Crime Story: कपूत की करतूत

Crime Story: करोड़पति बाप का बेटा अशोक अगर सीधी राह चलता तो ऐशोआराम की जिंदगी गुजार सकता था. लेकिन अपनी गलत आदतों के चलते पैसे की चाहत में उस ने अपने पिता की ही हत्या की सुपारी दे दी.

बासठ वर्षीय मामन जमींदार परिवार से थे, इसलिए इलाके के लोग उन का काफी सम्मान करते थे. इस उम्र में भी वह पूरी तरह स्वस्थ थे. इस की वजह यह थी कि वह बहुत ही अनुशासित जीवन जीते थे. वह हर रोज सुबह घर से काफी दूर स्थित पार्क में टहलने जाते थे और अपने हर मिलने वाले का कुशलक्षेम पूछते हुए 7, साढ़े 7 बजे तक घर लौटते थे.

2 नवंबर, 2014 की सुबह जब वह पार्क में टहल कर सवा 7 बजे घर लौट रहे थे तो गली में एक पल्सर मोटरसाइकिल उन के सामने आ कर इस तरह रुकी कि वह उस से टकरातेटकराते बचे. मोटरसाइकिल पर 2 युवक सवार थे. उन के चेहरों पर रूमाल बंधे थे. युवकों की यह हरकत मामन को नागवार गुजरी तो उन्होंने युवकों को डांटने वाले अंदाज में कहा, ‘‘यह कैसी बदतमीजी है, तुम्हारे मांबाप ने तुम्हें यह नहीं सिखाया कि बुजुर्गों से किस तरह पेश आना चाहिए?’’

‘‘सिखाया तो था, लेकिन हम ने सीखा ही नहीं,’’ मोटरसाइकिल चला रहे युवक ने हंसते हुए कहा, ‘‘ताऊ, हम ने तो एक ही बात सीखी है, पैसा लो और खेल खत्म कर दो.’’

‘‘क्या मतलब?’’ मामन ने हकबका कर पूछा.

मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे युवक ने उतरते हुए कहा, ‘‘ताऊ मतलब बताने से अच्छा है, कर के ही दिखा दूं.’’

इसी के साथ उस ने हाथ में थामी गुप्ती निकाल कर मामन के पेट में घुसेड़ दी. चीख कर मामन जमीन पर बैठ गए. उस वक्त वह इस तरह घिरे थे कि भाग भी नहीं सकते थे. उन की चीख सुन कर कुछ लोग घरों से निकल आए. तभी मोटरसाइकिल पर सवार युवक ने पिस्तौल लहराते हुए धमकी दी, ‘‘अगर कोई भी नजदीक आया तो गोली मार दूंगा.’’

उस की इस धमकी से किसी की आगे आने की हिम्मत नहीं पड़ी. इस बीच वह युवक मामन पर गुप्ती से लगातार वार करता रहा. वह चीखते रहे, छटपटाते रहे. लेकिन वह उन्हें गुप्ती से तब तक गोदता रहा, जब तक उन की मौत नहीं हो गई. जब उसे लगा कि मामन मर चुके हैं तो वह कूद कर मोटरसाइकिल पर बैठ गया. उस के बाद मोटरसाइकिल पर सवार युवक तेजी से मोटरसाइकिल चलाता हुआ चला गया. मामन इलाके के जानेमाने और सम्मानित व्यक्ति थे. उन की हत्या की खबर पलभर में पूरे इलाके में फैल गई. जहां हत्या हुई थी, थोड़ी ही देर में वहां भारी भीड़ जमा हो गई. किसी ने इस घटना की सूचना फोन से थाना नरेला को दे दी.

इलाके के एक सम्मानित व्यक्ति की हत्या होने की सूचना से थाना नरेला की पुलिस तुरंत हरकत में आ गई. थाने से एएसआई राजेंद्र सिंह, महिला सिपाही मधुबाला, अभिमन्यु एवं बीट के सिपाहियों को तुरंत घटनास्थल पर भेजा गया. राजेंद्र सिंह ने घटनास्थल एवं शव का निरीक्षण कर के वहां एकत्र लोगों से पूछताछ की. इस के बाद औपचारिक काररवाई निपटा कर उन्होंने लाश को पोस्टमार्टम के लिए राजा हरिश्चंद्र अस्पताल भिजवा दिया.

थाना नरेला पुलिस की जांच का सिलसिला काफी लंबा चला. इस के बावजूद पुलिस न हत्या की वजह जान सकी और न हत्यारों का सुराग लगा सकी. मामन की हत्या जिन 2 युवकों ने की थी, उन्होंने चेहरों पर रूमाल बांध रखे थे, इसलिए हत्या के समय घटनास्थल पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शी पुलिस को उन के बारे में कुछ भी नहीं बता सके थे. हां, किसी ने उस पल्सर मोटरसाइकिल का नंबर जरूर बता दिया था, जिस से दोनों हत्यारे भागे थे. पुलिस ने उस नंबर की मोटरसाइकिल के बारे में पता किया तो पता चला कि वह उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर की थी. उस के मालिक ने स्थानीय थाने में 1 नवंबर, 2014 को मोटरसाइकिल की चोरी की रिपोर्ट दर्ज करा रखी थी. बाद में 13 नवंबर, 2014 को वह नरेला के जंगल से बरामद हो गई थी.

दिल्ली के नरेला स्थित गांव बांकनेर के ममनीरपुर रोड पर मामन का आलीशान मकान था. उस इलाके में मामन के 5 अन्य मकान थे, जिन में तमाम किराएदार रहते थे. हर महीने किराए के रूप में उन्हें करीब 3 लाख रुपए मिलते थे. इस के अलावा उन के पास सैकड़ों एकड़ खेती की जमीन थी. साथ ही वह ब्याज पर पैसा देने का काम भी करते थे. ब्याज के भी उन्हें लाखों रुपए मिलते थे. मामन के परिवार में एक बेटा अशोक उर्फ चौटाला और एक बेटी सोनम थी. उन की पत्नी की मौत तब हो गई थी, जब बेटी 11 साल की और बेटा 14 साल का था. सयानी होने पर सोनम की शादी उन्होंने हरियाणा के सोनीपत निवासी सत्येंद्र से कर दी थी.

अशोक का विवाह उन्होंने दिल्ली के बसंतकुंज के रहने वाले हरिप्रसाद की बेटी रोशनी से किया था. लेकिन अशोक से रोशनी की पटरी नहीं बैठी. वह तलाक ले कर मायके में रहने लगी. अदालत के आदेश पर उसे हर महीने 20 हजार रुपए गुजाराभत्ता मिलता था, जिसे अशोक हर माह अदालत में जमा करता था. अशोक राजा हरिशचंद्र अस्पताल में सिक्युरिटी गार्ड की नौकरी करता था. मतभेदों के चलते मामन ने उसे घर से निकाल दिया था. वह मामन के बनवाए दूसरे मकान में अकेला रहता था.

मामन काफी मिलनसार थे. उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. दुश्मनी होती भी कैसे, वह हर किसी के सुखदुख में खड़े रहते थे. किसी बीमार को इलाज के लिए पैसों की जरूरत होती अथवा किसी की बेटी की शादी होती तो वह बिना ब्याज के पैसा देते थे. जितनी हो सकती थी, मदद भी करते थे. इसी वजह से इलाके के लोग उन की इज्जत करते थे. ऐसे आदमी की किसी से ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती थी, यह बात पुलिस समझ नहीं पा रही थी. थाना नरेला पुलिस ने अपने स्तर से काफी छानबीन की, लेकिन वह हत्यारों का सुराग नहीं लगा सकी. जब थाना पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर सकी तो 13 फरवरी, 2015 को यह मामला दिल्ली की अपराध शाखा को सौंप दिया गया.

अपराध शाखा के जौइंट कमिश्नर रविंद्र कुमार ने थाना नरेला पुलिस द्वारा की गई जांच का अध्ययन करने के बाद यह केस क्राइम ब्रांच के एडिशनल कमिश्नर अजय कुमार को सौंप दिया. अजय कुमार ने इस मामले की जांच के लिए क्राइम ब्रांच के डीसीपी राजीव कुमार के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में क्राइम ब्रांच के एसीपी जितेंद्र सिंह, इंसपेक्टर अशोक कुमार आदि को शामिल किया गया.

थाना नरेला पुलिस ने अपनी जांच की जो फाइल तैयार की थी, इंसपेक्टर अशोक कुमार ने उसे ध्यान से पढ़ा. उन्हें इस बात पर हैरानी हुई कि थाना पुलिस ने मामन , उन के बेटे अशोक, बेटी सोनम व सोनम के पति के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच करने की जहमत नहीं उठाई थी, जबकि आजकल तमाम केसों का खुलासा मोबाइल फोन से ही हो जाता है. अशोक कुमार ने तुरंत मृतक मामन, उन के बेटे अशोक उर्फ चौटाला, बेटी सोनम और उस के पति सत्येंद्र के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगवाने के साथ उन के नंबरों की 1 नवंबर से 15 नवंबर, 2014 तक की काल डिटेल्स निकलवाई. उन्होंने तीनों की काल डिटेल्स को ध्यान से देखी तो मामन के बेटे अशोक उर्फ चौटाला की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर उन्हें संदेह हुआ.

अशोक उर्फ चौटाला ने उस नंबर पर 1 नवंबर, 2014 की सुबह, दोपहर, शाम और रात में फोन कर के काफी देर तक बातें की थीं. इस के अलावा इसी नंबर पर उस ने 2 नवंबर की सुबह 5 बजे, 11 बजे और शाम 6 बजे बातें की थीं. उसी दिन सुबह सवा 7 बजे मामन की हत्या हुई थी. इस के बाद अशोक उर्फ चौटाला की उसी नंबर पर 25 दिसंबर से ले कर 28 दिसंबर, 2014 तक कुल 13 बार बातें हुईं थीं. इस के बाद 13 जनवरी से ले कर 17 जनवरी, 2015 तक 8 बार बातें हुई थीं.

जिस नंबर पर बातें हुई थीं, वह नंबर रिलायंस का था. अशोक कुमार ने रिलायंस से इस नंबर के बारे में पता किया तो बताया गया कि वह नंबर उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के रहने वाले नीतू उर्फ काला का है. हत्या में जिस मोटरसाइकिल का उपयोग हुआ था, वह भी बिजनौर की थी, इसलिए अशोक कुमार को लगा कि हत्या नीतू उर्फ काला ने ही की है. उन्होंने बिजनौर पुलिस से संपर्क कर के नीतू उर्फ काला के बारे में जानकारी मांगी तो पता चला कि 26 वर्षीय नीतू उर्फ काला पेशेवर अपराधी है. उस के खिलाफ उत्तर प्रदेश और हरियाणा के अनेक थानों में लूट, हत्या, हत्या की कोशिश और रंगदारी के कई मुकदमे दर्ज थे. काला कई बार जेल भी जा चुका था. उस समय वह जमानत पर छूटा हुआ था. बिजनौर पुलिस ने उसे जिला बदर कर रखा था.

जब अशोक उर्फ चौटाला पूरी तरह संदेह के घेरे में आ गया तो अशोक कुमार ने अपने कुछ मुखबिर मामन के बेटे अशोक के पीछे लगा दिए. आखिर एक दिन उन्हें किसी मुखबिर से पता चला कि अशोक की शराब के ठेके पर 2 लोगों से झड़प हो रही थी. वे लोग उस से अपने पैसे मांग रहे थे, जो अशोक ने हत्या के एवज में देने का वादा किया था. इस के बाद अशोक कुमार ने उन दोनों लोगों के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वे दोनों नीतू उर्फ काला और हरियाणा के सोनीपत का रहने वाला सुपारी किलर जितेंद्र उर्फ टिंकू थे. यह भी जानकारी मिली कि जितेंद्र काला का जिगरी दोस्त है. उस पर भी हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश में कई संगीन अपराधों के मुकदमे दर्ज हैं. ये दोनों मिल कर अपराध करते हैं.

इस के बाद अशोक कुमार ने अपनी टीम के साथ हर उस जगह छापा मारा, जहां काला और टिंकू मिल सकते थे. लेकिन वे कहीं नहीं मिले. अलबत्ता इस काररवाई में यह जरूर पता चला कि टिंकू दिल्ली के छावला स्थित गांव ख्याला खुर्द में किराए का मकान ले कर रहता है, जबकि काला दिल्ली के नरेला के सैक्टर ए-6 के पौकेट 1 में मकान नंबर 167 में किराए पर रहता है. लेकिन दोनों वहां भी नहीं मिले. इसी बीच पुलिस को पता चला कि मृतक मामन के बेटे अशोक ने 90 लाख में 2 एकड़ जमीन बेची है.

मामन का बेटा शक के दायरे में आया था तो अशोक कुमार ने उन की बेटी सोनम के सोनीपत स्थित घर जा कर पूछताछ की थी. इस पूछताछ में उन्होंने जरा भी यह जाहिर नहीं होने दिया था कि उन्हें उस के भाई पर शक है. उन का पहला सवाल था, ‘‘तुम्हारे पिता की किसी से ऐसी कोई दुश्मनी तो नहीं थी, जिस की वजह से उन की हत्या की गई हो?’’

‘‘पापा बहुत अच्छे इंसान थे,’’ सोनम ने कहा, ‘‘वह हर किसी के दुखसुख में खड़े रहते थे. भला ऐसे आदमी की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी?’’

‘‘फिर भी उन की हत्या हो गई. हत्या की कोई तो वजह होगी? तुम्हारे ख्याल से क्या वजह हो सकती है?’’ अशोक कुमार ने पूछा.

सोनम कुछ क्षण सिर नीचा किए बैठी रही. उस के बाद गहरी सांस ले कर बोली, ‘‘क्या कहूं सर, मेरे ख्याल से पापा की हत्या संपत्ति की वजह से हुई है. मेरा भाई बहुत ज्यादा लाड़प्यार की वजह से बिगड़ गया था. वह अय्याश और नशेबाज है. जुआ भी खेलता है. उस की इन गलत आदतों की वजह से पापा ने उसे और उस की पत्नी को अलग मकान दे कर घर से निकाल दिया था. कोई कारोबार करने के लिए उसे 6-7 लाख रुपए भी दिए थे. भाई ने कारोबार करने के बजाय वे रुपए अपने गलत शौकों में उड़ा दिए. उस के बाद वह लोगों से कर्ज ले कर खर्च करता रहा. पता चला है कि इस समय एक करोड़ के करीब कर्ज है. कर्ज देने वाले उसे परेशान कर रहे थे.’’

‘‘तुम्हारे कहने का मतलब है कि तुम्हारे भाई ने पिता की हत्या कराई है?’’

‘‘मुझे तो ऐसा ही लगता है.’’

‘‘तुम्हारे पिता के पास कितनी संपत्ति होगी?’’

‘‘कई मकान, सैकड़ों एकड़ जमीन, करोड़ों का बैंक बैलेंस. कुल मिला कर सौ करोड़ से ज्यादा की संपत्ति होगी.’’

‘‘इतनी संपत्ति के लिए तो तुम भी पिता की हत्या करवा सकती हो?’’

‘‘मैं पापा की हत्या क्यों कराऊंगी. सारी संपत्ति तो वैसे ही वह मेरे नाम करने जा रहे थे.’’

‘‘यह बात तुम्हारे भाई को पता थी?’’

‘‘जी पता थी. इस बात को ले कर वह अकसर पापा और मुझ से झगड़ा भी करता रहता था. पापा ने उस से कह भी दिया था कि वह उसे एक पैसा नहीं देंगे.’’

इस के बाद उन्होंने अशोक उर्फ चौटाला की तलाकशुदा पत्नी रोशनी के घर जा कर पूछताछ की थी. रोशनी ने बताया था कि अशोक शराबी, जुआरी, बाजारू औरतों के पास जा कर मुंह काला करने वाला बदतमीज इंसान है. ऐसे आदमी के साथ कौन औरत गुजारा कर सकती है. परेशान हो कर उस ने भी तलाक ले लिया. उस के ससुर बहुत अच्छे आदमी थे. अपने गलत शौक पूरे करने के लिए अशोक उन से पैसे मांगता था. पैसे न मिलने पर वह उन के साथ गालीगलौज करता था. कई बार उस ने उन्हें जान से मरवाने की धमकी भी दी थी. जरूर उसी ने उन की हत्या कराई होगी.

अशोक कुमार ने ये सारी बातें एसीपी जितेंद्र सिंह को बताईं तो उन्होंने तुरंत अशोक उर्फ चौटाला को हिरासत में लेने का आदेश दे दिया. इस के बाद 22 सितंबर, 2015 को अशोक कुमार की टीम अशोक उर्फ चौटाला को हिरासत में ले कर नेहरू प्लेस स्थित थाना क्राइम ब्रांच ले आई, जहां उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की जाने लगी. पुलिस के पास उस के खिलाफ सारे सबूत थे ही, मजबूरन उसे अपना अपराध स्वीकार कर के सच बताना पड़ा.

इस के बाद पुलिस टीम ने अशोक उर्फ चौटाला की निशानदेही पर जितेंद्र उर्फ टिंकू और नीतू उर्फ काला को भी दिल्ली के छावला इलाके से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने 23 सितंबर, 2015 को तीनों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के अदालत में पेश किया, जहां से पूछताछ के लिए तीनों को एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान पुलिस ने नीतू और टिंकू की निशानदेही पर गांव ख्याला खुर्द के एक बाग से हत्या में प्रयुक्त गुप्ती बरामद कर ली. रिमांड खत्म होने पर तीनों को 24 सितंबर, 2015 को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया.

हत्याभियुक्तों के बयान के आधार पर मामन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी: मामन पुश्तैनी रईस थे, लेकिन वह उन रईसों में नहीं थे, जो विरासत में मिली धनसंपत्ति से ऐश करते हैं. उन्होंने पुरखों से मिली धनसंपत्ति का सदुपयोग करते हुए उस में इजाफा ही किया था. उन की पत्नी की मौत तभी हो गई थी जब बेटा अशोक 14 साल का और बेटी सोनम 11 साल की थी. लोगों के कहने पर भी उन्होंने दूसरी शादी नहीं की थी और बच्चों को खुद ही पालने लगे थे. अधिक लाड़प्यार की वजह से बेटा अशोक बिगड़ गया था.

गलत संगत की वजह से वह किशोरावस्था से ही गंदी आदतों का शिकार हो गया. पिता से उसे मनचाहा जेब खर्च मिलता ही था, इसलिए उस के तमाम दोस्त भी थे. उन के साथ वह नशा करता, जुआ खेलता और बाजारू लड़कियों के साथ अय्याशी करता. इन बातों की जानकारी जब मामन को हुई तो उन्होंने अशोक को जेब खर्च देना बंद कर दिया. लेकिन अब तक अशोक पूरी तरह बिगड़ चुका था. पैसे न मिलने पर वह घर में चोरी करने लगा. अब तक वह 24 साल का हो चुका था. मामन ने सोचा कि अगर उस का विवाह कर दें तो जिम्मेदारी पड़ने पर शायद वह सुधर ही जाए.

उन्होंने अशोक का विवाह रोशनी से कर दिया. लेकिन वह नहीं सुधरा. वह पहले की ही तरह शराब पीता और बाजारू औरतों के पास जाता. पत्नी उसे रोकती तो वह उस के साथ मारपीट करता. तंग आ कर मामन ने अशोक को घर से निकाल दिया. उसे और उस की पत्नी के रहने के लिए दूसरा मकान दे दिया. वह कोई कामधंधा कर सके, इस के लिए उसे 7 लाख रुपए भी दिए. अशोक चाहता तो इतने से अपनी गृहस्थी चला सकता था. लेकिन उस ने कामधंधा करने के बजाय सारे रुपए अपनी गंदी आदतों में उड़ा दिए.

पति की गलत आदतों और रोजरोज की मारपीट से तंग आ कर रोशनी पति का साथ छोड़ कर मायके में रहने लगी थी. साथ ही उस ने तलाक का मुकदमा भी दायर कर दिया. उन दिनों अशोक राजा हरिश्चंद्र अस्पताल में गार्ड की नौकरी करता था. अदालत में तलाक का मुकदमा चला और सन् 2010 में अदालत ने निर्णय दिया कि अशोक रोशनी को हर महीने 20 हजार रुपए गुजाराभत्ता देगा. अशोक को जो वेतन मिलता था, उस से उस का ही खर्च पूरा नहीं होता था. इसलिए वह लोगों से रुपए उधार ले कर अपने शौक पूरा करता था. धीरेधीरे उस पर 70 लाख रुपए का कर्ज हो गया था.

जब काफी दिन हो गए तो कर्ज देने वाले उस से अपना रुपया मांगने लगे. इसी बीच अशोक को अस्पताल की एक नर्स से प्यार हो गया. पैसे न होने की वजह से वह उस की फरमाइशें पूरी नहीं कर पा रहा था. वह उस नर्स से शादी करना चाहता था. कर्ज चुकाने और शादी के लिए उसे पैसे चाहिए थे. इस के लिए वह पिता से मिला और उन से 2 करोड़ रुपए मांगे. मामन ने उसे लताड़ते हुए कहा, ‘‘2 करोड़ तो क्या, मैं तुम्हें 2 पैसे भी नहीं दूंगा. मैं ने सोच लिया है कि मेरा बेटा मर चुका है. तुम से अब मेरा कोई संबंध नहीं है. आइंदा तुम मुझ से मिलने भी मत आना.’’

अक्टूबर, 2014 में अशोक को एक वकील के जरिए पता चला कि मामन उसे अपनी संपत्ति से बेदखल कर के सारी संपत्ति सोनम के नाम करवा रहे हैं. यह जान कर अशोक क्रोध में पागल हो उठा और शराब पी कर मामन के पास पहुंच गया. जब वह उन से गालीगलौज करने लगा तो मामन ने उसे दुत्कारते हुए कहा, ‘‘मैं ने तो पहले ही कहा था कि मेरा कोई बेटा नहीं है. था भी तो मैं ने उसे मरा मान लिया है. मेरी संपत्ति में अब तुम्हारा कोई हक नहीं है.’’

‘‘मैं तुम्हें सारी प्रौपर्टी सोनम के नाम नहीं करने दूंगा.’’

‘‘क्या करेगा तू…?’’ मामन चीखे.

‘‘तुम्हें जिंदा नहीं रहने दूंगा.’’

‘‘धमकी देता है मुझे.’’

‘‘धमकी नहीं, सच कह रहा हूं. अगर तुम ने आधी संपत्ति मेरे नाम नहीं की तो मैं तुम्हें मरवा दूंगा. मेरी समझ में यह नहीं आता कि तुम वक्त से पहले क्यों मरना चाहते हो?’’

‘‘निकल जा यहां से.’’

‘‘इस का मतलब तुम नहीं मानोगे. तो ठीक है, मरने की तैयारी कर लो. लेकिन एक बार और सोच लेना. मरने के बाद क्या ले जा सकोगे यहां से. तुम्हारी मौत के बाद सबकुछ मेरा और सोनम का ही होगा.’’

‘‘जीतेजी मैं तुझे एक पैसा नहीं दूंगा.’’

‘‘यानी तुम ने मरने का फैसला कर लिया है. चलता हूं, अब हम जीते जी कभी नहीं मिलेंगे.’’ हंसता हुआ अशोक चला गया.

अशोक नरेला सैक्टर ए-6 में रहने वाले नीतू उर्फ काला को जानता था. उसे पता था कि काला सुपारी किलर है. वह काला से मिला और उसे 20 लाख रुपए में पिता के कत्ल की सुपारी दे दी. उस ने कर्ज ले कर एडवांस के रूप में उसे 14 लाख रुपए दे भी दे दिए. बाकी रकम उस ने काम होने के 2-3 महीने बाद जमीन बेच कर देने को कहा. नीतू उर्फ काला ने अपने आपराधिक सहयोगी जितेंद्र उर्फ टिंकू के साथ मिल कर मामन के कत्ल की योजना बनाई. दोनों ने कई दिनों तक मामन की गतिविधियों पर नजर रखी. मामन को ठिकाने लगाने के लिए उसे सुबह का समय ठीक लगा. दोनों ने बिजनौर से एक मोटरसाइकिल चोरी की और हत्या के लिए एक गुप्ती भी वहीं से खरीदी.

योजना के अनुसार, 2 नवंबर, 2014 की सुबह दोनों ने चोरी की मोटरसाइकिल से मामन का पीछा किया और गुप्ती से गोद कर उन की हत्या कर दी. उन्होंने मोटरसाइकिल वहीं जंगल में छोड़ दी और हरियाणा चले गए. इस के बाद वे जबतब अशोक से फोन पर बात करते रहे. जब दोनों को पता चला कि अशोक ने 2 एकड़ जमीन 90 लाख रुपए में बेची है तो उन्होंने फोन कर के अपनी बकाया रकम मांगी. लेकिन अशोक ने 70 लाख रुपए का कर्ज अदा करने के बाद जो पैसे बचे थे, उन्हें अय्याशी में खर्च कर दिए थे.

बकाया रकम के लिए दोनों की अशोक से अकसर झड़प होती रहती थी. नीतू और टिंकू को जब पता चला कि अशोक के नाम पिता की आधी संपत्ति होने वाली है और वह करोड़ों की है तो वे उस से 4 करोड़ रुपए मांगने लगे. रकम न देने पर वे उसे पुलिस से सच्चाई बताने की धमकी दे रहे थे. एक दिन जब नरेला स्थित शराब के ठेके पर नीतू और टिंकू की अशोक से झड़प हो रही थी, तभी वहां मौजूद मुखबिर ने उन की बातें सुन ली थीं. उस के बाद उस ने सारी बातें अशोक कुमार को बता दी थीं. इस तरह मामन की हत्या का राज खुल गया और हत्यारे पकड़े गए. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.

Cyber Crime: एमबीए ठगों का जाल

Cyber Crime: रेहान के पास एमबीए की डिग्री थी. वह कोई अच्छी नौकरी या काम कर सकता था, लेकिन उस के फितरती दिमाग में इंटरनेट के जरिए लोगों को ठगने का ऐसा आइडिया आया, जिस ने उसे साथियों के साथ जेल पहुंचा दिया. समाज में ऐसे युवाओं की कमी नहीं है, जो आधुनिकता की चकाचौंध से प्रभावित हो कर बहुत कम समय में सफलताओं की इमारत खड़ी करने के सपने देखते हैं. वे सोचते हैं कि उन के पास सभी भौतिक सुविधाएं और ढेर सारी दौलत हो. महत्त्वाकांक्षाओं की हवाएं जब उन के दिलोदिमाग में सनसनाती हैं तो सोच खुदबखुद इस की गुलाम हो जाती है. सोच की यह गुलामी उन्हें इसलिए बुरी भी नहीं लगती, क्योंकि इस से उन्हें ख्वाबों में कल्पनाओं के खूबसूरत महल नजर आने लगते हैं. रिहान भी कुछ ऐसी ही सोच का शिकार था.

एमबीए पास कंप्यूटर एक्सपर्ट रिहान का ख्वाब था कि किसी भी तरह उस के पास इतनी दौलत आ जाए कि जिंदगी ऐशोआराम से बीते. यह कैसे हो, इस के लिए वक्त के दरिया में तैराकी करते हुए वह दिनरात अपने दिमाग को दौड़ाता रहता था. कुछ विचार उसे सही नजर आए, मगर उन विचारों को क्रियान्वित करने के लिए पैसों की जरूरत थी, जो उस के पास नहीं थे. क्योंकि वह बेरोजगारी की गर्दिश झेल रहा था. लिहाजा उन विचारों का उस के लिए कोई महत्त्व नहीं रहा.

फिलहाल उस के सामने सब से बड़ी समस्या पैसों की थी, इसलिए वह अपने लिए सही नौकरी तलाशने लगा. इस के लिए उस ने कई जगह हाथपैर मारे, लेकिन जब उसे मन मुताबिक नौकरी नहीं मिली तो उस ने सन 2014 में एक फाइनैंस कंपनी में नौकरी कर ली. यह कंपनी लोगों को विभिन्न बैंकों से लोन दिलाने का काम करती थी. इस के बदले वह लोन लेने वालों से तयशुदा कमीशन लेती थी.

रिहान उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर स्थित कोतवाली क्षेत्र की पुरानी तहसील मोहल्ले का रहने वाला था. उस के पिता अख्तर नवाज का कई सालों पहले इंतकाल हो गया था. पति की मौत के सदमे में मां का साया भी उस के सिर से उठ गया. रिहान उन का एकलौता बेटा था. बाद में उस के चाचा मजहर ने न सिर्फ उस की परवरिश की, बल्कि उन्होंने उसे बेहतर तालीम भी दिलाई. रिहान लंबातगड़ा, आकर्षक कदकाठी का युवक था. उस का लाइफस्टाइल भी आधुनिक था. वह जितना कमाता था, उस से उस के महंगे शौक भी मुश्किल से पूरे होते थे. महत्त्वाकांक्षी होने के साथसाथ वह तेजतर्रार भी था.

जिस फाइनैंस कंपनी में वह नौकरी कर रहा था, वहां काम करतेकरते उसे यह बात समझ में आ गई थी कि यह कंपनी पाकसाफ काम नहीं करती, बल्कि लोगों को सपनों में उलझा कर उन के साथ ठगी करती है. एक दिन औफिस में उस के सामने जो वाकया पेश आया, उस से इस बात की पुष्टि तो हो ही गई, साथ ही उसे भी कुछ ऐसा ही काम करने की प्रेरणा मिल गई.

दरअसल, एक दिन औफिस में एक ग्राहक आ कर झगड़ने लगा. लोन पास कराने के लिए उस ने कंपनी को 25 हजार रुपए फाइल खर्च व अन्य खर्चों के नाम पर जमा कर दिए थे. इस के बावजूद भी कंपनी वाले उसे लोन नहीं दिला रहे थे. इस के लिए वह पहले भी कई बार औफिस के चक्कर लगा चुका था, लेकिन उस दिन वह गुस्से में दिखाई पड़ रहा था. औफिस में आते ही वह रिसैप्शनिस्ट के सामने पड़ी कुरसी पर बैठ गया. फिर उस से मुखातिब होते हुए बोला, ‘‘आज तो मैं कुछ फैसला कर के ही जाऊंगा. पैसे लेने के बावजूद भी मुझे लोन नहीं दिलाया जा रहा, मेरा काम नहीं हो रहा है तो मेरे पैसे वापस करो.’’

उस के तीखे तेवर देख कर रिसैप्शनिस्ट ने उसे समझाने की नाकाम कोशिश की, ‘‘सर, हम कोशिश कर रहे हैं.’’

इस पर वह और भी भड़क गया, ‘‘कोशिश तो आप कई महीनों से कर रहे हैं. बताओ उस का क्या नतीजा निकला? आप को पता है मैं पंजाब से यहां आताजाता हूं. कितने पैसे तो मैं किराए में ही खर्च कर चुका हूं, लेकिन आप लोग मेरी बात को समझ ही नहीं रहे.’’

शोर सुन कर रिहान भी वहीं आ कर खड़ा हो गया था. ग्राहक को समझाते हुए रिसैप्शनिस्ट बोली, ‘‘सौरी सर, आज तो बौस यहां नहीं हैं.’’

यह सुन रिहान को झटका लगा, क्योंकि कंपनी का बौस तो उस समय औफिस में बने अपनी केबिन में ही था.

रिसैप्शनिस्ट की बात से नाराज ग्राहक सख्ती से बोला, ‘‘मैं आज यहां से जाने वाला नहीं हूं. आप उन्हें अभी फोन मिलाइए और पूछिए कि मेरे पैसे कब मिलेंगे?’’

‘‘ओके सर,’’ उस के अडि़यल रुख को देखते हुए रिसैप्शनिस्ट ने तुरंत ही टेबल पर रखे टेलीफोन का स्पीकर औन कर के एक नंबर डायल कर दिया. तभी दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘उपभोक्ता का मोबाइल अभी स्विच औफ है. कृपया थोड़ी देर बाद डायल करें.’ इस के बाद रिसैप्शनिस्ट उस ग्राहक से शांत लहजे में बोली, ‘‘सर, आप फिर कभी आइए, अभी तो सर से बात नहीं हो पा रही है. मैं आप के सामने ही नंबर मिला रही हूं. उन का मोबाइल अभी बंद है.’’

‘‘ओजी ठीक है. मैं फिर आऊंगा और अब की बार अपने पैसे ले कर ही जाऊंगा.’’ खड़े होते हुए वह पंजाबी लहजे में बोला और गुस्से से पैर पटकता हुआ औफिस से निकल गया.

यह सब देख कर रिहान सोच में पड़ गया. इस की वजह भी थी क्योंकि कंपनी के बौस उस समय औफिस में ही थे और दूसरे उन का मोबाइल कभी बंद ही नहीं रहता था. इस बात को भी वह अच्छी तरह से जानता था. जिज्ञासावश उस ने रिसैप्शनिस्ट से पूछा, ‘‘मैडम, बौस का मोबाइल तो कभी बंद नहीं रहता, फिर यह सब…’’

उस की बात पर पहले वह खिलखिला कर हंसी, फिर रहस्यमय अंदाज में बोली, ‘‘रिहान अभी तुम नहीं समझोगे ये सब बातें.’’

‘‘मतलब… अब तो मैडम आप को बताना ही होगा.’’ रिहान ने जिद की.

उस की जिद पर रिसैप्शनिस्ट ने टेबल पर रखे फोन की तरफ इशारा करते हुए बताया, ‘‘रिहान, जब हम इस से बौस का नंबर डायल करते हैं तो हमेशा यही संदेश सुनने को मिलेगा. दरअसल बौस ने अपने मोबाइल में औटोमैटिक सौफ्टवेयर डाला हुआ है. ऐसे ग्राहकों से पीछा छुड़ाने के लिए यही तरीका अपनाना पड़ता है.’’

इन सब बातों से रिहान का दिमाग घूम गया. वह तुरंत एक फाइल के बहाने बौस के केबिन में दाखिल हुआ. उस समय बौस फोन से किसी से बातें कर रहे थे. अब उसे पक्का विश्वास हो गया कि रिसैप्शनिस्ट जो कह रही थी, बिलकुल सच था. उस दिन के बाद रिहान ने कंपनी के काम को और भी जिज्ञासा से समझना शुरू कर दिया. कुछ ही दिनों में पूरी तरह उस की समझ में आ गया कि कंपनी वास्तव में लोगों को लोन दिलाने का ख्वाब दिखा कर ठगी का धंधा करती है. उस के दिमाग में विचार आया कि जिस तरह से यह कंपनी लोगों को बेवकूफ बना कर पैसे ठग रही है, इसी तरह से वह भी लाखों रुपए कमा सकता है.

कंपनी जिस तरह से लोगों को झांसे में लेती थी, उस तरीके को वह यहां काम करते हुए अच्छी तरह से जान गया था. वह इस काम की बारीकियों को भी समझ चुका था. इस कंपनी में सैयद बिलाल उर्फ समी मलिक व अब्दुल बारी भी नौकरी करते थे. ये दोनों युवक भी मेरठ के ही रहने वाले थे. सैयद बिलाल तो उसी की तरह एमबीए पास था. रिहान के पास भी ऊंची तालीम थी. वह चाहता तो कोई अच्छी नौकरी या व्यवसाय कर सकता था, लेकिन उस का दिमाग गलत दिशा में दौड़ने लगा. उस ने मन ही मन सोच लिया कि वह भी अपनी खुद की ऐसी कंपनी खड़ी कर के करोड़ों रुपए कमाएगा.

इस मुद्दे पर रिहान अपने साथियों सैयद बिलाल और अब्दुल बारी से बात की तो वे भी उस का साथ देने के लिए तैयार हो गए. जल्दी ही ज्यादा पैसे कमाने के लालच में तीनों ने एक साथ उस फाइनैंस कंपनी से नौकरी छोड़ दी. लोगों को कंपनी के जाल में उलझाया जा सके, इस के लिए इंटरनेट वेबसाइट का रजिस्ट्रेशन जरूरी था. कंपनी को चूंकि धंधा ही ठगी का करना था, इसलिए वे रजिस्ट्रेशन अपने असली नाम से नहीं कराना चाहते थे.

रिहान ने आकाश शिंदे के नाम से फरजी प्रमाणपत्र बनवाए और उन के माध्यम से एडिशन कारपोरेशन फाइनैंस डौट काम नाम की वेबसाइट बनवाई. इस के बाद उन्होंने शहर के वैस्टर्न कचहरी मार्ग पर कंपनी का एक औफिस भी खोल लिया. औफिस में उन्होंने जरूरी स्टाफ भी रख लिया. यह जनवरी, 2015 की बात थी. उन्होंने वेबसाइट पर दावा किया कि कंपनी विभिन्न बैंकों से हर तरह के लोन दिलाती है. कंपनी का सब से आकर्षक औफर न्यूनतम 4 प्रतिशत ब्याज दर पर लोन दिलाने का था. समाज में ऐसे जरूरतमंद लोगों की कमी नहीं, जिन्हें लोन की जरूरत रहती है. कंपनी की वेबसाइट पर फरजी नामों से लिए गए मोबाइल नंबर भी दिए गए थे.

उन्होंने वेबसाइट पर योजनाबद्ध तरीके से प्रचार किया था. इस का नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों में उन के पास लोगों के फोन आने शुरू हो गए. फोनकर्त्ताओं से बेहद लुभावनी बातें की जातीं. उन से कहा जाता कि उन की कंपनी खुद भी लोन देती है और बैंकों से भी दिलाती है. चूंकि बैंकों के साथ उन का करार है, इसलिए उन के माध्यम से बैंक सस्ती ब्याज दरों पर लोन पास कर देती हैं. इन्हीं चिकनीचुपड़ी बातों में लोग फंसते गए. वे लोगों से फाइल चार्ज के नाम पर 5 से 25 हजार रुपए वसूलने लगे. लोगों को चूंकि बिना सख्त नियमों और आधेअधूरे कागजों के साथ मनचाहा लोन मिल जाने की उम्मीद होती थी, लिहाजा वह खुशीखुशी पैसे दे देते थे.

सपनों को बेचने का रिहान का यह धंधा ऐसा चमका कि उस की दुनिया ही बदल गई. फाइल चार्ज के नाम पर ही उन्होंने लाखों रुपए कमा लिए. इस के बाद उन्होंने धीरेधीरे कंपनी का नेटवर्क दूसरे राज्यों में फैलाना शुरू कर दिया. रिहान ने फरजी पहचानपत्रों के आधार पर बैंकों में भी खाते खुलवा लिए थे. उन्हीं खातों में वे लोगों से रकम जमा करवाते थे. उन्होंने जो वेबसाइट बनवाई थी, उस पर कंपनी का पता नहीं दिया था. वे फोन पर ही लोगों से बातें करते थे. उन की पूरी कोशिश यही होती थी कि पूरी काररवाई इंटरनेट के जरिए ही हो.

वे नजदीकी राज्यों के लोगों के बजाय उड़ीसा, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब, छत्तीसगढ़, आसाम, पश्चिमी बंगाल, आंध्र प्रदेश, बिहार आदि प्रदेशों के लोगों को ही अपने झांसे में लेने की कोशिश करते थे, ताकि ठगे जाने के बाद वे उन के औफिस के ज्यादा चक्कर न लगा सकें. जिस शख्स के ये पैसे ठगते, वह शख्स बारबार इन के पास फोन करता तो वे अपने फोन नंबर बदल देते थे. ठगी का अहसास होने के बावजूद कोई चाहते हुए भी इन के औफिस नहीं आ पाता था, क्योंकि औफिस उन के यहां से काफी दूर था और जो कोई इन के औफिस में कभी आ भी जाता तो उसे कोई न कोई बहाना बना कर चलता कर दिया जाता था. जो लोग इन के ऊपर ज्यादा दबाव बनाते थे, उन में से जिन लोगों के बैंक में दिए जाने वाले कागजात पूरे होते थे, उन का लोन पास करा देते थे.

धंधे में चमक आई तो उन्होंने समाचार पत्रों में भी विज्ञापन देने शुरू कर दिए. इस का भी उन्हें फायदा मिला. कंपनी का धंधा बढ़ने पर उन्होंने कई बैंकों में फरजी नामपतों पर एक दरजन से ज्यादा खाते खुलवा लिए. वे अलगअलग राज्यों के लोगों को पैसा जमा करने के लिए अलगअलग खाता नंबर देते थे. पैसे जमा होते ही वे तुरंत एटीएम कार्ड से निकाल लेते थे. ग्राहकों को उन के काम पर भरोसा रहे, इसलिए दिखावे के लिए वे अलगअलग राज्यों के स्टांप पेपर और बैंकों के फरजी चैक टेबल रखते थे. जिन्हें दिखा कर वे ग्राहकों को आश्वस्त करते थे कि कई ग्राहकों के चेक उन के यहां तैयार रखे हैं.

औफिस को उन्होंने इस ढंग से सुसज्जित किया था, जिस से लगे कि यह कोई बड़ी लोन कंपनी का औफिस है.

इस बीच उन्होंने एक टेलीफोन कंपनी से सिम कार्ड बिक्री के लिए भी अनुबंध कर लिया. स्टाफ रखने में वे अधिकांश लड़कियों को प्राथमिकता देते थे, ताकि कोई ग्राहक उन से ज्यादा लड़ेझगड़े नहीं.

एक दिन 3 लोग कंपनी के औफिस पहुंचे. देखने और पहनावे से वे गुजराती लग रहे थे. रिसैप्शनिस्ट के पास पहुंचते ही एक ने कहा, ‘‘हमें प्रौपर्टी के लिए लोन चाहिए. हम लोग बहुत दूर से आए हैं.’’

‘‘आप लोग कहां से आए हैं?’’ रिसैप्शनिस्ट बोली.

‘‘जी गुजरात से.’’ उन में से एक आदमी बोला.

‘‘कितना लोन चाहिए आप को?’’ रिसैप्शनिस्ट ने पूछा.

‘‘5 करोड़.’’ उस शख्स ने कहा तो रिसैप्शनिस्ट थोड़ा चकरा गई.

‘‘इतना बड़ा लोन. इस का फाइल चार्ज भी काफी लगेगा.’’ वह बोली.

‘‘कोई बात नहीं मैडम, जो भी चार्ज होगा हम देने को तैयार हैं.’’ कहने के साथ ही उस शख्स ने जेब में हाथ डाल कर 50 हजार रुपए की गड्डी निकाल कर रिसैप्शनिस्ट के सामने रख दी.

तभी रिसैप्शनिस्ट बोली, ‘‘नहींनहीं, अभी रहने दीजिए, यह तो बाद में जमा करना होगा. आप रुकिए, मैं आप को बौस से मिलवाती हूं.’’ कह कर वह केबिन में चली गई. इस के बाद उन तीनों गुजरातियों को भी बौस के औफिस में ले गई. उस केबिन में रिहान और बिलाल बैठे थे. उन दोनों को जब पता चला कि मोटे लोन के लिए वे लोग गुजरात से उन के पास आए हैं तो वे बहुत खुश हुए. लोन लेने के लिए जो लोग आए थे, उन्होंने यह भी बता दिया था कि उन के कुछ पेपर कम पड़ सकते हैं.

बिलाल को जब विश्वास हो गया कि पार्टी पक्की है तो वह बोला, ‘‘पेपरों की आप फिक्र न करें, उन्हें हम पूरे करा देंगे. लेकिन पेपर तैयार करने से पहले आप को फाइल चार्ज वगैरह के पैसे पहले जमा कराने होंगे.’’

‘‘ठीक है, आप जितना बोलेंगे हम कर जमा कर देंगे.’’ उन में से एक ने कहा.

बिलाल ने उन्हें एक सप्ताह के बाद अपने पेपरों के साथ आने को कहा. इस के बाद वे चले गए.

इसी बीच 2 नवंबर, 2015 को उन की कंपनी की वेबसाइट अचानक बंद हो गई. रिहान ने पहले इसे इंटरनेट व कंप्यूटर का कोई टैक्निकल फौल्ट समझा. कई घंटे बाद भी जब वह नहीं चली तो वे समझ गए कि यह वेब निर्माता कंपनी के स्तर से बंद हुई है. तब रिहान ने वेब निर्माता कंपनी के औफिस फोन किया. उन्होंने भी इसे टैक्निकल दिक्कत बताया.

वेबसाइट चल पाती, उस से पहले ही 3 नवंबर को पुलिस वहां दनदनाती हुई पहुंच गई. पुलिस को देख कर औफिस में बैठे सभी लोगों के होश फाख्ता हो गए. पुलिस टीम में वे लोग भी शरीक थे, जो गुजराती क्लाइंट बन कर उन के पास आए थे. रिहान समझ गया कि उस का खेल खत्म हो चुका है. पुलिस ने मौके से रिहान, बिलाल व अब्दुल बारी को गिरफ्तार कर लिया. औफिस की तलाशी ली गई तो वहां से 3 लैपटौप, 6 मोबाइल फोन, 2 लैंडलाइन फोन, 18 एटीएम कार्ड, 2 शौपिंग कार्ड, 6 पैन कार्ड, आधार कार्ड, 15 चैकबुक, विभिन्न राज्यों के लोगों के भरे हुए करीब साढ़े तीन सौ फार्म, 21 छोटीबड़ी मोहरें, कई राज्यों के स्टांप पेपर व अन्य कागजी सामग्री मिली.

पुलिस आरोपियों को बरामद सामान के साथ थाना सिविल लाइंस ले आई और उन से पूछताछ की. पूछताछ के दौरान उन्होंने इंटरनेट के जरिए ठगी का अपना सारा खेल पुलिस को बता दिया. पुलिस ने बेहद चतुराई से उन पर शिकंजा कसा था. दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक के एक पत्र के आधार पर उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय में तैनात पुलिस महानिरीक्षक (अपराध) मनोज कुमार झा ने मेरठ पुलिस को सितंबर महीने में इस संबंध में काररवाई करने के निर्देश दिए थे. एसएसपी डी.सी. दुबे ने मामले की जांच थाना सिविल लाइंस पुलिस को करने के निर्देश दिए, साथ ही उन्होंने साइबर यूनिट के प्रभारी कर्मवीर सिंह को भी इस काम में लगा दिया.

जांच में पता चला कि यह कंपनी वास्तव में लोगों के साथ ठगी का धंधा कर रही है. जो मोबाइल नंबर वेबसाइट पर दिए गए थे, जांच में वह भी फरजी आईडी प्रूफ पर लिए हुए पाए गए. जांचपड़ताल में वेबसाइट निर्माता कंपनी का पता भी लग गया. वह कंपनी मेरठ की ही थी. वेबसाइट रजिस्ट्रेशन के समय जो कागजात जमा किए थे, उन की जांच की तो वह भी फरजी पाए गए. वह कागजात आकाश शिंदे के नाम पर थे.

पुलिस को पता चल गया कि कंपनी का संचालन वैस्टर्न कचहरी रोड के एक कार्यालय से किया जा रहा है. जब साइबर युनिट प्रभारी कर्मवीर सिंह को विश्वास हो गया कि कंपनी की बुनियाद फरजीवाड़े पर टिकी है तो उन्होंने अपनी जांच से पुलिस अधीक्षक (अपराध) टी.एस. सिंह, पुलिस उपाधीक्षक एस. वीर कुमार को अवगत करा दिया. पुख्ता जानकारी मिलने के बाद एसएसपी डी.सी. दुबे ने ठगों की गिरफ्तारी के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया. इस टीम में थाना सिविल लाइंस प्रभारी इकबाल अहमद कलीम, सबइंसपेक्टर महेश कुमार शर्मा, कर्मवीर सिंह, कांस्टेबल अरविंद कुमार, विजय कुमार, आनंद कुमार व उमेश वर्मा को शामिल किया गया.

एक दिन पुलिस टीम के 3 सदस्य छद्म गुजराती क्लाइंट बन कर उन के औफिस पहुंचे. सदस्यों ने औफिस में जो बात की, उस से पूरा विश्वास हो गया कि ये लोग लोन दिलाने के नाम पर बहुत बड़ी ठगी कर रहे हैं. इस के बाद पुलिस ने उन ठगों की वेबसाइट ब्लौक करा दी और अगले दिन उन के औफिस में छापा मार दिया. विस्तार से की गई पूछताछ में पता चला कि रिहान और उस के साथी लाखों रुपए की ठगी कर चुके हैं. अगले दिन पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

अच्छी डिग्री होने के बावजूद रिहान और उस के साथियों ने लोगों को ठगने की फितरती सोच बनाई थी, उसी सोच ने उन के भविष्य को चौपट कर दिया. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. Cyber Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

ISI Agent: पाक खुफिया एजेंट पर पुलिस का शिकंजा

ISI Agent: एजाज आईएसआई के इशारे पर जासूसी के लिए भारत आया तो मोहब्बत का नाटक कर के एक युवती से निकाह भी कर लिया. वह अत्याधुनिक तकनीक के जरिए भारतीय सेना से जुड़ी जानकारियां और दस्तावेज पाकिस्तान भेजता था. खुफिया एजेंसियों ने उसे गिरफ्तार किया तो उस ने जो राज उगले, वे बेहद चौंकाने वाले थे.

बिस्तर पर लेटी आसमा अपनी मोहब्बत की निशानी के तौर पर आने वाले बच्चे की कल्पनाओं में डूबी थी. मां बनने का अहसास उस की भावनाओं को ममता के दरिया में बहाए ले जा रहा था. उस ने बचपन से गरीबी देखी थी, लेकिन जब से उस की जिंदगी में मोहम्मद कलाम दाखिल हुआ था, खुशियां जैसे उस की झोली में खुदबखुद चली आई थीं.

सांवली रंगत वाली आसमा भले ही बहुत खूबसूरत नहीं थी, लेकिन उस की दिल की खूबसूरती का कलाम कायल हो गया था. हर इंसान का अपना मिजाज होता है. वह उस की छोटीबड़ी सभी गलतियों को नजरअंदाज कर के खुशियों को तरजीह देता था.  आसमा शबनमी सोच के सागर में और डूबती, तभी उसे अपने सिरहाने किसी के खड़े होने का अहसास हुआ. बेखयाली में उस ने देखा और मुसकरा दिया, क्योंकि वह उस का शौहर कलाम था, ‘‘अरे आप कब आए?’’

‘‘अभीअभी, जब तुम कहीं खयालों में गुम थीं. वैसे क्या सोच रही थीं?’’ कलाम ने बैठते हुए पूछा.

‘‘आप के ही बारे में सोच रही थी. मैं तुम्हारे साथ बहुत खुश हूं कलाम.’’

इस पर कलाम ने मुसकरा कर कहा, ‘‘तुम्हारी अहमियत मेरी जिंदगी में सांसों से भी कहीं ज्यादा है आसमा. दुनिया के हर खजाने को मैं तुम्हारी खुशियों के लिए कुरबान कर सकता हूं.’’

‘‘मेरी खुशकिस्मती, जो मुझे तुम जैसा नेक शौहर मिला.’’

‘‘फर्ज अदायगी में मेरी नेकियां सलामत रहें.’’

‘‘एक दिन आप की नेकियां हमारी और आने वाले बच्चे की इज्जत अफजाई का सबब बनेंगी.’’

‘‘आसमा, कल मुझे किसी काम से मेरठ जाना होगा.’’

‘‘तुम इतनी मेहनत करते हो, अकसर बाहर जाते रहते हो, ऐसा क्या जरूरी काम है?’’

‘‘मैं मेहनत के जरिए तुम्हें खुशियां दे कर एक अच्छा शौहर बनने की कोशिश कर रहा हूं.’’

‘‘लेकिन हम तो खुश हैं. ऐसे वक्त पर मुझे तुम्हारे साथ की जरूरत है कलाम. मैं चाहती हूं कि नए मेहमान के आने तक तुम कहीं भी आनाजाना बंद कर दो.’’ आसमा ने कलाम का हाथ थाम कर कहा.

‘‘ठीक है, मैं 2 दिन बाद लौट कर आऊंगा तो फिर कहीं नहीं जाऊंगा.’’ कलाम ने कहा और वहां से उठ कर कमरे में रखे कंप्यूटर पर कुछ काम करने लगा.

आसमा और कलाम उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में दीवानखाना चौराहे के पास मोहल्ला शाहबाद में वसीम उल्लाह के एक पुराने मकान की दूसरी मंजिल पर किराए पर रहते थे. उन की जिंदगी बेहद साधारण थी. आसमा दिल की अच्छी थी और कलाम आसपड़ोस में सभी से घुलमिल कर रहता था. दिखावे की जिंदगी से उसे परहेज था. उस की आदतों और व्यवहार की लोग तारीफें किया करते थे. कलाम शादियों की वीडियो एडीटिंग और मिक्सिंग का काम करता था. फोटोग्राफी उस का शौक था और पेशा भी. कलाम बिहार का रहने वाला था. एक साल पहले उस की मुलाकात बिहार के ही आरा जनपद के गांव अजीमाबाद की रहने वाली आसमा से हुई तो दोनों आंखों के रास्ते एकदूसरे के दिलों में उतर गए.

आसमा का परिवार बेहद साधारण था. कलाम ने आसमा के साथ दुनिया बसाने की उम्मीदों में निकाह की पेशकस की तो आसमा के पिता शमशेर मना नहीं कर सके. कलाम अच्छा लड़का था. कलाम ने बताया था कि उस के परिवार में कोई नहीं है, वह दुनिया में अकेला है. दोनों की रजामंदी के बाद अक्तूबर, 2014 में उन का निकाह कर दिया गया था. निकाह के बाद कलाम घरजंवाई बन कर 2 महीने शमशेर के घर रहा. इस के बाद वह आसमा को ले कर बरेली आ गया और वहां किराए का मकान ले कर रहने लगा. घर चलाने के लिए उस ने वीडियोग्राफी करने वालों के साथ वीडियो एडीटिंग और मिक्सिंग का काम शुरू कर दिया.

मुलाकात के दौरान कम वक्त में ही किसी को अपना बना लेने का हुनर कलाम को अच्छी तरह आता था. वह लोगों से बहुत जल्दी घुलमिल जाता था. कलाम लोगों की मदद भी कर दिया करता था. यही वजह थी कि हर कोई उस की नेकियों का कायल था. काम का सिलसिला बता कर कलाम अकसर बाहर आताजाता रहता था. 26 नवंबर, 2015 को भी कलाम आसमा से मेरठ जाने की बात कह कर घर से निकला था. उम्मीदें और विश्वास करना हर इंसान की फितरत है, लेकिन आने वाले कल में यह अंदाजा किसी को नहीं होता कि उस की उम्मीदें पूरी होंगी और विश्वास का वजूद कायम रहेगा. वक्त और हालात कब करवट ले ले, इस बात कोई नहीं जानता.

कलाम आसमा का शौहर था. उस के निकाह को भी एक साल बीत चुका था. खुशियां उस की धड़कनों में बिखरी हुई थीं, लेकिन वह अपने शौहर की बहुत सी हकीकतों से वाकिफ नहीं थी. आसमा नहीं जानती थी कि वक्त के साथ उस की जिंदगी का नाजुक रिश्ता आंखों को आंसुओं से तर कर के तपते रेगिस्तान की गरम रेत पर पड़ कर दिल पर भी छाले देने वाला है. ऐसे छाले जिन का कोई मरहम नहीं होगा, वह दर्द की एक अनचाही सौगात दे जाएंगे. उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद का कैंट रेलवे स्टेशन आर्मी एरिया से एकदम सटा है. वहां पहुंचने के सभी रास्ते इसी एरिया से गुजरते हैं. चौबीसों घंटे लोगों की आवाजाही का सिलसिला जारी रहता है.

27 नवंबर की दोपहर तकरीबन 3 बजे का वक्त था. सफेद रंग की 2 कारें तेजी से स्टेशन के एकदम सामने आ कर रुकीं. दोनों कारों में बैठे लोग बिजली की सी फुरती से उतरे. उन में से कुछ लोगों के हाथों में अत्याधुनिक हथियार थे. हथियारबंद लोग तो टिकट काउंटर के आसपास ही रुक गए, जबकि बगैर हथियार वाले 5 लोग गलियारे को पार करते हुए प्लेटफौर्म पर पहुंच गए. वहां तमाम लोग मौजूद थे और काफी चहलपहल थी. उन लोगों ने अपनी नजरों को खास अंदाज में चारों ओर इस तरह दौड़ाया, जैसे उन्हें किसी की तलाश हो. तभी उन में से एक अपने साथियों से मुखातिब हुआ, ‘‘हमारा मकसद पूरा होगा क्या?’’

‘‘बिलकुल सर, आज हमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है.’’ उन में से एक ने आत्मविश्वास भरे लहजे में बोला.

‘‘ठीक है.’’ उसी दौरान उन सभी की नजरें प्लेटफौर्म पर बने एक टी स्टाल की ओट ले कर बेफिक्री भरे अंदाज में खड़े एक युवक पर जा कर ठहर गईं. वह स्मार्ट सा नौजवान था. उस ने ब्लैक कलर का ट्राउजर और उसी से मिलतीजुलती हाईनेक वुलन जैकेट पहन रखी थी. उस के कंधे पर एक लैपटौप वाला बैग झूल रहा था.

उसे देख कर आने वाले सभी लोगों ने एकदूसरे से थोड़ा दूरियां बनाईं और फिर आहिस्ताआहिस्ता चल कर उस के इर्दगिर्द फैल गए. युवक की नजरें उन से चार हुईं, लेकिन उस ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया और जेब से मोबाइल निकाल कर उस के कीपैड पर अंगुलियां चलाने लगा.

उन लोगों के हावभाव देख कर शायद उस युवक को अहसास हो गया कि वे उसी की तरफ आ रहे हैं. वे जैसे ही उस के नजदीक पहुंचे, वह युवक आगे बढ़ा. लेकिन तभी उन लोगों में से एक शख्स बोला, ‘‘रुकिए मिस्टर.’’

‘‘जी फरमाइए.’’ उस ने पलट कर बेपरवाही से कहा.

‘‘तुम्हें तो दिल्ली जाना है?’’

‘‘जी, लेकिन मैं ने आप को पहचाना नहीं. क्या आप मुझे जानते हैं?’’

‘‘हम तो तुम्हारे साए से भी वाकिफ हैं मियां. लेकिन दुख इस बात का है कि आप से पहले मिल नहीं सके.’’ एक दूसरे शख्स ने आगे आ कर उस की आंखों में आंखें डाल कर मुसकराते हुए कहा तो वह युवक असमंजस में पड़ गया.

वैसे तो वे सभी बेहद चालाकी से उस के नजदीक आए थे, लेकिन वह उन से तेज निकला. पलक झपकते ही हिरन सी तेजी से उस ने छलांग लगा दी. बाजी पलट सकती है, शायद यह बात आने वालों को पहले से पता थी. इसलिए वे सब भी होशियार थे. उन में से एक ने चंद कदम दौड़ कर फुरती से उसे पकड़ लिया. पकड़ मजबूत थी, इसलिए कोशिश के बावजूद वह युवक हिल नहीं सका. युवक अपनी बेबसी पर छटपटा कर रह गया.

तुरंत उस की तलाशी ली गई. उस का बैग, पर्स व मोबाइल उन लोगों ने अपने कब्जे में ले लिया.

‘‘कोई वैपन तो नहीं है?’’ किसी ने पूछा तो तलाशी लेने वाले ने कहा, ‘‘नहीं सर.’’

आननफानन में वे उसे खींच कर स्टेशन के बाहर लाए और फुरती से कार में धकेल कर खुद भी कार में बैठे और जिस तरह तेजी से आए थे, उसी तरह चले गए. यह सब फिल्मी अंदाज में हुआ था. लोगों की भीड़ भी जमा हो गई थी, लेकिन उन लोगों के हथियार देख कर कोई कुछ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा सका था. दोनों कारें जिस तेजी से आई थीं, उसी तेजी से वहां से चलीं तो तकरीबन 15 मिनट बाद वे नजदीक के थाना सदर बाजार आ कर रुकीं.

कार में सवार सभी लोग नीचे उतरे और उस युवक को नीचे उतार कर हवालात में डाल दिया. थाने में उस युवक के बैग और पर्स की तलाशी ली गई तो उस में से भारतीय सेना के गोपनीय दस्तावेज, राष्ट्रीय महत्व की कई गुप्त सूचनाएं, पहचान पत्र, बरेली व बिहार के पतों के वोटर आईडी कार्ड, आधार कार्ड, दिल्ली मैट्रो का ट्रैवलर कार्ड, भारत समेत 3 देशों की करेंसी, एटीएम कार्ड, 16 जीबी के पैनड्राइव और सिमकार्ड आदि चीजें मिलीं.

पुलिस ने उस के खिलाफ 3/9 औफिशियल सीक्रेट एक्ट, 14 विदेशी एक्ट व आईपीसी की धारा 467, 468, 471, 380, 420, 411 व 120 बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. दरअसल, जिस युवक को पकड़ कर पुलिस लाई थी, वह कोई और नहीं, आसमा का शौहर मोहम्मद कलाम था. उसे पकड़ने वाली थाने की पुलिस नहीं, स्पैशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) के एसपी शैलेंद्र कुमार श्रीवास्तव और सीओ अमित कुमार के नेतृत्व वाली टीम थी. कलाम कई महीने से एसटीएफ और खुफियां एजेंसियों के टौप सीक्रेट मिशन के टौप टारगेट पर था.

उस का नाम मोहम्मद कलाम नहीं, मोहम्मद एजाज था. वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटेलीजैंस (आईएसआई) का उत्तर प्रदेश में अब तक का सब से बड़ा एजेंट था और बड़ी होशियारी से अपने मिशन को अंजाम दे रहा था. बेहद शातिराना अंदाज वाला एजाज मूलरूप से पाकिस्तान का रहने वाला था. पहचान बदल कर उस ने हिंदुस्तान में ऐसी कामयाब पैठ बनाई थी कि आसमा से निकाह तक कर लिया था. अपने मिशन के लिए वह पूरी तरह प्रशिक्षित था. 3 भाषाओं पर उस की अच्छी पकड़ थी और हाईटैक टैक्नोलौजी के जरिए अपने आकाओं से बराबर संपर्क में रहता था.  उस के मंसूबे बेहद खतरनाक थे.

औपचारिक पूछताछ के बाद एजाज के मंसूबों की कडि़यों को जोड़ने के लिए एसटीएफ की एक टीम उसे ले कर बरेली उस के घर पहुंची और छापा मार कर उस के घर की तलाशी ले कर कंप्यूटर, डाटा कार्ड, कई वीडियो कैसेट, हिंदीउर्दू की कुछ किताबें और कुछ जरूरी कागजात बरामद किए. आसमा को जब पता चला कि उस का शौहर पाकिस्तानी आईएसआई एजेंट है तो उसे अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ. उस के रिश्ते का आईना चटक कर बिखर गया. आसपड़ोस के लोग भी हैरान थे कि जो शख्स उन के बीच नेकियां दिखा कर सादगी से रह रहा था, वह देश का दुश्मन था.

आईएसआई एजेंट की गिरफ्तारी उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए एक बड़ी कामयाबी थी. सन 2012 के बाद पहली बार कोई पाकिस्तान एजेंट पकड़ा गया था. यह खबर सुर्खियां बनने के बाद खुफिया एजेंसियों तक पहुंच गईं. एजाज से पूछताछ की गई तो उस ने हर सवाल का नपातुला जवाब दिया, जैसे वह ऐसे हालातों के लिए भी तैयार था. उस के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी. 24 घंटे के अंदर उसे अदालत में पेश किया जाना जरूरी था, इसलिए अगले दिन पुलिस ने उसे स्पैशल जज संजय सिंह की अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

एजाज से विस्तृत पूछताछ की जानी जरूरी थी, इसलिए अगले दिन पुलिस ने उस के रिमांड की अरजी दाखिल की तो अदालत ने उसे 7 दिनों के रिमांड पर दे दिया. पुलिस एजाज को थाने ले आई, जहां पूछताछ के लिए एक टीम का गठन पहले ही कर लिया गया था. इस टीम में इंटेलीजैंस ब्यूरो के स्थानीय एडिशनल डायरेक्टर एस.के. सिंह, एसपी स्वप्निल ममगई, सीओ वीर कुमार, आर्मी इंटेलीजैंस के मेजर मोती कुमार, थाना सदर बाजार के थानाप्रभारी गजेंद्रपाल सिंह व सबइंसपेक्टर धर्मेंद्र कुमार को शामिल किया गया था.

इस के अलावा एसटीएफ, स्थानीय पुलिस, राज्य व केंद्रीय इंटेलीजैंस ब्यूरो, आर्मी इंटेलीजैंस, मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा, सीओ (अभिसूचना) वी.के. शर्मा, दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच व उत्तराखंड इंटेलीजैंस ने भी एजाज से गहन पूछताछ की. इस पूछताछ में एजाज ने तमाम चौंकाने वाले राज उगले. एजाज की जड़ें बहुत गहरी थीं. वह 3 सालों के कौंट्रैक्ट पर भारत आया आईएसआई का बेहद खास मोहरा था. अपने मिशन के जुनून में उस ने सारी हदें पार कर दी थीं. उस के निशाने पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, एनसीआर के जिले और उत्तराखंड था.

मिशन की कामयाबी के लिए वह आसमा जैसी भोलीभाली युवती की जिंदगी से भी खेल गया था. इस बीच उस ने एक और युवती को अपने प्रेमजाल में फांस लिया था. उस के आईएसआई का एजेंट बनने से ले कर भारत आने और पहचान बदल कर रहने तक का हर पहलू चौंकाने वाला था. मोहम्मद एजाज पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद शहर के तारामंडी चौक निवासी मोहम्मद इशहाक का बेटा था. आर्थिक रूप से समृद्ध इशहाक एग्रीकल्चरल रिसर्च सैंटर में नौकरी करते थे. हालांकि सन 2004 में उन की मौत हो गई थी. उन के परिवार में पत्नी रुखसाना के अलावा 5 बेटे अशफाक, मुश्तियाक, फहद, एजाज, इश्तियाक तथा 3 बेटियां शबनम, शहजाद और शाजिदा थीं.

एजाज के सभी भाई वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी व प्रोसैसिंग का काम करते थे. हाईस्कूल पास एजाज भी इसी काम में लग गया था. पंजाबी और उर्दू भाषा उसे आती थी. इशहाक के परिवार के संपर्क कई नामी हस्तियों से थे. उस के भाई सरकार के लिए भी फोटोग्राफी करते थे, शायद इसी वजह से उन के संबंध बड़े लोगों से थे. देखने में सीधासादा दिखने वाला एजाज तेजतर्रार युवक था. पाकिस्तान में एक दर्जन से भी ज्यादा आतंकी व कट्टर संगठन आईएसआई के इशारे पर काम करते हैं. ऐसे संगठनों को उसी के जरिए देशीविदेशी आर्थिक मदद मिलती है. इन संगठनों का काम किसी न किसी तरीके से भारत में अराजकता और ज्यादा से ज्यादा तबाही फैलाना होता है.

सैन्य छावनियां उस के निशाने पर होती हैं. आईएसआई का आतंकी संगठनों के क्रियाकलापों और उन के प्रशिक्षण केंद्रों तक में सीधा दखल होता है. उस के अपने प्रशिक्षक भी वहां होते हैं. आतंकियों के अलावा वह अपने जासूस भी तैयार करती है, जिन्हें मोहरा बना कर आईएसआई अपने मकसद पूरा करती है. इस के पीछे उस की सोच बदनामी से बचना होता है.

सीधेसादे लोगों की उन्हें कभी धर्म के नाम पर तो कभी पैसे का लालच दे कर बरगलाया जाता है. झूठे वीडियो दिखाए जाते हैं कि भारत में मुसलमानों पर किस तरह अत्याचार हो रहा है. नई उम्र के लड़कों को तरजीह दे कर उन्हें बहलाफुसला कर प्रशिक्षण केंद्रों तक लाया जाता है. भटके युवाओं के लिए उन के दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं. सन 2012 में एजाज की जानपहचान आईएसआई के कुछ अधिकारियों से हुई. उन्हें वह काम का युवक लगा तो उन्होंने उसे अपने साथ शामिल कर के एक साल तक गहन प्रशिक्षण दिया. यह प्रशिक्षण उस ने एसपी सलीम की देखरेख में लिया. उसे जासूसी के गुर सिखाए गए, भारत के रहनसहन के बारे में बताया गया.

यही नहीं, भारत की सैन्य गतिविधियों की जानकारी बारीकी से दी गई. उसे समझाया गया कि सेना में बिग्रेड, यूनिट व कमांड में क्या फर्क है. औपरेशन विंग कौन सी होती है, आर्मी औफिसर के रैंक और स्टार के बारे में बताया गया. आर्मी यूनिट के अफसरों के पदों के बारे में भी समझाया गया, ताकि वह अफसर का बैच देख कर उस के पद को जान सके. आईएसआई ने भारत में जासूसी करने के लिए उस से 3 सालों का कौंट्रैक्ट किया. इस के बदले उसे 50 हजार रुपए महीने देना तय हुआ. भारत में उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड की विभिन्न सैन्य व वायुसेना की इकाइयों से संबंधित गुप्त सूचनाएं, प्रतिबंधित महत्त्व के दस्तावेज और भारतीय सेना की गतिविधियों की सूचना एकत्र कर के आईएसआई को भेजना था.

इरादों को मजबूत कर के अपने मिशन को पूरा करने के लिए एजाज अपने पासपोर्ट के साथ कराची होते हुए 31 जनवरी, 2013 को ढाका पहुंचा. वहां उस की मुलाकात आईएसआई के एजेंट प्रोबीन से हुई. प्रोबीन ने उस से पाकिस्तानी पहचान संबंधी दस्तावेज हासिल कर के कहा, ‘‘जब मिशन पूरा कर के तुम वापस जाओगे, तब ये चीजें तुम्हें वापस मिल जाएंगी. वैसे मिशन को बड़ी होशियारी से अंजाम देना मियां, क्योंकि भारत की खुफिया एजेंसियां बहुत सतर्क रहती हैं.’’

‘‘फिक्र न कीजिए, मैं हर तरह से फिट हूं.’’ एजाज ने आत्मविश्वास से जवाब दिया.

प्रोबीन ने कुछ दिन उसे अपने पास रख कर सावधानी बरतने के गुर सिखाए. इस के बाद 9 फरवरी को नदी के रास्ते भारतबांग्लादेश सीमा पार करा दी. यहां उस की मुलाकात वेस्ट बंगाल के माटियाबुर्ज, साउथ चौबीस परगना निवासी इरशाद हुसैन से हुई. यहां उस ने कपड़ों की फेरी लगाने का काम किया और हिंदी सीखी. एजाज यहीं रह कर हिंदी लिखनेपढ़ने और बोलने का पूरा अभ्यास किया. इरशाद, उस का बेटा और 2 भाई आईएसआई के लिए काम करते थे. इरशाद ने उसे गोपनीय दस्तावेज पाकिस्तान भेजने के सारे गुर सिखाए. इस दौरान उसे नई पहचान देने के लिए उस का नाम मोहम्मद कलाम रख दिया गया.

इसी नाम से उस के जूनियर हाईस्कूल के शैक्षिक प्रमाणपत्र बनवाए गए. उस का एक मतदाता पहचान पत्र व राशनकार्ड भी बनवाया गया, जिन के आधार पर सैंट्रल बैंक औफ इंडिया में उस का खाता खोलवा दिया गया. इन प्रमाण पत्रों पर उसे बिहार के नाड़ी गांव का निवासी बताया गया था. नई पहचान के बाद वह बिहार के एक वीडियोग्राफर रईस के साथ काम करने लगा, क्योंकि यह काम वह पहले से जानता था. वीडियोग्राफी के काम से जुड़े रहने से उसे अपने मिशन में बेहद आसानी हो सकती थी.

एजाज भारत के दिल्ली समेत कई इलाकों में घूमा. ऐसा कर के वह यहां की भौगोलिक स्थिति को समझना चाहता था. यहां आ कर उसे पता चला कि उस के जैसे तमाम जासूस हैं, लेकिन वे सब भारतीय हैं. उन के जरिए भी उसे काम लेने को कहा गया था. उन्हीं के जरिए उस ने प्रमुख आर्मी एरिया का पता लगाया. आईएसआई जानना चाहती थी कि किनकिन छावनयों में कौनकौन अधिकारी तैनात हैं. उन के व उन के परिवारों के कौंटैक्ट नंबर क्या हैं और आर्मीमैन किस तरह के अभ्यास करते हैं.

यह सब इतना आसान नहीं था, लेकिन ट्रेनिंगशुदा होने के चलते एजाज ने अपने काम को अंजाम देना शुरू कर दिया. कौंट्रैक्ट के लिहाज से उसे भारत में फरवरी, 2016 तक रहना था. लोगों के बीच आसानी से घुलनेमिलने और मकान किराए पर लेने के लिए वह चाहता था कि गृहस्थी बसा ली जाए. इस से शक की गुंजाइश कम हो जाती. इसी बीच उस की मुलाकात आसमा से हुई तो उस ने उस से मोहब्बत का नाटक कर के निकाह कर लिया. आसमा के पिता शमशेर की किराने की दुकान थी. एजाज ने भी उन की दुकान संभाली. इस के साथ ही वह वीडियोग्राफी छोड़ कर फेरी लगा कर कपड़े बेचने का काम करने लगा.

जनवरी, 2015 में वह बरेली आ गया. बरेली में सेना और वायुसेना की बड़ी विंग है. उन पर उसे काम करना था. बरेली में उस ने फोटो स्टूडियो वालों के साथ दिखावे के लिए काम शुरू कर दिया. वह कंप्यूटर का मास्टर था. सही बात यह थी कि वह फोटो व वीडियोग्राफी की आड़ में जासूसी कर रहा था. बरेली आ कर उस ने चंद महीनों में ही 3 ठिकाने बदल दिए. उस पर किसी भी तरह का शक न हो, इस के लिए उसे करना जरूरी था. बाद में उस ने 6 जून को शाहबाद में वसीम उल्लाह का मकान किराए पर ले लिया.

अब उसे अपने काम में आसानी हो गई. उस के साथी उस के संपर्क में रहते थे और सूचनाओं का आदानप्रदान करते रहते थे. वह फेसबुक, वाइबर, स्काईप, ईमेल के जरिए संपर्क में रहता था. वह औडियोवीडियो कौलिंग करता था. मोबाइल इंटरनेट के जरिए वह लाइव तसवीरें भी आईएसआई को दिखाता था. उस ने अलगअलग नामों से इंटरनेट पर अपने कई सोशल एकाउंट बना रखे थे. अपने पाकिस्तानी आकाओं से वह रात में 11 से 2 बजे के बीच संपर्क करता था. मेल में वह मैसेज लिख कर फोटो व वीडियो अटैच कर के ड्राफ्ट बौक्स में डाल देता था. उस की मेल आईडी का पासवर्ड आईएसआई के पास भी होता था. वे उस में से मैसेज निकाल लेते थे.

भारतीय एजेंसियां चूंकि संदिग्ध मेल पतों की निगरानी करती हैं. इसलिए इस से बचने के लिए वह ऐसे तरीके अपनाता था. उस के आका पाकिस्तानी सीमा पर बने एक्सचेंज से (वायस ओवर इंटरनेट प्रोटोकाल) तकनीक के जरिए बात करते थे. इस से नंबर तो भारत का शो होता था, लेकिन बात पाकिस्तान में होती थी. कलाम ने फेसबुक पर भी अपने एकाउंट बना रखे थे. अपने फेसबुक दोस्तों की लिस्ट में उस ने लड़कियों, कालेजों के छात्रों और पुलिसकर्मियों को जोड़ा था.

आसमा कभी उस की हकीकत नहीं जान पाई. उसे ख्वाबों में भी गुमान नहीं था कि उस का शौहर पाकिस्तानी जासूस है. वह 7 माह की गर्भवती थी. एजाज ने घर पर भी कंप्यूटर लगा रखा था, जिस पर वह शादियों की वीडियो मिक्सिंग के साथ इंटरनेट के जरिए सूचनाओं का आदानप्रदान करता था. आसमा सीधीसादी अनपढ़ युवती थी. इन सब बातों को वह समझ नहीं पाती थी. डूंगल के जरिए वह हाईस्पीड इंटरनेट कनेक्शन इस्तेमाल करता था. उस का सब से ज्यादा संपर्क आईएसआई के एसपी सलीम से था. अपने मिशन के लिए वह आगरा, मथुरा, मेरठ, दिल्ली, लैंसडाउन, रुड़की, सहारनपुर, रानीखेत, हरिद्वार, शाहजहांपुर व लखनऊ तक जाता था. जाते समय वह आसमा से यही बताता था कि शादी में वीडियोग्राफी करने बाहर जा रहा है.

कई स्लीपिंग मौड्यूल्स उस के संपर्क में रहते थे. वे ऐसे लोग थे, जो हाईलाइट हुए बिना रुपयों के लालच में जानकारी जुटा कर उसे देते थे. शाहबाद में रहते हुए उस ने एक दलाल के माध्यम से अपना आधार कार्ड भी बनवा लिया था. एजाज हंसमुख स्वभाव का था. वह लोगों से खूब मिलजुल कर रहता था. उस की असलियत से हर कोई बेखबर था. खुद को भारत का नागरिक साबित करने के लिए उस ने पासपोर्ट बनवाने की कोशिश भी शुरू कर दी थी.

सितंबर महीने में एजाज की मुलाकात बरेली की रहने वाली एक अन्य युवती आबिदा (परिवर्तित नाम) से हुई तो उस ने उसे अपने प्रेमजाल में फांस लिया. इस के पीछे भी उस का मकसद था. वह आसमा को हमेशा के लिए छोड़ कर उस युवती से निकाह कर के आगरा में अपना ठिकाना बनाना चाहता था. क्योंकि आगरा स्थित एयरबेस की सूचनाएं उसे जुटानी थीं. आसमा उस के बच्चे की मां बनने वाली थी. इस बोझ से भी वह छुटकारा पाना चाहता था. दिली मोहब्बत तो उसे नई महबूबा से भी नहीं थी. अपना कौंट्रैक्ट पूरा कर के फरवरी, 2016 में उसे पाकिस्तान चले जाना था.

अपने मिशन के तहत उस ने भारतीय वायुसेना द्वारा मिराज विमान की यमुना एक्सप्रेस वे पर की गई इमरजैंसी लैंडिंग संबंधी वीडियो, बरेली छावनी स्थित विभिन्न इकाइयों की जानकारी, बरेली एयरबेस व सुखोई-30 फाइटर जैट की जानकारी, हरिद्वार, मेरठ छावनी सैन्य इकाइयों के स्कैच व उन के मूवमेंट आदि की जानकारी आईएसआई को उपलब्ध करा दी थी. भारत में होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं की पूरी जानकारी भी वह पाकिस्तान भेजता था.

भारत में आतंकी गतिविधियों और जासूसी के मामलों में खुफिया एजेंसियां और स्पैशल टास्क फोर्स जांचपड़ताल में जुटी रहती हैं. इसी कड़ी में पुलिस महानिदेशक जगमोहन यादव को कुछ खुफिया सूचनाएं मिलीं तो उन्होंने एसटीएफ के आईजी सुजीत पांडेय को वह सूचनाएं दे दीं. उन्होंने उन से उन सूचनाओं पर काम करने को कहा. आईजी पांडेय ने वे सूचनाएं अधीनस्थों को निर्देशित कर दीं. एसटीएफ के एसएसपी अमित पाठक ने प्रदेश भर की यूनिटों को सतर्क कर दिया. ये सूचनाएं पाकिस्तान में सोशल नेटवर्किंग साइटों के जरिए संपर्क करने की थीं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसा एजेंट सक्रिय था, जो देश की रक्षा महत्त्व की सूचनाएं पाकिस्तान भेज रहा था. इस से खुफिया एजेंसियां, आर्मी इंटेलीजैंस आदि सतर्क हो गईं.

कई महीने तक बारीकी से पड़ताल की गई. इसी पड़ताल में कलाम पर नजर गई. उस की सोशल आईडी और मेल की जांच की गई. जब विश्वास हो गया कि कलाम पाकिस्तान से जुड़ा है और उस की गतिविधियां संदिग्ध हैं तो उस का मोबाइल नंबर हासिल कर के उस की बातचीत सुनी गई. इस सब से पता चला कि वह 3 भाषाएं जानता है और भारत के खिलाफ गतिविधियों को अंजाम दे रहा है. उस की जड़ों की गहराई तक पहुंचने के लिए उस के मोबाइल की डिटेल्स हासिल की गई तो उस की लोकेशन अलगअलग जिलों के अलावा दिल्ली की भी पाई गई. उस नंबर का इस्तेमाल वह पाकिस्तान में भी बातचीत के लिए कर रहा था. इसी दौरान पता चला कि उस का असली नाम एजाज है.

जब साफ हो गया कि उस की गतिविधियां बेहद संदिग्ध हैं तो उसे दबोचने की योजना बनाई गई. उस के पीछे मुखबिरों को लगा दिया गया. जब पता चला कि वह महत्त्वपूर्ण दस्तावेज दिल्ली में अपने साथियों को पहुंचाने जाएगा, तो उस की लोकेशन पता की जाने लगी. सर्विलांस के जरिए उस की लोकेशन मेरठ की मिलनी शुरू हुई तो एसटीएफ ने बिना देरी किए टीम बना कर उसे दबोच लिया. एजाज बरामद दस्तावेजों को दिल्ली ले जा रहा था. गिरफ्तारी के बाद उस ने नपेतुले जवाब दे कर एसटीएफ को भी उलझा दिया, लेकिन रिमांड के दौरान हुई पूछताछ में उस की परतें खुलने लगीं.

उस के परिवार के बड़े हस्तियों से रिश्तों का राज भी खुल गया. आईएसआई उसे अब तक 5 लाख 8 हजार रुपए दे चुकी थी. भारत में उस का खर्चा सीमित था और वह साधारण अंदाज में जीवनयापन कर रहा था, इसलिए दी गई रकम वह अपने परिवार को भिजवा चुका था. यह रकम उस के खाते में दुबई, सउदी अरब और जम्मूकश्मीर से ट्रांसफर की गई थी. पुलिस ने वेस्ट बंगाल में एजाज के संरक्षणदाता रहे मोहम्मद इरशाद, उस के बेटे अशफाक, उस के भाई इरफान और जहांगीर को भी नामजद कर लिया था. उन की तलाश में एक टीम हवाई जहाज से कोलकाता भेजी गई. तत्काल शिकंजा कस कर इरशाद, अशफाक और जहांगीर को भी गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि इरफान हाथ नहीं आ सका.

रिमांड के दौरान अदालत की अनुमति ले कर एजाज की उस के घर एक पीसीओ से बात कराई गई. उस ने अपनी मां और बहनों से बातचीत की. इस बातचीत को बतौर सबूत रिकौर्ड कर के रख लिया गया. रिमांड अवधि पूरी होने पर पुलिस ने एजाज को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. एजाज से बरामद इलैक्ट्रौनिक यंत्रों को एफएसएल जांच के लिए सीबीआई की फोरैंसिक लैब भेज दिया गया. इस बीच आसमा के पिता बरेली पहुंचे और सामान के साथ बेटी को अपने साथ ले गए. आसमा का कहना था कि उसे पता नहीं था कि वह इस तरह धोखे का शिकार हो जाएगी. वह देश का बुरा चाहने वाले शौहर से अब कभी नहीं मिलेगी.

वह कोख में पल रही उस की निशानी को जन्म तो देगी, लेकिन उसे अफसोस रहेगा कि वह ऐसे दुश्मन की निशानी है, जो मुल्क की तबाही के ख्वाब देख रहा था. एसटीएफ ने आसमा और उस के पिता से भी पूछताछ की. एजाज के परिवार के पाकिस्तानी हस्तियों से रिश्तों से संबंधित रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेज दी गई है. कथा लिखे जाने तक खुफिया एजेंसियां और एसटीएफ आईएसआई के भारत में फैले नेटवर्क को खत्म करने की कोशिश में लगी थीं. ISI Agent

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime News: पालनहार बना हैवान : संबंधों को किया शर्मसार

Crime News: बिहार के समस्तीपुर जिले के रोसड़ा अनुमंडलीय मुख्यालय स्थित बड़ी दुर्गा स्थान में मिश्र टोला का रहने वाला शिक्षक है रविंद्र झा. 50 वर्षीय रविंद्र झा रोसड़ा के संस्कृत विद्यालय में अध्यापक है. उसकी बुरी नजर अपनी ही 20 साल की बेटी मोनिका पर थी.

4 वर्ष पहले की बात है एक दिन मोनिका घर में अकेली थी. बस, बेशर्म शिक्षक पिता रविंद्र झा ने अपनी बेटी मोनिका के साथ अश्लील हरकत करनी शुरू कर दी. मोनिका ने विरोध किया फिर भी रविंद्र झा ने उस के साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बना लिए. मोनिका ने यह बात अपनी मां से बताई. लेकिन लोकलाज का हवाला दे कर मां ने उसे चुप रहने की हिदायत दी.

उस समय मोनिका इंटरमीडिएट की छात्रा थी. वह अब स्नातक तीसरे वर्ष की छात्रा है. उस के बाद रविंद्र झा का मनोबल बढ़ता ही चला गया और वह जबतब घर में अकेली रहती बेटी मोनिका के साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाने लगा. पिता की हरकत से परेशान हो कर मोनिका ने सबूत इकट्ठा करने के खयाल से ही यह घिनौनी करतूत 20 अप्रैल, 2022 को अपने मोबाइल के कैमरे में कैद कर ली.

पिता के घिनौने कृत्य की वीडियो बनाने के बाद मोनिका ने अपनी मामी से यह बात शेयर की. मामामामी उस के घर पहुंचे और मोनिका को साथ ले कर अपने घर चले गए. जहां मोनिका ने सारी बात मामामामी व अन्य रिश्तेदारों को खुल कर बताई. वहां उस का ममेरा भाई माधव मिश्रा कोने में खड़े हो कर सारी बात सुन रहा था. माधव ने मोनिका को मदद का भरोसा दिलाया तो वह मान गई और मोनिका ने वीडियो माधव के हवाले कर दी.

माधव ने वह वीडियो प्रशासनिक मदद के खयाल से अपने एक परिचित हसनपुर निवासी एक न्यूज पोर्टल के पत्रकार संजय भारती को दे दी. ‘रोसड़ा जंक्शन’ नामक उस न्यूज पोर्टल से जुड़े पत्रकार संजय भारती ने पहले मोनिका से मोबाइल पर संपर्क कर उसे ब्लैकमेल किया और जब उसे पैसा नहीं मिला तो उस ने वह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दी. मोनिका को जब वीडियो वायरल होने की खबर मिली तो वह बहुत परेशान हो गई. उस ने रोसड़ा थाने जा कर मदद की गुहार लगाई. लेकिन पुलिस वाले पीडि़ता के पिता से मिल गए और उन्होंने केस दर्ज नहीं किया.

पुलिस उच्चाधिकरियों के संज्ञान में मामला आने के बाद पुलिस ने केस दर्ज कर मोनिका के घर पर छापेमारी की. फिर मोनिका के पिता रविंद्र झा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है. इतना ही नहीं, पुलिस ने पीडि़ता के ममेरे भाई माधव मिश्रा को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. समस्तीपुर के एसपी हृदयकांत के आदेश पर अब यह मामला समस्तीपुर महिला थानाप्रभारी पुष्पलता कुमारी को ट्रांसफर कर दिया गया है.

दुष्कर्मी पिता रविंद्र झा व ममेरे भाई माधव मिश्रा के खिलाफ भादंवि की धारा 376, 354(बी), 341, 504, 506 आईपीपी व पोक्सो एक्ट एवं 67(ए) आईटी एक्ट के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है. तो वहीं न्यूज पोर्टल के पत्रकार संजय भारती के खिलाफ भी 5 मई, 2022 को भादंवि की धारा 384, 506, 509 व 67(ए) आईटी एक्ट 2000 के तहत रिपोर्ट दर्ज की जा चुकी है. लेकिन वह गिरफ्तार नहीं हो सका है.

थानाप्रभारी पुष्पलता कुमारी ने पीडि़ता मोनिका का 6 मई, 2022 को समस्तीपुर के सदर अस्पताल में मैडिकल कराया. डा. नवनीता, डा. गिरीश कुमार व डा. उत्सव की टीम ने पीडि़ता का मैडिकल परीक्षण किया. उस का अल्ट्रासाउंड व एक्सरे तक कराया गया. मैडिकल जांच में उस के साथ शारीरिक शोषण की पुष्टि हुई.

मैडिकल जांच और कोर्ट में बयान दर्ज कराने के बाद मोनिका को उस के मामामामी के साथ भेज दिया गया है. क्योंकि माधुरी ने मां के साथ घर जाने से इनकार कर दिया था.

फिलहाल मोनिका अभी डर से उबर नहीं पाई है. वह सहमी हुई रहती है.

—कथा में मोनिका नाम परिवर्तित है

Varanasi Crime: मदद के नाम पर देह धंधा

Varanasi Crime: उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी की रहने वाली सुनीता की मां अकसर बीमार रहती थी. उसे लगता था कि अगर कहीं उस की नौकरी लग जाती तो वह अपनी मां का ठीक से इलाज करा लेती. उस के पिता की मौत हो चुकी थी.

एक छोटा भाई जरूर था, लेकिन वह अभी पढ़ रहा था. एक दिन उस के फोन पर एक मिसकाल आई. उस ने पलट कर फोन किया तो पता चला वह नंबर लखनऊ की रहने वाली सोनी का था.

इस के बाद सोनी और सुनीता में बातचीत होने लगी. बाचतीत में एक दिन सुनीता ने सोनी से अपनी परेशानी कह सुनाई. सोनी बातचीत में काफी माहिर थी. मीठीमीठी बातें कर के उस ने सुनीता से दोस्ती गांठ ली. फोन के साथसाथ दोनों वाट्सऐप पर भी एकदूसरे को मैसेज करने लगी थीं.

सुनीता काफी सुंदर थी. उस की सुंदरता ने सोनी का मन मोह लिया. इसी वजह से सोनी के मन में लालच आ गया. उसे लगा कि अगर सुनीता उस के पास आ जाए तो उस का काम बन जाए.

सुनीता वाराणसी के लंका स्थित अपने घर में मां के साथ रहती थी. संयोग से एक दिन उस ने खुद ही सोनी को मौका दे दिया. उस ने कहा, ‘‘सोनी, मेरी मां की तबीयत खराब रहती है. उन का इलाज कराना है, घर में कोई मदद करने वाला नहीं है. मैं क्या करूं, कुछ समझ नहीं पा रही हूं. कोई नौकरी भी नहीं मिल रही है.’’

‘‘अगर तुम लखनऊ में होती तो मैं तुम्हारी मदद कर देती. यहां मैं कोई नौकरी दिला देती, जिस से तुम्हें आराम से 10 से 15 हजार रुपए महीना वेतन मिल जाता. अगर तुम बढि़या काम करती तो जल्दी ही तुम्हारा वेतन दोगुना हो जाता.’’ जवाब में सोनी ने सुनीता को समझाते हुए कहा.

‘‘अभी तो मैं मां को ले कर लखनऊ आ नहीं सकती. अगर नौकरी मिल जाए और महीने, 2 महीने में कुछ पैसे मिल जाएं तो मैं मां को ला कर वहीं रहने लगती.’’ सोनी की बात सुन कर सुनीता ने कहा.

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सुनीता की बातों से सोनी को लगा कि वह लखनऊ आ सकती है. उसे आकर्षित करने के लिए सोनी ने कहा, ‘‘सुनीता, तुम यहां आ जाओ और हम लोगों के साथ रह कर काम को देखसमझ लो. अगर काम पसंद आ जाए तो मां को ले आना. यहां रहने की कोई कमी नहीं है. मैं अपनी सहेली सुमन के साथ रहती हूं. हम से मिल कर तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा.’’

सुनीता जरूरतमंद थी ही, इसलिए उसे लगा कि एक बार लखनऊ जा कर सोनी से मिलने में कोई बुराई नहीं है. लखनऊ कोई बहुत दूर तो है नहीं, क्यों न एक बार जा कर उस के काम को देखसमझ ले. अगर काम अच्छा लगा तो करेगी, वरना वाराणसी लौट आएगी.

सोनी से हुई बातचीत के करीब 10 दिनों बाद सुनीता वाराणसी पैसेंजर ट्रेन से लखनऊ के लिए निकल पड़ी. सुमन और सोनी को उस ने अपने आने की बात पहले ही बता दी थी, इसलिए दोनों उसे लेने के लिए चारबाग रेलवे स्टेशन पहुंच गई थीं.

सोनी और सुमन से मिलने के बाद सुनीता ने कहा, ‘‘यार ट्रेन काफी लेट हो गई, जिस से यहां पहुंचने में काफी देर हो गई. चलो, पहले वहां चलते हैं, जहां नौकरी की बात करनी है. उस के बाद बैठ कर आराम से आपस में बातें करेंगे. अगर नौकरी पसंद आई तो रुक जाऊंगी, वरना रात की ट्रेन से वापस लौट जाऊंगी. तुम दोनों को नाहक परेशान नहीं होना पड़ेगा.’’

‘‘सुनीता, तुम जंगल में नहीं आई हो. हम दोनों तुम्हारे साथ हैं. आज तो देर हो गई है. औफिस बंद हो गया होगा. कल वहां चल कर बात कर लेंगे. अभी तुम हमारे साथ मेरे कमरे पर चलो. आज हम तीनों पार्टी कर के खूब एंजौय करेंगे.’’ सोनी ने कहा.

सुनीता को बहुत दिनों बाद घर से बाहर निकल कर तनावरहित कुछ समय गुजारने का मौका मिला था. सुमन और सोनी से मिल कर वह काफी खुश थी. दोनों उसे बहुत अच्छी लगी थीं. तीनों एक कार में बैठ कर लखनऊ के तेलीबाग स्थित सोनी के घर पहुंच गईं.

घर में सिर्फ सोनी का पति तौहीद था. वह देखने में काफी सीधासादा था. तीनों के घर पहुंचते ही वह घर से चला गया. उस समय शाम के करीब 6 बज रहे थे.

ठंडी का मौसम था. सुनीता का स्वागत चायपकौड़ों से किया गया. तीनों आपस में चाय पीते हुए बातें करने लगीं. चाय खत्म हुई तो सोनी ने कहा, ‘‘सुनीता, मैं तुम्हें कपड़े देती हूं. तुम फ्रैश हो कर कपड़े बदल लो.’’

‘‘सुनीता, सोनी के कपड़े तुम्हें एकदम फिट आएंगे. यह बहुत ही सैक्सी लुक वाले कपड़े पहनती है. उन्हें पहन कर तो तुम कयामत लगोगी.’’ सुमन ने कहा.

इस बीच सोनी कपड़े ले आई. न चाहते हुए भी सुनीता को सोनी की ड्रैस पहननी पड़ी. कपड़े पहन कर उस ने खुद को देखा तो सचमुच ही वह अलग दिख रही थी. वह खुश हो गई. बातें करतेकरते एकदूसरे के फोटो खींचे जाने लगे.

सोनी ने सुनीता के मौडलिंग वाले फोटो खींचतेखींचते बिना कपड़ों के भी फोटो खींचे. उस समय सुनीता की समझ में कुछ नहीं आया. वह सोच रही थी कि यह लड़कियों की दोस्ती है.

थोड़ी देर बाद सुमन अपने घर चली गई. अब सोनी और सुनीता ही रह गईं. रात में सोनी का पति तौहीद आया तो खाना खा कर सोनी अपने पति के साथ सोने चली गई. सुनीता भी अलग कमरे में सो गई. उसे नींद आने लगी थी, तभी उस के कमरे का दरवाजा खुला. सोनी एक आदमी के साथ उस के कमरे में आई.

सोनी उस आदमी को वहीं छोड़ कर बाहर निकल गई और बाहर से दरवाजा बंद कर दिया. अब कमरे में सुनीता और वह आदमी ही रह गए. सोनी के जाते ही उस ने कहा, ‘‘सुनीता, आज की रात के लिए सोनी ने तुम्हारा 6 हजार रुपए में सौदा किया है.’’

उस आदमी की बात सुन कर सुनीता के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस की आंखों के सामने लखनऊ से ले कर वाराणसी तक की दोस्ती, बातचीत और आवभगत की तसवीर घूमने लगी. सुनीता समझ गई कि वह फंस चुकी है. उस आदमी ने सुनीता को उस के वे निर्वस्त्र फोटो दिखाए, जो कुछ देर पहले ही सोनी और सुमन ने मजाकमजाक में खींचे थे. उस ने कहा, ‘‘अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो ये तुम्हारी इन तसवीरों को सार्वजनिक कर देंगी. तब लोग तुम्हें ही गलत समझेंगे.’’

सुनीता के सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं था. उसे पूरी रात उस आदमी की दरिंदगी का सामना करने को मजबूर होना पड़ा. सवेरा होते ही वह आदमी चला गया. उस के जाने के बाद सोनी कमरे में आई. सुनीता ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई.

सोनी चुपचाप सब सुनती रही. इस के बाद उस ने सुनीता को एक हजार रुपए देते हुए कहा, ‘‘सुनीता, आज से यही तुम्हारी नौकरी है. तुम्हारा खानापीना, कपड़े और मैकअप का सारा खर्च हम उठाएंगे. रहने के लिए हमारा घर है ही. इस सब के अलावा तुम्हें हर रात के एक हजार मिलेंगे. तुम 8-10 हजार रुपए की बात कर रही थी, मैं तुम्हें 20 से 25 हजार रुपए देने की बात कर रही हूं. अब तुम देख लो कि तुम्हें बदनाम होना है या मैं जो कह रही हूं, वह करना है.’’

चंगुल में फंस चुकी सुनीता को बचाव का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था. उसे लगा कि अगर उस ने लड़ाईझगड़ा किया तो वे उस के साथ और ज्यादा बुरा कर सकते हैं. इसलिए वह मजबूर हो गई. फिर उस के साथ यह सिलसिला सा चल निकला.

पहले रात को ही कोई आदमी आता था. कुछ दिनों बाद दिन में भी उस के पास ग्राहक आने लगे. सुनीता कुछ कहती तो सुमन, सोनी और दोनों के पति तौहीद और सुरजीत कहते, ‘‘सुनीता जाड़े के दिनों में कमाई ज्यादा होती है. अभी कमा कर रुपए जमा कर लो, गरमी में ग्राहक कम होंगे तो ये काम आएंगे.’’

कुछ ही दिनों में सुनीता को यह काम बोझ लगने लगा. 10 दिन साथ रहने के बाद उन लोगों को सुनीता पर भरोसा हो गया. वे उसे ग्राहकों के साथ बाहर भी भेजने लगे. सुनीता को बाहर जाना होता तो तौहीद और सुरजीत उसे पहुंचाने जाते. सवेरा होने पर वे जा कर उसे ले आते. इस तरह वह दिन में अलग और रात को अलग ग्राहकों को खुश करने लगी.

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एक दिन सोनी ने सुनीता से कहा, ‘‘सुनीता, मैं तुम्हें अपनी सहेली के यहां भेज रही हूं. तुम वहां जा कर काम करो. हम लोग एक जगह इस तरह का काम नहीं कर सकते. एक जगह ऐसा काम करने में पकड़े जाने का खतरा रहता है.’’

सोनी ने सुनीता को अपनी सहेली शोभा के यहां भेज दिया. शोभा जानकीपुरम में रहती थी. वहां सुनीता के साथ और ज्यादा बुरा सलूक होने लगा. शोभा के यहां दिन में 2 और रात में 2 ग्राहक उस के पास आने लगे. ज्यादा कमाई के चक्कर में शोभा ने ग्राहकों की संख्या बढ़ा दी थी. क्योंकि उसे पता था कि सुनीता एक सप्ताह के लिए ही उस के पास आई है.

वह लालच में फंस गई. ज्यादा काम करने से सुनीता की तबीयत खराब हो गई. इस के बाद भी शोभा ने उस के पास ग्राहकों को भेजना जारी रखा. एक दिन सवेरे सुनीता को भागने का मौका मिल गया.

बिना किसी बात की परवाह किए सुनीता सवेरे 4 बजे घर से भाग निकली. घर से बाहर आते ही उसे मौर्निंग वाक कर जाने वाले प्रदीप मिल गए. उन की मदद से वह थाना जानकीपुरम पहुंची, जहां उस की मुलाकात इंसपेक्टर अमरनाथ वर्मा से हुई. उन्होंने सुनीता को आराम से बैठाया और उस की पूरी बात ध्यान से सुनी.

इस के बाद उन्होंने महिला सिपाही कोमल और ज्योति के जरिए पूरी जानकारी प्राप्त की. सुनीता से पता चला कि उस की तरह तमाम लड़कियां इस जाल में फंसी हुई हैं. वाट्सऐप के जरिए लड़कियों के फोटो भेज कर उन का सौदा किया जाता है.

सौदा तय होने के बाद वे लड़कियों को ग्राहकों तक पहुंचाते थे. लड़की को ग्राहक के पास पहुंचा कर वे पैसा ले लेते थे. अगले दिन सुबह जा कर लड़की को ले आते थे.

सीओ अलीगंज डा. मीनाक्षी ने मामले की जांच कराई. इसी के साथ शोभा, मणिशंकर, सुरजीत, तौहीद, सुमन और सोनी के खिलाफ देहव्यापार कराने का मुकदमा दर्ज किया गया. पुलिस ने सुरजीत, तौहीद, सुमन और सोनी को तो गिरफ्तार कर लिया, लेकिन शोभा और मणिशंकर फरार होने में कामयाब रहे.

दरअसल, सुनीता के भागने का पता चलते ही वे भी घर छोड़ कर भाग गए थे. जांच में पता चला कि सुमन और सोनी मीठीमीठी बातें कर के लड़कियों को जाल में फंसाती थीं. इस के लिए वे कई बार रेलवे स्टेशन या बसअड्डे पर भी जाती थीं. इन का निशाना ऐसी लड़कियां होती थीं, जो नौकरी की तलाश में रहती थीं.

सुमन और सोनी महिलाएं थीं, इसलिए लड़कियां उन पर भरोसा कर लेती थीं. दोनों लड़कियों का भरोसा जीतने के लिए उन्हें अपने घर ठहराती थीं. वहां हंसीमजाक के दौरान उन की अश्लील फोटो खींच लेती थीं. इस के बाद उन्हीं फोटो की बदौलत वे उन्हें ब्लैकमेल कर के देहव्यापार में उतार देती थीं.

ये लड़की को बताते थे कि उन का ग्राहक बहुत बड़ा आदमी है. वह नौकरी दिलाएगा. इस के बाद बुकिंग और सप्लाई का धंधा शुरू हो जाता था. लड़की का पूरा खर्च यही लोग उठाते थे. ग्राहक के हिसाब से लड़की को हजार, 5 सौ रुपए दिए जाते थे.

ग्राहकों को लुभाने के लिए लड़कियों को आकर्षक कपड़े पहनने को दिए जाते थे, बढि़या मेकअप किया जाता था. जिस से ग्राहक मोटा पैसा दे सके. हर लड़की के एक रात के लिए 6 से 8 हजार रुपए लिए जाते थे.

कई बार ज्यादा कमाई के लिए ग्राहकों की संख्या बढ़ा दी जाती थी. बाद में यही लड़कियां दूसरी जरूरतमंद लड़कियों को यहां ले आती थीं. पुलिस ने सुनीता को उस के घर भेज कर बाकी आरोपियों को जेल भेज दिया है.

सुनीता का कहना है, ‘‘मुझे जरा भी अहसास नहीं हुआ कि मैं एक ऐसे जाल में फंसने जा रही हूं, जिस से मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. मैं ने उन लोगों का क्या बिगाड़ा था, जो उन्होंने मेरा भविष्य खराब कर दिया. मैं ने तो मदद मांगी थी, उन लोगों ने मदद के बहाने मुझे देह के बाजार में धकेल दिया.’’ Varanasi Crime

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित तथा सुनीता परिवर्तित नाम है

Hindi crime story: लखनऊ का कालगर्ल डौटकौम

Hindi crime story: ‘‘नेहा न तो ये देह व्यापार है और न ही तुम कोई कालगर्ल. यह तो जस्ट अ फन है, जिस में रात के कुछ घंटे किसी के साथ गुजारने हैं. ऐसे ही किसी के साथ भी नहीं, बल्कि जिसे तुम पसंद करो उस के साथ. पहले तुम उस की फोटो को पसंद कर लो, फिर वह तुम्हारी फोटो पसंद करेगा.’’ विपिन ने नेहा को समझाते हुए कहा.

‘‘फिर भी रिस्क तो है न, पकड़े गए तो क्या होगा?’’ नेहा को इस काम से इनकार नहीं था, वह तो बस बदनामी से डर रही थी. वह ऐसा लफड़ा नहीं चाहती थी, जिस से वह पकड़ी जाए.

‘‘नेहा, कोई रिस्क नहीं है, यह तो केवल गेम है. हम लोग तुम्हें होटल में छोड़ेंगे, वहां से तुम्हें हम ही पिक भी करेंगे. तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. कई बार तो होटल की जगह किसी का घर भी हो सकता है.’’

‘‘यह सब केवल रात में ही करना होगा.’’ नेहा ने पूछा.

‘‘हां, केवल रात, वह भी पूरी नहीं. रात में 11 से सुबह 4-5 बजे तक. किसी को कानोंकान खबर नहीं होगी.’’

‘‘यार, कुछ गड़बड़ न हो बस.’’

‘‘कोई गड़बड़ नहीं होगी. तुम्हारे साथ रहने वाली प्रिया तो सब जानती है. एक रात का 10 हजार मिलेगा. आराम से 3-4 रात यह काम करो, इस के बाद महीना भर आराम से रहो. किसी तरह का कोई रिस्क नहीं, यह सारा काम इंटरनेट और वाट्सऐप पर चलता है.’’

ये सारी बातें नेहा और दलाल टाइप के युवक के बीच हो रही थीं. युवक उस गिरोह का हिस्सा था, जो सोशल मीडिया के माध्यम से देह व्यापार चला रहा था.

नेहा ने अपनी साथी प्रिया से पूछा तो उस ने बताया कि कई लड़कियां इस तरह ही अपना खर्च उठा रही हैं. इस के लिए ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है. नेहा ने बात मान ली.

पहली बार नेहा को डर लगा लेकिन धीरेधीरे यह डर खत्म हो गया. अब नेहा और प्रिया एक साथ ही जाने लगीं. होटल और ग्राहक के बीच घूमते हुए नेहा को मजा आने लगा. लखनऊ कालगर्ल डौटकौम के जरिए उन्हें जो ग्राहक मिलते थे, वे अलग थे. उन से मिले पैसों पर कमीशन नहीं देना पड़ता था.

कई बार प्रिया अपने लिए खुद भी ग्राहक खोज लेती थी. ऐसे में उसे किसी को पैसा भी नहीं देना होता था. प्रिया ने यह गुर नेहा को भी बताया, ‘‘कुछ दिन इन लोगों के साथ काम कर लो. उस के बाद हर हफ्ते 1-2 ग्राहक बना लो, अच्छा पैसा मिलने लगेगा. पता है, खुद को तैयार करने के लिए मेकअप से ले कर ड्रैस तक खुद ही खरीदनी पड़ती है.’’

प्रिया ने आगे बताया, ‘‘हर ग्राहक को हर बार नई लड़की की जरूरत होती है. ऐसे में हम दोनों अपने ग्राहकों में अदलाबदली कर लेंगे. इस में हमें किसी और को पैसे नहीं देने होंगे.’’

नेहा ने पूछा, ‘‘जब सब हम ही लोग कर लेंगे तो इन लड़कों को क्यों साथ रखें?’’

प्रिया ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देखो, हर ग्राहक शरीफ नहीं होता. कई बार जब उसे लगता है कि अकेली लड़की है तो वह अपनी मनमरजी करने लगता है. ग्राहक के साथसाथ लड़की को अकेली जान कर पुलिस भी परेशान करती है. ऐसे में लड़कों का सहारा होता है तो ठीक रहता है. यह हमारी सुरक्षा के लिए जरूरी है.’’

नेहा और प्रिया की तरह दरजनों लड़कियां लखनऊ कालगर्ल डौटकौम के माध्यम से देह व्यापार कर रही थीं. ये लड़कियां लालच दे कर नई लड़कियों को देह व्यापार के लिए तैयार भी करती थीं. वैसे ही जैसे एक दलाल और प्रिया ने नेहा को तैयार किया था. कोठे, कोठियों, रेडलाइट एरिया और मसाज पार्लरों से होता हुआ देहव्यापार अब इंटरनेट तक पहुंच चुका है. अब कई ग्राहक वाट्सऐप पर लड़कियों के फोटो और वीडियो देख कर उन्हें पसंद करने लगे हैं. इंटरनेट से देहधंधे में सुविधाएं बढ़ गई हैं. लड़की को अपने अड्डे से ले कर होटल तक ले जाया जा सकता है.

होटल की भी इंटरनेट से बुकिंग होने लगी है, जहां पहले जैसी छानबीन का खतरा नहीं होता. कालोनियों के घरों जैसे बने कुछ कमरों में ही होटल चलने लगे हैं. ऐसे होटलों में खानेपीने की सुविधाएं नहीं होतीं, वहां केवल ठहरने की सुविधा होती है. खानेपीने की सुविधा के लिए होटल के बाहर बनी दुकानों पर निर्भर होना पड़ता है. इस तरह के रैकेट चलाने वाले पेशेवर लड़कियों के दलाल नहीं होते. यहां धंधा करने वाली लड़कियां भी जबरन नहीं लाई जातीं. वाट्सऐप और फेसबुक के जरिए ही इन को बुलाया जाता है.

कई तो हौलीडे पैकेज मान कर 4 से 6 दिन के लिए आती हैं और बाकी बचे महीने भर इस धंधे से दूर रहती हैं. इन में कुछ पढ़ने वाली लड़कियां हैं तो कुछ प्राइवेट जौब करने वाली. कुछ तो डांस, मौडलिंग और एक्टिंग के क्षेत्र में काम करने का दावा तक करती हैं. देह के इस धंधे में इस तरह की लड़कियों की डिमांड ज्यादा होती है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर जैसे पौश एरिया में एक ऐसे ही सैक्स रैकेट को पकड़ा गया. यह सैक्स रैकेट लखनऊ कालगर्ल डौटकौम के नाम से चलता था. गिरोह को चलाने वाले लड़के लड़कियों को ग्राहकों के कमरों तक पहुंचाने और वहां से सुरक्षित लाने का काम भी करते थे.

कई बार ग्राहक पैसे देने में आनाकानी और लड़कियों से जोरजबरदस्ती करने की कोशिश करता है तो उस के लिए गिरोह चलाने वाले अपने पास रिवौल्वर रखते हैं ताकि ऐसे लोगों को धमकाया जा सके. लखनऊ पुलिस को इस बात की सूचना लगी तो उस ने इस गिरोह का राजफाश करने का बीड़ा उठाया. पुलिस ने देर रात चलने वाले वाहनों पर नजर रखनी शुरू कर दी.

9 जून, 2018 को रात करीब ढाई बजे सीओ गोमतीनगर चक्रेश मिश्रा के निर्देश पर पुलिस कठौथा झील के पास आनेजाने वाले वाहनों की चैकिंग कर रही थी, तभी लाल रंग की कार में कुछ लोग आते दिखे. पुलिस ने जब उन्हें रुकने का इशारा किया तो वे तेजी से भागने लगे. पुलिस द्वारा पीछा करने पर कार से उतर कर भाग रहे विपिन नाम के लड़के को पकड़ा गया तो पता चला कि वे लोग सैक्स रैकेट का संचालन कर रहे थे. कार सवार लड़के तो भाग गए लेकिन कार से उतरने वाले लड़के को पुलिस ने पकड़ लिया.

पुलिस ने उस के पास से आधार दरजन मोबाइल, 13 हजार रुपए, एक पिस्टल और एक कार बरामद की. पुलिस की छानबीन में उस ने अपना नाम विपिन शर्मा बताया. विपिन ने अपने फरार साथियों के नाम अंकित, अतुल और गोलू बताए. उस ने पुलिस को बताया कि वे लोग देह व्यापार का धंधा करते हैं. बरामद पिस्टल के बारे में विपिन ने बताया कि कुछ ग्राहक बिगड़ैल किस्म के होते हैं. ऐसे लोग पेमेंट को ले कर लड़ाईझगड़ा तो करते ही हैं, लड़कियों को सैक्स के दौरान परेशान भी करते हैं. पिस्टल ऐसे ग्राहकों को डराने के काम आती है.

विपिन के पास से बरामद पिस्टल गैरलाइसेंसी थी. विपिन ने उस रात 3 लड़कियां ग्राहकों के पास भेजी थीं. वे लड़कियां वापस आने वाली थीं, ये लोग उन्हीं को लेने के लिए आए थे. यह जानकारी मिलते ही एसएसआई अमरनाथ सरोज ने थाने से 2 महिला सिपाही चारू मलिक और रुचि मांगट को बुला लिया. विपिन के दिए बयान के अनुसार पुलिस वहां आने वाली लड़कियों का इंतजार करने लगी. सुबह करीब 6 बजे कार से 4 युवक विकास यादव, कर्मदेव यादव, सतवंत सिंह और आदित्य वर्मा वहां आए. पुलिस ने इन्हें पकड़ लिया.

इन लोगों ने पुलिस को बताया कि 3 लड़कियों को होटल के पास छोड़ा था. वे अभी आ रही होंगी. कुछ ही देर में 3 लड़कियां पैदल आती दिखीं. इन्हें महिला सिपाहियों ने पकड़ लिया. पुलिस की तलाशी में रीना, प्रिया और नेहा के पास पर्स से नकदी, मोबाइल और कुछ आपत्तिजनक चीजें मिलीं. इस में 2 लड़कियां प्रिया और नेहा हावड़ा की रहने वाली थीं. ये चिनहट के पास एक महिला हौस्टल में रह रही थीं. रीना गोरखपुर की थी और एमबीए की पढ़ाई करने के लिए हौस्टल में रह रही थी. पुलिस जब लड़कियों को ले कर होटल गई तो वहां कोई ग्राहक नहीं मिला. ग्राहकों के नाम अहसान अली और दुर्गेश कुमार थे, जो पहले ही जा चुके थे.

पुलिस को पता चला कि इस रैकेट को विपिन कुमार अपने साथियों के साथ मिल कर चलाता था. ये लोग एक कमरा ले कर किराए पर रहते थे. विपिन बीकौम में पढ़ता है, जबकि विकास और आदित्य प्राइवेट जौब करते हुए यह काम करते थे. विभूतिखंड थाने के प्रभारी बृजेश कुमार राय ने बताया कि पुलिस को पता चला है कि ये लोग बड़ेबड़े लोगों को भी लड़कियां सप्लाई करते थे. इस की जांच होगी. पुलिस के सहयोग के लिए साइबर क्राइम पुलिस को भी सहयोग देने के लिए कहा गया है.

पूरा मामला इंटरनेट से जुड़ा होने के कारण साइबर पुलिस की उपयोगिता बढ़ गई थी. उस के सहयोग से ही पुलिस इंटरनेट पर ठिकाना बना कर देह व्यापार कराने वाले रैकेट को पकड़ सकी. पुलिस भी मानती है कि ऐसे धंधों का खत्म होना संभव नहीं है. धरपकड़ कर के केवल इन्हें सीमित भर किया जा सकता है.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. पहचान छिपाने के लिए कुछ नाम बदल दिए गए हैं

Hindi Crime Story: तांत्रिक की सेक्स पूजा

Hindi Crime Story: बदहवास युवती अजमेर के थाना आदर्श नगर थानाप्रभारी सुगन सिंह के सामने जमीन पर घबराई हुई आकर बैठ गई. उस ने उन के पांव पकड़ लिए और गिड़गिड़ाने लगी, ‘‘साहबजी, मुझे बचा लीजिए, वह आज फिर मेरी इज्जत लूटेगा.’’

‘‘कौन इज्जत लूटेगा? मेरा पैर छोड़ो पहले. ऊपर कुरसी पर सामने बैठ कर बताओ कि क्या कहना चाहती हो?’’ सुगन सिंह बोले और एक महिला सिपाही को पानी का गिलास लाने के लिए कहा.

‘‘महिला सिपाही एक गिलास पानी ले आई. तब तक करीब 22-23 साल की दिखने वाली युवती थानाप्रभारी के सामने की कुरसी पर बैठ गई. झट से पानी का गिलास ले कर पानी तेजी से पी गई.

‘‘अब शांति से बताओ कि तुम्हारा नाम क्या है? कहां से आई हो? क्या बात है? तुम क्यों घबराई हुई हो?’’ थानाप्रभारी सुगन सिंह ने एक साथ कई सवाल कर दिए.

‘‘मेरा नाम ललिता है साहब. मुझे बचा लो साहब, मैं अब घर नहीं जाऊंगी. क्योंकि वह फिर मेरे साथ रेप करेगा. बहुत तकलीफ होती है साहब. बुरीबुरी हरकत करता है वो,’’ युवती एक सांस में बोली.

‘‘कौन है वह? पूरी बात साफसाफ बताओ. पहले इस पन्ने पर अपना नाम और पूरा पता लिखो,’’ थानाप्रभारी ने उस की ओर सादा पन्ना लगा राइटिंग पैड और कलम बढ़ा दिया. युवती पन्ने पर अपना नामपता लिखने के बाद बताने लगी—

‘‘साहब, मैं यहीं आदर्श नगर क्षेत्र में ही रहती हूं. मैं 22 फरवरी को अपने मातापिता के साथ एक रिश्तेदार की शादी में दिल्ली गई थी. वहीं एक तथाकथित तांत्रिक राजेंद्र कुमार ने मेरे मातापिता को बताया कि उन का पूरा परिवार मृत्युदोष से ग्रसित है.

‘‘उस ने कहा कि परिवार में पहले छोटी बेटी, फिर पिता उस के बाद बड़ी बेटी की मृत्यु होने वाली है. हवन और पूजापाठ से इस बला से मुक्ति मिल सकती है. उस ने खुद को पहुंचा हुआ तांत्रिक बताया था.

‘‘मेरे पिता उस की बातों में आ गए और उसे अपने घर आने को कह दिया. उस के बाद  27 फरवरी, 2022 को वह तांत्रिक हमारे घर आ गया और पूजापाठ की तैयारी करने के साथ ही कहा कि विशेष पूजा सिर्फ घर की बड़ी बेटी के साथ होगी.

‘‘परिवार वाले तांत्रिक के हर आदेश को मानते हुए बड़ी बेटी के नाते मुझे घर में छत पर बने एक कमरे में तांत्रिक के साथ बंद कर दिया. तांत्रिक पूजा करने के लिए मंत्रजाप करने लगा. उस ने मुझे मंत्रपूरित पानी पीने के लिए दिया.

‘‘पानी पीते ही मेरी आंखें मुंदने लगीं. अर्द्धबेहोशी की हालत में उस ने मेरे कपड़े उतार दिए और मेरे साथ जबरदस्ती की. मैं ने उस का विरोध किया तब उस ने मेरी पिटाई कर दी. मुझे यह कह कर डरा दिया कि उस की आज्ञा का पालन नहीं किया तो मांबाप की मौत हो जाएगी.

‘‘मैं डर गई. उस ने मेरे साथ रेप किया और पिता से एक लाख रुपए भी लिए. एक सप्ताह बाद वह फिर आया और मेरे साथ एक मंदिर में पूजा करने के बहाने से वह मुझे मुरैना ले गया. वहां मुझे एक धर्मशाला में ठहराया और मेरे साथ जोरजबरदस्ती की.

‘‘उस के बाद होली से पहले घर आया और पूजापाठ के बहाने से रेप किया. फिर वही बाबा आज घर आ गया है और पूजा करने की योजना बना रहा है. वह फिर मेरी इज्जत लूटेगा. मेरे साथ जोरजबरदस्ती करेगा… मुझे बचा लीजिए साहब.’’

यह बात 19 मार्च, 2022 की है. ललिता की शिकायत पर थानाप्रभारी सुगन सिंह ने ललिता को विश्वास दिलाया कि अब तुम्हारे साथ कुछ नहीं होगा और उस तांत्रिक के खिलाफ कानूनी काररवाई की जाएगी.

मामला काफी गंभीर था, इसलिए थानाप्रभारी ने उसी वक्त यह जानकारी उच्चाधिकारियों को भी दे दी. तब अजमेर के एसपी ने एक एसआईटी का गठन किया. इस टीम में एएसपी (सिटी) विकास सांगवान, सीओ (दक्षिण) राजेंद्र बुरडक, थानाप्रभारी सुगन सिंह, एएसआई विजय कुमार, हैडकांस्टेबल संतोष कुमार, कांस्टेबल रमेश, करतार सिंह, पीयूष आदि को शामिल किया.

ललिता को साथ ले कर पुलिस टीम आदर्श नगर स्थित उस के घर पहुंच गई. उस समय घर पर वह तांत्रिक ललिता के घर वालों के साथ बातें करने में मशगूल था. ललिता के साथ पुलिस को देख कर उस के घर वाले ही नहीं, बल्कि तांत्रिक राजेंद्र भी चौंक गया.

ललिता के इशारे पर पुलिस ने तांत्रिक राजेंद्र को हिरासत में ले लिया. लेकिन उस का सहयोगी पवन वहां से भाग गया. पुलिस ने तांत्रिक को गिरफ्तार करने की वजह ललिता के मातापिता को बताई तो उन के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस तांत्रिक के कहने पर वह सब कुछ कर रहे थे, वह उन के घर की इज्जत से खिलवाड़ कर रहा है. घर वालों से पूछताछ करने के बाद पुलिस तांत्रिक राजेंद्र को थाने ले आई.

पूछताछ में पता चला कि उस तथाकथित तांत्रिक का नाम राजेंद्र कुमार वाल्मिकी है और वह दिल्ली के गुलाबी बाग क्षेत्र स्थित प्रताप नगर में रहता है. राजस्थान के रहने वाले ललिता के पिता की तांत्रिक के संपर्क में आने की एक अलग घटना है. दरअसल, ललिता के पिता कोरोना काल के दौरान वायरस संक्रमण का शिकार हो गए थे. स्वस्थ होने के बाद वह अपने कामधंधे में जुट गए थे, लेकिन जब भी कुछ अनहोनी होती तो वह डर जाते थे.

इसी बीच फरवरी, 2022 में उन का दिल्ली जाना हुआ. वहां उन के एक रिश्तेदार के यहां शादी थी. उसी दौरान उन्होंने अपने रिश्तेदार से अपनी समस्या बताई. रिश्तेदार ने इस का उपाय करने के लिए एक तांत्रिक से मिलवाया. वह तांत्रिक कोई और नहीं राजेंद्र कुमार वाल्मिकी था. तांत्रिक ने देखते ही बताया कि उस पर भूत का साया है और वह मृत्युदोष का शिकार है. उस ने छूटते ही कहा कि उस पर एक बार मृत्यु आ कर वापस लौट चुकी है, लेकिन अबकी बार आएगी तब बारीबारी से परिवार के 3 सदस्यों को अपने साथ ले जाएगी.

ललिता के पिता यह सुन कर डर गए. उन का 4 लोगों का परिवार था. पतिपत्नी और 2 बेटियां. वह चिंतित हो गए कि पता नहीं परिवार के किस सदस्य को मौत गले लगा ले. उन्होंने बाबा से तुरंत उपाय पूछा. बाबा ने कहा कि घर में 5 दिनों का अनुष्ठान करना होगा और अनुष्ठान में घर की कुंवारी कन्या को शामिल करना जरूरी होगा. इस के साथ ही उस ने कुछ शर्तें भी रखीं, जो उस ने कान में कही थीं. इस में मोटी रकम खर्च की भी बात थी.

ललिता के पिता ने बाबा की सभी शर्तों को मान कर तांत्रिक राजेंद्र को फरवरी, 2022 महीने में अपने घर बुला लिया और तांत्रिक पूजा के लिए घर की छत का एक कमरा दे दिया. पूजा में शामिल होने के लिए उन्होंने बड़ी बेटी को सौंप दिया. उस के बाद बाबा ने तंत्र पूजा के बहाने से वासना का खेल खेला. रेपलीला की. परिवार के बाकी सदस्यों ने बाबा की खूब आवभगत की थी.

शिक्षित ललिता समझ गई कि उस के पिता ढोंगी तांत्रिक के जाल में फंस चुके हैं. उस ने हिम्मत दिखाई और थाने जा कर उस तांत्रिक के खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दी. पुलिस ने ढोंगी तांत्रिक के मोबाइल फोन की जांच की तो उस से कई राज खुले. जांच में सामने आया कि राजेंद्र कुमार वाल्मिकी खुद को भगवान बताता था. कहता था, वह भूत को बोतल में बंद कर रखता है. फिर मृत्यु दोष और भूत के साए के नाम पर लोगों को डराधमका कर उन की बहूबेटियों से रेप करता था.

तांत्रिक धंधे में जुड़ने से पहले राजेंद्र कुमार दिल्ली में आटोरिक्शा चलाता था. वह सट्टा व जुआ भी लगाता था. नौकरी का झांसा दे कर धोखाधड़ी करता था. इतना ही नहीं, वह खुद 5वीं फेल है, लेकिन बीमारियों का शर्तिया इलाज करने का झांसा दे कर लोगों से रुपए ऐंठता था. वह जिस परिवार को निशाना बनाता, उस के बारे में दूर के रिश्तेदारों से पहले ही सारी जानकारियां जुटा लेता था. परिवार की समस्या को दूर करने के लिए तांत्रिक राजेंद्र उस के घर में आसन जमा लेता. रात के समय लोगों को उन से जुड़ी पुरानी बुरी घटनाओं को बता कर स्वयं को भगवान का अवतार बताता.

परिजनों से कहता कि आप के घर में भयानक भूत ने अड्डा जमा रखा है. भविष्य में सब से पहले आप की सब से छोटी संतान को मारेगा और उस के बाद सब की बारी आएगी. मंत्रों से भूत को बोतल में बंद करने के लिए परिवार की सब से बड़ी बेटी को कमरे में अकेले साथ भेजने के लिए कहता. एकांत में तांत्रिक क्रिया करने का नाटक करता. डरेसहमे परिजन ढोंगी की बातों में आ कर बहूबेटियों को उस के कमरे में भेज देते थे. वह परिजनों को दरवाजे के बाहर बैठा देता और जोरजोर से कुल देवता का मंत्र जाप करने के लिए कहता. इस दौरान तांत्रिक क्रिया के बहाने वह महिलाओं से रेप करता था.

बोतल में काले डोरे, रंग आदि लगा कर लाता और परिजनों से कहता कि तंत्रमंत्र कर भूत को बोतल में बंद कर दिया है. अब इस बोतल को दूर जंगल में फेंक आओ. एक पीडि़त परिवार से किसी दूसरे पीडि़त परिवार के बारे में जानकारी जुटाता और फिर इस प्रकार एक चेन सिस्टम बना कर लोगों को फंसाता था. तांत्रिक के मोबाइल फोन में औनलाइन सट्टे पर दांव लगाने के सबूत भी पुलिस को मिले. पुलिस की शुरुआती पड़ताल में सामने आया कि दिल्ली निवासी विजय सोनकर ने ढोंगी बाबा को अपने तीनों बेटों की सरकारी नौकरी लगवाने के लिए 10 लाख रुपए दिए थे.

मामले में पीडि़त विजय द्वारा दिल्ली के सराय रोहिल्ला थाने में मुकदमा दर्ज कराया था. साथ ही ढोंगी बाबा से कई लोगों का इलाज करने के बहाने रुपए ऐंठने की वाट्सऐप चैटिंग और पेमेंट के स्क्रीनशौट मिले. अजमेर पुलिस ने इस ढोंगी तांत्रिक राजेंद्र को गिरफ्तार कर उस के काले कारनामों से परदा उठा दिया. बताते हैं कि यह 300 से 400 परिवारों को अपना शिकार बना चुका है. इतना ही नहीं, जब आरोपी बाबा को गिरफ्तार किया गया, तब उस ने पुलिस पर अपने तंत्रमंत्र का भय दिखाया, लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे ज्यादा देर नहीं टिक पाया.

पुलिस गिरफ्त में आने के बाद तांत्रिक राजेंद्र का कानून के चंगुल से बचना मुश्किल हो गया. उस पर अंधविश्वास, ठगी से ले कर रेप तक की धाराएं लगा कर पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने के बाद कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस मामले में ढोंगी बाबा राजेंद्र वाल्मिकी (49) के बेटे अभिषेक सिरसवाल उर्फ बुक्की (25 साल) को भी पुलिस ने दिल्ली की सराय रोहिल्ला मलकागंज रेलवे कालोनी से गिरफ्तार कर लिया.

वह अपने पिता की तंत्र विद्या का प्रचार करता था. लोगों को उन के चमत्कारी उपाय के बारे में बताता था. भूतप्रेत भगाने के नाम पर वसूली जाने वाली रकम को वह ही लेता था. फरार हो चुके तांत्रिक के सहयोगी पवन कुमार को पुलिस संभावित स्थानों पर तलाश रही थी, लेकिन वह कथा संकलन तक गिरफ्तार नहीं हो सका था. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में ललिता परिवर्तित नाम है.

Best Spy Agencies: ये हैं दुनिया की बेहतरीन जासूसी एजेंसियां

Best Spy Agencies: हम ने कई फिल्मों में रा और आईएसआई के एजेंटों के बारे में देखा है. टीवी पर भी इस से संबंधित कई सीरियल आए हैं. जैसे अनिल कपूर का मशहूर शो ‘24’ भी काफी लोकप्रिय हुआ था. इस में अनिल कपूर ने एक रा एजेंट की भूमिका निभाई थी. आज के किशोर आधुनिक तकनीकी के साथ हर चीज से अपडेट रहना चाहते हैं तो क्यों न उन्हें दुनिया की खासखास और बेहतरीन खुफिया एजेंसियों के बारे में जानकारी दी जाए.

किसी भी देश में सुरक्षा और चौकसी बनाए रखने के लिए कई तरह की सेनाओं, एजेंसियों और अन्य माध्यमों का प्रयोग किया जाता है. इन में से एक महत्त्वपूर्ण कार्य है जासूसी करना. यह काम सरकारी जासूसी एजेंसी से कराया जाता है. खुफिया एजेंसियों का काम दूसरे देशों और संगठनों में सेंध लगा कर उन की जानकारी अपने देश के लिए निकालना होता है.

यही कारण है कि हर देश अपनी सुरक्षा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए खुफिया एजेंसियों पर निर्भर रहता है. वह खुफिया जानकारी ही होती है, जो किसी भी वारदात को अंजाम तक पहुंचने से पहले रोक सकती हैं.

दूसरे देशों की खुफिया एजेंसियों के असर को काटने के लिए अपनी खुफिया एजेंसी को ज्यादा कारगर बनाना जरूरी होता है. इन एजेंसियों में काम करने वाले लोग और इन के तरीके आम लोगों को पता नहीं होते. इन का सार्वजनिक रूप से कभी खुलासा भी नहीं किया जाता. इन के काम का भी कोई सेट फार्मूला नहीं होता है. यहां कुछ खुफिया एजेंसियों के बारे में बताया जा रहा है, जिन के काम करने की शैली आम लोगों के लिए हमेशा राज ही रहती है.

रा (रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग, भारत)

खुफिया एजेंसी किसी भी देश की सुरक्षा में अपना अलग महत्त्व रखती है. रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रा) का गठन 1962 के भारतचीन युद्ध और 1965 के भारतपाक युद्ध के बाद तब किया गया, जब इंदिरा गांधी सरकार ने भारत की सुरक्षा की जरूरत को महसूस किया. इस की स्थापना सन 1968 में की गई थी. इसे दुनिया की ताकतवर खुफिया एजेंसी माना जाता है.

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इस पर खासतौर से विदेशी धरती से भारत के खिलाफ रची जाने वाली साजिशों, योजनाओं का पता लगाने, अपराधियों और आतंकवादियों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने और उस के हिसाब से देश के नीति निर्माताओं को जानकारी मुहैया कराने की जिम्मेदारी है, ताकि देश और यहां के लोगों की सुरक्षा संबंधी नीतियों को बेहतर बनाया जा सके.

इसका मुख्यालय दिल्ली में स्थित है. यह एजेंसी भारत के प्रधानमंत्री के अलावा किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है. यह विदेशी मामलों, अपराधियों, आतंकियों के बारे में पूरी जानकारी रखती है. रा अपने खुफिया औपरेशंस के लिए जानी जाती है. इस ने अपनी कार्यकुशलता के जरिए कई बडे़ आतंकी हमलों को नाकाम किया है.

इस के सभी मिशन इतने सीक्रेट होते हैं कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती. यहां तक कि एजेंसी में काम करने वालों के परिजनों तक को पता नहीं होता कि वह किस मिशन पर काम कर रहा है. यह एजेंसी इतनी खुफिया है कि किसी भी अखबार को इस के बारे में छापने की अनुमति नहीं है.

आईएसआई (इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस, पाकिस्तान)

यह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी है जो आतंकवाद और उपद्रव को बढ़ाने के लिए भी बदनाम रही है. आईएसआई की स्थापना सन 1948 में की गई थी. 1950 में पूरे पाकिस्तान की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा का जिम्मा आईएसआई को सौंप दिया गया था.

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इस में सेना के तीनों अंगों के अधिकारी मिल कर काम करते हैं. अमेरिका क्राइम रिपोर्ट के मुताबिक आईएसआई को सब से ताकतवर एजेंसी बताया गया था. हालांकि आईएसआई पर आए दिन आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं. भारत में हुए कई आतंकी हमलों में भी आईएसआई के एजेंटों की भूमिका उजागर हो चुकी है. इस का मुख्यालय इस्लामाबाद में है.

सीआईए (सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी, अमेरिका)

यह अमेरिका की बहुचर्चित खुफिया एजेंसी है. इस की स्थापना सन 1947 में तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने की थी. सीआईए 4 भागों में बंटी हुई है. इस का मुख्यालय वर्जीनिया में है. सीआईए सीधे डायरेक्टर औफ नैशनल इंटेलिजेंस को रिपोर्ट करती है. 2013 में वाशिंगटन पोस्ट ने सीआईए को सब से ज्यादा बजट वाली खुफिया एजेंसी बताया था. साइबर क्राइम, आतंकवाद रोकने समेत सीआईए देश की सुरक्षा के लिए काम करती है. कहा जाता है कि अमेरिका को सुपर पावर का दरजा सीआईए के खुफिया कार्यक्रमों की वजह से ही मिल पाया है.

वैसे भारत में ही नहीं, दुनिया के कई देशों में सीआईए की गतिविधियों को ले कर सदैव प्रश्नचिह्न लगते रहे हैं. हालांकि ओसामा बिन लादेन को मार गिराने में सीआईए की सफलता एक लंबे अरसे के बाद मिली ऐतिहासिक विजय मानी गई थी. सीआईए के पास दूसरे देशों से खुफिया जानकारी जुटाने के अलावा आतंकवाद, परमाणु हथियार और देश के बड़े नेताओं की सुरक्षा का भी जिम्मा है.

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मौजूदा समय में सीआईए के सामने आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है. कहा जाता है कि सीआईए का बजट अरबों डौलर का होता है. इसे मिलने वाले पैसे की जानकाररी को वैसे तो गुप्त रखा जाता है पर माना जाता है कि 2017 में इस के लिए अमेरिकी सरकार ने 12.82 अरब डौलर का बजट दिया था.

एमआई-6 (मिलिट्री इंटेलिजेंस सेक्शन-6, ब्रिटेन)

जेम्स बौंड सीरीज की फिल्मों में बौंड के किरदार को इसी इंटेलिजेंस एजेंसी का सीक्रेट एजेंट बताया जाता है. अब आप समझ ही गए होंगे कि तकनीक और बहादुरी में इस का कोई मुकाबला नहीं है. इस की स्थापना सन 1909 में की गई थी. यह सब से पुरानी खुफिया एजेंसियों में से एक है. माना जाता है कि इस एजेंसी ने अपनी सेवाएं प्रथम विश्वयुद्ध में भी दी थीं और हिटलर को हराने में इस की मुख्य भूमिका थी.

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इस एजेंसी की खास बात यह भी है कि यह दूसरे देशों की खुफिया एजेंसियों को भी उन के मिशन में मदद करती है. इसे यूनाइटेड किंगडम की सुरक्षा का गुप्त मोर्चा भी कहा जाता है. एमआई-6 जौइंट इंटेलिजेंस, डिफेंस सरकार के साथ जानकारी साझा करने जैसे काम करती है.

एमएसएस (मिनिस्ट्री औफ स्टेट सिक्योरिटी, चीन)

यह चीन की एकलौती खुफिया एजेंसी है, जो आंतरिक और बाहरी दोनों मामलों पर नजर रखती है. इस का मुख्यालय बीजिंग में है. यह एजेंसी चीन को विश्व की गतिविधियों से अवगत कराती है. इस एजेंसी के जिम्मे काउंटर इंटेलिजेंस औपरेशंस और विदेशी खुफिया औपरेशंस को चलाना है. इस का गठन सन 1983 में हुआ था.

यह एजेंसी देश के आंतरिक मामलों में दखल बस कम्युनिस्ट पार्टी की लोकप्रियता बनाए रखने के लिए देती है. चीन जैसे कम्युनिस्ट देश में कई बार सूचनाओं पर भी प्रतिबंध लग जाते हैं.

वैसे भी यहां की कम्युनिस्ट सरकार को अगर कोई गुप्त सूचना या दुश्मन के बारे में जानना होता है तो वह एमएसएस को ही याद करती है. यह चीनी सरकार की सब से भरोसेमंद एजेंसी है. इस एजेंसी का एक ही मकसद है चीनी जनता की रक्षा और कम्युनिस्ट पार्टी का शासन बरकरार रखना.

पिछले 2 दशकों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह तेजी से उभरी है. इस की खासियत यह है कि जितनी बारीकी से यह अपने देश के नागरिकों की हर गतिविधि का रिकौर्ड रखती है, उतना ही मजबूत तंत्र इस का विदेशों में भी है.

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चीन ने जिस तरह से आर्थिक क्षेत्र में पूरी दुनिया में अपना दबदबा बनाया है और उस से महाशक्ति अमेरिका तक परेशान है, ठीक इसी तरह उस की खुफिया एजेंसी भी काफी मजबूत हो गई है. उस के स्लीपर सेल आज दुनिया के कोनेकोने में फैले हुए हैं.

एएसआईएस (आस्ट्रेलियन सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस, आस्ट्रेलिया)

यह आस्ट्रेलिया की खुफिया एजेंसी है. पिछले 2 दशकों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह तेजी से उभरी है. इस का मुख्यालय कैनबरा में है. इस का सहयोग व्यापार और विदेशी मामलों में भी लिया जाता है. 13 मई, 1952 को इस जांच एजेंसी का गठन किया गया था. इस की इंटेलिजेंसी काफी कुशल है जो अब तक इसे अंतरराष्ट्रीय खतरों से बचाए हुए है. इस का कार्यक्षेत्र एशिया और प्रशांत महासागर के क्षेत्र हैं.

यह खुफिया एजेंसी आस्ट्रेलियाई सरकार की एक तरह से वाचडौग है और यह चौबीसों घंटे देश की सेवा में लगी रहती है. पिछले कुछ सालों में इस ने कई घरेलू और बाहरी अपराधियों को गिरफ्तार करवाया है.

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मोसाद (इजराइल)

यह खुफिया एजेंसी दुनिया की सब से बेहतरीन खुफिया एजेंसी मानी जाती है. इस एजेंसी का अरब के देशों में काफी दबदबा है. इस की स्थापना सन 1949 में की गई थी. इस के बारे में खास बात यह है कि ये अपना काम बहुत ही क्रूरता के साथ करती है.

अगर इजराइल या फिर उस के नागरिकों के खिलाफ कोई साजिश रची जा रही हो तो जानकारी मिलने पर मोसाद के खूंखार एजेंट ऐसे साजिशकर्ताओं को दुनिया के किसी भी कोने से ढूंढ कर मौत के घाट उतार देते हैं.

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यह दुनिया की सब से खतरनाक खुफिया एजेंसी है. कहा जाता है कि इस का कोई भी औपरेशन आज तक फेल नहीं हुआ. मोसाद मुख्यत: आतंक विरोधी औपरेशंस को अंजाम देती है और सीक्रेट औपरेशंस चलाती है, जिस का उद्देश्य देश की रक्षा करना होता है. वैसे तो मोसाद काम इजराइल में अन्य एजेंसियों के साथ मिल कर करती है, लेकिन उस की जवाबदेही केवल प्रधानमंत्री को ही है.

डीजीएसई (डायरेक्टोरेट जनरल फौर एक्सटर्नल सिक्योरिटी, फ्रांस)

इस एजेंसी को सन 1982 में बनाया गया था, जिस का मकसद फ्रांस सरकार के लिए विदेशों से खुफिया जानकारी एकत्र करना है. इस का मुख्यालय पेरिस में है. यह एजेंसी अन्य देशों की खुफिया एजेंसी से काफी अलग है. डीजीएसई सिर्फ देश के बाहरी मामलों पर नजर रखती है. इस का मुख्य काम सरकार को आईएसआई की गतिविधियों से आगाह कराना है.

यह लोकल पुलिस के साथ मिल कर भी काम करती है. इस एजेंसी के द्वारा सेना और पुलिस को रणनीति बनाने में बहुत सहयोग दिया जाता है. कुछ देशों की तरह यह एजेंसी भले ही शक्तिशाली न हो लेकिन 9/11 के बाद इस ने 15 आतंकवादी घटनाएं होने से बचाई है. संसाधनों की कमी के बावजूद इस के हजारों जासूस दुनिया भर में फैले हुए हैं.

बीएनडी (फेडरल इंटेलिजेंस सर्विस, जर्मनी)

जर्मनी की बीएनडी को बेहतरीन और आधुनिक तकनीकों से लैस खुफिया एजेंसी माना जाता है. इस का मुख्यालय म्यूनिख के पास पुलाच में है. इस एजेंसी की खास बात यह है कि यह दुनिया भर की फोन काल्स पर खास नजर रहती है. इस एजेंसी के बारे में बहुत कम लोगों को ही पता है.

इस की निगरानी प्रणाली इतनी शानदार है कि शायद ही कोई इंटेलिजेंस एजेंसी इसे मात दे पाए. खतरे को पहले ही भांप कर यह उसे खत्म कर देती है. इस का गठन सन 1956 में हुआ था. बीएनडी योजनाबद्ध अपराध, प्रौद्योगिकी के अवैध हस्तांतरण, हथियारों और नशीली दवाओं की तस्करी, मनी लांड्रिंग और गैरकानूनी ढंग से देश से आनेजाने वालों का भी मूल्यांकन करती है.

समय के साथसाथ इस एजेंसी ने अपने कदम काफी आगे बढ़ा लिए हैं, इस एजेंसी की सब से बड़ी ताकत इस के जासूस होते हैं. अपने जासूसों के बल पर ही यह एजेंसी जान पाती है कि दुनिया में क्या चल रहा है. कहते हैं कि मौजूदा समय में बीएनडी के पास लगभग 4 हजार जासूसों का नेटवर्क है.

देश की सुरक्षा से संबंधित इस एजेंसी के पास बहुत से अधिकार भी हैं जैसे कि सुरक्षा की बात हो तो यह कभी भी किसी का भी फोन टेप कर सकती है. किसी की निजी जानकारी लेने पर भी वह किसी भी प्रकार की बाधा में नहीं फंसते हैं.

एफएसबी (फेडरल सिक्योरिटी सर्विस, रूस)

1995 में स्थापित एफएसबी खुफिया एजेंसी का लोहा पूरी दुनिया मानती है. इस का मुख्यालय मौस्को में है. माना जाता है कि सूचना देने और सुरक्षा पहुंचाने में एफएसबी का कोई जवाब नहीं है. खुफिया से जुड़े मामलों के अलावा एफएसबी बौर्डर से जुड़े मामलों पर भी गहरी नजर रखती है. यह गंभीर अपराधों और संघीय कानूनों के उल्लंघन की जांच भी करती है. ऐसा रूस के शीर्ष सुरक्षा बलों का मानना है.

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यूं तो पिछले कई सालों तक जब सोवियत संघ का पतन नहीं हुआ था, तब रूस में खुफिया एजेंसी केजीबी का दबदबा था और राष्ट्रपति पुतिन उस के चीफ रह चुके हैं. लेकिन एफएसबी ने पिछले कुछ सालों से आतंकवाद के खात्मे के लिए जो कार्यक्रम चलाए हैं, उस से यह रूस की नंबर एक खुफिया एजेंसी बन गई है.

इस एजेंसी ने ही रूस को एक बार फिर सुपरपावर देशों के लिए एक बड़ी चुनौती बना दिया है वरना केजीबी के बंद होने के बाद रूस की परेशानी बढ़ गई थी. देश के बाहर ही नहीं, बल्कि देश में आतंकवाद की संभावित घटनाओं को रोकने के लिए यह मशहूर है. Best Spy Agencies

Hindi stories: मैं कहा आ गई

Hindi stories: नरगिस जो सोच कर दिलशाद बेगम का कोठा छोड़ कर भागी थी, जब उसे वैसा ही माहौल भाई के घर में भी मिला तो उसे लगा, इस से अच्छा तो दिलशाद बेगम का कोठा ही था. अंतर सिर्फ इतना है कि यहां डांस को आर्ट कहा जाता है और वहां मुजरा.

सिसिगरेट का लंबा कश खींच कर गुलजार खां बोला, ‘‘दिलशाद बेगम, मैं तुम से फिर कह रहा हूं, शरीफों का खून बड़ा बेएतबार होता है. किसी दिन खट्टा खाओगी. मेरी मेहनत बेकार जाएगी.’’

‘‘गुलजार खां, उसे पढ़ने का शौक था, मैं ने पढ़ने बैठा दिया. बस, इतनी सी बात है. आंखें दिखाते ही सिर से पांव तक कांप जाती है.’’

‘‘मगर तुम यह क्यों भूल जाती हो कि पढ़नेलिखने से अच्छाईबुराई में तमीज करना आ जाता है. जिस दिन ऐसा हो गया, समझो, गई हाथ से.’’

‘‘समझ में नहीं आता, तुम्हारी इस बात पर हंसूं या कहकहे लगाऊं. जितने तमाशाई हमारे यहां आते हैं, माशाअल्लाह सब पढ़ेलिखे होते हैं. अच्छे खानदानों से भी होते होंगे, लेकिन सफेद कपड़े पहन कर कीचड़ में आ जाते हैं. नरगिस कीचड़ में कमल सी है.’’

‘‘तमाशा देखना अलग बात है, तमाशा बनना अलग. वे सब तमाशा देखने आते हैं, तमाशा बनने नहीं. नरगिस की बात और है.’’

‘‘पैदा किए की तो खैर मोहब्बत होती ही है, मगर पालने की मोहब्बत भी कम नहीं होती. 4 साल की उम्र से पाला है उसे.’’

‘‘बेचारी तुम्हीं को अपनी मां समझती है,’’ गुलजार खां ने दांत निकालते हुए कहा. फिर एकदम संजीदा हो गया, ‘‘अच्छा, यह बताओ, तुम से उस ने कभी अपने बाप का नाम पूछा है?’’

‘‘हां, बचपन में पूछती थी, मगर अब शायद समझ गई है कि इस बाजार में बाप नहीं, सिर्फ मां होती हैं.’’

‘‘अगर उसे मालूम हो जाए कि उस का कोई बाप भी है और तुम उस की मां नहीं हो तो सोचो, क्या होगा?’’

‘‘यह तो मैं बाद में सोचूंगी, पहले तुम यह बताओ कि तुम्हें आज हुआ क्या है?’’

‘‘हुआ यह है कि मुझे 20 हजार रुपए की जरूरत है.’’

‘‘मैं तुम्हें नरगिस की कीमत से बहुत ज्यादा दे चुकी हूं.’’

‘‘वह तो मुझे मिल चुकी है. अब मैं इस राज को छिपाने के लिए थोड़े से पैसे मांग रहा हूं. तुम्हें नहीं मालूम, किसी राज को छिपाना कितना मुश्किल होता है.’’

‘‘अब तुम्हें देने के लिए मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है,’’ दिलशाद बेगम गुर्राई, ‘‘और हां, इस घमंड में मत रहना कि तुम नरगिस को मेरे खिलाफ भड़का दोगे. मैं ने कच्ची गोलियां नहीं खेलीं. मैं तुम्हारी तरफ से उस के दिल में इतना जहर भर चुकी हूं कि अब वह तुम्हारी सूरत से भी नफरत करती है.’’

‘‘सोच लो, दिलशाद बेगम.’’

‘‘सोच लिया. यह कोठा यूं ही नहीं चला रही हूं.’’

दिलशाद बेगम के लहजे में इतना विश्वास था कि गुलजार खां खुशामद पर उतर आया, ‘‘दिलशाद बेगम, मैं ने तुम्हारी कितनी खिदमत की है और तुम हो कि मामूली सी रकम के लिए इनकार कर रही हो.’’

‘‘इनकार नहीं कर रही, तुम्हारी धमकियों का जवाब दे रही हूं.’’

‘‘धमकियां कैसी? मैं तो मजाक कर रहा था. लाओ, जल्दी से रकम निकालो.’’

‘‘एक शर्त पर. आइंदा तुम मेरे पास रकम लेने नहीं आओगे.’’

‘‘मंजूर है.’’

‘‘तुम बैठो, मैं अभी आई.’’ कह कर दिलशाद बेगम अपने कमरे में चली गईं.

आगे क्या होता है, यह देखने या सुनने की नरगिस को जरूरत नहीं थी. वह उलटे कदमों वापस हुई और घर से बाहर निकल गई. उस की हालत उस परिंदे की तरह थी, जिस के पर काट कर तेज हवा में उसे छोड़ दिया गया हो. उस ने ये बातें इत्तिफाक से सुन तो ली थीं, लेकिन उसे यह मालूम नहीं था कि सच्चाई का रहस्योद्घाटन कितना कष्टदायक होता है. कल तक वह कितनी मजबूत थी. आज रेत की दीवार की तरह बैठी जा रही थी. अगर गुलजार खां उस से यह बात कहता तो शायद वह कभी यकीन न करती. लेकिन दिलशाद बेगम, जिसे अब तक वह अपनी मां समझती रही थी, उस ने खुद कबूल किया था कि वह उस की मां नहीं है.

नरगिस इस बाजार की गंदगी को कबूल कर चुकी थी. वह यहां पैदा हुई है तो यहीं के आदाब उस पर सजेंगे. उसे कभी भूले से अपने बाप का खयाल आया भी था तो वह यह सोच कर हंस दी थी कि इस बाजार में किसे यह नेमत मिलती है, जो उसे मिलेगी. लेकिन जैसे ही उस पर राज खुला कि वह किसी की अमानत है, उसे खयानत के अहसास ने बेचैन कर दिया. वह अब तक अपने बाप का नाम डुबोती रही है. लेकिन कौन बाप? गुलजार खां ने यह तो बताया ही नहीं. कहीं वह जल्दी तो वहां से नहीं हट गईं? शायद उस ने बाद में नाम भी बताया हो.

गली में उस वक्त सन्नाटा था. इक्कादुक्का लोग चलफिर रहे थे. इन गलियों में तो रातें जागती हैं, दिन सोते हैं. उस वक्त भी दरोदीवार ऊंघ रहे थे. अगर सुगरा उसे बुला कर न ले गई होती तो वह भी इस वक्त सो रही होती. सुगरा उस के पड़ोस में रहती थी और नरगिस की तरह वह भी तालीम की मंजिल से गुजर रही थी. सुगरा और वह एक ही उस्ताद से नाच की तालीम हासिल कर रही थीं.

नरगिस इन्हीं खयालों में गुम थी कि उसे गुलजार खां आता दिखाई दिया.

‘‘गुलजार खां.’’ नरगिस ने उसे हौले से पुकारा.

‘‘हूं, क्या है?’’

‘‘तुम कल मुझ से मिल सकते हो?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बस, ऐसे ही.’’ नरगिस ने इठलाते हुए कहा.

‘‘मैं आज ही एक हफ्ते के लिए शहर से बाहर जा रहा हूं.’’

‘‘मेरी खातिर एक दिन के लिए रुक नहीं सकते?’’ नरगिस फिर इठलाई.

नरगिस ने उस से कभी सीधे मुंह बात नहीं की थी. उस ने अदाएं दिखाईं तो गुलजार खां के मुंह में पानी आ गया, ‘‘चल, तू कहती है तो रुक जाता हूं, लेकिन बात क्या है?’’

‘‘कल ही बताऊंगी.’’ नरगिस ने कहा और भागती हुई घर में चली गई.

नरगिस घर में दाखिल हुई तो दिलशाद बेगम उस के इंतजार में थी. दिलशाद बेगम उसे देखते ही गुर्राई, ‘‘कहां थीं तुम?’’

नरगिस का जी चाहा कि उस से भी ज्यादा जोर से चीख कर कहे, ‘तुम यह पूछने वाली कोन होती हो?’ लेकिन अभी इस का वक्त नहीं आया था. इसलिए बोली, ‘‘जरा देर के लिए सुगरा के पास गई थी.’’

‘‘खबरदार, जो कल से तू ने एक कदम भी बाहर निकाला.’’

‘‘अच्छा अम्मां.’’

‘‘और यह भी सुन लो. बहुत पढ़ चुकी. मैं कल मास्टर साहब को मना कर दूंगी. सिर्फ उस्तादजी आएंगे. हमारा रिश्ता किताबों से नहीं, घुंघरुओं से है. उसी में मन लगाओ.’’

नरगिस ने यह भी नहीं पूछा कि यह जुल्म क्यों कर रही हो? उस ने किसी प्रतिक्रिया का इजहार किए बगैर सिर झुका कर अपने कमरे का रास्ता लिया. अब उसे यह सोचना था कि वह हालात से समझौता कर ले या उस माहौल से बगावत कर के यहां से निकल जाए, लेकिन यहां से निकल कर कहां जाए? इस का फैसला गुलजार खां से मुलाकात के बाद ही किया जा सकता था. रात को नरगिस सोने के लिए लेटी तो नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. जिस बिस्तर पर वह शौक से लेटती थी, आज गंदगी का अहसास हो रहा था. उसे अपनेआप से घिन आ रही थी. सोचतेसोचते जैसे किसी ने उस के जेहन में कोई झरोखा खोल दिया.

उस ने उस झरोखे से बाहर झांक कर देखा. शादी का घर था, मेहमानों से भरा हुआ शोर था. 4 साल की एक बच्ची सुर्ख रंग के कपड़े पहने, तितली की तरह इधर से उधर घूमती फिर रही थी. फिर उस के जी में न जाने क्या आया कि अकेली घर से बाहर आ गई. सामने गुब्बारे वाला खड़ा था. वह उस के करीब जा कर खड़ी हो गई और हसरतभरी नजरों से गुब्बारों की तरफ देखने लगी.

‘‘गुब्बारा लोगी?’’ एक आदमी ने उस के करीब आ कर बड़े प्यार से पूछा.

‘‘पैसे नहीं हैं.’’ वह बोली.

‘‘पैसे मैं दिए देता हूं.’’ उस आदमी ने कहा.

‘‘नहीं, अम्मा कहती हैं, किसी से पैसे नहीं लेते.’’

‘‘गैरों के लिए कहा होगा, मैं तो चचा हूं तुम्हारा.’’

बच्ची राजी हो गई. गुब्बारे वाला इतनी देर में आगे बढ़ चुका था. वह उस की उंगली थामे आगे बढ़ती रही. फिर क्या हुआ था? नरगिस ने याददाश्त के झरोखे में झांक कर देखा, दूर तक अंधेरा फैला हुआ था. रेल की सीटी की आवाज आई. वह रो रही थी. फिर चुप हो कर सो गई. अम्मा का चेहरा तो कुछकुछ याद भी था, अब्बा तो बिलकुल याद नहीं थे.

नरगिस को ताज्जुब हो रहा था कि अब तक उसे ये बातें क्यों याद नहीं आई थीं. खयाल तक नहीं आया था इन बातों का. गुलजार खां, तू ने यह क्या कर दिया? ऐसी बातें मेरे कानों में क्यों डाल दीं? मैं गफलत की नींद सो रही थी, तू ने मुझे क्यों जगा दिया? क्या मैं अब जिंदगीभर सो सकूंगी? जो बिछड़ गए, जिंदा भी होंगे? जिंदा हुए भी तो मुझे मिलेंगे कैसे?

दिन निकल गया. नरगिस सोई कब थी कि जागती. उस ने अपने मंसूबे के मुताबिक जरूरी तैयारी की और गुलजार खां का इंतजार करने लगी. दोपहर के करीब जब दिलशाद बेगम अपने कमरे में सो रही थी, गुलजार खां आ गया. वह उस वक्त आया ही इसलिए था कि दिलशाद बेगम सो रही होगी.

‘‘गुलजार खां, तुम अम्मा से पैसे मांग रहे थे?’’ नरगिस ने पूछा.

‘‘हां, मांगे तो थे, लेकिन तुम्हें कैसे मालूम हुआ?’’

‘‘किसी ने भी बताया हो, मगर यह बात सही तो है न?’’

‘‘कह तो रहा हूं सही है.’’

‘‘क्या जरूरत आ पड़ी?’’

‘‘मेरी बेटी की शादी है. उस की मां को मैं तलाक दे चुका हूं. बेटी से भी नहीं मिलता, लेकिन है तो मेरा खून. उस की शादी का सुना तो मैं ने सोचा, कोई जेवर बनवा दूं,. कुछ हक मेरा भी तो है.’’

‘‘क्या तुम अपनी बेटी से बहुत मोहब्बत करते हो?’’ नरगिस ने पूछा.

‘‘मोहब्बत तो मुझे मालूम नहीं, किस बला का नाम है, लेकिन उस की शादी का सुना तो दिल चाहा कि मैं भी उस के लिए कुछ करूं.’’

‘‘जिसे खुश करने के लिए अपना सब कुछ कुरबान करने को जी चाहे, वही महबूब होता है. इसी जज्बे का नाम मोहब्बत है.’’

‘‘होगा, मुझे क्या?’’ गुलजार खां लापरवाही से बोला.

‘‘तुम अपनी बेटी से मिलते तो हो नहीं, बरसों से तुम ने उसे देखा भी नहीं होगा?’’

‘‘मिलने या न मिलने से क्या होता है. बेटी तो है वह मेरी.’’

‘‘वह भी तुम से मोहब्बत करती होगी?’’

‘‘क्यों नहीं करती होगी?’’

‘‘फिर तुम से मिलने क्यों नहीं आती?’’

‘‘अपनी मां के डर से. उस की मां बड़ी जालिम है.’’

‘‘मैं भी अपनी मां के डर से अपने बाप से नहीं मिलती.’’

‘‘कौन सी मां?’’ गुलजार खां अनजाने तौर पर पूछ बैठा.

‘‘दिलशाद बेगम और कौन?’’ नरगिस ने इत्मीनान से जवाब दिया.

‘‘हां, मगर बाप… बाप कौन है तुम्हारा?’’

‘‘यही पूछने के लिए तो मैं ने तुम्हें बुलाया है.’’

‘‘दिमाग खराब है क्या?’’ गुलजार खां ने झुंझला कर कहा, ‘‘मैं क्या ठेकेदार हूं तुम्हारे बाप का, और यह ठेकेदारी कबूल कर भी ली तो इस बाजार में किसकिस के बाप को तलाश करता फिरूंगा?’’

‘‘अगर नहीं मालूम तो छोड़ो.’’ कह कर नरगिस अपनी जगह से उठी और जेवर का डिब्बा ला कर गुलजार खां के सामने रख कर बोली, ‘‘ये कुछ जेवर हैं.’’

‘‘वह तो मैं भी देख रहा हूं, मगर तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘गुलजार खां, तुम ये जेवर अपनी बेटी को दे दो.’’

‘‘ये…ये… सब मेरा मतलब है, ये सब ले लूं?’’ गुलजार खां ने बेसब्री से जेवर की तरफ हाथ बढ़ाया.

‘‘नहीं, ऐसे नहीं.’’

‘‘फिर कैसे?’’

‘‘मुझे जिस घर से उठाया था, उस घर की निशानदेही कर दो. मेरा बाप भी तो मेरी शादी के लिए पैसे जमा करता फिर रहा होगा. उस की मेहनत ठिकाने लगा दो…’’

‘‘मेरा क्या वास्ता तुम्हारे बाप से…?’’

‘‘अब कोई फायदा नहीं गुलजार खां, मुझे वह गुब्बारे वाला याद आ गया है, जिस के पीछेपीछे मैं चली थी. वह आदमी तुम ही थे, जिस ने मेरी उंगली थाम कर कहा था, ‘गुब्बारा लोगी?’ तुम गुब्बारा तो नहीं दिला सके, यह कोठा दिला दिया.’’

‘‘ऐ लड़की, लानत भेज अपनी याददाश्त पर. मैं ऐसे घटिया काम नहीं करता.’’

‘‘गुलजार खां, मैं ने दिलशाद बेगम से तुम्हारी बातचीत सुन ली है. अब तुम सीधी तरह मुझे मेरे बाप का नाम बता दो.’’

‘‘मैं ऐसी बेहूदा बातों का जवाब नहीं देता. हिम्मत है तो दिलशाद बेगम से पूछो.’’

‘‘गुलजार खां, सोच लो. तुम्हारे 2 लफ्जों की कीमत ये सारे जेवर हैं.’’

गुलजार खां के चेहरे का रंग बदलने लगा. लगता था, जैसे वह किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले सोचने की क्रिया से गुजर रहा है.

‘‘गुलजार खां, तुम ने जिंदगी में शायद ही कोई नेक काम किया हो. आज एक नेकी कमा लो. जरा सोचो, तुम्हारी बेटी इतने जेवर देख कर कितनी खुश होगी.’’ नरगिस ने उस की गैरत को झिंझोड़ा.

‘‘अगर दिलशाद बेगम को मालूम हो गया, तो…?’’

‘‘फिक्र मत करो. तुम्हारा नाम कहीं नहीं आएगा. तुम्हारा नाम लेने के लिए मैं यहां रहूंगी ही नहीं.’’

‘‘लेकिन मैं तुम्हें क्या बताऊं? इतना अरसा गुजर गया, मुझे कुछ याद नहीं रहा.’’

‘‘सोचो, गुलजार खां, सोचो. जेहन पर जोर डालो. याद करो. कुछ तो याद होगा.’’

‘‘सच्ची बात तो यह है कि मैं तुम्हारे बाप को जानता तक नहीं. वह मकान तक मुझे याद नहीं, जहां से मैं ने तुम्हें उठाया था.’’

‘‘वह शहर तो याद होगा.’’

‘‘हां, शहर याद है. मोहल्ला भी याद आ जाएगा, लेकिन मकान, यह मुश्किल है.’’

‘‘शहर और मोहल्ला ही बता दो.’’

‘‘मैं ने तुम्हें मुलतान से उठाया था और मोहल्ले का नाम था मुमताजाबाद. इस के सिवा मुझे कुछ याद नहीं.’’

नरगिस के तनबदन में आग लग रही थी. उस का दिल चाह रहा था कि गुलजार खां का मुंह नोच ले. उस का मुजरिम उस के सामने था, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकती थी.

‘‘अब तुम क्या करोगी?’’ गुलजार खां ने पूछा.

‘‘करना क्या है. मुलतान जाऊंगी. मुमताजाबाद में कोई तो जानता होगा कि 15 साल पहले वहां किस की दुनिया उजड़ी थी. कुछ तो मालूम होगा. कुछ भी कर लूंगी, मगर अब यहां नहीं रहूंगी.’’

नरगिस बोलती रही और गुलजार खां डिब्बे से जेवर निकाल कर कंधे पर पड़े रूमाल में बांधता रहा. उस ने तमाम जेवर समेटे और खामोशी से बाहर निकल गया. अब नरगिस सोच रही थी कि यहां से कैसे निकले? जिस घर में उस ने 15 बरस काट दिए थे, अब वहां 15 मिनट गुजारना भी मुश्किल था.

अगले दिन सुबह हुई, फिर दोपहर हुई और फिर पूरे बाजार में यह खबर फैल गई कि नरगिस भाग गई.

दिलशाद बेगम को रहरह कर गुलजार खां की बात याद आ रही थी. उस ने कहा था, ‘ज्यादा ढील मत दो, वरना खट्टा खाओगी.’ ठीक कहता था. खा लिया खट्टा. ऐसी हर्राफा निकली कि कानोंकान खबर नहीं होने दी और भाग गई.

नरगिस ने एक बड़ी चादर से अपने जिस्म को अच्छी तरह लपेटा हुआ था. दिन का वक्त था, इसलिए चहलपहल जरा कम थी. वह गली से निकली और जिधर मुंह उठा, पैदल चल दी. वह गली से निकलते ही तांगे में बैठ सकती थी, लेकिन खामख्वाह तांगे वाले के फिकरों का निशाना बनना नहीं चाहती थी. जब उसे यकीन हो गया कि वह बहुत दूर निकल आई है तो उस ने एक तांगे वाले को हाथ दिया.

‘‘स्टेशन चलोगे?’’

‘‘क्यों नहीं चलेंगे, सवारियां कहां है?’’ तांगे वाले ने पूछा.

‘‘मैं अकेली हूं.’’ नरगिस बोली.

‘‘बैठिए.’’

नरगिस तांगे की पिछली सीट पर बैठ गई. तांगे वाले ने चाबुक लहराई और घोड़े ने कदम उठा दिए.

‘‘स्टेशन जा रही हैं, तो किसी दूसरे शहर भी जा रही होंगी, लेकिन यों खाली हाथ…?’’

नरगिस का जी चाहा कि उसे डांट दे, लेकिन यह सोच कर गुस्सा पी गई कि बातचीत के दौरान शायद कोई मतलब की बात हाथ लग जाए, ‘‘मेरी सास रावलपिंडी से सवार हुई होंगी. मेरा सामान उन्हीं के पास है.’’

‘‘लेकिन इतनी जल्दी क्यों जा रही हैं? गाड़ी आने में पूरे 2 घंटे बाकी हैं.’’

‘‘मेरी घड़ी खराब थी.’’

 

तांगे वाले ने इस बार कोई नया सवाल नहीं उठाया. समझ में नहीं आता था कि वह नरगिस के स्पष्टीकरण से आश्वस्त हो गया है या मायूस हुआ था. स्टेशन आ गया तो उस ने अजीब अंदाज में कहा, ‘‘लो बीबी, स्टेशन आ गया. तुम तो शायद पहली बार यहां आई होगी?’’

नरगिस कुछ नहीं बोली. तांगे वाला पैसे ले कर चलता बना, नरगिस हैरान खड़ी थी. उसे यह तो मालूम था कि टिकट लेना होता है, लेकिन टिकट कहां से मिलेगा, यह मालूम नहीं था. उस ने एक कुली से पूछा और टिकट लेने के लिए कतार में खड़ी हो गई. मुलतान का टिकट लिया और प्लेटफार्म पर पहुंच गई.

गाड़ी आने में अभी काफी देर थी. प्लेटफार्म पर लोगों की भीड़ देख कर उसे बड़ी खुशी हुई. अगर उसे कोई ढूंढने आया भी तो इस भीड़ में छिपना बहुत आसान होगा, नरगिस ने सोचा और एक खानदान के साथ इस तरह मिल कर बैठ गई, जैसे उसी खानदान का हिस्सा हो.

आहिस्ताआहिस्ता भीड़ बढ़ती जा रही थी. शायद गाड़ी आने वाली थी. नरगिस ने चादर से मुंह निकाल कर रेल की खाली पटरियों की तरफ देखा. फिर अचानक उस की आंखों ने जैसे कोई खौफनाक दृश्य देख लिया. वही तांगे वाला, जो उसे ले कर आया था, उसे आता हुआ नजर आया. उस के अंदाज से मालूम हो रहा था, जैसे वह किसी को ढूंढ रहा हो. नरगिस के दिल में एक खौफ ने सिर उठाया, ‘हो न हो, वह मुझे घर से भागी हुई लड़की समझ रहा हो.’

नरगिस ने फौरन चादर उतारी और बिछा कर उस पर आराम से बैठ गई. उसे मालूम था कि तांगे वाला उसे चादर से ही पहचानता है. उस ने चेहरा इतने गौर से नहीं देखा था कि उसे पहचान सकता. हुआ भी वही. तांगे वाला उस के करीब से गुजरा. लेकिन वह उसे पहचान नहीं सका. इतनी देर में गाड़ी आने का शोर मच गया और नरगिस भी दूसरे मुसाफिरों की तरह गाड़ी की तरफ लपकी. जिस खानदान के साथ वह बैठी थी, उसी के साथ एक जनाने डिब्बे में दाखिल हो गई. उस ने चादर फिर ओढ़ ली और एक तरफ सिमट कर खड़ी हो गई.

‘‘अकेली हो?’’ अचानक एक बूढ़ी औरत ने पूछा.

‘‘हां.’’ नरगिस बोली.

‘‘यहां बैठ जाओ.’’ बुढि़या अपनी जगह से थोड़ा सा खिसक गई.

नरगिस उस के करीब जा बैठी.

‘‘कहां जा रही हो?’’ बूढ़ी औरत ने पूछा.

‘‘मुलतान.’’

‘‘अच्छा है, साथ रहेगा. मैं भी मुलतान जा रही हूं.’’

अभी ये बातें हो रही थीं कि तांगे वाला 2 जनाना पुलिसवालियों के साथ डिब्बे में दाखिल हुआ. अब चादर उतारने का वक्त नहीं था. नरगिस ने बूढ़ी औरत से कहा, ‘‘मेरे पीछे बदमाश लगे हैं. आप उन से कह दीजिए कि मैं आप की बहू हूं. बाकी बात मैं आप को बाद में बताऊंगी.’’

बुढि़या अभी गौर ही कर रही थी कि तांगे वाले ने इशारे से बताया कि यही है वह लड़की.

एक पुलिसवाली उस के करीब आई, ‘‘ऐ, क्या नाम है तुम्हारा?’’

‘‘शाजिया.’’ नरगिस ने जानबूझ कर गलत नाम बताया.

‘‘घर से भाग कर आई हो?’’

‘‘दिमाग तो ठीक है आप का? मेरी सास बैठी हैं. इन से पूछ लें, मैं कैसे आई हूं.’’

अब बुढिया को याद आया. नरगिस ने क्या कहा था और अब उसे क्या करना है, ‘‘वाह, भई वाह. एक तो तुम मर्द को ले कर जनाना डिब्बे में घुस आई हो, ऊपर से मेरी बहू पर इल्जाम लगा रही हो. वर्दी में न होती तो चोटी पकड़ कर मारती.’’

बुढि़या चीखी तो अन्य औरतों की भी हिम्मत हुई. तांगे वाले की मौजूदगी पर औरतों ने ऐसा शोर मचाया कि वह दरवाजे पर तो खड़ा ही था, घबरा कर नीचे उतर गया. पुलिसवालियां भी इस सूरतेहाल से घबरा गईं और 2-4 सवाल करने के बाद वे भी रफूचक्कर हो गईं.

बुढि़या नरगिस के लिए बड़ी मददगार साबित हुई. उसी बीच गाड़ी ने प्लेटफार्म छोड़ दिया और तेज रफ्तार से दौड़ने लगी. नरगिस की परेशानी कुछकुछ दूर हो गई थी. लिहाजा वह अपने खयालों में खो गई. घर और घर वालों के बारे में सोचतेसोचते नरगिस की आंखों के कोने भीग गए.

‘‘अब मुलतान आने वाला है,’’ बूढ़ी औरत ने कहा, ‘‘संभल कर बैठ जाओ. मेरा बेटा मुझे लेने आएगा. सिर ढांप कर उस के सामने आना. वह गुस्से का जरा तेज है.’’

‘‘अच्छा मांजी.’’ नरगिस ने बूढ़ी को मां कह कर मुखातिब किया.

नरगिस को रहरह कर उस बूढ़ी औरत पर प्यार आ रहा था. वह बूढ़ी औरत थोड़ी ही देर में उसे मां जैसी लगने लगी थी. वह सोच रही थी, यह बूढ़ी या तो कामयाब ड्रामा कर रही है या फिर वाकई इतनी स्नेहशील है. इस के साथ जो लोग रहते होंगे, खुशकिस्मत होंगे. वे लड़कियां कितनी नसीब वाली होंगी, जो इस की सरपरस्ती में रहती होंगी. गाड़ी की रफ्तार कम हो गई थी. कुछ औरतें यह कहती हुई उठीं कि मुलतान आ रहा है. नरगिस ने भी साथ लाए हुए कपड़ों की पोटली संभाली. इस के सिवा उस के पास कोई और सामान था ही नहीं.

मुलतान आ गया. उस वक्त रात हो रही थी और नरगिस को मुमताजाबाद के सिवा पते के नाम पर कुछ भी मालूम नहीं था. न मकान नंबर मालूम था, न बाप या भाई में से किसी का नाम. वह सोच रही थी कि काश, यह रात उसे उस बूढ़ी औरत के साथ गुजारनी नसीब हो जाए. फिर सुबह वह मुमताजाबाद चली जाएगी, लेकिन अपनी जुबान से वह कैसे कहती?

गाड़ी से उतर कर नरगिस जैसे ही प्लेटफार्म पर खड़ी हुई, बूढ़ी औरत ने कहा, ‘‘इतनी रात को कहां घर ढूंढती फिरोगी? सुबह चली जाना. अभी मेरे साथ चलो. तुम्हें अभी अपनी कहानी भी तो मुझे सुनानी है. ऐ, वह लो, मेरा बेटा आ गया.’’ बूढ़ी ने नरगिस का हाथ इस तरह थाम रखा था, जैसे उसे डर हो कि इस भीड़ का फायदा उठा कर वह गायब न हो जाए.

एक नौजवान लड़का तेजी के साथ आया और उस बूढ़ी औरत के पास जो छोटा सा संदूक था, उसे उठा कर एक तरफ को चल दिया. नरगिस भी उस बूढ़ी औरत के साथसाथ चलती हुई स्टेशन के बाहर आ गई. बाहर तांगा तैयार था. लड़के ने सामान तांगे पर रखा. इस का मतलब था, उसी तांगे पर बैठना है. बूढ़ी औरत ने नरगिस का हाथ थामा और तांगे में बैठ गई.

‘‘अम्मां यह कौन है?’’ लड़के ने पूछा.

‘‘क्या खबर कौन है?’’ बूढ़ी औरत ने मजाक के अंदाज में कहा.

‘‘मखौल न किया करो. तुम्हारे साथ आई है. तुम्हीं को मालूम नहीं कौन है?’’

‘‘सच्ची बात तो यही है. अब घर चल कर पूछूंगी. वैसे तुझे इस से क्या? चुप बैठा रह.’’

रास्तेभर उन तीनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई. कभीकभी लड़का पीछे पलट कर देख लेता था. नरगिस को अंदाजा हो रहा था कि वह शहर लाहौर के मुकाबले छोटा है. एक बार फिर इस खयाल ने उसे घेर लिया कि वह आज बहुत सालों बाद अपने शहर में है. बूढ़ी का मकान शायद स्टेशन से काफी फासले पर था. तांगा बहुत देर तक चलता रहा. तब कहीं मकान आया, जहां उस बूढ़ी औरत को उतारना था. उस घर में उस बूढ़ी के अलावा 3 औरतें और थीं. उस के 3 बेटे थे, 2 बहुएं थीं और एक बेटी थी, जो लड़का उन्हें ले कर आया था, वह कुंवारा था.

‘‘पहले नहा कर कपड़े बदलो, फिर खाना खाएंगे. उस के बाद तुम्हारी कहानी सुनूंगी.’’ बूढ़ी औरत ने नरगिस से कहा.

इन सब कामों से निपटने के बाद वह बूढ़ी औरत नरगिस को ले कर एक कमरे में चली गई. बोली, ‘‘हो सकता है, तुम्हारी कहानी में कोई ऐसी बात हो, जो सब के सुनने की न हो, इसलिए मैं तुम्हें यहां ले आई. अब सुनाओ, तुम कौन हो और तुम पर क्या बीती है?’’

नरगिस ने शुरू से अब तक की अपनी पूरी कहानी उसे सुना दी.

‘‘बस, इतनी सी बात पर परेशान हो?’’ बूढ़ी औरत बोली.

‘‘मांजी, यह इतनी सी बात है? मैं किसी शरीफ घराने में रहने के लायक हूं?’’

‘‘क्यों, क्या हो गया तुम्हें? तुम जहां भी रही, उस में तुम्हारा क्या कसूर? तुम तो शरीफ घरानों की लड़कियों से भी शरीफ हो. वे तो अच्छेभले माहौल में भी बिगड़ जाती हैं और तुम उस गंदगी से बच कर निकल आई.’’

‘‘लेकिन मेरे मांबाप, भाईबहन?’’

‘‘अल्लाह फजल करेगा. मेरा बेटा सरफराज, जो हमें स्टेशन से ले कर आया है, पत्रकार है. अखबार वालों के बड़े लंबे हाथ होते हैं. मैं उस से कहूंगी, वह ढूंढ़ निकालेगा.’’

‘‘मुझे आप एक बार मुमताजाबाद ले चलें. शायद मैं अपना घर पहचान लूं.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं… मैं कल ही तुम्हें ले जाऊंगी. मेरी एक मिलने वाली वहां रहती है.’’

इस के बाद नरगिस इस तरह सोने के लिए लेट गई, जैसे चांदरात को बच्चे ईद के इंतजार में सोते हैं.

उस बूढ़ी के साथ सुबह मुमताजाबाद पहुंचते ही नरगिस की आंखें उस के हाथों से निकल गईं. आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं लेते थे. उसे महसूस हो रहा था, जैसे वह 4 साल की बच्ची है. घर का रास्ता भूल गई है और रास्ते में खड़ी रो रही है.

‘‘हौसला करो बेटी. क्या सड़क पर तमाशा बनोगी. लोग कहेंगे, मैं तुम्हें चुरा कर ले जा रही हूं.’’ बूढ़ी ने समझाया.

नरगिस ने आंसुओं को हौसले की मुट्ठी में बंद किया और बूढ़ी के साथसाथ चलने लगी. किसी गली में भी उसे यह महसूस नहीं हुआ कि वह यहां पहले भी आ चुकी है. हर मकान को भूखों की तरह देखती हुई चल रही थी.

बड़ी बी उसे ले कर एक से दूसरी, तीसरी और चौथी गली में घूमती रही. कई गलियां घूमने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘भई, तुम तो जवान हो, मेरी टांगें जवाब दे गईं. आधा मुमताजाबाद रह गया है. वह फिर कभी देख लेंगे. अब चल कर कुछ देर बैठते हैं. मैं ने कहा था न मेरी एक मिलने वाली यहां रहती है. चलो, वहां चलते हैं.’’

‘‘चलिए.’’ नरगिस बेदिली से बोली.

वहां जाते हुए नरगिस ने एक जगह को बड़े गौर से देखा. फिर वह एकदम से चीखी, ‘‘अम्मा, यह है मेरा घर. मुझे याद आ गया. यही तो है. मुझे तुम यहां ले चलो. मुझे सब याद आ गया. यही है मेरा घर.’’

बूढ़ी चौंकी, ‘‘यही तो है वह मकान, जहां मैं तुझे लाने वाली थी, इसी में तो मेरी वह जानने वाली रहती है. चलो, पहचान लेना, वरना मैं उन से खुद पूछ लूंगी.’’

दोनों अंदर चली गईं. अंदर एक औरत सिल पर मसाला पीस रही थी. एक औरत अपने बच्चे को लिए बैठी थी. वे अंदर पहुंचीं तो 4 नौजवान लड़कियां कमरे से निकल कर सेहन में आ गईं.

‘‘आओ खाला, बहुत दिनों बाद आईं.’’ उस औरत ने कहा, जो मसाला पीस रही थी.

‘‘हां, तू तो बहुत आ गई मेरे यहां.’’ बूढ़ी औरत ने ताना दिया.

 

नरगिस दीवानों की तरह एकएक दीवार को ताक रही थी. उसे यह भी खयाल नहीं आया कि वह वहां मेहमान बन कर आई है. वह भाग कर जीने की तरफ गई. बिलकुल ऐसा ही जीना था. इस में अब दरवाजा लग गया है, मगर यह तो बाद में भी लग सकता है. उस वक्त नहीं होगा, लेकिन ये लोग तो कोई और हैं. फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है, जैसे मैं यहां आ चुकी हूं?

औरतें उसे गौर से देख रही थीं और इशारों से पूछ रही थीं, यह कौन है? नरगिस इन सब से बेपरवाह कोनेखुदरे झांकती फिर रही थी. कुछ कोने उस के लिए अजनबी थे. कुछ हिस्से ख्वाब की तरह नजर आ रहे थे. यकीन नहीं आ रहा था, मगर उस का दिल कहता था, इस घर में कोई खास बात जरूर है.

‘‘खाला, यह कौन है?’’ एक औरत ने पूछा.

‘‘है एक बेचारी. बचपन में अगवा हो गई थी. अब 15 सालों बाद किसी तरह भाग कर आई है. इतने से बच्चे को याद रहता है. घंटाभर से मुझे लिए फिर रही है. हर मकान को समझ बैठती है, यही उस का घर है.’’ बूढ़ी ने कहा.

‘‘अल्लाह इस की मुश्किल आसान करे. इसे इस के मांबाप से मिलवाए.’’

सब ने ‘आमीन’ कहा. इतनी देर में नरगिस भी आ कर बैठ गई. उसे देख कर सब चुप हो गए.

‘‘अम्मा, यहां से चलो. यहां मेरा जी घबराता है.’’ नरगिस ने कहा.

‘‘तू तो जिद कर के यहां आई थी, अब जी घबराने लगा.’’

‘‘अच्छा आप बैठें. मैं जा रही हूं.’’

‘‘अरी सुन तो, मैं भी चल रही हूं. अच्छा बहन, फिर आऊंगी. यह लड़की तो हवा के घोड़े पर सवार है.’’ बूढ़ी ने कहा और बुरका संभाल कर उठ गई.

‘‘क्या हुआ, मकान देख लिया?’’ बूढ़ी ने रास्ते में पूछा.

‘‘नहीं, यह वह घर नहीं है, लेकिन न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है, जैसे यही है.’’

‘‘तू जी हलकान मत कर. मैं आज ही सरफराज से कहूंगी. वह सब पता लगा देगा.’’

‘‘नहीं अम्मा, दुनिया की भीड़ में गुम हो कर कोई नहीं मिलता. इंसान हो या मकान, सब गुम हो जाते हैं.’’

‘‘अल्लाह की जात से मायूस नहीं होते बेटी.’’

‘‘अच्छा एक बात बताइए.’’

‘‘पूछ बेटी.’’

‘‘अगर मेरे घर वाले मुझे नहीं मिले तो आप मुझे अपने घर में रख लेंगी? मैं आप की नौकरी करूंगी.’’

‘‘कैसी बातें करती है बेटी, तू काहे को नौकरी करने लगी? तू तो मेरी बेटी जमीला की तरह है. खैर से तेरे वारिस तुझे मिल जाएं. अगर नहीं मिलते तो तू भी मेरी जमीला है.’’

बड़ी बी ने सरफराज से जिक्र किया तो उस ने वादा किया कि वह नरगिस के सरपरस्तों की तलाश के लिए जो कुछ होगा, करेगा.

 

नरगिस को यहां रहते हुए 3 दिन हो गए थे. एक नई जिंदगी से उस का परिचय हुआ था. उस ने पहली बार शरीफ घरों के आदाब देखे थे. उसे पहली बार अहसास हुआ था कि घर की दहलीज हर एक के लिए नहीं होती. इन औरतों की आंखों में जो शरमोहया थी, नरगिस ने पहले नहीं देखी थी. चिराग जलने के बाद यहां पराए मर्दों के कदमों की आवाजें नहीं गूंजती थीं. औरतें मुसकराती थीं, कहकहे नहीं लगाती थीं. सिरों पर आंचल न भी हो, तो लगता था, शरमोहया का साया सिर पर है.

नमाज की चौकी पर बैठी हुई बड़ी बी रहमत का फरिश्ता लगती थीं. शौहरों के सामने दस्तरख्वान सजाती हुई बीवियां, भाइयों से जिद करती हुई बहनें कितनी अच्छी, कितनी प्यारी लगती थीं.

सरफराज बराबर कोशिश में लगा हुआ था. आखिरकार एक दिन वह कामयाब हो गया. उस ने बड़ी बी के सामने एक अखबार रखते हुए कहा, ‘‘पहचानिए तो, किस की तसवीर है?’’

‘‘कोई बच्ची है, जमीला को दिखाओ.’’

‘‘अम्मा, यह उसी लड़की की बचपन की तसवीर है, जो आप के घर में ठहरी है.’’

‘‘नरगिस की?’’ हैरानी से बड़ी बी की आंखें फैल गईं.

‘‘हां, इस का उस वक्त का नाम नजमा था. नरगिस बाद में रखा गया होगा.’’

‘‘मगर यह कैसे मालूम हुआ कि यह नरगिस की ही तसवीर है.’’

‘‘अम्मा, मैं ने 15 साल पहले के अखबार खंगाले. दरअसल मुझे यकीन था कि नरगिस के वालिदैन ने गुमशुदगी का इश्तिहार जरूर दिया होगा. वही हुआ. यह इश्तिहार मुझे नजर आ गया. इस में जो पता दिया गया है, वह मुमताजाबाद का है. यह भी लिखा है कि शादी के हंगामे में किसी संगदिल ने इसे अगवा कर लिया था. नरगिस ने भी यही बताया था. तसदीक उस वक्त हो जाएगी, जब हम उस पते पर जाएंगे, जो इस इश्तिहार में दिया गया है.’’

‘‘देखें, तो अपनी बच्ची की तसवीर,’’ बड़ी बी ने अखबार उठा लिया, ‘‘ऐ हां, है तो यह नरगिस ही. वही नाक, वही नक्शा. हाथ टूटें उस के, जिस ने उसे उस के मांबाप से जुदा किया.’’ फिर बड़ी बी ने नरगिस को आवाज दी, ‘‘नरगिस, जरा इधर तो आ.’’

‘‘जी अम्मा.’’ नरगिस लगभग दौड़ती हुई आ गई.

‘‘मैं तुझे एक चीज दिखाऊंगी, लेकिन तू वादा कर कि रोएगी नहीं.’’

‘‘नहीं रोऊंगी.’’ नरगिस बोली.

‘‘यह देख, क्या है?’’ बड़ी बी ने अखबार में छपी हुई तसवीर पर उंगली रखते हुए कहा.

‘‘तसवीर है किसी की.’’ नरगिस बोली.

‘‘किसी की नहीं, तुम्हारी तसवीर है.’’

अब नरगिस की समझ में आया, वह क्या दिखाना चाहती हैं. उस ने तसवीर देखी. ऊपर ‘गुमशुदा की तलाश’ और नीचे मुमताजाबाद का पता छपा हुआ था.

नरगिस कुछ देर तक उस तसवीर को गौर से देखती रही, फिर चीख मार कर बेहोश हो गई.

जब तक नरगिस होश में आई, तब तक सरफराज तय कर चुका था कि वह पहले खुद उस के मांबाप के पास जाएगा. जो लड़की तसवीर को देख कर बेहोश हो सकती है, वालिदैन को देख कर खुशी से मरने के करीब पहुंच जाएगी.

‘‘जब पता चल ही गया है तो आप मुझे वहां ले चलें. अम्मा, आप को भी ले कर चलूंगी. अपनी मां को बताऊंगी कि यह न होतीं तो मैं आप तक कभी न पहुंच सकती. अम्मा, पहले उन्हें यह बताइएगा नहीं कि मैं नजमा हूं. जरा वह भी तो बेताब हों. उन से कह दीजिएगा कि पता मालूम हो गया है. अब आप की बेटी 2-4 दिनों बाद मिलेगी. देख लेना अम्मा, खुशामद करेंगे और मेरे अब्बा कि बस, नजमा को आज ही ले आओ. मैं दिल ही दिल में खूब हंसूंगी उन पर. बेचारों को ज्यादा मत सताना. थोड़ी देर में बता देना कि नजमा यह क्या खड़ी है. बड़ा मजा आएगा.’’

नरगिस ये हवाई किले बना रही थी, जबकि सरफराज का मशविरा था कि वह अकेला जाएगा. हीलहुज्जत के बाद नरगिस तैयार हो गई और सरफराज अपनी वालिदा को ले कर मकान ढूंढ़ने चला गया.

‘‘यह तू मुझे कहां ले आया?’’ बड़ी बी ने मकान को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा.

‘‘अखबार में इसी मकान का नंबर छपा है.’’ सरफराज ने अखबार देखते हुए कहा.

‘‘लेकिन यह तो शाहिदा का मकान है. मेरी सहेली है. मैं तो नरगिस को ले कर यहां आ चुकी हूं.’’

‘‘अच्छा, मगर पता तो यही है.’’

‘‘सरफराज,’’ बड़ी बी ने सरगोशी की, ‘‘नरगिस भी इस मकान को देख कर चौंकी थी. शायद उस की याददाश्त ने सही निशानदेही की थी. हो सकता है, शाहिदा का नरगिस से वाकई कोई ताल्लुक हो.’’

‘‘चलिए, मालूम करते हैं. अकसर यह भी होता है कि गुम हो जाने वाली लड़कियों के रिश्तेदार उन्हें कबूल करने से कतराते हैं. अगर ऐसा हुआ तो हमें सख्त जद्दोजहद करनी पड़ेगी.’’

‘‘कैसी जद्दोजहद? मैं शाहिदा की जान को आ जाऊंगी. बच्ची का इस में क्या कसूर? बस तुम इतना खयाल करना कि यह जिक्र न आने पाए कि नरगिस अब तक तवायफ के कोठे पर थी. मैं कोई और बहाना तलाश लूंगी.’’

बड़ी बी अंदर चली गईं. कुछ देर बाद सरफराज को भी बुला लिया गया.

‘‘आप इस बच्ची को जानती हैं?’’ सरफराज ने शाहिदा को अखबार दिखाते हुए पूछा.

शाहिदा ने गौर से तसवीर को देखा और इनकार में सिर हिला दिया.

‘‘गौर से देखिए, कुछ याद कीजिए,’’ सरफराज ने जोर दिया, ‘‘यह 15 साल पुरानी तसवीर है.’’

‘‘नहीं बेटा, मैं इस को नहीं जानती.’’ शाहिदा ने फिर इनकार किया.

‘‘अच्छा यह बताइए, 15 साल पहले आप के घर में कोई बच्ची गुम हुई थी?’’

‘‘अल्लाह न करे. ऐसा हादसा तो कभी पेश नहीं आया.’’

‘‘फिर यह इश्तिहार कैसा है? इस में तो आप ही के घर का पता है.’’

‘‘कमाल है,’’ सरफराज किसी सोच में डूब गया, ‘‘अच्छा, यह बताइए, आप के यहां हाजी फरीद अहमद किस का नाम है?’’

‘‘किसी का भी नहीं. मेरे शौहर का नाम तो अब्दुल हमीद था.’’

सरफराज को अपनी सारी मेहनत बेकार जाती हुई नजर आ रही थी. अचानक उस के जेहन में एक खयाल बिजली की तरह कौंधा.

‘‘आप इस मकान में कब से हैं?’’ उस ने पूछा.

‘‘तकरीबन 12 साल से.’’

‘‘हूं,’’ सरफराज ने चुटकी बजाई, ‘‘यह इश्तिहार है 15 साल पहले का. इस का मतलब है, आप से पहले इस मकान में कोई और रहता था और वह थे हाजी फरीद अहमद यानी नरगिस के वालिद. उन्होंने किसी वजह से यह मकान आप को बेच दिया और यहां से चले गए.’’

‘‘हां, यही होगा.’’

‘‘आप मुझे मकान के कागजात दिखा सकती हैं?’’

‘‘बात क्या है? हमें पूरी तरह समझाओ.’’

‘‘मैं बताती हूं,’’ बड़ी बी ने कहा, ‘‘उस रोज जो लड़की मेरे साथ आई थी, यह तसवीर उसी की है. बचपन में वह गुम हो गई थी. शायद मैं ने तुम्हें बताया भी था. उस रोज वह यहां आई थी तो इस मकान को देख कर चौंकी भी थी. अब हमें उस के मांबाप की तलाश है. कागजात से यह मालूम हो जाएगा कि यह मकान वाकई हाजी फरीद का था, जो नरगिस के बाप हैं. यह तस्दीक हो जाए तो सरफराज उन्हें भी तलाश कर लेगा.’’

‘‘अच्छा, मैं कागजात ले कर आती हूं.’’

सरफराज ने कागजात देखे. मकान वाकई हाजी फरीद अहमद के नाम पर था, लेकिन बेचने वाले रशीद अहमद और हमीद अहमद थे, जिन की वल्दियत हाजी फरीद अहमद मरहूम लिखी हुई थी. इस का मतलब था कि हाजी साहब का इंतकाल हो गया था और उन के बेटों यानी नरगिस के दोनों बड़े भाइयों ने यह मकान बेच दिया था.

‘‘मामला बिलकुल साफ है. हम नरगिस के वारिसों के बहुत करीब पहुंच चुके हैं. अब गुत्थी सिर्फ यह है कि वे दोनों शख्स इस वक्त कहां हैं? मुलतान में या मुलतान के बाहर? अगर मुल्क में ही हैं तो मैं उन्हें जरूर तलाश लूंगा.’’

अगले दिन सरफराज ने पूरे मुल्क के अखबारों में टेलीप्रिंटर से यह खबर पहुंचा दी कि 15 साल पहले गुम होने वाली बच्ची नजमा वल्द हाजी फरीद मरहूम, जिस के भाइयों के नाम रशीद अहमद और हमीद अहमद हैं, हमारे पास मौजूद है और अपने भाइयों को तलाश रही है. ये लोग खबर को पढ़ते ही हम से संपर्क करें. इसी किस्म का इश्तिहार उस ने टीवी को भी दिया.

तीसरे दिन सरफराज के पास टेलीफोन आया, ‘हम ने खबर पढ़ी. हम कल आप के पास आ रहे हैं.’

यह टेलीफोन कराची से रशीद अहमद की तरफ से था. दूसरे दिन रशीद अहमद और उस की बेगम सरफराज के घर पहुंच गए. उस के लिबास और हुलिए से जाहिर हो रहा था कि वे निहायत दौलतमंद हैं. सरफराज को यह देख कर इत्मीनान हुआ कि दौलतमंद होने के बावजूद रशीद अपनी गुमशुदा बहन को भूला नहीं था. उस के चेहरे पर घबराहट और खुशी के मिलेजुले भाव साफ बता रहे थे कि वे नरगिस से मिलने के लिए बेचैन हैं.

‘‘पहले यह साबित कीजिए कि आप ही रशीद अहमद वल्द हाजी फरीद अहमद हैं.’’ सरफराज ने कहा.

‘‘मुझे मालूम था कि आप यह सबूत जरूर चाहेंगे, इसलिए मैं अपना पासपोर्ट साथ ले आया हूं. इस के अलावा मैट्रिक का सर्टीफिकेट भी है. मैं ने मैट्रिक मुलतान से ही किया था. अब्बाजी की तसवीर भी है, जिस में हम दोनों भाई उन के साथ बैठे हुए हैं. और एक सब से अहम सबूत यह है कि नजमा की जो तसवीर उस वक्त अखबार में छपी थी, वह मेरे अलबम में थी, जो मैं अपने साथ लाया हूं, यह देखिए.’’

‘‘आप ने इस तसवीर को बहुत संभाल कर रखा है.’’ सरफराज ने तसवीर को देखते हुए कहा.

‘‘क्यों न रखते साहब. कोई दिन ऐसा नहीं गया, जब हम ने इसे याद न किया हो. एक ही तो हमारी बहन थी. वह भी ऐसी, जो हम दोनों भाइयों के जवान होने के बाद पैदा हुई थी. मेरे छोटे भाई हमीद की शादी पर ही वह गुम हुई थी. उसे कहांकहां नहीं ढूंढ़ा हम ने. अब्बाजी तो ऐसे बिस्तर से लगे कि फिर उठ ही न सके. मां भी कुछ अरसे बाद ही हम से रूठ गईं. नजमा क्या गई, हमारा तो घर ही उजड़ गया. हम दोनों भाइयों का दिल भी उचाट हो गया. लिहाजा हम ने वह मकान बेच दिया. हमीद तो बाहर निकल गया. आजकल जापान में है. मैं कराची चला गया. अब वह मिली है तो ऐसे वक्त कि अम्माजी…’’ उस की आवाज आंसुओं में बह गई. वह बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगा.

‘‘रशीद साहब, हौसला रखिए. अल्लाह ने इतनी बड़ी खुशी दी है कि आप का दामन भर जाएगा. उसे समेटिए और खुदा का शुक्रिया अदा कीजिए. मैं नजमा को बुलाता हूं.’’ सरफराज ने कहा.

‘‘ठहरिए सरफराज साहब, मैं यह कैसे यकीन कर लूं कि वह नजमा मेरी बहन ही है?’’

‘‘इस की गवाही आप का दिल दे रहा है. आप के आंसू शहादत दे रहे हैं.’’

‘‘वह तो है, लेकिन मैं एक इत्मीनान करना चाहता हूं.’’

‘‘फरमाइए.’’

‘‘हमारे घर में एक मुर्गा था, जो कटखना हो गया था. उस ने नजमा की पीठ पर चोंच मार दी थी. जख्म बहुत दिन पका था और कंधे से कुछ नीचे निशान छोड़ गया था. वह निशान अब भी होगा.’’

‘‘यकीनन होगा.’’ सरफराज ने कहा.

‘‘आप मेरी बेगम को अंदर से जाइए. यह उस निशान को देख लेंगी. फिर कोई शक नहीं रहेगा.’’

‘‘बेशक.’’

रशीद अहमद की बेगम अंदर चली गई. कुछ देर बाद वह इस खुशखबरी के साथ बाहर आई कि निशान मौजूद है. रशीद अहमद की आंखें एक बार फिर भीग गईं.

‘‘आप लोग बैठें. मैं नजमा को ले कर आता हूं.’’ सरफराज ने कहा और कमरे से निकल गया.

रशीद अहमद की आंखें दरवाजे पर लगी थीं. उसे सांस लेने की फुरसत भी नहीं थी. पलक झपकाना भूल गया था. फिर कुछ आउट हुई. सरफराज की वालिदा के साथ नरगिस कमरे में दाखिल हुई. रशीद अहमद अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ. कुछ देर दोनों भाईबहन एकदूसरे को देखते रहे, फिर जैसे नरगिस को होश आ गया.

‘‘भाई जान.’’ उस ने कहा और दौड़ कर रशीद अहमद के गले से लग कर रोने लगी. रोरो कर मन कुछ हलका हुआ तो पूछा, ‘‘अम्मा को नहीं लाए और अब्बाजी भी नहीं आए?’’

‘‘तू घर चल, सब से मुलाकात हो जाएगी. अभी तो मैं और तेरी भाभी आए हैं तुझे लेने.’’

‘‘मुझे अम्मा बहुत याद आती हैं. मुझे जल्दी से घर ले चलें.’’

‘‘चलते हैं. जरा इन लोगों का शुक्रिया अदा कर लूं.’’

‘‘भाईजान, इन का शुक्रिया जरूर अदा कीजिए. ये न होते तो और न जाने कितने दिन ठोकरें खाती.’’ कह कर नरगिस फिर रोने लगी.

‘‘रशीद साहब, यह मेरी वालिदा हैं.’’ सरफराज ने बड़ी बी का परिचय कराया.

‘‘मांजी, मैं किस मुंह से आप लोगों का शुक्रिया अदा करूं.’’

‘‘शुक्रिया कैसा बेटा, तुझे तेरी बहन मिल गई, हमें तो खुदा ने एक जरिया बनाया था. तेरी बहन बहुत प्यारी है. इस का खयाल रखना. इसे कोई तकलीफ न पहुंचे.’’

‘‘यह मेरी जान है मांजी. मेरे पास अल्लाह का दिया सब कुछ है. मैं इसे सोने में तौल दूंगा.’’

‘‘बेटा, बहनें मोहब्बत की भूखी होती हैं, दौलत की नहीं.’’ बड़ी बी ने कहा.

‘‘मैं आप की नसीहत याद रखूंगा.’’

‘‘मैं अपनी बच्ची को तैयार कर दूं. आप की अमानत है, ले जाइएगा.’’

बड़ी बी नरगिस को अंदर ले गईं. तैयार करने का तो बहाना था. उन्हें दरअसल उसे यह नसीहत करनी थी, ‘‘मेरी एक बात याद रखना. अपने अतीत को भूल जाना. कभी किसी पर जाहिर मत करना कि तुम कोठे पर रही हो. यह ऐसी तोहमत है, जो तुम्हारे भाई की मोहब्बत को आधा कर देगी. भाई अगर बर्दाश्त कर भी लेगा तो भाभी आज नहीं, तो कल तुम्हें ताने जरूर देगी.’’

‘‘लेकिन भाई पूछेंगे जरूर कि 15 साल कहां रही? किस माहौल में जवान हुई? मैं उन से क्या कहूंगी?’’

‘‘बेटी, यह तुम्हारी मरजी पर निर्भर है. तुम समझदार हो. कोई कहानी गढ़ लेना. इसी में तुम्हारी बेहतरी है.’’

‘‘ठीक है, अम्मा. मैं समझ गई.’’

‘‘अब जाओ अपने भाई के साथ.’’

‘‘आप लोग मुझे बहुत याद आएंगे.’’

‘‘अरे, तुम्हें वहां ऐसा प्यार मिलेगा कि भूल जाएगी. फिर भी अगर मैं याद आऊं तो चली आना मुझ से मिलने. कराची कौन सा दूर है.’’

नरगिस उस घर से इस तरह रुखसत हुई, जैसे कोई बेटी अपनी मां के घर से ससुराल जाती है.

नरगिस ने सोचा भी नहीं था कि रशीद भाई इतने दौलतमंद होंगे. वह उन का मकान देख कर हैरान रह गई. उन की कोठी, कमरों की सजावट, अमीराना ठाठबाट, ये सब चीजें उस के लिए विस्मयकारी थीं. उसे भाई से मिलने की खुशी तो थी ही, भाई को खुशहाल देख कर उस का दिल और भी ज्यादा खुश हुआ.

घर पहुंचते ही वह एक बार फिर जानपहचान की मंजिल से गुजरी. रशीद अहमद की 2 बेटियां और एक बेटा था. बेटियां तो नरगिस की तरकीबन हमउम्र थी, लेकिन बेटा छोटा था. नरगिस के पहुंचते ही इमराना उस से मिलते आई, ‘‘हैलो.’’

‘‘यह मेरी बड़ी बेटी इमराना है,’’ रशीद ने परिचय कराया, ‘‘तुम से कोई 2 साल बड़ी होगी.’’

इस के बाद एक और लड़की अंदर दाखिल हुई. उस का नाम फरहाना था. बेटे का नाम इमरान था.

नरगिस उन लड़कियों को देख कर ज्यादा खुश नहीं हुई. उन के कपड़े, तराशे हुए बाल और लज्जाहीनता उस के लिए निराशाजनक थी. उसे पहली नजर में अंदाजा हो गया कि इस घर का रहनसहन अंग्रेजी तर्ज का है, लेकिन यह कोई ऐसी खराब बात नहीं थी. बड़े घराने ऐसे ही जिंदगी गुजारते हैं.

औचारिक परिचय के बाद रशीद अहमद नरगिस से मुखातिब हुए, ‘‘इतने दिनों कहां रहीं? तुम पर गुजरी क्या? कुछ हमें भी तो बताओ.’’

‘‘हां, नजमा, कुछ तो बताओ.’’ भाभी बोलीं.

नरगिस ने अपनी कहानी सुनाई, लेकिन कुछ तब्दीली के साथ, ‘‘भाईजान, मुझे तो कुछ याद नहीं रहा था. यह कहानी मरते वक्त मुझे मेरे मोहमिन (उपकारी) ने सुनाई. उस ने मुझे बताया कि कोई शख्स तुम्हें मुलतान से लाहौर ले आया था. जाहिर है कि किसी गलत इरादे से ले कर आया होगा. लेकिन खुदा को कुछ और ही मंजूर था. वह अभी रेलवे स्टेशन से बाहर आया था कि उस पर दिल का दौरा पड़ा. जिस ने मुझे पालापोसा, टैक्सी चलाता था. खैर, जब उस शख्स को हार्टअटैक हुआ तो उस ने टैक्सी को हाथ दिया. टैक्सी में बैठने से पहले ही उसे यकीन हो गया था कि वह अब बचेगा नहीं. उस ने मुझे सुपुर्द कर अटकअटक कर उस के अब्बू का पता बताया कि वह मुझे वहां पहुंचा दे.

‘‘उस के मरने के बाद उस ने बहुत चाहा कि मुझे मेरे घर पहुंचा दे, लेकिन उस के दिल में बेईमानी आ गई. उस वक्त वह बेऔलाद था. उस की अपनी बेटी मेरे आने के बाद पैदा हुई. उस ने और उस की बीवी ने तय किया कि जब खुदा ने यह तोहफा उसे दिया है तो वे हमें वापस नहीं करेंगे.

‘‘भाईजान, उस ने मरते वक्त मुझ से माफी मांगी और दरख्वास्त की कि उस की मौत के बाद मैं अपने घर चली जाऊं और अगर वह बच गया तो खुद मुझे मेरे घर छोड़ जाएगा. लेकिन मौत ने उसे मोहलत नहीं दी. इस से भी ज्यादा गजब यह हुआ कि उस ने सिर्फ यह बताया था कि मेरा घर मुमताजाबाद, मुलतान में है. इस से पहले कि वह मकान नंबर या अब्बा का नाम बताता, उस की रूह उड़ गई. यह भी हो सकता है कि इतने दिन गुजर जाने के बाद वह यह मालूमात भूल ही गया हो. उसे सिर्फ मुमताजाबाद याद रह गया हो.’’

‘‘उस बेहूदा आदमी ने तुम्हें हम से जुदा कर दिया और तुम उसे मोहसिन कहती हो. सोचो, अगर वह उसी वक्त तुम्हें हमारे पास ले आता तो आज यह दिन देखने को नहीं मिलता.’’ रशीद अहमद ने गुस्से से कहा.

‘‘मैं उसे इसलिए मोहसिन कहती हूं कि उस ने अपनी मौत से पहले मेरी हकीकत मुझे बता कर मुझ पर एहसान किया. अगर वह न बताता तो आज मैं वहां होती, जहां से अगर वापस आती तो आप मुझे अपनी बहन जानते हुए भी कबूल करने से इनकार कर देते.’’

नरगिस ने आगे बताया, ‘‘अब यह बताना जरूरी नहीं कि अब मेरा वहां रहना मुश्किल नहीं रहा था. मैं उन के घर से निकली और मुलतान का टिकट ले कर गाड़ी में बैठ गई. गाड़ी में मुझे सरफराज की वालिदा मिल गई. फिर जो कुछ हुआ, वह सरफराज साहब आप को बता ही चुके हैं.’’

नरगिस को कराची आते ही यह खबर मिल चुकी थी कि उस के वालिदैन का इंतकाल हो चुका है. अब रशीद भाईजान ही उस के सब कुछ हैं. उस की खुशी आधी रह गई थी, लेकिन यह खुशी फिर भी थी कि अब वह एक शरीफ घर में शरीफाना जिंदगी गुजारेगी.

 

नई जगह थी, इसलिए सुबह जल्दी ही नींद टूट गई. सुबह से कुछ पहले ही वह बिस्तर से उठी. जब से वह बड़ी बी के घर आई थी, नमाज की पाबंद हो गई थी. नमाज अदा की और फिर लौन में आ कर टहलने लगी. कुछ देर बाद वह वापस आ गई. घर में अभी तक सब लोग सो रहे थे. नरगिस कुछ देर अपनी जिंदगी पर गौर करती रही. कोई व्यस्तता तो थी नहीं. लेटेलेटे नींद आ गई. आंख खुली तो घड़ी में साढ़े नौ बज रहे थे. नरगिस घबरा कर उठी और एक बार फिर हाथमुंह धो कर बाहर निकली तो भाई रशीद को अकेले नाश्ता करते देखा.

नरगिस ने सलाम करने के बाद कहा, ‘‘मैं तो समझ रही थी, आप औफिस जा चुके होंगे.’’

‘‘अरे, अपना औफिस है. तेरा भाई किसी का मुलाजिम तो है नहीं. आओ, तुम भी नाश्ता कर लो.’’ रशीद बोला.

‘‘इमराना और फरहाना कहां हैं?’’ नरगिस ने पूछा.

‘‘उन्हें कालेज जाना होता है, 8 बजे चली गई होंगी.’’

‘‘और इमरान?’’

‘‘उस की मत पूछो. बरखुरदार नींद के ऐसे शौकीन हैं कि दोपहर की शिफ्ट में दाखिला लिया है. वह 11 बजे उठेंगे.’’

‘‘भाभी को तो नाश्ते की मेज पर होना चाहिए था. आप अकेले नाश्ता कर रहे हैं.’’

‘‘वह रात को देर तक जागती हैं. उन्हें कहीं जाना तो होता नहीं. अपनी मर्जी से उठती हैं. हमारी मुलाकात शाम की चाय पर होती है या रात के खाने पर.’’

नरगिस सोच में पड़ गई. यह कैसा घर है, जहां लोग एकसाथ बैठ कर नाश्ता भी नहीं करते. हर शख्स अपनी अलग जिंदगी गुजार रहा है.

रशीद अहमद ने नाश्ता किया और तैयार होने के लिए ड्रेसिंगरूम में चले गए. तैयार हो कर आए तो नरगिस भी नाश्ता कर चुकी थी.

‘‘अच्छा नजमा, मैं औफिस जा रहा हूं. तुम्हारी खातिर दोपहर को आ जाऊंगा. उस वक्त तक तुम्हारी भाभी भी उठ जाएंगी. तुम उन से गपशप करना.’’

नरगिस अपने भाई को छोड़ने दरवाजे तक गई और उस वक्त तक वहां खड़ी रही, जब तक ड्राइवर ने गाड़ी गेट से बाहर नहीं कर ली. यह पहला मौका था, जब कोई रशीद अहमद को छोड़ने दरवाजे तक आया था.

इतने बड़े घर में नरगिस अकेली घूमती रही. अल्लाहअल्लाह कर के 11 बजे इमरान सो कर उठा. उठते ही उस ने पूरे घर को सिर पर उठा लिया. मजबूरन उस की मां को भी उठना पड़ा. मांबेटे जल्दीजल्दी तैयार हुए. इमरान ने नाश्ता किया और स्कूल चला गया.

थोड़ी देर में रशीद अहमद आ गए. उन्हें देख कर बीवी चौंकी, ‘‘आप आज इतनी जल्दी आ गए.’’

‘‘भई, मैं ने सोचा, नजमा अकेली बोर हो रही होगी. इमरानाफरहाना आ जाएं तो कहीं घूमने निकलते हैं.’’

इमराना और फरहाना आ गईं. दोपहर का खाना सब ने मिल कर खाया. नरगिस को खुशी हो रही थी कि नाश्ते पर न सही, खाने पर तो सब मौजूद हैं.

‘‘कराची बाद में घूमेंगे, पहले तुम लोग नजमा को घर तो दिखा दो.’’ खाने के बाद रशीद अहमद ने बेटियों से कहा.

‘‘अच्छा डैडी.’’ उन्होंने बेदिली से कहा और नरगिस को ले कर चली गई. तमाम कमरे दिखाने के बाद वे उसे एक हौलरूपी कमरे में ले गईं. उस कमरे में कालीन के सिवा कोई फर्नीचर नहीं था. संगीत के जितने वाद्य हो सकते हैं, सब उस कमरे में मौजूद थे. तबले की जोड़ी, हारमोनियम, ड्रम, गिटार. क्या था, जो वहां नहीं था. एक कोने में घुंघरू पड़े हुए थे. नरगिस को फुरेरी आ गई. उसे बहुत दिनों बाद दिलशाद बेगम का कोठा याद आ गया.

‘‘यह सब क्या है इमराना?’’ नरगिस ने भयभीत आवाज में पूछा.

‘‘यह हमारा बालरूम है. यहां हम डांस करते हैं, संगीत सुनते हैं, शोर मचाते हैं, मौज उड़ाते हैं. यह साउंडप्रूफ कमरा है. यहां हम कितना ही शोर मचाएं, बाकी घर वाले डिस्टर्ब नहीं होते.’’

‘‘तुम लोग डांस करती हो?’’ नरगिस को जैसे यकीन नहीं हुआ.

‘‘हां, आप को भी दिखाएंगे किसी दिन. फरहाना तो ऐसा नाचती है कि बिजली भी क्या कौंधेगी. डैडी कहते हैं, पहले तालीम पूरी कर लो, वरना फिल्मों के दरवाजे तो उस के लिए हर वक्त खुले हैं.’’

नरगिस पर हैरतों के पहाड़ टूट रहे थे. तमाशबीनों के सिवा यहां तो सब कुछ दिलशाद बेगम के कोठे की तरह था.

नरगिस सोच रही थी. अगर वह यह सब कुछ न देखती तो अच्छा था. वह तो किसी पाकीजा माहौल की तलाश में आई थी, मगर यह सब क्या है? उस ने सोचा, वह इस माहौल को बदलने की कोशिश करेगी. शरीफ घरों का नक्शा उस के जेहन में कुछ और था, जो यहां नहीं था.

‘‘घर देख आईं नजमा?’’ रशीद अहमद ने पूछा.

‘‘जी, आप का घर बहुत पसंद आया.’’ उस की आवाज में छिपे व्यंग्य को रशीद अहमद महसूस नहीं कर सका.

‘‘आओ, अब तुम्हें कराची घुमाने चलते हैं.’’ रशीद अहमद ने कहा. उस के बाद इमराना और फरहाना से कहा कि वे भी चलें. इमराना और फरहाना लिबास बदल कर चलने को निकलीं तो नरगिस की आंखें झुक गईं. जींस की पतलून पर ऊंचीऊंची शर्ट्स पहने वे बिलकुल लड़का लग रही थीं.

नरगिस बोली, ‘‘तुम लोगों ने यह क्या लिबास पहना है? क्या इसी तरह बाहर जाओगी?’’

‘‘क्यों…? इस लिबास में क्या है?’’ इमराना ने तैश में आ कर कहा.

‘‘यह लिबास शरीफ लड़कियों पर अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘क्या हम शरीफ लड़कियां नहीं हैं? आप इसलिए आई हैं हमारे घर कि हमारी ही बेइज्जती करें?’’

‘‘यह बेइज्जती नहीं, लड़कियों पर दुपट्टा सजता है.’’

‘‘बसबस, अपनी नसीहत अपने पास रखें. डैडी, मैं यह बेइज्जती बरदाश्त नहीं कर सकती. मैं नहीं जाती, आप लोगों के साथ.’’

‘‘मैं भी नहीं जाऊंगी.’’ फरहाना ने बहन का साथ दिया.

‘‘तुम लोग क्यों इतनी जज्बाती होती हो? नजमा इस तरह के लिबास की आदी नहीं. कुछ दिन यहां रहेगी तो सीख जाएगी. खुद भी यही लिबास पहना करेगी.’’

नरगिस का मुंह लटक गया. वह समझ रही थी कि भाई उस की तारीफ करेंगे और बेटियों को डांटेंगे कि कैसा लिबास पहन कर आ गईं, मगर वह तो उलटे उन की हिमायत कर रहे थे. भाभी अलग मुंह बनाए खड़ी थीं. अब नरगिस के बिगड़ने का सबब ही नहीं था. उस ने माफी मांग ली, ‘‘मुझे माफ कर दो इमराना. भाईजान ठीक कहते हैं. मैं इस लिबास की आदी नहीं हूं न, इसलिए यह बात कह दी. आओ, घूमने चलें.’’

बुझे मन से दोनों बहनें उस के साथ चल दीं.

अगले दिन नरगिस ने सुना कि मास्टर साहब आए हैं तो उस के तालीम के शौक ने सिर उभारा, ‘‘भाईजान, मैं भी मास्टर साहब के पास जा कर बैठ जाऊं?’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं. मैं इंटरकौम पर कहता हूं, इमराना दरवाजा खोल देगी, तुम जाओ.’’ रशीद बोला.

‘‘मगर वह है किस कमरे में?’’

‘‘बालरूम में, और कहां.’’

‘‘जी अच्छा, मैं जाती हूं.’’

नरगिस ने सोचा, मास्टर साहब से वह खुद बात करेगी. मास्टर साहब तैयार हो गए तो भाई से कह कर  कल से खुद भी पढ़ना शुरू कर देगी. नरगिस ने दरवाजे को धक्का दिया. दरवाजा खुला हुआ था. रोम, अतोम, ततोम, तना, तरा, री… अंदर से आवाजें आ रही थीं. नरगिस उन आवाजों से अवगत थी. यह किस किस्म की पढ़ाई है. वह डरतेडरते अंदर गई. जिन्हें वह मास्टर साहब कह रही थी, वह उस्तादजी थे. उन से इमराना और फरहाना संगीत की तालीम हासिल कर रही थीं. नरगिस के लिए उस घर में यह एक और नई बात थी. उस्तादजी ने नरगिस की तरफ देखा और गाना बंद कर दिया.

‘‘यह लड़की कौन है?’’

‘‘डैडी की बहन हैं.’’

‘‘आज से पहले तो नजर नहीं आईं?’’

‘‘अभी तो आई हैं मुलतान से.’’

‘‘अच्छा चलो, तुम सबक दोहराओ.’’

नरगिस एक तरफ सिमट कर बैठ गई. सबक फिर शुरू हो गया.

थोड़ी देर बाद मास्टर साहब रुखसत हो गए और दूसरे उस्तादजी के आने का वक्त हो गया. अब नाच की महफिल जम गई. नरगिस को बारबार महसूस हो रहा था, जैसे वह दिलशाद बेगम के कोठे पर बैठी है. उसी रात 11 बजे की बात है. इमराना ने नरगिस से कहा, ‘‘आओ, तुम्हें अपने दोस्तों से मिलाऊं.’’

नरगिस खुशीखुशी उस के साथ चली गई. बालरूम में महफिल जमी हुई थी. नरगिस का खयाल था, इमराना की सहेलियां होंगी, लेकिन यहां तो मामला ही दूसरा था, 4 लड़के बैठे थे.

डेक बज रहा था, फरहाना नाच रही थी. चारों लड़के सोफे पर बैठे दाद दे रहे थे. नरगिस ने सोचा, तमाशबीनों की कसर थी इस घर में, अब यह भी पूरी हो गई. सिर्फ नोट नहीं बरसाए जा रहे हैं. बाकी सब वही है, जिस से बच कर वह यहां आई थी. उसे यों लगा, जैसे सब कुछ वही है, सिर्फ कोठा बदल गया है. अब यह उस के बर्दाश्त से बाहर था. वह गुस्से से उठी और सीधे भाई के पास कमरे में पहुंच गई.

‘‘भाईजान, यह क्या माहौल बनाया है आप ने?’’

‘‘क्या हो गया?’’ रशीद अहमद घबरा कर खड़ा हो गया.

‘‘मैं अभी बालरूम से आ रही हूं,’’ नरगिस ने बताया, ‘‘फरहाना डांस कर रही है और वह भी लड़कों के सामने.’’

‘‘ओह,’’ रशीद अहमद बुरी तरह हंसने लगा, ‘‘बस इतनी सी बात है? उन लोगों ने एक म्युजिकल ग्रुप बनाया है. प्रोग्राम करते हैं. किसी प्रोग्राम की रिहर्सल कर रहे होंगे.’’

‘‘भाईजान, आप की नजर में यह कोई बात ही नहीं है. लोग मुजरा देखने घरों से दूर जाते हैं, मगर यहां तो घर ही में मुजरा हो रहा है.’’

‘‘नजमा,’’ रशीद जोर से चीखा, ‘‘खबरदार, मेरी बच्चियों के शौक को मुजरा कहती हो? मैं ने तो सुन लिया, लेकिन सोचो, इमराना या फरहाना ने सुन लिया होता तो उन के दिलों पर क्या गुजरती. तुम्हारी भाभी पार्टी में गई हैं. अगर वह होतीं तो कितना बिगड़तीं तुम पर.’’

‘‘लेकिन भाईजान, क्या मैं सच नहीं कर रही हूं?’’

‘‘बिलकुल नहीं. म्यूजिक एक आर्ट है और मेरी बच्चियां आर्टिस्ट हैं. यह आर्ट उन्हें शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाएगा.’’

‘‘नाम बदलने से मुजरा आर्ट बन सकता है, लेकिन रहेगा तो मुजरा ही.’’

‘‘क्या बेवकूफी की रट लगा रखी है. बड़े घरानों में इसे बुरा नहीं समझा जाता. अब तुम बड़े घर में आ गई हो. एडजस्ट होने की कोशिश करो.’’

‘‘बहुत अच्छा, भाईजान.’’

नरगिस सोच रही थी, क्या दिलशाद बेगम का कोठा भी बड़ा घर था? क्या वह घर छोड़ कर उस ने गलती की है? क्या वह एडजस्ट नहीं हो सकी थी? क्या वहां से आना उस की गलती थी?

बहुत दिनों बाद उस रात नरगिस फिर रोई. ये आंसू खुशी के नहीं, पछतावे के थे. नरगिस से नजमा बनने का पछतावा. अब उस ने तय किया कि वह इस घर के मामलों में दखल नहीं देगी.

दूसरे दिन शाम को घर में भूचाल आ गया. नौकरचाकर भागेभागे फिर रहे थे. शायद कोई अहम मेहमान आने वाले थे. मुमकिन है, इमराना या फरहाना में से किसी का रिश्ता आया हो. भाभी की जुबानी मालूम हुआ कि टीवी के प्रोड्यूसर फरहाना से मुलाकात के लिए आए हैं. कोई ड्रामा तैयार हो रहा है. वह फरहाना को उस में शामिल करना चाहते हैं.

नरगिस तो वहां जा कर नहीं बैठी, लेकिन जब वे चले गए तो भाभी ने उसे बताया, ‘‘शुक्र है, फरहाना की मेहनत वसूल हो गई. प्रोड्यूसर ने बताया कि वह एक ड्रामा तैयार कर रहे हैं, जिस में 2-3 मुजरे पेश किए जाएंगे. फरहाना उस ड्रामे में तवायफ बन कर मुजरा करेगी. अब देखना, कैसी शोहरत होती है उस की.’’

नरगिस जहर का घूंट पी कर रह गई.

प्रोड्यूसर और अदाकारों का आनाजाना बढ़ने लगा. फरहाना के दिमाग भी अर्श को छू रहे थे. सीधे मुंह बात ही नहीं करती थी. उठतेबैठते प्रोड्यूसर की तारीफें, अदाकारों के किस्से. फिर उस ड्रामे की शूटिंग शुरू हो गई. फरहाना रात गए वापस आती. सुबह होते ही फिर चली जाती.

 

उसी बीच जापान से नरगिस का दूसरा भाई हमीद आ गया था. नरगिस भाई की मोहब्बत में गुम हो गई. नरगिस ने उस से भी दबेदबे लफ्जों में फरहाना की शिकायत की, लेकिन उस का कहना भी यही था कि इस में कोई हर्ज नहीं है, यह मौडर्न जमाना है. और उस को नापसंद करने वाले दकियानूसी हैं. हमीद कुछ दिन रहने के बाद वापस चला गया. नरगिस फिर जैसे होश में आ गई. उसे होश आया तो मालूम हुआ, ड्रामा मुकम्मल हो गया है.

‘‘आज फरहाना का मुजरा प्रसारित होगा.’’ भाभी ने नरगिस को बताया.

पूरा घर टीवी के सामने मौजूद था. रशीद अहमद बारबार घड़ी की तरफ देख रहे थे. वक्त हुआ और ड्रामा शुरू हो गया. फिर वह सीन आया, जिस में मुजरा पेश किया जाना था. प्रोड्यूसर ने हकीकत का रंग भरने के लिए असली वेश्या बाजार में शूटिंग की थी. फरहाना बता रही थी, ‘‘यह सेट नहीं है, असली कोठा है.’’

चंद उच्छृंखल किस्म के जवान तकियों से टेक लगाए बैठे थे. बूढ़ी नायिका पानदान खोले बैठी थी. इतनी देर में फरहाना कैमरे के सामने आई. दाग की एक गजल पर उस ने नाचना शुरू किया. एक नौजवान बारबार उठता था और फरहाना शरमा कर कलाई छुड़ा लेती थी और फिर नाच शुरू हो जाता था.

‘‘वेलडन फरहाना.’’ डांस खत्म होने के बाद रशीद अहमद ने बेटी को मुबारकबाद दी.

‘‘खुदा करे, यह सीन मशहूर हो जाए.’’ भाभी ने बेटी को मुबारकबाद दी.

इमराना तो खुशी से फरहाना के गले लग गई.

नरगिस इस धूमधाम से बेपरवाह सोच रही थी. यह कैसा इंकलाब है. मैं कोठे पर सिखलाई जाने के बावजूद वहां नाच नहीं सकी, भाग आई. एक शरीफ घर की लड़की वहां पहुंच कर नाच आई. वही लोग, जो तवायफ को गाली समझते हैं, तवायफ की तरह नाचने पर अपनी बेटी को मुबारकबाद दे रहे हैं.

उस दिन तो फरहाना को होश ही नहीं था, लेकिन दूसरे दिन उस ने नरगिस से पूछा, ‘‘नजमा फूफी, कैसा था मेरा डांस?’’

‘‘डांस तो बाद की बात है, पहले यह बताओ कि उस वक्त तुम में और किसी तवायफ में कोई फर्क था?’’ नरगिस ने पूछा.

‘‘फर्क नहीं रहने दिया, यही तो मेरा कमाल था.’’ फरहाना ने जवाब दिया.

‘‘तुम करो तो कमाल. यही कमाल तवायफ करें तो समाज गाली देता है.’’

‘‘इसलिए कि तवायफ आर्टिस्ट नहीं होती.’’ फरहाना ने दलील दी.

‘‘बहुत खूब. मगर यह क्यों भूलती हो कि वे तुम से बड़ी आर्टिस्ट होती हैं. तुम से बेहतर नाच सकती हैं.’’

‘‘गलत. तवायफ तमाशबीनों को खुश करने की अदाएं जानती हैं, नाच क्या जानें?’’

‘‘तमाशबीनों को तो तुम ने भी खुश किया. देखा नहीं, तुम्हारे डैडी और तुम्हारी मम्मी कैसे खुश हो रहे थे. हालांकि उन्हें फिक्रमंद होना चाहिए था.’’

‘‘यह महज अदाकारी थी.’’

‘‘तवायफ भी तो अदाकारी करती है.’’

‘‘आप कहना क्या चाहती हैं?’’

‘‘यही कि उस वक्त तुम में और किसी तवायफ में कोई फर्क नहीं था, सिवाय इस के कि तुम अदाकारा भी थीं.’’

‘‘ऐसी घटिया सोच पर मैं इस के अलावा आप से क्या कह सकती हूं कि आप अनपढ़, जाहिल और गंवार हैं. आप इस फन की एबीसी भी नहीं जानतीं और चली हैं आलोचना करने.’’

‘‘जहां तक जानकारी की बात है फरहाना, तो मैं बता सकती हूं कि तुम ने कहांकहां गलती की है.’’

‘‘जिन उस्तादों से मैं ने सीखा है, उन की आप को हवा भी नहीं लगी है. पांव उठा कर चलना आता नहीं, चली हैं मेरी गलतियां निकालने.’’

‘‘मैं तुम्हारी गलतफहमी दूर कर दूं?’’

‘‘क्या करेंगी आप?’’

‘‘उस गजल की रिकौर्डिंग है तुम्हारे पास, जिस पर तुम नाची थीं?’’

‘‘है.’’

‘‘बालरूम में चलो और उसे बजाओ.’’

फरहाना की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या होने वाला है. उस ने कैसेट को प्लेयर में रख दिया और देखने लगी कि क्या होता है.

नरगिस का बदन हरकत में आया और उस के अंगों ने शायरी शुरू कर दी. वह नाच रही थी और फरहाना उसे हैरानी से देख रही थी. जिसे वह जाहिल, गंवार कह रही थी, वह उस वक्त माहिर नर्तकी नजर आ रही थी. फरहाना ने कई बार अपनी आंखों को मसला, लेकिन यह हकीकत थी, ख्वाब नहीं था.

‘‘फरहाना, इसे कहते हैं नाच.’’

‘‘नजमा फूफी, आप ने यह डांस कहां सीखा?’’

‘‘इसे छोड़ो कि यह डांस कहां सीखा, यह पूछो कि मैं ने इस वक्त डांस क्यों किया? तुम न भी पूछो तो मैं तुम्हें बताऊंगी. मैं ने यह अदना सा नमूना इसलिए पेश किया कि तुम यह जान लो कि नाच सिर्फ तवायफ पर सजता है. तुम घर की जन्नत छोड़ कर दोजख तक जाओगी, लेकिन नाच फिर भी नहीं आएगा. यह नाच मैं ने यह बताने के लिए किया है कि मैं नाच सकती हूं, लेकिन मैं इस पर फख्र नहीं करती. फख्र करती हूं शराफत के उस आंचल पर, जो इस वक्त भी मेरे सिर पर है. आर्ट के नाम पर खुद को धोखा मत दो. तुम्हारा आर्ट हमारी शराफत और पाकीजगी है, जो तुम कहीं रख कर भूल गई हो. तुम्हें नाच इसलिए नहीं आ सकता, क्योंकि तुम तवायफ बनने की अदाकारी तो कर सकती हो, पर वह जख्म कैसे खाओगी, जो तवायफ के दिल पर रोज लगते हैं. अब भी वक्त है, लौट आओ. इसलिए कि तवायफ जब बगावत करती है तो किसी शरीफ घराने में पनाह लेती है. तुम बगावत करोगी तो कहां जाओगी? कुछ सोचा? सोच लो तो मुझे बता देना.’’

फरहाना सोचती तो क्या, उस ने तो पूरे घर में ऐलान कर दिया कि उस ने एक आर्टिस्ट खोज लिया है. यह खबर रशीद अहमद तक कैसे नहीं पहुंचती. रशीद ने पूछा, ‘‘सुना है, तुम डांस बहुत अच्छा करती हो?’’

‘‘मजबूरियां जब हद से बढ़ जाएं तो नाच बन जाती हैं.’’ नरगिस बोली.

‘‘तुम्हें यह फन भी आता है, मुझे मालूम ही नहीं था.’’

‘‘मालूम होता भी कैसे, मेरे कदम तो भाई की चारदीवारी में हैं.’’

‘‘फन और खुशबू को छिपे नहीं रहना चाहिए. तुम कहो तो मैं कोशिश करूं. एमडी से ले कर चेयरमैन तक सब से परिचय है.’’

‘‘अब मुझ में भागने की हिम्मत नहीं है.’’

‘‘यह तुम किस किस्म की बातें कर रही हो? सोचो तो, तुम्हारी तसवीरें अखबारों की जीनत बनेंगी. मशहूर हो जाओगी. तुम्हारे साथ मेरी शोहरत भी होगी.’’

नरगिस को लगा, जैसे उस का भाई नहीं, गुलजार खां सामने खड़ा है, जो फिर एक शरीफ घर की लड़की को उठाने आ गया है. वह गौर से उन्हें देख रही थी.

‘‘मगर तुम ने यह फन सीखा कहां से?’’ रशीद ने पूछा.

‘‘सुन सकेंगे?’’

‘‘अरे भई, यकीनन किसी अच्छे उस्ताद का नाम आएगा, सुनेंगे क्यों नहीं.’’

‘‘मेरी उस्ताद थीं दिलशाद बेगम और मैं ने यह फन लाहौर की हीरा मंडी (वेश्या बाजार) में 15 साल की लगातार मेहनत से सीखा है.’’

‘‘क्या… तो तुम…?’’

‘‘हां, भाईजान, मैं तवायफ थी और शराफत की तलाश में अपने वारिसों के साए में पनाह लेने आई थी.’’

‘‘आहिस्ता बोलो. किसी ने सुन लिया तो क्या कहेगा. मेरी इज्जत खाक में मिल जाएगी.’’

‘‘कह दीजिएगा, फरहाना की तरह अदाकारी कर रही है.’’

‘‘खामोश, मेरी बेटी का नाम अपने साथ न लो. अगर तुम पहले यह सब कुछ बता देतीं तो मैं अपने घर के दरवाजे बंद कर लेता. वैसे भी तुम हमारे लिए मर चुकी थीं.’’

‘‘तो बंद कर लीजिए. यों भी मुझे जिस घर की तलाश थी, यह वह घर नहीं है.’’

‘‘दरवाजे अब बंद करूंगा तो दुनिया से क्या कहूंगा?’’

‘‘कह दीजिएगा कि तवायफ थी, निकाल दिया.’’

‘‘बहुत खूब, मैं अपने मुंह पर खुद कालिख मल दूं.’’

‘‘मैं अगर आप के मशविरे पर अमल कर के आर्ट के नाम पर नाचने का प्रदर्शन करूं, तो आप का मुंह सलामत रहेगा?’’

‘‘वह और बात होगी.’’

‘‘मगर इस तरह मेरे मुंह पर कालिख मल जाएगी. दिलशाद बेगम कहेगी, शाबाश, नरगिस बेगम, शाबाश. तू ने कोठा छोड़ दिया, पेशा नहीं छोड़ा. जो काम मैं तुम से नहीं ले सकी, तेरे सगे भाई ने ले लिया.’’

रशीद सिर झुका कर अपने कमरे में चला गया और नरगिस अपने कमरे में आ गई.

दोपहर का वक्त था. सब अपनेअपने कमरों में थे. नरगिस खामोशी से उठी. ड्राइंगरूम में रखी हुई रशीद अहमद की तसवीर अपनी चादर में छिपाई और खामोशी से बाहर आ गई.

‘‘बीबीजी आप…’’ दरबान ने पूछा.

‘‘हां, मैं जरा पड़ोस में जा रही हूं. कोई पूछे तो बता देना.’’

नरगिस सड़क पर आई और एक टैक्सी को हाथ दे कर रोका, ‘‘स्टेशन चलो.’’

स्टेशन पहुंच कर नरगिस ने एक कुली से बुकिंग औफिस का पता पूछा. चंद औरतें खिड़की के सामने खड़ी थीं. वह भी खड़ी हो गई.

‘‘कहां की टिकट दूं?’’

‘‘मुलतान.’’

टिकट ले कर गाड़ी का वक्त पूछा और प्लेटफार्म पर आ गई. आज वह फिर एक गुलजार खां से, एक दिलशाद बेगम से बच कर भाग रही थी. हरम गेट, मुलतान- अपनी मांजी के पास. Hindi stories

   लेखक – डा. साजिद अमजद  

Love Story: प्यार नहीं, जिद

Love Story: अगर कोई लड़की किसी लड़के से दोस्ती कर ले और दोनों की दोस्ती गहरा जाए तो इस का मतलब यह नहीं है कि वह लड़के को प्यार करने लगी है. ज्यादातर लड़के ऐसी गलतफहमी पाल लेते हैं. सिद्धार्थ के साथ भी ऐसा ही हुआ, जिस का अंजाम डारिया को तो भुगतना ही पड़ा, वह भी जेल चला गया.

दुनिया में हर आदमी ख्वाब देखता है. कुछ सोते में तो कुछ जागते में. लेकिन यह भी सच है कि किसी के ख्वाब पूरे हो जाते हैं तो किसी के टूट कर किरचाकिरचा बिखर जाते हैं. कहने का अभिप्राय यह है कि ख्वाबों के मामले में सब खुशनसीब नहीं होते. डारिया यूरिएवा प्रोकीना के साथ भी कुछ ऐसा ही था. किशोर होते ही डारिया का झुकाव संगीत की ओर हो गया था. उस ने सुना था कि संगीत के मामले में भारत अग्रणी देश है, जहां बड़ेबड़े संगीतज्ञ रहते हैं. संगीतज्ञों के घराने हैं. इसलिए उस ने मन बना लिया था कि समय आने पर वह भारत जा कर संगीत की शिक्षा लेगी.

यही वजह थी कि 22 वर्ष की होते ही वह मन में संगीत सीखने की इच्छा लिए भारत आ गई. डारिया ने भारत के बारे में जैसा सुना था, ठीक वैसा ही पाया. उस ने यहां की ढेरों यादों को अपने दिलोदिमाग में संजो कर रख लिया. इन यादों को वह कभी खोना नहीं चाहती थी. 6 महीने के दौरान उस ने भारत के कई मनमोहक पर्यटकस्थल घूम लिए थे. इस के साथ ही उस ने संगीत के सुरों को अपनी नाजुक उंगलियों और मीठी आवाज से साधने की कला भी सीख ली थी.

डारिया मूलरूप से बुलगारिया के प्रमुख शहर वारना की रहने वाली थी. समुद्र किनारे बसे इस खूबसूरत शहर के समुद्री बीच पर देशीविदेशी पर्यटकों का खूब आवागमन रहता है. डारिया यूरी प्रोकीना की बेटी थी. यूरी के परिवार में पत्नी एंटोनिना प्रोकीना के अलावा 2 ही बेटियां थीं, जिन में बड़ी थी जेन प्रोकीना और छोटी डारिया. डारिया का परिवार साधन संपन्न था. उस ने रूस की राजधानी मास्को स्थित मास्को यूनिवर्सिटी से शिक्षा हासिल की थी. पढ़ाई के दौरान ही उस ने रूस की नागरिकता भी ले ली थी. बाद में इसी यूनिवर्सिटी में वह रिसर्च स्कौलर हो गई.

इस के लिए उसे 60 हजार यूरो मिलते थे. मास्को में वह सावेटेक्सिया क्षेत्र स्थित स्ट्रीट नंबर 21 के फ्लैट नंबर 22 में रह रही थी. उस का आवागमन दोनों देशों के बीच बना रहता था. इसी दौरान वह भारत आई थी. दरअसल, डारिया ने भारत के बारे में काफी कुछ सुन रखा था. इसी से उसे यहां के प्रति लगाव पैदा हुआ. मई, 2015 में उस का यह ख्वाब साकार हुआ. भारत में कई जगहों का भ्रमण करने के बाद उस ने अपना ठिकाना उत्तर प्रदेश की पर्यटक नगरी वाराणसी को बनाया. डारिया की खूबसूरत यादों की एक कड़ी सिद्धार्थ श्रीवास्तव भी था.

सिद्धार्थ का परिवार बनारस के लंका थानाक्षेत्र की नंदनगर कालोनी के मकान नंबर 37 में रहता था. साधनसंपन्न श्रीवास्तव परिवार की रीढ़ पूर्व एक्साइज कमिश्नर हृदयनाथ श्रीवास्तव थे. सिद्धार्थ उन का पोता था. सिद्धार्थ के पिता प्रदीप श्रीवास्तव का दूध का कारोबार था. उन के परिवार में पत्नी वीना के अलावा 2 बेटे थे, जिन में सिद्धार्थ छोटा था. सिद्धार्थ बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में बैचलर औफ म्यूजिक (बीम्यूज) तृतीय वर्ष का छात्र था. उस से मुलाकात के बाद डारिया उस के घर पर ही पेइंगगैस्ट के रूप में रहने लगी थी. भारत भ्रमण का उस का 6 महीने का सफर यादगार रहा. अब वह भारत की अपनी यादों के साथ 18 नवंबर को अपने देश वापस जाने की तैयारी कर रही थी. उस ने अपनी एयर टिकट भी बुक करा ली थी.

यादें खूबसूरत ही रहें तो बेहतर हैं. तकलीफ तब होती है, जब या तो वे कड़वाहट में तब्दील हो जाएं या फिर कोई गहरा जख्म देने वाला तूफान उन से टकरा जाए. डारिया को भी अचानक एक ऐसे भयानक तूफान से रूबरू होना पड़ा, जिस की उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. 2 नवंबर, 2015 की रात डारिया घर की छत पर बिछे तख्त पर मच्छरदानी लगा कर सो रही थी. रात बीत चुकी थी और भोर होने वाली थी. तड़के तकरीबन 4 बजे का वक्त था, जब डारिया की तेज चीखें सुन कर प्रदीप श्रीवास्तव की नींद खुल गई.

प्रदीप, उन की पत्नी वीना व बेटा सचिन दौड़ कर ऊपर पहुंचे तो डारिया रोतेरोते चिल्ला रही थी, ‘‘हैल्प…हैल्प…प्लीज हैल्प मी.’’ उसे देख कर सभी के पैरों तले से जमीन खिसक गई. डारिया के चेहरे, शरीर की खाल और कपड़ों से गंधयुक्त धुंआ निकल रहा था. श्रीवास्तव परिवार समझ गया कि उस पर किसी ने तीक्ष्ण तेजाब से हमला किया है. एकाएक किसी को कुछ सुझाई नहीं दिया तो वह डारिया को उठा कर नीचे बाथरूम में लाए और उस के जले हिस्से को पानी से धोया. इस बीच वह अचेत हो गई थी. आननफानन में वह उसे ले कर बीएचयू अस्पताल पहुंचे और प्राईवेट वार्ड में भर्ती करा दिया.

इस की सूचना उन्होंने पुलिस को दे दी थी. घटना जितनी गंभीर थी, उतनी ही दिल दहला देने वाली भी. मामला विदेशी युवती पर तेजाब डालने का  था. सूचना पा कर लंका॒ थानाप्रभारी संजीव कुमार मिश्र मय पुलिस बल के मौके पर पहुंच गए. उन्होंने अपने अधिकारियों को इस घटना से अवगत कराया तो एसएसपी आकाश कुलहरि, एसपी (सिटी) सुधाकर यादव और सीओ डी.पी. शुक्ला भी वहां आ पहुंचे. जिस बिस्तर पर डारिया पर तेजाब डाला गया था, उस का आधा हिस्सा जल कर काला पड़ चुका था. मौके से पुलिस को तेजाब का जग मिला, जो आधा भरा हुआ था. फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम को भी मौके पर बुलवाया गया. पुलिस ने साक्ष्य के तौर पर बिस्तर व जग को अपने कब्जे में ले लिया. इस के बाद पुलिस अस्पताल पहुंची. तब तक जिलाधिकारी राजमणि यादव भी वहां आ गए थे.

डारिया की हालत नाजुक थी. तेजाब से उस के चेहरे से ले कर पैर तक का दायां हिस्सा 45 प्रतिशत तक जल चुका था. डाक्टर उस का प्राथमिक उपचार कर रहे थे. इसलिए उस से तत्काल पूछताछ नहीं की जा सकती थी. पुलिस ने प्रदीप आदि से पूछताछ कर के युवती का ब्यौरा जुटाया. उस के कमरे से उस की दोहरी नागरिकता वाले पासपोर्ट भी मिल गए. घटना को ले कर अधिकारी असमंजस की स्थिति में थे. उन्हें आरंभ में ही लग गया था कि हमले के पीछे कोई बड़ा कारण है, लेकिन वह कारण आखिर क्या है, यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा था.

पुलिस का अनुमान था कि हमलावर या तो पीडि़ता को जानता था या फिर किसी ने निजी खुन्नस के चलते किसी को पैसा दे कर यह काम कराया था. जो भी रहा हो, यह काम करने या कराने वाले का मकसद युवती का चेहरा बिगाड़ना था. चिकित्सकों की इजाजत पर पुलिस ने डारिया से पूछताछ की तो उस ने इस के लिए सिद्धार्थ श्रीवास्तव को जिम्मेदार बताया. पुलिस ने सिद्धार्थ के परिजनों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वह घटना के बाद से ही लापता है. वे लोग डारिया की चीखें सुन कर छत पर गए थे. उन्हें नहीं पता कि हमले के पीछे सिद्धार्थ का हाथ है या नहीं?

एक तो शहर में तेजाब को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की यह बड़ी घटना थी, दूसरे घटना की शिकार हुई युवती विदेशी थी. इन दोनों ही बातों ने पुलिस की चिंता बढ़ा दी थी. कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण, जोन के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) अमरेंद्र सेंगर और पुलिस उप महानिरीक्षक एस.के. भगत ने अपने अधीनस्थ अफसरों को आरोपी को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने के निर्देश दिए. विदेशी युवती का प्रकरण होने की वजह से इस की गूंज प्रदेश मुख्यालय से ले कर दिल्ली तक पहुंची तो प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने डीजीपी जगमोहन यादव से पूरे घटनाक्रम की जानकारी ले कर डारिया का उपचार सरकारी खर्चे पर कराने के निर्देश दिए.

दूसरी ओर केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से रूस व बुल्गारिया के दूतावासों को इस घटनाक्रम का ब्यौरा प्रेषित कर दिया गया. इस बीच पुलिस ने डारिया के बयानों पर महिला एसआई संजू सरोज के माध्यम से लिखित तहरीर के आधार पर धारा 326 (ए) के अंतर्गत नामजद मुकदमा दर्ज कर लिया.

मामले की गंभीरता के मद्देनजर आरोपी को जल्द गिरफ्तार करना जरूरी था. एसएसपी आकाश कुलहरि ने थानाप्रभारी संजीव कुमार मिश्र को आरोपी की तलाश में जुट जाने को कहा. थानाप्रभारी ने आरोपी सिद्धार्थ की तलाश में कई स्थानों पर दबिश डाली, लेकिन वह हाथ नहीं आ सका. फिर भी पुलिस उस की सुरागसी में लगी रही. शाम को एक मुखबिर से पुलिस को सूचना मिली कि आरोपी सिद्धार्थ को कुछ देर पहले बसस्टैंड के पास घूमते देखा गया है.

सूचना मिलते ही संजीव कुमार ने एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम में एसआई संजय कुमार सिंह, एसआई महेंद्रराम प्रजापति, कांस्टेबल अखिलेश कुमार व संजय कुमार को शामिल किया गया. पुलिस टीम ने बसस्टैंड पहुंच कर सिद्धार्थ की तलाश शुरू कर दी. पुलिस चूंकि आरोपी के घर से उस का फोटो ले चुकी थी, इसलिए उसे पहचानने में देर नहीं लगी. पुलिस ने पीछे से जा कर उसे दबोच लिया.

सिद्धार्थ को गिरफ्तार कर के पुलिस थाना लंका ले आई. संजीव कुमार ने उस की गिरफ्तारी की सूचना उच्चाधिकारियों को भी दे दी. पुलिस ने सिद्धार्थ से पूछताछ की तो उस ने बिना किसी सख्ती के अपना जुर्म कबूल कर लिया. पुलिस ने उस से विस्तृत पूछताछ की तो दोस्ती व एकतरफा प्यार की वजह से डारिया को हमेशा के लिए अपना बनाने का ख्वाब देखने वाले हारे हुए जुनूनी प्रेमी की चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई.

दरअसल डारिया टूरिस्ट वीजा पर 1 मई, 2015 को भारत आई थी. पहले वह हिमाचल प्रदेश की वादियों में घूमी, फिर वाराणसी आ गई. डारिया का एक हमवतन दोस्त एलेक्जेंडर भी वाराणसी आया हुआ था. एक शाम दोनों गंगा घाट पर घूम रहे थे, तभी डारिया के कानों में टकराई बांसुरी की मधुर धुन ने जैसे उस के मन में मिठास घोल दी. उस ने घूम कर देखा तो एक युवक बांसुरी की धुन में खोया हुआ था. दोनों उस के नजदीक पहुंचे और उस की जम कर तारीफ की. यह युवक सिद्धार्थ श्रीवास्तव था.

बांसुरी बजाने का शौकीन सिद्धार्थ अक्सर गंगा किनारे चला जाया करता था और बांसुरी बजाने का अभ्यास करता था. उस दिन भी वह इसीलिए वहां गया था. डारिया की तारीफ से सिद्धार्थ बहुत खुश हुआ. इसी बीच तीनों के बीच औपचारिक परिचय हुआ. डारिया बांसुरी की धुन सुन कर जिस अंदाज से खिलखिला कर उस के पास आई थी, उसी अंदाज में वापस भी चली गई. लेकिन पहली ही मुलाकात में उस ने सिद्धार्थ के दिल के तारों को झंकृत कर दिया था.

डारिया खुद भी संगीत सीखना चाहती थी. सिद्धार्थ उसे भला लड़का लगा. इसलिए अगले दिन वह फिर गंगा किनारे उसी स्थान पर गई. सिद्धार्थ उस दिन भी वहां मौजूद था. डारिया ने संगीत के प्रति अपने लगाव की बात सिद्धार्थ को बताई तो उसी दिन से उन के बीच बातों और मुलाकातों का सिलसिला बढ़ गया. रफ्तारफ्ता उन की दोस्ती गहराती गई. डारिया होटल में ठहरी थी. एक दिन सिद्धार्थ ने उस से कहा, ‘‘डारिया, तुम्हें यदि अपने इस दोस्त पर भरोसा हो तो तुम मेरे यहां पेइंगगैस्ट बन कर रह सकती हो. इस से तुम्हें संगीत सीखने में भी आसानी होगी.’’

सिद्धार्थ का प्रस्ताव अच्छा था. संगीत सीखने की ललक की वजह से उस ने इस के लिए स्वीकृति दे दी. बनारस में अनेक सैलानी कईकई महीने रुकते हैं. होटल चूंकि महंगे पड़ते हैं, इसलिए कई बार वे होटल के बजाय पेइंगगैस्ट बन कर लोगों के यहां रुक जाते हैं. यह साधारण सी बात थी. सिद्धार्थ एक दिन डारिया को अपने घर ले गया और उस ने उस का परिचय अपने घर वालों से कराया. डारिया का स्वभाव सभी को पसंद आया. सिद्धार्थ की सहमति पर डारिया को बतौर पेइंगगैस्ट रहने के लिए एक कमरा दे दिया गया.

वह श्रीवास्तव परिवार के साथ रह कर संगीत सीखने लगी. डारिया को प्राकृतिक सौंदर्य से बहुत प्यार था. वह जी भर कर घूमना चाहती थी. वह खुले विचारों वाली युवती थी. इस बीच उस का दोस्त एलेक्जेंडर भी कहीं घूमने जा चुका था. वैसे भी वे दोनों अलगअलग आए थे. डारिया सिद्धार्थ के साथ सिक्किम, दार्जिलिंग और लेह घूमने के लिए गई. दोनों जहां भी जाते थे, एक साथ ही ठहरते थे. इस दौरान दोनों दोस्ती से उपजे वक्ती प्यार की वजह से एकदूसरे के बेहद नजदीक आ गए थे. नजदीकियों की रोशनी थोड़ी और फैली तो डारिया के दिल में क्या है? बिना यह जानेसमझे सिद्धार्थ ने मन ही मन डारिया को अपनी जिंदगी का हमसफर बनाने का फैसला कर लिया.

चूंकि डारिया की रजामंदी के बिना यह संभव नहीं था, इसलिए अच्छे वक्त के इंतजार में उस ने वक्ती तौर पर अपने जज्बातों को जब्त कर के रखना ही बेहतर समझा. यह बात अलग थी कि डारिया के लिए यह रिश्ता केवल और केवल वक्ती था. कई जगहों पर घूम कर सिद्धार्थ और डारिया सितंबर में वाराणसी आ गए. इस बीच डारिया ने बांसुरी, हारमोनियम और तबले पर संगीत सीखने का अभ्यास कर लिया था. वह अपना ज्यादातर वक्त संगीत के रियाज और किताबें पढ़ने में बिताती थी. सिद्धार्थ के दिल में चूंकि कुछ और था, इसलिए वह उस का ख्याल रखने में दिनरात एक कर रहा था. एक तरह से वह उस पर अपना हक भी समझने लगा था, जबकि डारिया उसे एक घनिष्ठ दोस्त से ज्यादा कुछ नहीं समझती थी.

डारिया श्रीवास्तव परिवार से काफी घुलमिल गई थी. उस का दोस्त एलेक्जेंडर सिक्किम गया हुआ था. उस ने डारिया को वहां आने को कहा, तो वह अक्तूबर के दूसरे सप्ताह में अकेली ही उस के पास चली गई और एक सप्ताह बाद वापस आई. सिद्धार्थ के दिल में उस के लिए एकतरफा प्यार का जुनून था. उस के इस तरह जाने से उसे गुस्सा तो आया. लेकिन उस ने अपनी नाराजगी प्रकट नहीं की. सिद्धार्थ जिद्दी व गुस्सैल प्रवृत्ति के विकार का शिकार था. उस के घर वाले उस का इलाज भी करा रहे थे. डारिया और सिद्धार्थ के बीच चूंकि संबंधों के मामले में कभी भी खुल कर बात नहीं हुई थी, इसलिए दोनों ही एकदूसरे की भावनाओं और अंदरूनी सोच को नहीं समझ पाए थे.

डारिया अब अपने देश वापस जाना चाहती थी. इस बारे में वह अपने घर वालों से अकसर बात भी करती थी. एक दिन जब वह अपनी मां से मोबाइल पर बात कर रही थी तो सिद्धार्थ कमरे में आ गया. कुछ देर बातें कर के डारिया ने चहकते हुए कहा, ‘‘एक सरप्राइज है माम, आई कम बैक होम. बट आफ्टर सम डेज. ओके बाय.’’ कहते हुए उस ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया. वह बहुत खुश थी. उस का अंतिम वाक्य सुन कर सिद्धार्थ को करंट सा लगा. एकाएक वह तनाव में आ गया. वह उस के नजदीक जा कर बोला, ‘‘कहां जाने की बात कर रही थीं डारिया?’’

‘‘अपनी कंट्री.’’ उस ने हंस कर जवाब दिया.

‘‘व्हाट?’’ सिद्धार्थ ने चौंक कर पूछा तो डारिया ने उस की तरफ देखा, ‘‘इतना हैरान क्यों हो रहे हो सिद्धार्थ? अपने देश तो मैं जाऊंगी ही.’’

सिद्धार्थ अपने दिल की बात छिपाते हुए बोला, ‘‘यह बात नहीं है, दरअसल मैं चाहता हूं कि तुम अभी कुछ दिनों और यहां रहो.’’

‘‘बट व्हाय? मैं यहां हमेशा के लिए तो कतई नहीं आई थी.’’

‘‘तुम नहीं जानती, तुम्हारे बिना मैं बहुत अकेला हो जाऊंगा.’’

‘‘सौरी डियर, मुझ से रुकने की बात मत करो. ऐसा नहीं हो सकता.’’

‘‘तुम चाहो तो सब हो सकता है.’’

‘‘उदास नहीं होते बेबी, दिस इज नौट बिग मैटर.’’ कहने के साथ ही डारिया उस की बातों को हंसी में टाल गई. जबकि सिद्धार्थ के साथ ऐसा नहीं हो सका.

उस दिन से सिद्धार्थ की चिंता का दौर शुरू हो गया. वह अजीब से तनाव में रहने लगा. उस की रातों की नींद उड़ गई. दरअसल वह मन ही मन फैसला कर चुका था कि वह डारिया को अपनी दुलहन बनाएगा. वह सोचता था कि डारिया इतने दिनों साथ रही है. उस के दिल में भी उस के लिए जगह होगी. वह पति के रूप में उसे अपना कर हमेशा के लिए भारत में बस जाएगी. इसलिए अब उस ने जल्द से जल्द अपने दिल की बात उस से करने का मन बना लिया.

इस बीच डारिया भारत को अलविदा कह कर जाने की तैयारी करने लगी थी. उस ने एक एजेंट के जरिए 18 नवंबर की अपनी टिकट भी बुक करा ली थी. यह बात पता चलने पर सिद्धार्थ बौखला गया. एक दिन वह डारिया के कमरे में आया तो उस की आंखों व चेहरे पर उदासी के बादल मंडरा रहे थे. उस की परेशानी छिपने वाली नहीं थी. उस ने डारिया से कहा, ‘‘मैं तुम से एक बात कहना चाहता हूं डारिया.’’

‘‘क्या?’’ डारिया ने आंखों में आंखें डाल कर पूछा तो वह बोला, ‘‘हमारा धर्म, संस्कार और देश भले ही अलग हों, लेकिन मेरे दिल ने सिर्फ तुम्हारी धड़कन को महसूस किया है. मैं तुम्हें सच्चा प्यार करता हूं. जब से तुम मेरी जिंदगी में आई हो, मैं ने अपनी हर खुशी और हर गम को तुम से जोड़ कर देखा है. मैं तुम से शादी करना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि तुम हमेशा के लिए यहीं रह जाओ.’’

‘‘कैसी बात कर रहे हो सिद्धार्थ? मैं यहां शादी करने नहीं, घूमने के लिए आई थी.’’

‘‘लेकिन…’’ उस ने कुछ कहना चाहा तो डारिया ने उसे बीच में ही टोक दिया, ‘‘प्लीज सिद्धार्थ, रिश्ते अपनी जगह हैं, लेकिन मैं ने इस बारे में कभी नहीं सोचा.’’

‘‘अब तो सोच सकती हो?’’

‘‘सौरी सिद्धार्थ.’’

‘‘तुम्हारे जाने से मैं बहुत दुखी हो जाऊंगा.’’ सिद्धार्थ ने कहा तो डारिया उसे समझाते हुए बोली, ‘‘मैं तुम से दूर नहीं जा रही सिद्धार्थ. महसूस कर के देखना, मुझे हरदम अपने साथ पाओगे. मैं तो यहां सिर्फ घूमने आई थी. मेरा लक्ष्य तुम नहीं थे. मुझे यहां तुम जैसा अच्छा दोस्त मिला, यह मेरे लिए खुशी की बात है. हमारी दोस्ती की डोर इतनी कमजोर नहीं, जो दूरियों से टूट जाए.’’

‘‘प्लीज एक बार शादी के बारे में सोच लो. मैं तुम्हें बहुत खुश रखूंगा.’’ सिद्धार्थ ने गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में कहा तो वह उस के प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए बोली, ‘‘नेवर सिद्धार्थ, यह सच है कि मैं तुम्हारे साथ रही. तुम ने मेरा खयाल भी रखा. इसे मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी. थैंक्यू सो मच.’’

सिद्धार्थ के सपने जैसे एक झटके में चकनाचूर हो गए. उसे डारिया से ऐसी उम्मीद नहीं थी. उस की हालत हारे हुए जुआरी जैसी हो गई. अब जैसेजैसे दिन बीत रहे थे, सिद्धार्थ और भी परेशान होता जा रहा था. वह दिनरात डारिया के बारे में सोचता और वक्त बेवक्त उसे मनाने की कोशिश भी करता, लेकिन हर बार डारिया का जवाब ना ही होता. डारिया उस की उदासी की वजह जानती थी, लेकिन उस की अपनी मजबूरी थी. इस से सिद्धार्थ बुरी तरह चिढ़ गया. प्यार की नाकामी ने उस के दिल में नफरत का सैलाब भर दिया. गुस्सैल प्रवृत्ति का होने से इस में और भी इजाफा हुआ.

उसे लगा कि डारिया ने उस के साथ बेवफाई की है और उसे अपनी खूबसूरती पर घमंड है. अगर वह उस की बात नहीं मानेगी तो वह भी उसे किसी के काबिल नहीं छोड़ेगा. उस की हालत पागलों जैसी हो गई. आखिर सिद्धार्थ ने डारिया पर तेजाब से हमला करने का फैसला कर लिया. इंटरनेट पर उस ने खतरनाक एसिड के बारे में जानकारी जुटाई और शहर में उस की दुकान का पता भी खोजा. 6 नवंबर को उस ने गांधीनगर मार्केट स्थित कैमिकल की एक दुकान से 750 रुपए में ढाई लीटर सल्फ्युरिक एसिड खरीद कर अपने पास रख लिया. यह एसिड एक जार में था. 12 नवंबर की शाम उस ने डारिया से अंतिम बार कहा, ‘‘डारिया एक बार फिर सोच लो.’’

लेकिन वह उस की बात से चिढ़ कर बोली, ‘‘तुम पागल हो गए हो सिद्धार्थ.’’

‘‘पागल ही सही, मुझे सोच कर जवाब दे देना.’’ कहते हुए वह उस के कमरे से बाहर निकल गया.

रात में डारिया छत पर सोने के लिए चली गई. वह खुली छत पर बिस्तर लगा कर सोती थी. डारिया तो अपने घर जाने के सपने लिए नींद के आगोश में चली गई. लेकिन सिद्धार्थ की आंखों से नींद कोसों दूर थी. उसे पूरी रात नींद नहीं आई. वह तड़के छत पर पहुंचा. डारिया उस वक्त सो रही थी. उस ने उसे जगाया. डारिया ने आंखे मलते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है सिद्धार्थ?’’

‘‘क्या सोचा तुम ने जाने के बारे में?’’ सिद्धार्थ ने कठोरता से पूछा तो उस के इरादे से अंजान अलसाई डारिया बोली, ‘‘ओफ्हो तुम अब भी इसी बात को ले कर बैठे हो. मुझे जाना है यार.’’ कहने के साथ वह दोबारा लेटने लगी, लेकिन तभी बिजली की सी गति से सिद्धार्थ के हाथ हरकत में आ गए. उस ने पीछे की तरफ किया हुआ अपना हाथ आगे किया और जग में लिया हुआ तेजाब डारिया की तरफ उछाल दिया.

इस के बाद वह चीते की सी फुर्ती से भाग गया. यह सब अप्रत्याशित था. तेजाब गिरते ही डारिया दर्द से बिलबिला उठी. उस के हलक से दर्दनाक चीखें निकलने लगीं. इस के बाद ही सिद्धार्थ के घर वाले दौड़ कर ऊपर पहुंचे थे और उसे अस्पताल में दाखिल कराया था. सिद्धार्थ चूंकि घर में नजर नहीं आ रहा था, इसलिए घर वालों को उस पर शक तो था, पर वह इस बात को छिपाए रहे. बाद में जब डारिया ने उस का नाम पुलिस को बताया तो उन्होंने सिद्धार्थ के फरार होने की बात पुलिस को बता दी. उधर सिद्धार्थ दिनभर इधरउधर छिपता घूमता रहा. घूमतेघूमते शाम को वह बस स्टैंड पहुंचा. उस ने शहर को हमेशा के लिए छोड़ देने का फैसला कर लिया था. लेकिन इस से पहले ही वह पुलिस के शिकंजे में आ गया. सिद्धार्थ की करतूत पर हर कोई हैरान था.

अगले दिन यानी 14 नवंबर को रूसी दूतावास के अधिकारी बनारस पहुंचे और पीडि़त डारिया से मिले. दूतावास के जरिए ही उस के घर वालों को हादसे की जानकारी दी गई. वे लोग चाहते थे कि बेहतर उपचार के लिए बेटी अपने देश आ जाए. गृह मंत्रालय के निर्देश पर डाक्टरों की एक टीम डारिया को एयर एंबुलैंस के जरिए दिल्ली ले गई और उसे सफदरजंग अस्पताल में भरती करा दिया.

डाक्टरों ने जांच की तो पता चला कि डारिया की बाईं आंख की रोशनी पूरी तरह जा चुकी है. विदेश मंत्रालय के अधिकारी वाराणसी से उस का सामान ले गए. इस के बाद डारिया को उस के परिजनों की इच्छानुसार विदेशी दूतावास के जरिए उस के देश भेज दिया गया. केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने घोषणा की है कि डारिया के इलाज का खर्चा भारत सरकार उठाएगी. इस बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने भी डारिया के नाम 5 लाख रुपए का एक चैक भारत सरकार को भेज दिया था. उधर आरोपी के दादा हृदयनाथ श्रीवास्तव का कहना था कि वह डारिया के लिए खुद नेत्रदान करने को तैयार हैं.

हमले से आहत डारिया का कहना था कि वह सिद्धार्थ से एक बार मिल कर पूछना चाहती है कि क्या किसी से दोस्ती या उस पर विश्वास करना गलत है? उस ने पुलिसकर्मियों से कहा कि सिद्धार्थ को माफ कर दिया जाए. सिद्धार्थ उस का अच्छा दोस्त है. डारिया ने यह भी कहा कि भारत एक अच्छा देश है. वह भविष्य में भी यहां आती रहेगी.

इधर पुलिस ने आरोपी सिद्धार्थ से विस्तृत पूछताछ व जरूरी कागजी औपचारिकताओं को पूरा कर के जिला अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा तैयार करने तक आरोपी जेल में था. पुलिस उस के खिलाफ चार्जशीट तैयार करने के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) की काररवाई करने की तैयारी कर रही थी.

डारिया से सिद्धार्थ को पहचानने की भूल हो गई थी. दूसरे सिद्धार्थ डारिया की दोस्ती और संबंधों को प्यार समझ कर उस के साथ दुनिया बसाने का ख्वाब देखने लगा था. अगर दोनों पहले ही एकदूसरे को ठीक से परख लेते तो न डारिया दर्दनाक हादसे से रूबरू होती और न सिद्धार्थ का भविष्य खराब होता. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों