Family Crime : पत्नी को भांग की गोली खिलाकर हत्या की फिर शव के टुकड़े कर झाड़ियों में फेंके

Family Crime : बिना छानबीन के हुई शादी के बाद जब पति या पत्नी की हकीकत सामने आनी शुरू होती है तो विवाद बढ़ना स्वाभाविक होता है. कई बार इस विवाद में किसी एक की जान भी दांव पर लग जाती है. अमित और कोमल के मामले में भी…

भिवाड़ी राजस्थान ही नहीं, उत्तरी भारत का प्रमुख औद्योगिक इलाका है. भिवाड़ी और हरियाणा के बीच केवल एक सड़क का फासला है. भिवाड़ी में सुई से ले कर अंतरिक्ष यान तक के कलपुर्जे बनाने वाले उद्योग हैं. भिवाड़ी वैसे तो अलवर जिले में आता है, लेकिन अपराधों के नजरिए से महत्त्वपूर्ण होने के कारण साल भर पहले अलवर जिले में भिवाड़ी को नया पुलिस जिला बना दिया गया था. राजस्थान में केवल अलवर ही ऐसा जिला है, जहां अलगअलग जिलों के नाम से 2 एसपी हैं. राज्य के कुछ जिलों में ग्रामीण और शहर एसपी हैं. जबकि जयपुर और जोधपुर शहर में पुलिस कमिश्नरेट है.

अपराधों के लिहाज से 2 महीने पहले भिवाड़ी में दबंग और इंटेलीजेंट एसपी के रूप में राममूर्ति जोशी को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी. बात 14 अगस्त की है. एसपी साहब जब अपने औफिस में स्वतंत्रता दिवस पर पुलिस की ओर से किए जाने वाले इंतजामों की फाइल देख रहे थे, तभी उन के मोबाइल पर यूआईटी फेज थर्ड थानाप्रभारी सुरेंद्र कुमार का फोन आया. थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘सर, खिदरपुर गांव के सरकारी स्कूल के पास सड़क किनारे एक महिला के शव के अलगअलग टुकड़े मिले हैं.’’

महिला के शव के टुकड़े मिलने की बात सुन कर एसपी साहब चौंके. मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने थानाप्रभारी को कुछ जरूरी निर्देश दे कर कहा, ‘‘आप शव के बाकी टुकड़े तलाश कराओ, मैं मौके पर आता हूं.’’

एसपी साहब ने अपने पीए को एडिशनल एसपी अरुण माच्या से बात कराने और तुरंत गाड़ी लगवाने को कहा. पीए ने फोन पर लाइन दी, तो एसपी साहब ने एडिशनल एसपी को महिला के शव के टुकड़े मिलने की बात बता कर तुरंत मौके पर चलने को कहा और खुद औफिस के बाहर खड़ी गाड़ी में सवार हो कर खिदरपुर स्कूल की ओर चल दिए. कुछ ही देर में वह खिदरपुर गांव पहुंच गए. स्कूल के पास तमाशबीन खड़े थे. वहां सड़क किनारे झाडि़यां उगी हुई थीं. थानाप्रभारी और कई पुलिसकर्मी भी वहां मौजूद थे. एसपी जोशी के पहुंचने के 2-4 मिनट बाद ही एडिशनल एसपी अरुण माच्या भी पहुंच गए. पुलिस के आला अधिकारियों को देख कर लोगों की भीड़ एक तरफ हट गई.

थानाप्रभारी ने आगे आ कर एसपी और एडिशनल एसपी को सैल्यूट किया. फिर बताया कि सब से पहले कमर से नीचे और जांघों से ऊपर का हिस्सा मिला. इस के बाद आसपास तलाश कराई गई तो कुछ दूर झाडि़यों में अलगअलग जगह पर दोनों हाथ मिले. एक जगह पर बालों में उलझा इंसानी मांस का टुकड़ा मिला. शव के ये अलगअलग टुकड़े महिला के थे, जो करीब 200 मीटर के दायरे में मिले थे. टुकड़ों से पता लगाना मुश्किल था एसपी राममूर्ति जोशी ने शव के टुकड़ों का निरीक्षण किया. वे 4-5 दिन पुराने लग रहे थे. जांघ और कमर से नीचे के हिस्से पर कोई कपड़ा नहीं था. शव के टुकड़े आवारा जानवरों के नोंचने और फूल जाने के कारण उम्र का अंदाज भी नहीं लग सका.

जहांजहां शव के टुकड़े मिले, वहां तेज बदबू आ रही थी. मौकामुआयना कर जोशी समझ गए कि महिला की बेरहमी से हत्या कर उस के शव को टुकड़ों में काट कर अलगअलग जगह फेंका गया है. यह भी आशंका थी कि महिला के साथ दुष्कर्म किया गया हो. चिंता की बात यह थी कि सिर सहित शव के अन्य टुकड़े नहीं मिले थे. जोशीजी ने थानाप्रभारी और एडिशनल एसपी को आसपास के इलाकों में शव के बाकी हिस्से तलाशने के निर्देश दिए. इसी के साथ उन्होंने अलवर से विधि विज्ञान विशेषज्ञों और डौग स्क्वायड को भी बुलवा लिया.

अलवर से एफएसएल के विशेषज्ञ और डौग स्क्वायड मौके पर पहुंच गया. पुलिस ने खोजी कुत्ते को शव के टुकड़े सुंघा कर बाकी टुकड़ों की तलाश कराई, लेकिन पुलिस को शव का कोई अन्य हिस्सा नहीं मिला. इस का कारण यह था कि 2-3 दिन से हो रही बारिश ने सुराग मिटा दिए थे. फोरैंसिक विशेषज्ञों ने भी मौके से साक्ष्य जुटाए, लेकिन 8-10 घंटे की खोजबीन के बाद भी पुलिस को न तो महिला के बारे में कोई सुराग मिला और न ही कातिलों के बारे में कोई जानकारी. पुलिस ने जगहजगह से एकत्र किए शव के टुकड़े सरकारी अस्पताल की मोर्चरी में भिजवा दिए. भिवाड़ी के यूआईटी फेज थर्ड पुलिस थाने में इस संबंध में मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

मामले की गंभीरता को देखते हुए जयपुर रेंज के आईजी एस. सेंगाथिर के निर्देश पर एसपी (भिवाड़ी) राममूर्ति जोशी के निर्देशन में विशेष जांच टीम का गठन किया गया. इस टीम को एडिशनल एसपी अरुण माच्या के नेतृत्व में काम करना था. टीम में डीएसपी (भिवाड़ी) हरिराम कुमावत और यूआईटी फेज थर्ड थानाप्रभारी सुरेंद्र कुमार सहित कई अफसरों और जवानों को शामिल किया गया. पुलिस ने तेजी से जांचपड़ताल शुरू की, लेकिन कहीं कोई ओरछोर नहीं मिल पा रहा था. इस का कारण यह था कि औद्योगिक इलाका होने के कारण भिवाड़ी में रोजाना राजस्थान के ही नहीं बल्कि हरियाणा के गुड़गांव, धारूहेड़ा, रेवाड़ी, बावल, फरीदाबाद, पलवल और दिल्ली तक के रोजाना हजारों लोग नौकरी और कामकाज के सिलसिले में भिवाड़ी आतेजाते हैं.

यह भी आशंका थी कि हरियाणा में हत्या करने के बाद शव के टुकड़े राजस्थान के भिवाड़ी में फेंके गए हों. हत्या के ऐसे एकदो मामले पहले भी सामने आए थे. दूसरी बड़ी समस्या यह थी भिवाड़ी में देश के विभिन्न राज्यों के लाखों श्रमिक काम करते हैं, इन श्रमिकों की भिवाड़ी सहित आसपास के गांवों में बड़ीबड़ी बस्तियां हैं. साथ ही भिवाड़ी में भी सैकड़ों बहुमंजिला सोसायटियां हैं. इन सभी इलाकों में एक महिला के बारे में खोजबीन करना चुनौती भरा काम था.

एसपी राममूर्ति जोशी पहले भी अलवर में विभिन्न पदों पर रह चुके थे. इसलिए उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर भिवाड़ी और आसपास के इलाकों से पिछले दिनों लापता हुई महिलाओं का रिकौर्ड मंगवाया. इन महिलाओं की गुमशुदगी के बारे में जांचपड़ताल की गई, लेकिन ऐसा कोई सुराग नहीं मिला, जिस से पुलिस को शव के टुकड़ों की शिनाख्त में मदद मिलती. इलाके की सोसायटियों में पिछले दिनों मकान खाली कर जाने वाले किराएदारों का भी पता लगाया गया. इस के अलावा घटनास्थल के निकटवर्ती सांथलका गांव में पिछले दिनों मकान खाली करने

वाले किराएदारों और कंपनियों से अचानक नौकरी छोड़ने वाले महिलापुरुषों के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए डोर टू डोर सर्वे किया गया. यह काम भूसे के ढेर में सूई खोजने जैसा था. पचासों पुलिस वाले इस काम में सुबह से शाम तक जुटे रहते. एसपी साहब इस काम में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते थे. वह हर संभव प्रयास से मृतका की शिनाख्त और कातिलों तक पहुंचना चाहते थे. इसलिए रोजाना शाम को एडिशनल एसपी और डीएसपी से रिपोर्ट लेते और उन्हें जरूरी निर्देश देते. पुलिस को मिली जांच की राह 2 सप्ताह से भी ज्यादा समय तक चली इस भागदौड़ में पुलिस को पता चला कि गांव सांथलका की विनोद कालोनी में रहने वाले अमित गुप्ता और उस की पत्नी कोमल पिछले कुछ दिनों से बिना किसी को बताए अचानक कमरा खाली कर चले गए.

पुलिस ने कालोनी के दूसरे लोगों से पूछताछ की, तो जानकारी मिली कि अमित और कोमल में आपस में झगड़ा होता रहता था. दोनों अलगअलग फैक्ट्रियों में काम करते थे. पुलिस को अमित का पता तो नहीं मिला. अलबत्ता यह जरूर पता लगा कि वह भरतपुर का रहने वाला है. यह सुराग मिलने पर पुलिस को उम्मीद की कुछ किरण नजर आई. अब पुलिस अमित और कोमल को तलाशने में जुट गई. इसी दौरान 3 सितंबर को यूआईटी फेज थर्ड पुलिस थाने पर डाक से एक पत्र आया. पत्र में अमित गुप्ता ने अपनी पत्नी कोमल के गायब होने की बात लिखी थी. पत्र में अमित का मोबाइल नंबर और कोमल का कानपुर का पता लिखा था.

पुलिस ने मामले की पड़ताल करने के लिए अमित के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन वह स्विच्ड औफ मिला. चूंकि अमित और उस की पत्नी अचानक मकान खाली कर के गए थे और अब अमित ने खुद थाने आने के बजाय पत्र लिख कर अपनी पत्नी की गुमशुदगी की बात कही थी. इस से पुलिस को संदेह हुआ.
थानाप्रभारी सुरेंद्र कुमार ने एसपी राममूर्ति जोशी को पूरी बात बताई. जोशी को भी मामले में संदेह नजर आया. उन्होंने भी अमित के मोबाइल नंबर पर कई बार काल की. लेकिन उस का फोन हर बार स्विच्ड औफ मिला. मोबाइल स्विच्ड औफ होने से उस की लोकेशन का भी पता नहीं चल पा रहा था. सच्चाई का पता लगाने के लिए एसपी ने थानाप्रभारी को पत्र में लिखे कोमल के कानपुर के पते पर पुलिस टीम भेजने के निर्देश दिए.

भिवाड़ी से पुलिस टीम कानपुर में मीरपुर कैंट स्थित कोमल के घर पहुंची. वहां पूछताछ में पता चला कि कोमल की अपने परिजनों से 11 अगस्त के बाद से कोई बात नहीं हुई थी. उन्हें न तो कोमल का कुछ पता था और न ही अमित का. कोमल के परिजनों ने पुलिस को बताया कि दोनों मियांबीवी में आए दिन झगड़ा होता था. यह भी बताया कि अमित ने कोमल से धोखे से शादी की थी. उन से यह जानकारी भी मिली कि अमित ने अपनी किसी महिला दोस्त की हत्या भी की थी. उन्हें शंका थी वह कोमल की भी हत्या कर सकता है. कानपुर में कोमल के घर वालों से मिली जानकारी के बाद अमित पर पुलिस का शक पक्का हो गया. साथ ही यह अनुमान भी लग गया कि 14 अगस्त को खिदरपुर स्कूल के पास मिले शव के टुकड़े कोमल के ही हो सकते हैं.

अब अमित को तलाशना जरूरी था, क्योंकि उसी से सारी सच्चाई का पता लग सकता था. एसपी राममूर्ति जोशी ने भिवाड़ी पुलिस की साइबर सेल को अमित गुप्ता के मोबाइल नंबर का तकनीकी अनुसंधान करने का निर्देश दिया. साइबर सेल के हैड कांस्टेबल मोहनलाल, कांस्टेबल संदीप और नीरज ने अमित का मोबाइल लगातार स्विच्ड औफ मिलने पर उस की पुरानी काल डिटेल्स निकलवा कर उन का विश्लेषण किया. पुलिस ने इन काल डिटेल्स के आधार पर पहले से अमित के संपर्क में रहे लोगों से उस की पूरी जन्मकुंडली हासिल की. तमाम प्रयासों के बाद पुलिस ने 7 सितंबर को अमित गुप्ता को भिवाड़ी के ही सांथलका इलाके से गिरफ्तार कर लिया. उसे पुलिस थाने ला कर पूछताछ की गई. पहले तो वह पुलिस को यह कह कर गुमराह करता रहा कि कोमल लापता है.

मैं उस की तलाश कर रहा हूं. लेकिन कड़ाई से पूछताछ में उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.
पुलिस पूछताछ में कोमल की हत्या की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है—

अमित गुप्ता राजस्थान के भरतपुर शहर का रहने वाला था. उस की शादी 13 दिसंबर, 2019 को कानपुर निवासी हरिप्रसाद गुप्ता की बड़ी बेटी कोमल से भरतपुर में हुई थी. कोमल की यह दूसरी शादी थी. उस की पहली शादी 2004 में कानपुर के संजय से हुई थी, लेकिन टीबी की बीमारी के कारण उस के पति संजय की 4 साल बाद 2008 में मौत हो गई थी. लौकडाउन में भुखमरी की नौबत ले आई भिवाड़ी अमित भरतपुर में ई मित्र की दुकान करता था. अमित और कोमल भरतपुर में कुम्हेर गेट पर रहते थे. कोमल अपने पहले पति संजय के भांजे लाली गुप्ता से फोन पर बात करती थी. इस पर अमित को ऐतराज था. इसी बात पर दोनों में आए दिन झगड़ा होता था.

कोरोना संक्रमण के कारण लौकडाउन होने से अमित का ई मित्र का कामकाज ठप हो गया. वह बेरोजगार हुआ, तो रोजीरोटी की तलाश में भरतपुर से भिवाड़ी आ गया. अमित और कोमल भिवाड़ी में सांथलका गांव की विनोद कालोनी में किराए का कमरा ले कर रहने लगे. अमित सेंट गोबेन कंपनी में नौकरी करने लगा. केवल अमित की नौकरी से घर का खर्च नहीं चल पाता था. इसलिए उस ने कोमल को भी नौकरी करने को कहा. कोमल ने प्रयास किया, तो उसे भिवाड़ी के पास चौपानकी में क्लच वायर बनाने वाली कंपनी में नौकरी मिल गई. भले ही पतिपत्नी दोनों नौकरी करने लगे थे, लेकिन उन के बीच झगड़े खत्म नहीं हुए. परेशान हो कर कोमल ने 11 अगस्त को अमित को कमरे से निकाल दिया. अमित कमरे से चला गया, उस के कुछ देर बाद कोमल अपनी नौकरी पर चली गई.

पत्नी से झगड़े के बाद अमित ने एक बार तो अपने घर भरतपुर जाने का विचार बनाया. फिर उस ने रोजरोज का झगड़ा खत्म करने के लिए कोमल का ही खेल खत्म करने की योजना बना डाली. उस ने बाजार से एक लुहार से तेज धारदार वाला बड़ा चाकू खरीदा और वापस कमरे पर आ गया. कमरे की एक चाबी अमित के पास पहले से ही रहती थी. इसलिए उसे कोई परेशानी नहीं हुई. शाम को कोमल अपनी नौकरी से वापस कमरे पर लौटी, तो अमित ने कमरे का गेट बंद कर उसे तरंग नामक भांग की गोलियां खिला दीं.
भांग के नशे में कोमल को कुछ होश नहीं रहा. अमित ने उस के हाथपैर बांध दिए और गला दबा कर उस की हत्या कर दी.

इस के बाद उस ने तेज धार वाले लंबे चाकू से उस के शरीर के अलगअलग टुकड़े किए. टुकड़े करने के दौरान कमरे के फर्श पर बिछी दरी पर खून फैल गया. इस पर उस ने दरी को एक तरफ रख कर बाकी खून के निशान पानी से धो दिए. इस काम में उसे करीब 3 घंटे लगे. कोमल के शव के टुकड़ों को प्लास्टिक के 3 अलगअलग बोरों में भर कर वह रात को कमरे पर ही सो गया. दूसरे दिन सुबह जब कालोनी के लोग अपनेअपने कामों पर चले गए, तब वह कमरे से एकएक बोरा निकाल कर ले गया और कच्चे रास्ते से हो कर खिदरपुर स्कूल के पास अलगअलग जगहों पर फेंक दिए.

उस ने खून से लथपथ वह दरी भी फेंक दी. दूसरे दिन वह अपना थोड़ाबहुत घरेलू सामान ले कर बिना किसी को कुछ बताए किराए का कमरा खाली कर फरार हो गया. बाद में 7 सितंबर को पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. फरारी के दौरान वह भिवाड़ी के अलावा पलवल, भरतपुर और जयपुर में रहा. अमित की गिरफ्तारी के बाद उस की निशानदेही पर पुलिस ने 7 सितंबर को ही कोमल के सीने से ऊपर का हिस्सा बरामद कर लिया. इस के अगले दिन 8 सितंबर को पुलिस ने खिदरपुर गांव से करीब 2 किलोमीटर दूर झाडि़यों से वह दरी भी बरामद कर ली, जिस पर कोमल की हत्या की गई थी. दरी पर खून के निशान सूख चुके थे. 9 सितंबर को पुलिस ने अमित की निशानदेही पर सिर का हिस्सा भी बरामद कर लिया.

पुलिस की सूचना पर कोमल के घर वाले 8 सितंबर को कानपुर से भिवाड़ी पहुंचे. पुलिस ने कोमल के भाई और बहन के डीएनए के सैंपल लिए ताकि कोमल के शव की अधिकृत पुष्टि की जा सके. पूछताछ में यह भी पता चला कि अमित ने सन 2013 में भरतपुर में दुष्कर्म करने के बाद एक महिला होमगार्ड की हत्या कर दी थी. इस मामले में पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया था. करीब डेढ़ साल तक वह भरतपुर जिले की सेवर जेल में बंद रहा. इस मामले में अदालत ने उसे आजीवन कारावास की सजा दी थी. सन 2014 में हाईकोर्ट से उस की जमानत हो गई थी.

अमित ने जो अपराध किया, उस की सजा उसे कानून देगा. लेकिन कोमल की मौत से उस के पिता हरिप्रसाद टूट गए हैं. कानपुर में चाय की थड़ी लगाने वाले हरिप्रसाद की 3 बेटियों में कोमल सब से बड़ी थी. पहले पति की मौत के बाद से कोमल कानपुर में अपने पिता के पास रह कर जौब करती थी. सुमन ने फंसाया था कोमल को हरिप्रसाद का कहना है कि इस दौरान कोमल के संपर्क में सुमन नाम की महिला आई. सुमन धीरेधीरे उन के घर भी आने लगी. फिर वह कोमल का रिश्ता भरतपुर के अच्छे परिवार में कराने की बात कहने लगी. भरतपुर ज्यादा दूर होने के कारण उन्होंने मना कर दिया. फिर भी सुमन ने पता नहीं कब कोमल का भरतपुर के अमित से संपर्क करा दिया.

जल्दी ही अमित ने कोमल को पूरी तरह अपने झांसे में ले लिया. इस का उन्हें पता भी नहीं चला. बाद में सुमन ने कहा कि एक बार भरतपुर जा कर लड़का देख आओ, पसंद आए तभी रिश्ता करना. बेटी की खुशी के लिए हरिप्रसाद भरतपुर गए. वहां देखा तो पहले से ही शादी की पूरी तैयारी हो चुकी थी. अनजान शहर में वे अकेले पड़ गए. बेटी की सहमति से उन्होंने अगले ही दिन 13 दिसंबर, 2019 को भरतपुर में कोमल की शादी अमित से कर दी. बाद में उन्हें पता चला कि यह शादी कराने के एवज में सुमन ने अमित से एक लाख रुपए लिए थे. कोमल शादी के बाद केवल एक बार होली पर अपने घर कानपुर गई थी.
कोमल अपनी छोटी बहन काजल को फोन पर बताती थी कि अमित का चालचलन ठीक नहीं है. वह उस पर शक करता है और आए दिन झगड़ता है.

कोमल की छोटी बहन काजल की 10 अगस्त को अमित से फोन पर बात हुई थी, तब अमित ने कहा था कि आज के बाद तुम से हमारा कोई रिश्ता नहीं रहेगा और न ही तुम कोमल से बात कर सकोगी. इस के बाद से लगातार संपर्क करने के बाद भी जब परिजनों की कोमल से बात नहीं हुई तो हरिप्रसाद ने अमित के पिता को फोन किया. उन्होंने कहा कि उन का बेटे और बहू से कोई संबंध नहीं है. इस संबंध में वे अखबार में विज्ञापन भी छपवा चुके हैं. हरिप्रसाद का कहना है कि बेटी तो चली गई, लेकिन अमित जैसे जल्लाद से कोमल का रिश्ता कराने वाली सुमन के खिलाफ भी काररवाई हो, जो पैसे कमाने के लिए जरूरतमंद युवतियों को झांसे में ले कर उन की जिंदगी बरबाद कर देती हैं.

Murder Story : दोस्त को कर्ज के 20 लाख रुपए नहीं लौटाने पडे़ इसलिए किया कत्ल

Murder Story : लौकडाउन सब से बड़ी मुसीबत बना पीनेपिलाने वालों के लिए. लेकिन पैसे वाले अपने लिए कोई न कोई राह निकाल ही लेते हैं. आकाश गुप्ता ने शराब का जुगाड़ कर के अपने दोस्तों सौरभ और सुनील को पिलाने के लिए बुलाया. दोनों आ भी गए लेकिन…

छत्तीसगढ़ के सरगुजा का शहर अंबिकापुर.रात के लगभग 8 बजे थे, कोरोना महामारी के चलते देशभर में लौकडाउन चल रहा था. जिधर देखो, उधर ही सन्नाटा. छत्तीसगढ़़ सरगुजा संभाग के ब्रह्म रोड, अंबिकापुर स्थित अपने आवास के बाहर खड़े सौरभ अग्रवाल ने मोबाइल से अपने चचेरे भाई सुनील अग्रवाल को काल लगाई. काल रिसीव हुई तो उस ने पूछा, ‘‘क्या कर रहे हो भाई? वैसे कर ही क्या सकते हो, चारों ओर तो सन्नाटा पसरा है.’’

हैलो के साथ सुनील ने दूसरी ओर से कहा, ‘‘घर पर बैठा हूं, टीवी पर कोरोना की खबरों के अलावा कुछ है ही नहीं. देखदेख कर बोर हो रहा हूं. कभी मौतों के आंकड़े आते हैं तो कभी मरीजों के. देख कर लगता है, जैसे अगला नंबर मेरा ही है.’’

हलकी हंसी के साथ सौरभ बोला, ‘‘आओ, आकाश के यहां चलते हैं. कह रहा था, टाइम पास नहीं हो रहा, सारी व्यवस्था कर रखी है उस ने.’’

सौरभ ने इशारे में सुनील को बता दिया. लेकिन वह तल्ख स्वर में बोला, ‘‘तू आकाश के चक्कर में मत रहा कर. उस की जुबान की कोई कीमत नहीं है. पिछले डेढ़ साल से चक्कर पर चक्कर कटवा रहा है, एक नंबर का बदमाश है.’’

‘‘भाई, समयसमय की बात है, कभी करोड़ों का आसामी था, उस के पिता की तूती बोलती थी सरगुजा में… समय का मारा है बेचारा. रही बात मकान की तो चिंता क्यों करते हो, पक्की लिखापढ़ी है, मकान तो उस के पुरखे भी खाली करेंगे.’’ सौरभ ने आकाश का पक्ष रखने की कोशिश की.

‘‘ठीक है, मैं आता हूं.’’ सुनील अग्रवाल ने बात बंद कर दी. सुनील उस का चचेरा भाई था, उम्र लगभग 40 वर्ष. दोनों में खूब छनती थी. दोनों मिलजुल कर अंबिकापुर में बिल्डिंग वर्क और प्रौपर्टी डीलिंग का काम करते थे. सौरभ अपनी इनोवा सीजी 15डी एच8949 पर आ कर बैठ गया. थोड़ी देर में सुनील अग्रवाल आ गया. दोनों कार से शहर का चक्कर लगा कर आकाश गुप्ता के घर पहुंच गए. हमेशा की तरह आकाश ने मुसकरा कर दोनों का स्वागत किया. तीनों के आपस में मित्रवत संबंध थे, एक ही शहर एक ही मोहल्ले में रहने के कारण एकदूसरे के काफी करीब थे. आपस में लेनदेन भी चलता था.

वह आकाश का पुश्तैनी घर था, जो अकसर खाली रहता था. जब पीनेपिलाने का प्रोग्राम बनता था तो सब दोस्त अक्सर यहीं एकत्र होते थे. फिर कैरम खेलने और पीनेपिलाने का दौर चलता था, इसी के चलते आकाश ने यह मकान 2. 30 करोड़ में सौरभ को बेच दिया था और पैसे भी ले लिए थे, मगर वह मकान को सुपुर्द करने में आनाकानी कर रहा था. बहरहाल, इन सब बातों को दरकिनार कर सुनील और सौरभ आकाश गुप्ता के घर पहुंचे और महफिल सज गई. आकाश ने बेशकीमती शराब, मुर्गमुसल्लम वगैरह मंगा रखा था. लौकडाउन के समय में ऐसी बेहतरीन व्यवस्था देख कर सौरभ अग्रवाल चहका, ‘‘अरे भाई क्या इंतजाम किया है, लग ही नहीं रहा लौकडाउन चल रहा है.’’ इस पर आकाश गुप्ता और सुनील अग्रवाल दोनों हंसने लगे.

बातचीत और पीनेपिलाने का दौर शुरू हुआ. इसी बीच अपने उग्र स्वभाव के मुताबिक सुनील अग्रवाल ने आकाश की ओर मुखातिब हो कर कहा, ‘‘यार, ये सब तो ठीक है मगर तू यह बता… सौरभ को मकान कब दे रहा है, 6 महीने हो गए.’’

यह सुन कर आकाश गुप्ता मुसकराते हुए बोला, ‘‘यार, तुम मौजमजा करने आए हो. मजे करो. कोरोना पर बात करो. ये मकान कहां जाएगा.’’

इस पर सौरभ बोला, ‘‘बात बिलकुल ठीक है. आज कोरोना की वजह से हुए लौकडाउन को 17वां दिन है. त्राहित्राहि मची है.’’

सौरभ की बात पर सुनील गंभीर हो गया और चुपचाप शराब का गिलास हाथों में उठा लिया. आकाश ने अपने एक साथी सिद्धार्थ यादव को भी बुला रखा था जो उन की सेवा में तैनात था, साथ ही हमप्याला भी बना हुआ था. हंसतेमुसकराते तीनों शराब पी रहे थे. तभी एकाएक सुनील अग्रवाल ने कहा, ‘‘यार, तूने यह आदमी कहां से ढूंढ निकाला, पहले तो तेरे यहां कभी नहीं देखा.’’

कुछ सकुचाते हुए आकाश गुप्ता ने कहा,

‘‘हां, नयानया रखा है  तुम्हारी सेवाटहल के लिए.’’

‘‘इसे कहीं देखा है…’’ सुनील ने शराब का घूंट गले से नीचे उतारते हुए कहा

‘‘हां देखा होगा. मैं यहीं का हूं भैया, पास में ही मेरा घर है.’’

‘‘नाम  क्या  है  तेरा?’’

‘‘सिद्धार्थ… सिद्धार्थ यादव.’’

‘‘हूं, तू जेल गया था न, कब छूटा?’’ सुनील ने उस पर तीखी नजर डालते हुए कहा

‘‘मैं…अभी एक महीना हुआ है.’’ सिद्धार्थ ने हकलाते हुए दोनों की ओर देख कर कहा.

‘‘अरे, तुम भी यार… सिद्धार्थ बहुत काम का लड़का है. अब सुधर गया है.’’ कहते हुए आकाश गुप्ता ने दोनों के खाली गिलास फिर से भर दिए. दोनों पीते रहे. जब नशा तारी हुआ तो अचानक आकाश गुप्ता जेब से पिस्तौल निकालते हुए बोला, ‘‘आज तुम दोनों खल्लास, मेरा… मेरा मकान चाहिए. ब्याज  पर ब्याज …ब्याज पर ब्याज… आज तुम दोनों को मार कर यहीं दफन कर दूंगा.’

आकाश का रौद्र रूप देख सौरभ और सुनील दोनों के होश उड़ गए. वे कुछ कहते समझते, इस से पहले ही आकाश ने गोली चला दी जो सीधे सुनील अग्रवाल के सिर में लगी. वह चीखता हुआ वहीं ढेर हो गया. सुनील को गोली लगते देख सौरभ कांप  उठा और वहां से भागने लगा. यह देख पास खड़े सिद्धार्थ यादव ने गुप्ती निकाली और सौरभ अग्रवाल के पेट में घुसेड़ दी. उस के पेट से खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह वहीं गिर गया. आकाश ने उस पर भी एक गोली दाग दी. सुनील और सौरभ फर्श पर गिर कर थोड़ी देर तड़पते रहे और फिर मौत के आगोश में चले गए.

आकाश गुप्ता ने पिस्तौल जेब में रख ली. फिर उस ने सिद्धार्थ के साथ मिल कर सौरभ और सुनील की लाशों को घर में पहले से ही खोद कर रखे गए गड्ढे में डाल कर ऊपर से मिट्टी डाल दी. इस से पहले सिद्धार्थ यादव ने सौरभ और सुनील की जेब से पर्स, हाथ से अंगूठी, चेन, इनोवा गाड़ी की चाबी अपने कब्जे में ले ली थी. आकाश के निर्देशानुसार वह घर से निकला और इनोवा को चला कर आकाशवाणी मार्ग पर पहुंचा. उस ने इनोवा वहीं खड़ी कर उस में पर्स, मोबाइल रख दिया. लेकिन वह यह नहीं देख सका कि उस का चेहरा कैमरे की जद में आ गया है.

10 अप्रैल, 2020 शुक्रवार को देर रात तक जब सौरभ अग्रवाल और सुनील अग्रवाल घर नहीं पहुंचे तो घर वालों को चिंता हुई. देश के साथसाथ अंबिकापुर में भी लौकडाउन का असर था. सड़कें सूनी थीं. सौरभ के भाई सुमित अग्रवाल ने सौरभ व सुनील के कुछ मित्रों को उन के मोबाइल पर काल कर के दोनों के बारे में पूछताछ की, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली. दोनों के मोबाइल भी स्विच्ड औफ थे. इस से घर वाले चिंतातुर थे. अगले दिन सुबह सुमित अग्रवाल ने सौरभ के पिता बलराज अग्रवाल से आकाश गुप्ता का मोबाइल नंबर ले कर उसे काल की और सौरभ व सुनील के बारे में पूछा. आकाश गुप्ता ने इस बारे में अनभिज्ञता जाहिर करते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है?’’

यह बताने पर कि सौरभ व सुनील भैया दोनों रात भर घर नहीं आए तो आकाश ने नाटकीयता पूर्वक कहा, ‘‘अरे, यह तो चिंता की बात है… रुको, मैं पता लगाता हूं.’’

सभी को यह जानकारी थी कि आकाश गुप्ता से सौरभ के घनिष्ठ संबंध थे. ऐसे में आकाश ने उस के परिजनों का विश्वास जीतने का प्रयास किया. थोड़ी देर बाद वह स्वयं सौरभ अग्रवाल के घर आ पहुंचा और बातचीत में शामिल हो गया. जब सुबह भी सौरभ व सुनील का पता नहीं चल पाया तो तय हुआ कि इस बात की जानकारी पुलिस को दे दी जाए. सुनील और सौरभ के भाई सुमित थाने पहुंचे. उन्हें कोतवाल विलियम टोप्पो से मिल कर उन्हें पूरी बात बता दी. कोतवाल टोप्पो ने पूछा, ‘‘पहले कभी ऐसा हुआ था?’’

‘‘नहीं…सर, ऐसा कभी नहीं हुआ, दोनों रात 11 बजे तक घर आ जाया करते थे. दोनों के मोबाइल भी औफ हैं. हम ने सारे परिचितों से भी पूछताछ कर ली है.’’ सुमित अग्रवाल यह सब बताते हुए रुआंसा हो गया.

‘‘देखो, चिंता मत करो, तुम्हारी तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज कर हम खोजबीन शुरू करते हैं.’’ कोतवाल  विलियम टोप्पो ने आश्वासन दिया. कोतवाल दोनों के घर पहुंचे और जरूरी बातें पूछने के बाद उच्चाधिकारियों एसपी आशुतोष सिंह, एडीशनल एसपी ओम चंदेल और एसपी (सिटी) एस.एस. पैकरा को इस घटना की जानकारी दे दी. मामला अंबिकापुर के धनाढ्य परिवार से जुड़ा था. सौरभ और सुनील के गायब होने की खबर बहुत तेजी से फैली. पुलिस पर सम्मानित लोगों का प्रेशर बढ़ने लगा. दोपहर होते होते एसपी आशुतोष सिंह और सभी अधिकारी व डीएसपी फोरैंसिक टीम के साथ सौरभ अग्रवाल व सुनील के घर पहुंच गए. इस के साथ ही जांच तेजी से शुरू हो गई.

इसी बीच खबर मिली कि सौरभ व सुनील जिस इनोवा कार में घर से निकले थे, वह अंबिकापुर के आकाशवाणी चौक के पास खड़ी है. यह सूचना मिलते ही कोतवाल विलियम टोप्पो आकाशवाणी चौक पहुंचे और गाड़ी की सूक्ष्मता से जांच की. गाड़ी में सुनील और सौरभ के पर्स व मोबाइल मिल गए. इस से मामला और भी संदिग्ध हो गया. पुलिस ने आसपास के सीसीटीवी कैमरों की जांच की तो एक शख्स गाड़ी पार्क करते और उस में से निकलते दिखाई दे गया. पुलिस ने तफ्तीश की तो पता चला वह शातिर अपराधी  सिद्धार्थ यादव उर्फ श्रवण है, जो फरवरी 2020 में ही एक अपराध में जेल से बाहर आया है. पुलिस ने उसे उस के घर से हिरासत में ले लिया और पूछताछ शुरू कर दी.

पहले तो सिद्धार्थ एकदम भोला बन कर कहने लगा, ‘‘मैं तो घर पर था, कहीं गया ही नहीं.’’

मगर जब उसे सीसीटीवी में कैद उस की फुटेज दिखाई गई तो उस का चेहरा स्याह पड़ गया. उस के कसबल ढीले पड़ गए. आखिर उस ने पुलिस को चौंकाने वाली बात बताई. उस ने कहा कि सौरभ व सुनील अग्रवाल की गोली मार कर हत्या कर दी गई है. सिद्धार्थ यादव के बयान के आधार पर पुलिस ने आकाश गुप्ता के यहां दबिश दी. वह शराब में डूबा घर पर बैठा था. पुलिस ने उसे गिरफ्त मे ले कर पूछताछ शुरू की. साथ ही सिद्धार्थ यादव की निशानदेही पर आकाश गुप्ता के घर में खोदे गए गड्ढे से सौरभ व सुनील की लाशें भी बरामद कर ली. हत्या में इस्तेमाल की गई पिस्तौल भी जब्त कर ली गई. तब तक यह खबर अंबिकापुर के कोनेकोने तक पहुंच गई थी. लौकडाउन के बावजूद आकाश गुप्ता के घर के बाहर लोगों का हुजूम जुट गया.

पुलिस हिरासत में आ कर आकाश गुप्ता का नशा हिरन हो गया था. थरथर कांपते हुए उस ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और पुलिस को सब कुछ बता दिया. आकाश के पिता काशी प्रसाद गुप्ता कभी शहर के बहुत बड़े आसामी थे, पांच बहनों में अकेले भाई आकाश को पिता की अर्जित धनसंपत्ति शौक में उड़ाने  के अलावा कोई काम नहीं था. धीरेधीरे वह करोड़ों की जमीनजायदाद बेचता रहा. उस ने अपना पुश्तैनी मकान भी सौरभ को 2 करोड़ 30 लाख रुपए में बेच दिया था. वह उस से रुपए भी ले चुका था, लेकिन उस की नीयत खराब हो गई थी.

वह चाहता था किसी तरह मकान उस के कब्जे में रह जाए. दूसरी तरफ 2016 में आकाश गुप्ता ने सौरभ के पिता बलराज अग्रवाल से 20  लाख रुपए का कर्ज  लिया था और इन 4 वर्षों में 50 लाख रुपए अदा करने के बावजूद उस से ब्याज के 50 लाख रुपए मांगे जा रहे थे. परेशान आकाश गुप्ता ने सिद्धार्थ को विश्वास में लिया. उसे सिद्धार्थ की आपराधिक पृष्ठभूमि पता थी. आकाश ने धीरेधीरे सिद्धार्थ से घनिष्ठ संबंध बनाए और उसे बताया कि वह किस तरह करोड़पति से बरबादी की ओर जा रहा है. इस पर सिद्धार्थ यादव ने आकाश गुप्ता के साथ हमदर्दी जताते हुए कहा, ‘‘ऐसा है तो क्यों ना सौरभ को रास्ते से हटा दिया जाए. आकाश को सिद्धार्थ की कही बात जम गई.

दोनों ने साथ मिल कर पहले सौरभ के अपहरण की योजना बनाई. लेकिन उस में बड़े पेंच देख कर तय किया कि हत्या ज्यादा आसान है. दोनों ने इसी योजना पर काम किया. सौरभ की हत्या की योजना बनने लगी तो सिद्धार्थ ने आकाश को पास के उपनगर  गंगापुर के रमेश अग्रवाल से मिलवाया. रमेश ने बरगीडीह निवासी शिव पटेल से 90 हजार रुपए में एक पिस्तौल व गोलियां दिला दीं. हत्या की योजना बना कर पहले ही यह तय कर लिया गया था कि सौरभ व सुनील को मार कर उन की लाशें घर में ही दफन कर दी जाएंगी. सिद्धार्थ और आकाश ने 4 अप्रैल से धीरेधीरे गड्ढा खोदने का काम शुरू कर दिया था.

आकाश गुप्ता ने सिद्धार्थ को मोटी रकम देने का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया. सिद्धार्थ भी आकाश गुप्ता की रईसी से प्रभावित था और धारणा बना चुका था कि इस काम में उस की मदद कर के उस का जिंदगी भर का राजदार बन जाएगा और आगे की जिंदगी मौजमजे से गुजारेगा. 11 अप्रैल 2020 की देर शाम तक आकाश गुप्ता और सिद्धार्थ को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने सौरभ अग्रवाल, सुनील अग्रवाल की हत्या के आरोप में आकाश और सिद्धार्थ के विरुद्ध भारतीय दंड विधान की धारा 302, 201, 120बी 34,25, 27 आर्म्स एक्ट  के तहत मामला दर्ज कर के आरोपियों को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें अंबिकापुर कारागार भेज दिया गया.

Agra Crime : रस्सी से गला घोंट कर पत्नी की हत्या की, फिर तिरपाल में लपेट कर जला डाला

Agra Crime : रशादी के कुछ सालों के बाद पतिपत्नी के रिश्तों में ठंडापन आने लगता है. समझदार लोग उस समय को अपनी बातों से गरमा कर बोरियत से निजात पा लेते हैं. लेकिन पुष्कर और शिवानी जैसे लोगों की कमी नहीं है, जो अपने ही जीवनसाथी की कमतरी ढूंढने लगते हैं. फलस्वरूप…

विश्वप्रसिद्ध ताज नगरी आगरा के थाना शाहगंज क्षेत्र के मोहल्ला पथौली निवासी पुष्कर बघेल की शादी अप्रैल, 2016 में आगरा के सिकंदरा की सुंदरवन कालोनी निवासी गंगासिंह की 21 वर्षीय बेटी शिवानी के साथ हुई थी. पुष्कर दिल्ली के एक प्रसिद्ध मंदिर के सामने बैठ कर मेहंदी लगाने का काम कर के परिवार की गुजरबसर करता था. बीचबीच में उस का आगरा स्थित अपने घर भी आनाजाना लगा रहता था. पुष्कर के परिवार में कुल 3 ही सदस्य थे. खुद पुष्कर उस की पत्नी शिवानी और मां गायत्री. 20 नवंबर, 2018 की बात है. सुबह जब पुष्कर और उस की मां सो कर उठे तो शिवानी घर में दिखाई नहीं दी. उन्होंने सोचा पड़ोस में कहीं गई होगी.

लेकिन इंतजार करने के बाद भी जब शिवानी वापस नहीं आई तब उस की तलाश शुरू हुई. जब वह कहीं नहीं मिली तो पुष्कर ने अपने ससुर गंगासिंह को फोन कर के शिवानी के बारे में पूछा. यह सुन कर गंगासिंह चौंके. क्योंकि वह मायके नहीं आई थी. उन्होंने पुष्कर से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारा उस के साथ कोई झगड़ा हुआ था?’’

इस पर पुष्कर ने कहा, ‘‘शिवानी के साथ कोई झगड़ा नहीं हुआ. सुबह जब हम लोग जागे, शिवानी घर में नहीं थी. इधरउधर तलाश किया, जब वह कहीं नहीं मिली तब फोन कर आप से पूछा.’’

बाद में पुष्कर को पता चला कि शिवानी घर से 25 हजार की नकदी व आभूषण ले कर लापता हुई है. ससुर गंगासिंह ने जब कहा कि शिवानी मायके नहीं आई है तो पुष्कर परेशान हो गया. कुछ ही देर में मोहल्ले भर में शिवानी के गायब होने की खबर फैल गई तो पासपड़ोस के लोग पुष्कर के घर के सामने जमा हो गए.  उस ने पड़ोसियों को शिवानी द्वारा घर से नकदी व आभूषण ले जाने की बात बताई. इस पर सभी ने पुष्कर को थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने की सलाह दी. जब शिवानी का कहीं कोई सुराग नहीं मिला, तब पुष्कर ने 23 नवंबर को थाना शाहगंज में शिवानी की गुमशुदगी दर्ज कराई. पुष्कर ने पुलिस को बताया कि शिवानी अपने किसी प्रेमी से मोबाइल पर बात करती रहती थी.

दूसरी तरफ शिवानी के पिता गंगासिंह भी थाना पंथौली पहुंचे. उन्होंने थाने में अपनी बेटी शिवानी के साथ ससुराल वालों द्वारा मारपीट व दहेज उत्पीड़न की तहरीर दी. गंगासिंह ने आरोप लगाया कि ससुराल वाले दहेज में 2 लाख रुपए की मांग करते थे. कई बार शिवानी के साथ मारपीट भी कर चुके थे. उन्होंने ही उन की बेटी शिवानी को गायब किया है. साथ ही तहरीर में शिवानी के साथ किसी अनहोनी की आशंका भी जताई गई. गंगासिंह ने पुष्कर और उस के घर वालों के खिलाफ थाने में दहेज उत्पीड़न व मारपीट का केस दर्ज करा दिया. जबकि पुष्कर इस बात का शक जता रहा था कि शिवानी जेवर, नकदी ले कर किसी के साथ भाग गई है.

पुलिस ने शिवानी के रहस्यमय तरीके से गायब होने की जांच शुरू कर दी. थाना शाहगंज और महिला थाने की 2 टीमें शिवानी को आगरा के अछनेरा, कागारौल, मथुरा, राजस्थान के भरतपुर, मध्य प्रदेश के मुरैना, ग्वालियर में तलाशने लगीं. लेकिन शिवानी का कहीं कोई पता नहीं चल सका. काफी मशक्कत के बाद भी शिवानी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. कई महीनों तक पुलिस शिवानी की तलाश में जुटी रही फिर भी उसे कुछ हासिल नहीं हुआ. शिवानी का लापता होना पुलिस के लिए सिरदर्द बन गया था. लेकिन पुलिस के अधिकारी इसे एक बड़ा चैलेंज मान रहे थे. पुलिस अधिकारी हर नजरिए से शिवानी की तलाश में जुटे थे, लेकिन शिवानी का कोई पता नहीं चल पा रहा था.

यहां तक कि सर्विलांस की टीम भी पूरी तरह से नाकाम साबित हुई. कई पुलिसकर्मी मान चुके थे कि अब शिवानी का पता नहीं लग पाएगा. सभी का अनुमान था कि शिवानी अपने किसी प्रेमी के साथ भाग गई है और उसी के साथ कहीं रह रही होगी. उधर गंगासिंह को इंतजार करतेकरते 6 महीने बीत चुके थे, पर अभी तक न तो बेटी लौट कर आई थी और न ही उस का कोई सुराग मिला था. ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा रहा था, त्योंत्यों गंगासिंह की चिंता बढ़ रही थी. शिवानी के साथ कोई अप्रिय घटना तो नहीं हो गई, इस तरह के विचार गंगासिंह के मस्तिष्क में घूमने लगे थे.

उन्होंने बेटी की खोज में रातदिन एक कर दिया था. रिश्तेनाते में भी जहां भी संभव हो सकता था, फोन कर के उन सभी से पूछा. उधर पुलिस ने इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया था. लेकिन गंगासिंह ने हिम्मत नहीं हारी. इस घटना ने गंगासिंह को अंदर तक तोड़ दिया था. वह गहरे मानसिक तनाव से गुजर रहे थे. न्याय न मिलता देख गंगासिंह ने प्रयागराज हाईकोर्ट की शरण ली. जिस के फलस्वरूप जुलाई 2019 में हाईकोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लिया. माननीय हाईकोर्ट ने आगरा के एसएसपी को कोर्ट में तलब कर के उन्हें शिवानी का पता लगाने के आदेश दिए. कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस हरकत में आई.

एसएसपी बबलू कुमार ने इस मामले को खुद देखने का निर्णय लेते हुए शिवानी के पिता गंगासिंह को अपने औफिस में बुला कर उन से शिवानी के बारे में पूरी जानकारी हासिल की. इस के बाद बबलू कुमार ने एक टीम का गठन किया. इस टीम में सर्विलांस टीम के प्रभारी इंसपेक्टर नरेंद्र कुमार, इंसपेक्टर (सदर) कमलेश कुमार, इंसपेक्टर (ताजगंज) अनुज कुमार के साथ क्राइम ब्रांच को भी शामिल किया गया था. पुलिस टीम ने अपनी जांच तेज कर दी. लापता शिवानी की तलाश में पुलिस की 2 टीमें उत्तर प्रदेश के अलावा राजस्थान के जिलों में भेजी गईं. पुलिस ने शिवानी के मायके से ले कर ससुराल पक्ष के लोगों से जानकारियां जुटाईं. फिर कई अहम साक्ष्यों की कडि़यों को जोड़ना शुरू किया. शिवानी के पति पुष्कर के मोबाइल फोन की घटना वाले दिन की लोकेशन भी चैक की.

करीब एक साल तक पुलिस शिवानी की तलाश में जुटी रही. जांच टीम ने शिवानी के लापता होने से पहले जिनजिन लोगों से उस की बात हुई थी, उन से गहनता से पूछताछ की. इस से शक की सुई शिवानी के पति पर जा कर रुकने लगी थी.

जांच के दौरान पुष्कर शक के दायरे में आया तो पुलिस ने उसे थाने बुला लिया और उस से हर दृष्टिकोण से पूछताछ की. लेकिन ऐसा कोई क्लू नहीं मिला, जिस से लगे कि शिवानी के गायब होने में उस का कोई हाथ था. पुष्कर पर शक होने के बाद जब पुलिस ने उस से पूछताछ की तो वह कुछ नहीं बोला. तब पुलिस ने उस का नार्को टेस्ट कराने की तैयारी कर ली थी. नार्को टेस्ट कराने के डर से पुष्कर टूट गया और उस ने 2 नवंबर, 2019 को अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

पुष्कर दिल्ली में रहता था, जबकि उस की पत्नी शिवानी आगरा के शाहगंज स्थित अपनी ससुराल में रहती थी. वह कभीकभी अपने गांव जाता रहता था. उस की गृहस्थी ठीक चल रही थी. लेकिन शादी के 2 साल बाद भी शिवानी मां नहीं बनी तो इस दंपति की चिंता बढ़ने लगी.  पुष्कर ने पत्नी का इलाज भी कराया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. इस के बाद बच्चा न होने पर दोनों एकदूसरे को दोषी ठहराने लगे. लिहाजा उन के बीच कलह शुरू हो गई. अब शिवानी अपना अधिकतर समय वाट्सऐप, फेसबुक पर बिताने लगी.  पुष्कर जब दिल्ली से घर आता तब भी वह उस का ध्यान नहीं रखती. वह पत्नी के बदले व्यवहार को वह महसूस कर रहा था. वह शिवानी से मोबाइल पर ज्यादा बात करने को मना करता था. लेकिन वह उस की बात को गंभीरता से नहीं लेती थी. इस बात को ले कर दोनों में अकसर झगड़ा भी होता था.

पुष्कर को शक था कि शिवानी के किसी और से नाजायज संबंध हैं. घर में कलह करने के अलावा शिवानी ने पुष्कर को तवज्जो देनी बंद कर दी तो पुष्कर ने परेशान हो कर शिवानी को ठिकाने लगाने का फैसला ले लिया. इस बारे में उस ने अपनी मां गायत्री और वृंदावन निवासी अपने ममेरे भाई वीरेंद्र के साथ योजना बनाई. योजनानुसार 20 नवंबर, 2018 को उन दोनों ने योजना को अंजाम दे दिया. उस रात जब शिवानी सो रही थी. तभी पुष्कर शिवानी की छाती पर बैठ गया. मां गायत्री ने शिवानी के हाथ पकड़ लिए और पुष्कर ने वीरेंद्र के साथ मिल कर रस्सी से शिवानी का गला घोंट दिया. कुछ देर छटपटाने के बाद शिवानी की मौत हो गई.

हत्या के बाद पुष्कर की आंखों के सामने फांसी का फंदा झूलता नजर आने लगा. पुष्कर और वीरेंद्र सोचने लगे कि शिवानी की लाश से कैसे छुटकारा पाया जाए. काफी देर सोचने के बाद पुष्कर के दिमाग में एक योजना ने जन्म लिया. पकड़े जाने से बचने के लिए रात में ही पुष्कर ने शिवानी की लाश एक तिरपाल में लपेटी. फिर लाश को अपनी मोटरसाइकिल पर रख कर घर से 10 किलोमीटर दूर ले गया. वीरेंद्र ने लाश पकड़ रखी थी. वीरेंद्र और पुष्कर शिवानी की लाश को मलपुरा थाना क्षेत्र की पुलिया के पास लेदर पार्क के जंगल में ले गए, जहां दोनों ने प्लास्टिक के तिरपाल में लिपटी लाश पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी. प्लास्टिक के तिरपाल के कारण शव काफी जल गया था.

इस घटना के 17 दिन बाद मलपुरा थाना पुलिस को 7 दिसंबर, 2018 को लेदर पार्क में एक महिला का अधजला शव पड़ा होने की सूचना मिली. पुलिस भी वहां पहुंच गई थी. पुलिस ने लाश बरामद कर उस की शिनाख्त कराने की कोशिश की लेकिन शिनाख्त नहीं हो सकी. शिनाख्त न होने पर पुलिस ने जरूरी काररवाई कर वह पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. साथ ही उस की डीएनए जांच भी कराई.  पुष्कर द्वारा अपराध स्वीकार करने के बाद मलपुरा थाना पुलिस को भी बुलाया गया. पुष्कर पुलिस को उसी जगह ले कर गया, जहां उस ने शिवानी की लाश जलाई थी.

इस से पुलिस को यकीन हो गया कि हत्या उसी ने की है. मलपुरा थाना पुलिस ने 7 दिसंबर, 2018 को यह बात मान ली कि महिला की जो लाश बरामद की गई थी, वह शिवानी की ही थी. उस की निशानदेही पर पुलिस ने घटनास्थल से हत्या के सुबूत के रूप में पुलिया के नीचे कीचड़ में दबे प्लास्टिक के तिरपाल के अधजले टुकड़े, जूड़े में लगाने वाली पिन, जले और अधजले अवशेष व पुष्कर के घर से वह मोटरसाइकिल बरामद कर ली, जिस पर लाश ले गए थे. डीएनए जांच के लिए पुलिस ने शिवानी के पिता का खून भी अस्पताल में सुरक्षित रखवा लिया.

पुलिस ने पुष्कर से पूछताछ के बाद उस की मां गायत्री को भी गिरफ्तार कर लिया लेकिन वीरेंद्र फरार हो चुका था. दोनों को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. जबकि हत्या में शामिल तीसरे आरोपी वीरेंद्र की गिरफ्तारी नहीं हो सकी थी. पति और पत्नी के रिश्ते की नींव एकदूसरे के विश्वास पर टिकी होती है, कई बार यह नींव शक की वजह से कमजोर पड़ जाती है. इस के चलते मजबूत से मजबूत रिश्ता भी टूटने की कगार पर पहुंच जाता है या टूट कर बिखर जाता है. शिवानी के मामले में भी यही हुआ. काश! पुष्कर पत्नी पर शक न करता तो शायद उस का परिवार बरबाद न होता.

 

UP Crime : बहनोई के बड़े भाई ने ही छोटे भाई के साले की हत्या कराई

UP Crime : सीधीसादी खूबसूरत रश्मि का विवाह एक ऐसे आदमी से हो गया, जिसे इंसान से कम, शराब से ज्यादा प्यार था. उत्तर प्रदेश (UP Crime) के जिला गोरखपुर के थाना कैंट का सब से व्यवस्ततम है इलाका अग्रसेन चौराहा. फर्नीचर व्यवसायियों की सब से बड़ी मार्केट होने की वजह से यहां पूरे दिन भीड़ लगी रहती है. इस मार्केट की दुकानगीता फर्नीचरकाफी बड़ी और प्रतिष्ठित मानी जाती है. फर्नीचर व्यवसायी अभिषेक रंजन अग्रवाल की यह दुकान उन की पत्नी गीता के नाम पर है. दुकान के पीछे ही उन का मकान भी है.

18 जून, 2013 की रात साढ़े 8 बजे अभिषेक अग्रवाल ने दुकान के कर्मचारियों सनी प्रजापति और राजेंद्र साहनी से दुकान बढ़ाने को कह कर खुद दुकान से बाहर कर अपने परिचित रवि अग्रवाल के साथ खड़े हो कर बातें करने लगे. इसी बीच बैंक रोड की ओर से एक मोटरसाइकिल उन के करीब कर रुक गईउस पर 2 युवक सवार थे. वे कौन हैं, यह देखने के लिए जैसे ही अभिषेक पलटे, पीछे बैठे युवक ने रिवाल्वर निकाल कर उन पर 2 गोलियां दाग दीं. दोनों ही गोलियां उन के सिर में लगीं. गोलियां लगते ही अभिषेक जहां जमीन पर गिर गए, वहीं मोटरसाइकिल युवक भाग निकले. उन के हाथों में रिवाल्वर थे, इसलिए कोई भी उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं कर सका.

अप्रत्याशित घटी इस घटना से जहां सभी हैरान थे, वहीं पूरी बाजार में हड़कंप सा मच गया था. दोनों नौकर पहले तो भाग कर घायल हो कर गिरे अभिषेक के पास आए. उन्हें तड़पता देख कर सनी जहां रवि अग्रवाल की मदद से उन्हें संभालने लगा, वहीं रवींद्र घर के अंदर की ओर घटना की सूचना देने के लिए भागा. घर के सदस्य सूचना पा कर बाहर आते, उस के पहले ही पड़ोस के दुकानदारों ने अभिषेक को एक रिक्शे पर बैठाया और पास के विंध्यवासिनीनगर स्थित स्टार नर्सिंगहोम के लिए रवाना हो गए. पीछेपीछे अभिषेक के घर वाले भी अस्पताल की ओर भागे. लेकिन अभिषेक को अस्पताल ले जाने का कोई फायदा नहीं हुआ. क्योंकि अस्पताल पहुंचने के पहले ही उस की मौत हो चुकी थी. डाक्टरों ने देखते ही उसे मृत घोषित कर दिया था. मौत की जानकारी होते ही घरवाले बिलखबिलख कर रोने लगे.

सूचना पा कर अभिषेक के तमाम परिचित भी अस्पताल पहुंच चुके थे. किसी ने घटना की सूचना फोन द्वारा पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी थी, जहां से सूचना पा कर थाना कैंट के इंस्पेक्टर टी.पी. श्रीवास्तव सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए थे. वहीं से उन्होंने इस घटना की सूचना अधिकारियों को दे कर खुद अस्पताल जा पहुंचे. इस के बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर, पुलिस अधीक्षक (नगर) परेश पांडेय, क्षेत्राधिकारी (कैंट) वी.के. पांडेय, कोतवाली के इंसपेक्टर बृजेंद्र कुमार सिंह भी वहां पहुंच गए.

पुलिस ने लाश कब्जे में ले कर औपचारिक काररवाई निपटाने के बाद पोस्टमार्टम के लिए मेडिकल कालेज भिजवा दी. पुलिस ने घटनास्थल से 9 एमएम के 2 खोखे बरामद किए थे. सारी काररवाई निपटाने के बाद थाने लौट कर पुलिस ने मृतक अभिषेक के पिता अर्जुन कुमार अग्रवाल द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर अभिषेक के बहनोई विवेक कुमार लाट, उस के मंझले भाई विनय कुमार लाट तथा 2 अज्ञात बदमाशों के खिलाफ अपराध संख्या 513/2013 पर भादंवि की धारा 302/120 बी/34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद थाना कैंट पुलिस ने उसी दिन विनय कुमार लाट को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उस से पूछताछ की गई. पहले तो वह पुलिस को बरगलाता रहा, लेकिन वह कोई पेशेवर अपराधी तो था नहीं, इसलिए पुलिस ने जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की तो उसे टूटते देर नहीं लगी. उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने सुपारी दे कर किराए के हत्यारों से अभिषेक की हत्या कराई थी. विनय द्वारा अपराध स्वीकार कर लेने और हत्यारों के नाम बता देने के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

इस मामले में नामजद दूसरा अभियुक्त विनय का भाई विवेक पहले से ही जेल में बंद था. पुलिस अन्य अभियुक्तों की तलाश में जुट गई. इस मामले में सोचने वाली बात यह थी कि आखिर बहनोई के बड़े भाई ने ही छोटे भाई के साले की हत्या क्यों कराई? अभिषेक का बहनोई जेल में क्यों बंद था? यह सब जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा. गोरखपुर के थाना कैंट के रहने वाले 72 वर्षीय अर्जुन कुमार अग्रवाल ढुनमुनदास बालमुकुंददास इंटर कालेज से 30 जून, 2003 को रिटायर होने के बाद अपने एकलौते बेटे अभिषेक रंजन के साथ उस के व्यवसाय में हाथ बंटाने लगे थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 4 बच्चों में 3 बेटियां रश्मि, शालिनी, दिवीता और एकलौता बेटा अभिषेक रंजन था. उन का यह बेटा तीसरे नंबर पर था.

अध्यापक होने की वजह से अर्जुन कुमार खुद तो संस्कारी थे ही, उन के चारों बच्चे भी उन्हीं की तरह संस्कारी थे. अर्जुन की बड़ी बेटी रश्मि सीधीसादी, बेहद सुशील थी. उस ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर (UP Crime) विश्वविद्यालय से संस्कृत से एमए करने के बाद नेट परीक्षा भी पास कर ली थी. अर्जुन कुमार अग्रवाल के सभी बच्चे इसी तरह पढ़ेलिखे थे. बायोलौजी से प्रथम श्रेणी में बीएससी करने के बाद अभिषेक रंजन अग्रवाल ने पढ़ाई छोड़ कर व्यवसाय की ओर कदम बढ़ाया था. अपने घर के आगे पड़ी जमीन में दुकान बनवा कर उस ने फर्नीचर और हार्डवेयर का काम शुरू कर दिया था. जल्दी ही उस का यह व्यवसाय चल निकला.

घर में हर तरह से खुशहाली थी. रश्मि शादी लायक हुई तो अर्जुन कुमार उस के लिए लड़का ढूंढ़ने लगे. एक दिन अर्जुन कुमार अग्रवाल की नजर स्थानीय अखबार के शहनाई कालम मेंवधु चाहिएमें छपे एक विज्ञापन पर पड़ी तो उन्हें लगा कि यहां बात बन सकती है. यह विज्ञापन रामस्वरूप लाट ने अपने बेटे के विवाह के लिए छपवाया था. उस  में फोन नंबर भी दिया था, इसलिए अर्जुन कुमार अग्रवाल ने तुरंत फोन कर के बात कर लीआखिर वहां बात बन गई. जल्दी गोदभराई कर के कुल 15 दिनों में अर्जुन कुमार ने अपनी बड़ी बेटी रश्मि का विवाह रामस्वरूप लाट के बेटे विवेक कुमार से कर दिया था. पहली और बड़ी बेटी का विवाह था, इसलिए अर्जुन कुमार ने अपनी हैसियत से कहीं ज्यादा इस शादी में खर्च किया था.

रामस्वरूप लाट ने यह विवाह इतनी जल्दी में कराया था कि अर्जुन कुमार को मौका ही नहीं मिला था कि वह लड़के या उस के घर वालों के बारे में ठीक से पता कर पाते. बाद में जो पता चला, उस के अनुसार गोरखपुर की कोतवाली के आर्यनगर के दक्षिणी हुमायूंपुर मोहल्ले के राज नर्सिंग होम के पास रहने वाले रामस्वरूप लाट ठेकेदारी करते थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 4 बेटे, कमलेश कुमार लाट, विनय कुमार लाट, विवेक कुमार लाट, विकास कुमार लाट तथा 3 बेटियां, कमला, वंदना और एप्पुल थीं

कमलेश प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था. उस से छोटे विनय, विवेक और विकास विजय चौक स्थित फोटो विजन स्टूडियो को संभालते थे. रामस्वरूप लाट सुखी और संपन्न थे, इसलिए उन की समाज में एक हैसियत थी. रामस्वरूप की बड़ी बेटी कमला की शादी कोलकाता में हुई थी. बेटों में भी कमलेश और विनय की शादी हो चुकी थी. अब उन्हें 2 बेटों और 2 बेटियों की शादी करनी थी. उसी बीच उन का बड़ा बेटा कमलेश अपने परिवार के साथ कैंट स्थित हरिओमनगर कालोनी में रहने चला गया. बाद में उस ने अपने लिए लखनऊ में मकान बनवा लिया तो अपना वह मकान सब से छोटे भाई विकास को दे कर परिवार के साथ लखनऊ चला गया.

विकास उस में रहने लगा तो विनय ने कोतवाली के विष्णु मंदिर स्थित बशारतपुर मोहल्ले में अपने लिए मकान बनवा लिया. विवेक उस की दोनों, बहनें वंदना और एप्पुल तथा मांबाप आर्यनगर स्थित पुश्तैनी मकान में एक साथ रहते थे. रहते भले ही सभी भाई अलगअलग थे, लेकिन एकदूसरे से दिल से जुड़े थे. अभिषेक को जब भी मौका मिलता, बहन का हालचाल लेने उस के घर जाता रहता था. इस के अलावा विवेक का स्टूडियो अभिषेक के घर के नजदीक ही था, इसलिए सालेबहनोई की मुलाकात अकसर होती रहती थी. रश्मि जब भी मायके आती, खुश नजर आती. इसलिए मायके वालों को यही लगता था कि वह ससुराल में खुश है.

लेकिन रश्मि की यह खुशी ऊपरी तौर पर थी, जबकि अंदर से वह बहुत दुखी थी. इस की वजह थी पति का शराबी होना. इस में दुख देने वाली बात यह थी कि शराब का घूंट हलक के नीचे उतरते ही विवेक किसी को भी नहीं पहचानता था, वह उस की पत्नी की क्यों हो. उस स्थिति में अगर रश्मि कुछ कह देती तो विवेक उसे भद्दीभद्दी गालियां तो देता ही था, पिटाई करने में भी पीछे नहीं रहता थाइस की एक वजह यह भी थी कि विवेक की कल्पना के अनुरूप रश्मि खूबसूरत नहीं थी, इसलिए वह उसे पत्नी नहीं मानता था.पति के इस उपेक्षित व्यवहार को रश्मि ने अपना भाग्य मान लिया था और ससुराल में उस के साथ क्या होता है, मायके वालों से नहीं बताया

बात उन दिनों की है कि जब रश्मि को 7 माह का गर्भ था. नवरात्र चल रहे थे. विवेक स्टूडियो बंद कर के घर पहुंचा ही था कि उस की मां का फोन गया. मां उन दिनों लखनऊ में थी. विवेक ने फोन रिसीव किया तो मां ने बिना हालचाल पूछे ही कहा, ‘‘कैसे कहूं, समझ में नहीं रहा है. कहूंगी तो कहोगे कि मेरे पत्नी के पीछे हाथ धो कर पड़ी हूं.’’

‘‘कहो तो बात क्या है?’’ विवेक ने कहा.

‘‘तेरी पत्नी कह रही थी कि बहुओं को पीटना इस घर का रिवाज है. अब तुम्हीं बताओ, मैं ने कब किस के साथ मारपीट की है, जो मुझ पर इस तरह के आरोप लग रहे हैं. जब से सुना है, कलेजे में आग लगी है. पूछ तो अपनी लुगाई से, आखिर वह चाहती क्या है? मांबेटे के बीच दरार क्यों डाल रही है?’’

मां ने ये बातें जिस तरह कही थीं, सुनते ही विवेक की देह में आग लग गई. उस ने आव देखा ताव, रश्मि पर पिल पड़ा. उस के हाथ में जो भी आया वह उसी से उसे मारता रहा. उस समय उस ने यह भी नहीं सोचा कि रश्मि गर्भवती है. कहीं उल्टासीधा चोट लग गई तो क्या होगा. आखिर इस पिटाई से रश्मि की हालत बिगड़ गई. वह चलनेफिरने लायक नहीं रही. तब विवेक उसे रिक्शे पर बैठा कर ससुराल छोड़ आया. मांबाप और अभिषेक उस की हालत देख कर दंग रह गए. यह सब कैसे हुआ, सभी पूछते रह गए. लेकिन रश्मि ने बताया नहीं. उस ने झूठ बोल दिया कि पीरियड नजदीक होने की वजह से उसे कुछ तकलीफ हो गई है

जिस की वजह से इतनी रात को यहां गई. मांबाप ने उस की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. इस की वजह यह थी कि उस के साथ यह सब जो हुआ था, उस के बारे में उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था. उन्होंने उसे आराम करने के लिए कह दिया. विवेक उसे छोड़ कर उसी समय अपने घर लौट गया. पति ने इतना मारापीटा था, इस के बावजूद रश्मि ने इस बात को दिल से नहीं लिया. शायद यही वजह थी कि उस ने मायके वालों से सच्चाई छिपा ली थी. उसे यह भी पता था कि अगर भाई को सच्चाई का पता चल गया तो हंगामा हो जाएगा. इसलिए चुप रहने में ही सब की भलाई है.

यही सोच कर रश्मि ने इस बात को भुला दिया. 3 दिनों बाद विवेक ने फोन किया. माफी मांगते हुए उस ने कहा कि उसे अपने किए पर काफी पछतावा है. इतने में ही रश्मि का दिल पसीज गया और उस ने विवेक को माफ कर दिया. यही नहीं, उस के साथ वह ससुराल भी गई.

रश्मि के ससुराल आने के बाद 2-4 दिनों तक घर का माहौल ठीक रहा. उस के बाद फिर पहले जैसे ही हालात हो गए. छोटीछोटी बातों को ले कर तूफान खड़ा होने लगा. विवेक पहले की तरह फिर रश्मि के साथ बदसलूकी और मारपीट करने लगा. जबकि उसे मना कर लाते समय उस ने वादा किया था कि अब वह उस के साथ बदसलूकी करेगा मारपीट. लेकिन घर आते ही वह अपना वादा भूल गया. धीरेधीरे रोज की यही नियति बन गई. समय पर रश्मि ने बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम श्रद्धा रखा गया. विवेक बेटी को पा कर निहाल था. उस की एप्पुल बुआ उस पर जान छिड़कती थी. वैसे तो सब कुछ ठीक रहता था, लेकिन विवेक की मां के आते ही घर का माहौल खराब हो जाता.

वह उलटासीधा पढ़ाती तो मां के प्रेम में अंधा विवेक वही करता, जो मां उसे करने को कहती. जब तक वह घर में नहीं रहती, घर में सुखचैन रहता. वैसे वह ज्यादातर बड़े बेटेबहू के साथ लखनऊ में रहती थी. श्रद्धा 2-3 महीने की थी, तभी एक दिन विवेक की बहन वंदना ने विवेक और रश्मि को अपने घर खाने पर बुलाया. बेटी को साथ ले कर रश्मि पति के साथ ननद के यहां पहुंची. हंसीठिठोली के बीच विवेक बातबात में रश्मि को जलील करने लगा. रश्मि वहां तो कुछ नहीं बोली, लेकिन घर कर वह विवेक से जलील करने की वजह पूछने लगी. विवेक ने ठीक से जवाब नहीं दिया तो इसी बात पर दोनों में नोकझोंक हो गई. विवेक दूसरे कमरे में जा कर सो गया और रश्मि अपने कमरे में सुबह रश्मि ने विवेक से कुछ कहा तो रात की खुन्नस निकालने के लिए वह उस की पिटाई करने लगा.

पति की इस हरकत से क्षुब्ध हो कर उसी समय रश्मि बेटी को ले कर मायके गई. रश्मि के अकेली आने पर मांबाप को समझते देर नहीं लगी कि बेटीदामाद में ऐसा कुछ जरूर हुआ है, जिस की वजह से रश्मि को घर छोड़ कर अकेली आना पड़ा. जब उन्होंने ध्यान से देखा तो उस के जिस्म पर उभरे नीले निशान दामाद की दरिंदगी की कहानी कह रहे थे. पहली बार उन्हें अहसास हुआ कि उन्होंने बेटी को गलत हाथों में सौंप दिया है. आगे से ऐसा हो, इस के लिए अर्जुन कुमार ने बेटी का मेडिकल करवाया और उसे ले कर महिला थाने पहुंच गए. महिला थाने की थानाप्रभारी से रश्मि के साथ हुए अत्याचार के बारे में बता कर कानूनी काररवाई करने को कहा, ताकि भविष्य में बेटी के साथ कोई अनहोनी हो तो इस के लिए उस के दामाद विवेक को जिम्मेदार माना जाए.

रश्मि नहीं चाहती थी कि उस के पिता कोई ऐसा काम करें, जिस से ससुराल जाने पर उसे परेशानी हो. इसलिए थानाप्रभारी से उस ने कोई भी काररवाई करने से मना कर दिया. इस के बावजूद रश्मि के लिए परेशानी खड़ी हो गई. विवेक को पता चल ही गया था कि रश्मि पिता के साथ महिला थाने गई थी. इस बात से रश्मि के प्रति उस का व्यवहार और बदल गया. अब वह पहले से ज्यादा शराब पी कर आने लगा और रश्मि को परेशान करने लगा. इसी तरह 3 साल बीत गए. इन 3 सालों में रश्मि ने ससुराल में एक दिन भी सुख का अनुभव नहीं किया. कोई भी ऐसा दिन नहीं बीता, जिस दिन पतिपत्नी के बीच लड़ाईझगड़ा या मारपीट हुई हो. शारीरिक उत्पीड़न और प्रताड़ना उस की जिंदगी का हिस्सा बन गई थी. एक तरह से उस की जिंदगी नरक बन कर रह गई थी.

शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न सहतेसहते रश्मि पूरी तरह से टूट गई थी. जब उस की सहनशक्ति खत्म हो गई तो ससुराल में उस के साथ क्याक्या हुआ, उस ने एकएक बात मांबाप को बता दी. बेटी की दुखद कहानी सुन कर मांबाप के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वे हैरानी से बेटी का मुंह ताकते रह गए कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी उस ने उफ तक नहीं की. उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि नाजों से पलीबढ़ी बेटी ससुराल में दुख के अंगारों पर झुलस रही है. वह ऐसे गुनाह की सजा वह काट रही है, जिसे उस ने कभी किया ही नहीं है. बिना वजह रश्मि को परेशान किए जाने की बात से अर्जुन कुमार और अभिषेक बहुत दुखी हुए. अब उन के पास कानून का सहारा लेने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था. इसलिए उन्होंने बेटी से दामाद द्वारा मारपीट करने की तहरीर महिला थाने में दिलवा दी.

रश्मि द्वारा दी गई तहरीर ने आग में घी का काम किया. महिला थाने की थानाप्रभारी ने विवेक को थाने बुलवा कर सब के सामने उसे इस तरह जलील किया कि वह भीगी बिल्ली बन कर रह गया. उस ने सब के सामने माफी मांगी और वादा किया कि भविष्य में वह फिर कभी किसी तरह की शिकायत का मौका नहीं देगा. विवेक के घडि़याली आंसू पर रश्मि तो पिघल गई, लेकिन उस के इस नाटक पर तो अर्जुन और अभिषेक को यकीन हुआ, ही थानाप्रभारी को. रश्मि के कहने पर उस के घर वाले और पुलिस उसे इस शर्त पर विवेक के साथ भेजने को राजी हुई कि भविष्य में अगर रश्मि के साथ किसी भी तरह की कोई अनहोनी होती है तो इस के लिए वही जिम्मेदार होगा. विवेक ने यह शर्त मान ली तो रश्मि को उस के साथ भेज दिया गया.

रश्मि पति के साथ ससुराल तो गई, लेकिन इस के बाद उसे मायके वालों का मुंह देखना नसीब नहीं हुआ. विवेक का सख्त आदेश था कि वह तो मायके जाएगी और ही वहां फोन करेगी. यही नहीं, मायके वालों का फोन आता है, तब भी वह बात नहीं करेगी. इस तरह विवेक ने ससुराल वालों से संबंध लगभग तोड़ लिए. उसे नाराजगी इस बात की थी कि ससुर और साले ने दूसरी बार पत्नी से उस की शिकायत करा दी थी, जिस की वजह से उसे थाने में सब के साने जलील किया गया था. यह अपमान वह भूल नहीं पा रहा था.

रश्मि ने सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़ दिया था. अब बेटी ही उस के लिए एकमात्र जीने का सहारा रह गई थी. उसे ही देख कर वह जी रही थी. सासससुर, ननददेवर सभी ने मुंह मोड़ लिया था. शायद उस ने भी ठान लिया था कि वह वही करेगी, जो भारतीय नारियां करती आई हैं. जिस इज्जत के साथ वह ब्याह कर ससुराल आई है, उसी इज्जत के साथ उस की अर्थी ससुराल से ही उठेगी. इसी तरह 5 साल बीत गए. सन 2008 में रश्मि की छोटी बहन दिवीता की शादी तय हुई. बेटी की शादी तय होने की बात अर्जुन कुमार ने बेटी रश्मि और दामाद विवेक को भी बताई. बहन की शादी तय होने की बात सुन कर रश्मि बहुत खुश हुई. जाने क्या सोच कर विवेक ने रश्मि को शादी में जाने की अनुमति दे दी. यही नहीं, वह खुद भी उस शादी में शामिल हुआ.

बेटीदामाद के आने से सभी को खुशी हुई. अर्जुन कुमार और उन की पत्नी को लगा, शायद अब सब ठीक हो जाएगा. इस के बाद विवेक खुद भी ससुराल आनेजाने लगा और रश्मि को भी साथ ले जाने लगा. 2 बार वह रश्मि को ले कर सिंगापुर भी घूमने गया. विवेक भले ही ससुराल आनेजाने लगा था और रश्मि को देश के बाहर घुमाने भी ले गया था, लेकिन रश्मि के साथ वह जो व्यवहार करता आया था, उस में कोई बदलाव नहीं आया थावह अभी भी रश्मि को जलील करने से चूकता था, उस के साथ मारपीट करने में पीछे रहता था. उस में सब से बड़ी कमी यह थी कि वह यह भी नहीं देखता था कि पत्नी से कहां और कैसा व्यवहार किया जाए. बाप के इस व्यवहार से श्रद्धा भी दुखी रहती थी. कहने का मतलब यह था कि विवेक ने शराफत का जो चोला ओढ़ रखा था, वह मात्र दिखावा था, जबकि उस की आदत में कोई सुधार नहीं आया था.

विवेक का जब मन होता, वह गंदीगंदी गालियां देते हुए रश्मि की पिटाई करने लगता. जबकि रश्मि को गालियों से बहुत चिढ़ थी. ऐसे में रश्मि विरोध करती तो घर का माहौल बिगड़ जाता. मजबूरन समझदारी का परिचय देते हुए रश्मि को ही चुप होना पड़ता. मार्च महीने की बात है. रश्मि मायके आई हुई थी. उसी बीच एक दिन उस ने देवर विकास और उस की पत्नी को खाने पर अपने घर बुलाया. रात में विवेक भी गया. खाना खा कर विकास तो पत्नी के साथ चला गया, लेकिन विवेक ससुराल में ही रुक गया. सब के जाने के बाद विवेक सोने के लिए लेटा तो पत्नी से लाइट बंद करने को कहा. काम में व्यस्त होने की वजह से रश्मि सुन नहीं पाई. इसलिए लाइट औफ नहीं की. विवेक गुस्से में उठा तो शराब की खाली पड़ी बोतल उस के पैर से टकरा गई.

फिर तो विवेक का गुस्सा इस कदर बढ़ा कि उस ने चप्पल निकाली और रश्मि के घर में ही उस की पिटाई करने लगा, साथ ही गंदीगंदी गालियां भी दे रहा था. हद तो तब हो गई, जब गिलास में रखी शराब उस ने उस के मुंह पर उड़ेल दी. इस पर रश्मि को भी गुस्सा गया. उस ने आवाज दे कर मांबाप को बुला लिया. इस के बाद उस रात विवेक से खूब झगड़ा हुआ. विवेक अकेला था, जबकि रश्मि का पूरा परिवार था. अंत में रश्मि ने ही बीचबचाव कर के मामला शांत कराया. इस के बाद एक बार फिर विवेक के संबंध ससुराल वालों से खराब हो गए. इतना सब होने के बावजूद रश्मि बेटी को ले कर पति के साथ ससुराल गई.

3 अप्रैल, 2013 की शाम 4 बजे के आसपास रश्मि ने अभिषेक को फोन कर के बताया कि विवेक ने उसे और श्रद्धा को खाने की चीज में जहर मिला कर खिला दिया है. इस के आगे वह कुछ नहीं कह पाई, क्योंकि दूसरी ओर से फोन कट गया था. शायद किसी ने फोन छीन कर काट दिया था. अभिषेक के पास सोचने का भी समय नहीं था. उस ने जल्दी से गाड़ी निकाली और पिता को साथ ले कर रश्मि की ससुराल जा पहुंचाविवेक घर में ही था. लेकिन उस से कोई बात किए बगैर बापबेटे सीधे रश्मि के कमरे में पहुंचे. श्रद्धा और रश्मि बिस्तर पर पड़ी तड़प रही थीं. बापबेटे ने मिल कर दोनों को गाड़ी में लिटाया और विंध्यवासिनीनगर स्थित स्टार नर्सिंग होम ले गए. दोनों का इलाज शुरू हुआ. इस बीच ससुराल का कोई भी सदस्य उन्हें देखने नहीं आया. रात करीब 11 बजे रश्मि की ननद वंदना जरूर आई. थोड़ी देर रुक कर वह भी चली गई.

श्रद्धा की हालत तो स्थिर रही, लेकिन रश्मि की हालत बिगड़ती गई. तब अर्जुन कुमार और अभिषेक, दोनों को वहां से डिस्चार्ज करा कर डा. मल्ल नर्सिंगहोम ले गए. श्रद्धा तो जैसेतैसे बच गई, लेकिन 2 दिनों तक जिंदगी और मौत से संघर्ष करते हुए 5 अप्रैल की शाम 6 बजे रश्मि मौत से हार गई और यह दुनिया छोड़ कर चली गई. रश्मि की मौत की सूचना पा कर कोतवाली पुलिस अस्पताल पहुंची और लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए मेडिकल कालेज भिजवा दिया. इस के बाद श्रद्धा के बताए अनुसार अभिषेक ने कोतवाली पुलिस को जो तहरीर दी, उस के आधार पर कोतवाली पुलिस ने अपराध संख्या 139/2013 पर भादंवि की धारा 302, 307, 498 के तहत विवेक कुमार लाट के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. इस मामले की जांच कोतवाल प्रभारी इंसपेक्टर बृजेंद्र सिंह ने स्वयं संभाली.

6 अप्रैल, 2013 की सुबह बृजेंद्र सिंह ने विवेक कुमार को आर्यनगर स्थित उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद उसी दिन उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. जांच के दौरान इंस्पेक्टर बृजेंद्र सिंह को अभिषेक ने रश्मि के हाथों के लिखी 13 बिंदुओं में 7 पृष्ठों की मर्मस्पर्शी एक चिट्ठी सौंपी. उस चिट्ठी में रश्मि ने पति के हर जुर्म को विस्तार से लिखा था. जांच के दौरान कोतवाली प्रभारी ने उस में लिखा एकएक शब्द सच पाया. इस मामले में पुलिस ने 29 जून, 2013 को विवेक कुमार लाट के खिलाफ आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया.

श्रद्धा ने अपने बयान में पुलिस को बताया था कि उस के पापा ने ही उसे और उस की मां को खाने के चीज में जहर मिला कर जबरदस्ती खिलाया था. जिसे खाने के कुछ देर बाद दोनों की हालत बिगड़ने लगी थी. अभिषेक ने पुलिस को बताया था कि उस की बहन बहुत ज्यादा सुंदर नहीं थी. वह निहायत सीधीसादी और परंपराओं में जीने वाली नारी थी. उस की यही बातें विवेक की पसंद नहीं थीं. वह अय्याश था. उस के कई औरतों से नाजायज संबंध थे. रश्मि ने इस का विरोध किया तो वह उस के साथ मारपीट करने लगा. 15 सालों तक वह तिलतिल मरती रही.

अभिषेक बहन की मौत का बदला लेना चाहता था. इसी वजह से वह बहन की हत्या के मामले की पैरवी ठीक से कर रहा था. विवेक के घर वालों ने जब उस की जमानत के लिए अदालत में याचिका दायर की तो अभिषेक की पैरवी की वजह से उस की जमानत याचिका खारिज हो गई. विवेक का मंझला भाई विनय कुमार लाट अभिषेक पर दबाव बना रहा था कि इस मामले से धारा 302 हटवा दे. अभिषेक इस के लिए तैयार नहीं था. अभिषेक और अर्जुन कुमार रश्मि की ससुराल वालों की धमकियों की परवाह किए बगैर मामले की पैरवी करते रहे. आखिरकार वही हुआ, जिस की उन्होंने परवाह नहीं थी. 18 जून, 2013 को भाड़े के शूटरों से विनय कुमार लाट ने अभिषेक रंजन अग्रवाल की हत्या करवा दी. मृतक अभिषेक के पिता अर्जुन कुमार अग्रवाल ने बेटे की हत्या की नामजद रिपोर्ट विवेक, उस के मंझले भाई विनय कुमार और 2 अज्ञात शूटरों के खिलाफ थाना कैंट में दर्ज कराई थी.

मुकदमा दर्ज होने के बाद थाना कैंट के इंस्पेक्टर टी.पी. श्रीवास्तव ने जांच के दौरान पाया कि यह हत्या पूर्व में हुए झगड़े की वजह से जेल में बंद एक बाहुबली सफेदपोश अपराधी को सुपारी दे कर कराई गई थी. विनय ने पुलिस के सामने अपना अपराध स्वीकार भी किया था. लेकिन हत्यारे कौन थे, कहां से आए थे? पुलिस इस का पता नहीं लगा सकी. जबकि इस मामले में नामजद अभियुक्त विनय और विवेक के बड़े भाई और प्रौपर्टी डीलर कमलेश कुमार लाट का कहना था कि रश्मि ने पारिवारिक कारणों से आजिज कर खुद ही जहर खा लिया था और श्रद्धा को भी खिलाया था. अस्पताल में उस ने सब के सामने यही कहा भी था. लेकिन अर्जुन कुमार और अभिषेक ने जबरदस्ती उस के निर्दोष भाई को जेल भिजवा दिया. उस की जमानत तक नहीं होने दी. अभिषेक की हत्या में भी उन का कोई हाथ नहीं है.

इस लड़ाई में एकमात्र गवाह 14 वर्षीया श्रद्धा लाट की जान खतरे में है. शूटरों के पकड़े जाने से अर्जुन कुमार का परिवार दहशत में है. उन की सुरक्षा के लिए पुलिस तैनात है. पुलिस ने विवेक कुमार और विनय कुमार पर 8 नवंबर, 2013 को गैंगस्टर एक्ट भी लगा दिया है. कथा लिखे जाने तक दोनों अभियुक्तों विवेक और विनय की जमानत नहीं हुई थी.

   —कथा परिजनों और पुलिस सूत्रों पर आधारित

Murder Story : 2500 करोड़ का वारिस जेल में रहेगा, किया था भयानक अपराध

Murder Story : एक ऐसी घटना जिसने सभी को झकझोर कर रख दिया, जिसे जानने के बाद हर कोई हैरान है. जिसमें 2500 करोड़ की संपति के मालिक को ऐसी सजा मिली कि वह उन दिनों की बड़ी चर्चा बन गई.

ब्रिटेन की कंपनी पेटी की वारिस डायलान थॉमस ने एक ऐसा क्राइम किया जिसके लिए डायलान को अब पूरा जीवन जेल के सलाखों के पीछे गुजारना होगा. डायलान ने अपने जिगरी दोस्त विलियम बुश का बड़े बेरहमी से कत्ल कर दिया, जिसके लिए अब डायलान को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. थॉमस ने अपने जिगरी दोस्त की हत्या उसके घर में ही की थी.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार थॉमस ने अपने जिगरी दोस्त बुश को 37 बार चाकुओं से वार कर उसका पूरा शरीर गोद दिया था. इसके लिए थॉमस ने किचन में इस्तेमाल किए जाने वाले बड़े चाकू और एक फ्लिक चाकू का इस्तेमाल किया था.

घटना करने से पहले थॉमस ने इंटरनेट पर इस संबंध में काफी सर्च किया था. कोर्ट में लाए जाने पर थॉमस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिय. कोर्ट ने कहा है कि थॉमस मानसिक अवसाद से गुजर रहा था, लेकिन थॉमस ने अपने दोस्त का कत्ल किया इसलिए उसे अपने द्वारा किए गए अपराध का पूरा एहसाह है.

परिवार और दोस्त का शोक

बुश के परिवार और उनकी प्रेमिका ने अदालत में शोक व्यक्त किया. बुश की बहन कैट्रिन ने इसे एक भयानक हत्या करार दिया है. जबकि बुश के पिता जॉन ने कहा कि इस घटना ने उनके पूरे परिवार को एक गहरी चोट पहुंचाई है. वहीं बुश की प्रेमिका एला जेफ्रीज़ ने कहा कि उन्होंने पूरी जिंदगी के सपने संजोये थे पर अब वह सपने बिखर गए.

थॉमस के बचाव पक्ष ने कहा कि वह मानसिक स्थिति मे था और थॉमस को मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता थी.

अरेस्ट करने से पहले थॉमस ने पुलिस से कहा कि वह यीशु हैं

पुलिस ने थॉमस द्वारा अपने दोस्त की बेरहमी से कत्ल करने की हत्या को एक विश्वासघात के रूप में देखा है. थॉमस का परिवार 1950 के दशक में पाई उद्योग में अपनी संपत्ति बनाने में सफल रहा था. हालांकि थॉमस के परिवार ने 1988 में अपनी कंपनी पीटर्स फूड को बेच दिया.

कोर्ट ने थॉमस को अपने जिगरी दोस्त बुश की हत्या करने के लिए दोषी ठहरा गया है. इसलिए अब 2500 करोड़ के वारिश को अब अपना पूरा जीवन जेल की सलाखों में गुजारना होगा.

Social Crime story : 20 लाख सुपारी देकर लिया थप्पड़ का बदला

Social Crime story : तमाचे के कई रंग होते हैं, अगर कमजोर या गरीब के गाल पर पड़े तो वह मन मसोस कर रह जाता है, लेकिन यही तमाचा किसी समृद्ध व्यक्ति के गाल पर पड़े तो वह लाशें भी बिछवा सकता है. महेंद्र सिंह पूनिया और हरवीर की दुश्मनी बस एक तमाचे की थी, जो…   

राजस्थान के जिला बीकानेर की सेंट्रल जेल में 3500 कैदियों के रखने की क्षमता है, लेकिन यहां फिलहाल  1500 कैदी ही हैं. सरकार भले ही जेलों को सुधार गृह की उपमा दे, पर अंदर की सच्चाई इस से इतर है. विभिन्न आरोपों में जितने लोग जेल भेजे जाते हैं, उन में से अधिकांश लोग सुधरने के बजाय और ज्यादा कुख्यात हो कर आते हैं. बीकानेर जेल में कम से कम 10 ऐसे हार्डकोर अपराधी चिह्नित किए जा सकते हैं, जिन के एक धमकी भरे फोन से सामने वाला बिना किसी नानुकुर के लाख-2 लाख रुपए उस के गुर्गे के पास पहुंचा देता है. यह भी एक कटु सत्य है कि जेल के अंदर जेल प्रशासन की जगह इन हार्डकोर अपराधियों का ही राज चलता है. नए आने वाले कैदियों को डराधमका कर उन के परिजनों से चौथ वसूली मामूली सी बात है.

बीकानेर जेल में एक ऐसा ही कैदी था अजीत यादव. अजीत यादव झुंझुनू जिले का हार्डकोर क्रिमिनल था. हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे अजीत के खिलाफ विभिन्न अदालतों में लगभग एक दरजन मुकदमे विचाराधीन हैं. एक तरह से अजीत यादव जेल में बौस थासन 2017 की एक घटना है. रावतसर के चाइया निवासी रामनिवास जाट ने रंजिश के चलते एक टोलनाका कर्मी से मारपीट कर के टोलनाका पर लगे बैरियर को तोड़ दिया था. बाद में महाजन थाने की पुलिस ने रामनिवास को गिरफ्तार कर बीकानेर जेल में भिजवा दिया था.

रामनिवास जब जेल में पहुंचा तो उसे अन्य कैदियों से कुख्यात अपराधी अजीत यादव के बारे में जानकारी मिली. पता चला कि जेल में उस का ही राज चलता है, इसलिए पुराने कैदियों की सलाह पर रामनिवास अजीत यादव की बैरक में पहुंचा और जाते ही उस ने उस के पैर छुए. अजीत ने उस की बांहें पकड़ कर उठाते हुए पूछा, ‘‘अरे जवान, कहां से आए हो?’’

‘‘जी, रावतसर थानाक्षेत्र का रहने वाला हूं. महाजन पुलिस ने गिरफ्तार किया था.’’ रामनिवास ने जवाब दिया.

‘‘तूने किस का कत्ल किया था?’’ अजीत ने अपने चिरपरिचित अंदाज में रामनिवास से पूछा.

‘‘भैया, कत्ल नहीं, मारपीट के आरोप में जेल आया हूं.’’ कहते हुए रामनिवास हीनभावना से ग्रसित हो गया. उस का जवाब सुन कर अजीत खिलखिला कर हंस पड़ा, ‘‘तेरी कदकाठी डीलडौल देख कर मैं ने कत्ल की बात कही थी. मारपीट, छेड़छाड़, चोरीचकारी वगैरह सैकेंडहैंड गुंडों को शोभा देती हैं. तेरे जैसे को तो कातिल की उपमा ही शोभा देती है.’’

जाने क्यों अजीत को रामनिवास भा गया. दूसरी ओर रामनिवास ने भी अपराध की दुनिया के बादशाह अजीत को मन ही मन अपना गुरु मान लिया. ऐसे बनते हैं क्रिमिनल रामनिवास ने धीरेधीरे सभी कैदियों से संपर्क बना लिए. 1-2 घंटे अजीत की बैरक में बिताना उस का नित्यक्रम बन गया था. अजीत भी रामनिवास को छोटे भाई की तरह चाहने लगा था. एक दिन रामनिवास ने अजीत का मूड सही देख कर कहा, ‘‘भैया, एक मसले पर आप से मार्गदर्शन लेना है. आप नाराज हों तो जिक्र करूं?’’

‘‘अरे छोटे भाई से कैसी नाराजगी, तू खुल कर बता.’’ अजीत ने कहा.

‘‘भैया, एक आदमी को सुलटाना है.’’ रामनिवास ने कहा.

‘‘कौन है निशाने पर?’’ अजीत ने पूछा.

‘‘रावतसर नगर पालिका की चेयरपरसन का पति है, खुद भी पार्षद है और इस बार नोहर विधानसभा क्षेत्र से एमएलए का चुनाव भी लड़ रहा है. आप शार्पशूटर की व्यवस्था कर दें तो मेरा काम आसानी से हो जाएगा. और हां, 4-5 लाख की सुपारी भी मिल जाएगी, मुझे प्रस्ताव मिल चुका है.’’ रामनिवास ने कहा.

‘‘अरे पगले, लगता है तू निरा बुद्धू है. भावी विधायक की कीमत केवल 5 लाख रुपए. इतने रुपयों में तो कोई सड़कछाप शख्स को भी ठिकाने नहीं लगाएगा. तू एक करोड़ की मांग कर. 50 लाख तक सैटिंग बिठा ले. मैं तुझे शार्पशूटर उपलब्ध करवा दूंगा. याद रखना, मिलने वाली आधी रकम मेरी होगी.’’ अजीत ने कहा.

करीब एक साल बाद जमानत मिलने पर रामनिवास जेल से बाहर गया. जेल में बिताया हर पल उस के दिलोदिमाग पर हावी था. अजीत द्वाराकत्लीकी उपमा ले कर जेल जाने का ताना गाहेबगाहे उस के दिलोदिमाग में घूम रहा था. कभीकभी वह अजीत से फोन पर बतिया भी लेता था. उस दिन 23 सितंबर, 2018 का दिन था. बड़े भैया अजीत ने वादे के अनुसार शार्पशूटर के रूप में हरियाणा निवासी मंजीत सिंह 2 अन्य को रामनिवास के पास भेज दिया. रामनिवास अपने लक्ष्य को साधने में किसी तरह की खामी नहीं छोड़ना चाहता था. वह शूटर मंजीत अन्य को साथ ले कर अपने दोस्त अमनदीप के खेत में बनी ढाणी पर चला गया.

योजना को अंजाम देने के लिए 24 सितंबर का दिन चुना गया था. रामनिवास ने पार्षद चेयरपरसन के पति हरवीर सिंह की रैकी करने और एकएक पल की सूचना देने के लिए अपने दोस्तों अशोक रैगर और फोटोग्राफर रमेश सुथार के साथ अमनदीप को तैनात कर दिया था. रैकी की सूचना कोड वर्ड में दी जानी थी. हरवीर के घर के आगे सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. वहां वारदात को अंजाम देना खतरे से खाली नहीं था. करीब 11 बजे पार्षद हरवीर अपने बेटे हनुमंत राजू सैनी के साथ एसडीएम कोर्ट पहुंचे. रैकी करने वालों ने अविलंब यह सूचना शूटरों तक पहुंचा दी. एसडीएम कोर्ट पुलिस थाने से मात्र 300 मीटर की दूरी पर है.

लगातार 2-3 दिनों की छुट्टियां होने के कारण उस दिन भीड़ अपेक्षाकृत ज्यादा थी. एसडीएम डा. अवि गर्ग से मिलने के बाद हरवीर सहारण कोर्ट की तरफ चल दिए. वहीं पर उन की कार खड़ी थी. तभी अचानक एक सफेद रंग की कार गेट के सामने कर रुकी. कार से 3-4 लोग बड़ी फुरती से उतरे और कोर्ट परिसर में जा पहुंचेगोलियों से भून दिया पार्षद हरवीर को  2 लोगों ने सामने रहे हरवीर सहारण को अपने हाथों में थामे तमंचों के निशाने पर ले लिया. अगले ही पल दोनों हमलावरों ने हरवीर पर 2-2 फायर झोंक दिए.

अचानक गोलियों की आवाज से कोर्ट परिसर दहल उठा. कचहरी में सैकड़ों की संख्या में मौजूद लोग समझ नहीं सके कि गोलियां की आवाज कहां से रही है. अचानक हुए हमले से हरवीर भी सकते में गए थेजान बचाने के लिए वह फिर से एसडीएम के चैंबर की तरफ भागे पर एक शख्स ने टांग अड़ा कर उन्हें जमीन पर गिरा दिया. तभी एक अन्य शख्स उन के पास कर बोला, ‘‘तूने मेरे आदमी को थप्पड़ मारा था. आज मैं तेरा खेल ही खत्म कर देता हूं.’’

कहने के साथ ही उस ने हरवीर के सिर पर पिस्तौल की नाल सटा कर एक और फायर झोंक दिया. इस के बाद हमलावर फुरती से वहां से भाग कर गेट के सामने स्टार्ट खड़ी अपनी कार में सवार हो गए. कार तेज गति से वहां से चली गई. इन में से एक हमलावर, जिस ने हरवीर के सिर में गोली मारी थी, वह पहचान लिया गया था. वह और कोई नहीं बल्कि रामनिवास जाट था, जो रावतसर पुलिस थाने का हिस्ट्रीशीटर था. कोर्ट परिसर में दिनदहाड़े हुए इस हत्याकांड को ले कर सभी हतप्रभ थे. कोर्ट परिसर में सन्नाटा पसर गया था. वकीलों ने अपने चैंबर्स के शटर डाल दिए थे. गंभीर रूप से घायल हरवीर सिंह को जिला चिकित्सालय हनुमानगढ़ ले जाया गया

सूचना मिलने पर प्रदेश के सिंचाई मंत्री डा. रामप्रताप जो हनुमानगढ़ वासी हैं, अस्पताल पहुंच गए. डाक्टरों के अथक प्रयासों के बाद भी हरवीर सिंह को नहीं बचाया जा सका.  हरवीर के मारे जाने की घटना जंगल की आग की तरह कुछ ही देर में पूरे क्षेत्र में फैल गई. व्यापारी वर्ग इस घटना के विरोध में अपनी दुकानें बंद कर सड़क पर उतर आया. कुछ घंटों में देहात क्षेत्र के लोग भी रावतसर पहुंचने शुरू हो गए. आम लोगों के बढ़ते आक्रोश दबाव को देख कर प्रशासन के हाथपांव फूल गए. आपसी रंजिश या राजनैतिक प्रतिद्वंदिता को ले कर यह हत्याकांड हाईप्रोफाइल बन गया था. क्षेत्र की स्थिति कभी भी विस्फोटक हो सकती थी

इस घटना की सूचना राजस्थान के तेजतर्रार निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल तक पहुंच चुकी थी. हनुमान बेनीवाल तीसरे मोर्चे के संस्थापक मृतक हरवीर के राजनीतिक आका थे. सूचना मिलते ही वह भी रावतसर के लिए निकल पड़े. हरवीर की हत्या, हनुमान बेनीवाल का आगमन क्षेत्र के हालात की जानकारी बीकानेर संभाग के आईजी दिनेश एम.एन. तक भी पहुंच गई. आईजी जानते थे कि सत्र के दौरान सरकार को घेरने वाले विधायक बेनीवाल आक्रोशित आमजन को कहीं भी झोंकने का माद्दा रखते हैं

दूध का धुला नहीं था हरवीर सहारण पार्षद हरवीर का नाम आईजी दिनेश एम.एन. के जेहन में था, क्योंकि कुछ महीने पहले ही एसओजी के प्रमुख होने के नाते उन्होंने इसी हरवीर को रावतसर क्षेत्र में घटित एक हत्याकांड में प्रमुख आरोपी मानते हुए गिरफ्तार करवाया था. गिरफ्तारी के लगभग महीने भर बाद ही हरवीर को राजस्थान उच्च न्यायालय ने जमानत पर रिहा कर दिया था. बता दें कि आईजी दिनेश एम.एन. राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में न्यायिक अभिरक्षा में रहे थे. बाद में ऊपरी अदालत ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया था. उन का नाम प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर के ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ आईपीएस अफसरों की पहली पंक्ति में शुमार है

दिनेश एम.एन. को पहले भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो का प्रमुख, बाद में एसओजी प्रमुख और हाल ही में बीकानेर का आईजी बनाया था. हनुमान बेनीवाल के आगमन को देखते हुए आईजी खुद कनिष्ठ अधिकारियों के साथ रावतसर पहुंच गए. शहर में अतिरिक्त पुलिस फोर्स के साथ आरएसी (राजस्थान आर्म्ड कंपनी) के जवान भी तैनात कर दिए गए थेमाना जा रहा था कि मृतक का शव आते ही हालात बेकाबू हो सकते हैं. नियत समय तक मृतक का पोस्टमार्टम हो पाने के कारण शव हनुमानगढ़ के जिला अस्पताल में रखा रहा.

शाम घिरते ही हनुमान बेनीवाल रावतसर पहुंच गए. परिजनों को ढांढस बंधा कर विधायक बेनीवाल जिला मुख्यालय पहुंचे. वहां बेनीवाल ने पत्रकार वार्ता आयोजित कर मामले की सीबीआई जांच, हत्यारों की अविलंब गिरफ्तारी रावतसर के जिम्मेदार अधिकारियों का तुरंत ट्रांसफर किए जाने की मांग उठा दीं. बेनीवाल ने यह आरोप भी लगाया कि हरवीर की हत्या के पीछे असली चेहरे कुछ सफेदपोशों के हैं. वारदात के बाद पुलिस ने नाकाबंदी करवा दी थी पर हमलावर कच्चे रास्तों से किसी तरह हरियाणा में घुस गए थे. सभी आरोपी हरियाणा में तितरबितर हो गए थे. मुख्य आरोपी रामनिवास प्राइवेट गाड़ी से राजस्थान के झुंझुनू  जिले में घुस गया था.

25 सितंबर को थाने में आईजी के साथ पुलिस अधिकारियों की एक हाईलेवल मीटिंग चल रही थी. बैठक में एसपी अनिल कयाल, एएसपी नरेंद्र, सीआई अरविंद बरेड़, डीएसपी दिनेश राजौरा मौजूद थे. मामले का सुपरविजन आईजी खुद कर रहे थे. अब तक की जांच में पुलिस को यह पता चल चुका था कि इस मामले में हिस्ट्रीशीटर रामनिवास का हाथ है. अधिकारियों का मानना था कि मुख्य आरोपी की जल्द गिरफ्तारी होने पर इलाके में हालात बेकाबू हो सकते हैंरामनिवास का फोन बंद था, उस के फोन नंबरों के ट्रैसआउट नहीं होने की सूरत में उस की गिरफ्तारी मुश्किल थी. तेजतर्रार आईजी के निर्देश पर अधिकारियों ने रामनिवास की एक प्रेमिका तमन्ना (परिवर्तित नाम) को ढूंढ निकाला. एसआई अनीता लाखर तमन्ना को हिरासत में थाने ले आई थीं

पुलिस ने प्रेमिका पर साधा निशाना  थाने में आईजी ने तमन्ना से पूछताछ करनी शुरू कर दी, ‘‘देखो मैडम, कत्ल का मामला है. झूठ बोलना आप पर भारी पड़ सकता है. पुलिस को रामनिवास का वह नंबर चाहिए, जिस से आप उस से बात करती हैं.’’

आईजी ने कहा तो तमन्ना ने अगले ही पल अपने मोबाइल में सहेली के नाम से फीड किए गए नंबर बता दिए. तमन्ना से मिले मोबाइल नंबर जिला मुख्यालय में स्थित साइबर सेल ने सर्विलांस पर लगा दिए. स्वयं आईजी दिनेश एम.एन. वीडियो कौन्फ्रैंसिंग में जुड़ चुके थे. आईजी के निर्देश पर तमन्ना ने रामनिवास को फोन किया तो रामनिवास ने फोन उठा लिया

‘‘कोई गया है, 10 मिनट बाद फिर फोन करूंगी.’’ कह कर तमन्ना ने फोन डिसकनेक्ट कर दियाउसी समय साइबर सेल ने रामनिवास की लोकेशन पता कर ली. वह फतेहपुररतनगढ़ के नजदीक सांखू फांटा में था. यानी वह वहां के एक ढाबे में था. आईजी के निर्देश पर क्षेत्र के सभी थानों की पुलिस गाडि़यों में भर कर सांखू फांटा पहुंच गई. पुलिस ने उसे चारों तरफ से घेर लिया. अब तमन्ना के फोन से आईजी ने रामनिवास को काल कराई. फोन रिसीव होते ही आईजी बोले, ‘‘देखो रामनिवास, मैं आईजी बोल रहा हूं. तुम चारों ओर से पुलिस से घिर चुके हो. भागने या गोली चलाने की कोशिश की तो तुम्हें गोली मार दी जाएगी. मैं ने सभी अधिकारियों को शूटआउट का आदेश दे दिया है. भलाई इसी में है कि तुम सरेंडर कर दो और हाथ ऊपर उठाए ढाबे से बाहर जाओ.’’

अगले ही पल दोनों हाथ ऊपर उठाए रामनिवास ढाबे से बाहर गया. नोहर थाने के कांस्टेबल दुनीराम गोदारा ने रामनिवास की पुख्ता पहचान कर दी थी. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. रामनिवास की गिरफ्तारी की सूचना अविलंब फ्लैश कर दी गई. उस के गिरफ्तार होने पर जिला पुलिस प्रशासन ने राहत की सांस ली. 25 सितंबर की शाम पोस्टमार्टम के बाद हरवीर का शव रावतसर गया. हरवीर की शवयात्रा में रिकौर्ड भीड़ एकत्र हुई. पुलिस अमला रामनिवास जाट को ले कर रावतसर गया था. आईजी की मौजूदगी में रामनिवास ने पूछताछ में जो बताया, उसे सुन कर हर कोई हतप्रभ रह गया

रामनिवास के बताए अनुसार, हनुमानगढ़ के केंद्रीय सहकारी बैंक के चेयरमैन महेंद्र पूनिया ने हरवीर की हत्या की 20 लाख की सुपारी दी थी. इस में से 5 लाख रुपए रामनिवास को अग्रिम दे दिए गए थे. यह खुलासा होते ही पुलिस ने महेंद्र पूनिया की मौजूदगी को ट्रैस आउट कर के उसे सूरतगढ़ क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया. हरवीर की आपराधिक पृष्ठभूमि कौन थे हरवीर महेंद्र पूनिया और रामनिवास ने हरवीर को क्यों मौत की नींद सुला दिया था? जानने के लिए हमें अतीत में जाना पड़ेगा. राजस्थान पुलिस के रिटायर्ड एसआई रामजस सहारण शांति देवी सहारण (पूर्व अध्यक्षा कृषि उपज मंडी समिति, रावतसर) का इकलौता बेटा था हरवीर. एक बेटी एक बेटे का पिता हरवीर ज्यादा पढ़ालिखा तो नहीं था, पर राजनीति में उस का अच्छा दखल था.

इसी के चलते हरवीर अपनी मां को कृषि उपज मंडी समिति की अध्यक्ष बनाने में सफल रहा था. खुद भी वह नगर पालिका का पार्षद बन गया था. हरवीर भले ही पार्षद उस की पत्नी नीलम सहारण चेयरपरसन निर्वाचित हुए थे, पर उस का दामन भी कथित रूप से दागदार था. आरोप है कि सन 2001 में हरवीर ने एक युवक प्रेम कुमार की गरदन मरोड़ कर इसलिए कत्ल कर दिया था कि वह उस की मां को चुनाव में हरवाना चाहता था. प्रेम के शव को कहीं दूर जंगल में जला कर सबूत नष्ट कर दिए थे. इसी तरह रुपयों के लेनदेन के चक्कर में हरवीर ने लीलाधर सोनी नामक शख्स की कथित हत्या कर दी थी. लीलाधर का शव भी नहीं मिला था.

मृतकों के परिजनों ने पुलिस अदालत की मार्फत मुकदमे दर्ज करवाए थे, पर दोनों मामलों की जांच में पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी. इसी साल हरवीर के विरोधी इन मामलों को हाई लेवल की सिफारिश के दम पर एसओजी तक ले जाने में सफल हो गए थे. एसओजी के तत्कालीन प्रमुख दिनेश एम.एन. ने 13 मई, 2018 को हरवीर को गिरफ्तार करवा कर जेल भिजवा दिया था. 20-25 दिनों बाद हरवीर जमानत पर रिहा हुआ तो उस के समर्थक करीब 400 गाडि़यां ले कर बीकानेर जेल तक पहुंचे थे. हरवीर विधायक हनुमान बेनीवाल का चहेता था. वह इस चुनाव में नोहर विधानसभा क्षेत्र, जहां से भाजपा के युवा विधायक अभिषेक मटोरिया लगातार 2 बार जीतते रहे हैं, अपनी पत्नी को चुनाव लड़वाना चाहता था. इस 30 सितंबर को हरवीर नोहर में एक विशाल रैली करने वाले थे, पर 24 सितंबर को ही उन की हत्या कर दी गई.

एक अन्य घटनाक्रम भी काबिलेगौर है. सन 2015 में एक भाजपा नेता एक पूर्व विधायक ने मिल कर नगरपालिका चुनाव में नागरिक मोर्चा का गठन किया था. इस चुनाव में हरवीर उस की पत्नी नीलम पार्षद चुने गए थे. नागरिक मोर्चा ने 25 वार्डों में 13 वार्डों पर विजय हासिल की थी. महिला हेतु आरक्षित चेयरपरसन पद पर नीलम सहारण चुनी गई थीसन 2016 में नगर पालिका प्रशासन ने अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया था. कहा जाता है कि इस अभियान में हनुमानगढ़ केंद्रीय सहकारी बैंक के जिलाध्यक्ष महेंद्र पूनिया रामनिवास जाट को कथित अतिक्रमणकारी चिह्नित कर उन के प्लौट्स पर पालिका  प्रशासन नेनगर पालिका संपत्तिके बोर्ड लगा दिए थे.

इस अभियान से घबरा कर शहर के कथित अतिक्रमणकारियों नेरावतसर बचाओअभियान चला कर एक दिन रावतसर बंद का आह्वान किया था. इसी बंद के दौरान रावतसर धान मंडी में जबरदस्ती दुकानें बंद करवाने की बात सुन कर हरवीर भी धान मंडी पहुंच गए थे. महेंद्र पूनिया ने रची थी हरवीर की हत्या की साजिश कहा जाता है कि जबरन दुकानें बंद करवा रहे महेंद्र पूनिया को देख कर चेयरपरसन के पति हरवीर ताव खा गए थे और उन्होंने भरे बाजार में सहकारी बैंक के जिलाध्यक्ष को 2-3 चांटें रसीद कर दिए थे. इस प्रकरण में महेंद्र पूनिया ने पुलिस में हरवीर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई थी. उसी दिन महेंद्र पूनिया ने हरवीर को सबक सिखाने की ठान ली थी.

फर्श से अर्श पर पहुंचने वाले महेंद्र पूनिया का अतीत भी रोचक रहा है. नोहर क्षेत्र के गांव पदमपुरा का मूल निवासी है महेंद्र पूनिया. वह सन 1996-97 में रावतसर आया था. एक जानकार ठेकेदार के सहयोग से वह सार्वजनिक निर्माण विभाग के छिटपुट निर्माण कार्यों के ठेके लेने लगा था. इसी दौर में वह एक भाजपाई विधायक का खास बन गया था. आर्थिक हालत पटरी पर आई तो महेंद्र पूनिया ने हरियाणा में एंट्री मार दी. राजनैतिक पहुंच के बल पर महेंद्र पूनिया हरियाणा में करोड़ों में खेलने लगा तो फिर से रावतसर लौट आया. बड़े व्यवसाय में दखल के साथसाथ महेंद्र ने राजनीति में भाग लेना शुरू कर दिया था. विधायकजी की शह पर पूनिया सहकारी बैंक का जिलाध्यक्ष बन गया था.

मृतक के बेटे हनुमंत सहारण की तहरीर पर पुलिस ने रामनिवास, महेंद्र पूनिया 4-5 अन्य के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 अन्य धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. नामजद दोनों हत्यारोपी गिरफ्त में चुके थे. अदालत में पेश कर दोनों को 8 दिन के रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड अवधि में दोनों आरोपियों के खुलासे के बाद पुलिस ने रेकी करने वाले रमेश सुथार, अशोक रैगर, अमनदीप जाट, सहकारी बैंक के संचालक मंडल सदस्य रामचंद्र भील, जो महेंद्र पूनिया का खास है को भी गिरफ्तार कर लिया. आरोप है कि रामचंद्र भील षडयंत्र रचने का सूत्रधार था.

शूटर मंजीत सिंह की निगरानी के बाद पुलिस ने बीकानेर जेल में बंद अजीत यादव को भी गिरफ्तार कर लिया. मंजीत सिंह ने खुलासा किया कि हमले के दिन उस के और रामनिवास के अलावा 2 और शूटर जोगेंद्र सिंह उर्फ धोलिया निवासी महेंद्रगढ़ मोहित उर्फ जैलदार निवासी लुहारू कोर्ट में हथियारों सहित घुसे थे. हरवीर की हत्या किए जाने का विरोध होने पर चारों हमलावर कोर्ट में गोलियां बरसाने को तत्पर थे. दोनों शार्पशूटरों को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. व्यापक पूछताछ अपेक्षित बरामदगी के बाद पुलिस ने सभी 10 आरोपियों को अदालत में पेश किया. अदालत ने उन्हें जेल भिजवा दिया.

इस हाईप्रोफाइल हत्याकांड में यह अफवाह भी उड़ी कि सुपारी की एक नहीं बल्कि 2 डील हुई थीं. दूसरी सुपारी हरवीर को गोली मारने वाले रामनिवास की हत्या की सुपारी अन्य शार्पशूटरों को दी गई थी. अगर रामनिवास की हत्या हो जाती तो यह मामला ब्लाइंड मर्डर बन कर रह जाता और षडयंत्रकर्ता बेनकाब नहीं होते. कहा जाता है कि रामनिवास को शक हो गया था और फरारी के कुछ देर बाद ही वह चालाकी से शूटरों से अलग हो गया था. हालांकि जांच अधिकारी ने इस तथ्य का खंडन किया है. पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से मृतक हरवीर सहारण के परिवार को सशस्त्र गार्ड उपलब्ध करवा दिए थे.

अपेक्षाकृत अमनचैन शांत रहने वाले रावतसर क्षेत्र में रंजिशन हुआ यह हत्याकांड भविष्य में क्या गुल खिलाएगा, कहा नहीं जा सकता.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

    

Himachal Crime : 2 साल तक पानी की टंकी में पड़ा रहा बच्चे का शव

Himachal Crime : शिमला का बहुचर्चित युग गुप्ता हत्याकांड एक ऐसा केस था, जिस की सुनवाई पिछले डेढ़ साल से फास्ट ट्रैक कोर्ट में चल रही थी. इस केस के फैसले पर राज्य की ही नहीं, बल्कि पूरे देश की निगाहें टिकी थीं. आखिर…

शिमला के जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंदर सिंह की अदालत में अंदर और बाहर 6 अगस्त, 2018 को लोगों की भीड़ को देख ऐसा लग रहा था जैसे पूरा शिमला शहर ही कचहरी में उमड़ आया हो. अदालत परिसर के अंदर व बाहर सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए थे और अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किया गया था. दरअसल, उस दिन 4 वर्षीय युग गुप्ता के अपहरण और हत्या का फैसला सुनाया जाना था. युग का अपहरण 4 करोड़ रुपए की फिरौती के लिए किया गया था. लेकिन फिरौती की रकम न मिलने के कारण अपहर्त्ताओं ने मासूम की हत्या कर दी थी.

युग के परिजनों के अलावा पूरे राज्य को करीब पौने 2 साल से अदालत के इस फैसले का इंतजार था. यह शायद देश का एकमात्र ऐसा ऐतिहासिक फैसला था, जिसे सुनने के लिए राज्य के मुख्यमंत्री भी अदालत पहुंचे थे.अपहर्त्ता कौन थे और उन्होंने युग का अपहरण कर उसे कितनी दर्दनाक मौत दी, जानने के लिए पूरी कहानी समझनी होगी. अचानक युग हुआ गायब बात 14 जून, 2014 की है. राजधानी शिमला के रामबाजार से एक व्यापारी विनोद कुमार गुप्ता का 4 वर्षीय बेटा युग लापता हो गया था. विनोद गुप्ता शहर के जानेमाने व्यापारी थे. शहर में उन की किराने की थोक दुकानें और गारमेंट का बिजनैस था. स्थानीय सदर थाना पुलिस ने मामले की जांच शुरू की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. बाद में नगरवासियों का आक्रोश देखते हुए यह मामला सीबीसीआईडी को सौंप दिया गया था.

युग 14 जून को अचानक लापता हुआ था. इस के 13 दिन बाद 27 जून को युग का जन्मदिन था. उसी दिन विनोद गुप्ता के घर डाक से एक बड़ा पैकेट आया, जिस में युग के कपड़े थे. ये वही कपड़े थे, जो वह लापता होने वाले दिन पहने हुए था. पैकेट में एक पत्र भी था, जिस में युग को वापस लौटाने के बदले 3 करोड़ 60 लाख रुपए की मांग की गई थी. ये पैसे विनोद गुप्ता के नौकर हरिओम के माध्यम से अंबाला में देने को कहा गया था. इस पैकेट के मिलने से यह बात साफ हो गई थी कि किसी ने युग का अपहरण फिरौती के लिए किया है.

इस के एक हफ्ते बाद विनोद गुप्ता के नाम फिर एक पत्र आया, उस में 4 करोड़ रुपए की मांग की गई थी. उस के बाद फिर एक और पत्र आया, जिस में 10 करोड़ रुपए मांगे गए थे. लेकिन जब उन्होंने पैसे नहीं दिए तो घटना के 3 महीने बाद एक और पत्र आया, जिस में दोबारा 4 करोड़ की मांग की गई थी. यह आखिरी पत्र था. इस के बाद यह मामला जब सीबीसीआईडी को ट्रांसफर हो गया तो विनोद के पास पत्र आने बंद हो गए. सीबीसीआईडी की जांच भी लगभग 2 साल तक चलती रही, लेकिन ऐसा कोई सुराग हाथ नहीं लगा, जिस से वह अपहर्त्ताओं तक पहुंच पाती. पहले इस मामले की जांच सीबीसीआईडी के डीएसपी भूपिंदर बरागटा के नेतृत्व में गठित टीम द्वारा की जा रही थी.

लेकिन जब शहर में जनता का आक्रोश भड़का और मामले की गूंज विधानसभा से होते हुए संसद तक पहुंची तो सीबीसीआईडी के डीआईजी विनोद धवन ने इस मामले में हस्तक्षेप किया. डीआईजी विनोद धवन की निगरानी में युग मामले ने रफ्तार पकड़ी और यहीं से एकएक अनसुलझी कड़ी को जोड़ कर अपराध की तह तक पहुंचा जा सका. डीआईजी के हस्तक्षेप के बाद बढ़ी उम्मीदें एसपी (क्राइम) अशोक कुमार, डीएसपी भूपिंदर बरागटा, एसआई सुरेश कुमार, एएसआई राजेश कुमार, अनिल, हैडकांस्टेबल रवि, उमेश्वर सिंह, कांस्टेबल दीपक के अलावा एफएसएल के डायरेक्टर डा. अरुण शर्मा, डा. जगजीत सिंह, डा. संजीव कुमार और डा. बी. पटियाल ने क्राइम सीन विजिट में वैज्ञानिक तरीके से सबूतों को एकत्रित करना शुरू किया.

सीबीसीआईडी ने कई संदिग्ध लोगों के नारको टेस्ट भी करवाए, जिन में से एक विनोद गुप्ता का नौकर हरिओम भी था. चूंकि अपहर्त्ताओं ने जब पहली बार फिरौती की मांग की थी तो अंबाला में रकम पहुंचाने के लिए उन्होंने नौकर हरिओम को ही चुना था. इस का मतलब यह था कि अपहर्त्ता हरिओम को जानते थे. नारको टेस्ट के दौरान नौकर हरिओम बारबार चंद्र शर्मा का नाम ले रहा था. इस से जांच टीम को संदेह हो गया कि इस मामले से किसी चंद्र शर्मा का जरूर कोई वास्ता है. लेकिन चंद्र शर्मा कौन है, कहां रहता है, यह टीम को पता नहीं था.

जांच टीम ने इस के बाद चंद्र शर्मा की तलाश शुरू कर दी. इत्तफाक से उन्हीं दिनों अगस्त 2016 में न्यू शिमला में एक चोरी के मामले में चंद्र शर्मा का नाम आया. उस के साथ 2 और लोगों तेजिंदरपाल सिंह और विक्रांत बख्शी के भी नाम थे. जब तीनों आरोपियों का नाम सामने आया तो जांच टीम का शक यकीन में बदल गया. तीनों के मोबाइल खंगाले गए. इस बीच विक्रांत बख्शी के मोबाइल से युग की 60 सैकेंड की एक वीडियो क्लिप और फोटो बरामद हुई. इस से पुष्टि हो गई कि युग के अपहरण में इन लोगों का हाथ है. इस के बाद पुलिस ने 22 अगस्त को तेजिंदर और चंद्र शर्मा को हिरासत में ले लिया.

चंद्र शर्मा, तेजिंदरपाल सिंह व विक्रांत से बरामद मोबाइल फोन सीबीसीआईडी ने कोर्ट के माध्यम से अपने कब्जे में ले लिए. फोरैंसिक टीम ने सभी फोन नंबरों का डिलीट किया गया डाटा रिकवर कर लिया. इस से युग के अपहरण का एक बड़ा सबूत जांच टीम के हाथ आ गया. पता चला कि वे लोग बच्चे के वीडियो व औडियो दोनों बनाते थे, जो मोबाइल फोन में मिले. पकड़े जाने के डर से उन्होंने विनोद को वीडियो नहीं भेजे थे. दोषियों की निशानदेही पर टीम ने उस जगह भी छापा मारा, जहां युग को अपहरण के बाद रखा गया था. उस कमरे की तलाशी ली गई. सीबीसीआईडी की विशेष जांच के साथ फोरैंसिक टीम भी मौजूद रही.

वहां से ट्रेसिंग पेपर, अन्य पेपर, कोल्डड्रिंक व बैड के बौक्स में निशान पाए गए. इसी आधार पर दोषियों की गिरफ्तारी हुई. 20 अगस्त, 2016 को विक्रांत और 22 अगस्त को तेजिंदर और चंद्र शर्मा को पकड़ा गया. 2 साल तक लोग उस टैंक का पानी पीते रहे, जिस में युग की लाश पड़ी थी 4 वर्षीय युग गुप्ता हत्याकांड का सब से दर्दनाक पहलू अपराधियों द्वारा वारदात को अंजाम देने का रहा. रामबाजार स्थित घर से करीब 3 किलोमीटर दूर युग को शराब पिलाने के बाद पत्थरों से बांध दिया गया था, फिर उसे केलेस्टन क्षेत्र स्थित नगर निगम के पानी के टैंक में जिंदा फेंक दिया गया.

हत्यारों ने फिरौती न मिलने का गुस्सा मासूम युग पर निकाला था. टैंक में युग की किस तरह तड़पतड़प कर मौत हुई होगी, इस की कल्पना मात्र से ही दिल दहल जाता है. उस का शव टैंक में ही पड़ा सड़ता रहा था. इस वाटर टैंक से शिमला के कई हिस्सों केलेस्टन और भराड़ी को पेयजल सप्लाई किया जाता है. मतलब करीब 25 हजार लोगों ने 2 साल तक इस टैंक का पानी पीया था. उन्हें पता ही नहीं था कि टैंक में बच्चे का शव है. ऐसा सरकारी तंत्र की लापरवाही से हुआ. बाद में नगर निगम कर्मियों ने टैंक की सफाई की तो युग का कंकाल बरामद हुआ.

युग की हत्या ने सरकारी तंत्र के मुंह पर जोरदार तमाचा मारा था. कागजों में टैंकों की सफाई हर 6 महीने में होती थी, मगर बच्चे का शव बरामद नहीं हुआ. नगर निगम के कनिष्ठ अभियंता की मौजूदगी में टैंक की सफाई की जाती है, लेकिन नगर निगम अधिकारियों की हकीकत युग का कंकाल बरामद होने के बाद सामने आई. बहरहाल, सीबीसीआईडी ने केलेस्टन टैंक के अंदर और बाहर से युग के अवशेष बरामद कर इस केस को सुलझा दिया था.

22 अगस्त, 2016 को भराड़ी टैंक से युग का कंकाल निकाला गया था. इस के बाद अवशेषों को आईजीएमसी भेजा गया, जहां डाक्टरों ने इसे इंसानी बच्चे का कंकाल होने की पुष्टि की. इस के बाद युग के मातापिता के डीएनए से मिलान करा कर इस बात की तसदीक की गई कि बरामद कंकाल युग का ही है. इस केस की सुनवाई के दौरान अदालत में भी वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर यह साबित कर दिया गया कि टैंक से मिला कंकाल युग का ही था. युग के अवशेषों को बतौर सबूत मालखाने में जमा करवा दिया गया था. युग के परिजनों को अपने बेटे की अस्थियां अंतिम संस्कार के लिए अदालत के आदेश पर ही मिलनी थीं.

अपहर्त्ताओं ने युग का 7 दिनों तक उत्पीड़न किया था. उसे जहां रखा गया था, वहां ट्रेसिंग पेपर व दूसरे कागजात भी रखे गए थे. इस केस के मास्टरमाइंड और मुख्य आरोपी चंद्र शर्मा ने फोरैंसिक साइंस का कोर्स किया हुआ था. उसे पता था कि अगर ट्रेसिंग पेपर पर फिरौती का पत्र लिखेंगे तो हैंडराइटिंग मैच नहीं होगी. लेकिन फोरैंसिक एक्सपर्ट्स ने विनोद को फिरौती के लिए लिखे गए पत्रों से हैंडराइटिंग के नमूनों को मैच कराया तो वह चंद्र शर्मा की निकली. आखिर हत्यारे आ ही गए पकड़ में मासूम युग की गुमशुदगी के रहस्य को सुलझाने और आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए डीआईजी (सीबीसीआईडी) की टीम ने रातदिन एक किया था.

कई बार ऐसा भी हुआ, जब जांच अधिकारियों के हौसले पस्त हो गए. लेकिन टीम ने हिम्मत नहीं हारी. इस स्थिति में वह बारबार 4 साल के मासूम युग की फोटो देख कर प्रण लेते रहे कि इस के पीछे जो कोई भी हों और कहीं पर भी हों, उसे पकड़ कर ही दम लेंगे. आखिरकार टीम ने कत्ल के तीनों आरोपियों को पकड़ कर ही दम लिया था. इन सब के पीछे एडीजीपी बी.एन.एस. नेगी, डीआईजी सिक्योरिटी क्राइम रहे दलजीत ठाकुर का भी अहम रोल रहा, जिन्होंने टीम के हौसले को कम नहीं होने दिया और हरसंभव मदद दी थी.

25 अक्तूबर, 2016 को जांच टीम ने जिला एवं सत्र न्यायालय में आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट पेश कर दी. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सीबीसीआईडी ने चालान पेश करने के साथ ही अदालत में अरजी दाखिल करते हुए अनुरोध किया कि इस केस को फास्टट्रैक कोर्ट में सुना जाए, ताकि सुनवाई जल्द पूरी हो सके. करीब पौने 2 साल तक चले इस केस के ट्रायल में कुल 135 गवाह बनाए गए थे, जिन में से 105 गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे. 13 अगस्त और 21 अगस्त को सुनवाइयों के दौरान अदालत ने दोषियों के मातापिता को भी तलब किया था.

न्यायाधीश के समक्ष अपने बयान में घर वालों ने अपनी बीमारी का हवाला दिया और दोषियों की सजा कम करने की गुहार लगाई. इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले तीनों आरोपी संपन्न परिवारों से ताल्लुक रखते थे. 2 आरोपियों के घर वालों की शिमला के रामबाजार में किराने और गारमेंट्स की दुकानें हैं और वे युग के पिता विनोद गुप्ता के पड़ोसी थे. अदालत में जज वीरेंदर सिंह ने 4 वर्षीय मासूम के हत्यारों को खड़े हो कर सजा सुनाई. एकएक कर तीनों दोषियों की सजा का ऐलान करने में जज ने मात्र 10 मिनट का वक्त लिया. सजा पर फैसला सुनाने के बाद जज वीरेंदर सिंह ने कलम तोड़ कर पीछे की ओर फेंक दी और सीधे अपने चैंबर में चले गए.

तीनों दोषियों को जब अदालत के सामने पेश किया गया तो उस समय अदालत का माहौल बिलकुल शांत था. अदालत ने एकएक कर तीनों को फांसी की सजा सुनाने की प्रक्रिया शुरू की. सब से पहले चंद्र शर्मा को फांसी की सजा सुनाई गई. इस के बाद तेजिंदर पाल और फिर विक्रांत बख्शी की सजा का ऐलान किया गया. सजा सुन कर तीनों के चेहरे पीले पड़ गए. उन के चेहरों पर खौफ झलक रहा था. अदालत में मौजूद सभी की नजरें उस समय जज और हत्यारों पर टिकी थीं. हत्याकांड में दोषियों की सजा पर 6 अगस्त, 2018 को सुनवाई हुई. जिला एवं सत्र न्यायालय में युग हत्याकांड के दोषियों की सजा पर एक घंटे तक बहस हुई. कोर्टरूम के बंद दरवाजे के भीतर बहस प्रक्रिया पूरी हुई. सजा पर हुई बहस की वीडियो रिकौर्डिंग भी की गई थी.

सुनवाई में तीनों आरोपियों को दोषी करार देने के बाद अदालत ने 800 पन्नों का अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. बहस के दौरान तीनों दोषियों के अलावा युग के पिता विनोद गुप्ता भी वहां मौजूद रहे. अदालत ने फांसी की सजा दे कर किया न्याय न्यायाधीश वीरेंदर सिंह की अदालत ने इस अपराध को रेयरेस्ट औफ रेयर श्रेणी का करार दिया था. युग हत्याकांड में अदालत ने आईपीसी की धारा 302, 120बी हत्या और हत्या का षडयंत्र रचने, 364ए में फिरौती की मांग करने का दोषी करार देते हुए तीनों दोषियों को मौत की सजा सुनाई.

वहीं धारा 347 में बंधक बनाने का दोषी पाए जाने पर एक साल की सजा और 20 हजार रुपए जुरमाने की अलग सजा सुनाई गई. जुरमाना अदा न करने की सूरत में 3 माह की अतिरिक्त सजा सुनाई गई थी. अदालत ने तीनों को धारा 201 और 120बी के तहत सबूत नष्ट करने और षडयंत्र रचने का दोषी होने पर 7 साल के कठोर कारावास, 50 हजार रुपए के जुरमाने की सजा सुनाई और कहा कि जुरमाना अदा न करने पर 6 माह के अतिरिक्त कारावास की सजा होगी. अदालत ने इन दोषियों को आईपीसी की धारा 506 और 120बी के तहत धमकियां देने और षडयंत्र रचने पर एक साल के कठोर कारावास और 10 हजार रुपए के जुरमाने की सजा सुनाई. इस में जुरमाना अदा न करने की सूरत में एक महीने की अतिरिक्त जेल का प्रावधान था.

फैसला आने पर 4 साल से न्याय का इंतजार कर रहे युग की मां पिंकी, पिता विनोद कुमार और दादी चंद्रलेखा की आंखों से आंसू छलक पड़े. कोर्ट ने मौत की सजा के आदेशों को कन्फरमेशन के लिए उच्च न्यायालय भेज दिया. वहीं दोषियों को हाइकोर्ट में फैसले को ले कर अपील करने के लिए 30 दिन का समय दिया था. भीड़ कम होने तक सुरक्षा कारणों और फैसले की प्रति देने के लिए दोषियों को कुछ देर के लिए कोर्ट में रोका गया. इस के बाद पुलिस की कड़ी सुरक्षा के बीच तीनों को अदालत परिसर से शाम को फिर से कंडा जेल ले जाया गया. अदालत का यह फैसला लगभग पौने 2 साल बाद आया था.

4 साल के युग के लिए मांबाप ने सैकड़ों सपने देखे थे. एक दिन आंगन में खेलते हुए युग लापता हो गया था. किसी ने नहीं सोचा था कि वह कभी लौट कर नहीं आएगा. जिस दिन युग लापता हुआ, उस की मां उसी दिन से बेसुध सी हो गई थी. जिस दिन मां ने सुना कि युग इस दुनिया में नहीं है तो वह गुमसुम रहने लगी.  युग की मां भी अपने बच्चे की एक झलक देखना चाहती थी. लेकिन दरिंदों ने उसे बेरहमी से मार दिया था. मां की आंखें सिर्फ आंसुओं से भरी रहती थीं. घर में युग की एक छोटी सी फोटो को मां हमेशा सीने से लगाए रखती थी. वह हर रोज यही प्रार्थना करती थी कि उस के बेटे को मुक्ति देनी है तो हत्यारों को फांसी की सजा होनी चाहिए.

जब भी कोर्ट में पेशी होती तो पूरे परिवार को उम्मीद होती कि हत्यारों को फांसी होगी. जब कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई तो बेटे की हत्या करने वाले तीनों दरिंदे अदालत में उन के सामने थे. मां की आंखों से एकदम आंसू निकल आए. उन्होंने कहा कि दोषियों को मृत्युदंड सुना कर युग के साथ इंसाफ हुआ है लेकिन वह दोषियों को कभी माफ नहीं करेंगी.

 

UP Crime : मांबेटी को जलाया जिंदा

UP Crime : उत्तर प्रदेश के कानपुर (देहात) जनपद के रूरा थाने से 5 किलोमीटर दूर मैथा ब्लौक के अंतर्गत एक बड़ी आबादी वाला गांव है मड़ौली. अकबरपुर और रूरा 2 बड़े कस्बों के बीच लिंक रोड से जुड़े ब्राह्मण बाहुल्य इसी गांव में कृष्ण गोपाल दीक्षित सपरिवार रहते थे. उन के परिवार में पत्नी प्रमिला के अलावा 2 बेटे शिवम, अंश तथा एक बेटी नेहा थी. कृष्ण गोपाल दीक्षित के पास मात्र 2 बीघा जमीन थी. इसी जमीन पर खेती कर और बकरी पालन से वह अपना परिवार चलाते थे. बेटे जवान हुए तो वह भी पिता के काम में सहयोग करने लगे.

कृष्ण गोपाल के घर के ठीक सामने अशोक दीक्षित का मकान था. अशोक दीक्षित के परिवार में पत्नी सुधा के अलावा 3 बेटे गौरव, अखिल व अभिषेक थे. अशोक दीक्षित दबंग व संपन्न व्यक्ति थे. उन के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. इस के अलावा उन के 2 बेटे गौरव व अभिषेक फौज में थे. संपन्नता के कारण ही गांव में उन की तूती बोलती थी. उन के बड़े बेटे गौरव का विवाह रुचि दीक्षित के साथ हो चुका था. रुचि खूबसूरत थी. वह अपनी सास सुधा के सहयोग से घर संभालती थी.

घर आमनेसामने होने के कारण अशोक व कृष्ण गोपाल के बीच बहुत नजदीकी थी. दोनों परिवारों का एकदूसरे के घर आनाजाना था. अशोक की पत्नी सुधा व कृष्ण गोपाल की पत्नी प्रमिला की खूब पटती थी, लेकिन दोनों के बीच अमीरीगरीबी का बढ़ा फर्क था. कृष्ण गोपाल व उस के परिवार के मन में सदैव गरीबी की टीस सताती रहती थी.

मड़ौली गांव से लगभग एक किलोमीटर दूर सडक़ किनारे ग्राम समाज की भूमि पर कृष्ण गोपाल दीक्षित का पुश्तैनी कब्जा था. सालों पहले इस वीरान पड़ी भूमि पर कृष्ण गोपाल के पिता चंद्रिका प्रसाद दीक्षित व बाबा ने पेड़ लगा कर कब्जा किया था. बाद में पेड़ों ने बगीचे का रूप ले लिया. इसी बगीचे में कृष्ण गोपाल ने एक कमरा बना लिया था और सामने झोपड़ी डाल ली थी. इसी में वह रहते थे और पशुपालन करते थे.

भू अभिलेखों में ग्राम समाज की यह जमीन गाटा संख्या 1642 में 3 बीघा दर्ज है, जिस में से एक बीघा भूमि पर कृष्ण गोपाल का कब्जा था. लेकिन जो 2 बीघा जमीन थी, उस पर कृष्ण गोपाल किसी को भी कब्जा नहीं करने देता था. उस पर भी वह अपना अधिकार जमाता था. कृष्ण गोपाल ही नहीं, गांव के दरजनों लोग ग्राम समाज की जमीन पर काबिज हैं. किसी ने खूंटा गाड़ कर कब्जा किया तो किसी ने कूड़ाकरकट डाल कर. किसी ने कच्चापक्का निर्माण करा कर कब्जा किया तो किसी ने सडक़ किनारे दुकान बना ली. इस काबिज ग्राम समाज की भूमि पर किसी ने अंगुली नहीं उठाई और आज भी काबिज हैं.

सिपाही लाल ने शुरू किया विवाद…

लेकिन कृष्ण गोपाल की काबिज भूमि पर आंच तब आई, जब गांव के ही सिपाही लाल दीक्षित ने गाटा संख्या 1642 की 2 बीघा में से एक बीघा जमीन अपनी बेटी रानी के नाम तत्कालीन ग्रामप्रधान के साथ मिलीभगत कर पट्टा करा दी. रानी का विवाह रावतपुर (कानपुर) (UP Crime) निवासी रामनरेश के साथ हुआ था. लेकिन उस की अपने पति से नहीं पटी तो वह मायके आ कर रहने लगी थी. उस का पति से तलाक हुआ या नहीं, यह तो पता नहीं चला, पर उस का पति से लगाव खत्म हो गया था.

यह बात सन 2005 की है. सिपाही लाल ने बेटी के नाम पट्ïटा तो करा दिया, लेकिन वह कृष्ण गोपाल के विरोध के कारण उस पर कब्जा नहीं कर पाया. बस यही बात कृष्ण गोपाल के पड़ोसी अशोक दीक्षित को चुभने लगी. दरअसल, रानी रिश्ते में अशोक की बहन थी. वह चाहते थे कि रानी पट्टे वाली जमीन पर काबिज हो. इस मामले को ले कर अशोक दीक्षित ने परिवार के अनिल दीक्षित, निर्मल दीक्षित, गेंदनलाल व बढ़े बउआ को भी अपने पक्ष में कर लिया. अब ये लोग कृष्ण गोपाल के विपक्षी बन गए और मन ही मन रंजिश मानने लगे.

अशोक दीक्षित का बेटा गौरव दीक्षित फौज में था. उसे भी इस बात का मलाल था कि उस के पिता रानी बुआ को पट्टे वाली जमीन पर काबिज नहीं करा पाए. वह जब भी छुट्टी पर गांव आता, वह कृष्ण गोपाल के परिवार को नीचा दिखाने की कोशिश करता. एक बार उस ने शिवम की बहन नेहा के फैशन को ले कर भद्दी टिप्पणी कर दी. इस पर नेहा और उस की मां प्रमिला ने उसे तीखा जवाब दिया, जिस से वह तिलमिला उठा.

कृष्ण गोपाल दीक्षित के दोनों बेटे शिवम व अंशु भी दबंगई में कम न थे. दोनों विश्व हिंदू परिषद के सक्रिय सदस्य थे. विहिप के धरनाप्रदर्शन में दोनों भाग लेते रहते थे. दोनों भाई आर्थिक रूप से भले ही कमजोर थे, लेकिन खतरों के खिलाड़ी थे. अब तक शिवम की शादी शालिनी के साथ हो गई थी. वह पुश्तैनी मकान में रहता था. दिसंबर, 2022 में गौरव छुट्टी पर आया तो एक रोज सडक़ किनारे एक दुकान पर किसी बात को ले कर उस की अंशु से तकरार होने लगी. तकरार बढ़ती गई और दोनों एकदूसरे को देख लेने की धमकी देने लगे.

इस घटना के बाद गौरव ने फैसला कर लिया कि वह कृष्ण गोपाल व उस के बेटों को सबक जरूर सिखाएगा और उन की अवैध कब्जे वाली ग्राम समाज की भूमि को मुक्त करा कर ही दम लेगा. इस के बाद गौरव ने अपने पिता अशोक दीक्षित व परिवार के अन्य लोगों के साथ कान से कान जोड़ कर सलाह की और पूरी योजना बनाई. योजना के तहत गौरव ने लेखपाल अशोक सिंह चौहान से मुलाकात की. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे से प्रभावित हुए. कारण, अशोक सिंह चौहान भी पहले फौज में था. रिटायर होने के बाद उसे लेखपाल की नौकरी मिल गई थी.

चूंकि दोनों फौजी थे, अत: जल्द ही उन की दोस्ती हो गई. इस के बाद गौरव ने लेखपाल को पैसों का लालच दे कर उसे अपनी मुट्ठी में कर लिया. योजना के तहत ही गौरव ने अपने पिता अशोक दीक्षित के मार्फत परिवार के एक व्यक्ति गेंदनलाल दीक्षित को उकसाया और उसे शिकायत करने को राजी कर लिया. गेंदन लाल ने तब दिसंबर के अंतिम सप्ताह में एक प्रार्थनापत्र कानपुर (देहात) की डीएम नेहा जैन को दिया. इस प्रार्थना पत्र में उस ने लिखा कि मड़ौली गांव के निवासी कृष्ण गोपाल दीक्षित व उस के बेटों ने ग्राम समाज की भूमि पर अवैध कब्जा कर कमरा बना लिया है व झोपड़ी भी डाल ली है. इस जमीन को खाली कराया जाए.

गेंदन लाल को बनाया मोहरा…

गेंदन लाल के इस शिकायती पत्र पर डीएम नेहा जैन ने काररवाई करने का आदेश एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद को दिया. ज्ञानेश्वर प्रसाद ने इस संबंध में जानकारी लेखपाल अशोक सिंह चौहान से जुटाई तो पता चला कि कृष्ण गोपाल जिस जमीन पर काबिज है, वह जमीन ग्राम समाज की है.

लेखपाल अशोक सिंह चौहान घूसखोर था. वह कोई भी काम बिना घूस के नहीं करता था. उस की निगाह अवैध कब्जेदारों पर ही रहती थी. जो उसे पैसा देता, उस का कब्जा बरकरार रहता, जो नहीं देता उन को धमकाता. मड़ौली के ग्राम प्रधान मानसिंह की भी उस से कहासुनी हो चुकी थी. उन्होंने उस की शिकायत भी डीएम साहिबा से की थी. लेकिन उस का बाल बांका नहीं हुआ. उस ने अधिकारियों को गुमराह कर अपना उल्लू सीधा कर लिया था. मैथा ब्लाक में एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद भी उस के जायजनाजायज काम में लिप्त रहते थे.

13 जनवरी, 2023 को बिना किसी नोटिस के एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद की अगुवाई में राजस्व विभाग की एक टीम कृष्ण गोपाल के यहां पहुंची और ग्राम समाज की भूमि पर बना उस का कमरा ढहा दिया. कमरा ढहाए जाने के पहले कृष्ण गोपाल ने एसडीएम (मैथा) के पैरों पर गिर कर ध्वस्तीकरण रोकने की गुहार लगाई, लेकिन वह नहीं पसीजे. लेखपाल अशोक सिंह चौहान तो उन्हें बेइज्जत ही करता रहा. एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद ने कृष्ण गोपाल से कहा कि 5 दिन के अंदर वह अपनी झोपड़ी भी हटा ले, वरना इसे भी ढहा दिया जाएगा. काररवाई के दौरान एक मैमो भी बनाया गया, जिस में गवाह के तौर पर 15 ग्रामीणों के हस्ताक्षर कराए गए.

14 जनवरी, 2023 को पीडि़त कृष्ण गोपाल दीक्षित व उन के घर के अन्य लोग लोडर से बकरियां ले कर माती मुख्यालय धरना देने पहुंच गए. समर्थन में विहिप नेता आदित्य शुक्ला व गौरव शुक्ला भी पहुंच गए. पीडि़त परिजनों ने आवास की मांग की तो अफसरों ने उन्हें माफिया बताया. माफिया बताने पर विहिप नेताओं का पारा चढ़ गया. उन्होंने सर्दी में गरीब का घर ढहाने व प्रशासन की संवेदनहीनता पर नाराजगी जताई. उन की एडीएम (प्रशासन) केशव गुप्ता से झड़प भी हुई.

दूसरे दिन पीडि़तों की आवाज दबाने के लिए तहसीलदार रणविजय सिंह ने अकबरपुर कोतवाली में शांति भंग की धारा में कृष्ण गोपाल दीक्षित, उन की पत्नी प्रमिला, बेटों शिवम व अंशु, बेटी नेहा व बहू शालिनी तथा सहयोग करने वाले विहिप नेता आदित्य व गौरव शुक्ला के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया.

14 जनवरी, 2023 को ही लेखपाल अशोक सिंह चौहान ने थाना रूरा में कृष्ण गोपाल व उन के दोनों बेटों के खिलाफ एक मुकदमा दर्ज कराया, जिस में उस ने लिखा, ‘13 जनवरी को प्रशासन अवैध कब्जा हटाने गया था. उस वक्त कृष्ण गोपाल व उन के बेटे शिवम व अंशु प्रशासन से गालीगलौज करते हुए मारपीट पर उतारू हो गए थे. जोरजोर से झगड़ा करने लगे थे. गांव के लोगों को सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने के लिए उकसाने लगे थे. वह कहने लगे कि यहां से भाग जाओ वरना बिकरू वाला कांड अपनाएंगे.’

लेखपाल की तहरीर के आधार पर रूरा पुलिस ने रिपोर्ट तो दर्ज कर ली थी, लेकिन किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया. दूसरी तरफ इस मामले के खिलाफ पीडि़त कृष्ण गोपाल ने तहसील अकबरपुर में वाद दायर किया, जिस की सुनवाई की तारीख 20 फरवरी निर्धारित की गई.

बदले की भावना से चलाया बुलडोजर…

मड़ौली गांव में दरजनों लोग ग्रामसमाज की भूमि पर काबिज थे, उन की भूमि पर प्रशासन का बुलडोजर नहीं चला, लेकिन बदले की भावना से तथा मुट्ïठी गर्म होने पर कृष्ण गोपाल को निशाना बनाया गया. पर कृष्ण गोपाल भी जिद्ïदी था. उस ने कमरा ढहाए जाने के बाद उसी जगह पर ईंटों का पिलर खड़ा कर उस पर घासफूस की झोपड़ी बना ली थी. यही नहीं, उस ने हैंडपंप को ठीक करा लिया था और शिव चबूतरे को भी नया लुक दे दिया था.

कृष्ण गोपाल दीक्षित को 5 दिन में जगह को कब्जामुक्त करने का अल्टीमेटम प्रशासनिक अधिकारियों ने दिया था, लेकिन 2 सप्ताह बीत जाने के बावजूद भी उस ने जगह खाली नहीं की थी. दरअसल, कृष्ण गोपाल ने तहसील में वाद दाखिल किया था और सुनवाई 20 फरवरी को होनी थी. इसलिए वह निश्चिंत था और जगह खाली नहीं की थी. लेखपाल अशोक सिंह चौहान व अन्य प्रशासनिक अधिकारी जमीन कब्जा मुक्त न होने से खफा थे. लेखपाल उन के कान भी भर रहा था और उन्हें गुमराह भी कर रहा था. अत: प्रशासनिक अधिकारियों ने कृष्ण गोपाल की झोपड़ी भी ढहाने का मन बना लिया.

13 फरवरी, 2023 की शाम 3 बजे एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद, कानूनगो नंदकिशोर, लेखपाल अशोक सिंह चौहान और एसएचओ दिनेश कुमार गौतम बुलडोजर ले कर मड़ौली गांव पहुंचे. साथ में 15 महिला, पुरुष पुलिसकर्मी भी थे. लोडर चालक दीपक चौहान था. अचानक इतने अधिकारियों और पुलिस को देख कर झोपड़ी में आराम कर रहे कृष्ण गोपाल और उन की पत्नी प्रमिला बाहर निकले. प्रशासनिक अधिकारियों ने जमीन पर अवैध कब्जा बताते हुए उन से तुरंत जगह खाली करने को कहा.

इस पर प्रमिला, उन के बेटे शिवम व बेटी नेहा ने कहा कि कोर्ट में उन का वाद दाखिल है और सुनवाई 20 फरवरी को है. लेकिन पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी नहीं माने. उन्होंने जगह को तुरंत खाली करने की चेतवनी दी. इस के बाद शिवम अपने पिता के साथ झोपड़ी का सामान निकाल कर बाहर रखने लगा. इसी समय एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद ने बुलडोजर चालक दीपक चौहान को संकेत दिया कि वह काररवाई शुरू करे. बुलडोजर शिव चबूतरा ढहाने आगे बढ़ा तो एसएचओ (रूरा) दिनेश गौतम ने उसे रोक दिया. वह चबूतरे पर चढ़े. उन्होंने शिवलिंग व नंदी को प्रणाम कर माफी मांगी फिर चबूतरे से उतर आए. उन के उतरते ही बुलडोजर ने चबूतरा ढहा दिया और मार्का हैंडपंप को उखाड़ फेंका.

जीवित भस्म हो गईं मांबेटी…

अब तक प्रमिला के सब्र का बांध टूट चुका था. उन्हें लगा कि अधिकारी उन की झोपड़ी नेस्तनाबूद कर देंगे. वह पुलिस व लेखपाल से भिड़ गईं. उस ने लेखपाल अशोक सिंह चौहान के माथे पर हंसिया से प्रहार कर दिया. फिर वह बेटी नेहा के साथ चीखती हुई बोली, ‘‘मर जाऊंगी, लेकिन कब्जा नहीं हटने दूंगी.’’

इस के बाद वह नेहा के साथ झोपड़ी के अंदर चली गई और दरवाजा बंद कर लिया. महिला पुलिसकर्मियों ने दरवाजा खुलवाने का प्रयास किया, लेकिन दरवाजा नहीं खुला. इधर प्रशासनिक अधिकारियों को लगा कि मांबेटी ध्वस्तीकरण रोकने के लिए नाटक कर रही हैं. उन्होंने झोपड़ी गिराने का आदेश दे दिया. बुलडोजर ने छप्पर ढहाया तो झोपड़ी में आग लग गई. हवा तेज थी. देखते ही देखते आग ने विकराल रूप धारण कर लिया.

आग की लपटों के बीच मांबेटी धूधू कर जलने लगी. कृष्ण गोपाल चिल्लाता रहा कि पत्नी और बेटी झोपड़ी के अंदर है. परंतु अफसरों ने नहीं सुनी और जलता छप्पर जेसीबी से और दबवा दिया. इस से उन का निकल पाना तो दूर, दोनों को हिलने तक का मौका नहीं मिला और दोनों जल कर भस्म हो गईं.

कृष्ण गोपाल व उन का बेटा शिवम मां व बहन को बचाने किसी तरह झोपड़ी में घुस तो गए. लेकिन वे उन दोनों तक नहीं पहुंच पाए. आग की लपटों ने उन दोनों को भी झुलसा दिया था. शिवम बाहर खड़ा चीखता रहा, ‘‘हाय दइया, कोउ हमरी मम्मी बहना को बचा लेऊ.’’ पर उस की चीख अफसरों ने नहीं सुनी. वे आंखें मूंदे खतरनाक मंजर देखते रहे.

इधर मड़ौली गांव के लोगों ने कृष्ण गोपाल के बगीचे में आग की लपटें देखीं तो वे उस ओर दौड़ पड़े. वहां का भयावह दृश्य देख कर ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा और वे पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों पर पथराव करने लगे. ग्रामीणों का गुस्सा देख कर पुलिस व अफसर किसी तरह जान बचा कर वहां से भागे. ग्रामीणों का सब से ज्यादा गुस्सा लेखपाल पर था. उन्होंने उस की कार पलट दी और तोड़ डाली. वे कार को फूंकने जा रहे थे, लेकिन कुछ समझदार ग्रामीणों ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया.

सूर्यास्त होने से पहले ही मांबेटी के जिंदा जलने की खबर जंगल की आग की तरह मड़ौली व आसपास के गांवों में फैल गई. कुछ ही देर बाद सैकड़ों की संख्या में लोग घटनास्थल पर आ पहुंचे. लोगों में भारी गुस्सा था और वह शासनप्रशासन मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे थे. शिव चबूतरा तोड़े जाने से लोगों में कुछ ज्यादा ही रोष था. इस बर्बर घटना की जानकारी पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को हुई तो चंद घंटों बाद ही एसपी (देहात) बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति, एएसपी घनश्याम चौरसिया, एडीजी आलोक सिंह, आईजी प्रशांत कुमार, कमिश्नर डा. राजशेखर तथा डीएम (कानपुर देहात) नेहा जैन आ गईं और उन्होंने घटनास्थल पर डेरा जमा लिया.

कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस अधिकारियों ने भारी संख्या में पुलिस व पीएसी बल बुलवा लिया. कमिश्नर डा. राजशेखर, एडीजी आलोक सिंह तथा आईजी प्रशांत कुमार ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा कृष्ण गोपाल व उन के बेटों को धैर्य बंधाया. निरीक्षण के बाद अधिकारियों ने मृतक मांबेटी के घर वालों से पूछताछ की. मृतका प्रमिला के पति कृष्ण गोपाल ने अफसरों को बताया कि एसडीएम (मैथा), कानूनगो व लेखपाल बुलडोजर ले कर आए थे. उन के साथ गांव के अशोक दीक्षित, अनिल, निर्मल व बड़े बउआ और गांव के कई अन्य लोग भी थे. ये लोग अधिकारियों से बोले कि आग लगा दो तो अफसरों ने आग लगा दी. हम और हमारा बेटा उन दोनों को बचाने में झुलस गए. लेकिन उन्हें बचा नहीं पाए और वे आग में जल कर खाक हो गईं. कृष्ण गोपाल के बेटे शिवम दीक्षित ने भी इसी तरह का बयान दिया.

दोषियों को बचाने में जुटा प्रशासन…

अधिकारियों ने कुछ ग्रामीणों से भी पूछताछ की. राजीव द्विवेदी नाम के व्यक्ति ने बताया कि अशोक दीक्षित का बेटा गौरव दीक्षित फौज में है. वह दबंग है. उसी ने पूरी साजिश रची. उस के साथ गांव के कुछ लोग हैं. इस में एसडीएम, एसएचओ और लेखपाल भी मिले हैं. डीएम साहिबा अपने कर्मचारियों को बचा रही हैं. ग्रामीणों ने बताया कि इस पूरे मामले में प्रशासन दोषी है. अफसरों ने पैसा लिया है. वह जबरदस्ती कब्जा हटाने पर अड़े हुए थे. उन्होंने कहा मृतका प्रमिला की बेटी नेहा की शादी तय हो गई थी. उस की अब डोली की जगह अर्थी उठेगी. प्रमिला भी समझदार महिला थी. उस ने कभी किसी का अहित नहीं सोचा.

ग्रामीण व मृतका के परिजन जहां अफसरों को दोषी ठहरा रहे थे, वहीं प्रशासनिक अफसर उन का बचाव कर रहे थे. जिलाधिकारी नेहा जैन ने इस मामले पर सफाई देते हुए कहा कि अतिक्रमण हटाने के लिए राजस्व टीम पुलिस के साथ मौके पर पहुंची थी. महिलाएं आईं और रोकने का प्रयास किया. लेखपाल पर हंसिया से अटैक भी किया. इस के बाद मांबेटी ने झोपड़ी के अंदर जा कर आग लगा ली.

कानपुर (देहात) के एसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति ने कहा, ‘‘एसडीएम व अन्य कर्मचारी अवैध कब्जा हटाने गए थे. इस दौरान कुछ लोग विरोध कर रहे थे. महिला व उन की बेटी भी विरोध में शामिल थी. विरोध करतेकरते उन दोनों ने खुद को झोपड़ी के अंदर बंद कर लिया. थोड़ी देर बाद झोपड़ी के अंदर आग लग गई. इस में महिला व उन की बेटी की मौत हो गई. आग लगी या लगाई गई, इस की जांच होगी.’’

पूछताछ के बाद रूरा पुलिस थाने में मृतका प्रमिला के बेटे शिवम दीक्षित की तहरीर के आधार पर मुअसं 38/2023 पर भादंवि की धारा 302/307/429/436/323 व 34 के तहत 11 नामजद, 15 पुलिसकर्मियों व 13 अन्य के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई. नामजद आरोपियों में एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद, लेखपाल अशोक कुमार सिंह चौहान, रूरा प्रभारी निरीक्षक दिनेश गौतम, कानूनगो नंद किशोर, जेसीबी चालक दीपक चौहान, मड़ौली गांव के अशोक दीक्षित, अनिल दीक्षित, निर्मल दीक्षित, गेंदन लाल, गौरव दीक्षित व बढ़े बउआ के नाम थे. मामले की जांच थाना अकबरपुर के इंसपेक्टर प्रमोद कुमार शुक्ला को सौंपी गई.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद शासन ने एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद को सस्पेंड कर दिया तथा 2 आरोपियों जेसीबी चालक दीपक चौहान व लेखपाल अशोक सिंह चौहान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. सस्पेंड एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद व थाना रूरा के एसएचओ दिनेश गौतम भूमिगत हो गए. अन्य आरोपियों की धरपकड़ के लिए 5 पुलिस टीमें लगा दी गईं.  इधर जल कर खाक हुई मांबेटी का मामला प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक पहुंचा तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भावुक हो उठे. उन्होंने पीडि़त परिवार को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया तथा अपनी टीम को लगा दिया. यही नहीं, उन्होंने पूरे घटनाक्रम की जानकारी अफसरों से ली और सख्त काररवाई का आदेश दिया.

इसी कड़ी में भाजपा की क्षेत्रीय विधायक व राज्यमंत्री प्रतिभा शुक्ला देर रात घटनास्थल मड़ौली गांव पहुंचीं. उन्होंने पीडि़त परिवार को धैर्य बंधाया फिर कहा, ‘‘मैं इस क्षेत्र की विधायक हूं और यहां ऐसी बर्बर घटना घट गई. महिलाओं के साथ अत्याचार हुआ. ऐसे में मेरा कल्याण विभाग में होना बेकार है. जब हम अपनी बेटी और मां को नहीं बचा पा रहे. पहले घर के बाहर निकालते फिर गिराते. जमीन तो यूं ही पड़ी है. आगे भी पड़ी रहेगी. कोई कहीं नहीं ले जा रहा है.’’

गांव वालों का फूटा आक्रोश…

पुलिस अधिकारी मांबेटी के शवों को रात में ही पोस्टमार्टम हाउस भेजने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन पीडि़त घर वालों व गांव वालों ने शव नहीं उठाने दिए. उन्होंने एक मांग पत्र कमिश्नर डा. राजशेखर को सौंपा और कहा कि जब तक उन की मांगें पूरी नहीं होती वह शव नहीं उठने देंगे. उन्होंने मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री को भी घटनास्थल पर आने की शर्त रखी. पीडि़त परिजनों ने जो मांग पत्र कमिश्नर को सौंपा था, उन में 5 मांगें थी.

1- मृतक परिवार को 5 करोड़ रुपए का मुआवजा,

2-मृतका के दोनों बेटों को सरकारी नौकरी,

3-मृतका के दोनों बेटों को आवास,

4- परिवार को आजीवन पेंशन तथा

5- दोषियों को कठोर सजा.

चूंकि पीडि़त परिवार की मांगें तत्काल मान लेना संभव न था, अत: अधिकारियों ने पीडि़त परिवार को समझाया और उनकी मांगों को शासन तक पहुंचाने की बात कही, लेकिन परिजन अपनी बात पर अड़े रहे. उन्होंने राज्यमंत्री प्रतिभा शुक्ला की भी बात नहीं मानी. लाचार अधिकारी मौके पर ही डटे रहे और मानमनौवल करते रहे.

14 फरवरी, 2023 की सुबह कानपुर नगर/देहात से प्रकाशित समाचार पत्रों में जब मांबेटी की जल कर मौत होने की खबर सुर्खियों में छपी तो पूरे प्रदेश में राजनीतिक भूचाल आ गया. कांग्रेस पार्टी प्रमुख राहुल गांधी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव तथा बसपा प्रमुख मायावती ने जहां ट्वीट कर योगी सरकार की कानूनव्यवस्था पर तंज कसा तो दूसरी ओर इन पार्टियों के नेता घटनास्थल पर पहुंचने को आमादा हो गए. लेकिन सतर्क पुलिस प्रशासन ने इन नेेताओं को घटनास्थल तक पहुंचने नहीं दिया. किसी विधायक को उन के घर में नजरबंद कर दिया गया तो किसी को रास्ते में रोक लिया गया.

एसआईटी के हाथ में पहुंची जांच…

इधर 24 घंटे बीत जाने के बाद भी जब घर वालों तथा गांववालों ने मांबेटी के शवों को नहीं उठने दिया तो कमिश्नर डा. राजशेखर ने प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक से वीडियो काल कर पीडि़तों की बात कराई. उपमुख्यमंत्री ने मृतका के बेटे शिवम दीक्षित से कहा कि आप हमारे परिवार के सदस्य हो. पूरी सरकार आप के साथ खड़ी है. दोषियों के खिलाफ केस दर्ज हो गया है और कड़ी से कड़ी काररवाई होगी. उन्हें ऐसी सख्त सजा दिलाएंगे कि पुश्तें याद रखेंगी.

डिप्टी सीएम बात करतेकरते भावुक हो गए. उन्होंने शिवम से कहा कि आप कतई अकेला महसूस न करें, जिन्होंने तुम्हारी मांबहन को तुम से छीना है, उन्हें इस का खामियाजा भुगतना पड़ेगा. इस घटना से हम सभी द्रवित है. इस के बाद उन्होंने शिवम की पत्नी शालिनी तथा भाई अंशु से भी बात की और उन्हें धैर्य बंधाया. डिप्टी सीएम से बात करने के बाद पीडि़त परिवार शव उठाने को राजी हो गया. इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने मांबेटी के शवों के पोस्टमार्टम हेतु माती भेज दिया. शाम साढ़े 6 से साढ़े 7 बजे के बीच 3 डाक्टरों (डा. गजाला अंजुम, डा. शिवम तिवारी तथा डा. मुनीश कुमार) के पैनल ने वीडियोग्राफी के बीच पोस्टमार्टम किया.

मांबेटी के अंतिम संस्कार के बाद पुलिस ने आरोपी अशोक दीक्षित के घर रात 2 बजे छापा मारा, लेकिन घर पर महिलाओं के अलावा कोई नहीं मिला. पुलिस टीम ने महिलाओं से पूछताछ की तो गौरव की पत्नी रुचि दीक्षित ने बताया कि उन के परिवार का इस केस से कोई लेनादेना नहीं है. उन के पति गौरव दीक्षित फौज में है. वह श्रीनगर में तैनात है. उन का देवर अभिषेक दीक्षित राजस्थान में फौज में है. छोटा देवर अखिल 29 जुलाई से घर से लापता है. उन के ससुर अशोक दीक्षित खेती करते हैं. रुचि ने पुलिस टीम की अपने पति गौरव से फोन पर बात भी कराई.

आरोपी अशोक दीक्षित की पत्नी सुधा दीक्षित ने पुलिस को बताया कि उन के पति व बेटों को इस मामले में साजिशन फंसाया जा रहा है. इधर शासन ने भी मांबेटी की मौत को गंभीरता से लिया और जांच के लिए अलगअलग 2 विशेष जांच टीमों (एसआईटी) का गठन किया. पहली टीम का गठन डीजीपी हाउस लखनऊ द्वारा किया गया.5 सदस्यीय इस टीम में हरदोई के एसपी राजेश द्विवेदी को अध्यक्ष, हरदोई सीओ (सिटी) विकास जायसवाल को विवेचक बनाया गया. जबकि हरदोई के कोतवाल संजय पांडेय, हरदोई महिला थाने की एसएचओ राम सुखारी तथा क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर रमेश चंद्र पांडेय को शामिल किया गया.

दूसरी विशेष जांच टीम (एसआईटी) का प्रमुख कमिश्नर डा. राजशेखर व एडीजी आलोक सिंह को बनाया गया और विवेचक कन्नौज के एडीएम (वित्त एवं राजस्व) राजेंद्र कुमार को बनाया गया. इस टीम को भी तत्काल प्रभाव से जांच के आदेश दिए. एसआईटी की दोनों टीमें मड़ौली गांव पहुंची और जांच शुरू की. एसपी राजेश द्विवेदी की टीम ने घटनास्थल का निरीक्षण किया फिर पीडि़त परिवार के लोगों से पूछताछ कर बयान दर्ज किए. टीम ने गांव के प्रधान व कुछ अन्य लोगों से भी जानकारी जुटाई. टीम ने थाना अकबरपुर व रूरा में पीडि़तों के खिलाफ दर्ज रिपोर्ट का भी अध्ययन किया. टीम ने उन 15 लोगों को भी नोटिस जारी किया जो गवाह के रूप में दर्ज थे.

दूसरी विशेष जांच टीम ने भी जांच शुरू की. डा. राजशेखर की टीम ने लगभग 60 लोगों की लिस्ट तैयार की और उन्हें जिला मुख्यालय पर शिविर कार्यालय निरीक्षण भवन में बयान दर्ज कराने को बुलाया. टीम ने कुछ मोबाइल फोन नंबर भी जारी किए, जिस पर कोई भी व्यक्ति घटना से संबंधित बयान दर्ज करा सके.

बहरहाल, कथा लिखने तक एसआईटी की जांच जारी थी. रूरा पुलिस ने गिरफ्तार आरोपी लेखपाल अशोक सिंह चौहान व चालक दीपक चौहान को माती कोर्ट में पेश किया, जहां से उन दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. आरोपी एसएचओ दिनेश गौतम व एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद भूमिगत हो चुके थे. अन्य आरोपियों को पकडऩे के लिए पुलिस प्रयासरत थी. मृतका प्रमिला के दोनों बेटों शिवम व अंशु को 5-5 लाख रुपए की सहायता राशि शासन द्वारा प्रदान कर दी गई थी तथा उन्हें सुरक्षा भी मुहैया करा दी गई थी.

-कथा पुलिस सूत्रों तथा पीडि़त परिवार से की गई बातचीत पर आधारित

Punjab crime : रात में लड़की बनकर घूमता था सीरियल किलर, 18 महीने में किए 11 कत्ल

Punjab crime : एक खतरनाक सीरियल किलर (Serial Killer) की दास्तां, जिसने 11निर्दोष लोगों की हत्या कर दी. इस खौफनाक सीरियल किलर के वारदातों को सुनकर आप की रूह कांप उठेगी.

अक्सर ऐसे सीरियल किलर के बारे में पढ़ते रहे हैं जो आसानी से पकड़े नहीं जाते हैं, लेकिन यहां आपको एक अजीबोगरीब (Serial Killer) के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसने धोखेबाजों को मारना अपना मिशन बना लिया था. वह कत्ल करने के बाद उनके पैर छूकर माफी मांगता और मारने के बाद उनकी पीठ पर ‘धोखेबाज’ लिख देता था.

दिन में पुरुष और रात में महिला दिखता

इस सीरियल  किलर का नाम रामस्वरूप है. जिसे पंजाब पुलिस ने पकड़ा है, यह सीरियल किलर एक अनोखी पहचान रखता है. रामस्‍वरूप दिन में दिन में पुरुष जैसी और रात में महिला जैसी रूप बनाता था. पंजाब पुलिस ने इस किलर की पहचान के लिए स्केच भी जारी किया था.

भूलने वाला सीरियल किलर

यह सीरियल किलर 11 कत्ल कर चुका था और कैमरे के सामने उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया. हैरानी की बात यह है कि कबूल करने के बाद यह सीरियल किलर खुद कहता है कि मेरी याददाश्त कमजोर है और मुझे अभी तक याद नहीं है कि मैंने कितने कत्ल किए हैं. किलर अपने आप को एक भुलक्कड़ मानता है.

अजीबोगरीब हरकतें करनेवाला रामस्‍वरूप

रामस्‍वरूप कत्ल करने के बाद लोगों की पीठ पर धोखेबाज लिख देता था. इतना ही नहीं, वह मृतक के हाथ पैर पकड़कर उससे माफी भी मांगता था. इसकी इस अजीब हरकत ने उसे इसे एक रहस्यमय और डरावना शख्स बना दिया था.

इस सीरियल किलर ने 18 अगस्त को कीरतपुर साहिब गढ़ मोड़ा टोल प्लाजा के करीब चाय पानी की दुकान वाले 37 वर्षीय शख्स की हत्या कर दी और उसका मोबाइल अपने साथ ले गया. इसी मोबाइल के जरिए पुलिस मोबाइल बेचने वाले के पास पहुंचती है जहां उसे पता चलता है कि मोबाइल बेचने के लिए एक महिला आई थी लेक‍िन देखने में वह पुरुष जैसा लग रहा था. पंजाब पुलिस ने इस शख्स के जरिए सीरियल किलर का स्केच तैयार किया और उसकी तलाश शुरू की. मोबाइल और स्केच के आधार पर ही रामस्वरूप की पहचान और गिरफ्तारी संभव हो सकी. इसके बाद पंजाब पुलिस स्केच के आधार पर उस रामस्वरूप के पास तक पहुंचती है और उसे अरेस्ट कर लेती है.

जब पुलिस उसे पकड़ती है तो लगता है कि उसने सिर्फ एक कत्ल किया होगा लेकिन जब वह अपना मुंह खोलता है तो पुलिस शौक्‍ड रह जाती है उसने ऐसे खुलासे किए कि पुलिस कुछ ही देर में समझ गई कि वह एक खतरनाक सीरियल किलर के सामने खड़ी है.

किस तरह से करता था कत्ल

रामस्‍वरूप एक “गे सेक्स वर्कर” था. यह रात को महिलाओं की तरह सजता था और घूंघट में चेहरा ढक कर ग्राहकों की तलाश में जुड़ जाता. जब इसे कोई ग्राहक मिल जाता है तो वह उस ग्राहक से पैसे के लिए लड़ता और उस ग्राहक का गला घोंट कर हत्या कर देता.

पंजाब पुलिस के मुताबिक इस सीरियल किलर ने डेढ़ साल में 11 कत्ल किए है. अभी पुलिस इससे जुड़े और सबूत तलाश रही है.