Police Inspector Murder Case. ज्योति ने इंसपेक्टर विजय से नजदीकी बना कर मंदिर में विवाह कर लिया. इस के बाद वह इंसपेक्टर को रिश्ते उजागर करने की धमकी दे कर ब्लैकमेल करने लगी. इस तरह दूसरों को न्याय दिलाने वाला खुद अन्याय का शिकार होने लगा.  

जिला मुजफ्फरनगर के थाना फुगाना के पहरा ड्यूटी पर तैनात संतरी मुस्तैदी से मुख्य गेट के पास खड़ा था. थानाप्रभारी इंसपेक्टर विजय सिंह कुछ सिपाहियों के साथ किसी अपराधी की तलाश में बाहर गए हुए थे. बाकी का स्टाफ थाने में अपनेअपने काम में लगा था. उसी बीच काले रंग की एक टाटा सफारी कार नंबर यूपी-11एडी-6704 थाने में दाखिल हुई.

कार की ड्राइविंग सीट पर एक युवक बैठा था. उस की बगल वाली सीट पर एक खूबसूरत लड़की बैठी थी. ड्यूटी पर तैनात संतरी ने उसे रोका तो संतरी के कार रोकने का मतलब भांप कर ड्राइवर के बगल बैठी लड़की ने कहा, ‘‘हमें इंसपेक्टर साहब से मिलना है.’’

संतरी को पता था कि थानाप्रभारी थाने में नहीं हैं, इसलिए उस ने संक्षिप्त सा जवाब दिया, ‘‘साहब, इस समय थाने में नहीं हैं.’’

‘‘हम उन के परिचितों में हैं.’’ लड़की ने कहा तो सिपाही ने लड़की को गौर से देखा. इस के बाद उस ने कहा, ‘‘सौरी मैडम, अंधेरे में पहचान नहीं सका. आप तो पहले भी…’’

सिपाही की बात पूरी होती, उस से पहले ही लड़की ने आत्मविश्वास भरे लहजे में कहा, ‘‘हां भई, हम पहले भी आते रहे हैं. साहब से हमारी बात भी हो गई है. उन का फोन आता ही होगा. कुछ देर में वह आ भी जाएंगे.’’

सिपाही उस लड़की को ज्यादा तो नहीं जानता था, लेकिन उसे इतना जरूर पता था कि यह लड़की थानाप्रभारी से मिलने आती रहती है. थाना परिसर में बने थानाप्रभारी के आवास में इस की सीधी एंट्री है. सिपाही उस से बात कर ही रहा था कि औफिस से बाहर आ कर मुंशी ने उसे एक चाबी देते हुए कहा, ‘‘इन्हें आने दो भाई, साहब का फोन आया है.’’

चाबी ले कर कार सीधे इंसपेक्टर विजय सिंह के आवास के सामने जा कर रुकी. लड़की ने आवास का ताला खोला और ड्राइवर के साथ अंदर दाखिल हो गई. टाटा सफारी से आई वह लड़की, उस की गाड़ी चला कर लाने वाला लड़का कौन था, यह थाने के स्टाफ में से कोई नहीं जानता था. लेकिन जिस तरह वह इंसपेक्टर साहब से मिलती थी, उस से उन लोगों को यही लगता था कि वह उन की कोई खास ही है.

थाना फुगाना उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर में है. इस जिले में कुछ महीने पहले ही भयंकर सांप्रदायिक दंगा भड़का था. उस के बाद ही 16 फरवरी को इंसपेक्टर विजय सिंह को थाना फुगाना की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

इस के पहले वह इसी जिले के दूसरे थाने में तैनात थे. वह लड़की और उस का साथी इंसपेक्टर साहब के कितना करीबी थे, यह सिर्फ वही जानते थे. इस के बावजूद थाने की कैंटीन से खाना मंगा कर उन के लिए भिजवा दिया गया था.

थानाप्रभारी इंसपेक्टर विजय सिंह रात करीब 10 बजे थाने आए तो सीधे अपने आवास पर चले गए. रात 11 बजे के करीब थानाप्रभारी के आवास में ठहरी लड़की भागती हुई थाने के औफिस में पहुंची. वह घबराई हुई थी, इसलिए मुंशी ने उत्सुकता से पूछा, ‘‘क्या हुआ मैडम?’’

अपनी सांसों पर काबू पाते हुए लड़की ने कहा, ‘‘इंसपेक्टर साहब को न जाने क्या हो गया है. वह बेहोश हो कर गिर गए हैं.’’

लड़की की बात सुन कर वहां मौजूद स्टाफ सन्न रह गया. मुंशी ने हकला कर पूछा, ‘‘अरे, ऐसा कैसे हुआ? अभी थोड़ी देर पहले तो वह एकदम ठीकठाक थे.’’

‘‘पता नहीं अचानक उन्हें क्या हो गया?’’ लड़की ने कहा.

थाने में मौजूद लोग थानाप्रभारी के आवास की आरे भागे. दरवाजा खुला था. लड़की के साथ आया लड़का हैरानपरेशान कमरे में खड़ा था. अचेत इंसपेक्टर विजय सिंह जमीन पर पड़े थे. उन की सांसें धीरेधीरे चल रही थीं. उन के शरीर पर कहीं चोट का निशान नजर नहीं आ रहा था. स्टाफ ने उन्हें उठा कर कार में डाला और कस्बा शामली के एक अस्पताल में पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया.

मामला थानाप्रभारी की मौत का था, वह भी रहस्यमयी अंदाज में. क्योंकि वह पूरी तरह स्वस्थ थे और थोड़ी देर पहले ही गश्त से लौट कर आए थे. अचानक उन्हें क्या हुआ, यह बात किसी की समझ में नहीं आ रही थी. तत्काल इस की सूचना पुलिस अधिकारियों के अलावा उन के घर वालों को भी दे दी गई थी.

59 वर्षीय विजय सिंह थाने में अकेले ही रहते थे. उन का परिवार अस्थाई रूप से शहर के थाना कोतवाली के मोहल्ला लद्दावाला में रहता था. अचानक हुई इस अनहोनी से हर कोई परेशान था. जो कुछ भी हुआ था, वह लड़की और उस के साथ आए लड़के के सामने हुआ था, इसलिए पुलिस को उन दोनों पर शक हुआ. भला कोई स्वस्थ आदमी इस तरह अचानक एकदम से कैसे मर सकता है? यह 22 मई, 2014 की रात की घटना थी.

सुबह पुलिस अधीक्षक (देहात) आलोक प्रियदर्शी, पुलिस अधीक्षक (अपराध) राकेश जौली और पुलिस उपाधीक्षक सत्यप्रकाश थाने आए तो इन की उपस्थिति में बड़ी बारीकी से थानाप्रभारी विजय सिंह के आवास की तलाशी ली गई.

इस तलाशी में वहां से एक शीशी मिली, जिस में पाउडर जैसी कोई चीज थी. शीशी पर कोई लेबल नहीं लगा था. उस में पाउडर जैसा क्या था, यह पता लगाना मुश्किल था.

थानाप्रभारी के यहां आई वह लड़की और लड़का कौन था, यह जानने के लिए पुलिस ने उन से पूछताछ की. पता चला कि लड़की का नाम ज्योति मिश्रा था. उस के साथ आया लड़का उस का भाई प्रशांत मिश्रा था. दोनों 9 सौ किलोमीटर दूर गोरखपुर जिले के रहने वाले थे. वहीं से वे इंसपेक्टर से मिलने आए थे.

शुरुआती पूछताछ में उन्होंने यही बताया कि विजय सिंह की तबीयत अचानक खराब हो गई थी और वह एकदम से नीचे गिर पड़े थे.

लड़की और उस का भाई काफी घबराया हुआ था. पुलिस अधिकारियों को मामला संदिग्ध लग रहा था, इसलिए सहारनपुर रेंज के डीआईजी रघुबीरलाल ने दोनों को हिरासत में ले कर मामले की जांच गहराई से करने को कहा.

पुलिस ने ज्योति और प्रशांत को हिरासत में ले कर सुबूत जुटाने के लिए फोरेंसिक टीम बुला ली. जांच की वीडियोग्राफी भी कराई जा रही थी. फोरेंसिक टीम ने बरामद शीशी कब्जे में ले कर गिलास समेत कई स्थानों से फिंगर प्रिंट उठाए. पुलिस अधीक्षक राकेश जौली ने ज्योति से शीशी के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘सर, मैं इस के बारे में कुछ नहीं जानती.’’

‘‘इंसपेक्टर की मौत संदेह के घेरे में है. उस समय तुम दोनों के अलावा वहां कोई और नहीं था. इसलिए शक तो तुम्हीं दोनों पर होगा.’’

‘‘सर, हम उन्हें बहुत पहले से जानते थे. हमारे संबंध भी बहुत अच्छे थे, इसी वजह से कभीकभी मिलने चले आते थे. हमें अंदाजा नहीं था कि आज ऐसा कुछ हो जाएगा.’’ ज्योति ने कहा.

ज्योति कितना सच बोल रही थी, अब जांच के बाद ही पता चल सकता था. बहरहाल तो वे संदेह के घेरे में थे. इंसपेक्टर विजय सिंह की मौत पुलिस विभाग में चर्चा का विषय बनी हुई थी.

विजय सिंह की पत्नी प्रभा देवी और अन्य घर वाले तथा रिश्तेदार आ गए थे. ज्योति पर नजर पड़ते ही प्रभा देवी भड़क उठीं. उन्होंने कहा, ‘‘इस ने इंसपेक्टर साहब से 5 लाख रुपए उधार ले रखे थे. रुपए वापस न करने पड़ें, इसलिए इसी ने उन की हत्या कर दी है.’’

इस बात से साफ हो गया कि प्रभा देवी ज्योति को पहले से जानती थीं. उन्होंने ज्योति और प्रशांत के खिलाफ तहरीर भी लिख कर दे दी थी, जिस के आधार पर दोनों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया था. पुलिस ने अपनी काररवाई निपटा कर विजय सिंह के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था.

मामला गंभीर और विभाग से जुड़ा था, इसलिए मामले की जांच पुलिस उपाधीक्षक सत्यप्रकाश को सौंपी गई. पुलिस अधिकारियों को अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था. क्योंकि उसी से मौत के रहस्य का पता चल सकता था.

इंसपेक्टर विजय सिंह का स्वभाव काफी मिलनसार था, इसलिए उन की इस तरह हुई मौत से सहयोगी काफी दुखी थे. पोस्टमार्टम के बाद उन का शव पुलिस लाइन लाया गया, जहां अंतिम सलामी के बाद शव को उन के घर वालों को सौंप दिया गया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी मौत का कारण स्पष्ट नहीं हुआ था, इसलिए बिसरा जांच के लिए सुरक्षित रख लिया गया था.

इंसपेक्टर विजय सिंह की पत्नी प्रभा देवी ने ज्योति और उस के भाई प्रशांत के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था, इसलिए पुलिस ने ज्योति से पूछताछ शुरू की. ज्योति ने हत्या की बात से तो इनकार कर दिया, लेकिन इस के अलावा जो बताया, वह काफी चौंकाने वाला था.

ज्योति के बताए अनुसार, उस ने विजय सिंह से शादी की थी. इसी की वजह से वह उन से मिलने यहां आती थी. ज्योति का इतना कहना था कि पुलिस अधीक्षक राकेश जौली हैरान रह गए. उन्होंने कहा, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’

‘‘सर, मैं झूठ नहीं बोल रही हूं. जब वह गोरखपुर में थे, तब हम दोनों ने मंदिर में विवाह किया था.’’

ज्योति का बयान सनसनीखेज था. अब तक जांच में पुलिस को पता चल चुका था कि ज्योति ने विजय सिंह से काफी रुपए ले रखे थे. इसलिए पुलिस ने उन के खाते की डिटेल खंगाली. इस से जानकारी मिली कि पिछले कुछ महीनों में विजय सिंह के खाते से ज्योति के खाते में 7 लाख रुपए ट्रांसफर किए गए थे. यह भी पता चला कि जिस सफारी कार से वह आई थी, उसे भी विजय सिंह ने खरीद कर दी थी.

इस के बाद ज्योति के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की गई तो पता चला कि अकसर विजय सिंह से उस की बात होती रहती थी. इन तथ्यों के सामने आने के बाद पुलिस ने ज्योति से सख्ती से पूछताछ की. इस के बाद ज्योति के बारे में जो जानकारियां मिलीं, वे काफी चौंकाने वाली थीं.

पता चला कि वह इतनी शातिर थी कि एक से एक शातिरों को पकड़ने वाले पुलिस इंसपेक्टर को ही ब्लैकमेल करते हुए अपने इशारे पर नचा कर ऐश की जिंदगी जी रही थी. दूसरों को ब्लैकमेलरों से बचाने वाले विजय सिंह को ज्योति ब्लैकमेल कर रही थी.

शातिर ज्योति का शिकार बने इंसपेक्टर विजय सिंह मूलरूप से जिला अमरोहा के गांव केरुआ के रहने वाले थे. सिपाही के रूप में भरती हुए विजय सिंह ने 1990 में एक ऐसा साहसिक कार्य किया कि उन्हें आउट औफ टर्न प्रमोशन मिला तो वह सबइंसपेक्टर बन गए. उस के बाद प्रमोशन से वह इंसपेक्टर बने.

पहले तो वह अपने परिवार को साथ रखते रहे, लेकिन इधर उन्होंने अपने परिवार को मुजफ्फरनगर के मोहल्ला लद्दावाला में शिफ्ट कर दिया था.

विजय सिंह के परिवार में पत्नी, 2 बेटे और एक बेटी थी. वह काफी मिलनसार स्वभाव के थे. सन 2009 में विजय सिंह का तबादला गोरखपुर हुआ तो अलगअलग थानों में रहने के बाद उन की तैनाती थानाप्रभारी के रूप में थाना कैंट में हुई. इसी थाने में तैनाती के दौरान उन की मुलाकात खूबसूरत ज्योति मिश्रा से हुई थी.

ज्योति गोरखपुर के ही थाना बेलाघाट के गांव भभया के रहने वाले वीरेंद्र मिश्रा की बेटी थी. महत्त्वाकांक्षी ज्योति भले ही गांव में पैदा हुई थी, लेकिन इंटर तक पढ़ी इस लड़की के सपने बहुत ऊंचे थे. इन्हीं सपनों को आकार देने के लिए उस ने कुछ छुटभैये नेताओं से संपर्क बना लिए थे.

इस के बाद तो उसे पंख लग गए. उन्हीं के साथ वह सरकारी औफिसों और अधिकारियों के पास आनेजाने लगी. वह जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही तेजतर्रार भी थी. अपनी लच्छेदार बातों में उलझा कर कैसे काम निकाला जाता है, यह हुनर वह बहुत जल्दी सीख गई थी.

वीरेंद्र मिश्र गांव के मामूली किसान थे. उन की माली हालत भी कुछ खास नहीं थी. ज्योति यह सब बदल देना चाहती थी. समझदार होने के बाद उस ने लोगों का रौबरुतबा और चकाचौंध देखी तो खुद भी उसी तरह बनने का निश्चय कर लिया.

ऐसी तमाम लड़कियां हैं, जो बड़े और पहुंच वाले लोगों से संबंध बना कर आगे बढ़ना चाहती हैं. कुछ अपने इस मकसद में सफल हो जाती हैं तो कुछ इस तरह बरबाद होती हैं कि किसी लायक नहीं रहतीं.

ज्योति भी ऐसी ही लड़की थी. घर वालों के जोरदबाव से निकल चुकी ज्योति जिस परिवेश में रह रही थी, वहां चर्चाओं को फैलने में देर नहीं लगती. उस के साथ भी यही हुआ, लेकिन उस ने उन चर्चाओं पर ध्यान देने के बजाय चर्चा करने वालों से किसी भी तरह का मतलब रखना छोड़ दिया.

वह अपने अंदाज में पूरी आजादी के साथ जीना चाहती थी. छुटभैये नेताओं की मदद से वह अधिकारियों से मिल कर लोगों के छोटेमोटे काम कराने लगी. इस के बदले वह उन लोगों से पैसे लेती थी. उन्हीं नेताओं की बदौलत वह पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से संबंध बना लेती थी. अधिकारियों से संबंध बना कर उस ने कुछ विवादास्पद काम कराए तो वह चर्चा में आ गई. लेकिन नेताओं के संरक्षण में होने की वजह से कोई उस का कुछ नहीं कर सका.

उसी बीच ज्योति ने एक बड़े प्रशासनिक अधिकारी से संबंध बना लिए. उस के बाद सब से कहने लगी कि वह उस के रिश्तेदार हैं. यही कह कर उस ने तमाम लोगों के काम कराए. जरूरत पड़ने पर उस अधिकारी से सिफारिश भी करा दी. ऐसी ही बातों से ज्योति का रुतबा बढ़ता गया.

ज्योति की मुलाकात इंसपेक्टर विजय सिंह से हुई तो उस ने उन्हें अपने रौबरुतबे और लच्छेदार बातों से शीशे में उतार लिया. इस के बाद ज्योति अकसर थाने आनेजाने लगी. इस का असर भी पुलिसकर्मियों से ले कर आम जनता तक दिखाई देने लगा. ज्योति से संबंधों को ले कर विजय सिंह चर्चा में तब आए, जब अन्य थाने के पुलिसकर्मियों से ज्योति की स्कूटी के कागज चैक करने को ले कर झड़प हो गई. उस के बाद विजय सिंह ने हस्तक्षेप कर के मामला सुलटाया.

समय के साथ ज्योति और विजय सिंह के संबंध प्रगाढ़ होते गए. कभीकभी विजय सिंह का परिवार भी उन से मिलने आता रहता था, इसलिए ज्योति की जानपहचान उन की पत्नी प्रभा देवी से भी हो गई. दुनिया की नजरों में ज्योति और विजय सिंह के संबंध कुछ और थे, जबकि असली रिश्ते कुछ और थे.

संबंधों को मजबूरी देने और उम्र भर साथ निभाने के लिए ज्योति ने एक मंदिर में विजय सिंह के साथ विवाह कर लिया था. शातिर ज्योति ने इस के सुबूत भी अपने पास रख लिए थे.

यह अलग बात थी कि उन का यह संबंध गुप्त बना रहा, क्योंकि ज्योति ने इस का दावा कभी सामने आ कर नहीं किया. जरूरत पड़ने पर ज्योति विजय सिंह से खर्च के लिए रुपए मांग लेती थी. इस के अलावा वह उधार के रूप में भी उन से रुपए लेती रहती थी. धीरेधीरे यह रकम 5 लाख रुपए हो गई थी.

सच्चाई यह थी कि विजय सिंह उस के खूबसूरत जाल में उलझ गए थे. ज्योति ने विजय सिंह से रुपए उधार ले रखे हैं, यह बात उन के घर वालों को भी पता थी.

जल्दी ही ज्योति की असलियत विजय सिंह के सामने आ गई. वह जान गए कि ज्योति बहुत ही महत्त्वाकांक्षी है, जिस के लिए अब वह शिकार हैं, पति और प्रेमी नहीं. वह उस से दूरी बनाने लगे. जब इस बात का अहसास ज्योति को हुआ तो वह तिलमिला उठी और सीधे ब्लैकमेलिंग पर उतर आई.

एक साल पहले विजय सिंह का तबादला मुजफ्फरनगर हुआ तो उन्होंने थोड़ी राहत महसूस की. बच्चे पहले से ही मुजफ्फरनगर में रह रहे थे. उन की बेटी निक्की दिल्ली में रह की एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थी तो बेटों में विपुल आईएएस की तैयारी कर रहा था और शिवम आईटी की पढ़ाई कर रहा था.

मुजफ्फरनगर में उन्हें थाना भोपा का इंचार्ज बनाया गया. विजय सिंह का सोचना था कि इतनी दूर आ कर ज्योति से उन्हें मुक्ति मिल जाएगी. लेकिन यह उन की भूल थी. वह उस के लिए सेने का अंडा देने वाली मुर्गी बन चुके थे. इसलिए वह उन्हें कैसे मुक्त कर सकती थी. वह फोन से उन से संपर्क बनाए रही.

यही नहीं, उस ने कह भी दिया कि अगर समयसमय पर उन्होंने उस की मांगों को पूरा नहीं किया तो वह शादी वाली बात को उजागर कर देगी. विजय सिंह सरकारी नौकरी में थे, इसलिए दूसरी शादी करने के मामले में फंस सकते थे.

यही वजह थी कि उन की इस कमजोर नस को वह इच्छानुसार बारबार दबाती रही. कुछ महीने बाद उन का तबादला थाना फुगाना कर दिया गया.

विजय सिंह ज्योति से सैकड़ों किलोमीटर दूर आ गए थे, लेकिन ज्योति उन से मिलने यहां भी आ गई. आते ही उस ने विजय सिंह से एक लग्जरी कार खरीद कर देने को कहा. पीछा छुड़ाने के लिए उन्होंने किसी तरह सहारनपुर के रहने वाले प्रवेश की टाटा सफारी कार, जिस का नंबर यूपी-11डी-6704 था, खरीद कर दे दी. इस के बाद वह उसी कार से आनेजाने लगी.

वह जब भी मुजफ्फरनगर आती, रेल या बस से आने के बजाय उसी कार से आती. कार चलाने के लिए उस का भाई प्रशांत था ही. वह जब भी इधर आती, दिल्ली, मेरठ, नोएडा, हरिद्वार और देहरादून आदि शहरों में ठाठ से घूमती और अपनी जानपहचान वालों से मिलती. दूसरी ओर विजय सिंह ज्योति से अपने संबंधों की वजह से परेशान ही नहीं थे, बल्कि घुटघुट कर जी रहे थे. खुद को बचाए रखने के लिए वह किसी भी तरह उस की हर मांग पूरी करते थे.

मुजफ्फरनगर आने के बाद ज्योति की मांग पर उन्होंने अलगअलग समय पर उस के खाते में 7 लाख रुपए की मोटी रकम ट्रांसफर की थी. इस के बावजूद ज्योति की मांग लगातार बढ़ती जा रही थी.

अप्रैल से वह मकान बनवाने के बहाने उन से 20 लाख रुपए मांगने लगी थी. उस की इस मांग से वह काफी परेशान थे. अपनी इसी मांग को पूरा कराने के लिए 22 मई को ज्योति अपने भाई प्रशांत के साथ उन के पास आई थी. तभी रहस्यमय तरीके से उन की मौत हो गई थी और उस के बाद ज्योति का राज खुल गया था.

ज्योति और उस के भाई प्रशांत पर हत्या का आरोप था, लेकिन उन्होंने विजय सिंह की हत्या कैसे की, पुलिस उन से यह नहीं उगलवा सकी. पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार ज्योति पहले अधिकारियों या नेताओं से गहरे संबंध बनाती थी, उस के बाद उजागर करने की धमकी दे कर उन्हें ब्लैकमेल करती थी. पुलिस ने अब तक की जांच में ये तथ्य जुटा लिए थे कि वह शातिर ब्लैकमेलर थी. विजय सिंह को भी वह ब्लैकमेल कर रही थी.

पुलिस को शक है कि इंसपेक्टर विजय सिंह ही उस के अकेले शिकार नहीं थे. और भी कई लोग उस के चंगुल में थे. वे कौन हो सकते हैं, इस की जांच चल रही है.

कथा लिखे जाने तक ज्योति और उस का भाई जेल में था, उन की जमानत नहीं हो सकी थी. विजय सिंह की मौत का भी रहस्य बरकरार था कि आखिर उन की मौत कैसे हुई थी? उन के आवास से बरामद शीशी और पाउडर आगरा स्थित फोरेंसिक लैब जांच के लिए गया हुआ था.

अभी तक की जांच में सामने आए तथ्यों के हिसाब से हो सकता है कि ज्योति ब्लैकमेलर रही हो, लेकिन उस ने और उस के भाई ने विजय सिंह की हत्या की होगी, इस बात पर सहज रूप से यकीन नहीं होता. क्योंकि कोई भी हत्यारा न तो हत्या के इरादे से इस तरह खुलेआम आता है और न ही इतना बड़ा अपराध करने के बाद घटनास्थल पर रुकता है. बहरहाल, विस्तृत जांच के बाद ही इस मामले की सच्चाई सामने आ पाएगी.    Police Inspector Murder Case

— 2014 में प्रकाशित

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...