्हें बताया है कि स्टेम सेल पर रिसर्च चल रही है, जिस से स्पाइनल डैमेज का इलाज हो सकेगा. लेकिन यह अभी दूर की कौड़ी है. उस रिसर्च को पहले जानवरों पर आजमाया जाएगा. सफल होने के बाद ही मनुष्य का इलाज हो सकेगा.
फिलहाल तो कोई चमत्कार ही गौरव को ठीक कर सकता है. अभी तो गौरव सविता के ही सहारे है. अब सविता गौरव के व्यवसाय में भी मदद कर रही है. Indore Love Story






