सूटकेस में बंद हुआ लिवइन रिलेशन – भाग 1

मनोहर शुक्ला के घर पहुंचते ही नैना और उस के बीच काफी कहासुनी हुई. नैना ने मनोहर शुक्ला को साफ चेतावनी दी कि अगर तुम ने मुझे फ्लैट खरीद कर नहीं दिया तो मैं एसिड पी कर आत्महत्या कर लूंगी. उस के बाद तुम सारी जिंदगी मेरी हत्या के आरोप में जेल में सड़ोगे.

नैना की यह धमकी सुन कर मनोहर शुक्ला के तनबदन में आग लग गई. उसी गुस्से के आवेग में मनोहर शुक्ला ने पीछे से नैना के बाल पकड़ लिए और कहा, “ठीक है जब तुम्हें मरने का ही शौक है तो इस में मैं ही तुम्हारी मदद करता हूं.”

कह कर मनोहर शुक्ला उस को खींच कर बाथरूम में ले गया. वहां पर पहले से ही पानी का एक बड़ा टब भरा हुआ था. बाथरूम में ले जाते ही उस ने उस के मुंह को कई बार टब में भरे पानी में डुबोया और तब तक डुबोता रहा, जब तक उस की मौत नहीं हो गई.

नैना का मर्डर करने के बाद उस की लाश को उस ने बिस्तर पर लिटा दिया. फिर उस का मोबाइल और घर की चाबी ले कर वह अपने काम पर चला गया था.

नेपाल की मूल निवासी 28 वर्षीय नैना महतो अपने भाईबहन के साथ रोजगार की तलाश में मुंबई पहुंची. मुंबई में जाते ही तीनों भाई बहनों ने वसई के नायगांव में एक किराए का मकान लिया और उसी में रहने लगे. वहीं से तीनों के काम की शुरुआत हुई. सब से पहले नैना की बहन जया को एक ब्यूटीशियन के यहां काम मिला. फिर उस के सहारे से ही नैना भी काम पर लग गई. उस के भाई ने भी वहीं पर अपना काम लगा लिया था.

उसी काम करने के दौरान एक दिन नैना की मुलाकात कास्ट्यूम डिजाइनर मनोहर शुक्ला से हुई. जानपहचान दोस्ती तक जा पहुंची और फिर प्यार हुआ. उस के बाद नैना ने अपने भाईबहन से अलग किराए का मकान ले लिया, जहां पर नैना और मनोहर शुक्ला लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे.

फिर एक दिन ऐसा भी आया कि नैना ने मनोहर शुक्ला के साथ सारी जिंदगी गुजारने का वचन ले लिया. लेकिन मनोहर शुक्ला ने उस के साथ शादी करने से साफ मना कर दिया था. उसी दौरान एक दिन नैना के सामने मनोहर शुक्ला की हकीकत सामने आई. पता चला कि वह शादी करने से पहले ही पूर्णिमा नामक युवती के साथ शादी कर चुका था.

यह जानकारी मिलने के बाद मनोहर शुक्ला और नैना के बीच आपसी संबधों को ले कर मनमुटाव पैदा हो गया. फिर नैना ने मनोहर शुक्ला की हरकतों से परेशान हो कर उस पर बलात्कार का केस दर्ज करा दिया, जिस में मनोहर शुक्ला को एक महीने जेल में रहना पड़ा. जेल से जमानत मिलने के बाद वह फिर से नैना के संपर्क में आ गया. दोनों फिर से पहले की तरह मिलने लगे.

12 अगस्त, 2023 की बात है. महाराष्ट्र के नायगांव से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर गुजरात के वलसाड में एक खाड़ी के पास पड़े एक बैग को देख कर लोग हैरत में पड़ गए, लेकिन उस बैग के पास जाने की कोई भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. लोगों को डर इस बात का था कि अगर उस बैग में कोई बम हुआ तो उस से कोई बड़ा हादसा हो सकता है. यही सोच कर वहां पर मौजूद लोगों ने तुरंत इस की सूचना वलसाड पुलिस को दी.

सूटकेस में निकली लाश

खाड़ी के पास लावारिस पड़े बैग की सूचना पाते ही पुलिस आननफानन सूचना में बताए गए पते पर पहुंची. बैग की जगह पहुंचते ही पुलिस ने सब से पहले बैग के आसपास की छानबीन की, वहां पर पुलिस को किसी वाहन के आनेजाने के कोई प्रमाण नहीं मिले.

उस के बाद पुलिस ने उस बैग को खुलवाया तो उस में जो निकला, उसे देखते ही तहलका मच गया. उस बैग में एक युवती का सड़ागला शव था, जिस से तेज दुर्गंध आ रही थी. शव की हालत बेहद खराब थी. उस का चेहरा तक पहचानने में नहीं आ रहा था.

पुलिस ने जैसेतैसे कर उस युवती के शरीर का बारीकी से निरीक्षण कराया तो उस युवती के शरीर पर त्रिशूल का एक टैटू बना हुआ था. साथ ही उस के गले में ओम पेंडेंट वाली एक चेन भी थी, जिस से साबित हो गया था कि मृतका कोई हिंदू युवती ही थी.

सूटकेस में मिली लाश के पुलिस ने हर ऐंगल से फोटोग्राफ्स कराने के बाद अपनी काररवाई पूरी करते हुए लाश का पंचनामा भरने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. लेकिन पोस्टमार्टम की जो रिपोर्ट आई, उस से उस युवती की मौत का जो कारण सामने आया, वह काफी चौंका देने वाला था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया कि युवती की मौत पानी में डूबने से हुई थी. रिपोर्ट पढ़ कर पुलिस भी हैरान हुई कि जब युवती की मौत पानी में डूबते से हुई तो उस का शव बैग में इस तरह से पैक कर के क्यों डाला गया था? यह पुलिस के लिए एक हैरान करने वाली बात थी. इस मामलेे में पुलिस ने एडीआर (आकस्मिक मृत्यु रिपोर्ट) दर्ज की थी.

मामले को एडीआर में दर्ज करने के बाद पुलिस ने हर तरह से मृतका की शिनाख्त कराने की पूरी कोशिश की. सोशल मीडिया से ले कर न्यूजपेपर व न्यूज चैनलों पर उस की सूचना प्रसारित कराई, लेकिन कोई लाभ नहीं मिला. फिर भी पुलिस ने उस युवती के शरीर से डीएनए कराने के लिए कुछ सैंपल भी सुरक्षित करा लिए थे. युवती के शव की बिगड़ी हालत को देखते हुए पुलिस ने उस का अंतिम संस्कार करा दिया था.

जया को मिली नैना के गायब होने की खबर

जया मुंबई की टीवी इंडस्ट्री में मेकअप आर्टिस्ट थी. अगस्त के महीने में जया किसी शूटिंग के सिलसिले में पुणे जिले में स्थित लोनावला में गई हुई थी. उसी दौरान मुंबई निवासी उस के दोस्त मेकअपमैन प्रमोद शाह ने उस के नंबर पर बात की.

प्रमोद शाह ने पूछा, “आजकल नैना कहां पर है. न तो उस का फोन ही मिल रहा है और न ही वह अपने फ्लैट पर मौजूद है. उस के फ्लैट के बाहर से ताला लगा हुआ है.”

यह जानकारी मिलते ही जया ने भी कई बार उसे फोन लगाने की कोशिश की, लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ आ रहा था. यह जान कर जया हैरत में पड़ गई कि नैना अचानक बिना बताए कहां चली गई. वह अपना काम बीच में छोड़ कर मुंबई स्थित नैना के फ्लैट पर पहुंची. लेकिन उस वक्त भी उस के फ्लैट पर ताला लटका हुआ था.

जब जया की समझ में कुछ नहीं आया तो उस ने तुरंत ही पूर्वी मुंबई के नायगांव थाने में उस की मिसिंग की सूचना दर्ज करा दी. चूंकि नैना टीवी इंडस्ट्री से जुड़ी हुई थी, ऐसे में उसे काम के सिलसिले में कई बार बाहर भी जाना पड़ता था. इसी कारण पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया.

उस के बाद भी जया नैना के साथ हुई किसी अनहोनी का शक करते हुए बारबार पुलिस पर उसे ढूंढने का अनुरोध करती रही. तब जया के अनुरोध पर पुलिस ने नैना के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकाली, जिस से पता चला कि नैना का मोबाइल 9 अगस्त, 2023 से बंद है.

यह जानकारी मिलते ही नायगांव एसएचओ रमेश पंढरीनाथ भामे ने इस मामले को गंभीरता से लिया और तुरंत ही नैना की खोज में लग गए.

भाभी की सुपारी का राज – भाग 2

पुलिस टीमों ने मनोज के संभावित जगहों पर होने की परिजनों से जानकारी ली. इस के बाद मनोज को उसी रात जयपुर से धर दबोचा और उसे पुलिस टीम थाने ले आई.

25 जून, 2023 को थाने में उस से सख्ती से पूछताछ की तो सुधा चौधरी हत्याकांड पर से परदा उठ गया. पुलिस ने 24 घंटे में ही मर्डर मिस्ट्री सौल्व कर ली. हत्या का आरोपी कोई और नहीं बल्कि सुधा का देवर मनोज ही निकला. उस ने ही 5 लाख रुपए में अपनी भाभी सुधा चौधरी की हत्या कराई थी. उस से पूछताछ के बाद सुधा चौधरी की हत्या की जो सनसनीखेज कहानी सामने आई, वह इस प्रकार है—

राजस्थान के भरतपुर जिले के अंतर्गत एक गांव बुढ़वारी खुर्द आता है. इसी गांव में पुष्पेंद्र सिंह चौधरी अपने परिवार रहता था. बचपन से ही मेहनती पुष्पेंद्र पढ़ाई के साथ खेलकूद में भी अव्वल था. सुबह जल्दी उठ कर दौड़भाग करने वाला पुष्पेंद्र सीआरपीएफ में भरती हो गया था.

घर परिवार में खुशियां मनाई गईं. पुष्पेंद्र की जब सरकारी नौकरी लगी तो आज से 18 साल पहले उस के योग्य लडक़ी की खोजबीन शुरू हुई. एक रिश्तेदार ने हाथरस (उत्तर प्रदेश) के सालाबाद निवासी बदनसिंह की बेटी सुधा के बारे में बता कर हिम्मत सिंह चौधरी से कहा, “चौधरी साहब, मेरी मानो तो पुष्पेंद्र के लिए सुधा जैसी गोरी और बला की खूबसूरत बीवी ले आओ. सुधा पढ़ीलिखी और सर्वगुण संपन्न है.”

“एक दिन आप साथ चल कर बता दें तो फिर देख कर रिश्ता पक्का करें.” हिम्मत सिंह ने कहा.

“शुभ काम में देरी नहीं करनी चाहिए. कल ही चलते हैं तैयार हो जाओ.”

“चलो ठीक है, कल चलते हैं.”

इस तरह सालाबाद (हाथरस) आ कर सुधा को देखा. गोरे रंग की तीखे नयननक्श वाली सुधा को पहली नजर में ही पुष्पेंद्र के लिए पसंद कर लिया गया. रिश्ता पक्का कर दिया गया. थोड़े दिन बाद शादी का मुहूर्त निकला. आज से 18 वर्ष पूर्व पुष्पेंद्र की सुधा से शादी हो गई.

एक साल बाद सुधा को बेटा हुआ, उस का नाम अनुराग रखा गया. अनुराग के जन्म के बाद सुधा उसे पालने पोसने में लग गई. पति ज्यादातर ड्यूटी पर रहते थे. बेटे की देखरेख में घर का काम समय पर नहीं होता तो सास उस से लडऩे लगती थी.

सुधा लाख सफाई देती कि वह अनुराग को नहलाधुला रही थी. मगर सास उस की एक भी न सुनती और कहती, “हम ने भी तो बच्चे पैदा किए थे, उन्हें संभालते हुए घर का सारा कामकाज करते थे. खेती का काम भी करती थी और पशु भी पालते थे.”

वगैरह वगैरह तमाम बातें बता कर यह जताती थी कि तुम कामचोर हो.

मां के बहकावे में उजाड़ी गृहस्थी

सासबहू की रोज किचकिच होने लगी. पुष्पेंद्र छुट्टी पर घर आता तो मां उस के कान भरती. पुष्पेंद्र मां का पक्ष लेता तो सुधा उस से लड़ पड़ती. पुष्पेंद्र भी लड़ पड़ता. अनुराग मात्र 2 साल का था तब यानी आज से 15 साल पहले रोजरोज के झगड़ों से आजिज आ कर सुधा अपने मायके जा बैठी.

पुष्पेंद्र को मां इस कदर भडक़ाती कि पुष्पेंद्र को सुधा फूटी आंख नहीं सुहाती थी. एक बार पतिपत्नी का रिश्ता खराब हुआ तो वह वक्त के साथ टूटता ही गया. सुधा काफी समय मायके में रही. फिर वह नदबई आ कर रहने लगी. उस ने भरतपुर में औक्सीजन गैस प्लांट पार्टनरशिप में लगा लिया. इस प्लांट से उसे अच्छी आय होती थी.

सुधा कासगंज रोड नदबई में अपने बेटे अनुराग के साथ रहती थी. वह सुबह भरतपुर गैस प्लांट जाती और शाम तक नदबई वापस लौट आती. सुधा एक तरह से अपने बेटे अनुराग के लिए जी रही थी. सुधा और पुष्पेंद्र ने तलाक नहीं लिया था. मगर वे अलगअलग पिछले 15 सालों से रह रहे थे.

पुष्पेंद्र ने एक तरह से सुधा को शादी के 2 साल बाद ही छोड़ दिया था. दोनों के बीच तलाक नहीं हुआ था. इस के बावजूद पुष्पेंद्र ने 3 साल पहले बेरू का नंगला, मथुरा (उत्तर प्रदेश) निवासी सुशीला के साथ दूसरी शादी कर ली. हालांकि कोर्ट से तलाक हुए बिना यह शादी गैरकानूनी थी.

सुशीला से भी एक बेटा लाव्यांश हो गया था. सुधा को जब पुष्पेंद्र की सुशीला से दूसरी शादी एवं उस के बाद बेटा होने का पता चला तो वह जलभुन गई थी. सुधा चौधरी नदबई नगरपालिका के दिसंबर 2021 में हुए चुनावों में कांग्रेस के टिकट से वार्ड नंबर 21 की प्रत्याशी थी. मगर वह चुनाव हार गई थी.

चुनाव के बाद सुधा चर्चा में आ गई थी. सुधा चौधरी जाट महासभा की यूथ विंग की अध्यक्ष भी थी. वह राजनीतिक पार्टियों में पूरी तरह से एक्टिव रहती थी. उस के और पुष्पेंद्र के बीच कोर्ट में तलाक का मुकदमा चल रहा था, लेकिन तलाक हुआ नहीं था. पति से अलग होने के बाद से सुधा अपने मातापिता को हाथरस से नदबई ले आई थी. वह मातापिता और बेटे अनुराग के साथ नदबई में रहती थी.

पुलिस को जांच में पता चला था कि परिवार में विवाद है. 2 पत्नियों के बीच विवाद के 4 कारण थे. पुष्पेंद्र सिंह सीआरपीएफ में थे. उन की दुर्घटना में 27 जुलाई, 2022 को मृत्यु हो गई थी. इस के बाद फैमिली क्राइम के तानेबाने बुनने शुरू हो गए.

पुष्पेंद्र की मौत के बाद भिड़ गईं दोनों पत्नियां

पुष्पेंद्र सिंह की मौत के बाद अनुकंपा नियुक्ति के नियम के तहत बेटे को नौकरी दी जानी थी. ऐसे में सुधा चौधरी और सुशीला दोनों ही अपनेअपने बेटों को नौकरी दिलाना चाहती थीं. इस के अलावा दूसरा कारण पति की पेंशन भी थी.

पुष्पेंद्र की मौत के बाद सरकार की ओर से लाखों रुपए दिए जाने थे. इन पैसों के लिए भी सुधा और सुशीला के बीच में लड़ाई शुरू हो चुकी थी. साथ ही पुष्पेंद्र के नाम पर गांव में खेती की काफी जमीन है. इस को लेकर भी दोनों में विवाद था.

जांच में पुलिस को पता चला कि सुशीला ने आधार कार्ड से ले कर अपने सारे डाक्यूमेंट्स में नाम चेंज करवा लिया था. उस के खिलाफ नदबई थाने में सुधा चौधरी ने रिपोर्ट भी दर्ज करवा दी थी. सुशीला के बेटे लाब्यांश के पिता के नाम को ले कर भी मथुरा गेट थाने में सुधा ने रिपोर्ट दर्ज करवा दी थी.

मामले में सब से बड़ा सवाल यह था कि जब पुष्पेंद्र की दोनों पत्नियों के बीच विवाद था तो देवर मनोज ने भाई पुष्पेंद्र की पहली पत्नी सुधा की हत्या की सुपारी क्यों दी?

कहानी के अगले अंक में पढ़िए, मनोज ने क्यों अपनी ही भाभी की हत्या करवा दी?

मोहब्बत वाली गली – भाग 2

लगातार कई महीने तक खत आने से लिफाफे पर लिखा रहने वाला साफसुथरा पता मेरी आंखों में बस गया था. मैं मन ही मन सोचता था कि खत लिखने वाला भी अफरोज की तरह ही सुंदर होगा. फिर एक दिन अचानक एक अजीब घटना घटी.

उस दिन सुबह से ही बादल छाए थे. मैं डाक ले कर निकला तो फुहारें पड़ रही थीं. लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था कि तेज बारिश होने लगेगी. मैं जल्दी से घर वापस लौटने का इरादा कर के उस्मानाबाद पहुंच गया. तब तक तेज बरसात होने लगी थी. पूरी तरह भीग जाने के बावजूद मैं सीधा उस के दरवाजे पर जा कर रुका.

डाक में उस दिन भी उस के नाम का लिफाफा था. मैं ने सोचा, मुझे भीगता देख कर वह अंदर आने के लिए कहेगी और अगर मौका मिला तो मैं उस के सामने अपना हालेदिल बयां कर दूंगा. मैं उस से कहूंगा कि मेरे जैसा प्यार करने वाला उसे कहीं नहीं मिलेगा. लेकिन जैसे ही मेरी साइकिल की घंटी बजने पर दरवाजे की चिक उठी, मेरे सारे अरमानों पर ओस पड़ गई.

चिक हटाने वाला एक बूढ़ा आदमी था. वह अफरोज का पिता भी हो सकता था, इसलिए मैं गुलाबी रंग का लिफाफा हाथ में दबाए सोच रहा था कि वह उसे दूं या न दूं. तभी उस के पिता के कंधों के ऊपर मुझे उस की काली आंखें दिखाई दीं, जिन्हें देख कर ऐसा लगा जैसे वह लिफाफा न देने की विनती कर रही हो. एक क्षण के लिए मेरी समझ में नहीं आया कि मैं क्या करूं, लेकिन मैं तुरंत ही संभल कर बोला, ‘‘चचा मियां, बारिश का बड़ा जोर है. क्या आप..?’’

‘‘हां..हां आओ, आओ बेटा.’’ बुजुर्ग ने मेरी बात पूरी होने से पहले ही बड़े प्यार से कहा और पीछे हट गया. वह बुजुर्ग अफरोज के पिता ही थे, मलिक साहब.

मैं अंदर चला गया. अंदर छोटा सा कमरा था, जिस में एक ओर चारपाई पर सफेद बिस्तर बिछा था और दूसरी ओर एक मेज के पास 2 कुर्सियां पड़ी थीं. मलिक साहब ने एक कुरसी मेरी ओर खिसका दी और दूसरी पर खुद बैठ गए.

‘‘बेटा अफरोज, अंगीठी जला कर ले आओ.’’ उन्होंने जोर से पुकारा. फिर मेरी ओर प्यार से देख कर बोले, ‘‘इस मौसम का भी कोई भरोसा नहीं, सुबह जब मैं दुकान पर गया था तो मौसम साफ था. फिर हलकीहलकी बूंदाबांदी होने लगी, लेकिन इस तरह अचानक तेज बारिश की उम्मीद नहीं थी.’’

इस के बाद वह इधरउधर की बातें करते रहे. इसी बीच अफरोज अंगीठी ले आई. बातोंबातों में जब उन्होंने कहा कि आजकल अच्छे लड़कों की कमी है तो मैं ने कहना चाहा कि मैं अच्छा लड़का हूं और आप का बोझ हलका करना चाहता हूं. लेकिन चाह कर भी मैं कुछ नहीं कह सका.

मलिक साहब बाप की हैसियत से अफरोज की बात कर रहे थे. उन्होंने बताया कि एक बेटी के अलावा उन की कोई औलाद नहीं है. कुछ समय पहले पत्नी की मौत हो गई थी. जमाना खराब है और बेटी अकेली, इसलिए उसे घर में ही रखते हैं. बाहर आनेजाने पर भी पाबंदी लगा रखी है.

मैं यह सोच कर दिल ही दिल में हंस रहा था कि वह अपनी बेटी के इश्क के बारे में कुछ नहीं जानते. साथ ही मन को तसल्ली भी दे रहा था कि उन की बेटी ने जिस का चुनाव किया होगा, वह मुझ से अच्छा ही होगा. मेरे मन ने चाहा कि मैं उन से कहूं कि चचा मियां, आप चिंता न करें. अफरोज ने आप का बोझ खुद ही हलका कर दिया है.

एक पल के लिए मन में खयाल भी आया कि मलिक साहब के सामने खुद को पेश कर दूं. लेकिन मैं ऐसा न कर सका. क्योंकि ऐसा करना एक तरह से जबरदस्ती होती. वह भी एक ऐसी लड़की के साथ, जो किसी से प्यार करती थी.

‘‘बेटा अफरोज, चाय बना ला.’’ मलिक साहब ने कहा तो वह किचन में चली  गई.

कुछ देर बाद वह चाय बना लाई. तभी मलिक साहब को खांसी उठी और वह थूकने के लिए बाहर चले गए. उसी वक्त मैं ने चुपके से गुलाबी लिफाफा उस के हाथ पर रख दिया. लिफाफा ले कर वह मेरी ओर देख कर मुसकराई और अंदर चली गई.

अधिकतर डाकियों की कईकई साल तक एक ही जगह ड्यूटी रहती थी, लेकिन शायद मैं नौकरी में नया था या अफरोज से रोज मिलना मेरे भाग्य में नहीं था. जो भी हो, जल्दी ही मेरी ड्यूटी उस्मानाबाद से बदल कर जौहराबाद में लगा दी गई.

अब साधारण डाक के अलावा मुझे रजिस्ट्री और मनीआर्डर बांटने का काम भी दे दिया गया था. वक्त के साथ सालों बीत गए. इस बीच मेरी शादी हो चुकी थी. जबतब ड्यूटी भी बदलती रहती थी. लेकिन मैं अफरोज को कभी नहीं भूल सका.

मैं अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ रहते हुए कभीकभी सोचता था कि अगर अफरोज ने मुझ से प्यार किया होता तो हम दोनों कितने खुश होते. अब तो वह न जाने किस घर में बैठी राज कर रही होगी. पता नहीं कौन था वह, जिसे वह चाहती थी. मुझे उस की किस्मत से ईर्ष्या होती थी. क्योंकि वह न होता तो मैं अपने सपनों की उस रानी को जरूर पा लेता जो आज भी मेरे दिल में बसी हुई थी.

19 साल बाद की बात है. एक दिन उस्मानाबाद का पोस्टमैन बीमार हो गया तो अपने इलाके के अलावा मुझे उस्मानाबाद की डाक भी बांटने के लिए दे दी गई. उस्मानाबाद के नाम पर मुझे अफरोज की याद आ गई. मन उस से मिलने, उसे देखने को मचल उठा. इसलिए सब से पहले मैं ने उस्मानाबाद की डाक में गली नंबर 2 के 7वें मकान की डाक ढूंढने की कोशिश की, लेकिन मुझे उस पते का कोई खत नहीं मिला.

मुझे यह सोच कर खुद पर हंसी आ गई कि 19 साल बीत गए, पता नहीं अफरोज कहां होगी. कितने बच्चों की मां होगी और मैं आज भी उसे देखने, उस से मिलने की सोच रहा हूं. बहरहाल, पता नहीं क्याक्या सोचते हुए मैं उस्मानाबाद पहुंच गया.

कर्नल का इश्क बना रिस्क – भाग 1

“क्या कर्नल साहब, इतना पसंद करते हो हमें तो बता क्यों नहीं  दिया. “बगल में लेटी 21 वर्षीय श्रेया ने रामेंदु के सीने के बालों को अपने हाथों से सहलाते हुए कहा.

“हां, यह तो है. आप को बहुत चाहता हूं मैं. क्योंकि आप इतनी खूबसूरत हैं कि आप से मिलने की चाहत मुझे रोज आप के पास खींच लाती है.” रामेंदु ने भी अपने मन की बात  कह दी.

“चाहत थी तो एक बार इजहार कर देते. हमें भी तो आप जैसे दोस्त की चाहत है.”   कहते हुए श्रेया ने अपने अधर उस के होंठों पर रख दिए. फिर क्या था, थोड़ी ही देर में दोनों जिस्म एक हो गए.

उस रात रामेंदु को श्रेया ने वो चरमसुख दिया, जो रामेंदु को कभी अपनी नईनवेली पत्नी से नहीं मिला था. उस रात श्रेया और रामेंदु के बीच जो रिलेशन बने, उस के बाद तो दोनों के रिश्ते ऐसे परवान चढ़े कि पहले कुछ दिन वे एक प्रेमीप्रेमिका की तरह मिलते रहे और एकदूसरे को प्यार करते रहे, लेकिन कुछ ही महीनों में दोनों सिलीगुड़ी में एक निजी मकान ले कर पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

श्रेया ने अब डांस बार में काम करना छोड़ दिया था. वक्त तेजी से गुजरने लगा.

10 सितंबर, 2023 की सुबह के करीब 7 बजे का वक्त था. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में लोग ठीक से नींद से जगे भी नहीं थे. पुलिस तो वैसे भी रात भर जाग कर लोगों की सुरक्षा करने और अपराधियों को जुर्म करने से रोकने का काम करती है. लिहाजा उस की दिनचर्या तो वैसे भी थोड़ा देर से ही शुरू  होती है.  ऐसे में अगर सुबह के 7 बजे पुलिस स्टेशन में जा कर कोई किसी बड़े अपराध की सूचना दे तो पुलिस वालों के मुंह का स्वाद कसैला होना लाजिमी है.

देहरादून के रायपुर थाने में पहुंच कर सोडा सरोली गांव के प्रधान प्रवेश कुमेड़ी ने भी जब ये सूचना दी कि माल देवता रोड पर सिरवालगढ़ में एक युवती का शव संदिग्ध अवस्था में पड़ा है तो थाने के कार्यालय इंचार्ज और हैड मुंशी को ऐसा लगा कि किसी ने सुबह के वक्त उन्हें करेले का जूस पिला दिया है.

लेकिन वक्त चाहे कोई भी हो और सूचना कैसी भी हो, पुलिस को तो अपना काम हर हाल में करना ही होता है. सूचना ऐसी थी कि पुलिस जैसे महकमे में होने के कारण हैड मुंशी को अपनी जिम्मेदारी का अहसास हुआ. उन्होंने थाना परिसर में बने क्वार्टर में एसएचओ कुंदन राम को जब ये जानकारी दी तो तड़के तक गश्त करने के बाद गहरी नींद से जागे एसएचओ कुंदन राम की नींद काफूर हो गई.

आननफानन में वरदी पहन कर वह अपने कार्यालय में पहुंचे और उन्होंने वहां मौजूद पुलिसकर्मियों को तत्काल एकत्र होने का संदेश भिजवाया. अगले 10 मिनट में थाने का सारा स्टाफ वहां मौजूद था.  एक दरोगा और 2-3 कांस्टेबलों को साथ ले कर वह सिरवाल गढ़ की तरफ रवाना हो गए. इसी बीच उन्होंने उच्चाधिकारियों को भी इस खबर से अवगत करा दिया था.

जिस वक्त एसएचओ घटनास्थल पर पहुंचे, मौके पर इलाके के लोगों की काफी भीड़ जमा हो चुकी थी. वहां एक युवती की लहूलुहान लाश पड़ी थी. एसएचओ ने आगे की काररवाई करने से पहले फोरैंसिक व क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम स्टाफ को भी मौके पर बुलवा लिया. कुछ ही देर में ये टीमें घटनास्थल पर पहुंच कर सबूत जुटाने में लग गईं.

कुछ ही देर में देहरादून के डीआईजी/एसएसपी दलीप सिंह कुंवर, एसपी (नगर) सरिता डोभाल और सीओ (डोईवाला) अभिनय चौधरी भी मौके पर पहुंच गए. सभी ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.  जिस युवती की लाश मिली थी, उस के चेहरे और शरीर की बनावट से लग रहा था कि उस की उम्र मुश्किल से 20-22 साल के करीब रही होगी. महिला के माथे व सिर पर किसी वजनी या नुकीली चीज से किए गए वार के कारण चोटों के निशान थे. शरीर पर किसी ब्रांडेड कंपनी की मिडी थी, जिस का ऊपरी हिस्सा खून से लथपथ हो चुका था. लाश के पास में ही एक टायलेट क्लीनर (तेजाब) की बोतल पड़ी हुई थी.

मृत युवती के हाथ में एक सोने व एक चांदी की मौजूद अंगूठियां इस बात की तरफ साफ इशारा कर रही थीं कि उस की हत्या कम से कम लूटपाट के लिए तो नहीं की गई है. जिस जगह युवती की लाश मिली थी, वह सड़क किनारे बनी एक कच्ची नाली की  ऐसी जगह थी, जहां आसपास कोई सीसीटीवी कैमरा भी नहीं था. पुलिस ने आसपास के इलाकों से लोगों को बुला कर उस की पहचान कराने की कोशिश की, लेकिन 2 घंटे की मशक्कत के बाद भी इस में कोई सफलता नहीं मिली.

लाश के पास से भी कोई चीज नहीं मिली, जिस से तत्काल उस की शिनाख्त हो सके. इसलिए घटनास्थल से साक्ष्यों के संकलन और पंचनामे की काररवाई के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए दून अस्तपाल भिजवा दिया गया. एसएसपी देहरादून के निर्देश पर पुलिस ने लाश की फोटो खिंचवा कर उसे मीडिया व सोशल मीडिया पर प्रसारित करवा दिया ताकि मृतका की शिनाख्त हो सके.

चूंकि यह बात साफ थी कि महिला की हत्या कहीं और करने के बाद उस की लाश वहां ला कर फेंकी गई थी. मालदेवता चौकीप्रभारी एसआई राजीव धारीवाल की शिकायत पर रायपुर थाने में अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 और साक्ष्य मिटाने की धारा 201 के तहत मुकदमा दर्ज करने के बाद उच्चाधिकारियों के आदेश पर विवेचना एसएसआई नवीन जोशी को सौंप दी गई.

घटना की गंभीरता को देखते हुए जिले के एसएसपी दलीप सिंह कुंवर ने एसपी (सिटी) सरिता डोभाल और सीओ (डोईवाला) अभिनय चौधरी की निगरानी में हत्याकांड का खुलासा करने के लिए एसएचओ कुंदन राम के नेतृत्व में 4 टीमें गठित कर दी गईं.

पुलिस की चारों टीमें जुटीं जांच में

जांच अधिकारी एसएसआई नवीन जोशी के साथ मालदेवता चौकी प्रभारी एसआई राजीव धारीवाल, बालावाला चौकी प्रभारी एसआई सुनील नेगी, एसआई रमन बिष्ट, महिला एसआई तनुजा शर्मा, हैडकांस्टेबल संतोष कुमार, दीपप्रकाश, प्रदीप सिंह, कांस्टेबल सौरभ वालिया, किशनपाल,  शाहिद जमाल, अजय कुमार, पंकज ढौंडियाल, महिला कांस्टेबल मीतू शाह आदि को शामिल किया गया.  उन के साथ फोरैंसिक टीम के कांस्टेबल अरविंद और प्रभात जुगरान, एसओजी की हैडकांस्टेबल किरन को भी इस विशेष टीम का हिस्सा बनाया गया.

police inspect at murder spot

पहली टीम ने घटनास्थल के आसपास रहने वाले व्यक्तियों से गहनता से पूछताछ शुरू कर दी. दूसरी टीम ने घटनास्थल की तरफ आनेजाने वाले मार्गों पर लगे तमाम सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को चैक करना शुरू  कर दिया.

तीसरी टीम ने मृतका द्वारा पहनी जुडियो ब्रांड की नई दिख रही ड्रेस की जानकारी लेने के लिए जुडियो ब्रांड के शोरूम जाखन व किशन नगर चौक में जा कर जानकारी जुटानी शुरू कर दी कि वह किस ने खरीदा था.

मनहूस कदम : खाली न गयी मजलूम की आह – भाग 2

मेरी हमदर्दी का नतीजा यह निकला कि उस ने सच्चाई बयां कर दी, ‘‘सच पूछो तो मेरी मां, मेरी दूसरी शादी करना चाहती है. संयोग से ग्रीनकार्डधारी लड़की मुझे मिल भी गई है. वह खूबसूरत तो है ही, 12 सौ डौलर तनख्वाह पाती है. वहां मेरी फोटोग्राफी का धंधा भी खूब चलेगा.’’

‘‘बहुत नसीब वाले हो भाई. उस खूबसूरत लड़की का नाम क्या है?’’ मैं ने पूछा.

वह खुश होते हुए बोला, ‘‘उस का नाम यासमीन है. वह एक कारोबारी परिवार की बेटी है. उस के बाप का बाजार में बहुत बड़ा होटल है.’’

‘‘भई तुम्हें यह शानदार चांस कैसे मिल गया?’’

‘‘दरअसल, उस लड़की का तलाक हो चुका है. दूसरे उम्र की कुछ ज्यादा है, लेकिन ऐसे में यह सब कौन देखता है?’’

मैं ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘कब तक जाने का प्लान है?’’

‘‘डेढ़-2 महीने तो लग ही जाएंगे. बस लड़की की ओर से जवाब का इंतजार है.’’

मैं ने कहा, ‘‘मेरे नोटिस के बारे में तुम्हारा क्या इरादा है?’’

‘‘नोटिस के बारे में क्या सोचना, उस से घर थोड़े ही आबाद होते हैं.’’

‘‘अगर तुम दूसरी शादी करना चाहते हो तो ताहिरा के वाजिब हक दे कर उसे आजाद कर दो. सिर्फ 32 हजार मेहर के, 1 लाख दहेज वाले, 10 हजार मेंटीनेंस और गहने तो देने ही हैं,’’ मैं ने समझाया.

‘‘वकील साहब, यही तो मुश्किल है. इसी वजह से मैं उस मनहूस से जान नहीं छुड़ा सका. मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं, फिर भी कोशिश कर के जल्दी ही उस के पैसे दे दूंगा.’’

‘‘ऐसा करो, 25 हजार इस हफ्ते दे दो, बाकी पैसे एक महीने बाद दे देना.’’

‘‘जी…’’ उस ने घबरा कर चालाकी से कहा, ‘‘आप अपनी मुवक्किल से कहें कि कुछ इंतजार कर ले. मैं दुकान बेच कर… अरे कुछ भी बेच कर उस का पैसा अदा कर दूंगा.’’

मैं समझ गया कि यह ताहिरा को तलाक दे कर उस के ड्यूज नहीं देना चाहता. यह देश छोड़ कर भाग जाने के लिए मोहलत मांग रहा है. मैं ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं तुम्हारी बीवी को 2 महीने टालने की कोशिश करूंगा, पर तुम इस नोटिस का जवाब तो लिख दो.’’

‘‘जवाब किस बात का? मैं आप को सौ रुपए दे रहा हूं. आप इस मामले को संभाल लीजिए.’’

मैं ने एक आंख दबा कर कहा, ‘‘मुझे अपने मुवक्किल को भी तो संतुष्ट करना होगा.’’

हिचकिचाते हुए उस ने कहा, ‘‘बताइए, क्या लिखूं?’’

‘‘हमें फर्ज अदायगी करनी है, इसलिए जो सच्चाई है, वही लिख दो. यह कोई फौजदारी केस तो है नहीं, मियांबीवी राजी तो क्या करेगा काजी?’’

उस ने कुछ अपने दिमाग से, कुछ मेरी सलाह ले कर जवाब लिखा, ‘‘ताहिरा मेरी बीवी जरूर है, मगर घर में रखने लायक नहीं है. शादी के पहले उस के घर वालों ने बताया था कि वह कुंवारी है. जबकि वह अपने पहले शौहर को खा चुकी है. उस की वजह से मेरा भी काफी नुकसान हुआ है. वह मनहूस है. यह मियांबीवी का मामला है, मैं बहुत जल्दी उस के हक अदा कर दूंगा. मैं इस तरह की नोटिसों से बिलकुल नहीं डरता.’’

उसे साथ ले कर मैं ओथ कमिश्नर के पास गया और उस के इस लिखित बयान की वेरीफिकेशन करवा दी. वह इस बात से थोड़ा परेशान हुआ, पर मैं ने कहा कि यह कार्यवाही का एक हिस्सा है, इस से कोई फर्क नहीं पड़ेंगा.

तीसरे दिन ताहिरा आई तो मैं ने उसे अजीम बुखारी के आने की बात बता कर जब उस से पहली शादी के बारे में पूछा तो उस ने कुछ और ही कहानी सुनाई. ताहिरा के बताए अनुसार, शादी से पहले ही उस के शौहर की कार दुर्घटना में मौत हो गई थी. उस ने तो उस का मुंह भी नहीं देखा था.

इस के बाद उस के अब्बा ने यह शादी की थी. उस की यह शादी भी मात्र 11 दिनों ही चल सकी. उस के ससुराल आते ही कुछ घटनाएं घट गईं तो उसे मनहूस करार दे कर घर से निकाल दिया गया. इसलिए वह चाहती थी कि अजीम बुखारी उसे स्वीकार कर ले. अगर उस ने उसे स्वीकार नहीं किया तो लोग उसे सचमुच मनहूस मान लेंगे.

मैं ने ताहिरा पर एक नजर डाल कर कहा, ‘‘बीबी, तुम उस आदमी को पूरी तरह खयाल से निकाल दो. अब वह किसी भी सूरत में तुम्हें अपने घर रखने वाला नहीं है.’’

‘‘बेग साहब, अगर ऐसा हुआ तो लोग मेरा जीना हराम कर देंगे. आप किसी तरह समझौता करा दें. मैं उस का हर जुर्म सह लूंगी.’’

‘‘बीबी, तुम किस दुनिया में हो? अजीम बुखारी ने एक ग्रीनकार्डधारी तलाकशुदा औरत ढूंढ ली है. वह उस के साथ शादी कर के अमेरिका जाने की फिराक में है.’’

मेरी बात सुन कर ताहिरा गुस्से में बोली, ‘‘यह आप को किस ने बताया?’’

‘‘उसी ने बताया है.’’

‘‘लेकिन वकील साहब, मेरी इजाजत के बगैर वह दूसरी शादी कैसे कर सकता है?’’

‘‘हां, कानून तो यही है. शायद उस ने लड़की वालों को अपनी पहली शादी के बारे में नहीं बताया है. वह चुपचाप शादी कर के अमेरिका चला जाना चाहता है. पर मैं ऐसा नहीं होने दूंगा. तुम अपना निकाहनामा और गहनों की रसीद मुझे दे दो. अगर 1 लाख रुपए का भी कोई सुबूत है तो वह भी दे जाओ.’’

‘‘1 लाख का तो कोई सुबूत नहीं है. शादी के तीसरे दिन वह रकम ले कर अजीम ने अपने एकाउंट में जमा कर दी थी.’’

‘‘तुम्हें वह एकाउंट नंबर मालूम है?’’

‘‘एकाउंट नंबर तो नहीं मालूम, पर बैंक की एक स्लिप मेरे पास है, जिसे अजीम ने दी थी.’’

ताहिरा ने एक मुड़ीमुड़ी बैंक स्लिप पर्स से निकाल कर दी तो मैं ने उसे फाइल में रख कर कहा, ‘‘ताहिरा बीवी, तुम किसी भी तरह अपने शौहर की सरगर्मियों पर नजर रखो.’’

‘‘ठीक है, मौसी से कह दूंगी, वह कोई न कोई इंतजाम कर लेंगी.’’

मैं ने उसे रुखसत करते हुए कहा, ‘‘इस से हमें उस की शादी के बारे में फौरन मालूम हो जाएगा.’’

2 दिनों बाद मैं ने अजीम बुखारी की मंगेतर के बाप के होटल में फोन किया. फोन लड़की के बाप मकबूल हुसैन ने ही उठाया. मैं ने बड़े अदब से कहा, ‘‘मकबूल साहब, मैं आजमी ज्वैलर्स से इब्राहीम बोल रहा हूं. मेरे पास एक साहब अजीम बुखारी आए हैं. उन्होंने हमारी दुकान से कुछ गहने खरीदे हैं. कैश कुछ कम पड़ गया है तो वह चैक दे रहे हैं. मैं ने चैक लेने से मना किया तो वह आप का रेफरेंस दे कर कह रहे हैं कि वह आप के होने वाले दामाद हैं. मैं आप को जानता हूं, इसलिए पूछ रहा हूं कि चैक लेने में कोई खतरा तो नहीं है?’’

‘‘खतरा तो कोई नहीं है, लेकिन उसे इतनी जल्दी क्यों पड़ी है? अभी तो शादी की तारीख भी तय नहीं हुई है.’’ उस ने नागवारी से कहा.

‘‘अरे मकबूल भाई, तारीख तय होने में कहां देर लगती है? गहने तो खरीदने ही पड़ेंगे. आप भी आइए.’’ मैं ने कहा.

‘‘इब्राहीम भाई, यह सारा काम मैं ने अपनी बेटी पर छोड़ रखा है. सब उसी की पसंद से होगा. 2 हफ्ते बाद वह अमेरिका से आएगी और शादी के फौरन बाद लौट जाएगी.’’ मकबूल हुसैन ने कहा.

मैं ने शुक्रिया कह कर फोन रख दिया. इस बातचीत से साफ हो गया कि अजीम बुखारी सच कह रहा था. लड़की सिर्फ शादी के लिए आ रही थी. मैं ने मेंटीनेंस और मेहर का केस तैयार कर लिया, मगर दाखिल नहीं किया.

आगे की कहानी जानने के लिए पढ़ें Hindi Emotional Story का तीसरा भाग…

भाभी की सुपारी का राज – भाग 1

24 जून, 2023 का दिन था. शाम के पौने 5 बजे का समय था. 36 वर्षीया सुधा चौधरी अपने 17 साल के बेटे अनुराग के साथ स्कूटी द्वारा नदबई बस स्टैंड से कासगंज रोड पर स्थित अपने घर की ओर आ रही थी. तभी रास्ते में बाइक सवार 2 बदमाश उस का पीछा करने लगे. उन दोनों ने ही मुंह पर कपड़ा बांध रखा था. उस समय स्कूटी उस का बेटा अनुराग चला रहा था.

उस की स्कूटी जब सरस्वती मैरिज होम के पास स्थित मंदिर के नजदीक पहुंची ही थी कि बाइक पर पीछा कर रहे युवकों में से पीछे बैठे युवक ने स्कूटी के बराबर पहुंचते ही सुधा चौधरी पर 2 गोलियां चलाईं. गोली लगते ही सुधा की चीख निकल गई. उस के शरीर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. जब तक लोग माजरा समझते, बाइक सवार हमलावर फरार हो गए थे. दिनदहाड़े हुई इस वारदात के बाद इलाके में सनसनी फैल गई थी. सुधा चौधरी का बेटा अनुराग बालबाल बच गया था.

यह घटना राजस्थान के जिला भरतपुर के नदबई कस्बे में घटी थी. सुधा चौधरी के एक गोली कंधे से होती हुई हार्ट तक पहुंच गई थी, यही गोली मौत का कारण बनी थी. दूसरी गोली उन की कमर से नीचे लगी थी. गोलियां लगते ही सुधा चौधरी स्कूटी से गिर पड़ी थी.

स्कूटी रोक कर अनुराग लोगों की मदद से अपनी मम्मी को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नदबई ले गया. डाक्टर ने सुधा चौधरी को मृत घोषित कर दिया था. अस्पताल द्वारा थाना नदबई को फोन पर घटना की इत्तिला दे दी गई.

दिनदहाड़े एक महिला को सरेराह गोलियों से भूनने की खबर मिलते ही नदबई थाना के एसएचओ श्रवण पाठक पुलिस टीम के साथ अस्पताल पहुंच गए थे. इस के बाद उन्होंने घटनास्थल पर पहुंच कर शुरुआती जांच शुरू कर दी. आसपास के दुकानदारों से भी उन्होंने वारदात के बारे में पूछताछ की.

पुलिस ने सुधा चौधरी के शव को कब्जे में ले कर मोर्चरी में रखवा दिया. मृतका का बेटा अनुराग सिसकसिसक कर रो रहा था. उसे श्रवण पाठक ने दिलासा दे कर चुप कराया और घटना के बारे में पूछताछ की. एसएचओ श्रवण पाठक ने शव मोर्चरी में रखवाने के बाद उच्चाधिकारियों को घटना की खबर दे दी.

अनुराग ने पुलिस को दी घटना की जानकारी

घटना की खबर पा कर मृतका के मायके से एवं नदबई में रहने वाले आसपड़ोस के लोग भी अस्पताल व घटनास्थल पर पहुंच गए थे. हर कोई हैरत में था कि सुधा चौधरी जैसी दयालु, समझदार एवं हर किसी के दुखसुख में शामिल रहने वाली महिला की हत्या किस व्यक्ति ने और क्यों कर डाली.

सवाल अपनी जगह थे, मगर सच यही था कि 15 वर्ष से सुधा अपने पति पुष्पेंद्र चौधरी से अलग रह रही थी. पुष्पेंद्र सिंह सीआरपीएफ में नौकरी करता था. पुष्पेंद्र ने करीब 3 साल पहले सुशीला चौधरी नामक युवती से दूसरी शादी कर ली थी. पुष्पेंद्र 27 जुलाई, 2022 को दुर्घटना में चल बसा था.

सुधा और पुष्पेंद्र का तलाक नहीं हुआ था. बगैर तलाक लिए पुष्पेंद्र ने सुशीला से शादी कर ली थी. वह शादी कानून के हिसाब से मान्य नहीं थी. पुलिस को जैसेजैसे जानकारी मिल रही थी, मामला पेचीदा लगने लगा था.

मृतका सुधा के बेटे अनुराग चौधरी (17 साल) ने पुलिस को अपने बयान में बताया, “मैं और मेरी मम्मी सुधा चौधरी (36 वर्ष) पिछले 15 सालों से कासगंज रोड नदबई में अपने पिता पुष्पेंद्र सिंह चौधरी से अलग रह रहे थे. मम्मी का पार्टनरशिप में भरतपुर में औक्सीजन गैस प्लांट है. मम्मी हमेशा की तरह 24 जून, 2023 की सुबह नदबई से भरतपुर गैस प्लांट पर गई थीं. दोपहर साढ़े 3 बजे भरतपुर से बस में बैठ कर वह नदबई आईं.

“उन्होंने बस में बैठने के बाद मुझे फोन कर के स्कूटी लाने को कहा था. वह स्कूटी ले कर नदबई बस स्टैंड पर पहुंच गया था. भरतपुर वाली बस से उतरीं और मेरे पीछे स्कूटी पर बैठ गईं. बाजार से मम्मी ने कुछ खरीदारी की और फिर दोनों स्कूटी से घर की तरफ रवाना हो गए.

“जब स्कूटी कासगंज रोड पर देवी मां के मंदिर के पास पहुंची, तभी बाइक सवार 2 बदमाश स्कूटी के समीप पहुंचे और पीछे बैठे व्यक्ति ने दोनों हाथों में लिए कट्टों से मम्मी पर 2 फायर झोंके और फरार हो गए.”

घटना की खबर मिलते ही सीओ (नदबई) नीतिराज सिंह भी घटनास्थल पर पहुंचे और घटना की जानकारी ली. घटनास्थल का मौका मुआयना किया. उन के निर्देश पर पुलिस ने आसपास के सीसीटीवी फुटेज खंगाले तो काले रंग की बाइक पर 2 व्यक्ति नजर आए. एसएचओ श्रवण पाठक ने सीसीटीवी फुटेज खंगालने के बाद संभावित स्थानों पर दबिश दी.

अनुराग ने अपने नाना बदन सिंह निवासी सालाबाद, हाथरस (उत्तर प्रदेश) के साथ 24 जून, 2023 को थाने पहुंच कर अपनी मम्मी की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई.

चाचा के खिलाफ लगाई रिपोर्ट

अनुराग ने पुलिस को बताया था कि उस के चाचा मनोज चौधरी व सुशीला ने हत्या कराई है, क्योंकि पहले भी माधव के चचेरे भाई शिशुपाल के साथ मिल कर चाचा मनोज ने उन्हें मारने की धमकी दी थी. अनुराग ने आरोप लगाया कि मम्मी की हत्या में दादी रामदेई व बाबा के भाई गुटयारी उर्फ फत्ते का भी हाथ है.

अनुराग की तहरीर पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर लिया. अनुराग व उस के नाना बदन सिंह द्वारा दी गई जानकारी के बाद पुलिस आरोपियों की खोजबीन करने लगी.

उधर 24 जून, 2023 की शाम को मैडिकल बोर्ड गठित कर सुधा चौधरी के शव का पोस्टमार्टम करा कर पुलिस ने शव परिजनों को सौंप दिया.

इस केस को सुलझाने के लिए भरतपुर के एसपी मृदुल कच्छावा के निर्देश पर विशेष पुलिस टीम का गठन किया गया. इस टीम में मनीषा लाडो (आरपीएस प्रोबेशनर), लखनपुर एसएचओ श्रवण पाठक एएसआई ओम प्रकाश, कांस्टेबल अमित, जयदेव, सुकेश मीना, थाना लखनपुर के एसएचओ, एसएचओ (कुम्हेर) गौरव कुमार, डीएसटी टीम के एएसआई बलदेव सिंह व बाबूलाल, हैडकांस्टेबल वीरेंद्र, सत्यवीर गिरधारी, जगदीश, अमर सिंह, कांस्टेबल लक्ष्मण सिंह आदि शामिल थे.

पुलिस टीम ने सर्वप्रथम सुधा चौधरी की ससुराल बुढ़वारी खुर्द जा कर ससुराल वालों से पूछताछ की. पता चला कि मनोज चौधरी गांव से फरार हो गया है. यह साफ संकेत था कि जरूर सुधा चौधरी हत्याकांड में मनोज का हाथ है. अगर वह निर्दोष था तो फरार क्यों हुआ था.

क्या सच में मनोज ने ही अपने भाभी की हत्या करवाई थी? या इस हत्या के पीछे कोई और था? जानने के लिए पढ़ें कहानी का अगला भाग.

दोस्त के प्यार पर डाका

मोहब्बत वाली गली – भाग 1

उन दिनों मेरी ड्यूटी मोहल्ला उस्मानाबाद में थी. छोटीछोटी तंग गलियों और गंदे जरजर मकानों से घिरा यह मोहल्ला उन शरीफ लोगों का था, जो अपनी इज्जत का भरम रखने के लिए दरवाजों पर टाट या कपड़े के परदे टांग दिया करते थे. इस से पहले मेरी ड्यूटी कई अच्छे इलाकों में रही थी, इसलिए इस इलाके में मेरी कोई खास रुचि नहीं थी. सच कहूं तो मेरा सारा दिन बोरियत भरा गुजरता था.

डाक विभाग में आए मुझे अधिक समय नहीं हुआ था. उम्र भी 19-20 साल से अधिक नहीं थी. चूंकि खुदा ने शक्लसूरत भी अच्छी दी थी, इसलिए कई लड़कियां मेरी ओर आकर्षित हो जाती थीं. उम्र के उस नाजुक दौर में कभीकभी मेरा झुकाव भी लड़कियों की ओर हो जाया करता था.

अब्बा डाक विभाग में क्लर्क थे. मैं ने मैट्रिक कर लिया तो उन्होंने मुझे अपने विभाग में क्लर्क बनवाने की कोशिश की, लेकिन वहां कोई जगह खाली नहीं थी, इसलिए उन्होंने मुझे पोस्टमैन बनवा दिया था. मैं ने कभी किसी ऊंची नौकरी का सपना नहीं देखा था. न ही पढ़नेलिखने के मामले में तेज था.

मैं जानता था कि अब्बा जैसी ही कोई नौकरी करनी पड़ेगी, इसलिए मैं डाकिए की नौकरी पा कर संतुष्ट था. शुरू शुरू में तो मुझे अपना काम बहुत अच्छा लगा. विभाग की ओर से मुझे साइकिल नहीं मिली थी, इसलिए मैं पैदल ही डाक बांटता था. डाक देते वक्त मेरा दरवाजे पर दस्तक देने का एक खास अंदाज था. साथ ही मुझे आवाज भी लगानी पड़ती थी, ‘पोस्टमैन’.

फिर मुझे साइकिल मिल गई, जिस की खास घंटी मेरे आने की सूचना होती थी. कभी मैं किसी के लिए खुशी का समाचार लाता और कभी दुख का. कुछ लोग मेरा इंतजार बड़ी बेचैनी से करते और कुछ लोग डाक लेते हुए भी कसमसाते.

पौश इलाकों में आमतौर से गेट के बाहर लेटरबौक्स लगा होता था, लेकिन मध्यमवर्गीय इलाकों के लोग दरवाजे पर आ कर डाक लेते थे. दोपहर के समय अकसर घर पर लड़कियां होती थीं, जो मुझे देख कर आपस में कानाफूसी करती थीं. कुछ तो मुझे देख कर फिकरे भी कसतीं. पहले तो मैं चुप रहा, लेकिन बाद में मैं एकाध को जवाब देने लगा था.

बाद में जब मेरी ड्यूटी मोहल्ला उस्मानाबाद में लगी तो मुझे बोरियत सी हुई. मेरी आदत थी कि साइकिल की घंटी बजाने के बाद दरवाजा खुलने का इंतजार किए बिना मैं खत को दरवाजे की झिर्री से अंदर फेंक देता था. इस की वजह यह थी कि कभी कोई दरवाजे पर आता भी तो वह गंदा सा बच्चा होता था या मैली कुचैली सी कोई औरत.

एक दिन मैं गली नंबर 2 से गुजर रहा था कि 7वें मकान के सामने एकदम ठिठक गया. साइकिल की चाल कम हो गई और मैं भूल गया कि मैं कोई आम युवक नहीं, बल्कि डाक विभाग का एक जिम्मेदार पोस्टमैन हूं. वह घर जिस के दरवाजे पर चिक पड़ी हुई थी, दूसरे घरों के मुकाबले में कुछ अच्छी हालत में थी. उस चिक से एक चांद जैसे चेहरे वाली लड़की झांक रही थी. मुझे आते देख कर उस का सुंदर गुलाबी चेहरा फूल की तरह खिल उठा.

मेरे होंठों पर भी हलकी सी मुसकराहट आ गई. मगर अगले ही क्षण यह सोच कर कि वह मेरा इंतजार क्यों करने लगी, मैं उदास हो गया. मेरा इंतजार भला कौन करता है, सब को अपनेअपने खतों का इंतजार रहता है. मैं ने सिर झुकाया और उस के दरवाजे के सामने से गुजर गया. वह भी अंदर चली गई. शायद दुखी हो कर, क्योंकि उस की डाक नहीं थी.

जाने क्यों वह लड़की मुझे अच्छी लगी. काले रेशमी बाल और गुलाबी चेहरे वाली वह लड़की जैसे मेरे सपने में दुलहन बन के उतर आई. शायद इसलिए कि अम्मी जब भी मेरी होने वाली पत्नी की बात करती थी तो मैं ऐसी ही लड़की की कल्पना करता था.

अब मैं रोजाना गली नंबर 2 से गुजरते हुए उस चिक वाले दरवाजे को जरूर देखता, मेरी साइकिल की घंटी सुन कर वह भी गली में झांकती. पलभर के लिए हम एकदूसरे को देखते और फिर मैं सिर झुकाए दरवाजे के सामने से गुजर जाता. वह भी अंदर चली जाती. उस के दरवाजे पर लगी सफेद नेमप्लेट पर मैं ने मलिक फजल लिखा देखा था.

मैं सोचता था कि कभी मलिक साहब का खत आए तो उस चिक वाली के ठीक से दर्शन हो जाएं, लेकिन ऐसा लगता था जैसे उन्हें कोई खत लिखता ही नहीं था. धीरेधीरे मुझे लगने लगा कि मेरे सपनों में बसने वाली वह लड़की वास्तव में मेरा इंतजार करती है. यह सोच कर मैं हवाओं में उड़ने लगता.

फिर अचानक एक दिन मुझे झटका सा लगा. दरअसल मैं डाकखाने से खत ले कर निकलते समय बिना वजह ही गली नंबर 2 के सातवें मकान का खत ढूंढा करता था. उस दिन मैं ने उस्मानाबाद की डाक देखी तो चौंका.

उस दिन की डाक में मकान नंबर 7 का एक खत था, लेकिन वह खत मलिक फजल के लिए नहीं अफरोज के नाम था. मैं समझ गया कि उस लड़की का नाम अफरोज है.

गुलाबी रंग का वह लिफाफा अफरोज के उस प्रेमी का रहा होगा, जिस के खत का वह इंतजार करती है. मैं ने सोचा, मैं भी कितना पागल हूं, वह इंतजार किसी और का करती थी और मैं समझ रहा था कि वह मेरा इंतजार करती है.

मैं ने लिफाफा उलटपलट कर देखा. उस पर कराची की ही मोहर थी. इस का मतलब था कि वह इसी शहर में कहीं रहता था. खत के कोने पर भेजने वाले का नाम वीए लिखा था. अगले दिन मैं डाक ले कर उस्मानाबाद गया तो वह दरवाजे पर खड़ी मेरा इंतजार कर रही थी. चिक से झांकती हुई उस की काली आंखों में इंतजार के जलते दीप साफ नजर आ रहे थे.

आज मेरी हार्दिक इच्छा पूरी होने जा रही थी, लेकिन दिल उदास था. जिसे मैं चाहता था, वह किसी और को चाहती थी. मैं ने उस के दरवाजे के सामने साइकिल रोकी और डाक के थैले से वह खत निकाल कर उस की ओर बढ़ा दिया. उसे खत देते हुए मेरी अंगुलियां कांप रही थीं और नजर उस के चेहरे पर थी. उस ने खत ले कर मुझे ऐसी निगाह से देखा, जैसे मैं ने जीवन का सब से बड़ा उपहार उसे दे दिया हो.

अगले दिन फिर वैसा ही खत अफरोज के नाम आया. उस ने उसी बेचैनी के साथ खत ले कर मुझे धन्यवाद दिया और मैं ने साइकिल आगे बढ़ा दी. अब हर दिन ऐसा होने लगा. मैं ने सोचा हो सकता है कि अफरोज और उस के प्रेमी ने आपसी सहमति से तय किया हो कि वे रोजाना एकदूसरे को खत लिखेंगे. जरूर वह भी रोज उसे इसी तरह एक खत भेजती होगी.

यह जानने के बाद भी कि वह किसी और को चाहती है, मेरे दिल में बनी उस की सूरत मिट नहीं सकी. अम्मा जब भी मेरी शादी की बात करती तो अफरोज की छवि मेरी आंखों में उतर आती. कभीकभी मेरा दिल चाहता कि मैं उस का खत खोल कर पढ़ लूं, लेकिन मैं चाह कर भी ऐसा नहीं कर सका, क्योंकि यह अपराध था. आने वाली डाक पहुंचाना मेरी सरकारी ड्यूटी थी. बिना इजाजत किसी का खत पढ़ने का मुझे कोई हक नहीं था.

मनहूस कदम : खाली न गयी मजलूम की आह – भाग 1

सुबहसुबह ही एक तीखे नैननक्श की खूबसूरत लड़की अपनी मौसी के साथ मेरे औफिस में आई. बैठने के साथ ही लड़की ने कहा, ‘‘वकील साहब, क्या कोई आदमी भी  मनहूस हो सकता है?’’

‘‘हां, क्यों नहीं हो सकता है.’’ जवाब में मैं ने कहा.

‘‘क्या उस की वजह से आसपास के लोग परेशानी में पड़ जाते हैं?’’

‘‘बीबी, तुम्हारा सवाल बड़ा पेचीदा है. एक बात बताओ, क्या अच्छाई आसपास रहने वालों के लिए खुशनसीबी ला सकती है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘क्यों नहीं, अच्छाई तो सब के लिए अच्छी होती है.’’ लड़की ने जवाब दिया.

मैं ने उस के जवाब की सराहना की तो उस ने आगे कहा, ‘‘वकील साहब, मेरे शौहर ने अपनी मां के कहने पर मुझे घर से निकाल दिया है और अब तलाक देना चाहते हैं. मेरी सास का कहना है कि मैं मनहूस हूं. उन्होंने मेरे सारे गहने और नकद रकम भी रख ली है.’’

‘‘बीबी, पहले आप अपने बारे में तो बताइए.’’ मैं ने कहा.

‘‘मेरा नाम ताहिरा है,’’ फिर बगल में बैठी औरत की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘और यह मेरी मौसी फिरदौसी हैं. यही मेरी सब कुछ हैं. अगर यह न होतीं तो शायद मैं किसी कब्रिस्तान में होती.’’

‘‘क्या तुम्हारे मातापिता और भाईबहन नहीं हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘ऐसी बात नहीं है. मैं 4 भाइयों और पांच बहनों की एकलौती बहन हूं.’’ उस ने कहा.

‘‘यह कैसी पहेली है?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘यह मेरे लिए भी एक पहेली ही है वकील साहब. बात यह है कि मेरे अब्बा ने भी 2 शादियां कीं और अम्मी ने भी 2 शादियां कीं. दरअसल मेरे अब्बा एक हादसे की वजह से अपनी पहली बीवी से बिछुड़ गए थे. मिलने की उम्मीद नहीं दिखाई दी तो रिश्तेदारों के कहने पर उन्होंने दूसरी शादी कर ली.

‘‘उस शादी से मैं पैदा हो गई. इस के बाद अम्मीअब्बा में मनमुटाव हो गया और उसी बीच अब्बा को अपनी पहली बीवी का सुराग लग गया. उन्होंने मेरी अम्मी को तलाक दे कर पहली बीवी के साथ अपना घर आबाद कर लिया.

‘‘कुछ अरसे के बाद मेरी अम्मी ने भी दूसरी शादी कर ली. अब मेरे अब्बा को पहली बीवी से 2 बेटे और 3 बेटियां हैं. दूसरी ओर मेरी अम्मी को दूसरी शादी से 2 बेटे और 2 बेटियां हैं. इस तरह 2 हंसतेबसते घरों की मैं एक फालतू चीज हो गई.’’ ताहिरा ने आह भरते हुए कहा.

‘‘यह तो वाकई परेशानी वाली बात है. तुम्हारे शौहर ने तुम्हें तलाक की धमकी दी है या तलाक दे दिया है?’’ मैं ने नरमी से पूछा.

‘‘अभी तलाक इसलिए नहीं दिया है, क्योंकि तलाक के बाद हके मेहर देना होगा. वह मेहर की रकम देना नहीं चाहता.’’ ताहिरा की मौसी ने कहा.

मेरे पूछने पर ताहिरा ने बताया कि मेहर की रकम 32 हजार रुपए है. उस समय यह एक अच्छीखासी रकम थी.

‘‘शौहर का नाम क्या है?’’

‘‘अजीम बुखारी.’’ ताहिरा ने बताया.

‘‘तुम कह रही थी कि तुम्हारे कुछ गहने और पैसे भी उस के पास हैं?’’

‘‘मुझे नकद और गहने नहीं चाहिए. मैं अपने शौहर के साथ रहना चाहती हूं.’’

‘‘मैं कोशिश यही करूंगा. लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम्हारी देनदारी सामने आ जाए. कुछ लोग पैसे के दबाव में सुलहसफाई कर लेते हैं.’’

‘‘मेरे गहनों की कीमत 1 लाख रुपए के आसपास होगी. इतनी ही रकम अब्बा ने उसे दहेज का सामान खरीदने के लिए दी थी. लेकिन उस ने कुछ खरीदा नहीं था.’’

‘‘शादी के कितने दिनों बाद तुम्हें मनहूस कहा गया?’’

‘‘11 दिनों बाद. फिर 21 दिनों बाद मां के कहने पर मेरे शौहर ने मुझे घर से निकाल दिया. अब इस बात को 7 महीने हो रहे हैं.’’

‘‘ऐसी क्या बात थी, जिस से सास तुम्हारे खिलाफ हो गई?’’

कुछ देर सोच कर ताहिरा ने कहा, ‘‘शादी के तीसरे दिन 80-82 साल की बीमार और कमजोर मेरे शौहर की नानी गुजर गई थीं. सातवें दिन मेरे देवर की मोटरसाइकिल खो गई. फिर 11वें दिन मेरी सास ने कहा कि यह सब मेरी वजह से हो रहा है. इस मनहूस को घर से बाहर निकालो.’’

पूरी कहानी सुन कर मैं ने अजीम बुखारी के नाम एक नोटिस भिजवा दी. नोटिस भेजने के सातवें दिन एक दुबलापतला नौजवान मेरे औफिस में आया. उस ने एक सफेद लिफाफा मेरी ओर बढ़ाया तो मैं ने उसे बिठा कर पूछा, ‘‘मसला क्या है?’’

‘‘वकील साहब,’’ उस ने कहा, ‘‘मैं इस तरह की धमकियों में आ कर उस चुड़ैल को दोबारा अपने घर में नहीं रख लूंगा. उस मनहूस की वजह से मैं अपना घर नहीं बरबाद कर सकता.’’

‘‘मैं भी उस मनहूस की वजह से तुम्हारा घर बरबाद नहीं कराना चाहता’ लेकिन शौहर होने के नाते तुम्हें उस के कानूनी हकूक तो पूरे करने ही पड़ेंगे,’’ मैं ने कहा.

‘‘उस मनहूस की वजह से मेरी नानी मर गईं, भाई की मोटरसाइकिल गायब हो गई. मां मरतेमरते बचीं.’’

वह कुछ और कहता, मैं ने बात बदलते हुए कहा, ‘‘तुम कहां तक पढ़े हो?’’

‘‘मैं ने साइंस से इंटर किया है. अब एक फिल्म लैब में नौकरी करता हूं. रात को अपनी दुकान पर बैठता हूं, दिन में भाई बैठता है.’’

‘‘आदमी तो तुम पढ़ेलिखे हो, फिर यह अंधविश्वास तुम्हारे अंदर कहां से आ गया?’’

‘‘यह अंधविश्वास नहीं है सर, हकीकत है. वह जहां कदम रखती है, मुसीबत आ जाती है. आप को पता है, वह 13 साल में ही बेवा हो गई थी.’’

‘‘इस में अजीब क्या है, न जाने कितनी औरतें बेवा हो जाती हैं.’’

‘‘अरे साहब, मनहूस औरत अपने शौहर को खा गई थी.’’

मैं ने हंस कर पूछा, ‘‘कच्चा या पक्का?’’

वह चिढ़ कर बोला, ‘‘मेरी बात को आप मजाक समझ रहे हैं. अरे इस के पैदा होने से पहले ही इस के बाप ने इस की मां को छोड़ दिया, क्योंकि उसे उस की पहली गुम हुई बीवी मिल गई. उस ने खुदा का शुक्र अदा किया और इस की मां को तलाक दे दिया.

‘‘कुछ अरसे बाद मां ने दूसरी शादी कर ली और यह लड़की दोनों घरों के लिए फालतू की चीज बन गई. इस की मां को लगा कि यह मनहूस है, इसलिए उस ने जल्दी से एक अच्छे घर में इस की शादी कर दी. इस ने वहां कदम रखा ही था कि दूल्हे की फूफू के बीमार होने की खबर आई.

‘‘दूल्हा कार से फूफू को देखने जा रहा था तो रास्ते में कार ऐक्सीडेंट में दूल्हे के साथ ड्राइवर भी मारा गया. फूफू ने भी अस्पताल में दम तोड़ दिया. अब आप ही बताइए, ऐसी खतरनाक औरत को मैं घर में कैसे रख सकता हूं?’’

मुझे यकीन हो गया कि यह ताहिरा को अपने घर में नहीं रखेगा, इसलिए मैं ने हमदर्दी दिखाते हुए कहा, ‘‘शुक्र करो तुम बच गए. अब आगे क्या इरादा है?’’

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आशा की चाह में टूटा सपना – भाग 3

उमेश की यह हरकत आशा को बिलकुल पसंद नहीं आई. उस का इस तरह जिंदगी में दखल देना उसे अच्छा नहीं लगा तो उस ने उमेश को फोन कर के कहा, ‘तुम ने हमारे बारे में झूठ बोल कर राजू से मेरी जो लड़ाई कराई है, यह मुझे अच्छा नहीं लगा.’ अब तुम मुझ से न तो मिलने की कोशिश करना और न ही मुझे फोन  करना.

‘‘आशा, तुम मेरी बात का बेकार ही बुरा मान रही हो. मैं तुम्हें प्यार करता हूं, इसलिए चाहता हूं कि तुम मेरे अलावा किसी और से न मिलो.’’ उमेश ने सफाई दी.

‘‘लेकिन राजू से शिकायत कर के तुम ने मुझे उस की नजरों में गिरा दिया. वह मेरे बारे में क्या सोच रहा होगा? शक तो वह पहले से ही करता था. अब उसे विश्वास हो गया कि मैं सचमुच गलत हूं.’’ आशा ने झल्ला कर कहा.

‘‘मैं गुस्से में था, इसलिए मुझ से गलती हो गई. अब ऐसा नहीं होगा. तुम मुझे समझने की कोशिश करो आशा.’’ उमेश ने आशा को समझाने की कोशिश की.

‘‘तुम्हारी यह पहली गलती नहीं है. इस के पहले तुम ने मेरे साथ मारपीट की थी, मैं ने उस का भी बुरा नहीं माना था. लेकिन यह जो किया, अच्छा नहीं किया. यह गलती माफ करने लायक नहीं है. मैं तुम जैसे आदमी से अब संबंध नहीं रखना चाहती.’’ आशा ने कहा.

‘‘आशा, 13 नवंबर को मैं तुम से मिलने आ रहा हूं. तब बैठ कर आराम से बातें कर लेंगे.’’ उमेश ने कहा.

‘‘मैं तुम से बिलकुल नहीं मिलना चाहती, इसलिए तुम्हें यहां आने की जरूरत नहीं है.’’ आशा ने उसे आने से रोका.

‘‘आशा इतना भी नाराज मत होओ बस एक बार मेरी बात सुन लो, उस के बाद सब साफ हो जाएगा. बात इतनी बड़ी नहीं है, जितना तुम बना रही हो.’’

‘‘तुम्हारे लिए भले ही यह बात बड़ी नहीं है, लेकिन मेरे लिए यह बड़ी बात है. मैं अभी तक तुम्हारी हरकतें नजरअंदाज करती आई थी, यह उसी का नतीजा है. लेकिन अब बरदाश्त के बाहर हो गया है.’’ कह कर आशा ने फोन काट दिया.

13 नवंबर को उमेश आशा से मिलने उस के घर जाने वाला था. 14 नवंबर को बाराबंकी में उस के दोस्त पंकज के यहां शादी थी. उमेश ने योजना बनाई थी कि वह आशा से मिलते हुए दोस्त के यहां शादी में चला जाएगा. 13 नवंबर की शाम को यही कोई 7 बजे उमेश ने अपने घर फोन कर के बताया भी था कि वह मलिहाबाद में अपने दोस्त से मिल कर बाराबंकी चला जाएगा. इस के बाद उमेश ने घर वालों से संपर्क नहीं किया. रात में उस के छोटे भाई सुधीर ने उसे फोन किया तो उस का फोन बंद मिला.

13 नवंबर को उमेश ने दिन में 32 बार फोन कर के आशा को मनाने की कोशिश की थी. लेकिन आशा को अब उमेश से नफरत हो गई थी. उमेश ने उस के साथ जो किया था, अब वह उस से उस का बदला लेना चाहती थी.

आशा के संबंध गांव के ही रहने वाले रामनरेश, शकील और हरौनी के रहने वाले छोटे उर्फ पुत्तन से थे. आशा ने इन्हीं लोगों की मदद से उमेश से हमेशाहमेशा के लिए छुटकारा पाने का निश्चय कर लिया था. शाम को जब उमेश आशा से मिलने उस के घर पहुंचा तो आशा ने उस के साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसे उस से उसे कोई शिकायत नहीं है. उस ने उसे खाना खिलाया और सोने के लिए बिस्तर भी लगा दिया.

सोने से पहले उमेश ने शारीरिक संबंध की इच्छा जताई तो थोड़ी नानुकुर के बाद आशा ने उस की यह इच्छा भी पूरी कर दी. आशा की यही अदा उमेश को अच्छी लगती थी. आशा के इस व्यवहार से उमेश को लगा कि वह मान गई है. वह उसे बांहों में लिए लिए ही निश्चिंत हो कर सो गया.

उमेश के सो जाने के बाद आशा उठी और अपने कपड़े ठीक कर के घर के बाहर आई. उस ने गांव का माहौल देखा. गांव में सन्नाटा पसर गया था. उस ने रामनरेश, शकील और छोटे को पहले से ही तैयार कर रखा था. उन के पास जा कर उस ने कहा, ‘‘चलो उठो, वह सो चुका है. गांव में भी सन्नाटा पसर गया है. जल्दी से उसे खत्म कर के लाश ठिकाने लगा दो.’’

रामनरेश और आशा ने उमेश के पैर पकड़े तो छोटे ने हाथ पकड़ लिए. उस के बाद शकील ने गला दबा कर उसे खत्म कर दिया. छोटे महदोइया गांव का ही रहने वाला था, इसलिए उसे गांव की एकएक गली का पता था. सभी ने मिल कर उमेश की लाश को टैंपो नंबर 35 ई 8902 में डाला और ले जा कर गांव से काफी दूर नहर के किनारे फेंक दिया. शकील और छोटे टैंपो के पीछेपीछे उमेश की मोटरसाइकिल ले कर गए थे. उसे भी वहीं डाल दिया था.

लाश ले जाने से पहले आशा ने उमेश की पैंट की जेब से मोबाइल और पर्स निकाल लिया था, जिस से उस की पहचान न हो सके.

शकील और छोटे ने उमेश की लाश को नहर के किनारे इस तरह फेंका था कि देखने वालों को यही लगे कि रात में दुर्घटना की वजह से इस की मौत हुई है. अपनी इस योजना में वे सफल भी हो गए थे, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पोल खुल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उस की मौत गला दबाने से हुई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर के मामले की जांच शुरू की तो हत्यारों तक पहुंचने में उसे देर नहीं लगी.

आशा से पूछताछ के बाद पुलिस ने रामनरेश को भी गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने उस से भी पूछताछ की. उस ने भी अपना जुर्म कुबूल लिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

पुलिस शकील और छोटे की तलाश कर रही थी, लेकिन कथा लिखे जाने तक दोनों पुलिस के हाथ नहीं लगे थे. पुलिस हत्या के इस मामले में आशा के मांबाप की भूमिका की भी जांच कर रही है.

आशा ने जो किया, उस से उमेश का ही नहीं, उस का खुद का भी परिवार छिन्नभिन्न हो गया. जिस पति से वह अपने जिन संबंधों को छिपाना चाहती थी, उमेश की हत्या के बाद पति को ही नहीं, पूरी दुनिया को पता चल गया. अब उस का क्या होगा, यह तो अदालत के फैसले के बाद ही पता चलेगा.