Inspiring Story : वीडियो में छिपा मौत का रहस्य

Inspiring Story : महंत नरेंद्र गिरि का शिष्य आनंद गिरि बेहद शातिर था. उस की नजर मठ बाघंबरी गद्दी के साथसाथ मठ की करोड़ों की संपत्ति पर थी. तभी तो वह अपने गुरु महंत नरेंद्र गिरि को मानसिक रूप से प्रताडि़त करता रहता था. लेकिन अब उस के पास अपने गुरु का ऐसा कौन सा वीडियो था, जिस के वायरल होने से पहले ही महंत नरेंद्र गिरि ने दुनिया ही छोड़ दी. शिष्यों और महंतों के बीच तिकड़म को ले कर अयोध्या में एक संत ने कविता लिखी थी, ‘पैर दबा कर संत बने और गला दबाए महंत’. उन की कविता शिष्यों और महंतों के बीच आए दिन होने वाले विवादों पर पूरी तरह से खरी उतरती है.

मंदिर हो, मठ हो या आश्रम, सभी जगहों पर जमीन, जायदाद और सैक्स को ले कर षडयंत्र चलते रहते हैं. महंत नरेंद्र गिरि को डर था कि किसी लड़की के साथ उन की फोटो लगा कर बदनाम किया जा सकता है. इस के पहले भी वह डांस करने वाली लड़कियों पर पैसे लुटाते चर्चा में आ चुके थे. मानसम्मान का डर महंत की मौत का कारण बना. धर्म के नाम पर जहां जनता अपनी मेहनत का पैसा चढ़ावे में चढ़ाती है, वहां के लोग उस का किस तरह से भोग करते हैं, महंत की मौत के पीछे की कहानी से इसे समझा जा सकता है.

‘‘प्रकाश, महंतजी अभी अपने कमरे से बाहर नहीं आए. देख तो क्या बात है,’’ बाघंबरी मठ के सेवादार बबलू ने अपने साथी से कहा. बाघंबरी मठ प्रयागराज के अल्लापुर में स्थित है. यह प्रयागराज का सब से प्रभावशाली मठ है. प्रकाश और बबलू यहां सेवादार के रूप में काम करते हैं. ये दोनों अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और 75 वर्षीय महंत नरेंद्र गिरि के बारे में बात कर रहे थे. यह 20 सितंबर, 2021 के शाम लगभग 5 बजे की बात है.

‘‘बबलू, मैं कमरे के पास गया और आवाज दी. पर महंतजी ने कमरा नहीं खोला, न ही अंदर से कोई आवाज आ रही है.’’ प्रकाश वापस आ कर बोला. इस के बाद प्रकाश और बबलू अपने कुछ और सेवादार साथियों से इस बात को ले कर बात करने लगे. सेवादार साथी सोच रहे थे कि एसी की आवाज में महंतजी बाहर की आवाजें नहीं सुन पा रहे होंगे. इन लोगों ने सोचा कि यदि कमरे का एसी बंद कर दिया जाए तो शायद महंतजी उठ सकते हैं. यही सोच कर उन्होंने महंतजी के कमरे का एसी बाहर से बंद कर दिया. इस के बाद भी जब कोई हलचल कमरे के अंदर से नहीं हुई तो एक शिष्य बोला, ‘‘मंहतजी के मोबाइल पर काल करो.’’

‘‘नहीं, ऐसा मत करो, क्योंकि महंतजी ने फोन करने से मना किया था.’’ दूसरा साथी बोला.

‘‘कोई बात नहीं, अब उन के मोबाइल पर फोन कर के ही उन्हें जगाने का रास्ता बचता है. कहीं महंतजी किसी दिक्कतपरेशानी में न हों.’’ कह कर एक शिष्य ने उन के मोबाइल पर काल की. इस के बाद भी कोई जवाब नहीं मिला. ऐसे में अब शिष्यों के लिए धैर्य रखना संभव नहीं था. महंत नरेंद्र गिरि हर दोपहर करीब 12 बजे अपने शिष्यों के साथ पंगत करते थे. इस के बाद वह आश्रम में जाते थे. शाम 5 बजे वह वापस आते थे. 20 सितंबर, 2021 को भी यही सब हुआ था. शिष्यों  के साथ पंगत के बाद नरेंद्र गिरि अपने आश्रम में गए. वहां उन्होंने कुछ कागज लिए. अपने शिष्यों से कहा कि उन से मिलने कोई गेस्टहाउस में आ रहा है. इसलिए उन्हें फोन कर के परेशान न किया जाए.

दोपहर में सभी को लगा कि वह आराम कर रहे होंगे. जब शाम करीब 5 बजे तक उन का कोई हाल नहीं मिला तो मंदिर में खलबली मचने लगी. फोन करने पर कोई जवाब नहीं मिला. पहले शिष्यों ने दरवाजा खटखटाया. बाहर से एसी बंद कर दिया. इस के बाद भी जब वह बाहर नहीं निकले तो कमरे के दरवाजे को धक्का दे कर खोल दिया गया. कमरे का दृश्य देख कर शिष्यों की चीख निकल गई. कमरे के अंदर छत में लगे हुक में रस्सी के सहारे महंतजी लटके हुए थे. थोड़ी देर में वहां सन्नाटा छा गया. शिष्य बदहवास हालत में इधर से उधर भागने लगे. शिष्यों ने महंतजी के शव को शीघ्र ही उतार कर जमीन पर लिटा दिया, ताकि उन के जीवित बचने की संभावना तलाशी जा सके.

इस के बाद पुलिस को सूचना दी गई. करीब साढ़े 5 बजे वहां भारी संख्या में पुलिस पहुंच गई. आश्रम का मुख्यद्वार बंद कर दिया गया. महंत नरेंद्र गिरि के गले में फांसी के फंदे का निशान था. डीएम और एसएसपी ने पंचनामा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. जार्जटाउन थाने के इंसपेक्टर महेश सिंह ने बताया कि मठ से सूचना मिलने पर पुलिस आई. शव के पास ही पुलिस को सल्फास की गोलियां रखी मिलीं. उसे खोला नहीं गया था. शव के पास ही 13 पन्ने का एक सुसाइड नोट वसीयत की तरह लिखा मिला, जिसे पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. महंत नरेंद्र गिरि बहुत पंहुच वाले व्यक्ति थे. ऐसे में आईजी के.पी. सिंह, डीआईजी सर्वश्रेष्ठ त्रिपाठी और डीएम संजय खत्री भी वहां पहुंच गए थे. 6 बजे तक पूरे शहर और शहर के बाहर यह सूचना फैल गई थी.

वहां डेढ़ घंटे तक पुलिस ने छानबीन की. सुसाइड नोट के बारे में पुलिस ने बताया कि इस में महंतजी ने अपने सम्मान से जीने की बात कही है. महंत नरेंद्र गिरि का सुसाइड नोट मीडिया में वायरल हो गया. वसीयतनुमा सुसाइड नोट महंत नरेंद्र गिरि का यह सुसाइड नोट अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के लेटरहैड पर लिखा गया था. पहले 13 सितंबर, 2021 की तारीख लेटरहैड पर पड़ी थी. बाद में इसे काट कर नीचे 20 सितंबर किया गया था. टूटीफूटी हिंदी में यह लिखा गया था. इस में कई जगहों पर कटिंग भी हुई थी. अपने सुसाइड नोट में महंत नरेंद्र गिरि ने लिखा, ‘मैं महंत नरेंद्र गिरि मठ बाघंबरी गद्दी, बड़े हनुमान मंदिर (लेटे हनुमानजी) वर्तमान में अध्यक्ष, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद अपने होशोहवास में बगैर किसी दबाव के यह पत्र लिख रहा हूं.

‘जब से आंनद गिरि ने मेरे ऊपर असत्य, मिथ्या और मनगढं़त आरोप लगाए हैं, तब से मैं मानसिक दबाव में जी रहा हूं. जब भी मैं एकांत में रहता हूं, मर जाने की इच्छा होती है. आनंद गिरि, आद्या तिवारी और उन के बेटे संदीप तिवारी ने मिल कर मेरे साथ विश्वासघात किया है.

‘सोशल मीडिया, फेसबुक और समाचार पत्रों में आनंद गिरि ने मेरे चरित्र पर मनगढं़त आरोप लगाए हैं. मैं मरने जा रहा हूं. सत्य बोलूंगा. मेरा घर से कोई संबंध नहीं है. मैं ने एक भी पैसा घर पर नहीं दिया है. मैं ने एकएक पैसा मंदिर और मठ में लगाया है. 2004 में मैं महंत बना. 2004 से अब तक मंदिर मठ का जो विकास किया, सभी भक्त जानते हैं.

‘आनंद गिरि के द्वारा मेरे ऊपर जो आरोप लगाए गए, उस से मेरी और मठ मंदिर की बदनामी हुई. मेरे मरने की संपूर्ण जिम्मेदारी आनंद गिरि, आद्या प्रसाद तिवारी जो मंदिर के पुजारी हैं और आद्या प्रसाद तिवारी के बेटे संदीप तिवारी की होगी. मैं समाज में हमेशा  शान से जीया. आनंद गिरि ने मुझे गलत तरह से बदनाम किया.

‘मुझे जान से मारने का प्रयास भी किया गया. इस से मैं बहुत दुखी हूं. प्रयागराज के सभी पुलिस अधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों से अनुरोध करता हूं कि मेरी आत्महत्या के जिम्मेदार उपरोक्त लोगों पर कानूनी काररवाई की जाए. जिस से मेरी आत्मा को शांति मिले.

‘प्रिय बलवीर गिरि, मठ मंदिर की व्यवस्था का प्रयास करना. जिस तरह से मैं ने किया, इसी तरह से करना. नितीश गिरि और मणि सभी महात्मा बलवीर गिरि का सहयोग करना. परमपूज्य महंत हरिगोबिंदजी एवं सभी से निवेदन है कि मठ का महंत बलवीर गिरि को बनाना. महंत रवींद्र गिरि जी (सजावटी मढ़ी) आप ने हमेशा साथ दिया. मेरे मरने के बाद बलवीर गिरि का साथ दीजिएगा. सभी को ओम नमो नारायण.

‘मै महंत नरेंद्र गिरि 13 सितंबर को ही आत्महत्या करने जा रहा था, लेकिन हिम्मत नहीं कर पाया. आज हरिद्वार से सूचना मिली कि एकदो दिन में आनंद गिरि कंप्यूटर के द्वारा मोबाइल से किसी लड़की या महिला के साथ मेरी फोटो लगा कर गलत काम करते हुए फोटो वायरल कर देगा.

‘मैं ने सोचा कहांकहां सफाई दूंगा. एक बार तो बदनाम हो जाऊंगा. मैं जिस पद पर हूं वह गरिमामयी पद है. सच्चाई तो लोगों को बाद में पता चल ही जाएगी, लेकिन मैं तो बदनाम हो जाऊंगा. इसलिए मैं आत्महत्या करने जा रहा हूं.

‘बलवीर गिरि मेरी समाधि पार्क में नीम के पेड़ के पास दी जाए. यही मेरी अंतिम इच्छा है. धनजंय विद्यार्थी मेरे कमरे की चाबी बलवीर महराज को दे देना. बलवीर गिरि एवं पंच परमेश्वर निवेदन कर रहा हूं कि मेरी समाधि पार्क में नीम के पेड़ के नीचे लगा देना.

‘प्रिय बलवीर गिरि ओम नमो नारायण. मैं ने तुम्हारे नाम एक रजिस्टर्ड वसीयत की है. जिस में मेरे ब्रह्मलीन हो जाने के बाद तुम बड़े हनुमान मंदिर एवं मठ बाघंबरी गद्दी के महंत बनोगे. तुम से मेरा अनुरोध है कि मेरी सेवा में लगे विद्यार्थी जैसे मिथिलेश पांडेय, रामकृष्ण पांडेय, मनीष शुक्ला, शिवेष कुमार मिश्रा, अभिषेक कुमार मिश्रा, उज्जवल द्विवेदी, प्रज्जवल द्विवेदी, अभय द्विवेदी, निर्भय द्विवेदी, सुमित तिवारी का ध्यान देना.

‘जिस तरह से हमेशा मेरी सेवा और मठ की सेवा की है उसी तरह से बलवीर गिरि महराज और मठ मंदिर की सेवा करना. वैसे हमें सभी विद्यार्थी प्रिय हैं. लेकिन मनीष शुक्ला, शिवम मिश्रा और अभिषेक मिश्रा मेरे अति प्रिय हैं.

‘कोरोना काल में जब मुझे कोरोना हुआ मेरी सेवा सुमित तिवारी ने की. मंदिर में मालाफूल की दुकान मैं ने सुमित तिवारी को किरायानामा रजिस्टर किया है. मिथिलेश पांडेय को बड़े हनुमान रुद्राक्ष इंपोरियम की दुकान किराए पर दी है. मनीष शुक्ला, शिवम मिश्रा और अभिषेक मिश्रा को लड्डू की दुकान किराए पर दी है.’ महंत की मौत का हंगामा अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की मौत की खबर जंगल में आग की तरह पूरे देश में छा गई. सोशल मीडिया, टीवी और अखबारों में प्रमुखता के साथ इस को दिखाया जाने लगा. महंत नरेंद्र गिरि को जानने वाले लोग यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि वह आत्महत्या जैसा कदम उठा सकते थे. महंत की मौत हत्या और आत्महत्या के बीच झूलने लगी और लोग सीबीआई जांच की मांग करने लगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा नेता अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही साथ बसपा नेता मायावती, सपा नेता अखिलेश यादव आदि नेताओं के शोक संदेश ट्विटर पर आने लगे. पुलिस ने सुसाइड नोट में लिखे नामों को आधार मान कर आनंद गिरि, आद्या तिवारी और संदीप तिवारी को हिरासत में ले लिया. इन पर धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप) लगाया गया. यह सभी महंत नरेंद्र गिरि के करीबी थे. इधर कुछ दिनों से आपस में इन का विवाद चल रहा था. आनंद गिरि, आद्या तिवारी और संदीप तिवारी का कहना था कि महंतजी से हमारा कोई झगड़ा नहीं था. उन की मौत के बाद हमें फंसा कर दोषियों को बचाने का काम किया जा रहा है.

नरेंद्र सिंह से महंत नरेंद्र गिरि का सफर बात 1984 की है जब प्रयाग में संगम के किनारे कुंभ का मेला लगा था. लाखोंकरोड़ों की भीड़ रोज गंगा स्नान कर रही थी. 20 साल का युवक भी इस भीड़ का हिस्सा बन कर संगम नहाने के लिए आया. संगम पर संतों की चकाचौंध को देख कर युवक के मन में यहीं बस जाने का मन करने लगा. वह संगम किनारे निरंजनी अखाडे़ के संत कोठारी दिव्यानंद गिरि के पास आया. यहीं साथ में रह कर उन की सेवा करने लगा. कुंभ खत्म हो गया तो भी युवक अपने घर जाने को तैयार नहीं हुआ. तब दिव्यानंद उस युवक को ले कर हरिद्वार चले गए. वहां उस का संपूर्ण भाव देख कर दिव्यानंद ने 1985 मे नरेंद्र गिरि को संन्यास की दीक्षा दी और उस का नामकरण नरेंद्र गिरि के रूप में कर दिया.

इस के बाद श्रीनिरंजनी अखाड़े के महात्मा व श्रीमठ बाघंबरी गद्दी के महंत बलवंत गिरि ने गुरुदीक्षा दी. बलवंत गिरि के न रहने के बाद नरेंद्र गिरि 2004 में श्रीमठ  बाघंबरी गद्दी के पीठाधीश्वर तथा बडे़ हनुमान मंदिर के महंत का पद संभाला. इस के बाद वह मठ और मंदिर को भव्य स्वरूप दिलाने का काम करने लगे. 2014 में उन को संतों की सब से बड़ी संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष चुन लिया गया. अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि मूलरूप से प्रयागराज के सराय ममरेज के करीब छतौना गांव के रहने वाले थे. उन के पिता का नाम भानुप्रताप सिंह था. वह आरएसएस में थे. पिता का प्रभाव नरेंद्र गिरि पर था. नरेंद्र गिरि का असली नाम नरेंद्र सिंह था.

वह 4 भाई थे. उन के भाइयों के नाम अशोक कुमार सिंह, अरविंद कुमार सिंह और आंनद सिंह थे. नरेंद्र गिरि यानी नरेंद्र सिंह ने बाबू सरजू प्रसाद इंटर कालेज से हाईस्कूल की परीक्षा पास की थी. 1980 में नरेंद्र सिंह 20 साल की उम्र में संन्यासी बन गए थे. वह प्रयाग के निरजंनी अखाडे़ में रहने लगे. अपने मधुर स्वभाव और मेहनती होने के कारण जल्द ही उन का नाम अखाड़े के प्रमुख लोगों में शामिल हो गया. अखाड़े में शामिल होने के 6 साल के अंदर ही नरेंद्र गिरि पदाधिकारी बन गए थे. निरंजनी अखाड़े का पदाधिकारी बनने के बाद नरेंद्र गिरि ने अखाडे़ के विस्तार पर काम करना शुरू किया. बातचीत में अच्छा होने के कारण जल्द ही वह लोकप्रिय होने लगे.

उन के संपर्क के बाद मठ की जायदाद और संपत्ति बढ़ने लगी, जिस की वजह से नरेंद्र गिरि का नाम केवल निरंजनी अखाड़े में ही नहीं, बाकी अखाड़ों में भी सम्मान से लिया जाने लगा. 1998 में नरेंद्र गिरि का नाम संतों की सब से बड़ी अखाड़ा परिषद के पदाधिकारी के रूप मे लिया जाने लगा. अखाड़ा परिषद का पदाधिकारी बनने के बाद नरेंद्र गिरि की अलग पहचान बनने लगी. साजिश दर साजिश नरेंद्र गिरि को सब से बड़ी सफलता तब मिली, जब वर्ष 2014 में अयोध्या निवासी संत ज्ञानदास की जगह पर उन्हें संतों की सब से बड़ी संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष चुन लिया गया. उस समय उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और नरेंद्र गिरि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के करीबी हो गए.

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष चुने जाने के बाद नरेंद्र गिरि का कद तेजी से बढ़ने लगा. उन से मिलने वालों में नेताओं और अधिकारियों की लाइन लगने लगी. जिस निरंजनी अखाडे़ में वह हाशिए पर रहते थे, वहां भी उन का महत्त्व बढ़ गया था. अखाड़े के तमाम प्रभावशाली लोग किनारे हो गए थे. ऐसे लोगों को नरेंद्र गिरि का बढ़ता कद अखरने लगा था. नरेंद्र गिरि ने तमाम ऐसे फैसले करने शुरू कर दिए, जो लोगों को नागवार गुजरने लगे थे. अखाड़ा परिषद का प्रमुख कार्य संतों के अलगअलग अखाड़ों को मान्यता देने का होता है. ऐसे में नरेंद्र गिरि ने 2017 में किन्नर और परी अखाडे़ को मान्यता देने से इंकार कर दिया था.

अखाड़ा परिषद में नरेंद्र गिरि की छवि कड़े फैसले लेने वाले अध्यक्ष की बन गई थी. महंत नरेंद्र गिरि ने फरजी संतों की एक लिस्ट जारी कर दी थी. इस में 19 संतों के नाम शामिल थे, जिस की वजह से वह काफी चर्चा में रहे थे. मीडिया में यह सूची जारी करने के बाद उन पर दबाव पड़ रहा था कि वह इस सूची को वापस ले लें, लेकिन नरेंद्र गिरि सूची वापस लेने को तैयार नहीं थे. ऐसे में उन के खिलाफ विरोधियों की साजिश शुरू हो गई. नरेंद्र गिरि का एक वीडियो वायरल किया गया, जिस में वह एक शादी समारोह में डांस करने वाली लड़कियों पर नोट लुटा रहे थे.

नरेंद्र गिरि की तरफ से सफाई देते यह कहा गया था कि वह शादी रिश्तेदारी में थी, जिस में वह खुशीखुशी डांस करने वाली लड़कियों को नोट दे रहे थे. इस वीडियो के वायरल होने के बाद से नरेंद्र गिरि की छवि को काफी धक्का लगा था. जायदाद और जमीन से जुडे़ विवाद बाघंबरी गद्दी मठ और निरजंनी अखाड़े के पास अकूत धन और संपदा है. इसे ले कर साजिशों का दौर चल रहा था. प्रभावशाली लोग संतों के साथ मिल कर इस की जायदाद पर कब्जा करने का काम कर रहे थे. संतमहंत ही नहीं सेवादार भी अपने परिजनों के नाम जमीनें खरीद रहे थे. इस तरह की बातों को ले कर ही नरेंद्र गिरि का अपने ही शिष्य आंनद गिरि के साथ विवाद शुरू हो गया. मठ मंदिर से जुडे़ लोग किसी न किसी तरह से ऐसे मसले तलाश करने लगे, जिस से वह नरेंद्र गिरि से अपनी बात मनवा सकें.

आनंद गिरि मूलरूप से उत्तराखंड के रहने वाले थे. किशोरावस्था में ही वह हरिद्वार के आश्रम में नरेंद्र गिरि को मिले थे. इस के बाद नरेंद्र गिरि उन को प्रयागराज ले आए थे. 2007 में आनंद गिरि निरजंनी अखाड़े से जुड़े और महंत भी बने. गुरु के करीबी होने के कारण लेटे हनुमान मंदिर के छोटे महंत के नाम से भी उन्हें जाना जाता था. यह मंदिर भी बाघंबरी ट्रस्ट के द्वारा ही संचालित होता था. आनंद गिरि को योग गुरु के नाम से भी जाना जाता था. वह देशविदेश में योग सिखाने के लिए भी जाता था. महत्त्वाकांक्षी आनंद गिरि ने खुद को नरेंद्र गिरि का उत्तराधिकारी भी घोषित कर लिया था. बाद में विवाद होने के बाद नरेंद्र गिरि ने इस का खंडन किया था.

आनंद गिरि ने गंगा सफाई के लिए गंगा सेना भी बनाई थी. वह हरिद्वार में एक आश्रम भी बना रहा था. इस के बाद नरेंद्र गिरि के साथ उन का विवाद बढ़ गया था. दूसरे शिष्य भी खफा रहते थे आनंद गिरि से महत्त्वाकांक्षी आनंद गिरि दूसरे शिष्यों की आंखों में खटकता था. ऐसे में उस को ले कर सभी इस कोशिश में रहते थे कि वह नरेंद्र गिरि से दूर हो जाए. आनंद गिरि के विरोधियों को तब मौका मिल गया, जब आनंद गिरि 2016 और 2018 के पुराने मामलों में अपनी ही 2 शिष्याआें के साथ मारपीट और अभद्रता को ले कर 2019 में सुर्खियों में आया था. मई, 2019 में उसे जेल भी जाना पड़ा था. इस के बाद सितंबर माह में सिडनी कोर्ट ने उसे बाइज्जत बरी कर दिया था. इस के बाद उस का पासपोर्ट भी रिलीज कर दिया गया था. तब आनंद गिरि भारत आ गया.

आनंद गिरि का हवाई जहाज में शराब पीते हुए एक फोटो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. आंनद गिरि ने इसे शराब नहीं जूस बताया था. आनंद गिरि शौकीन किस्म का था. महंगी कार, बाइक और ऐशोआराम का उसे शौक था. नरेंद्र गिरि से पहले भी ऐसे ही विवादों के बीच ही मठ के 2 महंतों की संदिग्ध हालत में मौत हो चुकी है. नरेंद्र गिरि का अपने ही षिष्य आनंद गिरि के साथ विवाद की वजह 80 फीट चौड़ी और 120 फीट लंबी गौशाला की जमीन का टुकड़ा बना. आनंद गिरि के नाम यह जमीन लीज पर थी. यहां पर पेट्रोल पंप बनना था. कुछ दिनों के बाद महंत नरेंद्र गिरि ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया कि यहां पर पेट्रोल पंप नहीं चल सकता. उन का कहना था कि यहां पर मार्केट बना दी जाए, जिस से मठ की आमदनी बढ़ेगी.

आनंद गिरि का कहना था कि नरेंद्र गिरि उस जमीन को बेचना चाहते हैं. इस कारण लीज कैंसिल कराई गई थी. मठ की इस करोड़ों रुपए की जमीन को ले कर नरेंद्र गिरि और उन के शिष्य आनंद गिरि के बीच घमासान इस कदर बढ़ गया कि नरेंद्र गिरि ने आनंद गिरि को निरंजनी अखाड़े और मठ से निकाल दिया था. इस के बाद आंनद गिरि भाग कर हरिद्वार पहुंच गया था. आनंद गिरि ने इस के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह के ऐसे वीडियो वायरल किए, जिन में नरेंद्र गिरि के शिष्यों के पास करोड़ों की संपत्ति होने का दावा किया गया था. नरेंद्र गिरि ने इन मुद्दों पर सफाई देते कहा था कि ये आरोप बेबुनियाद हैं. उन की छवि को धूमिल करने के लिए यह काम किया गया है. कुछ समय के बाद आनंद गिरि ने अपने गुरु नरेंद्र गिरि से माफी मांग ली थी. माफी मांगने के वीडियो भी खूब वायरल हुए थे.

नरेंद्र गिरि का एक और विवाद लेटे हनुमान मंदिर के मुख्य पुजारी आद्या तिवारी और उस के बेटे संदीप तिवारी के साथ बताया जाता है. लेनेदेन के इस विवाद की वजह से दोनों के बीच बातचीत बंद थी. जायदाद के ऐसे विवादों के अलावा भी नरेंद्र गिरि कई तरह के दूसरे विवादों में भी घिरे थे. नरेंद्र गिरि के करीबी रहे शिष्य और निरंजनी अखाड़े के सचिव महंत आशीष गिरि ने 17 नवंबर, 2019 को गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी. आशीष गिरि ने जमीन बेचने का विरोध किया था. दारागंज स्थित अखाड़े के आश्रम में आशीष गिरि ने गोली मार कर आत्महत्या की थी. इस की वजह यह बताई जा रही थी कि 2011 और 2012 में बाघंबरी गद्दी की जमीन समाजवादी पार्टी के नेता को बेची जा रही थी. पुलिस ने आशीष गिरि की आत्महत्या का कारण डिप्रेशन बताया था.

वीडियो में छिपे राज जानकार लोगों का मानना है कि नरेंद्र गिरि का कोई ऐसा वीडियो था, जिस के वायरल होने से उन को अपने मानसम्मान के धूमिल होने का डर लग रहा था. एक ऐसा ही वीडियो पहले भी वायरल हो चुका था, जिस में वह डांस करने वाली लड़कियों पर रुपए लुटा रहे थे. यह माना जा रहा है कि उस की तरह का या उस से अधिक घातक वीडियो और भी हो सकता है. जिस की आड़ में उन को ब्लैकमेल किया जा रहा था. ऐसे में अपना मानसम्मान खोने के डर से नरेंद्र गिरि ने आत्महत्या जैसा फैसला कर लिया. उत्तर प्रदेश सरकार ने नरेंद्र गिरि की मौत की जांच कराने के लिए एसआईटी का गठन कर दिया है. 18 सदस्यों वाली इस जांच टीम की निगरानी 4 अफसरों को सौंपी.

पुलिस ने गिरफ्तार किए गए आरोपी आनंद गिरि, आद्या तिवारी और उन के बेटे संदीप तिवारी को भादंवि की धारा 306 के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर नैनी जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक इस केस की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी. नरेंद्र गिरि ने सुसाइड नोट लिखने के अलावा अपना बयान रिकौर्ड कर के भी मोबाइल में रखा है. मौत की वजह जायदाद और मठ के महंत पद का लालच है. महंत नरेंद्र गिरि की मौत से पता चलता है कि मंदिर और मठ कितनी भी धर्म की बातें कर लें पर वहां भी लालच और एक दूसरे के खिलाफ षडयंत्र हावी रहता है, जिस की वजह से ऐसी घटनाएं घटती रहती है.

Short Hindi Story : दूल्हा एक दुलहन दो

Short Hindi Story : आज के महंगाई के दौर में एक पत्नी के साथ घर को चलाना आसान नहीं है तो वहीं ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जहां सामान्य परिवार के युवकों ने एक साथ 2-2 लड़कियों से समाज और घर वालों की सहमति से शादी की. आखिर यह कैसे हुआ?

आज लोग एक शादी कर के परेशान रहते हैं. हां, राजारजवाड़ों के जमाने की बात अलग थी. उस समय जरूर लोग कईकई शादियां करते थे. जिस की जैसी सामर्थ्य होती थी, वह उसी हिसाब से शादी कर लेता था. राजाओं या जमींदारों की तो बात ही अलग थी. वे तो बुढ़ापे तक जवान लड़कियों से शादियां करते रहते थे. कहा जाता है कि पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह की तो वैधअवैध मिला कर कुल 365 पत्नियां थीं. लेकिन अब समय बदल गया है. महंगाई के इस जमाने में एक पत्नी को ही संभालना लोगों के लिए मुश्किल हो रहा है तो 2 पत्नियों को भला कौन संभाल पाएगा. शादी भी अब एक से ज्यादा नहीं की जा सकती. हां, अगर पहली पत्नी ऐतराज न करे तो आदमी दूसरी शादी कर सकता है.

लेकिन ये शादियां एक साथ नहीं होतीं. किसी को बच्चा नहीं हुआ या पहली पत्नी को असाध्य बीमारी हो गई या फिर किसी से प्यार हो गया तो पहली पत्नी से स्वीकृति ले कर ही लोग दूसरी शादी कर सकते हैं.  जिस ने भी दूसरी शादी की है, उस ने इसी तरह की है. किसी दूसरी महिला के प्यार में पड़ कर भी बहुत लोगों ने धर्म बदल कर दूसरी शादी की है. लेकिन कोई एक ही मंडप में एक साथ 2 लड़कियों से शादी करे तो जान कर थोड़ी हैरानी तो होगी न. भला 2 लड़कियां एक साथ एक ही लड़के से एक ही मंडप में शादी करने को कैसे राजी हो गईं?

लेकिन इस में हैरान होने की बात नहीं है. जहां प्यार होता है, वहां कुछ भी संभव है. जिनजिन लोगों ने पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी की है, उन में से ज्यादातर लोगों ने दूसरी शादी प्यार में ही पड़ कर की है. इसी तरह प्यार में ही पड़ कर जिला आदिलपुर के उन्नूर मंडल के गांव घनपुर के रहने वाले अर्जुन ने एक ही मंडप में एक साथ 14 जून, 2021 को 2 लड़कियों से एक साथ शादी की है. हुआ यह कि अर्जुन को पहले अपनी बुआ (पिता की बहन) की बेटी ऊषा रानी से प्यार हो गया. अर्जुन और ऊषा रानी की प्रेमकहानी चल ही रही थी कि अर्जुन को अपनी चाची की बेटी सुरेखा से भी प्यार हो गया.

कहा जाता है कि अर्जुन अपनी इन दोनों प्रेमिकाओं से 4 साल तक मिलताजुलता रहा और किसी और को तो क्या उस की प्रेमिकाओं को भी पता नहीं चला कि उन का प्रेमी एक नहीं, 2-2 लड़कियों से प्यार ही नहीं कर रहा, बल्कि मिलजुल भी रहा है. इस का पता तो तब चला, जब अर्जुन के मातापिता ने उस की शादी का निर्णय लिया. घर वालों ने जैसे ही अर्जुन की शादी की बात चलाई, दोनों लड़कियां आ कर सामने खड़ी हो गईं. दोनों ही लड़कियां उस से शादी को तैयार थीं. इस के लिए अर्जुन को न कोई दुविधा थी और न ही किसी तरह का ऐतराज. ऐतराज होता भी क्यों, उस ने तो दोनों से प्यार किया था.

चूंकि दोनों लड़कियों को भी मंजूर था और उन के घर वालों को भी किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं थी, इसलिए अर्जुन की शादी ऊषा रानी और सुरेखा के साथ समुदाय के लोगों की मौजूदगी में धूमधाम से हो गई. आदिवासी समुदाय में जिस तरह के पारंपरिक कपड़े पहन कर विवाह होता है, उसी तरह के कपड़े पहन कर अर्जुन और दोनों लड़कियां आदिवासी समुदाय के रीतिरिवाजों के अनुसार रस्में पूरी कर विवाह बंधन में बंध गए. चूंकि आदिवासी समुदाय में इस तरह के विवाह की अनुमति है, इसलिए अर्जुन को 2 लड़कियों से एक साथ शादी करने में किसी तरह की कोई अड़चन नहीं आई.

अर्जुन के समुदाय में भले ही इस तरह की शादी की अनुमति है, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है, जब 2 दुलहनों ने एक साथ एक दूल्हे से विवाह किया है. आप सोच रहे होंगे कि 2 दुलहनों से एक साथ विवाह करने वाला अर्जुन अनपढ़ गंवार होगा, तभी तो उस ने इस तरह का अजीब काम किया है. ऐसी बात नहीं है. अर्जुन पढ़ालिखा है. उस ने बीएड किया है. लेकिन अभी उसे नौकरी नहीं मिली है. वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है. आदिवासी समुदाय के अर्जुन का विवाह भले ही अपने समुदाय में इस तरह का पहला विवाह है, जिस ने 2 लड़कियों के साथ एक साथ विवाह किया है, लेकिन इस के पहले 3 जनवरी, 2021 को छत्तीसगढ़ के जिला बस्तर के शहर से लगे गांव टिकरा लोहंगा का रहने वाला चंदू मौर्य एक ही मंडप में पूरे गांव के सामने 2 लड़कियों से विवाह कर चुका है.

दरअसल, चंदू मौर्य अपने ही गांव की हसीना बघेल और सुंदरी कश्यप से प्यार करता था. दोनों लड़कियां भी उसे इस हद तक प्यार करती थीं कि उस के बिना नहीं रह सकती थीं. जब चंदू की शादी की बात चली तो दोनों ही उस के साथ शादी करने को तैयार हो गईं. गांव में पंचायत बैठी. दोनों लड़कियां जिद पर अड़ी थीं. मजबूरन गांव वालों को फैसला लेना पड़ा कि चंदू चाहे तो दोनों लड़कियों के साथ शादी कर सकता है. चंदू भी दोनों लड़कियों के साथ शादी के लिए राजी था. गांव वालों की सहमति थी ही. इस के बाद गांव वालों की मौजूदगी में गाजेबाजे के साथ आदिवासी रीतिरिवाजों के साथ चंदू ने हसीना और सुंदरी के साथ 7 फेरे लिए.

वैसे तो हिंदुओं में कोई युवक 2 शादियां नहीं कर सकता. पर आदिवासी प्रथा के अनुसार पुरुष एक से अधिक शादी कर सकते हैं. फिर भी अर्जुन की ही तरह चंदू का यह पहला मामला है, जब किसी युवक ने एक ही मंडप में 2 लड़कियों के साथ विवाह किया है. हसीना और सुंदरी अपने पति चंदू के साथ हंसीखुशी से रह रही हैं. अर्जुन और चंदू की ही तरह 8 जुलाई, 2020 को मध्य प्रदेश के जिला बैतूल मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर ब्लौक घोड़ाडोंगरी के गांव कोयलारी के रहने वाले संदीप उइके ने भी एक ही मंडप में 2 लड़कियों से विवाह किया था. इन में एक दुलहन उन की प्रेमिका है तो दूसरी उस के मातापिता द्वारा पसंद की गई है.

हुआ यह कि संदीप जब भोपाल में पढ़ रहा था, तभी होशंगाबाद की रहने वाली एक लड़की से उसे प्यार हो गया. दोनों ने शादी का निर्णय कर लिया. वहीं दूसरी ओर घर वालों ने उस की शादी घोड़ाडोंगरी ब्लौक के गांव कोयलारी की रहने वाली एक लड़की से तय कर दी. घर वाले अपनी पसंद की लड़की से शादी करने लिए संदीप पर दबाव डाल रहे थे. दूसरी ओर प्रेमिका संदीप को छोड़ने को तैयार नहीं थी. मामला बढ़ा तो पंचायत बुलाई गई. पूरी बात सुन कर पंचायत ने कहा कि जब दोनों लड़कियां एक साथ रहने को तैयार हैं तो क्यों न दोनों ही लड़कियों की संदीप से शादी करा दी जाए.

दोनों लड़कियां इस बात पर सहमत थीं. उन के घर वालों ने भी ऐतराज नहीं किया. उस के बाद दोनों के घर वालों के अलावा गांव और बिरादरी वालों की मौजूदगी में उन के रीतिरिवाजों के अनुसार एक ही मंडप में संदीप की शादी दोनों लड़कियों से करा दी गई. इसी तरह उत्तर प्रदेश के प्रयागराज का रहने वाला एक युवक मंदिर में 2 लड़कियों की मांग भर कर एक साथ विवाह कर चुका है. दरअसल, हुआ यह था कि युवक एक लड़की से प्यार करता था. लड़की जब भी उस युवक से शादी के लिए कहती तो वह कोई न कोई बहाना बना कर टाल देता था. तब लड़की ने उस से कहा, ‘‘अगर तुम ने मेरे साथ शादी नहीं की, मुझे धोखा दिया तो मैं जहर खा कर जान दे दूंगी.’’

युवक ने लड़की को बहुत समझाया, पर लड़की अपनी जिद पर अड़ी रही. इस पर युवक को गुस्सा आ गया और उस ने लड़की को एक थप्पड़ मार दिया. वह लड़की वहां से सीधे थाना कर्नलगंज पहुंची और युवक के खिलाफ मारपीट का मुकदमा दर्ज करा दिया. मुकदमा दर्ज करने के बाद थाना कर्नलगंज पुलिस ने युवक को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे जमानत मिल गई. युवक अपने ही मोहल्ले की एक अन्य  लड़की से पहले से ही प्रेम करता था. उस का और उस लड़की से कई सालों से प्रेम प्रसंग  चल रहा था. एक दिन दोनों यमुना बैंक पर घूम रहे थे तो उस की पहली प्रेमिका ने उन्हें देख लिया. दूसरी लड़की के साथ अपने प्रेमी को देख कर वह लड़की हंगामा करने लगी. आखिर किसी तरह मामला शांत हुआ.

अगले दिन वह युवक अपनी नई प्रेमिका के साथ मंदिर में शादी करने पहुंचा तो न जाने किस तरह सूचना पा कर युवक की पुरानी प्रेमिका भी वहां पहुंच गई. शादी को ले कर वह हंगामा करने लगी. दोनों ही लड़कियां उस युवक से शादी करना चाहती थीं. युवक दोनों को समझाता रहा, पर वे मानने को तैयार नहीं थीं. मजबूर हो कर युवक ने दोनों की मांग भर कर दोनों के साथ शादी कर ली. जिस का वीडियो वायरल हुआ तो लोगों को इस अनोखी शादी का पता चला.

Family Story : पति की प्रताड़ना से तंग आकर पत्नी ने आठवीं मंजिल से लगाई छलांग

Family Story : करीब 2 साल पहले ही डा. मंजू वर्मा का विवाह डा. सुशील वर्मा से हुआ था. लेकिन शादी के डेढ़ साल बाद ही लालची प्रवृत्ति के डा. सुशील ने मंजू वर्मा को 40 लाख रुपए का लोन चुकाने के लिए प्रताडि़त करना शुरू कर दिया. इस प्रताड़ना से डा. मंजू वर्मा इतनी परेशान हो गईं कि…

15  मई, 2021 की सुबह 4 बजे बिठूर थानाप्रभारी अमित मिश्रा को सूचना मिली कि सिंहपुर स्थिति रूद्रा ग्रीन्स अपार्टमेंट की 8वीं मंजिल से कूद कर किसी महिला ने जान दे दी है. सूचना अपार्टमेंट के सिक्योरिटी गार्ड जगदीश ने दी थी. रूद्रा ग्रीन्स अपार्टमेंट में ज्यादातर धनवान लोग ही रहते थे. अत: उन्होंने मामले को गंभीरता से लिया और पुलिस टीम के साथ तत्काल घटनास्थल की ओर रवाना हो लिए. रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट बिठूर थाने से करीब 4 किलोमीटर दूर कल्याणपुर-बिठूर मार्ग पर स्थित है. वहां पहुंचने में थानाप्रभारी को ज्यादा समय नहीं लगा. उस समय वहां भीड़ जुटी थी. शव के पास एक युवक सुबक रहा था. अमित मिश्रा ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस का नाम डा. सुशील वर्मा है और मृतका उस की पत्नी डा. मंजू वर्मा है.

वह अपार्टमेंट की 8वीं मंजिल के फ्लैट नंबर 8ए में रहते हैं. वहीं बालकनी से कूद कर इन्होंने खुदकशी की है. हम ने उस की मौत की सूचना उस के मायके वालों तथा अपने परिजनों को दे दी है. चूंकि मौत का मामला हाईप्रोफाइल था और जरा सी चूक भारी पड़ सकती थी. अत: प्रभारी निरीक्षक अमित मिश्रा ने इस मामले की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी. थोड़ी देर बाद ही एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (वेस्ट) संजीव त्यागी तथा डीएसपी (कल्याणपुर) दिनेश कुमार शुक्ला घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतका डा. मंजू वर्मा की लाश अपार्टमेंट के नीचे फर्श पर पड़ी थी. उन की उम्र 30 वर्ष के आसपास थी. रंग गोरा तथा शरीर स्वस्थ था.

ऊंचाई से गिरने के कारण उन के शरीर की हड्डियां चकनाचूर हो गई थीं. पुलिस अधिकारी 8वीं मंजिल के फ्लैट नंबर 8ए पहुंचे जहां की बालकनी से डा. मंजू वर्मा ने छलांग लगाई थी. उन्होंने उस कुरसी का भी निरीक्षण किया, जिस पर चढ़ कर वह कूदी थीं. पुलिस अधिकारियों ने फ्लैट की सघन तलाशी कराई. लेकिन उन्हें फ्लैट से सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ. अधिकारियों को मामला संदिग्ध लगा. घटनास्थल पर फोरैंसिक टीम मौजूद थी. टीम प्रभारी प्रवीण कुमार श्रीवास्तव ने बड़ी बारीकी से जांच शुरू की. उन्होंने ग्राउंड फ्लोर से ले कर 8वीं मंजिल पर स्थित फ्लैट की जांच की. जांच में उन्होंने पाया कि जहां से डा. मंजू वर्मा कूदी, वहां की बालकनी की बाउंड्री 3 फीट ऊंची है.

बाउंड्री के पास कुरसी मिली, जोकि 40 सेंटीमीटर ऊंची थी. कुरसी पर चढ़ कर ही डा. मंजू वर्मा ने छलांग लगाई. टीम ने कई जगह से फिंगरप्रिंट भी लिए. फोरैंसिक टीम की रिपोर्ट के अनुसार डा. मंजू वर्मा ने खुदकुशी की थी. पुलिस अधिकारी अभी छानबीन कर ही रहे थे कि मृतका के पिता अर्जुन प्रसाद आ गए. उन के साथ पत्नी मीरा, बेटा विष्णुकांत, बेटी गरिमा व सरिता भी थी. बेटी का शव देख कर अर्जुन प्रसाद व मीरा फफक पड़ी. गरिमा, सरिता व विष्णुकांत भी बहन का शव देख कर रो पड़े. एसपी संजीव त्यागी ने उन्हें धैर्य बंधाया. घटनास्थल का निरीक्षण व मृतका के परिजनों के आ जाने के बाद पुलिस अधिकारियों ने शव को पोस्टमार्टम हेतु लाला लाजपतराय अस्पताल भिजवा दिया. आक्रोश को देखते हुए पोस्टमार्टम हाउस पर सुरक्षा भी बढ़ा दी.

एसपी (वेस्ट) संजीव त्यागी ने मृतका डा. मंजू वर्मा के पिता अर्जुन प्रसाद से घटना के संबंध में पूछताछ की तो वह रो पड़े. कुछ देर बाद आंसुओं का सैलाब थमा तो उन्होंने बताया कि दामाद सुशील वर्मा व उस का परिवार उन की डा. बेटी को दहेज के लिए प्रताडि़त करता था. डा. सुशील वर्मा रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट के जिस फ्लैट में रहता है. उसे उस ने 80 लाख रुपए में खरीदा था. इस पर 40 लाख रुपए का लोन था, जो उस ने उन की बेटी मंजू वर्मा के नाम पर लिया था. इस लोन की अदायगी हेतु डा. सुशील वर्मा, डा. मंजू वर्मा पर दबाव डाल रहा था. लेकिन बेटी कहती थी कि वह अभी प्रैक्टिस भी नहीं कर रही है. इतना बड़ा लोन वह कहां से चुकाए. तब वह बेटी पर मायके से रकम लाने को कहता था. मना करने पर उस के साथ मारपीट करता था.

अर्जुन प्रसाद ने आगे बताया, ‘‘13 मई को मोबाइल फोन पर मेरी बात मंजू से हुई थी. तब उस ने बताया था कि डा. सुशील से लोन को ले कर उस की बहस हुई थी. बहस के दौरान उन्होंने उस से मारपीट की थी. तब से वह परेशान है. बेटी की व्यथा सुन कर मैं ने उसे समझाया था और दामादजी से बात कर कोई हल निकालने का आश्वासन दिया था.

‘‘इस के बाद 14 मई की शाम मैं ने बेटी से बात करने का प्रयास किया, लेकिन उस का फोन बंद था. रात 2 बजे उन के फोन पर काल आई. काल दामाद के छोटे भाई सुधीर की थी. उस ने बताया कि मंजू भाभी ने बालकनी से छलांग लगा कर जान दे दी है.

‘‘यह बात सुनते ही हमारे तो जैसे होश ही उड़ गए थे. फिर हम सभी प्रयागराज से अपने निजी वाहन से घटनास्थल पहुंचे. सर, मेरी बेटी मंजू ने आत्महत्या नहीं की है बल्कि दामाद सुशील वर्मा ने उसे बालकनी से धक्का दे कर मार डाला. दामाद को उकसाने में उन के बड़े भाई सुनील वर्मा का भी हाथ है, जो कानपुर (देहात) जिले में बेसिक शिक्षा अधिकारी के पद पर है. आप मेरी रिपोर्ट दर्ज कर दहेज लोभियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करें.’’

एसपी(वेस्ट) संजीव त्यागी ने अर्जुन प्रसाद की बात गौर से सुनी, फिर रिपोर्ट लिखने का आदेश कर दिए. आदेश पाते ही बिठूर थानाप्रभारी अमित मिश्रा ने अर्जुन प्रसाद की तहरीर पर दहेज हत्या की धारा 304बी के तहत डा. सुशील कुमार वर्मा तथा उन के बड़े भाई सुनील वर्मा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. रिपोर्ट दर्ज होते ही अमित मिश्रा ने मृतका के पति डा. सुशील वर्मा को हिरासत में ले लिया. मृतका डा. मंजू वर्मा के शव का पोस्टमार्टम 3 डाक्टरों के एक पैनल ने किया. परीक्षण के बाद शव को मृतका के पिता अर्जुन प्रसाद को सौंप दिया गया. दरअसल ससुराल पक्ष से शव लेने कोई भी पोस्टमार्टम हाउस नहीं आया था.

अर्जुन प्रसाद बेटी का शव प्रयागराज ले जाना चाहते थे और वहीं अंतिम संस्कार करना चाहते थे, जबकि बिठूर पुलिस कोई रिस्क नहीं उठाना चाहती थी और अंतिम संस्कार कानपुर के भैरवघाट पर कराना चाहती थी. थानाप्रभारी ने इस बाबत अर्जुन प्रसाद से बात की तो वह इस शर्त पर मान गए कि बेटी को मुखाग्नि उस का पति दे. इस पर बिठूर थानाप्रभारी अमित मिश्रा मृतका के पति डा. सुशील वर्मा को ले कर भैरव घाट पहुंचे, जहां सुशील वर्मा ने पत्नी मंजू की चिता को अग्नि दी. उस के बाद उसे पुन: थाने लाया गया. इधर मृतका की मां मीरा देवी व उस की बेटियों सरिता व गरिमा सुशील वर्मा के फ्लैट पर पहुंची. उस समय फ्लैट पर डा. सुशील वर्मा की मां कौशल्या देवी तथा छोटा भाई सुधीर वर्मा मौजूद था. मांबेटियों ने वहां जम कर भड़ास निकाली और बेटी की सास कौशल्या देवी को खूब खरीखोटी सुनाई.

मीरा देवी ने आरोपों की झड़ी लगाई तो कौशल्या देवी ने कहा कि वह गांव में रहती है. बेटा और बहू शहर में रहते हैं. उन्हें न तो लोन के संबंध में जानकारी थी और न ही दोनों के बीच मनमुटाव की. बहू ने क्यों और कैसे जान दी, वह नहीं जानती. दहेज मांगने और प्रताडि़त करने की बात सरासर गलत है. उधर एसपी (वेस्ट) संजीव त्यागी ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को गौर से पढ़ा. रिपोर्ट के अनुसार लगभग 75 फीट की ऊंचाई से गिरने के कारण डा. मंजू वर्मा की लगभग सारी पसलियां टूट कर चकनाचूर हो गई थीं. दिल और लिवर फट गया था. आंतरिक रक्तस्राव हुआ, जिस की वजह से मौत हो गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद एसपी संजीव त्यागी व डीएसपी दिनेश कुमार शुक्ला ने आरोपी डा. सुशील वर्मा से बिठूर थाने में घटना के संबंध में पूछताछ की.

उस ने बताया कि 14 मई, 2021 की शाम सब कुछ सामान्य था. रात 8 बजे उस ने औनलाइन पिज्जा मंगाया. इस के बाद हम ने व मंजू ने पिज्जा खाया. कुछ देर तक हम दोनों बातचीत करते रहे. उस के बाद सोने चले गए. रात 2 बजे डेढ़ वर्षीय बेटे रुद्रांश के रोने की आवाज सुन कर उस की नींद खुल गई. कमरे में आया तो देखा मंजू कमरे में नहीं है. कमरे से बाहर आ कर बालकनी में देखा तो मंजू वहां भी नहीं थी. बालकनी से नीचे झांका तो शोर सुनाई पड़ा. नीचे आ कर देखा तो मंजू की लाश पड़ी थी. इस के बाद उस ने अपने घर वालों को सूचना दी.

‘‘तुम्हारी पत्नी मंजू वर्मा ने आत्महत्या की या तुम ने उसे मार डाला?’’ डीएसपी दिनेश शुक्ला ने पूछा.

‘‘सर, मैं ने उस की हत्या नहीं की. मंजू ने स्वयं आत्महत्या की है.’’ सुशील ने जवाब दिया.

‘‘लेकिन डा. मंजू वर्मा ने आत्महत्या क्यों की?’’ श्री शुक्ला ने पूछा.

‘‘सर, डा. मंजू वर्मा ने एमबीबीएस की डिग्री हासिल की थी. शादी के पूर्व वह प्रैक्टिस करती थी. लेकिन शादी के बाद उन की प्रैक्टिस छूट गई थी. उन की साथी उन्हें चिढ़ाती थीं कि एमबीबीएस करने से क्या फायदा जो प्रैक्टिस न कर सको. वह एमडी करना चाहती थी. लेकिन बच्चा होने से वह पढ़ाई नहीं कर पा रही थी. इसी कारण वह डिप्रेशन में चली गई और उन्होंने आत्महत्या कर ली.’’

लेकिन सुशील कुमार की बात पुलिस अधिकारियों के गले नहीं उतरी और उन्होंने सुशील कुमार को दहेज हत्या में विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने सुशील के बड़े भाई सुनील वर्मा से भी पूछताछ की, जो बेसिक शिक्षा अधिकारी के पद पर कानपुर (देहात) जिले में तैनात है. उन्होंने बताया कि डा. मंजू वर्मा कांड की मौत से उन का कोई लेनादेना नही है. डा. मंजू वर्मा ने मौत को गले क्यों लगाया, उन्हें कोई जानकारी नही है. डा. मंजू वर्मा के पिता अर्जुन प्रसाद ने उन की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है. पुलिस द्वारा की गई जांच, आरोपी के बयानों एवं मृतका के घर वालों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर डा. मंजू वर्मा की मौत की जो कहानी प्रकाश में आई, उस का विवरण इस प्रकार है.

उत्तर प्रदेश का प्रयागराज शहर कई मायनों में चर्चित है. गंगा यमुना के संगम तट पर बसा प्रयागराज धर्म नगरी के रूप में भी जाना जाता है. हर 12 साल में यहां संगम तट पर कुंभ का मेला लगता है. देशविदेश के लाखों श्रद्धालु एवं संत मेले में आते हैं और गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं. मेले का आकर्षण देख कर विदेशी श्रद्धालु अचरज से भर उठते हैं. प्रयागराज शहर में उच्च न्यायालय भी है, जहां प्रदेश के मुकदमों की सुनवाई होती है. पूर्व में प्रयागराज को इलाहाबाद के नाम से भी जाना जाता था. इसी प्रयागराज का एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है-नैनी. नैनी क्षेत्र की पीडीए कालोनी में अर्जुन प्रसाद अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी मीरा देवी के अलावा 3 बेटियां मंजू, सरिता, गरिमा तथा एक बेटा विष्णुकांत था.

अर्जुन प्रसाद औद्योगिक न्यायाधिकरण प्रयागराज में सहायक लिपिक पद पर कार्यरत थे. वह एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. लेकिन रहनसहन साधारण था. अर्जुन प्रसाद की बड़ी बेटी मंजू दिखने में जितनी सुंदर थी, पढ़ने में भी उतनी ही तेज थी. हाईस्कूल तथा इंटर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद मंजू ने प्रयागराज के स्वरूप रानी मैडिकल कालेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर ली थी. उस के बाद वह प्रैक्टिस करने लगी थी. मंजू डाक्टर बन गई थी और कमाने भी लगी थी. लेकिन अर्जुन प्रसाद के माथे पर चिंता की लकीरें खिंचने लगी थीं. एक देहाती कहावत है ‘जब बेटी भई सयानी, फिर पेटे नहीं समानी.’ अर्जुन प्रसाद और उन की पत्नी मीरा भी इस कहावत से अछूते नहीं थे. मंजू के ब्याह की चिंता उन्हें सताने लगी थी.

वह मंजू का विवाह ऐसे युवक से करना चाहते थे, जो उस के समकक्ष हो. मंजू डाक्टर थी, सो वह डाक्टर वर की ही खोज कर रहे थे. अथक प्रयास के बाद उन्हें एक लड़का पसंद आ गया. लड़के का नाम था सुशील कुमार वर्मा. सुशील कुमार वर्मा मूलरूप से रायबरेली जिले के चतुर्भुज गांव का रहने वाला था. 3 भाइयों में वह मंझला था. सुशील का छोटा भाई सुधीर, गांव में मां कौशल्या देवी के साथ रहता था और पेशे से वकील था, जबकि सुशील का बड़ा भाई सुनील बेसिक शिक्षा अधिकारी के पद पर था. वह कानपुर देहात में कार्यरत था. सुशील कुमार वर्मा स्वयं डाक्टर था. वह उरई मैडिकल कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर तैनात था और कानपुर (बिठूर) स्थित रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट में रहता था.

अर्जुन प्रसाद बेटी के लिए जैसा वर चाहते थे, सुशील कुमार वैसा ही था. अत: उन्होंने उसे पसंद कर लिया. इस के बाद 29 जनवरी, 2019 को अर्जुन प्रसाद ने अपनी बेटी डा. मंजू वर्मा का विवाह डा. सुशील कुमार वर्मा के साथ धूमधाम से कर दिया. शादी में उन्होंने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च किया था. डा. मंजू वर्मा बेहद खूबसूरत थी. ससुराल में जिस ने भी उसे देखा, उसी ने उस के रूपसौंदर्य की तारीफ की. डा. सुशील वर्मा जहां सुंदर पत्नी पा कर खुश थे, वहीं डा. मंजू भी काबिल पति पा कर अपने भाग्य को सराह रही थी. कौशल्या देवी भी सुंदर बहू पा कर खुशी से इतरा उठी थी. डा. मंजू वर्मा कुछ दिन ससुराल में रही फिर पति सुशील वर्मा के साथ बिठूर (कानपुर) स्थित रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट की 8वीं मंजिल के फ्लैट नंबर 8ए में रहने लगी.

बड़े प्यार से दोनों ने जिंदगी की शुरुआत की. शादी के एक साल बाद डा. मंजू ने एक बेटे को जन्म दिया. उस का नाम रखा रुद्रांश. रुद्रांश के जन्म से उन की खुशियां दोगुनी बढ़ गईं. एक रोज बातचीत के दौरान डा. सुशील वर्मा ने मंजू को बताया कि जिस फ्लैट में वह रह रहे हैं, उसे उस ने 80 लाख रुपए में खरीद लिया है. इस पर उस ने 40 लाख रुपए का लोन तुम्हारे नाम पर लिया है जिसे तुम्हें चुकाना है. पति की बात सुन कर डा. मंजू वर्मा चौंक पड़ी और बोली, ‘‘मैं 40 लाख रुपए का लोन कैसे चुकाऊंगी. मैं तो बच्चे की परवरिश के कारण प्रैक्टिस भी नहीं कर रही हूं.’’

‘‘यह सब मैं नहीं जानता. लोन तुम्हें ही चुकाना है. तुम्हारे पास पैसा नही है तो पिताजी से मांग लो. वह तुम्हें कभी मना नहीं करेंगे.’’

डा. मंजू वर्मा समझ गई कि पति लालची है. दहेज के रूप में मायके वालों से पैसा लेना चाहता है. फिर भी मंजू ने पति को समझाया कि पिता की हैसियत ऐसी नहीं है कि वह लाखों रुपए दे सकें. इस के बाद तो अकसर लोन अदायगी को ले कर मंजू और सुशील वर्मा में तकरार होने लगी. एक रोज मंजू ने पिता अर्जुन प्रसाद को फोन किया, ‘‘पिताजी, आप से दामाद चुनने में बड़ी भूल हो गई. आप का दामाद लालची है. उस ने मेरे नाम पर 40 लाख रुपए का लोन लिया है. वह कहता है कि यह लोन मुझे चुकाना होगा.’’

बेटी की बात सुन कर अर्जुन प्रसाद चिंतित हो उठे. फिर भी उन्होंने मंजू को समझाया कि वह इस बाबत दामादजी से बात करेंगे और उन्हें समझाएंगे. उन्होंने ऐसा किया भी. पर बात नहीं बनी. अब तो दिन पर दिन लोन अदायगी को ले कर मंजू और सुशील में तकरार होने लगी. सुशील, मंजू को शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताडि़त करने लगा. मंजू एमडी की पढ़ाई पूरा करना चाहती थी. इस के लिए उस ने प्रयास भी शुरू कर दिया था. लेकिन पति की प्रताड़ना और बच्चे की परवरिश के कारण वह टूट गई और पढ़ाई का इरादा बदल दिया. अब वह मानसिक तौर पर परेशान रहने लगी. 13 मई, 2021 को भी डा. मंजू वर्मा और डा. सुशील वर्मा के बीच लोन अदायगी को ले कर झगड़ा हुआ.

झगड़ा इतना बढ़ा कि सुशील वर्मा ने मंजू की पिटाई कर दी. पिटाई से आहत मंजू ने पिता से फोन पर बात की और अपनी व्यथा बताई. अर्जुन प्रसाद ने उसे समझाया कि वह कोई रास्ता निकालेंगे. 14 मई, 2021 की शाम को भी सुशील ने मंजू को प्रताडि़त किया. इस पर उस ने खाना नहीं बनाया. तब सुशील ने औनलाइन पिज्जा मंगाया और खाया भी. लेकिन तनाव व गुस्से में मंजू ने कुछ नहीं खाया. रात 10 बजे मंजू अपने डेढ़ वर्षीय बेटे रुद्रांश के साथ कमरे में पड़े पलंग पर लेट गई तथा सुशील वर्मा दूसरे कमरे में जा कर लेट गया. कुछ देर बाद वह गहरी नींद सो गया. डा. सुशील वर्मा तो सो गया. लेकिन गुस्से और तनाव में डा. मंजू वर्मा को नींद नहीं आई. इसी तनाव में मंजू कमरे से बाहर निकली और बालकनी में चहलकदमी करने लगी.

लेकिन उस का तनाव फिर भी कम नहीं हुआ. इसी तनाव में डा. मंजू वर्मा ने बालकनी में रखी कुरसी पर चढ़ कर नीचे छलांग लगा दी. नीचे गिरते ही उस की मौत हो गई. रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट के सिक्योरिटी गार्ड जगदीश ने किसी भारी वस्तु के गिरने की आवाज सुनी तो वह वहां पहुंचा और महिला की लाश देख कर शोर मचाया. शोर व बच्चे के रोने की आवाज सुन कर सुशील वर्मा की नींद खुली तो वह कमरे में आया. कमरे में मंजू नहीं दिखी तो बालकनी पर पहुंचा. वहां से झांका तो उस के होश उड़ गये. नीचे आ कर देखा तो मंजू की लाश पड़ी थी. उस ने फोन से मंजू की मौत की सूचना बड़े भाई सुनील वर्मा तथा छोटे भाई सुधीर को दी. सुधीर ने मंजू के पिता अर्जुन प्रसाद को फोन पर सूचना दी. तब वह कानपुर पहुंचे.

इधर सिक्योरिटी गार्ड जगदीश की सूचना पर बिठूर थानाप्रभारी अमित मिश्रा रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट पहुंचे और शव को कब्जे में ले कर जांच शुरू की. जांच से पता चला कि मंजू वर्मा ने तनाव में 8वीं मंजिल से छलांग लगा कर जान दी है. लेकिन उन के पिता ने दहेज हत्या मे रिपोर्ट दर्ज कराई थी. अत: रिपोर्ट के आधार पर ही मंजू वर्मा के पति सुशील वर्मा को गिरफ्तार किया गया. 16 मई, 2021 को बिठूर पुलिस ने डा. सुशील वर्मा को चौबेपुर की अस्थाई जेल भेजा, जहां कोरोना जांच तथा अन्य औपचारिकताएं पूरी की गईं. इस के बाद 27 मई, 2021 को उन्हें कानपुर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

दूसरे आरोपी सुनील वर्मा जो बेसिक शिक्षा अधिकारी है, को पुलिस ने अभी तक गिरफ्तार नहीं किया था. शासनप्रशासन की अनुमति के बाद ही उस की गिरफ्तारी संभव हो सकेगी. कथा संकलन तक सुशील वर्मा की जमानत मंजूर नहीं हुई थी. Family Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

पहले महाकुंभ लाया, फिर बीवी की हत्या कर दी : वजह जान कर चौंक जाएंगे

UP Crime : उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हुई एक सनसनीखेज वारदात ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. आरोप है कि एक पति ने पहले तो पत्नी को कुंभ स्नान कराने के बहाने बुलाया फिर उस की बेरहमी से हत्या कर दी. जिस किसी ने भी इस घटना के बारे में सुना, वह हैरान रह गया. इस दिल दहला देने वाली घटना की पूरी कहानी जान कर आप के भी रौंगटे खड़े हो जाएंगे।

प्रयागराज की घटना

घटना उतर प्रदेश के प्रयागराज की है, जहां भारत से ले कर दुनियाभर से लोग महाकुंभ  (Mahakumbh) स्नान के लिए आए थे. इसी भीड़ का फायदा उठा कर पति ने अपनी पत्नी मीनाक्षी को दिल्ली से बुला कर हत्या कर दी और मौके से फरार हो गया, लेकिन सीसीटीवी फुटेज और मृतका मीनाक्षी के बेटे की मदद से पुलिस ने कातिल पति को अरैस्ट कर लिया है.

कातिल पति अपनी पत्नी को झूंसी इलाके के एक लौज में बेरहमी से मार कर फरार हो गया. बताया जा रहा है कि कातिल पति का दूसरी महिला से अवैध संबंध चल रहा था, इसलिए उस ने अपनी पत्नी को मौत के घाट उतार दिया.

अवैध संबंध का निकला चक्कर

कातिल पति अशोक वाल्मिकी ने दिल्ली से अपनी पत्नी मीनाक्षी को महाकुंभ स्नान के लिए प्रयागराज बुलाया. महाकुंभ स्नान को ले कर मीनाक्षी बहुत खुश थी और इसीलिए संगमतट पर स्नान करने आई थी.

अशोक ने अपनी पत्नी मीनाक्षी के साथ एक वीडियो भी बनाया और सोशल मीडिया पर भी पोस्ट किया. ऐसा इसलिए ताकि सभी को लगे कि वे महाकुंभ स्नान करने आए हैं.

रात में अशोक ने अपनी पत्नी के लिए झूंसी के एक लौज में ₹500 में एक कमरा लिया. लेकिन पत्नी को बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि आज उस की आखिरी रात होगी. रात जब गहराई तो आरोपी अशोक ने बाथरूम में पत्नी मीनाक्षी की बेरहमी से हत्या कर दी और सामान लेने के बहाने लौज से रात को ही फरार हो गया.

महिला की लाश देख चौंके लोग

सुबह होने पर जब लौज के स्टाफ ने बाथरूम में एक महिला की लाश देखी तो वे चौंक गए. तुरंत घटना की सूचना पुलिस को दी गई, लेकिन लौज में आईडी जमा न होने की वजह से मृतक महिला की पहचान मुश्किल थी.

कातिल पति का खुलासा

जब पुलिस कातिल का सुराग ढूंढ़ने लगी तो आसपास के सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकाले गए. इन्हीं फुटेज के आधार पर कातिल की पहचान हो गई. इसी दौरान मीनाक्षी का बेटा अश्विनी 21 फरवरी, 2025 को मां को खोजतेखोजते प्रयागराज पहुंच गया. वह झूंसी थाने में भी गया और थाने में एक तसवीर को देख कर बोला कि यह मेरी मां है, जो महाकुंभ मेले में खो गई है. जब पुलिस ने अश्विनी को लौज से वरामद लाश दिखाई तो अश्विनी फफकफफक कर रो पङा.

प्रेम प्रसंग के चक्कर में मारा पत्नी को

पुलिस के द्वारा कातिल अशोक को अरैस्ट कर लिया गया है, जहां उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया है. अशोक ने बताया कि उस का एक महिला के साथ अवैध संबंध चल रहा था और पत्नी उस का विरोध करती थी. इसी कारण उस ने पत्नी को महाकुंभ स्नान के बहाने बुला कर उस की हत्या कर दी.

कैसे पकड़ा गया कातिल

पुलिस ने अशोक के बेटे के जरिए उसे बुलाया और बहराना में पहुंचते ही अरैस्ट कर लिया. जब पुलिस ने अशोक से पूछताछ की तो उस ने अपना जुर्म कबुल कर लिया, जिस के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

Kanpur Crime : कुंभ स्नान ले जाने के बहाने पत्नी और बेटे का कर दिया कत्ल

Kanpur Crime : सुमन ने अपने मातापिता की इज्जत की परवाह न कर के अमित वर्मा से प्रेम विवाह किया था. लेकिन जब अमित वर्मा की जिंदगी में खुशी आई तो उसे प्रेमिका से पत्नी बनी सुमन आंखों में खटकने लगी. आखिरकार…

31 जुलाई, 2019 का दिन था. सुबह के  करीब 10 बज रहे थे. कानपुर जिले की एसपी (साउथ) रवीना त्यागी अपने कार्यालय में मौजूद थीं, तभी एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति उन के पास आया. वह बेहद मायूस नजर आ रहा था. उस के माथे पर चिंता की लकीरें दिखाई दे रही थीं. वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘साहब, मेरा नाम मकसूद प्रसाद विश्वकर्मा है. मैं नौबस्ता थाने के राजीव विहार मोहल्ले में रहता हूं. मेरी बेटी सुमन ने करीब 8 साल पहले राजेश वर्मा के बेटे अमित वर्मा के साथ प्रेम विवाह किया था. चूंकि बेटी ने यह काम हम लोगों की मरजी के खिलाफ किया था, इसलिए हम ने उस से नाता तोड़ लिया था.

बच्चों के लिए मांबाप का दिल बहुत बड़ा होता है. 2 साल पहले जब वह घर लौटी तो हमें अच्छा ही लगा. तब से बेटी ने हमारे घर आनाजाना शुरू कर दिया था. उस के साथ उस का बेटा निश्चय भी आता था. उस ने हमें बताया था कि वह रवींद्रनगर, नौबस्ता में अमित वर्मा के साथ रह रही है. पर दिसंबर, 2018 से वह हमारे घर नहीं आई. हम ने उस के मोबाइल फोन पर बात करने की कोशिश की लेकिन उस का मोबाइल भी बंद मिला. हम ने बेटी सुमन व नाती निश्चय के संबंध में दामाद अमित वर्मा से फोन पर बात की तो वह पहले तो खिलखिला कर हंसा फिर बोला, ‘‘ससुरजी, अपनी बेटी और नाती को भूल जाओ.’’

मकसूद प्रसाद विश्वकर्मा ने बताया कि अमित वर्मा की बात सुन कर मेरा माथा ठनका. हम ने गुप्त रूप से जानकारी जुटाई तो पता चला कि दिसंबर के आखिरी सप्ताह से सुमन अपने बेटे के साथ घर से लापता हैं. यह भी जानकारी मिली कि 3 माह पहले अमित ने खुशी नाम की युवती से दूसरा विवाह रचा लिया है. वह हंसपुरम में उसी के साथ रह रहा है. मकसूद ने एसपी के सामने आशंका जताई कि अमित वर्मा ने सुमन व नाती निश्चय की हत्या कर लाश कहीं ठिकाने लगा दी है. उस ने मांग की कि अमित के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवा कर उचित काररवाई करें. मकसूद प्रसाद विश्वकर्मा की बातों से एसपी रवीना त्यागी को मामला गंभीर लगा. उन्होंने उसी समय थाना नौबस्ता के थानाप्रभारी समरबहादुर सिंह यादव को अपने औफिस बुलाया.

उन्होंने थानाप्रभारी को आदेश दिया कि इस मामले की तुरंत जांच करें और अगर कोई दोषी है तो उसे तुरंत गिरफ्तार करें. एसपी साहब का आदेश पाते ही थानाप्रभारी मकसूद प्रसाद को साथ ले कर थाने लौट गए और उन्होंने मकसूद से इस संबंध में विस्तार से बात की. इस के बाद उन्होंने उसी शाम आरोपी अमित वर्मा को थाने बुलवा लिया. थाने में उन्होंने उस से उस की पत्नी सुमन और बेटे निश्चय के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया कि 24 दिसंबर, 2018 की रात सुमन अपने बेटे को ले कर बिना कुछ बताए कहीं चली गई थी. अमित वर्मा के अनुसार, उस ने उन दोनों को हर संभावित जगह पर खोजा, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चला. तब उस ने 28 दिसंबर को नौबस्ता थाने में पत्नी और बेटे के गुम होने की सूचना दर्ज करा दी थी.

यही नहीं, शक होने पर उस ने पड़ोस में रहने वाली मनोरमा नाम की महिला पर कोर्ट के माध्यम से पत्नी व बेटे को गायब कराने को ले कर उस के खिलाफ धारा 156 (3) के तहत कोर्ट के आदेश पर मुकदमा भी दर्ज कराया था लेकिन पुलिस ने जांच के बाद उसे क्लीन चिट दे दी थी. थानाप्रभारी ने अमित वर्मा की बात की पुष्टि के लिए थाने का रिकौर्ड खंगाला तो उस की बात सही निकली. थाने में उस ने पत्नी और बेटे की गुमशुदगी दर्ज कराई थी और पड़ोसी महिला मनोरमा पर कोर्ट के आदेश पर मुकदमा भी दर्ज हुआ था. चूंकि मनोरमा पर आरोप लगा था, अत: थानाप्रभारी समरबहादुर सिंह ने मनोरमा को थाने बुलवाया.

उन्होंने उस से सुमन और उस के बेटे निश्चय के गुम होने के संबंध में सख्ती से पूछताछ की. तब मनोरमा ने उन्हें बताया कि अमित वर्मा बेहद शातिरदिमाग है. वह पुलिस को बारबार गुमराह कर के उसे फंसाने की कोशिश कर रहा है. जबकि वह बेकसूर है. मनोरमा ने थानाप्रभारी समरबहादुर सिंह को यह भी बताया कि 23 दिसंबर, 2018 को उस की सुमन से बात हुई थी. उस ने बताया था कि वह अपने पति के साथ कुंभ स्नान करने प्रयागराज जा रही है. दूसरे रोज वह अमित के साथ चली गई थी. लेकिन वह उस के साथ वापस नहीं आई. शक है कि अमित ने पत्नी व बेटे की हत्या कर उन की लाशें कहीं ठिकाने लगा दी हैं. मनोरमा से पूछताछ के बाद उसे घर भेज दिया गया.

अमित वर्मा की ओर शक की सुई घूमी तो थानाप्रभारी ने सच का पता लगाने के लिए अपने मुखबिर लगा दिए. साथ ही खुद भी हकीकत का पता लगाने में जुट गए. मुखबिरों ने राजीव विहार, गल्लामंडी तथा रवींद्र नगर में दरजनों लोगों से अमित के बारे में जानकारी जुटाई. इस के अलावा मुखबिरों ने अमित पर भी नजर रखी. मसलन वह कहां जाता है, किस से मिलता है और उस के मददगार कौन हैं. 11 अगस्त, 2019 की सुबह 10 बजे 2 मुखबिरों ने थानाप्रभारी को एक चौंकाने वाली जानकारी दी. मुखबिरों ने बताया कि सुमन और उस के बेटे निश्चय की हत्या अमित वर्मा ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर की है. दरअसल, अमित वर्मा के नाजायज संबंध देवकीनगर की खुशी नाम की युवती से बन गए थे. इन रिश्तों का सुमन विरोध करती थी. खुशी से शादी रचाने के लिए सुमन बाधक बनी हुई थी.

यह सूचना मिलते ही थानाप्रभारी समरबहादुर सिंह ने अमित वर्मा को गिरफ्तार कर लिया. थाने में जब उस से पूछताछ की गई तो पहले तो वह पुलिस को बरगलाता रहा लेकिन सख्ती करने पर वह टूट गया और पत्नी सुमन तथा बेटे निश्चय की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उस ने बताया कि पत्नी और 6 साल के बेटे की हत्या उस ने देवकीनगर निवासी संजय शर्मा तथा कबीरनगर निवासी मोहम्मद अख्तर उर्फ गुड्डू मिस्त्री की मदद से की थी. यह पता चलते ही थानाप्रभारी ने पुलिस टीम के साथ संजय शर्मा तथा मोहम्मद अख्तर उर्फ गुड्डू मिस्त्री को भी गिरफ्तार कर लिया. थाने में जब दोनों का सामना अमित वर्मा से हुआ तो उन्होंने भी हत्या का जुर्म कबूल लिया.

पूछताछ करने पर अमित वर्मा ने बताया कि उस ने सुमन व उस के बेटे की हत्या कौशांबी जिले में लाडपुर के पास एक सुनसान जगह पर की थी और वहीं सड़क किनारे लाशें फेंक दी थीं. दोनों की हत्या किए 7 महीने से ज्यादा बीत गए थे, इसलिए मौके पर लाशें नहीं मिल सकती थीं. उम्मीद थी कि लाशें संबंधित थाने की पुलिस ने बरामद की होंगी. यह सोच कर थानाप्रभारी तीनों आरोपियों और शिकायतकर्ता मकसूद प्रसाद विश्वकर्मा को साथ ले कर कौशांबी के लिए निकल पड़े. सब से पहले वह लाडपुर गांव की उस पुलिया के पास पहुंचे, जहां आरोपियों ने सुमन को तेजाब से झुलसाने के बाद गला दबा कर उन की हत्याएं कीं और लाशें फेंक दी थीं.

पुलिस ने सड़क किनारे झाडि़यों में सुमन की लाश ढूंढी लेकिन वहां लाश मिलनी तो दूर, उस का कोई सबूत भी नहीं मिला. तीनों आरोपियों ने बताया कि 6 वर्षीय निश्चय की हत्या उन्होंने लोडर के डाले से सिर टकरा कर की थी. इस के बाद उसे निर्वस्त्र कर लाश पुलिया से करीब एक किलोमीटर दूर चमरूपुर गांव के पास सड़क किनारे फेंकी थी. पुलिस उन्हें ले कर चमरूपुर गांव के पास उस जगह पहुंची, जहां उन्होंने बच्चे की लाश फेंकने की बात बताई थी. पुलिस ने वहां भी झाडि़यों वगैरह में लाश ढूंढी, लेकिन लाश नहीं मिल सकी. जिन जगहों पर दोनों लाशें फेंकी गई थीं, वह क्षेत्र थाना कोखराज के अंतर्गत आता था. अत: पुलिस थाना कोखराज पहुंच गई.

थानाप्रभारी समरबहादुर सिंह ने कोखराज थाना पुलिस को सुमन व उस के बेटे की हत्या की बात बताई. कोखराज पुलिस ने रिकौर्ड खंगाला तो पता चला 25 दिसंबर, 2018 की सुबह क्षेत्र के 2 अलगअलग स्थानों से 2 लाशें मिली थीं. एक लाश महिला की थी, जिस की उम्र 30 वर्ष के आसपास थी. उस का चेहरा तेजाब डाल कर जलाया गया था. दूसरी लाश निर्वस्त्र हालत में एक बालक की थी, जिस की उम्र करीब 6 वर्ष थी. इन दोनों लाशों की सूचना कोखराज गांव के प्रधान गुलेश बाबू ने दी थी. दोनों लाशों की शिनाख्त नहीं हो पाने पर अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली गई.

थाना कोखराज पुलिस के पास दोनों लाशों के फोटोग्राफ्स मौजूद थे. फोटोग्राफ्स मकसूद प्रसाद को दिखाए तो वह फोटो देखते ही फफक कर रो पड़ा. उस ने बताया कि फोटो उस की बेटी सुमन तथा नाती निश्चय के हैं. सिंह ने उसे धैर्य बंधाया और थाने का रिकौर्ड तथा फोटो आदि हासिल कर थाना नौबस्ता लौट आए. थानाप्रभारी समरबहादुर सिंह ने सारी जानकारी एसपी रवीना त्यागी को दे दी और मकसूद प्रसाद विश्वकर्मा की तरफ से अमित वर्मा, संजय शर्मा और मोहम्मद अख्तर उर्फ गुड्डू मिस्त्री के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 326 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

एसपी (साउथ) रवीना त्यागी ने अपने कार्यालय में प्रैसवार्ता आयोजित कर मीडिया के सामने इस घटना का खुलासा किया. अभियुक्तों से पूछताछ के बाद दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह काफी दिलचस्प थी—

उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के कस्बा नौबस्ता में एक मोहल्ला है राजीव विहार. मकसूद प्रसाद विश्वकर्मा इसी मोहल्ले में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी कमला देवी के अलावा एक बेटी सुमन और 2 बेटे थे. मेहनतमजदूरी कर के वह जैसेतैसे अपने परिवार को पाल रहा था. मकसूद प्रसाद की बेटी सुमन खूबसूरत थी. उस ने जब जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो उस की सुंदरता में और भी निखार आ गया. एक रोज सुमन छत पर खड़ी अपने गीले बालों को सुखा रही थी. तभी उस के कानों में फेरी लगा कर ज्वैलरी की सफाई करने वाले की आवाज आई.

उस की आवाज सुनते ही सुमन छत से नीचे उतर आई. उस की चांदी की पायल गंदी दिख रही थी, वह उन की सफाई कराना चाहती थी, इसलिए फटाफट बक्से में रखी अपनी पायल निकाल कर साफ कराने के लिए ले गई. ज्वैलरी की सफाई करने वाला नौजवान युवक था. खूबसूरत सुमन को देख कर वह प्रभावित हो गया. उस ने सुमन की पायल कैमिकल घोल में डाल कर साफ कर दीं. पायल एकदम नई जैसी चमकने लगीं. पायल देख कर सुमन बहुत खुश हुई. पायल ले कर वह घर जाने लगी तो कारीगर बोला, ‘‘बेबी, पायल पहन कर देख लो, मैं भी तो देखूं तुम्हारे दूधिया पैरों में ये कैसी लगेंगी.’’

अपने पैरों की तारीफ सुन कर सुमन की निगाहें अनायास ही कारीगर के चेहरे पर जा टिकीं. उस समय उस की आंखों में प्यार का समंदर उमड़ रहा था. कारीगर की बात मानते हुए सुमन ने उस के सामने बैठ कर पायल पहनीं तो वह बोला, ‘‘तुम्हारे खूबसूरत पैरों में पायल खूब फब रही हैं. वैसे बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?’’

‘‘पूछो, क्या जानना चाहते हो?’’ वह बोली.

‘‘तुम्हारा नाम जानना चाहता हूं.’’ उस ने कहा.

‘‘मेरा नाम सुमन है.’’ कुछ पल रुकने के बाद सुमन बोली, ‘‘तुम ने मेरा नाम तो पूछ लिया, पर अपना नहीं बताया.’’

‘‘मेरा नाम अमित वर्मा है. मैं राजीव विहार में ही रहता हूं. राजीव विहार में मेरा अपना मकान है. मेरे पिता भी यही काम करते हैं. फेरी लगा कर जेवरों की सफाई करना मेरा पुश्तैनी धंधा है.’’

पहली ही नजर में सुमन और अमित एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए. उसी समय दोनों ने एकदूसरे को अपने मोबाइल नंबर दे दिए थे. फिर सुमन घर चली गई. अमित भी हांक लगाता हुआ आगे बढ़ गया. उस रोज रात में न तो सुमन को नींद आई और न ही अमित को. दोनों ही एकदूसरे के बारे में सोचते रहे. दोनों के दिलों में चाहत बढ़ी तो उन की मुलाकातें भी होने लगीं. मोबाइल फोन पर बात कर के मिलने का समय व स्थान तय हो जाता था. इस तरह उन की मुलाकातें कभी संजय वन में तो कभी किदवई पार्क में होने लगीं. एक रोज अमित ने उस से कहा, ‘‘सुमन, मैं तुम से बेइंतहा प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना अब मैं नहीं रह सकता. मैं तुम्हें अपना जीवनसाथी बनाना चाहता हूं.’’

सुमन कुछ पल मौन रही. फिर बोली, ‘‘अमित, मैं भी हर कदम पर तुम्हारा साथ देने को तैयार हूं.’’

सुमन और अमित का प्यार परवान चढ़ ही रह था कि एक रोज उन के प्यार का भांडा फूट गया. सुमन के भाई दीपू ने दोनों को किदवई पार्क में हंसीठिठोली करते देख लिया. उस ने यह बात अपने मातापिता को बता दी. कुछ देर बाद सुमन वापस घर आई तो मां कमला ने उसे आड़े हाथों लेते हुए खूब डांटाफटकारा. इस के बाद घर वालों ने सुमन के घर से बाहर निकलने पर प्रतिबंध लगा दिया. लेकिन सुमन को प्रतिबंध मंजूर नहीं था. वह अमित के प्यार में इतनी गहराई तक डूब गई थी, जहां से बाहर निकलना संभव नहीं था. आखिर एक रोज सुमन अपने मांबाप की इज्जत को धता बता कर घर से निकल गई. फिर बाराह देवी मंदिर जा कर अमित से शादी कर ली. अमित ने सुमन की मांग में सिंदूर भर कर उसे पत्नी के रूप में अपना लिया.

सुमन से शादी करने के बाद अमित, सुमन को साथ ले कर अपने राजीव विहार स्थित घर पहुंचा तो उस के मातापिता ने सुमन को बहू के रूप में स्वीकारने से मना कर दिया. क्योंकि वह उन की बिरादरी की नहीं थी. हां, उन्होंने दोनों को घर में पनाह जरूर दे दी. सुमन ने अपनी सेवा से सासससुर का मन जीतने की भरसक कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हुई. अमित के पिता राजेश वर्मा को सदैव इस बात का भय बना रहता था कि सुमन को ले कर उस के घर वाले कोई बवाल न खड़ा कर दें. अत: उन्होंने राजीव विहार वाला अपना मकान बेच दिया और नौबस्ता गल्लामंडी में किराए का मकान ले कर रहने लगा.

चूंकि पिता का मकान बिक चुका था, इसलिए अमित भी नौबस्ता के रवींद्र नगर में किराए पर मकान ले कर सुमन के साथ रहने लगा. इधर सुमन के मातापिता भी गायब हुई बेटी को अपने स्तर से ढूंढ रहे थे. उन्होंने बदनामी की वजह से पुलिस में शिकायत नहीं की थी. कुछ समय बाद उन्हें जानकारी हुई कि सुमन ने अमित के साथ ब्याह रचा लिया है. इस का उन्हें बहुत दुख हुआ. इतना ही नहीं, उन्होंने सुमन से नाता तक तोड़ लिया. उन्होंने यह सोच कर कलेजे पर पत्थर रख लिया कि सुमन उन के लिए मर गई है. अमित सुमन को बहुत प्यार करता था. वह हर काम सुमन की इच्छानुसार करता था. सुमन भी पति का भरपूर खयाल रखती थी. इस तरह हंसीखुशी से 3 साल कब बीत गए, उन्हें पता ही नहीं चला. इन 3 सालों में सुमन ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम निश्चय रखा गया.

बेटे के जन्म के बाद सुमन के घरआंगन में किलकारियां गूंजने लगीं. निश्चय जब 3 साल का हुआ तो सुमन ने उस का दाखिला विवेकानंद विद्यालय में करा दिया. सुमन ही निश्चय को स्कूल भेजने व छुट्टी होने पर घर लाने का काम करती थी. कुछ समय बीतने के बाद स्थितियों ने करवट बदली. धीरेधीरे सुमन की मुसकान गायब हो गई. पति न केवल उस से दूर भागने लगा बल्कि बातबात पर उसे डांटनेफटकारने भी लगा. वह देर रात घर लौटता था. कभीकभी तो पूरी रात गायब रहता. यह सब सुमन की चिंता का कारण बन गया.  वह हमेशा उदास रहने लगी. वह सब कुछ सहती रही. आखिरकार जब स्थिति सहन सीमा से बाहर हो गई, तब उस ने पति के स्वभाव में इस परिवर्तन का पता लगाने का निश्चय किया.

सुमन को यह जान कर गहरा सदमा लगा कि उस का पति खुशी नाम की युवती के प्रेम जाल में फंस गया है. उसे खुशी के बारे में यह भी पता चला कि वह जितनी सुंदर है, उतनी ही चंचल और मुंहफट भी है. वह देवकीनगर में किराए के मकान में रहती है. उस के मांबाप नहीं हैं. एक भाई है, जो शराबी तथा आवारा है. बहन पर उस का कोई नियंत्रण नहीं है. फेरी लगाने के दौरान जिस तरह अमित ने सुमन को फांसा था, उसी तरह उस ने खुशी को भी फांस लिया था. वह उस का इतना दीवाना हो गया था कि अपनी पत्नी और बच्चे को भी भूल गया. हर रोज घर में देर से आना और पूछने पर कोई न कोई बहाना बना देना, उस की दिनचर्या बन गई थी.

सुमन पहले तो अमित की बातों पर विश्वास कर लेती थी किंतु जब असलियत का पता चला तो उस का नारी मन विद्रोह पर उतर आया. भला उसे यह कैसे गवारा हो सकता था कि उस के रहते उस का पति किसी दूसरी औरत की ओर आंख उठा कर देखे. वह इस का विरोध करने लगी. लेकिन अमित अपनी हरकतों से बाज नहीं आया. उलटे वह सुमन को ही प्रताडि़त करने लगा. खुशी से नाजायज रिश्तों को ले कर घर में कलह बढ़ने लगी. पतिपत्नी आए दिन एकदूसरे से झगड़ने लगे. इस तनावपूर्ण वातावरण में एक बुराई और घर में घुस आई. अमित को शराब की लत पड़ गई.

शराब पीने के बाद वह सुमन को बेतहाशा पीटता पर सुमन थी कि सब कुछ सह लेती थी. उस के सामने समस्या यह भी थी कि वह किसी से अपना दुखदर्द बांट भी नहीं सकती थी. मांबाप से उस के संबंध पहले ही खराब हो चुके थे. एक दिन तो अमित ने हद ही कर दी. वह खुशी को अपने घर ले आया. उस समय सुमन घर पर ही थी. खुशी को देख कर सुमन का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने पति को खूब खरीखोटी सुनाई. इतना ही नहीं, उस ने खुशी की बेइज्जती करते हुए उसे भी खूब लताड़ा. बेइज्जती हुई तो खुशी उसी समय वहां से चली गई. उस के यूं चले जाने पर अमित सुमन पर कहर बन कर टूट पड़ा. उस ने सुमन की जम कर पिटाई की. सुमन रोतीतड़पती रही.

सुमन की एक पड़ोसन थी मनोरमा. अमित जब घर पर नहीं होता तब वह मनोरमा के घर चली जाया करती थी. सुमन उस से बातें कर अपना गम हलका कर लेती थी. एक रोज मनोरमा ने सुमन से कहा कि बुरे वक्त में अपने ही काम आते हैं. ऐसे में तुम्हें अपने मायके आनाजाना शुरू कर देना चाहिए. मांबाप बड़े दयालु होते हैं, हो सकता है कि वे तुम्हारी गलती को माफ कर दें. पड़ोसन की यह बात सुमन को अच्छी लगी. वह हिम्मत जुटा कर एक रोज मायके जा पहुंची. सुमन के मातापिता ने पहले तो उस के गलत कदम की शिकायत की फिर उन्होंने उसे माफ कर दिया. इस के बाद सुमन मायके आनेजाने लगी. सुमन ने मायके में कभी यह शिकायत नहीं की कि उस का पति उसे मारतापीटता है और उस का किसी महिला से चक्कर चल रहा है.

इधर ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था, त्योंत्यों खुशी अमित के दिलोदिमाग पर छाती जा रही थी. वह खुशी से शादी रचा कर उसे अपनी पत्नी बनाना चाहता था, लेकिन इस रास्ते में सुमन बाधा बनी हुई थी. खुशी ने अपना इरादा जता दिया था कि एक म्यान में 2 तलवारें नहीं रह सकतीं. यानी जब तक सुमन उस के साथ है, तब तक वह उस की जीवनसंगिनी नहीं बन सकती. खुशी का यह फैसला सुनने के बाद अमित परेशान रहने लगा कि वह किस तरह इस समस्या का समाधान करे. अमित वर्मा का एक दोस्त था संजय शर्मा. वह देवकीनगर में रहता था और केबल औपरेटर था. वह भी अमित की तरह अपनी पत्नी से पीडि़त था. उस की पत्नी संजय को छोड़ कर मायके में रह रही थी.

उस ने संजय के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मुकदमा भी दर्ज करा रखा था. अमित ने अपनी परेशानी संजय शर्मा को बताई तो संजय ने सलाह दी कि वह अपनी पत्नी सुमन व उस के बच्चे को खत्म कर दे. तभी उस की समस्या का निदान हो सकता है. खुशी से विवाह रचाने के लिए अमित पत्नीबेटे की हत्या करने को राजी हो गया. उस ने इस बारे में संजय से चर्चा की तो उस ने अमित की मुलाकात मोहम्मद अख्तर उर्फ गुड्डू मिस्त्री से कराई. अख्तर नौबस्ता क्षेत्र के कबीरनगर में रहता था. वह लोडर चलाता था. साथ ही लोडर मिस्त्री भी था. मोहम्मद अख्तर मूलरूप से कौशांबी जिले के कोखराज थाना क्षेत्र के गांव मारूकपुरवा का रहने वाला था. उस की पत्नी मेहरुन्निसा गांव में ही रहती थी.

अमित, संजय व मोहम्मद अख्तर ने सिर से सिर जोड़ कर हत्या की योजना बनाई. संजय ने गुड्डू मिस्त्री से सलाह मशविरा कर अमित से 35 हजार रुपए में हत्या का सौदा कर लिया. अमित ने संजय को 10 हजार रुपए एडवांस दे दिए. चूंकि अब योजना को अंजाम देना था, इसलिए अमित ने सुमन के साथ अच्छा बर्ताव करना शुरू कर दिया. वह उस से प्यार भरा व्यवहार करने लगा. उस ने सुमन से वादा किया कि अब वह खुशी के संपर्क में नहीं रहेगा. पति के इस व्यवहार से सुमन गदगद हो उठी. उस ने सहज ही पति की बातों पर भरोसा कर लिया. यही उस की सब से बड़ी भूल थी.

योजना के तहत 23 दिसंबर, 2018 को अमित वर्मा और संजय मूलगंज बाजार पहुंचे. वहां से अमित ने एक बोतल तेजाब खरीदा. शाम को अमित ने सुमन से कहा कि कल हम लोग कुंभ स्नान को प्रयागराज जाएंगे. सुमन राजी हो गई. उस ने रात में ही प्रयागराज जाने की सारी तैयारी कर ली. योजना के मुताबिक 24 दिसंबर, 2018 की शाम 7 बजे अमित, पत्नी सुमन व बेटे निश्चय को साथ ले कर रामादेवी चौराहा पहुंचा. पीछे से मोहम्मद अख्तर भी लोडर ले कर रामादेवी चौराहा पहुंच गया. उस के साथ संजय शर्मा भी था. लोडर अमित के पास रोक कर अख्तर ने उस से पूछा कि कहां जा रहे हो तुम लोग॒. तब अमित ने कहा, ‘‘हम कुंभ स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे हैं.’’

‘‘मैं भी लोडर ले कर प्रयागराज जा रहा हूं, उधर से वापसी के समय लोडर में पत्थर लाऊंगा. अगर तुम लोग चाहो तो मेरे साथ चल सकते हो.’’ मोहम्मद अख्तर बोला.

अमित ने सुमन से कहा कि लोडर चालक उस का दोस्त है. वह प्रयागराज जा रहा है. ऐतराज न हो तो लोडर से ही निकल चलें. किराया भी बच जाएगा. सुमन को क्या पता थी कि यह अमित की चाल है और इस में उस का पति भी शामिल है. वह तो पति पर विश्वास कर के राजी हो गई. उस के बाद अमित वर्मा, पत्नी व बेटे के साथ लोडर में पीछे बैठ गया, जबकि संजय आगे बैठा. उस के बाद मोहम्मद अख्तर लोडर स्टार्ट कर चल पड़ा. मोहम्मद अख्तर ने जीटी रोड स्थित एक ढाबे पर लोडर रोक दिया. वहां अमित, संजय व गुड्डू ने खाना खाया तथा शराब पी. अधिक सर्दी होने का बहाना बना कर अमित ने सुमन को भी शराब पिला दी. इस के बाद ये लोग चल दिए. कौशांबी जिले के लाडपुर गांव के पास पहुंच कर मोहम्मद अख्तर ने एक पुलिया के पास सुनसान जगह पर गाड़ी रोक दी.

संजय और मोहम्मद अख्तर उतर कर पीछे आ गए. इस के बाद संजय व मोहम्मद अख्तर ने सुमन को दबोच लिया और अमित ने सुमन कोतेजाब से  नहला दिया. सुमन जलन से चीखी तो अमित ने उसे गला दबा कर मार डाला. मां की चीख सुन कर 6 साल का बेटा निश्चय जाग गया. संजय ने बच्चे का सिर लोडर के डाले से पटकपटक कर उसे मार डाला. इन लोगों ने सुमन की लाश लाडपुर पुलिया के पास सड़क किनारे फेंक दी तथा वहां से लगभग एक किलोमीटर आगे जा कर निश्चय की निर्वस्त्र लाश भी फेंक दी. इस के बाद तीनों प्रयागराज गए. वहां से दूसरे रोज लोडर पर पत्थर लाद कर वापस कानपुर आ गए.

25 दिसंबर, 2018 की सुबह कोखराज के ग्रामप्रधान गुलेश बाबू सुबह की सैर पर निकले तो उन्होंने लाडपुर पुलिया के पास महिला की लाश तथा कुछ दूरी पर एक मासूम बच्चे की लाश देखी. उन्होंने यह सूचना कोखराज थाना पुलिस को दी. पुलिस ने दोनों लाशें बरामद कर उन की शिनाख्त कराने की कोशिश की लेकिन उन्हें कोई भी नहीं पहचान सका. शिनाख्त न होने पर पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिए. गुलेश बाबू को वादी बना कर पुलिस ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली.

इधर शातिरदिमाग अमित वर्मा ने दोस्त संजय की सलाह पर 28 दिसंबर को थाना नौबस्ता में तहरीर दी कि उस की पत्नी सुमन 24 दिसंबर की रात अपने बेटे निश्चय के साथ बिना कुछ बताए घर से चली गई है. उस का कहीं पता नहीं चल रहा है. इस तहरीर पर पुलिस ने साधारण पूछताछ की, फिर शांत हो कर बैठ गई.  इस के बाद अमित ने पड़ोसी महिला मनोरमा को फंसाने के लिए 156 (3) के तहत कोर्ट से मुकदमा कायम करा दिया. उस ने मनोरमा पर आरोप लगाया कि उस की पत्नी व बच्चे को गायब करने से उस का ही हाथ है. पर जांच में आरोप सही नहीं पाया गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने मनोरमा को छोड़ दिया. अप्रैल, 2019 को अमित ने खुशी से शादी कर ली और हंसपुरम में उस के साथ रहने लगा.

सुमन, महीने में एक या 2 बार मायके आ जाती थी. पर पिछले 7 महीने से वह मायके नहीं आई थी, जिस से सुमन के पिता मकसूद प्रसाद को चिंता हुई. उस ने दामाद अमित से बात की तो उस ने बेटी नाती को भूल जाने की बात कही. शक होने पर मकसूद ने 31 जुलाई, 2019 को एसपी रवीना त्यागी को जानकारी दी. इस के बाद ही केस का खुलासा हो सका. 12 अगस्त, 2019 को पुलिस ने अभियुक्त अमित वर्मा, संजय शर्मा तथा मोहम्मद अख्तर को कानपुर कोर्ट के रिमांड मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश किया, जहां से तीनों को जिला कारागार भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Social story : महाकुंभ बना मृत्युकुंभ

Social story : प्रयागराज महाकुंभ हादसे से पहले आयोजित कुंभ और अद्र्धकुंभ मेलों में भी हादसे हुए थे, लेकिन योगी सरकार ने उन हादसों से सबक लेने के बजाए अपना ध्यान मेले का राजनीतिक लाभ लेने के साथ वीवीआईपी व्यवस्थाओं पर जोर दिया. जितने स्तर पर इस मेले का प्रचार किया गया, काश! उसी स्तर पर सुरक्षा के इंतजाम किए होते तो…

28 और 29 जनवरी, 2025 की दरम्यानी रात थी. हिंदू आस्था के प्रतीक शहर प्रयागराज में 144 साल बाद लगे महाकुंभ में मौनी अमावस्या के अमृत स्नान के कारण आस्था में डूबे लाखोंकरोड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति से जनसैलाब का मंजर था. हर कोई संगम नोज में स्नान करने को व्याकुल था. वैसे तो मौनी अमावस्या का मुहूर्त 28 जनवरी की शाम 7.35 बजे से ही शुरू हो चुका था, लेकिन हर कोई अपनी आस्था के कारण मध्यरात्रि के बाद और ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने को आतुर था. 

चाहे धर्मभीरु सम्राट हर्षवर्धन का दौर रहा हो या फिर सैकड़ों वर्षों की गुलामी का कालखंड. कुंभ में आस्था का यह जन प्रवाह कभी नहीं रुका. पद्मपुराण में कहा गया है, ‘आगच्छन्ति माघ्यां तु, प्रयागे भरतर्षभ…यानी माघ महीने में सूर्य जब मकर राशि में गोचर करते हैं, तब संगम में स्नान से करोड़ों तीर्थों के बराबर पुण्य मिल जाता है. लोक धारणा है कि इस अवधि में जो श्रद्धालु प्रयाग के संगम तट पर में स्नान करते हैं, वह हर तरह के पापों से मुक्त हो जाते हैं.

इसी आस्था में डूबे श्रद्धालुओं के जत्थे संगम नोज और उस के आसपास गंगा यमुना किनारे पवित्र स्नान के लिए अपने कदम बढ़ा चुके थे. शाम से ही महाकुंभ मेले के डीआईजी वैभव कृष्ण माइक हाथ में ले कर घोषणा कर श्रद्धालुओं से अपील कर रहे थे कि वो अपने स्थान से उठ कर समीप के गंगा घाटों पर जाएं और जल्दी स्नान कर के अपने गंतव्यों की ओर प्रस्थान करें. क्योंकि मौनी अमावस्या पर प्रयागराज में देशभर से करीब 12 करोड़ श्रद्धालु आए हैं और भीड़ बहुत अधिक है.  

 

डीआईजी वैभव कृष्ण शाम से ही यह भी अपील कर रहे थे कि श्रद्धालु घाटों पर रात को न सोएं, न ही सामान छोड़ें और जो घाट करीब है, वहीं जल्दीजल्दी स्नान कर लें, दूसरे लोगों को भी स्नान का मौका दें. प्रशासन के अलगअलग अधिकारी बारबार ये अपील कर रहे थे कि श्रद्धालु किसी भी घाट पर स्नान कर लें और संगम घाट पर भीड़ न बढ़ाएं. धार्मिक गुरुओं ने भी बारबार अपील की कि संगम घाट और बाकी घाटों पर स्नान का महत्त्व एक ही है, इसलिए श्रद्धालु जहां जगह मिले, वहीं स्नान कर लें. 

पुलिस प्रशासन ने संगम नोज पर भीड़ को रोकने के लिए अखाड़ा द्वार पर बैरिकेड्स भी लगा कर आवाजाही बंद कर दी थी, लेकिन आस्था तो आस्था होती है. लोगों की मान्यता तो यही है कि महाकुंभ में संगम तट, जहां 3 नदियों का मिलन होता है, वहीं पर स्नान करने से असल पुण्य मिलता है. इसी आस्था के कारण हजारों की संख्या में श्रद्धालु संगम नोज पर शाम को ही पुहंच गए और वहीं जमीन पर लेट कर रात्रि विश्राम करने लगे. अचानक आधी रात के बाद अखाड़ा क्षेत्र में श्रद्धालुओं की भीड़ और उस का ऐसा रेला आया कि बैरिकेड्स टूट गए. बहुत सारे श्रद्धालु जो ब्रह्म मुहूर्त का इंतजार करते हुए घाटों पर ही लेटे हुए थे, अचानक आई भीड़ के रेले में दब गए. 

जब श्रद्धालुओं की भीड़ आगे बढऩे की होड़ में वहां नीचे लेटे हुए श्रद्धालुओं को रौंद कर आगे बढ़ी तो दर्द और पीड़ा से लोग चीखने लगे. चीखपुकार का अंजाम ये हुआ कि अचानक अफरातफरी मच गई और लोग इधर से उधर भागने लगे. देखते ही देखते भगदड़ मच गई. कौन जमीन पर लेटा है, सामने महिला है या बुजुर्ग और बच्चे किसी को सुध नहीं रही. किसी को नहीं सूझ रहा था कि भगदड़ क्यों मची है. बस जिसे देखो, एक अंजान सी आफत से बचने के लिए इधर से उधर दौड़ रहा था. किसी के पांव से जूतेचप्पल निकल गए तो किसी का बैग छूट गया. कोई जमीन पर गिरे अपने परिजनों को संभालने की कोशिश में भीड़ के सैलाब में खुद भी लोगों के पांव तले कुचल गया.

कुछ ही मिनटों में संगम नोज क्षेत्र में भगदड़ के कारण ऐसा मंजर पैदा हो गया, मानो कोई प्राकृतिक आपदा आ खड़ी हुई हो. देखते ही देखते कुछ ही घंटों में आस्था का महाकुंभ मौत का महाकुंभ बन गया. हादसे के चश्मदीदों का कहना है कि संगम तट के पास जब अचानक भगदड़ मचने से चारों तरफ चीखचीत्कार मची तो कुछ लोग इधरउधर भागने में गिरे और उठ न सके. जिसे जहां जगह मिली, उस ओर जान बचा कर शरण ली. सब कुछ एक समय पर व्यवस्थित चल रहा था. लेकिन अचानक ही वहां अव्यवस्था हो गई.

अचानक से बाहर की तरफ से भीड़ का जत्था अंदर प्रवेश करने के कारण बाहर जाने और अंदर आने वाले लोग आमनेसामने आ गए थे. कोई इधर जाने लगता था तो कोई उधर. ऐसी स्थिति बन गई कि लोग आपस में ही फंसने लगे थे. कोई भी हिल तक नहीं पा रहा था. भीड़ खुद के बचाव में दूसरों को  धक्का देने लगी. जिस से बचने के चक्कर में लोग भीड़ में नीचे गिरे और उन के ऊपर भी लोग गिरने लगे. इस से लोग दबते गए और उठ ही नहीं सके. बाद में पुलिस की मदद से लोगों को सुरक्षित स्थानों की तरफ भेजा गया. 

हादसे के बाद सारा क्षेत्र पुलिस की गाडिय़ों और एंबुलेंस के सायरन की आवाज से गूंजने लगा. पुलिस और प्रशासन के अधिकारी राहत और बचाव कार्य में जुट गए. पहली प्राथमिकता थी मेले में उमड़ी भीड़ को नियंत्रित करने और और उन अफवाहों को रोकने की, जिस के कारण करोड़ों लोगों में भय का माहौल बन गया था. भगदड में जो लोग घायल हुए, उन्हें कुंभ मेले में ही बने टैंट के अस्पतालों में पहुंचाया गया. जिन की हालत गंभीर थी, उन्हें शहर के विभिन्न सरकारी और निजी अस्पतालों में पहुंचाया गया. भगदड़ में दबे कुछ लोगों की वहीं पर मौत हो गई थी तो कुछ ने अस्पताल तक पहुंचतेपहुंचते दम तोड़ तोड़ दिया.  

हालांकि भगदड़ व अफरातफरी के बाद कुछ ही घंटों में प्रशासन ने स्थिति पर काबू पा लिया और रात में मची भगदड़ के बाद सुबह 11 बजे तक स्थिति पर नियंत्रण कर लिया गया. इस के बाद सभी अखाड़ों ने अमृत स्नान को स्थगित करने का ऐलान कर दिया था, लेकिन स्थिति काबू में आने के बाद दोपहर में सभी 13 अखाड़ों ने सांकेतिक स्नान किया. इस दौरान कुंभ मेला प्रशासन की तरफ से डीआईजी (महाकुंभ) वैभव कृष्ण ने बयान जारी किया कि, ‘ब्रह्म मुहूर्त से पहले रात 1 से 2 बजे के बीच अखाड़ा मार्ग पर भारी भीड़ जमा हो गई. इस भीड़ के कारण दूसरी तरफ लगे बैरिकेड्स टूट गए और भीड़ दूसरी तरफ ब्रह्म मुहूर्त की पवित्र डुबकी लगाने के लिए इंतजार कर रहे श्रद्धालुओं पर चढ़ गई. इसी कारण भगदड़ व अफवाह के चलते कुछ लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए.’ 

हालांकि प्रशासन ने दोपहर में सिर्फ 12 लोगों के मौत की पुष्टि की थी, लेकिन देर शाम तक पुलिस प्रशासन की तरफ से कहा गया कि इस हादसे में उस समय तक 30 लोगों के मरने की पुष्टि हुई है, जिन में से 25 की पहचान हो गई है और 5 मृतकों की पहचान के प्रयास किए जा रहे हैं. साथ ही हादसे में घायलों की संख्या 60 बताई गई. 

संगम पर उस रात आखिर किस की गलती से हुआ ये हादसा 

वैसे तो जहां भी लाखोंकरोड़ों की भीड़ उमड़ती है, वहां इस तरह के हादसे होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार और मेला प्रशासन ने जिस तरह के दावे किए थे, उसे देखते हुए यह हादसा एक तरह से प्रशासन की अक्षमताओं और अदूरदर्शिता की ओर ज्यादा इशारा करता है. कुंभ हो, अद्र्धकुंभ हो, पूर्ण कुंभ हो या महाकुंभ हो, इन सब में सब से बड़ा अमृत स्नान मौनी अमावस्या का होता है. इस स्नान को मोक्ष की प्राप्ति के लिए जरूरी माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन प्रयागराज की त्रिवेणी में अमृत बहता है, जिस की वजह से ज्यादातर लोग गंगा नदी या यमुना नदी में स्नान करने के बजाय संगम की नोज में स्नान करने का संकल्प लेते हैं.

इस बार महाकुंभ का मेला क्षेत्र लगभग 4 हजार हेक्टेयर की भूमि पर फैला हुआ है, जिस में कुल 25 सेक्टर हैं और 41 घाट हैं. ये घटना मेला क्षेत्र के सेक्टर 2 में हुई, जहां महाकुंभ का सब से प्रमुख और महत्त्वपूर्ण घाट है. इस घाट को संगम घाट या संगम नोज भी कहते हैं, क्योंकि इसी घाट पर गंगा, यमुना और सरस्वती नदी का मिलन होता है. लोग मानते हैं कि उन्हें महाकुंभ में पवित्र स्नान का असली पुण्य तभी मिलेगा, जब वो संगम में डुबकी लगाएंगे. मीडिया के माध्यम से भी लगातार ये प्रचार होता रहा. यही कारण था कि जितने भी लोग महाकुंभ गए, वो संगम घाट पर स्नान करना चाहते थे और इस घटना में भी यही हुआ. 

जो श्रद्धालु गंगा और यमुना नदी के घाटों पर मौजूद थे, वो मौनी अमावस्या पर अमृत स्नान करने के लिए संगम घाट की तरफ प्रस्थान करने लगे, जिस से संगम घाट पर भीड़ का दबाव काफी बढ़ गया. चश्मदीदों का कहना है कि देर रात 2 बजे जब ये घटना हुई, उस से महज आधा घंटा पहले तक संगम घाट पर चारों तरफ लोगों का सैलाब उमड़ चुका था. अनुमान है कि उस समय सिर्फ इस एक सेक्टर में संगम के आसपास 25 लाख से ज्यादा श्रद्धालु इकट्ठा हुए थे. पुलिस ने संगम पहुंचने के लिए जो मार्ग बनाए थे, वो इस कदर भरे हुए थे कि लोग वहां लगाए गए बैरिकेड्स को तोडऩे की कोशिश कर रहे थे और पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स के जवान उन्हें रोकने के लिए बारबार समझा रहे थे. 

ये सारे हालात भगदड़ मचने से सिर्फ आधा घंटा पहले के थे. प्रशासन के मुताबिक, ये घटना देर रात 1 बज कर 45 मिनट से 2 बजे के बीच हुई. जहां ये घटना हुई, वहां से संगम घाट की दूरी ज्यादा से ज्यादा 200 मीटर थी. महाकुंभ के 45 दिनों में सब से बड़ा अमृत स्नान मौनी अमावस्या को सिर्फ संगम में होता है और ये स्नान 13 अखाड़ों के साधुसंतों और महामंडलेश्वर द्वारा किया जाता है. इस दिन आम श्रद्धालु गंगा और यमुना नदी के घाटों पर अमृत स्नान कर सकते हैं, लेकिन साधुसंत सनातन परंपरा के कारण सिर्फ संगम की  (नोज) पर ही अमृत स्नान करते हैं. यही कारण है कि संगम पर साधुसंतों के पहुंचने के लिए एक आरक्षित मार्ग बनाया जाता है, जिसे अखाड़ा रोडभी कहते हैं.

अखाड़ों के साधुसंतों के टेंट गंगा नदी के उस पार लगे हुए थे. उन्हें संगम में स्नान करने के लिए अस्थाई पुलों से गंगा नदी को पार कर के इस अखाड़ा मार्ग पर आना था, क्योंकि अमृत स्नान के लिए सभी अखाड़े रथों पर सवार हो कर संगम पहुंचते हैं, इसलिए इस मार्ग को थोड़ा चौड़ा और बड़ा रखा गया था. मौनी अमावस्या के अमृत स्नान के लिए भी ऐसा ही किया गया था और ये कोई वीवीआईपी मूवमेंट नहीं था. पुलिस ने गंगा नदी पर बने कई अस्थाई पुलों को बंद कर दिया था, ताकि आम श्रद्धालु जिस घाट पर हैं, वहीं स्नान करें और संगम की तरफ न आएं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और अलगअलग मार्ग से करोड़ों श्रद्धालु संगम पर पहुंच गए, जिस से नागा साधुओं को अपना अमृत स्नान रोकना पड़ा.

भीड़ के कारण एक अखाड़े के साधुसंतों को बीच रास्ते से ही बिना अमृत स्नान किए वापस अपने शिविरों में लौटना पड़ा और इस से ये साधुसंत नाराज भी हुए. इस सब के बीच हालात तब और ज्यादा बिगडऩे शुरू हुए, जब संगम पर पहुंचने के बाद लोग वहीं रुक कर सुबह होने का इंतज़ार करने लगे. ये तमाम लोग यह सोच रहे थे कि ये मौनी अमावस्या पर सुबह 4 बजे ब्रह्म मुहूर्त में पवित्र स्नान करेंगे और बाद में वहां से शहर की ओर वापस लौट जाएंगे. लेकिन इस से संगम पर भीड़ का दबाव काफी बढऩे लगा और इस भीड़ में लाखों लोग संगम के पास अपना सामान रख कर वहीं विश्राम करने लगे. दावा है कि जब संगम के मार्ग में भगदड़ हुई, तब यही भीड़ वहां नीचे सो रहे लोगों पर गिर गई और इस में 30 लोगों की जान चली गई.

क्या इस भगदड़ को रोका जा सकता  

क्या प्रशासन ने इस भीड़ को नियंत्रित करने का कोई प्रयास नहीं किया? इस भगदड़ को रोका जा सकता था, अगर श्रद्धालु प्रशासन की अपील को नजरअंदाज नहीं करते तो हां, इस घटना को रोका जा सकता था. डीआईजी वैभव कृष्ण ने घटना से कुछ देर पहले ही लाउडस्पीकर पर ये अपील की थी कि लोग घाटों पर रात भर न रुकें, क्योंकि इस से आने वाले दूसरे श्रद्धालुओं को परेशानी हो सकती है. उन्होंने यह भी कहा था कि लोग संगम पर जाने के बजाय उन्हीं घाटों पर पवित्र स्नान करें, जो उन के आसपास हैं. लेकिन लोगों ने प्रशासन की इस अपील पर ध्यान नहीं दिया और संगम पर बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने से ये घटना हो गई.

सरकार और चश्मदीदों के अलगअलग दावे

यह बात सही है कि लोगों ने प्रशासन की अपील पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन एक तथ्य यह भी है कि इस घटना के लिए लोगों को दोष देना बिलकुल गलत होगा. अगर आप महाकुंभ की व्यवस्था को देखेंगे तो प्रशासन ने संगम पर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कई रास्तों को डायवर्ट किया हुआ था. इस डायवर्जन के कारण लोगों को 6 से 7 किलोमीटर पैदल चल कर संगम की नोज पर पहुंचना पड़ रहा था यानी संगम का जो रास्ता 1 से 2 किलोमीटर का था, वो डायवर्जन के कारण 6 से 7 किलोमीटर हो गया था. 

इस के अलावा ये मार्ग भीड़ के मुकाबले संकरे थे और इन रास्तों में धक्के खाते हुए संगम पहुंचना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था. अगर कोई व्यक्ति मेला क्षेत्र में 6 से 7 किलोमीटर पैदल चल कर संगम पहुंच रहा था तो उस के लिए घाट पर कुछ देर रुक कर आराम करना स्वाभाविक बात थी. इस घटना में भी बहुत सारे लोगों ने यही किया, इसलिए ये कहना कि लोग वहां क्यों रुके हुए थे, ये सही नहीं होगा. यहां गलती प्रशासन से हुई थी, जो भीड़ को नियंत्रित करने में नाकाम रहा.

महाकुंभ में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए 40 हजार पुलिसकर्मी और जवान और 2700 सीसीटीवी  कैमरे लगाए गए थे, लेकिन इस के बावजूद ये भगदड़ को रोक नहीं पाए. इस के अलावा महाकुंभ में 3 प्रकार की सड़कें थीं. पहली सड़क को काली सड़क के नाम से थी, जो आम श्रद्धालुओं के लिए थी. दूसरी सड़क को लाल सड़क नाम दिया गया, जो वीवीआईपी मूवमेंट के लिए थी और तीसरे मार्ग को त्रिवेणी मार्ग नाम दिया, जो मेला क्षेत्र को संगम से जोड़े हुए था. लेकिन इस घटना में ये व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई और प्रशासन इस भगदड़ को रोक नहीं पाया.

इस घटना पर सरकार और चश्मदीदों का पक्ष अलगअलग क्यों है? पुलिस का कहना है कि इस भगदड़ में कुछ बैरिकेड्स टूट गए थे, जिस की वजह से भीड़ का एक जत्था जमीन पर सो रहे कुछ श्रद्धालुओं पर चढ़ गया. लेकिन चश्मदीदों ने बताया कि संगम घाट पर आने और जाने के लिए एक ही मार्ग था, जिस से लोगों में धक्कामुक्की हुई और इस के बाद वहां भगदड़ मच गई.

2 अन्य जगहों पर भी मची थी भगदड़ 

वैसे जिस वक्त अखाड़ा बैरिकेड के पास संगम नोज में जिस वक्त भगदड़ मची थी, उस के एक घंटे बाद अफवाह और अफरातफरी में मेला क्षेत्र में 2 अन्य स्थानों पर भी भगदड़ मची थी, जिस में कुछ लोगों की मौत हुई थी. महाकुंभ मेले में एक नहीं, बल्कि 3 स्थानों पर भगदड़ हुई थी. संगम तट के अलावा सेक्टर 10 में ओल्ड जीटी रोड पर और सेक्टर 21 में उल्टा किला झूंसी के पास भी भगदड़ हुई थी. उल्टा किला के पास से दरभंगा, बिहार निवासी रमा देवी पत्नी महेंद्र झा कथा लिखने तक लापता थे. 

इस दर्दनाक हादसे के कुछ घंटे बाद सेक्टर 21 में उल्टा किला झूंसी के पास भी भगदड़ मची थी. कुछ प्रत्यक्षदर्शी हर्षित, बलराम और रंजीत ने बताया कि भगदड़ में कई श्रद्धालु दब गए और कई अचेत हो गए थे. जान बचाने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु एक दुकान में घुस गए थे. इस के अलावा कई श्रद्धालु संगम लोअर मार्ग की तरफ भी भागने लगे थे. हर्षित नाम के प्रत्यक्षदर्शी का कहना है कि घटना के दौरान वह मौके पर मौजूद था. भगदड़ होते ही श्रद्धालु नमकीन की दुकान में घुसने लगे तो कर्मचारी वहां से भाग गए. सूचना पा कर पहुंची पुलिस भगदड़ में हताहत लोगों को किसी तरह उठा कर निकट के अस्पताल ले गई थी.

सेक्टर 21 के बाद सेक्टर 18 में ओल्ड जीटी के पास एक महामंडलेश्वर की कार के लिए रास्ता बनाने के दौरान भगदड़ हुई थी, जिस में एक बच्ची समेत 7 महिलाओं की मौत हुई थी. भगदड़ में जान गंवाने वाली बच्ची समेत सातों महिलाओं की पहचान गुरुवार तक नहीं हो सकी थी.  

क्या वीआईपी कल्चर भी बना हादसे में मददगार  

दरअसल, इस हादसे की एक बड़ी वजह ये वीआईपी की सेवा में शासन का समर्पण भी रहा. शासन से ले कर प्रशासन का सारा ध्यान नेताओं, प्रदेश के बड़े अफसरों, उन के परिजनों व रिश्तेदारों, दूसरे प्रदेशों से आने वाले विशिष्ट अतिथियों, सेलिब्रिटी और संतों की सेवा में ही लगा रहा. इन के कारण नदियों के ऊपर बने करीब 18 पंटून पुलों को बारबार बंद किया जाता रहा, जिस के कारण आम जनता का अधिकांश वक्त इंतजार में ही बीता और भीड़ का दबाव लगातार बढता रहा. जिस रात ये हादसा हुआ, उस वक्त भी अधिकांश पंटून पुल बंद थे.

अब लोगों का सवाल यह था कि हिंदुओं के धार्मिक स्थलों और आयोजनों में ही क्यों भक्तों के बीच भेदभाव होता है. इस दर्दनाक हादसे ने वीआईपी कल्चर पर एक बार फिर से नए सिरे से बहस छेड़ दी है. सवाल उठ रहा है कि जब गुरुद्वारे में वीआईपी दर्शन नहीं, मसजिद में वीआईपी नमाज नहीं, चर्च में वीआईपी प्रार्थना नहीं होती है तो सिर्फ मंदिरों में कुछ प्रमुख लोगों के लिए वीआईपी दर्शन क्यों जरूरी है? क्या इस पद्धति को खत्म नहीं किया जाना चाहिए, जो हिंदुओं में एकदूसरे के बीच दूरियों का कारण बनता है.

हाल यह है कि कई मंदिरों के भीतर तो वहीं का स्टाफ और पुरोहित ही धन उगाही कर के भक्तों को वीआईपी सुविधा प्रदान करने से नहीं चूकते हैं. ऐसे भक्तों को बिना लाइन के और मंदिर का प्रोटोकाल तोड़ कर गर्भगृह में प्रवेश करा कर भी दर्शन करा दिए जाते हैं. आम श्रद्धालु घंटों कतार में खड़े रहते हैं, जबकि वीआईपी को सीधे गर्भगृह में प्रवेश मिल जाता है. बड़े मंदिरों में वीआईपी पास या दान के बदले विशेष दर्शन की व्यवस्था होती है, जबकि साधारण भक्तों को धक्कामुक्की झेलनी पड़ती है. वीआईपी भक्तों को विशेष प्रसाद, बैठने की जगह और पुजारियों का अलग से आशीर्वाद मिलता है, जबकि आम भक्त को कुछ ही सेकेंड में दर्शन कर आगे बढऩे को कहा जाता है.

अन्य तीर्थस्थलों और गंगा स्नान में वीआईपी संस्कृति की बात की जाए तो महाकुंभ मेले प्रयागराज, हरिद्वार या वाराणसी जैसे तीर्थस्थलों पर भी आम श्रद्धालुओं को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है, लेकिन वीआईपी के लिए अलग घाट बना दिए जाते हैं. जहां आम लोग भीड़ में संघर्ष करते हैं, वहीं खास लोगों के लिए विशेष स्नान व्यवस्था, सुरक्षा घेरा और सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं. 

सवाल यह है कि जहां करोड़ों लोग जुट रहे हों, वहां आम श्रद्धालुओं की असुविधा को बढ़ा कर वीआईपी स्नान जैसी व्यवस्था आखिर  क्यों की जानी चाहिए?

हादसे के बाद वीआईपी स्नान के नग्न प्रदर्शन की टीस महाराज प्रेमानंद गिरि के शब्दों में भी दिखी, जब उन्होंने कहा कि प्रशासन का पूरा ध्यान वीआईपी पर था. आम श्रद्धालुओं को उन के हाल पर छोड़ दिया गया था. उन का आरोप है कि पूरा प्रशासन वीवीआईपी की जीहुजूरी में लगा रहा, तुष्टीकरण में लगा रहा. आम श्रद्धालु 15-15, 20-20 किलोमीटर पैदल चल कर स्नान करने पहुंचे और कथित वीआईपी गाडिय़ों के रेले के साथ सीधे तट तक पहुंचे, ये तो आम श्रद्धालुओं में रोष, खीझ और असंतोष पैदा करने वाला ही होगा. 

वैसे वीआईपी कल्चर का दायरा काफी बढ़ा है. वीआईपी कल्चर धार्मिक स्थलों तक ही नहीं सीमित है. लोकतंत्र से आस्था तक, हर जगह कुछ लोगों को कई मौकों पर विशेषाधिकार मिल ही जाता है. लोकतंत्र के मूल सिद्धांत कहते हैं कि सभी नागरिक समान हैं, लेकिन व्यवहार में कुछ लोग विशेषहो जाते हैं, फिर चाहे वे सड़क पर हों, सरकारी दफ्तर में, अस्पताल में, या फिर मंदिर में. इसी प्रकार से अकसर बड़े नेताओं और अधिकारियों की सुरक्षा के नाम पर ट्रैफिक रोका जाता है, जबकि आम जनता घंटों जाम में फंसी रहती है. अस्पतालों में वीआईपी वार्ड अलग से बनाए जाते हैं, जबकि आम मरीजों को बिस्तर तक नहीं मिलता. एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशनों पर वीआईपी यात्रियों के लिए विशेष सुविधाएं होती हैं, जबकि आम जनता लंबी कतारों में खड़ी रहती है.

वीआईपी कल्चर एक नासूर की तरह है. इसीलिए हर सरकार वीआईपी कल्चर खत्म करने के वादे और बात करती है, लेकिन असल में इसे बनाए रखने के नए तरीके ढूंढे जाते हैं. मंदिरों और तीर्थस्थलों में भी यह भेदभाव खत्म होना चाहिए, क्योंकि भगवान के दरबार में वीआईपी और आम आदमी का भेद न्यायसंगत नहीं हो सकता. सब से बड़ी बात यह है कि जब तक जनता खुद इस संस्कृति को स्वीकार करती रहेगी, तब तक वीआईपी कल्चर खत्म नहीं होगा. बदलाव तभी आएगा, जब लोग अपने अधिकारों को समझेंगे और भक्ति से ले कर लोकतंत्र तक समानता की मांग करेंगे.  

हादसे के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह और डीजीपी प्रशांत कुमार ने गुरुवार को महाकुंभ भगदड़ के घटनास्थल पर पहुंच कर हालात का जायजा लिया. वाच टावर पर जा कर उन्होंने वहां से जाना कि भगदड़ के वक्त अचानक ऐसा क्या हुआ कि लोगों का सैलाब आ गया. प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों को 25 लाख रुपए के मुआवजे की घोषणा के साथ हादसे की जांच के लिए 3 सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति हर्ष कुमार की अध्यक्षता वाले इस आयोग में सेवानिवृत्त आईएएस अफसर डी.के. सिंह और सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी वी.के. गुप्ता भी शामिल हैं.

आयोग को अपने गठन के एक महीने के अंदर मामले की जांच रिपोर्ट देनी होगी. आयोग भगदड़ के कारणों और परिस्थितियों की जांच करेगा. साथ ही भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सुझाव भी देगा. महाकुंभ में मौनी अमावस्या से पहले संगम तट पर मची भगदड़ के बाद शासन ने सख्त कदम उठाए. हादसे तक करीब 30 करोड़ लोग स्नान कर चुके थे. मेला क्षेत्र में कई बड़े बदलाव कर दिए गए. महाकुंभ मेला क्षेत्र में वाहनों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई. सभी वीआईपी पास रद्द कर दिए गए. वीआईपी लोगों के भी अमृत स्नान वाले दिन वाहन घाट तक ले जाने की रोक लगा दी.

इस के अलावा मेला क्षेत्र में भीड़ का दबाव न बने, इस के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में होल्डिंग एरिया बनाए गए, जहां कहीं भी लोगों को रोका गया, वहां सभी के भोजन/पेयजल का प्रबंध किया गया. प्रयागराज के सीमावर्ती जिलों में भी पेट्रोलिंग बढ़ा दी गई. अयोध्या-प्रयागराजकानपुर-प्रयागराज, फतेहपुर-प्रयागराजलखनऊ-प्रतापगढ़-प्रयागराज, वाराणसी-प्रयागराज जैसे सभी मार्गों पर कहीं भी यातायात अवरुद्ध न हो, इस के प्रयास किए गए. प्रयागराज से वापसी के सभी मार्गों को लगातार खुला रखने की घोषणा कर दी गई.

महाकुंभ में व्यवस्था को और बेहतर बनाने के लिए कुंभ 2019 के समय प्रयागराज में बतौर मंडलायुक्त सेवा दे चुके आशीष गोयल और एडीए के वीसी रहे भानु गोस्वामी की तैनाती की गई. इस के अतिरिक्त विशेष सचिव स्तर के 5 अधिकारियों को भी भेजा गया है. मौनी अमावस्या स्नान पर्व पर मौन डुबकी की ललक में संगम पर हादसा हुए कुछ ही घंटे बीते थे कि आस्था के जन ज्वार में यह दर्दनाक हादसा चंद समय बाद ही पीछे छूट गया. 8 लेन वाले अखाड़ा मार्ग से ले कर संगम द्वार तक कुछ देर बाद ही ऐसा माहौल बन गया, जैसे वहां कुछ हुआ ही न हो. आस्था का जन प्रवाह रत्ती भर कम नहीं हुआ. 

पहले कुंभ में हुए हादसों से क्यों नहीं लिया सबक

भारी भीड़ और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं के कारण कुंभ या महाकुंभ में पहली बार भगदड़ या हादसा नहीं हुआ है. इस से पहले भी कई बार इस तरह के हादसे हो चुके हैं, जिस में बहुत से श्रद्धालुओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. इस तरह के हादसे पर एक नजर डालते हैं. आजादी के बाद 3 फरवरी, 1954 को भी कुंभ में भगदड़ मची थी. उस मेले में मौनी अमावस्या पर त्रिवेणी बांध पर भगदड़ में कई श्रद्धालुओं की जान चली गई थी. तब के इलाहाबाद और आज के प्रयागराज में कुंभ मेला लगा था. यह आजादी के बाद का पहला कुंभ था. मौनी अमावस्या के मौके पर बड़ी तादाद में श्रद्धालु संगम तट पहुंचे थे. कहा जाता है कि एक हाथी की वजह से भगदड़ मच गई. इस में 800 से ज्यादा लोग मारे गए थे. सैकड़ों घायल हुए थे.

साल 1992 में उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ मेला लगा था. उस दौरान भी भगदड़ की स्थिति देखने को मिली थी. इस दर्दनाक हादसे में 50 से ज्यादा लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी. इस घटना के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राजनेताओं और विशिष्ट लोगों को मेले में जाने से बचने की सलाह दी थी. हरिद्वार में कुंभ मेला लगा था और 14 अप्रैल, 1986 को उस वक्त के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कई दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं के साथ हरिद्वार गए थे. आम लोगों को तट पर जाने से रोक दिया गया था. इस की वजह से भीड़ का दबाव बढ़ा. भीड़ अनियंत्रित हो गई. इस घटना में करीब 50 लोगों की मौत हो गई थी. हरिद्वार में इस से पहले 1927 और 1950 में भी भगदड़ मची थी. 

27 अगस्त, 2003 में नासिक में कुंभ मेले का आयोजन किया गया था. जहां भगदड़ मचने से 39 लोगों की जान चली गई थी. 2010 के हरिद्वार कुंभ में भी भगदड़ मचने से 7 लोगों की जान गई थी. दरअसल, स्नान के दिन साधुओं और श्रद्धालुओं के बीच कुछ बहस हुई. इस के बाद भगदड़ मच गई. इसी तरह साल 2013 में प्रयागराज में कुंभ का आयोजन हुआ था. तब भी 10 फरवरी को मौनी अमावस्या के अमृत स्नान के दिन प्रयागराज रेलवे स्टेशन पर भारी भीड़ के कारण भगदड़ मची, जिस के चलते 36 लोगों की जान गई थी. इन में 29 महिलाएं थीं. 

आखिर कुंभ में स्नान के लिए क्यों उतावले होते हैं लोग

पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था, तब भगवान धनवंतरि अमृत कुंभ यानी कलश ले कर प्रकट हुए. देवताओं के संकेत पर इंद्र पुत्र जयंत अमृत से भरा कलश ले कर भागने लगे तो असुर जयंत के पीछे भागने लगे. अमृत कलथ की प्राप्ति के लिए देवताओं और दैत्यों के बीच 12 दिन तक भयंकर युद्ध हुआ. माना जाता है कि देवताओं का एक दिन मनुष्य के 12 वर्षों के बराबर होता है. इस युद्ध के दौरान जिनजिन स्थानों पर कलश से अमृत की बूंदे गिरी थीं, वहां कुंभ मेला लगता है. अमृत की बूंदे इन 4 जगहों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में गिरी थीं. इन चारों स्थानों पर कुंभ मेलों का आयोजन किया जाता है.

इस दौरान श्रद्धालु गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा नदी में आस्था की डुबकी लगाते हैं. वहीं, प्रयागराज में लोग संगम में स्नान करते हैं. इस में अद्र्धकुंभ मेले का आयोजन प्रत्येक 6 वर्ष में एक बार किया जाता है. यह मेला सिर्फ प्रयागराज और हरिद्वार में होता है, जिस में करोड़ों संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. अब सवाल है कि आखिर पूर्णकुंभ मेला क्या होता है? तो आप को बता दें कि पूर्णकुंभ मेला 12 वर्ष में एक बार आयोजित किया जाता है. यह मेला प्रयागराज में संगम तट पर आयोजित होता है, जिस में करोड़ों संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.

आखिरी बार साल 2013 में यहां पूर्णकुंभ मेले का आयोजन किया गया था. वहीं, इस के बाद अब 2025 में पूर्णकुंभ आयोजित हो रहा है. हालांकि, इसे महाकुंभ नाम दिया जाता है. अब सवाल है कि आखिर इसे यह नाम क्यों दिया गया है?

जब प्रयागराज में 12 बार पूर्णकुंभ हो जाते हैं तो उसे एक महाकुंभ का नाम दिया जाता है. पूर्णकुंभ 12 वर्ष में एक बार लगता है और महाकुंभ 12 पूर्णकुंभ में एक बार लगता है. यानी 144 साल बाद इस पीढी के लोग पहली बार महाकुंभ में पवित्र स्नान कर रहे थे. इस कारण पूरे देश से श्रद्धालुओं का सैलाब प्रयागराज पहुंचा था. इस प्रकार वर्षों की गणना करें तो यह 144 सालों में एक बार आयोजित होता है. इस वजह से इसे महाकुंभ कहा जाता है. यह सब से बड़ा मेला होता है, जिस में सब से अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं. बता दें कि महाकुंभ में नागा साधुओं से ले कर अन्य अलगअलग बड़ेबड़े संत पधारते हैं, जिन का आशीर्वाद लेने के लिए श्रद्धालु दूरदूर से आते हैं.  

 

 

 

  

विनोद उपाध्याय : एक थप्पड़ ने बनाया गैंगस्टर

विनोद उपाध्याय : एक थप्पड़ ने बनाया गैंगस्टर – भाग 4

स्थानीय थानों में भी रहता था दबदबा

बात जनवरी, 2017 की है. विनोद उपाध्याय के दोस्त और खोराबार कजाकपुर का प्रौपर्टी डीलर संजय यादव घर से निकलते समय रहस्यमय तरीके से लापता हो गया.

उन दिनों योगी आदित्यनाथ प्रदेश के नएनए मुख्यमंत्री बने थे. भाई की गुमशुदगी का मामला ले कर पीडि़त दीपक मुख्यमंत्री के दरबार (गोरखनाथ मंदिर में) पेश हुआ और मामले की पूरी जानकारी दे कर भाई की हत्या किए जाने की आशंका जताई थी.

चूंकि मामला मुख्यमंत्री के गृह जनपद से जुड़ा हुआ था और एक बड़े प्रौपर्टी डीलर से भी जुड़ा हुआ था, इसलिए उन्होंने इसे गंभीरता से लिया और गोरखपुर पुलिस को आड़े हाथों लेते हुए तुरंत काररवाई करने का आदेश दिया.

मुख्यमंत्री के सख्त तेवर के बाद पुलिस हरकत में आई और संजय यादव की तलाश तेजी से शुरू की. लापता होने के बाद संजय यादव की आखिरी लोकेशन बेलीपार थाना क्षेत्र के चोरिया की मिली. बाद में दानबहादुर के खेत में उस की लाश मिली.

जिस क्षेत्र में संजय की लाश बरामद हुई थी, उसी इलाके में मृतक लाल बहादुर यादव का घर था. इस मौके को विनोद अपने हाथों से जाने देना नहीं चाहता था.

लाल बहादुर गैंग के लोगों ने विनोद के 2 आदमियों को दर्दनाक तरीके से मौत के घाट उतारा था. यह बात विनोद अभी तक नहीं भूल पाया था. उस ने इसी बात का फायदा उठाया और दोस्त संजय यादव की हत्या में लाल बहादुर गैंग के दुश्मनों को झूठे केस में फंसा दिया.

दरअसल, दीपक को भरोसा नहीं था कि खोराबार पुलिस मामले की जांच ठीक तरीके से करेगी. विनोद के बहकावे में दीपक पूरी तरह आ गया था, जो वह यही चाहता था. विनोद के उकसाने पर दीपक ने मामले की जांच खोराबार से शाहपुर थाने में स्थानांतरित करवा दी.

शाहपुर थाने में विनोद उपाध्याय की तूती बोलती थी. थाने की पुलिस उस के इशारों पर नाचती थी. संजय यादव हत्याकांड की जांच एसआई विमलेंदु को सौंपी गई थी. विमलेंदु विनोद का खासमखास था. उसी के इशारों पर विवेचक विमलेंदु ने फरजी नाम जोड़ दिया था और लाल बहादुर गैंग के दुश्मनों को आरोपी बना दिया था.

सच्चाई जब सामने आई तो वादी मुकदमा दीपक यादव को शासन के सामने पेश कर आरोपी पक्ष के मुकदमे को कुशीनगर जिले स्थानांतरण करवा दिया. बाद में गोरखपुर से लखनऊ तक पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया था.

17 सालों से माफिया विनोद उपाध्याय पुलिस की आंखों की किरकिरी बन गया था. आतंक के बल पर अपराध की दुनिया में बादशाहत का परचम लहराया था. साथ ही उस ने फिरौती की रकम से करीब 6 करोड़ की संपत्ति भी बना ली थी. यही नहीं उस ने अपनी संपत्ति का विस्तार गोरखपुर, लखनऊ और प्रयागराज तक कर लिया था.

फिलवक्त विनोद गुलरिहा थाने के मोगलहा मोहल्ले में आलीशान इमारत बनवा कर परिवार सहित रहता था. जुर्म की दौलत से खड़ा मकान पुलिस ने बुलडोजर चलवा कर जमीदोंज कर दिया.

बात 25 मई, 2023 की है. कैंट मोहल्ले के दाउदपुर नहर रोड पर रहने वाले प्रवीण श्रीवास्तव ने गुलरिहा थाने में माफिया विनोद कुमार उपाध्याय, उस के भाई संजय, नौकर छोटू और 2 अन्य व्यक्तियों के खिलाफ रंगदारी मांगने, जान से मारने की धमकी देने और तोडफ़ोड़ करने का मुकदमा दर्ज कराया था.

प्रवीण का आरोप था कि जमीन बेचने के लिए उन के ऊपर दबाव बनाया जा रहा था. बात न मानने पर प्रति प्लौट 5 लाख रुपए मांग रहा था. इस मामले में मुकदमा दर्ज होने के बाद संजय और नौकर छोटू गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए थे. विनोद चकमा दे कर फरार हो गया था.

इस के ठीक 9वें दिन यानी 3 जून, 2023 को कोतवाली थानाक्षेत्र स्थित धम्माल मोहल्ला निवासी राजकुमार श्रीवास्तव ने विनोद उपाध्याय, सहयोगी बाबू नंदन यादव, रमेश शर्मा और 2 अज्ञात लोगों के खिलाफ रंगदारी और जान से मारने की धमकी का मुकदमा दर्ज कराया था. इन्हीं दोनों मुकदमों में विनोद की तलाश तेज कर दी गई थी.

फरारी के दौरान विनोद लखनऊ में मंत्री बन कर छिपा था. वहीं उस की बेटी एक कौन्वेंट स्कूल में पढ़ती थी. उस ने बेटी का नाम कटवा कर वहां से हटा दिया था. विनोद को इस बात की भनक लग चुकी थी, पुलिस कभी भी उस की बेटी को मोहरा बना कर उसे हाजिर होने के लिए दबाव बना सकती थी. वह हरगिज ऐसा होने देना नहीं चाहता था, इसीलिए उस ने बेटी का नाम कटवा दिया था.

खैर, फरारी के दौरान आईजी रेंज ने अगस्त 2023 में विनोद के ऊपर 50 हजार का इनाम घोषित किया. सितंबर में एडीजी (जोन) डा. के.एस. प्रताप कुमार ने इनाम की राशि बढ़ा कर एक लाख रुपए कर दी थी. इस के बाद उस का नाम मोस्टवांटेड अपराधियों की सूची में जुड़ा और उसे गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी एसटीएफ को सौंपी गई. अदालत से कुख्यात डौन विनोद उपाध्याय के खिलाफ गैरजमानती वारंट भी जारी हो चुका था. जबकि विनोद किसी कीमत पर पुलिस के हाथों चढऩा नहीं चाहता था.

आखिरकार लखनऊ से प्रयागराज आते समय सुलतानपुर के हनुमानगंज गोपालपुरवा इलाके में एसटीएफ ने उसे घेर लिया. 4/5 जनवरी, 2024 की सुबह साढ़े 3 बजे आतंक का पर्याय बने विनोद उपाध्याय की कहानी उस के गुरु श्रीप्रकाश शुक्ला की तरह खत्म कर दी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

विनोद उपाध्याय : एक थप्पड़ ने बनाया गैंगस्टर – भाग 3

बात 2007 की है. किसी बात को ले कर विनोद के छोटे भाई संजय का पुलिसकर्मियों से विवाद हो गया. शाहपुर थाने की पुलिस संजय को हिरासत में कौवा बाग पुलिस चौकी पर ले गई.

विनोद को जैसे ही पता चला कि भाई को पुलिस पकड़ कर ले गई है तो वह अपने साथ बड़े लावलश्कर को साथ ले कर कौवा बाग चौकी पहुंच गया और पुलिस के कब्जे से दबंगई के बल पर भाई को छुड़ा कर ले गया. पुलिस वालों के साथ मारपीट भी की.

इस मामले में विनोद और उस के भाइयों पर केस भी दर्ज हुआ. धीरेधीरे मामला राजनैतिक रूप लेने लगा, जिस के बाद विनोद उपाध्याय और संजय उपाध्याय को जेल जाना पड़ा.

अपराधी से राजनेता और फिर राजनेता से माफिया बन चुका था विनोद उपाध्याय. साल 2007 में हुई कैंट थानाक्षेत्र के पीडब्ल्यूडी कांड की याद जब आती है तो रूह अपने आप कांप जाती है. माफिया विनोद उपाध्याय और माफिया लालबहादुर यादव के बीच लोक निर्माण विभाग के ठेके को ले कर लंबे समय से तनातनी चल रही थी.

टेंडर वाले दिन टेंडर डालने को ले कर विनोद के साथियों का लाल बहादुर यादव के साथ विवाद हो गया था. धीरेधीरे मामला बढ़ता गया. मामला बढऩे पर लालबहादुर ने उपाध्याय के साथियों को घेर लिया. दोनों ओर से गोलियां चलीं.

विनोद उपाध्याय गिरोह पर माफिया लाल बहादुर यादव भारी पड़ा. इस गैंगवार में उपाध्याय के 2 करीबी साथी रिपुंजय राय और सत्येंद्र कुमार मौत के घाट उतार दिए गए. रिपुंजय की तो खोपड़ी ही उड़ गई थी. जिलाधिकारी आवास के पास हुई दिनदहाड़े हुई इस लोमहर्षक घटना के बाद पूरे शहर में सनसनी फैल गई थी.

इस मामले में अजीत शाही, संजय यादव, संजीव सिंह, इंद्रकेश पांडेय सहित 6 लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ, लेकिन लालबहादुर यादव को आरोपी नहीं बनाया गया. यह देख विनोद का खून खौल उठा और उस दिन से दोनों गुटों में दुश्मनी और भी ज्यादा बढ़ गई थी.

इस घटना ने विनोद उपाध्याय को एक शातिर खिलाड़ी के रूप में कुख्यात कर दिया था. साथी की मौत से विनोद उपाध्याय पागल सा हो गया था और लाल बहादुर यादव से बदला लेने के लिए इंतकाम की आग में जल रहा था.

अब लाल बहादुर इस के निशाने पर था. उस ने शतरंज के बिसात पर अपने मोहरों को खेलना शुरू कर दिया था. शातिर विनोद ने लाल बहादुर को अंजाम तक पहुंचाने के लिए चक्रव्यूह की रचना शुरू की. 2014 की शाम कैंट थाने के पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मुख्य गेट के सामने लाल बहादुर यादव की गोली मार कर हत्या करवा दी थी. इस मामले में विनोद सहित कुल 11 लोग आरोपी बनाए गए.

घटना की जांच चली तो 3 महीने बाद प्रकाश में आया कि चिडिय़ाघर बनाने के लिए गिराई जा रही मिट्टी को ले कर लालबहादुर और विनोद के करीबी धनंजय तिवारी के बीच में अदावत चल रही थी.

धनंजय विनोद का पक्का दोस्त था. उस का सपोर्ट खुद विनोद कर रहा था. धनंजय के कंधे पर विनोद ने बंदूक रख कर घटना की रोचक पटकथा लिखी. बाद में विनोद सहित सभी आरोपी जेल भेज दिए थे.

विनोद उपाध्याय कितना शातिर किस्म का माफिया था, इस घटना से साफ जाहिर होता है. लाल बहादुर यादव हत्याकांड के जुर्म में विनोद गोरखपुर मंडलीय कारागार में बंद था.

जेल में बंद होते ही वहां अपनी हुकूमत चलानी शुरू कर दी थी. इस बात को ले कर डिप्टी जेलर राजेश मौर्या और विनोद उपाध्याय के बीच ठन गई थी. किसी भी कीमत पर जेलर राजेश मौर्या उस की गुंडागर्दी की खेती जेल के अंदर फैलने देना नहीं चाहते थे.

जेलर राजेश मौर्या को उन की औकात बताने के लिए जेल में रह कर ही माफिया विनोद ने खतरनाक साजिश रच कर सनसनी फैला दी थी. 8 दिसंबर, 2014 की रात डिप्टी जेलर राजेश मौर्या के सरकारी आवास में पिस्टल ले कर एक बदमाश घुस गया. जेलर मौर्या को पिस्टल सटा कर नकदी, गहने, मोबाइल फोन और सरकारी रिवौल्वर छीनने के बाद उन की स्कूटी की चाबी ले कर बदमाश फरार हो गया.

इस घटना से पुलिस महकमा दहल गया तो वहीं पुलिसकर्मी भी रात को कमरे से बाहर निकलने में बुरी तरह कांपते थे. फिर जेलर की सुरक्षा के लिए पीएसी की बड़ी टुकड़ी तैनात कर दी गई थी. लेकिन जेलर मौर्या बुरी तरह अंदर से भयभीत हो गए थे और कुछ दिनों बाद उन्होंने वहां से अपना स्थानांतरण करवा लिया था.

फिलहाल, पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू की. जांच के दौरान पता चला कि घटना की साजिश जेल के भीतर ही रची गई थी. साजिश को रचने वाला कोई और नहीं बल्कि माफिया विनोद ही था. 3 महीने बाद 6 मार्च, 2015 की रात जेल परिसर में फिर से एक घटना घटी.

जेल टावर पर चढ़े मंकी कैप पहने बदमाश ने ड्यूटी कर रहे सिपाही की पिस्टल की नोक पर वरदी उतरवा ली. बदमाश ने दूसरे टावर पर तैनात बंदीरक्षक के साथ भी ऐसा ही किया. इस घटना के बाद जेल में हड़कंप मच गया. एक बार फिर जेल के सिपाही बुरी तरह दहशत में आ गए थे.

घटना की जांच हुई. 27 मार्च, 2015 को पुलिस ने शाहपुर थानाक्ष़ेत्र स्थित घोषीपुरवा पुरानी मसजिद निवासी सैफ अली उर्फ सोनू और सुडिय़ाकुंआ बशारतपुर के रहने वाले विजय उपाध्याय को गिरफ्तार कर घटना का परदाफाश किया.

जेल में कैसे रची खौफनाक साजिश

दोनों बदमाश जेल में बंद माफिया विनोद उपाध्याय के इशारे पर दहशतगर्दी का नंगा खेल खेले थे. हद तो तब हो गई थी, जब 2014 में एक घटना को ले कर गोरखपुर के एक एसएसपी ने विनोद उपाध्याय को गिरफ्तार कर जेल भिजवाया था. इस ने अपनी राजनैतिक रसूख का इस्तेमाल कर एसएसपी पर उसे छोडऩे का दबाव बना रहा था, लेकिन एसएसपी ने उस की एक न सुनी.

फिर क्या था, सत्ता के गलियारे में अपनी पहुंच के बल पर उस ने एसएसपी का ट्रांसफर पीएसी में करा दिया. हालांकि बाद में उन का स्थानांतरण इसी पद पर बड़े जिले में कर दिया गया.

माफिया विनोद उपाध्याय के नाम से पुलिस विभाग में दहशत कायम थी. सलाखों के पीछे रहते हुए भी अपना वर्चस्व बनाए रखता था. लाल बहादुर यादव हत्याकांड के बाद एक बार फिर विनोद चर्चाओं में था.

सलाखों के पीछे कैद विनोद बाहर आने के लिए तड़प रहा था. साम, दाम, दंड, भेद सारी नीति अपना कर हर हाल में जेल के बाहर आना चाहता था. 2017 में ही एक और घटना घटी थी, जिस में खुद को बचाने के लिए अपने दुश्मनों को झूठे केस में फंसा दिया था.

विनोद उपाध्याय : एक थप्पड़ ने बनाया गैंगस्टर – भाग 2

1997 के दौर में श्रीप्रकाश शुक्ला एक कुख्यात डौन का नाम था, जिस के नाम से बड़ेबड़े सूरमाओं की घिग्घी बंध जाती थी. उस के एक फोन से व्यापारियों की तिजोरियों के ताले खुल जाया करते थे. मंत्रियों और राजनेताओं की जान उन के गले में अटकी रहती थी कि किस गोली पर उन का नाम लिखा है. उस के नाम से वे थरथर कांपते थे.

हालांकि विनोद उपाध्याय कभी डौन श्रीप्रकाश शुक्ला से मिला नहीं था, लेकिन 1997 में श्रीप्रकाश शुक्ला ने बाहुबली वीरेंद्र प्रताप शाही को लखनऊ में गोलियों से भून डाला, तब विनोद उपाध्याय का कहीं नाम भी नहीं था. श्रीप्रकाश शुक्ला के उस खूनी खेल को देख विनोद को हाथों में बंदूक थामने की सनक सवार हुई और वह गिरोह के सदस्यों से संपर्क में आ गया.

जब श्रीप्रकाश शुक्ला गाजियाबाद में एसटीएफ के हाथों मुठभेड़ में मारा गया था, तब विनोद गिरोह के सदस्यों सत्यव्रत राय और सुजीत चौरसिया के नजदीक आ गया था. उस के दिलोदिमाग पर श्रीप्रकाश शुक्ला के कारनामों की अमिट छाप छप गई और उस के आदर्श का चोला पहन कर अपने जीवन में पूरी तरह से उतार लिया और उस के जैसा डौन बनने का संकल्प ले लिया था.

सत्यव्रत राय की अंगुलियां पकड़ कर विनोद उपाध्याय ने जुर्म की डगर पर चलना शुरू किया था. एक तरह से वह अपराध के विश्वविद्यालय का एक माहिर प्रोफेसर था. अपराध के हर एक दांवपेंच को बखूबी जानता था. अपराध के चक्रव्यूह में प्रवेश करने और उस के सभी द्वारों को सफलतापूर्वक तोड़ कर बाहर निकलने की कला में भी वह माहिर था. विनोद धीरेधीरे सारे गुणों में माहिर हो चुका था.

विनोद और सत्यव्रत राय ने जमीन के कारोबार से अपने दोस्ताना सफर को आगे बढ़ाना शुरू किया. जमीन खरीदफरोख्त को ले कर गोरखपुर में जमीन के एक मालिक से विवाद हो गया. दबंग विनोद ने उसे जान से मारने की कोशिश की, लेकिन वह बच गया. जमीन मालिक ने उस के खिलाफ गोरखपुर के गोरखनाथ थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया.

1999 में विनोद के खिलाफ पहली बार हत्या का प्रयास (धारा 307 आईपीसी) का मुकदमा दर्ज हुआ था और उसे जेल भेज दिया गया. कुछ दिन जेल में रहने के बाद उस की जमानत हो गई और वह जेल से बाहर आ गया और फिर जुर्म की राह चल निकला.

जेल से बाहर आने के बाद विनोद और सत्यव्रत राय दोनों फिर से अपने जमीन और सूद वाले धंधे में जुड़ गए थे. इस बार दोनों की यह दोस्ती ज्यादा दिनों तक नहीं टिकी, बल्कि कुछ ही समय में दोनों के बीच दुश्मनी की बड़ी लकीर खिंच गई.

जुर्म की दुनिया का बड़ा खिलाड़ी था सत्यव्रत राय. जबकि विनोद जुर्म के बीज से अंकुरित हुआ एक पौधा था. उस के सामने उस की न कोई औकात थी और न कोई वजूद ही. उस ने अपनी तिकड़म वाली चाल से विनोद उपाध्याय को जेल भिजवा दिया.

वह साल 2004 था, जब विनोद विवाद में गोरखपुर जिला कारागार में बंद हुआ था. वह गजब का शातिर और उतना ही मनबढ़ किस्म का बदमाश था. जेल में बंद दबदबे को ले कर वहां पहले से निरुद्ध नेपाल के भैरहवा जिले के माफिया डौन जीतनारायण मिश्र से कहासुनी हो गई थी. माफिया जीत के सामने विनोद बौना था. उस ने विनोद को जम कर अपमानित करने के साथ ही एक जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिया था.

थप्पड़ इतना जोरदार था कि उसे दिन में तारे नजर आने लगे थे. इस के बाद माफिया जीतनारायण मिश्र को बस्ती जेल भेज दिया गया.

कुछ दिनों बाद विनोद जमानत पर जेल से बाहर आया और जीतनारायण से बदला लेने की जुगत में जुट गया था. जेल में हुआ अपमान और थप्पड़ की मार वह चाह कर भी भुला नहीं पा रहा था.

उस दिन साल 2005 के अगस्त की 7 तारीख थी. विनोद को पता चला कि जेल से छूटने के बाद जीतनारायण मिश्र बहनोई गोरेलाल मिश्र के साथ नेपाल जा रहा है. इसी मौके के इंतजार में विनोद कब से फडफ़ड़ा रहा था.

जैसे ही उसे जानकारी हुई, उस ने साथियों के साथ संतकबीर नगर के बखिरा क्षेत्र में जीतनारायण मिश्र और बहनोई गोरेलाल को घेर लिया. और दोनों को गोलियों से भून कर मौत के घाट उतार दिया. विनोद ने अपने अपमान का बदला ले लिया. इस के बाद वह पूर्वी उत्तर प्रदेश में चर्चा में आ गया था.

अपराध सिंडीकेट में विनोद ने अपना नाम दर्ज करा लिया था और दुस्साहस का एक पर्याय बन गया था. उस के नाम का डंका बजने लगा था. पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय को उस ने राजनीति का अखाड़ा बना लिया था.

उस के सामने कोई भी खड़ा होने का दुस्साहस नहीं कर सकता था. जो भी टकराने की जुर्रत करता, उस के हाथपांव तोड़वा कर अपाहिज बना देता था. अब उस के साथ युवाओं की एक बड़ी फौज तैयार हो चुकी थी.

अपराधी से राजनेता कैसे बना विनोद

विनोद उपाध्याय ने छात्र राजनीति से सियासी शुरुआत की. वह खुद छात्र संगठन का चुनाव नहीं लड़ा, बल्कि अपने प्रत्याशी मैदान में उतारने लगा. जिस प्रत्याशी के सिर पर हाथ रखता था, उस का विजयी होना तय था. उस से विनोद का जलवा और भी ज्यादा बढ़ गया था. अब तो उस के नाम पर छात्र हफ्तावसूली करने लगे.

इसी दौरान पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक बाहुबली और कद्दावर नेता की जब उस पर नजर पड़ी तो उस ने उस के सिर पर अपना हाथ रख दिया था.

उस बाहुबली नेता का वरदहस्त प्राप्त होते ही विनोद के पैर जमीन पर नहीं थे. उसी नेता ने बहुजन समाज पार्टी की मुखिया बहन मायावती से उसे मिलवाया और साल 2007 में बसपा से गोरखपुर सदर विधानसभा से टिकट दिलवाया.

विनोद के चुनाव प्रचार में खुद बसपा सुप्रीमो मायावती ने हिस्सा लिया और उस के हिस्से में वोट डालने की जनता से अपील की थी, लेकिन गोरखपुर की जनता ने उसे सिरे से नकार दिया.

चुनाव में उसे बुरी तरह हार का सामना करना पड़़ा और दूसरी बार जीत का सेहरा भाजपा के कद्दावर नेता राधामोहन दास अग्रवाल के सिर बंधा और वह एक बार फिर से विधायक बनेे.

विनोद उपाध्याय का आपराधिक चरित्र उस के सामने आया, जो हार का सब से बड़ा कारण बना था और वह चौथे स्थान पर आ गया था. इस हार के बाद मायावती ने उसे बसपा की सदस्यता से बरखास्त कर दिया और किसी राजनैतिक पार्टी ने उसे अपने यहां स्थान नहीं दिया तो उस ने अपना पुराना धंधा शुरू कर दिया.