Love Crime: इश्क का खूनी अंजाम

Love Crime: 25 वर्षीय जिकरा परवीन का पति कामधंधा करने दूसरे प्रदेश क्या गया, वह देवर दिलदार कुरैशी के लंगोटिया यार  27 वर्षीय मोहम्मद फैजान को प्यार करने लगी. फैजान ने न सिर्फ जिकरा बल्कि दिलदार की बहन को भी प्यार के जाल में फांस लिया था. फिर एक दिन इन के इश्क का ऐसा खूनी अंजाम हुआ कि…

जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में एक रोज दोपहर में दिलदार ने भाभी व दोस्त को हमबिस्तर होते देख लिया. यह देखने के बावजूद उस ने अपने गुस्से पर काबू रखा और दबे पांव घर से चला गया. चूंकि उस समय घर पर उस की बहन भी मौजूद थी, अत: दिलदार को यह भी शक हुआ कि बहन भी भाभी से मिली हुई है. उस के मन में भी फैजान के प्रति चाहत है. उस का भी नाजायज रिश्ता फैजान से हो सकता है.

सच्चाई जानने के बावजूद दिलदार ने एक बार फिर भाभी जिकरा परवीन व फैजान को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे दोनों नहीं माने और मनमानी करते रहे. बहन को समझाया तो वह अपनी भाभी का ही पक्ष लेने लगी. इतना ही नहीं, उस ने दोनों के नाजायज रिश्तों को भी नकार दिया. अपने आप को भी पाकीजा बताया. दिलदार तब समझ गया कि बहन मन्नू भी फैजान के प्रेमजाल में फंस चुकी है. भाभी जिकरा परवीन ने खानदान की इज्जत को खाक में मिलाया था और दोस्त मोहम्मद फैजान ने दोस्ती का छुरा उस की पीठ में घोंपा था, इसलिए दिलदार ने उन दोनों को सबक सिखाने की ठान ली. बहन के प्रेम संबंधों पर भी उसे शक था, अत: उसे भी सबक सिखाने का निश्चय किया.

16 जनवरी, 2026 की दोपहर दिलदार अपनी योजना के तहत हसवा कस्बे के बाजार पहुंचा. वहां उस ने एक दुकान से तेज धार वाला चापडऩुमा चाकू 500 रुपए में खरीदा और उसे कमर में खोंस कर रख लिया. इस के बाद शराब ठेके पर जा कर उस ने शराब पी, साथ ही शराब का एक क्वार्टर और खानेपीने का सामान सुरक्षित कर लिया.

दोपहर बाद लगभग 3 बजे दिलदार अपने दोस्त मोहम्मद फैजान के घर पहुंचा. उस समय वह घर पर ही था. दिलदार उसे क्रिकेट खेलने के बहाने करबला के पास बगीचे में ले गया. कुछ दूरी पर बगीचे में लड़के क्रिकेट खेल रहे थे. दिलदार ने फैजान से कहा कि पहले शराब पी कर मूड बना लेते हैं, फिर क्रिकेट खेलने चलेंगे. इस के बाद दोनों ने बगीचे में बैठ कर शराब पी.

नशा हावी होने पर दिलदार ने उस से पूछा, ”दोस्त, सचसच बताना कि भाभीजान से तुम्हारा नाजायज रिश्ता है या नहीं? क्या मेरी बहन से भी तुम्हारे ताल्लुकात हैं?’’

”तुम्हारी भाभी और मेरे बीच वही रिश्ता है जो एक बीवीशौहर के बीच होता है. तुम्हारी बहन से भी मेरे प्रेम संबंध हैं. वह भी मुझ पर जान छिड़कती है.’’ फैजान ने नशे में सच्चाई बयां कर दी.

जिकरा परवीन के अवैध संबंध से बेहद खफा था देवर दिलदार

फैजान की बात सुन कर दिलदार के तनबदन में आग लग गई. उस पर खून का भूत सवार हो गया. उस ने कमर में खोंसा चाकू निकाला और फैजान के गले पर वार कर दिया. फैजान जान बचा कर भागा, लेकिन चंद कदम की दूरी पर लडख़ड़ा कर गिर पड़ा. उस के बाद दिलदार ने फैजान के गले पर 2 और वार कर उस का गला रेत दिया.

फैजान कुछ देर तड़पा, फिर उस ने दम तोड़ दिया. हत्या किए जाने की भनक न क्रिकेट खेल रहे लड़कों को लगी और न ही किसी अन्य को. फैजान की हत्या करने के बाद दिलदार हाथ में खून सना चाकू लहराते हुए अपने घर पहुंचा. उस के सिर पर खून का भूत सवार था.

घर में उस समय उस की भाभी जिकरा परवीन व बहन मौजूद थी. अम्मी व छोटी बहन किसी काम से पड़ोस में गई थीं. घर में घुसते ही वह चीखा, ”भाभी… ओ भाभी…’’

2 खून के बाद…

दिलदार के चीखने की आवाज सुन कर जिकरा परवीन कमरे से बाहर आ गई. उसे देख कर दिलदार बोला, ”भाभी, मैं ने तुम्हारे यार फैजान को तो उस की सही जगह में पहुंचा ही दिया है. अब तुम्हारी बारी है.’’

देवर के रूप में साक्षात मौत को सामने देख कर जिकरा परवीन सिर से पांव तक कांप उठी. वह जान बचा कर छत की तरफ भागी, लेकिन दिलदार ने उसे आंगन में ही पकड़ लिया. फिर उस ने उस की पीठ व गरदन पर चाकू से कई प्रहार किए. जिकरा परवीन खून से सराबोर हो कर जमीन पर गिर पड़ी. कुछ पल बाद ही उस ने दम तोड़ दिया. इसी बीच भाभी की चीख सुन कर मन्नू उसे बचाने आई तो दिलदार उस पर भी टूट पड़ा और चाकू से हाथ, सिर व गरदन पर वार कर उसे घायल कर दिया.

मन्नू भी खून से लथपथ हो कर आंगन में धराशाई हो गई. कुछ देर बाद मांबेटी वापस आईं तो घर में खूनी खेल देख कर उन की रूह कांप गई. इस के बाद तो घरमोहल्ले में कोहराम मच गया. इसी बीच फैजान की लाश आम के बाग में पड़ी होने की खबर लगी तो मोहल्ले के लोग वहां पहुंच गए.

फेमिली वालों ने फैजान का शव देखा तो उन की चीखें गूंजने लगीं. उन की चीखों से लोगों का कलेजा कांप उठा. मृतका जिकरा परवीन के पेरेंट्स को मौत की खबर लगी तो वे भी आ गए और बेटी का शव देख कर बिलख पड़े.

इधर डबल मर्डर करने के बाद दिलदार कुरैशी हसवा कस्बा चौकी पहुंचा. उस समय चौकी इंचार्ज वी.के. सिंह वहां मौजूद थे. दिलदार उन के पास पहुंचा और बोला, ”सर, मैं ने उन दोनों को मार डाला है.’’

दिलदार की बात सुन कर वी.के. सिंह चौंक पड़े, ”तूने किसे मार दिया? कहीं नशे में तो बकबक नहीं कर रहा है?’’

”सर, मैं नशे में जरूर हूं. लेकिन जो कह रहा हूं, वह सच है. मैं ने सचमुच अपनी भाभी जिकरा परवीन व उस के आशिक फैजान को मार डाला है. भाभी की लाश हमारे घर में तथा फैजान की लाश आम के बाग में पड़ी है. यकीन न हो तो जा कर देख लो. भाभी को बचाने आई अपनी बहन पर भी हमला किया. पता नहीं वह जिंदा है या वह भी मर गई?’’

रूह कपा देने वाली दिलदार की बात सुन कर चौकी इंचार्ज वी.के. सिंह ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया. इस के बाद डबल मर्डर की सूचना असोथर थाने के एसएचओ राजेंद्र सिंह को दी. सूचना पाते ही राजेंद्र सिंह पुलिस बल के साथ हसवा कस्बा आ गए और चौधराना मोहल्ला स्थित घटना वाले मकान पर जा पहुंचे. उस समय वहां भीड़ जुटी थी.

जिकरा परवीन के घर के बाहर जमा भीड़

मामले की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने डबल मर्डर की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी और निरीक्षण में जुट गए. घर के अंदर आंगन में एक महिला की लाश पड़ी थी, जबकि दूसरी युवती घायल अवस्था में पड़ी थी. राजेंद्र सिंह ने घायल युवती को इलाज के लिए जिला अस्पताल भिजवाया, लेकिन हालत गंभीर होने के कारण उसे हैलट अस्पताल कानपुर रेफर किया गया.

बाग में मिली लाश

एसएचओ राजेंद्र सिंह अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी अनूप कुमार सिंह, एएसपी महेंद्र पाल सिंह तथा सीओ (थरियांव) वीर सिंह पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया.

बाग में मिली मोहम्मद फैजान की लाश 

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. घर के अंदर आंगन में मृतका जिकरा परवीन खून से लथपथ पड़ी थी. उस की पीठ पर 3 घाव तथा गले पर 5 घाव थे. बदन के सारे कपड़े खून से सने थे. फर्श पर भी खून फैला था. मृतका की उम्र 25 वर्ष के आसपास थी. फोरैंसिक टीम ने भी घटनास्थल से सबूत जुटाए. मृतका जिकरा परवीन के ससुरालीजन मौके से फरार हो गए थे, लेकिन उस की अम्मी तहरून निशा व अब्बू फकीरे वहां मौजूद थे. वे दोनों बेटी के शव के पास बिलख रहे थे.

पुलिस अधिकारियों ने उन दोनों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि बेटी का शाम 4 बजे फोन आया था. तब उस ने कहा था कि उसे आ कर ले जाओ. लेकिन देर शाम खबर लगी कि बेटी के देवर दिलदार ने उस की हत्या कर दी और बहन को घायल कर दिया है. पता नहीं मेरी बेटी ने ऐसा कौन सा गुनाह किया था, जो उसे मार डाला. गुनहगार को सख्त सजा मिलनी चाहिए.

इस के बाद पुलिस अधिकारी आम के बगीचे में पहुंचे, जहां मोहम्मद फैजान की लाश पड़ी थी. लाश के पास मृतक के फेमिली वाले बिलख रहे थे. पुलिस अधिकारियों ने उन्हें सांत्वना दी, फिर बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र 27 वर्ष के आसपास थी. उस की हत्या बेरहमी से की गई थी. उस के गले में 3 बड़े घाव थे. चाकू से गला रेता गया था. कपड़ेे खून से तरबतर थे. जमीन पर भी खून था.

पुलिस अधिकारियों ने मृतक के अब्बू रुआब व चाचा मोहम्मद शमीम से घटना के बारे में पूछताछ की. इस पर उन्होंने बताया कि फैजान और दिलदार दोस्त थे. उन की दोस्ती नफरत में क्यों बदल गई, उन्हें पता नहीं. लेकिन हत्या के बाद पता चला कि दिलदार को शक था कि उस की भाभी और फैजान के बीच नाजायज रिश्ता था. शायद इसी शक में उस ने डबल मर्डर कर दिया. मृतक व मृतका के फेमिली वालों से पूछताछ के बाद एसपी अनूप कुमार सिंह ने एसएचओ राजेंद्र सिंह को आदेश दिया कि वह दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद आरोपी दिलदार कुरैशी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार करें.

एसपी के आदेश पर एसएचओ राजेेंद्र सिंह ने जिकरा परवीन व मोहम्मद फैजान के शव पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल फतेहपुर भेज दिए. इस के बाद फैजान के अब्बू रुआब उर्फ राजू की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103(1) के तहत दिलदार कुरैशी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस की जांच, आरोपी के बयानों एवं मृतकों के परिजनों से की गई पूछताछ के आधार पर इश्क के खूनी खेल की जो सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई, इस प्रकार है.

दोनों भाई थे अपराधी

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर शहर का एक मुसलिम बाहुल्य मोहल्ला है— पीरनपुर. इसी मोहल्ले में फकीरे अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी तहरून निशा के अलावा 3 बेटियां थीं, जिस में जिकरा परवीन सब से छोटी थी. दोनों बड़ी बेटियों का निकाह हो चुका था. फकीरे छोटामोटा कामधंधा कर अपने परिवार का भरणपोषण करता था.

मृतका जिकरा परवीन की अम्मी तहरून

फकीरे की बेटी जिकरा परवीन अपनी बहनों में सब से खूबसूरत और होशियार थी. उस ने मोहल्ले के मदरसे से हाईस्कूल तक तालीम हासिल की थी. जिकरा परवीन 18 साल की हो गई थी. पेरेंट्स की अब एक ही ख्वाहिश थी कि जल्दी से कोई अच्छा लड़का देख कर उस का निकाह कर दिया जाए. इस के लिए फकीरे ने खोजबीन शुरू की तथा नातेरिश्तेदारों से भी कहा. काफी प्रयास के बाद एक रिश्तेदार ने मोहम्मद आमिर उर्फ बल्लू का नाम सुझाया.

आमिर उर्फ बल्लू के वालिद वाजिद कुरैशी, फतेहपुर जनपद के थरियांव थाने के हसवा कस्बे के चौधराना मोहल्ले में रहते थे. उन के परिवार में बीवी शकीला के अलावा 6 बेटे व 3 बेटियां थीं. उन का एक बेटा विदेश में था. वाजिद के 2 बेटे आमिर उर्फ बल्लू व दिलदार उस के साथ रहते थे. दोनों पशुओं की खरीदफरोख्त का व्यापार करते थे. आमिर व दिलदार दोनों अविवाहित थे.

अस्पताल में उपचाराधीन दिलदार की छोटी बहन मन्नू और मृतक फैजान के रोतेबिखलते फैमिली वाले

फकीरे ने जब आमिर उर्फ बल्लू को देखा तो उस ने उसे अपनी बेटी जिकरा परवीन के लिए पसंद कर लिया. इस के बाद 13 जून, 2019 को फकीरे ने जिकरा परवीन का निकाह आमिर उर्फ बल्लू के साथ कर दिया. जिकरा परवीन बेहद खूबसूरत थी. ससुराल में उस का चांद सा मुखड़ा जिस ने भी देखा, उसी ने उस के रूपयौवन की तारीफ की. आमिर उर्फ बल्लू भी खूबसूरत बीवी पा कर खुश था. उस ने कभी सोचा नहीं था कि उसे इतनी खूबसूरत बीवी मिलेगी.

निकाह के बाद जिकरा परवीन और आमिर ने बड़े प्यार से जिंदगी की शुरुआत की. दोनों एकदूसरे को बेहद चाहते थे. इसी चाहत में 3 साल कब बीत गए, पता ही न चला. इन 3 सालों में जिकरा परवीन 3 बेटियों की मां बन गई.

भाभी जिकरा परवीन और उस के प्रेमी मौहम्मद फैजान की हत्या का आरोपी दिलदार कुरैशी 

मोहम्मद आमिर उर्फ बल्लू अपने भाई दिलदार के साथ पशुओं के खरीदनेबेचने का व्यापार करता था. दोनों भाई अपराधी प्रवृत्ति के थे. उन का अकसर किसी न किसी से झगड़ा होता रहता था. थाना थरियांव में दोनों के खिलाफ मारपीट, हत्या का प्रयास, आम्र्स ऐक्ट व गोवध निवारण अधिनियम के तहत कई मुकदमे दर्ज थे. थरियांव थाने में दोनों भाइयों की हिस्ट्रीशीट खुली थी. पुलिस ने जब दोनों भाइयों पर शिकंजा कसा तो वह उत्तर प्रदेश के बजाय मध्य प्रदेश जा कर पशु तसकरी करने लगे. आमिर उर्फ बल्लू अब 2-4 माह में एक बार घर आता और कुछ दिन रह कर वापस चला जाता.

इसी तरह दिलदार भी घर आता और फिर कुछ माह रह कर भाई आमिर के पास चला जाता. दोनों भाइयों को सदैव पुलिस का डर बना रहता था. दिलदार कुरैशी का एक दोस्त था मोहम्मद फैजान. वह भी हसवा कस्बा के चौधराना मोहल्ले में रहता था. उन के घरों के बीच मात्र 200 मीटर का फासला था. फैजान के अब्बू रुआब उर्फ राजू टेलर थे.

रुआब के परिवार में पत्नी रोशन बानो के अलावा 2 बेटे मोहम्मद फैजान, मोहम्मद अरमान तथा 2 बेटियां थीं. रुआब खुद तो रायबरेली में रहते थे और वहीं टेलङ्क्षरग का काम करते थे, जबकि उन का परिवार हसवा कस्बे में ही रहता था. दिलदार और फैजान एक ही गली में खेलकूद कर बड़े हुए थे. दोनों बचपन के दोस्त थे. हाईस्कूल तक उन्होंने साथ ही पढ़ाई की थी. लेकिन दिलदार जब हाईस्कूल में फेल हो गया तो उस ने पढ़ाई बंद कर दी. इस के बाद वह अपराधिक गतिविधियों में लग गया.

लेकिन फैजान होनहार युवक था. उस ने इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ठाकुर युगराज सिंह महाविद्यालय में बीएससी में प्रवेश ले लिया था. वह पढ़ाई पूरी कर विदेश (सऊदी अरब) जाना चाहता था. दिलदार और फैजान के बीच गहरी दोस्ती थी. दोनों साथ खातेपीते व उठतेबैठते थे. उन को क्रिकेट खेलने का भी शौक था. दिलदार शराब का लती था. उस ने फैजान को भी इस की लत लगा दी थी. दिलदार तो इतना लती हो गया था कि जब उसे शराब नहीं मिलती तो वह नशे का इंजेक्शन लगा लेता था.

दोस्ती के नाते फैजान का दिलदार के घर आनाजाना लगा रहता था. घर आतेजाते ही एक रोज फैजान की नजर दिलदार की खूबसूरत भाभी जिकरा परवीन पर पड़ी. वह उसे चाहत भरी नजरों से देखता रहा और उस से रसभरी बातें करता रहा. जिकरा परवीन अब उस के दिल में रचबस गई थी और वह उस से प्यार करने लगा था.

खूबसूरती पर फिदा

जिकरा परवीन की खूबसूरती ने फैजान के दिल में हलचल मचा दी थी. अत: वह खिंचा हुआ उस के घर आ जाता था. जिकरा परवीन भी हंसतीबोलती थी. चूंकि दोनों ने आपस में देवरभाभी का रिश्ता बना रखा था, इसलिए उन में हंसीमजाक भी हो जाता था. एक रोज ऐसे ही हंसीमजाक के दौर में फैजान बोला, ”भाभी, तुम बहुत खूबसूरत हो. जी चाहता है कि…’’

फैजान के इतना कहने पर जिकरा परवीन ने मादक आंखों से उसे देखा और मुसकरा कर बोली, ”तुम्हारा क्या जी चाहता है फैजान?’’

”यही कि तुम्हारा चांद जैसा चेहरा हमेशा मेरी आंखों के सामने रहे.’’ फैजान ने दिल की बात जुबां पर ला दी.

”अच्छा,’’ जिकरा परवीन हंसने लगी, ”मैं तुम्हें इतनी हसीन लगती हूं.’’

”हां भाभी,’’ फैजान जिकरा परवीन का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोला.

जिकरा परवीन का शौहर आमिर मध्य प्रदेश में पड़ा रहता था, अत: वह पुरुष सुख से वंचित थी. ऐसे में जवान फैजान का घर आना उस को अच्छा लगता था. उस की रसीली बातें उस के दिल में गुदगुदी पैदा करती थीं. अब उस की उमंगें भी छलांग मारने लगी थीं. वह भी फैजान की ओर आकर्षित होने लगी थी.

मौहम्मद फैजान और दिलदार के बीज जबरदस्त याराना था, लेकिन भाभी के साथ अवैध संबंधो ने जानी दुश्मन बना दिया

धीरेधीरे जिकरा परवीन और फैजान के दिल नजदीक आते गए. उन के बीच की दूरियां सिमटती गईं. एक रोज फैजान ने मुसकरा कर जिकरा परवीन की आंखों में देखा तो उन में उसे अजीब सी प्यास मचलती नजर आई. उस से रहा नहीं गया तो उस ने उसे बांहों में भर लिया. फिर तो तूफान तभी थमा, जब दोनों की हसरतें पूरी हुईं.

इस के बाद अकसर दोनों का मिलन होने लगा. दिलदार की बहन को भी फैजान का घर आना और बतियाना अच्छा लगता था. अत: वह भाभी की वफादार बन गई. वह भी फैजान को पसंद करती थी. वह फैजान के घर आनेजाने की जानकारी परिवार के किसी अन्य सदस्य को नहीं देती थी. जुलाई 2025 में दिलदार मध्य प्रदेश से आ कर घर में रहने लगा. आते ही दोनों के बीच दोस्ती फिर से कायम हो गई. दोनों की महफिल भी सजने लगी. कभीकभी फैजान और दिलदार की महफिल दिलदार के घर पर ही जम जाती. 2 महीने तक सब कुछ सामान्य रहा.

एक दिन दिलदार कुरैशी शाम को घर में दाखिल हुआ तो उस की नजर कमरे में बैठे मोहम्मद फैजान पर पड़ी. वह उस की भाभी जिकरा परवीन से हंसीठिठोली कर रहा था. जिकरा परवीन भी उस की बातों में सराबोर थी.

यह देख कर दिलदार का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. वह दांत पीसते हुए बोला, ”भाभीजान, अपने यार से ही बतियाती रहोगी या फिर अपने देवर को भी चायपानी को पूछोगी.’’

दिलदार का कटाक्ष जिकरा परवीन के मन में कांटे की तरह चुभ गया. अत: वह गुस्से से बोली, ”कैसी बातें करते हो दिलदार? थोड़ा सोचसमझ कर बोला करो. मोहम्मद फैजान मेरा यार नहीं, गलीटोले के नाते देवर लगता है. वैसे भी फैजान तुम्हारा ही दोस्त है. तुम्हीं उस के साथ उठतेबैठते हो. गपशप लड़ाते हो और महफिल भी जमाते हो. दोष तुम्हारा और लांछन मुझ पर लगाते हो. उस का यहां आना तुम्हें इतना ही बुरा लगता है तो बेइज्जत कर के भगा दो, ताकि दोबारा इधर न आए.’’

”भाभीजान, तुम्हारी लोमड़ी वाली चाल को मैं अच्छी तरह समझता हूं. तुम चाहती हो कि मैं उस का बुरा बन जाऊं और तुम उस की भली बनी रहो. मैं भी उड़ती चिडिय़ा के पर गिन लेता हूं. तुम्हारे दिल में फैजान के लिए जो मोहब्बत है, उसे मैं अच्छी तरह जानता हूं. तुम्हारी ही वजह से यह बेशर्मों की तरह चला आता है. मुझ से मिलने का तो बहाना होता है.’’

दिलदार और जिकरा परवीन की बहस की भनक फैजान के कानों में पड़ी तो वह कमरे से निकल कर आंगन में आ गया और बोला, ”दिलदार भाई, लगता है तुम किसी से लड़ कर आए हो. इसलिए तुम्हारा मूड ठीक नहीं है और सारा गुस्सा भाभीजान पर उतार रहे हो. लेकिन दोस्त, तुम चिंता मत करो. तुम्हारा मूड ठीक करने के लिए मैं साथ में लालपरी लाया हूं. हलक में उतरते ही मूड ठीक हो जाएगा.’’

दिलदार कुरैशी शराब का लती था. फैजान ने शराब लाने की बात कही तो उस का सारा गुस्सा जाता रहा.

वह खुशी का इजहार करते हुए बोला, ”फैजान भाई, मैं भाभी से बहस नहीं कर रहा था, खानेपीने का सामान लाने की बात हो रही थी.’’ उस के बाद उस ने हांक लगाई, ”भाभीजान, कमरे में पानी, गिलास, नमकीन का इंतजाम कर दो. हम दोनों महफिल सजाएंगे.’’

देवर की हांक सुन कर जिकरा परवीन मन ही मन बुदबुदाई, ”कैसा देवर है. कुछ देर पहले चरित्र पर लांछन लगा रहा था, अपने दोस्त को भलाबुरा कह रहा था और अब देखो, शराब पार्टी की बात सुन कर कैसा गिरगिट की तरह रंग बदलने लगा है.’’

जिकरा परवीन ने कमरे में पानी, गिलास, नमकीन का इंतजाम किया. उस के बाद दिलदार और फैजान शराब पीने लगे. शराब पीते वक्त फैजान की निगाहें जिकरा परवीन पर ही टिकी रहीं. जिकरा परवीन भी मंदमंद मुसकरा कर फैजान का नशा बढ़ाती रही. दिलदार को मोहम्मद फैजान का घर आनाजाना नागवार लगता था, लेकिन गहरी दोस्ती के चलते वह फैजान से कुछ कह नहीं पाता था. हालांकि उस ने कई बार इस बाबत फैजान से टोकाटाकी की थी, लेकिन फैजान उस की बात अनसुनी कर जाता था.

दिलदार ने भाभी जिकरा परवीन को भी समझाया था और खानदान की इज्जत की दुहाई दी थी, लेकिन उस पर भी कोई असर नहीं पड़ रहा था. दिलदार कुरैशी को अब शक होने लगा था कि भाभी और दोस्त फैजान के बीच नाजायज रिश्ता है. दोनों मौका पा कर रंगरलियां मनाते हैं. शक का बीज दिलदार के मन में पड़ा तो उसे पनपते देर न लगी.

लेकिन शक के आधार पर वह कोई भी फैसला नहीं लेना चाहता था. वह दोनों को रंगेहाथ पकडऩा चाहता था, अत: वह चोरीछिपे दोनों पर नजर रखने लगा. उस ने अपना शक किसी को भी जाहिर नहीं होने दिया. अपनी योजना के तहत दिलदार कुरैशी ने 16 जनवरी, 2026 को बारीबारी से दोनों की हत्या कर दी और बहन को भी जख्मी कर दिया. इस के बाद पुलिस के समक्ष समर्पण कर दिया.

17 जनवरी, 2026 को पुलिस ने आरोपी दिलदार कुरैशी को फतेहपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक आरोपी की बहन कानपुर के हैलट अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही थी. Love Crime

 

 

प्रेमिका की कब्र पर आम का पेड़

प्रेमिका की कब्र पर आम का पेड़ – भाग 3

समरजीत दीपा को जीजान से चाहता था, इसलिए उसे पत्नी पर विश्वास था. लेकिन उसे इस बात की भनक तक नहीं लगी कि उस के विश्वास को धता बता कर वह क्या गुल खिला रही है. कहते हैं कि कोई भी गलत काम ज्यादा दिनों तक छिपाया नहीं जा सकता. एक न एक दिन किसी तरीके से वह लोगों के सामने आ ही जाता है.

दीपा की आशिकमिजाजी भी एक दिन समरजीत के सामने आ गई. हुआ यह था कि एक बार समरजीत की रात की ड्यूटी लगी थी. वह शाम 7 बजे ही घर से चला गया था. दीपा को पता था कि पति की ड्यूटी रात 8 बजे से सुबह 8 बजे तक की है. जब भी पति की रात की ड्यूटी होती थी, दीपा प्रेमी को रात 10 बजे के करीब अपने कमरे पर बुला लेती थी. मौजमस्ती करने के बाद वह रात में ही चला जाता था. उस दिन भी उस ने अपने प्रेमी को घर बुला लिया.

रात 11 बजे के करीब समरजीत की तबीयत अचानक खराब हो गई. ड्यूटी पर रहते वह आराम नहीं कर सकता था. वह चाहता था कि घर जा कर आराम करे. लेकिन उस समय घर जाने के लिए उसे कोई सवारी नहीं मिल रही थी. इसलिए उस ने अपने एक दोस्त से घर छोड़ने को कहा. तब दोस्त अपनी मोटरसाइकिल से उसे उस के कमरे के बाहर छोड़ आया.

समरजीत ने जब अपने कमरे का दरवाजा खटखटाया तो प्रेमी के साथ गुलछर्रे उड़ा रही दीपा दरवाजे की दस्तक सुन कर घबरा गई. उस के मन में विचार आया कि पता नहीं इतनी रात को कौन आ गया. प्रेमी को बेड के नीचे छिपने को कह कर उस ने अपने कपड़े संभाले और बेमन से दरवाजे की तरफ बढ़ी.

जैसे ही उस ने दरवाजा खोला, सामने पति को देख कर वह चौंक कर बोली, ‘‘तुमऽऽ, आज इतनी जल्दी कैसे आ गए?’’

‘‘आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है इसलिए ड्यूटी बीच में ही छोड़ कर आ गया.’’ समरजीत कमरे में घुसते हुए बोला.

कमरे में बेड के नीचे दीपा का प्रेमी छिपा हुआ था. दीपा इस बात से डर रही थी कि कहीं आज उस की पोल न खुल जाए. समरजीत की तो तबीयत खराब थी. वह जैसे ही बेड पर लेटा, उसी समय बेड के नीचे से दीपा का प्रेमी निकल कर भाग खड़ा हुआ. अपने कमरे से किसी आदमी को निकलते देख समरजीत चौंका. वह उस की सूरत नहीं देख पाया था. समरजीत उस भागने वाले आदमी को भले ही नहीं जानता था, लेकिन उसे यह समझते देर नहीं लगी कि उस की गैरमौजूदगी में यह आदमी कमरे में क्या कर रहा होगा.

वह गुस्से में भर गया. उस ने पत्नी से पूछा, ‘‘यह कौन था और यहां क्यों आया था?’’

‘‘पता नहीं कौन था. कहीं ऐसा तो नहीं कि वह चोर हो. कोई सामान चुरा कर तो नहीं ले गया.’’ दीपा ने बात घुमाने की कोशिश करते हुए कहा और संदूक का ताला खोल कर अपना कीमती सामान तलाशने लगी.

तभी समरजीत ने कहा, ‘‘तुम मुझे बेवकूफ समझती हो क्या? मुझे पता है कि वह यहां क्यों आया था. उसे जो चीज चुरानी थी, वह तुम ने उसे खुद ही सौंप दी. अब बेहतर यह है कि जो हुआ उसे भूल जाओ. आइंदा यह व्यक्ति यहां नहीं आना चाहिए. और न ही ऐसी बात मुझे सुनने को मिलनी चाहिए.’’

पति की नसीहत से दीपा ने राहत की सांस ली. समरजीत तबीयत खराब होने पर घर आराम करने आया था, लेकिन आराम करना भूल कर वह रात भर इसी बात को सोचता रहा कि जिस दीपा के लिए उस ने अपना गांव छोड़ा, उसे पत्नी बनाया, उसी ने उस के साथ इतना बड़ा विश्वासघात क्यों किया. वह इस बात को अच्छी तरह जानता था कि जब कोई भी महिला एक बार देहरी लांघ जाती है तो उस पर विश्वास करना मूर्खता होती है.

अगले दिन जब वह ड्यूटी पर गया तो वहां भी उस का मन नहीं लगा. उस के मन में यही बात घूम रही थी कि दीपा अपने यार के साथ गुलछर्रे उड़ा रही होगी. घर लौटने के बाद उस ने अपने भाइयों अरविंद और धर्मेंद्र से दीपा के बारे में बात की. यह बात उस ने अपने मामा नरेंद्र को भी बताई.

उन सभी ने फैसला किया कि ऐसी कुलच्छनी महिला की चौकीदारी कोई हर समय तो कर नहीं सकता. इसलिए उसे खत्म करना ही आखिरी रास्ता है. दीपा को खत्म करने का फैसला तो ले लिया, लेकिन अपना यह काम उसे कहां और कब करना है, इस की उन्होंने योजना बनाई.

काफी सोचनेसमझने के बाद उन्होंने तय किया कि दीपा को दिल्ली में मारना ठीक नहीं रहेगा, क्योंकि लाख कोशिशों के बाद भी वह दिल्ली पुलिस से बच नहीं पाएंगे. अपने जिला क्षेत्र में ले जा कर ठिकाने लगाना उन्हें उचित लगा.

समरजीत को पता था कि दीपा सुलतानपुर जाने के लिए आसानी से तैयार नहीं होगी. उसे झांसे में लेने के लिए उस ने एक दिन कहा, ‘‘दीपा, सुलतानपुर के ही नगईपुर में मेरे मामा रहते हैं. उन के कोई बच्चा नहीं है और उन के पास जमीनजायदाद भी काफी है. उन्होंने हम दोनों को अपने यहां रहने के लिए बुलाया है. तुम्हें तो पता ही है कि दिल्ली में हम लोगों का गुजारा बड़ी मुश्किल से हो रहा है. इसलिए मैं चाहता हूं कि हम लोग कुछ दिन मामा के घर पर रहें.’’

पति की बात सुन कर दीपा ने भी सोचा कि जब उन की कोई औलाद नहीं है तो उन के बाद सारी जायदाद पति की ही हो जाएगी. इसलिए उस ने मामा के यहां रहने की हामी भर दी.

23 दिसंबर, 2013 को समरजीत दीपा को ट्रेन से सुलतानपुर ले गया. उस के साथ दोनों भाई अरविंद और धर्मेंद्र भी थे. जब वे सुलतानपुर स्टेशन पहुंचे, अंधेरा घिर चुका था. नगईपुर सुलतानपुर स्टेशन से दूर था. नगईपुर गांव से पहले ही समरजीत के मामा नरेंद्र का आम का बाग था. प्लान के मुताबिक नरेंद्र उन का उसी बाग में पहले से ही इंतजार कर रहा था. बाग के किनारे पहुंच कर तीनों भाइयों ने दीपा की गला घोंट कर हत्या कर दी और बाग में ही गड्ढा खोद कर लाश को दफना दिया.

जिस गड्ढे में उन्होंने लाश दफन की थी, जल्दबाजी में वह ज्यादा गहरा नहीं खोदा गया था. नरेंद्र को इस बात का अंदेशा हो रहा था कि जंगली जानवर मिट्टी खोद कर लाश न खाने लगें. ऐसा होने पर भेद खुलना लाजिमी था इसलिए इस के 2 दिनों बाद नरेंद्र रात में ही अकेला उस बाग में गया और वहां से 20-25 कदम दूर दूसरा गहरा गड्ढा खोदा. फिर पहले गड्ढे से दीपा की लाश निकालने के बाद उस ने उसे उसी की शाल में गठरी की तरह बांध दिया.

उस गठरी को उस ने दूसरे गहरे गड्ढे में दफना कर उस के ऊपर आम का एक पेड़ लगा दिया ताकि किसी को कोई शक न हो. दीपा को ठिकाने लगाने के बाद वे इस बात से निश्चिंत थे कि उन के अपराध की किसी को भनक न लगेगी. यह जघन्य अपराध करने के बाद अरविंद और धर्मेंद्र पहले की ही तरह बनठन कर घूम रहे थे. उन को देख कर कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता था कि उन्होंने हाल ही में कोई बड़ा अपराध किया है.

गांव के ज्यादातर लोगों को पता था कि दीपा दिल्ली में समरजीत के साथ पत्नी की तरह रह रही है. जब उन्होंने समरजीत को गांव में अकेला देखा तो उन्होंने उस से दीपा के बारे में पूछा.

जब दीपा के पिता रामसनेही को भी जानकारी मिली कि समरजीत के साथ दीपा गांव नहीं आई है तो उस ने उस से बेटी के बारे में पूछा. तब समरजीत ने उसे झूठी बात बताई कि दीपा एक महीने पहले उस से झगड़ा कर के दिल्ली से गांव जाने की बात कह कर आ गई थी.

समरजीत की यह बात सुन कर रामसनेही घबरा गया था. फिर वह बेटी की छानबीन करने दिल्ली पहुंचा और बाद में दिल्ली के पुल प्रहलादपुर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

इस के बाद ही पुलिस अभियुक्तों तक पहुंची. पुलिस ने समरजीत, अरविंद, धर्मेंद्र और मामा नरेंद्र को अपहरण कर हत्या और लाश छिपाने के जुर्म में गिरफ्तार कर 9 जनवरी, 2013 को दिल्ली के साकेत न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी पवन कुमार की कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

प्रेमिका की कब्र पर आम का पेड़ – भाग 2

पुलिस ने लाश का मुआयना किया तो उस के गले पर कुछ निशान पाए गए. इस से अनुमान लगाया कि दीपा की हत्या गला घोंट कर की गई थी. मौके की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सुलतानपुर के पोस्टमार्टम हाऊस भेज दिया और चारों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर के दिल्ली ले आई.

थाना पुल प्रहलादपुर में समरजीत, अरविंद, धर्मेंद्र और इन के मामा नरेंद्र से जब पूछताछ की गई तो दीपा और समरजीत के प्रेमप्रसंग से ले कर मौत का तानाबाना बुनने तक की जो कहानी सामने आई, वह बड़ी ही दिलचस्प निकली.

उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर के थाना कूंड़ेभार में आता है एक गांव धनजई, इसी गांव में सूर्यभान सिंह परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे धर्मेंद्र, अरविंद और समरजीत थे. अरविंद और धर्मेंद्र शादीशुदा थे. दोनों भाई दिल्ली में ड्राइवर की नौकरी करते थे. समरजीत गांव में ही खेतीकिसानी करता था. वह खेती किसानी करता जरूर था, लेकिन उसे अच्छे कपड़े पहनने का शौक था.

वह जवान तो था ही. इसलिए उस का मन ऐसा साथी पाने के लिए बेचैन था, जिस से अपने मन की बात कह सके. इसी दौरान उस की नजरें दीपा से दोचार हुईं. दीपा रामसनेही की 20 वर्षीया बेटी थी. दीपा तीखे नयननक्श और गोल चेहरे वाली युवती थी. दीपा उस की बिरादरी की नहीं थी, फिर भी उस का झुकाव उस की तरफ हो गया. फिर दोनों के बीच बातों का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि वे दोनों एकदूसरे के करीब आते गए.

दोनों ही चढ़ती जवानी पर थे, इसलिए जल्दी ही उन के बीच शारीरिक संबंध बन गए. एकदूसरे को शरीर सौंपने के बाद उन की सोच में इस कदर बदलाव आया कि उन्हें अपने प्यार के अलावा सब कुछ फीका लगने लगा. उन्हें ऐसा लग रहा था, जैसे उन की मंजिल यहीं तक हो.

मौका मिलने पर दोनों खेतों में एकदूसरे से मिलते रहे. उन के प्यार को देख कर ऐसा लगता था, जैसे भले ही उन के शरीर अलगअलग हों, लेकिन जान एक हो. उन्होंने शादी कर के अपनी अलग दुनिया बसाने तक की प्लानिंग कर ली. घर वाले उन की शादी करने के लिए तैयार हो सकेंगे, इस का विश्वास दोनों को नहीं था. इस की वजह साफ थी कि दोनों की जाति अलगअलग थी और दूसरे दोनों एक ही गांव के थे.

घर वाले तैयार हों या न हों, उन्हें इस बात की फिक्र न थी. वे जानते थे कि प्यार के रास्ते में तमाम तरह की बाधाएं आती हैं. सच्चे प्रेमी उन बाधाओं की कभी फिक्र नहीं करते. वे परिवार और समाज के व्यंग्यबाणों और उन के द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को लांघ कर अपने मुकाम तक पहुंचने की कोशिश करते हैं.

समरजीत और दीपा भले ही सोच रहे थे कि उन का प्यार जमाने से छिपा हुआ है, लेकिन यह केवल उन का भ्रम था. हकीकत यह थी कि इस तरह के काम कोई चाहे कितना भी चोरीछिपे क्यों न करे, लोगों को पता चल ही जाता है. समरजीत और दीपा के मामले में भी ऐसा ही हुआ. मोहल्ले के कुछ लोगों को उन के प्यार की खबर लग गई.

फिर क्या था. मोहल्ले के लोगों से बात उड़तेउड़ते इन दोनों के घरवालों के कानों में भी पहुंच गई. समरजीत के पिता सूर्यभान सिंह ने बेटे को डांटा तो वहीं दूसरी तरफ दीपा के पिता रामसनेही ने भी दीपा पर पाबंदियां लगा दीं. उसे इस बात का डर था कि कहीं कोई ऐसीवैसी बात हो गई तो उस की शादी करने में परेशानी होगी.

कहते हैं कि प्यार पर जितनी बंदिशें लगाई जाती हैं, वह और ज्यादा बढ़ता है यानी बंदिशों से प्यार की डोर टूटने के बजाय और ज्यादा मजबूत हो जाती है. बेटी पर बंदिशें लगाने के पीछे रामसनेही की मंशा यही थी कि वह समरजीत को भूल जाएगी. लेकिन उस ने इस बात की तरफ गौर नहीं किया कि घर वालों के सो जाने के बाद दीपा अभी भी समरजीत से फोन पर बात करती है. यानी भले ही उस की अपने प्रेमी से मुलाकात नहीं हो पा रही थी, वह फोन पर दिल की बात उस से कर लेती थी.

एक बार रामसनेही ने उसे रात को फोन पर बात करते देखा तो उस ने उस से पूछा कि किस से बात कर रही है. तब दीपा ने साफ बता दिया कि वह समरजीत से बात कर रही है. इतना सुनते ही रामसनेही को गुस्सा आ गया और उस ने उस की पिटाई कर दी. रामसनेही ने सोचा कि पिटाई से दीपा के मन में खौफ बैठ जाएगा. लेकिन इस का असर उलटा हुआ. सन 2012 में दीपा समरजीत के साथ भाग गई.

समरजीत प्रेमिका को ले कर हरिद्वार में अपने एक परिचित के यहां चला गया. तब रामसनेही ने थाना कूंडे़भार में बेटी के गायब हेने की सूचना दर्ज करा दी.

चूंकि गांव से समरजीत भी गायब था. इसलिए लोगों को यह बात समझते देर नहीं लगी कि दीपा समरजीत के संग ही भागी है. तब रामसनेही ने गांव में पंचायत बुला कर पंचों की मार्फत समरजीत के पिता सूर्यभान सिंह पर अपनी बेटी को ढूंढ़ने का दबाव बनाया.

आज भी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ गांवों में पंचों की बातों का पालन किया जाता है. सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई मामलों में पंचायतों के फैसले सही भी होते हैं. अपनी मानमर्यादा और सामाजिक दबाव को देखते हुए लोग पंचों की बात का पालन भी करते हैं. पंचायती फैसले के बाद सूर्यभान सिंह ने अपने स्तर से समरजीत और दीपा को तलाशना शुरू किया. बाद में उसे पता लगा कि समरजीत और दीपा हरिद्वार में हैं तो वह उन दोनों को हरिद्वार से गांव ले आया.

दोनों के घर वालों ने उन्हें फिर से समझाया. समरजीत और दीपा कुछ दिनों तक तो ठीक रहे, इस के बाद उन्होंने फिर से मिलनाजुलना शुरू कर दिया. फिर वे दोनों अंबाला भाग गए. वहां पर समरजीत की बड़ी बहन रहती थी. समरजीत दीपा को ले कर बहन के यहां ही गया था. उस ने भी उन दोनों को समझाया. उस ने पिता को इस की सूचना दे दी. सूर्यभान सिंह इस बार भी उन दोनों को गांव ले आए.

बेटी के बारबार भागने पर रामसनेही और उस के परिवार की खासी बदनामी हो रही थी. अब उस के पास एक ही रास्ता था कि उस की शादी कर दी जाए. लिहाजा उस ने उस की फटाफट शादी करने का प्लान बनाया. वह उस के लिए लड़का देखने लगा.

दीपा को जब पता चला कि घर वाले उस की जल्द से जल्द शादी करने की फिराक में हैं तो उस ने आखिर अपनी मां से कह ही दिया कि वह समरजीत के अलावा किसी और से शादी नहीं करेगी. उस की इस जिद पर मां ने उस की पिटाई कर दी.

इस के बाद 27 फरवरी, 2013 को दीपा और समरजीत तीसरी बार घर से भाग गए. इस बार समरजीत उसे दिल्ली ले गया. दक्षिणपूर्वी दिल्ली के पुल प्रहलादपुर गांव में समरजीत के भाई धर्मेंद्र और अरविंद रहते थे. वह उन्हीं के पास चला गया. बाद में समरजीत और दीपा ने मंदिर में शादी कर ली. फिर उसी इलाके में कमरा ले कर पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

पुल प्रहलादपुर में रामसनेही के कुछ परिचित भी रहते थे. उन्हीं के द्वारा उसे पता चला कि दीपा समरजीत के साथ दिल्ली में रह रही है. खबर मिलने के बावजूद भी रामसनेही ने उसे वहां से लाना जरूरी नहीं समझा. वह जानता था कि दीपा घर से 2 बार भागी और दोनों बार उसे घर लाया गया था. जब वह घर रुकना ही नहीं चाहती तो उसे फिर से घर लाने से क्या फायदा.

समरजीत के भाई अरविंद और धर्मेंद्र ड्राइवर थे. जबकि समरजीत को फिलहाल कोई काम नहीं मिल रहा था. उस की गृहस्थी का खर्चा दोनों भाई उठा रहे थे. समरजीत भाइयों पर ज्यादा दिनों तक बोझ नहीं बनना चाहता था, इसलिए कुछ दिनों बाद ही एक जानकार की मार्फत ओखला फेज-1 स्थित एक सिक्योरिटी कंपनी में नौकरी कर ली. उस की चिंता थोड़ी कम हो गई.

दोनों की गृहस्थी हंसीखुशी से चल रही थी. चूंकि समरजीत सिक्योरिटी गार्ड के रूप में काम कर रहा था, इसलिए कभी उस की ड्यूटी नाइट की लगती थी तो कभी दिन की. वह मन लगा कर नौकरी कर रहा था. जिस वजह से वह पत्नी की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रहा था. इस का नतीजा यह निकला कि पास में ही रहने वाले एक युवक से दीपा के नाजायज संबंध बन गए.

प्रेमिका की कब्र पर आम का पेड़ – भाग 1

समरजीत करीब एक साल बाद दिल्ली से अपने भाइयों अरविंद और धर्मेंद्र के साथ गांव धनजई लौटा तो मोहल्ले वालों ने उस  में कई बदलाव देखे. उस के पहनावे और बातचीत में काफी अंतर आ चुका था. उस का बातचीत का तरीका गांव वालों से एकदम अलग था. इस से गांव वाले समझ गए कि दिल्ली में उस का काम ठीकठाक चल रहा है. धनजई गांव उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर के थाना कूंड़ेभार में पड़ता है.

देखने से ही लग रहा था कि समरजीत की हालत अब पहले से अच्छी हो गई है, लेकिन गांव वाले एक बात नहीं समझ पा रहे थे कि जब वह गांव से गया था तो गांव के ही रहने वाले रामसनेही की बेटी दीपा को भगा कर ले गया था. लेकिन उस के साथ दीपा दिखाई नहीं दे रही थी.

दरअसल, दीपा और समरजीत के बीच काफी दिनों से प्रेमसंबंध चल रहा था. जिस के चलते वह और दीपा करीब एक साल पहले गांव से भाग गए थे. बाद में रामसनेही को पता लगा कि समरजीत दीपा के साथ दक्षिणपूर्वी दिल्ली के पुल प्रहलादपुर गांव में रह रहा है.

गांव के ही लड़के के साथ बेटी के भाग जाने की बदनामी रामसनेही झेल रहा था. उसे जब पता लगा कि समरजीत के साथ दीपा नहीं आई है तो यह बात उसे कुछ अजीब सी लगी. बेटी को भगा कर ले जाने वाला समरजीत उस के लिए एक दुश्मन था. इस के बावजूद भी बेटी की ममता उस के दिल में जाग उठी. उस ने समरजीत से बेटी के बारे में पूछ ही लिया.

तब समरजीत ने बताया, ‘‘वह तो करीब एक महीने पहले नाराज हो कर दिल्ली से गांव चली आई थी. अब तुम्हें ही पता होगा कि वह कहां है?’’

यह सुन कर रामसनेही चौंका. उस ने कहा, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो? वो यहां आई ही नहीं है.’’

‘‘अब मुझे क्या पता वह कहां गई? आप अपनी रिश्तेदारियों वगैरह में देख लीजिए. क्या पता वहीं चली गई हो.’’

समरजीत की बात रामसनेही के गले नहीं उतरी. वह समझ नहीं पा रहा था कि समरजीत जो दीपा को कहीं देखने की बात कह रहा है, वह कहीं दूसरी जगह क्यों जाएगी? फिर भी उस का मन नहीं माना. उस ने अपने रिश्तेदारों के यहां फोन कर के दीपा के बारे में पता किया, लेकिन पता चला कि वह कहीं नहीं है. बात एक महीना पुरानी थी. ऐसे में वह बेटी को कहां ढूंढ़े. बेटी के बारे में सोचसोच कर उस की चिंता बढ़ती जा रही थी. यह बात दिसंबर, 2013 के आखिरी हफ्ते की थी.

समरजीत के साथ उस के भाई अरविंद और धर्मेंद्र भी गांव आए थे. रामसनेही ने दोनों भाइयों से भी बेटी के बारे में पूछा. लेकिन उन से भी उसे कोई ठोस जवाब नहीं मिला. 10-11 दिन गांव में रहने के बाद समरजीत दिल्ली लौट गया.

बेटी की कोई खैरखबर न मिलने से रामसनेही और उस की पत्नी बहुत परेशान थे. वह जानते थे कि समरजीत दिल्ली के पुल प्रहलादपुर में रहता है. वहीं पर उन के गांव का एक आदमी और रहता था. उस आदमी के साथ जनवरी, 2014 के पहले हफ्ते में रामसनेही भी पुल प्रहलादपुर आ गया.

थोड़ी कोशिश के बाद उसे समरजीत का कमरा मिल गया. उस ने वहां आसपास रहने वालों से बेटी दीपा का फोटो दिखाते हुए पूछा. लोगों ने बताया कि जिस दीपा नाम की लड़की की बात कर रहा है, वह 22 दिसंबर, 2013 तक तो समरजीत के साथ देखी गई थी, इस के बाद वह दिखाई नहीं दी है.

समरजीत ने रामसनेही को बताया था दीपा एक महीने पहले यानी नवंबर, 2013 में नाराज हो कर दिल्ली से चली गई थी, जबकि पुल प्रहलादपुर गांव के लोगों से पता चला था कि वह 22 दिसंबर, 2013 तक समरजीत के साथ थी. इस से रामसनेही को शक हुआ कि समरजीत ने उस से जरूर झूठ बोला है. वह दीपा के बारे में जानता है कि वह इस समय कहां है?

रामसनेही के मन में बेटी को ले कर कई तरह के खयाल पैदा होने लगे. उसे इस बात का अंदेशा होने लगा कि कहीं इन लोगों ने बेटी के साथ कोई अनहोनी तो नहीं कर दी. यही सब सोचते हुए वह 6 जनवरी, 2014 को दोपहर के समय थाना पुल प्रहलादपुर पहुंचा और वहां मौजूद थानाप्रभारी धर्मदेव को बेटी के गायब होने की बात बताई.

रामसनेही ने थानाप्रभारी को बेटी का हुलिया बताते हुए आरोप लगाया कि समरजीत और उस के भाइयों, अरविंद व धर्मेंद्र ने अपने मामा नरेंद्र, राजेंद्र और वीरेंद्र के साथ बेटी को अगवा कर उस के साथ कोई अप्रिय घटना को अंजाम दे दिया है. थानाप्रभारी धर्मदेव ने उसी समय रामसनेही की तहरीर पर भादंवि की धारा 365, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कराकर सूचना एसीपी जसवीर सिंह मलिक को दे दी.

मामला जवान लड़की के अपहरण का था, इसलिए एसीपी जसवीर सिंह मलिक ने थानाप्रभारी धर्मदेव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में इंसपेक्टर आर.एस. नरुका, सबइंसपेक्टर किशोर कुमार, युद्धवीर सिंह, हेडकांस्टेबल श्रवण कुमार, नईम अहमद, राकेश, कांस्टेबल अनुज कुमार तोमर, धर्म सिंह आदि को शामिल किया गया.

उधर दिल्ली में रह रहे समरजीत और उस के भाइयों को जब पता चला कि दीपा का बाप रामसनेही पुल प्रहलादपुर आया हुआ है तो तीनों भाई दिल्ली से फरार हो गए. पुलिस टीम जब उन के कमरे पर गई तो वहां उन तीनों में से कोई नहीं मिला.

चूंकि तीनों आरोपी रामसनेही के गांव के ही रहने वाले थे, इसलिए पुलिस टीम रामसनेही को ले कर यूपी स्थित उस के गांव धनजई पहुंची. लेकिन घर पर समरजीत और उस के घर वालों में से कोई नहीं मिला.

अब पुलिस को अंदेशा हो गया कि जरूर कोई न कोई गड़बड़ है, जिस की वजह से ये लोग फरार हैं. गांव के लोगों से बात कर के पुलिस ने यह पता लगाया कि इन के रिश्तेदार वगैरह कहांकहां रहते हैं, ताकि वहां जा कर आरोपियों को तलाशा जा सके.  इस से पुलिस को पता चला कि सुलतानपुर और फैजाबाद के कई गांवों में समरजीत के रिश्तेदार रहते हैं. उन रिश्तेदारों के यहां जा कर दिल्ली पुलिस ने दबिशें दीं, लेकिन वे सब वहां भी नहीं मिले.

दिल्ली पुलिस ने समरजीत के सभी रिश्तेदारों पर दबाव बनाया कि आरोपियों को जल्द से जल्द पुलिस के हवाले करें. उधर बेटी की चिंता में रामसनेही का बुरा हाल था. वह पुलिस से बारबार बेटी को जल्द तलाशने की मांग कर रहा था. समरजीत या उस के भाइयों से पूछताछ करने के बाद ही दीपा के बारे में कोई जानकारी मिल सकती थी. इसलिए दिल्ली पुलिस की टीम अपने स्तर से ही आरोपियों को तलाशती रही.

9 जनवरी, 2014 को पुलिस को सूचना मिली कि समरजीत सुलतानपुर के ही गांव नगईपुर, सामरी बाजार में रहने वाले अपने मामा के यहां आया हुआ है. खबर मिलते ही पुलिस नगईपुर गांव पहुंच गई. सूचना एकदम सही निकली. वहां पर समरजीत, उस के भाई अरविंद और धर्मेंद्र के अलावा उस का मामा नरेंद्र भी मिल गया.

चूंकि दीपा समरजीत के साथ ही रह रही थी, इसलिए पुलिस ने सब से पहले उसी से दीपा के बारे में पूछा. इस पर समरजीत ने बताया, ‘‘सर, नवंबर, 2013 में दीपा उस से लड़ झगड़ कर दिल्ली से अपने गांव जाने को कह कर चली आई थी. इस के बाद वह कहां गई, इस की उसे जानकारी नहीं है.’’

‘‘लेकिन पुल प्रहलादपुर में जहां तुम लोग रहते थे, वहां जा कर हम ने जांच की तो जानकारी मिली कि दीपा 23 दिसंबर, 2013 को दिल्ली में ही तुम्हारे साथ थी.’’ थानाप्रभारी धर्मदेव ने कहा तो समरजीत के चेहरे का रंग उड़ गया.

थानाप्रभारी उस का हावभाव देख कर समझ गए कि यह झूठ बोल रहा है. उन्होंने रौबदार आवाज में उस से कहा, ‘‘देखो, तुम हम से झूठ बोलने की कोशिश मत करो. दीपा के साथ तुम लोगों ने जो कुछ भी किया है, हमें सब पता चल चुका है. वैसे एक बात बताऊं, सच्चाई उगलवाने के हमारे पास कई तरीके हैं, जिन के बारे में तुम जानते भी होगे. अब गनीमत इसी में है कि तुम सारी बात हमें खुद बता दो, वरना…’’

इतना सुनते ही वह डर गया. वह समझ गया कि अगर सच नहीं बताया कि पुलिस बेरहमी से उस की पिटाई करेगी. इसलिए वह सहम कर बोला, ‘‘सर, हम ने दीपा को मार दिया है.’’

‘‘उस की लाश कहां है?’’ थाना प्रभारी ने पूछा.

‘‘सर, उस की लाश बाग में दफन कर दी है.’’ समरजीत ने कहा तो पुलिस चारों आरोपियों के साथ उस बाग में पहुंची, जहां उन्होंने दीपा की लाश दफन करने की बात कही थी. समरजीत के मामा नरेंद्र ने पुलिस को आम के बाग में वह जगह बता दी. लेकिन उस जगह तो आम का पेड़ लगा हुआ था. नरेंद्र ने कहा कि लाश इसी पेड़ के नीचे है.

उन लोगों की निशानदेही पर पुलिस ने वहां खुदाई कराई तो वास्तव में एक शाल में गठरी के रूप में बंधी एक महिला की लाश निकली. उस समय रामसनेही भी पुलिस के साथ था. लाश देखते ही वह रोते हुए बोला, ‘‘साहब यही मेरी दीपा है. देखो न इन्होंने मेरी बेटी का क्या हाल कर दिया. मुझे पहले ही इन लोगों पर शक हो रहा था. इन के खिलाफ आप सख्त से सख्त काररवाई कीजिए, ताकि ये बच न सकें.’’

वहां खड़े गांव वालों ने तसल्ली दे कर किसी तरह रामसनेही को चुप कराया. गांव वाले इस बात से हैरान थे कि समरजीत दीपा को बहुत प्यार करता था, जिस के कारण दोनों गांव से भाग गए थे. फिर समरजीत ने उस के साथ ऐसा क्यों किया?