Hindi Crime Story: बदल जाए जब प्यार

Hindi Crime Story: बिरमा को अनुज यादव से प्यार हुआ तो वह पुराने प्रेमी राजकुमार से पीछा छुड़ाने के बारे में सोचने लगी. प्रेमी से पीछा छुड़ाने के लिए बिरमा ने जो रास्ता अपनाया, क्या वह उचित था?

फिरोजाबाद से मैनपुरी की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित थानाकस्बा घिरोर के नजदीकी गांव नंगला केहरी के शिव मंदिर के पास जब गांव वालों ने 2-2 लाशें पड़ी देखीं तो परेशान हो उठे. उन्होंने तुरंत इस की सूचना थाना घिरोर पुलिस को दी. गांव नंगला केहरी थाना घिरोर के अंतर्गत ही आता था. वह थाने के नजदीक ही था, इसलिए थानाप्रभारी देवेश कुमार जल्दी ही घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतकों की उम्र 35-40 साल रही होगी. शक्लसूरत और पहनावे से दोनों ही ठीकठाक घरों के लग रहे थे. लाशों के आसपास खून नहीं था, इस से पुलिस समझ गई कि इन्हें कहीं दूसरी जगह मार कर लाशें यहां फेंकी गई हैं.

गांव वाले भी उन्हें नहीं पहचान पाए थे. इस का मतलब वे इस इलाके के रहने वाले नहीं थे. पुलिस को लाशों की तलाशी में भी कुछ नहीं मिला था, जिस से उन की पहचान हो पाती. पुलिस को लगा कि इन की शिनाख्त में परेशानी होगी. लेकिन जब उन्हें एक लाश की कमीज पर सिलने वाले दरजी का स्टिकर दिखाई दिया तो मन को थोड़ा संतोष हुआ कि शायद इस से कुछ मदद मिल जाए. पुलिस ने कोशिश की तो उस स्टिकर से मदद ही नहीं मिली, बल्कि मृतकों के घर तक पहुंच गई. कमीज पर जो स्टिकर लगा था, वह आगरा के फतेहाबाद के एक दरजी का था. थाना घिरोर पुलिस दरजी के यहां पहुंची तो उस ने तुरंत मृतक की शिनाख्त कर दी. उस ने बताया कि यह कमीज गांव छहबिस्वा के रहने वाले राजकुमार की है.

थाना घिरोर पुलिस ने राजकुमार के घर पहुंच कर उस के बारे में पूछा तो घर वालों ने कहा कि वे खुद ही राजकुमार और लक्ष्मीकांत को ढूंढ रहे हैं. दोनों एक दिन पहले फिरोजाबाद में रहने वाली अपनी बहन के यहां जाने की बात कह कर घर से निकले थे, लेकिन वे बहन के यहां पहुंचे ही नहीं. चिंता की बात यह है कि उन का फोन भी बंद है. जब पुलिस ने घर वालों को बताया कि राजकुमार और लक्ष्मीकांत की हत्या हो गई है तो घर वाले हैरान होने के साथसाथ रोनेबिलखने लगे. घर वालों की समझ में नहीं आ रहा था कि उन की हत्या क्यों की गई?

क्योंकि उन की ऐसी किसी से दुश्मनी भी नहीं थी. लेकिन जब पुलिस ने पूछा कि दोनों का किसी महिला से कोई चक्कर वगैरह तो नहीं था तो घर वालों ने बताया कि राजकुमार का फिरोजाबाद में रह रही बिरमा से संबंध था. उस का यह संबंध तब से था, जब वह इसी गांव में रहती थी. 2 भाइयों की हत्या को ले कर पुलिस गंभीर थी. बिरमा की ससुराल आगरा के थाना फतेहाबाद के गांव खिसवा में थी. राजकुमार का तभी से उस के यहां आनाजाना था. लेकिन इधर उस का पति प्रहलाद सिंह उसे और बच्चों को ले कर फिरोजाबाद में रहने लगा था. पुलिस ने सबूत जुटाने के लिए राजकुमार के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स के अनुसार राजकुमार की घटना वाले दिन एक नंबर पर कई बार बात हुई थी. उस नंबर के बारे में पुलिस ने पता किया तो वह नंबर फिरोजाबाद में झील की पुलिया की रहने वाली ऊषा का निकला.  पुलिस ऊषा के घर पहुंची तो वह घर से गायब थी. उस के घर से गायब होने पर पुलिस को उस पर शक हुआ. पुलिस ने उस के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि ऊषा देहधंधा करने के अलावा लड़कियां भी सप्लाई करती थी. ऊषा के मिलने पर ही स्थिति साफ हो सकती थी. पुलिस ऊषा के पीछे लग गई. वह जहांजहां मिल सकती थी, पुलिस ने छापा मारा. उस के पति बलबीर पर भी शिकंजा कसा गया, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला. इस के बाद मुखबिरों की मदद ली गई. तब जा कर मैनपुरी बसअड्डे से उसे गिरफ्तार किया गया.

उस के साथ एक औरत और थी. दोनों दिल्ली जाने की फिराक में थीं. पूछताछ में पता चला कि ऊषा के साथ जो औरत थी, वह बिरमा थी. पुलिस उस से भी पूछताछ करना चाहती थी. थाने ला कर उन से पूछताछ की गई तो उन के बताए अनुसार, राजकुमार और उस के चचेरे भाई लक्ष्मीकांत की हत्या की जो कहानी सामने आई, सुन कर पुलिस भी सन्न रह गई. हत्या की यह कहानी कुछ इस प्रकार थी: आगरा के थाना फतेहाबाद के गांव छहबिस्वा के रहने वाले राजेंद्र सिंह का बेटा था राजकुमार. उस के 2 भाई और थे, भोले और पूरन. राजेंद्र सिंह गांव का खातापीता किसान था.

राजकुमार की शादी मुरैना के जनकपुर की रहने वाली गुड्डी के साथ हुई थी, जिस से उसे एक बेटी और 2 बेटे थे. राजकुमार के पड़ोस के गांव में रहता था प्रहलाद सिंह, जो ब्याज पर पैसे देने का काम करता था. राजकुमार अकसर प्रहलाद सिंह के घर जाया करता था. वह उस की पत्नी बिरमा को भाभी कहता था. न जाने क्यों बिरमा उस की खूब आवभगत करती थी. राजकुमार को भी वह अच्छी लगती थी. एक तो बिरमा का अच्छा लगना, दूसरे उस के द्वारा आवभगत करना, राजकुमार उस की ओर आकर्षित हो गया. फिर वह उसे अपनी बनाने के चक्कर में रहने लगा. दूसरी ओर बिरमा ब्याही भले प्रहलाद सिंह के साथ थी, लेकिन कभी उस ने उसे पसंद नहीं किया, इस की वजह यह थी कि प्रहलाद सिंह कमजोर दिमाग का था.

बिरमा उस के साथ बिलकुल खुश नहीं थी. इसीलिए राजकुमार के आने पर वह उस की खूब आवभगत करती थी. क्योंकि वह उसे पसंद करती थी. दोनों ओर से आकर्षण की डोर बढ़ी तो उसे जुड़ने में ज्यादा देर नहीं लगी. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला चल निकला. लेकिन यह सब चोरीछिपे हो रहा था. बिरमा भी 1 बेटी और 2 बेटों की मां थी. वह रहती भले प्रहलाद सिंह के साथ थी, लेकिन वह पति राजकुमार को ही मानती थी. कोई बात आखिर कितने दिनों तक छिपी रह सकती है. धीरेधीरे गांव वालों को बिरमा और राजकुमार के संबंधों का पता चल गया.

कुछ लोगों ने प्रहलाद सिंह को आगाह भी किया, लेकिन उस में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह बिरमा को रोक सकता. दूसरी ओर राजकुमार भी दबंग किस्म का युवक था. इसलिए सब कुछ जानते हुए भी उसे कोई रोक नहीं सका. इस तरह राजकुमार और बिरमा बिना किसी रुकावट के एकदूसरे से मिलते रहे. लेकिन जब पति के इन संबंधों की जानकारी गुड्डी को हुई तो वह तनाव में रहने लगी. बिरमा की वजह से पतिपत्नी के बीच दूरियां पैदा होने लगीं. उस ने कई बार सास से शिकायत भी की, लेकिन मां भी बेटे को नहीं रोक पाई. लिहाजा इसी गम और चिंता में एक दिन गुड्डी चल बसी.

गुड्डी जब मरी थी, बच्चे छोटेछोटे थे. लेकिन राजकुमार ने दूसरी शादी नहीं की, क्योंकि उस का काम तो बिरमा से चल ही रहा था. अब वह पूरी तरह से आजाद था. प्रहलाद सिंह की गांव में ज्यादा बदनामी होने लगी तो उस ने अपना गांव छोड़ दिया और फिरोजाबाद के थाना लाइन पार के रामनगर गांव में अपना मकान बनवा कर परिवार के साथ रहने लगा. जिस बदनामी की वजह से प्रहलाद सिंह ने गांव छोड़ा था, उस ने यहां आने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ा. बिरमा और राजकुमार के संबंध उसी तरह बने रहे. वह यहां भी लगातार आता रहा. फिरोजाबाद में बिरमा की दोस्ती ऊषा से हो गई तो वह उस के घर भी आनेजाने लगी.

यहीं ऊषा की मुलाकात राजकुमार से हुई. राजकुमार को पता चला कि ऊषा देहधंधा तो करती ही है, लड़कियां भी सप्लाई करती है तो उसे खुशी हुई. इस के बाद वह ऊषा के घर जा कर अपने लिए लड़कियां मंगवाने लगा. इस तरह शारीरिक सुख की चाह में वह ऊषा के घर भी जाने लगा. बिरमा को इस की जानकारी थी, लेकिन उसे इस से कोई मतलब नहीं था, क्योंकि राजकुमार अब भी उस पर दिल खोल कर पैसे खर्च करता था. लेकिन जब बिरमा की मुलाकात चिलवा गेट के रहने वाले अनुज यादव से हुई तो राजकुमार उसे खटकने लगा. अनुज भी सूदखोरी का काम करता था. वह भी बिरमा पर दिल खोल कर रुपए खर्च करने लगा था. था तो वह भी शादीशुदा और बालबच्चेदार, लेकिन जैसा कहा जाता है कि आदमी को घर की मुर्गी दाल बराबर लगती है, वैसा ही कुछ अनुज के साथ भी था.

इस नए प्रेमी के जिंदगी में आने के बाद बिरमा राजकुमार से दूरियां बनाने लगी. उस ने राजकुमार का फोन रिसीव करना भी बंद कर दिया. बिरमा के इस व्यवहार से राजकुमार को परेशानी होने लगी, क्योंकि उसी से मिल कर उस के दिल को तसल्ली मिलती थी. जब उसे बिरमा से कुछ ज्यादा ही उपेक्षा मिलने लगी तो एक दिन उस ने कहा, ‘‘बिरमा, इधर तुम बदल नहीं गई हो, लगता है मैं तुम्हें भारू लगने लगा हूं?’’

‘‘नहीं तो, यह तुम्हारा वहम है. मैं तुम्हें अभी भी उसी तरह चाहती हूं. लेकिन अब परेशानी की बात यह है कि बच्चे बड़े हो गए हैं. उन के सामने यह सब अच्छा नहीं लगता.’’

बिरमा राजकुमार से ये बातें कह ही रही थी कि तभी उस की बेटी आ गई. उसे देख कर राजकुमार मुसकराते हुए बोला, ‘‘तुम सही कह रही हो, बच्चे बड़े हो गए हैं. मैं ने तो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया.’’

राजकुमार ने बिरमा की बेटी को जिस तरह  देखा था, उस की नजरों में खोट था, जिसे बिरमा ने ताड़ लिया था. उस ने तुरंत बेटी को अंदर जाने का इशारा करते हुए राजकुमार से धीरे से कहा, ‘‘अब हम घर के बाहर मिले तो ज्यादा ठीक रहेगा.’’

बिरमा की बेवफाई राजकुमार की समझ में नहीं आ रही थी. उस की उपेक्षा से वह चिंतित था. उसे लगा, इस के पीछे जरूर कोई बात है. उस ने कोशिश की तो सच्चाई सामने आ गई. बिरमा और अनुज यादव के संबंधों की उसे जानकारी हो गई. बिरमा ने उसे शारीरिक सुख दिया था तो उस ने भी उस के बदले उस के लिए कम नहीं किया था. अब उसे चिंता थी कि अगर बिरमा हाथ से निकल गई तो उसे शारीरिक सुख कैसे मिलेगा? वह किसी भी कीमत पर उसे छोड़ना नहीं चाहता था. इसलिए उस ने बिरमा से पूछा, ‘‘अनुज यादव तुम्हारा कौन लगता है?’’

‘‘अनुज यादव से मेरा क्या संबंध? बस मोहल्ले में रहता है?’’ बिरमा ने कहा.

‘‘बिरमा, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. इसलिए कान खोल कर सुन लो, अगर हमारे बीच कोई आया तो मैं न तुम्हें जिंदा छोड़ूंगा और न उसे.’’ राजकुमार ने धमकी दी.

राजकुमार की इस धमकी से बिरमा परेशान जरूर हो गई, लेकिन अब वह अनुज को कतई नहीं छोड़ सकती थी. वह उसी की बदौलत राजकुमार से पीछा छुड़ाना चाहती थी. जबकि यह इतना आसान नहीं था. इसी वजह से दोनों के बीच तनाव बढ़ने लगा. जब राजकुमार को लगा कि बिरमा उस के बजाय अनुज को ज्यादा महत्त्व दे रही है तो उस ने अपनी लायसेंसी पिस्तौल से बिरमा के घर फायरिंग करते हुए धमकी दी कि अगर उस ने अनुज से संबंध खत्म नहीं किए तो अच्छा नहीं होगा. राजकुमार के तेवर देख कर बिरमा डर गई. बिरमा को लगने लगा कि राजकुमार कभी भी उस की बेटी पर हाथ डाल सकता है. यह बात उस ने अनुज से बता कर कहा, ‘‘अगर तुम मुझ से संबंध बनाए रखना चाहते हो तो राजकुमार नाम के इस कांटे को तुम्हें निकालना होगा.’’

अनुज को पता चल गया था कि राजकुमार दबंग किस्म का आदमी है. बिरमा के लिए वह उस की भी जान ले सकता है. इसलिए उस ने सोचा कि राजकुमार उस के साथ कुछ गड़बड़ करे, उस के पहले ही वह उसे ठिकाने लगा दे. इस के बाद उस ने ऊषा और बिरमा के साथ बैठ कर राजकुमार को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. योजना बनने के बाद ऊषा ने राजकुमार को फोन किया, ‘‘एक अच्छी लड़की आ गई है. अगर चाहो तो आ जाओ. लेकिन पैसा थोड़ा ज्यादा लगेगा.’’

राजकुमार ने कहा, ‘‘पैसे की कोई चिंता नहीं है. बस लड़की अच्छी होनी चाहिए.’’

‘‘लड़की अच्छी है, तभी तो फोन किया है.’’

‘‘फिर रात में मैं पहुंच रहा हूं.’’ कह कर राजकुमार ने फोन काट दिया.

शाम को राजकुमार ने घर वालों से कहा कि वह बहन के यहां जा रहा है. वह घर से निकला तो चचेरा भाई लक्ष्मीकांत दिखाई दे गया. लड़की के बारे में बता कर उस ने उसे भी साथ ले लिया. लक्ष्मीकांत भी विधुर था. शारीरिक सुख की लालसा से वह भी राजकुमार के साथ चल पड़ा. दोनों ऊषा के घर पहुंचे तो वहां बिरमा भी मौजूद थी. बिरमा और लड़की को देख कर राजकुमार ने कहा कि वह बिरमा के साथ मौजमस्ती करेगा और लक्ष्मीकांत लड़की के साथ. ऊषा ने लड़की के साथ लक्ष्मीकांत को संतनगर भेज दिया तो राजकुमार को बिरमा के साथ तिलकनगर के अन्य मकान में. राजकुमार अपनी पिस्तौल लिए था.

लेकिन जब वह बिरमा के साथ उस घर में पहुंचा तो वहां पहले से घात लगाए बैठे अनुज यादव, लाला पंडित और विजय सिंह उस पर टूट पड़े. अनुज यादव ने राजकुमार की हत्या के लिए उन दोनों को 2 लाख रुपए दिए थे. राजकुमार को पिस्तौल निकालने का मौका ही नहीं मिला. उन लोगों ने ईंटपत्थर से राजकुमार की हत्या कर दी. लक्ष्मीकांत लड़की के साथ संतनगर स्थित जिस मकान में आया था, थोड़ी देर बाद टाटा मैजिक से राजकुमार की लाश ले कर तीनों वहां पहुंचे. उन्हें देख कर वह हक्काबक्का रह गया. वह कुछ समझ पाता, गोली मार कर उस की भी हत्या कर दी गई.

इस के बाद उस की लाश को भी उसी टाटा मैजिक में डाल कर वे मैनपुरी को जाने वाली सड़क पर चल पड़े. रोड पर ही स्थित थानाकस्बा घिरोर के पास गांव नंगला केहरी के शिवमंदिर के पास दोनों लाशें फेंक कर अपनेअपने घर चले गए. थाना घिरोर पुलिस ने ऊषा और बिरमा को गिरफ्तार कर हत्या का खुलासा तो कर दिया, लेकिन अभी मुख्य अभियुक्त उन के हाथ नहीं लगे थे. देवेश कुमार मुख्य अभियुक्तों तक पहुंचते, उस के पहले ही उन का तबादला हो गया. उस के बाद आए नए थानाप्रभारी दिवाकर सिंह यादव. उन्होंने काफी कोशिश कर के अनुज यादव को गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में अनुज यादव ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया, लेकिन वह राजकुमार की मोटरसाइकिल, पिस्तौल और मोबाइल नहीं बरामद कर सके. उस का कहना था कि इन चीजों के बारे में लाला पंडित और गुन्नू यादव उर्फ विजय सिंह ही कुछ बता सकते हैं. अनुज यादव की गिरफ्तारी के बाद लाला पंडित और विजय सिंह को लगा कि वे कभी भी पकड़े जा सकते हैं. पकड़े जाने के डर से दोनों ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस पूछताछ तथा सामान की बरामदगी के लिए उन्हें रिमांड पर लेने की कोशिश कर रही थी. लेकिन कथा लिखे जाने तक उन्हें रिमांड पर नहीं लिया जा सका था. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: वासना की आग – परिवार हुआ बरबाद

Hindi Crime Story:‘‘तुम्हारी बात तो कोई नहीं है, क्योंकि तुम तो कभी मेरा कहना मानती ही नहीं हो. पर कम से कम बेटियों का तो खयाल रखो. तुम्हारी आदतों का उन पर गलत प्रभाव पड़ सकता है. उन के बारे में तो सोचो.’’ राम सजीवन ने अपनी पत्नी फूलमती को समझाते हुए कहा.

‘‘हमें पता है कि हमें अपनी बेटियों को कैसे रखना है. हम कोई नासमझ नहीं हैं, जो अच्छीबुरी बात न समझें. लेकिन तुम्हें तो केवल दूसरों की बातें सुन कर हमारे ऊपर आरोप लगाने में ही मजा आता है.’’ पत्नी फूलमती ने झल्लाते हुए पति की बातों का जबाव दिया.

‘‘दूसरे की बातों में क्यों आऊंगा मैं? क्या मुझे दिखाई नहीं दे रहा कि तुम क्या करती हो. तुम्हारी बातें पूरे मोहल्ले में किसी से भी छिपी हुई नहीं हैं.’’ कहते हुए राम सजीवन घर से बाहर जाने लगा.

‘‘दरअसल, अब तुम शक्कीमिजाज के हो गए हो. हमारे पास जो भी खड़ा हो जाए. जो भी हमारे काम आ जाए. हमारे दुखदर्द में शामिल हो जाए, उसे देख कर तुम केवल यही सोचते हो कि उस के हमारे साथ संबंध बन गए हैं.’’ फूलमती बोली.

‘‘हम शक नहीं कर रहे बल्कि हकीकत है. हमें अब तुम्हारी चिंता नहीं है क्योंकि तुम मनमानी करोगी. हम तो बस बेटियों को ले कर परेशान हो रहे हैं. एक बार वे अपने घर चली जाएं. बस, उस के बाद तो हम तुम्हें कभी देखेंगे भी नहीं.’’ राम सजीवन ने कहा.

पत्नी की गलत आदतों की वजह से राम सजीवन मानसिक रूप से परेशान रहने लगा था. उस के एक बेटा और 3 बेटियां थीं. वह अपने तीनों जवान बच्चों को भी अच्छी सीख देता रहता था. जब उसे लगा कि पत्नी पर उस के कहने का कोई असर नहीं हो रहा है तो उस ने खुद को परिवार से दूर करना शुरू किया. वह स्वभाव से एकाकी रहने लगा. 38 साल की फूलमती ने 20-22 साल के कई लड़कों के साथ दोस्ती कर ली थी. वह उन लड़कों को अपने घर पर बुलाती रहती थी. यह बात मोहल्ले वालों से भला कैसे छिपी रह सकती थी. जिस से पूरे मोहल्ले में फूलमती के ही चर्चे होते रहते थे.

राम सजीवन को लगता था कि पत्नी की बुरी हरकतों का प्रभाव उस की जवान हो रही बेटियों पर पड़ेगा. इस कारण वह पत्नी को लड़कों की संगत से दूर रहने को कहता था. पति की बात को मानने के बजाय फूलमती उस से झगड़ने लगती थी. इस कारण पति और पत्नी अलगअलग रहने लगे.

राम सजीवन अपने घर से दूर अपने प्लौट पर बने मकान में रहने लगा था. जबकि फूलमती लखनऊ के ही थाना गोसाईंगंज स्थित बखारी गांव के मजरा रानीखेड़ा में एक बेटे रवि कुमार और तीनों बेटियों के साथ रह रही थी. पति के अलग रहने से फूलमती को और भी आजादी मिल गई थी. क्योंकि अब उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. अलग मकान पर रहने के बाद भी राम सजीवन पत्नी को अकसर समझाता रहता था, जिस की वजह से दोनों में झगड़ा भी हो जाता था.

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11 मई, 2021 की बात है. लखनऊ शहर के थाना गोसाईंगंज स्थित बखारी गांव के मजरा रानी खेड़ा के रहने वाले रवि कुमार ने पुलिस को सूचना दी कि उस के पिता 40 साल के राम सजीवन की हत्या किसी ने गांव के बाहर कर दी गई है. उस के पिता अपने घर से दूर प्लौट पर रहते थे. सूचना पा कर थानाप्रभारी अमरनाथवर्मा पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया तो उस का चेहरा ईंट से कुचला हुआ था. खून सनी ईंट भी वहीं पड़ी थी. मृतक के घर के लोग वहां मौजूद थे. उन से प्रारंभिक पूछताछ के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी.

राम सजीवन दलित था. गांव में उस की किसी से ऐसी कोई दुश्मनी नहीं थी जिस की वजह से हत्या की जा सके. ऐसे में पुलिस को हत्या की वजह समझ नहीं आ रही थी. लखनऊ के पुलिस कमिश्नर डी.के. ठाकुर के निर्देश पर डीसीपी (दक्षिण) डा. ख्याती गर्ग, अपर पुलिस उपायुक्त (दक्षिण) पूर्णेंदु सिंह और एसीपी स्वाति चौधरी के निर्देशन में गोसाईंगंज के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अमरनाथ वर्मा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई.

टीम में इंसपेक्टर डा. रामफल प्रजापति, एसआई फिरोज आलम सिद्दीकी, दीपक कुमार पांडेय, महिला एसआई नीरू यादव, कांस्टेबल गिरजेश यादव, रमापति पांडेय, अकबर, कुलदीप, सगीर अहमद, किशन जायसवाल, जितेंद्र भाटी को शामिल किया गया. थाना पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच की टीम को भी केस की जांच में लगा दिया गया. इस टीम में इंसपेक्टर तेज बहादुर सिंह, एसआई संतोष कुमार सिंह, दिलीप मिश्रा, प्रमोद कुमार सिंह कांस्टेबल विनय यादव, वीर सिंह, अजय तेवतिया, राजीव कुमार और अभिषेक कुमार शामिल थे.

राम सजीवन की हत्या की वजह जानने के लिए जब पुलिस ने उस की पत्नी फूलमती से पूछा तो वह बोली, ‘‘उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. हमारे साथ भी कोई लड़ाईझगड़ा नहीं था. बस वह नाराज हो कर गांव के बाहर वाले मकान में रहते थे.’’

फूलमती के पति की हत्या हुई थी. इस कारण वह परेशान थी. इस वजह से पुलिस बहुत दबाव डाल कर उस से पूछताछ नहीं कर पा रही थी. फूलमती हर बार बयान बदल रही थी. एक बार उस ने कहा, ‘‘वह खराब संगत में रहता था. इस कारण कुछ नशेड़ी लोगों से उस की दोस्ती हो गई थी. हो सकता है कि उन लोगों में से किसी ने नशे में हत्या की हो.’’

पुलिस को भी राम सजीवन का शव जिस हालत में मिला था, उसे देख कर ऐसा ही लग रहा था जैसे किसी ने मारने के बाद भी अपना गुस्सा निकालने के लिए ईंट से हमला कर के मुंह को कुचल दिया हो. जिस से उस की पहचान न हो सके. पर यह मसला पहचान छिपाने का नहीं दुश्मनी का लग रहा था. पुलिस ने गांव के लोगों से भी पूछताछ शुरू की तो पता चला कि राम सजीवन और उस की पत्नी के झगड़े की वजह पत्नी का कुछ अलग लोगों से संबंध था. 4 बच्चों की मां होने के बाद भी फूलमती दूसरे लोगों से हंसीमजाक करने में आगे रहती थी.

इस जानकारी के बाद पुलिस ने फूलमती से फिर से पूछताछ शुरू की. बारबार बयान बदलने से पुलिस को भी यह विश्वास होने लगा कि हत्या की जानकारी फूलमती को जरूर होगी. पुलिस के साथ पूछताछ और सवालों में वह फंस गई. थानाप्रभारी ने पूछा, ‘‘तुम्हें यह तो पता है कि किस ने मारा है. भले ही तुम उस में शामिल न रही हो. अगर तुम सच बता दोगी तो तुम्हें कुछ नहीं होगा. जिस ने यह हत्या की है, उसी को सजा मिलेगी.’’

पुलिस से यह भरोसा पा कर फूलमती ने कहा, ‘‘गांव बखारी के ही रहने वाले कल्याण ने यह किया है. राम सजीवन उसे हमारे घर आता देख कर गुस्सा होता था. यह बात उस से सहन नहीं हुई तो उस ने राम सजीवन की हत्या कर दी.’’

अब पुलिस टीम ने बिना समय गंवाए कल्याण को पकड़ लिया. कल्याण ने खुद को फंसता देख पूरी कहानी बता दी. कल्याण ने बताया, ‘‘राम सजीवन को मेरा फूलमती से मिलनाजुलना अच्छा नहीं लगता था. इस बात से वह फूलमती से नाराज रहता था. फूलमती भी पति की रोजरोज की कलह से परेशान हो गई थी. उसी के कहने पर राम सजीवन को रास्ते से हटाया.

‘‘फूलमती के दबाव डालने के बाद मैं ने उसे रास्ते से हटाने की योजना बनाई. मैं अकेले यह काम करने की हालत में नहीं था. इसलिए मैं ने अपने साथी सतीश से बात की. सतीश आपराधिक प्रवृत्ति का था. वह सुरियामऊ गांव का रहने वाला था.

‘‘हम लोगों ने अपने 2 और साथी सूरज और नीरज को भी शामिल किया. इस के बाद 11 मई की रात को राम सजीवन के घर में घुस कर हम चारों ने उस की हत्या कर दी.’’

कल्याण ने बताया, ‘‘राम सजीवन की हत्या करने के बाद उस के शव को घर से 100 मीटर दूर गांव से बाहर वाली सड़क पर डाल दिया. इस की जानकारी फृलमती को दी तो उस ने अपने मन की भड़ास और गुस्सा निकालने के लिए ईंट से मृत पति के चेहरे पर कई वार किए. मुंह को बुरी तरह से कुचल दिया.’’

कल्याण से मिली जानकारी के आधार पर गोसाईंगंज पुलिस ने सब से पहले फूलमती को पकड़ा उस के बाद रानीखेड़ा के रहने वाले 20 साल के सूरज, सुरियामऊ के रहने वाले 22 साल के सतीश, इसी गांव के 19 साल के नीरज को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने आरोपियों के पास से खून लगे कपड़े भी बरामद किए.

पुलिस ने राम सजीवन हत्याकांड में 5 अभियुक्तों राम सजीवन की पत्नी फूलमती, कल्याण, सतीश, सूरज और नीरज के खिलाफ धारा 302, 147, 149 और 201 आईपीसी के साथ 3 (2) (5) एससीएसटी ऐक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया. गोसाईंगंज थाना पुलिस और क्राइम टीम ने राम सजीवन की निर्मम हत्या करने वाले सभी आरोपियों को गिरफ्तारकर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया. Hindi Crime Story

Rajasthan Crime Story: आखिर माता बनी कुमाता – बेटे का अत्याचार

Rajasthan Crime Story: राजस्थान के भरतपुर जिले और उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले की सीमाएं एकदूसरे से सटी हुई हैं. इसी सीमा पर भरतपुर जिले की ग्राम पंचायत जाटौली रथभान का गांव कोलीपुरा बसा हुआ है. इसी साल 21 मार्च की बात है. पौ फट गई थी, लेकिन सूरज निकलने में अभी देर थी. कुछ लोग खेतों की तरफ जा रहे थे, तभी उन्होंने कोलीपुरा गांव के पास एक खेत में एक युवक का शव पड़ा देखा. कुछ लोगों ने शव के पास जा कर देखा. वहां शराब की बोतल, गिलास, नमकीन और पानी के पाउच पड़े थे.

खेत में लाश मिलने की बात जल्दी ही आसपास के गांवों में फैल गई. इस के बाद कोलीपुरा समेत दूसरे गांवों के लोग भी मौके पर जमा हो गए. किसी गांव वाले ने पुलिस को इस की सूचना दे दी. सूचना मिलने पर भरतपुर जिले की चिकसाना थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने लाश का मुआयना किया. करीब 25 साल के उस युवक की कनपटी पर गोली लगी हुई थी. लग रहा था कि उसे नजदीक से गोली मारी गई थी. पुलिस ने वहां इकट्ठा लोगों से मृतक युवक के बारे में पूछताछ की. लोगों ने शव देख कर उस की शिनाख्त कर ली. उस का नाम जितेंद्र उर्फ टल्लड़ था. वह मथुरा जिले के ओल गांव के रहने वाले नत्थी सिंह का बेटा था.

कोलीपुरा गांव में जिस जगह जितेंद्र की लाश मिली थी, वह जगह उस के गांव से करीब दोढाई किलोमीटर ही दूर थी. उस जगह से कुछ ही दूरी पर शराब का ठेका भी था. पुलिस ने मौके पर मौजद कोलीपुरा गांव के लोगों से पूछताछ की. इस में पता चला कि एक दिन पहले यानी 20 मार्च की शाम को 7-8 बजे के आसपास गांव वालों ने 3-4 युवकों को उस जगह देखा था.

गांव वालों से पूछताछ में जो बातें पता चलीं, उस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि जितेंद्र अपने दोस्तों के साथ रात में खाली खेत में शराब पी रहा होगा. इस दौरान किसी बात पर उन दोस्तों में झगड़ा हो गया होगा. झगड़े में ही किसी ने उसे गोली मार दी होगी. गोली पास से मारी गई, जो उस की आंख के नीचे कनपटी पर धंस गई.

लाश की शिनाख्त हो गई थी. मृतक जितेंद्र का गांव भी वहां से ज्यादा दूर नहीं था. इसलिए थानाप्रभारी ने एक सिपाही ओल गांव भेज कर उस के घर वालों को मौके पर बुला लिया. घर वालों ने लाश की शिनाख्त जितेंद्र के रूप में कर दी. उन्होंने पुलिस को बताया कि जितेंद्र कल शाम को आसपास घूमने जाने की बात कह कर घर से निकला था. इस के बाद वह रात को घर नहीं लौटा. रात को उस की तलाश भी की, लेकिन पता नहीं चला.

पुलिस ने जितेंद्र के घर वालों से जरूरी पूछताछ की. इस के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दी. पोस्टमार्टम कराने के बाद उसी दिन पुलिस ने लाश जितेंद्र के घर वालों को दे दी. एकलौते जवान बेटे जितेंद्र की लाश देख कर उस की मां गीता दहाड़े मार कर रोने लगी. जितेंद्र की मौत से दुखी दोनों बहनों और बहनोइयों की आंखों से भी आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. जवान मौत का गम तो पूरे गांव को था. फिर वे तो घर के लोग थे. उन का रोना, विलाप करना स्वाभाविक था.

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मृतक के चाचा राधाचरण ने जितेंद्र की हत्या का मामला भरतपुर जिले के चिकसाना पुलिस थाने में दर्ज करा दिया. थानाप्रभारी रामनाथ सिंह गुर्जर ने इस मामले की जांच खुद अपने हाथ में ले ली. मृतक जितेंद्र के पिता नत्थी सिंह की मौत हो चुकी थी. जितेंद्र शादीशुदा था. करीब 9 महीने पहले उस की शादी ज्योति से हुई थी. ज्योति के साथ वह खुश था. पतिपत्नी में किसी तरह की कोई अनबन नहीं थी. दोनों का दांपत्य जीवन सुखी था.

परिवार में केवल 2 ही प्राणी थे. जितेंद्र की मां गीता और उस की पत्नी ज्योति. पुलिस ने इन दोनों से पूछताछ की, लेकिन न तो कातिलों के बारे में कुछ पता चला और न ही कत्ल के कारण का राज सामने आया. पुलिस ने ओल गांव के लोगों से भी पूछताछ की, लेकिन कोई खास बात पता नहीं चली. यह बात जरूर पता चली कि जितेंद्र के घर उस की 2 शादीशुदा बहनों और बहनोइयों का आनाजाना रहता था. पुलिस ने दोनों बहनोइयों विपिन और सुनील से भी पूछताछ की, लेकिन जितेंद्र की हत्या के बारे में ऐसा कोई सुराग नहीं मिला, जिस से कातिलों तक पहुंचा जा सके.

जांचपड़ताल में मृतक जितेंद्र की किसी से दुश्मनी या खराब चालचलन की बात भी सामने नहीं आई. यह पता चला कि जितेंद्र शराब पीने का आदी था. शराब पी कर वह घर में क्लेश और अपनी मां से मारपीट करता था. जितेंद्र के घर वालों और गांव वालों से पूछताछ में कोई बात पता नहीं चलने पर पुलिस ने ओल गांव से कोलीपुरा तक 2 किलोमीटर के दायरे में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने का फैसला किया.

सीसीटीवी फुटेज में एक पलसर बाइक पुलिस के संदेह के दायरे में आई. पुलिस ने नंबरों के आधार पर इस बाइक के मालिक का पता लगाया. इस के बाद पुलिस ने महेंद्र ठाकुर को पकड़ा. वह मथुरा जिले के फरह थानांतर्गत परखम गांव का रहने वाला है. सख्ती से पूछताछ में महेंद्र ठाकुर ने जितेंद्र की हत्या का राज उगल दिया. उस ने जो बताया, उस से पुलिस को भी एक बार तो भरोसा नहीं हुआ कि कोई मां भी अपने बेटे को मरवा सकती है.

पुलिस ने महेंद्र ठाकुर को गिरफ्तार कर लिया. उस से पूछताछ के आधार पर मृतक के बहनोई विपिन को भी गिरफ्तार कर लिया. विपिन मथुरा जिले के फरह थाना इलाके के गांव सनोरा का रहने वाला है. विपिन से पूछताछ के बाद पुलिस ने पहली अप्रैल को जितेंद्र की मां गीता देवी को भी गिरफ्तार कर लिया. इन से पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह एक मां की अपनी कोख से पैदा किए एकलौते बेटे के प्रति नफरत की इंतहा की कहानी है. मथुरा जिले के ओल गांव के रहने वाले नत्थी सिंह के परिवार में उस की पत्नी गीता देवी के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा था. नत्थी के पास खेतीबाड़ी थी. इस से अच्छी गुजरबसर हो जाती थी. घरपरिवार में मौज थी. किसी तरह की कोई कमी नहीं थी.

नत्थी सिंह की कुछ साल पहले मृत्यु हो गई. गीता देवी पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई. दोनों बेटियां जवान हो रही थीं. इसलिए उसे उन के हाथ पीले करने की ज्यादा फिक्र थी. रिश्तेदारों से पूछ परखने के बाद उस ने अपनी दोनों बेटियों की शादी पास के ही गांव सनोरा में एक ही परिवार में तय कर दी. सनोरा गांव भी मथुरा जिले के फरह थाना इलाके में आता है. गीता ने सनोरा गांव के रहने वाले विपिन से बड़ी बेटी की शादी कर दी और विपिन के

छोटे भाई सुनील से छोटी बेटी की शादी कर दी. बेटियों की शादी के बाद गीता देवी के सिर से एक बोझ सा उतर गया. उस की आधी चिंता खत्म हो गई. दोनों बेटियां पास के ही गांव में ब्याही थीं, इसलिए उन का जब मन होता, मां गीता के पास आ जाती थीं. गीता का दोनों बेटियों से ज्यादा मोह था. इसलिए बेटी या जमाई आते तो वह खुले हाथ से उन पर पैसे खर्च करती थी. उन्हें दान या शगुन देने में कोई कंजूसी नहीं करती थी.

कभी कोई दुखतकलीफ होती तो गीता फोन कर दोनों में से किसी भी बेटी को अपने पास बुला लेती. 2-4 दिन रुक कर वे चली जातीं. गीता का मन अपनी बेटियों में ज्यादा लगता था. होने को तो वे जितेंद्र की ही बहनें थी, लेकिन मां का बेटियों के प्रति लाडप्यार देख कर जितेंद्र को कोफ्त होती थी. जितेंद्र शराब पीता था. उस की इस बुरी लत पर मां टोकती थी. बहनें जब घर पर होतीं, तो वे भी जितेंद्र को लताड़ लगाती थीं. मां और बहनों के टोकने पर उसे बुरा लगता था. ऐसा 1-2 बार नहीं, बीसियों बार हुआ. धीरेधीरे जितेंद्र के मन में मां और बहनों के प्रति गुस्सा बढ़ने लगा.

शराब पीने के बाद जितेंद्र कई बार अपनी मां से मारपीट करने लगा. पहले तो मां और बहनबहनोइयों ने उसे समझाया, लेकिन उस के दिमाग में यह बात बैठ गई कि मां उस से ज्यादा प्यार दोनों बहनों को करती है. इस से जितेंद्र के मन में हीनभावना बढ़ती गई. वह मां की बातों पर ऐतराज जताने लगा. मां जब अपनी बेटियों और जमाई को पैसे या कोई सामान देती तो जितेंद्र को बुरा लगता था. वह घर में मां से झगड़ा करता और उसे पीटता था.

बुढ़ापे की ओर बढ़ रही गीता बेटे की रोजरोज की पिटाई को आखिर कब तक बरदाश्त करती. घर में हालत यह हो गए कि मां और बेटा दोनों एकदूसरे से नफरत करने लगे. दोनों नफरत की आग में जलते थे. जितेंद्र तो अपनी नफरत की आग को मां की पिटाई कर शांत कर लेता था, लेकिन गीता क्या करती? वह जवान बेटे का मुकाबला भी नहीं कर सकती थी.

एक दिन गीता ने अपने बड़े जमाई विपिन को घर बुला कर सारी बातें बताईं. विपिन को पहले से ही अपने साले जितेंद्र की सारी हरकतों के बारे में पता था. विपिन को यह भी पता था कि जितेंद्र को समझानेबुझाने का कोई फायदा नहीं है. उस ने अपनी सास को कोई न कोई रास्ता निकालने का भरोसा दिया और यह सुझाव दिया कि जितेंद्र की शादी कर दी जाए. हो सकता है शादी के बाद वह सुधर जाए.

गीता को भी यह बात ठीक लगी. उस ने रिश्ता ढूंढ कर पिछले साल जितेंद्र की शादी कर दी. ज्योति से उस की शादी धूमधाम से हो गई. गीता ने सोचा था कि शादी के बाद बेटा सुधर जाएगा. शादी का लड्डू खा कर जितेंद्र ज्योति के साथ खुश था. इसी हंसीखुशी के बीच, शादी के कुछ समय बाद ही ज्योति गर्भवती हो गई. ज्योति के गर्भवती होने से जितेंद्र खुश था, लेकिन गीता के मन में इस की जरा भी खुशी नहीं थी. बेटे के अत्याचारों से नफरत की आग में सुलगती गीता नहीं चाहती थी कि घर में कोई नया वारिस आए. इसलिए उस ने बहू ज्योति को भरोसे में ले कर उस का ढाई महीने का गर्भपात करा दिया.

दरअसल, गीता के पास करीब 50 लाख रुपए की संपत्ति थी. यह संपत्ति वह अपनी दोनों बेटियों को देना चाहती थी. बेटे जितेंद्र को संपत्ति में से फूटी कौड़ी भी नहीं देना चाहती थी. जितेंद्र जब गीता को पीटता था, तो वह कई बार यह बात कह चुकी थी. जितेंद्र को भी इस का अंदेशा था कि पैतृक संपत्ति में से मां उसे कुछ नहीं देगी. इसीलिए वह मां पर अत्याचार और अपनी बहनों का विरोध करता था. शादी के बाद भी बेटा जितेंद्र नहीं सुधरा. वह अपनी मां पर अत्याचार करता रहा, तो गीता उस से तंग आ गई. उस ने अपने बड़े जमाई विपिन के साथ मिल कर जितेंद्र की रोजरोज की पिटाई से छुटकारा पाने के लिए उस का काम तमाम करने की योजना बनाई.

विपिन को इस में अपना फायदा नजर आया. एक तो जितेंद्र मां के लाडप्यार के कारण अपनी बहनों से भी नफरत करता था. इसलिए विपिन ने सोचा कि यदि जितेंद्र नाम का कांटा निकल जाएगा तो नफरत की झाड़ी हमेशा के लिए कट जाएगी. फिर सास गीता भी बेटे की रोज की पिटाई से बच जाएगी. इस के अलावा गीता की संपत्ति भी उस के हाथ में आ जाएगी. विपिन ने अपनी सास के भरोसे का फायदा उठाया. योजना के तहत, उस ने सास का खाता अपने नजदीकी बैंक में ट्रांसफर करवा लिया और खुद नौमिनी बन गया. गीता के बैंक खाते में करीब 7 लाख रुपए थे.

गीता ने विपिन की मदद से इसी साल जनवरी महीने में मथुरा जिले के कुख्यात सुपारी किलर छविराम ठाकुर के गैंग को अपने बेटे जितेंद्र की हत्या की 3 लाख रुपए की सुपारी दे दी. उसी दिन एडवांस के रूप में उसे 50 हजार रुपए भी दे दिए. छविराम ठाकुर ने अपनी गैंग के शार्पशूटर महेंद्र ठाकुर को जितेंद्र की हत्या का जिम्मा सौंप दिया.

योजनाबद्ध तरीके से महेंद्र ठाकुर ने शराब पिलाने के बहाने जितेंद्र से दोस्ती की. इस के बाद 20 मार्च की शाम महेंद्र ने जितेंद्र को बुलाया. महेंद्र के साथ एकदो लोग और भी थे. उन्होंने कोलीपुरा गांव के पास ठेके से शराब खरीदी. इन सभी ने पास ही एक खाली खेत में बैठ कर शराब पी. रात करीब 8-साढ़े 8 बजे शराब का दौर खत्म हुआ तो जितेंद्र ने अपने घर जाने की बात कही. महेंद्र ने उसे पकड़ कर वापस बैठा लिया और तमंचा निकाल कर उस की कनपटी पर गोली मार दी. जितेंद्र कुछ बोलता, उस से पहले ही उस के प्राण निकल गए.

सीसीटीवी फुटेज के आधार पर महेंद्र ठाकुर की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने जितेंद्र की हत्या के मामले में उस के बहनोई विपिन और मां गीता को भी गिरफ्तार कर लिया. गीता को अपने ही बेटे की हत्या कराने का कतई मलाल नहीं था. उस ने कहा, ‘‘मैं ने उसे जनम दिया और मैं ने ही उसे मरवा दिया, इस का कोई अफसोस नहीं है. पति की मौत के बाद दोनों बेटियां ही मेरा खयाल रखती  थीं. बेटा तो रोज पैसे मांगता और मारपीट करता था. कभी बेटियां मेरे पास आ जातीं, तो वह उन का विरोध करता था.

‘‘वह मेरे बैंक खाते और सारी संपत्ति का अकेला ही मालिक बनना चाहता था. मैं ने उसे कई बार समझाया, लेकिन वह किसी भी कीमत पर दोनों बहनों को स्वीकार नहीं करता था. मैं उस की रोजरोज की कलह से तंग आ गई थी. इसलिए उसे रास्ते से हटाना ही उचित समझा. कोई नया वारिस न आए, इसलिए बहू ज्योति का भी गर्भपात करा दिया.’’ सभी आरोपियों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. Rajasthan Crime Story

UP Crime: शक का कीड़ा

UP Crime: पत्नी सलीमा के चरित्र को ले कर आलमगीर के मन में ऐसा शक बैठ गया कि वह उस से उबर नहीं पा रहा था. इसी बीच एक युवती से आलमगीर की ऐसी नजदीकी बढ़ी कि उस से निकाह की खातिर वह एक खौफनाक गुनाह कर बैठा.

उत्तर प्रदेश के जिला बागपत के थाना रमाला के किरठल गांव में सूरज की किरणें फूटने के साथ ही कोहराम मच गया था. इस की वजह थी एक लोमहर्षक वारदात, जो इतनी बड़ी थी कि पूरे गांव में मातम छा गया था. दरअसल, इसी गांव में रहने वाले आलमगीर के परिवार में पत्नी सलीमा के अलावा 4 बच्चे थे. आलमगीर अपने परिवार के साथ अलग रहता था, जबकि उस के पिता दिलशेर तथा भाई और बहन वाजिदा एकसाथ अलग घर में रहते थे. उस के 2 भाई वासिद और आलम दिल्ली में रह कर खराद का काम करते थे. एक भाई वाजिद गांव में ही रह कर दूध का काम करता था.

भाईबहनों में आलमगीर सब से बड़ा था. उस की बड़ी बेटी साहिबा अपने चाचा वासिद के पास दिल्ली गई हुई थी. उस की माली हालत कोई खास नहीं थी. किसी तरह मेहनत कर के वह परिवार को पाल रहा था. आलम ही नहीं, उस के पिता और भाइयों की स्थिति भी उसी जैसी थी. आलम के बच्चे गांव के मदरसे में पढ़ने जाते थे. 9 अप्रैल, 2015 की सुबह जब वे मदरसे में पढ़ने नहीं पहुंचे तो मौलवी ने आलमगीर की बेटी करीना की सहपाठीसहेली 10 वर्षीया सना को उन्हें बुलाने के लिए भेजा. सना भागती हुई मोहल्ला मूलेजाट स्थित आलमगीर के घर पहुंची तो दरवाजा खुला हुआ था. वह आवाज लगाते हुए जितनी तेजी से अंदर दाखिल हुई, उतनी ही तेजी से चिल्लाते हुए बाहर आ गई.

आलमगीर की बहन वाजिदा उधर से गुजर रही थी, सना की आवाज सुन कर उस के कदम ठिठक गए. उस ने पूछा, ‘‘क्या हुआ बेटा?’’

डरीसहमी सना के गले से शब्द नहीं फूटे. उस ने घर की ओर इशारा कर दिया. अब तक कुछ और लोग आ चुके थे. माजरा समझने के लिए वे अंदर पहुंचे तो उन के होश उड़ गए. घर के अंदर 1-2 नहीं, 4 लाशें पड़ी थीं. दिल दहला देने वाले इस खूनी मंजर की सूचना किसी ने पुलिस को दी तो थाना रमाला के थानाप्रभारी राजेंद्र सिंह कुछ पुलिसकर्मियों के साथ मौके पर पहुंच गए. घटनास्थल के मुआयना में पुलिस ने देखा कि 35 वर्षीया सलीमा, उस की 2 बेटियां 13 वर्षीया करीना, 6 वर्षीया यासमीन और 8 वर्षीय बेटे सूफियान की हत्या किसी धारदार हथियार से की गई थी.

घर के अंदर बाहरी कमरे में तख्त पर करीना की लाश पड़ी थी जबकि अंदर के कमरे में एक चारपाई पर सलीमा, सूफियान और यासमीन की लाशें पड़ी थीं. थानाप्रभारी राजेंद्र सिंह ने हत्याकांड की खबर अपने आला अधिकारियों को दी तो एएसपी विद्यासागर मिश्र, डीएसपी (बड़ौत) सी.पी. सिंह, डीएसपी (रमाला) राहुल मिठास, थानाप्रभारी (बड़ौत) राजेश वर्मा, अपराध शाखा के प्रभारी सतीशचंद्र और एडीएम यशवर्धन श्रीवास्तव भी घटनास्थल पर आ पहुंचे. 4 हत्याओं की चर्चा मेरठ मंडल में फैल चुकी थी, इसलिए मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा ओर डीआईजी रमित शर्मा भी मौके पर आ पहुंचे. आलमगीर ड्राइवर था और नजदीकी जिला मुजफ्फरनगर में प्राइवेट बस चलाता था. वह हफ्ता 10 दिन में घर आता था.

उस समय आलमगीर घर में नहीं था, इसलिए घर वालों ने फोन कर के उसे घटना की सूचना दे दी. कुछ ही घंटे में वह आ गया. पत्नी और बच्चों की मौत से उस की हालत पागलों जैसी हो गई थी. पुलिस अधिकारियों ने आपस में विचारविमर्श किया. सभी का अनुमान था कि हत्या से पहले मृतकों को खाने में कोई नशीला पदार्थ दिया गया था, जिस के बाद वे बेहोश हो गए तो उन के गले काटे गए. हत्या का तरीका एक जैसा था. सभी के गले के बीचोबीच वार किए गए थे. इस से यही लगता था कि हत्यारे के मन में मृतकों के प्रति काफी नफरत थी.

आसपड़ोस के किसी भी आदमी को हत्या के बारे में बिलकुल पता नहीं चल सका था. किसी को आतेजाते भी नहीं देखा गया था. आलम का रोरो कर बुरा हाल था. वह बारबार लाशों से लिपटे जा रहा था. हर कोई उसे दिलासा दे रहा था. पुलिस ने दिलासा दे कर उस से पूछा, ‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’

कुछ पल खामोश रहने के बाद उस ने शून्य में ताकते हुए कहा, ‘‘नहीं साहब.’’

‘‘तुम आखिरी बार घर कब आए थे?’’

‘‘पिछले सप्ताह 29 तारीख को आया था साहब. पता नहीं किस से मेरे बच्चों की क्या दुश्मनी थी, जो उस ने इन्हें मार दिया. अल्लाह उसे कभी माफ नहीं करेगा.’’ आलमगीर ने बिलखते हुए कहा.

‘‘सलीमा से तुम्हारी कब बात हुई थी?’’

‘‘2 दिनों पहले उस का फोन आया था. कह रही थी कि सूफियान की तबीयत खराब है. मैं ने कहा था कि उसे दवा दिला दो, मैं जल्दी ही घर आऊंगा.’’

इतना कह कर वह एक बार फिर फूटफूट कर रोने लगा. हालात और गम की वजह से उस से ज्यादा पूछताछ नहीं की जा सकती थी, इसलिए पुलिस अन्य लोगों से पूछताछ करने लगी. लोगों से पता चला कि आलम काफी व्यवहारकुशल आदमी था. गांव में उस की किसी से कोई अनबन नहीं थी. पुलिस का अनुमान था कि हत्यारा परिवार का ही कोई करीबी हो सकता है. इस की कुछ वजह भी थीं. जैसे कि घर में सब्जियों से सनी खाने की पैकिंग पौलीथिन घर के कोने में कूड़े पर पड़ी थीं. घर के आंगन में जो चूल्हा था, उस में राख नहीं थी. इस का मतलब वह पिछली रात नहीं जलाया गया था. साफ था रात का खाना बाहर से आया था.

सलीमा घर का दरवाजा अंदर से बंद कर के ही सोती रही होगी. किसी अंजान के लिए वह दरवाजा खोल नहीं सकती थी. घर में लूटपाट का भी कोई निशान नहीं था. मोबाइल भी घर में ही रखा था. इस के अलावा मृतका करीना के कमरे में एक अन्य चारपाई पर बिस्तर लगा था. संभवत: वह किसी करीबी के सोने के लिए ही लगाया गया होगा. पूरी आशंका थी कि उसी ने खाने में कोई नशीली चीज दे कर पहले सभी को बेहोश किया होगा, उस के बाद इत्मीनान से सभी की हत्या की होगी. बेहोश होने की वजह से कोई विरोध नहीं कर सका. करीना के हाथ पेट पर रखे थे, सलीमा के हाथ सीने पर थे, जबकि अन्य दोनों बच्चों के हाथ सिर के नीचे थे.

किसी अंजान के लिए जिस का मकसद मात्र कत्ल करना था, उस के लिए न दरवाजा खोला जाता, न बिस्तर लगाया जाता और न ही वह खाना बाहर से ले कर आता. ऐसे में कातिल आलमगीर का कोई रिश्तेदार या खास ही हो सकता था. लेकिन यह बात समझ से बाहर थी कि कोई इस तरह का आदमी पूरे परिवार को इस तरह क्यों खत्म करेगा? बहरहाल पुलिस ने जरूरी सामान को अपने कब्जे में ले लिया और लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. हत्याओं में इस्तेमाल किया गया हथियार बरामद नहीं किया जा सका था. इस के बाद थाने आ कर आलमगीर के पिता दिलशेर की तरफ से अज्ञात हत्यारे के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया और पुलिस जांच में जुट गई.

4 हत्याओं की इस घटना से जिले में सनसनी फैल गई थी. अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद लाशें गांव लाई गईं. जब 4-4 जनाजे एकसाथ निकले तो लोगों की आंखें नम हो गईं. बच्चे बड़े सभी दुखी थे. हर कोई कातिल को कोस रहा था. गमगीन माहौल के बीच चारों लाशों को दफना दिया गया. दुख का पहाड़ आलमगीर पर टूटा था. इस दौरान वह रोरो कर बेहोश भी हो जाता था. गांव के बुजुर्ग उसे दिलासा दे रहे थे, ‘‘सब्र रखो आलम, अल्लाह को शायद यही मंजूर था.’’

पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को मिली तो सभी की मौत की वजह सांस की नली कटना बताया गया. मृतकों के सिर पर भी किसी भारी चीज से प्रहार किए गए थे. पुलिस ने आलमगीर और सलीमा की काल डिटेल्स निकलवाई. सलीमा के नंबर पर आलमगीर की 2 दिन पहले बात हुई थी लेकिन आलमगीर की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा था, जिस पर उस की बहुत ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर गाजियाबाद की एक युवती का था. पुलिस ने गाजियाबाद जा कर उस युवती से पूछताछ की तो उस ने बताया कि आलमगीर से उस के गहरे ताल्लुकात थे. दोनों के बीच प्रेमप्रसंग था, इसलिए दोनों बातें किया करते थे.

पुलिस उस वक्त चौंकी जब आलमगीर के मोबाइल की लोकेशन सुबह के 4 बजे तक गांव में ही मिली. इस का मतलब हत्या वाली रात वह गांव में ही था, जबकि उस ने बताया था कि वह गांव नहीं आया था. पुलिस के शक की सुई उसी पर जा कर ठहर गई. पुलिस ने बिना देर किए उसे हिरासत में ले लिया और थाने ले आई. थाने में पूछताछ की जाने लगी तो वह रोने और बेहोश होने का नाटक करने लगा. पुलिस जानती थी कि यह नाटक कर रहा है इसलिए उस से सख्ती से पेश आया गया. इस के बाद उस ने चौंकाने वाला जो खुलासा किया, एकबारगी पुलिस को भी विश्वास नहीं हुआ. किसी और ने नहीं, बल्कि आलमगीर ने ही पत्नी और अपने तीनों बच्चों की हत्या की थी. अब सवाल यह था कि आलमगीर ने अपनी ही पत्नी और प्राणों से प्यारे बच्चों की हत्या क्यों की? वह इतना कू्रर कैसे बन गया? इन सारे सवालों के जवाब उस की इस कहानी में छिपे हैं.

आलमगीर का विवाह सलीमा के साथ सन 2000 में हुआ था. सलीमा झारखंड राज्य के रांची शहर के मोहल्ला बडयातू की रहने वाली थी. सलीमा के पिता नहीं थे. उस का भाई महमूद दूरसंचार विभाग में नौकरी करता था. शादी के बाद सलीमा अपने मायके बहुत कम जाती थी. उस का भाई 2-3 सालों में उस से मिलने आ जाता था. विवाह होते ही आलमगीर पिता से अलग रहने लगा था. समय के साथ सलीमा 4 बच्चों की मां बनी. आलमगीर ड्राइवर था. वह प्राइवेट बस चलाता था. वह अकसर बाहर रहता था. बाद में वह मुजफ्फरनगर रूट पर बस चलाने लगा.

परिवार बड़ा था, जिस का खर्च पूरा करने के लिए उसे दिनरात मेहनत करनी पड़ती थी. उस की इतनी कमाई नहीं थी जिस से बच्चों को अच्छी तालीम दिला सके. इसलिए बच्चे गांव के मदरसे में तालीम ले रहे थे. सलीमा हंसमुख स्वभाव की थी, हर किसी से मुसकरा कर बात करती थी. आलमगीर को उस का यह व्यवहार बहुत खलता था. यहां तक कि उसे अपने पिता से भी सलीमा का इस तरह बात करना पसंद नहीं था. उस ने सलीमा को कई बार टोका. जब उस की आदत नहीं बदली तो उसे उस पर शक होने लगा.

वह 8-10 दिनों में ही घर आ पाता था. वह जितना दूर रहता था, उतना ही सलीमा के बारे में सोचता रहता था कि पत्नी कहीं चरित्रहीन तो नहीं है. वह जितना सोचता, उस का शक उतना ही बढ़ता गया. एक दिन उस ने शराब पी कर इस बात को ले कर झगड़ा किया तो सलीमा ने अपना सिर थाम लिया, ‘‘या अल्लाह, कैसी तोहमत लगा रहे हो, कुछ तो शरम करो?’’

‘‘शरम तो तुम्हें करनी चाहिए. तुम जब से मेरी जिंदगी में आई हो, मुझे तभी से तुम्हारे ऊपर शक है.’’

नशे में आलमगीर ने न जाने क्याक्या कह डाला. इस के बाद तो यह सिलसिला सा बन गया. शक्की आदमी को कितना भी समझाओ, विश्वास दिलाओ उस का शक दूर नहीं होता. ऐसा ही आलमगीर के साथ भी था.

एक बार आलमगीर करीब 20 दिनों बाद घर आया तो सलीमा से उस का झगड़ा हो गया. इस से उसे लगा कि सलीमा ने उस से जानबूझ कर झगड़ा किया है. शायद उस का घर आना उसे अच्छा नहीं लगता. अब आए दिन ऐसी बातों पर तकरार होने लगी. सलीमा इस बात से बहुत आहत थी. फिर भी क्लेश के बीच जिंदगी और दिन बीतते रहे. एक साल पहले की बात है. आलमगीर घर आया हुआ था. एक दिन शाम को वह मोबाइल घर पर ही छोड़ कर गांव में घूमने निकल गया. तभी उस का मोबाइल बजा तो सलीमा ने फोन रिसीव कर लिया. वह कुछ कहती, उस के पहले ही दूसरी ओर से कोई लड़की नाराजगी के लहजे में कहने लगी, ‘‘आलम, 2 दिन हो गए तुम ने मुझ से कोई बात नहीं की. मेरा दिल नहीं लग रहा है.

बीवी में इतना खो गए हो कि मेरा खयाल ही नहीं आ रहा है.’’

यह सुन कर सलीमा के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह खामोश रही. दूसरी ओर से फिर कहा गया, ‘‘कुछ बोलते क्यों नहीं? मेरी मोहब्बत का इम्तिहान क्यों ले रहे हो?’’

सलीमा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. वह भड़क उठी, ‘‘मैं आलमगीर की बीवी बोल रही हूं. तू कौन है, जो मेरा घर बरबाद करना चाहती है. तुझे शरम नहीं आती, बेहया…’’

उस के इतना कहते ही दूसरी ओर से फोन काट दिया गया. सलीमा गुस्से में बड़बड़ाती रही. सलीमा को बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि जो आदमी उस पर झूठा शक करता है, वह खुद इस तरह का काम कर सकता है. वह गुस्से से भरी बैठी थी. आलम के आते ही उस ने जम कर खरीखोटी सुनाई. बीवी पर शक करने वाला आलमगीर सन्न रह गया. उस ने टालने की कोशिश की, लेकिन सलीमा ने बखेड़ा खड़ा कर दिया. इस के बाद घर में अकसर कलह रहने लगी. दोनों एकदूसरे पर आरोप लगाते रहते. धीरेधीरे मनमुटाव और झगड़ा इतना बढ़ गया कि दोनों के बीच मारपीट होने लगी. सलीमा को पता चल गया था कि आलमगीर गाजियाबाद की किसी युवती से प्रेम करता है और उस के साथ निकाह करना चाहता है.

दूसरी ओर आलम को जो सलीमा पर शक था, वह बढ़ता ही गया. एक दिन उस ने कुछ कहा तो सलीमा ने उसे झिड़क दिया, ‘‘तुम अपने दिमाग का इलाज क्यों नहीं करा लेते. ऐसी बातें करोगे तो अल्लाह भी तुम्हें माफ नहीं करेगा. खराब तुम खुद हो, इसलिए मुझ पर शक करते हो.’’

‘‘मैं रोजरोज के झगड़ों से तंग आ गया हूं. अब मैं यह सब बरदाश्त नहीं कर सकता.’’

‘‘तो तुम क्या करोगे?’’ सलीमा चीखी.

‘‘मुझे भी नहीं पता, लेकिन मेरा शक गलत नहीं है.’’

‘‘और तुम जो हम से अलग गुलछर्रे उड़ा रहे हो, उस का क्या? गलत काम खुद करते हो और हमारे ऊपर झूठी तोहमत लगाते हो.’’

आलमगीर लड़झगड़ कर शांत हो गया लेकिन शक उस के दिमाग से निकला नहीं. शक इंसान को अंधा कर देता है. वक्त के साथ उसे इस बात का शक हो गया कि चारों बच्चे उस के नहीं है. अब वह मन ही मन सलीमा ही नहीं बच्चों से भी नफरत करने लगा. प्रेमिका के लिए उस के मन में मोहब्बत बढ़ने लगी और वह उस के साथ निकाह के सपने देखने लगा. आलमगीर ने सोचा कि वह पत्नी और बच्चों को रास्ते से हटा दे तो उस के शक का समाधान भी हो जाएगा और उस के बाद प्रेमिका से निकाह कर के आराम से रहेगा. उस का यह इरादा घर बरबाद करने वाला था लेकिन शक में उस की मति मारी गई थी. वह जब भी घर आता, सलीमा से जरूर झगड़ता था.

मन ही मन उस ने पत्नी और बच्चों को मारने का खतरनाक फैसला ले लिया. एक दिन वह जहर ले आया और शाम को दूध में मिला दिया. वह अपना काम कर पाता, इस के पहले ही कुछ रिश्तेदार आ गए. जिस की वजह से उस का काम नहीं हो पाया. उस ने दूध में छिपकली गिरने की बात कह कर सारा दूध नाली में फेंक दिया. उस के इरादों से उस की प्रेमिका पूरी तरह अंजान थी. जबकि वह ठान चुका था कि सभी को मार कर ही रहेगा. एक दिन वह घर में रखी दरांती अपने साथ ले गया और उस पर धार लगवा कर उसे तेज करा लाया. उस ने सोचा कि इस बार पूरी तैयारी कर के सभी को खत्म कर देगा.

अप्रैल के पहले सप्ताह की बात है. उस ने बस पर अपने साथ रहने वाले परिचालक से गेहूं में रखने की बात कह कर सल्फास मंगवा लिया. सल्फास की गोलियां गांवों में अकसर गेहूं को कीड़ों से बचाने के लिए उस के बीच रखी जाती हैं. सल्फास उसे आसानी से मिल गया. उस ने तय कर लिया कि इस बार वह जब भी घर जाएगा, सभी को खत्म कर देगा. पहले वह मोबाइल से बच्चों से बात कर लिया करता था, लेकिन इधर उस ने ऐसा करना कम कर दिया था. 6 अप्रैल को सलीमा ने उसे फोन किया कि बेटे की तबीयत खराब है. उस ने उसे दवा दिलाने की बात कही तो उस दिन भी दोनों के बीच फोन पर ही झगड़ा हुआ.

इस के बाद उस ने 8 अप्रैल को सभी को खत्म कर देने का विचार बना लिया. अकसर वह घर आने से पहले फोन कर देता था. लेकिन उस दिन उस ने जानबूझ कर फोन नहीं किया. उस ने आते समय शाम का खाना एक ढाबे से पैक कराया और कोल्डड्रिंक की बोतल भी खरीदीं. इस के बाद वह घर पहुंच गया. शाम ढलते ही गांव में लोग सो जाते हैं, इसलिए किसी ने उसे घर आते नहीं देखा. सलीमा ने तब तक खाना नहीं बनाया था. उस ने खाना दे कर सलीमा से उस दिन बहुत प्यार से कहा, ‘‘सभी को खाना परोस कर दे दो. मैं भी बेवजह तुम पर शक करता हूं.’’

सलीमा को लगा कि आलमगीर को अपनी गलती का अहसास हो गया है. परिवार खुश रहे किसी औरत के लिए इस से अच्छी बात और क्या हो सकती है. वह खुश हो गई. उस ने खाना लगाया तो सब ने साथ मिल कर खाया. सलीमा और बच्चों ने सभी के सोने के लिए बिस्तर लगा दिए. किसी को अंदाजा नहीं था कि आलमगीर के सिर पर शैतान सवार है और वह सभी की आखिरी रात है. वह कोल्डड्रिंक की जो बोतल लाया था, उस में सल्फास की गोलियां डाल कर मिला दीं और सभी को पिला दी. आलमगीर ने कोल्डड्रिंक नहीं पी. इस के बाद सभी सोने चले गए. आलमगीर भी बिस्तर पर लेट गया लेकिन उसे भला नींद कैसे आती.

सभी सो चुके थे. रात 11 बजे जब उसे लगा कि सभी गहरी नींद सो गए हैं और जहर अपना असर दिखा चुका होगा तो उस ने घर में रखी दराती और एक हथौड़ा निकाला. कपड़ों पर खून के दाग न लगें इस के लिए उस ने अपने सारे कपड़े उतार दिए. वह सिर्फ अंडरवियर पहने था. वह सलीमा के नजदीक पहुंचा और हथौड़े से उस के सिर पर वार किया. वह पहले से ही बेहोश थी, इसलिए चीखपुकार का कोई सवाल नहीं था. फिर उस ने दरांती से उस का गला काट दिया. इस के बाद उस ने एकएक कर के तीनों बच्चों सूफियान, यासमीन और करीना को भी मार दिया. हैवान बने आलमगीर को अपने बच्चों पर जरा भी दया नहीं आई. जब उसे इत्मीनान हो गया कि सभी मर चुके हैं तो उस ने खून सने हाथ और मुंह पर लगे खून को साफ किया और बिस्तर पर आ कर लेट गया.

सुबह 4 बजे उस ने दरांती और हथौड़ा चादर में लपेट कर साथ लिया और घर से निकल गया. यह संयोग ही था कि उसे जाते हुए भी किसी ने नहीं देखा. गांव के बाहर एक खेत में उस ने दरांती और हथौड़ा छिपा दिया. इस के बाद दिन निकलने का इंतजार करने लगा. सुबह उजाला होने पर वह मुजफ्फरनगर चला गया और घर से हत्याओं की सूचना आने का इंतजार करने लगा. सूचना मिलने पर वह गांव पहुंचा और दुखी होने का सफल नाटक किया. हर किसी की हमदर्दी आलमगीर के साथ थी. किसी को अंदाजा नहीं था कि वह इतना खतरनाक काम भी कर सकता है. उस ने नाटक तो बहुत बढि़या किया, लेकिन पुलिस के शिकंजे से बच नहीं सका.

पुलिस ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त दरांती और हथौड़ा भी बरामद कर लिया. एसपी शरद सचान ने प्रेसवार्ता कर हत्याकांड का खुलासा किया. आलमगीर की करतूत पर हर कोई हैरान था. पुलिस ने उस की प्रेमिका से भी पूछताछ की लेकिन वह आलमगीर की योजना से अंजान थी, इसलिए निर्दोष मान कर उसे छोड़ दिया गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने आलमगीर को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

अब उस के घर वालों तथा नातेरिश्तेदारों ने निर्णय लिया है कि उस ने हैवानियत भरा जो काम किया है, इस के लिए उस की कोई पैरवी नहीं करेगा. उस के पिता दिलशेर का कहना था कि उसे बेटे की गंदी सोच और गुनाह का हमेशा अफसोस रहेगा. कथा लिखे जाने तक आलमगीर जेल में था. उस की जमानत नहीं हो सकी थी. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Family Dispute: तीसरे शौहर की तीसरी बीवी

Family Dispute: शफीक की तीसरी बीवी नगमा उस के निकम्मेपन से तो परेशान थी ही, उस ने उस की मां के 5 लाख रुपए भी हड़प लिए थे. ऐसे पति से छुटकारा पाने के लिए उस ने जो किया, क्या वह उचित था?

24 वर्षीया नगमा खान अपने मातापिता की एकलौती संतान थी. नगमा के पैदा होने के कुछ दिनों बाद ही पिता का साया उस के सिर से उठ गया था. मां ने छोटामोटा काम कर के उस की परवरिश की. बिना बाप की बेटी नगमा पर मोहल्ले के तमाम लड़कों की नजरें टिकी रहती थीं. बेटी के साथ कहीं कुछ ऐसावैसा न हो जाए, यह सोच कर मां ने जल्दी ही उस का निकाह आसिफ खान से करा दिया. आसिफ खान अशफाक खान का बेटा था. परिवार में पत्नी के अलावा 4 बेटे और बेटियां थीं. सभी बेटों और बेटियों का उन्होंने निकाह कर दिया था. परिवार में सुमति थी, लेकिन परिवार बड़ा होने की वजह से सभी अपनेअपने बालबच्चों के साथ अलगअलग घरों में रहते थे.

अशफाक खान के बेटों में पहला तौकीर खान, दूसरा तौफीक खान, तीसरा शफीक खान और चौथा बेटा आसिफ खान था. उन के चारों बेटों में शफीक खान अन्य भाइयों से अलग था. वह कोई कामधंधा करने के बजाय अपने आवारा दोस्तों के साथ दिनभर इधरउधर आवारागर्दी किया करता था. रंगीनमिजाज होने की वजह से शफीक ने 3-3 शादियां की थीं. उस के व्यवहार से तंग आ कर उस की पहले की दोनों बीवियां उसे छोड़ कर अपनेअपने मायके में रह रही थीं. 6 महीने से वह अपनी तीसरी बीवी नगमा के साथ किराए के मकान में रह रहा था. नगमा शफीक के छोटे भाई आसिफ की बीवी थी. लेकिन उस से उस का तलाक हो चुका था. तब शफीक ने उस से तीसरी शादी कर ली थी.

नगमा और आसिफ खान का जब निकाह हुआ था, तब कुछ दिनों तक तो दोनों ठीकठाक, हंसीखुशी से रहे. लेकिन जैसेजैसे समय बीतता गया, वैसेवैसे नगमा की महत्वाकांक्षाएं बढ़ती गईं. अकसर वह पति से किसी न किसी महंगे समान या खानेपीने की चीजों की फरमाइश करने लगी. जबकि आसिफ को यह सब पसंद नहीं था. नगमा की इन्हीं हरकतों से तंग आ कर आखिर एक दिन उस ने नगमा को तलाक दे दिया. आसिफ से आजादी मिलने के बाद कुछ दिनों तक नगमा इधरउधर भटकती रही. इस के बाद उस ने अपने ही मोहल्ले के रहने वाले अपनी उम्र से 5 साल छोटे सरवर उर्फ मोनू से निकाह कर लिया. कुछ दिनों तक तो नगमा सरवर के साथ हंसीखुशी से रही. सरवर ने भी नगमा के हर सुखदुख का ध्यान रखा था. उसी बीच वह एक बेटे की मां बनी.

कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चला, लेकिन कुछ दिनों के बाद नगमा का आकर्षण सरवर के प्रति कम होता गया. दोनों के बीच छोटीछोटी बातों और घरेलू खर्च को ले कर कहासुनी होने लगी थी. इस क्लेश से परेशान हो कर नगमा सरवर का घर छोड़ कर अपनी मां के साथ आ कर रहने लगी. नगमा मां के साथ रह रही थी, तभी उस की मुलाकात पहले शौहर आसिफ के बड़े भाई शफीक से हुई. रंगीनमिजाज शफीक ने अपनी लच्छेदार और मीठीमीठी बातों से नगमा का मन मोह लिया. इस के बाद उस ने यह कह कर नगमा को अपने साथ रख लिया कि वह जल्दी ही उस से निकाह कर लेगा.

इस मामले में नगमा की मां ने उसे बहुत समझाया, लेकिन उस पर शफीक के प्रेम का भूत इस तरह सवार था कि उस ने मां की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया. बिना निकाह किए ही वह शफीक के साथ रहने लगी थी. इस बात का शफीक की दोनों बीवियों ने ही नहीं, घरवालों ने भी विरोध किया, लेकिन शफीक ने सभी के विरोध को नजरअंदाज कर दिया. कुछ दिनों तक शफीक ने नगमा को खूब अच्छी तरह रखा. बाद में एकएक पैसे के लिए मोहताज रहने लगी. अब उसे सरवर को छोड़ कर शफीक के साथ आने का पछतावा होने लगा.

दूसरी एक बात उसे इस से भी ज्यादा परेशान कर रही थी. दरअसल शफीक ने नगमा की मां से 5 लाख रुपए यह कह कर ले लिए थे कि वह उसे एसआरए में चल रही योजना के अंतर्गत घर दिला देगा. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. उस ने वे पैसे भी मौजमस्ती में उड़ा दिए. नगमा जब भी अपनी मां के पैसे लौटाने को कहती, वह उस के साथ मारपीट करने लगता. इस स्थिति में वह जब कभी सरवर से मिलती, उस से सारी परेशानियां बता कर मन का बोझ हलका कर लेती. इसी के साथ उसे छोड़ देने का अफसोस भी जाहिर करती. क्योंकि अब उसे लगता था कि सरवर जैसा भी था, शफीक से तो ठीक ही था.

30 जनवरी की रात साढ़े 10 बजे शफीक घूम कर लौटा तो बैडरूम में नगमा को सरवर के साथ हंसहंस कर बातें करते देखा. इस बात से उस का खून खौल उठा. वह सरवर को गालियां देते हुए उस से मारपीट करने लगा. नगमा को शफीक की यह हरकत अच्छी नहीं लगी. वह दोनों को अलग करने लगी तो शफीक ने उसे भी गाली दे कर गाल पर एक झन्नाटेदार तमाचा जड़ दिया. तमाचा इतना जोरदार था कि नगमा के मुंह से खून निकल आया. नगमा को यह बात बरदाश्त नहीं हुई और वह भी आपा खो बैठी. क्योंकि वह पहले से ही शफीक की हरकतों से परेशान थी. उसी का नतीजा था कि उस ने तुरंत एक क्रूर फैसला ले लिया. वह दौड़ कर बाथरूम में गई और वहां रखी कपड़ा धोने वाली मुंगरी उठा लाई.

शफीक सरवर से उलझा था इसलिए उस ने नगमा की ओर ध्यान नहीं दिया. इसी का फायदा उठा कर नगमा ने पीछे से उस के सिर पर मुंगरी से जोरदार वार कर दिया. वार इतना जोरदार था कि शफीक संभल नहीं सका और लड़खड़ा कर फर्श पर गिर पड़ा. इस के बाद सरवर को मौका मिल गया और वह शफीक पर पिल पड़ा. सरवर ने शफीक को इतना मारा कि वह बेहोश हो गया. नगमा और सरवर ने शफीक के साथ जो किया था, होश आने पर वह उन के साथ कुछ भी कर सकता था. इस से बचने के लिए दोनों ने उस के गले में रस्सी लपेट कर कस दी, जिस से शफीक की मौत हो गई.

शफीक को दोनों ने गुस्से में मार तो दिया, लेकिन गुस्सा शांत हुआ तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ. अब उन्हें जेल जाने का डर सताने लगा. अब उन्हें शफीक की लाश को ठिकाने लगाने की चिंता सताने लगी. काफी सोचविचार कर सरवर शेख ने अपने दोस्त सोहेल मिर्जा को फोन कर के वहां बुलाया और लाश को ठिकाने लगाने में मदद मांगी. सोहेल ने मदद के लिए हामी भर दी तो सरवर और नगमा ने शफीक की लाश को एक चादर में लपेट दिया. इस के बाद सरवर उस लाश को उसी की मोटरसाइकिल से, जो वह अपने भाई की मांग कर लाया था, से रफीकनगर डंपिंग यार्ड में ले आए. लाश की शिनाख्त न हो सके, इस के लिए उन्होंने उस पर पहले मिट्टी का तेल, उस के बाद पेट्रोल डाल कर आग लगा दी.

31 जनवरी की सुबह 8 बजे महानगर मुंबई के उपनगर चेंबूर थाना शिवाजीनगर के सीनियर इंसपेक्टर बाला साहेब जाधव को पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि रफीकनगर के डंपिंग यार्ड में एक लाश जल रही है, जिस के आसपास आग फैली है. सूचना मिलते ही वह तुरंत हरकत में आ गए. तुरंत सारी औपचारिकताएं निभा कर वह सहायक इंसपेक्टर संजय दलवी, विकास भुजबल, नितिन भाट, सबइंसपेक्टर आनंद वागड़े, कांस्टेबल सुनील कलपीकट्टे, जनार्दन इंदुलकर, नारायन धड़म, संभाजी पोटे और सुनील निवालकर को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

प्राप्त सूचना के अनुसार लाश आग में जल रही थी, इसलिए चलने से पहले उन्होंने मामले की जानकारी फायरब्रिगेड को भी दे दी थी. फायरब्रिगेड की गाडि़यों ने घटनास्थल पर पहुंच कर आग को काबू में कर लिया था. पुलिस टीम के पहुंचने तक लाश इस तरह जल चुकी थी कि उसे पहचाना नहीं जा सकता था. इंसपेक्टर बाला साहब जाधव सहायकों के साथ लाश का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर परिमंडल-7 के एडिशनल सीपी संग्राम सिंह निशायदार, एसीपी प्रकाश निलवाड़ आदि पुलिस फोटोग्राफर और क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के साथ वहां पहुंच गए.

प्रेस फोटोग्राफर और क्राइम टीम का काम खत्म हो गया तो इन पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल एवं लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद उन्होंने बाला साहेब जाधव से विचारविमर्श कर के उन्हें कुछ निर्देश दिए. अधिकारियों के जाने के बाद बाला साहेब जाधव सबूत जुटाने में जुट गए. लेकिन लाश की स्थिति ऐसी थी कि वह कुछ कर नहीं सके. मदद के लिए उन्होंने शहर के ही सायन अस्पताल के डा. ढेरे को बुला कर उन्हीं की मदद से लाश को पोस्टमार्टम के लिए मुंबई उपनगर घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल भिजवाया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला मृतक पुरुष था और उसे गला घोंट कर मारा गया था. सबूत नष्ट करने के लिए लाश पर पेट्रोल और मिट्टी का तेल डाल कर जलाया गया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर बाला साहेब जाधव ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करा कर मामले की जांच की जिम्मेदारी इंसपेक्टर संजय दलवी और विकास भुजबल को सौंप दी थी. इस मामले में सब से बड़ी समस्या थी लाश की शिनाख्त. बिना शिनाख्त के जांच एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती थी. इस के लिए संजय दलवी ने शहर के सभी पुलिस थानों में संदेश भेज कर यह जानने की कोशिश की कि कहीं किसी की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. जब किसी थाने से कोई सूचना नहीं मिली तो मामला पेचीदा हो गया. दिन बीत रहे थे और अधजली लाश के बारे में कुछ पता नहीं चल रहा था.

जब कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली तो संजय दलवी और विकास भुजबल ने अपने सभी साथियों को मृतक के बारे में पता करने के लिए लगा दिया. उन की यह कोशिश रंग लाई. घटनास्थल के आसपास पूछताछ में उन्हें एक व्यक्ति ने बताया कि रात के 3-4 बजे के बीच वह डंपिंग यार्ड में शौच के लिए बैठा था तो वहां सफेद रंग की एक मोटरसाइकिल आ कर रुकी. उस से 2 लोग आए थे. पीछे बैठे आदमी के कंधे पर एक बड़ी गठरी थी. उसे वे डंपिंग यार्ड में ले आए और उसे एक जगह रख कर उस पर मिट्टी का तेल या पेट्रोल डाल कर आग लगा दी.

यह सब वह इसलिए चुपचाप बैठा देखता रहा, क्योंकि उस समय उस के पास काफी पैसे और महंगा मोबाइल फोन था. उसे डर लग रहा था कि पता नहीं वे किस तरह के आदमी हैं. उन के जाने के बाद वह भी चुपचाप वहां से चला गया था. थाना शिवाजीनगर पुलिस तो इस मामले की जांच में रातदिन एक किए ही थी, दूसरी ओर क्राइमब्रांच यूनिट-6 की टीम भी इस मामले से रहस्यों का परदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी. मगर कामयाबी शिवाजीनगर पुलिस के हाथ लगी.

संजय दलवी की टीम सफेद रंग की उस मोटरसाइकिल की खोज में लग गई, जिस से लाश को डंपिंग यार्ड तक लाया गया था. संयोग देखो, जिस मोटरसाइकिल के बारे में पुलिस पता कर रही थी, उस मोटरसाइकिल को थाना चेंबूर पुलिस बरामद कर चुकी थी. चेंबूर के किसी दुकानदार ने फोन कर के सूचना दी थी कि सफेद रंग की एक मोटरसाइकिल कुछ दिनों से उस की दुकान के सामने लावारिस खड़ी है. दुकानदार की सूचना पर थाना चेंबूर पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले कर उस के नंबर के आधार पर जब उस के मालिक को बुलाया तो वह अपनी मोटरसाकिल को थाने में देख कर चौंका. उस का नाम तौफीक खान था. उस ने पुलिस को बताया कि उस की इस मोटरसाइकिल को उस का छोटा भाई शफीक एक सप्ताह पहले मांग कर ले गया था.

चूंकि मोटरसाइकिल लावारिस खड़ी मिली थी, यह जान कर तौफीक का पूरा परिवार घबरा गया. किसी अनहोनी की चिंता में सभी बुरी तरह डर गए. पता नहीं शफीक कहां और किस स्थिति में है. उस के बारे में पता करने के लिए जब उस की पत्नी नगमा को फोन किया गया तो उस ने बताया कि वह 4-5 दिनों से घर नहीं आए हैं. घरवाले चिंता में पड़ गए कि वह घर नहीं आया तो गया कहां? उस की जानपहचान वालों और नातेरिश्तेदारों से पता किया गया. जब कहीं से उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो घर वाले थाना नेहरूनगर जा पहुंचे. जब सारी बात वहां के थानाप्रभारी को बताई गई तो उन्होंने शफीक की गुमशुदगी दर्ज कर के बताया कि थाना शिवाजीनगर पुलिस ने बुरी तरह से जली एक लाश बरामद की है, जो अस्पताल की मोर्चरी में है. वे चाहें तो वहां जा कर उसे देख सकते हैं.

4 फरवरी, 2015 की शाम शफीक के पिता अशफाक खान अपने बेटों के साथ थाना शिवाजीनगर पहुंचे और विकास भुजबल तथा संजय दलवी से मिल कर शफीक के गायब होने के बारे में बता कर लाश देखने की इच्छा जाहिर की. संजय दलवी असफाक और उन के बेटों को राजावाड़ी अस्पताल ले गए और उन्हें वह लाश दिखाई, जो डंपिंग यार्ड से मिली थी. चूंकि लाश इस तरह जली थी कि उसे वे पहचान नहीं पाए. लेकिन सफेद रंग की मोटरसाइकिल का जो मामला था, उस से साफ हो गया कि वह लाश शफीक की ही थी. इस के बाद संजय दलवी ने शफीक के बारे में पता किया तो पता चला कि उस की 3 बीवियां थीं. वह मनमौजी और रंगीनमिजाज आदमी था. उस की पहली पत्नी का नाम शबाना था, जिस की 2 बेटियां थीं और वह उन के साथ जिला ठाणे के उपनगर मुंब्रा में रहती थी.

दूसरी पत्नी का नाम आसमा था और वह कुर्ला की पाइप लाइन में अपनी एक बेटी के साथ रहती थी. तीसरी पत्नी का नाम नगमा था, जो उस के साथ निसर्ग कौआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी के मकान नंबर 6 के रूम नंबर 701 में रहती थी. शफीक के बारे में मिली इस जानकारी से जांच अधिकारियों को लगा कि शफीक की हत्या के पीछे उस की पत्नियों का हाथ हो सकता है. ईर्ष्यावश उन्हीं में से किसी ने उसे मरवा दिया है. उस की तीनों बीवियों से पूछताछ की गई तो इन में से आसमा और शबाना तो साफ निकल गईं, लेकिन नगमा फंस गई. वह पुलिस के किसी भी सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी. मजबूर हो कर उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और फिर शफीक की हत्या की पूरी कहानी सुना दी.

नगमा के बयान के आधार पर संजय दलवी और विकास भुजबल की टीम ने 5 फरवरी, 2015 को शिवाजीनगर स्थित दुर्गा सेवा संघ के औफिस में छापा मार कर सरवर को गिरफ्तार कर लिया. मगर उस का साथी सोहेल मिर्जा उन के हाथ नहीं लगा. क्योंकि उसे एक दिन पहले क्राइम ब्रांच यूनिट-6 के सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट पाटिल की टीम ने पकड़ लिया था. पूछताछ के बाद उन्होंने सोहेल को शिवाजीनगर पुलिस के हवाले कर दिया था. पूछताछ में उन्होंने बताया था कि लाश को आग के हवाले कर के वे मोटरसाइकिल से चेंबूर स्थित मकवाना कंपाउंड पहुंचे और वहां एक दुकान के सामने मोटरसाइकिल खड़ी कर के अपनेअपने घर चले गए.

उन्हें लगा कि उन्होंने जिस तरह सारे काम निपटाए हैं, वे कतई नहीं पकड़े जाएंगे. लेकिन उन्होंने वह मोटरसाइकिल जिस दुकान के सामने खड़ी की थी, उस दुकान के मालिक ने थाना चेंबूर पुलिस को फोन कर के लावारिस खड़ी उस मोटरसाइकिल की सूचना दे दी थी, जिस से इस बात की सूचना शफीक के घर तक पहुंच गई थी. उस के बाद उस की खोज शुरू हुई तो उस की हत्या की जानकारी शफीक के घरवालों को हो गई और पुलिस नगमा तक पहुंच गई, जिस के बाद शफीक की हत्या का मामला खुल गया. पूछताछ के बाद नगमा, सरवर और शोहेल मिर्जा को पुलिस ने कुर्ला की अदालत में मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Family Dispute

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: मानवीयता का अनूठा चेहरा – आलमजीत

Hindi Stories: सड़क दुर्घटना को देख कर आलमजीत के सिर पर समाजसेवा का ऐसा जुनून सवार हुआ कि वह दिनरात लोगों की सेवा में लग गए. इसी सेवा ने उन्हें आम से खास बना दिया. कभीकभी कोई घटना किसी व्यक्ति के मन पर इतना गहरा असर डाल देती है कि उस व्यक्ति का काम या काम करने का नजरिया ही बदल जाता है.

आलमजीत के साथ भी यही हुआ. आंखों के सामने घटी एक घटना ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सेवा के लिए अर्पित कर दिया. लुधियाना के एक स्कूल के एथलेटिक्स कोच आलमजीत एक दिन सुबहसुबह अपनी मोटरसाइकिल से ड्यूटी जा रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि आरती थिएटर के सामने एक स्कूटर वाले को बचाने की कोशिश में एक जीप फुटपाथ पर चढ़ कर पलट गई. जीप में ड्राइविंग सीट पर बैठा शख्स बुरी तरह जख्मी हो कर स्टीयरिंग के बीच फंस गया. उसे देखने के लिए वहां अच्छीखासी भीड़ इकट्ठी हो गई, लेकिन ड्राइवर की मदद को कोई आगे नहीं आया. सब तमाशाबीन बने खड़े थे.

आलमजीत से यह मंजर देखा न गया. उन्होंने आगे बढ़ कर किसी तरह अकेलेदम पर जीप की स्थिति ठीक की. फिर बड़ी कठिनाई से उस में फंसे घायल शख्स को बाहर निकाला. उस शख्स की उम्र करीब 27-28 साल थी. उसे आटोरिक्शा से दयानंद अस्पताल ले गए. अपनी मोटरसाइकिल को वह घटनास्थल पर ही छोड़ आए थे. सिर में गहरी चोट लगने की वजह से वह बेहोश था. उस की हालत गंभीर थी. डाक्टरों ने ढेर सारी दवाओं, इंजेक्शंस और अन्य सामान की लिस्ट आलमजीत के हाथ पर रख दी. आलमजीत अपने पैसों से दवाएं और अन्य सामान खरीद लाए.

काफी कोशिश के बाद वह युवक होश में आ गया. होश में आते ही उस ने अपनी पत्नी और बच्चों को याद किया. इस के बाद वह फिर से बेहोश हो गया. डाक्टर उसे फिर से होश में लाने की कोशिश करने लगे. डाक्टरों ने आलमजीत से कहा कि इस युवक के फिर से होश में आने से पहले ही इस के बीवीबच्चे इस के सामने खड़े मिलें तो अच्छा रहेगा, वरना बिगड़ती जा रही मानसिक हालत इस के लिए घातक सिद्ध हो सकती है. आलमजीत को उस की जेब से एक ड्राइविंग लाइसेंस मिला था. उस से पता चला कि युवक का नाम किशोरचंद है और वह गुरुद्वारा के पास गिल नामक गांव का रहने वाला है. डाक्टरों की बात को ध्यान में रख कर आलमजीत उस के गांव चले गए.

गांव गिल काफी बड़ा था. इतने बड़े गांव में आलमजीत को ड्राइवर का घर तलाशना आसान नहीं था. फिर भी वह गांव में घूमघूम कर किशोरचंद का घर ढूंढते रहे, लेकिन सफलता नहीं मिली. उन्होंने गांव के गुरुद्वारे में पहुंच कर माइक से इस की घोषणा करवाई. 6 घंटे की कोशिश के बाद आलमजीत की मुलाकात किशोर की पत्नी से हुई. उस की गोद में एक नन्हा बच्चा भी था. आलमजीत उसे थोड़ाबहुत बता कर अस्पताल ले आए. गांव के कुछ लोग भी उन के साथ हो लिए थे. अस्पताल में पति की हालत देख कर किशोर की पत्नी सन्न रह गई. डाक्टर किशोर को होश में लाने का प्रयास कर रहे थे, मगर सफलता नहीं मिल रही थी.

उस की पत्नी के साथ गांव के जो लोग आए थे वे भी उस की मदद को आगे आ गए, आलमजीत भी तब तक वहीं रहे. 3 दिनों बाद किशोर की बेहोशी टूटी तो पत्नी और बच्चे को सामने पा कर उस की खुशी का ठिकाना न रहा. किशोर के होश में आने के बाद आलमजीत बहुत खुश हुए. इस के बाद उन्हें अपनी मोटरसाइकिल का ध्यान आया. वह घटनास्थल पर पहुंचे तो मालूम पड़ा कि पुलिस वाले जीप के साथ मोटरसाइकिल भी उठा ले गए थे. थाने जाने पर पता चला कि पुलिस ने जीप के साथ उन की मोटरसाइकिल को भी केस प्रौपर्टी बना कर अपने कब्जे में ले लिया था. बड़ी मशक्कत के बाद आलमजीत ने अपनी मोटरसाइकिल पुलिस के कब्जे से छुड़वाई.

बहरहाल, 2-3 हफ्तों में किशोरचंद पूरी तरह ठीक हो कर अपने घर लौट गया. आलमजीत की वजह से उसे एक तरह से नया जीवन मिला था. उस के ठीक हो जाने के बाद आलमजीत को बड़ी आत्मसंतुष्टि मिली थी. यह बात सन 1988 की है. इस के बाद आलमजीत के भीतर सेवाभाव का एक अनोखा जज्बा पैदा हो गया. फिर उन्होंने मन ही मन प्रण लिया कि वह दुर्घटना में घायल हुए लोगों की जान बचाने की पूरी कोशिश करेंगे. मानवीय उपकार से जुड़े इस रास्ते पर उन्होंने कदम रखा तो पीछे मुड़ कर नहीं देखा. सड़क दुर्घटनाओं में घायल होने वाले लोगों के बचाव के लिए वह सब काम छोड़ कर आगे आने लगे. अपने इन प्रयासों में उन्होंने अनेक लोगों की जानें बचाने में अभूतपूर्व सहयोग दिया.

आलमजीत का जन्म हरियाणा-उत्तर प्रदेश की सीमा पर बसे गांव माजरा में हुआ था. उन के पिता सुरजीत सिंह ने देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान से आ कर इसी गांव में शरण ली थी. फिर सुरजीत सिंह वहां से काम की तलाश में लुधियाना चले आए थे. लुधियाना में उन्होंने ठेकेदारी शुरू कर दी. वहीं पर बच्चों की पढ़ाई हुई. ग्रैजुएशन और नेशनल इंस्टीट्यूट औफ स्पोर्ट्स से डिप्लोमा करने के बाद आलमजीत की नौकरी एक स्कूल में एथलेटिक कोच के रूप में लग गई. इस बीच लुधियाना की कमलजीत कौर से उन की शादी हो गई. पति की सेवाभावना देख कर वह भी खुश हुईं और वह भी पति के सेवाभाव के काम में सहयोग करने लगी.

एक दफा आलमजीत की यह सेवा भावना उन पर ही भारी पड़ गई. हुआ यह था कि फिल्म अभिनेता धर्मेंद्र के गांव साहनेवाल में टैंपो व मारुति कार की टक्कर हो गई. आमनेसामने की सीधी टक्कर में दोनों गाडि़यां तो क्षतिग्रस्त हो गईं लेकिन उन के भीतर बैठे किसी शख्स को खरोंच तक नहीं आई. किसी को चोट भले ही न लगी, लेकिन उन की गाडि़यों को तो नुकसान पहुंचा ही था. इस बात को ले कर दोनों गाडि़यों के लोग निकल कर एकदूसरे को गालियां देते हुए आपस में गुत्थमगुत्था होने लगे. जरा ही देर में वे गाडि़यों से लोहे की रौड और हौकियां निकाल लाए.

इत्तफाक से आलमजीत अपनी बाइक से उधर से गुजर रहे थे. उन्हें जब पता चला कि दुर्घटना के बाद दोनों पक्ष आपस में झगड़ रहे हैं तो उन्होंने आगे बढ़ कर दोनों को समझाते हुए उन का बीचबचाव कराने की कोशिश की. लेकिन यहां उलटा हुआ. उन लोगों ने उलटे आलमजीत को ही पीटना शुरू कर दिया. उन की इतनी जबरदस्त पिटाई की कि उन की बाजू टूट गई. 4 महीनों तक उन्हें बाजू पर प्लास्टर चढ़ाए रखना पड़ा. इस दौरान भी वह चैन से घर नहीं बैठे, बल्कि अपने मिशन में लगे रहे. एक हाथ पर प्लास्टर चढ़ा होने की वजह से वह मोटरसाइकिल चला नहीं सकते थे. इसलिए उन्होंने मोटरसाइकिल का एक्सलेटर व क्लच एक ही तरफ करवा लिया. फिर वह एक ही हाथ से बाइक को संभालने लगे.

लोकसेवा का ऐसा फल हासिल होते देख घर में सब परेशान हो उठे. कुछ लोगों ने उन्हें यह सेवा छोड़ देने की सलाह तक दे डाली. लेकिन आलमजीत की उच्चशिक्षित पत्नी ने उन का उत्साह बनाए रखा. दूसरी ओर आलमजीत जैसे बने ही अलग मिट्टी के थे. इस तरह की बातों की उन्होंने कभी कोई परवाह नहीं की, बल्कि हंसते हुए कहा करते कि परेशानियां तो अच्छेबुरे हर काम में आया करती हैं. इसी का नाम जिंदगी है. परेशानियों को झेलते हुए आगे बढ़ते जाना ही जिंदादिली है. अपना टूटा हुआ हाथ ठीक हो जाने के बाद वह फिर से उसी सेवा में जुट गए. पंजाब में जब गहन आतंकवाद पनपा तो वह आतंकी हमलों में घायल हुए लोगों की चिकित्सा करवाने लगे. यह बात आतंकियों को बुरी लगी तो उन्होंने उन्हें धमकी दी कि वह हमलों में घायल लोगों की सहायता न करें, वरना अंजाम बुरा होगा.

इस धमकी से परिवार वाले डर गए. सभी ने उन्हें सलाह दी कि या तो वह अपने इस खतरनाक जुनून से तौबा कर लें या फिर अपने परिवार को किसी सुरक्षित जगह पर छोड़ आएं. लेकिन आलमजीत किसी तरह की धमकी, किसी तरह के हमले या विरोध से कभी विचलित नहीं हुए. आलमजीत ने जो भी किया, एकदम खामोश रह कर अपने सुकून के लिए किया. एक रोज जब मीडिया को इस की खबर हो गई तो उन लोगों ने इन्हें सर आंखों पर बिठाने में कसर न छोड़ी. इस से आलमजीत चंडीगढ़ व आसपास के क्षेत्र में नायक की तरह प्रसिद्ध होने लगे. अब आलमजीत की सेवाभावना की स्थिति ऐसी बन गई कि आम आदमी की तो बात ही छोडि़ए, नगर के उच्चाधिकारी भी इस तरह की कोई परेशानी आ जाने पर उन्हें ही याद करने लगे थे.

इस के बाद लावारिस लाशों का अपने खर्चे पर दाहसंस्कार कराना आलमजीत के सेवाभाव का अगला पड़ाव बन गया. एक दफा तो उन की सेवा उन्हीं के लिए आफत बनतेबनते बची. बात यह थी कि मोहाली की एक लड़की को फोन पर कोई लड़का परेशान कर रहा था. लड़की के पिता ने आलमजीत से मदद की दरकार की. तब आलमजीत ने लड़की से फोन करने वाले लड़के को बसअड्डे पर बुलवाने को कहा. इस के पीछे उन की सोच यह थी जैसे ही लड़का बसअड्डे पर पहुंचेगा, वह उसे अपने हिसाब से समझाएंगे. अगली बार उस लड़के ने लड़की को फोन किया तो लड़की ने कुछ देर बात करने के बाद उस लड़के को बसअड्डे पर मिलने के लिए कह दिया.

वह लड़का खुश हुआ. वह अपने दोस्त के साथ नियत समय से पहले ही बसअड्डे पर पहुंच गया. लड़की अपनी स्कूटी से बसअड्डे की तरफ चल दी. आलमजीत अपनी कार में लड़की के पिता व भाई को बिठा कर पीछेपीछे चल पड़े. योजना लड़के को रंगेहाथों पकड़ने की थी. जैसे ही लड़की बसअड्डा पहुंची, वह लड़का अपने साथी की मदद से उस लड़की को ही अपहृत कर के ले जाने लगा. यह देख कर आलमजीत भी घबरा गए. उन्होंने अपनी जान पर खेल कर न केवल उस लड़की को बचाया, बल्कि उस के अपहर्ताओं को भी हवालात की हवा खिलाई.

एक बार एक जरमन युवती इर्मगार्ड भारत घूमने आई. हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला के पास मेटाडोर दुर्घटनाग्रस्त हो गई. उसी मेटाडोर में वह बैठी थी. इस दुर्घटना में उस के सिर में गंभीर चोटें आईं. तब उसे चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल भिजवाया गया. 3 हफ्तों बाद उस की मौत हो गई. इस दौरान आलमजीत ही उसे मंडी के छोटे से अस्पताल से रेफर करा कर चंडीगढ़ लाए थे. उन्होंने उस की जान बचाने की काफी कोशिश की थी. उस की मौत के बाद आलमजीत ने ही इर्मगार्ड के घर वालों को फोन कर के इस की सूचना दी थी.

40 देशों की यात्रा कर चुके समाजसेवी आलमजीत सिंह का जीवन इस तरह की रोचक और रोमांचक गाथाओं से अटा पड़ा है. भारतीय लोगों को मदद एवं न्याय दिलाने को वह विदेशों में भी जाते रहते हैं. उन से जुड़ी इस तरह की कितनी ही प्रेरक गाथाएं विदेशी रिसालों में भी छपी हैं. विश्वभर की संस्थाएं उन्हें इस सब के लिए सम्मानित करती रही हैं. 3 बेटों, रतन किरण सिंह, अनमोल रतन सिंह व अनमोल किरण सिंह को अपनी जिंदगी के बड़े पुरस्कार मानते हुए आलमजीत सिंह का यही कहना है कि उन्हें कभी किसी अन्य सम्मान वगैरह की लालसा नहीं रही. अपने लिए वह सब से बड़ा पुरस्कार इसी बात को मानते हैं कि उन की कोशिश से अनगिनत लोगों को नया जीवनदान मिला.

आलमजीत के अनुसार इंसान चाहे किसी भी क्षेत्र में हो, वह चाहे तो मुसीबतजदा लोगों की किसी न किसी तरीके से निश्चित मदद कर सकता है और उसे ऐसा करना चाहिए भी. Hindi Stories

Maharashtra Crime New: ड्रग क्वीन बेबी पाटनकर

Maharashtra Crime New: गरीबी में पलीबढ़ी शशिकला पाटनकर उर्फ बेबी ने महलों में रहने के जो सपने देखे थे, वे पूरे तो कर लिए, लेकिन न जाने कितनों के सपने तोड़ कर. अपने सपने पूरे करने के लिए उस ने जो रास्ता अख्तियार किया, क्या वह उचित था….

महाराष्ट्र के नवी मुंबई पनवेल के खारपाडा टोला नाके के पास जैसे ही एक लग्जरी बस आ कर रुकी, फुरती से उस में एक महिला के साथ कई लोग चढ़ गए. उन में से एकएक आदमी बस के दोनों गेटों के पास खड़े हो गए, ताकि बस से कोई भी आदमी बाहर न जा सके, बाकी लोग ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर बैठी महिला के पास जा कर खड़े हो गए. महिला देखने में किसी धनाढ्य परिवार की लग रही थी. बस में चढ़े लोगोेंके साथ चढ़ी महिला ने सीट पर बैठी महिला से कहा, ‘‘मैडम चलिए, आप का सफर खत्म हो गया है. अब आप को हमारे साथ चलना है.’’

सीट पर बैठी उस महिला ने खड़ी महिला को एक बार ऊपर से नीचे तक देखा. इस के बाद थोड़ी नाराजगी जताते हुए बोली, ‘‘क्या मतलब है आप का. आप हैं कौन और मुझ से इस तरह की बात क्यों कह रही हैं?’’

‘‘हम कौन हैं, यह अभी आप को पता चल जाएगा. हम मतलब भी बता देंगे. बहरहाल अभी तो आप को हमारे साथ चलना होगा.’’ उस महिला को सवारी से बहस करता देख बस के ड्राइवर और कंडक्टर को बुरा लगा. उन्होंने सीट पर बैठी महिला का पक्ष लेते हुए उन लोगों से पूछा, ‘‘आप लोग कौन हैं, जो बस में बैठी महिला से इस तरह की बातें कर रहे हैं.’’

इसी के साथ अन्य सवारियों ने भी उन लोगों का विरोध करना शुरू कर दिया. इस के बाद उन लोगों में से एक ने अपना आईडी कार्ड दिखाते हुए कहा, ‘‘हम लोग मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच से हैं. इस महिला की हमें लंबे समय से तलाश थी.’’

जब सभी को पता चला कि ये पुलिस वाले हैं तो फिर किसी की भी बोलने की हिम्मत नहीं हुई. सीट पर बैठी महिला के चेहरे पर भी हवाइयां उड़ने लगीं. पुलिस वालों ने उस महिला को बस से उतार कर अपनी वैन में बैठा लिया. इसी के साथ वे उसी बस में अलगअलग सीटों पर बैठे 3 अन्य लोगों को भी बस से उतार कर उसी वैन में बैठा लिया था. वे तीनों भी उसी महिला के साथी थे. उन चारों को पुलिस क्राइम ब्रांच के हेड औफिस ले आई. बस में बैठा कोई भी व्यक्ति नहीं समझ सका था कि वह महिला कौन थी और क्राइम ब्रांच वाले उसे और उस के साथियों को क्यों ले गए थे?

वह महिला कोई और नहीं, महाराष्ट्र की एक बहुत बड़ी ड्रग्स तस्कर 52 वर्षीया शशिकला मजगांवकर उर्फ बेबी रमेश पाटनकर थी. उस के साथ जिन 3 लोगों को हिरासत में लिया गया था, उस में उस का छोटा बेटा गिरीश पाटनकर, उस का दोस्त और उस की भांजी थी. बेबी को छोड़ कर बाकी तीनों के बयान ले कर पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया था. ड्रग्स तस्कर शशिकला मजगांवकर का नाम पुलिस की लिस्ट में तब आया था, जब सातारा लोकल क्राइम ब्रांच और मरीन लाइंस पुलिस ने उस के एक साथी कांस्टेबल धर्मराज उर्फ धर्मा कालोखे को 122 किलोग्राम मेफेड्रन  (मिथाइलमेथ कैथिनोन) के साथ गिरफ्तार किया गया था.

यह एक सिंथेटिक ड्रग है, जिस की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में करीब 2 करोड़ रुपए से अधिक थी. कांस्टेबल धर्मराज उर्फ धर्मा को ड्रग की इतनी बड़ी खेप के साथ गिरफ्तार कराने में शशिकला की ही मुख्य भूमिका थी. शशिकला ने ही सतारा पुलिस की लोकल क्राइम ब्रांच को इस की खबर दी थी. इस के बाद उस गिरफ्तार सिपाही धर्मराज से पूछताछ के बाद क्राइम ब्रांच ने शशिकला को गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल की थी. शशिकला उर्फ बेबी से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के साथ ड्रग्स तस्करी में लगे उस के दोनों भाई अर्जुन, शत्रुघ्न, उस के बेटे सतीश पाटनकर, ड्राइवर महेंद्र सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने उस की लग्जरी कारों को भी बरामद कर लिया.

अब तक की जांच में क्राइम ब्रांच को पता चला गया था कि शशिकला और कांस्टेबल धर्मराज के बीच गहरे रिश्ते थे. धर्मराज सिर्फ शशिकला के लिए ही काम करता था. इस पूछताछ और जांच में एक गरीब परिवार की बेटी शशिकला के ड्रग्स क्वीन बनने की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी : शशिकला माजगांवकर उर्फ बेबी पाटनकर का जन्म महाराष्ट्र के जनपद सतारा के एक गरीब किसान परिवार में हुए था. शशिकला चंचल स्वभाव की थी. उस की परवरिश गरीबी में हुई जरूर थी, लेकिन वह अतिमहत्त्वाकांक्षी थी. उस के परिवार में मातापिता के अलावा 2 भाई अर्जुन और शत्रुघ्न थे. वह अपने दोनों भाइयों से बड़ी थी. गरीबी की वजह से उन की पढ़ाईलिखाई भी नहीं हो सकी थी.

शशिकला को गरीबी से नफरत थी. उस की चाहत और सपने बड़े थे. वह अकसर धनदौलत के ख्वाब देखा करती थी. उस के सारे सपने और सारी चाहतें तब जल कर खाक हो गईं, जब उस की शादी एक साधारण से युवक रमेश पाटनकर से हो गई. सीधासाधा रमेश पाटनकर महानगर मुंबई के उपनगर वरली के सिद्धार्थनगर की झोपड़पट्टी में रहता था. वहां उस के साथ रहने में शशिकला का जैसे दम घुटता था. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. पति जो भी मेहनतमजदूरी कर के लाता था, उसी में वह जैसेतैसे घर चलाती थी.

समय का पहिया अपनी गति से घूम रहा था. इसी बीच शशिकला 2 बेटों और एक बेटी की मां बन गई. परिवार बढ़ने पर घर के खर्च भी बढ़ गए थे. पति जो कमा कर लाता था, उस से घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था. उस ने अपने सपनों के साथ तो समझौता कर लिया था, लेकिन उसे बच्चों के भविष्य की भी चिंता थी. वह नहीं चाहती थी कि उसी की तरह उस के बच्चे भी अभावों भरी जिंदगी जिएं. शशिकला पति से आमदनी बढ़ाने की बात करती. लेकिन पति भी कोई ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था, जिस से उसे कोई मोटी तनख्वाह की नौकरी मिलती. लिहाजा चाह कर भी वह अपनी आमदनी नहीं बढ़ा पा रहा था. इसी बात को ले कर शशिकला की पति से अकसर कहासुनी होती रहती थी. आखिरकार   रोजरोज की कहासुनी से तंग आ कर रमेश पाटनकर एक दिन घर छोड़ कर कहीं चला गया.

पति की इस बेरुखी से शशिकला टूट सी गई. अब तीनों बच्चों की परवरिश और पढ़ाईलिखाई की सारी जिम्मेदारी उस के कंधों पर आ गई. अचानक आने वाली इस परेशानी से वह घबराई नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़ी होने की कोशिश करने लगी. गुजरबसर के लिए शशिकला ने दूध का धंधा शुरू किया. वह सुबह उठ कर वरली की दूध डेयरी पर जाती और वहां से बोतल पैक दूध ला कर अपनी बस्ती के घरघर पहुंचाती. यह बात सन 1981 की है. इस से उस के घर की गाड़ी तो चलने लगी, लेकिन भविष्य के लिए हाथ में कुछ नहीं बचता था. इस के लिए वह हमेशा चिंतित रहती थी. अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए वह किसी हद तक जाने को तैयार थी. इसलिए वह किसी ऐसे काम की तलाश में थी, जिस से उसे भरपूर कमाई हो.

आखिर उसे एक दिन वह काम मिल ही गया, जिसे करने से उसे मोटी आमदनी हो सकती थी. शशिकला जिस बस्ती में रहती थी, वहीं उसे एक ऐसा व्यक्ति मिला, जिस ने उस की जीवनधारा ही बदल दी. उस ने बिना मेहतन के ढेर सारी दौलत कमाने का रास्ता सुझा दिया. वह काम ड्रग्स सप्लाई का था. यह काम थोड़ा जोखिम भरा जरूर था. लेकिन जितनी मेहनत वह दूध बेचने में करती थी, उतनी मेहनत इस काम में कर देने पर उस की झोली में ढेर सारी दौलत आ सकती थी.

शशिकला को उस आदमी की सलाह उचित लगी थी क्योंकि उस की बस्ती के ही तमाम लोग ड्रग्स का सेवन करते थे. उस ने  दूध बेचने के साथसाथ चरस, गांजा, हशीश, ब्राऊनशुगर आदि बेचना शुरू कर दिया. इस से उस की आमदनी बढ़ गई. जब कमाई बढ़ गई तो शशिकला ने दूध बेचने वाला काम बंद कर दिया और अपना पूरा ध्यान नशीले पदार्थों के धंधे पर लगा दिया. धीरेधीरे शशिकला ने बस्ती से बाहर पैर पसारने शुरू किए. इस के बाद उस ने मुंबई यूनिवर्सिटी परिसर को अपना अड्डा बना लिया. शुरूशुरू में ड्रग्स तस्करी में अपना पैर जमाने के लिए शशिकला पाटनकर को काफी तकलीफों का सामना करना पड़ा था. लेकिन समय के साथ सब ठीक हो गया.

क्योंकि जल्दी ही उस के शहर के कई बड़े ड्रग्स तस्करों से अच्छे संबंध बन गए थे. इस लाइन में आने के बाद उस ने अपना नाम बेबी रख लिया था. बेबी उन्हीं तस्करों से माल ला कर मुंबई में सप्लाई करने लगी थी. गरीबी का अभिशाप दूर करने के लिए उस ने अपने पूरे परिवार, बेटे सतीश, बेटीबहू के अलावा दोनों भाइयों को भी अपने इस व्यवसाय में शामिल कर लिया था. किसी तरह की परेशानी न हो, सभी को उस ने धंधे के गुर भी सिखा दिए थे. मुंबई में अचानक ड्रग्स की विक्री की बाढ़ सी आ गई तो मुंबई पुलिस और क्राइम ब्रांच के अलावा एंटी नार्कोटिक्स (ड्रग्स कंट्रोल सेल) के अधिकारियों के कान खड़े हो गए. क्राइम ब्रांच ने मुखबिरों को सतर्क किया तो उन्हें अपने मुखबिरों से पता चला कि इस सारे रैकेट के पीछे किसी बेबी नाम की महिला का हाथ है.

क्राइमब्रांच और एंटी नार्कोटिक्स सेल के अधिकारी हाथ धो कर बेबी के पीछे पड़ गए तो वह घबरा कर कुछ दिनों के लिए भूमिगत हो गई. उस पर मामला तो दर्ज हो गया, लेकिन उस ने खुद को गिरफ्तारी से बचा लिया. उस के भूमिगत होने से ड्रग्स मार्केट में खलबली मच गई. बाजार में ड्रग्स के न आने से करोड़ो रुपए का नुकसान हो रहा था. बेबी इस बात को ले कर परेशान थी कि अगर कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा तो उस का करोबार ठप हो जाएगा. वह इस समस्या का समाधान ढूंढने लगी. इसी तलाश में उस की मुलाकात पुलिस कांस्टेबल धर्मराज उर्फ धर्मा कालोखे से हुई, जिस की मदद से उस ने एक बार फिर अपने कारोबार को शिखर पर पहुंचा दिया.

अपना काम निकालने के लिए बेबी ने उसे अपने रूपयौवन के जाल में इस तरह फंसाया कि वह उस में उलझ कर रह गया. यह सन 2002 की बात थी. धर्मराज उसी जनपद का रहने वाला था, जिस जनपद की बेबी रहने वाली थी. धर्मराज उन दिनों पुलिस की नौकरी में नयानया आया था. उसे भरती हुए लगभग 2 साल ही हुए थे. इस नौकरी से मिलने वाले थोड़े से वेतन से वह संतुष्ट नहीं था. उस के वेतन से उस के घरपरिवार का गुजारा बड़ी मुश्किल से हो पाता था. जब बेबी को भरोसा हो गया कि सिपाही धर्मराज उस के रूपजाल में पूरी तरह फंस चुका है तो उस ने उसे अपने कारोबार के बारे में सब कुछ बता कर करोबार को बढ़ाने में मदद मांगी.

बेबी की असलियत जान कर एक बार तो धर्मराज के होश उड़ गए. लेकिन जल्दी ही उस ने खुद को संभाल लिया. क्योंकि बेबी की तरह उस ने भी सुखसुविधाओं वाली जिंदगी के जो सपने देखे थे, वे पुलिस की नौकरी में मिलने वाले वेतन से कभी पूरे नहीं हो सकते थे. इसलिए शुरूशुरू में बेबी के साथ काम करने से भले ही वह घबराया हो, लेकिन जल्दी ही वह उस के साथ जुड़ गया. यह सच है कि पैसा अच्छोंअच्छों की नीयत खराब कर देता है, जबकि धर्मराज तो एक मामूली इंसान था, उस की कमाई न के बराबर थी. इसलिए वह बेबी के साथ जुड़ने से मना नहीं कर सका था.

धर्मराज बेबी के कहने पर उस के कारोबार से जुड़ गया. धर्मराज के जुड़ते ही बेबी के कारोबार को जैसे पंख लग गए. धर्मराज की मदद से बेबी अपना करोड़ो का माल बड़ी आसानी से इधर से उधर पहुंचा देती थी. सिपाही और वरिष्ठ अधिकारियों का ड्राइवर होने की वजह से धर्मराज पर कोई शक भी नहीं करता था. इस के अलावा भी पुलिस वालों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए बेबी खुद भी एक बड़े एनकाउंटर स्पैशलिस्ट की मुखबिर बन गई. विश्वास जमाने के लिए उस ने अपने ही कारोबार से जुड़े कई बड़े तस्करों की मुखबिरी कर के उन्हें पकड़ा दिया. इस से उसे दोहरा लाभ मिला. एक तो अधिकारी को उस पर भरोसा हो गया, दूसरे उस का कारोबार बढ़ गया.

अब वह सीधे राजस्थान के भवानी बाजार और मध्य प्रदेश के रतलाम शहर से भारी मात्रा में ड्रग्स मंगा कर पूरे मुंबई में सप्लाई करने लगी. इस बीच बेबी ने अपने कारोबार में धर्मराज की तरह कुछ अन्य पुलिस, कस्टम और इनकमटैक्स के बड़े अधिकारियों को जोड़ लिया था. जिस का उस ने जम कर फायदा उठाया. कुछ ही दिनों में बेबी गांजा, चरस, हशीश, ब्राऊनशुगर और म्यांऊम्यांऊ यानी एमडी मेफेड्रन जैसे खतरनाक ड्रग्स की महारानी बन गई. ड्रग्स तस्करी से बेबी पर नोटों की बरसात होने लगी. देखते ही देखते वह धन कुबेरों की लाइन में खड़ी गई. ड्रग्स तस्करी के पैसों से उस के सपने साकार होने लगे.

पुलिस जांच में बेबी की कई करोड़ की नामीबेनामी संपत्तियों का पता चला है. उस ने घर के सभी लोगों को सोने के गहनों से लाद दिया था. यही नहीं, सिद्धार्थनगर की जिस बस्ती में वह रहती थी, वहां की 20 चालों को उस ने खरीद लिया था, जिस से उसे मोटा किराया आता था. 4 लग्जरी कारों में उस की 2 कारें इनकमटैक्स विभाग में लगी थीं, जिन्हें उस का भाई देखता था. जरूरत पड़ने पर बेबी उन कारों का भी इस्तेमाल अपने कारोबार के लिए कर लेती थी.

इस के अलावा बेबी का नवी मुंबई में एक बड़ा सा प्लौट, पनवेल में एक फार्महाऊस, मुंबई के बोरीवली गौराई बीच में एक सुंदर सा आलीशान बंगला, पूना लोनावाला में एक बंगला, पूना के कोरेगांव में एक मंजिला गृह संकुल, वाइन शौप और कोकण विदर्भ में काफी जमीनजायदाद थी. पकड़े जाने पर 3 बैंक एकाउंट में 40-40 लाख रुपए कैश मिले थे. बेबी पाटनकर का सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. उस पर पहला मामला सन 2001 में दर्ज हुआ था. लेकिन 2014 में बेबी पर वरली, मुंबई और थाना जनपद वसई में अनेक मामले दर्ज हो गए तो उस का अस्तित्व डगमगा गया. उस ने इन 13 सालों में जिस तरह पुलिस और कस्टम के कई बड़े अधिकारियों को मैनेज कर के अपने कारोबार को फैलाया था, लगातार दर्ज होने वाली शिकायतों से उस की जमीजमाई बुनियाद हिल गई.

इस के बाद वह यह सोचने पर मजबूर हो गई कि कोई ऐसा है, जो उस के साम्राज्य में सेंध लगाना चाहता है. जब उस ने इस बात पर गहराई से विचार किया तो उसे अपने साथी धर्मराज उर्फ धर्मा पर संदेह हुआ. धर्मराज उर्फ धर्मा ही एक ऐसा आदमी था, जो उस के लगभग सभी रहस्यों को जानता था. इस की एक वजह यह भी थी कि अभी तक मुंबई और अन्य उपनगरों में बेबी द्वारा लाई गई ही एमडी बिकती थी. लेकिन इधर धर्मराज द्वारा उस के खंडाला कन्हेरी फार्महाऊस से 150 किलोग्राम एमडी छिपाने के बाद भी बाजार में बिक रही थी. इसी बात से उसे लगा कि धर्मराज ज्यादा पैसों के लालच में उस के साथ गद्दारी कर रहा है. जबकि बेबी का यह एक वहम था. वह 150 किलोग्राम एमडी को ले कर बेबी से थोड़ा नाराज जरूर था, लेकिन वह किसी भी तरह की कोई गद्दारी नहीं कर रहा था.

यह 150 किलोग्राम एमडी बेबी ने पूना के एक तस्कर सैमुअल से खरीदी थी. जबकि वह सैमुअल के बारे में ज्यादा कुछ जानती नहीं थी. बेबी से उसे उस के भाई बादशाह ने सन 2007 में मिलवाया था. सैमुअल बादशाह के साथ आर्थर रोड जेल में बंद रहा था. तभी दोनों में दोस्ती हुई थी. यह 150 किलोग्राम एमडी एसटी (स्टेट ट्रांसपोर्ट) की बस द्वारा 2 बार में लाई गई थी. बेबी ने इसे सिद्धार्थनगर स्थित अपने घर में रखवा दी थी. लेकिन दिसंबर, 2014 में सैमुअल पकड़ा गया तो बेबी डर गई. इस के बाद सारी एमडी उस ने धर्मराज को अपने किसी फार्महाऊस में छिपाने के लिए दे दी. धर्मराज उस एमडी को इस शर्त पर छिपाने के लिए राजी हुआ था कि बेबी उसे 25 लाख रुपए देगी.

बेबी ने शर्त मान ली तो धर्मराज ने उसे ले जा कर खंडाला कन्हेरी के अपने फार्महाऊस में छिपा दिया था. लेकिन बाद में बेबी ने शर्त में माने 25 लाख रुपए धर्मराज को नहीं दिए, जिस की वजह से दोनों के बीच मनमुटाव हो गया था. दरअसल धर्मराज बेबी पाटनकर से मिले इन पैसों को पूना की किसी प्रौपर्टी में निवेश करना चाहता था. उस ने उस प्रौपर्टी के लिए डेढ़ लाख रुपए एडवांस भी दे दिए थे. बेबी के पैसे न देने से वह प्रौपर्टी तो हाथ से निकल ही गई थी, उस के पैसे भी डूब गए थे. इन पैसों को ले कर धर्मराज और बेबी के बीच अकसर कहासुनी होती रहती थी. इस कहासुनी से वह उसे गिरफ्तार कराने की धमकियां भी देता था.

पुलिस वाले कभी किसी के नहीं होते, यह सोच कर बेबी ने धर्मराज को पकड़वा देने में ही अपनी भलाई समझी और अपने ही करोड़ो रुपए के ड्रग को धर्मराज का बता कर सतारा लोकल क्राइम ब्रांच को सूचना दे दी. धर्मराज को अपनी गिरफ्तारी का शक उस पर न हो, इस के लिए वह धर्मराज को साथ ले कर 2 मार्च, 2015 को हिलस्टेशन चली गई थी. वह उस के साथ गोवा, कोल्हापुर, सांवतवाड़ी, रत्नागिरी, महाबलेश्वर और खंडाला जैसे पिकनिक प्वाइंटों पर घूमते हुए उस की गिरफ्तारी का चक्रव्यूह रचती रही. इस मामले में बेबी ने अपने एक विश्वसनीय सिपाही की मदद ली थी. वह सिपाही बेबी पाटनकर के कहने पर अपने एक निलंबित सबइंस्पेक्टर से मिला.

इस के बाद दोनों ने सिपाही धर्मराज के खंडाला कन्हेरी स्थित फार्महाऊस पर छापा मरवाने के लिए पहले पूना के एक कस्टम अधिकारी से बात की. लेकिन पूना के उस कस्टम अधिकारी ने किसी वजह से इस मामले में दिलचस्पी नहीं ली तो दोनों सतारा पुलिस की लोकल क्राइम ब्रांच के औफिस पहुंचे. सतारा क्राइम ब्रांच के अधिकारी तुरंत हरकत में आ गए. उन्होंने धर्मराज के खंडाला कन्हेरी स्थित फार्महाऊस पर छापा मार कर 110 किलोग्राम एमडी बरामद कर ली. धर्मराज उन दिनों मुंबई के मरीन लाइंस पुलिस थाने में तैनात था. वहां उस के लौकर से भी 12 किलोग्राम एमडी बरामद की गई.

9 मार्च, 2015 को पहले सतारा की क्राइम ब्रांच ने धर्मराज उर्फ धर्मा को गिरफ्तार किया. इस के बाद मरीन लाइंस पुलिस ने अपनी सुपुर्दगी में ले लिया. चूंकि सतारा की क्राइम ब्रांच पुलिस को 150 किलोग्राम एमडी की सूचना मिली थी, जबकि बरामद 122 किलोग्राम ही हुई थी. बाकी की 28 किलोग्राम एमडी कहां गई? इस के लिए धर्मराज से पूछताछ के बाद बेबी के बड़े बेटे सतीश पाटनकर को गिरफ्तार किया गया. उस ने पुलिस को बताया कि उस ने बेबी पाटनकर के कहने पर 40 किलोग्राम एमडी निकाली थी, जिस में से 12 किलोग्राम उस ने धर्मराज के लौकर में रखवा दी थी.

बेबी ने सिपाही धर्मराज को तो पकड़वा दिया. लेकिन ऐसा करते हुए वह यह भूल गई कि जिस आग को वह हवा दे रही है, उस आग में उस का खुद का भी दामन जल जाएगा. उस की लगाई आग की आंच जब उस के भाइयों और बेटे सतीश तक पहुंची तो वह समझ गई कि अब उस का भी खेल खत्म हो चुका है. जब उसे लगा कि अब पुलिस कभी भी उसे गिरफ्तार कर सकती है तो वह अपने सारे सोने के गहने गिरवी रख कर मुंबई से फरार हो गई. पुलिस ने उस के कई ठिकानों पर छापा मारा, लेकिन वह हाथ नहीं लगी. 13 मार्च, 2015 को बेबी का छोटा बेटा गिरीश अपनी मां को ले कर नवी मुंबई स्थित कामोठे में रहने वाली अपनी गर्लफ्रैंड के यहां पहुंचा.

गर्लफ्रैंड को भी साथ ले कर वह कार द्वारा सूरत चला गया. 14 मार्च, 2015 को सभी गर्लफ्रैंड की मौसी के यहां रुके. 15 मार्च को प्राइवेट कार से मुंबई के लिए निकले तो 16 मार्च को सुबह मुंबई के बोरिवली पहुंचे. गिरीश ने अपनी गर्लफ्रैंड को वहां छोड़ा और मां के साथ वाशी चला गया. यहां से मुंबई जा कर उस ने जमानत की कोशिश की, पर वकील ने उसे सलाह दी कि वह ऐसा न करे तो वह गिरीश की गर्लफ्रैंड के घर आगरा चली गई. कुछ दिनों तक आगरा में रहने के बाद वह दिल्ली आ गई. दिल्ली से वह कुराड़गांव में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के यहां चली गई. कुराड़गांव से बस द्वारा वह मुंबई आ रही थी, तभी एक सोशल वर्कर की नजर उस पर पड़ गई तो उस ने क्राइम ब्रांच सर्विस सेल के अधिकारियों को सूचना दे दी. इस के बाद वह पकड़ी गई.

इस तरह बेबी के पकड़े जाने पर 40 दिनों तक चले इस चूहेबिल्ली का खेल खत्म हो गया. गिरफ्तार बेबी के मामले की गंभीरता को देखते हुए ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर अतुलचंद्र कुलकर्णी ने आगे की तफ्तीश क्राइम ब्रांच यूनिट-2 प्रौपर्टी सेल के अधिकारियों को सौंप दी है. ड्रग्स क्वीन बेबी और सिपाही धर्मराज उर्फ धर्मा कालोखे से पूछताछ और उन के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स से कई पुलिस वालों और कस्टम अधिकारियों के नाम सामने आए हैं. इन में 30 मई को 4 लोग, एंटी नारकोटिक्स के इंसपेक्टर सुहास गोखले, गौतम गायकवाड़ सुधाकर, हवलदार ज्योतिराम माने और यशवंत पतारे को गिरफ्तार भी किया गया है. आगे की जांच क्राइम ब्रांच अधिकारी कर रहे हैं. इसी बीच उन्हें एक और बड़ी सफलता मिली.

ड्रग्स तस्कर सैमुअल को भारी मात्रा में ड्रग्स सप्लाई करने वाले तस्कर जानपाल दुरई को केरल से गिरफ्तार कर लिया गया. यह गिरफ्तारी सैमुअल के बयान पर हुई थी. जान पाल दुरई भी बेबी की तरह ही नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का मुखबिर था. उस ने नार्कोटिक्स ब्यूरो को कई बड़े टिप दिए थे. बहरहाल कथा लिखे जाने तक क्राइम ब्रांच बेबी से पूछताछ कर रहे थे. Maharashtra Crime New

कथा पुलिस सूत्रों और समाचार पत्रों पर आधारित

 

Illicit Relationship: 6 सालों बाद खुला अवैध संबंधों का राज

Illicit Relationship: अवैध संबंधों की वजह से राजकुमार की हत्या 6 साल पहले हुई थी. पुलिस ने राजकुमार के घर वालों की शिकायत पर अपहरण का केस तो दर्ज कर लिया, लेकिन काररवाई कुछ नहीं की. लेकिन राजकुमार के घर वालों ने हार नहीं मानी और 6 साल बाद ही सही, पत्नी और प्रेमी को बेनकाब कर दिया…

गुडि़या का कुछ ही देर पहले अपने पति राजकुमार से झगड़ा हुआ था. यह उस दिन की ही नहीं, हर रोज की बात थी. राजकुमार एक नंबर का पियक्कड़ था. उस दिन भी सुबह होते ही अद्धा ले कर बैठ गया था. गुडि़या ने उसे टोका, लेकिन वह कहां मानने वाला था. कुछ देर तक तो वह पत्नी की बातें सुनता रहा, लेकिन 4 पैग हलक से नीचे उतरते ही उस का दिमाग घूम गया. बिना कुछ कहे उस ने गुडि़या की चोटी पकड़ कर उसे रूई की तरह धुन दिया. मां को मार खाते देख कर बच्चे भय से चिल्लाने लगे तो राजकुमार ने उन को भी थप्पड़ों का स्वाद चखा दिया. फिर गंदीगंदी गालियां देते हुए अद्धा बगल में दबाए घर से बाहर निकल गया.

राजकुमार बरेली जनपद के भमोरा थानाक्षेत्र के गांव सिंघा में रहता था. उस के पिता ऋषिराज सिंह के पास खेती लायक थोड़ी जमीन थी, जिस पर खेती कर के वह किसी तरह परिवार का भरणपोषण करते थे. परिवार में राजकुमार की मां रूषमा देवी, 2 भाई व 4 बहनें थीं. चारों बहनें विवाहित थीं. राजकुमार के दोनों भाई प्रेमप्रकाश और बबलू उस से छोटे थे. वह खुद चौकीदारी का काम करता था. प्रेमप्रकाश रामपुर जिले में आबकारी विभाग में नौकरी करता था, जबकि बबलू दिल्ली में रह कर प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा था. 18 वर्ष पहले राजकुमार का विवाह रामपुर जनपद के रमपुरा गांव की रहने वाली गुडि़या से हुआ था. वक्त के साथ गुडि़या एकएक कर के 3 बच्चों की मां बनी.

परिवार बढ़ा तो राजकुमार की जिम्मेदारियां भी बढ़ीं. परिवार चलाने के लिए उस ने अपने लिए नौकरी ढूंढनी शुरू की तो जल्दी ही उसे एक निजी कंपनी में सुरक्षागार्ड की नौकरी मिल गई. नौकरी मिल गई तो वह अपनी पत्नी गुडि़या और तीनों बच्चों को ले कर शहर आ गया और बारादरी थानाक्षेत्र के शहामतगंज में हरीलाल जैन के प्लौट में बने कमरे में किराए पर रहने लगा. नौकरी से राजकुमार को इतनी आमदनी हो जाती थी कि दालरोटी चल सके. दिक्कत तब आई, जब उसे शराब की लत लग गई. गुडि़या कुशल गृहिणी थी. कम आय में भी उसे गृहस्थी चलाना आता था. लेकिन राजकुमार की शराब की लत ने घर का बजट गड़बड़ा दिया. फलस्वरूप गुडि़या परेशान रहने लगी.

उस ने राजकुमार को हर तरह से समझाने का प्रयास किया, बच्चों की भी दुहाई दी. लेकिन उसे बीवीबच्चों से ज्यादा शराब प्यारी थी. राजकुमार सुधरता तो क्या, उलटा ढीठ बन गया. नतीजा यह हुआ कि पहले केवल शाम को पीने वाला राजकुमार रातदिन शराब में डूबा रहने लगा. उसे न पत्नी की फिक्र थी, न बच्चों की चिंता. वेतन के पैसों को वह शराब की बोतलों पर उड़ा देता था. नशे में राजकुमार इतना डूब चुका था कि नौकरी में भी लापरवाही करने लगा. पैसों की किल्लत होती तो घर के कीमती बरतन शराब की भेंट चढ़ जाते. गुडि़या रोकती तो पिटती, उस स्थिति में बदकिस्मती पर आंसू बहाने के अलावा उस के पास कोई चारा न रहता.

राजकुमार का एक दोस्त था ज्ञानप्रकाश. वह बरेली के कस्बा थाना फरीदपुर के कानूनगोयान मोहल्ले में मुकुंद सिंह के मकान में रहता था. वह मकान मालिक की बोलेरो जीप चलाता था. ज्ञानप्रकाश के पिता का देहांत हो चुका था. उस की 2 बहनें थीं, जिन का विवाह हो चुका था. दोनों में दोस्ती तो काफी दिन से थी, लेकिन बाद में जब दोस्ती गहरी हुई तो वह राजकुमार के कमरे पर भी आनेजाने लगा. ज्ञानप्रकाश को गुडि़या से हमदर्दी थी. उस ने राजकुमार को शराब पीना छोड़ कर गृहस्थी पर ध्यान देने की सलाह दी, लेकिन उस ने ज्ञान प्रकाश की बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दी. पतिपत्नी के झगड़े की वजह से ज्ञानप्रकाश कभीकभार ही राजकुमार के घर जाता था.

एक दिन ज्ञानप्रकाश कई दिनों के बाद राजकुमार के घर गया. उस के पहुंचने के कुछ देर पहले ही राजकुमार गुडि़या के साथ मारपीट कर के बाहर गया था. जब वह पहुंचा तो गुडि़या रो रही थी. उस की नजर ज्यों ही ज्ञानप्रकाश पर पड़ी, वह आंसू पोंछने लगी. फिर मुसकराने का प्रयास करती हुई बोली, ‘‘अरे ज्ञान तुम, आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए?’’

‘‘सच पूछो तो भाभी मैं आज भी नहीं आता.’’ ज्ञानप्रकाश ने गुडि़या की नम आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘लेकिन तुम्हारा दर्द मुझ से देखा नहीं जाता, इसलिए आ जाता हूं. लगता है, राजकुमार अपनी हरकतों से बाज नहीं आएगा.’’

‘‘जब अपनी ही किस्मत खोटी हो तो किसी को क्या दोष देना ज्ञान.’’ कहते हुए गुडि़या की आंखों में आंसू भर आए. ज्ञानप्रकाश और गुडि़या हमउम्र थे, इसलिए एकदूसरे की भावनाओं को अच्छी तरह समझते थे. गुडि़या जहां ज्ञानप्रकाश की सादगी और भोलेपन पर फिदा थी, वहीं ज्ञानप्रकाश उस की कोमल काया पर मोहित था.

दरअसल, 3 बच्चों की मां होने के बावजूद गुडि़या की जवानी अभी ढली नहीं थी. उस की कटीली मुसकान किसी को घायल करने में सक्षम थी. लेकिन शराबी राजकुमार को प्यालों की गहराई मापने से इतनी फुरसत नहीं थी कि पत्नी की आंखों में झांक कर उस की चाहत को जान पाता. ऐसी स्थिति में उस का झुकाव ज्ञानप्रकाश की ओर होने में ज्यादा समय नहीं लगा. इधर ज्ञानप्रकाश की भी दिली हालत गुडि़या से जुदा नहीं थी. गुडिया को रोता देख ज्ञानप्रकाश तड़प उठा. उस ने भावावेश में गुडि़या का हाथ थाम कर कहा, ‘‘ऐसा मत कहो भाभी, मैं सारी दुनिया की बातें तो नहीं जानता, पर अपनी गारंटी देता हूं, अगर तुम साथ दो तो कसम से मैं सारी जिंदगी तुम पर वार दूंगा.’’

यह सुन कर गुडि़या ज्ञानप्रकाश से लिपट कर रोने लगी. ज्ञानप्रकाश उसे कस कर भींचते हुए बोला, ‘‘असल में तुम गलत आदमी से बंध गई. खैर अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, तुम चाहो तो सब कुछ फिर से बदल सकता है.’’

गुडि़या ने जवाब में कुछ कहने के बजाय ज्ञानप्रकाश को चूम लिया. उस के ऐसा करते ही ज्ञानप्रकाश भी उतावला हो कर उसे चूमने लगा. कुछ ही देर में वह उस से भी आगे निकलता गया. फलस्वरूप दोनों के बीच जिस्मानी संबंध बन गए. उस दिन दोनों के बीच एक नए रिश्ते की बुनियाद रखी गई. उस दिन के बाद गुडि़या और ज्ञानप्रकाश की दुनिया ही बदल गई. दोनों एकदूसरे से पतिपत्नी जैसा व्यवहार करने लगे. अब ज्ञानप्रकाश गुडि़या का खयाल तो रखता ही था, उस की घरगृहस्थी का सारा खर्च भी उठाने लगा था. गुडि़या की बेजान दुनिया में फिर से जीवन लौट आया. अब घर में बढि़या खाना पकता और ज्ञानप्रकाश राजकुमार के साथ बैठ कर खाना खाता. ऐसा नहीं था कि राजकुमार ज्ञानप्रकाश और गुडि़या के रिश्तों से अनजान रहा हो, उसे सब कुछ पता था.

लेकिन वह इस बात से खुश था कि अब उसे कोई शराब पीने से नहीं रोकता था. इतना ही नहीं, पैसा कम पड़ जाने पर ज्ञानप्रकाश उस की मदद भी कर दिया करता था. इन सब के एवज में उस ने ज्ञानप्रकाश और गुडि़या के रिश्ते को मौन स्वीकृति दे दी थी. राजकुमार की मूक सहमति मिलने के बाद गुडि़या और ज्ञानप्रकाश की बांछें खिल उठीं. इस के बाद दोनों बाजार वगैरह साथ घूमने जाने लगे. रातें भी एक छत के नीचे गुजरने लगीं, उधर शराब ने राजकुमार को बिलकुल बेगैरत बना दिया था.

फिर अचानक एक दिन नशे की हालत में ही उस की गैरत जाग उठी. उस ने गुडि़या से साफसाफ कहा, ‘‘बस बहुत हो चुका रासरंग, अब और नहीं. आज के बाद तुम ज्ञानप्रकाश से कोई रिश्ता नहीं रखोगी. बेहयाई की भी हद होती है.’’

राजकुमार के इस बदले हुए रूप ने गुडि़या को हैरान कर दिया. उस ने पूछा, ‘‘आज अचानक क्या हो गया तुम्हें?’’

राजकुमार गुडि़या को घूरते हुए बोला, ‘‘क्यों, समझ में नहीं आ रहा क्या या बेगैरती ने भेजा बिलकुल ही चाट लिया है?’’

‘‘गैरत या बेगैरती की बातें तुम्हारे मुंह से अच्छी नहीं लगतीं. अच्छा होगा, अब इस मामले में न ही पड़ो.’’ कहते हुए आवेश में गुडि़या की सांसें फूलने लगीं. वह क्षण भर रुक कर बोली, ‘‘सोच कर बताओ, बेगैरती का यह रास्ता मुझे किस ने दिखाया? तुम ने… अगर तुम अच्छे पति, अच्छे पिता और सच्चे इंसान होते तो मैं राह से क्यों भटकती? अब कुछ नहीं हो सकता, तीर कमान से निकल चुका है.’’

‘‘मैं कुछ सुनना नहीं चाहता, आइंदा वही होगा, जो मैं चाहूंगा.’’ राजकुमार कड़े स्वर में बोला.

‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता.’’

गुडि़या के दो टूक जवाब से राजकुमार पागल हो उठा. वह चीखते हुए उस पर झपटा, ‘‘ठहर, अभी बताता हूं कि क्या हो सकता है और क्या नहीं हो सकता.’’

राजकुमार ज्यों ही गुडि़या को पीटने दौड़ा, संयोग से ज्ञानप्रकाश वहां आ गया. पल भर में वह सारा माजरा समझ गया. उस ने आगे बढ़ कर राजकुमार को गिरा दिया. अचानक लगे धक्के से राजकुमार चारों खाने चित गिरा. उस का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. वह खड़ा हो कर बोला, ‘‘ज्ञानप्रकाश खबरदार, अगर तुम हम दोनों के बीच आए, तुम्हारा सिर तोड़ दूंगा.’’

इतना सुनना था कि ज्ञानप्रकाश राजकुमार पर टूट पड़ा. उस ने मुक्कों और लातों से राजकुमार की बुरी गत बना दी. जिंदगी भर पति से पिटने वाली गुडि़या ने जब पति को पिटते देखा तो उस के प्रतिशोध ने सिर उठा लिया. उस ने भी ज्ञानप्रकाश के साथ राजकुमार पर हाथ आजमाए. उस दिन के बाद से उलटी गंगा बहने लगी. राजकुमार जरा भी चूंचपड़ करता गुडि़या और ज्ञानप्रकाश उसे पीटपीट कर हाथों की खुजली मिटा लेते. इतना ही नहीं, ज्ञानप्रकाश ने उसे शराब के पैसे देने भी बंद कर दिए थे. अब राजकुमार गुडि़या और ज्ञानप्रकाश की आंखों में खटकने लगा था. वैसे भी उस के रहते वह एक साथ सुकून की जिंदगी नहीं जी सकते थे. इसलिए उन्होंने राजकुमार को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया.

ज्ञानप्रकाश ने इस के लिए अपने बहनोई हरिशंकर उर्फ शंकर, अपने दोस्त सतीश और शंकर के चचेरे भाई टीकाराम को अपनी योजना में शामिल कर लिया. ये तीनों गांव प्रेमराजपुर, थाना भमोरा, जिला बरेली के रहने वाले थे. योजनानुसार ज्ञानप्रकाश जनवरी, 2009 में एक दिन देर रात राजकुमार को गुडि़या और बच्चों के साथ एक धार्मिक आयोजन में चलने के बहाने अपने बहनोई शंकर के गांव प्रेमराजपुर ले गया. शंकर ने बच्चों को गांव में अपने घर छोड़ दिया. इस के बाद ज्ञानप्रकाश और उस के साथियों ने गांव के पास ही सहासा के जंगल में ले जा कर राजकुमार को दबोच लिया. शंकर घर से कपड़ों में छिपा कर बांका ले आया था.

उसी बांके से ज्ञानप्रकाश और शंकर ने बारीबारी से राजकुमार पर वार किए, जिस से कुछ ही पलों में राजकुमार जमीन पर गिर कर ढेर हो गया. गुडि़या यह सब अपनी आंखों से देखती रही. राजकुमार की हत्या करने के बाद सतीश और टीकाराम चले गए. इस के बाद शंकर घर जा कर फावड़ा ले आया और फिर ज्ञानप्रकाश और उस ने वहीं 2 फुट गहरा गड्ढा खोद कर राजकुमार की लाश को दफना दिया. तत्पश्चात सब वहां से लौट आए, लेकिन गुडि़या अपने घर वापस नहीं गई. वह ज्ञानप्रकाश के साथ चली गई.

दूसरी ओर जब कई दिनों तक राजकुमार गुडि़या और बच्चों के साथ घर नहीं लौटा तो उस की तलाश शुरू हो गई. काफी प्रयास के बाद भी उस का पता नहीं चला तो राजकुमार की मां रूषमा देवी और भाई प्रेमप्रकाश की समझ में आ गया कि राजकुमार के साथ कोई अनहोनी हो गई है. उन्हें गुडि़या और ज्ञानप्रकाश के अवैधसंबंधों की जानकारी थी. ज्ञानप्रकाश का भी कोई अतापता नहीं था. इसलिए रूषमा देवी ने फरीदपुर थाने में गुडि़या और ज्ञानप्रकाश के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया. लेकिन फरीदपुर पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की. इस पर उस के घर वालों ने यह मुकदमा थाना बारादरी में स्थानांतरित कराने के लिए पुलिस अधिकारियों के पास कई चक्कर लगाए. लेकिन अधिकारियों ने इस में कोई रुचि नहीं ली.

राजकुमार के घर वालों ने हार नहीं मानी. उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिस के बाद अदालत ने मुकदमे को बारादरी थाने में स्थानांतरित करने का आदेश दिया. इसी बीच इसी साल फरवरी में गुडि़या राजकुमार के घर वालों के हत्थे चढ़ गई. उस से जब पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि राजकुमार दिल्ली में रह कर नौकरी कर रहा है, लेकिन वह दिल्ली में कहां है, उसे नहीं मालूम. घर वालों को बरगला कर गुडि़या उन की आंखों में धूल झोंक कर फिर गायब हो गई. जब ज्ञानप्रकाश को पता चला कि गुडि़या को उस के घर वालों ने पकड़ लिया है तो उस ने 20 फरवरी, 2015 को फरीदपुर के ही पीतांबरपुर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली.

8 मार्च, 2015 को राजकुमार के अपहरण का मुकदमा फरीदपुर से बारादरी थाने स्थानांतरित कर दिया गया था. बारादरी थाने के इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम ने इस केस की जांच का जिम्मा सबइंसपेक्टर ओमवीर सिंह को सौंप दिया. 20 अप्रैल को एक बार गुडि़या फिर राजकुमार के घर वालों की पकड़ में आ गई. परिजनों ने उसे बारादरी पुलिस के सुपुर्द कर दिया. सबइंसपेक्टर ओमवीर सिंह ने महिला कांस्टेबल की उपस्थिति में गुडि़या से कड़ाई से पूछताछ की तो उस ने पूरी घटना बयान कर दी. पूछताछ के बाद 20 अप्रैल, 2015 को ही ओमवीर सिंह ने पुलिस टीम के साथ सतीश को सैटेलाइट बसअड्डे से गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ के बाद ओमवीर सिंह उसे ले कर सहासा के जंगल में गए और राजकुमार की लाश बरामद करने के लिए एक खेत में खुदाई करवाई. लेकिन सफलता नहीं मिली. चूंकि सतीश लाश दफनाते समय मौजूद नहीं था, इसलिए वह सही जगह नहीं बता सका. इस के बाद पुलिस ने सतीश व गुडि़या को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. 28 अप्रैल को शंकर ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. इस की जानकारी मिलते ही एसआई ओमवीर सिंह ने अदालत से अनुमति ले कर जेल  में शंकर के बयान लिए. इस के बाद उन्होंने शंकर की पुलिस रिमांड के लिए अदालत में प्रार्थनापत्र दिया. 5 मई को पुलिस को शंकर का 24 घंटे का रिमांड मिल गया.

इस के बाद एसआई ओमवीर सिंह पुलिस टीम के साथ शंकर को ले कर सहासा के जंगल में गए. वहां राजकुमार के घर वालों, रिश्तेदारों व ग्रामीणों की मौजूदगी में शंकर की निशानदेही पर एक गड्ढा खुदवाया गया. 2 फुट की खुदाई होते ही कपड़े फावड़े में फंस गए. जब मिट्टी हटाई गई तो एक नरकंकाल मिला. कंकाल के साथ ही कोटपैंट, स्वेटर, मफलर, मौजे और जूते भी बरामद हुए. उन कपड़ों को देख कर प्रेमप्रकाश ने उस नरकंकाल की शिनाख्त अपने भाई राजकुमार के रूप में की. मां अपने बेटे का कंकाल देख कर फफक कर रो पड़ी. उसे किसी तरह सांत्वना दे कर चुप कराया गया. इस के बाद कंकाल को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया गया.

तत्पश्चात पुलिस शंकर को ले कर थाने लौट आई. अपहरण के मुकदमे में हत्या और साक्ष्य छिपाने की धाराएं और बढ़ाने के साथ ही इस केस में शंकर, सतीश और टीकाराम का नाम भी जोड़ लिया गया. इस के बाद शंकर की निशानदेही पर पुलिस ने उस के घर से हत्या में इस्तेमाल बांका भी बरामद कर लिया. अगले दिन रिमांड अवधि खत्म होने से पहले शंकर को न्यायालय में पेश कर दिया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक टीकाराम फरार था, पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. Illicit Relationship

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Bhopal Crime News: धरे गए एटीएम के शातिर ठग

Bhopal Crime News: परमिंदर, नरेंद्रजीत और रवींद्र ने एटीएम की एक ऐसी खामी पकड़ ली थी, जिस की तरफ न तो कभी बैंक वालों का ध्यान गया था, न ही शायद एटीएम बनाने वालों का. उसी खामी की वजह से इन्होंने कई बैंकों को करोड़ो का चूना लगा दिया.

पुराने भोपाल का पीरगेट इलाका तंग गलियों और संकरी सड़कों वाला है, जिस की वजह से यहां दिनभर इतनी भीड़भाड़ बनी रहती है कि आधा किलोमीटर का पैदल रास्ता तय करने में आधा घंटा लग जाना मामूली बात है. यहां चलने वाले लोग खुद को देखने के बजाय आगे चल रहे लोगों को धकिया कर अपने लिए जगह बना कर आगे निकलने की जुगत में लगे रहते हैं. लेकिन जैसेजैसे रात गहराती जाती है, वैसेवैसे यहां भीड़ कम होने लगती है. 6 मई की रात लगभग 9 बजे रोजाना की तरह यहां भीड़भाड़ कम होने लगी तो आईसीआईसीआई बैंक के एटीएम पर ड्यूटी कर रहे गार्ड पुष्पेंद्र सिंह यादव ने थोड़ी राहत महसूस की, क्योंकि दिन भर एटीएम के अंदरबाहर होती भीड़, सड़क की तरह अब एटीएम पर भी कम हो गई थी.

पुष्पेंद्र को लगा कि अब कम और जरूरतमंद लोग ही आएंगे तो वह एटीएम के अंदर चला गया और वहां रखे सामान की जांच करने के बाद वहां रखे रजिस्टर को उलटपलट कर बाहर आ गया. तभी बड़ी सी एक कार धीमी होती एटीएम के सामने आ कर रुकी, जिस से 2 नवयुवक उतरे, जिन में से एक सरदार था तो दूसरा सामान्य लड़कों जैसा. पुष्पेंद्र का सामना रोज ऐसे लोगों से होता रहता था, जो दूर से वाहन धीमा कर के सड़क के दोनों किनारे एटीएम ढूंढ़ते हुए आते थे और कार साइड में लगा कर पैसे निकाल कर चले जाते थे. दोनोें नवयुवक कार से उतर कर एटीएम के पास आए तो बाहर खड़े पुष्पेंद्र को देख कर कुछ सकपकाए. इस के बाद सामान्य से दिखने वाले युवक ने आवाज को रौबीला बनाने की कोशिश करते हुए पूछा, ‘‘एटीएम में कैश है या नहीं?’’

आमतौर पर इस तरह के सवाल वही लोग करते हैं, जिन्हें किसी अन्य एटीएम से नकद रुपए न मिले हों या फिर जो पहले कभी इस स्थिति से गुजर चुके हों कि कार्ड स्वाइप कर के पासवर्ड डाला हो, उस के बाद स्क्रीन पर संदेश आया हो कि कैश नहीं है. जवाब में गार्ड ने ‘हां’ में सिर हिलाया और बेखयाली से एटीएम के अंदर बने कमरे, जिसे बैकरूम कहा जाता है, में चला गया. लेकिन वह वहां लगे सीसीटीवी को गौर से देख रहा था, जिस में दोनों युवक साफ दिखाई दे रहे थे.

स्क्रीन पर उन की हरकतें देख कर पुष्पेंद्र चौंका. इस की वजह यह थी कि ग्राहक आते हैं, कार्ड डाल कर पैसा निकालते हैं और चले जाते हैं. लेकिन वे दोनों युवक एटीएम का बड़ी बारीकी से निरीक्षण कर रहे थे. पुष्पेंद्र की समझ में कुछ आता, उस के पहले ही दोनों में से एक युवक ने बैकरूम का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया. लड़कों की इस हरकत से पुष्पेंद्र किसी अनहोनी के डर से घबरा गया, लेकिन उस ने अपनी समझ कायम रखी. इस के बाद वह पूरी तरह से सीसीटीवी पर आंखें गड़ा कर दोनों की हरकतें देखने लगा.

एक युवक ने कार्ड डाला और नोट निकाले, लेकिन कार्ड मशीन में डालने से पहले उस ने एक खास किस्म का इशारा अपने साथी को किया, जिस का मतलब पुष्पेंद्र उस समय समझ नहीं पाया. लेकिन जब नोट निकलने के तुरंत बाद उस ने झपट कर बिजली का मेन पावर स्विच बंद कर दिया, जिस से पूरे एटीएम में अंधेरा छा गया, तब पुष्पेंद्र को हैरानी हुई. यह सब इतनी जल्दी और अप्रत्याशित तरीके से हुआ था कि पुष्पेंद्र माजरा समझ नहीं पाया, लेकिन उन दोनों के भागते ही उस ने सब्र से काम लेते हुए बैकरूम का दरवाजा तोड़ कर एटीएम के बाहर छलांग सी लगाई तो रफ्तार पकड़ती कार का नंबर डीएल 07 2757 उस की आंखों और दिमाग दोनों में दर्ज हो गया. कार का मौडल स्विफ्ट भी उस ने पहचान लिया था.

एटीएम पर तैनात किए जाने वाले गार्डों को सिक्योरिटी एजेंसियां खासतौर से यह टे्रनिंग देती हैं कि ऐसी हालत में सब से पहले उन्हें क्या करना चाहिए. पुष्पेंद्र को वह सबक याद आया तो उस ने तुरंत अपने मोबाइल फोन से नजदीकी कोतवाली तलैया पुलिस को इस घटना की सूचना दे दी. सूचना मिलते ही पुलिस हरकत में आ गई और कार की खोज शुरू कर दी. पुलिस की कोशिश रंग लाई और अगले दिन कार ही नहीं, दोनों युवक भी पकड़ लिए गए. थाने ला कर दोनों युवकों से पूछताछ की गई तो उन्होंने पुलिस को जो बताया, उस से वहां मौजूद पुलिस वालों की आंखें फटी की फटी रह गईं. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि एटीएम के जरिए करोड़ों की ठगी करने वाले ये युवक इतनी आसानी से उन के हाथ लग गए हैं. थाना पुलिस ने तुरंत इस घटना की सूचना आला अफसरों को दे दी.

पकड़े गए आरोपियों में से एक ने अपना नाम परमिंदर सिंह पुत्र हरविंदर सिंह, उम्र 27 वर्ष, निवासी 870-ए इस्लामगंज, लुधियाना और दूसरे ने नरेंद्रजीत सिंह पुत्र सुरेंद्र सिंह, उम्र 44 साल, निवासी 2158 टेलीफोन एक्सचेंज के पास, 29-ए सैक्टर फरीदाबाद, हरियाणा बताया. वे क्या करते हैं, कैसे करते हैं, यह जानकारी लेने से पहले पुलिस ने उन की तलाशी ली तो उन के पास से अलगअलग बैंकों के कई एटीएम कार्ड मिले. एक और साथी रवींद्र सिंह उर्फ बल्ला के साथ होने की बात भी उन्होंने कबूली. पूछताछ में पता चला कि ये तीनों व्यावसायिक इलाके एमपीनगर के होटल कृष्णा में ठहरे थे. पुलिस टीम होटल पहुंची तो रवींद्र सिंह उर्फ बल्ला वहां नहीं था, शायद वह फरार हो चुका था. लेकिन इस बात की पुष्टि हो गई कि ये तीनों अपने सही नामों से होटल में ठहरे थे.

होटल के उन के कमरे से अलगअलग बैंकों के 60 एटीएम कार्ड बरामद हुए थे, साथ ही एक डायरी भी, जिस में इन ठगों की ठगी के ब्यौरे दर्ज थे. उस ब्यौरे को देख कर पुलिस वालों की हैरानी और बढ़ गई. थोड़ी सख्ती करने पर उन्होंने एटीएम द्वारा ठगी करने की जो कहानी बयान की, वह इस तरह थी. ये तीनों ठग महज 12वीं तक पढे़ थे और दिलचस्प तरीके से ठगी को अंजाम देने से पहले ये लुधियाना की एक कोरियर कंपनी में काम करते थे. लगभग 2 सालों से इन्होंने पूरी तरह से एटीएम कार्ड द्वारा ठगी करने को व्यवसाय बना लिया था. इन 2 सालों में इन्होंने लगभग 2 करोड़ का चूना बैंकों को लगाया था. इस के लिए इन्होंने खुद के अलावा रिश्तेदारों और जानपहचान वालों के नाम से विभिन्न बैंकों में खाते खुलवा रखे थे, लेकिन उन के एटीएम कार्ड ये अपने पास रखते थे.

आम लोग एटीएम के तकनीकी तौरतरीकों को ज्यादा नहीं जानते. लेकिन इन शातिरों ने एटीएम की एक अहम खामी पकड़ रखी थी. यह खामी थी कि अगर कार्ड स्वाइप कर मशीन से पैसे निकाले जाएं तो उस की खाते में एंट्री होने में ढाई सेकेंड लगते हैं. इन्हीं ढाई सेकेंड का फायदा ये तीनों उठा रहे थे. तीनों में से एक पैसे निकालता था और दूसरा तुरंत पावर औफ कर देता था, जिस से निकाले गए पैसे की एंट्री खाते में नहीं हो पाती थी. निकाला गया पैसा जेब में रखने के बाद ये तुरंत संबंधित बैंक के कस्टमर केयर को फोन कर के कहते थे कि कार्ड डाल कर पासवर्ड भी डाला था, लेकिन हमारा पैसा नहीं निकला है.

उन की इस शिकायत पर बैंक निकाली गई रकम बाद में इन के खाते में डाल देती थी, क्योंकि निकासी की राशि उस के दस्तावेजों में दर्ज नहीं हो पाती थी. इस तरह ये रुपए भी निकाल लेते थे और एक बार फिर बैंक के अपने खाते में रुपए जमा करवा लेते थे. दरअसल, जब कोई भी एटीएम से पैसे निकालता है तो लेनदेन का कोड 00 दर्ज होता है. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में ढाई सेकेंड लगते हैं. इसी बीच अगर बिजली चली जाए या पावर औफ कर दिया जाए, जैसा ये लोग करते थे तो लेनदेन में एरर कोड यानी त्रुटि दर्ज होती है. ग्राहक की शिकायत पर बैंक को यह मानना पड़ता है कि पैसा एटीएम मशीन से नहीं निकला है, इसलिए वह पैसा बैंक को ग्राहक के खाते में डालना पड़ता है, ऐसा पैसा बैंक महीने के आखिर में क्लोजिंग के दौरान मिसलेनियस कैश में डाल देती है.

परमिंदर, नरेंद्रजीत और रवींद्र ने 2 सालों में ठगी की तकरीबन 5 सौ वारदातों को अंजाम देते हुए अलगअलग एटीएम से लगभग 2 करोड़ रुपए की कमाई की थी. जिन बैंकों को इन्होंने चूना लगाया था, उन में स्टेट बैंक औफ इंडिया, आईडीबीआई बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, इंडस बैंक, फेडरल बैंक, केनरा बैंक, बैंक औफ इंडिया, बैंक औफ बड़ौदा और थाइलैंड की भी एक बैंक शामिल है. इन ठगों ने दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद, लुधियाना, फरीदाबाद, अमृतसर, सूरत, अहमदाबाद के अलावा ग्वालियर, झांसी, मुंबई, गोवा, बड़ौदा, अंबाला और चंडीगढ़ जैसे शहरों के एटीएम से रुपए निकाले थे. यह अलगअलग शहरों में जा कर इसलिए रुपए निकाल रहे थे, ताकि किसी को उन पर शक न हो.

रुपए निकालने ये कार से जाते थे. आमतौर पर ये उन एटीएम को ज्यादा निशाना बनाते थे, जो सुनसान इलाके में होते थे और वहां गार्ड नहीं होते थे. ठगी करतेकरते ये तीनों काफी चालाक हो गए थे. रुपए निकलने और एंट्री होने में ज्यादा वक्त लगे, इस के लिए ये एक बैंक का कार्ड दूसरे बैंक के एटीएम में इस्तेमाल करते थे. निकाले गए रुपए ये मौजमस्ती और अय्याशी में उड़ा रहे थे. आमतौर पर बगैर मेहनत की कमाई इसी तरह बरबाद होती है.

भोपाल पुलिस ने रवींद्र सिंह के पते पर छापा मारा तो वह वहां भी नहीं मिला. इसी के साथ वे लोग भी भूमिगत हो गए, जिन के खातों के एटीएम कार्ड्स इन के पास थे. इस से यही जाहिर होता है कि यह ठगी गिरोहबद्ध तरीके से हो रही थी. जिन लोगों के एटीएम इन के पास थे, उन्हें या तो कमीशन दिया जा रहा था या फिर झांसा कि हम रुपए निकालेंगे तो बाद में जमा करा देंगे. संभावना इस बात की ज्यादा है कि इन खातों में रुपए भी यही लोग जमा कराते रहे होंगे.

ठगी का मामला दर्ज करने के बाद पुलिस ने इन्हें रिमांड पर लिया. भोपाल में यह इन की पहली वारदात थी, जिस में सिक्योरिटी गार्ड पुष्पेंद्र यादव की सूझबूझ और फुर्ती की वजह से ये पकड़े गए, वरना ये इसी तरह बेखौफ हो कर बेधड़क बैंकों को ठगते रहते और अय्याशी करते रहते. इन ठगों के पकड़े जाने के बाद इन की ठगी का समाचार अखबारों में छपा और टीवी पर दिखाया गया तो जिस ने भी यह समाचार पढ़ा और देखा, दांतों तले अंगुली दबा ली कि अरे ऐसा भी होता है, लेकिन ऐसा हो रहा था.

पुलिस इस मामले में बैंकों की भूमिका को भी संदिग्ध मान रही है. इस बारे में उस ने रिजर्व बैंक औफ इंडिया को पत्र भी लिखा है कि लुटे बैंकों के प्रबंधकों की जांच किसी विशेष एजेंसी से कराई जाए. ठगी की रकम का औसत निकाला जाए तो इन्होंने एक खाते में से 2 सालों में लगभग 3 लाख रुपए निकाले हैं. हैरानी की बात यह है कि इस के बाद भी किसी बैंक या बैंक अधिकारी का ध्यान इस तरफ नहीं गया. जिन बैंकों के एटीएम से ये रुपए निकालते थे, उसे ये डायरी में शायद इसलिए दर्ज कर लेते थे कि याद रहे कि किस खाते में कितने रुपए हैं और पिछली बार कब रुपए निकाले गए थे. 60 में से 20 एटीएम कार्ड्स तीनों आरोपियों के खुद अपने नाम के थे, बाकी 40 दूसरे रिश्तेदारों और दोस्तों के नाम थे. गिरफ्तारी के बाद दोनों आरोपियों से 44 हजार रुपए नकद बरामद हुए थे.

बगैर कुछ किए करोड़ों कमाने के इस हुनर के खुलासे से बैंकों के कान अब भले ही खड़े हो गए हैं, लेकिन ढाई सेकेंड की परेशानी का खामियाजा अब उन आम ग्राहकों को भुगतना तय है, जिन की रकम वाकई किसी और तकनीकी खामी या बिजली गुल हो जाने से नहीं निकलेगी. जरूरत इस बात की भी महसूस हो रही है कि बैंक जल्द ही लेनदेन के इस ढाई सेकेंड को दुरुस्त करे, वरना अगर ठगी के इस अनोखे धंधे में और लोग भी लिप्त हो गए तो बैंकों के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है. Bhopal Crime News

 

Hindi Stories: नन्ही की ‘सपना’

Hindi Stories: नन्ही थी तो लड़की, पर उस का कामधाम ही नहीं सोच और बातव्यवहार भी लड़कों जैसा था. शायद इसीलिए उस ने लड़के से नहीं लड़की से शादी की.

उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज के कस्बा सोरों की रहने वाली केला देवी अपनी बेटी नन्ही की शादी के लिए बहुत ज्यादा परेशान थीं, क्योंकि बाकी उन के सभी बच्चों की शादियां हो चुकी थीं. पति राम सिंह की मौत बरसों पहले हो चुकी थी. उस की सोरों में परचून की दुकान थी. उस के 5 बेटों में 2 बेटे दिल्ली में नौकरी करते थे, बाकी के 3 सोरों में ही अपना काम करते थे. बेटी नन्ही बचपन से ही दुकान पर बैठ कर पिता की मदद करती थी. घर में पढ़ाई का माहौल नहीं था, इसलिए राम सिंह का कोई भी बच्चा पढ़ालिखा नहीं था. लेकिन नन्ही ऐसी थी, जो दस्तखत कर लेती थी.

पिता की मौत के बाद नन्ही ने दुकान की ही नहीं, घरपरिवार की भी सारी जिम्मेदारी संभाल ली थी. उसी ने दुकान की कमाई से 2 बड़ी बहनों की शादियां कीं. वह बचपन से ही लड़कों वाले काम करती थी, इसलिए लड़कों की ही तरह रहती थी. कपड़े भी वह उन के जैसे ही पहनती थी. बातचीत का लहजा भी उस का लड़कों जैसा ही था. यह सब देख कर यही लगता था, जैसे वह खुद को लड़की न समझ कर लड़का समझती है.

केला देवी जब भी उस से शादी की बात करती, वह साफ मना कर देती. लेकिन मां को तो उस की शादी की चिंता थी, क्योंकि वह जवान हो चुकी थी. अब भी वही दुकान पर बैठती थी. लोग उसे बचपन से ही दुकान पर बैठती देखते आए थे, इसलिए किसी को इस में कुछ अजीब नहीं लगता था. दुकानदारी में नन्ही काफी कुशल थी. वह त्योहारों का सामान तो लाती ही थी, गर्मियों में बर्फ भी बेचती थी. वह दुकान पर काफी मेहनत करती थी. करीब 2 साल पहले की बात है. केला देवी ने जाहरबीर बाबा को जात चढ़ाने का विचार किया. इस के लिए उस ने भानपुर नगरिया के रहने वाले अमरीश से बात की. वह अपनी विधवा मां और भाईबहनों के साथ रहता था. जाहरबीर बाबा का स्थान राजस्थान के बागड़ में पड़ता है.

बात कर के केला देवी नन्ही तथा अन्य घर वालों को साथ ले कर अमरीश के साथ बाबा जाहरबीर की जात चढ़ाने के लिए चल पड़ी. अमरीश के साथ उस की मां और 17 वर्षीया बहन सपना भी गई थी. पूरे एक सप्ताह का प्रोग्राम था, इसलिए सभी वहां एक धर्मशाला में ठहरे. नन्ही खुश थी कि कुछ दिनों के लिए दुकान से छुट्टी मिल गई है. लेकिन यहां उस की नजर अमरीश की बहन सपना पर पड़ी तो उसी पर जम कर गई.

सपना उस समय साथ आए लोगों को पानी पिला रही थी. नन्ही ने उसे इशारे से बुला कर कहा, ‘‘सब को तो पानी पिला रही हो, मुझे नहीं पिलाओगी क्या?’’

‘‘क्यों नहीं पिलाऊंगी. आखिर हम तुम्हारे साथ ही तो आए हैं. तुम्हें प्यासा कैसे रख सकती हूं.’’ कह कर सपना ने पानी का गिलास नन्ही की ओर बढ़ाया तो उस ने गिलास के बजाय उस का हाथ पकड़ लिया. सपना ने हैरानी से उसे घूरते हुए कहा, ‘‘यह क्या कर रही हो?’’

‘‘तुम्हारा हाथ देख रही हूं, कितना सुंदर और मुलायम है.’’

नन्ही की बात सपना को अटपटी लगी. वह कुछ सोच रही थी कि नन्ही ने दूसरे हाथ से गिलास थाम कर उसे अपनी ओर खींचा तो वह उस की गोद में आ गिरी. इस के बाद सपना का चेहरा अपनी ओर घुमा कर बोली, ‘‘यार, तुम सचमुच बहुत खूबसूरत हो. मेरे सपनों में आने वाली हसीना की तरह.’’

सपना खुद को संभालते हुए जल्दी से उठ कर बोली, ‘‘लगता है, फिल्में बहुत देखती हो, तभी इस तरह के डायलौग बोल रही हो.’’

‘‘फिल्में देखने की फुरसत कहां है. लेकिन तुम्हारे चेहरे पर जो लिखा है, उसे पढ़ना फिल्म देखने जैसा ही है.’’

नन्ही की बातें सपना की समझ में नहीं आईं. वह खाली गिलास ले कर चली गई, साथ ही नन्ही के दिल का करार भी ले गई. नन्ही को लगा, सपना ही वह लड़की है, जिसे वह जीवनसाथी के रूप में अपना सकती है. नन्ही सपना के करीब आने की कोशिश करने लगी. लेकिन वह जानती थी कि सपना को दिल की बात समझाना आसान नहीं है. इस के बावजूद उस की नजरें सपना पर ही टिकी रहती थीं. हमेशा वह उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करती रहती थी. उसे अपने दिल की बात समझाना चाहती थी. वह उसे बताना चाहती थी कि देखने में भले ही वह लड़की है, लेकिन मन से वह पुरुष है. सपना उसे लड़की समझ रही थी, इसलिए उस की ओर खास ध्यान नहीं दे रही थी.

वह अपने साथ आए लोगों की सेवा में लगी रहती थी. जबकि नन्ही दिल की बात उस तक पहुंचाने के लिए परेशान थी. वह सपना से प्यार करने लगी थी और यह बात उस तक पहुंचाना चाहती थी. धर्मशाला में सब के सामने यह बात कही नहीं जा सकती थी. इसलिए एक दिन वह घूमने के बहाने सपना को एकांत में ले गई. उसे बगल में बैठा कर बांहों में जकड़ लिया तो सपना घबरा कर बोली, ‘‘तुम तो लड़कों जैसी हरकतें करती हो. मुझे अब तुम से डर लगने लगा है.’’

‘‘तुम ने सही समझा. मैं सिर्फ देखने में लड़की हूं, बाकी सोच लड़कों वाली है. मैं तुम से प्यार करने लगी हूं. तुम्हें देख कर मेरी आंखों को बहुत सुकून मिलता है.’’ कह कर उस ने सपना की कलाई थाम ली. सपना को उस का यह स्पर्श किसी पुरुष का लगा, इसलिए उस का शरीर सिहर उठा. उस ने हैरानी से नन्ही की ओर देखा, इस के बाद अपना हाथ छुड़ा कर बोली, ‘‘लड़की भी कहीं लड़की से प्यार कर सकती है?’’

‘‘जब तुम भी मुझे प्यार करने लगोगी तो तुम्हें पता चल जाएगा कि एक लड़की दूसरी लड़की से कैसे प्यार कर सकती है.’’

‘‘अब हमें चलना चाहिए. सब इंतजार कर रहे होंगे.’’ कह कर सपना उठ खड़ी हुई.

‘‘वादा करो, फिर मिलोगी?’’

‘‘हां मिलूंगी.’’ कह कर सपना धर्मशाला की ओर बढ़ी तो पीछेपीछे नन्ही भी चल पड़ी.

सपना परेशान थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उस के दिल में नन्ही ने जो हलचल पैदा कर दी थी, उस से वह बेचैन थी. नन्ही उसे अपनी ओर खींच रही थी, जबकि वह लड़की थी. उस का दिल बेकाबू हो रहा था. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. उस का दिल जिस तरह नन्ही को ले कर धड़का था, इस के पहले किसी लड़के को ले कर भी नहीं धड़का था. सपना 17 साल की थी. पर गरीब घर की बिना बाप की बेटी को मां ने नसीहतें देदे कर इतना बड़ा किया था. इसलिए अब तक वह किसी लड़के के करीब नहीं आई थी. उसे पुरुष के स्पर्श का कोई अनुभव नहीं था. लेकिन नन्ही के स्पर्श ने उस के तनमन को झकझोर दिया था.

उस रात सभी सोने के लिए लेटे तो नन्ही ने इशारे से सपना को बुलाया और अपने बगल लिटा लिया. दोनों लड़कियां थीं, इसलिए किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया. उस रात दोनों काफी करीब आ गईं. अगले दिन लौटना था, सपना अपने घर चली गई तो नन्ही अपने घर आ गई. लेकिन अब नन्ही का मन काम में बिलकुल नहीं लग रहा था. वह सपना से मिलने का बहाना खोजने लगी. नन्ही जानती थी कि 2 लड़कियों की दोस्ती पर किसी को ऐतराज नहीं होगा, लेकिन जब लोगों को उन की नजदीकियों का पता चलेगा तो जरूर तूफान आ जाएगा. नन्ही को एक डर यह भी था कि कहीं सपना का मन बदल न जाए. नन्ही को पता था कि नगरिया में सपना की एक मौसी रहती हैं. सपना से मिलने में परेशानी न हो, एक दिन वह उस की मौसी के यहां गई और मौसी की बेटी से दोस्ती कर ली. उसी के माध्यम से सपना और उस की मुलाकातें होने लगीं.

धीरेधीरे दोनों को प्यार रास आने लगा. नन्ही सपना की हर जरूरतें पूरी करने लगी. अब वह कभीकभी सपना के घर भी जाने लगी. तब ओमवती ने सपने में भी नहीं सोचा था कि इन दोनों लड़कियों के बीच क्या चल रहा है. वह गांव की औरत थीं, उन्हें मालूम ही नहीं था कि ऐसा भी होता है. पहले तो सब सामान्य लग रहा था. कुछ दिनों बाद नन्ही ने सपना को एक मोबाइल फोन दिलवा दिया, जिस से उसे बात करने में तो आसानी हो ही गई, मिलने में भी आसानी हो गई. जरूरत पड़ने पर नन्ही ओमवती की आर्थिक मदद भी कर देती थी.

लेकिन सच्चाई को लाख छिपाया जाए, उजागर हो ही जाती है. एक दिन ओमवती ने सपना और नन्ही को कुछ इस स्थिति में देख लिया कि सन्न रह गई. इस के बाद उस की समझ में आ गया कि नन्ही उस की बेटी पर इतना मेहरबान क्यों है. उस ने नन्ही से साफसाफ कह दिया, ‘‘तुम्हारा हमारे घर आना किसी को अच्छा नहीं लगता, इसलिए तुम हमारे यहां मत आया करो.’’

‘‘लेकिन चाची मैं ने किया क्या है? सपना मेरी दोस्त है, उस से मिलने आ जाती हूं. इस में गलत क्या है?’’

‘‘यह सब मैं नहीं जानती. बस तुम समझ लो कि मेरे घर कोई मर्द नहीं है. मुझे पड़ोसियों का ही सहारा है. मुझे उन्हीं की मदद से बेटी की शादी करनी है.’’

‘‘चाची, आप पड़ोसियों की इतनी चिंता क्यों करती हैं. मुझे सपना और आप से हमदर्दी है, इसलिए चली आती हूं. अगर आप को मेरा आना अच्छा नहीं लगता तो नहीं आऊंगी.’

‘‘यही हम दोनों के लिए अच्छा रहेगा.’’ ओमवती ने कहा.

मां के इस व्यवहार से सपना तड़प उठी. उस ने कहा, ‘‘मां, तुम नन्ही से यह क्या कह रही हो? वह हमारी कितनी मदद करती है.’’

ओमवती ने बेटी को डांटा. तभी गांव का रहने वाला महिपाल आ गया. उस ने कहा, ‘‘ओमवती इस चिडि़या के पर उग आए हैं. लगता है, उन्हें काटना पड़ेगा.’’

महिपाल की बात सुन कर नन्ही बोली, ‘‘खबरदार, सपना को कुछ कहा तो अच्छा नहीं होगा. मैं तुम्हारी हरकतों को अच्छी तरह जानती हूं. मैं यह भी जानती हूं कि तुम्हारी नजर सपना पर है. लेकिन याद रखना, अगर सपना को कोई नुकसान पहुंचा तो मैं तुम्हें छोड़ूंगी नहीं.’’

नन्ही के तेवर देख कर महिपाल घबरा गया. उस के दिल में चोर तो था ही, वह ओमवती और सपना के चक्कर में वहां आता था.

इस घटना के बाद नन्ही गंभीर हो गई. उसे लगा कि सपना की मां और महिपाल उस की राह में रोड़ा बन सकते हैं. कई दिनों तक सपना और नन्ही की न तो मुलाकात हुई और न ही फोन पर बातें हो सकीं. एक दिन सपना ने फोन कर के बताया कि मां ने फोन छीन लिया है, इसलिए वह फोन नहीं कर पाई. उस ने रोरो कर कहा कि उसे घर में कैद कर दिया गया है. महिपाल मम्मी से कह रहा था कि वह जल्दी से उस की शादी करा दे. अब वही कुछ करे, यहां उस का दम घुटता है.

‘‘तुम चिंता मत करो सपना, मैं जल्दी ही कुछ करती हूं. मैं तुम्हें उस नरक से जल्दी ही निकालती हूं.’’ नन्ही ने कहा.

ओमवती ने सपना के लिए लड़के की तलाश शुरू कर दी थी. उसे सपना के लिए लड़का मिल भी गया था. सपना को जब पता चला कि मां ने उस के लिए लड़का पसंद कर लिया है तो उस ने नन्ही को फोन कर के सारी बात बता कर कहा, ‘‘तुम जल्दी से मुझे यहां से निकालो वरना ये लोग मेरी शादी कर देंगे.’’

18 अप्रैल, 2015 को लड़के वालों को ओमवती के घर आना था. उसी दिन गोद भराई भी होनी थी. नन्ही सोच में पड़ गई कि अब क्या किया जाए. उस ने तुरंत निर्णय लिया और अपने शुभचिंतकों से बात कर के सपना को फोन किया कि वह 14 अप्रैल को घर से बाहर मिले, उस के बाद वह सब संभाल लेगी. इसी बीच नन्ही ने वकील से भी बात कर ली थी. ओमवती गोद भराई की तैयारी में जुटी थी. इस चक्कर में उस का ध्यान सपना के ऊपर से हट गया था. वह खुश थी कि सपना की शादी के बाद नन्ही से छुटकारा मिल जाएगा. 14 अप्रैल को योजना के अनुसार, सुबह 8 बजे के करीब सपना घर से निकल गई. उस समय अमरीश पड़ोसी गांव में गया हुआ था तो ओमवती घर के काम में लगी थी.

अचानक ओमवती को सपना की याद आई तो वह उसे कहीं दिखाई नहीं दी. उसे लगा कि पड़ोस में गई होगी. लेकिन जब वह पड़ोसियों के यहां भी नहीं मिली तो ओमवती को चिंता हुई. उस ने अमरीश और महिपाल को उस की तलाश में लगा दिया. जब सपना गांव में नहीं मिली तो सभी को यही लगा कि सपना नन्ही के यहां होगी. ओमवती ने केला देवी को फोन किया तो पता चला कि सपना वहां भी नहीं थी. नन्ही भी 2 दिनों से घर से गायब थी.

ओमवती परेशान हो गई. लड़के वाले आएंगे तो वह उन से क्या कहेगी. अगले दिन थाने गई और पूरी बात थानाप्रभारी सुरेशचंद्र को बताई. उन्होंने सपना के बारे में पता करने का आश्वासन दे कर उसे घर भेज दिया. वह सपना के बारे में पता करते 18 अप्रैल को नन्ही सपना के साथ थाना सोरो पहुंची और थानाप्रभारी को एक एफीडेविट दिया, जिस के अनुसार दोनों ने विवाह कर लिया था. उसे पढ़ कर सुरेशचंद्र हैरान रह गए. सोरों जैसे छोटे से कस्बे में समलैंगिक शादी हो सकती है, वह सोच भी नहीं सकते थे.

थानाप्रभारी ने नन्ही को घूर कर देखा तो वह बोली, ‘‘साहब, हम दोनों ने शादी की है, कोई जुर्म नहीं किया है. अब हम साथ रहना चाहते हैं.’’

‘‘लेकिन यह शादी कैसे..?’’ सुरेशचंद्र कुछ और कहते, सपना ने कहा, ‘‘हम दोनों बालिग हैं. हमें भी अपनी मरजी से जीने का हक है. अब कोई हमारी जिंदगी में कैसे दखल दे सकता है.’’

सुरेशचंद्र ने फोन द्वारा ओमवती को सूचना दी. थोड़ी ही देर में दोनों लड़कियों के घर वाले थाने आ गए. बात थाने से बाहर भी पहुंच गई. कस्बे के लिए यह एक अजूबा था, लोग थाने में जुटने लगे.

दोनों पक्षों में बहस होने लगी. ओमवती सपना को अपने साथ ले जाना चाहती थी. उस ने थानाप्रभारी के आगे हाथ जोड़ कर कहा कि आज लड़के वाले उस की बेटी को देखने आने वाले हैं. अगर बेटी घर नहीं गई तो उस की बड़ी बदनामी होगी.

लेकिन सपना ने कहा कि उस की शादी तो नन्ही के साथ हो चुकी है, अब वह दूसरी शादी क्यों करेगी.

‘‘यह कैसी बेहयाई है. भला 2 लड़कियां भी शादी कर सकती हैं?’’ ओमवती ने रोते हुए कहा, ‘‘इस शादी का क्या भविष्य होगा?’’

भीड़ में चखचख होने लगी थी. पुलिस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस मामले में क्या करे. दोनों लड़कियां बालिग थीं. उन पर दबाव भी नहीं डाला जा सकता था. भारत में समलिंगी विवाह को कानूनी मान्यता नहीं है, लेकिन उन्हें साथ रहने से रोका नहीं जा सकता था. सुरेशचंद्र ने ओमवती से कहा, ‘‘भई लड़कियां बालिग हैं, इसलिए हम उन पर दबाव नहीं डाल सकते. ये जहां चाहे, वहां जा सकती हैं. तुम भी जबरदस्ती नहीं कर सकती. अगर तुम अपनी बेटी को घर ले जाना चाहती हो तो तुम्हें अदालत जाना होगा.’’

ओमवती ने अपना सिर पीट लिया. पति की मौत के बाद वह वैसे ही परेशानियों से जूझ रही थी. उस के 5 बेटे और 3 बेटियां थीं. सपना उस की सब से प्रिय बेटी थी. पर उसी ने उसे गहरा आघात पहुंचाया था. 2 लड़कियों के बीच भी शारीरिक संबंध हो सकते हैं, उस ने पहली बार जानासुना था. पुलिस ने सपना को नन्ही के साथ जाने की इजाजत दे दी. दोनों खुशीखुशी घर आ गईं. सपना अब नन्ही की पत्नी थी. सपना ने नन्ही के नाम का मंगलसूत्र पहन कर मांग में सिंदूर भर लिया. नन्ही को किसी की भी परवाह नहीं थी. उस का कहना था कि वह सपना को जान से ज्यादा प्यार करती है, इसलिए उस से शादी कर ली. रही बात समाज की तो वह किसी को कुछ नहीं देता, सिर्फ परेशान करता है.

किसी को उस की मरजी से न रहने देता है, न जीने देता है. वह सपना के साथ जीना चाहती है. रही बात बच्चे की तो वह कोई बच्चा गोद ले लेगी. नन्ही ने सपना से शादी कर के मां का सपना पूरा कर दिया. उस की मां को इस में कुछ गलत नहीं दिखाई देता. क्योंकि नन्ही उस के लिए लड़की नहीं, लड़के की तरह है. उस ने सपना को बहू के रूप में स्वीकार कर लिया है. अब देखना है कि इस शादी का भविष्य क्या होगा? फिलहाल कथा लिखे जाने तक सपना ससुराल में थी और उस का मायके जाने का कोई इरादा नहीं था. नन्ही ही अब उस का सब कुछ है, वही उस का भविष्य संवारेगी, ऐसा उसे विश्वास है. Hindi Stories