Mehndi Suicide Note : मेहंदी से शरीर पर लिखा सुसाइड नोट, खाया जहर.

Mehndi Suicide Note.एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां एक महिला ने आत्महत्या करने से पहले अपने हाथपैरों पर मेहंदी से सुसाइड नोट लिखा. इस के बाद उस ने जहर खा लिया. आइए जानते हैं इस पूरी घटना के बारे में, जो करेगी आप को सतर्क और सावधान.

यह हैरान कर देने वाला मामला मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का है, जहां 32 साल की प्रीति वर्मा ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली. जहर खाने से पहले प्रीति ने कागज पर नहीं, बल्कि अपने हाथों और पैरों पर मेहंदी से सुसाइड नोट लिखा.

हालत बिगड़ने पर फेमिली वाले उसे पहले जिला अस्पताल और फिर बेहतर इलाज के लिए एक निजी अस्पताल ले गए, लेकिन इलाज के दौरान उस की मौत हो गई.

अब सवाल यह है कि प्रीति ने मेहंदी से क्या लिखा था? पुलिस के लिए उस के शरीर पर लिखे शब्द इस पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी बन गए हैं. पुलिस इसी सुसाइड नोट के आधार पर आत्महत्या के कारणों की जांच कर रही है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जहर खाने से पहले प्रीति ने अपने दोनों हाथों और पैरों पर मेहंदी से एक लंबा मैसेज लिखा था. इस मैसेज में उस ने कथित प्रताड़ना का जिक्र किया था.

बताया जा रहा है कि यह मैसेज इतनी डिटेल में था कि पुलिस इसे मामले के महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में देख रही है. पुलिस का मानना है कि यह मैसेज घटना के पीछे की परिस्थितियों को समझने में अहम भूमिका निभा सकता है. Mehndi Suicide Note

Madhya Pradesh Crime News: गढ़ी का रहस्य

Madhya Pradesh Crime News: नंदी सिंह और हरि सिंह के सामने जब भी युवरानी और राजकुमारी बेबी राजा आतीं, दोनों को अपना वह अपमान याद आ जाता, जिसे उन्होंने गांव वालों के सामने पुलिस से करवाया था. उन्होंने दोनों की हत्या कर के अपमान का बदला तो ले लिया, लेकिन अब उन की बाकी की जिंदगी जेल में ही कटेगी.

छतरपुर जिले में जहां से उत्तर प्रदेश की सीमा शुरू होती है, वहां हजार बारह सौ लोगों की आबादी वाला एक छोटा सा गांव है नैगुंवा. विकास की दौड़ में पिछड़े इस जिले में नैगुंवा का इलाका काफी पिछड़ा हुआ है. नैगुंवा हमेशा से उपेक्षा का शिकार रहा हो, ऐसा नहीं है. उत्तर प्रदेश के चरखारी राजा की यह जागीर भूतकाल में अपने वैभव और सुशासन के लिए जानी जाती थी. स्वतंत्रता के बाद राजारजवाड़े खत्म हो गए तो फिर जागीरें भी नहीं रहीं. लेकिन जैसे रस्सी जलने पर भी उस के बल नहीं जाते, कुछ वैसा ही हाल इन रियासतों और रियासतदारों का है.

नैगुंवा के बीचोबीच पत्थर की विशाल हवेली आज भी मौजूद है, जिसे जागीरदारों की निशानी कह सकते हैं. स्थानीय लोग इसे गढ़ी कहते हैं. यह गढ़ी अब जागीरदार के वंशज महाराज बहादुर सिंह के आधिपत्य में है. इस हवेली में वह अपनी पत्नी संगीता देवी, 70 वर्षीया राजमाता युवरानी और 40 वर्षीया बहन राजकुमारी बेबी राजा के साथ रहते हैं. यह जागीर अब पहले जैसी संपन्न तो नहीं रही, लेकिन अभी भी जागीरदारों के पास खेतीकिसानी की इतनी जमीन है, जिस से आज भी इस पुराने जागीरदार खानदान का राजसी ठाठबाट बरकरार है.

अपने रुतबे को बरकरार रखने के लिए महाराज बहादुर सिंह ने अपनी सारी खेती की जमीन बंटाईदारों को सौंप रखी है. इस के 2 फायदे हैं, एक तो राजा को खुद किसान के तौर पर अपने खेतों में काम नहीं करना पड़ता, दूसरे बटाई के बाद भी जागीर के खाते में हर साल इतना माल आ जाता है कि पेट भी भरता रहे और शान भी बनी रहे. इसी साल फरवरी महीने के दूसरे सप्ताह की बात है. महाराज के ससुराल पक्ष के किसी खास रिश्तेदार के यहां शादी थी. शादी में शामिल होने के लिए महाराज बहादुर सिंह अपनी पत्नी संगीता देवी और दोनों बच्चों को ले कर उरई चले गए. उन की मां युवरानी और बहन बेबी राजा गढ़ी में ही रह गईं.

दरअसल, महाराज बहादुर सिंह की 2 बहनें थीं, जिन में से एक की मृत्यु हो चुकी थी. दूसरी छोटी बहन बेबी राजा की शादी उत्तर प्रदेश के एक राज परिवार में हुई थी. लेकिन पति से अनबन के कारण वह पिछले कई सालों से अपने मायके में मां और भाई के साथ रह रही थीं. 17 फरवरी की बात है. महाराज बहादुर सिंह उरई में शादी समारोह में व्यस्त थे. तभी नैगुंवा के रहने वाले नंदी सिंह राजपूत ने उन्हें फोन कर के बताया कि गढ़ी के दरवाजे सुबह से ही बंद हैं. दरअसल नंदी सिंह रोज सुबह गढ़ी में दूध देने आता था. वह महाराज का बटाईदार भी था, इसलिए महाराज बहादुर सिंह से उस की अच्छी बनती थी.

नंदी ने फोन पर महाराज को बताया कि सुबह वह दूध ले कर गढ़ी गया था, लेकिन काफी देर तक दरवाजे पर दस्तक देने के बाद भी किसी ने दरवाजा नहीं खोला. उस वक्त वह वापस लौट आया और 11 बजे के आसपास फिर से दूध ले कर गढ़ी पर गया. लेकिन अंदर से दरवाजा अब भी बंद था. बारबार आवाज देने पर अंदर से कोई नहीं आया, न ही कोई जवाब मिला.नंदी की इस सूचना के बाद महाराज बहादुर सिंह को तत्काल कदम उठाना चाहिए था, लेकिन संभवत: अपनी व्यस्तता की वजह से उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया, फलस्वरूप बात यहीं खत्म हो गई. अगले दिन 18 फरवरी की सुबह नंदी ने उन्हें फिर से फोन कर के दरवाजा न खोले जाने की बात बताई, जिसे सुन कर नैगुंवा महाराज बहादुर सिंह को मांबहन की चिंता हुई.

दोपहर बाद वह पत्नी संगीता और बच्चों को ले कर नैगुंवा वापस आ गए. महाराज के बारबार आवाज देने पर भी जब दरवाजा नहीं खुला तो पूरा गांव गढ़ी के बाहर जमा हो गया. लोगों ने तुरंत बढ़ी सी सीढ़ी लगाई, ताकि अंदर जाया जा सके. कुछ लोगों ने सीढ़ी के सहारे महाराज के साथ गढ़ी की दीवार फांद कर अंदर प्रवेश किया. अंदर सन्नाटा पसरा था. महाराज ने गांव वालों के साथ एकएक कमरे को छान मारा, लेकिन मां और बहन का कहीं कोई पता नहीं चला. उन्हें ढूंढ़ते हुए जब वह महारानी युवरानी के शयन कक्ष में पहुंचे तो वहां का नजारा देख कर सन्न रह गए. कमरे की फर्श पर उन की मां युवरानी और बहन बेबी राजा के शव पड़े थे.

मौके के हालात किसी गंभीर वारदात की तरफ इशारा कर रहे थे, इसलिए महाराज ने तुरंत इस घटना की जानकारी नैगुंवा थाना प्रभारी मृगेंद्र त्रिपाठी को दी. जागीरदार परिवार में इस तरह का हादसा होना गंभीर बात थी. टीआई मृगेंद्र त्रिपाठी ने तुरंत एसपी छतरपुर ललित शाक्यवार और एसडीओपी नैगुंवा उमेश तोमर को इस घटना के बारे में बता दिया. इस के बाद वह अपने साथ एसआई जितेंद्र भदौरिया, सुशील शुक्ला और महिला एसआई प्रतिभा श्रीवास्तव को ले कर नैगुंवा पहुंच गए.

जिस के बारे में हम यहां बात कर रहे हैं, वह चरखारी रियासत कभी बुंदेलखंड अंचल के बड़े भूभाग पर फैली हुई थी. प्रजा की बेहतर खुशहाली के लिए जब कुछ जागीरदारों के गठन की जरूरत पड़ी तो विचारविमर्श के बाद नैगुंवा के रहने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह यादव को नैगुंवा का जागीरदार नियुक्त किया गया था. विश्वनाथ प्रताप सिंह वाकई योग्य, पराक्रमी और ईमानदार व्यक्ति थे. उन्होंने अपने समय में इस जागीर का काफी विकास किया, जिस से खुश हो कर चरखारी महाराज ने नैगुंवा की सीमा से लगी रिबई जागीर की जागीरदारी भी उन्हें सौंप दी. दोनों जागीरों का काम संभालते हुए ही विश्वनाथ प्रताप सिंह की शादी हुई. शादी के एक साल बाद उन के घर बेटे का जन्म हुआ, जिसे नाम दिया गया रतन सिंह जूदेव.

वक्त के साथ रतन सिंह जूदेव बड़े होने लगे. शिक्षादीक्षा के बाद जब उन्होंने जवानी में कदम रखा तो रियासत में सब से खूबसूरत मानी जाने वाली युवती चंपा पर उन का दिल आ गया. यह वह समय था, जब जागीरदार के बेटे और भविष्य के जागीरदार की जीवनसाथी बनने के लिए लगभग हर युवती तैयार रहती थी. जब रतन सिंह ने चंपा के पास एकांत में मिलने का संदेश भिजवाया तो वह खुशी से झूम उठी. वह निश्चित समय पर रतन सिंह से मिलने नदी किनारे बने बाग में पहुंच गई. पहली मुलाकात में ही चंपा ने रतन सिंह के दिल पर अपनी छाप छोड़ दी. नतीजतन रतन सिंह उस से शादी करने की जिद कर बैठे. लेकिन पिता विश्वनाथ प्रताप सिंह ने यह रिश्ता स्वीकार नहीं किया.

उस की जगह वह पड़ोसी जागीरदार की बेटी को बहू बना कर गढ़ी में ले आए. रतन सिंह ने पिता की आज्ञा मान कर उन की पसंद की लड़की से शादी तो कर ली, लेकिन पत्नी का रूपयौवन उन का मन नहीं जीत सका. फलस्वरूप शादी के बाद भी रतन सिंह की अधिकांश रातें चंपा के साथ बीतती रहीं. समय के साथ चंपा रतन सिंह के 2 बेटों, सरकार सिंह और सरताज सिंह की मां बनी. दूसरी तरफ रतन सिंह की ब्याहता रानी से भी 2 बेटे, विजय बहादुर सिंह और गजराज सिंह पैदा हुए. चंपा चाहती थी कि महाराज अपनी नैगुंवा और रिबई की जागीरदारी में से एक जागीर उस के दोनों बेटों को दे दें और दूसरी अपनी पत्नी के बेटों को.

लेकिन तब तक चंपा का यौवन ढल चुका था. उस में अब वह आकर्षण नहीं रह गया था, जिस की वजह से महाराज अपनी रानी को छोड़ कर उस के घर पड़े रहते थे. इसलिए वह उस की बात टालते रहे. उसी दौरान उन का निधन हो गया. महाराज के निधन के बाद जागीरों का बंटवारा हुआ, जिस में रिबई की जागीर गजराज सिंह को मिली और नैगुंवा की जागीर विजय बहादुर सिंह को. इस तरह गजराज सिंह और विजय बहादुर सिंह अलगअलग जागीरों के जागीरदार बन गए.

बाद में गजराज सिंह का विवाह महोबा के महाराजपुर की राजकुमारी शांति सिंह के साथ हुआ. लेकिन विवाह के ठीक दूसरे दिन जब महाराज की सुहागरात थी और वह अपने शयनकक्ष में दाखिल होने ही वाले थे कि अज्ञात लोगों ने उन पर हमला कर के उन की हत्या कर दी थी. शांति सिंह पति का चेहरा देखने से पहले ही विधवा हो गईं. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और देवर विजय बहादुर सिंह के सहयोग से अपनी जागीर को संभालने लगीं.

विजय बहादुर सिंह जूदेव का विवाह हमीरपुर जिले के ममना गांव में हुआ था. उन की 3 संतानें हुईं, 2 बेटियां और एक बेटा महाराज बहादुर सिंह जूदेव. समय आने पर विजय बहादुर सिंह जूदेव ने अपनी बड़ी बेटी रज्जो राजा का विवाह कर दिया. इसी बीच लंबी बीमारी के बाद उन का निधन हो गया. जबकि दूसरी बेटी बेबी राजा की शादी के बाद अपने पति से नहीं बनी. फलस्वरूप वह मायके आ कर अपनी मां युवरानी और भाई महाराज बहादुर सिंह के साथ रहने लगीं.

सब कुछ ठीक चल रहा था कि 18 फरवरी को महाराज बहादुर सिंह की गैरमौजूदगी में गढ़ी के अंदर मांबेटी की संदिग्ध मौत से गढ़ी चर्चाओं में आ गई. नैगुंवा थाना टीआई मृगेंद्र त्रिपाठी की टीम नैगुंवा स्थित गढ़ी के अंदर पहुंची तो वहां पर 70 वर्षीया युवरानी तथा 40 वर्षीया राजकुमारी बेबी राजा की लाशें बरामद हुईं. घटनास्थल पर मिले सबूत और हालात साफ इशारा कर रहे थे कि मांबेटी को किसी सुनियोजित साजिश के तहत मौत के घाट उतारा गया था. अलबत्ता वारदात को हादसे की शक्ल देने की नाकाम कोशिश जरूर की गई थी. गढ़ी के अंदर महारानी और राजकुमारी के शव बरामद होने की खबर फैलते ही न केवल छरतपुर जिले में, बल्कि समूचे बुंदेलखंड में सनसनी फैल गई थी.

घटनास्थल की स्थिति से साफ लग रहा था कि हत्यारों ने मांबेटी की हत्या के बाद उन के शव रूम हीटर से चिपका दिए थे, ताकि ऐसा लगे कि दोनों की मौत करंट की चपेट में आने की वजह से हुई थी. प्रारंभिक जांच के बाद पुलिस ने रानी और राजकुमारी की बरामद लाशों को पोस्टमार्टम के लिए नैगुंवा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भिजवा दिया. 3 चिकित्सकों के पैनल ने मांबेटी के शवों का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम के बाद गांव में ही शवों का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया. गढ़ी में मांबेटी की संदिग्ध मौत को ले कर तरहतरह के कयास लगाए जा रहे थे. लेकिन हकीकत तब सामने आई, जब 3 दिनों बाद पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली.

रिपोर्ट में बताया गया था कि रानी और राजकुमारी के साथ मारपीट कर के उन की हत्या की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने पर नैगुंवा थाना पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी. दूसरी तरफ इस बीच छतरपुर रेंज के डीआईजी के.सी. जैन, एसपी ललित शाक्यवार, एएसपी नीरज पांडेय, नैगुंवा एसडीओपी उमेश सिंह तोमर ने भी मौके पर पहुंच कर घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.

इन अधिकारियों ने स्थानीय लोगों से चर्चा भी की. घटनास्थल का जायजा लेने के बाद ललित शाक्यवार ने न केवल एक टीम गठित कर के जल्द से जल्द हत्या की गुत्थी सुलझाने के निर्देश दिए, बल्कि यह भी बताया कि जांच की दिशा क्या होनी चाहिए? दरअसल, घटनास्थल से पुलिस को कुछ टूटे दांत और कुछ ऐसे सबूत मिले थे, जिन से साफ जाहिर हो रहा था कि मांबेटी की मौत करंट लगने से नहीं, बल्कि उन की हत्या की गई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, मृत्यु से पहले मांबेटी को क्रूरतापूर्वक पीटा गया था, जिस से जिस्म के कई अंदरूनी हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए थे और इसी वजह से दोनोें ने दम तोड़ दिया था. गढ़ी से राजकुमारी बेबी राजा का मोबाइल भी गायब था. लेकिन लंबा समय बीतने के बाद भी हत्यारों का कोई पुख्ता सुराग नहीं लगा तो एसपी ने हत्यारों का सुराग देने वाले व्यक्ति को 10 हजार रुपए इनाम देने की घोषिण की.

बाद में इस राशि को बढ़ा कर छतरपुर पुलिस रेंज के डीआईजी ने 20 हजार रुपए कर दी. इस के बाद भी जब पुलिस को सफलता नहीं मिली तो ललित शाक्यवार ने घटना का सिलसिलेवार अध्ययन किया और सब से पहले महाराज बहादुर सिंह को वारदात की सूचना देने वाले नंदी सिंह से बारबार पूछताछ करने के निर्देश दिए. इस का नतीजा यह निकला कि वारदात के 13वें दिन पुलिस को गढ़ी के अंदर दोहरी हत्या करने वालों तक पहुंचने में कामयाबी मिल गई.

दोहरी हत्या की इस वारदात को नैगुंवा के नंदी सिंह राजपूत ने अपने साथी हरि सिंह उर्फ मुन्ना यादव के साथ मिल कर अंजाम दिया था. पुलिस ने आरोपियों से जब सख्ती से पूछताछ की तो दोनों ने महारानी और राजकुमारी की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. दोनों हत्यारोपियों को अदालत में पेश कर के नैगुंवा पुलिस ने दोनों को 2 बार पुलिस रिमांड पर ले कर हत्याकांड से संबंधित पूछताछ की और सबूत हासिल किए. नैगुंवा टीआई के मुताबिक हत्या की वारदात का मकसद एक लाख रुपए की रकम चोरी करना तथा पुरानी रंजिश थी.

नंदी राजपूत रानी की खेती की जमीन बटाई पर ले कर खेती किया करता था. नंदी ने गढ़ी के अंदर दोहरी हत्या को उस वक्त अंजाम दिया था, जब राजा महाराज बहादुर सिंह जूदेव उरई स्थित रिश्तेदारी में गए हुए थे. हत्या की वारदात के अगले दिन हत्यारोपी नंदी राजपूत ने योजना अनुसार मोबाइल पर महाराज बहादुर सिंह जूदेव को सूचना दी कि गढ़ी के दरवाजे नहीं खुल रहे हैं.

महाराज बहादुर सिंह जूदेव के निर्देश पर नंदी राजपूत ने नैगुंवा थाना पुलिस को गढ़ी के दरवाजे न खुलने की जानकारी दी थी. बताते हैं कि नैगुंवा गढ़ी में कुछ समय पूर्व लाखों रुपए के गहने, नकदी चोरी होने की घटना घटी थी, जिस में संदेह के आधार पर राजकुमारी बेबी राजा ने पुलिस से दोनों हत्यारोपियों को प्रताडि़त करवाया था. इन दोनों को पता चला कि बेबी राजा ने किसी को एक लाख रुपए की जमीन बेची है. नकदी चोरी करने के मकसद से दोनों हत्यारोपी रात के वक्त गढ़ी में घुसे. लेकिन वहां से उन्हें महज 3 हजार रुपए की धनराशि और एक मोबाइल ही मिल पाया था.

जमीन बिक्री से हासिल रकम कर्ज में चुका दी गई थी. चूंकि गढ़ी के अंदर दाखिल हत्यारोपियों को महारानी और राजकुमारी ने पहचान लिया था, इसलिए भेद खुल जाने के डर से दोनों ने पीटपीट कर मांबेटी की हत्या कर दी थी. पुलिस रिमांड के बाद 5 मार्च को दोनों अभियुक्तों का डीएनए परीक्षण कराने के बाद पुलिस ने उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Madhya Pradesh Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

MP News: लालच का बुरा अंजाम

MP News: देवेंद्र खंडेलवाल वकील होने के साथसाथ एक रसूखदार व्यक्ति थे. करीब 20 करोड़ की एक प्रौपर्टी को ले कर उन का अपने खास दोस्त लालचंद हार्डिया से कोर्ट में मुकदमा चल रहा था. लेकिन कोर्ट का फैसला आने से पहले ही देवेंद्र खंडेलवाल की हत्या हो गई. देवेंद्र खंडेलवाल इंदौर के एक जानेमाने वकील थे. 23 दिसंबर, 2014 को वह इंदौर से करीब 30 किलोमीटर दूर हातोद कोर्ट में एक केस की पैरवी के लिए गए थे. वह देर रात तक घर नहीं लौटे तो घर वालों ने बात करने के लिए उन्हें फोन किया, लेकिन वह बंद था. कई बार नंबर मिलाने के बाद भी उन का फोन मिला.

इस से घर वाले चिंता में पड़ गए, क्योंकि वह अपना मोबाइल कभी भी बंद नहीं रखते थे. रात काफी गहरा चुकी थी. इतनी रात को उन्हें खोजने के लिए कहीं जाना भी मुमकिन नहीं था. फिर भी उन्होंने कुछ जानकारों के पास फोन किए, लेकिन देवेंद्र खंडेलवाल के बारे में जानकारी नहीं मिल सकी. तब परिजनों ने सुबह होने पर उन्हें खोजने का मन बनाया. चिंता में जैसेतैसे उन्होंने रात काटी. अगले दिन परिजन इंदौर की कचहरी पहुंचे. देवेंद्र खंडेलवाल के जिन वकीलों के साथ नजदीकी संबंध थे, उन से मालूमात की तो पता लगा कि वह हातोद कोर्ट से शाम 4 बजे इंदौर कचहरी आ गए थे. इस के बाद वह कचहरी के सामने ही स्थित बीजी बार में देखे गए थे.

बीजी बार कोर्ट के ठीक सामने एमजी रोड पर है. बीजी बार से 57 वर्षीय देवेंद्र खंडेलवाल कहां चले गए, यह बात परिजनों को पता नहीं लगी तो वह थाना सेंट्रल कोतवाली चले गए. थानाप्रभारी मंजू यादव को उन्होंने पूरी बात बता दी. मामला चूंकि एक वकील का था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस बारे में अपने वरिष्ठ अधिकारियों को अवगत करा दिया. वकील मामले को तूल न दे दें, इसलिए डीआईजी राकेश गुप्ता ने थाना सेंट्रल कोतवाली, थाना एमजी रोड, थाना तुकोगंज के थानाप्रभारियों की संयुक्त बैठक कर एडवोकेट देवेंद्र खंडेलवाल को तलाशने के निर्देश दिए.

सेंट्रल कोतवाली प्रभारी मंजू यादव ने जांच की शुरुआत बीजी बार से शुरू की. वहां मौजूद सीसीटीवी कैमरे की फुटेज की जांच की तो पता चला कि देवेंद्र खंडेलवाल बीजी बार गए तो थे, लेकिन वहां से वह 2 व्यक्तियों के साथ निकल गए थे. उन्हीं के साथ वह एक कार में बैठ कर कहीं चले गए थे. थानाप्रभारी ने वह फुटेज जब खंडेलवाल के परिजनों को दिखाई तो उन्होंने उन दोनों व्यक्तियों को पहचान लिया. उन्होंने बताया कि उन में से एक महेंद्र ठाकुर और दूसरा रूपेश उर्फ महेंद्र शर्मा है. दोनों ड्राइवर हैं. वे दोनों ही उन के अच्छे परिचित हैं. उन्होंने बताया कि वे दोनों नंदानगर में रहते हैं.

थानाप्रभारी को रूपेश शर्मा और महेंद्र ठाकुर के फोन नंबर मिल गए थे. फोन नंबरों के आधार पर पुलिस को उन के घर के पते भी मिल गए. एक पुलिस टीम तुरंत उन के घर के पते पर भेजी गई तो अपनेअपने घरों से नदारद मिले. पुलिस ने उन के फोन नंबर सर्विलांस पर लगाए तो उन की लोकेशन राजस्थान के कोटा शहर स्थित एक होटल की मिली. थानाप्रभारी मंजू यादव एक पुलिस टीम के साथ कोटा पहुंच गईं और स्थानीय पुलिस के साथ उस होटल में पहुंचीं. उस होटल की तलाशी ली गई तो एक कमरे में रूपेश और महेंद्र मिल गए. दोनों को हिरासत में ले कर पुलिस टीम इंदौर लौट आई.

दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि एडवोकेट देवेंद्र खंडेलवाल की हत्या की जा चुकी है और उन की लाश जिला खरगोन के घामनोद इलाके में फेंक दी है. उन्होंने उस की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

एडवोकेट देवेंद्र खंडेलवाल और लालचंद हार्डिया अच्छे दोस्त थे. दोनों ही कामोडिटी व्यापार से जुड़े थे. इंदौर के आर्ट्स ऐंड कौमर्स कालेज के पास देवेंद्र ने एक एकड़ जमीन 30 साल पहले 50 हजार में खरीदी थी. आज इस जमीन की कीमत लगभग 20 करोड़ रुपए थी. बाद में इस जमीन पर लालचंद हार्डिया ने भी अपना हक जताया. दोनों के बीच विवाद बढ़ने पर मामला न्यायालय में पहुंच गया. दोनों के बीच चल रहे टकराव को दूर करने के लिए उन के नजदीकियों ने उन का समझौता भी कराने की कोशिश की, लेकिन दोनों की जिद की वजह से समझौता नहीं हो सका. लालचंद हार्डिया का कहना था कि वह उन की पुश्तैनी जमीन थी और देवेंद्र ने छलबल से इस पर अपना कब्जा कर लिया था.

देवेंद्र खंडेलवाल और लालचंद हार्डिया की तरह किशनलाल उर्फ बड़े भी कामोडिटी व्यापार से जुड़े थे. तीनों ही धनाढ्य थे. किशनलाल की बुरहानपुर में बड़ी धाक थी. वह विवादित जमीनों को औनेपौने दामों पर खरीद कर उसे ऊंची कीमत पर बेचता था. हार्डिया ने किशनलाल से बात की. किशनलाल ने पहले तो देवेंद्र खंडेलवाल को समझाने की कोशिश की. जब समझौते के सारे प्रयास विफल हो गए तो किशनलाल देवेंद्र खंडेलवाल को रास्ते से हटाने की योजना बना ली. किशनलाल ने रूपेश, महेंद्र और प्रभाकर नाम के व्यक्तियों से बात कर देवेंद्र खंडेलवाल की हत्या के लिए तैयार कर लिया. बदले में सब को एकएक लाख रुपए देने की बात कही. रूपेश और महेंद्र ड्राइवर थे. जबकि प्रभाकर छोटेमोटे अपराधों में संलिप्त था. तीनों लोगों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. इसलिए इतने पैसों में ही वे एडवोकेट खंडेलवाल की हत्या करने के लिए तैयार हो गए.

उन्होंने पहले एडवोकेट देवेंद्र खंडेलवाल की रैकी की, इस के बाद वे उन्हें ठिकाने लगाने का मौका तलाशने लगे. एक दिन देवेंद्र स्कूटर से कहीं जा रहे थे, तब रूपेश और महेंद्र टवेरा कार नंबर एमपी-47बी सी 0151 से उन का पीछा करने लगे. एक जगह मौका देख कर उन्होंने जान से मारने के लिए उन के स्कूटर में जोरदार टक्कर मारी. इस से देवेंद्र स्कूटर से उछल कर सड़क के एक तरफ गिर गए और घायल हो गए. उन के हाथ की एक उंगली भी टूट गई थी, जिस में बाद में तार डाला गया. उन का स्कूटर भी काफी क्षतिग्रस्त हो गया. घटनास्थल पर ही दोनों पक्षों में जम कर कहासुनी हुई.

रूपेश ने किशनलाल को फोन कर के यह बात बताई तो किशनलाल ने उस से कहा कि वह फौरन खंडेलवाल से माफी मांगते हुए समझौता कर ले और देवेंद्र की गाड़ी ठीक कराने का, हर्जेखर्चे का जिम्मा ले ले. रूपेश ने देवेंद्र से माफी मांगते हुए उन का स्कूटर सही कराने और उन का इलाज कराने का भरोसा दिया. यह बात उन की हत्या से दोढाई साल पहले की है. तब दोनों में समझौता हो गया. यह पूरा खर्च किशनलाल राय ने उठाया. समझौता हो जाने के बाद उस ने रूपेश और महेंद्र से यह भी कहा कि तुम दोनों इस बहाने देवेंद्र से दोस्ती कर लो. इस से काम और आसान हो जाएगा.

स्कूटर सही कराने में 4-5 दिन लग गए. इस दौरान रूपेश और महेंद्र ने एडवोकेट देवेंद्र खंडेलवाल से अच्छी दोस्ती कर ली. जब सब ठीक हो गया तो रूपेश ने देवेंद्र खंडेलवाल को उन का स्कूटर सौंपते हुए शाम की दावत का प्रस्ताव उन के सामने रखा. खंडेलवाल तैयार हो गए. उस दावत में रूपेश को यह भी पता चल गया कि वह शराब पीने के भी शौकीन हैं. इस के बाद तो उन के बीच आए दिन पीनेपिलाने का दौर चलने लगा. दोस्ती होने के बाद उन्हें अपना काम और आसान होता नजर आया. 23 दिसंबर, 2014 को उन्होंने काम को अंजाम देने की योजना बना ली. क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि उस दिन देवेंद्र खंडेलवाल एक केस के सिलसिले में हातोद कोर्ट गए हुए हैं.

वे शाम को इंदौर सिविल कोर्ट के बाहर खड़े हो कर देवेंद्र के लौटने की राह देखने लगे. करीब 3 बजे देवेंद्र हातोद से इंदौर कोर्ट लौटे तो मेन गेट पर ही रूपेश और महेंद्र उन्हें मिल गए. हालचाल पूछने के बाद रूपेश ने कहा, ‘‘आइए बीजी बार में नाश्तापानी हो जाए.’’

देवेंद्र ने कहा, ‘‘तुम बार में पहुंचो, मैं फाइलें वगैरह रख कर आता हूं.’’

15-20 मिनट बाद देवेंद्र भी बार में पहुंच कर बोले, ‘‘आज कोई खास बात है क्या? अचानक यह पार्टी कैसी?’’

‘‘खास बात यह है कि सांवेर के पास एक खेती की जमीन है. एकदम साफसुथरी, कोई विवाद भी नहीं है उस जमीन पर. जमीन बेचने वाला परिचित है और गरजू भी, इसलिए सस्ते में सौदा हो सकता है. एक बात और कि बेचने वाला उस जमीन का अकेला वारिस है. चल कर देख लेते हैं.’’ रूपेश ने कहा.

‘‘ठीक है, देख लेंगे.’’ देवेंद्र ने रजामंदी जता दी.

खापी कर वे रवाना होने की तैयारी करने लगे तो रूपेश ने अपने एक साथी विजय को फोन कर के बुला लिया. विजय भी आपराधिक प्रवृत्ति का था. बार से निकल इंडिगो कार में बैठ कर सभी रवाना हो गए. वे पहले ए.बी. रोड पर श्री सत्यसाईं चौराहे के पास किशनलाल के दफ्तर गए. वहां से किशनलाल भी उन के साथ हो लिया. वे कार द्वारा सांवेर की तरफ रवाना हुए. कार रूपेश चला रहा था और देवेंद्र उस के बगल बैठे थे, बाकी साथी पीछे बैठे थे. उन्होंने देवेंद्र को कुछ ज्यादा ही शराब पिला दी थी, इसलिए उन्हें नशा चढ़ने लगा था. जब गाड़ी सुनसान क्षेत्र से गुजर रही थी, तभी पीछे बैठे प्रभाकर और किशनलाल देवेंद्र के गले में मफलर डाल कर गला कसने लगे. विजय और महेंद्र ने भी इस काम में मदद की. थोड़ी देर छटपटा कर देवेंद्र का शरीर शांत हो गया.

अब उन के सामने समस्या यह थी कि लाश को ठिकाने कहां लगाएं. प्लान बना कर वे खरगोन की तरफ रवाना हो गए. धामनोद में उन्होंने एक दुकान से एक केन खरीदी और आगे एक पैट्रोल पंप से 5 लीटर पैट्रोल भरवा लिया. थोड़ी दूर आगे चलने पर एक जगह गाड़ी बंद हो गई. जांच की गई तो पता चला कि गाड़ी के इंजन के पास जो फैन होता है उस की बेल्ट टूट गई थी. जहां गाड़ी रुकी थी, वह भी सुनसान जगह थी. पास ही एक छोटा सा तालाब था. मौका देख कर उन्होंने वहीं पर देवेंद्र की लाश गाड़ी से उतार कर डाल दी. फिर उस पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा दी. उन का मोबाइल फोन उन्होंने तालाब में फेंक दिया. जब तक आग जलती रही, वे वहीं खड़े रहे.

जब देखा कि अब शव पहचानने योग्य नहीं रह गया है तो रूपेश बड़वाह गया और कार का फैन बेल्ट खरीद लाया. इस के बाद गाड़ी ठीक कर के वे बड़वाह के रास्ते इंदौर पहुंच गए. थानाप्रभारी मंजू यादव दोनों अभियुक्तों को ले कर मौकाएवारदात पर गईं तो पता चला कि स्थानीय पुलिस ने लाश बरामद कर ली थी और लावारिस मान कर उस का पोस्टमार्टम करवा कर दफना भी दी थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया था कि दम घुटने से व्यक्ति की मौत हुई थी. काररवाई पूरी कर के थानाप्रभारी जमीन से लाश निकलवा कर इंदौर ले आईं और उसे एडवोकेट खंडेलवाल के परिजनों को दिखाई. झुलस जाने की वजह से घर वालों ने उसे देवेंद्र का शव मानने से इंकार कर दिया. उन का कहना था कि देवेंद्र के हाथ की एक अंगुली में तार डाला गया था, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इस का खुलासा नहीं था.

लाश पर से एक धातु की चेन में पैंडल भी पड़ा मिला. उस पैंडल को देख कर देवेंद्र खंडेलवाल की बहन चौंकी, क्योंकि वह पैंडल उन्होंने ही इंदौर के भमोरी इलाके के एक तांत्रिक से उस समय बनवाया था, जब देवेंद्र को जान का खतरा था. परिजनों की मांग को देखते पुलिस ने फिर से शव का पोस्टमार्टम करवाया. तब डाक्टर ने स्पष्ट किया कि देवेंद्र के हाथ की अंगुली में तार डाला गया था, जो बाद में निकलवा लिया गया था. इस का चिह्न डाक्टर को अंगुली में मिला. इस के बाद ही परिजनों ने लाश की पुष्टि देवेंद्र खंडेलवाल के रूप में की. तब पुलिस ने लाश उन के हवाले कर दी.

दोनों से पूछताछ के बाद पुलिस ने किशनलाल राय, विजय और प्रभाकर को भी 31 दिसंबर, 2014 को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने सभी अभियुक्तों को 2 जनवरी, 2015 तक रिमांड पर लिया. उन्हें ले कर जब पुलिस कोर्ट से बाहर निकली तो कुछ वकीलों ने अभियुक्तों को पीटना शुरू कर दिया. पुलिस ने बड़ी मुश्किल से उन्हें बचाया. रिमांड अवधि में पुलिस ने अभियुक्तों से विस्तार से पूछताछ की. पूछताछ में लालचंद हार्डिया का नाम सामने आने पर पुलिस ने उन से भी पूछताछ की. उन्होंने घटना में अपना हाथ होने से साफ इंकार कर दिया और कहा कि विवादित जमीन का मामला कोर्ट में है. कोर्ट जो भी फैसला करेगी, मुझे मान्य होगा.

2 जनवरी, 2015 को अभियुक्तों को पुन: कोर्ट में भारी सुरक्षा के साथ पेश किया गया, जहां से उन्हें सेंट्रल जेल भेज दिया गया. इसी दौरान वकीलों का एक प्रतिनिधिमंडल आईजी विपिन माहेश्वरी से मिला और एडवोकेट देवेंद्र खंडेलवाल हत्या की पृष्ठभूमि में जिन बड़े लोगों का हाथ रहा है उन्हें भी गिरफ्तार करने की मांग की. आईजी ने वकीलों को भरोसा दिलाया कि पुलिस निष्पक्ष जांच कर रही है. दोषी के खिलाफ सख्त काररवाई की जाएगी. कितना भी रसूखदार व्यक्ति इस घटना में सम्मिलित होगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi love Story in Short : प्रेमिका को घर बुलाकर घोंटा गला फिर गड्ढा खोदकर शव दफनाया

Hindi love Story in Short : अपनेअपने जीवनसाथी को छोड़ चुके संतोष और छायाबाई के बीच काफी नजदीकी रिश्ता बन गया था. लेकिन दोनों के बीच ऐसा क्या हुआ कि उन की यह नजदीकी एक दिन 2 गज जमीन के नीचे दफन हो गई?

साल 2020 समाप्त होने में गिनती के दिन बचे थे. नया साल शीत लहर की चौखट पर खड़ा था. ऐसे में खरगोन जिला मुख्यालय से कुछ दूरी पर स्थित भीकनगांव के टीआई जगदीश प्रसाद गोयल पुलिस टीम के साथ गांव में रहने वाली छायाबाई के पिता को ले कर मोहनखेड़ी पहुंचे. पुलिस को देख कर गांव वालों की भीड़ भी संतोष गोलकर के नए बने मकान के सामने जमा हो गई. दरअसल 2 दिन पहले गांव में अपने पिता के घर पर रहने वाली 25 वर्षीय छायाबाई अचानक लापता हो गई थी. जिस दिन छायाबाई लापता हुई, उसी रोज संतोष भी गांव से गायब था. दोनों का पे्रम प्रंसग पूरे गांव के लोगों की जुबान पर था, इसलिए गांव वालों का मानना था कि संतोष ही छायाबाई को ले कर भाग गया.

लेकिन छायाबाई के पिता को शक था कि उस की बेटी को संतोष ने अपने नए मकान में छिपा रखा है. इसी बात की जांच करने के लिए पुलिस मोहनखेड़ी आई थी. छायाबाई हुई लापता संतोष के मकान में ताला पड़ा था. गांव में रहने वाले उस के मातापिता भी गायब थे. इसलिए पुलिस ने ताला तोड़ कर पूरे घर की तलाशी ली, लेकिन वहां केवल छिपकली और मकडि़यों के अलावा कोई तीसरा जीव दिखाई नहीं दिया. इसलिए पुलिस टीम वापस लौट आई. गांव वाले तो पहले ही मान चुके थे कि छायाबाई संतोष के साथ कहीं भाग गई है. अब पुलिस ने भी ऐसा ही मान लिया, लेकिन ऐसा मानने वालों के बीच केवल छायाबाई का परिवार ही ऐसा था, जो इस बात को मानने को राजी नहीं हो रहा था.

इसलिए  उन के बारबार कहने पर संतोष के मकान में एक कमरे के फर्श की खुदाई भी कर के देखी गई, लेकिन कुछ हाथ नहीं आया. धीरेधीरे गांव के लोग छायाबाई और संतोष को भूलने लगे और अपने कामों में जुट गए थे. लेकिन छायाबाई के पिता लगातार बेटी की खोज में लगे हुए थे. कोई महीने भर बाद संतोष के बंद पडे़ मकान से आने वाली अजीब सी बदबू से लोग परेशान होने लगे. पहले तो लोगों ने इस पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन बदबू लगातार बढ़ने से पड़ोसियों का ध्यान संतोष के बंद मकान पर गया, जहां से यह बदबू आ रही थी. इस बात की खबर छायाबाई के पिता को लगी तो वह दौड़ेदौड़े अपने समाज के नेता के पास पहुंचे और उन्हेें सारी बात बताई.

वह नेता छायाबाई के पिता को खंडवा एसपी के पास ले गया और एसपी को सारी कहानी से अवगत कराया. संतोष छायाबाई के लापता होने के मामले में संदिग्ध तो था ही, इसलिए उस के मकान से आने वाली बदबू की जानकारी को खंडवा एसपी शैलेंद्र सिंह चौहान ने गंभीरता से लिया. उन के निर्देश पर एएसपी (ग्रामीण) जितेंद्र पंवार ने अपने आदेश पर एसडीपीओ प्रवीण कुमार उइके के नेतृत्व में एक पुलिस टीम प्रशासनिक अधिकारियों के साथ 27 जनवरी, 2021 को एक बार फिर मोहनखेड़ी पहुंची. संतोष गोलकर का मकान खोलते ही बदबू का तेज झोंका आने से पुलिस समझ गई की यह मांस सड़ने की बदबू है. इसलिए पूरे मकान की बारीकी से जांच की गई.

जिस से पता चला कि तीसरे कमरे के फर्श में ताजा सीमेंट लगाया गया है. इसलिए शक के आधार पर पुलिस ने उस जगह की खुदाई करवाई तो डेढ़ फुट नीचे एक कान की बाली और लगभग ढाई फुट नीचे एक लेडीज चप्पल मिली. जिन के बारे में बताया कि ये दोनों ही चीजें छायाबाई की हैं. सड़ागला मिला शव खुदाई की गहराई बढ़ने के साथ बदबू भी बढ़ती जा रही थी. वास्तव में पुलिस का शक उस समय सही साबित हुआ, जब कोई 4 फुट की गहराई पर छायाबाई का सड़ागला शव बरामद हो गया. इस के बाद जांच के लिए एफएसएल अधिकारी सुनील मकवाना भी पहुंच गए. जांच के बाद उन्होंने शव को लगभग एक महीने पुराना बताया.

जिस के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. लेकिन शव की हालत अत्यधिक खराब होने की वजह से उस का पोस्टमार्टम इंदौर के एमवाई अस्पताल में किया गया. जाहिर सी बात है कि अब तक पुलिस का मानना था कि संतोष छायाबाई को ले कर भाग गया है. लेकिन अब छायाबाई की लाश संतोष के मकान में दफन मिल चुकी थी. जबकि संतोष और उस का परिवार गायब था. इसलिए पुलिस का सीधा शक यही था की संतोष ने ही छायाबाई की हत्या की है. चूंकि उस के परिवार के सभी सदस्य गायब थे, इसलिए वे भी शक के घेरे में थे. एसपी शैलेंद्र सिंह चौहान ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए एक टीम गठित कर दी, जिस ने मुखबिरों से मिली सूचना के आधार पर 6 फरवरी, 2021 को संतोष की मां सकुबाई, भाई सुनील एवं बुआ के बेटे अनिल को गिरफ्तार कर लिया.

संतोष की तलाश पुलिस तत्परता से कर रही थी. जिस के चलते टीआई जगदीश प्रसाद गोयल की टीम में शामिल एएसआई लक्ष्मीनारायण पाल, प्रधान आरक्षक नंदकिशोर राय, आरक्षक अभिलाष डोंगरे, जितेंद्र एवं कमलेश की टीम ने सूचना मिलने पर उसे बैतूल से गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद यह कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

16 साल की उम्र में छायाबाई की शादी पास के ही गांव एकतासा में रहने वाले युवक  के साथ हुई थी. दोनों के 3 बच्चे भी हुए किंतु दोनों के बीच रिश्ता कुछ यूं बिगड़ा कि छायाबाई अपने पति का घर छोड़ कर मोहनखेड़ी में पिता के घर आ कर रहने लगी. मोहनखेड़ी में ही संतोष भी रहता था. संतोष छायाबाई की उम्र का था और छायाबाई की शादी से पहले वह उस की गली में चक्कर लगाया करता था. संतोष की दीवानगी की जानकारी छायाबाई को भी थी, लेकिन उन का इश्क परवान चढ़ पाता, उस से पहले ही छायाबाई की शादी हो गई थी. इस के बाद यह कहानी वहीं खत्म हो गई थी.

कुछ दिन बाद संतोष की भी शादी हो गई. लेकिन करीब 3 साल पहले ही उस की पत्नी भी उसे छोड़ कर अपने मायके में जा कर रहने लगी. संतोष ने कुछ दिनों तक तो ध्यान नहीं दिया, लेकिन पत्नी की गैरमौजूदगी में शारीरिक जरूरतें परेशान करने लगीं तो उसे छायाबाई का ध्यान आया जो खुद भी अपने पति को छोड़ कर बैठी थी. इसलिए उस ने अगले दिन ही छायाबाई की खातिर उस की गली में चक्कर लगाने शुरू कर दिए. छायाबाई भी कई साल से पति से अलग रह रही थी. जैसे ही उस ने संतोष को देखा तो उसे अपने किशोर उम्र की याद आ गई, जब संतोष उस के लिए गली में चक्कर लगाया करता था.

इसलिए एक दिन छायाबाई ने भी मौका देख कर उसे सकारात्मक संदेश दे दिया. जिस के 4 दिन बाद ही दोनों गांव के बाहर एकांत में मिले और अपनी हसरतें पूरी कर प्यार के बंधन में बंध गए छायाबाई मायके में रहते हुए अपने मातापिता के ऊपर बोझ नहीं बनना चाहती थी. इसलिए वह गांव के कुछ घरों में झाड़ूपोंछा करने लगी थी. वह सुबह घर से निकल कर पहले अपना काम करती थी फिर सीधे संतोष के पास पहुंच जाती थी, जहां दोनों एकदूसरे के तन की प्यास पूरी करते थे. फिर छायाबाई वापस घर चली जाती थी. दोनों एकांत में रोज मिला करते थे, इसलिए इस बात की जानकारी गांव वालों को हो गई थी. छायाबाई के परिवार तक भी यह खबर पहुच चुंकी थी. पिता ने अपनी बेटी को समझाने की कोशिश की, लेकिन मामला हाथ से निकल चुका था.

छायाबाई ने तोड़ा विश्वास इधर छायाबाई के साथ घर बसाने की ठान चुके संतोष ने अपना खेत बेच कर छायाबाई के लिए सपनों का घर बनवा दिया था. कुछ दिनों में संतोष का मकान बन कर तैयार हो गया तो वह छायाबाई को इस मकान में ला कर अय्याशी करने लगा. बताया जाता है कि इसी दौरान छायाबाई की नजरें गांव के ही एक दूसरे युवक से लड़ गई थीं. वह संतोष की तुलना में रईस और जवान था. इसलिए छायाबाई संतोष से दूर जाने की कोशिश करने लगी. इस बात की जानकारी लगने पर संतोष काफी खफा था. बताया जाता है कि उस ने छायाबाई की हत्या की योजना पहले से ही बना रखी थी. इसलिए उस ने पानी का एक टैंक बनाने के नाम पर एक कमरे में गहरा गड्ढा खुदवा लिया था.

जिस के बाद उस ने 24 दिसंबर की रात को छायाबाई को अपने घर बुला कर पहले तो उस के साथ संबंध बनाए और फिर इसी दौरान मौका पा कर उस का गला दबा कर हत्या कर के शव को गड्ढे में डाल कर उस के ऊपर मिट्टी डाल दी और फरार हो गया. उस ने सोचा था कि घर के अंदर लाश की खबर पुलिस को कभी नहीं मिल पाएगी. लेकिन एक महीने के बाद मकान से आ रही बदबू के बाद शक होने पर पुलिस ने लाश बरामद कर हत्या में सहयोग करने वाली संतोष की मां, भाई और अन्य 2 को गिरफ्तार कर लिया. छायाबाई के लापता होने पर उस के पिता को उस की हत्या का शक हो गया था.

इसलिए पिता के कहने पर पुलिस ने पहले भी एक बार संतोष के घर नए पर बने फर्श की खुदाई लाश की तलाश करने के लिए की थी. लेकिन उस समय कुछ नहीं मिला था. लेकिन बदबू आने पर जब दूसरे कमरे में खुदाई की गई तो वहां से छायाबाई का शव बरामद हुआ. गिरफ्तार किए मुख्य आरोपी संतोष के भाई ने बताया कि छायाबाई की हत्या कर लाश को गड्ढे में दबाने वाली बात संतोष ने सुबह घर आ कर बताई थी. इस के बाद वह घर से भाग गया था. संतोष के भाग जाने के बाद घर वालों ने पुलिस से बचने के लिए खुदाई वाली जगह पर फर्श बनवा दिया और घर का ताला लगा कर फरार हो गए. Hindi love Story in Short

पुलिस ने सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

Family Story Hindi : पत्नी से छेड़छाड़ करता था पिता तो बेटे ने करवा दी हत्या

Family Story Hindi : ससुर पिता के समान होता है, लेकिन शैल कुमार पटेल इतनी घटिया सोच वाला था कि वह अपनी बहू रति के साथ जबरदस्ती करने पर आमादा था. एक दिन शैल के बेटे प्रमोद ने पिता की हरकतें खुद देख ली. इस के बाद जो हुआ, वह इतना भयावह था कि…

28 मार्च, 2021 को होली का त्यौहार था. जगहजगह होलिका दहन की तैयारियां चल रही थीं. जबलपुर जिले के बरगी पुलिस थाने के टीआई शिवराज सिंह क्षेत्र में होने वाले होलिका दहन के सुरक्षा इंतजाम में लगे थे. दोपहर का वक्त था, तभी उन के मोबाइल की घंटी बजी. काल रिसीव करते ही दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘सर, मैं वन विभाग से सीनियर बीट गार्ड अमित त्रिपाठी बोल रहा हूं. वन विभाग की टीम ने गढ़ गोरखपुर के पास बरगी-घंसौर रोड के किनारे एक अधजली लाश पड़ी देखी है.’’

टीआई शिवराज सिंह ने बीट गार्ड अमित त्रिपाठी को निर्देश दिया, ‘‘आप वहीं रुकिए, मैं थोड़ी देर में पहुंचता हूं.’’

टीआई ने इस घटना की जानकारी एसपी और एएसपी को दी और अपनी टीम के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. बरगी थाना से घटनास्थल की दूरी करीब 30 किलोमीटर थी. पुलिस टीम को वहां पहुंचने में करीब घंटे भर का समय लग गया. इस बीच यह खबर सोशल मीडिया पर फैल चुकी थी. युवक की अधजली लाश मिलने की खबर पा कर एफएसएल टीम के साथ एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा व एएसपी शिवेश सिंह बघेल भी घटनास्थल पर पहुंच गए. टीआई ने लाश का निरीक्षण किया. लाश अधेड़ उम्र के किसी व्यक्ति की थी और लाश झुलसी हुई थी. लग रहा था कि हत्यारे ने उस की पहचान मिटाने के लिए उस के शरीर पर सागौन के पत्ते और लकडि़यां डाल कर जलाया था.

पूरा शरीर जलने से काला पड़ गया था. मृतक के पेट की अंतडि़यां बाहर निकल आई थीं. वह नीले रंग का अंडरवियर पहने था, वह भी आधा जल चुका था. उस के एक पैर के अंगूठे में लोहे का छल्ला, बाएं हाथ की 2 अंगुलियों में लोहे और तांबे का छल्ला और गले में मोतियों की माला थी. जिस कच्चे रास्ते के किनारे शव पड़ा था, वह गढ़ गोरखपुर को जाता था. यह इलाका सिवनी जिले के घंसौर से करीब 10 किलोमीटर दूर था, परंतु जबलपुर जिले की सीमा में आता था. टीआई शिवराज सिंह, सीएसपी (बरगी) रवि सिंह चौहान व बरगी नगर चौकी के एसआई कुलदीप पटेल ने वहां मौजूद लोगों से मृतक के संबंध में पूछताछ की, मगर लाश की शिनाख्त नहीं हो पाई. तब पुलिस ने मौके की काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

चूंकि लाश की शिनाख्त नहीं हो पाई थी, इसलिए पोस्टमार्टम के बाद उसे कब्र खोद कर दबा दिया गया. एसपी के निर्देश पर जबलपुर जिले के आसपास के सिवनी, मंडला जिलों को भी मृतक की अधजली लाश और बरामद सामान की फोटो भेजी गई. साथ ही अपनेअपने जिलों के गुमशुदा मामलों की तस्दीक करने को कहा गया. इतना ही नहीं, एसपी ने मामले के खुलासे पर 10 हजार का ईनाम भी घोषित कर दिया. पुलिस मामले की जांच में जुट गई. वापस नहीं लौटा शैल मध्य प्रदेश के सिवनी और जबलपुर जिले की सीमाओं पर सघन वनों से आच्छादित घंसौर तहसील का एक छोटा सा गांव है बरोदा माल. 52 साल के शैल कुमार पटेल उर्फ शिल्लू का परिवार बरोदा माल में ही रहता था.

अपनी जमीन पर खेतीबाड़ी करने वाला शैल आसपास के इलाके में दूध बेचने का काम भी करता था. उस के परिवार में पत्नी रमाबाई, एक अविवाहित बेटी और 26 साल का बेटा प्रमोद, उस की पत्नी और उस की 2 महीने की बेटी थे. प्रमोद ने घर पर ही एक छोटी सी किराना दुकान खोल रखी थी. इस के 3 दिन बाद यानी 31 मार्च, 2021 को बरोदा माल गांव की रहने वाली रमाबाई अपने चचेरे भाई जोध सिंह के साथ सिवनी जिले के घंसौर थाने में अपने पति शैल कुमार पटेल उर्फ शिल्लू की गुमशुदगी दर्ज कराने पहुंची. उस ने पुलिस को बताया कि 26 मार्च को उस का पति खेत पर जाने की बोल कर गया था. इस के बाद घर नहीं लौटा.

घंसौर पुलिस ने रमाबाई और जोधसिंह को 28 मार्च को जबलपुर के बरगी थाना क्षेत्र में मिले शव के बारे में बताया और उस लाश के फोटो भी दिखाए. मृतक के गले की माला और पैर में पहने लोहे के कड़े को देख कर रमाबाई की आंखें फटी रह गईं. ये सभी चीजें उस के पति शैल की ही थीं. घंसौर पुलिस द्वारा बरगी पुलिस थाने को इस बात की जानकारी दी गई तो पहली अप्रैल को रमाबाई और उस के घर वाले जबलपुर के बरगी थाने गए. बरगी पुलिस ने जबलपुर के एसडीएम से अनुमति ले कर तहसीलदार की मौजूदगी में दफनाई गई लाश कब्र से बाहर निकलवाई. लाश की शिनाख्त रमाबाई ने अपने पति शैल पटेल के रूप में कर ली. लाश का पंचनामा कर उस के घर वालों को सौंप कर पुलिस जांच में जुट गई.

शैल कुमार पटेल के अंतिम संस्कार के समय बरगी पुलिस की एक टीम गांव में मौजूद थी. उसी समय पूछताछ में शैल की पत्नी रमाबाई ने पुलिस को बताया कि 26 मार्च को उस के पति को गांव के 2 लड़के आयुष शर्मा और मनोज बैगा अपनी बाइक पर बैठा कर ले गए थे, जिस के बाद से वह घर वापस नहीं लौटा था.आयुष शर्मा उस वक्त श्मशान घाट पर शैल के अंतिम संस्कार की रस्म में शामिल था. पुलिस टीम ने आयुष से उसी समय पूछताछ की तो पहले तो वह अंजान बना रहा, लेकिन जब पुलिस टीम ने उसे वहीं से अपनी गाड़ी में ले जा कर सख्ती से पूछताछ की तो उस ने सारा राज खोल दिया. उस ने बताया कि वह बाइक पर शैल को बिठा कर घंसौर तक ले गया था.

वहां से शैल को मनोज बैगा उर्फ पंडा, राहुल नेमा और राहुल यादव कार में बिठा कर ले गए थे. उन लोगों ने ही हत्या कर शव को जलाया. आयुष से मिली जानकारी के आधार पर घंसौर में मौजूद पुलिस टीम ने तीनों को पकड़ लिया. फिर आखिर में मृतक के बेटे प्रमोद को भी हिरासत में लिया. सभी को थाने ले कर जब पूछताछ की गई तो पता चला कि शैल कुमार की हत्या का षडयंत्र उस के बेटे प्रमोद ने अपने दोस्तों के साथ रचा था. बेटे ने कराई हत्या प्रमोद ने अपने पिता की हत्या के लिए अपने दोस्त राहुल नेमा और उस के ड्राइवर राहुल यादव को सुपारी दी थी. हिरासत में लिए गए पांचों आरोपियों द्वारा बताई गई कहानी को सुन कर यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि बेटा ही अपने पिता का कातिल होगा.

पुलिस पूछताछ में शैल कुमार की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह मानवीय रिश्तों को शर्मसार कर देने वाली थी. शैल कुमार पटेल के बेटे प्रमोद की पहली पत्नी शादी के कुछ समय बाद ही अपने प्रेमी के साथ भाग गई थी. करीब डेढ़ साल पहले प्रमोद ने दूसरी शादी रति (परिवर्तित नाम) से की थी, जिस से सवा महीने की एक बेटी है. 21 साल की नवयौवना रति की खूबसूरती को देख कर सभी उस की तारीफ करते थे. प्रमोद की दूसरी शादी के कुछ ही महिनों बाद उस का पिता रति पर बुरी नजर रखने लगा. रति ने जब इस की शिकायत प्रमोद से की तो उसे भरोसा नहीं हुआ. उस ने पत्नी को समझाया कि बापू गांजे के नशे में खोए रहते हैं, हो सकता है गलती से उन्होंने कुछ हरकत कर दी हो. शैल गांजे का नशा करता था.

प्रमोद ने तो पत्नी को समझा दिया, लेकिन शैल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था. उसे जब भी मौका मिलता वह उस की पत्नी से छेड़छाड़ करने लगता. शैल अपनी पोती को गोद में लेने के बहाने रति के अंगों को बुरी नीयत से छूता था. वह रति के साथ जबरदस्ती करना चाहता था. मगर रति के सख्त व्यवहार के कारण वह सफल नहीं हो पा रहा था. रति भी अपने परिवार की बदनामी के डर से इस बात का जिक्र किसी से नहीं कर पा रही थी. होली के हफ्ते भर पहले की बात है. रति अर्द्धनग्न अवस्था में गुसलखाने से नहा कर निकली थी कि ताक में बैठे शैल ने रति को अपनी बांहों में भर लिया और उस के गालों को चूमने लगा. रति बदहवास सी ससुर के आगोश से छूटने का प्रयास कर रही थी.

तभी अचानक प्रमोद आ गया. प्रमोद ने जब यह नजारा देखा तो क्रोध के मारे वह चीख उठा. उस ने पिता को भलाबुरा कहा. बेटे ने देखी पिता की करतूत प्रमोद की चीख सुन कर शैल रति को छोड़ कर घर से बाहर निकल गया. उस दिन प्रमोद को यकीन हो गया कि उस की पत्नी बापू के व्यवहार के बारे में जो शिकायत करती थी, वह झूठी नहीं थी. अब बापू प्रमोद की नजर में खटकने लगा था. उस के दिल में अपने बाप के प्रति इस कदर नफरत पैदा हो गई थी कि वह उस की शक्ल तक देखना पसंद नहीं करता था. रात दिन वह इसी चिंता में खोया रहता. प्रमोद की दोस्ती गांव के राहुल नेमा से थी. राहुल नेमा के पिता जिला पंचायत के नेता थे और राहुल जबलपुर के प्रतिष्ठित दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ा था. इस कारण गांव में उस की इज्जत ज्यादा थी. राहुल दिन भर कार में सवार हो आवारागर्दी करता घूमता था. दोस्तों के बीच उस का काफी रुतबा था.

प्रमोद ने जब राहुल को अपनी परेशानी बताई तो राहुल ने प्रमोद को उस के बाप की हत्या के लिए उकसा दिया. राहुल ने प्रमोद से कहा,  ‘‘तुम पैसे खर्च करो तो तुम्हारे बापू को हमेशा के लिए ही रास्ते से हटा देंगे.’’

प्रमोद बापू के कारनामों से छुटकारा चाहता था, इसलिए उस ने राहुल का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. प्रमोद ने राहुल के सामने इस काम को अंजाम देने के लिए 50 हजार रुपयों की पेशकश की. राहुल महंगे मोबाइल रखने और खानेपीने का शौकीन था. अपने इन्हीं शौक और फिजूलखर्ची की वजह से एक बार उस ने अपने घर का ट्रैक्टर तक बेच दिया था और पुलिस थाने में ट्रैक्टर चोरी की झूठी शिकायत दर्ज करा दी थी. प्रमोद ने राहुल को जब 50 हजार रुपए देने का औफर दिया तो पैसों की खातिर उस ने प्रमोद के पिता की हत्या की सुपारी ले ली.

इस काम के लिए राहुल ने अपने ड्राइवर राहुल यादव को भी साथ मिला लिया. 50 हजार रुपए में से 15 हजार रुपए प्रमोद ने राहुल नेमा को एडवांस दिए, जबकि 35 हजार रुपए काम होने के बाद देने का वादा किया. ड्राइवर राहुल यादव ने गांव के आयुष शर्मा और मनोज बैगा से बात की और दोनों को साजिश में शामिल कर लिया. चूंकि शैल गांजा पीने का शौकीन था, इसलिए गांव के दूसरे नशेडि़यों के साथ उस का उठनाबैठना था. योजना के मुताबिक, 28 मार्च, 2021 को आयुष शर्मा एवं मनोज बैगा शाम लगभग 7 बजे शैल पटेल को अपनी बाइक पर गांजा पिलाने के बहाने घंसौर तिराहा ले गए, जहां पर राहुल नेमा अपनी कार ले कर ड्राइवर राहुल यादव के साथ पहले से ही मौजूद था. तिराहे पर बैठ कर सभी ने गांजा पीया.

आयुष शर्मा एवं मनोज बैगा ने अपनी बाइक घंसौर तिराहे पर ही छोड़ दी और शैल पटेल को राहुल नेमा की कार में बैठा कर घंसौर की तरफ चले गए. चलती कार के अंदर ही सभी ने शैल पटेल के साथ मारपीट शुरू कर दी और कार में पहले से पड़ी रस्सी से उस का गला घोंट कर हत्या कर दी. चारों आरोपी शैल का शव ले कर घंसौर से 10 किलोमीटर दूर जबलपुर के गढ़ गोरखपुर के पास पहुंच गए. रोड किनारे जंगल में कार खड़ी कर शव को जंगल में फेंक कर सूखी पत्तियों से ढंक कर आग लगा दी. रमाबाई हो रही थी परेशान जब देर रात तक शैल घर नहीं लौटा तो घर वालों को उस की चिंता हुई. शैल की पत्नी रमाबाई ने बेटे प्रमोद से कहा, ‘‘आज तेरे बापू अभी तक घर नहीं लौटे.’’

प्रमोद ने मां की बात पर ध्यान न देते हुए कहा, ‘‘मां, इस में चिंता की कोई बात नहीं है बापू कहीं नशे के अड्डे पर चिलम पीने बैठ गए होंगे, आ जाएंगे. तुम खाना खा कर सो जाओ.’’

रमा को लगा कि होलिका दहन देखने की वजह से शैल घर आने में लेट हो गया होगा. यही सोच कर उस रात रमा चुपचाप सो गई. जब सुबह तक भी शैल घर नहीं पहुंचा तो उस की चिंता बढ़ गई. रमाबाई हर रोज बेटे प्रमोद से अपने बापू की खोजखबर लेने की बात करती रही, लेकिन वह मां को गोलमोल जबाब दे कर चुप करा देता. धीरेधीरे शैल को घर से गायब हुए 4 दिन बीत चुके थे. रमाबाई प्रमोद से उस के पिता की गुमशुदगी पुलिस थाने में दर्ज कराने की बात कहती रही, परंतु प्रमोद अपने पिता को आसपास के इलाकों में खोजने का नाटक करता रहा. आखिर में रमाबाई खुद 70 साल के चचेरे भाई जोधसिंह पटेल के साथ थाने पहुंची और पति की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

आरोपियों ने यह सोच कर इस काम को अंजाम दिया था कि दूसरा जिला होने की वजह से शव की पहचान नहीं हो पाएगी और किसी को शक भी नहीं होगा. लेकिन पुलिस की नजरों से वे ज्यादा दिन नहीं बच सके. पुलिस ने इस मामले में आईपीसी की धारा 302, 201, 364 और 120(बी) के तहत मामला दर्ज कर मृतक के 26 वर्षीय बेटे प्रमोद पटेल, के अलावा राहुल नेमा, राहुल यादव, मनोज बैगा उर्फ पंडा और आयुष शर्मा को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया. आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल की गई बाइक और कार सहित 2 मोबाइल फोन भी जब्त कर लिए हैं.

अपनी बहू से नाजायज संबंध बनाने की ख्वाहिश रखने वाले ससुर को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और बेटे को अपनी नामसझी की वजह से अपने बीवीबच्चों से दूर जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा. Family Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Family Dispute : संपत्ति पाने की लालच में देवर ने भाभी की गोली मार कर दी हत्या

Family Dispute :  घर वालों के विरोध के बावजूद फौजी चंद्रशेखर ने अपनी ममेरी बहन वर्षा से शादी कर ली थी. कुछ दिनों बाद संदिग्ध परिस्थितियों में चंद्रशेखर की मृत्यु हो गई तो वर्षा के साथ ऐसी घटना घटी कि…

वर्षा से शादी के बाद से ही खफा चल रहे उस के देवर कृष्णकांत को जब यह पता चला की वर्षा किसी और के साथ लिवइन में रह रही है तो यह उस से सहा नहीं गया. बड़े भाई चंद्रशेखर की मौत के बाद उस का सारा पैसा भी उस की भाभी वर्षा ही ले गई थी. भाई के बदले वह सेना में नौकरी चाह रहा था. यह मामला भी कोर्ट की दहलीज पर पहुंच चुका था. भाभी के लिवइन में रहने की खबर के बाद कृष्णकांत को लगा कि भाभी उस के भाई की ही संपत्ति और पैसे पर ऐश कर रही है. तब कृष्णकांत ने अपनी भाभी को सदा के लिए मौत की नींद सुला देने का भयानक निर्णय ले लिया.

मध्य प्रदेश के जिला बैतूल से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर बसा है आमला कस्बा. आदिवासी बाहुल्य यह कस्बा ज्यादा बड़ा तो नहीं है पर आसपास के गांव वाले यहां खरीदारी करने आया करते हैं. लिहाजा शाम तक यहां के बाजार भीड़ से भरे होते हैं. ऐसे में पुलिस को भी कानूनव्यवस्था के लिए चुस्त रहना पड़ता है. 6 फरवरी, 2021 को रात करीब 9 बजे का वक्त रहा होगा. आमला के टीआई सुनील लाटा शहर में भ्रमण पर थे. इसी बीच उन्हें पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि कनौजिया गांव में गोली चली है, इस में एक महिला गंभीर रूप से घायल है.

सूचना मिलते ही टीआई कनौजिया गांव पहुंचे, इस इलाके में गोली चलने की वारदात अमूमन कम ही होती है. बरहाल, टीआई ने इस घटना की जानकारी एसपी सिमाला प्रसाद को दी. साथ ही एसडीपीओ मुलताई नम्रता सोंधिया समेत फोरैंसिक टीम के सदस्यों को दी और वह तत्काल कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. आमला से कनौजिया की दूरी करीब 5 किलोमीटर है, लिहाजा पुलिस को यहां पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. पुलिस जब घटनास्थल पर पहुंची, तब तक भीड़ काफी जमा हो चुकी थी. कनौजिया गांव के जिस मकान में गोली चलने की घटना हुई थी, वहां करीब 4-5 कमरे थे.

पहले कमरे में बैड पर खून से लथपथ एक 27-28 वर्षीय युवती का शव पड़ा था. पास में ही उस का मोबाइल पड़ा था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि घटना के समय युवती मोबाइल पर बात कर रही होगी. टीआई सुनील लाटा अभी मौकामुआयना कर ही रहे थे कि इतने में एसडीपीओ (मुलताई) नम्रता सोंधिया भी मौके पर आ गईं. इस के बाद एसपी सिमाला प्रसाद भी वहां पहुंच गईं. पूछताछ में पता चला कि मृतका का नाम वर्षा नागपुरे है और वह बोखड़ी कस्बे की रहने वाली थी. सुबह ही वह अपनी मां के पास कनोजिया आई थी. पुलिस ने यहां लोगों से प्रारंभिक पूछताछ भी की, पर वे कुछ बताने की स्थिति में नहीं थे.

उन का कहना था कि कौन आया, किस ने वर्षा को गोली मारी, पता ही नहीं चला. वे तो गोली चलने की आवाज के बाद अपने घरों से बाहर आए थे. वर्षा की हत्या की वजह पुलिस को भी समझ नहीं आ रही थी. पुलिस समझ नहीं पा रही थी कि मायके में आने के बाद उस की हत्या किस ने की? एफएसएल टीम द्वारा जांच करने के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने इस के बाद वर्षा के मायके वालों से पूछताछ की तो वर्षा के भाई कृष्णा पवार ने बहन वर्षा की हत्या का संदेह उस के देवर कृष्णकांत नागपुरे और महेश नागपुरे निवासी बोडखी पर व्यक्त किया था.

इधर पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि वर्षा किसी के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी. बहरहाल, सारी जानकारी जुटाने के बाद टीआई सुनील लाटा आमला लौट आए. उन के सामने जिन लोगों के नाम संदेह के तौर पर सामने आए थे, उन पर नजर रखने के लिए उन्होंने कुछ पुलिसकर्मियों को लगा दिया. पुलिस को अपनी जांच में यह भी पता चला कि अपनी ससुराल वालों से वर्षा के रिश्ते ठीक नहीं थे, लिहाजा उन्होंने जांच का रुख ससुराल वालों की तरफ मोड़ लिया. इस बीच टीआई सुनील लाटा को खबर मिली कि वर्षा का देवर कृष्णकांत घटना से कुछ दिनों से गांव बोडखी में ही देखा गया था.

पर घटना के बाद से वह गायब है. पुलिस ने अब अपना ध्यान कृष्णकांत की ओर लगा दिया. पुलिस की जांच आगे बढ़ी तो यह भी पता चला कि कृष्णकांत का अपनी भाभी वर्षा से काफी समय से विवाद चल रहा था. जब से उस ने कृष्णकांत के बड़े भाई चंद्रशेखर नागपुरे से लवमैरिज की थी, तभी से ससुराल वाले उस से नाराज चल रहे थे. जिस से वह शादी के बाद से ही ससुराल वालों से अलग पति के साथ रह रही थी. वह भी उस से खुश नहीं थे. पुलिस ने वर्षा की सास और जेठ से भी पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वर्षा उन से अलग रहती थी. लिहाजा उन्होंने भी उस से रिश्ता लगभग खत्म कर रखा था. इस मामले में पता चला कि कीर्ति नाम की युवती से मृतका के देवर की मित्रता थी.

पुलिस ने कीर्ति के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि उस का कृष्णकांत से मिलनाजुलना था. पुलिस ने कीर्ति से पूछताछ की और उस की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि घटना के दिन कई बार उस की कृष्णकांत से बात भी हुई थी. कीर्ति से जब पुलिस ने थोड़ी सख्ती से पूछताछ की तो उस ने बताया कि कृष्णकांत अकसर उस से वर्षा के बारे में पूछता रहता था. तब वह उसे वर्षा की लोकेशन बता देती थी. कीर्ति ने पुलिस को बताया कि अब कृष्णकांत कहां है, इस बारे में उसे कुछ भी पता नहीं है. कृष्णकांत का मोबाइल फोन भी बंद था. पुलिस ने अपने मुखबिरों को लगातार इस मामले में नजर रखने को कहा था. इस का परिणाम यह हुआ की पुलिस को जानकरी मिली कि कृष्णकांत भोपाल में है.

पुलिस को यह भी पता चला कि वह कोर्ट के काम से आमला आने वाला है. लिहाजा पुलिस मुस्तैद हो कर उस के आने का इंतजार करने लगी. अगले दिन जैसे ही वह आमला आया, पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने थाने ले जा कर जब कृष्णकांत से पूछताछ की तो वह खुद को बेगुनाह बताने लगा. उस ने बताया कि घटना वाली तारीख को वह भोपाल में था. पुलिस ने जब उसे बताया कि घटना की रात उस का मोबाइल देर रात तक आमला के आसपास ही लोकेशन दिखा रहा था. उसे उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स दिखाई तो वह टूट गया. उस ने कबूल कर लिया कि उस ने अपनी दोस्त कीर्ति की मदद से अपनी भाभी वर्षा की हत्या की है.

वर्षा ने हालात ही ऐसे बना दिए थे, जिस से उसे उस की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. कृष्णकांत ने पुलिस को जो बताया उस के अनुसार कहानी कुछ इस प्रकार सामने आई—

बैतूल जिले के आमला गांव के समीप बोडखी में रहने वाले आर.के. नागपुरे के 3 बेटों में सब से बड़ा चंद्रशेखर नागपुरे था. इंटरमीडिएट की पढ़ाई करने के बाद चंद्रशेखर सेना में भरती हो गया. नौकरी से छुट्टी मिलने पर जब वह घर आता तो कनोजिया में रहने वाले अपने मामा के यहां भी जाता था. उस के मामा की बेटी वर्षा उस समय जवानी की दहलीज पर कदम रख ही रही थी और महज 16 साल की थी. इधर चंद्रशेखर 27 की उम्र छू रहा था. पर सेना में होने के कारण उस का बदन गठीला था और सेना में होने का रौब तो उस पर था ही. उसी दौरान वर्षा से उसे प्यार हो गया. दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे.

रिश्ते मे वर्षा चंद्रशेखर की ममेरी बहन थी, पर इस के बाद भी दोनों रिश्तों की मर्यादा भूल गए और प्यार की पींगे बढ़ाने लगे. जब इस बात की भनक चंद्रशेखर के घर वालों को लगी तो वे उस पर नाराज हुए. उन को कतई गवारा नहीं था कि उन का बेटा ऐसी युवती से प्रेम करे, जो उस के सगे रिश्ते में आती हो. वे चंद्रशेखर का रिश्ता कहीं दूसरी जगह करने की योजना बना रहे थे. उन्होंने चंद्रशेखर को काफी समझाया पर वह नहीं माना. चंद्रशेखर ने घर वालों के विरोध की परवाह नहीं की ओर वर्षा से मिलना जारी रखा. वर्षा भी उस के प्यार में दीवानी थी. लिहाजा उस ने नजदीकी रिश्ते से ज्यादा अपने प्यार को अहमियत दी.

नतीजा यह हुआ कि घर वालों के विरोध के बावजूद चंद्रशेखर और वर्षा ने शादी का फैसला कर लिया और घर वालों के विरोध के बावजूद उन्होंने शादी कर ली. शादी चूंकि चंद्रशेखर ने घर वालों के विरोध के बावजूद की थी, लिहाजा शादी के बाद वह घर से अलग हो गया और बोखड़ी में ही अलग मकान ले कर रहने लगा. समय अपनी गति से बीतता रहा. कुछ समय बाद वर्षा एक बेटे की मां भी बन गई. बात 2013 के आसपास की है. चंद्रशेखर की जहर खाने से संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. उस ने जहर कैसे खाया, इस बात का खुलासा तो नहीं हो पाया, पर कहा यह जाता है कि चंद्रशेखर अपने घर वालों के व्यवहार से दुखी था और घर वालों द्वारा उसे स्वीकार नहीं किया तो उस ने यह कदम उठा लिया.

हालांकि उस ने जहर खाया था या उसे दिया गया था, यह भी एक रहस्य था. चंद्रशेखर की मृत्यु के बाद उस की सारी संपत्ति की वारिस उस की पत्नी वर्षा बन गई. चंद्रशेखर के घर वाले वर्षा को पहले ही नापसंद करते थे. उन्होंने इस शादी को भी मान्यता नहीं दी थी, लिहाजा वे इस के खिलाफ हो गए कि वर्षा को उस की संपत्ति में से कुछ मिले. पर उन के चाहने से कुछ नहीं हुआ. सेना ने वर्षा को उस की पत्नी मानते हुए उस की मौत के बाद उस के सारे देय दे दिए. बताया जाता है कि वर्षा को चंद्रशेखर की मौत के बाद करीब 30 लाख रुपए मिले थे. चंद्रशेखर का भाई कृष्णकांत इसे अपनी संपत्ति मान रहा था और उस का मानना था कि इस से उस के घर वालों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है.

उस ने सेना मुख्यालय में भी पत्र लिख कर इस धनराशि में अपना अधिकार बताया. कृष्णकांत ने कहा कि चंद्रशेखर का वर्षा के साथ कभी विवाह हुआ ही नहीं था. दोनों भाईबहन थे, लिहाजा उस की संपत्ति पर घर वालों का अधिकार है. उस ने चंद्रशेखर की मौत के बाद खुद को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति देने की मांग भी सेना से की थी. जब यह बात नहीं बनी तो वह कोर्ट चला गया. कोर्ट में इस मामले की सुनवाई अभी जारी थी. अब बात करते हैं हत्या के कारणों की. बड़े भाई चंद्रशेखर की मौत के बाद कृष्णकांत भोपाल आ गया और यहां एक कंपनी में मोटरसाइकिल राइडर बन गया. वह कंपनी के निर्देश पर लोगों को लाने ओर छोड़ने का काम करने लगा.

इस दौरान वह जब भी गांव जाता तो वर्षा के शानोशौकत भरे खर्चे देख कर उसे बेहद पीड़ा होती थी. उसे लगता था कि उस का परिवार आर्थिक दिक्कत झेल रहा है और वर्षा उस के भाई की मौत के बाद मिले पैसों से ऐश कर रही है. कुछ दिनों बाद कृष्णकांत को पता चला की वर्षा किसी और व्यक्ति के साथ लिवइन में रहने लगी है तो उसे और बुरा लगा. उसे लगा कि अब तो वर्षा की संपत्ति उसे कभी नहीं मिलेगी. लाखों के लालच में उस ने वर्षा को मारने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने कीर्ति को अपने विश्वास में लिया और उस से दोस्ती कर ली. कीर्ति को उस ने यह जिम्मेदारी दी कि वर्षा की हर गतिविधि पर नजर रखे और उस की हर गतिविधि की उसे फोन द्वारा जानकारी देती रहे.

6 फरवरी, 2021 को वर्षा अपनी मां के यहां आई थी. कीर्ति ने इस की जानकारी फोन पर कृष्णकांत को दी. कृष्णकांत को लगा कि अच्छा मौका है. शाम के समय वैसे भी गांव में अंधेरा छा जाता है और अधिकांश लोग अपने घरों में कैद हो जाते हैं. ऐसे मे वर्षा की हत्या करना कृष्णकांत को आसान लगा. उस ने अपने एक मित्र से एक तमंचे का जुगाड़ किया और शाम को मोटरसाइकिल से सीधा कनौजिया गांव पहुंचा और वर्षा के घर के सामने जा कर खड़ा हो गया. वहां उस समय कुछ लोग उसे दिखे और घर का दरवाजा भी बाहर से बंद था. लिहाजा वह घर के पीछे गया. वहां वर्षा की दादी बरतन साफ कर रही थीं. बूढ़ी होने के कारण उन्हें कम दिखाई और कम सुनाई देता था.

उन्हें चकमा दे कर वह पीछे के दरवाजे से अंदर घुस गया. वर्षा कमरे में किसी से फोन पर बात कर रही थी. कृष्णकांत ने बिना समय गंवाए उस पर गोली चला दी. गोली लगते ही वर्षा ढेर हो गई. उधर अपना काम करने के बाद कृष्णकांत पीछे के दरवाजे से फरार हो गया. उसी रात वह मोटरसाइकिल से भोपाल आ गया. कोर्ट के काम से उसे फिर आमला जाना पड़ा. हालांकि वह 2 दिन में निश्चिंत हो चुका था कि उसे किसी ने नहीं देखा होगा. इस कारण वह पकड़ा नहीं जाएगा.

लेकिन कहते हैं न कि जुर्म कहीं न कहीं अपने निशान छोड़ ही जाता है. कृष्णकांत के साथ भी यही हुआ. पुलिस ने कड़ी से कड़ी जोड़ी तो उस का जुर्म सामने आ गया. पुलिस ने कृष्णकांत और कीर्ति से पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Family Dispute

MP News : प्रेमिका की हत्या कर शव को कुत्ते की लाश संग गड्ढे में दबाया

MP News : डा. आशुतोष त्रिपाठी संपन्न परिवार से था. अपनी अटैंडेंट विभा केवट को शादी का झांसा दे कर उस ने इसलिए संबंध बनाए थे, ताकि वह उस के साथ जब चाहे मौजमस्ती कर सके. लेकिन उसे क्या पता था कि उस का यह कदम उसे …

विभा केवट की उम्र 24 साल थी. सामान्य कदकाठी की विभा देखने में सुंदर होने के साथ पढ़नेलिखने में भी होशियार थी. चूंकि उस के घर की माली हालत अच्छी नहीं थी इसलिए पिछले 2 सालों से वह फैमिली दंत चिकित्सालय में अटेंडेंट की नौकरी कर रही थी. सतना के धावरी स्थित कलैक्ट्रेट रोड पर यह दंत चिकित्सालय डा. आशुतोष त्रिपाठी का था. विभा का घर मल्लाह मोहल्ले में था. वह हर रोज सुबह 8 बजे घर से क्लीनिक के लिए निकल जाती थी और पेशेंट देखने में डा. आशुतोष की मदद करती थी.

दोपहर में वह लंच करने के लिए घर लौटती. लंच के बाद फिर वापस क्लीनिक में लौट आती थी. रात के 8 बजे डा. आशुतोष त्रिपाठी क्लीनिक बंद कर के कार से पहले विभा को उस के घर के पास छोड़ता फिर अपने घर जाता था. यह विभा की रोज की दिनचर्या थी. नौकरी में अपना अधिकतर समय देने के बाद भी विभा पढ़ाई के लिए समय निकाल लेती थी. उस का सपना एलएलबी कर के वकील बनने का था. वह एक प्राइवेट कालेज से एलएलबी कर रही थी. चूंकि घर की हालत सही न होने के कारण वह अपनी पढ़ाई के खर्चों को पूरा करने में असमर्थ थी. इसलिए पिछले 2 सालों से इस क्लीनिक में नौकरी कर रही थी.

वह अपने काम से खुश थी और जिंदगी सामान्य ढर्रे पर चल रही थी. पिछले साल 14 दिसंबर को वह रोज की तरह घर से ड्यूटी पर गई थी. दोपहर के समय वह घर आई और लंच कर के वापस ड्यूटी पर लौट गई. उस रात नौ बजे तक वह घर नहीं लौटी तो उस के पिता रामनरेश केवट और मां रमरतिया की आंखों में परेशानियों के बादल घुमड़ने लगे. उस का मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ था. उन के मन में तरह तरह के बुरे खयाल आ रहे थे. रात भर इंतजार के बाद सुबह भी विभा घर नहीं लौटी तो क्लीनिक खुलने के समय दोनों डाक्टर से मिलने उस के क्लीनिक जा पहुंचे. डा. आशुतोष क्लीनिक में पेशेंट देख रहे थे. बुरी तरह परेशान रामनरेश केवट ने जब डा.

आशुतोष से बेटी के बारे में पूछा तो उस ने विभा के घर नहीं पहुंचने पर हैरानी जाहिर करते हुए कहा कि कल शाम विभा ने उस से पगार के छह हजार रुपए लिए और कुछ जरूरी काम से बाहर जाने की बात कह कर चली गई थी. लगता है, उस ने कहीं दूसरी जगह काम पकड़ लिया है. चिंता न करो वह कुछ दिनों में खुद ही घर लौट आएगी. रामनरेश और रमरतिया वहां से घर लौट आए और बारबार विभा के मोबाइल पर काल कर उस से संपर्क साधने का प्रयास करते रहे. लेकिन बीती रात से ही उस का मोबाइल स्विच्ड औफ आ रहा था. रामनरेश ने अपने सभी रिश्तेदारों से फोन कर पूछा, लेकिन निराशा ही हाथ लगी.

बाद में रामनरेश ने फिर डा. आशुतोष त्रिपाठी से विभा के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि विभा ने उस के यहां से नौकरी छोड़ दी है. वह तुम लोगों से नाराज है और किसी दूसरी जगह पर कमरा ले कर रहने लगी है. उस ने अपना फोन नंबर भी बदल लिया है. विभा ने कहां पर कमरा लिया है इस की जानकारी उसे नहीं है. बेटी के अलग रहने की बात रामनरेश और रमरतिया के गले से नहीं उतरी. फिर भी उन्होंने बेटी की तलाश में शहर का चप्पाचप्पा छान मारा लेकिन वह उस का पता लगाने में नाकामयाब रहे. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे जमीन निगल गई या आसमान खा गया.

दरअसल, विभा के मातापिता को ऐसा लग रहा था जैसे डाक्टर को विभा के बारे में जानकारी है और वह शायद बाद में विभा के बारे उन्हें बता देगा. विभा की तलाश करतेकरते डेढ़ महीने गुजर जाने के बाद भी जब उस का पता नहीं चला तो रमरतिया ने एक फरवरी, 2021 को धवारी की सिटी कोतवाली में बेटी की गुमशुदगी दर्ज करा दी और पुलिस अधिकारियों से उसे तलाश करने की गुहार लगाई. सिटी कोतवाली इंसपेक्टर अर्चना द्विवेदी ने 24 वर्षीय युवती विभा केवट के गायब होने के मामले को गंभीरता से लिया. वह इस की जांच में जुट गईं.

इंसपेक्टर अर्चना द्विवेदी ने विभा के मातापिता से उस के गायब होने के बारे में विस्तार से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि 14 दिसंबर की सुबह विभा डा. आशुतोष के क्लीनिक में ड्यूटी पर गई थी. जहां डाक्टर के अनुसार उस ने शाम तक ड्यूटी की. इस के बाद वह डाक्टर से 6 हजार रुपए लेने के बाद कहीं दूसरी जगह रहने चली गई. उस ने अपना मोबाइल नंबर भी बदल लिया था. यह जानकारी मिलने के बाद इंसपेक्टर अर्चना द्विवेदी ने डा. आशुतोष त्रिपाठी को कोतवाली बुला कर उस से विभा केवट के बारे में पूछताछ की. थोड़ी पूछताछ के बाद डा. आशुतोष को घर जाने की इजाजत मिल गई.

लेकिन डाक्टर के बारबार बदले बयानों को ले कर इंसपेक्टर अर्चना द्विवेदी को उस पर संदेह हो गया था. उन्होंने डा. आशुतोष त्रिपाठी और विभा के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर देखी तो पता चला कि विभा ने आखिरी बार 14 दिसंबर को डा. आशुतोष त्रिपाठी से 750 सेकंड बातें की थीं. इस के बाद उस का मोबाइल स्विच्ड औफ हो गया था, जो फिर औन नहीं हुआ था. इस का मतलब था कि विभा के गायब होने का राज डा. आशुतोष को मालूम था. इंसपेक्टर अर्चना द्विवेदी ने डा. आशुतोष त्रिपाठी को दोबारा थाने बुला कर मनोवैज्ञानिक तरीके से कुरेदना शुरू किया तो वह ज्यादा देर तक नहीं टिक सका.

उस ने विभा के बारे में जो कुछ बताया उसे सुन कर अर्चना द्विवेदी आश्चर्यचकित रह गईं. उस ने बताया कि दरअसल विभा का कत्ल हो चुका है और उस की लाश एक गड्ढे में दबा दी गई थी. कत्ल की बात पता चलते ही इंसपेक्टर अर्चना द्विवेदी ने डा. आशुतोष को गिरफ्तार कर लिया और इस की सूचना सतना के एसपी (सिटी) विजय प्रताप सिंह को दी. 20 फरवरी, 2021 शनिवार को एसपी (सिटी) विजय प्रताप सिंह, तहसीलदार अनुराधा सिंह, नायब तहसीलदार हिमांशु भलवी, यातायात थानाप्रभारी राजेंद्र सिंह राजपूत और इंसपेक्टर अर्चना द्विवेदी आरोपी डा. आशुतोष के साथ घटनास्थल पर पहुंचे जहां पर विभा की लाश एक गड्ढे में दबी थी.

मिल गई विभा की लाश डा. आशुतोष की निशानदेही पर नगर निगम के श्रमिकों की मदद से गड्ढे की खुदाई की गई तो कुछ देर खुदाई के बाद उस में से एक कुत्ते की लाश निकली. कुत्ते की लाश को बाहर निकालने के बाद थोड़ी और खुदाई की गई तो वहां एक युवती की लाश दिखाई पड़ी. लाश को बाहर निकाला गया. लाश के गले में एक दुपटटा तथा कमर के नीचे लोअर मौजूद था. रामनरेश केवट और उस की पत्नी रमरतिया को लाश दिखाई गई तो दोनों ने कपड़ों के आधार पर उस की पहचान अपनी बेटी विभा केवट के रूप में की. शिनाख्त हो जाने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. डा. आशुतोष के बयान और पुलिस की तहकीकात के आधार पर विभा केवट हत्याकांड के पीछे एक सनसनीखेज कहानी उभर कर सामने आई—

सतना के धावरी इलाके में चांदमारी रोड, मंगल भवन के पीछे अंग्रेजी के शिक्षक नरेंद्र त्रिपाठी अपने परिवार के साथ रहते थे. वह राजकीय कन्या विद्यालय, धावरी में नौकरी करते हैं. उन के 2 बेटे हैं. बड़ा बेटा अभिषेक त्रिपाठी छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर स्थित एक रियल एस्टेट फर्म में बतौर फाइनेंस मैनेजर कार्यरत है. दूसरा बेटा आशुतोष डेंटिस्ट है. 2 साल पहले आशुतोष को अपने क्लीनिक के लिए एक अटेंडेंट की जरूरत थी. मल्लाह मोहल्ले में रहने वाले रामनरेश केवट की दूसरी बेटी विभा को जब इस नौकरी बारे में पता चला तो उस ने डा. आशुतोष से मिल कर उस के यहां काम करने की इच्छा जाहिर की.

डा. आशुतोष ने विभा को क्लीनिक से संबंधित जरूरी कामकाज के बारे में समझाते हुए जब सैलरी के बारे में उसे बताया तो उस ने वहां काम करने के लिए हामी भर दी. यह बात सन 2018 की थी. डा. आशुतोष ने विभा को क्लीनिक से संबंधित सभी बातों को समझने के बाद यह भी समझा दिया कि वहां आने वाले पेशेंट से किस प्रकार व्यवहार करना है. फिर उसे अपना मोबाइल नंबर देते हुए कहा कि अगर उस की अनुपस्थिति में उसे कोई भी मुश्किल आए तो मुझे कभी भी काल कर सकती हो. उसी समय विभा और डा. आशुतोष ने अपनेअपने मोबाइल में एक दूसरे के नंबर सेव कर लिए. विभा तेजतर्रार युवती थी. थोड़े ही दिनों में वह सारा काम सीख गई. उस की कुशलता देख कर डा. आशुतोष भी खुश हुआ.

विभा यहां काम पा कर पूरी तरह संतुष्ट थी. क्योंकि उस के प्रति डाक्टर का व्यवहार ठीक था. वह वेतन भी टाइम से दे देता था. इस तरह धीरेधीरे समय का पहिया घूमता रहा. सालभर गुजर जाने के बाद डाक्टर आशुतोष और विभा आपस में काफी घुलमिल गए थे. पेशेंट की मौजूदगी में वे दोनों एक दूसरे से सिर्फ काम की ही बातें करते थे. लेकिन जब वहां कोई नहीं होता तो वे हंसीमजाक से ले कर दुनियाजहान की बातें करते थे. बातों बातों में वक्त आसानी से कट जाता था. इसी दौरान डाक्टर आशुतोष ने मन ही मन विभा को पाने की योजना तैयार की और उस पर अमल करना आरंभ कर दिया.

अपनी योजना के तहत शाम को जब वह क्लीनिक बंद करता तो घर जाने से पहले विभा को उस के घर छोड़ने जाने लगा. विभा डा. आशुतोष के इस बदले हुए व्यवहार के पीछे की चाल को नहीं भांप सकी. उस ने सोचा कि डा. आशुतोष खुश हो कर उस की मदद कर रहे हैं. कभीकभार वह विभा को घर छोड़ने से पहले किसी होटल या रेस्टोरेंट में ले जाता जहां खाने के दौरान वह विभा का दिल जीतने की कोशिश करता था. विभा एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखती थी. जल्द ही वह उस की बातों में आ गई. डा. आशुतोष ने जब ताड़ लिया कि विभा उस की इच्छा का विरोध नहीं करेगी तो एक दिन उस ने विभा को शादी करने का झांसा दे कर उस के साथ शारीरिक संबंध बना लिया.

उस दिन के बाद विभा के प्रति डा. आशुतोष का व्यवहार एकदम बदल गया. विभा को खुश रखने के लिए वह उसे महंगे तोहफे आदि देता रहता था. ताकि उस की जिस्मानी जरूरतों को पूरा करने में विभा आनाकानी न करे. अलबत्ता एक दिन विभा ने अपनी बड़ी बहन को आशुतोष से अपने अफेयर की बात बता दी और यह भी कहा कि कुछ दिनों के बाद डाक्टर उस से शादी कर लेगा. इस पर उस की बहन ने उसे समझाते हुए कहा भी कि अमीर लोग गरीब घर की लड़की से शादी करने की बात अपना मतलब निकालने के लिए करते हैं. कहीं तुम आगे चलकर ठगी न जाओ, इसलिए जितनी जल्दी हो सके शादी कर लो.

बहन की बात सुन कर विभा ने उसे जवाब दिया कि उस का प्यार इतना कच्चा नहीं है कि डाक्टर उस से शादी का बहाना कर असानी से अपना मुंह फेर ले. उस वक्त कहने के लिए तो विभा ने बड़़े ही आत्मविश्वाश के साथ अपनी बड़ी बहन को जवाब दे दिया. लेकिन उसी दिन उस ने मन में ठान लिया कि वह डाक्टर से जल्द शादी करने को कहेगी. विभा बन गई गले की हड्डी इस के बाद जब भी आशुतोष विभा को शारीरिक संबंध बनाने के लिए राजी करने की कोशिश करता तो वह उस से पहले शादी करने की बात करती. इतना ही नहीं, जब भी दोनों क्लीनिक में अकेले होते वह उस से शादी करने का दबाव डालना शुरू कर देती थी. आशुतोष एक बड़े परिवार से ताल्लुक रखता था. समाज में उस की अपनी अच्छीखासी हैसियत थी.

उस ने तो केवल विभा के साथ मौजमस्ती करने के लिए उस से शादी की बात कही थी. वास्तव में उस ने दिल से कभी विभा से शादी के बारे में सोचा तक नहीं था. इसलिए जब विभा ने उस पर शादी का अधिक दबाव बनाना शुरू किया तो 14 दिसंबर, 2020 को आशुतोष ने बात बढ़ जाने पर विभा की गला घोंट कर हत्या कर दी. उस समय क्लीनिक में उन दोनों के सिवा कोई नहीं था. विभा की हत्या करने के बाद आशुतोष ने उस की लाश एक बोरी में डाल कर क्लीनिक के अंदर ही एक कोने में रख दी. अगले दिन वह क्लीनिक में पेशेंट का इलाज करते हुए मन ही मन विभा की लाश को ठिकाने लगाने की तरकीब सोचता रहा.

दोपहर के बाद उस ने कुछ मजदूरों को बुलाया और क्लीनिक के पीछे बारिश का गंदा पानी जमा करने की बात कह कर एक 6 फुट गहरा गड्ढा खुदवाया. रात को उस ने विभा की लाश गड्ढे में डाल कर उस के उपर नमक डाला फिर उस पर थोड़ी मिट्टी डाल दी. इस के बाद कहीं से उस ने एक कुत्ते की लाश का इंतजाम किया. कुत्ते की लाश को उसी गड्ढे में डालने के बाद उस ने उस के उपर अच्छी तरह मिट्टी भर दी. कुत्ते की लाश गड्ढे में इसलिए डाली गई कि ताकि विभा की लाश की बदबू आसपास फैलने पर अगर लोग बदबू उठने का कारण पूछे तो वह सब को बता सके कि वहां कुत्ते की लाश दबाई गई है.

इस तरह विभा की लाश इस गड्ढे में दबी होने की बात उजागर नहीं होगी. लेकिन पुलिस को विभा की अंतिम काल और उस के मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर आशुतोष के ऊपर शक हो गया. जब उस से थोड़ी सख्ती बरती गई तो उस ने सारा सच उगल दिया. विभा की लाश का डीएनए टेस्ट कराने के लिए सैंपल भी सुरक्षित रख लिया गया ताकि तय हो सके कि लाश विभा की ही थी. विभा की लाश की बरामदगी के बाद इस मामले में हत्या और साजिश की धारा 302, 201, जोड़ दी गई. पुलिस ने आशुतोष त्रिपाठी से पूछताछ करने के बाद उसे गिरफ्तार कर सतना की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. MP News

Love Stories in Hindi Short : आशिकी में गई एसएचओ की जान

Love Stories in Hindi Short  : छतरपुर के 48 वर्षीय तेजतर्रार एसएचओ अरविंद कुजूर ने 21 वर्षीय कमसिन आशी राजा से दिल तो लगा लिया था, लेकिन उन्होंने न अपनी अधेड़ावस्था का खयाल रखा और न ही अपने पुलिसिया रुतबे का. प्रेमिका आशी राजा पर महंगे तोहफे लुटातेलुटाते वह उस की ब्लैकमेल की गिरफ्त में ऐसे आ फंसे कि चाह कर भी निकल नहीं पा रहे थे. उस के सामने उन के पुलिसिया रौब की भी हवा निकल गई. फिर इस के बाद जो हुआ, उस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी. 

मध्य प्रदेश के शहर छतरपुर की कोतवाली के एसएचओ (टीआई) अरविंद कुजूर 5 मार्च, 2025 को सुबह के 10 बजे अपने सरकारी क्वार्टर में थे. दिनचर्या से निपटे ही थे कि उन के केयर टेकर प्रदीप अहिरवार ने किसी के आने सूचना दी. आने वाले का नाम सुन कर कुजूर की भौंहें तन गईं. वह बुदबुदाए, ‘सुबहसुबह क्यों चली आई!’

‘‘साहब, साथ में एक लडक़ा भी है.’’

‘‘लडक़ा? उसे पहचानते हो!’’ कुजूर ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, उसे पहली बार देखा है. आप ने ही कहा था उस मैडम के बारे में… मैं ने उन्हें बाहर बरामदे में सोफे पर बैठा दिया है.’’

‘‘तुम ने उस से क्या बोला?’’

‘‘साहब, वाशरूम में हैं!’’ प्रदीप बोला.

‘‘उन्हें बाहर ही चाय पिला दो. जब मैं कहूं तभी अंदर हाल में बुलाना.’’ कुजूर ने प्रदीप को समझाया.

‘‘जी साहब!’’ कहता हुआ प्रदीप पहले 2 गिलास पानी ले कर बाहर गया, फिर रसोई में आ कर चाय बनाने लगा. जबकि कुजूर अपने बैडरूम चले गए.

करीब आधे घंटे के बाद कुजूर ने प्रदीप को आवाज लगाई, जो उस वक्त रसोई में सुबह का नाश्ता बना रहा था. बाहर बरामदे में आगंतुक युवती और युवक बैठे आपस में बातें कर रहे थे. तभी युवती ने भी प्रदीप को आवाज लगाई, ‘‘साहब रेडी हो गए हों तो उन्हें बता दो, आशी कब से उन का इंतजार कर रही है.’’

‘‘उन को भी बोल दो अंदर आ जाएं…और हां! प्रदीप, उन के लिए भी नाश्ता बना लेना.’’ कुजूर बैडरूम से ही बोले.

थोड़े समय में डायनिंग टेबल पर कुजूर के सामने दोनों युवक और युवती बैठे थे. उन लोगों के बीच कोई बातचीत नहीं हो रही थी. वहां की शांति को भंग करती हुई बरतनों की आवाजों के सिवाय और कुछ नहीं था. प्रदीप उन के लिए नाश्ता लगा रहा था. प्लेट, चम्मच और गिलास की आवाजों के बीच कुजूर बोले, ‘‘हां आशी, तुम आज सुबहसुबह… कैसे आना हुआ?’’

‘‘कई दिन हो गए थे…इसलिए!’’

‘‘यूं ही या कुछ खास बात है?’’

‘‘समझो ऐसा ही…’’

‘‘तुम्हारे साथ ये कौन है? इसे मैं पहली बार देख रहा हूं.’’

‘‘हां, यह सोनू है, सोनू ठाकुर!’’ आशी अपने साथ आए युवक के नाम पर जोर दे कर बोली.

‘‘रेंट का पैसा तो मिल गया होगा!’’

‘‘हां, लेकिन खर्च का नहीं मिला, अभी तक!’’ आशी बोली.

‘‘सोनू क्या करता है? मेरा मतलब है, पढ़ाई या कोई काम वगैरह!’’ अचानक कुजूर बात बदलते हुए पूछ बैठे.

आशी भी उसी तरह से अलसाए अंदाज में बोली, ‘‘क्या करेगा? बेरोजगार है…नौकरी ढूंढ रहा है?’’

‘‘कहीं अप्लाई किया है या यूं ही हाथपांव मार रहा है.’’ कुजूर बोले.

‘‘बात बदल रहे हो.’’ आशी बोली.

‘‘क्यों? जिस से पहली बार मिलूं, उस के बारे में जानना जरूरी नहीं. वह भी डायनिंग टेबल पर!’’ कुजूर तहकीकात के अंदाज में बोले.

‘‘आखिर तुम हो तो पुलिस वाले ही न! सोनू मेरा क्लासमेट रह चुका है. मुझ से मदद मांगी, सो यहां साथ ले आई. लेकिन मेरे काम का क्या हुआ?’’ आशी की आवाज बोलतेबोलते तीखी होने लगी थी.

‘‘नाराज क्यों होती हो, समय पर सब कुछ हो जाएगा. मुझे थोड़ा वक्त चाहिए.’’

‘‘कैसे नाराज नहीं होना, कब से बोल रहे हो काम हो जाएगा…हुआ तो नहीं अभी तक.’’ आशी बोली और साथ बैठे सोनू की ओर इशारा किया.

वह वहीं अपना लैपटाप खोले हुए था. एक हाथ से नाश्ता करते हुए बीचबीच में कीबोर्ड पर अंगुलियां चला रहा था.

‘‘वह क्या कर रहा है लैपटाप पर?’’ कुजूर बोले.

‘‘बायोडेटा निकाल रहा है.’’

‘‘किस का?’’

‘‘देखोगे तब मालूम पड़ जाएगा.’’ यह कहते हुए उस ने लैपटाप की स्क्रीन उन की ओर घुमा दी. स्क्रीन पर कुछ तसवीरें थीं, जिन्हें देखते ही कुजूर के माथे पर पसीना आ गया.

‘‘क्या हुआ… यह तो ट्रेलर है. पूरी पिक्चर दिखाऊं क्या?’’ आशी बोली.

‘‘यह सब कब लिया? क्यों लिया?…क्यों किया यह सब तुम ने…’’ कुजूर बोलतेबोलते हांफने लगे थे.

‘‘बीपी की दवाई खा लो, फिर सभी सवालों का जवाब देती हूं.’’ आशी का यह कहना था कि कुजूर करीबकरीब चीख कर बोले, ‘‘लाओ, इधर लैपटाप!’’

उन की तेज आवाज प्रदीप ने भी सुनी और भागता हुआ आया, ‘‘क्या लाऊं साहब!’’

‘‘कुछ नहीं, तुम्हें नहीं बुलाया.’’

‘‘साहब जो दवाई खाते हैं, वह मांग रहे हैं.’’ कुजूर के कुछ बोलने से पहले 21 वर्षीय आशी राजा ही बोल पड़ी.

प्रदीप अपने साहब की ओर देखता हुआ बोला, ‘‘साहब, वह दवाई खत्म हो गई है, बाजार से लानी होगी. आप कहो तो अभी खरीद लाऊं?’’

‘‘हां, जाओ. पहले हम सभी के लिए जूस ले आओ.’’ कुजूर बोले.

थोड़ी देर तक हाल में पहले की तरह शांति छा गई. तीनों नाश्ता करने लगे. डायनिंग टेबल पर जूस के 3 गिलास भी आ चुके थे.

प्रदीप दवाई लाने के लिए बाजार चला गया था. जल्द ही वह वापस लौट आया. अपने साहब को दवाई दी और घर के बिखरे काम को निपटाने में जुट गया. इस बीच उस ने महसूस किया कि उस के साहब तनाव में हैं. वे हाल में ही सोफे पर बैठे दोनों अतिथियों से बातें कर रहे हैं. प्रदीप उन की बातों का कोई मतलब नहीं निकाल पाया. वह औफिस की बात समझ कर अपने काम में लगा रहा. वहां आने वालों को उस ने पहले कभी नहीं देखा था, लेकिन इतना समझ गया था कि साहब से उन का खास संबंध है.

‘‘ठीक है… आप लोग यहीं ठहरो, मैं प्रदीप को बोल देता हूं. लंच यहीं करो… और मैं ने जो कहा है, वह पूरा करो! फिर मैं भी तुम्हारा काम कर दूंगा.’’ कुजूर आशी और सोनू से बोलते हुए खड़े हो गए. बैडरूम की तरफ जाने लगे. जातेजाते प्रदीप को आवाज दी. उसे दोनों के लिए दोपहर का खाना बनाने का आदेश दिया.

‘‘कब तक लौटोगे?’’ आशी ने पूछा.

‘‘जल्द लौट आऊंगा…एक तहकीकात के सिलसिले में जाना है… लेकिन हां, काम खत्म हो जाना चाहिए.’’

‘‘मेरे लिए तो चुटकी भर का काम है…तुम ही मुकर रहे हो?’’

कुछ देर में कुजूर वहां से चले गए. क्वार्टर में प्रदीप के अलावा आशी ओर सोनू थे. दोनों लैपटाप पर क्या कर रहे थे, प्रदीप की समझ से बाहर था, लेकिन वह यह नहीं समझ पा रहा था कि हाईटेक खूबसूरत युवती खुद से दुगनी उम्र के उस के साहब से तुमतुम कर के क्यों बातें कर रही थी?…और वह बातबात पर नाराज क्यों हो जाती थी?

एसएचओ ने कमरे में कर लिया सुसाइड

अरविंद कुजूर मध्य प्रदेश के जिला छतरपुर के थाना कोतवाली के एसएचओ (टीआई) थे. उन की उम्र 48 वर्ष थी. उन की थाने से ले कर पूरे इलाके तक में धाक थी. उन की ताकत और कानूनव्यवस्था को लोग अगस्त 2023 में देख चुके थे. तब उन्होंने स्थानीय भीड़ द्वारा की गई पत्थरबाजी को अपने साहस से काबू में करने में सफलता पाई थी, जिस में घायल तक हो गए थे. उन की कर्तव्यनिष्ठा की चर्चा पूरे पुलिस महकमे में होती थी. वह छतरपुर की ही पेप्टेक कालोनी में रहते थे.

परिवार साथ नहीं रहता था. उन की पत्नी 12 और 8 साल की बेटियों के साथ सागर में रहती थी. उन्होंने एक केयरटेकर के तौर पर प्रदीप अहिरवार को रखा हुआ था. थाना कोतवाली में शाम लगभग पौने 7 बजे टीआई अरविंद कुजूर के बारे जो सूचना मिली, उस से थाने में हडक़ंप मच गया. जिस ने भी सुना अवाक रह गया, ‘‘यह क्या हो गया?’’

महिला पुलिसकर्मी बोल पड़ी, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता! जरूर किसी ने मजाक किया है?’’

‘‘सूचना सच है, उन के केयरटेकर ने ही काल कर के बताया है. उन के बंद कमरे से गोली चलने की आवाज आई है.’’

थाना कोतवाली की पुलिस टीम तुरंत अरविंद कुजूर के पेप्टेक कालोनी में स्थित आवास पर पहुंच गई. कुजूर के कमरे का दरवाजा भीतर से बंद था. कमरे के बाहर मौजूद प्रदीप अहिरवार ने बताया कि भीतर कमरे में सिर्फ गोली चलने की आवाज आई. उस के बाद से एकदम शांति है. उस ने कई बार दरवाजे को थपथपाया. कुंडी खटकाई. उस के साहब कुछ नहीं बोल रहे हैं.

वहां आई पुलिस ने दरवाजा तोड़ दिया. कमरे में टीआई कुजूर की रक्तरंजित लाश पड़ी थी. उन का आधा शरीर बैड पर और पैर जमीन पर था. उन का सर्विस रिवौल्वर उन के दाहिने हाथ के पास था. दाहिनी कनपटी पर गोली का निशान था.

पुलिस टीम को समझने में देर नहीं लगी कि कुजूर ने आत्महत्या कर ली है. कमरे की तलाशी ली गई. अमूमन आत्महत्या करने वाला व्यक्ति सुसाइड नोट छोड़ जाता है, लेकिन कुजूर का लिखा कोई सुसाइड नोट नहीं मिला. इस वारदात की सूचना तुरंत एसपी अगम जैन के अलावा कुजूर के भाई, रिश्तेदार और उन की पत्नी को भेज दी गई, जो दूसरे शहरों में रहते थे. मौके की जांच करने के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. तहकीकात और पूछताछ की शुरुआत केयर टेकर प्रदीप अहिरवार से हुई. प्रदीप ने बताया कि उस ने अपने साहब को 5 मार्च, 2025 की सुबह से ही परेशान पाया था. वे आशी राजा मैडम और सोनू ठाकुर के आने के बाद से और भी ज्यादा परेशान दिखे थे.

पहले तो उन्होंने दोनों को बाहर से ही बहाना बना कर चलता करने को कहा था. फिर उन के मन में न जाने क्या आया, जो उन को घर के भीतर बुलाया, नाश्ता करवाया, लंच और डिनर साथ में किया. दोनों उन के घर में 6 मार्च को करीब 4 बजे तक रहे. उस के बाद वह खुद बाजार चला गया था. टीआई कुजूर के साथ किस तरह की बातें होती रहीं? वे करीब 30 घंटे तक कुजूर के घर पर क्यों रुके रहे? इस बारे में प्रदीप कुछ नहीं बता पाया, लेकिन इतना जरूर बताया कि दोनों के जाने के बाद उस के साहब बहुत परेशान दिख रहे थे. दोनों से बातोंबातों में वह बारबार ‘ब्लैकमेल…ब्लैकमेल’ बोल रहे थे.

केयरटेकर ने यह भी बताया कि उस रोज साहब बहुत ही गुस्से में थे और उन दोनों के जाने के बाद भी फोन पर गुस्से में बातें कर रहे थे. घटनास्थल पर पहुंचे डीआईजी ललित शाक्यवार, एसपी अगम जैन, एएसपी विक्रम सिंह सहित जिले के तमाम बड़े अधिकारियों ने वारदात की जांचपड़ताल की. वहां पहुंचने वालों में कलेक्टर पार्थ जायसवाल, एसडीएम अखिल राठौर, तहसीलदार संदीप तिवारी के साथ ही विधायक ललिता यादव भी थीं. फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड ने गहन जांच की. आगे तहकीकात के लिए पुलिस टीम ने इलाके में लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज का सहारा लिया.

आशी राजा और सोनू ठाकुर की तसवीरों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया गया, किंतु पुलिस उन तक पहुंच नहीं पाई. पड़ताल में यह पता चला कि टीआई अरविंद कुजूर एबीवीपी की नेता आशी राजा के संपर्क में थे. वह फरार हो चुकी थी. उन तक पहुंचने के लिए एसपी अगम जैन ने 3 टीमें बनाईं. पुलिस टीमों ने उन की तलाश शुरू की. यह घटना ओरछा रोड थाना इलाके में हुई थी. पुलिस ने शहर के 15 से ज्यादा लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया, जिस में कई लड़कियां भी शामिल थीं. इन्हीं में एक युवती और उस का प्रेमी सोनू ठाकुर बुंदेला था. वे पन्ना जिले से गिरफ्तार किए गए.

पुलिस को कई सूत्रों से जो जानकारी मिली उस से पता चला कि टीआई साहब और आशी राजा के बीच चक्कर चल रहा था. टीआई कुजूर अपनी प्रेमिका पर इस कदर फिदा थे कि अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा उस पर खर्च करते थे. शहर के कई नेताओं और अधिकारियों से भी उस का मिलनाजुलना होता था. इस आधार पर पुलिस ने उन की मौत को हनीट्रैप का मामला समझा.

21 साल की आशी से थे एसएचओ के संबंध

पुलिस को यह आशंका हुई कि कुजूर एक ऐसे गिरोह की गिरफ्त में आ गए होंगे, जिस में कुछ युवक और युवतियां भी शामिल होंगी. उन के जरिए कुजूर के अंतरंग पलों के वीडियो बनाए गए होंगे. फिर उन के जरिए उन को ब्लैकमेल किया गया होगा. जांच का सिलसिला जैसेजैसे आगे बढ़ा, कुजूर और आशी की कहानी सामने आने लगी. टीआई कुजूर कोई दूध के धुले नहीं थे, बल्कि उन्होंने भी काली कमाई की थी और अय्याश किस्म के इंसान थे. तभी तो उन का 21 वर्षीय आशी राजा के साथ अफेयर चल रहा था.

खुद को गोली मार कर आत्महत्या करने वाले टीआई कुजूर की मौत सनसनीखेज और पूरे शहर को स्तब्ध करने वाली थी. आत्महत्या के कारणों को ले कर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया था. हर कोई इस का कारण जानने को उत्सुक था. अरविंद कुजूर पुत्र विलियम कुजूर मूलरूप से छत्तीसगढ़ के रहने वाले थे. वह पिछले 10 सालों से छतरपुर और पन्ना जिले के विभिन्न थानों में तैनात रहे. करीब 2 साल पहले वह सिटी कोतवाली छतरपुर के टीआई बनाए गए थे. उन की पत्नी सागर के पौलिटेक्निक कालेज में प्रोफेसर हैं. वह 12 और 8 साल की 2 बेटियों के साथ सागर में ही रहती हैं. कुजूर ने शहर में अमनचैन बहाल करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.

कोतवाली में हुए बहुचर्चित पत्थर कांड के समय अरविंद कुजूर ही टीआई थे और उन्होंने कोतवाली पर हमला करने की जुर्रत करने वाले सभी नामजद सहित अनेक आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी. बताते हैं कि कुजूर अपनी खुदकुशी से 2 दिन पहले बाहर थे. जांच का सिलसिला जैसेजैसे आगे बढ़ा, वैसेवैसे आशी राजा का नाम केंद्र में आता चला गया. पुलिस ने पाया कि कुजूर उस पर काफी मेहरबान थे. वह उस के साथ शादी भी करना चाहते थे. इतना ही नहीं, उन्होंने आशी को रेंट पर एक मकान भी दिलवाया हुआ था.

आशी राजा महज 21 साल की बेहद खूबसूरत कमसिन बाला थी. उस की सुंदरता और अदाओं पर कुजूर का दिल आ गया था. बदले में उस पर महंगे तोहफे और सोनेचांदी की ज्वैलरी लुटाते रहते थे. यहां तक कि गाड़ी, मकान और प्लौट तक खरीद कर दिए थे. इन तोहफों की कीमत लाखों में थी. इस में डायमंड नेकलेस से ले कर महंगी गाडिय़ां तक शामिल हैं. आत्महत्या के 5 दिन बाद इस मामले में ओरछा थाने में आशी राजा और सोनू ठाकुर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई. जिस में खुलासा हुआ है कि आशी राजा और उस का बौयफ्रेंड सोनू ठाकुर टीआई अरविंद को काफी समय से ब्लैकमेल कर रहे थे.

आरोप लगा कि यह लडक़ी डायमंड का नेकलेस और जमीन जैसी महंगी चीजों की मांग कर रही थी. जब टीआई अरविंद ने उन की मांगें पूरी नहीं कीं तो उन्हें बेनकाब करने की धमकी दी गई. आशी और सोनू की गिरफ्तारी होने के बाद पुलिस ने दोनों को न्यायालय में पेश किया और एक दिन की रिमांड मंजूर हो गई.  पुलिस ने उन से पूछताछ की. पूछताछ में ब्लैकमेलिंग के चौंकाने वाले कई खुलासे हुए. ब्लैकमेलिंग के पैसों से उन्होंने काफी प्रौपर्टी बना ली थी.

कुजूर की गिनती छतरपुर पुलिस में तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों में होती थी. उन की जहां ड्यूटी होती थी, वहां उन का बोलबाला रहता था, लेकिन यह कम लोगों को पता था कि जिस 21 साल की हसीना को वह पुलिस की मुखबिर बता कर लोगों से मिलवाते थे, वह उन की प्रेमिका थी. आशी टीआई कुजूर को नोट छापने की मशीन समझती थी. अपने प्रेमी के साथ मिल कर वह टीआई की भावनाओं से खेलने लगी. आशी राजा ने टीआई अरविंद कुजूर को बुरी तरह से अपनी गिरफ्त में ले लिया था. बताते हैं कि मौका देख कर उस ने अंतरंग संबंधों के वीडियो भी बना लिए थे. कुजूर आशी की हर मांग को पूरा करने को मजबूर थे.

घटना के दिन ही आशी ने उस से सोनू ठाकुर को मिलवाया, जो उस का बौयफ्रेंड है. फिर दोनों मिल कर टीआई को ब्लैकमेल करने लगे. साथ ही अधिक रुपए और नई गाड़ी की मांग की. यहां तक कि वे एक प्लौट अपने नाम करवाने की जिद कर रहे थे. आशी राजा और सोनू ठाकुर की गिरफ्तारी के बाद टीआई अरविंद कुजूर के मामले में और कई सवाल उठने लगे कि उन के पास महंगे तोहफे दिलाने के लिए इतने रुपए कहां से आए. हालांकि इस पर कथा लिखे जाने तक जांच शुरू नहीं हुई थी. पूरी जांच उन की खुदकुशी पर टिकी हुई थी.

इस जांच में आशी राजा के पास से गुच्ची ब्रांड का डेढ़ लाख रुपए का बैग, डायमंड का नेकलेस, आईफोन, सोने के झुमके, 2 प्लौट के कागज और एक कार बरामद हुई. जबकि सोनू के पास से एक सफारी कार और आईफोन मिला. पुलिस को कुजूर और आशी के बीच वाट्सऐप चैट भी मिले, जिन से पता चल गया कि वे पन्ना रोड पर एक घर खरीदने की योजना बना रहे थे. शायद यही उन की ब्लैकमेलिंग और विवाद की आखिरी वजह बनी. Love Stories in Hindi Short

Social Stories in Hindi : जल्दी अमीर बनने के लालच में महिला ने बनाया हनीट्रैप गिरोह

Social Stories in Hindi : जल्द अमीर बनने के लिए 22 वर्षीय पायल ने 6 महिलाओं व पुरुषों के साथ एक ऐसा गिरोह बना रखा था जो पैसे वाले लोगों को हनीट्रैप के जाल में फांस कर मोटी रकम वसूलता था. कारोबारी युवक धीरज से मोटी रकम ऐंठने के चक्कर में ये सभी ऐसे फंसे कि…

23 नवंबर, 2020 की सुबह का वक्त था. मंदसौर जिले के मल्हारगढ़ थाने के टीआई कमलेश सिंगार को थाने पहुंचे कुछ ही समय हुआ था कि पास के गांव रतनगढ़ से आए 2 लोग मोहन और धीरज ने उन से मिलने की इच्छा जाहिर की. टीआई ने उन दोनों को केबिन में बुला लिया. मोहन की उम्र कोई 40-45 साल थी, जबकि उस के साथ आए युवक धीरज की उम्र मुश्किल से 22 साल रही होगी. मोहन गांव में पंचायत स्तर की राजनीति से जुड़ा होने के कारण तेज था, इसलिए उस ने बिना लागलपेट के टीआई कमलेश सिंगार को साथ आए युवक धीरज के साथ हुई लूट की रिपोर्ट दर्ज करने का अनुरोध किया. लेकिन धीरज इज्जत के डर से रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाना चाहता था.

पूरे घटनाक्रम में मोहन भी जुड़ा हुआ था. इसलिए उस ने टीआई कमलेश सिंगार को पूरी घटना से अवगत करा दिया. इस के बाद टीआई ने मोहन की तरफ से एक अज्ञात युवती, 2 महिलाओं और 3 पुरुषों के खिलाफ लूट की रिपोर्ट दर्ज कर ली. 22 वर्षीय अविवाहित धीरज रतनगढ़ का रहने वाला था. संपन्न परिवार के धीरज का बड़ा करोबार था. एक दिन उस के मोबाइल फोन पर किसी अज्ञात नंबर से फोन आया.

‘‘हैलो, कौन?’’ धीरज ने फोन रिसीव करते हुए पूछा.

‘‘आप दिनेशजी बोल रहे हैं?’’ किसी लड़की की मीठी सी आवाज आई.

‘‘जी नहीं, शायद आप ने गलत नंबर मिलाया है,’’ धीरज ने कहा.

‘‘मेरी किस्मत में हमेशा गलत डायलिंग क्यों लिखी है.’’ उस युवती ने गहरी सांस लेते हुए कहा तो धीरज को अजीब लगा.

उस से कुछ बोलते नहीं बना. वह चुप रहा तो उधर से फिर आवाज आई, ‘‘हैलो आप सुन रहे हैं न?’’

‘‘हांहां सुन रहा हूं. लेकिन मैं दिनेश नहीं हूं.’’

‘‘मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप का नाम दिनेश है या नहीं. मेरे लिए इतना ही काफी है कि आप ने कम से कम मेरा दर्द तो सुना, वरना इतनी बड़ी दुनिया में मेरा एक भी हमदर्द नहीं है.’’ वह बोली.

‘‘आप ऐसा क्यों सोचती हैं, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा.’’ धीरज ने उसे तसल्ली देने वाले अंदाज में कहा.

‘‘पता नहीं कब होगा. मुझे तो लगता है कि सारी प्रौब्लम मेरे लिए ही हैं. मेरे पिता ने मुझे इतना पढ़ायालिखाया, लेकिन कुछ काम नहीं आया. खैर छोड़ो, आप क्यों मेरी कहानी सुन कर अपना समय खराब करेंगे.’’

‘‘अरे नहींनहीं, ऐसी कोई बात नहीं है.’’ धीरज ने जल्दी से कहा. उसे डर था कि कहीं वह फोन न काट दे.

‘‘आप सुनेंगे मेरे दर्द की दास्तान?’’

‘‘जी, बताइए. हो सकता है मैं आप के किसी काम आ सकूं.’’

‘‘तो ठीक है. मैं रात में आप को इसी नंबर पर फोन करूंगी. कहानी लंबी है, फिर रात की तनहाई में किसी अपने के सामने दिल खोल कर रख देने का सुख ही अलग होता है. अच्छा, यह बताओ कि आप की पत्नी तो गुस्सा नहीं करेंगी.’’

‘‘अभी मेरी शादी नहीं हुई है.’’ धीरज ने बताया.

‘‘अरे तो फिर किसी लड़की के दिल पर यूं प्यारभरा हाथ रखना आप ने कहां से सीखा. आप मेरी कहानी सुनने के लिए राजी हो गए तो मुझे लगा जैसे आप अभीअभी मेरे दिल को बहुत हौले से छू कर गुजरे हो.’’ वह बोली.

‘‘आप की शादी हो गई?’’ धीरज ने कुछ हिम्मत कर के पूछा.

‘‘इस तन की तो हो गई लेकिन दिल की नहीं हुई.’’

‘‘क्या मलतब?’’

‘‘मतलब सीधा सा है यार. पति है, इसलिए मेरे शरीर को तो उस ने शादीशुदा बना दिया, लेकिन मेरे दिल को अब तक यह भरोसा नहीं दिला पाया कि वह मेरा पति है. अच्छा कोई आ जाएगा, बाकी बातें मैं रात में बताऊंगी, तुम अपनी तरफ से फोन मत करना मैं खुद कर लूंगी.’’

कहते हुए उस युवती ने काल डिसकनेक्ट कर दी तो धीरज ठगा सा खड़ा रह गया. उस का मन कर रहा था कि काश! अभी रात हो जाए और वह फिर उस युवती की मीठी आवाज सुने.

रात में उस युवती का फोन आ गया. वह बोली, ‘‘क्या कर रहे हो?’’

‘‘कुछ नहीं.’’ धीरज ने कहा.

‘‘धत मैं तो समझी थी कि तुम मुझे याद कर रहे होगे. सच कहूं तो आप से फोन पर बात करने के बाद से मैं लगातार आप को ही याद कर रही हूं.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘शायद इसी को पुराने जन्म का रिश्ता कहते हैं. हो सकता है, पिछले जन्म में आप मेरे रहे हो. इसलिए इस जन्म में भी मिल गए.’’

‘‘हां, हो सकता है.’’ धीरज ने थूक गटकते हुए कहा.

‘‘तो हमारे बीच इस जन्म में ये दूरी क्यों?’’

‘‘सब किस्मत की बात है.’’

‘‘सच कहा आप ने तभी तो नियति ने ऐसे पति के साथ बांध दिया जो दिन भर मेरे ऊपर अपने दिमाग की गरमी निकालता है और रात में अपने तन की. मेरी भावनाओं से तो जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं है. सच कहूं तो मेरा पति रात में तो मुझे केवल मशीन समझता है. आप समझ रहे हैं न, मैं क्या कहना चाहती हूं.’’

‘‘जी, समझ रहा हूं.’’

‘‘कैसे? आप की तो अभी शादी भी नहीं हुई. कहीं ऐसा तो नहीं कि बिना शादी के ही गर्लफ्रैंड ने ये सब सिखा दिया हो.’’

‘‘मेरी कोई गर्लफ्रैंड भी नहीं है.’’

‘‘तो मुझे समझ लो.’’

‘‘आप बनोगी मेरी फ्रैंड?’’

‘‘समझो बन गई. सच कहूं, अब आप मिल गए हो तो लगता है कि सब ठीक हो जाएगा. चंद पलों की इस बात में ही आप से मिलने का मन करने लगा है. आप मिलना चाहेंगे मुझ से?’’

‘‘जरूर.’’

‘‘कहां सब के सामने या कहीं अकेले में? ज्यादा परेशान तो नहीं करोगे न मुझे?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो ठीक है, मैं 2-4 दिन में तुम से मिलने की कोशिश करती हूं.’’

उस के बाद काफी देर तक वह धीरज से मीठीमीठी बातें करती रही फिर दूसरे दिन फोन करने को कह कर फोन डिसकनेक्ट कर दिया. दूसरे दिन धीरज इंतजार करता रहा लेकिन उस का फोन नहीं आया. अगले दिन उस ने बताया कि उसे मौका नहीं मिल पाया, इसलिए फोन नहीं कर सकी. इस बार उस ने अगले दिन धीरज को मल्हारगढ़ बस स्टैंड पर मिलने को कहा. धीरज न केवल राजी हो गया बल्कि उस के बताए समय पर वहां पहुंच भी गया. एकांत की मुलाकात थोड़ी देर में लगभग 22 साल की एक खूबसूरत युवती उस से आ कर मिली और उसे मस्ती करने के नाम पर गाडगिल सागर डैम ले गई. डैम पर एकांत में वह युवती धीरज को अपने साथ शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में ले जाने लगी.

लेकिन इस से पहले कि बात ज्यादा आगे बढ़ती, मौके पर 2 महिलाएं और 2 युवक आ कर सीधे धीरज के साथ मारपीट करने लगे. महिलाएं उस पर आरोप लगा रहीं थी कि उस ने उन के परिवार की बहू को बिगाड़ दिया है. वह उस से अकेले में मिल कर शारीरिक संबंध बनाता है. धीरज ने उन के सामने बहुत हाथपैर जोड़े, लेकिन वे उसे थाने ले जा कर बलात्कार का मामला दर्ज करवाने पर अड़े रहे. इसी बीच वहां से एक आदमी गुजरा, जिस ने पूरा मामला सुन कर दोनों पक्षों को समझाया कि थाने जाने से कोई फायदा नहीं है. यहीं आपस में मामला निपटा लो.

इस के लिए युवती के परिवार वालों ने धीरज से 5 लाख रुपए की मांग की. इतना ही नहीं, उन्होंने उसी समय धीरज की जेब में रखे 70 हजार रुपए छीन लिए. धीरज के पास 5 लाख रुपए नहीं थे, इसलिए मामला 3 लाख में सेट हो जाने पर धीरज ने तुरंत अपने दोस्त मोहन को फोन लगा कर 3 लाख रुपया ले कर बुलाया. मोहन ने इस का कारण पूछा, लेकिन धीरज ने कुछ नहीं बताया. इसलिए अंधेरा होने तक मोहन धीरज के बताए स्थान पर पैसा ले कर तो आ गया मगर वह इस बात पर अड़ गया कि जब तक धीरज पैसों की जरूरत का कारण नहीं बताएगा, वह पैसे नहीं देगा.

लड़की और उस के साथियों ने धीरज की मोटरसाइकिल रख कर उसे अकेले ही मोहन के पास भेजा था. किसी तरह की बदमाशी दिखाने पर उन्होंने उसे बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करवाने का डर भी दिखाया था. लेकिन जब मोहन बिना कारण जाने पैसे देने को राजी नहीं हुआ तो धीरज ने उसे पूरी बात बता दी. संयोग से इसी बीच धीरज के पास फिर बदमाशों का फोन आ गया. उन का कहना था कि जल्दी पैसे ले कर आओ वरना वे थाने जा कर मामला दर्ज करवा देंगे. इस पर मोहन ने धीरज के हाथ से फोन छीन लिया और खुद को पुलिस इंसपेक्टर बताते हुए धमकी दी तो बदमाशों ने अपना फोन स्विच्ड औफ कर लिया.

अगले दिन मोहन धीरज को किसी तरह थाने ले कर आया, लेकिन धीरज रिपोर्ट लिखवाने को राजी नहीं हुआ तो मोहन ने अपनी तरफ से रिपोर्ट दर्ज करवा दी. धीरज के साथ घटी लूट की घटना सुन कर टीआई कमलेश सिंगार को एक पुरानी घटना याद आ गई, जिस में इसी तरह से एक औरत ने 70 वर्षीय गांव के मुखिया को अपने जाल में फंसा कर उस से एक लाख 80 हजार रुपए लूट लिए थे. इस से टीआई समझ गए कि यह किसी गिरोह का काम है, जो नियोजित योजना के तहत लोगों को इज्जत का डर दिखा कर लूटने हैं. इसलिए उन्होंने इस गिरोह को खत्म करने के लिए कमर कस ली. अगले दिन टीआई कमलेश सिंगार ने उसी नंबर पर फोन लगाया, जिस से वह युवती धीरज को फोन किया करती थी.

युवती ने टीआई से उन का परिचय पूछा तो इंसपेक्टर सिंगार ने एक दिलफेंक युवक की तरह उस से बातें करते हुए उस के मन में यह भ्रम पैदा कर दिया कि उस युवती ने ही कुछ दिन पहले उन्हें फोन किया था. चूंकि युवती इस तरह से कई लोगों को फोन लगाती रहती थी, इसलिए वह टीआई कमलेश सिंगार के जाल में फंस गई. टीआई सिंगार को अपना नया शिकार जान कर युवती ने पहले तो उन के साथ काफी अश्लील बातें कीं, फिर अकेले में मिलने की जगह तय कर गिरोह के दूसरे सदस्यों को शिकार पर चलने के लिए बुला लिया. लेकिन उस गिरोह के लोगों को क्या मालूम था कि आज उन का पाला ऐसे पुलिस इंसपेक्टर से पड़ने वाला है जो खुद उन का शिकार करने शिकारी बन कर आया है.

थोड़ी देर में वही स्थिति बन गई जो धीरज के साथ बनी थी. फिर युवती के बाद साथ आए 2 पुरुष और एक महिला ने उन्हें घेरने की कोशिश की. फिर टीआई कमलेश सिंगार की टीम ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. सभी से पूछताछ की गई. पूछताछ के बाद 3 और महिलाओं व एक पुरुष को गिरफ्तार किया गया. गिरोह में शामिल 22 साल की युवती पायल सब से ज्यादा तेजतर्रार थी. उस ने एक मुसलिम युवक से शादी की थी. गिरोह के लोग उस की बात मानते थे. उस ने अपने गिरोह से कह रखा था कि जब वह शिकार पर हो तो गिरोह के लोग उस के पास इशारे पर ही आएं. क्योंकि शिकार पसंद आने पर पायल पहले उस युवक के साथ पूरी तरह संबंध बना कर अपना मन भरती थी, बाद में गिरोह की तिजोरी भरने के लिए बाकी सदस्यों को इशारा कर मौके पर बुला लेती थी.

गिरोह की बाकी महिला सदस्य हीराबाई, कुशालीबाई, नाथी उर्फ सुमन भी शिकार करने में माहिर थीं. मल्हारगढ़ पुलिस ने इन महिलाओं के साथ कारूलाल उर्फ करण निवासी गोपालपुरा, गुलाम हैदर उर्फ भयू निवासी रामपुरा और श्यामलाल उर्फ समरथ निवासी सावन को भी गिरफ्तार कर इन के पास से धीरज और रामपुरा निवासी एक अन्य युवक से लूटे गए एक लाख रुपए बरामद किए. गिरोह में जो 6 महिलाएं थीं, उन में से 3 की उम्र 20 से ले कर 24 साल और बाकी की 30-40 और 48 साल थी. ये ग्राहक की उम्र देख कर उस के सामने चारा बना कर डालने के लिए युवती चुनती थीं.

यदि शिकार जवान होता था तो तीनों युवतियों में से किसी एक को चारा बनाया जाता था और अगर शिकार अधेड़ होता तो फिर 30-40 साल वाली महिला सदस्य उस से प्रेमिका बन कर मिलती थीं. पूछताछ करने के बाद पुलिस ने सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Social Stories in Hindi

 

MP Crime News : हत्यारे ने पहचान छिपाने के लिए शव के साथ कौन सी घिनौनी करतूत की

MP Crime News : ममता तोमर एक साथ 2 प्रेमियों सुरेश उइके और सईद के साथ प्यार की पींगें बढ़ा रही थी. बाद में उस ने सुरेश के साथ लवमैरिज कर ली. लेकिन शादी के बाद भी उस का सईद के साथ चक्कर चलता रहा. इस का नतीजा…

30 सितंबर, 2020 की सुबह का वक्त था. होशंगाबाद जिले के थाना पथरोड़ा की थानाप्रभारी सुश्री प्रज्ञा शर्मा पुराने मामलों की फाइल पलट रही थीं. तभी डंडे का सहारा ले कर लगभग 90 वर्षीय एक बुजुर्ग धीरेधीरे उन के औफिस में दाखिल हुए. थानाप्रभारी ने बुजुर्ग को कुरसी पर बैठने का इशारा किया. बुजुर्ग ने अपना नाम रामदास बताते हुए कहा कि वह डोव गांव में रहता है और उस का 40 साल का बेटा सुरेश उइके गांव नानपुरा पंडरी में पत्नी ममता और 2 बच्चों के साथ रहता है. सुरेश रेलवे में वेल्डर है. वह रोज सुबह नौकरी पर अपनी मोटरसाइकिल से भौरा स्टेशन आताजाता था. लेकिन कल रात में वह काम से वापस नहीं लौटा और उस का मोबाइल भी बंद था.

वह उसे खोजने के लिए जब भौरा जा रहा था तो जंगल के रास्ते में उसे अपने बेटे की मोटरसाइकिल पड़ी दिखाई दी. जिस के पास कुछ दूरी पर एक पेड़ के नीचे उस की लाश पड़ी है. रामदास ने बताया कि किसी ने उन के बेटे का सिर कुचल कर उस की हत्या कर दी है. थानाप्रभारी प्रज्ञा शर्मा के सामने कई ऐसे सवाल थे जिन के उत्तर रामदास दे सकता था. लेकिन पहली जरूरत मौके पर पहुंचने की थी. इसलिए उन्होंने सब से पहले एसपी होशंगाबाद संतोष सिंह गौर और एसडीपीओ महेंद्र मालवीय को घटना की जानकारी दी. फिर वह पुलिस टीम ले कर मौके पर पहुंच गई. भौरा मार्ग से कुछ हट कर जंगल के अंदर सागौन के पेड़ के नीचे सुरेश की सिर कुचली लाश पड़ी थी.

लाश के पास ही खून से सना भारी पत्थर पड़ा था, जिस से जाहिर था कि उसी पत्थर को सुरेश के सिर पर मारा गया था, जिस से उस का पूरा भेजा बाहर निकल कर चारों तरफ बिखर गया था. सड़क पर पड़ी मोटरसाइकिल के पास भी खून के निशान थे. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि संभवत: मोटरसाइकिल से घर लौट रहे सुरेश को हमलावरों ने पहले चलती बाइक पर हमला कर रोका होगा और फिर बाद में अंदर जंगल में ले जा कर उस की हत्या कर दी होगी. पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के साथ ही रामदास की रिपोर्ट पर हत्या का केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी. दूसरी तरफ मामले की गंभीरता देखते हुए एसपी संतोष सिंह गौर ने एसडीपीओ महेंद्र मालवीय के निर्देशन और पथरोड़ा थानाप्रभारी प्रज्ञा शर्मा के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी.

टीम में एएसआई भोजरात बरबडे, हेडकांस्टेबल सुरेंद्र मालवीय, अनिल ठाकुर, कांस्टेबल हेमंत, टिल्लू, विनोद, संजय आदि को शामिल किया गया. इस टीम ने मृतक सुरेश के बारे में गहन छानबीन की, जिस में पता चला कि सुरेश ने करीब 13 साल पहले कांदई कलां की रहने वाली ममता तोमर से प्रेम विवाह किया था. जबकि ममता के बारे में जानकारी मिली कि वह अपने एक रिश्तेदार के घर ड्राइवर की नौकरी करने वाले सईद खां से प्यार करती थी. मृतक सुरेश के पिता रामदास आर्डिनैंस फैक्ट्री में गार्ड की नौकरी करते थे. शादी के कुछ समय बाद सुरेश को रेलवे में वेल्डर की नौकरी मिल गई, जिस के बाद वह अपनी पत्नी ममता के साथ नानपुरा पंडरी में मकान बना कर रहने लगा था.

सुरेश की ड्यूटी भौरा और कीरतगढ़ रेल सेक्शन के बीच रहती थी, इसलिए वह रोज मोटरसाइकिल से भौरा आ कर रात लगभग 8 बजे ड्यूटी खत्म कर के घर लौट जाता था. सुरेश के साथियों से भी पूछताछ की गई, लेकिन उन्होंने बताया कि सुरेश सीधासच्चा आदमी था और उस की किसी से कोई रंजिश भी नहीं थी. कहानी में मोड़ तब आया, जब पुलिस ने मृतक के पिता रामदास से पूछताछ की. उन्होंने उस की हत्या का शक अपने बेटे की पत्नी ममता पर जाहिर किया. ससुर अपनी ही बहू पर खुद उसी के पति की हत्या करने का आरोप लगा रहा था. इसलिए उन के आरोप को हलके में नहीं लिया जा सकता था. थानाप्रभारी प्रज्ञा शर्मा ने मृतक की पत्नी ममता को पूछताछ के लिए थाने बुलाने के बजाए खुद गांव जा कर उस के बयान दर्ज करने की सोची.

दरअसल इस के पीछे थानाप्रभारी का इरादा गांव में ममता के बारे में लोगों से और जानकारी हासिल करना था. इस के लिए जब वह ममता के घर पहुंचीं तो वहां पहुंचते ही यह देख कर चौंकी कि ममता के घर के मुख्य दरवाजे के अलावा घर में कई जगहों पर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. सुरेश रेलवे मे मामूली सी नौकरी करता था. उस के पास करोड़ों की पुश्तैनी संपत्ति भी नहीं थी और न ही उस की किसी से कोई रंजिश की बात सामने आई थी. तो उस ने घर में कई सीसीटीवी कैमरे क्यों लगवाए. उन्होंने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सुरेश की हत्या का संबंध उस के घर में लगाए गए सीसीटीवी कैमरों से जुड़ा हो.

उन का यह शक उस वक्त और भी गहरा गया, जब उन्हें पता चला कि सुरेश ने ये कैमरे 10-12 दिन पहले ही लगवाए थे. इसलिए ममता के बयान दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी प्रज्ञा शर्मा ने टीम के कुछ सदस्यों को गांव में ममता के बारे में जानकारी जुटाने की जिम्मेदारी दे दी. पता चला कि ममता के मायके में रहने वाला सईद अक्सर उस समय ममता के घर आता था, जब सुरेश घर पर नहीं होता था. पुलिस को यह जानकारी भी मिली कि सुरेश के घर में कैमरे लगने के बाद से सईद को गांव में नहीं देखा गया. दूसरी जो सब से बड़ी बात सुनने में आई, वह यह कि कोई 4 महीने पहले ममता अचानक घर से लापता हो गई थी. वह करीब एक महीने बाद घर लौटी थी, जिस के कुछ दिन बाद सुरेश ने अपने घर में कैमरे लगवाए थे.

सुनने में आया था कि लापता रहने के दौरान ममता सईद खान के साथ सिवनी मालवा में रही थी. इस जानकारी के बाद ममता के साथ सईद भी शक के घेरे में आ गया, जो ममता के मायके का रहने वाला था. पुलिस टीम ने कांदई कलां में सईद की तलाश की तो वह गांव से गायब मिला. जब सईद के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाली गई तो पता चला कि मृतक सुरेश की पत्नी ममता के साथ उस की लगातार लंबी बातें होती थीं. जिस दिन सुरेश की हत्या हुई उस दिन भी उस ने कई बार ममता से बात की थी.

दूसरी सब से बड़ी बात जो उस की काल डिटेल्स में निकल कर सामने आई, वह यह कि जिस समय सुरेश का कत्ल हुआ उस समय तक सईद का मोबाइल उसी लोकेशन पर था, जहां सुरेश की लाश मिली थी. इस से थानाप्रभारी प्रज्ञा शर्मा के सामने पूरी कहानी साफ हो गई. सईद की काल डिटेल्स से यह भी पता चला कि घटना के पहले कुछ दिनों तक सईद ने लगातार नया बस स्टैंड नंदूबाड़ा रोड सिवनी मालवा निवासी आशू उर्फ हसरत और अरबाज के साथ न केवल कई बार फोन पर बात की थी, बल्कि घटना के समय इन दोनों के मोबाइल भी सईद के साथ घटनास्थल पर ही मौजूद थे. इसलिए एसडीपीओ महेंद्र मालवीय के निर्देश पर पुलिस टीम ने इन तीनों की तलाश शुरू कर दी.

आरोपी फंसे शिकंजे में जिस से जल्द ही सईद को बैतूल के चिचोली थाना इलाके के मउपानी से और अरबाज आशू को सिवनी मालवा से हिरासत में ले लिया. पुलिस ने इन तीनों से सख्ती से पूछताछ की. पूछताछ में तीनों ने न केवल सुरेश की हत्या की बात स्वीकार की बल्कि इस में उस की पत्नी ममता के भी शामिल होने की बात बताई. पुलिस ने उन की निशानदेही पर घटना के समय पहने तीनों के रक्तरंजित कपड़े तथा उपयोग में लाई गई कुदाल, गला घोंटने में प्रयुक्त तार आदि भी बरामद कर सुरेश की पत्नी ममता को भी उस के गांव से गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद प्रेमी और पति को एक साथ खुश रखने वाली ममता द्वारा सुरेश की हत्या करवा देने की कहानी इस प्रकार सामने आई—

कांदई कला में रहने वाली ममता बचपन से ही अपने चंचल स्वभाव के लिए जानी जाती थी. बताते हैं कि मिडिल में पढ़ते समय ही उस का रंगरूप कुछ ऐसा निखार आया था कि देखने वाले उसे देख रीझ जाते थे. ममता के साथ स्कूल में गांव का रहने वाला सईद भी पढ़ता था. सईद ममता का दीवाना था. वह उस से दोस्ती कर उसे पाने के सपने देखता था. फिर नादान उम्र में ही ममता सईद के साथ प्रेम और देह के पाठ पढ़ने लगी थी. स्कूली पढ़ाई के बाद ममता ने आगे की पढ़ाई बंद कर दी. वह घर पर ही रहने लगी. उसी दौरान सुरेश उइके से उस के प्रेम संबंध हो गए. यह जानकारी जब सईद को हुई तो उसे झटका लगा. ममता के पिता गांव के बडे़ किसान थे.

गांव में रहने वाले ममता के रिश्ते के एक भाई ने खेतीकिसानी के काम के लिए सईद को बतौर टै्रक्टर ड्राइवर नौकरी पर रख लिया था. इस से सईद को ममता के आसपास रहने का मौका मिलने लगा. सईद बहुत शातिर था. उस का मकसद नौकरी के बहाने ममता से नजदीकियां बढ़ाना था, क्योंकि ममता उन दिनों सुरेश उइके से प्रेम की पींगें बढ़ा रही थी. सईद ने तिकड़म से जल्द ही ममता के पूरे परिवार का दिल जीत लिया. जिस से उस का उस के घर में बेरोकटोक आनाजाना शुरू हो गया. जब ममता को पता चला कि सईद उस की दीवानगी के चलते ही ड्राइवर की नौकरी करने आया है तो उस ने सईद की दीवानगी को भी हवा देनी शुरू कर दी.

वह पहले से ही प्यार के मामले में काफी अनुभवी थी. उस ने सईद को पूरी तरह से अपना दीवाना बना लिया. ममता एक ही समय में 2 प्रेमियों सईद और सुरेश को अपनी बांहों में प्रेम का झूला झुलाने लगी. इतना ही नहीं, उस ने सईद के संग निकाह और सुरेश के संग शादी करने का वादा भी कर रखा था जबकि वह जानती थी कि ये दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते. बहरहाल, सईद के साथ उस का निकाह होना सुरेश के साथ शादी होने से ज्यादा मुश्किल था. इसलिए उस ने सईद को छोड़ कर सुरेश के साथ लवमैरिज कर ली.

संयोग से शादी के ठीक बाद सुरेश को रेलवे में नौकरी मिल गई, जिस के बाद वह नानपुर पंडरी में मकान बना कर अपनी पत्नी के साथ रहने लगा. बाद में ममता 2 बेटियों की मां बनी. उस की घरगृहस्थी ठीकठाक चल रही थी. सुरेश की ड्यूटी भौंरा और कीरतगढ़ के बीच थी, इसलिए वह गांव से रोज सुबह मोटरसाइकिल से आ कर शाम को वापस घर लौट आता था. दिन भर ममता घर में अकेली रहती थी. उस ने अपने इस खाली समय का उपयोग पुराने प्रेमी सईद को खुश करने के लिए करना शुरू कर दिया. वह पति के काम पर चले जाने के बाद सईद को अपने घर बुलाने लगी, जहां दोनों दिन भर वासना का खेल खेलते.

शाम को सुरेश के आने से पहले सईद अपने घर चला जाता. इस दौरान सईद ममता से किसी न किसी बहाने पैसा भी लेता रहता था. ममता ने रची गहरी साजिश ममता को सईद का आना अच्छा लगता था, इसलिए सईद के आते ही वह घर का दरवाजा बंद कर उस के साथ कमरे में कैद हो जाती थी. जल्द ही इस बात की चर्चा गांव में होने से बात सुरेश तक भी पहुंच गई. सुरेश ने एकाध बार इशारे में ममता से  इस बारे में बात की, जिस से ममता समझ गई कि अब सईद को घर बुलाने में खतरा है. इसलिए जब उस ने इस बारे में सईद से बात की तो उस ने उसे साथ भाग चलने को कहा. ममता सईद के साथ भागने को तैयार हो गई.

फिर 8 अगस्त, 2020 के दिन ममता को ले कर सईद सिवनी मालवा आ गया, जहां उस के दोस्त और रिश्तेदार अरबाज तथा आशू ने दोनों के रहने की व्यवस्था पहले से ही कर दी थी. ममता के भाग जाने से सुरेश पागल सा हो गया. उसे जरा भी भरोसा नहीं था कि उस के साथ प्रेम विवाह करने वाली ममता उसे और बच्चों को इस तरह से धोखा देगी. इस से सुरेश का दिल टूट गया. इधर एक महीने तक ममता द्वारा घर से लाए गए पैसों पर ऐश करने के बाद सईद ने उसे वापस सुरेश के पास भेज दिया. एक महीने बाद घर लौटी पत्नी को सुरेश अपनाना तो नहीं चाहता था, लेकिन बच्चों की खातिर उस ने ममता को माफ कर दिया. आगे ऐसा न हो, इसलिए सुरेश ने घर में कई सीसीटीवी कैमरे लगवा दिए. वह ड्यूटी पर रहते हुए मोबाइल के माध्यम से घर पर नजर रखने लगा.

इस से सईद और ममता समझ गए कि अब उन का वासना का खेल खत्म हो गया है. इसलिए उन्होंने फोन पर चर्चा कर सुरेश का ही खेल खत्म करने की योजना बना ली, जिस में सईद ने अपने दोनों दोस्त अरबाज और आशू को भी शामिल कर लिया. फिर तीनों ने मिल कर 30 सितंबर, 2020 की रात ड्यूटी से लौट रहे सुरेश को रोक लिया और साथ लाए तार से गला घोंट दिया. फिर भारी पत्थर से उस का सिर कुचल दिया. सईद और उस की प्रेमिका ममता का सोचना था कि मामला शांत हो जाने के बाद वे दोनों फिर पहले की तरह अय्याशी कर सकेंगे. लेकिन पथरोड़ा थानाप्रभारी प्रज्ञा शर्मा ने 4 दिन में ही सभी आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.