Delhi Robbery Case: सवा करोड़ के गहनों की लूट

Delhi Robbery Case: देश की राजधानी के भीड़ भरे इलाके से हुई सवा करोड़ रुपए के गहनों की लूट ने दिल्ली पुलिस की नींद उड़ा दी थी. लेकिन पुलिस ने भी ऐसा सूत्र ढूंढ निकाला कि लुटेरों के पूरे गैंग को दबोच लिया, जिस ने और भी कई चौंकाने वाले राज उगले.

सुबह के 8 बजे के करीब पुलिस कंट्रोल रूम से उत्तरी दिल्ली के थाना सदर बाजार पुलिस को सूचना मिली कि कुतुब रोड पर तांगा स्टैंड के पास मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने चाकू मार कर किसी का बैग छीन लिया है. सदर बाजार, खारी बावली और चावड़ी बाजार आसपास हैं. यहां रोजाना बड़ेबड़े व्यापारियों का आनाजाना लगा रहता है. लुटेरे व्यापारियों व अन्य लोगों को यहां अपना निशाना बनाते रहते हैं. यहां ज्यादातर घटनाएं लूट की ही होती हैं.

जिस समय ड्यूटी अफसर को यह सूचना मिली थी, उस समय थानाप्रभारी अनिल कुमार औफिस में ही थे. ड्यूटी अफसर ने लूट की इस घटना के बारे में थानाप्रभारी को बताया तो उन के दिमाग में तुरंत आया कि लुटेरों ने किसी व्यापारी को शिकार बना लिया है. वह तुरंत एसआई संजय कुमार सिंह, प्रकाश और कुछ अन्य स्टाफ को ले कर घटनास्थल की ओर चल पड़े. घटनास्थल थाने से उत्तर दिशा में आधा किलोमीटर दूर था, इसलिए वह 5 मिनट में वहां पहुंच गए. वहां कुछ लोग जमा थे और एक औटो खड़ा था. उस में 30-35 साल का एक आदमी बैठा था, जिस के  दाहिने पैर के घुटने के पास से खून बह रहा था.

औटो के पास एक आदमी खड़ा था, जिस की उम्र 40-42 साल रही होगी. वह बहुत घबराया हुआ था. पूछने पर उस ने अपना नाम भरतभाई बताया. उस ने बताया कि बदमाश उसी का गहनों से भरा बैग ले कर फरार हो गए हैं. गहनों की कीमत कितनी थी, उसे पता नहीं था. उस का कहना था कि लूट का विरोध करने पर एक बदमाश ने उस के साथी प्रवीण को चाकू मार कर घायल कर दिया था.

अनिल कुमार ने घायल प्रवीण को कांस्टेबल सतेंद्र के साथ हिंदूराव अस्पताल भिजवाया और खुद भरतभाई से पूछताछ करने लगे. इस पूछताछ में उस ने बताया कि वह अहमदाबाद में मेसर्स राजेश कुमार अरविंद कुमार आंगडि़या के यहां नौकरी करता है. उन की फर्म अहमदाबाद से दिल्ली और दिल्ली से अहमदाबाद गहने भेजने का काम करती है. दिल्ली के कूचा घासीराम, चांदनी चौक में उन का एक औफिस है, जिसे अमितभाई संभालते हैं.

भरतभाई ने आगे जो बताया, उस के अनुसार, वह अहमदाबाद-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रैस से गहनों का एक बैग ले कर दिल्ली के लिए चला था. यह ट्रेन अहमदाबाद से एक दिन पहले शाम 5 बजे चली थी और उस दिन पौने 8 बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची थी. प्रवीण दिल्ली वाले औफिस में काम करता था. जब भी वह माल ले कर नई दिल्ली स्टेशन पहुंचता था, वही उसे लेने रेलवे स्टेशन पर आता था. उस दिन भी प्रवीण उसे लेने स्टेशन पर आया था. वहां से उन दोनों ने चांदनी चौक जाने के लिए एक औटो किया और बैग ले कर उस में बैठ गए. जैसे ही उन का औटो यहां पहुंचा, तभी पीछे से पल्सर मोटरसाइकिल पर आए 3 लोगों ने उन का औटो रुकवा लिया.

औटो के रुकते ही मोटरसाइकिल से 2 लोग उतरे. उन में से एक ने भरतभाई पर पिस्तौल तान दी, दूसरा चाकू ले कर प्रवीण के पास खड़ा हो गया. तभी एक अपाचे मोटरसाइकिल और आ गई. उस पर भी 3 लोग सवार थे. उस मोटरसाइकिल से भी 2 लोग उतर कर उन के पास आ गए. तभी पिस्तौल वाले ने उस से गहनों से भरा बैग छीनने की कोशिश की. उस ने बैग नहीं छोड़ा तो चाकू वाले ने प्रवीण के पैर में चाकू मार दिया. इसी के साथ औटोचालक को 2 थप्पड़ मार दिए. थप्पड़ लगते ही औटोचालक भाग कर सड़क के उस पार जा कर खड़ा हो गया. उसी समय पिस्तौल वाले ने भरतभाई से बैग छीन कर अपाचे मोटरसाइकिल से आए लड़के को दे दिया. इस के बाद वे सभी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की तरफ तेजी से चले गए.

भरतभाई से पुलिस को यह तो पता नहीं चला कि लूटे गए बैग में कितनी कीमत के गहने थे, पर यह जरूर पता चल गया था कि लुटेरे गहनों से भरा जो बैग लूट कर ले गए थे, उस का वजन 5, साढ़े 5 किलोग्राम था और उस बैग में जीपीएस डिवाइस भी लगा था. जीपीएस डिवाइस की बात सुन कर अनिल कुमार को लगा कि उस के सहारे लुटेरों तक पहुंचा जा सकता है. गहनों के वजन के आधार पर पुलिस ने अंदाजा लगाया कि बैग में लाखों रुपए के गहने होंगे.

लूट का यह मामला बड़ा था, इसलिए अनिल कुमार ने घटनास्थल से ही पुलिस ने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दे दी. डीसीपी मधुर वर्मा ने जिले की मुख्य सड़कों पर बैरिकेड्स लगा कर वाहनों की चैकिंग के आदेश समस्त थानाप्रभारियों को दिए और खुद भी घटनास्थल पर पहुंच गए. भरतभाई ने लूट की सूचना दिल्ली और अहमदाबाद के अपने औफिसों को दे दी थी. यह खबर सुन कर दिल्ली औफिस से अमितभाई घटनास्थल पर पहुंच गए थे. उन्होंने डीसीपी को बताया कि लूटे गए गहनों की कीमत एक करोड़ से अधिक थी. गहने वाले बैग में जो जीपीएस डिवाइस रखा था, पुलिस ने अमित से उस का नंबर ले लिया. वह डिवाइस वोडाफोन कंपनी का था.

दिनदहाड़े हुई इस लूट को सुलझाने के लिए मधुर वर्मा ने 2 पुलिस टीमें बनाईं. पहली टीम थाना सदर के थानाप्रभारी सतीश मलिक के नेतृत्व में बनाई गई, जिस में इंसपेक्टर मनमोहन, कमलेश, एसआई संजय कुमार सिंह, प्रकाश, निसार अहमद, आशीष शर्मा, एएसआई सुरेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल ए.के. वालिया, अवधेश कुमार, अशोक, जितेंद्र सिंह, कांस्टेबल अमित, सुरेश, बलराम, समंद्र आदि को शामिल किया गया.

दूसरी पुलिस टीम औपरेशन सेल के इंसपेक्टर धीरज कुमार के नेतृत्व में बनी, जिस में एसआई सुखवीर मलिक, देवेंद्र, यशपाल, प्रणव, आनंद, एएसआई सतीश मलिक, हैडकांस्टेबल योगेंद्र, राजेंद्र, कांस्टेबल प्रमोद, चंद्रपाल दिनेश को शामिल किया गया था. दोनों टीमों का निर्देशन के एसीपी राजेंद्र प्रसाद गौतम कर रहे थे. दोनों टीमें एसीपी राजेंद्र प्रसाद गौतम की देखरेख में केस की छानबीन में जुट गईं.

पुलिस टीम ने जांच की शुरुआत जीपीएस डिवाइस से की. पुलिस पता करने लगी कि बैग किस क्षेत्र में है. पुलिस ने फर्म के अहमदाबाद औफिस में अरविंदभाई से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि वह जल्द ही दिल्ली पहुंच कर पुलिस से संपर्क करेंगे. डिवाइस के कोड नंबर से पुलिस ने जांच की तो पता चला कि वह डिवाइस अहमदाबाद से निकलने के कुछ देर बाद ही बंद हो गया था. इस से पुलिस को निराशा हुई. गहने वाले बैग में जीपीएस डिवाइस रखी होने की जानकारी भरतभाई को भी थी, इसलिए पुलिस को शक हुआ कि कहीं उसी ने लूट के लिए डिवाइस को बंद नहीं कर दिया था. इस का पता लगाने के लिए पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. प्रवीण का हिंदूराव अस्पताल में इलाज चल रहा था. वहां भी पुलिस का पहरा लगा दिया गया.

भरतभाई को हिरासत में लेने की बात अरविंदभाई को पता चली तो उन्हें हैरानी हुई कि पुलिस लुटेरों को पकड़ने के बजाय उन्हीं के कर्मचारी को परेशान कर रही है. उन्होंने पुलिस से भरतभाई के खिलाफ कोई काररवाई न करने की सिफारिश की. उन्होंने कहा कि भरत पिछले 6 महीने से उन की फर्म में काम कर रहा है. वह बहुत ही ईमानदार और वफादार है. वह उसे अच्छी तरह जानते हैं. इस तरह का काम वह हरगिज नहीं कर सकता. जीपीएस डिवाइस के बारे में उन्होंने बताया कि वह किसी वजह से अपने आप ही कभीकभी बंद हो जाती है.

फर्म मालिक के कहने पर पुलिस ने भरतभाई को छोड़ जरूर दिया, लेकिन उसे यह हिदायत दे दी थी कि जांच में जब भी उस की जरूरत पड़ेगी, वह हाजिर होगा. अब पुलिस टीमों ने दूसरी दिशा में जांच शुरू की. जिस तांगा स्टैंड के पास लूट की गई थी, वहां पर मार्केट एसोसिएशन की ओर से 3 सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. पुलिस को उम्मीद थी कि उन कैमरों में लुटेरों की फोटो जरूर कैद हो गई होगी. लेकिन पुलिस ने उन कैमरों की फुटेज के लिए मार्केट एसोसिएशन से सपंर्क किया तो पता चला कि 31 दिसंबर की रात 8 बजे से किसी वजह से सीसीटीवी सिस्टम बंद हो गया था. पुलिस को यहां भी शक हुआ कि यह सिस्टम इस घटना से कुछ घंटे पहले ही क्यों बंद हुआ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि इस सिस्टम की देखरेख करने वाले की लुटेरों से कोई सांठगांठ रही हो? लुटेरों के कहने पर उस ने सिस्टम को बंद कर दिया हो. पुलिस टीम ने इस बिंदु पर भी जांच की. मार्केट एसोसिएशन की तरफ से जो व्यक्ति सीसीटीवी सिस्टम को देखता था, उस से भी पुलिस ने पूछताछ की. उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स भी खंगाली, पर कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस को जांच में जिस बिंदु पर सफलता की उम्मीद नजर आती, उस पर भी जांच आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

जांच का अगला पड़ाव पुलिस ने काल डिटेल्स पर केंद्रित किया. पुलिस टीम ने पता किया कि घटना वाले दिन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड तांगा स्टैंड तक सुबह 6 बजे से 9 बजे तक कौनकौन से फोन नंबर सक्रिय रहे. यानी उस रूट पर उस दौरान कितने लोगों की फोन पर बातें हुईं. मोबाइल फोन कंपनियों के सहयोग से पुलिस ने यह डाटा इकट्ठा किया. इस डाटा को डंप डाटा कहा जाता है. इस डाटा में कई हजार नंबर निकले. उन हजारों फोन नंबरों से संदिग्ध नंबरों को छांटना आसान नहीं था. यह जिम्मेदारी उत्तरी जिला पुलिस मुख्यालय में कंप्यूटर औपरेटर हेडकांस्टेबल ए.के. वालिया को दी गई.

ए.के. वालिया को डंप डाटा खंगालने का एक्सपर्ट माना जाता है. उन्होंने उस डाटा से करीब 300 संदिग्ध नंबर निकाले. इस के अलावा पुलिस ने अरविंदभाई की फर्म में जितने भी कर्मचारी काम करते थे, उन सभी के फोन नंबर ले कर यह जानने की कोशिश की कि उन में से किसी की डंप डाटा के नंबरों से किसी पर उस समय बात नहीं हुई थी. लेकिन कर्मचारियों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला. उन हजारों फोन नंबरों में जो 3 सौ संदिग्ध नंबर निकाले गए थे, उन में से भी कोई ऐसा सूत्र नहीं मिला, जिस से लुटेरों तक पहुंचा जा सकता. यह जांच भी जहां से चली थी, वहीं ठहर गई.

भरतभाई ने पुलिस को बताया था कि बदमाश पल्सर और अपाचे मोटर- साइकिलों से आए थे. इन के बारे में पता करने के लिए पुलिस ने यह पता लगाया कि घटनास्थल से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बीच कहांकहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. पता चला कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर, स्टेशन के बाहर स्थित कई दुकानों पर और उसी रोड पर रास्ते में पड़ने वाले थाना नबी करीम के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. लुटेरों ने घटना को अचानक अंजाम नहीं दिया होगा. इस से पहले उन्होंने इस रूट पर रेकी की होगी. इसी बात को ध्यान में रख कर पुलिस ने सभी कैमरों की 15 दिन पुरानी फुटेज देखी.

फुटेज में घटना वाले दिन एक औटो के पीछे पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिल जाती दिखाई दी. उस दिन से एक दिन पहले भी वे दोनों मोटरसाइकिलें उसी रूट पर जाती दिखाई दीं, लेकिन फुटेज में उन के नंबर स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहे थे. 4-5 दिन पहले तक दोनों मोटरसाइकिलें उस रूट में कई बार आतीजाती दिखीं. उन मोटरसाइकिलों पर जो लोग बैठे थे, उन की कदकाठी भरतभाई और प्रवीण द्वारा बताए गए हुलिए से मेल खा रही थी.

इस के बाद पुलिस ने अपना ध्यान पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिलों पर लगा दिया. दिल्ली परिवहन विभाग की सभी अथौरिटियों में जितनी भी पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिलें रजिस्टर्ड थीं, पुलिस ने उन की जानकारी निकलवाई. पता चला कि दिल्ली में 40 हजार पल्सर और 20 हजार अपाचे मोटरसाइकिलें रजिस्टर्ड हैं. इतनी मोटरसाइकिलों की जांच करना आसान बात नहीं है. लिहाजा पुलिस ने अपने जिले की अथौरिटी से उक्त दोनों ब्रांड की मोटरसाइकिलों की डिटेल्स निकलवाई.

यहां 400 पल्सर और 150 अपाचे मोटरसाइकिलें रजिस्टर्ड थीं. इन सभी की डिटेल्स हासिल कर पुलिस ने जिन लोगों के नाम से गाडि़यां थीं, उन का उम्र के हिसाब से वर्गीकरण किया. ज्वैलरी का बैग लूटने वाले बदमाशों की जो उम्र थी, उस उम्र के मोटरसाइकिल वालों को छांटा गया. इस तरह के करीब 42 मोटरसाइकिल मालिक मिले. इन सभी के पतों पर जा कर पुलिस ने पता किया कि 2 जनवरी, 2016 को वे सुबह 7 से 9 बजे के बीच वे अपनी मोटरसाइकिल ले कर कहां थे. इस जांच में भी पुलिस के हाथ लुटेरों तक नहीं पहुंच सके.

उधर जिला पुलिस मुख्यालय में कंप्यूटर औपरेटर ए.के. वालिया डंप डाटा को खंगालने में जुटे थे. उस में से वोडाफोन के एक नंबर पर उन की नजर जम गई. वह नंबर उन्होंने एसीपी राजेंद्र प्रसाद गौतम को दिया. वह नंबर पश्चिमी दिल्ली के रघुवीरनगर की रहने वाली गुड्डी के नाम था. सबइंसपेक्टर संजय कुमार सिंह उस नंबर की जांच के लिए गए तो पता चला कि उस पते पर गुड्डी नाम की कोई महिला नहीं रहती. इस से साफ हो गया कि वह नंबर किसी फरजी आईडी पर लिया गया था.

जब किसी भी कंपनी का नया मोबाइल नंबर लिया जाता है तो कंपनियां फार्म पर ग्राहक का एक अल्टरनेट नंबर मांगती हैं. वोडाफोन कंपनी का जो नंबर लिया गया था, उस पर अल्टरनेट नंबर के रूप में रिलायंस कंपनी का एक नंबर लिखा था. वह नंबर महेंद्र सिंह का था, जो बी-492, मीतनगर, ज्योतिनगर, नंदनगरी, दिल्ली का रहने वाला था. एसआई संजय कुमार सिंह हैडकांस्टेबल अवधेश और अशोक को ले कर उस पते पर पहुंचे.

वहां महेंद्र सिंह मिल गया. पुलिस को देखते ही वह घबरा गया. पुलिस ने उसे हिरासत में ले कर सदर बाजार में हुए गहनों की लूट के बारे में पूछा तो उस ने इस लूट से मना करते हुए बताया कि वह तो नंदनगरी की ईएसआई डिसपेंसरी में नौकरी करता है. उसे किसी लूट की कोई जानकारी नहीं है. उस ने भले ही खुद को ईएसआईसी डिसपेंसरी का कर्मचारी बताया था, पर उस के हावभाव से साफ लग रहा था कि वह कुछ छिपा रहा है. पुलिस ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो आखिर उस ने मुंह खोल दिया. उस ने स्वीकार कर लिया कि 2 जनवरी को उसी ने अपने साथियों के साथ लूट की उस घटना को अंजाम दिया था.

पुलिस टीम पूछताछ के लिए उसे थाने ले आई. डीसीपी मधुर वर्मा को जब पता चला कि लूट वाला मामला खुल गया है तो वह भी थाने आ गए. उन के सामने जब महेंद्र सिंह से पूछताछ की गई तो गहनों के बैग की लूट का पूरा रहस्य उजागर हो गया. पता चला, उस में सवा करोड़ के गहने थे. गहनों के बैग की लूट की जो कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली थी. महेंद्र सिंह दिल्ली के ज्योतिनगर के रहने वाले तेजू सिंह का बेटा था. वह नंदनगरी स्थित कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) की डिसपेंसरी में अस्थाई सफाई कर्मचारी था. उसे वहां से जो वेतन मिलता था, उस से उस के परिवार का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था. इसलिए वह हमेशा मोटी कमाई के बारे में सोचा करता था. इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था.

महेंद्र को कहीं से पता चला कि चांदनी चौक में ऐसे तमाम लोग हैं, जो यहां से लाखों रुपए के गहने गुजरात ले जाते हैं और वहां से भी उसी तरह गहने दिल्ली आते हैं. उस ने सोचा कि अगर उन्हीं में से किसी को शिकार बना लिया जाए तो एक ही झटके में लाखों रुपए हाथ लग सकते हैं. इस के बाद वह यह पता लगाने लगा कि यह काम कौनकौन करते हैं. किसी जानकार ने उसे बताया कि दिल्ली के कूचा घासीराम में कई आंगडि़ए हैं, जो दिल्ली से बाहर गहने भेजते हैं. वहीं एक सरजू पंडित नाम का आदमी है, जो उन आंगडि़यों के बारे में अच्छी तरह से जानता है. क्योंकि वह उन्हें चायपानी पिलाता है. अगर सरजू पंडित को विश्वास में ले लिया जाए तो मोटा माल हाथ लग सकता है.

महेंद्र कूचा घासीराम के सरजू पंडित के पास पहुंच गया. उस ने पहले तो किसी जरिए उस से जानपहचान की. इस के बाद वह रोजाना उस से मिलने लगा. धीरेधीरे दोनों के बीच दोस्ती हो गई. जब दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई तो एक दिन महेंद्र ने सरजू को अपनी योजना के बारे में बता कर पैसों का लालच दे कर कि जो भी माल हाथ लगेगा, उस में से एक हिस्सा उसे दिया जाएगा, के बाद आंगडि़ए के बारे में पूछा. सरजू पंडित लालच में आ गया. 60 वर्षीय सरजू पंडित ने महेंद्र को प्रवीण कुमार के बारे में बताया ही नहीं, उसे पहचनवा भी दिया. प्रवीण कूचा घासीराम स्थित राजेश कुमार अरविंद कुमार आंगडि़या की फर्म में काम करता था. यह फर्म गहनों की कूरियर का काम करती थी.

दिल्ली के कुछ ज्वैलर्स इस फर्म द्वारा पुराने गहने अहमदाबाद भेज कर वहां से नए डिजाइन के तैयार गहने मंगाते थे. यह काम इस फर्म का कूरियर बौय भरतभाई करता था. वह हर 2 दिन बाद दिल्ली आता था. सरजू पंडित ने महेंद्र को पूरी बात बता तो दी, लेकिन महेंद्र यह फैसला नहीं कर सका कि कूरियर बौय भरतभाई से माल कैसे झटका जाए. महेंद्र का एक दोस्त था रोशन गुप्ता, जो विवेक विहार की झिलमिल कालोनी में रहता था. वह पेशे से ड्राइवर था. उस के 2 बच्चे थे, जो बड़े हो चुके थे. उन की शादी को ले कर वह काफी परेशान था. कुछ दिनों पहले उस ने मकान बनवाया था, जिस से उस पर ढाई लाख रुपए का कर्ज हो गया था. उसे इस बात की भी चिंता रहती थी कि वह कर्ज कैसे चुकाएगा.

महेंद्र ने लूट की योजना रोशन को समझाई तो पैसों की सख्त जरूरत की वजह से वह भी उस के साथ यह काम करने को तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने एक महीने तक उस रूट की रेकी की, जिस रूट से भरतभाई और प्रवीण माल ले कर नई दिल्ली स्टेशन आतेजाते थे. रेकी में रोशन ने अपनी स्प्लेंडर मोटरसाइकिल का उपयोग किया था. रूट को अच्छी तरह समझने के बाद बात हुई कि वारदात को कैसे अंजाम दिया जाए, क्योंकि इस में रिस्क था, इसलिए हथियारबंद लोगों का भी इस में शामिल होना जरूरी था. रोशन मनीष शर्मा और मोहम्मद आरिफ नाम के बदमाशों को जानता था. दोनों ही गाजियाबाद जिले के साहिबाबाद के रहने वाले थे.

मनीष शार्पशूटर था तो मोहम्मद आरिफ शातिर चाकूबाज. रोशन ने दोनों से बात की. वे राजी हो गए तो उन्हें भी योजना में शामिल कर लिया. दोनों बदमाशों को शामिल करने के बाद उन के दिमाग में बात आई कि ज्वैलरी लूटने के बाद मोटरसाइकिल से तुरंत भागना होगा. इस के लिए उन्हें भीड़भाड़ वाली जगह में भी तेजी से मोटरसाइकिल चलाने वाले 2 लोग चाहिए. इस बारे में आपस में चर्चा हुई तो मनीष शर्मा ने बताया कि वह जसपालदास उर्फ रिंकू को जानता है. वह भी साहिबाबाद में रहता है. पहले वह दिल्ली में क्लस्टर बस चलाता था. कुछ दिनों पहले उस ने नौकरी छोड़ा है. वह एक अच्छा बाइक रेसर है.

जसपाल को एक खतरनाक जानलेवा बीमारी थी, उसी के इलाज के लिए उसे पैसों की जरूरत थी. मनीष ने उसे लूट की योजना बताई तो वह भी तैयार हो गया. उस के पास चोरी की एक पल्सर मोटरसाइकिल भी थी. उन्हें एक मोटरसाइकिल चलाने वाला मिल गया था, एक की अभी और जरूरत थी. इस के लिए जसपाल ने अरुण नागर उर्फ बौबी से बात कराई. अरुण नागर मोटरसाइकिल से स्टंट करता था. वह बेरोजगार था. पैसों के लालच में वह भी उन के साथ काम करने को तैयार हो गया. अरुण ने भी किसी की अपाचे मोटरसाइकिल चुरा रखी थी, जिस की नंबर प्लेट बदल कर वह उसे खुद ही चलाता था.

पूरी टीम तैयार हो गई तो सभी ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कूचा घासीराम बाजार तक का कई बार चक्कर लगाया. इस के बाद इस बात पर विचार किया जाने लगा कि घटना को किस जगह अंजाम दिया जाए, जहां से वे आसानी से भाग सकें. काफी सोचनेविचारने के बाद कुतुब रोड पर तांगा स्टैंड के पास वारदात को अंजाम देना निश्चित किया गया. क्योंकि वहां जो दुकानें बनी थीं, वे सुबह के समय बंद रहती थीं और सामने की पार्किंग भी खाली रहती थी. सुनसान रहने की वजह से वहां से यूटर्न ले कर भागना आसान था. वारदात की जगह निश्चित करने के बाद इस बात का भी कई बार रिहर्सल किया गया कि बैग को छीन कर किस तरह वहां से भागना है.

महेंद्र और रोशन गुप्ता को इस बात की पुख्ता जानकारी मिल गई थी कि अहमदाबाद से माल ले कर भरतभाई अहमदाबाद-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रैस से 2 जनवरी को नई दिल्ली स्टेशन पर उतरेगा. उसे पता ही था कि भरतभाई को लेने प्रवीण कुमार आता है. वहां से दोनों औटो से औफिस जाते हैं. पूरा प्लान तैयार कर के महेंद्र, मनीष शर्मा, अरुण नागर उर्फ बौबी, रोशन गुप्ता, जसपाल उर्फ रिंकू और मोहम्मद आरिफ पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिलों से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए. महेंद्र ने सब से पहले रेलवे स्टेशन की इनक्वायरी से यह पता लगाया कि अहमदाबाद से नई दिल्ली आने वाली राजधानी एक्सप्रैस कब आ रही है.

वहां से उसे पता चला कि ट्रेन स्टेशन पर 8 बजे पहुंचेगी. भरतभाई को लेने के लिए सुबह 7 बज कर 40 मिनट पर प्रवीण स्टेशन पहुंच गया था. महेंद्र प्रवीण को पहचानता था, इसलिए वह कुछ दूरी से उस पर नजर रखने लगा, क्योंकि भरतभाई को ट्रेन से उतर कर उसी के पास आना था. कुछ देर बाद अहमदाबाद से चल कर नई दिल्ली आने वाली राजधानी एक्सप्रैस के दिल्ली पहुंचने की घोषणा हुई, महेंद्र सतर्क हो गया. स्टेशन से बाहर निकलने वाले यात्रियों को महेंद्र गौर से देख रहा था. जब उसे भरतभाई दिखा तो वह खुश हो गया. भरत के हाथ में एक बैग था. भरत को पहले से ही पता था कि प्रवीण कहां खड़ा हो कर उस का इंतजार करता है, इसलिए वह स्टेशन से बाहर सीधे उसी स्थान पर पहुंच गया, जहां प्रवीण खड़ा था.

प्रवीण ने एक औटो तय किया, जिस में दोनों बैठ गए. महेंद्र फुरती से उस जगह आ गया, जहां उस के साथी खड़े थे. महेंद्र ने उन्हें वह औटो दिखा दिया, जिस में भरत और प्रवीण बैठे थे. पल्सर को जसपाल उर्फ रिंकू चला रहा था और उस पर महेंद्र तथा मोहम्मद आरिफ बैठे थे. दूसरी मोटरसाइकिल अपाचे को अरुण नागर उर्फ बौबी चला रहा था, जिस पर मनीष शर्मा और रोशन गुप्ता बैठ गए. वे सभी उस औटो का पीछा करने लगे, जिस में भरतभाई और प्रवीण बैठे थे.

जैसे ही वह औटो तांगा स्टैंड के पास पहुंचा, जसपाल ने उसे ओवरटेक कर के रोक लिया. इस के बाद अरुण नागर ने अपाचे मोटर-साइकिल औटो के बराबर में खड़ी कर दी. औटोचालक सरोज पटेल समझ नहीं पाया कि उन लोगों ने ऐसा क्यों किया, क्योंकि उस से तो कोई गलती भी नहीं हुई थी. औटो रुकते ही आरिफ चाकू ले कर और मनीष शर्मा पिस्तौल ले कर भरतभाई और प्रवीण के पास पहुंच गए. महेंद्र ने भरत के हाथ से बैग छीनना चाहा तो उस ने बैग नहीं छोड़ा. तभी डराने के लिए आरिफ ने प्रवीण के पैर पर चाकू मार दिया. इसी के साथ महेंद्र ने ड्राइवर सरोज पटेल के 2 थप्पड़ जड़ दिए.

थप्पड़ लगते ही औटोचालक वहां से भाग कर सड़क के उस पार चला गया. प्रवीण और भरतभाई भी डर गए थे. महेंद्र ने भरतभाई के हाथ से बैग छीन कर रोशन को पकड़ाया तो वे फुरती से यूटर्न ले कर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर चले गए. वहां से गलियों में होते हुए वे शीला सिनेमा के सामने फ्लाईओवर के पास पहुंचे. जसपाल ने वहां पल्सर मोटरसाइकिल रोकी और एक औटोरिक्शा तय कर के उस में महेंद्र और आरिफ के साथ बैठ कर सीमापुरी बौर्डर चला गया. उन के पीछेपीछे अपाचे मोटरसाइकिल पर मनीष, अरुण और रोशन आ रहे थे.

वहां से वे जनकपुरी, साहिबाबाद पहुंचे. जनकपुरी में मनीष का एक प्लौट था, जिस में एक कमरा बना हुआ था. वह जगह सुनसान थी. वहां उन्होंने बैग खोल कर देखा तो उस में अलगअलग डिब्बों में सोने के गहने भरे थे. कुछ अंगूठियां, टौप्स और पैंडेंट ऐसे थे, जिन में हीरे जड़े थे. हीरे जड़ी सारी ज्वैलरी उन्होंने आपस में बांट ली. अब उन के सामने समस्या यह थी कि उन गहनों को कैसे और कहां बेचा जाए, क्योंकि गहने को बेचने पर पकड़े जाने की आशंका थी, इसलिए वे असमंजस में थे कि उसे कैसे ठिकाने लगाया जाए. तभी जसपाल ने कहा, ‘‘मेरे एक मौसा हैं किशनलाल, जो यहीं शालीमार गार्डन के रहने वाले हैं. अंडमान निकोबार में उन की गहनों की दुकान हैं. इस समय वह किसी परिचित की शादी में दिल्ली आए हुए हैं. गहनों को बेचने में वह मदद कर सकते हैं.’’

इस बात पर सभी तैयार हो गए तो जसपाल उर्फ रिंकू ने किशनलाल से बात की. उसने बताया कि सारे गहनों को पिघला कर अगर छड़ें बना दी जाए तो उन छड़ों को बाजार में आसानी से बेचा जा सकता है. सभी को यह सुझाव पसंद आया तो अगले दिन किशनलाल ज्वैलरी पिघलाने के लिए गैस बर्नर और अन्य सामान ले कर जनकपुरी के उसी प्लौट पर बने कमरे में पहुंच गया. किशनलाल ने पांच साढ़े पांच किलोग्राम सोने की ज्वैलरी को पिघला कर एक गोला बना दिया. वह गोला सोने की तरह चमकता हुआ न हो कर कुछ काले रंग का था. किशनलाल ने बताया कि इसे रिफाइंड कर के छड़ें बनानी पड़ेंगी. तब उन सभी ने किशनलाल से कह दिया कि इस गोले को वह अपने साथ ले जाएं और छड़ें बना दें.

किशनलाल उस गोले को ले गया. 3 दिन बाद आ कर उस ने कहा, ‘‘मैं ने उस गोले से अभी एक छड़ बनाई है, जो साढ़े 12 लाख रुपए की बाजार में बिकी है. जैसेजैसे छड़ें बनती जाएंगी, मैं उन्हें बेच कर तुम लोगों को पैसे देता रहूंगा.’’

किशनलाल से मिले साढ़े 12 लाख रुपयों में से एक लाख रुपए महेंद्र ने सरजू पंडित को दे दिए, जिस की सूचना पर उन्होंने घटना को अंजाम दिया था. बाकी के पैसे उन्होंने आपस में बांट लिए. महेंद्र से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 9 जनवरी को मनीष शर्मा, मोहम्मद आरिफ, अरुण नागर उर्फ बौबी, जसपाल उर्फ रिंकू, रोशन गुप्ता और सरजू पंडित को उन के ठिकानों से गिरफ्तार कर लिया. उन की निशानदेही पर पुलिस ने 2 पिस्तौलें, 7 जीवित कारतूस, साढ़े 12 लाख रुपए नकद, 18 डायमंड रिंग्स, 2 जोड़ी डायमंड टौप्स और एक डायमंड पैंडेंट के अलावा अपाचे मोटरसाइकिल बरामद कर ली थी.

किशनलाल को जब पता चला कि पुलिस ने जसपाल व अन्य लोगों को पकड़ लिया है तो वह फरार हो गया. पुलिस ने उस के ठिकाने पर भी छापा मारा था, लेकिन वह नहीं मिला. सभी अभियुक्तों से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि 6 सितंबर, 2015 को दिल्ली के कमला मार्केट इलाके में भी उन्होंने एक कूरियर बौय से 39 लाख रुपए के गहने लूटे थे. इस के अलावा 2 जुलाई, 2015 को देशबंधु गुप्ता रोड पर ढाई लाख रुपए की नकदी लूटी थी.

इन 2 मामलों के खुलासे के बाद पुलिस को लगा कि इस गैंग ने राजधानी में और भी वारदातें की होंगी, इसलिए पुलिस ने 10 जनवरी, 2016 को इन सभी अभियुक्तों को तीसहजारी कोर्ट में ड्यूटी एमएम श्री आर.के. पांडेय के समक्ष पेश किया. उस समय उन्होंने सभी अभियुक्तों को एक दिन के लिए जेल भेज दिया. अगले दिन सभी अभियुक्तों को महानगर दंडाधिकारी अंबिका सिंह की कोर्ट में पेश किया, जहां से पुलिस ने उन्हें 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. Delhi Robbery Case

कथा लिखे जाने तक पुलिस सभी अभियुक्तों से पूछताछ कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story Hindi: गलतफहमी ने बनाया दोस्त को दुश्मन

Crime Story Hindi: सजल और निश्चल गहरे दोस्त थे. निश्चल की प्रेमिका राखी ने उस से दूरियां बनानी शुरू कीं तो निश्चल को लगा कि उस की प्रेमिका को सजल ने ही उस के खिलाफ भड़काया है. इस गलतफहमी के चलते उस ने एक ऐसी खतरनाक योजना बनाई कि…

दोस्ती में आदमी एकदूसरे की आदतों, बातों और इरादों से अच्छी तरह परिचित हो जाता है. उस बीच दोनों एकदूसरे को काफी हद तक जान चुके होते हैं. दोस्ती की इसी पगडंडी पर चलते हुए शुरू किया गया प्यार का सफर लंबा चलता है. निश्चल ने भी राखी के साथ प्यार के खुशनुमा सफर की शुरुआत दोस्ती के बाद ही की थी. उन का प्यार इतनी गहराई तक पहुंच गया था कि उन्होंने ख्वाबों का एक महल भी बना लिया था, लेकिन एक दिन निश्चल को अचानक अपने ख्वाब तब टूटते नजर आए, जब राखी की बातों में अचानक बेरुखी की हवाएं तैरने लगीं.

पहले तो निश्चल ने प्रेमिका की बेरुखी को नजरंदाज करने की कोशिश की, लेकिन एक दिन तो हद हो गई. उस दिन उस ने आदतन राखी के मोबाइल पर फोन किया तो उस ने बड़ी बेरुखी से कहा, ‘‘कहो, किसलिए फोन किया है?’’

राखी के इस व्यवहार पर निश्चल पहले तो हैरान हुआ, फिर भी उस की बेरुखी को नजरअंदाज करते हुए बड़े प्यार से बोला, ‘‘कैसी बात कर रही हो, अपने प्यार से बात करने की भी कोई वजह होती है क्या. दिल ने याद किया तो मैं ने तुम्हारा नंबर मिला दिया.’’

‘‘वह तो ठीक है निश्चल, पर मैं चाहती हूं कि अब हमारा इस तरह ज्यादा बातें करना ठीक नहीं है.’’ राखी ने उसी लहजे में जवाब दिया.

राखी की इन बातों और व्यवहार से निश्चल का दिमाग घूम गया. उस ने कहा, ‘‘राखी, तुम्हें क्या हो गया है. तुम ये कैसी अजीब बातें कर रही हो?’’

‘‘मैं जो कह रही हूं, ठीक ही कह रही हूं. अब पता नहीं तुम्हें यह सब अजीब क्यों लग रहा है.’’ राखी तुनक कर बोली.

‘‘मैं एक बात कहूं राखी?’’ निश्चल ने कहा.

‘‘हां, कहो.’’

‘‘मैं पिछले 2-3 दिनों से महसूस कर रहा हूं कि तुम काफी बदल सी गई हो. बताओ मुझ से ऐसी क्या गलती हो गई है?’’ निश्चल ने माहौल सामान्य करने की गरज से कहा.

‘‘ऐसी तो कोई बात नहीं है निश्चल. फिर भी तुम्हें ऐसा लगता है तो मैं भला इस में क्या कर सकती हूं.’’ राखी ने निराश करने वाले अंदाज में कहा.

‘‘क्या तुम मेरे प्यार का इम्तिहान ले रही हो?’’ निश्चल ने पूछा.

‘‘मैं कौन होती हूं ऐसा करने वाली. वैसे भी मुझे अभी बहुत काम है. अब हम बाद में बात करेंगे. ओके बाय.’’ कहने के साथ ही राखी ने फोन काट दिया.

निश्चल यह सोचसोच कर परेशान था कि राखी को अचानक न जाने ऐसा क्या हो गया है, जो वह इस तरह का व्यवहार करने लगी है. उसी दौरान उस के दिमाग में आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि राखी को उस की वे बातें पता चल गई हों, जो राज बनी रहनी चाहिए थीं. इस के बाद वह यह सोचने लगा कि राखी को ऐसी बातें भला कौन बताएगा? इस पर उस ने सोच के घोड़े दौड़ाए तो कुछ देर बाद गहरी सांस ले कर हलके से बुदबुदाया, ‘ओह, अब समझ में आया, सजल ने ही राखी को उस के बारे में बताया होगा.’

अपने इस खयाल की पुष्टि के लिए उस ने फिर से राखी का मोबाइल मिलाया तो राखी ने पूछा, ‘‘अब क्या हुआ, मैं ने कहा तो था कि बाद में बात करेंगे.’’

‘‘राखी, मुझे एक बात पूछनी थी.’’ निश्चल बोला.

‘‘बताओ क्या पूछना है?’’

‘‘मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या तुम्हारी सजल से कोई बात हुई थी?’’ निश्चल ने पूछा.

‘‘हां, हुई तो थी, लेकिन इस में बुरा क्या है. वह तुम्हारा अच्छा दोस्त है.’’ राखी ने कहा.

‘‘मुझे लगता है कि उसी ने मेरे बारे में तुम से कुछ उलटीसीधी बातें की हैं, तभी तुम बदल गई हो.’’ निश्चल ने अपने मन की बात कही.

‘‘सौरी निश्चल, मैं इस बारे में कोई कमेंट नहीं करना चाहती.’’

राखी बात को खींचना नहीं चाहती थी, इसलिए उस ने बात को यहीं विराम देना चाहा.

लेकिन निश्चल राखी से सच्चाई जानना चाहता था, इसलिए उस ने पूछा, ‘‘तो फिर इस बेरुखी की वजह क्या है, यह तो बता दो?’’

‘‘मैं कुछ नहीं बताना चाहती, बाय.’’ पीछा छुड़ाते हुए राखी ने अपनी बात खत्म कर दी.

निश्चल उस के इस रूखे और उपेक्षित व्यवहार से ठगा सा रह गया. निश्चल अरोड़ा उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के कस्बा बेहट की संजय कालोनी निवासी रमेश अरोड़ा का बेटा था. राखी भी उसी कालोनी में रहती थी. कुछ महीने पहले ही दोनों के बीच दोस्ती के बाद प्यार हो गया था. दोनों अकसर मोबाइल पर लंबीलंबी बातें और चैटिंग किया करते थे. राखी के प्यार से निश्चल की जिंदगी में जैसे बहार आ गई थी. लेकिन राखी का अचानक बदला रुख उसे परेशान करने लगा था. उस का ही एक दोस्त था सजल चुघ.

25 वर्षीय सजल की कस्बे में ही छोटे चौक पर पुश्तैनी किराने की दुकान थी. वह एक प्रतिष्ठित परिवार से था. उस के पिता राजेंद्र चुघ दुकान संभालते थे, जबकि चाचा मुकेश चुघ व्यापारी नेता थे. सजल व निश्चल न सिर्फ गहरे दोस्त थे, बल्कि वे एकदूसरे के हमराज भी थे. इसी दोस्ती के नाते निश्चल ने उस का परिचय अपनी प्रेमिका राखी से करा दिया था. सजल निश्चल की गैरमौजूदगी में भी कभीकभी राखी से बातें कर लिया करता था. इसीलिए राखी के बदले रवैए के पीछे निश्चल यह मान बैठा था कि सजल ने ही उस के बारे में राखी से कोई ऐसी बात कह दी होगी, जिस से राखी उस से दूरियां बना रही है.

जिंदगी के बहुत मौकों पर इंसान गलतफहमियों का शिकार हो जाता है. गहरे दोस्त होने के नाते निश्चल को यूं तो अपने मन में पल रही गलतफहमियों को बातचीत के जरिए दूर कर लेना चाहिए था, लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया. वह दोस्ती में ऐसी बातें कर के खुद को छोटा साबित नहीं करना चाहता था. अलबत्ता वह मन ही मन सजल से नाराज रहने लगा था. इतना ही नहीं, उस ने उस के खिलाफ एक खतरनाक योजना तक बना डाली थी.

12 नवंबर, 2015 की रात को सजल दुकान बंद कर के घर आया और करीब सवा 8 बजे अपने दादा बाबूराम चुघ से घूमने जाने की बात कह कर घर से निकल गया. वह अकसर इसी तरह जाता था. लेकिन वह आधे घंटे बाद घर वापस आ जाता था, जब उस दिन 2 घंटे बाद भी वह वापस नहीं आया तो घर वालों ने उस के मोबाइल पर फोन किया. उस का फोन स्विच्ड औफ मिला. सजल के पास एक और मोबाइल फोन था. घर वालों ने उस फोन का नंबर मिलाया. उस पर घंटी तो जा रही थी, लेकिन वह फोन रिसीव नहीं कर रहा था. घर वालों ने 2-3 बार उस नंबर पर फोन किया. हर बार घंटी बजती रही, लेकिन फोन नहीं उठा.

इस के बाद घर के सभी लोग सजल को ढूंढ़ने निकल पड़े. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. रात में कई बार उसे फोन किया गया, लेकिन उस ने एक भी फोन का जवाब नहीं दिया. उस की चिंता में घर वाले रात भर जागते रहे. अगली सुबह उस का दूसरा मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ हो गया. उस के इस तरह अचानक लापता होने का कारण किसी की समझ में नहीं आ रहा था. सजल के करीबी दोस्त निश्चल अरोड़ा और अनुज सक्सेना भी परेशान थे.

सभी लोगों को यही लग रहा था कि किसी ने फिरौती के लिए उस का अपहरण कर लिया है. जब कहीं से सजल के बारे में कुछ पता नहीं चला तो उस के पिता राजेंद्र चुघ अपने रिश्तेदारों के साथ थाना कोतवाली पहुंचे और थानाप्रभारी नरेश चौहान से मिल कर सजल की गुमशुदगी दर्ज करा दी. मामला एक प्रतिष्ठित व्यापारी के बेटे के लापता होने का था, इसलिए पुलिस भी इस मामले को ले कर चिंतित थी. उसी दिन पुलिस को सूचना मिली कि बेलका गांव के पास बेहट शाकुंभरी मार्ग पर ऋषिपाल के आम के बाग में एक युवक की लाश पड़ी है.

खबर मिलते ही नरेश चौहान पुलिस टीम के साथ उस बाग में पहुंच गए. वह लाश एक 24-25 साल के लड़के की थी. शव खून से लथपथ था. देख कर ही लगता था कि उस के सिर पर गोली चलाई गई थी. शव के नजदीक ही 2 मोबाइल पड़े थे. एक मोबाइल की बैटरी निकली हुई थी, जबकि दूसरा स्विच्ड औफ था. उसी दिन व्यापारी राजेंद्र चुघ ने अपने बेटे सजल की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. उन्होंने उस का जो हुलिया बताया था, वह उस मृत युवक से मेल खा रहा था. यह लाश कहीं सजल की तो नहीं है, जानने के लिए थानाप्रभारी ने फोन कर के राजेंद्र चुघ को बाग में ही बुला लिया. राजेंद्र चुघ अपनी पत्नी के साथ वहां पहुंचे तो लाश देखते ही रो पड़े. उन की पत्नी को तो इतना सदमा पहुंचा कि वह बेहोश हो गईं.

राजेंद्र चुघ ने उस लाश की पहचान अपने बेटे सजल के रूप में की. उन्होंने बताया कि दोनों मोबाइल सजल के ही हैं. शव के पास लाल रंग की एक हवाई चप्पल पड़ी थी, जो मृतक की नहीं थी. पुलिस ने सोचा कि शायद यह हत्यारे की है. मामला हत्या का था, इसलिए सूचना पा कर एसपी चरण सिंह यादव, एसपी (देहात) जगदीश शर्मा भी वहां पहुंच गए थे. उन्होंने भी मौकामुआयना किया. शव के आसपास किसी वाहन के टायरों के निशान भी थे. सजल की हत्या से कस्बे में सनसनी फैल गई थी. हत्या के विरोध में कस्बे के बाजार बंद हो गए. सैकड़ों व्यापारी घटनास्थल पर जमा हो गए. सभी व्यापारी हत्यारों को जल्द गिरफ्तार करने की मांग कर रहे थे.

पुलिस ने व्यापारियों को समझाबुझा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया. एसएसपी राजेंद्र प्रसाद यादव ने नरेश चौहान को केस का जल्द से जल्द खुलासा करने को कहा. इस के अलावा उन्होंने क्राइम ब्रांच के तेजतर्रार इंसपेक्टर संजय पांडेय को भी इस केस की जांच में लगा दिया. पुलिस टीम हत्या की वजह तलाशने में जुट गई. पुलिस ने मृतक के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी से कोई रंजिश होने से इंकार कर दिया. एक बात साफ थी कि हत्यारे सजल के करीबी थे. क्योंकि इतनी दूर उन के साथ वह अपनी मरजी से ही गया था.

जवान बेटे की मौत से चुघ परिवार में कोहराम मचा था. पुलिस अच्छी तरह जानती थी कि अगर केस का खुलासा नहीं हुआ तो बड़ा बखेड़ा खड़ा होगा, इसलिए पुलिस हत्यारों की तलाश में लग गई. अगले दिन पुलिस को कुछ लोगों से पता चला कि 12 नवंबर की रात को उन्होंने सजल के साथ निश्चल और अनुज को जाते देखा था. इस खबर की पुष्टि के लिए पुलिस ने सजल के मोबाइल की लोकेशन के साथ निश्चल और अनुज के मोबाइल की लोकेशन निकलवाई.

तीनों के मोबाइल फोनों की लोकेशन साथसाथ पाई गई. शक पुख्ता होने पर नरेश चौहान ने निश्चल और अनुज को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने सजल की हत्या में अपना हाथ होने से साफ इंकार कर दिया. लेकिन जब मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर उन से पूछताछ की तो वे ज्यादा देर तक पुलिस को गुमराह नहीं कर सके. उन्हें सच बोलने पर मजबूर होना पड़ा. इस के बाद उन्होंने सजल की हत्या का चौंकाने वाला राज उगला. पता चला कि महज गलतफहमी में एक दोस्त दूसरे की जान का दुश्मन बन गया था.

दरअसल, निश्चल अपनी प्रेमिका राखी के व्यवहार में आए बदलाव की वजह नहीं समझ पाया था. इस बात को ले कर वह परेशान रहने लगा था. एक दिन उस ने राखी से जिद कर के पूछने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘राखी, तुम इतनी बदल क्यों गई हो?’’

‘‘निश्चल, ऐसा तुम्हें लगता है तो बताओ भला मैं क्या कर सकती हूं.’’ राखी ने टालने वाले अंदाज में कहा.

‘‘नहीं, कोई तो वजह है. वह वजह क्या है, आज तुम्हें बतानी ही होगी.’’ निश्चल ने दबाव डालते हुए पूछा.

‘‘कोई वजह नहीं है निश्चल. मैं तुम से और ज्यादा बात करना नहीं चाहती. इसलिए आगे से तुम इस बात का ध्यान रखना.’’ राखी ने दो टूक जवाब दिया.

राखी की यही बेरुखी उस पर बिजली बन कर गिरी थी. रहरह कर उस के दिमाग में यह बात आती रहती थी कि इस के पीछे सजल ही जिम्मेदार है. वही राखी को उस के खिलाफ भड़काने का काम कर रहा है.

बस, वह मन ही मन सजल से रंजिश रखने लगा. उसे यह गलतफहमी हो गई कि सजल राखी को भड़का कर उस की खुशियों को छीनने का काम कर रहा है. सजल को सबक सिखाने के लिए निश्चल ने एक खतरनाक योजना बना डाली. अपने दोस्त अनुज सक्सेना को भी उस ने अपनी इस योजना में शामिल कर लिया. यह योजना थी सजल की हत्या की. उस की हत्या के लिए उस ने एक तमंचे और कुल्हाड़ी का भी इंतजाम कर लिया. वह सजल से लगातार मिलता रहा और अपने इरादों को बिलकुल भी जाहिर नहीं होने दिया. वैसे भी जब कोई अजीज दोस्त हो तो उस के इरादों को भांपना मुश्किल हो जाता है. सजल भी दोस्ती के विश्वास में निश्चल के इरादों से पूरी तरह अंजान था.

12 नवंबर, 2015 की रात सजल घर से घूमने के लिए निकला तो उसे रास्ते में निश्चल व अनुज मिल गए. निश्चल चूंकि जानता था कि सजल रात में घूमने के लिए घर से रोजाना निकलता है, इसलिए पहले से ही वह अपनी आल्टो कार संख्या यूपी 16 एक्स-1015 लिए रास्ते में खड़ा था. निश्चल और अनुज के इस तरह मिलने पर सजल को हैरानी नहीं हुई. कुछ देर में घूम कर आने की बात कह कर उन्होंने सजल को अपनी कार में बैठा लिया. सजल को अपने दोस्तों पर जरा भी शक नहीं हुआ. वे कार से ऋषिपाल के आम के बाग में पहुंच गए. उस वक्त वहां बिलकुल सुनसान था.

अनुज ने सजल को बातों में लगा लिया तो उसे बीच निश्चल ने तमंचा निकाल कर उस के सिर को टारगेट कर के गोली चला दी. गोली लगते ही सजल नीचे गिर गया और उस की मौत हो गई. अनुज ने भी तमंचा ले कर एक गोली और उस पर चलाई. सजल की हत्या करने के बाद उन्होंने सजल के दोनों मोबाइल फोन उस की जेब से निकाल कर वहीं फेंक दिए. फेंकते समय ही एक मोबाइल की बैटरी निकल गई थी. सजल की हत्या कर के वे जल्दी से वहां से भागे, जिस से निश्चल की एक चप्पल वहीं छूट गई थी. घटनास्थल से कुछ दूर जा कर उन्होंने एक खेत में तमंचा व कुल्हाड़ी छिपा दी और अपनेअपने घर चले गए.

अगली सुबह तक सजल के लापता होने की खबर फैल चुकी थी. चूंकि वे उस के गहरे दोस्त थे, इसलिए सजल को ढुंढवाने का उन्होंने भी बराबर नाटक किया. सजल का शव मिलने पर वे भी घटनास्थल पर पहुंचे. दोनों ने सोचा था कि उन्हें सजल के साथ जाते हुए किसी ने नहीं देखा. लेकिन गांव के ही किसी व्यक्ति ने उन्हें सजल के साथ जाते देख लिया था. उसी के आधार पर वे पुलिस की गिरफ्त में आ गए. एसपी देहात जगदीश शर्मा और सीओ चरण सिंह भी थाने आ गए थे. पुलिस ने तमाम लोगों की मौजूदगी में हत्याकांड का खुलासा किया.

जब कस्बे के लोगों को पता चला कि सजल की हत्या किसी और ने नहीं, उस के खास दोस्तों ने की थी तो सब हैरान रह गए. पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर खेत से हत्या में प्रयुक्त 315 बोर का तमंचा, खाली कारतूस और एक कुल्हाड़ी बरामद कर ली थी. हत्या में प्रयुक्त की गई कार भी पुलिस ने बरामद कर ली थी. विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें नहीं हो सकी थी.

निश्चल ने गलतफहमी को दिल से नहीं लगाया होता और सजल दोस्त के इरादों को भांप गया होता तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती. न सजल दुनिया से जाता और न उस के दोस्त जेल जाते. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, राखी बदला हुआ नाम है.

Love Story: जी नहीं पाए प्यार करने वाले

Love Story: नरेश और भारती शादी कर के एकदूसरे के साथ जिंदगी बिताना चाहते थे. लेकिन जाति ने उन का यह सपना ही नहीं चकनाचूर किया, जिंदगी ही लील ली.

आगरा का एक छोटा सा गांव है नगला लालजीत, जिस की आबादी मुश्किल से 5 सौ होगी. इस में कुशवाहा ज्यादा हैं, जबकि ठाकुरों के सिर्फ 4 घर हैं. इन में एक घर है हुकुम सिंह का. उन के परिवार में पत्नी शांति के अलावा 5 बेटे और एक बेटी थी. उन का सब से छोटा बेटा था नरेश, जो किसी मोबाइल कंपनी में सेल्समैन था. इसी गांव का रहने वाला गिरिराज कुशवाहा शादीब्याह में खाना बनाने का ठेका लेता था. उस के परिवार में पत्नी जलदेवी के अलावा 3 बेटियां सीमा, रोशनी, भारती और 2 बेटे देवेश तथा योगेश थे.

सीमा की शादी उस ने देवी रोड निवासी शैलेंद्र के साथ की थी तो उस से छोटी रोशनी की शादी आगरा के रहने वाले बंटू से. तीसरी बेटी भारती का अभी विवाह नहीं हुआ था. यह कहानी गिरिराज की इसी तीसरी बेटी भारती की है. एक साल पहले तक हुकुम सिंह और गिरिराज कुशवाहा सुखशांति से रह रहे थे. उन के घरों के बीच ज्यादा दूरी नहीं थी. छोटा सा गांव है, इसलिए गांव का हर कोई एकदूसरे को जानता ही नहीं था, बल्कि सभी रिश्ते की डोर से बंधे थे, चाहे वह किसी भी जाति के हों.

भारती मात्र आठवीं तक पढ़ी थी, क्योंकि इस से आगे वह न पढ़ना चाहती थी और न ही गिरिराज उसे पढ़ाना चाहता था. लेकिन एक पढ़ाई वह मांबाप से छिपछिप कर जरूर पढ़ रही थी. और वह थी इश्क की. इस पढ़ाई में उस के साथ था हुकुम सिंह का सब से छोटा बेटा नरेश. किसी दिन नरेश और भारती की नजरें टकराईं तो उन के दिलों की धड़कनें बढ़ गईं. दोनों अलगअलग जाति के थे, लेकिन इश्क करने वाले कहां इस की परवाह करते हैं. प्यार दोनों को करीब ले आया और वे लुकछिप कर मिलने लगे.

उन्हें मिलने में परेशानी भी नहीं होती थी, क्योंकि आजकल लगभग सभी के पास मोबाइल फोन है ही. यही मोबाइल फोन उन की भी मिलने में मदद कर रहा था. उन्हें जब मिलना होता, फोन कर के समय और जगह तय करते, उस के बाद तय समय और जगह पर मिल लेते. भारती और नरेश प्यार ही नहीं कर बैठे, साथ जीने और मरने की कसमें भी खा लीं, लेकिन उन की जाति अलगअलग थी, इसलिए उन्हें पता था कि उन का यह सपना आसानी से पूरा नहीं होगा. इसलिए कभीकभी भारती नरेश से पूछती भी थी कि समाज के डर से कहीं वह उसे छोड़ तो नहीं देगा?

तब नरेश कहता, ‘‘भारती, मैं अपने घर वालों को छोड़ सकता हूं, पर तुम्हें नहीं छोड़ सकता.’’

नरेश भले ही भारती को हर तरह से साथ देने का आश्वासन देता था, पर वह जानता था कि यह सब इतना आसान नहीं है. गांव में, वह भी दूसरे जाति की लड़की से शादी करना बहुत ही मुश्किल काम है. लेकिन उस का प्यार दीवानगी की हद तक पहुंच चुका था, इसलिए उस की अच्छाबुरा सोचने की समझ ही खत्म हो चुकी थी. न उसे घरपरिवार दिखाई दे रहा था और न समाज. उसे परिणाम की भी चिंता नहीं थी. नरेश और भारती भले ही लुकछिप कर मिल रहे थे, लेकिन उन का यह प्यार गांव वालों की नजरों से छिपा नहीं रह सका. फिर एक दिन वही हुआ, जिस का डर था. भारती फोन पर नरेश से बातें कर रही थी, तभी गिरिराज ने उस की कुछ बातें सुन लीं. उस ने पूछा, ‘‘किस से बातें कर रही है?’’

जवाब में भारती कुछ कहती, गिरिराज ने उस के हाथ से मोबाइल छीन लिया. उस में नरेश की फोटो लगी देख कर उस ने अपना सिर पीट लिया. उसे समझते देर नहीं लगी कि बेटी आशिकी में फंस गई है.

‘‘यह सब क्या है?’’ गिरिराज ने फोटो दिखाते हुए पूछा, ‘‘तू नरेश से क्यों बातें करती है?’’

भारती अंजान बनते हुए बोली, ‘‘पापा मैं तो अपनी सहेली से बातें कर रही थी, कभीकभी नेटवर्क की गड़बड़ी की वजह से किसी दूसरे को फोन ही नहीं लग जाता, बल्कि उस का फोटो भी आ जाता है.’’

गिरिराज इतना बेवकूफ नहीं था, जितना भारती समझ रही थी. उस ने पूछा, ‘‘पहले तो यह बता, नरेश का नंबर तेरे मोबाइल में कैसे आया?’’

‘‘पड़ोसी है, अब पड़ोसी का नंबर मोबाइल में नहीं आएगा तो क्या दूसरे गांव वालों का आएगा?’’ भारती रुआंसी हो कर बोली.

गिरिराज को लगा कि वह बेटी के साथ ज्यादती कर रहा है. जब मोबाइल है तो उस में नंबर तो होंगे ही. रही बात नरेश की तो वह गांव का ही नहीं है, पड़ोसी भी है. मोबाइल का काम भी करता है. इसलिए उस का नंबर भारती के पास है तो बुरा क्या है. वह चुप हो गया. गिरिराज भले ही चुप हो गया, लेकिन भारती कहां चुप होने वाली थी. वह उसी दिन नरेश से मिली और पूरी बात बता कर बोली, ‘‘आज तो किसी तरह बच गई, लेकिन इस तरह कब तक चलेगा. जो कुछ भी करना है, जल्दी करो.’’

नरेश ने कहा, ‘‘पहले तो हम घर वालों से कहेंगे कि वे हमारी शादी कर दें. नहीं करेंगे तो मैं तुम्हें ले कर कहीं दूर चला जाऊंगा, जहां घर वाले पहुंच ही नहीं पाएंगे.’’

भारती को नरेश पर पूरा विश्वास था, वह उस से अलग होना भी नहीं चाहती थी, इसलिए वह उस के साथ भागने को तैयार थी. लेकिन जब एक दिन गिरिराज ने बेटी को नरेश के साथ देख लिया तो उसे ममझते देर नहीं लगी कि बेटी ने उस से झूठ बोला था. उस ने पत्नी से कहा, ‘‘भारती पर नजर रखो, उस का घर से बाहर निकलना बंद कर दो, वरना यह हमारी नाक कटवाने वाली है.’’

इस के बाद भारती पर नजरों के पहरे लग गए. उस का बाहर आनाजाना बंद कर दिया गया.

यही नहीं, सोचविचार कर गिरिराज ने बड़े दामाद शैलेंद्र को फोन कर के बुलाया और पूरी बात बता दी. इस पर शैलेंद्र ने कहा, ‘‘आप नरेश के पिता से मिलें और उन से कहें कि वह बेटे को समझाएं.’’

गिरिराज ने हुकुम सिंह से शिकायत की तो उन्होंने नरेश को समझाने का आश्वासन ही नहीं दिया, बल्कि समझाया भी. लेकिन नरेश को तो जैसे ऐसे ही मौके की तलाश थी. उस ने कहा, ‘‘पापा, मैं भारती से प्यार करता हूं और उस से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग तो ठीक है,’’ हुकुम सिंह ने उसे डांटा, ‘‘ऐसा कतई नहीं हो सकता. एक तो वह गांव की है, दूसरे दूसरी जाति की है. तुम जानते हो गांव में ठाकुरों के सिर्फ 4 ही घर हैं. कुशवाहा ज्यादा हैं. अगर कुछ उल्टासीधा किया तो इस का खामियाजा पूरे परिवार को भुगतना पड़ेगा.’’

बाप की इस बात से नरेश की समझ में आ गया कि भारती को भगा कर ले जाना ठीक नहीं है. क्योंकि अगर वह उसे भगा कर ले गया तो गांव के कुशवाहा उस के घर वालों का जीना हराम कर देंगे. अब उसे गांव में ही रह कर अपने और भारती के घर वालों को मनाना होगा. नरेश ने गिरिराज को संदेश भिजवाया कि वह भारती से प्यार करता है और शादी करना चाहता है. वह वादा करता है कि भारती को खुश रखेगा. लेकिन जब यह संदेश गिरिराज को मिला तो वह उबल पड़ा. उस ने नरेश को तो कुछ नहीं कहा, लेकिन भारती की जम कर पिटाई कर दी. उस का कहना था कि उसी की वजह से आज उसे यह दिन देखना पड़ा है.

भारती की बहनों और बहनोइयों ने भी उसे समझाया. लेकिन उस ने साफ कह दिया कि वह शादी करेगी तो नरेश से, वरना पूरी जिंदगी कुंवारी रहेगी. हुकुम सिंह और उन की पत्नी शांति भी नरेश को समझा रहे थे कि वह ऐसा कोई काम न करे, जिस से परिवार को परेशानी हो. इस आशिकी की वजह से दोनों परिवारों में काफी तनाव था. गांव भी इस आशिकी से अंजान नहीं था. गिरिराज ने बदनामी से बचने के लिए दिसंबर के पहले सप्ताह में गांव की पंचायत बुलाई. पंचायत में दोनों ही बिरादरी के लोग शामिल थे. सभी इस शादी के खिलाफ थे, इसलिए सभी ने नरेश और भारती को समझाया कि वे ऐसा न करें. उन के ऐसा करने से गांव की बदनामी तो होगी ही, आने वाली पीढ़ी पर भी इस का बुरा असर पड़ेगा.

लेकिन नरेश और भारती उन की बातों से सहमत नहीं थे. उन का कहना था कि वे नए जमाने के लोग हैं. वे अपनी खुशी देखते हैं, परंपरा नहीं. इस पर बुजुर्गों ने उन्हें डांट कर चुप करा दिया और कहा कि वे जो चाहते हैं, वैसा कतई संभव नहीं है.

‘‘तो फिर ठीक है, आप सभी हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए. हम अपनीअपनी दुनिया में एकदूसरे की यादों के सहारे जी लेंगे.’’ भारती ने कहा.

इस पर कुशवाहा नाराज हो गए. उन का कहना था कि बेटी को अविवाहित कैसे रखा जा सकता है. लेकिन भारती का बागी सुर मुखर हो उठा, ‘‘कुछ भी हो, मैं नरेश के अलावा किसी और से शादी नहीं कर सकती.’’

दोनों की जिद को देखते हुए पंचायत ने फैसला किया कि इन्हें गांव से बाहर रिश्तेदारियों में भेज दिया जाए. गिरिराज को लगा कि बेटी ने उस का सिर झुका दिया है, इसलिए उस ने पंचायत के सामने कहा, ‘‘अगर ऐसा कुछ हुआ तो वह दोनों को काट कर रख देगा.’’

ठाकुरों ने कोई जवाब नहीं दिया. उन का सोचना था कि कुछ दिन दोनों अलग रहेंगे तो सब ठीक हो जाएगा. उस समय यह किसी ने नहीं सोचा था कि गिरिराज ने जो कहा है, वह सचमुच ही वैसा कर डालेगा.

जो छिपा था, इस पंचायत के बाद पूरी तरह खुल गया. नरेश और भारती जो अब तक लुकछिप कर मिलते थे, वे खुलेआम मिलने लगे. शांति को बेटे की जान खतरे में लगी तो उस ने उसे बेटी के पास दिल्ली भेज दिया. लेकिन पंचायत में जो हुआ था, उस से गिरिराज को लग रहा था कि उस की मूंछें नीची हो गई हैं. मूंछें उठाने के लिए उसे कुछ करना ही होगा. उस ने अपनी जाति के कुछ लोगों से बात की तो उन्होंने कहा कि बेटी को खत्म कर दो, सारा झंझट खत्म हो जाएगा. इज्जत भी बच जाएगी.

गिरिराज ने भारती को खत्म करने का इरादा तो बना लिया, लेकिन उसे लगा कि भारती की हत्या पर नरेश चुप नहीं बैठेगा. क्योंकि वह उसे जान से ज्यादा प्यार करता है. भारती की मौत का संदेह होते ही वह पुलिस के पास पहुंच जाएगा. जब इस बात पर गहराई से विचार किया गया तो उस के बड़े दामाद शैलेंद्र ने कहा, ‘‘दोनों को खत्म कर देते हैं. किसी ठाकुर में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह पुलिस के पास जा कर शिकायत करेगा.’’

दामाद की बात गिरिराज को भी उचित लगी. लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था. गांव में कत्ल करने पर वे पकड़े जा सकते थे. इसलिए योजना बनी कि कहीं दूर ले जा कर दोनों को मारा जाए. इस के लिए भारती को विश्वास में लेना जरूरी था. घर वालों ने कोशिश भी शुरू कर दी. लेकिन भारती को विश्वास नहीं हो रहा था. उसे विश्वास तब हुआ, जब जलदेवी उस के लिए शादी का जोड़ा खरीद कर ले आई. इस के बाद भारती को लगा कि उस के घर वाले सचमुच शादी को तैयार हैं.

मां ने ही नहीं, पिता ने भी कहा, ‘‘हमारी समझ में आ गया है कि तू सचमुच नरेश को बहुत प्यार करती है. फिर इस में बुराई ही क्या है. नरेश है भी तो ऊंची जाति का. मुझे पहले लगता था कि वह धोखा दे देगा. लेकिन अब हमें उस पर भी विश्वास हो गया है. वह तुझ से शादी कर के तुझे सुखी रखेगा.’’

भारती को पिता की बातों पर विश्वास तो नहीं हो रहा था, लेकिन उसे उस की बातों में कोई साजिश भी नजर नहीं आ रही थी. वह कुछ नहीं बोली तो गिरिराज ने कहा, ‘‘गांव में तो हम तेरी शादी करा नहीं सकते, क्योंकि गांव वाले यह शादी कतई नहीं होने देंगे. तू ऐसा कर, नरेश को प्रिंस के ढाबे पर बुला ले. हम उसे ले कर ग्वालियर के किसी मंदिर चलते हैं और वहीं तुम दोनों की शादी करा देते हैं. नगला लालजीत गांव ग्वालियर के लिए जाने वाले हाईवे के किनारे बसा है. भारती जानती थी कि गांव वाले उस की शादी का विरोध कर रहे हैं. इसीलिए मम्मीपापा उस की शादी गांव से बाहर किसी मंदिर में करना चाहते हैं. उस ने नरेश को फोन कर के सारी बात बताई तो वह बहुत खुश हुआ.

किसी को कुछ बताए बगैर वह उसी रात प्रिंस के ढाबे पर पहुंच गया. गिरिराज पत्नी और भारती के साथ वहां पहले से मौजूद था. उस ने उसे गाड़ी में बैठाया और चल पड़ा. भारती और नरेश पिछली सीट पर एक साथ बैठे थे. वे सुनहरे भविष्य की कल्पनाओं में इस तरह खोए थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब गाड़ी मौजपुरा के जंगल में पहुंच गई. वहां पहुंचते ही नरेश समझ गया कि ये लोग उस की शादी कराने नहीं, उन्हें मारने लाए हैं. क्योंकि पीछे से भारती का बहनोई शैलेंद्र मोटरसाइकिल से भी वहां पहुंच गया था. नरेश तो कुछ नहीं बोला, लेकिन भारती फट पड़ी, ‘‘तुम लोग इतने बड़े धोखेबाज निकलोगे, मैं ने सोचा भी नहीं था. इस से अच्छा तो तुम लोगों ने पैदा होते ही मेरा गला घोंट दिया होता. ’’

नरेश और भारती ने जिंदगी के लिए संघर्ष तो बहुत किया, लेकिन उन लोगों ने नरेश को उस के मफलर तथा भारती को उस की शाल से गला घोंट कर मार दिया. दोनों लाशें वहीं छोड़ कर सभी लौट आए. भारती के पास शिनाख्त लायक वैसे भी कुछ नहीं था, नरेशजेबों से भी सब कुछ निकाल लिया गया था. सभी यह सोच कर निश्चिंत थे कि पुलिस उन तक पहुंच नहीं पाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

अगले दिन राजस्थान के जिला धौलपुर के थाना मनियां के थानाप्रभारी रतन सिंह को जंगल में 2 लाशें पड़ी होने की सूचना मिली तो सहयोगियों के साथ वह वहां पहुंच गए. उन्होंने शिनाख्त के लिए दोनों लाशों की तलाशी ली तो लड़की के पास से तो कुछ नहीं मिला, लेकिन लड़के की जेब से परिचय पत्र मिल गया, जिस से पता चला कि वह आगरा के गांव नगला लालजीत का रहने वाला है. लाशों पर चोटों के निशान के अलावा लड़के के गले पर मफलर और लड़की के गले पर शाल कसा हुआ था. इस से पुलिस को लगा कि इन्हें गला घोंट कर मारा गया है. हमउम्र लड़कालड़की की लाशें होने की वजह से यह भी अंदाजा लगाया गया कि यह प्रेमी जोड़ा रहा होगा और घर वालों ने ही इन की हत्याएं की हैं.

राजस्थान पुलिस लाशों की खबर ले कर नगला लालजीत स्थित हुकुम सिंह के घर पहुंची तो हड़कंप मच गया. वहीं पूछताछ में पता चला कि दूसरी लाश गांव के गिरिराज कुशवाहा की बेटी भारती की थी. गांव में तो किसी ने कुछ नहीं बताया, लेकिन जब हाईवे पर बने टोल प्लाजा पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज चेक की गई तो उस में गिरिराज और जलदेवी के साथ गाड़ी में बैठे नरेश और भारती दिख गए. इसी के आधार पर थाना मनियां पुलिस ने पतिपत्नी को हिरासत में ले लिया. पोस्टमार्टम के बाद दोनों लाशें घर वालों को सौंप दी गई थीं. गांव ला कर उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया था.

थाने ला कर गिरिराज और जलदेवी से पूछताछ शुरू हुई. वे कोई पेशेवर अपराधी तो थे नहीं, जल्दी ही उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस जानती थी कि केवल ये दोनों नरेश और भारती की हत्या नहीं कर सकते. इस के बाद पुलिस ने उन से शैलेंद्र का भी नाम उगलवा लिया. लेकिन शैलेंद्र डर के मारे फरार हो चुका था. पुलिस ने गिरिराज की निशानदेही पर नरेश का सामान, वह गाड़ी, जिस से भारती और नरेश को ले जाया गया था, बरामद कर ली थी. इस के बाद दोनों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया था.

कथा लिखे जाने तक शैलेंद्र को भी गिरफ्तार कर के पुलिस ने जेल भेज दिया था. सभी जेल में बंद थे, किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Bihar Crime: पति ने पत्नी की कराई प्रेमी से शादी

Bihar Crime: एक ऐसा अनोखा मामला सामने आया, जहां एक महिला का अपने प्रेमी से प्रेमप्रंसंग चल रहा था. जब पति को पत्नी के प्रेम के बारे में पता चला तो उस ने पत्नी की शादी उस के प्रेमी से करवा दी. क्यों एक पति ने अपनी पत्नी को प्रेमी के हवाले किया. आखिर क्या थी इस घटना की वजह? चलिए जानते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से, जो आप को बताएगी इस अनोखी घटना की पूरी जानकारी.

यह हैरान कर देने वाली वारदात  बिहार के रोहतास से सामने आई है, जहां धर्मेंद्र कुमार ने अपनी पत्नी मंजू देवी की शादी दोस्त से करवा दी. शादी गांव के ही एक मंदिर में संपन्न हुई. इस दौरान पंचायत के सरपंच, महिला के पेरेंट्स समेत सैकड़ों लोग मौजूद रहे. आप को बता दें कि दिनारा प्रखंड के नटवार गांव की रहने वाली मंजू की शादी जून 2021 में करमैनी गांव के धर्मेंद्र कुमार से हुई थी. दोनों का 4 साल का एक बच्चा भी है.

धर्मेंद्र कुमार अपनी पत्नी मंजू के साथ दिल्ली में रहता था. वहीं पति का दोस्त पास ही किराए के मकान में रहता था और अकसर उन के घर आताजाता था.  इस दौरान मंजू और उस युवक के बीच बातचीत और मुलाकातें बढ़ती गईं. इसी दौरान दोनों के बीच लव अफेयर शुरू हुआ. इस के बाद दोनों होली के समय गांव आए थे. कुछ दिनों बाद पति काम के सिलसिले में गुजरात चला गया. मंजू मायके में रहने लगी और प्रेमी युवक भी दिल्ली से गांव पहुंच गया.

इस के बाद दोनों फिर से मिलने लगे थे. देर रात को प्रेमी अपनी प्रेमिका मंजू से मिलने उस के घर आया, और दोनों एक ही कमरे में सोते पाए गए. इस के बाद फेमिली वालों ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया. इस के बाद पूरे गांव में रातभर हंगामा मच गया. इस कि सूचना मंजू के पति को भी दे दी गई. वह भी गुजरात से गांव के लिए चल दिया.

घटना के बाद रात को ही तत्काल गांव में पंचायत बुलाई गई थी. पंचायत ने दोनों पक्षों को बुलाकर पूरे मामले को सुलझाने की कोशिश शुरू की. मंजू और युवक अपने प्रेम संबंध पर अड़े रहे और किसी भी समझौते को स्वीकार नहीं किया. सरपंच ने कहा कि महिला और युवक अब अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत करेंगे. हम ने दोनों पक्षों को समझाते हुए यह सुनिश्चित किया कि आगे किसी तरह का विवाद न उत्पन्न हो सके.

पंचायत ने रातभर चर्चा की, और दोनों के निर्णय को देखते हुए तय किया कि उन का विवाह कराना ही इस विवाद का अंतिम समाधान होगा. पंचायत ने यह भी तय किया कि महिला का 4 साल का बेटा अपनी मां के पास ही रहेगा, ताकि बच्चे की देखभाल में कोई कठिनाई न आए. धर्मेंद्र ने कहा, “मेरी पत्नी मंजू देवी और मेरा दोस्त डेढ़ साल से प्रेम संबंध में थे.  दोनों फोन पर बातचीत करते थे और छिपकर मिलते भी थे. दोनों को समझाया गया, लेकिन उन्होंने नहीं माना.  जब हद पार हो गई, तो दोनों की शादी करा दी गई.”

पंचायत ने विवाह का अंतिम निर्णय सुनाया. 20 मार्च, 2026 शुक्रवार सुबह दिनारा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर स्थित हनुमान मंदिर में दोनों का विवाह संपन्न हुआ. विवाह के दौरान मंजू का पहला पति भी मौजूद था और उस ने शादी के लिए सहमति दी. Bihar Crime

UP Crime: महिला का सिर कटा शव मिल ने पर हड़कंप

UP Crime: एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसे सुनकर आप के रौंगटे खड़े हो जाएंगे. उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के नरसेना थाना क्षेत्र में एक महिला की हत्या कर उस के शव को टुकड़ों में काटकर अलगअलग फेंक दिया गया. इस घटना ने पूरे इलाके को दहला दिया और पुलिस को भी चौंका दिया. सवाल ये उठता है कि यह महिला कौन थी और किस ने उस के साथ इतनी क्रूरता की. पढ़ते हैं पूरी स्टोरी को

यह दर्दनाक घटना यूपी के बुलंदशहर के नरसेना थाना क्षेत्र में घुंघरावली बांगर के रजवाहे गांव से सामने आई. वहां महिला की सिर कटी लाश मिलने से इलाके में सनसनी फैल गई. पुलिस की प्रारंभिक जांच में मामला हत्या कर शव को टुकड़ों में अलगअलग फेंकने का प्रतीत हो रहा है. महिला की बाजू पर ‘बबली’ गुदा हुआ मिला, जिस से पुलिस को शक है कि मृतक किसी अन्य राज्य की हो सकती है. घटना के बाद इलाके में अफरातफरी मच गई.

एसपी (सिटी) शंकर प्रसाद ने बताया कि शव के धड़ और सिर अलगअलग फेंके गए हैं और मामले का खुलासा करने के लिए 6 टीमों को लगाया गया है. पुलिस ने घटनास्थल से लगभग 500 मीटर दूर सरसों के खेत से महिला का सिर बरामद किया. इस कार्य के लिए 4 टीमों ने विशेष तलाशी अभियान चलाया, जिस के बाद सिर बरामद हो पाया.

एसपी सिटी ने बताया कि महिला की पहचान की कोशिशें जारी हैं. घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने पूरे इलाके में खोजबीन तेज कर दी है. 7 घंटे की लगातार तलाश के बाद यह बरामदगी हुई और पुलिस ने आश्वासन दिया कि जल्द ही पूरे मामले का परदाफाश किया जाएगा. UP Crime

Dhradun Crime: मौत का नजराना

Dhradun Crime: शादीशुदा गुरप्रीत कौर मकान मालिक के निठल्ले और आवारा बेटे आशीष के पे्रेमजाल में फंस गई. उस के खर्चे पर वह ऐश करने लगा और धीरेधीरे 2 लाख रुपए ले लिए. ऐसे बेमेल, गलत और स्वार्थी रिश्तों का आखिर क्या अंजाम हुआ?

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के आर्मी एरिया को पार कर के प्रेमनगर से एक किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षेत्र शुरू हो जाता है. यहां चाय के बाग भी हैं और अन्य फसलें भी होती हैं. 5 फरवरी, 2016 की शाम सड़क के ठीक किनारे स्थित एक चाय के बाग में पुलिसकर्मियों और आम लोगों की भीड़ लगी थी.  वजह, किसी ने एक खूबसूरत महिला की बेरहमी से हत्या कर दी थी. वहां खून से लथपथ जिस महिला की लाश मिली, वह लाल रंग की जैकेट पहने थी. मृतका की उम्र करीब 35 साल थी और हत्यारे ने किसी तेज धार वाले हथियार से उस की गर्दन पर वार कर के उस की सांसों की डोर काट दी थी.

प्राथमिक जांचपड़ताल में पुलिस महिला की लाश के इर्दगिर्द ऐसे सबूतों को ढूंढ रही थी, जिस के सहारे कातिल तक पहुंचा जा सके. इसी सिलसिले में पुलिस महिला की जेबों की तलाशी भी ले चुकी थी, लेकिन कुछ नहीं मिला था. अलबत्ता पुलिस को वहां पड़ा एक लेडीज हेलमेट जरूर मिला था. संभवत: वह मृतका का ही था.

दरअसल, करीब 7 बजे किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को वहां लाश पड़ी होने की खबर दी थी. कंट्रोल रूम से सूचना फ्लैश होने के बाद पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया और क्षेत्र के थाना प्रेमनगर के थानाप्रभारी यशपाल सिंह बिष्ट मय पुलिस बल के अविलंब वहां पहुंच गए. मामला सनसनीखेज था, इस तरह से किसी महिला की हत्या हो जाना कोई मामूली बात नहीं थी. इस की सूचना आला अधिकारियों को दी गई तो एसएसपी डा. सदानंद दाते, एसपी (सिटी) अजय सिंह, एएसपी मंजूनाथ व सीओ (सिटी) मनोज कत्याल समेत कई थानों की पुलिस घटनास्थल पर आ पहुंची. पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया, लेकिन मौके पर कातिल तक पहुंचने लायक कोई सुराग नहीं मिल सका.

आसपास भी पुलिस ने तलाश की, लेकिन हत्या में इस्तेमाल किया गया हथियार वहां नहीं मिला. पुलिस ने मौके पर मौजूद लोगों से पूछा कि किसी ने हत्या करने वाले को तो नहीं देखा. लेकिन ऐसा कोई चश्मदीद नहीं नहीं था. अलबत्ता एक युवक ने इतना जरूर बताया कि उस ने स्कूटी वाले एक आदमी को वहां से भागते जरूर देखा था. पुलिस ने युवक से पूछताछ की. उस के अनुसार, वह टहलने के लिए निकला था. तभी उस ने किसी महिला के चीखने की आवाज सुनी. पहले उसे लगा कि महिला पर जंगली जानवर ने हमला किया है. लेकिन जब उस ने इस ओर स्कूटी स्टार्ट होने की आवाज सुनी तो वह यहां आया.

जब तक वह वहां पहुंचा, तब तक स्कूटी सवार वहां से जा चुका था. चूंकि रात का धुंधलका होने लगा था, इसलिए वह स्कूटी सवार को देख नहीं सका. इस के बाद उस ने 100 नंबर पर फोन कर दिया था. कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने एक युवकयुवती को स्कूटी से उस तरफ आते देखा था. मामला सीधे हत्या का था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारा किसी बहाने महिला को अपने साथ यहां लाया होगा और फिर चालाकी से उस की हत्या कर के भाग गया होगा. घटनास्थल से बरामद हुआ हेलमेट चूंकि लेडीज था, इस से यह संभावना अधिक थी कि स्कूटी मृतका की ही रही होगी, साथ ही यह भी कि हत्यारा उस का कोई खास जानकार रहा होगा, इसीलिए वह उस क्षेत्र में उस के साथ आई होगी.

इस बात की संभावना कतई नहीं थी कि महिला की स्कूटी लूटने के लिए उस की हत्या की गई होगी. अमूमन चोरी और लूट के लिए इस तरह हत्या के मामले पेश नहीं आते. निस्संदेह हत्यारे ने पूरी प्लानिंग के साथ वारदात को अंजाम दिया था. घटना के अंदाज से ऐसा लगता था कि हत्यारे के दिल में मृतका के प्रति गहरी नफरत थी.

हत्यारा चूंकि स्कूटी ले कर भागा था, इसलिए पूरे जिले में संदिग्ध व्यक्ति की तलाश में नाकेबंदी कर के अभियान चलाने के निर्देश दे दिए गए. हत्या के इस मामले में जांच आगे बढ़ाने के लिए मृतका की शिनाख्त जरूरी थी. पुलिस ने उस के चेहरे के फोटो कराए और पूरे उत्तराखंड की पुलिस को व्हाट्सएप ग्रुप में भेज दिए. इस के साथ ही मृतका की लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

रात को करीब 9 बजे चैकिंग के दौरान पुलिस को शहर के सावलांकला क्षेत्र में एक स्कूटी लावारिस खड़ी मिली. पुलिस ने स्कूटी की डिग्गी खुलवा कर उस की तलाशी ली तो उस में से एक मोबाइल फोन मिला. इसी दौरान पर्वतीय क्षेत्र उत्तरकाशी में तैनात सबइंसपेक्टर कुलदीप पंत ने प्रेमनगर पुलिस को बताया कि शिनाख्त के लिए जिस महिला का फोटो वायरल हुआ है, कुछ समय पहले वह एक महिला के केस की पैरवी के सिलसिले में कोर्ट आती थी. उस का पूरा पता तो वह नहीं जानते, लेकिन इतना पता है कि वह रेसकोर्स इलाके में कहीं रहती थी. कुलदीप चूंकि वर्ष 2013 में देहरादून शहर की लक्खीबाग पुलिस चौकी के इंचार्ज रहे थे, इसलिए उन्हें यह जानकारी थी.

मोबाइल मिलने से पुलिस के लिए मृतका की शिनाख्त की राह आसान हो गई थी. पुलिस ने स्कूटी से बरामद मोबाइल को अनलौक करा कर उस का सिम नंबर हासिल करने के साथ कंपनी से पता किया कि वह किस के नाम था. पता चला कि वह नंबर गुरप्रीत कौर के नाम रजिस्टर्ड था. उस का पता सरकुलर रोड स्थित रैस्ट कैंप कालोनी था. पुलिस अविलंब उस पते पर पहुंची तो जानकारी मिली कि वह वहां अपने पति गुरमीत सिंह के साथ किराए पर रहती थी. वहां से थोड़ी दूर स्थित त्यागी रोड पर उस के मायके वाले रहते थे. पुलिस ने वहां जा कर बरामद शव की फोटो दिखाई तो उन्होंने गुरप्रीत की पहचान अपनी बेटी के रूप में कर दी.

इस के बाद पुलिस ने उस के भाई जगजीत की तरफ से रात पौने 12 बजे भादंवि की धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस केस की विवेचना थानाप्रभारी यशपाल सिंह के सुपुर्द कर दी गई. अब सब से बड़ा सवाल यह था कि गुरप्रीत की हत्या क्यों और किस ने की थी? एसएसपी डा. सदानंद दाते ने इस मामले में अपने अधीनस्थों को त्वरित काररवाई कर के केस का खुलासा करने के निर्देश दिए. हत्या के खुलासे के लिए एसपी (सिटी) अजय सिंह के निर्देशन में एक पुलिस टीम गठित कर दी गई, जिस में विवेचनाधिकारी के अलावा एसओजी इंचार्ज अशोक राठौड़, एआई धनराज सिंह, कैंट थानाप्रभारी राजेश शाह, पटेलनगर थानाप्रभारी बी.डी. उनियाल, बसंत विहार थानाप्रभारी अब्दुल कलाम व शहर कोतवाली प्रभारी एस.एस. बिष्ट आदि को शामिल किया गया.

अगले दिन यानी 6 फरवरी को पुलिस ने गुरप्रीत के नंबर की काल डिटेल्स हासिल की तो उस में अंतिम नंबर एक युवक का निकला. उस युवक का नाम आशीष उर्फ मोनू था. 27 वर्षीय आशीष रेसकोर्स इलाके के त्यागी रोड पर रहता था. उसे संदेह के दायरे में रख कर पुलिस ने तुरंत उस के घर दविश दी तो पता चला कि वह घर से बिना बताए शाम से ही गायब था. घर वालों से भी उस का संपर्क नहीं हुआ था. वहां काम की एक बात यह पता चली कि गुरप्रीत कौर पहले उस के यहां बतौर किराएदार रही थी, लेकिन कुछ महीने पहले उस ने मकान बदल दिया था.

इस से पुलिस का शक और भी बढ़ गया. पुलिस को यह मामला प्रेमप्रसंग का लगा. आगे की जांच में पुलिस को कुछ और भी अहम बातें पता चलीं, जो इसी ओर इशारा कर रही थीं. पुलिस आशीष की तलाश में जुट गई. इस के लिए इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस का भी सहारा लिया गया. इस से पता चला कि उस की न सिर्फ गुरप्रीत से बातें हुई थीं, बल्कि घटना के समय उस की लोकेशन भी गुरप्रीत के साथ थी. जांच आगे बढ़ी तो आशीष की लोकेशन देहरादून से करीब 28 किलोमीटर दूर मसूरी में मिलनी शुरू हुई. यह पता चलते ही एक पुलिस टीम मसूरी के लिए रवाना कर दी गई. तब तक शाम हो चुकी थी.

लोकेशन को ट्रैस करते हुए पुलिस कुल्हाड़ी चौकी स्थित होटल राज पैलेस पहुंची. पुलिस ने होटल का रजिस्टर चैक किया तो पता चला कि आशीष होटल के कमरा नंबर 7 में ठहरा हुआ है. पुलिस ने दरवाजा खुलवाया तो दरवाजा आशीष ने ही खोला. उस पर नजर पड़ते ही पुलिस चौंकी, क्योंकि उस की बाईं कलाई कटी हुई थी. खून बहने से वह लड़खडड़ा रहा था. आननफानन में पुलिस उसे वहां के सेंटमैररी अस्पताल ले गई. पुलिस टीम को कतई उम्मीद नहीं थी कि वह इस हाल में मिलेगा. प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने उसे देहरादून ला कर सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया.

अब उस की हालत खतरे से बाहर थी. पुलिस ने औपचारिक पूछताछ के बाद उसे आराम करने दिया. अगली सुबह पुलिस ने आशीष से पूछताछ की तो प्यार, लालच, बेवफाई और नफरत में उलझी बेमेल मोहब्बत की एक चौंकाने वाली कहानी सामने आई. दरअसल, गुरप्रीत का परिवार देहरादून में ही रैस्टकैंप में रहता था. 10 साल पहले घर वालों ने उस का विवाह गुरमीत सिंह से कर दिया था. शादी के बाद गुरप्रीत एक बेटे की मां बनी. गुरमीत का औटो स्पेयर पार्ट्स का बिजनैस था. पतिपत्नी त्यागी रोड स्थित रेलवे कर्मचारी सुबोध कुमार के मकान में किराए पर रहते थे.

सुबोध के 3 बेटे थे, अविनाश, आशीष और अंकुश. पौलिटैक्निक का डिप्लोमा करने के बाद पढ़ाई से आशीष का मन उचट गया था. उस ने नौकरी की भी तलाश नहीं की. निठल्लेपन ने उसे आवारा बना दिया. एक वक्त ऐसा भी आया, जब वह घर वालों के हाथों से निकल गया. तेजतर्रार आशीष मनमर्जी करता था और सनकी किस्म का था. गुरप्रीत थोड़ा खुले विचारों वाली थी. किसी से भी हंसबोल लेती थी. गुरमीत बिजनैस के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते थे. उन के पीछे गुरप्रीत को कोई परेशानी नहीं होती थी. उस का मायका तो नजदीक था ही, सुबोध का भी परिवार उस का खयाल रखता था. घर चूंकि एक ही था, लिहाजा उस के पास आशीष का भी आनाजाना था. आशीष गुरप्रीत की तरफ आकर्षित हो गया.

2 साल पहले दोनों के बीच पहले दोस्ती हुई, फिर यही दोस्ती प्यार में बदल गई. पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास का होता है. जहां विश्वास, समर्पण और सामाजिक मर्यादाओं को महत्त्व दिया जाता है, वहां रिश्ते की डोर मजबूत होती है. गुरप्रीत के मामले में ऐसा नहीं था. भावावेश में ही सही, आशीष के प्यार में पड़ कर उस ने न केवल अपने विश्वास के रिश्ते को कमजोर किया, बल्कि वह एक बड़ी भूल भी कर रही थी. गुजरते वक्त के साथ गुरप्रीत और आशीष की मोहब्बत परवान चढ़ती गई. जल्दी ही एक ऐसा समय भी आया, जब उन के बीच का रिश्ता मर्यादाओं की दीवार लांघ गया.

गुरप्रीत विवाहिता थी. आशीष के लिए उस ने पति से बेवफाई की थी. उस के साथ गुरप्रीत का रिश्ता सामाजिक और नैतिक तौर पर पूरी तरह गलत था. जीवन की पगडंडियां बहुत रपटीली होती हैं. जब कोई इंसान पतन की डगर पर उतरता है तो फिर उस की वापसी मुश्किल हो जाती है. गुरप्रीत बिना किसी अंजाम की परवाह किए खुद अपनी इच्छा से इस राह पर चल रही थी. इस तरह के रिश्तों में भले ही खुशियों का बगीचा नजर आता हो, परंतु वह वक्ती होता है. उस के नतीजे कब किस रूप में घातक हो जाएं, यह बात कोई नहीं जानता. सीधे तौर पर कहें तो कालांतर में ऐसे रिश्तों के परिणाम दुखदायक ही होते हैं.

आशीष और गुरप्रीत के प्यार का सिलसिला चलता रहा. गुरप्रीत पूरी तरह आशीष के मोहपाश में बंधी थी. उन दोनों के रिश्तों की भनक किसी को नहीं लग सकी. घर के अलावा दोनों बाहर जा कर भी मिलते थे. गुरप्रीत को विश्वास में ले कर अशीष ने उस का एटीएम कार्ड ले लिया था और धीरेधीरे उस में से 2 लाख रुपए निकाल लिए थे. दरअसल, आशीष को लगता था कि उसे बैठेबिठाए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी मिल गई है. सन 2015 में जब गुरप्रीत और आशीष के रिश्ते की हकीकत सामने आई तो गुरमीत ने पत्नी को खूब डांटाफटकारा. गुरप्रीत ने वक्त की नजाकत को भांप कर अपने किए पर माफी मांग ली.

इस के बाद गुरमीत ने आशीष पर रुपए वापसी का दबाव बनाया तो काफी जद्दोजहद के बाद उस ने एक लाख रुपए वापस कर दिए और बाकी बाद में देने को कहा. अपनी गृहस्थी को बचाए रखने के लिए गुरमीत ने 3 महीने पहले सुबोध का मकान छोड़ कर ससुराल के नजदीक किराए पर रहना शुरू कर दिया, साथ ही गुरप्रीत को आगाह भी किया कि वह आशीष से कोई गलत रिश्ता न रखे और उस से अपने पैसे वापस मांगे.

अच्छा इंसान वही होता है, जो वक्त रहते अपनी गलतियों को सुधार ले. गलतियों को बारबार दोहराया जाए तो बुरे नतीजों का रूप ले लेती हैं. गुरप्रीत और आशीष दोनों ही इस बात से जानबूझ कर अंजान थे. कुछ दिनों तक गुरप्रीत और आशीष के बीच दूरियां रहीं, लेकिन मकान बदलने से दोनों के दिल नहीं बदले. इस के बाद भी दोनों मिलते रहे. गुरप्रीत पर पति का दबाव था कि वह आशीष से अपने पैसे वापस ले. इसलिए गुरप्रीत ने पैसों का तकाजा जारी रखा. इस बात पर आशीष से उस की बहस भी हुई. गुरप्रीत आजादख्याल महिला थी. आशीष से उस के आंतरिक रिश्ते थे, लेकिन उस की सोच के हिसाब से वह उस की गुलाम नहीं थी. बाद में उस के रिश्ते कुछ अन्य युवकों से भी हो गए. उस की खुफिया मुलाकातों का सिलसिला गुपचुप चलता रहा.

जब यह बात आशीष को पता चली तो उसे बहुत नागवार गुजरा. एक दिन मुलाकात हुई तो आशीष ने तेवर दिखाने की कोशिश की. इस पर गुरप्रीत ने उसे टका सा जवाब दे दिया, ‘‘मैं तुम्हारी गुलाम नहीं हूं आशीष, वैसे भी तुम मेरे ऊपर झूठा आरोप लगा रहे हो.’’

आशीष गुस्से में था. उस ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, ‘‘मैं तुम से प्यार करता हूं गुरप्रीत, इसलिए तुम किसी दूसरे से मिलो यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता. जरूरत पड़ने पर मैं किसी भी हद तक जा सकता हूं.’’

‘‘जब तुम प्यार करते हो तो विश्वास भी करो, साथ ही यह भी कि अपनी हद मत भूलो.’’

उस दिन के बाद आशीष अवसादग्रस्त रहने लगा. काम वह कुछ करता नहीं था, खाली दिमाग शैतान का घर होता है. वह दिनरात गुरप्रीत के बारे में ही सोचता रहता था. तरहतरह के खयाल उस के मन को कचोटते रहते थे. सब से ज्यादा वह यही सोचता था कि गुरप्रीत किसकिस से मिल रही होगी.

गुरप्रीत आशीष की ब्याहता नहीं थी, बल्कि पति से बेवफाई कर के उस ने आशीष में खुशियों की नाजायज तलाश की थी. इस के बावजूद आशीष न सिर्फ गुरप्रीत पर अपना पूरा हक समझता था, बल्कि उसे लगता था कि उस ने उस के साथ बेवफाई की है. वह दिलोदिमाग से पूरी तरह गुरप्रीत से जुड़ा था. उस के लिए इस से भी ज्यादा तकलीफदेह बात यह थी कि वह पैसे वापसी के लिए तकाजा करती थी. आशीष अवसादग्रस्त हुआ तो उस ने मन ही मन आत्महत्या कर के अपनी जिंदगी खत्म करने की सोची. कुछ दिनों तक वह इसी उधेड़बुन में रहा.

इस के बाद उस ने यह सोच कर इस खयाल को अपने मन से निकाल दिया कि इस से तो गुरप्रीत और भी आजाद हो जाएगी. उसे कोई सबक नहीं मिल सकेगा. उसे खुद मरने के बजाय गुरप्रीत को ही बेवफाई का सबक सिखाना चाहिए. आशीष ने सोचा कि कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले उसे गुरप्रीत से बात करनी चाहिए. वह यह सब सोच रहा था कि एक दिन उस ने गुरप्रीत को किसी युवक के साथ घूमते देख लिया. यह देख कर उसे बहुत गुस्सा आया. एक दिन उस ने गुरप्रीत से मिलने की इच्छा जाहिर की तो वह चली आई.

गुरप्रीत किसी भी तरह आशीष से अपने पैसे वापस लेना चाहती थी. जबकि रिश्ते तोड़ कर यह मुमकिन नहीं था. आशीष मिला तो उस ने अपनी नाराजगी जाहिर की, ‘‘तुम यह मत सोचना गुरप्रीत कि मुझे कुछ पता नहीं है. मैं जानता हूं, तुम अपनी आदतों को बदलने के लिए तैयार नहीं हो. मैं ने कल भी तुम्हें बाजार में एक युवक से मिलते देखा था.’’

उस की बात सुन कर गुरप्रीत गुस्सा हो गई, ‘‘देखो आशीष, यह मेरा निजी मामला है. तुम अपनी हद में रहो.’’

‘‘क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करतीं?’’

‘‘प्यार करती हूं, तभी तो तुम से मिलती हूं. मैं किस से मिलती हूं, तुम्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि मैं तुम से किनारा तो कर नहीं रही. तुम्हें पूरा वक्त दे रही हूं.’’ कुछ पल रुक कर गुरप्रीत आगे बोली, ‘‘और हां, जितनी जल्दी हो सके, तुम मेरे पैसों का इंतजाम कर दो. तुम नहीं जानते मुझे तुम्हारी वजह से क्याक्या सुनने को मिलता है.’’

आशीष शातिर दिमाग युवक था. उसे गुस्सा तो बहुत आया, पर उस ने अपने गुस्से को जब्त करने में ही भलाई समझी. उस की हालत हारे जुआरी जैसी हो गई है. अपने गुस्से को दबा कर उस ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं कुछ करूंगा.’’

उस रात आशीष को नींद नहीं आई. वह गुरप्रीत पर अपना हक समझ रहा था, जबकि वह उस के कहे अनुसार चलने को तैयार नहीं थी. वह चाहता था कि गुरप्रीत सिर्फ उसी की बनी रहे और वक्तबेवक्त उस पर पैसे भी खर्च करे. पर अब सब कुछ उस की सोच के विपरीत हो रहा था. नतीजतन वह गुरप्रीत से नफरत करने लगा.  निठल्लेपन का शिकार आशीष घर पर रह कर ज्यादातर आपराधिक घटनाओं पर आधारित सीरियल देखता रहता था. इसी से आइडिया ले कर उस ने मन ही मन फैसला कर लिया कि अगर गुरप्रीत ने उस की बात नहीं मानी तो पूरी प्लानिंग के साथ वह उस की हत्या कर देगा.

इस के लिए जनवरी के अंतिम सप्ताह में उस ने एक चाकू खरीद कर अपने पास रख लिया. उस ने सोचा कि ऐसा कर के वह गुरप्रीत से प्रतिशोध भी ले लेगा और उसे उस के तकाजे से भी मुक्ति मिल जाएगी.  फरवरी की शाम आशीष ने तयशुदा प्लानिंग के तहत गुरप्रीत को फोन कर के मिलने की इच्छा जताई. उस ने उस से रेलवे स्टेशन आने को कहा. गुरप्रीत ने जब आने के लिए हामी भर ली तो आशीष अपनी मोटरसाइकिल से वहां पहुंच गया. उधर गुरप्रीत अपने 8 वर्षीय बेटे शीतल से कुछ देर में वापस आने की बात कह कर अपनी स्कूटी से आशीष से मिलने पहुंच गई.

आशीष ने उस से प्रेमनगर के चाय बागान की तरफ घूमने चलने को कहा. गुरप्रीत उस पर भरोसा करती थी, इसलिए साथ जाने को तैयार हो गई. आशीष उस की स्कूटी पर पीछे बैठ गया और दोनों करीब आधे घंटे में चाय बागान के पास पहुंच गए.

आशीष ने अपने इरादे के बारे में गुरप्रीत को जरा भी शक नहीं होने दिया. अपने मोबाइल से उस ने गुरप्रीत के साथ सैल्फी खींची. इस के बाद वह मुद्दे पर आते हुए बोला, ‘‘क्या सोचा गुरप्रीत तुम ने?’’

‘‘किस बारे में?’’

‘‘तुम बदलोगी या नहीं?’’

वह उस के इस रवैये से बुरी तरह चिढ़ कर बोली, ‘‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, मुझे अभी वापस जाना है.’’

‘‘नहीं, आज तुम सीधे ऊपर ही जाओगी.’’ कहने के साथ ही आशीष के हाथ हरकत में आ गए. उस ने गुरप्रीत का गला पकड़ कर दबाया और जमीन पर पटक दिया. गुरप्रीत को उस से ऐसी उम्मीद नहीं थी. उस के खतरनाक इरादों से अंजान गुरप्रीत संभल पाती, उस के पहले ही उस ने चाकू निकाला और उस के गले पर वार कर दिया.

इस से गुरप्रीत की चीख निकल गई. आशीष का वार घातक था. कुछ ही देर में तड़प कर गुरप्रीत की सांसों की डोर टूट गई. इस के बाद वह स्कूटी ले कर वहां से निकल गया. गुरप्रीत की चीख के बाद एकदो लोग वहां पहुंचे. उन्होंने ही पुलिस को इस हत्या की सूचना दी थी. गुरप्रीत की स्कूटी ले कर आशीष सीधा सेवलांकला गया और स्कूटी वहां छोड़ कर टैक्सी स्टैंड पहुंचा, जहां से वह मसूरी चला गया. वहां उस ने होटल में अपनी आईडी जमा कर के कमरा ले लिया. किसी को अंदाजा नहीं था कि वह कत्ल कर के आया है. उस ने रात में शराब पी और चिकन खाया. इस के बाद घंटों आराम किया. अगले दिन वह काफी परेशान रहा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. दिन भर उस ने आराम किया.

शाम को आशीष ने गुरप्रीत की खबर टीवी पर देखी तो अवसाद से ग्रस्त हो कर खुद भी अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला किया और अपनी बाईं कलाई की नसें काट लीं. संयोग से उसी समय पुलिस ने वहां पहुंच कर उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस के पहुंचने में देरी होती तो रक्तस्राव से उस की मौत हो सकती थी. विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने आशीष को अस्पताल से डिस्चार्ज करा लिया. होटल के प्रबंधक प्रकाश सिंह की तरफ से धारा 309 के अंतर्गत आशीष के खिलाफ आत्महत्या के प्रयास का भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. पुलिस ने उस से गुरप्रीत की हत्या में इस्तेमाल चाकू के बारे में पूछताछ की तो उस ने कोई उत्तर नहीं दिया. पुलिस ने उसे 7 फरवरी को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

बाद में पुलिस ने 10 फरवरी को हत्यारोपी को एक दिन के रिमांड पर लिया. उस की निशानदेही पर उसी दिन मसूरी रोड स्थित डीयर पार्क की झाडि़यों से हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू बरामद हो गया. फिलहाल वह जेल में है. गुरप्रीत अपने परिवार से बेवफाई कर के सनकी स्वभाव के आशीष के प्यार में न पड़ी होती तो शायद इस तरह की नौबत कभी न आती. आशीष जैसे युवक महिलाओं की भावनाओं से खेल कर उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं और उन्हें मौजमस्ती और कमाई का जरिया बना लेते हैं.

कानून आशीष को क्या सजा देगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन एक परिवार की खुशियों को उस ने हमेशा के लिए खत्म कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्र

Hindi Crime Story: दिल दौलत और दगाबाज दोस्त

Hindi Crime Story: टेड सैंडी को दिल से प्यार करता था जबकि सैंडी को उस की दौलत से प्यार था. इस में जब टेड का दोस्त रिक भी सैंडी के साथ मिल गया तो दोनों ने टेड की दौलत के लिए उसे ठिकाने लगा दिया.

उत्तरी अमेरिका के शहर लास वेगास को दुनिया का फन सिटी माना जाता है. वहां चौबीसों घंटे जुआ खेला जाता है, इसलिए वहां जुआ खेलने वालों का जमघट लगा रहता है. यहां सिर्फ जुआ ही नहीं खेला जाता सैक्स और फैशनेबल कपड़ों का भी व्यापार होता है. इस की वजह से यहां अपराधी भी बहुत हैं. यहां रातदिन टौपलेस लड़कियों के डांस शो और शराब के साथ जुआ चलता रहता है. इस शहर की रौनक सालोंसाल से ज्यों की त्यों बनी है. कसीनो में डूबी रातों, स्पा बाथ के जलवे और सैक्स का मजा लूटने यहां तमाम पर्यटक आते हैं.

कसीनो में पैसे वाले लोग हजारोंलाखों रुपयों की बाजियों में डूबे रहते हैं. एक तरफ बाजी जीतने वाले को खुशी होती है तो दूसरी ओर हजारोंलाखों हारने वाले पर भी ‘जीत’ का नशा छाया रहता है. कसीनो का मायाजाल ही ऐसा होता है कि हारने का भी गम नहीं होता. वह इसी उम्मीद में रहता है कि कभी उस का भी समय आ सकता है. 17 सितंबर, 1996 की रात निवेडा वैली पर काले बादलों का ऐसा साया मंडराया, जो कभी फीका नहीं पड़ा. निवेडा वासियों के दिल में अब घोड़ों, जुआ और लड़कियों के शौकीन टेड बिनियन की सिर्फ यादें ही रह गई हैं.

स्मार्ट, गणित में माहिर और बेशुमार दौलत का मालिक. टेड के पास इतनी दौलत थी कि नोट गिनने वाली मशीन भी थक जाए. खतरों से खेलने वाला, मौत से न डरने वाला, टेड आखिर में मारा गया. जो दौलत उसे जान से प्यारी थी, उसी दौलत की वजह से उसे जान गंवानी पड़ी. टेड बिनियन लड़कियों का भी खूब शौकीन था. उसे हर रोज एक नई लड़की की तलाश होती थी. पैसा उस के पास था ही, इसलिए हर रात उसे नई लड़की आसानी से मिल जाती थी. उस रात वह लड़की की ही तलाश में चिताह क्लब पहुंचा तो वहां उस की मुलाकात साथ वाली टेबल पर बैठी सैंडी मर्फी से हुई.

टेड बारबार उसी की ओर देख रहा था. उस के इस तरह देखने से सैंडी को अंदाजा हो गया कि वह क्या चाहता है. सैंडी को पता था कि टेड अरबपति है. टेड ने सैंडी को अपनी तरफ खींचने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस ने भाव नहीं दिया. तब उस ने उसे नोटों की गड्डी दिखाई. लेकिन सैंडी ने उसे लौटाते हुए कहा, ‘‘तुम ने मुझे समझा क्या है? तुम्हें क्या लगता है कि पैसे ले कर मैं तुम्हारे साथ चल दूंगी.’’

टेड ने सोचा था कि सैंडी भी अन्य लड़कियों की तरह होगी, लेकिन वह वैसी नहीं थी. जबकि यह उस की एक अदा थी, जिस की बदौलत वह टेड को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब हो गई थी. उस के इस अंदाज से टेड अंदर तक घायल हो गया था. लड़कियों को सिर्फ मौजमस्ती की चीज समझने वाले टेड के दिल में सैंडी अपनी इस अदा से उतर गई थी. जबकि सही बात यह थी कि सैंडी पैसों की तलाश में ही कैलिफोर्निया से लास वेगास आई थी. वह पैसों के लिए क्लबों में टौपलेस डांस करती थी. सैंडी की यह अदा टेड के लिए दिखावा भर थी. वह टेड की अमीरी और खुले दिल से अनजान नहीं थी. वह खुद उसे अपनी ओर खींचना चाहती थी. जिस में वह कामयाब भी हो गई थी.

इस के बाद उन्हें मिलते देर नहीं लगी. उन की मुलाकातें होने लगीं. एक लंबे समय के बाद सैंडी को पता चला कि टेड ही उस कसीनो का मालिक है, जहां वह काम करती थी. 2 सप्ताह में ही सैंडी की जिंदगी बदल गई थी. टेड की पत्नी को जब पति और सैंडी के प्रेम के बारे में पता चला तो उस की पत्नी डौरिस अपनी 15 वर्षीया बेटी को ले कर चली गई. उस ने तलाक का मुकदमा करने में भी देर नहीं की. टेड शराब तो पीता ही था, पत्नी के जाने के बाद हेरोइन भी लेने लगा.

डोरिस के घर से जाते ही जो सैंडी पैसों की खातिर हर रात क्लबों में जिस्म दिखाने का नाच करती थी, वह अरबपति के घर की मालकिन बन गई. एक तरह से उस के हाथ सोने का अंडा देने वाली मुर्गी लग गई थी. लास वेगास ने उस की जिंदगी बदल दी थी. टेड सैंडी की अदाओं पर फिदा था. हर रात उस के साथ बाहर जा कर खाना खाता, कसीनो में जुआ खेलता और फिर रात भर सैंडी के साथ मजे लेता. यही उस की जिंदगी का नियम बन गया था.

सैंडी ने जिंदगी में जो चहा था, पा लिया था. अब टेड की बेशुमार दौलत सैंडी के हाथों में थी. उस की जिंदगी ने नया करवट तब लिया, जब उस की जिंदगी में टेबिश आया. रिक टेबिश लास वेगास सन 1991 में आया था. यहां उस ने अपनी ट्रांसपोर्ट कंपनी खोली थी. इस के बाद जल्दी ही उस की गिनती करोड़पतियों में होने लगी थी. पिएरो रेस्टोरेंट के रौसलेट में रिक की मुलाकात टेड से हुई तो जल्दी ही दोनों गहरे दोस्त बन गए. एक दिन टेड रिक को अपने घर ले गया तो वहां उस ने उसे सैंडी से मिलवाया. इस के बाद अक्सर तीनों की मुलाकातें होने लगीं.

टेड बिनियन अपने कारोबार में व्यस्त रहता था, जिस की वजह से सैंडी का झुकाव रिक की ओर हो गया. वह उस के साथ शौपिंग पर भी जाने लगी. इस तरह दोनों करीब आते गए. इस के बाद एक शाम जब दोनों घर में अकेले थे तो सैंडी ने कहा, ‘‘रिक, क्या तुम्हें नहीं लगता कि हमारे बीच अपनापन इस हद तक बढ़ गया है कि अब इसे रिश्ते का नाम दे दिया जाना चाहिए.’’

‘‘कैसा रिश्ता?’’ रिक ने पूछा.

‘‘प्यार का रिश्ता,’’ सैंडी ने कहा, ‘‘तुम्हारे साथ होने पर दिल में कुछकुछ होने लगता है. सच कहूं, मेरा दिल बिलकुल खाली है. टेड को तो मेरे दिल ने सिर्फ नाम का पति माना है. उस बूढ़े में इतनी ताकत कहां है कि उसे पूरी तरह से पति मान लिया जाए. वह शरीर में आग तो लगा देता है, लेकिन बुझाना उस के वश की बात नहीं है.’’

रिक उस के कहने का मतलब समझ गया था. वह तो वैसे ही सैंडी पर फिदा था. इस तरह खुले आमंत्रण पर भला कैसे खुद को रोक पाता. उस ने सैंडी को बाहों में भर लिया. इस का नतीजा यह रहा कि दोनों के बीच जिस्मानी दूरी खत्म होते देर नहीं लगी. दोनों एकांत के साथी बने तो हर छोटीबड़ी बातों के भी राजदार बन गए. इस सब से बेखबर टेड का भी रिक पर विश्वास बढ़ता गया. यही वजह थी कि एक दिन टेड ने उस से पार्किंग के नीचे बने बेसमेंट में दबी चांदी के सिक्कों की बोरियों को कहीं दूसरी जगह ले जाने के बारे में सलाह मांगी. क्योंकि टेड अपनी बहन की दखलंदाजी से परेशान था. वह उस की दौलत हड़पना चाहती थी.

इस के बाद रिक की सलाह पर टेड ने चांदी के सिक्कों से भरी बोरियां लास वेगास से 60 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव पाहरूपम पहुंचा दी. टेड ने वहां जमीन खरीद कर इंजीनियर्स ग्रुप की मदद से एक तहखाना बनवाया था और उसी में अपनी दौलत रखवा दी थी. 17 सितंबर, 1998 की रात लास वेगास के मेट्रोपैलिटन डिपार्टमेंट में एक फोन आया, जिस में एक औरत कह रही थी कि उस के पति की तबीयत बहुत खराब है. उन्होंने सांस लेना बंद कर दिया है.

उस ने घर का पता बताया था 2406, पोलोकिनो लेन. यह टेड बिनियन का घर था. वह फोन सैंडी ने किया था. थोड़ी देर में घर के बाहर 3 जीपें आ कर रुकीं. इसी के साथ डाक्टरों की 2 टीमों के साथ पुलिस वालों की लाइन लग गई. भीतर से सैंडी चिल्लाई,  ‘‘आप लोग इन्हें बचा लो, यह मर जाएंगे, इन की सांस रुक गई है.’’

एक डाक्टर उसे चुप कराने लगा तो बाकी अंदर चले गए. रेंकल ने बाहर आ कर उस से पूछा, ‘‘आप कौन हैं?’’

‘‘मैं उन की बीवी हूं.’’ सैंडी बोली.

‘‘आप की पति से आखिरी बार कब मुलाकात हुई थी?’’

‘‘आज सुबह.’’

रेंकल सैंडी को वहीं छोड़ कर अंदर टेड के पास पहुंचा. उस की नब्ज टटोली तो रुक चुकी थी. शरीर एकदम ठंडा हो चुका था. साफ था टेड मर चुका था. सैंडी भी आ गई और टेड की लाश से लिपट कर रोने लगी. पुलिसकर्मियों ने उसे पकड़ कर अलग किया और सांत्वना दिया. टेड को जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया. वहां सैंडी की तबीयत खराब हो गई तो उसे दवा दे कर सुला दिया गया. कुछ देर में रिक भी आ गया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में उस ने बताया कि वह टेड और सैंडी दोनों का दोस्त है. वह कारोबार के सिलसिले में शहर से बाहर जा रहा था. टेड की मौत का पता चला तो एयरपोर्ट से सीधे अस्पताल आ गया.

पुलिस ने अनुमान लगाया कि कैसीनों का लाइसैंस न मिलने से टेड ने आत्महत्या की होगी. सैंडी ने बताया कि देर शाम उस ने टेड के हाथ में बंदूक देखी थी. चाह कर भी उसे नींद नहीं आ रही थी. परेशानी की वजह से उन्होंने हेरोइन की ज्यादा डोज ले ली होगी? जांच करने वाली टीम ने पाया कि टेड बिनियन की मौत आत्महत्या नहीं थी, बल्कि उसे आत्महत्या दिखाने की कोशिश की गई थी. जांच में उस के कमरे से जो एक्सानेक्स की शीशी मिली थी, उस की अधिक डोज देने से टेड तड़पतड़प कर एक कमरे से दूसरे कमरे में भटका होगा. कमरा बंद होने की वजह से छलांग लगाने का भी कोई रास्ता नहीं था. इस दवा के कारण उल्टी भी हुई होगी, जिसे साफ किया गया होगा.

यह अपराध काफी गहराई तक सोच कर किया गया था. टेड बिनियन की मौत के 2 दिनों बाद 19 सितंबर, 1998 पुलिस को सूचना मिली कि 2 बड़ेबड़े भरे हुए ट्रक पाहरूम से बाहर जाते हुए देखे गए हैं. उन दोनों ट्रकों में से एक को रिक टेबिश चला रहा है, जबकि दूसरे को उस का साथी डेविड मेटसन. दोनों ट्रकों को पीछा कर के पकड़ लिया गया. उस समय तो रिक बहाना कर के बच गया था. उस ने कहा था कि टेड बिनियन ने उसे ये ट्रक मि. एंथनी के पास पहुंचाने को कहा था. लेकिन आगे की जांच में सैंडी और रिक शक के दायरे में आ गए. इस के बाद 14 जून, 1999 को सैंडी मर्फी और रिक टेबिश को गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में पता चला कि जिस रात टेड का कत्ल हुआ था, दोनों होटल पेनिनसुला में एक साथ दिखाई दिए थे. होटल का कमरा मिस्टर एंड मिसेज टेबिश के नाम से बुक कराया गया था. रात गुजारने के बाद दोनों सुबह वहां से एक साथ घर के लिए निकले थे. लेकिन उस समय सबूत न होने की वजह से वे छूट गए थे. करीब 4 सालों बाद अक्टूबर, 2004 में सैंडी मर्फी और रिक टेबिश को सबूतों के साथ पेशी के लिए कोर्ट में लाया गया, जहां दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. सैंडी ने माना कि उस ने टेड बिनियन के साथ शादी प्यार की वजह से नहीं, उस की दौलत की वजह से की थी. वह उस की दौलत हासिल करना चाहती थी. इस के बाद रिक उस की जिंदगी में आया तो दोनों ने शादी का फैसला कर लिया.

सैंडी की तरह रिक भी टेड की दौलत हड़पना चाहता था. सैंडी ने जब उस से टेड की दौलत हथिया कर शादी करने को कहा तो वह राजी हो गया. सैंडी जानती थी कि टेड हेरोइन के नशे का आदी है. इस के अलावा वह कई तरह की नशीली गोलियां भी खाता था. उस ने टेड को मारने के लिए इन्हीं चीजों का सहारा लेने का फैसला किया. रिक भी इस पर सहमत हो गया. घटना वाले दिन पहले दोनों ने दवा की हाई डोज दे कर टेड को मार दिया. उस के बाद दोनों ने जिस्मानी भूख मिटाई.

उन्होंने माना कि टेड बिनियन को जबरदस्ती 12 पैकेट हेरोइन खिलाई गई थी. उस के बाद एक्सानेक्स की 10 गोलियां उस के मुंह में ठूंस दी थी, ताकि उस की अरबों की दौलत के मालिक वे खुद बन सकें. दोनों के अपराध स्वीकार करने और सबूतों के आधार पर जज ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी. उम्रकैद की सजा मिलने के बाद सैंडी और रिक ने कई बार जमानत की अर्जी दी, लेकिन उन्हे खारिज कर दिया गया. 2 जनवरी, 2010 को फिर सैंडी ने उम्र का हवाला देते हुए जमानत की अर्जी दाखिल की कि अभी उस की उम्र ही क्या है, अपने किए की वह काफी सजा भुगत चुकी है, इसलिए उस के भविष्य को ध्यान में रख कर उसे जमानत दी जाए. लेकिन इस बार भी उसे जमानत नहीं मिल सकी. दोनों की उम्रकैद की सजा बरकरार है. यह प्रकरण इतना विख्यात हुआ था कि हौलीवुड में इस पर फिल्म बनी थी. Hindi Crime Story

Moradabad Crime: सावधान – ऐसे दोस्तों से

Moradabad Crime: रईस मंसूरी और जमा खां के बीच गहरी दोस्ती थी. इसी दोस्ती की आड़ में रईस ने उस की बेटी से संबंध तो बनाए ही, अश्लील फिल्म भी बना ली. मजबूरी में जमा खां के बेटे ने जो किया, सामाजिक तौर पर क्या उसे उचित कहेंगे?

मुरादाबाद के मोहल्ला वारसीनगर के रहने वाले रईस मंसूरी का इनवर्टर बनाने और उस की मरम्मत करने का काम था. उस का यह काम काफी अच्छा चल रहा था. 15 दिसंबर, 2015 को इनवर्टर लगवाने के लिए उस के दोस्त जमा खां के बेटे आलम ने फोन किया. आलम शहर के ही मोहल्ला बखलान की चामुंडा वाली गली में रहता था. इनवर्टर लगाने के लिए वह रईस को 5 हजार रुपए पहले ही दे चुका था. लेकिन काम ज्यादा होने की वजह से रईस को आलम के यहां इनवर्टर लगाने का समय नहीं मिला था.

आलम ने 15 दिसंबर को रईस को फोन कर के अपने यहां जल्द इनवर्टर लगाने को कहा तो रईस ने उसे भरोसा दिया कि उसी दिन शाम को वह उस के यहां इनवर्टर जरूर लगा देगा. अपने वादे के अनुसार उसी दिन शाम को लगभग साढ़े 7 बजे रईस  अपनी स्कूटी से आलम के घर के लिए निकला. आलम के घर जाने वाली बात उस ने अपनी पत्नी नुसरत को बता दी थी. रईस को आलम के घर गए कई घंटे बीत गए. न तो वह लौटा और न ही उस ने फोन किया. इस से पहले जब कभी उसे देर होने लगती थी तो वह पत्नी को फोन कर देता था. घर आने में कितनी देर और लगेगी, यह जानने के लिए नुसरत ने फोन किया तो रईस का फोन बंद मिला.

नुसरत ने 2-3 बार पति को फोन किया, हर बार कंप्यूटर द्वारा फोन बंद होने की बात बताई गई. नुसरत परेशान हो गई कि उन्होंने फोन बंद क्यों कर दिया है? आधे घंटे बाद उस ने फिर फोन किया. इस बार भी फोन बंद मिला. पति से संपर्क न होने की बात उस ने अपने देवर अमीर को बताई. अमीर आलम को तो जानता ही था, उस ने उस का घर भी देखा था. अमीर भाई के बारे में पता लगाने आलम के घर पहुंचा. पूछने पर आलम ने बताया कि वह तो इनवर्टर लगा कर 8 बजे ही चले गए थे. अमीर घर लौट आया. अमीर और नुसरत रईस के बारे में पता लगाने लगे, लेकिन कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली.

रात भर दोनों परेशान होते रहे. सुबह होते ही रईस के घर वालों ने एक बार फिर उस की खोज शुरू कर दी. सभी रिश्तेदारों से फोन कर के उस के बारे में पूछा, लेकिन सभी ने कहा कि वह उन के यहां नहीं आया था. जब कहीं से रईस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो घर वाले चिंतित हो गए. 16 दिसंबर को अमीर हुसैन ने थाना मुरादाबाद पहुंच कर भाई रईस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. रईस के मामले में पुलिस कोई काररवाई करती, उस के पहले ही क्रिकेट खेलने वाले कुछ बच्चों ने रईस के बारे में पता कर लिया.

हुआ यह कि 16 दिसंबर की दोपहर को कुछ बच्चे शहर के किनारे से गुजरने वाली रामगंगा नदी के किनारे क्रिकेट खेल रहे थे. उन्हीं बच्चों में से किसी ने ऐसा शौट मारा कि गेंद पानी के किनारे जा कर गिरी. जैसे ही एक बच्चा गेंद लेने गया, उसे वहां एक आदमी का हाथ पड़ा दिखाई दिया. हाथ देख कर वह बच्चा डर गया और उस ने शोर मचा दिया. शोर सुन कर सभी बच्चे वहां आ गए. हाथ देख कर बच्चे क्रिकेट खेलना भूल कर शोर मचाने लगे. इस के बाद आसपास के खेतों में काम करने वाले भी आ गए. सभी इस बात को ले कर परेशान थे कि यह कटा हाथ किस का हो सकता है?

किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को इस की सूचना दे दी. वह इलाका थाना मुगलपुरा के तहत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना थाना मुगलपुरा को दे दी गई. खबर मिलते ही मुगलपुरा के थानाप्रभारी अनिल कुमार वर्मा एसएसआई मनोज कुमार सिंह और अन्य पुलिसकर्मियों को साथ ले कर रामगंगा नदी के किनारे पहुंच गए. हाथ के बालों को देख कर पुलिस ने अनुमान लगाया कि यह हाथ किसी आदमी का है. पुलिस को लगा कि इस हाथ को कुत्ता वगैरह यहां खींच कर ले आया है. लाश भी यहीं आसपास ही होगी.

पुलिस वाले लाश को इधरउधर तलाशने लगे. वहां से कुछ दूरी पर रामगंगा पर बने पुल के नीचे 4 बोरे मिले. पुलिस ने उन बोरों को खोला तो उन में से आदमी के कटे अंग निकले. लेकिन उस में सिर और एक हाथ नहीं मिला. थानाप्रभारी ने यह सूचना एसएसपी नितिन तिवारी, एसपी (सिटी) डा. रामसुरेश यादव को दी तो दोनों पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने सिर और एक हाथ को आसपास बहुत ढूंढा, लेकिन वे नहीं मिले. शायद उन्हें कोई जंगली जानवर उठा ले गया था.

5 टुकड़ों में लाश मिलने की खबर थोड़ी देर में ही शहर में फैल गई. मीडिया वाले भी वहां पहुंच गए. एक दिन पहले ही थाना मुगलपुरा में रईस मंसूरी की गुमशुदगी दर्ज हुई थी. थानाप्रभारी ने गुमशुदगी वाला रजिस्टर चेक किया तो पता चला कि गुम हुए व्यक्ति की कदकाठी और हुलिया मरने वाले से मिल रहा था. यह गुमशुदगी अमीर ने दर्ज कराई थी. अमीर का फोन नंबर लिखा ही था, थानाप्रभारी ने उस नंबर पर फोन कर के उसे बुला लिया. अनिल कुमार वर्मा से बात होने के बाद अमीर अपनी भाभी नुसरत को ले कर रामगंगा के किनारे पहुंच गया. हालांकि लाश का सिर नहीं था, इस के बावजूद कपड़ों से अमीर और नुसरत ने उस की शिनाख्त रईस मंसूरी की लाश के रूप में कर दी.

पति के शरीर के 5 टुकड़े देख कर नुसरत रोरो कर बेहोश हो गई. अमीर समझ नहीं पा रहा था कि उस के भाई की किसी से ऐसी क्या दुश्मनी थी कि उस की हत्या कर उसे इस तरह टुकड़ों में काट कर यहां फेंक गया. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि हत्यारों ने उस के गुप्तांग को काट डाला था. हत्या करने से पहले रईस ने शराब भी पी थी. हत्या के इस सनसनीखेज मामले को सुलझाने के लिए एसएसपी ने एसपी (सिटी) डा. रामसुरेश यादव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम ने मृतक की पत्नी नुसरत और भाई अमीर से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि रईस का किसी से कोई झगड़ा वगैरह नहीं था.

उस दिन शाम को वह आलम के घर इनवर्टर लगाने गया था. उस के बाद नहीं आया. इसी पूछताछ में पुलिस को पता चला कि नुसरत रईस की चौथी बीवी थी. रईस ने पहला निकाह अमरोहा की शबाना से किया था. उसे तलाक दे कर रईस ने गुइयाबाग निवासी नरगिस से दूसरा निकाह किया था. कुछ दिनों साथ रख कर रईस ने उसे भी छोड़ दिया था. इस के बाद रईस ने लालबाग निवासी रानी से निकाह किया. उसे भी छोड़ कर उस ने 8 साल पहले नुसरतजहां से निकाह किया, जिस से उसे 3 बच्चे थे. पुलिस ने मृतक रईस मंसूरी के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगाया तो वह बंद आ रहा था.

लेकिन जांच में पता चला कि उस के फोन की अंतिम लोकेशन 15 दिसंबर की शाम को उसी इलाके में थी, जहां आलम रहता था. इस से यह तो पता चल रहा था कि रईस आलम के यहां गया था, लेकिन वहां जाने के बाद उस का फोन बंद क्यों हो गया? पुलिस को यही पता लगाना था. पुलिस टीम बखलान के रहने वाले आलम के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पूछताछ के लिए पुलिस उसे थाने ले आई. अनिल कुमार वर्मा ने आलम से रईस की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू की तो वह यही कहता रहा कि उस के यहां इनवर्टर लगाने के बाद रईस चला गया था. इस के बाद वह कहां गया, उसे पता नहीं. वह खुद को बेकुसूर बता रहा था.

पूछताछ के दौरान ही एसएसआई मनोज कुमार सिंह को मुखबिर से पता चला कि मृतक रईस के आलम की बहन से नाजायज संबंध थे. यह बात उन्होंने अनिल कुमार वर्मा को बता दी. जिस तरह क्रूरता से रईस की लाश के टुकड़े कर के उस के गुप्तांग को काट कर फेंक दिया गया था, उस से अनिल कुमार वर्मा को लग रहा था कि हत्या के पीछे प्रेमप्रसंग का मामला है. मनोज कुमार सिंह की बात ने उन के शक को पुख्ता कर दिया. उन्हें लगा कि आलम झूठ बोल रहा है. इसलिए उन्होंने उस से थोड़ी सख्ती की तो वह सारी सच्चाई बताने को तैयार हो गया.

उस ने स्वीकार कर लिया कि रईस मंसूरी की हत्या उसी ने की थी. उस ने उस के सामने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे कि उसे उस की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. आलम से पूछताछ में रईस मंसूरी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी. रईस मंसूरी और आलम के पिता जमा खां आपस में अच्छे दोस्त थे. कहा जाता है कि दोनों बिजली की लाइनों का तार चोरी किया करते थे. चोरी किए तार से जो पैसा मिलता था, उसे वे आपस में बांट लेते थे. इसी काम से वे अपनेअपने परिवारों को पाल रहे थे.

लेकिन जमा खां की पत्नी को जानकारी नहीं थी कि उस का पति बिजली के तार चोरी करता है. उसे तो जमा खां ने यही बताया था कि वह इलैक्ट्रिशियन है. करीब 15 साल पहले की बात है. रईस और जमा खां काशीपुर की तरफ बिजली के तार काटने गए थे. जमा खां ने पत्नी को बताया था कि उसे काशीपुर में बिजली फिटिंग का एक बड़ा काम मिला है, रईस के साथ वह उस काम को करने जा रहा है. उस की पत्नी रईस को जानती थी, क्योंकि वह उस के यहां आताजाता रहता था. उस ने कहा था कि वह वहां से कई दिनों बाद लौटेगा. लेकिन वह वहां से जिंदा नहीं लौट सका.

दरअसल, हुआ यह कि जब दोनों रात को काशीपुर के जंगल में 11 हजार वोल्ट की लाइन के तार काट रहे थे, तभी जमा खां को बिजली ने करंट मार दिया. वह खंभे से नीचे गिरा और उस की मौत हो गई. दोस्त को मरा देख कर रईस डर गया. कहीं वह पुलिस के चक्कर में न फंस जाए, वह उसे वहीं छोड़ कर घर चला आया. अगले दिन लोगों ने खेत में लाश देखी तो इस की सूचना पुलिस को दे दी. पुलिस मौके पर पहुंची तो लाश के पास बिजली के तार काटने के औजार देख कर पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि यह बिजली के तार काटने वाला चोर है और बिजली के करंट की चपेट में आ कर मर गया है.

पुलिस ने आवश्यक काररवाई कर के लाश का पोस्टमार्टम कराया और शिनाख्त न होने के बाद अज्ञात मान कर उस का अंतिम संस्कार करा दिया. इस के बाद एक दिन जमा खां की पत्नी को बाजार में रईस मिला तो वह उसे देख कर चौंकी, क्योंकि उस का पति तो रईस के साथ काम करने काशीपुर गया था. तसलीमा ने उस से पति के बारे में पूछा तो रईस ने बताया कि उस की एक हादसे में मौत हो गई है.

पति की मौत की बात सुन कर तसलीमा चौंकी, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो, यह नहीं हो सकता?’’

‘‘मैं सच कह रहा हूं भाभी, करंट लगने से जमा खां की मौत हो गई है.’’ रईस ने कहा.

‘‘यह कैसे और कहां हो गया? तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं?’’ तसलीमा ने पूछा.

‘‘हम दोनों बिजली का तार काटने काशीपुर गए थे. वहीं तार काटते समय उन्हें 11 हजार वोल्ट का करंट लग गया, जिस से वह खंबे से नीचे गिर गया और उस की मौत हो गई.’’ रईस ने बताया.

‘‘मेरे पति चोर नहीं थे, वह तो इलैक्ट्रिशियन थे. तुम झूठ बोल रहे हो.’’ तसलीमा रोते हुए बोली.

‘‘नहीं भाभी, मैं बिलकुल सच कह रहा हूं. उन्होंने तुम्हें बताया होगा कि वह इलैक्ट्रिशियन हैं. हकीकत में हम दोनों तार काट कर बेचा करते थे.’’ रईस ने कहा.

‘‘मुझे तुम्हारी बात पर यकीन नहीं हो रहा. मैं काशीपुर जा कर वहां की पुलिस से मिलूंगी.’’ तसलीमा ने कहा.

‘‘तुम वहां जाना चाहती हो तो जरूर जाओ. लेकिन वहां जा कर तुम खुद भी फंस सकती हो. वहां की पुलिस ने जब जमा खां की लाश बरामद की थी, तब उस के साथ तार काटने के औजार भी मिले थे. जब तुम वहां जाओगी, पुलिस तुम से कहेगी कि एक चोर की बीवी हो कर तुम ने पुलिस को इस की खबर क्यों नहीं दी?’’ रईस ने उसे डराने के लिए कहा.

तसलीमा सीधीसादी औरत थी. वह रईस की बातों से डर कर काशीपुर नहीं गई और पति की मौत का गम सीने में दबा कर रहने लगी. उस समय उस का बेटा आलम 13 साल का था. रईस मंसूरी ने बाद में इनवर्टर का काम शुरू कर दिया. उस ने एकएक कर के 4 शादियां कीं. 3 बीवियों को वह तलाक दे चुका था, अब चौथी बीवी नुसरतजहां के साथ रह रहा था. पति के मरने के बाद तसलीमा को आर्थिक परेशानी हुई तो रईस ने उस की काफी मदद की. इस वजह से वह रईस की एहसानमंद हो गई. तसलीमा की बेटियां जवान हो चुकी थीं. रईस की नीयत उस की बड़ी बेटी पर खराब हो गई. वह उसे फंसाने की कोशिश करने लगा. उसे इस बात की भी शर्म नहीं आई कि वह उस के लंगोटिया यार की बेटी है. एक तरह से वह उस की बेटी की तरह है. लेकिन उस ने इस ओर ध्यान नहीं दिया.

उसे फंसाने के लिए वह उस की पसंद की चीजें खरीद कर देने लगा. आखिर एक दिन वह अपनी योजना में सफल हो गया. नाजायज संबंध बने तो यह सिलसिला काफी दिनों तक चला. उस ने उस के अंतरंग संबंधों की मोबाइल से फिल्म भी बना ली थी. तसलीमा के घर वालों को रईस मंसूरी पर इतना विश्वास था कि कोई उस के बारे में कुछ गलत सोच भी नहीं सकता था. इसी की आड़ में वह अपने मंसूबे पूरे कर रहा था. कुछ दिनों बाद तसलीमा की बेटी ने महसूस किया कि रईस से संबंध बना कर उस ने ठीक नहीं किया, क्योंकि वह उस की पिता की उम्र का है. उस से वह शादी भी नहीं कर सकती.

यह अहसास होने के बाद वह उस से दूरियां बनाने लगी. लेकिन रईस उस का पीछा छोड़ने को तैयार नहीं था. उस ने जो वीडियो बना रखी थी, उसी के बल पर वह उसे ब्लैकमेल करने लगा. रईस ने उसे धमकी दी कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उस वीडियो को इंटरनेट पर डाल देगा. इस धमकी से वह डर गई. इस तरह रईस उस का शारीरिक व मानसिक शोषण करने लगा. तसलीमा का बेटा आलम अब जवान हो चुका था. वह दुनियादारी समझने लगा था. अपने घर आने वाले रईस की गतिविधियां उसे अच्छी नहीं लगती थीं. क्योंकि वह जब भी उस के घर आता था, उस की बहन के आगेपीछे मंडराता रहता था.

वह रईस से तो कुछ कह नहीं कहा, क्योंकि वह उस के मरहूम पिता की उम्र का था. उस की अम्मी भी उस की बड़ी इज्जत करती थी. इसलिए उस ने बहन को ही डांटा कि वह रईस ज्यादा बातें न किया करे. आलम को पता नहीं था कि बात तो उस की बहन भी नहीं करना चाहती, पर रईस ने वीडियो फिल्म का ऐसा खौफ उस के दिल में बैठा दिया है कि ना चाहते हुए भी वह रईस की हर बात मानती है. एक दिन आलम के एक दोस्त ने अपने मोबाइल में उसे एक वीडियो दिखाई. वह वीडियो देख कर आलम का खून खौल उठा. उस वीडियो में उस की बहन रईस के साथ आपत्तिजनक स्थिति में थी. उस के दोस्त को वह फिल्म रईस ने ही दी थी.

इस के बाद रईस आलम का दुश्मन बन गया. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह उसे उस के किए की सजा जरूर देगा. अपने दिल में उठ रहे गुस्से के सैलाब को उस ने जाहिर नहीं होने दिया और रईस को ठिकाने लगाने का उपाय खोजने लगा. आखिर उस ने एक खौफनाक योजना बना ही ली. आलम को अपने घर में इनवर्टर लगवाना था. चूंकि रईस इनवर्टर का काम करता था, इसलिए उस ने रईस को इनवर्टर लगाने के लिए 5 हजार रुपए दे दिए. रईस के पास काम ज्यादा था, इसलिए उस ने सोचा कि जिस दिन उसे टाइम मिलेगा, वह आलम के यहां जा कर इनवर्टर लगा देगा.

आलम ने रईस को फोन किया तो उस ने आलम से कह दिया कि 15 दिसंबर की शाम को वह उस के यहां इनवर्टर लगा देगा. आलम ने उसी दिन रईस को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. इस काम में उस ने अपने एक दोस्त शोएब को भी शामिल कर लिया. उस दिन शाम को वह रईस के आने का इंतजार करने लगा. शाम साढ़े 7 बजे तक रईस उस के यहां नहीं पहुंचा तो उस ने उसे फोन किया. फोन पर बात करने के कुछ देर बाद रईस अपनी स्कूटी से आलम के यहां पहुंच गया.

योजना के अनुसार, आलम ने शराब की एक बोतल पहले से ही खरीद कर रख ली थी. रईस ने जब उस के यहां इनवर्टर लगा दिया तो वह रईस को एक कमरे में ले गया. उस कमरे में मेज पर शराब की बोतल और नमकीन पहले से ही रखी थी.

आलम ने कहा, ‘‘इनवर्टर लगने की खुशी में मैं ने छोटी सी पार्टी रखी है.’’

रईस मना नहीं कर सका और आलम तथा शोएब के साथ शराब पीने बैठ गया. आलम ने तेज आवाज में डेक बजा दिया. जैसे ही उन का पीनेपिलाने का दौर खत्म हुआ, आलम अपनी जगह से उठा और कमरे में पहले से रखे हथौड़े से रईस के सिर पर जोरदार वार कर दिया. एक ही वार में रईस बिना कोई आवाज किए नीचे गिर गया. सिर से खून बहने लगा. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. हत्या के बाद उन के सामने समस्या लाश ठिकाने लगाने की थी. नाराज आलम ने उस की गरदन काट दी. इस के बाद उस ने लाश के टुकड़े कर के 4 बोरों में भर दिए और आधी रात को उन बोरों को एकएक कर के रामगंगा नदी के किनारे फेंक आया.

कमरे में जमीन पर जो खून फैला था, उसे भी उस ने मिट्टी सहित कुरच कर एक बोरे में भर दिया और उसे भी जामा मस्जिद के नाले में डाल आया. उस की स्कूटी को उस ने रामगंगा नदी के पार मजार के पास बने कुंड में फेंक दी. पूछताछ के बाद पुलिस ने आलम के साथी शोएब को भी गिरफ्तार कर लिया. आलम की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त हथौड़ा, चाकू, आरी के ब्लेड, मृतक का मोबाइल फोन और स्कूटी बरामद कर ली. इस के बाद उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Moradabad Crime

(कथा पुलिस सूत्रों व अभियुक्त आलम के बयान पर आधारित. कथा में तसलीमा परिवर्तित नाम है)

 

Family Dispute: बुढ़ापे का सहारा बना कातिल

Family Dispute: हरिकिशन अपना करोड़ों का मकान अपनी तलाकशुदा बेटी को देना चाहते थे, जो उन के दोनों बड़े बेटों को इसलिए मंजूर नहीं था, क्यों उसी मकान में बनी दुकानों से उन की रोजीरोटी चलती थी. इस मामले में समझबूझ कर काम लिया गया होता तो बाप और बहन की हत्या में विजय और अजीत जेल में नहीं होते.

उम्र बढ़ने पर इंसान का शरीर तो कमजोर हो ही जाता है, कई तरह की बीमारियां भी घेर लेती हैं. 88 साल के हो चुके हरिकिशन वर्मा के साथ भी कुछ ऐसा ही था. हालांकि देखने में वह ठीकठाक लगते थे, लेकिन अंदर से वह कई तरह की बीमारियों से घिरे थे. वह शास्त्रीनगर के नीमड़ी गांव स्थित अपने घर में अपनी 50 साल की बेटी राजबाला के साथ रहते थे. उसी मकान में उन के बेटे अजीत और विजय अपनी ज्वैलरी शौप चलाते थे, लेकिन इन दोनों बेटों से उन का कुछ लेनादेना नहीं था. इस की वजह यह थी कि उन का उन से संपत्ति को ले कर विवाद चल रहा था. उन का छोटा बेटा अरविंद, जो उत्तरीपश्चिमी दिल्ली के सरस्वती विहार में रहता था, वही उन की देखभाल के लिए रोज आता था.

अरविंद सुबह ही पिता के पास पहुंच जाता और दिन भर उन की देखभाल करता था. शाम 6-7 बजे वह घर लौट जाता था. कई सालों से उस का यही नियम बना हुआ था. अरविंद 28 जनवरी, 2016 की सुबह करीब साढ़े 9 बजे नीमड़ी गांव स्थित पिता के घर पहुंचा. वह जब भी आता था, घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद मिलता था. दरवाजा खटखटाने के बाद बहन राजबाला कुंडी खोलती थी. 28 जनवरी को भी उस ने दरवाजा खटखटाया. 5 मिनट तक कुंडी नहीं खुली तो उस ने दोबारा दरवाजा खटखटाया. दोबारा भी कुंडी नहीं खुली और न ही अंदर से कोई आवाज आई तो वह सोचने लगा कि पता नहीं क्या बात है, जो अभी तक दरवाजा नहीं खुला.

उस ने आवाज देते हुए दरवाजे को धक्का दिया तो वह खुल गया. वह जैसे ही गैलरी में पहुंचा, उसे किचन के सामने राजबाला औंधे मुंह पड़ी दिखाई दी. बहन को उस हालत में देख कर वह घबरा गया. दौड़ कर उस ने बहन को सीधा किया तो शरीर अकड़ा एवं ठंडा था, नाक और मुंह से थोड़ा खून भी निकला हुआ था, जो सूख चुका था. बहन की हालत देख कर वह सहम उठा. उसे पिता की चिंता हुई तो आवाज देते हुए वह सामने वाले कमरे में गया. वहां टीवी चल रहा था और उस के पिता जो लुंगी बांधे रहते थे, वह बैड पर पड़ी थी. इस के बाद वह सामने वाले कमरे में गया तो वहां पिता रजाई में लिपटे हुए मिले. रजाई हटाई तो उन का शरीर भी ठंडा और अकड़ा हुआ था.

उन्हें पेशाब की जो नली लगी हुई थी, वह जस की तस लगी थी. बहन और पिता की हालत देख कर अरविंद चीखता हुआ बाहर आया और सभी को यह बात बताई. इस के बाद उस ने यह सूचना दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम को दे दी. नीमड़ी गांव के नजदीक मुख्य रोड पर स्थित पैट्रोल पंप के पास अकसर पुलिस कंट्रोल रूम की वैन खड़ी रहती है. 100 नंबर पर कौल होते ही वैन नीमड़ी गांव पहुंच गई और हरिकिशन तथा उन की बेटी राजबाला को बाड़ा हिंदूराव अस्पताल ले गई, जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया.

चूंकि यह क्षेत्र उत्तरी दिल्ली के थाना सराय रोहिल्ला के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना थाना सराय रोहिल्ला को दे दी गई. हरिकिशन और उन के बेटों को थाना सराय रोहिल्ला के ज्यादातर पुलिसकर्मी जानते थे. इस की वजह यह थी कि हरिकिशन और उन के बेटे आए दिन झगड़े की शिकायतें ले कर वहां आते रहते थे. उन के बीच प्रौपर्टी को ले कर काफी समय से झगड़ा चल रहा था.

इसीलिए सूचना पा कर कार्यवाहक थानाप्रभारी साहिब सिंह लाकड़ा एसआई आलोक कुमार राजन, कांस्टेबल यशपाल को ले कर नीमड़ी गांव पहुंच गए. वहां से पता चला कि पुलिस कंट्रोल रूम की वैन हरिकिशन और राजबाला को हिंदूराव अस्पताल ले गई है तो कांस्टेबल यशपाल को घटनास्थल पर छोड़ कर साहिब सिंह लाकड़ा और एसआई आलोक कुमार हिंदूराव अस्पताल जा पहुंचे. साहिब सिंह ने वहां मौजूद मृतक हरिकिशन के बेटे अरविंद से बात करने के बाद इस घटना की जानकारी एसीपी मनोज कुमार मीणा और डीसीपी मधुर वर्मा को दे दी.

2-2 हत्याओं की बात थी, इसलिए डीसीपी मधुर वर्मा, डीसीपी द्वितीय असलम खां, एसीपी मनोज कुमार मीणा भी घटनास्थल का दौरा करने के बाद बाड़ा हिंदूराव अस्पताल पहुंच गए. सूचना पा कर हरिकिशन के अन्य दोनों बेटे विजय वर्मा और अजीत वर्मा, जिन से उन का झगड़ा चल रहा था, वे भी अस्पताल पहुंच गए थे. उन्होंने भी अपने पिता और बहन की हत्या पर दुख जताया. पिता और बहन की हत्या हुई थी, इसलिए दुख होना स्वाभाविक था. पुलिस ने इन दोनों भाइयों से भी बात की. उन्होंने बताया कि जिस मकान में पिता और बहन की हत्या हुई है, उन का वह मकान मेन बाजार में है.

उसी मकान में 2 दुकानें बनी हैं, जिन में वे महालक्ष्मी ज्वैलर्स के नाम से ज्वैलरी का धंधा करते हैं. वे रोजाना सुबह 10 बजे के करीब अपनी दुकानें खोलते हैं और रात 9 बजे बंद कर के सरस्वती विहार स्थित अपने फ्लैटों पर चले जाते थे.

आज जब वे अपनी दुकानों पर आए तो उन्हें पिता और बहन की हत्या की खबर मिली. जब उन्हें पता चला कि दोनों को बाड़ा हिंदूराव अस्पताल ले जाया गया है तो वे वहां आ गए.

‘‘आप दोनों बता सकते हैं कि इन की हत्या किस ने की होगी?’’ साहिब सिंह ने पूछा.

‘‘पता नहीं सर, यह किस ने किया है? इस बारे में हम किसी का नाम भी तो नहीं ले सकते, लेकिन इतना जरूर बता सकते हैं कि कल रात 9 बजे के करीब जब हम दुकान बंद कर के अपने घर के लिए निकले थे, तब दोनों ठीकठाक थे.’’ अजीत वर्मा ने कहा.

अजीत और विजय से बात करने के बाद साहिब सिंह घटनास्थल पर आए. घटनास्थल के निरीक्षण में उन्होंने पाया कि घर का सारा सामान अपनीअपनी जगह पर रखा है. इस से साफ था कि ये हत्याएं लूट की वजह से नहीं की गई थीं. उसी मकान के एक हिस्से में विजय और अजीत की ज्वैलरी की दुकानें थीं. हत्यारों को यदि लूटपाट करनी होती तो वे ताला तोड़ कर दुकानों का सामान ले जा सकते थे, लेकिन दुकानों के ताले बंद थे. अब सवाल यह था कि ये हत्याएं क्यों और किस ने कीं?

थाने पहुंच कर अरविंद ने पुलिस को बताया कि उस के पिता और बहन की हत्या उस के बड़े भाइयों, अजीत वर्मा और विजय वर्मा ने उन की संपत्ति हथियाने के लिए की हैं. संपत्ति को ले कर बापबेटों के बीच आए दिन झगड़ा होने की जानकारी पुलिस को थी ही, इसलिए जब अरविंद ने अपने दोनों सगे भाइयों पर हत्या का शक जताया तो पुलिस ने उस की शिकायत पर अजीत वर्मा और विजय वर्मा के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के इस बात की जानकारी डीसीपी को दे दी.

डीसीपी मधुर वर्मा ने हत्या के इस मामले को सुलझाने के लिए एसीपी मनोज कुमार मीणा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर साहिब सिंह लाकड़ा, एसआई आलोक कुमार राजन, राजीव कुमार, कांस्टेबल यशपाल, ताराचंद को शामिल किया गया. जिन दोनों भाइयों के खिलाफ मुकदमा दर्ज था, वे बाड़ा हिंदूराव अस्पताल में थे. पुलिस टीम दोनों भाइयों अजीत वर्मा और विजय वर्मा को वहां से थाने ले आई. थाने में पूछताछ में दोनों भाइयों ने कहा कि प्रौपर्टी को ले कर पिता से उन का विवाद जरूर चल रहा था, लेकिन हत्या करने जैसी बात वे सोच भी नहीं सकते. अपने समय पर वे दुकानें बंद कर के स्कूटी से सरस्वती विहार चले गए थे.

उन का कहना था कि उन के छोटे भाई अरविंद को पिताजी बहुत ज्यादा चाहते थे, क्योंकि घर में वह सब से छोटा था. ज्यादा लाड़प्यार की वजह से वह बिगड़ गया था. कोई कामधंधा भी नहीं करता था. कहीं ऐसा तो नहीं कि पैसे की जरूरत पड़ने पर उस ने पिताजी से पैसे मांगे हों और पिताजी ने मना कर दिया हो तो उसी ने गुस्से में उन्हें मार दिया हो. राजबाला ने उसे देख लिया हो, तो उस ने उस की भी हत्या कर दी हो. अजीत वर्मा और विजय वर्मा ने पुलिस को जो बताया था, वह सच भी हो सकता था. इसलिए सच्चाई जानने के लिए पुलिस ने अरविंद वर्मा को भी थाने बुला लिया.

पड़ोसियों और दुकानदारों को जब पता चला कि जिन लोगों की हत्या हुई है, पुलिस उन्हीं के घर वालों को संदिग्ध मान कर पूछताछ कर रही है तो उन्हें यह बात बुरी लगी. दुकानें बंद कर के सभी इकट्ठा हुए और कहने लगे कि पुलिस इस मामले को गंभीरता से न ले कर घर वालों को ही परेशान कर रही है. इस बात से नाराज हो कर सभी पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगे. एसीपी मनोज कुमार मीणा और अन्य अधिकारियों ने भीड़ को समझाया और विश्वास दिलाया कि उन्हें कातिलों का सुराग मिल चुका है, इसलिए कातिल जल्द ही पुलिस की गिरफ्त में होंगे. पुलिस किसी निर्दोष को कतई नहीं फंसाती. उन के काफी समझाने के बाद भीड़ शांत हुई.

पुलिस पर मामले के खुलासे का दबाव बढ़ता जा रहा था. अरविंद और उस के दोनों भाई पुलिस की गिरफ्त में थे. पुलिस दोनों उन से अपने तरीके से पूछताछ कर रही थी. पुलिस ने पड़ोसियों से पूछताछ कर के यह जानने की कोशिश की कि हरिकिशन और उन की बेटी राजबाला की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी? इस पूछताछ में एक बात यह सामने आई कि हरिकिशन अकड़ वाले जिद्दी स्वभाव के आदमी थे. अगर कोई आदमी उन के घर के आगे गाड़ी खड़ी कर देता था तो वह उस से लड़ने को तैयार हो जाते थे. लेकिन ये झगड़े ऐसे नहीं थे, जिस से कोई उन की हत्या कर देता.

हरिकिशन का नीमड़ी गांव में 100 वर्ग गज का जो मकान था, वह वहां की मेन बाजार में था. मौजूदा समय में उस की कीमत करोड़ों रुपए में थी. इस से पुलिस को लग रहा था कि ये हत्याएं प्रौपर्टी को ले कर ही की गई हैं. तीनों भाई खुद को बेकसूर बता रहे थे. एसआई आलोक कुमार राजन जिस समय साहिब सिंह के सामने तीनों भाइयों से पूछताछ कर रहे थे, उसी समय इंद्रलोक चौकी के प्रभारी राजीव कुमार सीसीटीवी कैमरे की एक फुटेज ले कर आ गए. वह फुटेज हरिकिशन के मकान के सामने स्थित एक ज्वैलर्स की दुकान के सामने लगे सीसीटीवी कैमरे की थी.

पुलिस को उस फुटेज से पता चला कि अरविंद रोजाना सुबह 9-10 बजे के बीच पिता के पास आता था और शाम 7, साढ़े सात बजे तक वहां रहता था. 28 जनवरी को भी वह साढ़े 7 बजे के करीब मकान के मुख्य दरवाजे से बाहर निकलता दिखाई दिया था. पूछताछ में अरविंद ने बताया भी यही था. उसी फुटेज में साढ़े 8 बजे के करीब एक युवक हरिकिशन के मकान के मुख्य दरवाजे से तेजी से निकलता दिखाई दिया. एचडी क्वालिटी के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में वह युवक साफतौर पर घबराया हुआ दिख रहा था. उस के निकलने के कुछ देर बाद 2 लोग तेजी से उसी दरवाजे से निकले. वे दोनों हेलमेट लगाए हुए थे.

पुलिस ने वह फुटेज अरविंद को दिखाई तो उस ने उन लोगों को पहचान कर बताया कि हेलमेट लगा कर निकलने वाले उस के बड़े भाई अजीत और विजय हैं. उन से पहले जो युवक भागता हुआ निकला था, वह विजय का बेटा विकास है. अरविंद ने बताया कि विकास कभीकभी वहां आता था. घर से निकलते समय इतना घबराया हुआ क्यों था, यह बात उस की समझ में नहीं आई. उस दिन अजीत और विजय घर के अंदर से हेलमेट लगा कर निकले थे, जबकि इस के पहले वे अपना हेलमेट हाथ में ले कर निकलते थे और स्कूटी पर बैठने के बाद हेलमेट लगाते थे. पुलिस ने वह फुटेज अजीत और विजय को दिखाई तो उन्होंने यह तो माना कि हेलमेट लगाए हुए वही घर से निकले थे, लेकिन उस दिन वे घर के अंदर से हेलमेट लगा कर क्यों निकले, इस बात का वे कोई उचित जवाब नहीं दे सके.

पूछताछ के लिए पुलिस विजय के बेटे विकास को थाने ले आई. विकास को अलग ले जा कर जब उस से इस दोहरे हत्याकांड के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने सारी सच्चाई पुलिस को बात दी. उस ने बताया कि उसी ने अपने पिता और चाचा के साथ मिल कर दादा और बूआ की हत्या की थी. बेटों द्वारा बाप और बहन के कत्ल की बात सुन कर पुलिस हैरान रह गई. क्योंकि एक बाप ने जिस तरह जीजान लगा कर अपने बेटों की परवरिश की थी, किसी लायक बनाया था, वही बेटे उन की जान ले लेंगे, ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था.

खैर, केस खुल चुका था. अजीत और विजय जो अब तक पिता और बहन की हत्या पर घडि़याली आंसू बहा रहे थे और खुद को बेकसूर बता रहे थे, उन की हकीकत सामने आ चुकी थी. पुलिस ने उन दोनों के सामने विकास से पूछताछ की. उस ने उन के सामने भी हत्या का खुलासा कर दिया. अब विजय और अजीत कैसे हत्या से मना कर सकते थे. लिहाजा उन्होंने भी स्वीकार कर लिया कि इस डबल मर्डर को उन्होंने ही अंजाम दिया था. उन्होंने बताया कि पिता और बहन ने उन के सामने ऐसे हालात खड़े कर दिए थे कि उन की हत्या करने के अलावा उन के पास कोई दूसरा उपाय नहीं था.

विकास, विजय और अजीत से पूछताछ के बाद हरिकिशन और उन की बेटी राजबाला की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

हरिकिशन वर्मा मूलरूप से हरियाणा के जिला झज्जर के रहने वाले थे. सन 1950 के आसपास नौकरी की तलाश में वह दिल्ली आए तो सन 1953 में दिल्ली के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में उन की नौकरी लग गई. इस के बाद वह अपनी पत्नी लक्ष्मी देवी को भी दिल्ली ले आए. हरिकिशन की ड्यूटी गुलाबी बाग के स्कूल में थी, इसलिए उन्होंने वहीं नीमड़ी गांव में किराए का कमरा ले लिया. हंसीखुशी के साथ उन का समय बीत रहा था. वह एकएक कर 4 बेटों आजाद, अजीत, विजय, अरविंद और 4 बेटियों सावित्री, सरला, राजबाला और चंद्रकला के पिता बने.

हरिकिशन के पिता हरलाल गांव में रहते थे. वह हरिकिशन के लिए अनाज वगैरह भेजते रहते थे. घर से सहयोग मिलने की वजह से हरिकिशन को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती थी. उसी दौरान उन के पिता ने नीमड़ी गांव में उन के लिए 100 वर्ग गज का एक प्लौट खरीद दिया था. वह प्लौट गांव की मुख्य सड़क के किनारे था. हरिकिशन उसी प्लौट में घर बनवा कर रहने लगे. उन्होंने अपने सभी बच्चों को पढ़ायालिखाया. बच्चे जैसेजैसे जवान होते गए, वह उन की शादियां करते गए. बड़े बेटे आजाद की युवावस्था में ही मौत हो गई थी. उस के बाद उन के 3 बेटे रह गए थे.

हरिकिशन ने उत्तरीपश्चिमी दिल्ली के सरस्वती विहार में एक 3 मंजिला मकान बना कर एकएक फ्लोर अपने तीनों बेटों को रहने के लिए दे दिया था, जिस में वे अपनेअपने परिवारों के साथ रहते थे. उन का नीमड़ी गांव में जो मकान था, उस में अजीत और विजय ने अलगअलग 2 दुकानें बना ली थीं, जिन में वे सोनेचांदी की ज्वैलरी का धंधा करते थे. हर मांबाप के लिए उस समय एक बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है, जब उन की बेटी शादीशुदा होने के बावजूद अपने मायके में आ कर रहने लगती है. राजबाला की यही समस्या थी, जिस की वजह से हरिकिशन काफी परेशान रहते थे. हरिकिशन सन 1988 में नौकरी से रिटायर हो चुके थे.

दरअसल, उन्होंने राजबाला की शादी फरीदाबाद में कर दी थी. शादी के बाद हर औरत की ख्वाहिश मां बनने की होती है. शादी के कई सालों बाद भी जब वह मां नहीं बनी तो वह मानसिक तनाव में रहने लगी. क्योंकि ससुराल में सभी उसे ताने देने लगे थे. हालात यहां तक पहुंच गए कि पति ने उसे तलाक दे दिया. तलाक के बाद राजबाला पिता के पास आ गई. जवान बेटी किस तरह अपनी जिंदगी काटेगी, इस बात की चिंता हरिकिशन और उन की पत्नी लक्ष्मी देवी को परेशान करती थी. दोनों एक बार बेटी का घर फिर से बसाने की कोशिश की और दिल्ली में ही एक आदमी से उस की शादी कर दी.

बेटी का घर फिर से बस गया तो वे निश्चिंत हो गए. सभी बच्चे अपनीअपनी घरगृहस्थी में खुश थे, इसलिए उन्हें किसी भी तरह की कोई चिंता नहीं थी. लेकिन उन की यह निश्चिंतता ज्यादा दिनों तक कायम नहीं नहीं रह सकी. बेटी राजबाला की उन्होंने जो दूसरी शादी की थी, उस से भी उस की जिंदगी में खुशहाली नहीं आ सकी. वजह वही रही कि यहां भी राजबाला की कोख सूनी रही. वह मां नहीं बनी तो उस की गृहस्थी में फिर से जहर घुलना शुरू हो गया.

ससुराल के और लोगों की बात तो दूर, पति भी बातबात पर ताने देने लगा. रोजरोज की बेइज्जती से राजबाला ऊब गई तो एक दिन ससुराल से मायके आ गई. यह सन 2003 की बात है. इस के बाद वह न ससुराल गई और न ही उस का पति उसे बुलाने आया. राजबाला ने इसे नियति का खेल मानते हुए हालातों से समझौता कर लिया और पिता के साथ ही रहने लगी. लक्ष्मी देवी राजबाला की बहुत चिंता करती थीं. इसी चिंता की वजह से वह बीमार रहने लगीं और सन 2004 में एक दिन चल बसीं.

हरिकिशन वर्मा ने तीनों बेटों को सरस्वती विहार में एकएक फ्लैट दे रखा था. उन्हें अब बेटी राजबाला की चिंता थी. उन के न रहने पर बेटे राजबाला की देखभाल करेंगे या नहीं, इस बात पर उन्हें संशय था. इसलिए वह नीमड़ी गांव वाला मकान राजबाला को देना चाहते थे, जिस से भविष्य में उसे किसी का मोहताज न रहना पड़े. नीमड़ी वाले मकान में 2 दुकानों और उन के पीछे वाले 2 कमरों पर विजय और अजीत का कब्जा था. मकान मुख्य बाजार में था, इस से काफी महंगा था. अजीत और विजय को जब पता चला कि उस के पिता यह मकान राजबाला के नाम करना चाहते हैं तो उन्होंने पिता से इस बात का विरोध किया.

हरिकिशन जिद्दी स्वभाव के थे ही. उन्होंने साफ कह दिया कि यह मकान उन का है, इसलिए वह इसे किसे देते हैं, यह उन की मरजी. पिता के इस दो टूक जवाब से दोनों भाइयों को लगा कि अगर उन्होंने मकान दूसरे के नाम कर दिया तो उन के हाथ से दुकानें निकल जाएंगी. तब वे सड़क पर आ जाएंगे. उन्होंने पिता की बात का जम कर विरोध किया और यहां तक कह दिया कि वे किसी भी हालत में यह घर किसी दूसरे के नाम नहीं करने देंगे. इसी बात को ले कर बापबेटों के बीच आए दिन झगड़ा होने लगा.

इस झगड़े से परिवार 2 हिस्सों में बंट गया. एक तरफ अजीत और विजय थे तो दूसरी तरफ हरिकिशन, उन की बेटी राजबाला और बेटा अरविंद. दोनों ही अपनीअपनी जिद पर अड़े थे. हरिकिशन ने भी ठान लिया था कि जो औलाद उन की बात नहीं मान रही, उसे वह अपनी जायदाद से फूटी कौड़ी नहीं देंगे. उन्होंने दोनों बेटों से अपनी दुकानें खाली करने को कह दिया. लेकिन वे दुकानें खाली करने को तैयार नहीं थे. तब हरिकिशन ने दिल्ली उच्च न्यायालय की शरण ली. अजीत और विजय ने न्यायालय में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि चूंकि वे हरिकिशन वर्मा की जायज औलादें हैं, इसलिए इस पैतृक संपत्ति पर उन का भी अधिकार है.

जबकि हरिकिशन कहा था कि यह संपत्ति पैतृक नहीं है, इसे उन्होंने खुद खरीदी है. इसलिए इस संपत्ति पर वे अपना अधिकार नहीं जता सकते. अदालत ने फैसला सुनाया कि जिन दुकानों का अजीत और विजय उपयोग कर रहे हैं, हर महीने वे डेढ़डेढ़ हजार रुपए किराए के रूप में हरिकिशन को दें. यह बात करीब 9 साल पहले की है. इसी आदेश पर दोनों भाई पिता को निर्धारित धनराशि देते रहे. विजय और अजीत ने अपनी दुकानों के पीछे बने कमरों में चांदी के सिक्के बनाने की मशीनें लगवा ली थीं. बड़े ज्वैलर्स के और्डर पर वे चांदी के सिक्के बना कर पहुंचाते थे. इस से उन की आमदनी बढ़ गई थी. राजबाला और हरिकिशन दुकानों को खाली कराने के उपाय खोजते रहते थे. इसलिए दोनों भाई दुकानों के शटर में ताले हमेशा अंदर से लगाते थे.

अंदर से ताले लगा कर वे पीछे की गैलरी से होते हुए घर के मुख्य दरवाजे से निकलते थे. उसी समय राजबाला या हरिकिशन उन से किसी न किसी बात पर झगड़ा कर बैठते थे, जिस की शिकायत पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर होती थी. तब पुलिस मौके पर पहुंच कर दोनों पक्षों को समझाबुझा कर शांत कराती थी. जैसेजैसे हरिकिशन की उम्र बढ़ती जा रही थी और वह बीमार भी रहने लगे थे, इसलिए उन का छोटा बेटा अरविंद उन की देखभाल के लिए रोज सुबह उन के पास आ जाता था. दिन भर उन के पास रहता और शाम को सरस्वती विहार स्थित अपने घर चला जाता था. उस का रोज का यही क्रम था.

दिवाली या अन्य मौकों पर अजीत और विजय के पास चांदी के सिक्के बनाने के बड़े और्डर आते थे, जिन्हें पूरा करने के लिए वे रातदिन काम करते थे. इन के काम को प्रभावित करने के लिए राजबाला 100 नंबर पर फोन कर के शिकायत कर देती थी कि उस के भाई सिक्के बनाने में तेजाब का इस्तेमाल करते हैं, जिस की स्मैल से उस के बूढ़े पिता को सांस लेने में परेशानी होती है. इस शिकायत पर पुलिस आ कर उन का काम रुकवा देती थी. काम रुकने पर विजय और अजीत का नुकसान होता. इस तरह के फोन राजबाला अकसर करती रहती रहती थी. आए दिन के इस तरह के झगड़े से दोनों भाई परेशान रहते थे.

एक दिन विजय के हाथ पिता के इसी मकान की एक परची हाथ लग गई. वह परची गांव वजीरपुर के प्रधान द्वारा लिखी गई थी. पहले जब लोग कोई प्लौट या मकान खरीदते थे, गांव में इसी तरह की परचियों पर लिखापढ़ी हो जाती थी. हरिकिशन को भी प्लौट की इसी तरह की परची कटी थी. वह परची हरिकिशन के पिता हरलाल के नाम थी. लेकिन हरिकिशन ने उस परची पर कटिंग कर के अपना नाम लिख दिया था. विजय को इस परची से लगा कि नीमड़ी गांव वाला प्लौट उस के दादा हरलाल ने खरीदा था. यानी जिस प्लौट को हरिकिशन अपने द्वारा खरीदा बता रहे थे, वह उन के दादा का खरीदा था. जबकि दादा की संपत्ति परिवार के लोगों की मरजी के बिना किसी और को नहीं दी जा सकती थी.

उसी परची के आधार पर विजय ने तीसहजारी न्यायालय में इस्तगासा दाखिल कर प्लौट की उस परची पर कटिंग कर धोखाधड़ी करने वाले पिता हरिकिशन और भाई अरविंद के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने की अपील की थी. यह सन 2009 की बात है. तत्कालीन महानगर दंडाधिकारी ज्योति कलेर के आदेश पर उस परची की फोरैंसिक जांच हुई तो यह बात सिद्ध हो गई कि परची पर कटिंग कर के हरिकिशन का नाम बाद में लिखा गया था. इस के बाद कोर्ट के आदेश पर हरिकिशन और उन के छोटे बेटे अरविंद के खिलाफ सराय रोहिल्ला थाने में भादंवि की धारा 420/467/468/120 बी के तहत रिपोर्ट दर्ज हो गई थी.

इस केस में हरिकिशन की गिरफ्तारी हुई तो अरविंद ने अपनी अग्रिम जमानत ले ली थी. यह मामला आज भी महानगर दंडाधिकारी श्री अजय कुमार मलिक की कोर्ट में चल रहा है, जिस की अगली तारीख 15 मार्च, 2016 है. कोर्ट में केस चलने के बावजूद इन लोगों के बीच चल रहा झगड़ा बंद नहीं हुआ. छोटीछोटी बातों पर झगड़ा कर के पुलिस को फोन करना आए दिन की बात थी, इसीलिए थाने का हर पुलिसकर्मी इन्हें अच्छी तरह से जानता था. झगड़े से विजय और अजीत का धंधा चौपट हो रहा था. उन पर लोगों का कर्ज भी हो गया था.

28 जनवरी, 2016 की शाम 6 बजे दोनों भाई इसी समस्या पर विचार कर रहे थे, तभी विजय का बेटा विकास आ गया. अपने पिता और चाचा की हालत देख कर वह भी परेशान हो गया. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इस समस्या का समाधान कैसे निकला जाए. अचानक विकास तैश में आ गया. उस ने कहा कि क्यों न इस समस्या की जड़ हरिकिशन और राजबाला को ही खत्म कर दिया जाए? उपाय अच्छा था. विजय और अजीत विकास की बात पर सहमत हो गए, लेकिन समस्या यह थी कि यह सब किया कैसे जाए.

विकास ने कहा, ‘‘यह बहुत आसान है. दादा और बूआ को गला दबा कर मार देते हैं. उस के बाद हम लोग निकल चलते हैं. यहां अरविंद चाचा भी आते हैं, वह दिन भर इन के पास रहते हैं. पुलिस जब पूछताछ करेगी तो हम अरविंद का नाम ले लेंगे. इस तरह एक तीर से 2 शिकार हो जाएंगे. लालच में आ कर तीनों ने हरिकिशन और उस की बेटी राजबाला की हत्या करने की पूरी योजना बना डाली. शाम 7 बजे के बाद जब अरविंद वहां से चला गया तो 8 बजे के करीब उन्होंने अपनी दुकानों के शटर गिरा कर अंदर से ताले बंद किए. इस के बाद वे तीनों गैलरी से होते हुए उन कमरों की तरफ गए, जहां हरिकिशन और राजबाला रहते थे.

राजबाला उस समय कमरे में बैठी टीवी देख रही थी. विजय उस के कमरे में इस तरह घुसा कि राजबाला को उस के आने की भनक तक नहीं लगी. विजय ने उस के पास पहुंच कर पहले एक हाथ से मुंह दबोचा और दूसरे हाथ से उस का गला दबाने लगा. राजबाला मजबूत जिस्म की थी. उस ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की. किसी तरह उस ने खुद छुड़ा भी लिया. वह कमरे से निकल कर बाहर के दरवाजे की ओर भागी तो विजय ने उसे पकड़ कर गिरा दिया और दोनों हाथों से गला घोंट दिया.

अजीत और विकास उस कमरे में गए, जिस में हरिकिशन सोते थे. हरिकिशन उस समय रजाई ओढ़े सो रहे थे. आते ही विकास ने हरिकिशन का मुंह वहां पड़ी धोती से दबाया तो हरिकिशन जाग गए. उन्होंने अपना बचाव करते हुए विकास को गाल पर एक चांटा मारा तो विकास की पकड़ ढीली पड़ गई. तभी अजीत ने विकास को हटा कर खुद पिता का मुंह और नाक हाथ से दबा दिया. हरिकिशन तड़पने लगे तो विकास ने उन के पैर दबोच लिए. कुछ देर में उन का शरीर ढीला पड़ गया तो उन्होंने उन की लाश रजाई में लपेट दी. उन्हें उम्मीद थी कि मकान के मुकदमे से जुड़े कागजात घर में रखी सेफ में रखे होंगे, इसलिए वे चाबी तलाशने लगे.

राजबाला के कमरे में उन्हें एक बैग मिला, जिस में उन्हें अलमारी की चाबी मिल गई. वह चाबी विजय ने अपने पास रख ली. दोनों हत्याएं करने के बाद पहले विकास निकला. वह घबराया हुआ इधरउधर यह देख रहा था कि उसे घर से निकलते कोई देख तो नहीं रहा. इस के कुछ देर बाद सिर पर हेलमेट लगा कर विजय और अजीत निकले. जाते समय वे दरवाजे को भिड़ा गए थे. तीनों ने यही सोचा था कि घर से निकलते हुए उन्हें किसी ने नहीं देखा, लेकिन उन के घर के सामने ज्वैलर्स की दुकान के बाहर उच्च क्वालिटी के लगे सीसीटीवी कैमरे ने देख लिया था, यह शायद उन्हें पता नहीं चला.

विकास मैट्रो से तो विजय और अजीत अपनी एक्टिवा से सरस्वती विहार स्थित अपने फ्लैटों पर चले गए थे. तीनों यही सोच रहे थे कि उन पर किसी को शक नहीं होगा. लेकिन उन की हकीकत कैमरे से सामने आ गई थी. पुलिस ने विजय, अजीत और विकास से पूछताछ कर 29 जनवरी को उन्हें तीस हजारी न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी अजय कुमार मलिक के समक्ष पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. पुलिस ने सेफ की चाबी व अन्य सबूत इकट्ठे कर 31 जनवरी को उन्हें फिर से उन्हीं की अदालत में पेश किया, जहां से सभी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Family Dispute

—कथा पुलिस सूत्रों और अभियुक्तों से की गई बातचीत पर आधारित

 

Emotional Crime Story: इनाम या ब्लैकमेल

Emotional Crime Story: जिंदगी में अच्छे लोग भी मिलते हैं और बुरे भी. जिस लड़की ने अपनी हरकतों से मेरी नींद हराम कर दी थी, वह रिया निकलेगी, मैं ने सोचा भी नहीं था. लेकिन रिया के साथ जो हुआ था, उस ने ही कहां सोचा होगा. बहरहाल, हम मिले तो अच्छाई और बुराई दोनों सामने आ गई.  ट्रेन फुल स्पीड में दौड़ रही थी. बाहर हलकीहलकी बूंदाबांदी हो रही थी. मैं खिड़की के पास ही बैठा था. कुछ देर तक तो रिमझिम फुहार अच्छी लगी,

पर जब पानी की बूंदें मेरी सीट पर गिरने लगीं तो मैं ने शीशा गिरा दिया. लोगों को मुझ से शिकायत रही है कि मुझे बोलना नहीं आता. ठीक ही कहते थे लोग. मैं 4 घंटे से चुपचाप बैठा था. आसपास बैठे यात्री आपस में बातें कर रहे थे. मैं या तो अपनी डायरी उलटपलट कर देखता था या फिर बीचबीच में न्यूजपेपर पढ़ लेता था. मेरे सामने वाली सीट पर एक महिला बैठी थी. मैं ने उस की साड़ी से ही समझ लिया था कि कोई महिला या लड़की है, अभी तक उस की शक्ल नहीं देखी थी. बात करने का तो सवाल ही नहीं था. जबकि वह सब से घुलमिल कर बातें कर रही थी.

इसी बीच वह उठ कर मेरी खिड़की के पास आ कर बोली कि थोड़ी सी खिड़की खोल देती हूं, घुटन सी महसूस हो रही है. मैं अपनी डायरी में कुछ लिखने की सोच रहा था, सो बिना सिर उठाए या उस की तरफ देखे मैं ने हूं कह दिया. खिड़की खोल कर वह अपनी सीट पर जा बैठी. थोड़ी देर में चाय वाला आया तो उस ने अपने लिए चाय ली और औपचारिकतावश आसपास के यात्रियों से भी चाय के लिए पूछा, मुझ से भी. मैं ने बिना उस की ओर देखे ना कह दिया.

खैर, उस ने 3 या 4 कप चाय ली. कितनी, मुझे ठीक से पता नहीं, पर सब के पैसे उसी ने दिए. मैं ने कनखियों से उसे पैसे देते देखा था. इस बीच मैं बाथरूम गया. लेकिन जब लौटा तो वह लड़की सीट पर नहीं थी. मैं यह तो बताना ही भूल गया कि मैं कोलकाता से पटना जा रहा था. जब तक मैं बाथरूम से निकल कर अपनी सीट पर आता, ट्रेन आसनसोल पर खड़ी थी और वह लड़की वहीं उतर गई थी.

थोड़ी देर में ट्रेन चली तो फिर मैं फिर से अपनी डायरी उठा कर पढ़ने लगा. उस में एक परची रखी थी. मैं ने पढ़ना शुरू किया तो दिमाग के तवे पर वैसे ही एक जोरदार छींटा सा लगा, जैसे डोसा बनाने वाले गरम तवे पर पानी के छींटे मारते वक्त होता है. उस पर लिखा था, ‘गिड्डू, तू घोंचू ही रहा. डायरी में जिंदगी को कैद करता है, इस से बाहर निकल कर जिंदगी जीना सीख ले.’

मेरी समझ में नहीं आया कि वह लड़की कौन हो सकती है. गिड्डू विशेषण मुझे हाईस्कूल में मिला था और घोंचू कालेज में. हालांकि दोनों में किसी का सही अर्थ आज तक मुझे खुद नहीं मालूम. पटना में स्कूल के कुछ दोस्तों ने मुझे बताया था कि नाटे को गिड्डू कहते हैं, हालांकि मैं उतना छोटा भी नहीं था. मैं ने उस के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई टाटा से की थी. इस का मतलब वह लड़की मेरे साथ स्कूल और कालेज दोनों में रही थी. मेरे बगल में बैठे यात्री ने मुझ से पूछा कि क्या मैं उस लड़की को जानता हूं तो मैं ने सिर हिला कर ना कहा. पर वह बोला कि वह तो बारबार आप की ओर देख कर मुसकरा रही थी, लेकिन आप ने एक बार भी उस की ओर नहीं देखा. न ही उस की चाय ली थी. मैं क्या कहता, इसलिए चुप रह गया.

खैर, मैं अपने घर पटना आ गया. मैं कोलकाता में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी जौइन करने के बाद कुछ दिनों के लिए पटना आया था. कोलकाता में फ्लैट लेने के बाद मुझे अपना बाकी सामान कोलकाता शिफ्ट करना था. पर मेरे जेहन में वह लड़की बैठी थी, कौन हो सकती थी वह? मैं ने ट्रेन में उस से बात तो नहीं की थी, अलबत्ता उसे बातें करते जरूर सुना था. इस बीच मेरे सेल पर 3 बार फोन आया और मेरे हैलो कहने पर उधर से भी एक लेडी हैलो बोलती थी, फिर फोन कट जाता था.

एक बार मैं ने हिम्मत कर के उस नंबर पर डायल किया तो उधर से आवाज आई, ‘‘गिड्डू, सौरी दीपक! मुझे फोन करने की हिम्मत कैसे कर ली? खैर, फोन किया है तो बताओ, तुम कोलकाता कब और किस ट्रेन से लौट रहे हो?’’ बिना कोई बात किए इस बार मैं ने फोन काट दिया. एक बार जब मैं घर पर नहीं था तो घर की लैंडलाइन पर फोन आया था. पिताजी ने फोन उठाया तो उस लड़की ने बताया, ‘‘अंकल, मैं दीपक के औफिस से बोल रही हूं. औफिस में कुछ अरजेंट काम है. आप बता सकते हैं वह कब आ रहे हैं?’’

अब तक मेरा नाम आप भी जान गए होंगे. जी हां, सही पकड़ा आप ने, मेरा नाम दीपक ही है. पिताजी ने तो मेरे बारे में बता दिया था, पर लड़की का नाम नहीं पूछा था. वह लड़की मेरे लिए पहेली बनती जा रही थी. बहरहाल, चौथे दिन मैं कोलकाता लौट आया था. मैं ने अपना सामान ट्रांसपोर्ट से बुक करा दिया था. मैं जब औफिस में पहुंचा तो थोड़ी देर बाद मेरे सेल पर फोन आया. उसी लड़की की आवाज थी.

‘‘क्यों, औफिस पहुंच गया?’’ और फोन कट गया. अब मुझे गुस्सा आने लगा था. मैं ने ठान लिया था कि इस लड़की तक किसी भी कीमत पर पहुंच कर रहूंगा. इसी उलझन में मुझे नींद भी नहीं आ रही थी कि एक बार फिर लड़की ने फोन कर के कहा, ‘‘क्यों, नींद नहीं आ रही है न?’’ इतना कह कर उस ने फोन काट दिया था.

हर शुक्रवार को कंपनी के मैनेजिंग डाइरेक्टर मीटिंग ले कर सप्ताह भर में हुए काम या उन में आने वाली कठिनाइयों की समीक्षा करते थे. उस मीटिंग में सभी इंजीनियर्स को जाना पड़ता था. इस बार की मीटिंग में मुझे थोड़ी डांट पड़ी थी, क्योंकि मेरे काम की प्रगति संतोषजनक नहीं थी. उसी दिन रात में उस लड़की ने फोन किया, ‘‘क्यों, मीटिंग में तैयारी कर के क्यों नहीं आते हो? कभीकभी मैनेजमेंट को ओवर रिपोर्टिंग कर के बचना सीखो. और हां, जो कमी रह गई है, अगले हफ्ते पूरी करो. अब ज्यादा तंग नहीं करूंगी. मेरा कोटा पूरा हो गया. जितना तुम ने तंग किया, उस का बदला ले लिया है.’’

‘‘जहां तक मुझे याद है मैं ने किसी को तंग नहीं किया, पर मेरा फोन नंबर तुम्हें कहां से मिला?’’ मैं ने कहा. संयोग से इस बार उस ने फोन काटा नहीं.

कुछ पल की खामोशी के बाद उस ने कहा, ‘‘फोन नंबर तो तुम्हारी डायरी में ट्रेन में ही मिल गया था. और हां, तुझे बोलना ही कहां आता था, जो मुझे तंग करता? अच्छा मैं ही बोलती हूं. कल दोपहर पार्कस्ट्रीट में ब्लू फौक्स में आ जाना, बोका कहीं का.’’ और फोन कट गया. अगले दिन शनिवार था. छुट्टी का दिन. इस आखिरी शब्द ‘बोका’ पर मेरा माथा ठनका. यह शब्द तो बंगाली बोलते हैं. एक तरह से यह उन का तकियाकलाम होता है. इस का मतलब यह लड़की बंगालिन है और मेरी ही कंपनी में है. हो सकता है, एमडी सचिवालय में ही हो. उस की बातों की टोन बंगाली थी. जबकि मेरे सेक्शन में एक भी बंगाली लड़की नहीं थी. एक रिया नाम की बंगाली लड़की दूसरे सेक्शन में थी.

पटना में हम लोग किराए के एक मकान में रहते थे. रिया भी पास वाले मकान में ही रहती थी. उस के पिता रेलवे में थे और उन की पोस्टिंग पटना में थी. हम दोनों की छत के बीच बस एक 3 फुट की रेलिंग थी. गरमियों में बहुत बार देर रात तक दोनों का परिवार छत पर ही रहता था. कभी सिर्फ हम दोनों ही रहते थे. वह बहुत चुलबुली और खुराफाती थी. कभी अकेले छत पर होता तो कमेंट्स करती थी. कभी होली में रंग फेंकती थी. एक बार जब छत पर अकेला था, उस ने एक पर्ची भी फेंकी थी, लिखा था ‘ना समझे वो अनाड़ी है.’ दूसरे दिन पर्ची पर लिखा था, ‘तेरी बनियान में 2 छेद हैं.’ मेरे कपडे़ छत पर सूखते वक्त देखा होगा उस ने.

एक बार तो लिखा, ‘लव यू बेबी’. पर मेरी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती थी. 11वीं कक्षा के बाद उस के पिता का आसनसोल ट्रांसफर हो गया था. इस के अतिरिक्त मैं उस के बारे में कुछ नहीं जानता था. उस का चेहरा भी मुझे याद नहीं था. यह तो स्कूल की बात हुई. मैं सोचने लगा, कालेज में मुझे जो घोंचू विशेषण मिला, उस की जानकारी इस लड़की को कैसे मिली? फिर सोचा कल तो मिल ही रहे हैं, फिर माथापच्ची क्या करना. शनिवार को ठीक 12 बजे मैं ब्लू फौक्स के सामने खड़ा था. तभी टैक्सी से एक लड़की उतर कर मेरी ओर आई और उस ने पास आ कर कहा, ‘‘हाय, मैं रिया. मैं जानती हूं, तुम मेरा ही इंतजार कर रहे हो. चलो, अंदर बैठ कर बातें करते हैं. मैं ने एक टेबल बुक कर रखी है.’’

रिया ने एक एकांत कोने में टेबल बुक करा रखी थी. अब पहली बार मैं ने उस के चेहरे को देखा. मुझे धूमिल सा रिया का चेहरा याद आया. पर अब वह मैच्योर्ड और सुंदर लग रही थी. मैं ने कहा कि अब मैं अपना इंट्रोडक्शन दूं तो उस ने बीच में ही टोका, ‘‘नो मिस्टर दीपक.’’

मैं मुसकरा कर रह गया. वेटर और्डर लेने आया तो उस ने पहले कोल्डड्रिंक लाने को कहा, साथ में लंच भी और्डर कर दिया.

फिर रिया ने कहा, ‘‘शुरू तो मुझे ही करना होगा, तुम से तो हो नहीं सकेगा. तुम सोच रहे होगे, तुम तक मैं पहुंची कैसे?’’

मेरे हां कहने पर उस ने कहा, ‘‘बता चुकी हूं कि ट्रेन में तुम्हारी डायरी से तुम्हारा नंबर मिला था. मैं ने भी इसी कंपनी में एमडी सचिवालय में तकनीकी सहायक के पद पर हाल ही में जौइन किया है. वीकली मीटिंग में भाग लेने वालों में तुम्हारा नाम देखा था. इस तरह तुम तक आसानी से पहुंच गई.’’

तब तक वेटर कोल्डड्रिंक दे गया. हम दोनों ने साथसाथ कोल्डड्रिंक की सिप ली. इस बार मैं बोला, ‘‘तुम्हें मेरे स्कूल और कालेज के विशेषण कहां मिले? तुम तो मेरे सेक्शन में नहीं थी और न ही कालेज में?’’

‘‘घोंचू! सौरी अब नो मोर. तुम्हारे सेक्शन की लड़कियां मेरी भी सहेली थीं. मैं ने भी टाटा से ही इंजीनियरिंग की है. पर पहले अटेंप्ट में कंपीट नहीं कर सकी थी, पर दूसरे साल कंपीट कर गई थी और तुम से एक साल जूनियर हो गई. पर मैं आंखकान दोनों खुले रखती हूं.’’

इस बार मैं खुल कर हंसा. मैं ने पूछा कि मैं ने तो कभी तुम्हें तंग नहीं किया, तुम कैसे कहती हो कि मुझ से बदला ले रही हो. वह हंस कर बोली, ‘‘खाना आ चुका है. शुरू करो, साथ में बातें भी होती रहेंगी.’’ और हम ने खाना शुरू कर दिया.

रिया बोली, ‘‘यही तो शिकायत है तुम से. मैं तो चाहती थी कि तुम मुझे बारबार देखते और छेड़ते. जवाब में मैं भी तुम्हें छेड़ती. इस तरह हम करीब आ सकते थे. पर मैं तुम्हारा मौनव्रत नहीं तुड़वा सकी थी. पहल मैं ने ही की थी, पर तुम उदासीन रहे थे. जहां तक मुझे याद है, तुम ने एक बार भी मेरी तरफ ठीक से नहीं देखा होगा. मुझे लगा, तुम मुझे इग्नोर कर रहे हो. दूसरे लड़कों की तरह मुझे देख कर तुम ने न कभी आंख मारी, न सीटी बजाई. तुम्हारी इसी अदा पर मैं फिदा थी. तब मैं ने सोचा कि तुम्हें मैं ही ठीक करूंगी, पर तब तक पिताजी का ट्रांसफर हो गया था. अब जा कर आखिर पकड़े ही गए.’’

और वह इतना जोर से हंसी कि पास की टेबल पर बैठे लोग हमारी ओर देखने लगे थे. बाद में सौरी बोल कर वह झेंप गई थी. पता नहीं क्यों अब मेरा मन भी रिया के पास आने का करने लगा था. हमारा खानापीना खत्म हुआ, वेटर बिल ले आया. जब मैं ने जेब से पर्स निकाला तो रिया बोली, ‘‘नो..नो, मैं ने तुम्हें यहां बुलाया है तो बिल भी मैं ही दूंगी.’’

होटल से बाहर आ कर उस ने टैक्सी बुलाई तो मैं ने कहा, ‘‘चलो, कुछ देर विक्टोरिया मेमोरियल के पार्क में बैठते हैं.’’

‘‘ये कौन बोला, चलो अच्छा हुआ, डायरी के पन्नों से बाहर निकल आए.’’ कह कर उस ने मेरा मजाक उड़ाया. खैर, हम विक्टोरिया मेमोरियल के पार्क के एक वीरान कोने में जा बैठे. जब रिया ने पूछा कि बीवीबच्चे यहीं हैं कि पटना में तो मैं ने कहा कि अभी तो बैचलर ही हूं. फिर मैं ने पलट कर पूछा, ‘‘तुम ने शादी की?’’

रिया ने कहा, ‘‘नहीं, पर करीब एक साल तक जिस के साथ लिवइन में रही, उस से ब्रेकअप हो गया है. यही कोई एक सवा महीने पहले.’’

मैं कुछ देर खामोश रहा और सोचने लगा कि यह लड़की किस चीज की बनी है. इतना कुछ होने पर भी जिंदगी को खुशीखुशी जिए जा रही है. मैं ने महसूस किया कि रिया खामोश थी. इस के आगे मुझे उस के निजी जीवन के बारे में पूछने का साहस नहीं हुआ. मैं ने उस से कहा कि मेरा कोलकाता का मशहूर बोटैनिकल गार्डन देखने का मन है तो उस ने खामोशी तोड़ते हुए कहा, ‘‘नो प्रौब्लम, कल संडे है. पूरा दिन हम जहां चाहें घूम सकते हैं. कल सुबह नाश्ता कर के 10 बजे यहीं मिलते हैं. मैं सैंडविच और कौफी बना कर साथ ले आऊंगी. वहीं गार्डन में लंच करेंगे, कैसा रहेगा?’’

‘‘परफेक्ट. तुम ने तो मेरे मन की बात कह डाली.’’ मैं ने कहा. इस के बाद मैं अपने फ्लैट पर आ गया. ब्रेकअप के बाद रिया अपनी ही कंपनी की एक लड़की के साथ फ्लैट शेयर करती थी. संडे को हम दोनों बोटैनिकल गार्डन में गंगा के किनारे जा बैठे. मैं ने रिया से परिवार के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि परिवार में बस पिताजी हैं. मां का देहांत हो चुका है. जब उस ने मेरे बारे में पूछा तो मैं ने भी बता दिया कि मां ही है, जो मेरे साथ कोलकाता में रहेगी.

इस के बाद मैं ने ही उस से पूछा कि क्या ब्रेकअप पर पुनर्विचार की संभावना नहीं है. उस ने थोड़ा मुसकरा कर कहा, ‘‘तुम्हें बोलना आ गया है.’’ और आगे भी उसी ने कहा, ‘‘मुझे कायर और धोखेबाज आदमी से सख्त नफरत है. उस से तो बेहतर है, मैं अकेली ही जी लूंगी.’’

मैं ने कहा, ‘‘अकेले का सवाल क्यों? हो सकता है उस से बेहतर साथी मिल जाए. बुरा न मानो तो क्या मुझे बता सकती हो वह कौन है? मैं उस से मिल कर फिर से सब ठीक करने का प्रयास कर सकता हूं.’’

रिया ने मुझे ऐसा करने से मना कर दिया और कहा, ‘‘मैं तो खुली किताब हूं. मुझे तुम्हें बताने में कोई संकोच नहीं है.’’

उस ने बताया कि कंपनी ने उसे 6 महीने की ट्रेनिंग के लिए जर्मनी भेजा था. उसी बैच में मैनेजिंग डाइरेक्टर का बेटा रवि भी गया था. वहीं उस से दोस्ती भी हुई. भारत लौटने पर दोनों की पोस्टिंग नासिक में थी. वहां दोस्ती प्यार में बदल गई और उस के साथ रहने लगी थी. उस ने भरोसा दिलाया था कि जल्द ही दोनों शादी कर लेंगे. इसी बीच रिया को गर्भ रह गया था. रवि ने उस से कहा कि वह शादी बाद में कर लेगा, पर उसे गर्भपात कराना होगा. लेकिन रिया को यह मंजूर नहीं था. यह बात एमडी साहब तक पहुंची तो आननफानन में पिछले माह रिया का ट्रांसफर कोलकाता ब्रांच में कर दिया गया.

रिया ने बताया कि कोलकाता में उसे डायरेक्टर ने अपने सेक्रेटरिएट में रखा था. उसे बुला कर काफी डांटा भी था. कहा था कि वैसे भी किसी दूसरे प्रांत और जाति की लड़की उन की बहू नहीं बन सकती. रिया ने भी दो टूक कह दिया था कि उसे रवि जैसे कायर की जरूरत नहीं है. जब हम दोनों बोटैनिकल गार्डन में बैठे थे, तभी एमडी का पर्सनल सेक्रेटरी भी घूमता हुआ हमारे पास आ गया था. वह 2 मिनट इधरउधर की बातें कर के चला गया था. उस ने बौस को हम दोनों के बारे में बता दिया था. उन्होंने मुझे और रिया को एक साथ अपने चैंबर में बुलाया. उन्हें शायद गलतफहमी थी कि हम दोनों प्यार करते हैं.

वैसे अब मैं खुद उस से प्रभावित था और उसे चाहने लगा था. उन्होंने कहा कि अगर हम लोग शादी कर लें तो एकदो साल के लिए हमारी पोस्टिंग विदेश में करवा सकते हैं. रिया को यह बात बुरी लगी और वह बौस पर ही बरस पड़ी, ‘‘मैं समझ सकती हूं कि आप अपने बेटे की घिनौनी करतूत का ठीकरा दीपक के सिर फोड़ना चाहते हैं.’’

इतना सुन कर एमडी ने आगबबूला हो कर कहा, ‘‘मैं चाहूं तो तुम दोनों को नौकरी से निकाल सकता हूं.’’

इस बार न जाने मुझ में कहां से इतना साहस आ गया कि मैं बोला, ‘‘और अगर रिया चाहे तो आप और आप के बेटे दोनों को हवालात की हवा खिला सकती है. आप भूल जाएं कि आप बौस हैं तो जो जी में आए, कर सकते हैं. आप को इतनी सी समझ आ जाए तो आप का ही भला होगा.’’

रिया आश्चर्यचकित हो कर मेरी ओर देखे जा रही थी. मैं ने इशारे से उसे बाहर निकलने को कहा और हम दोनों बौस के औफिस से बाहर आ गए. रिया मुझे औफिस में ले गई. पहले तो उस ने पानी पीने को कहा, फिर 2 कप चाय और्डर की. फिर उस ने कहा, ‘‘तुम्हें बौस से उलझने की क्या जरूरत थी?’’

मैं ने कहा, ‘‘तो मैं उस खूसट को मनमानी करने देता? अब हमें बड़ा फैसला लेना होगा.’’

वह बोली, ‘‘हमें मतलब? मुझ से क्या चाहते हो?’’

मैं ने कहा, ‘‘ऐसी हालत में लड़कियों को मां की सख्त जरूरत होती है. मुझे पूरा यकीन है कि मेरी मां मेरा साथ अवश्य देगी. हम दोनों 15 दिन की नोटिस के साथ इस्तीफा दे देते हैं. इस बीच हम लोग छुट्टी पर रहेंगे. अगर तुम्हें आजीवन साथ पसंद हो तो सब ठीक हो जाएगा. जब मैं फोन करूं, मेरे फ्लैट पर आ जाना. मैं इस हाल में तुम्हें अकेली नहीं छोड़ सकता. तुम्हें मुझ पर भरोसा है या नहीं?’’

‘‘पहले तो यह बता दूं कि मुझे तुम्हारा अचानक बदला रूप बहुत अच्छा लगा. पर सब कुछ जानते हुए भी तुम इस पचड़े में क्यों पड़ रहे हो?’’

मैं ने सिर्फ इतना कहा कि मेरी बात स्वीकार हो तो मेरे फोन करने पर मेरे फ्लैट पर आ जाना, तब तक मां भी आ जाएगी. और अपना त्यागपत्र दे कर मैं औफिस से निकल गया. घर आ कर मैं ने मां को फोन पर सारी बात बता कर कहा कि वह कल की गाड़ी से कोलकाता आ जाए. मां के आने पर मैं ने रिया को फोन कर के कल आने को कहा. अगले दिन सुबह रिया आई तो मैं ने उसे मां से मिलाया. मां ने मुझ से कहा कि मुझे थोड़ी देर अकेले में रिया से बात करने दो. दोनों ने काफी देर तक बातें कीं. मैं ने देखा कि दोनों की आंखें गीली थीं.

मां ने उसे कल फिर आने को कहा और वह चली गई. मैं ने रिया से फोन पर पूछा कि मां से क्या बातें हुईं तो उस ने कहा, ‘‘पहले तो मेरे परिवार के बारे में बात की. फिर कहा तुम तो हमें पंसद हो, पर इस बच्चे के कारण थोड़ी उलझन में हूं. मैं ने कहा कि आप एक मां हैं, भला कोई मां अपनी कोख गिराना चाहेगी? मुझे तो एक मर्द ने धोखा दिया है. मैं चाहती भी नहीं थी कि दीपक इस झंझट में पड़े. हो सके तो आप ही उसे समझाइए. इस पर मां भी रो पड़ी थीं. पता नहीं कल क्यों बुलाया है?’’

रिया के जाने के बाद मां ने मुझ से भी पूछा, ‘‘सब कुछ जान कर तुम रिया को अपनाने को तैयार हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है. बाद में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए.’’

मैं ने फिर फोन कर के मां की बात रिया को बताई और उस से पूछा कि उसे तो कोई प्रौब्लम नहीं है. इस पर वह बोली, ‘‘दीपक मेरे लिए तो विन विन सिचुएशन (चित भी मेरी पट भी मेरी) है. पर तुम मेरी खातिर क्यों नौकरी छोड़ रहे हो?’’

रिया ने बताया था कि उस ने भी रूममेट से अपना इस्तीफा भिजवा दिया है. मैं ने कहा कि 3-4 दिनों के अंदर ही मंदिर में हम शादी कर लेंगे और घर पर ही 15-20 दोस्तों के साथ पार्टी करेंगे. रिया मेरे कंधे पर सिर रख कर सिसकने लगी. मैं ने उसे थपथपाते हुए अलग किया तो बोली, ‘‘मैं ने तो सोचा था कि सब मर्द एक से होते हैं, बल्कि मर्द को दर्द ही नहीं होता है.’’

मैं ने कहा, ‘‘मर्द को भी दर्द होता है.’’

और चौथे दिन हमारी शादी हो गई. उस के अगले दिन हम ने घर पर पार्टी दी. मेरे नहीं चाहने पर भी रिया ने बौस को निमंत्रित किया था. उस ने कहा कि वह बौस को अहसास दिलाना और शर्मिंदा करना चाहती है कि इस दुनिया में उन के बेटे जैसा शैतान भी है तो दीपक जैसा इंसान भी. वे आए भी और उन्होंने बेटे की करतूत के लिए हम लोगों से माफी भी मांगी. साथ ही कहा भी, ‘‘तुम दोनों का इस्तीफा नामंजूर हो गया है और हां, मेरी तरफ से यह उपहार है.’’

वे 2 लिफाफे थे. एक लिफाफे में ट्रैवल एजेंट के नाम का चैक था, ताकि वह हमारे स्विट्जरलैंड टूर का वीसा, टिकट व अन्य खर्चों की व्यवस्था हमारी सुविधानुसार कर सके. दूसरे लिफाफे में काफी महत्त्वपूर्ण पेपर थे, जिन में रवि और उस के मातापिता के हस्ताक्षर थे. लिखा था कि रिया के होने वाले बच्चे पर उन का भविष्य में कोई अधिकार नहीं होगा. जातेजाते बौस ने एक बार फिर माफी मांगी और कहा, ‘‘दीपक, तुम ने 2 बड़े काम किए हैं. एक तो दोनों परिवारों की इज्जत बचाई और दूसरे समाज के लिए एक असाधारण मिसाल पेश की. इसलिए तुम्हें इनाम तो मिलना ही चाहिए. तुम्हारा प्रमोशन और्डर भी मैं ने साइन कर दिया है. इसे अन्यथा नहीं लेना.’’

और बौस ने हम सब को बाय कह कर विदा ले ली. पर रिया सोच रही थी कि यह इनाम था या ब्लैकमेल. Emotional Crime Story