Uttar Pradesh Crime: इश्क में बरबाद हुई जिंदगी

Uttar Pradesh Crime. घर वालों के समझाने पर आरती ने प्रेमी प्रवीण कुमार से किनारा किया तो प्रवीण ने उसे बदनाम करने की धमकी दे डाली. प्रेमी की इस धमकी से आरती ने जो कदम उठाया, आज उस का प्रेमी जेल की सजा काट रहा है.

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले की जिला अदालत में उस दिन भी रोज की तरह ही सभी अपनेअपने कामों में व्यस्त थे. वकील अपने मुवक्किलों की फाइलें लिए इधरउधर भागमभाग लगाए थे तो पेशी पर आए मुवक्किल अपनेअपने मजिस्ट्रैटों के कक्ष के बाहर बैठे अपनीअपनी पुकार का इंतजार कर रहे थे.

स्पैशल जज श्री गुरप्रीत सिंह भी अपने कक्ष में आ कर बैठ गए थे. उस दिन उन्हें एक मामले का फैसला सुनाना था. मुलजिम को वह पहले ही दोषी करार दे चुके थे. उन के कुरसी पर बैठते ही पेशकार ने मामले की फाइल उन के सामने रख दी थी. वह फाइल पलटने लगे तो पुकार हुई, मामले से जुड़े दोनों पक्षों के लोग और उन के वकील कक्ष के अंदर आ गए.

मुलजिम प्रवीण कुमार कटघरे में आ कर खड़ा हो गया. सरकारी वकील ने दोषी पाए गए मुलजिम प्रवीण कुमार को सख्त से सख्त सजा देने की मांग की तो बचाव पक्ष के वकील उसे निर्दोष होने की दलील देते हुए छोड़ देने की अपील की. इस मामले में क्या सजा सुनाई गई, यह जानने से पहले आइए यह जान लें कि मुलजिम प्रवीण कुमार कौन था, उस ने ऐसा कौन सा जुर्म किया था, जिस के लिए उसे सजा सुनाई जा रही थी.

पूरे मामले को जानने के लिए हमें 6 साल पीछे जाना होगा. रिटायर्ड फौजी महेंद्र सिंह मूलरूप से मैनपुरी के नजदीकी गांव बुरीचक सहारा के रहने वाले थे. फौज से रिटायर होने के बाद वह मैनपुरी शहर में जेल रोड पर शकुंतला अस्पताल के सामने मकान बनवा कर उसी में परिवार के साथ रहने लगे थे.

उन के परिवार में पत्नी माया के अलावा बेटी आरती और 2 बेटे अनूप तथा अवधपाल थे. बात तब की है, जब आरती एक महिला महाविद्यालय से बीए कर रही थी. महेंद्र सिंह के पड़ोस में ही देशराज सिंह परिवार के साथ रहते थे. वह भी सेना से रिटायर थे, इसलिए उन के और महेंद्र सिंह के परिवार के बीच घनिष्ठ संबंध थे.

दोनों ही परिवारों का एकदूसरे के घर बेरोकटोक आनाजाना था. उन्हीं दिनों सिंचाई विभाग का जूनियर इंजीनियर प्रवीण कुमार देशराज के घर किराए पर रहने आया. वह मेरठ के गढ़ रोड स्थित गांव समयपुर का रहने वाला था.

प्रवीण की नौकरी तो ठीकठाक थी ही, शक्लसूरत से भी वह ठीकठाक था. प्रवीण कुमार को देशराज के घर आए कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन उस की मुलाकात आरती से हो गई. वह रविवार का दिन था. आरती देशराज के घर उन की पत्नी के पास बैठी थी कि तभी प्रवीण ने ऊपर से आवाज लगाई, ‘‘आंटी, एक बोतल पानी चाहिए.’’

देशराज की पत्नी ने आरती से कहा, ‘‘बेटा, फ्रिज से एक बोतल निकाल कर प्रवीण को दे आ.’’

आरती ने फ्रिज से बोतल निकाली और ऊपर चली गई. ऊपर कमरे में एक हैंडसम युवक फाइलों में खोया था. आरती ने कहा, ‘‘पानी…’’ तो उस ने नजर उठा कर उस की ओर देखा. उस के बाद हड़बड़ा कर बोला, ‘‘आप… आप ने क्यों तकलीफ की?’’

‘‘पानी की बोतल लाने में कैसी तकलीफ?’’ आरती ने हंसते हुए कहा.

‘‘भई मेरे लिए तो आप का ऊपर आना ही तकलीफ लग रहा है,’’ प्रवीण ने कहा, ‘‘आइए बैठिए.’’

‘‘नहीं, मैं चलती हूं. आप अपना काम कीजिए.’’ कह कर आरती चली गई.

आरती प्रवीण को अच्छी लगी थी, इसलिए उस के जाने के बाद वह उस के बारे में सोचने ही नहीं लगा, बल्कि उस के बारे में पता भी करने लगा. बहुत जल्दी उसे पता चल गया कि आरती पड़ोस में रहती है और बीए कर रही है. आतेजाते या मकान मालकिन के साथ जब भी आरती उसे दिखाई देती, वह उसे ऐसी नजरों से देखता, जिन नजरों से हर किसी को नहीं देखा जाता.

प्रवीण भी सजीला जवान था और रहता भी ढंग से था. कुल मिला कर वह ऐसा था कि कोई भी लड़की उसे नकार नहीं सकती थी. यही वजह थी कि आरती को भी वह अच्छा लगने लगा था. आरती के मन में क्या है, यह प्रवीण को पता नहीं था.

पर जब आरती किसी न किसी बहाने देशराज के घर जा कर उस से बातें करने का मौका तलाशने लगी तो उसे उस के मन की थाह मिल ही गई. एक दिन जब आरती बहाने से उस के कमरे में पहुंची तो प्रवीण ने उसे प्यार से बैठाया ही नहीं, बल्कि आगे इसी तरह मुलाकातें होती रहें, इस के लिए कहा भी कि अगर पढ़ाई में उसे किसी तरह की मदद की जरूरत हो तो वह उस की मदद कर सकता है.

आरती को भी प्रवीण से मिलने का बहाना मिल गया था. ऐसे में ही एक दिन मौका देख कर प्रवीण ने उस का हाथ पकड़ कर प्यार का इजहार कर दिया. आरती बिना कुछ सोचेविचारे प्रवीण के प्यार में पड़ गई. तब वह यह भी भूल गई कि दोनों की जाति अलगअलग है. वह लोधी राजपूत है, जबकि प्रवीण जाटव.

आरती और प्रवीण का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों चोरीछिपे मिल कर भविष्य का तानाबाना बुनने लगे.

लेकिन जब आरती देशराज के घर कुछ ज्यादा ही आनेजाने लगी तो महेंद्र सिंह को संदेह हुआ. उन्होंने जब गहराई से छानबीन की तो उन्हें पता चल गया कि आरती का पड़ोसी देशराज के घर किराए पर रह रहे जूनियर इंजीनियर प्रवीण से कुछ चक्कर चल रहा है.

उन्होंने आरती पर पाबंदी लगाने के साथ देशराज से भी कह दिया कि वह प्रवीण से कमरा खाली करा ले. देशराज के कहने पर प्रवीण ने उन का कमरा खाली कर दिया और देवपुरा रोड पर किराए पर कमरा ले कर रहने लगा. प्रेमी के दूर चले जाने से आरती परेशान रहने लगी. क्योंकि प्यार की राह पर वह काफी आगे बढ़ चुकी थी.

पाबंदी की वजह से वह प्रेमी से मिल नहीं पा रही थी. मन की व्यथा शांत करने के लिए उस ने प्रवीण को कई पत्र लिखे. उसे लगता था कि चाह कर भी वह उस से नहीं मिल सकती. वह हताश होने लगी थी. उस की हताशा उस के चेहरे पर भी नजर आने लगी थी.

घर वालों ने उसे समझायाबुझाया, इज्जत का हवाला दिया तो उसे भी लगा कि वह गलत है. ऐसे विवाह की उम्र लंबी नहीं होती. वह प्रवीण को भूलने की कोशिश कर रही थी कि तभी उसे पता चला कि प्रवीण की शादी तय हो गई है. महेंद्र सिंह और उन की पत्नी माया को लगता था कि अब सब ठीक हो गया है. वे निश्चिंत हो गए.

माया किसी काम से गांव चली गई तो उसी बीच आरती ने घर की लाइसैंसी बंदूक से गोली मार कर आत्महत्या कर ली.

यह 1 जुलाई, 2010 की बात है. महेंद्र सिंह ने तुरंत घटना की सूचना कोतवाली मैनपुरी पुलिस को दी तो थोड़ी ही देर में एसआई रामकुमार पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

निरीक्षण में उन्होंने देखा आरती सोफे पर बैठी मरी पड़ी थी. बगल में दोनाली बंदूक पड़ी थी. माथे से खून बह रहा था. उस के कंधे पर एक बैग टंगा था. साफ था, उस ने सोफे पर बैठ कर खुद को गोली मारी थी.

पुलिस ने बंदूक और बैग कब्जे में ले लिया. इस के बाद सारी औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

इस के बाद राम कुमार ने पूछताछ की तो महेंद्र सिंह के यहां किराए पर रह रही स्नेहलता ने बताया कि आरती के कमरे की बत्ती पूरी रात जलती रही थी. आधी रात के आसपास वह उस के कमरे में आई थी और उस का मोबाइल मांग कर ले गई थी.

5 बजे के बाद उस ने गोली चलने की आवाज सुनी तो घबरा कर अपने कमरे से बाहर आई. उसे लगा कि गोली आरती के कमरे में चली है तो उस ने महेंद्र सिंह को आवाज दी. उस के बाद महेंद्र अपने बेटों के साथ ऊपर आए और कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर गए तो आरती सोफे पर बैठी मरी पड़ी थी. उस के माथे से खून बह रहा था.

पुलिस ने आरती के बैग से मिला सुसाइड नोट पढ़ा तो उस में उस ने आत्महत्या के लिए जूनियर इंजीनियर प्रवीण कुमार को जिम्मेदार ठहराया था. उस ने उस में उस का पता भी लिखा था, इसलिए पुलिस ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया.

पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर हैरानी जताते हुए प्रवीण ने कहा कि वह आरती से बहुत प्यार करता था. वह भला क्यों उसे आत्महत्या के लिए मजबूर करेगा. उस की तो मेरठ में शादी तय हो चुकी थी. 9 जुलाई को उस की शादी है.

लेकिन पुलिस ने उस की एक नहीं सुनी और उस के खिलाफ हत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया. इस तरह शादी से एक सप्ताह पहले ही वह जेल चला गया. इस बात की जानकारी लड़की वालों को हुई तो उन्होंने शादी तोड़ दी.

आगे की जांच में पता चला कि घर वालों के समझाने पर आरती ने तय कर लिया था कि वह प्रवीण से संबंध खत्म कर लेगी और उस से कभी नहीं मिलेगी. यह बात उस ने प्रवीण से कह भी दी थी. लेकिन शादी तय होने के बावजूद वह उसे छोड़ने को तैयार नहीं था. रंग बदलते हुए उस ने कहा था कि वह उसे ऐसे कैसे छोड़ सकता है. वह उस से कोर्टमैरिज करना चाहता है.

आरती ने उस की शादी तय होने की बात कही तो उस ने कहा कि शादी तो घर वालों ने तय की है, वह तो उसी से शादी करना चाहता है. वह तय कर ले कि उसे क्या करना है. लेकिन अगर उस ने शादी से मना किया तो वह उस के प्रेमपत्रों को अखबारों में छपवा कर उसे बदनाम कर देगा. यही नहीं, वह उस के पिता तथा भाइयों को भी मरवा देगा.

प्रेमी की इस धमकी से आरती परेशान हो गई. घर वालों को उस पर वैसे ही विश्वास नहीं रह गया था, प्रेमी की ओर से वह अपना ध्यान हटा ही चुकी थी. क्योंकि उस की समझ में आ चुका था कि उस का प्रवीण से संबंध परिवार के लिए ठीक नहीं है. जबकि प्रवीण उस के साथ जबरदस्ती शादी करना चाहता था.

आरती की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना चाहिए? जिंदगी शायद उसे बेमानी लगने लगी थी. उसे लगा कि उस का मर जाना ही ठीक है, क्योंकि अगर जिंदा रही तो उस के परिवार को प्रवीण बदनाम कर देगा. उस के बाद घर वाले उस से नफरत करने लगेंगे. प्रवीण से प्यार करना उसे जीवन की सब से बड़ी भूल लगी.

उसे प्रेमी से अचानक नफरत हो गई. शायद इसीलिए उस ने अपने सुसाइड नोट में उस के लिए मौत की सजा की मांग की थी. उस ने लिखा था कि प्रवीण ने उस का जीना मुश्किल कर दिया था. पुलिस ने प्रवीण को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. महीने भर जेल में रहने के बाद उसे जमानत मिल गई. वह जेल से बाहर आ गया.

मुकदमा चलने लगा. अब प्रवीण का कैरियर दांव पर लग गया था. जमानत पर छूटने के बाद वह अपने मुकदमे की पैरवी करने लगा. सबूत के तौर पर उस ने आरती के प्रेमपत्र अदालत में पेश किए.

दूसरी ओर सरकारी वकील अशोक कुमार पंकज ने प्रवीण के मोबाइल की काल डिटेल्स अदालत में पेश की, जिस के अनुसार प्रवीण ने उसे कई बार फोन किया था. उन का कहना था कि प्रवीण ने फोन कर के मृतका और उस के परिवार को बदनाम करने की धमकी दी थी, जिस से डर कर मृतका ने आत्महत्या का निर्णय लिया था.

जज श्री गुरप्रीत सिंह ने आरती के सुसाइड नोट को अहम सबूत मानते हुए प्रवीण कुमार को आरती के आत्महत्या के लिए दोषी माना. जबकि उस के वकील विजय प्रताप का कहना था कि सुसाइड नोट की फोरैंसिक जांच होनी चाहिए. इस के अलावा मृतका 12 बोर की डबल बैरल बंदूक से सुसाइड नहीं  कर सकती. यह सुसाइड का नहीं, बल्कि हत्या का मामला है.

लेकिन अदालत ने न सुसाइड नोट की फोरैंसिक जांच कराई और न ही उस के इस दलील को माना कि मृतका डबल बैरल बंदूक से आत्महत्या नहीं कर सकती.

स्पैशल जज श्री गुरप्रीत सिंह ने प्रवीण कुमार को दोषी मानते हुए आरती को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में 10 साल की कैद और एक लाख रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. जुरमाने की धनराशि में से 90 हजार रुपए मृतका के  घर वालों को देने के आदेश दिए.

प्रवीण कुमार ने हाईकोर्ट में इस सजा के खिलाफ अपील भले ही कर दी है, लेकिन उसे नौकरी से बर्खाश्त कर दिया गया है. वह मैनपुरी नौकरी करने आया था, लेकिन वहां वह एक ऐसी लड़की से प्यार कर बैठा, जो उस की जाति की नहीं थी. इस प्यार से उसे कुछ मिलता, वह कुछ ऐसा कर बैठा कि उस की जिंदगी बरबाद हो गई.

True Crime Story: दुष्कर्म में फंसे राजद विधायक राजवल्लभ यादव

True Crime Story: रूपम पाठक ने यौनशोषण करने वाले एक आरोपी विधायक राजकिशोर केसरी को खुद मौत के घाट उतार दिया था. जबकि दूसरे आरोपी विपिन राय को कोर्ट ने 10 साल की सजा सुना दी है.

10 मार्च, 2016 को बिहार के पूर्णिया जिले के अपर सत्र न्यायाधीश (तृतीय) मोहम्मद एजाउद्दीन की अदालत खचाखच भरी थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन बहुचर्चित रूपम पाठक यौनशोषण कांड का फैसला सुनाया जाना था. इस केस में भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी और उन का सहायक विपिन राय आरोपी थे. इसलिए वकीलों के अलावा अन्य तमाम लोग उस दिन अदालत में पहुंच कर माननीय न्यायाधीश द्वारा सुनाए जाने वाले फैसले का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे.

मामले में विधायक के फंसने के बाद दूसरी पार्टियों के नेताओं ने इसे बहुत तूल दिया था. इस केस के सहारे वे अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने की कोशिश कर रहे थे. बाद में इस केस में कई उतारचढ़ाव आए. यह पूरा मामला क्या था और विधायक राजकिशोर केसरी इस केस में कैसे फंसे, जानने के लिए हमें अतीत में जाना होगा. दरअसल, रूपम अपने पति और 2 बच्चों के साथ इंफाल में रहती थी. सन 2006 में वह अपने पति अशोक पाठक और बच्चों के साथ बिहार के पूर्णिया शहर आ गई और शहर के ओली टोला में राजहंस पब्लिक स्कूल खोल लिया.

सन 2007 में स्कूल के सालाना जलसे में उस ने चीफ गेस्ट के रूप में पूर्णिया के विधायक राजकिशोर केसरी को बुलाया. वहीं से रूपम और विधायक की जानपहचान बढ़ी. विधायक के साथ उन का सहायक विपिन राय भी जलसे में पहुंचा था. जलसे में विधायक ने स्कूल के विकास के लिए विधायक फंड से रकम देने का ऐलान किया था. रूपम राजकिशोर के उसी झांसे में फंस गई थी. उसे यह लालच हो गया कि विधायक की मदद से वह अपने स्कूल की काफी तरक्की कर सकती है, जिस से उस की आमदनी में काफी इजाफा हो जाएगा. जलसा खत्म होने के कुछ दिनों बाद जब रूपम विधायक से रुपए पाने के लालच में उन के मधुबनी वाले घर पहुंची तो वहां मौजूद उस के सहायक विपिन से उस ने बात की.

विपिन ने रूपम के सामने पेशकश रखी कि यदि उसे स्कूल के लिए आर्थिक मदद चाहिए तो उसे विधायक के साथ बिस्तर पर जाना होगा. रूपम ने मना किया तो विपिन ने उसे जबरन विधायक के कमरे में धकेल कर दरवाजा बंद कर दिया. कमरे में पहले से मौजूद विधायक ने रुपए देने के बहाने उस के साथ बलात्कार किया. इतना ही नहीं, जब वह विधायक के कमरे से निकली तो विपिन ने भी डराधमका कर उस के साथ मनमानी की. उस के बाद विपिन जबतब रूपम के घर पहुंचने लगा और उसे ब्लैकमेल करने लगा.

वह रूपम से कहता था कि जैसा वह कहता है, करती रहे नहीं तो सारे शहर में उस की बदनामी करा देगा. इसी डर से रूपम कई सालों तक उन दोनों के शोषण का शिकार होती रही. फिर हिम्मत जुटा कर रूपम ने 18 अप्रैल, 2009 को विधायक राजकिशोर केसरी और उन के सहयोगी विपिन राय पर पिछले 3 सालों से दुराचार करने का आरोप लगाया. रूपम ने इस की शिकायत तत्कालीन एसपी से की थी. शिकायत के आधार पर पूर्णिया के केहाट थाने में दोनों आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. पुलिस ने सीजेएम कोर्ट में धारा-164 के तहत 18 जून, 2010 को रूपम का बयान रिकौर्ड कराया तो रूपम एफआईआर में लगाए गए आरोपों से पलट गई. इस का लाभ विधायक को मिला.

फिर एसपी ने इस मामले की जांच कराई और विधायक पर लगाए गए आरोप को बेबुनियाद करार देते हुए 7 सितंबर, 2010 को सीजेएम कोर्ट में अपनी ओर से आखिरी रिपोर्ट फाइल करते हुए जांच को बंद कर दिया. इस के 10 दिनों बाद 16 सितंबर, 2010 को रूपम ने उसी कोर्ट में प्रोटेस्ट पिटीशन दायर किया, जिस में उस ने 18 जून, 2010 को धारा-164 के तहत दिए बयान को दबाव में दिया गया बयान बताया. कोर्ट ने उस की पिटीशन मंजूर कर के सुनवाई के लिए 25 मार्च, 2011 की तारीख निश्चित कर दी.

इस के बाद इस केस में नया मोड़ तब आया, जब रूपम ने दिनदहाड़े विधायक राजकिशोर केसरी की चाकू मार कर हत्या कर दी. बात 4 जनवरी, 2011 की सुबह करीब सवा 9 बजे के आसपास की है. विधायक राजकिशोर केसरी अपने समर्थकों से अपने ही घर में बातचीत कर रहे थे. उसी दौरान शाल लपेटे रूपम वहां पहुंची. वह विधायक से बोली कि उसे उन से कुछ खास बात करनी है. विधायक ने सोचा कि शायद केस के बारे में कुछ बात करने आई होगी. इसलिए वह अपने समर्थकों के बीच से उठ कर उस के साथ किनारे की ओर बढ़ने लगे.

कुछ आगे बढ़ने के बाद रूपम ने अपना शाल हटाया और दनादन चाकू से विधायक के पेट पर वार करने लगी. खून से लथपथ विधायक घायल हो कर जमीन पर गिर पड़े. आननफानन में उन के समर्थक उन्हें उठा कर सदर अस्पताल ले गए, लेकिन इलाज के दौरान सवा 10 बजे के करीब उन की मौत हो गई. विधायक के घर में घुस कर सुरक्षागार्डों और उन के समर्थकों के बीच रूपम ने उन की हत्या कर दी. रूपम जैसी पढ़ीलिखी महिला ने विधायक की हत्या कर जीवन भर जेल की सलाखों के पीछे रहने का फैसला आखिर क्यों किया? इस राज का खुलासा पुलिस और अदालत की काररवाई के दौरान हुआ.

पुलिस ने विधायक की हत्या के आरोप में रूपम पाठक को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. रूपम ने पुलिस को दिए अपने बयान में कहा था कि वह विधायक के खिलाफ ठीक से कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकती थी. उसे इस बात की आशंका थी कि विधायक की दबंगई की वजह से उसे न्याय नहीं मिल पाएगा, इसलिए उस ने खुद ही सजा देने का फैसला किया. जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई, उस में बताया गया था कि हृदय से जुड़ी एब्डोमिनल एरोटा नस (महाधमनी) के कट जाने की वजह से विधायक की मौत हुई थी. राजकिशोर केसरी सन 2000 में पहली बार विधायक बने थे.

उस के बाद वह 4 बार पूर्णिया विधानसभा सीट से जीते थे. इस हत्याकांड से बिहार की सियासत में हलचल मच गई थी. उस समय राज्य में जदयू और भाजपा की सरकार थी. सरकार दोनों के बेहतर तालमेल के साथ चल रही थी. भाजपा विधायक पर जब रूपम ने दुराचार और 3 सालों तक यौनशोषण का आरोप लगाया था तो भाजपा की काफी फजीहत हुई थी. इस मामले की जांच के लिए भाजपा के वरिष्ठ नेता और उस समय के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी खुद 30 मई, 2010 को पूर्णिया गए थे. हर भाजपा नेता यही रट लगा रहा था कि रूपम ने विधायक केसरी पर मनगढं़त आरोप लगा कर उन की छवि को खराब करने की कोशिश की थी.

विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या के बाद अदालत ने रूपम के प्रोटेस्ट पिटीशन से विधायक का नाम हटा दिया. करीब एक साल तक चले गवाहों के बयान के बाद चीफ जुडीशियल मजिस्ट्रेट ने आरोपी विपिन राय के खिलाफ मामला संज्ञान में लिया. तब 19 मार्च, 2012 को विपिन राय ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया. तब से ले कर इस केस की सुनवाई अदालत में होती रही. अपर सत्र न्यायाधीश (तृतीय) मोहम्मद एजाउद्दीन ने इस केस का फैसला 10 मार्च 2016 को सुनाने का दिन मुकर्रर किया. इसलिए फैसले को जानने के लिए तमाम लोग अदालत में पहुंच गए थे.

विपिन के वकील जनार्दन प्रसाद ने कोर्ट में यह दलील दी कि आरोपी की आयु का खयाल रखते हुए उस के अपराध पर सहानुभूति बरती जाए और कम से कम सजा दी जाए. वहीं पीडि़ता रूपम पाठक के वकील ने आरोपी विपिन को कठोरतम सजा देने की मांग की थी. दोनों पक्षों को सुनने के बाद माननीय न्यायाधीश मोहम्मद एजाउद्दीन ने विपिन राय को 10 साल के सश्रम कारावास की सजा के साथ 50 हजार रुपए का जुरमाना भी भरने का आदेश दिया. अदालत ने कहा कि जुरमाने की 80 फीसदी रकम पीडि़ता को दी जाए. उधर विधायक की हत्या के मामले में निचली अदालत ने रूपम को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. वह भी जेल की रोटियां तोड़ रही है. फिलहाल रूपम भागलपुर जेल में कैद है.

विधायक ने सैक्स के चक्कर में फंस कर अपनी जान गंवाई. अब विपिन की जवानी भी अंधेरी कालकोठरी में कटेगी. वहीं रुपयों के लालच में फंस कर रूपम ने इज्जत और आगे की जिंदगी दोनों बरबाद कर ली. राजकिशोर की हत्या के बाद उन का परिवार, विपिन के जेल जाने के बाद उस का परिवार और रूपम को उम्रकैद मिलने के बाद उस का परिवार भी घर पर सजा भुगतने को मजबूर है. यानी अविवेक में उठाए गए कदम का खामियाजा तीनों के परिवार भुगत रहे हैं. True Crime Story

True Crime Story: तेजाब की आंच से ताउम्र झुलसेंगे आरोपी

True Crime Story:अपनी प्रेमिका लावण्या को पाने के लिए हरदीप ने दोस्त के साथ मिल कर तेजाब कांड को अंजाम दिया. इस कांड के बाद उसे प्रेमिका तो नहीं मिली, लेकिन अदालत से ऐसी सजा जरूर मिल गई कि ताउम्र वह प्रेमिका से नहीं मिल सकेगा.

राकेश रेखी पंजाब पुलिस के रिटायर्ड एसपी देशराज के बेटे थे. मोहाली की फेज-1 मार्केट में रुद्राक्ष ग्रुप इमीग्रेशन नाम से उन की एक कंपनी थी. उन के दफ्तर में कई युवकयुवतियां काम करते थे. धार्मिक विचारों के राकेश जब भी माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर जाते, अपने औफिस के कुछ कर्मचारियों को भी साथ ले जाते थे. पहली सितंबर, 2011 को भी एक कार्यक्रम बना कर अपनी फोर्ड आईकान कार नंबर सीएच03जे 2042 से माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर के लिए निकले. इस बार भी वह अपने साथ औफिस से 4 जनों को ले गए थे. कार वह खुद चला रहे थे.

स्टाफ की 25 वर्षीया स्वातिका उन के बगल वाली सीट पर बैठी थी, जबकि 24 वर्षीया शिवालिका कार की पिछली सीट पर थी. स्टाफ के 2 लोग शेर खान और नवनीत इन के पीछे दूसरी गाड़ी में आ रहे थे. राकेश को अपनी गाड़ी में पैट्रोल भरवाना था, इसलिए वह राष्ट्रीय राजमार्ग-21 पर मोहाली और खरड़ के बीच स्थित एक पैट्रोल पंप पर चले गए. उस समय शाम के करीब 5 बजे थे, वह अकसर उसी पैट्रोल पंप पर कार में पैट्रोल भरवाने जाते थे. पैट्रोल टैंक फुल करवाने के बाद पेमेंट करने के लिए उन्होंने खिड़की का शीशा नीचे किया कि तभी उन के ऊपर जैसे कहर बरपा गया.

विपरीत दिशा से 2 बाइक सवार उन की कार के पास पहुंचे. आगे वाले ने हैलमेट लगा रखा था, जबकि दूसरा बिना हैलमेट के था. उस के हाथ में 5 लीटर की कैन थी, जिस का ऊपरी हिस्सा कटा हुआ था. जो शख्स कैन पकड़े था, वह राकेश के एकदम पास आ गया. राकेश को यह सब अजीब सा लगा. वह उस से कुछ बोलने को हुए, तभी उस युवक ने कैन में भरा तरल पदार्थ कार के अंदर बैठी युवतियों पर फेंक दिया. तरल पदार्थ फेंक कर वह युवक उसी बाइक से फरार हो गया. इस के बाद तो कार के भीतर चीखपुकार मच गई.

राकेश भी कराह उठे. कार का दरवाजा खोल कर वह बाहर आ गिरे थे. वह दर्द से तड़प रहे थे. कार के अंदर बैठी दोनों युवतियां भी चीखतीचिल्लाती हुई कार से बाहर निकल आई थीं. जरा सी देर में बात साफ हो गई कि बाइक सवारों द्वारा उन पर जो तरल पदार्थ डाला गया था, वह तेजाब था. उन का मुख्य निशाना वह लड़की थी, जो राकेश के बगल वाली सीट पर बैठी थी. वही तेजाब से सब से ज्यादा झुलसी थी. इस घटना के बाद पैट्रोल पंप पर भी अफरातफरी मच गई. कार में से बह कर तेजाब फर्श पर फैलने लगा था, जिस पर पैट्रोल पंप कर्मियों ने फोम डाल दी, ताकि अफरातफरी में वहां कोई फिसल कर न गिरे. पैट्रोल पंप कर्मियों ने इस घटना की सूचना पुलिस को दी और तीनों घायलों को पीजीआई अस्पताल ले गए.

सूचना मिलते ही थाना बलौंगी के थानाप्रभारी भूपेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. बाद में खरड़ के डीएसपी सुखदेव सिंह विर्क और मोहाली के एसएसपी गुरप्रीत सिंह भुल्लर भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल पर मौजूद राकेश के कर्मचारी शेर खान और पैट्रोल पंप कर्मियों से घटना के बारे में पूछताछ की. घायलों से मिलने के लिए पुलिस अधिकारी पीजीआई अस्पताल भी गए और शेर खान की तरफ से अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कर ली. एसपी ने इस सनसनीखेज मामले को सुलझाने के लिए डीएसपी सुखदेव सिंह विर्क के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई.

पुलिस ने पैट्रोल पंप पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच शुरू की. इस में बाइक और उस पर सवार 2 लोग दिखाई तो दे रहे थे, मगर न तो बाइक का नंबर साफ पढ़ने में आ रहा था और न ही उस पर बैठे लड़के किसी की पहचान में आ रहे थे. घटना की सूचना पा कर राकेश की कंपनी के कई कर्मचारी अस्पताल और थाने पहुंचे. पुलिस ने उन्हें सीसीटीवी फुटेज दिखाई तो उन्होंने बताया कि तेजाब फेंकने वाला युवक उन के औफिस में काम करने वाली स्वातिका का बौयफ्रैंड हो सकता है. इस वारदात में स्वातिका भी झुलस चुकी थी, इसलिए पुलिस ने भी यही अनुमान लगाया कि शायद उस लड़के ने प्यार में नाकाम होने पर स्वातिका को निशाना बनाया होगा.

पुलिस ने जांच की तो पता चला कि स्वातिका का वह कथित बौयफ्रैंड पहले गुड़गांव में काम करता था, बाद में वह डेरा बस्ती की किसी फैक्ट्री में नौकरी करने लगा था. लेकिन इन दिनों उस के चंडीगढ़ में काम करने की जानकारी मिली. बिना नामपते के उस के पास पहुंचना आसान नहीं था. पुलिस ने स्वातिका की सहेलियों से इस बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि स्वातिका की उस लड़के से बोलचाल थी, वह उसे प्रपोज भी करने लगा था लेकिन स्वातिका उसे खास पसंद नहीं करती थी. फिर वह अकसर उसे परेशान करने लगा था. स्वातिका ने जब उस के प्रति अपना रुख सख्त किया तो वह उसे देख लेने की धमकियां भी देने लगा था.

पुलिस ने उन सभी सहेलियों से कहा कि वह उस के कथित बौयफ्रैंड का नामपता जुटाने में पुलिस का सहयोग करें. संदर्भवश बता दें कि 80 के दशक में सर्वथा पहली बार यह तेजाबकांड सुर्खियों में तब आया था, जब मध्यप्रदेश के जिला जबलपुर में एक सिरफिरे ने अपनी प्रेमिका के चेहरे पर तेजाब उड़ेला था. उसे अपनी प्रेमिका पर शक था कि उस के संबंध किसी और से हैं. हालांकि उस समय निजी न्यूज चैनल नहीं थे, इस के बावजूद भी इस घटना से पूरे देश में सनसनी फैल गई थी. इस के बाद तो देश भर में इस तरह की घटनाएं जैसे आम हो गईं. मजबूरन सरकार को तेजाब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाना पड़ा.

खैर, इस ताजा केस में तेजाब के हमले से 3 लोग घायल हो गए. स्वातिका 80 प्रतिशत, शिवालिका 10 प्रतिशत और राकेश रेखी 40 प्रतिशत झुलस चुके थे. तीनों पीजीआई के इमरजेंसी वार्ड में भरती थे. पुलिस अभी तक उन के बयान नहीं ले पाई थी. फिलहाल अनुमान यही लगाया जा रहा था कि यह एकतरफा प्यार का मामला है. साफ नजर आ रहा था कि स्वातिका के उन्मादी प्रेमी का निशाना वही थी, बाकी दोनों तो उस के साथ बैठे होने की वजह से लपेटे में आ गए थे. स्वातिका के कथित प्रेमी का पता लगाने को पुलिस ने अपने मुखबिर भी सक्रिय कर दिए थे. मुखबिरों से ही पता लग गया कि जिस शख्स ने तेजाब फेंका था, उस का नाम भावेश है और वह चंडीगढ़ के सेक्टर-49 का रहने वाला है.

एसएसपी के आदेश पर सीआईए इंसपेक्टर गुरचरन सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम भावेश की तलाश में उस के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. अगले दिन एक गुप्त सूचना के आधार पर सीआईए टीम ने भावेश को चंडीगढ़ से गिरफ्तार कर लिया. रातभर उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पता चला कि वह भारतीय जीवन बीमा निगम में एजेंट था. डेढ़ साल पहले स्वातिका भी एलआईसी की उसी शाखा में एजेंट थी. एक ही जगह काम करने की वजह से दोनों की आपस में मुलाकात होती रहती थी.

उसी दौरान भावेश ने स्वातिका से प्यार का इजहार कर दिया. स्वातिका ने साफ कह दिया कि वह प्यारव्यार के चक्कर में न पड़ कर, अपने संबंध केवल दोस्ती तक ही सीमित रखना चाहती है. लेकिन भावेश तो जैसे उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गया. तब स्वातिका ने परेशान हो कर एलआईसी का काम ही करना बंद कर दिया. इस के बाद वह राकेश रेखी के यहां नौकरी करने लगी. भावेश को जब पता चला तो वह उस का वहां भी पीछा करने लगा. अपनी एकतरफा प्यार की कहानी तो भावेश ने तमाम शिद्दत से सुना दी. लेकिन पुलिस द्वारा अपने सभी तरीकों से पूछताछ कर लेने पर भी वह यही दोहराता रहा कि स्वातिका पर तेजाब फेंकने में उस का कोई हाथ नहीं है.

उस ने भावुक हो कर कहा था, ‘‘सर, स्वातिका को मैं अपनी जान से ज्यादा चाहता हूं. उसे नुकसान पहुंचाने की तो मैं कभी सपने में भी नहीं सोच सकता. मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि उस के साथ ऐसी दुश्मनी निभाने की हिमाकत किस ने की.’’

गहन पूछताछ कर के इंसपेक्टर गुरचरन सिंह को वह बेकुसूर लगा तो उन्होंने हिदायत दे कर उसे घर भेज दिया. पुलिस ने जिस एंगल से जांच करनी शुरू की थी, वहां से कोई सफलता नहीं मिल पाई. पुलिस ने स्वातिका के घर वालों से भी बात की, लेकिन वहां से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली. उसी दौरान पुलिस को मुखबिर से एक खास जानकारी मिली. उस सूचना पर पुलिस ने काम किया तो 16 सितंबर, 2011 को 2 ऐसे आदमी पुलिस के हत्थे चढ़ गए, जिन्होंने पुलिस की प्रारंभिक पूछताछ में स्वीकार कर लिया कि उन्होंने ही इस तेजाब कांड को अंजाम दिया था.

उन्होंने बताया कि उन का निशाना कोई और न हो कर राकेश रेखी था. दोनों लड़कियां तो राकेश के साथ कार में बैठी होने की वजह से लपेटे में आ गई थी, जिस का उन्हें भारी अफसोस हुआ. उन दोनों से की गई पूछताछ से जो खुलासा हुआ वह इस तरह से था कि गांव देसूमाजरा के रहने वाले हरदीप सिंह उर्फ दीपा और जगवंत सिंह उर्फ बिट्टू आपस में गहरे दोस्त थे. बिट्टू अपना निजी कारोबार करता था और दीपा मोहाली के कस्बे कुराली में अपना नशामुक्ति केंद्र चलाता था. एक बार एक औरत अपने शराबी पति के साथ उस की शराब छुड़ाने की दरकार को ले कर दीपा के नशामुक्ति केंद्र आई. वह औरत इतनी खूबसूरत थी कि पहली ही नजर में हरदीप उर्फ दीपा का उस पर दिल आ गया. खूबसूरती के अनुरूप उस का नाम भी निहायत खूबसूरत था— लावण्या.

हरदीप अभी कुंवारा था और लावण्या शादीशुदा थी. उस से बात करने के बाद हरदीप अपने दिल पर काबू नहीं रख सका. लावण्या तो जैसे सीधे उस के दिल में उतर कर उस के तनमन को सराबोर कर गई थी.  उस के पति को हरदीप ने अपने नशामुक्ति केंद्र में भरती कर लिया. इस के बाद वह लावण्या से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगा. उसे विश्वास में लेने के लिए उस ने उसे यह गारंटी दे दी थी कि आने वाले चंद महीनों में वह उस के पति में इतना सुधार कर देगा कि वह कभी शराब को हाथ नहीं लगाएगा. हरदीप की बात सुन कर लावण्या बहुत खुश हुई. बाद में वह 4-5 दिन पर पति के हालचाल जानने के लिए उस के नशामुक्ति केंद्र आने लगी. बीच में भी वह फोन कर के हरदीप से पति की जानकारी लेती रहती थी.

इस तरह लावण्या और हरदीप एकदूसरे के करीब आते गए. नशेड़ी पति के बजाय उस का झुकाव हरदीप की तरफ बढ़ता गया. लावण्या राकेश लेखी की कंपनी में काम करती थी. लावण्या का पति पुराना नशेड़ी था. इसलिए उस का नशा इतनी जल्दी नहीं छूट सकता था. इसलिए हरदीप को भरोसा था कि इस बीच वह लावण्या को अपने प्रेमजाल में फांस कर उस के पति से तलाक दिलवा कर उसे अपनी बना लेगा. इस तरह दोनों का मिलनाजुलना जारी रहा. लावण्या ने एक दफा हरदीप को मुलाकात का समय दे दिया. हरदीप निश्चित जगह पर उस का इंतजार करने लगा. काफी देर इंतजार के बाद भी वह उस से मिलने नहीं आई. हरदीप ने जब उसे फोन किया तो उस का फोन भी स्विच्ड औफ मिला. इस से हरदीप को गुस्सा आ गया.

अगले दिन लावण्या ने ही हरदीप को फोन कर के मुलाकात न हो पाने की मजबूरी बताई. उस ने कहा कि उस का बौस राकेश रेखी मां चिंतपूर्णी देवी मंदिर जाता है तो कंपनी के कुछ कर्मियों को अपने साथ ले जाता है. इस के लिए कोई इनकार नहीं करता. इस दफा उस ने एकदम अंतिम समय पर उसे साथ चलने को कहा. वह उसे मना नहीं कर पाई और अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर उस के साथ चली गई. अभी तक तो हरदीप को अपनी प्रेमिका लावण्या पर नाराजगी थी. पर जब उसे पता चला कि इस में गलती लावण्या की नहीं, बल्कि उस के बौस राकेश रेखी की है तो उस का खून खौल उठा. राकेश जब भी कहीं बाहर जाते तो लावण्या को अपने साथ जरूर ले जाते थे.

इस से हरदीप राकेश को अपना जानी दुश्मन समझने लगा. मन ही मन उन्हें सबक सिखाने की ठान ली. इस बारे में अपने खास दोस्त जगवंत सिंह बिट्टू से बात की तो वह उस का साथ देने को तैयार हो गया. दोनों ने राकेश को सबक सिखाने के लिए एक फूलपू्रफ योजना बना ली. हरदीप ने मोहाली की एक दुकान से तेजाब खरीदा. फिर उसे ऊपर से कटी हुई कैन में डाल लिया, ताकि वह आसानी से डाला जा सके. फिर योजना को अंजाम देने का मौका ढूंढने लगा. उसे पता चला कि पहली सितंबर को राकेश ने चिंतपूर्णी देवी जाने का प्रोग्राम बनाया है और इस बार वह लावण्या के बजाय अन्य लोगों को ले जा रहे हैं.

हरदीप औफिस से राकेश के निकलने का इंतजार करने लगा. वह मौका उसे पैट्रोल पंप पर उस समय मिल गया, जब राकेश ने पैट्रोल के पैसे देने के लिए खिड़की खोली. लेकिन जैसे ही उस ने राकेश को निशाना बना कर तेजाब फेंका, राकेश ने अपना चेहरा पीछे हटा लिया, जिस से निशाना अगली सीट पर बैठी स्वातिका बन गई. राकेश के बजाय दोनों युवतियों के जख्मी होने का हरदीप को बहुत अफसोस हुआ. दोनों अभियुक्तों से पूछताछ पूरी कर पुलिस ने उन्हें अदालत पर पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

उधर अस्पताल में भरती देहरादून की रहने वाली स्वातिका की हालत बिगड़ती जा रही थी. इन्फैक्शन बढ़ जाने के कारण 19 सितंबर को उस की अस्पताल में ही मौत हो गई. उस की मौत हो जाने के बाद पुलिस ने इस केस में धारा 302 भी बढ़ा दी. तेजाब की वजह से राकेश रेखी की एक आंख की रोशनी चली गई और उन के जिस्म पर इतनी सर्जरी हुई कि इस की गिनती उन्हें भी नहीं मालूम. बिना सहारे के वह कहीं आजा भी नहीं सकते. 90 दिनों के भीतर पुलिस ने दोनों अभियुक्तों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर इलाका मैजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर यह केस मोहाली के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश परमिंदरपाल सिंह की अदालत में चला.

विद्वान न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को तमाम तवज्जो दे कर सुना और सभी साक्ष्यों को विधिपूर्वक जांचापरखा. अभियोजन पक्ष की ओर से 48 गवाहों ने अपने बयान अदालत में दर्ज करवाए. 27 मई, 2015 को इस केस का फैसला सुना दिए जाने की उम्मीद थी. दोनों अभियुक्तों को सुबह ही अदालत में बैठा दिया गया था. उस दिन इस चर्चित केस की सुनवाई कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच हुई. अदालत के भीतरबाहर दोनों पक्षों की हिफाजत के लिए बाऊंसरों की भरमार थी. पुलिस द्वारा भी अदालत में आनेजाने वाले लोगों पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. किसी को भी बिना पर्याप्त चैकिंग व पूछताछ के भीतर नहीं जाने दिया जा रहा था. राकेश रेखी अभी तक भी पूरी तरह ठीक नहीं हुए थे. वह अपने वकीलों के साथ अदालत में हाजिर थे.

सक्षम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश परमिंदरपाल सिंह ने उस दिन दोनों अभियुक्तों को धारा 302 एवं 307 का दोषी करार देते हुए 29 मई को सजा सुनाए जाने की बात कही. तब तक के लिए दोषियों को वापस जेल भिजवाने के आदेश दिए. 3 पुलिसकर्मी दोनों अभियुक्तों को ले कर कोर्ट रूम से बाहर निकले. वहां मीडिया के कुछ लोग खड़े थे, जिन्हें देखते ही दोनों अभियुक्तों ने पुलिस वालों से अपने हाथ छुड़वा कर मीडियाकर्मियों पर ही हमला बोल दिया. इस हमले में फोटो जर्नलिस्ट अमित वालिया की इन्होंने काफी पिटाई कर दी. बाद में इस पत्रकार ने इस संबंध में न केवल पुलिस को शिकायत दी, बल्कि अदालत को भी घटना के बारे में लिख कर दिया.

बहरहाल, 29 मई, 2015 को विद्वान एवं सक्षम जज परमिंदरपाल सिंह ने हरदीप सिंह उर्फ दीपा व जगवंत सिंह उर्फ बिट्टू को उक्त केस में ताउम्र कैद की सजा के अलावा 5-5 लाख रुपयों का जुरमाना भी किया. इस राशि में 4.60 लाख रुपए मृतका के परिजनों व 4.60 लाख राकेश रेखी को अदा करने के साथ 80 हजार रुपए सरकारी खजाने में जमा कराने के आदेश दिए. 29 मई, 2015 को दोनों अभियुक्तों को सजा सुनाई जानी थी. उस दिन मोहाली अदालत का परिदृश्य बाकी दिनों से एकदम अलग था. चारों तरफ पुलिस ही पुलिस नजर आ रही थी. दोनों अभियुक्तों के परिजन व अनेक दोस्त भी वहां पहुंचे थे. राकेश की हालत दयनीय थी, इस के बावजूद भी 50 बाउंसरों के घेरे में वहां आए हुए थे. वह अदालत के फैसले से बहुत खुश हुए.

उन का कहना था कि जिस लड़ाई को वह पिछले 4 सालों से जारी रखे हुए थे, उस का परिणाम संतोषजनक निकला. जिन लोगों ने एक युवती की जान लेने के साथ उन्हें जिंदा लाश बना कर रख दिया, उसे देखते हुए ऐसी सख्त सजा उन्हें मिलनी ही चाहिए थी. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

लावण्या नाम परिवर्तित है.

Gorakhpur Crime: जानवर सी सोच वाला आदमी

Gorakhpur Crime: डा. पूनम और डा. धन्नी कुमार जो भी कर रहे थे, उदयसेन के भले के लिए कर रहे थे, लेकिन भाई और भाभी की अच्छाई भी उसे बुरी लगी. इस के बाद खुन्नस में उस ने जो किया, अब शायद उस की पूरी जिंदगी जेल में ही बीतेगी  गोरखपुर की अदालत संख्या-3 में अपर सत्र न्यायाधीश श्री पुर्णेंदु कुमार श्रीवास्तव कीअदालत में 4 हत्याओं का आरोपी उदयसेन गुप्ता फैसला सुनने के लिए कठघरे में खड़ा हुआ तो उस के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी. सरकारी वकील जयनाथ यादव जहां सामने कठघरे में खड़े मासूम से दिखने वाले उदयसेन को शातिर अपराधी बता कर अधिक से अधिक सजा देने की गुहार लगा रहे थे, वहीं बचाव पक्ष के वकील रामकृपाल सिंह उसे निर्दोष बताते हुए साजिशन फंसाए जाने की बात कर रहे थे.

इस मामले में क्या फैसला सुनाया गया, यह जानने से पहले आइए हम यह जान लें कि यह उदयसेन गुप्ता कौन है और उस ने 4 निर्दोष लोगों की हत्या क्यों की? हत्या जैसा जघन्य अपराध करने के बावजूद उसे अपने किए पर मलाल क्यों नहीं था? दिल दहला देने वाली इस कहानी की बुनियाद 12 साल पहले पड़ी थी. उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की कोतवाली शाहपुर के बशारतपुर स्थित मोहल्ला रामजानकीनगर में चंद्रायन प्रसाद गुप्ता परिवार के साथ रहते थे. वह विद्युत विभाग में अधिशासी अभियंता थे. उन के परिवार में पत्नी शुभावती के अलावा 4 बच्चे, जिन में बेटी पूनम, बेटा संतोष, बेटी सुमन और बेटा अभय कुमार गुप्ता उर्फ चिंटु थे.

चंद्रायन प्रसाद के बच्चे समझदार थे, सभी पढ़ने में भी ठीक थे. पूनम पढ़लिख कर डाक्टर बन गई तो उस से छोटा संतोष बीटेक की पढ़ाई करने दिल्ली चला गया. पूनम के डाक्टर बनने के बाद उन्होंने जिला कुशीनगर के फाजिलनगर के रहने वाले डा. धन्नी कुमार गुप्ता के साथ उस का विवाह कर दिया. इस के बाद घर में मात्र 4 लोग ही रह गए. उस समय सुमन गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमएससी कर रही थी तो अभय जुबली इंटर कालेज में बारहवीं में पढ़ रहा था. परिवार के दिन हंसीखुशी से कट रहे थे. 28 दिसंबर, 2006 को पूनम मांबाप का हालचाल जानने के लिए सुबह से ही फोन कर रही थी, लेकिन न मोबाइल फोन उठ रहा था और न ही लैंडलाइन. धीरेधीरे 10 बज गए और फोन नहीं उठा तो पूनम को चिंता हुई.

उस ने दिल्ली में बीटेक कर रहे छोटे भाई संतोष को फोन कर के पूरी बता कर कहा कि वह फोन कर के पता करे कि घर में कोई फोन क्यों नहीं उठा रहा है?

‘‘ठीक है, अभी पता कर के बताता हूं कि क्या बात है?’’ संतोष ने कहा और पिता के मोबाइल तथा घर के नंबर पर फोन किया. जब उस का भी फोन किसी ने रिसीव नहीं किया तो उस ने मोहल्ले के अपने परिचित प्रशांत कुमार मिश्रा को फोन कर के अपने घर भेजा कि वह पता कर के बताए कि घर वाले फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं. संतोष के कहने पर प्रशांत अपने साथी सोनू के साथ उस के घर पहुंचा और बाहर से जोरजोर से आवाज लगाने लगा. उस की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग भी इकट्ठा हो गए. कई बार आवाज लगाने पर भी अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो दोनों चारदीवारी फांद कर अंदर जा पहुंचे. बाहर बरामदे से कमरे के अंदर उन्हें जो भयानक दृश्य दिखाई दिया, उस से वे कांप उठे. मकान के अंदर चंद्रायन प्रसाद गुप्ता, उन की पत्नी शुभावती, बेटी सुमन और बेटा अभय खून से लथपथ पड़े थे.

प्रशांत ने घटना की सूचना मोबाइल फोन से संतोष को दी. घर के सभी लोगों की हत्या की बात सुन कर वह सन्न रह गया. उस ने चाचा रवींद्र प्रसाद गुप्ता को फोन किया. वह चौरीचौरा के रामपुर बुजुर्ग गांव में रहते थे. पड़ोसियों ने घटना की सूचना कोतवाली शाहपुर पुलिस को दी तो तत्कालीन कोतवाली प्रभारी कमलेश्वर सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्हीं की सूचना पर एसपी (सिटी) रामचंद्र यादव, सीओ हरिनाथ यादव, डौग स्क्वायड और फिंगर एक्सपर्ट की टीमों के साथ पहुंच गए. जांच में पुलिस ने पाया कि शुभावती और चंद्रायन प्रसाद की सांसे चल रही हैं, जबकि सुमन और अभय की मौत हो चुकी है. पुलिस ने दोनों को अस्पताल भिजवा दिया.

पुलिस ने घटनास्थल और लाशों का बारीकी से निरीक्षण कर के सारे साक्ष्य जुटाने के बाद दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. घटनास्थल की स्थिति से साफ था कि हत्यारों का उद्देश्य सिर्फ हत्या करना था. क्योंकि लूटपाट के लक्षण नहीं दिखाई दे रहे थे. अगर थोड़ीबहुत लूटपाट हुई भी थी तो कोई बताने वाला नहीं था. चंद्रायन प्रसाद का मोबाइल फोन गायब था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटाने के बाद चंद्रायन प्रसाद के भाई रवींद्र प्रसाद की ओर से हत्याओं का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. कोतवाली प्रभारी कमलेश्वर सिंह ने जांच शुरू की. उम्मीद थी कि अगर दोनों में से कोई भी बच गया तो हत्यारों तक पहुंचने में आसानी रहेगी. लेकिन शुभावती ने अगले ही दिन दम तोड़ दिया.

चंद्रायन प्रसाद भी इस हालत में नहीं थे कि वह कुछ बता सकते. 6 महीने बाद नोएडा के एक अस्पताल में चंद्रायन प्रसाद ने भी बेहोशी की हालत में ही दम तोड़ दिया था. इस हत्याकांड के खुलासे के लिए पुलिस की 2 टीमें गठित की गई थीं. जांच में पता चला कि मृतक सुमन को उस की सगी मौसी का बेटा प्यार करता था और वह उस से विवाह करना चाहता था. जबकि सुमन और उस के घर वालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. डेयरी कालोनी में रहने वाली मृतका सुमन की मौसी के बेटे को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. कई दिनों तक पुलिस उस से पूछताछ करती रही, लेकिन पुलिस को उस से काम की कोई बात पता नहीं चली. पुलिस को जब लगा कि वह निर्दोष है तो उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया गया.

घर वालों से पुलिस को कोई उम्मीद नहीं थी. यह हत्याकांड पुलिस के लिए चुनौती बना हुआ था. पुलिस के लिए उम्मीद की किरण चंद्रायन प्रसाद गुप्ता का मोबाइल फोन था. पुलिस उसी के चालू होने की राह देख रही थी. आखिर 19 जनवरी को वह मोबाइल चालू हो गया. पुलिस को सर्विलांस के माध्यम से पता चला कि उस की लोकेशन कुशीनगर के सुकरौली बाजार है. पुलिस ने वहां जा कर सत्यप्रकाश गुप्ता को पकड़ लिया. सत्यप्रकाश से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि यह मोबाइल फोन उस के साले उदयसेन गुप्ता ने उसे दिया था. इस के बाद फाजिलनगर से उदयसेन गुप्ता को हिरासत में ले लिया गया. पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाते ही उस ने कहा, ‘‘आप लोग काफी दिनों बाद सही आदमी तक पहुंचे हैं. मैं ने ही वे हत्याएं की थीं.’’

उदयसेन गुप्ता की बात सुन कर पुलिस दंग रह गई. पुलिस उसे गोरखपुर ले आई. थाने में की गई पूछताछ में उस ने उन हत्याओं के पीछे की जो वजह बताई, उस से साफ हो गया कि उस ने मात्र खुन्नस की वजह से वे हत्याएं की थीं. उस के बताए अनुसार हत्या के पीछे की कहानी कुछ इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला कुशीनगर के फाजिलनगर निवासी चांदमूरत गुप्ता के 3 बेटों में उदयसेन सब से बड़ा था. चांदमूरत काफी रसूख वाले थे. वह अकूत धनसंपदा के मालिक भी थे. उदयसेन शुरू से ही उग्र स्वभाव का था. वह गोरखपुर के मोहद्दीपुर में किराए का कमरा ले कर अकेला ही रहता था और पंडित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर से एमकौम की पढ़ाई कर रहा था.

चंद्रायन प्रसाद गुप्ता की बड़ी बेटी पूनम की शादी इसी उदयसेन गुप्ता के बड़े पिता के बेटे डा. धन्नी कुमार गुप्ता से हुई थी. उदयसेन के पिता 5 भाई थे. पांचों भाइयों का परिवार एक साथ एक में ही रहता था. परिवार में डा. धन्नी कुमार के पिता का काफी मानसम्मान था. उन की मर्जी के बिना कोई काम नहीं होता था. उदयसेन भाभी पूनम का काफी सम्मान करता था, इसलिए वह भी उसे बहुत मानती थीं. पैसे वाले बाप का बेटा होने की वजह से उदयसेन काफी बिगड़ा हुआ था. डा. धन्नी कुमार जब भी गोरखपुर आए, उदयसेन को घर से लाए रुपयों से अपने 4 दोस्तों के साथ मौजमस्ती करते देखा. इस के बाद उन्होंने इस बात की शिकायत अपने चाचा से कर दी. जब ऐसा कई बार हुआ तो उदयसेन को भाई से नफरत होने लगी.

भाई से चिढ़े उदयसेन ने एक दिन भाभी पूनम से कहा कि पापा बंटवारे के लिए कह रहे थे, लेकिन वह बड़े पापा से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि वह अपने अन्य भाइयों से डरते हैं कि कहीं उन के परिवार की हत्या कर के उन की संपत्ति न हड़प लें. पूनम ने यह बात डा. धन्नी कुमार को बताई तो क्षुब्ध हो कर उन्होंने अपने पापा से बात की. तब उन्होंने चांदमूरत को बुला कर उन से बात की. बड़े भाई की बात सुन कर चांदमूरत को जैसे काठ मार गया, क्योंकि उन्होंने इस तरह की कोई बात कही ही नहीं थी. कहने की छोड़ो, इस तरह की बात उन्होंने सोची ही नहीं थी. बेटे की इस बेहूदगी से उन का सिर झुक गया था.

इस के लिए उन्होंने पूरे परिवार के सामने उदयसेन को जलील ही नहीं किया, बल्कि जम कर पिटाई भी की. इस के बाद उस से परिवार वालों से माफी भी मंगवाई. मरता क्या न करता, उदयसेन ने सब से माफी मांगी. लेकिन इस सब से उस ने खुद को काफी अपमानित महसूस किया. उदयसेन गोरखपुर आ गया. उस के साथ जो हुआ था, इस सब के लिए वह डा. धन्नी कुमार और डा. पूनम को दोषी मान रहा था. इसलिए उस ने उन से अपने अपमान का बदला लेने का मन बना लिया. वह उन दोनों की हत्या कर देना चाहता था. उस ने दोनों की हत्या की कई बार कोशिश भी की, लेकिन अपने इस खतरनाक मंसूबे में कामयाब नहीं हुआ.

भैया और भाभी की हत्या करने में असफल होने के बाद उस ने दोस्तों से मदद मांगी. तब उस के दोस्तों ने उसे समझाया कि यह सब जो भी हुआ है, वह पूनम भाभी की वजह से हुआ है, इसलिए सजा उसे ही मिलनी चाहिए. अगर तुम ने उस की हत्या कर दी तो उसे सजा का पता कैसे चलेगा, इसलिए तुम उस के किसी ऐसे को मार दो कि वह जब तक जिंदा रहे, उस की याद में तड़पती रहे. शातिर उदयसेन को पूनम के मायके वालों की याद आ गई. उस ने उस के मायके वालों को निशाने पर लिया और तय कर लिया कि जो भी करेगा, अकेले करेगा. उसे पता था कि पूनम के मायके में मातापिता और एक बहन तथा एक भाई रहता है. लेकिन कभी वह उन के यहां गया नहीं था. योजना बनाने के बाद पहली बार वह 27 दिसंबर, 2006 की शाम उन के यहां पहुंचा.

दामाद का चचेरा भाई था, इसलिए उसे काफी सम्मान दिया गया. बढि़या खाना बना कर खिलाया गया. खाने के बाद बैठक के बैड को खिसका कर एक फोल्डिंग बिछाई गई. फोल्डिंग पर अभय लेटा तो बैड पर उदयसेन सोया. चंद्रायन प्रसाद पत्नी के साथ अपने कमरे में चले गए तो सुमन अपने कमरे में जा कर सो गई. जब सभी सो गए तो उदयसेन उठा और चंद्रायन प्रसाद  के कमरे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी और साथ लाए पेचकस से अभय की हत्या कर दी. नफरत की आग में जल रहे उदयसेन ने अभय की हत्या तो कर दी, पर बाद में उसे खयाल आया कि अब उस की पूरी जिंदगी जेल में कटेगी, क्योंकि पूरे घर को पता है कि इस कमरे में अभय के साथ वही सोया था. खुद को जेल की सलाखों के पीछे जाने से बचाने के लिए उस ने सभी को खत्म करने का मन बना लिया.

इस के बाद उस ने चंद्रायन प्रसाद के कमरे के बाहर की सिटकनी खोली तो खट की आवाज सुन कर अंदर से उन्होंने पूछा, ‘‘कौन है?’’

जवाब में उदयसेन ने कहा, ‘‘बाबूजी, मैं उदयसेन, जरा देखिए तो अभय को न जाने क्या हो गया है?’’

बेटे के बारे में सुन कर चंद्रायन प्रसाद उस के कमरे में पहुंचे और झुक कर देखने लगे, तभी उदयसेन ने पेचकस से उन पर भी हमला कर दिया. वह जोर से चीखे तो उन की इस चीख से शुभावती और सुमन की आंखें खुल गईं. दोनों भाग कर कमरे में आईं तो देखा चंद्रायन प्रसाद फर्श पर पड़े तड़प रहे थे और उदयसेन उन की पीठ पर सवार उन की कनपटी पर पेचकस से वार कर रहा था. मांबेटी के होश उड़ गए. चंद्रायन प्रसाद को बचाने के लिए मांबेटी उदयसेन पर टूट पड़ीं. सुमन उस के बाल पकड़ कर खींचने लगी तो शुभावती कमीज पकड़ कर खींचने लगीं. इस तरह तीनों गुत्थमगुत्था हो गए. उदयसेन को लगा कि उस का बचना मुश्किल है तो उस ने मांबेटी पर भी हमला बोल दिया.

मांबेटी निहत्थी थीं और उस के पास पेचकश था. उसी से उस ने मांबेटी को भी बुरी तरह से घायल कर दिया. वे दोनों भी घायल हो कर फर्श पर गिर पड़ीं तो उस ने एकएक के पास जा कर देखा कि कौन जीवित है और कौन मर गया? चंद्रायन प्रसाद, सुभावती और सुमन की सांसें चल रही थीं. उदयसेन अपने खिलाफ कोई भी सुबूत नहीं छोड़ना चाहता था. उस ने पैंट की जेब से ब्लेड निकाली और चारों का गला काटने की कोशिश की. जब उसे लगा कि चारों मर गए हैं तो उस ने बाथरूम में नहाया, क्योंकि उस के कपड़ों में ही नहीं, शरीर में भी खून लग गया था.

अपने कपड़े उस ने पौलीथिन में रख लिए और अभय के कपड़े पहन कर चारदीवारी फांद कर बाहर आ गया. चलते समय उस ने चंद्रायन प्रसाद का मोबाइल फोन और अलमारी में रखे कुछ रुपए और गहने निकाल कर पौलीथिन में रख लिए थे. रात उस ने रेलवे स्टेशन पर गुजारी. स्टेशन पर जाते हुए उस ने गहने निकाल कर कपड़ों की पोटली महाराजगंज की ओर जा रहे एक ट्रक पर फेंक दी थी. मोबाइल फोन का सिम निकाल कर उस ने रास्ते में फेंक दिया था. रात स्टेशन पर बिता कर सुबह 7 बजे वह मोहद्दीपुर स्थित अपने कमरे पर आ गया. सुबह अखबारों से पता चला कि चंद्रायन प्रसाद बच गए हैं तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. उस ने अस्पताल जा कर उन्हें मारने की कोशिश की, लेकिन पुलिस सुरक्षा सख्त होने की वजह से वह उन तक पहुंच नहीं सका.

उदयसेन गुप्ता ने अपना अपराध स्वीकार कर ही लिया था. पुलिस ने आरोप पत्र तैयार कर के अदालत में दाखिल कर दिया. 9 सालों तक यह मुकदमा चला. पुलिस ने उस के खिलाफ ठोस सबूत पेश किए. उसी का नतीजा था कि उदयसेन को 4 हत्याओं का दोषी ठहराते हुए 30 मार्च, 2015 को आजीवन कारावास के साथ 1 लाख रुपए जुर्माना की सजा सुनाई गई. कथा लिखे जाने तक अभियुक्त उदयसेन जेल में बंद था. उस के वकील रामकृपाल सिंह उस की जमानत के लिए हाइकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे थे. Gorakhpur Crime

कथा अदालत के फैसले पर आधारित.

True Crime Hindi: बेगुनाह

लेखक – एडवोकेट मिर्जा अमजद बेग ,

True Crime Hindi: पुलिस ने मुनीर नवाज को एक लड़की के अपहरण और कत्ल में फंसाने के लिए सारे सुबूत जुटा लिए थे. लेकिन मिर्जा अमजद बेग एडवोकेट ने ऐसा कमाल किया कि वह बरी ही नहीं हो गया बल्कि निर्दोष भी साबित हुआ. वह बूढ़ी औरत झिझकती हुई मेरे दफ्तर में दाखिल हुई. उस के साथ उस की नौजवान बेटी भी थी. दोनों के चेहरों पर परेशानी झलक रही थी. थोड़ी देर पहले मैं ने उन्हें अदालत के बरामदे में एक वकील से बातें करते देखा था. औरत

वकील को कुछ समझाने की कोशिश कर रही थी, जबकि वकील का व्यवहार बहुत ही रूखा और बेगाना सा था. वह उस से जान छुड़ाने की कोशिश कर रहा था. उस समय मैं ने उन की ओर ध्यान नहीं दिया था. कचहरी में तो यह सब होता ही रहता है. औरत भले घर की लग रही थी. उस की बेटी 19-20 बरस की थी. वह काफी सुंदर थी.

‘‘तशरीफ रखें,’’ में ने पेशेवर अंदाज में कहा, ‘‘मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं?’’

दोनों मेज के सामने रखी कुरसियों पर बैठ गईं. औरत ने पूछा, ‘‘मिर्जा अमजद बेग आप ही हैं?’’

‘‘जी हां,’’ मैं ने सिर को जरा सा झुका कर जवाब दिया.

‘‘मुझे किसी ने बताया है कि आप बहुत अच्छे वकील हैं.’’

‘‘बताने वाले की मेहरबानी है. मैं बड़ी मेहनत से मुकदमों की पैरवी करता हूं और मेरे ज्यादातर मुवक्किल मुझ से खुश हो कर लौटते हैं. आप का मामला क्या है?’’

‘‘मेरा बेटा एक झूठे मुकदमे में फंस गया है.’’

मैं ने डायरी खोल ली और उस में जरूरी बातें नोट करने लगा. उस के बेटे का नाम मुनीर नवाज था, उम्र 26 बरस. हाल ही में टैक्सटाइल मिल में अफसर के तौर पर तैनात हुआ था. उस के बाप की मौत हो चुकी थी. एक बहन थी, जो इस समय मेरे सामने बैठी थी. उस का नाम सरोत था और वह बीए फाइनल में पढ़ रही थी. 10 महीने पहले एक सुबह मुनीर कार से दफ्तर जाने के लिए घर से निकला तो रास्ते में पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. वह कार उसे कंपनी ने खरीद कर दी थी और किस्तों में कीमत वसूल कर रही थी. पुलिस ने उस पर अपहरण और हत्या के आरोप लगाए थे. जिस वारदात का आरोप उस पर लगाया गया था, वह उस की गिरफ्तारी से 2 हफ्ते पहले हुई थी.

मौडल कालोनी की रहने वाली एक लड़की, जिस का नाम सनम था, जब एक दूसरी लड़की शकीला के साथ ट्यूशन पढ़ कर घर जा रही थी तो रास्ते में एक कार वाले ने उस का अपहरण कर लिया था. पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी गई थी, लेकिन तत्काल कोई गिरफ्तारी नहीं हुई. अगली सुबह सनम का शव एक वीरान इलाके में पड़ा हुआ पाया गया. उस के शरीर पर चोटों के निशान थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह सनसनीखेज रहस्य खुला कि सनम 2 माह की गर्भवती थी. वारदात के 2 हफ्ते बाद पुलिस ने मुनीर को गिरफ्तार कर लिया. फिर शिनाख्त परेड हुई और सनम की सहेली शकीला ने अपहर्ता के रूप में मुनीर को पहचान लिया.

मुनीर की मां का नाम सबाहत बेगम था. यह सारा किस्सा सुनने के बाद मैं ने सबाहत बेगम से पूछा, ‘‘क्या आप अपने पहले वकील से संतुष्ट नहीं हैं?’’

‘‘उस ने अपना वकालतनामा कैंसिल कर दिया है. अब सरकार ने अपने खर्च पर एक वकील मुहैया किया है, जो केस में बिलकुल दिलचस्पी नहीं ले रहा है.’’

‘‘लेकिन पहला वकील क्यों पीछे हट गया?’’

‘‘जी, बात दरअसल यह है कि हमारी सारी पूंजी खत्म हो गई है. हम ने घर के कीमती सामान और जेवरात बेच दिए हैं. सारी रकम मुकदमे पर खर्च हो गई है.’’ कहतेकहते उस की आवाज भर्रा गई और आंखों में आंसू आ गए, ‘‘मैं ने बड़ी मेहनत से बेटे को तालीम दिलाई थी. जब वह पहली तनख्वाह ले कर घर आया था तो खुशी से मेरी आंखों में आंसू आ गए थे. मैं ने सोचा था कि अब मुसीबतों के दिन खत्म हो गए.

‘‘लेकिन किस्मत में तो अभी और ठोकरें लिखी थीं. मुझे पूरा यकीन है कि मेरे बेटे ने यह जुर्म नहीं किया है. मेरा बेटा ऐसी हरकत कभी नहीं कर सकता. जिस दिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया था, उस के एक महीने बाद उस की शादी होने वाली थी. लेकिन अचानक ही सब कुछ खाक में मिल गया. सारा शहर हमारा दुश्मन हो गया. लड़की वालों ने मंगनी तोड़ दी. मोहल्ले वालों ने हमारे घर आनाजाना बंद कर दिया. रिश्तेदारों ने मुंह फेर लिए.’’

यह सब सुन कर मुझे खयाल आया कि वह मेरी फीस कहां से अदा करेगी? दूसरी बात यह थी कि वादी की दलीलें और सुबूत बहुत मजबूत थे. मां के जज्बात की बात और थी. हर मां को अपना बेटा बेगुनाह नजर आता है.

‘‘बात यह है मैडम कि मैं आम वकीलों से ज्यादा फीस लेता हूं,’’ मैं ने कहा, ‘‘और दूसरी बात यह कि मैं मामला समझ लेने के बाद ही फैसला करूंगा.’’

‘‘आप बेशक समझ लें,’’ सबाहत बेगम ने कहा, ‘‘लेकिन मैं आप को यकीन दिलाती हूं कि मेरा बेटा बेगुनाह है. उस ने यह जुर्म नहीं किया. जरा सोचें, एक माह बाद जिस की शादी होने वाली थी, भला वह ऐसी घिनौनी हरकत कैसे कर सकता है? जहां तक आप की फीस की बात है, मैं आप का पैसापैसा अदा कर दूंगी. इस के लिए आप को थोड़ी मोहलत देनी पड़ेगी. सरोत बीए फाइनल में पढ़ रही है. कुछ महीने बाकी हैं. उस के बाद यह नौकरी कर लेगी.’’

‘‘बात यह है कि मैं फीस हमेशा पेशगी लेता हूं. अगर आप एकमुश्त भुगतान नहीं कर सकतीं तो पेशी के हिसाब से फीस अदा कर सकती हैं.’’

‘‘अभी तो मैं कुछ भी नहीं दे सकती. यकीन करें, कल तक हमारे पास बस के किराए के लिए भी पैसे नहीं थे.’’

‘‘तो मामला अल्लाह पर छोड़ दें. अगर आप का बेटा बेगुनाह है तो जरूर बरी हो जाएगा.’’

सरोत, जो अब तक खामोश बैठी थी, रुआंसी आवाज में बोली, ‘‘क्या आप के अंदर जरा भी हमदर्दी नहीं है या दौलत की तलब ने आप को अंधा कर दिया है? हम आप से खैरात तो नहीं मांग रहे? मुफ्त काम करने के लिए तो नहीं कह रहे? कभी पैसा भूल कर किसी मुसीबतजदा के काम भी आ जाया करें.’’

‘‘बीबी, अदालत में रोजाना सैकड़ों मुसीबत के मारे लोग आते हैं. उन में ज्यादातर ऐसे होते हैं, जो वकील की फीस अदा नहीं कर सकते. हम किसकिस की मदद करें? यह हमारा पेशा है. रोजीरोटी का जरिया है.’’

‘‘जिन सैकड़ों की बात आप कर रहे हैं, उन्हें तो शायद आप के दफ्तर में झांकने की भी हिम्मत नहीं होगी. आप यह बताएं कि साल भर में आप कितने केस इंसानी हमदर्दी के तौर पर लेते हैं? कितने गरीबों की बगैर फीस के इंसाफ दिलाने में मदद करते हैं?’’

‘‘यह मेरा निजी मामला है?’’

‘‘बहस न करो,’’ सबाहत बेगम ने अपनी बेटी से कहा, ‘‘हम झगड़ा करने नहीं आए. उठो, चलें.’’

दोनों उठीं और दरवाजे की ओर चल पड़ीं. दरवाजे के निकट पहुंच कर सरोत ने आशा भरी नजरों से पीछे देखा. उस के चेहरे पर सारी दुनिया की हसरत और निराशा सिमट आई थी. मेरे जी में आया कि उन्हें रोक लूं, लेकिन पता नहीं क्यों मैं ने ऐसा नहीं किया. एक दिन अदालत के बरामदे में पुलिस इंसपेक्टर मजहर हुसैन से मेरा सामना हो गया. मुनीर नवाज के केस की जांच उसी ने की थी. वह बड़ीबड़ी मूंछें रखता था और रौबदाब वाला पुलिस अफसर था. उस समय वह सरकारी वकील नूर मोहम्मद से बातें कर रहा था.

‘‘क्या हालचाल है वकील साहब?’’ मजहर हुसैन मेरे कंधे पर अपना भारी हाथ मारता हुआ बोला, ‘‘सुना है, आप ने डाकुओं और बदमाशों की वकालत करनी शुरू कर दी है?’’

‘‘अब पहले तो मुझे अपने कंधे का एक्सरे कराना पड़ेगा,’’ मैं ने अपना कंधा सहलाते हुए कहा, ‘‘मुझे डर है कि कहीं कोई हड्डी न टूट गई हो.’’

उस ने कहकहा लगाया और मेरे कंधे पर एक और हाथ मारते हुए बोला, ‘‘यार, अच्छा मजाक कर लेते हो.’’

उस ने फिर कहकहा लगाया और मेरे कंधे पर फिर हाथ मारना चाहा तो मैं झुका कर जल्दी से पीछे हट गया. उस ने मुश्किल से अपना कहकहा रोका और मूंछों पर हाथ फेरता हुआ बोला, ‘‘तुम वकीलों ने बहुत तंग कर रखा है. हम डाकुओं और कातिलों को पकड़ कर लाते हैं और तुम लोग कोई न कोई कानूनी नुक्ता निकाल कर उन्हें बरी करवा देते हो.’’

‘‘तुम लोग मुजरिम नहीं पकड़ते, अपना कोटा पूरा करते हो,’’ मैं ने कहा, ‘‘आजकल एक नौजवान मुनीर नवाज तुम्हारी हिरासत में है.’’

‘‘नौजवान नहीं, कातिल है.’’ फिर वह अचानक अदालत के कमरे की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘वह देखो, वह बैठा है तुम्हारा नौजवान कातिल.’’

मैं ने उधर देखा. कमरे के अंदर दीवार के साथ एक परेशानहाल नौजवान खड़ा था. बाल बिखरे हुए, दाढ़ी बढ़ी हुई, लिबास गंदा और सलवटों भरा था. उस के हाथों में हथकड़ी और पांवों में बेडि़यां पड़ी थीं. उस के दाएंबाएं खड़े दो सिपाही सिगरेट पी रहे थे. पास ही सबाहत बेगम और उस की बेटी सरोत भी मौजूद थीं. दोनों पहले से कमजोर नजर आ रही थीं. उन के चेहरे उतरे हुए थे.

‘‘मैं ने सुना है कि तुम इस बदमाश का केस अपने हाथ में लेना चाहते हो?’’ मजहर हुसैन ने पूछा.

‘‘अभी तो नहीं लिया. मगर तुम कहते हो तो ले लेता हूं.’’

‘‘वकील साहब, उस के गले में फंदा पड़ चुका है, बस लीवर दबाने की देर है. अगर मेरी बात पर यकीन न हो तो नूर मोहम्मद से पूछ लो. यह इस केस का वकील है.’’

‘‘बस जी, कुछ पेशियों में फैसला हो जाएगा.’’ नूर मोहम्मद ने कहा.

‘‘और तुम्हारी तरक्की हो जाएगी.’’ मैं ने चिढ़ कर कहा. फिर इंसपेक्टर से पूछा, ‘‘शिनाख्त परेड में कुल कितने आदमी थे?’’

‘‘मुनीर नवाज समेत कुल 5 थे.’’

‘‘बाकी 4 कौन थे? मुजरिम, पुलिस के आदमी या आम पब्लिक के लोग?’’

‘‘आम पब्लिक के आदमी थे.’’

‘‘क्या उन के हुलिए एक जैसे थे या वे एकदूसरे से अलग थे. पूछना तो यों चाहिए कि क्या मुनीर नवाज और उन के हुलिए में फर्क था?’’

मजहर हुसैन ने खौफनाक नजरों से मेरी ओर देखा. फिर बोला, ‘‘तुम यह सवाल किस हैसियत से कर रहे हो?’’

‘‘दोस्ताना तौर पर.’’

‘‘यह सब अदालत के रेकार्ड में मौजूद है.’’

‘‘अच्छा. तो अब फिर अदालत में मुलाकात होगी,’’ मैं ने कहा, ‘‘वैसे अगर तुम इजाजत दो तो मैं मुलजिम से कुछ बातें कर लूं?’’

‘‘तुम उस के वकील नहीं हो. मैं इजाजत नहीं दे सकता.’’

‘‘कर लेने दो यार 2-4 बातें,’’ नूर मोहम्मद ने कहा, ‘‘इस की तसल्ली हो जाएगी.’’

‘‘जाओ, कर लो.’’ मजहर हुसैन ने कहा, लेकिन वह बेचैन नजर आ रहा था.

मैं कमरे में दाखिल हुआ तो सबाहत बेगम और सरोत ताज्जुब से मेरी ओर देखने लगीं.

‘‘बेग साहब, आप?’’ सबाहत बेगम ने कहा.

‘‘मैं आप के बेटे से कुछ बातें करना चाहता हूं. आप ने किसी दूसरे वकील का इंतजाम तो नहीं किया?’’

वह मेरी ओर उम्मीद भरी नजरों से देखने लगी. बोली, ‘‘मैं ने आप के कहने पर मामला अल्लाह पर छोड़ दिया है.’’

मैं ने मुनीर नवाज को अपना परिचय दे कर पूछा, ‘‘क्या तुम सनम को पहले से जानते थे?’’

उस ने ‘नहीं’ में सिर हिला कर कहा, ‘‘मैं ने कभी उस लड़की की शक्ल नहीं देखी थी.’’

‘‘वारदात वाली रात तुम कहां थे?’’

‘‘उस दिन मैं 7 बजे घर पहुंचा था और उस के बाद बाहर नहीं निकला था. मेरी मां और बहन इस बात की गवाह हैं.’’

‘‘अगर तुम घर में थे तो तुम्हारी कार घर के सामने खड़ी रही होगी. तुम्हारे पड़ोसियों ने उसे जरूर देखा होगा.’’

‘‘उस दिन मेरी कार एक मामूली मरम्मत के लिए वर्कशौप में थी.’’

‘‘ओह! क्या तुम ने पुलिस को वर्कशौप के बारे में नहीं बताया?’’

‘‘बताया था. शायद इंसपेक्टर साहब ने वर्कशौप के मालिक से बात भी की थी, लेकिन उस का कहना था कि उसे दिन और तारीख याद नहीं रही. इसलिए वह गवाही नहीं दे सकता.’’

‘‘और कोई खास बात?’’

उस ने कुछ कहने का इरादा किया. फिर दुविधा भरी नजरों से सिपाहियों की ओर देख कर बोला, ‘‘कोई खास बात नहीं है जी सिवाय इस के कि में बेगुनाह हूं. कुछ बातें मैं ने अपनी अम्मी को बताई थीं. आप उन से पूछ लीजिए.’’

‘‘ठीक है,’’ मैं ने कहा, ‘‘अब तुम कोई फिक्र न करो. आज मैं तुम्हारे केस की तारीख ले लेता हूं. अगली तारीख को मैं वकालतनामा दाखिल कर दूंगा.’’

मुनीर नवाज की मां और बहन, जो पास ही खड़ी थीं, अहसानमंद नजरों से मेरी ओर देखने लगीं. थोड़ी देर बाद मैं ने पेशकार से एक महीने की तारीख ले ली और सबाहत बेगम से कहा कि वह मेरे दफ्तर आ जाएं. इंसपेक्टर मजहर हुसैन को मेरी यह हरकत पसंद नहीं आई. लेकिन जाहिर है, वह मुझे रोक नहीं सकता था. एक घंटे बाद, जब मैं 2 पेशियां भुगताने के बाद दफ्तर पहुंचा तो सबाहत बेगम और उस की बेटी को इंतजार करते पाया. सरोत के चेहरे पर बड़ी मासूम सी शर्मिंदगी थी.

‘‘बेग साहब,’’ उस ने हौले से कहा, ‘‘मैं बहुत शर्मिंदा हूं. उस दिन मैं ने आप के साथ बदतमीजी की थी.’’

‘‘खाली शर्मिंदा होने से काम नहीं चलेगा,’’ मैं ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे लिए कोई सजा तजबीज करनी पड़ेगी, लेकिन अभी तो मुकदमे की बात हो जाए.’’

फिर मैं सबाहत बेगम से मुखातिब हुआ, ‘‘मुनीर ने मुझे बताया है कि उस ने आप को कुछ जरूरी बातें बताई थीं.’’

‘‘जी हां, पहली बात तो यह है कि सरकार ने मुनीर का जो वकील तैनात किया है, वह इंसपेक्टर मजहर हुसैन का रिश्तेदार है. दोनों आपस में मिले हुए हैं और मेरे बेटे को सजा दिलवाना चाहते हैं.’’

‘‘यह तो सचमुच बड़ी अहम बात है. अच्छा यह बताइए, क्या आप सनम के घर वालों को जानती हैं?’’

‘‘मैं अपने बेटे की गिरफ्तारी के बाद उस की मां से मिली थी. मैं ने रोरो कर और कसमें खा कर उसे यकीन दिलाने की कोशिश की थी कि मेरा बेटा उस की बेटी का कातिल नहीं है, लेकिन उस ने मेरी बात पर गौर नहीं किया. सिर्फ इतना कहा कि मामला पुलिस के हाथ में है, वह कुछ नहीं कर सकती.’’

‘‘हां, वह सचमुच कुछ नहीं कर सकती. अब फैसला अदालत ही कर सकती है. बहरहाल अगली पेशी पर मैं वकालतनामा दाखिल कर दूंगा और साथ ही सरकारी वकील को फारिग कर देने की सिफारिश भी. इस दौरान मैं कुछ लोगों से मिलना चाहता हूं. इस में आप को मेरी थोड़ी सी मदद करनी पड़ेगी. सब से पहले मैं शकीला से मिलना चाहता हूं, जो इस मुकदमे की अहम गवाह है. उस के अलावा मैं सनम की मां से और उस वर्कशौप के मालिक से भी मिलना चाहता हूं, जिस ने मुनीर की कार मरम्मत की थी.’’

‘‘मैं उन के पते आप को दे सकती हूं. इस के अलावा मुझ से कोई और मदद नहीं हो सकेगी.’’

मैं ने तीनों के पते डायरी में नोट कर लिए और सबाहत बेगम से जरूरी कागजात पर दस्तखत कराने के बाद उन्हें विदा कर दिया. फिर मैं दूसरे मुकदमों की फाइलें देखने लगा.

थोड़ी देर बाद हलकी सी आहट हुई. मैं ने नजर उठा कर देखा तो सरोत झिझकती हुई अंदर दाखिल हो रही थी.

‘‘आप ने फीस के बारे में तो कुछ बताया ही नहीं?’’ उस ने कहा.

‘‘ओह हां, मैं फीस के बारे में तो भूल ही गया था. मैं तुम से बड़ी मामूली सी फीस लूंगा, यही कोई 25 हजार के करीब.’’

‘‘25 हजार! यह तो बहुत ज्यादा है.’’

‘‘ज्यादा है तो ऐसा करते हैं कि फीस कुछ भी नहीं लेते. अब तो ठीक है न?’’

‘‘मुझे हंसी नहीं आएगी,’’ उस ने कहा और उस की आंखों में आंसू तैरने लगे, ‘‘जब से मुनीर भाई गिरफ्तार हुए हैं, मैं हंसना भूल गई हूं.’’

वह सचमुच रोने लगी.

मैं एकदम संजीदा हो गया, ‘‘अरे, मैं तो यूं ही मजाक कर रहा था. फीस की बात उस समय करेंगे, जब तुम्हारे मुनीर भाई बरी हो कर घर पहुंच जाएंगे.’’

‘‘क्या आप को यकीन है कि वह बरी हो जाएंगे?’’ उस ने दुपट्टे से आंसू पोंछते हुए पूछा.

‘‘अदालत के मामलों में कोई बात यकीन के साथ नहीं कही जा सकती. बहरहाल मैं पूरी कोशिश करूंगा. उम्मीद भी है. और देखो, ज्यादा रोया नहीं करो. सेहत खराब हो जाएगी. मुसीबतों का मुकाबला हिम्मत से करना चाहिए.’’

उस ने अपने आंसू पोंछ डाले और बोली, ‘‘जी अच्छा, मैं कोशिश करूंगी.’’ फिर वह कमरे से निकल गई. सोमवार के दिन अदालत के काम निपटाने के बाद मैं कार में बैठ कर मौडल कालोनी में पहुंच गया. सब से पहले मैं ने शकीला के घर पर दस्तक दी. एक अधेड़ औरत ने दरवाजा खोला. उस के बाल स्याह थे और शरीर कुछ मोटा था. उस ने कड़ी नजरों से मेरा जायजा लिया और मेरे आने का मकसद पूछा.

मैं ने अपना परिचय देने के बाद कहा, ‘‘मैं शकीला से कुछ बातें पूछना चाहता हूं.’’

‘‘इस मुसीबत से कब हमारी जान छूटेगी?’’

‘‘उम्मीद है कि जल्दी ही छूट जाएगी.’’

औरत ने अंदर की ओर मुंह कर के आवाज लगाई, ‘‘शकीला..अरी ओ शकीला…इधर आ…यह एक और वकील साहब आए हैं तुम्हारा बयान लेने. कमबख्त को मना भी किया था कि कुछ मत बोल. पुलिस वालों को झख मारने दे. लेकिन इस के दिमाग में इंसाफ का धुआं भरा हुआ था. अरे यहां किसी के साथ कभी इंसाफ हुआ भी है…’’

इतने में एक 17-18 साल की लड़की नंगे पैर दरवाजे के पास आई. उस के बाल बिखरे हुए थे. दुपट्टा कंधे पर लटक रहा था और हाथ में खुली हुई किताब थी. वह एक अल्हड़ सी लापरवाह लड़की लगती थी. उस की शक्ल हूबहू अधेड़ औरत से मिलतीजुलती थी.

‘‘कौन है अम्मी?’’ उस ने पूछा. फिर मेरी ओर देखने लगी.

‘‘कमबख्त दुपट्टा तो ठीक से ओढ़.’’ उस की मां ने कहा, ‘‘पूछें जी, जो कुछ पूछना है.’’

‘‘क्या हम 2 मिनट के लिए अंदर नहीं बैठ सकते?’’ मैं ने कहा.

‘‘हम?’’ औरत ने कंधे के ऊपर से गली में नजर दौड़ाई, ‘‘क्या कोई और भी है आप के साथ?’’

‘‘जी नहीं, मैं अकेला हूं. मेरा मतलब है कि आप और शकीला.’’

‘‘वह कार आप की है?’’

‘‘जी हां, मेरी है.’’

‘‘आ जाइए अंदर.’’ उस ने मेरे दाखिल होने के लिए दरवाजा खोल दिया. यह बात मेरी समझ में नहीं आई कि उस ने कार के बारे में पूछने के बाद मुझे अंदर आने की इजाजत क्यों दी थी. ड्राइंगरूम में बेतरतीबी थी, लेकिन फरनीचर आला था. फर्श पर कालीन भी निहायत खूबसूरत बिछी थी.

‘‘यह घर हमारा अपना है.’’ औरत ने कहा. यह सुन कर शकीला ने मुंह बनाया.

‘‘आप किस के वकील हैं?’’ उस ने पूछा.

‘‘मुनीर नवाज का.’’ मैं ने उत्तर दिया.

‘‘हाय मैं मर गई.’’ शकीला की मां ने कहा, ‘‘आप उस कातिल बदमाश की वकालत कर रहे हैं? उसे तो सरेआम फांसी पर लटकाना चाहिए.’’

‘‘मैडम, मेरी बात का बुरा न मानें. क्या आप ने उसे कत्ल करते देखा था?’’

‘‘लो, यह बात तो सब जानते हैं.’’

‘‘यही तो हमारे समाज में एक बड़ी खराबी है. बगैर तसदीक के फैसला कर देते हैं. पुलिस ने उसे कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार जरूर किया है, लेकिन जब तक उस का जुर्म साबित नहीं हो जाता, उसे कातिल नहीं कहा जा सकता. जब उस का जुर्म साबित हो जाएगा तो वह मुजरिम कहलाएगा.’’

शकीला की मां हाथ हिलाती हुई बोली, ‘‘ए हटो, हमें इन कानूनी चक्करों में दिलचस्पी नहीं है.’’

मैं भी लंबी बात करने के मूड में नहीं था. मैं ने शकीला से कहा, ‘‘मुकदमे में तुम्हारी गवाही अहम है. तुम्हारे बयान पर उसे फांसी की सजा हो सकती है. अगर तुम ने उसे पहचानने में गलती की है या पुलिस के दबाव में आ कर उस के खिलाफ बयान दिया है तो उस का खून तुम्हारे सिर होगा. इसलिए सोचसमझ कर बताओ कि क्या तुम ने सचमुच उसे पहचान लिया था?’’

‘‘बिलकुल वैसा ही लगता था. मैं ने पुलिस को भी यही बयान दिया था कि यह वही लगता है.’’

‘‘वही लगता है और वही है, में बहुत फर्क है. मैं ने अदालत में तुम्हारा बयान पढ़ा है. उस में लिखा है कि तुम ने यकीनी तौर पर मुलजिम को पहचान लिया है. क्या मुनीर नवाज वही आदमी है, जिस ने तुम्हारी सहेली सनम का अपहरण किया था?’’

‘‘मुझे क्या पता जी? थानेदार ने जिस तरह मुझे समझाया था, मैं ने वैसा ही बयान दे दिया.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ अगर तुम पर फैसला छोड़ दिया जाए तो क्या तुम मुनीर नवाज को फांसी की सजा दोगी?’’

‘‘तौबा…तौबा…’’ उस ने कानों पर हाथ लगाया, ‘‘मैं क्यों दूंगी उसे फांसी की सजा? हो सकता है, कातिल कोई और हो?’’

‘‘हूं, गोया तुम्हें पूरा यकीन नहीं है कि सनम का अपहरण करने वाला वही है.’’

‘‘हां, यों ही समझ लें, लेकिन आप यह चाहते हैं कि मैं यह बात अदालत के सामने भी कहूं तो यह नामुमकिन है. मैं अपना बयान बदल नहीं सकती. वकील ने मुझे बताया था कि अगर मैं ने अपना बयान बदला तो मैं अदालत के अपमान की दोषी बनूंगी. थानेदार ने भी यही कहा था.’’

‘‘तुम्हें गलत बताया गया है. बयान बदलने से अदालत का अपमान नहीं होता. आमतौर पर होता यह है कि पुलिस जब किसी के खिलाफ मुकदमा तैयार करती है तो वह चाहती है कि गवाह भी उस की तसदीक करे. इस के लिए कई बार वह गवाहों पर दबाव भी डालती है, इसलिए अगर कोई गवाह मुकर जाए तो अदालत को ताज्जुब नहीं होता.’’

‘‘कुछ भी हो,’’ शकीला की मां ने कहा, ‘‘अब हम अपनी बेटी को अदालत में नहीं भेजेंगे. हम क्यों ख्वाहमख्वाह पुलिस की दुश्मनी मोल लें.’’

‘‘एक बात और पूछना चाहता हूं,’’ मैं ने कहा, ‘‘जब सनम को अपहरण करने वाले ने उठा कर या घसीट कर अपनी कार में डाला था तो उस ने कोई विरोध किया था या शोर मचाया था?’’

‘‘दरअसल, उस वक्त उसे कुछ पता ही नहीं चला. मुझे भी उसी वक्त अहसास हुआ, जब कार चल दी.’’

‘‘शुरू से पूरी बात बताओ.’’

‘‘वह कार हमारे पीछे से आई और करीब पहुंच कर धीमी हो गई. ड्राइवर ने मुसकरा कर सनम की ओर देखा और हौले से उस का नाम पुकारा.’’

यह सुनते ही मैं उछल पड़ा, ‘‘क्या कहा? ड्राइवर सनम का कोई जानने वाला था?’’

‘‘हां, लेकिन सनम ने उस की ओर कोई ध्यान नहीं दिया और सीधी चलती रही. कार भी धीरेधीरे हमारे साथ चलती रही. ड्राइवर ने सनम से कहा, ‘जरा सुनो तो.’ और साथ ही उस की बाहें पकड़ लीं. सनम ने गुस्से से कहा, ‘छोड़ दो, वरना शोर मचा दूंगी.’ ड्राइवर ने कहा, ‘मचाओ शोर. देखूं तो सही, तुम्हारे अंदर कितनी हिम्मत है.’ इस पर सनम रुक गई. कार भी रुक गई. सनम ने कहा, ‘बोलो, क्या चाहते हो?’ ड्राइवर ने दरवाजा खोला और सनम को अचानक अंदर खींच लिया. उस ने सनम को बड़ी बेरहमी से अपनी गोद में लिटा लिया. दरवाजा बंद किया और जल्दी से कार आगे बढ़ा दी.’’

‘‘और तुम यह सब कुछ चुपचाप देखती रहीं?’’

‘‘शुरू में मैं यही समझती रही कि सनम उस को जानती है. बातों के अंदाज से यही जाहिर होता था कि वह उस से रूठी हुई है, लेकिन जब उस ने जबरदस्ती सनम को अंदर खींच लिया तो मैं चीखने लगी.’’

‘‘तुम ने यह सब कुछ पुलिस को क्यों नहीं बताया?’’

‘‘मैं ने सब कुछ बताया था. लेकिन अखबार वालों को नहीं बताया, क्योंकि सनम की अम्मी ने मुझे मना कर दिया था. उन्होंने कहा था कि इन बातों से सनम की बदनामी होगी.’’

शकीला के लिखित बयान में इन बातों का जिक्र नहीं था. निश्चय ही पुलिस ने इन बातों को गोल कर दिया था और इस का मकसद इस के सिवा और कुछ नहीं लगता था कि मुनीर नवाज हत्या के आरोप से बच न सके.

‘‘कार का रंग क्या था?’’

‘‘कार का रंग हलका बादामी था. लेकिन पुलिस का कहना है कि रंग के मामले में मुझे गलतफहमी हुई है. असल में कार का रंग हलका सब्ज है.’’

मैं ने कुछ प्रश्न किए, फिर जाने के लिए खड़ा हो गया, ‘‘शुक्रिया!’’ मैं ने कहा, ‘‘मेरे साथ जो बातचीत हुई है, उस का जिक्र किसी से न करें.’’

‘‘किसी दिन अपने बीवीबच्चों को ले कर आना.’’ शकीला की मां ने कहा.

‘‘अभी इस मुसीबत से बचा हुआ हूं.’’

‘‘तो फिर अपनी अम्मी को ले कर आना.’’

शकीला ने अपनी मां को कोहनी मारी. तब मुझे अहसास हुआ कि शकीला की मां ने बीवीबच्चों को साथ लाने के लिए क्यों कहा था. दरअसल वह यह जानना चाहती थीं कि मैं शादीशुदा हूं या नहीं. 15 मिनट बाद मैं सनम के घर का दरवाजा खटखटा रहा था. दरवाजा खुला तो मेरे सामने 2 लड़कियां खड़ी थीं. उन की उम्र 12 और 15 बरस के बीच थी.

‘‘जी, आप किस से मिलना चाहते हैं?’’ दोनों ने एक साथ पूछा और फिर एकदूसरे को देख कर हंसने लगीं. इतने में एक 7-8 साल की लड़की ने दोनों के बीच से सिर निकाला.

‘‘घर में कोई बड़ा नहीं है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘इन से बड़ी 2 और हैं.’’ छोटी लड़की ने कहा.

‘‘माशाअल्लाह!’’ मैं ने कहा, ‘‘सब मिला कर 5 बहनें हुईं. खूब रौनक रहती होगी.’’

‘‘जब साथ थीं तो खूब ऊधम मचता था.’’ छोटी ने कहा, ‘‘लेकिन सब से बड़ी की शादी हो गई और उस से छोटी अल्लाह को प्यारी हो गई.’’

दोनों बड़ी लड़कियां दोबारा खीखी करने लगीं. तभी एक बूढ़े आदमी का चेहरा लड़कियों के सिरों के ऊपर से प्रकट हुआ. उस के बाल आधे सफेद और आधे काले थे. सफेद इसलिए थे कि वह बालों में रंग लगाना भूल गया था.

‘‘किस से मिलना चाहते हो मियां?’’ उस ने पूछा.

‘‘मेरा नाम अमजद बेग है और मैं वकील हूं.’’

‘‘हमें किसी वकील की जरूरत नहीं है.’’

‘‘क्या आप सनम के अब्बा हैं?’’

उस ने ‘हां’ में जवाब दिया.

‘‘मैं आप की बेटी के साथ पेश आने वाले हादसे के बारे में कुछ बातें करना चाहता हूं.’’

‘‘हम सब कुछ पुलिस को बता चुके हैं.’’

‘‘ए कौन है?’’ पीछे से किसी औरत की आवाज आई. लम्हा भर बाद एक दरमियाने कद की औरत बूढ़े के दाईं ओर से प्रकट हुई. वह बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रख चुकी थी, फिर भी उस ने खासा चुस्त लिबास पहन रखा था और खूब बनीसंवरी थी. उस के बाल हलके रंग के थे. मैं ने अंदाजा लगाया कि वह बालों में रंग लगाती थी. उस ने कल्ले में पान दबा रखा था और लगातार मुंह चला रही थी. मेरे सामने खासा दिलचस्प नजारा था. 3 लड़कियां, बड़े मियां और बेगम साहिबा. में ने फिर अपना मकसद बयान किया, लेकिन बड़े मियां बात करने को तैयार नहीं हुए.

‘‘क्या आप यह पसंद करेंगे कि कोई बेगुनाह फांसी पर चढ़ जाए?’’

‘‘यह मामला अब पुलिस के हाथ में है. अदालत जिसे चाहे, फांसी पर लटकाए. हमें इस से कोई सरोकार नहीं.’’

‘‘क्या आप यह पसंद करेंगे कि आप की बेटी का कातिल दनदनाता फिरे?’’

‘‘यह तो हम हरगिज बरदाश्त नहीं करेंगे.’’ इस बार औरत ने जवाब दिया.

‘‘तो फिर आप को मेरी मदद करनी चाहिए.’’

दोनों मियांबीवी ने आपस में सलाहमशविरा किया और कुछ हीलहुज्जत के बाद मुझे अंदर ड्राइंगरूम में ले गए. बूढ़े का नाम इबरार हुसैन था. वह रिटायर्ड जिंदगी बिता रहा था. उस के 7 बेटियां और 1 बेटा था. एक बेटी की शादी हो चुकी थी और एक बेटी सनम कुछ समय पहले कत्ल हो गई थी. बेटा अमेरिका में था और टेक्नोलौजी की एक कंपनी में नौकर था. 5 बेटियां घर में थीं और वह अपनी मौजूदगी का पूरापूरा सुबूत दे रही थीं.

मैं ने पूछा, ‘‘जिस आदमी को पुलिस ने आप की बेटी के कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार किया है, उस का नाम मुनीर नवाज है. क्या आप उसे जानते हैं?’’

‘‘हम ने तो कभी उस मनहूस की शक्ल भी नहीं देखी.’’

‘‘कुछ दिनों पहले मैं मुनीर नवाज से अदालत में मिला हूं. वह एक जहीन और काबिल नौजवान है. जिस दिन उसे गिरफ्तार किया गया था, उस के एक महीने बाद उस की शादी होने वाली थी. लेकिन अब मंगनी टूट गई है.’’

‘‘तुम यह सब हमें क्यों बता रहे हो?’’ इबरार हुसैन ने कहा, ‘‘अगर वह कातिल नहीं है, तो बरी हो जाएगा.’’

‘‘बात यह है जनाब कि अदालत में बात दलीलों और गवाहों के बल पर होती है. अगर एक बेगुनाह के हक में गवाही देने वाला कोई नहीं होगा तो वह कानून के फंदे में जरूर फंस जाएगा. आप को हमारी पुलिस का हाल भी खूब मालूम है. कई बार मुजरिमों से सौदेबाजी कर के उन्हें छोड़ देते हैं और बेगुनाहों को अंदर करा देते हैं.’’

‘‘देखो मियां, मैं हूं बूढ़ा आदमी. मैं पुलिस की दुश्मनी मोल ले कर अपने आखिरी दिन खराब नहीं करना चाहता. इसीलिए मैं ने अपनी तरफ से कोई वकील भी मुकर्रर नहीं किया.’’

‘‘तुम चुप रहो जी,’’  बेगम इबरार ने कहा, ‘‘जवानी में तुम ने कौन सा तीर मार लिया था? चूहे की तरह सारी जिंदगी बिता दी. इतनी अच्छी पोस्ट पर कोई और होता तो बिल्डिंगें खड़ी कर देता. घर के सामने चारचार कारें खड़ी होतीं, लेकिन तुम तो 4 बेटियों की शादी भी न कर सके.’’

‘‘खुदा का शुक्र है कि मैं ने तुम्हारी बातों में आ कर अपना परलोक खराब नहीं किया.’’

‘‘परलोक..परलोक.. तुम अपनी जन्नत खरी कर लो. बाकी कुनबा चाहे सारी उम्र आग में जलता रहे. खुदा ने बीवीबच्चों के हक भी मुकर्रर कर रखे हैं.’’

‘‘हुंह!’’ इबरार हुसैन उठता हुआ बोला, ‘‘तुम हमेशा ऊपर की तरफ देखती हो और जो इंसान ऊपर की तरफ देखता है, वह कभी खुदा का शुक्रगुजार बंदा नहीं बन सकता. मुझे तो खुदा सिर्फ इतनी बात पर जन्नत में दाखिल कर देगा कि मैं ने तुम जैसी औरत के साथ जिंदगी बिता दी.’’ फिर वह तेजी के साथ कमरे से निकल गया.

‘‘बिल में घुस जाओ जा कर. चूहों के लिए जन्नत में कोई जगह नहीं होती.’’ बेगम इबरार उस के जाने के बाद भी बोलती रहीं.

‘‘दिल के बुरे नहीं हैं,’’ बेगम इबरार एकदम बदले हुए मूड में बोलीं, ‘‘बस जरा डरपोक हैं. दुनिया की आंखों में आंखें डाल कर बात नहीं कर सकते.’’

‘‘बेगम इबरार,’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं एक बहुत जाती किस्म का सवाल करना चाहता हूं. उम्मीद है कि आप बुरा नहीं मानेंगी. आप चूंकि रोशनखयाल हैं, इसलिए मुझे यकीन है कि आप की बेटियां आप को सब कुछ बता देती होंगी.’’

वह अपनी तारीफ सुन कर खुश हो गई. बोली, ‘‘आप बड़ी खुशी से सवाल करें.’’

‘‘मैं ने पता लगाया है कि सनम की किसी नौजवान से दोस्ती थी और वह उस के साथ शादी करना चाहती थी. क्या आप उस नौजवान को जानती हैं?’’

बेगम इबरार ने जवाब देने में थोड़ा संकोच किया. फिर जरा पास आ गई और अपनी आवाज धीमी करती हुई बोली, ‘‘पुलिस ने भी मुझ से यह सवाल किया था, मैं ने उन्हें टाल दिया था. लेकिन मैं आप से कुछ नहीं छिपाऊंगी. सनम बड़ी अच्छी लड़की थी. वह मुझे सब कुछ बता देती थी. अपनी मौत से कुछ हफ्ते पहले उस ने मुझे बताया था कि गड़बड़ हो गई है. लड़का बहुत ऊंचे खानदान से ताल्लुक रखता था और उस ने सनम को यकीन दिलाया था कि वह अपने मांबाप को राजी कर के जल्दी ही उस के साथ शादी कर लेगा, लेकिन उस ने यह भी कहा था कि अगर मांबाप राजी न हुए तो वह सिविल मैरिज कर लेगा. मैं ने भी इस बात की इजाजत दे दी थी. आप खुद सोचें कि इस बदहाली के दौर में 7 बेटियों की शादी करना कोई आसान काम तो नहीं है.’’

मैं ने महसूस किया कि सनम की तबाही की आधी जिम्मेदारी इस औरत पर आती है. उस ने बेटियों के बोझ से छुटकारा पाने के लिए आसान राह तलाश कर ली थी.

‘‘उस नौजवान का नाम क्या था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘सनम ने सिर्फ एक बार उस का नाम बताया था, लेकन मेरी बदकिस्मती देखिए कि मुझे वह नाम याद नहीं रहा. दिमाग पर जोर देती हूं तो यों लगता है कि उस का नाम कहीं खो गया है. दिमाग में आतेआते रह जाता है. काश, मैं उस के मांबाप का पता ही पूछ लेती.’’

‘‘वह नौजवान कभी आप के घर नहीं आया?’’

‘‘यह जो अल्लाह वाले अभी यहां से उठ कर गए हैं न, यह लड़कियों के मामले में बहुत तंगनजर हैं. अगर किसी दिन कोई लड़का हमारी किसी बेटी के हवाले से इस घर में दाखिल हुआ तो उस दिन यह जन्नत के रखवाले इस घर को जहन्नुम का नमूना बना देंगे. वैसे तो बहुत बुजदिल हैं, लेकिन इस मामले में शेर बन जाते हैं. शेर क्या, वहशी बन जाते हैं.’’

‘‘क्या सनम ने अपनी किसी बहन को भी नाम नहीं बताया?’’

‘‘इस मामले में ये एकदूसरी पर बिलकुल भरोसा नहीं करतीं. इन के अंदर आपसी जलन बहुत है.’’

कुछ अन्य सवालों के बाद मैं जाने के लिए खड़ा हो गया, लेकिन बेगम इबरार चाय बना कर ले आई. बातों के दौरान उस ने कहा कि अगर मुनीर नवाज बेकुसूर साबित हुआ और बरी हो गया तो वह उस की रुसवाई का बदला चुकाने के लिए अपनी एक बेटी की शादी उस से कर देगी. उस ने मुनीर की मां का पता भी मुझ से ले लिया और कहा कि वह उस से मिलने जाएगी. वहां से विदा हो कर मैं उस वर्कशौप पहुंचा, जहां मुनीर नवाज ने अपनी कार सर्विस के लिए दी थी. वर्कशौप के मालिक का नाम नबी बख्श था. उस ने मेरे पूछने पर बताया कि कुछ समय पहले मुनीर नवाज की मर्सिडीज कार उस की वर्कशौप में आई थी.

साथ ही उस ने रजिस्टर निकाल कर दिखाया, जिस में कार का नंबर और तारीख दर्ज थी. यह वही तारीख थी, जिस तारीख को सनम का अपहरण हुआ था. उस ने बताया कि इंसपेक्टर मजहर हुसैन ने भी उस रजिस्टर को देखा था और कुछ सवाल भी किए थे.

‘‘क्या उस ने तुम्हारा तहरीरी बयान नहीं लिया?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं, उस ने कहा था कि अगर जरूरत पड़ी तो मुझे अदालत में गवाही देने के लिए आना पड़ेगा. लेकिन उस के बाद न कोई सम्मन आया और न ही किसी ने गवाही के लिए बुलाया.’’

मैं ने नबी बख्श से पूछा कि उस के पास कभी कोई ऐसा नौजवान अपनी मर्सिडीज कार की मरम्मत कराने तो नहीं आया, जिस की शक्ल मुनीर नवाज से मिलतीजुलती रही हो. लेकिन नबी बख्श का जवाब नहीं में था. मैं उसी इलाके की कुछ अन्य वर्कशौप में गया, मगर कुछ पता नहीं चल पाया. पुलिस ने जो केस तैयार किया था, उस में कई खामियां थीं. मसलन, शकीला को यकीन था कि कार का रंग बादामी था. वारदात वाले दिन मुनीर नवाज की कार वर्कशौप में थी. यह बात नबी बख्श के रेकार्ड में मौजूद थी, लेकिन उसे गवाही के लिए नहीं बुलाया गया था. जिस नौजवान के साथ सनम के ताल्लुक थे, उसे सामने लाने की कोई कोशिश नहीं हुई थी.

शकीला के बयान के अनुसार उस ने मुलजिम की यकीनी तौर पर शिनाख्त नहीं की थी. एक खास बात उस के बयान से यह पता चलती थी कि अपहरण करने वाले ने सनम का नाम ले कर पुकारा था, जिस का मतलब था कि वह उसे जानता था, जबकि मुनीर नवाज का सनम से परिचय का कोई भी सुबूत नहीं मिला था. अगली पेशी पर मैं ने वकालतनामा दाखिल कर दिया और अदालत को केस में पाई जाने वाली कुछ खामियों के बारे में बताया. जब मैं खामियों को स्पष्ट कर रहा था तो मैं ने महसूस किया कि जज के रवैए में एकदम बदलाव आ गया था. मैं ने देखा कि सफाई वकील और इंसपेक्टर मजहर हुसैन के चेहरे पर बड़ी सख्त उलझन छा गई थी.

जज ने वर्कशौप के मालिक नबी बख्श के नाम सम्मन जारी करने का आदेश दे दिया. अदालत से बाहर आ कर सबाहत बेगम ने मुझे बहुत सारी दुआएं दीं और एक बार फिर फीस के बारे में दिलासा दी. सरोत अहसानमंद नजरों से मेरी ओर देखती रही, लेकिन बोली कुछ नहीं. कुछ दिनों बाद शाम के समय मैं दफ्तर से उठने की तैयारी कर रहा था कि एक 22-23 साल की लड़की झिझकती हुई कमरे में दाखिल हुई. उस ने आसमानी रंग की सलवारकमीज पहन रखी थी. वह भरेभरे बदन की सुंदर लड़की थी.

‘‘मैं एक मुकदमे के बारे में आप से बात करना चाहती हूं.’’

मैं ने उसे बैठने के लिए कुरसी पेश की. उस ने अपना नाम सायरा बताया और कहा कि वह मुनीर के मुकदमे के बारे में बात करना चाहती है.

‘‘तुम्हारा इस मुकदमे से क्या ताल्लुक है?’’ मैं ने पूछा, ‘‘क्या तुम मुनीर नवाज की रिश्तेदार हो?’’

‘‘मुनीर मेरे मंगेतर हैं.’’

‘‘अच्छा, लेकिन मैं ने तो सुना है कि मंगनी टूट गई.’’

‘‘मेरे मांबाप ने मंगनी तोड़ दी है, लेकिन मैं ने नहीं तोड़ी.’’

‘‘यानी तुम बागी हो गई हो?’’

‘‘आप जो भी समझ लें. दरअसल मुझे यकीन है कि मुनीर ने यह जुर्म नहीं किया. मैं उन्हें कई सालों से जानती हूं. वह इस टाइप के इंसान नहीं हैं. किसी लड़की का अपहरण करना तो दूर की बात, वह किसी लड़की से खुल कर बात भी नहीं कर सकते. नर्वस हो जाते हैं.’’

‘‘मैं तुम्हारी बात पर यकीन कर लेता हूं कि तुम मुनीर नवाज की मंगेतर हो, लेकिन मैं तुम्हें किसी के बारे में कुछ नहीं बता सकता.’’

‘‘मैं आप से कुछ पूछने नहीं आई.’’ उस ने कहा और अपने हैंडबैग से सौ-सौ के कुछ नोट निकाल कर मेरे सामने रख दिए, ‘‘मुझे मालूम था कि अभी तक आप को फीस अदा नहीं की गई. ये 12 सौ रुपए हैं. फिलहाल आप ये रख लें, बाकी रुपए अगले महीने ले कर आ जाऊंगी.’’

मैं ने नोटों की ओर हाथ नहीं बढ़ाया, ‘‘मेरा खयाल है कि मुनीर नवाज की मां इस बात को पसंद नहीं करेंगी.’’

‘‘मुझे मालूम है. आंटी बहुत भली औरत हैं. लेकिन आजकल उन के हालात ठीक नहीं हैं. उन के लिए आप की फीस अदा करना बहुत कठिन है. आप ये रुपए रख लें. अगर आंटी ने आप को फीस अदा कर दी तो मेरे रुपए वापस कर दीजिएगा.’’

मैं ने नोट उठा कर दराज में रख लिए. अचानक मुझे खयाल आया, ‘‘क्या मुनीर की खातिर थोड़ा सा काम कर सकती हो?’’

‘‘क्यों नहीं? अगर मेरे बस में हुआ तो जरूर करूंगी.’’

‘‘तुम ने अखबार में वारदात के बारे में तो जरूर पढ़ा होगा. यह जो लड़की कत्ल हुई है, मैडिकल रिपोर्ट के अनुसार गर्भवती थी. मैं कुछ दिनों पहले उस की मां से मिला था. उस ने बताया था कि सनम के किसी लड़के के साथ संबंध थे. लड़का किसी अमीर घराने का था. सनम ने अपनी मां को उस का नाम भी बताया था, लेकिन वह भूल गई है. हो सकता है कि सनम के साथ पढ़ने वाली कोई लड़की उस लड़के के बारे में जानती हो. तुम उस की हमजमात लड़कियों से मिल कर इस बारे में पता करने की कोशिश करो. अगर उस लड़के का सुराग मिल गया तो शायद सनम के कत्ल का राज खुल जाए.’’

‘‘काम तो मुश्किल है, लेकिन मैं कोशिश करूंगी.’’ उस ने कहा.

मैं ने उसे अपना कार्ड दे दिया और कहा कि अगर उसे कोई बात मालूम हो तो मुझे फोन कर दे. 15 दिनों बाद उस का फोन आया. वह जोश में लग रही थी. उस ने उस लड़के के बारे में मालूम कर लिया था, जिस की सनम से दोस्ती थी. उस का नाम नजीब उल्लाह था. मैं ने उस का नामपता नोट कर लिया और अपनी पहली फुरसत में उस पते पर पहुंच गया.  वह खूबसूरत बंगला था. दाहिनी ओर गैराज में 2 कारें खड़ी थीं. मैं अपनी कार गेट से अंदर ले गया. एक वर्दी वाला चौकीदार जल्दी से आगे बढ़ा और उस ने मेरी कार का दरवाजा खोला.

‘‘नजीब उल्लाह साहब घर पर हैं?’’ मैं ने चौकीदार से पूछा.

‘‘मैं अभी पता करता हूं. आप का नाम क्या है?’’

‘‘अमजद बेग.’’

उस ने मुझे इंतजार करने को कहा और इमारत के अंदर चला गया. मैं इमारत की शानशौकत का जायजा लेने लगा. फिर मेरी नजर अचानक मर्सिडीज कार पर टिक गई. मुझे एक ऐसी चीज नजर आई, जिसे देख कर मैं चौंक गया. कार के बंपर पर हलका सा गड्ढा पड़ा हुआ था, जिस के कारण रंग उखड़ गया था. मैं ने पास जा कर उस हिस्से का मुआयना किया तो मेरा अंदाजा बिलकुल सही निकला. नीचे बादामी रंग का पेंट था, जो बाद में कराया गया था. मैं ने जेब से डायरी निकाली और कार का नंबर नोट कर लिया. इतने में चौकीदार वापस आ गया और मुझे अपने साथ ड्राइंगरूम में ले गया. वहां जो आदमी मेरे स्वागत के लिए मौजूद था, उसे देख कर मुझे एक बार फिर चौंकना पड़ा.

कदकाठी और शक्लसूरत से वह मुनीर नवाज का जुड़वा भाई लगता था. अगर दोनों को एक जैसा लिबास पहना दिया जाता तो पहचानना मुश्किल हो जाता. वह अय्याश आदमी लगता था यानी कातिल मेरे सामने था. अब उस से अपराध स्वीकार कराना मेरा काम था. मैं ने उस के साथ एक छोटा सा नाटक खेलने का निश्चय किया.

‘‘फरमाइए?’’ उस ने रुखाई से कहा.

‘‘मेरा नाम अमजद बेग है,’’ मैं ने गंभीरता से कहा ‘‘मिरजा अमजद बेग एडवोकेट.’’

वह मेरा जायजा लेता हुआ बोला, ‘‘मैं ने आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘लेकिन मैं ने आप को पहली ही नजर में पहचान लिया है, क्योंकि सनम के खत के साथ आप की तसवीर भी थी.’’

‘‘सनम?’’ उस के चेहरे पर हलकी सी घबराहट जाहिर हो गई, ‘‘किस का खत, कैसी तसवीर?’’

उस ने अभी तक मुझे बैठने को नहीं कहा था. मैं ने जेब से सिगरेट निकाल कर सुलगाई और कहा, ‘‘कोई हमारी बातें सुन तो नहीं लेगा?’’

‘‘एक्टिंग न करो,’’ उस ने बेचैनी से कहा और वह आप से तुम पर आ गया, ‘‘तुम कहना क्या चाहते हो?’’

‘‘मैं कुछ दिनों पहले अमेरिका से वापस आया हूं. वकालत की हायर एजूकेशन के लिए वहां गया था. यहां आ कर पता चला कि मेरी फुफेरी बहन कुछ समय पहले कत्ल हो गई थी. मेरे अमेरिका जाने से पहले वह फूफीजान, मेरा मतलब अपनी अम्मी के साथ हमारे घर आई थी और मुझे एक मोहरबंद खत दिया था, साथ ही यह ताकीद की थी कि इस खत को केवल उस की मौत की हालत में ही खोला जाए.

‘‘पहले तो मैं ने उस की बात को मजाक समझा था, लेकिन वह बहुत संजीदा थी, बल्कि मेरे मजाक पर बुरा मान गई थी. इसलिए मैं ने उसे खुश करने के लिए वह खत अपने लौकर में रख लिया था. अमेरिका से वापस आने के बाद जब मैं ने उस के कत्ल के बारे में सुना तो मेरा ध्यान फौरन उस के खत की ओर गया. मैं ने वह खत खोल कर पढ़ा तो उस में उस ने आप के साथ अपने प्रेम के बारे में लिखा था.

‘‘आखिर में लिखा था कि वह गर्भवती हो गई है, लेकिन आप शादी के मामले में हीलहुज्जत से काम ले रहे हैं. कभी कहते हैं कि मांबाप नहीं मानते तो कभी कहते हैं कि सिविल मैरिज कर लेंगे. खत में यह भी लिखा है कि अगर वह कत्ल हो गई या किसी हादसे में मारी गई तो आप उस की मौत के जिम्मेदार होंगे. उस खत में आप की तसवीर भी है, जिस पर सनम ने अपने हाथ से लिखा है—मेरा कातिल. कानूनन मुझे वह खत और तसवीर पुलिस के हवाले कर देनी चाहिए थी, लेकिन मैं ने आप के साथ बात कर लेना बेहतर समझा.’’

‘‘वह खत और तसवीर कहां है?’’

‘‘मेरे दफ्तर के अंदर तिजोरी में.’’

‘‘अब आप क्या चाहते हैं?’’

‘‘मैं यह देखना चाहता हूं कि आप अपनी जिंदगी की कितनी कीमत लगाते हैं?’’

‘‘आप की डिमांड क्या है?’’

‘‘5 लाख.’’

‘‘5 लाख! हुंह! जनाब मैं ने 50 हजार में पूरे थाने का मुंह बंद कर दिया था. उतने ही रुपए आप को भी दे सकता हूं. शायद आप को मालूम नहीं कि पुलिस मेरे एक हमशक्ल को गिरफ्तार कर के अपनी तफ्तीश पूरी कर चुकी है. मजहर हुसैन ने मुझे बताया है कि अदालत कुछ ही पेशियों के बाद सजा सुना देगी.’’

थोड़ी सी बहस के बाद मैं 60 हजार पर राजी हो गया. तय यह हुआ कि अगले दिन 12 बजे वह 60 हजार रुपए ले कर तयशुदा होटल में पहुंच जाएगा. मैं उसे खत और तसवीर दूंगा और वह रुपए मेरे हवाले कर देगा. अगले दिन मैं डीआईजी विजिलेंस से मिला और उन्हें हालात से अवगत कराया. साथ ही मैं ने उन से एक छापामार पार्टी बना कर देने को कहा. उन्होंने फौरन मेरी मांग मंजूर कर ली और एक छापामार पार्टी मेरे साथ कर दी. उन में एक मजिस्ट्रेट दर्जा अव्वल, एक डीएसपी और 3 सिपाही शामिल थे. ये पांचों लोग सादे लिबास में होटल के रेस्तरां की मेजों पर बैठ गए. 12 बज कर 5 मिनट पर नजीब उल्लाह होटल में दाखिल हुआ और सीधा मेरी मेज की ओर आया.

उस के हाथ में खाकी कागज में लिपटा हुआ एक पैकेट था, जिसे उस ने मेज पर रख दिया. फिर खत और तसवीर की मांग की. इतने में छापामार पार्टी के आदमी हमारी मेज के इर्दगिर्द खड़े हो गए और डीएसपी ने मेज पर रखा हुआ पैकेट उठा लिया. यह देख कर नजीब उल्लाह बुरी तरह घबरा गया. वह समझ गया कि उसे धोखे से फंसाया गया है. उस ने 2-3 बार बात करने की कोशिश की, लेकिन आवाज उस के गले में अटक गई. डीएसपी ने पैकेट फाड़ कर देखा तो उस में 100-100 के नोटों की 6 गड्डियां थीं. संयोग से वह मर्सिडीज कार में ही वहां आया था. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और कार कब्जे में ले ली.

अगले दिन डीआईजी ने इंसपेक्टर मजहर हुसैन को मुअत्तल कर लाइन हाजिर करने का आदेश दिया. इस बीच पुलिस ने नजीब उल्लाह को अदालत में पेश कर के 15 दिनों का रिमांड ले लिया. इस के साथ ही मैं ने मुनीर नवाज की जमानत की दरख्वास्त दे दी. जज साहब चूंकि सारी बात समझ गए थे, इसलिए जमानत मंजूर हो गई. जब मैं मुनीर को रिहा करवा कर जेल से बाहर निकला तो सायरा अपने भाई के साथ उस के स्वागत के लिए मौजूद थी. उस के चेहरे पर बेपनाह खुशी थी. मैं ने उन दोनों को कार में बिठाया और सीधा मुनीर के घर पहुंच गया. सबाहत बेगम ने जब अपने बेटे को घर के दरवाजे पर देखा तो कुछ मिनटों तक तो उसे अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हुआ. फिर उस ने जोर से सरोत को आवाज दी और दौड़ कर मुनीर से लिपट गई. सरोत बहुत घबराहट की हालत में अपने कमरे से बाहर आई. वह भी ‘भैया’ कह कर भाई से लिपट गई.

जब खुशी का यह तूफान थम गया तो सब लोग पहले मेरी ओर और फिर सायरा की ओर मुखातिब हुए. सायरा की वहां मौजूदगी का मतलब यह था कि टूटा हुआ रिश्ता फिर जुड़ गया था.

‘‘वकील साहब, आप का शुक्रिया अदा करने के लिए मेरे पास अल्फाज नहीं हैं.’’ सरोत ने कहा.

‘‘इस का मतलब यह है कि तुम्हारी जुबान बहुत कमजोर है,’’ मैं ने हंस कर कहा, ‘‘तुम हिंदी, अंगरेजी, उर्दू किसी भी जुबान में शुक्रिया अदा कर सकती हो. वैसे असल शुक्रिया की हकदार तो यह तुम्हारी होने वाली भाभी हैं.’’

‘‘आप बैठें न,’’ उस ने कहा, ‘‘मैं आप के लिए चाय बनाती हूं…या आप कौफी पसंद करते हैं? वैसे कोल्डड्रिंक भी मिल जाएगी.’’

‘‘मेरा खयाल है कि फिलहाल तुम यह फैसला करो कि मुझे क्या पिलाना चाहती हो. मैं फिर कभी आ जाऊंगा. और हां, अम्मी को समझा देना कि केस तकरीबन खत्म हो गया है. सिर्फ कुछ रस्मी काररवाई अभी बाकी है.’’ True Crime Hindi

 

सिस्टर अभया हत्याकांड : 28 साल पुराने मामले के लिए दोषियों को कैसी सजा मिली

Kerala Crime News : 28 साल का समय बहुत होता है. इस बीच इस केस को खत्म कराने, बंद कराने, अदालत को गुमराह करने के हरसंभव प्रयास हुए. पुलिस, क्राइम ब्रांच यहां तक कि सीबीआई ने भी कातिलों का साथ दिया. लेकिन आखिरकार सिस्टर अभया को…

केरल के तिरुवनंतपुरम की सीबीआई कोर्ट में चल रहे सिस्टर अभया की हत्या के मुकदमे में पूरे 28 साल बाद सीबीआई के स्पैशल न्यायाधीश के. सनिल कुमार ने बुधवार 23 दिसंबर, 2020 को अपना फैसला सुनाया. इतनी देर से फैसला आने की वजह यह थी कि इस मामले की जांच बहुत लंबी चली. मामले की जांच पहले स्थानीय थाना पुलिस ने की. उस के बाद क्राइम ब्रांच ने की और जब मामला नहीं सुलझा तो जांच सीबीआई को सौंपी गई थी. सीबीआई की भी 4 अलगअलग टीमों ने जांच की. इस तरह कुल मिला कर 6 जांच एजेंसियों ने इस केस की जांच की. इस बीच कई सीबीआई अफसर भी बदले गए.

सीबीआई ने 3 बार क्लोजर रिपोर्ट लगाने की कोशिश की, पर कोर्ट ने उसे स्वीकर नहीं किया. सीबीआई की चौथी टीम ने इस मामले में एक चोर की गवाही पर जो चार्जशीट दाखिल की, उसी चोर की गवाही पर कोर्ट इस मामले में अंतिम नतीजे पर पहुंचा और हत्यारों को सजा सुनाई. इतनी लंबी जांच होने की वजह से ही हत्या के इस मामले को केरल की हत्या की सब से लंबी जांच का मामला कहा जा सकता है. सिस्टर अभया हत्याकांड में क्या फैसला आया, यह जानने से पहले आइए यह जान लें कि सिस्टर अभया कौन थी, उन की हत्या क्यों हुई और हत्या के इस मामले में इतनी लंबी जांच क्यों करनी पड़ी. 19 साल की सिस्टर अभया कोट्टायम के पायस टेन कौन्वेंट में प्री कोर्स की पढ़ाई कर रही थीं.

पिता थौमस और मां लीला ने उन का नाम बीना थौमस रखा था. पढ़ाई के लिए जब वह नन बनीं तो उन का नाम बदल कर अभया रख दिया गया. वह सेंट जोसेफ कौन्ग्रीगेशन औफ रिलीजियस सिस्टर्स की सदस्य थीं. 27 मार्च, 1992 की सुबह 4 बजे सिस्टर अभया पढ़ने के लिए उठीं. क्योंकि उस दिन उन की परीक्षा थी, जिस की तैयारी करनी थी. उन्होंने 4 बजे का अलार्म लगा रखा था. उन्हें प्यास लगी थी. वह पानी लेने के लिए किचन में गईं. लेकिन वापस अपने कमरे में नहीं आईं. किचन में गईं सिस्टर अभया कमरे में नहीं लौटीं. उन के साथ रहने वाली अन्य ननें भी पढ़ने के लिए उठीं तो सिस्टर अभया कमरे में नहीं थीं. जबकि उस समय उन्हें कमरे में ही होना चाहिए था.

उन लोगों को अभया की चिंता हुई. उन्होंने उन की तलाश शुरू की. सिस्टर अभया को ढूंढते हुए वे किचन में पहुंची तो देखा फ्रिज का दरवाजा खुला हुआ था. उसी के पास पानी की एक बोतल खुली पड़ी थी और बोतल का पानी फर्श पर फैला था. उसी के पास अभया की एक चप्पल पड़ी थी. सिस्टर अभया की काफी तलाश की गई, पर उन का कुछ पता नहीं चला. जल्दी ही यह बात पूरे कंपाउंड में फैल गई कि सिस्टर अभया गायब हैं. सवेरा हो चुका था. उजाला होने पर किसी की नजर कौन्वेंट के ही कंपाउंड में बने कुएं के पास पड़ी अभया की दूसरी चप्पल पर पड़ी. कुएं के पास चप्पल पड़ी होने से अंदाजा लगाया गया कि कहीं सिस्टर अभया कुएं में तो नहीं गिर गईं.

इस के बाद स्कूल प्रशासन ने पुलिस और फायर ब्रिगेड को सूचना दी. पुलिस और फायर ब्रिगेड ने कुएं को खंगाला तो सिस्टर अभया की लाश मिली. अब तक सुबह के लगभग 10 बज चुके थे. पुलिस ने लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. जांच में सिस्टर अभया की एक चप्पल फ्रिज के पास पड़ी मिली. फ्रिज का दरवाजा खुला था. पानी की खुली बोतल फर्श पर पड़ी थी और उस के पास पानी फैला था, जो यह बताता था कि फ्रिज से पानी की बोतल निकाली गई थी. सिस्टर अभया की दूसरी चप्पल कुएं के पास पड़ी मिली थी. सोचने की बात यह थी कि सिस्टर अभया कुएं के पास कैसे पहुंचीं? पुलिस ने कुछ लोगोें से पूछताछ भी की, पर कोई नतीजा नहीं निकला.

अंत में सब ने यही सोचा कि सिस्टर अभया ने आत्महत्या की होगी. क्योंकि वहां हत्या करने वाला कोई नहीं आ सकता था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में स्पष्ट लिखा था कि सिस्टर अभया की मौत पानी में डूबने से हुई है. उन के शरीर पर जो चोट लगी थी, उस के बारे में कहा गया कि वह चोट उन के कुएं में गिरने पर लगी है. स्थानीय पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सबूत मान कर अपनी फाइनल रिपोर्ट लगा दी कि सिस्टर अभया ने आत्महत्या की है. पुलिस और स्कूल प्रशासन ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सच मान कर बात खत्म कर दी. पर स्कूल के हौस्टल में रहने वाली अन्य ननों को न तो पुलिस जांच पर भरोसा था और न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर.

इस की एक वजह यह थी कि एक नन ने उसी सुबह किचन के पास हौस्टल की प्रभारी सिस्टर सेफी, फादर थौमस कोट्टूर और एक अन्य फादर जोस पुथुरुक्कयिल को देखा था. वह ननों का हौस्टल था, इसलिए वहां फादर का जाना वर्जित था. इस के अलावा सिस्टर अभया की एक चप्पल किचन में मिली थी तो दूसरी कुएं के पास. फ्रिज खोल कर उन्होंने पीने के लिए पानी की बोतल निकाल कर खोली तो थी, पर शायद पानी पी नहीं पाई थीं. क्योंकि अगर वह पानी पीतीं तो बोतल का ढक्कन लगा कर उसे साथ ले जातीं या फिर फ्रिज में रख देतीं. फ्रिज का दरवाजा भी खुला पड़ा था. अगर उन्हें कुएं में कूद कर आत्महत्या ही करनी थी तो वह फ्रिज का दरवाजा बंद कर के जा सकती थीं.

एक चप्पल किचन में और दूसरी कुएं के पास क्यों छोड़तीं. चप्पल पहन कर भी तो कुएं में कूद सकती थीं. इस के अलावा किचन का कुछ सामान भी अस्तव्यस्त था. उसे देख कर लग रहा था कि जैसे वहां हाथापाई हुई थी. इन्हीं वजहों से हौस्टल में रहने वाली अन्य ननों को पुलिस जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर भरोसा नहीं हुआ. घटनास्थल की स्थिति देख कर उन्हें लगता था कि उस रात वहां कुछ तो गड़बड़ हुई थी, जिस ने सिस्टर अभया के साथ कुछ उल्टासीधा किया था. परिणामस्वरूप हौस्टल की 67 ननोें ने केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. करुणाकरन को एक पत्र लिख कर अपील की कि उन्हें पुलिस जांच पर भरोसा नहीं है, इसलिए सिस्टर अभया की मौत के मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए.

ननों की इस अपील के बावजूद केरल सरकार ने इस मामले की जांच सीबीआई को देने के बजाय केरल पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दी. क्राइम ब्रांच ने पूछताछ शुरू की तो उस नन ने बताया कि उस रात उस रात उस ने हौस्टल के किचन में सिस्टर सेफी के अलावा 2 फादर, थौमस कोट्टूर और जोस पुथुरुक्कयिल को देखा था. इस के अलावा क्राइम ब्रांच को एक गवाह भी मिल गया था. वह गवाह था एक चोर, जिस का नाम था अदक्का राजा. उस रात वह कौन्वेंट में चोरी करने आया था. दरअसल वह चोर आकाशीय बिजली को रोकने के लिए छत पर लगे तांबे के तार को चुराने आया था. चोर अदक्का राजा छत पर चढ़ कर जब तार चोरी करने जा रहा था, उसी समय उस ने सिस्टर सेफी, फादर थौमस कोट्टूर और फादर जोस पुथुरुक्कयिल को टार्च लिए किचन के दरवाजे पर देखा था.

जब उस ने सिस्टर अभया की पूरी कहानी अखबारों में पढ़ी तो उसे समझते देर नहीं लगी कि उस रात सिस्टर अभया ने आत्महत्या नहीं की थी, बल्कि इन्हीं तीनों ने उस की हत्या की थी. उस ने खुद क्राइम ब्रांच के औफिस जा कर यह बात क्राइम ब्रांच के अधिकारियों से बताई. लेकिन पुलिस ने उस की गवाही मानने के बजाय उसे चोरी के आरोप में जेल भेज दिया और क्राइम ब्रांच पुलिस ने भी वही रिपोर्ट दी, जो स्थानीय थाना पुलिस ने दी थी. क्राइम ब्रांच का कहना था कि सिस्टर अभया की मौत कुएं में डूबने से हुई थी यानी उन्होंने आत्महत्या की थी. पर कोई भी इस बात को मानने को तैयार नहीं था. यही वजह थी कि जेमोन पुथेनपुरक्कल जैसे कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस जांच के खिलाफ न्याय की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. इस मामले को ले कर विधानसभा में भी काफी हंगामा हुआ.

अंतत: जब यह मामला केरल हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी. यह सन 1993 की बात है. जांच का आदेश मिलते ही सीबीआई की टीम सिस्टर अभया की मौत के रहस्य का पता लगाने में लग गई. सीबीआई ने भी अपनी जांच के बाद वही कहा, जो पुलिस और क्राइम ब्रांच ने अपनी रिपोर्ट में कहा था. उस का कहना था कि उसे इस तरह का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला कि वह इसे हत्या का मामला माने. सीबीआई की इस टीम का ध्यान न तो उस नन की बात पर गया था, न चोर अदक्का राजा की बात पर. सीबीआई ने यह रिपोर्ट सन 1996 में दी थी. लेकिन हाईकोर्ट ने सीबीआई की इस रिपोर्ट को खारिज कर फिर से जांच के आदेश दिए. इस के बाद सीबीआई की दूसरी टीम इस मामले की जांच में लगाई गई.

दूसरी टीम ने भी जांच कर के सन 1999 में रिपोर्ट दी कि उन्हें पता ही नहीं चल पा रहा है कि सिस्टर अभया की हत्या हुई या उन्होंने आत्महत्या की है. पर इस टीम ने इस मामले को संदिग्ध जरूर माना था. इस टीम का कहना था कि मामला है तो संदिग्ध, पर सबूत के अभाव में वह निश्चित रूप से कुछ कह नहीं सकती. हाईकोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगा कर फिर से ईमानदारी और ढंग से जांच करने के आदेश दिए. इस के बाद सीबीआई की तीसरी टीम जांच में लगाई गई. इस तीसरी टीम ने जांच करने के बाद कोर्ट को बताया कि जांच में यह तो पता चल गया है कि मामला आत्महत्या का नहीं, बल्कि हत्या का है. लेकिन उन के पास ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि वह किसी को दोषी मान कर जांच आगे बढ़ाए. उस का कहना था कि इस मामले में अब तक सारे सबूत मिटाए जा चुके हैं.

कोर्ट ने सीबीआई की इस रिपोर्ट को भी खारिज कर दिया और एक बार फिर से डांट कर ईमानदारी और ढंग से जांच करने के आदेश दिए. इस बार सीबीआई ने किसी भी तरह का सबूत या सुराग देने वाले को 3 लाख रुपए ईनाम देने की घोषणा भी की थी. फिर भी सीबीआई के हाथ ऐसा कोई सबूत या सुराग नहीं लगा कि वह कोर्ट में यह साबित कर सके कि यह हत्या का मामला है. इसी बीच सीबीआई के एक अफसर वर्गीज पी. थौमस, जो इस मामले की जांच कर रहे थे और काफी तेजतर्रार अफसर माने जाते थे, ने एक दिन अचानक उन्होंने प्रैस कौन्फ्रैंस बुलाई. 19 जनवरी, 1994 को जब यह रिपोर्ट आई थी, तब उन्होंने कहा था कि वह समय से पहले अपनी नौकरी से इस्तीफा दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें इस मामले में ईमानदारी से जांच करने की इजाजत नहीं दी जा रही है.

केरल के कोच्चि स्थित सीबीआई औफिस के सुपरिटेंडेंट वी. त्यागराजन उन पर दबाव डाल रहे हैं कि वह सिस्टर अभया के मामले में अपनी जांच रिपोर्ट को सुसाइड में तब्दील कर के कोर्ट में सुसाइड ही दिखाएं. यह खुलासा होने के बाद तो हंगामा मच गया. सीबीआई पर काफी दबाव पड़ा तो वी. त्यागराजन को कोच्चि से हटा दिया गया. इस के बाद कोर्ट के आदेश पर सीबीआई की चौथी टीम को जांच पर लगाया गया. यह टीम केरल के कोच्चि स्थित सीबीआई औफिस के अफसरों की थी. सीबीआई की टीम ने इस केस में फादर कोट्टूर, फादर जोस पुथुरुक्कयिल और नन सिस्टर सेफी को संदिग्ध माना. साथ ही उन लोगों का नारको टेस्ट कराने का फैसला किया.

जब इस बात की जानकारी कौन्वेंट को हुई तो उस ने हौस्टल की रसोइया की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करा कर नारको टेस्ट रोकवाने का भी प्रयास किया. पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रोक लगाने से मना कर दिया. इस के बाद बेंगलुरु में इन तीनों का नारको टेस्ट कराया गया. तीनों का नारको टेस्ट डा. मालिनी ने किया. नारको टेस्ट के दौरान इन तीनों का जो इकबालिया बयान था, वह एक सीडी के तौर पर सीबीआई को सौंप दिया गया, जिसे सीबीआई ने कोर्ट में पेश किया. लेकिन बाद में पता चला कि सीबीआई ने तीनों के नारको टेस्ट की जो सीडी अदालत में पेश की थी, उस के साथ छेड़छाड़ की गई थी. इस का मतलब यह था कि फादर और नन सेफी ने नारको टेस्ट के दौरान जो कुछ भी कहा था, छेड़छाड़ कर के उसे बदल दिया गया था.

इस के बाद कोर्ट ने सीधे डा. मालिनी से संपर्क कर उन से कहा कि इस मामले की जो ओरिजनल रिकौर्डिंग है, वह उन्हें भेजें. पर डा. मालिनी ने अपने बर्थ सार्टिफिकेट को ले कर कुछ गलत काम किया था, इसलिए उसी समय उन्हें नौकरी से हटा दिया गया. इस के बाद यह मामला यहीं लटक गया. अब वह सीडी सही है या गलत, कोई जानकारी देने वाला नहीं था. लेकिन एक दिन अचानक वही सीडी केरल के एक लोकल चैनल पर चल गई. वह सीडी चैनल को कहां से और कैसे मिली, यह तो पता नहीं चल सका. जबकि कोर्ट ने कहा कि यह सीडी सीलबंद लिफाफे में हमें दो. उस सीडी में दोनों फादर और नन अपनी पूरी कहानी सुना रहे थे, जो नारको टेस्ट के दौरान उन्होंने बताई थी. इस के बाद सीबीआई की इस चौथी टीम का ध्यान चोर अदक्का राजा पर गया.

पहली बार सन 2008 में सीबीआई ने उसी अदक्का राजा की गवाही के आधार पर चार्जशीट दाखिल की. जिस के बाद पहली बार सन 2008 में सिस्टर अभया की हत्या के आरोप में दोनों फादर थौमस कोट्टूर, जोस पुथुरुक्कयिल और नन सेफी को गिरफ्तार किया गया. हालांकि गिरफ्तारी के बाद ये तीनों साल भर भी जेल में नहीं रहे और 2009 में हाईकोर्ट ने इन्हें जमानत पर छोड़ दिया था. इस के बाद यह मामला फिर रुक गया. सीबीआई ने जो चार्जशीट दाखिल की थी और सीडी में तीनों ने जो कहानी सुनाई थी, वह कुल मिला कर कुछ इस तरह थी. उस रात सुबह 4 बजे सिस्टर अभया पानी पीने के लिए किचन में गईं और पानी पीने के लिए फ्रिज से बोतल निकाल कर जैसे ही बोतल का ढक्कन खोल कर पानी पीना चाहा, तभी उन्हें किसी की आवाज सुनाई दी.

उन्होंने पलट कर देखा तो दोनों फादर थौमस कोट्टूर, जोस पुथरुक्कयिल, जिन्हें कोर्ट ने 2 साल पहले सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था और सिस्टर सेफी आपत्तिजनक स्थिति में दिखाई दिए. उन लोगों को उस स्थिति में देख कर सिस्टर अभया सन्न रह गईं. इसी के साथ दोनों फादर और सिस्टर सेफी ने भी सिस्टर अभया को देख लिया था. अभया को देख कर तीनों घबरा गए. क्योंकि उन की चोरी पकड़ी गई थी. चोरी भी ऐसी कि अगर बात खुल जाती तो तीनों की बदनामी तो होती ही, उन्हें वहां से निकाल भी दिया जाता. इस के बाद वे कहीं के न रहते. इसलिए उन्होंने तुरंत निर्णय लिया कि क्यों न सिस्टर अभया की हत्या कर उन का मुंह हमेशाहमेशा के लिए बंद कर दिया जाए.

यह निर्णय लेते ही फादर थौमस कोट्टूर ने आगे बढ़ कर हैरानपरेशान खड़ी सिस्टर अभया का एक हाथ से गला और दूसरे हाथ से उन का मुंह दबोच लिया तो सिस्टर सेफी ने किचन में रखी कुल्हाड़ी उठा कर पूरी ताकत से सिस्टर अभया के सिर पर वार कर दिया. उसी एक वार में सिस्टर अभया बेहोश हो कर गिर पड़ीं तो उन्हें लगा कि वह मर चुकी हैं. और यही सोच कर फादर थौमस और सिस्टर सेफी ने बेहोश पड़ी अभया को घसीट कर कौन्वेंट के कंपाउंड में बने कुएं में ले जा कर डाल दिया. उस समय यह किसी को पता नहीं था कि सिस्टर अभया जिंदा थीं या मर चुकी थीं. इस के बाद किचन में आ कर वहां फैले खून को साफ कर दिया. लेकिन सिस्टर अभया की चप्पल, फ्रिज के दरवाजे, फर्श पर पड़ी बोतल और वहां अस्तव्यस्त हुए सामान की ओर उन का ध्यान नहीं गया.

बाद में इन्हीं चीजों से लोगों कोे अभया के साथ कोई हादसा होने का शक हुआ. उसी समय चोर अदक्का राजा चोरी करने के इरादे से छत पर चढ़ा था. तभी उस ने इन तीनों को वहां देख लिया था. उस समय उस ने फादर थौमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी को पहचान भी लिया था. बाद में उस ने दोनों की शिनाख्त भी कर दी थी. फादर जोस अंधेरे में थे, इसलिए वह उन्हें पहचान नहीं पाया था. यह पूरी बातें नारको टेस्ट में सामने आई थीं. कोर्ट नारको टेस्ट को सबूत नहीं मानता, क्योंकि इस में आदमी जो भी बताता है, वह नशे की हालत में यानी अर्द्धबेहोशी की हालत में बताता है, इसलिए कोर्ट इसे पुख्ता सबूत नहीं मानता. ऐसा ही इस मामले में भी हुआ.

कोर्ट ने नारको टेस्ट में दिए गए बयान को सही नहीं माना और तीनों को सन 2009 में जमानत पर रिहा कर दिया था. इस मामले की जिस पुलिस अधिकारी ने जांच की थी, उस पर भी संदेह था. बाद में पता चला कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी छेड़छाड़ की गई थी. उस रात सिस्टर अभया ने जो कपड़े पहने थे, वे भी गायब कर दिए गए थे. उन के  शरीर पर जो चोट के निशान थे, वे भी छिपाए गए थे. इस तरह इस मामले में हर कदम पर साक्ष्य और सबूत छिपाए और नष्ट किए गए. शायद इसीलिए सीबीआई ने इस मामले में एक पुलिस अधिकारी को भी साक्ष्य मिटाने के आरोप में आरोपी बनाया था, लेकिन बाद में वह हाईकोर्ट से बरी हो गए थे.

सन 2018 में फादर जोस पुथुरुक्कयिल इस केस में सबूतों के अभाव में बरी कर दिए गए. इस के बाद सन 2019 में हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वी.जी. अरुण की बेंच ने इस मामले में हो रही देरी की ओर ध्यान दिया. उन्होंने निर्देश दिया कि इस केस को जल्द से जल्द निपटाया जाए. इस के बाद सीबीआई कोर्ट में इस केस मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई, जिस की वजह से घटना के 28 साल बाद कोर्ट किसी नतीजे पर पहुंच सका और न्यायाधीश के. सनिल कुमार के फैसले के साथ इस मामले का पटाक्षेप हुआ. श्री सनिल कुमार ने अपने फैसले में न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर को उद्धृत करते हुए अपना जो फैसला सुनाया वह इस प्रकार था.

उन का कहना था कि सिस्टर अभया की मौत का मामला निश्चय ही ऐसा था, जिस पर मलयाली भाषी केरल की पूरी एक पीढ़ी ने अपने जीवनकाल के दौरान घरघर खूब चर्चा सुनी. झूठ, फरेब, अपराध को छिपाना, राजनीतिक प्रभाव, अदालती काररवाई और बीचबीच में मामला बंद करने की रिपोर्ट सहित सब कुछ देखासुना था. न्यायाधीश जाते रहे, पर मुकदमा जस का तस रहा. रिकौर्ड में उपलब्ध साक्ष्य इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए इतने अधिक हैं कि परिस्थितियों की तारतम्यता की कड़ी कुल मिला कर आरोपियों के अपराध की ओर इशारा करती है और इस नतीजे पर पहुंचाती है कि आरोपियोें ने इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया है.

गवाहोें और प्राप्त सबूतों से साबित होता है कि सिस्टर अभया की मौत सिर में लगी चोट और पानी में डूबने से हुई. अभया के शव परीक्षण से पता चला कि उस की गरदन के दोनों ओर नाखूनों की खरोंच के निशान थे, उन की गरदन पर जख्म भी था और सिर के पिछले हिस्से में भी जख्म था, मैडिकल विशेषज्ञों के अनुसार ये जख्म मौत से पहले के थे. गवाहों के बयानों और प्राप्त सबूतों के आधार पता चला कि अभया ने फादर थौमस कोट्टूर, सिस्टर सेफी और संभवत: एक दूसरे आरोपी को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था. अपने बचाव के लिए उन्होंने उस के सिर पर कुल्हाड़ी से हमला किया और उस की हत्या कर अपनी करतूतों पर परदा डालने के इरादे से उसे कुएं में फेंक दिया.

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अपना जीवन खत्म करने पर तुला व्यक्ति जो अपना जीवन तत्काल खत्म कर रहा हो, वह अपने साथी छात्रों के साथ मिल कर पढ़ाई करने की बात तो दूर वह अपने भविष्य को ले कर क्यों चिंता करेगा? अपनी परीक्षा को अच्छी तरह देने के बारे में सोच कर अच्छी नींद भी नहीं लेगा और न मन लगा कर पढ़ाई करेगा. ये सारी बातें आत्महत्या करने की बात को झुठलाती हैं. अदालत का कहना था कि अभया एक बुद्धिमान, धर्मनिष्ठ, ईमानदार, सादगी पसंद, दृढ़निश्चयी और अति शिष्टाचारी लड़की थी, जो हर तरह से कुशल थी और परोपकारी जीवन व्यतीत कर रही थी. उस के लिए खुद ही अपने जीवन का अंत कर लेना पूरी तरह से असंभव था, जैसी दलीलें बचाव पक्ष पेश कर रहा है.

इस मामले में गवाही देने वाला अदक्का राजू या अंडासू राजू जिसे ज्यादातर लोग इसी नाम से बुलाते थे, एक मामूली चोर था, वह आकाशीय बिजली रोकने के लिए कौन्वेंट की छत में लगी तांबे की छड़ की चोरी किया करता था. न्यायाधीश ने इस तथ्य का भी जिक्र किया है कि वह अपने बयान पर अडिग रहा कि उस ने फादर थौमस कोट्टूर और एक अन्य व्यक्ति को टौर्च के साथ किचन के पास खड़े देखा था. जबकि बचाव पक्ष ने राजू की पृष्ठभूमि के आधार पर उस की गवाही पर ही सवाल खड़े किए. लेकिन 2 वकीलों द्वारा जिरह करने के बावजूद वह अपनी बात पर कायम रहा. फैसले में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि किस तरह से गवाह राजू को अपने बयान से मुकरने और सिस्टर अभया की हत्या कबूल करने के लिए धमकियां मिलीं, यातना दी गई और मोटी रकम देने का प्रलोभन दिया गया, पर वह अपने बयान से टस से मस नहीं हुआ.

अदालत ने इस तथ्य को रिकौर्ड किया कि सिस्टर अभया की मौत वाली रात सिस्टर सेफी अकेली थीं. क्योंकि उन की साथिन रिट्रीट सेंटर गई थीं. उस रात और सवेरे रसोई घर में सामान्य स्थिति नहीं थी, जिस के बारे में अदालत को कौन्वेंट में रहने वाले अन्य लोगों ने, जो बाद में मुकर गए थे, की गवाही से पता चला था. एक महत्त्वपूर्ण जानकारी यह भी मिली थी कि सिस्टर सेफी ने अपने यौनाचार में लिप्त रहने के तथ्य को छिपाने के लिए स्त्रीरोग विशेषज्ञ से अपनी हाईमेनोप्लास्टी कराई थी. अदालत ने पाया कि सेफी ने यह प्रक्रिया सीबीआई द्वारा गिरफ्तार करने के बाद कराई थी. अदालत ने इस मामले के गवाहों में से एक गवाह कलारकोडे वेणुगोपाल को दिए गए फादर थौमस कोट्टूर के बयान का संज्ञान लिया. इस मामले में वेणुगोपाल ने कोट्टूर का नारको टेस्ट कराए जाने की संभावना के बारे में जानकारी मिलने पर थौमस कोट्टूर से संपर्क किया था.

तब उन्होंने भावावेश में वेणुगोपाल से कहा था कि वह लोहे या पत्थर से नहीं बने, वह भी मनुष्य हैं, जो एक समय पर सिस्टर सेफी के साथ पतिपत्नी की तरह रहे थे, अब उन्हें क्यों सूली पर चढ़ाया जा रहा है. बचाव पक्ष ने अदालत से वेणुगोपाल के बयान को भरोसेमंद न मानने का आग्रह किया था. पर अदालत ने कहा कि आरोपी का बर्ताव, उस की गवाही के दौरान उस की भावभंगिमाएं औैर अपनी गवाही के बुनियादी तथ्यों से टस से मस नहीं होने का तथ्य गवाह की विश्वसनीयता बता रहा था. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अचानक बगैर किसी वजह से पूरा कौन्वेंट सामूहिक रूप से मुकर गया, सबूत भी गायब हो गए और कौन्वेंट की रसोइया अचम्मा ने नारको टेस्ट को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दी.

अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि उस ने स्वीकार किया कि उच्चतम न्यायालय में देश के महानतम वकीलों में शामिल वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे उस की ओर से पेश हुए थे. अदालत ने फैसले में कहा कि उस ने यह भी स्वीकार किया कि उस के मुकदमे का खर्च कौन्वेंट ने उठाया था. जबकि उसे मुकदमे के बारे में बिलकुल जानकारी नहीं थी. अदालत ने कहा कि इस से यह साबित होता है कि इस मुकदमे को किस अंतिम नतीजे पर पहुंचने से रोकने तथा अभियोजन के मामले की सुनवाई को पटरी से उतारने के लिए प्रभावशाली लोगों ने व्यवस्थित और संगठित तरीके से प्रयास किए.

न्यायाधीश श्री के. सनिल कुमार ने इस मामले के जांच अधिकारियों, डीएसपी के. सैमुअल और तत्कालीन एसपी केटी माइकल की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि इन की इस मामले में दिलचस्पी की वजह से साक्ष्य नष्ट हुए, मनगढ़ंत सबूत तैयार किए गए. यहां तक कि मुख्य गवाह अदक्का राजू को सिखायापढ़ाया गया और अन्य गवाहों पर दबाव डाले गए. अदालत ने भविष्य में इस तरह से हस्तक्षेप के खिलाफ सख्त चेतावनी देते हुए इस फैसले की प्रति राज्य पुलिस के मुखिया को भी देने का आदेश दिया. अंत में न्यायाधीश सनिल कुमार ने फादर थौमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी को सिस्टर अभया की हत्या, अपराध छिपाने और सबूत मिटाने का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास यानी जीवित रहने तक जेल में रहने की सजा सुनाई. साथ ही 5-5 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया.

थौमस कोट्टूर पर घर में बिना अनुमति घुस जाने का भी आरोप लगा. सिस्टर सेफी अब नन वाले कपड़े नहीं पहन सकेंगी. सिस्टर अभया को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रहे लोगों में अकेले जीवित बचे मानवाधिकार कार्यकर्ता जोमोन पुथेनपुराकल ने कहा कि आखिर सिस्टर अभया को न्याय मिल ही गया. यह इस बात का उदाहरण है कि किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि उस के पास पैसा और बाहुबल है तो वह न्याय से खिलवाड़ कर लेगा. जिस चोर अदक्का राजा की गवाही पर दोनों को सजा हुई, फैसला आने के बाद उस ने कहा कि उसे मुकरने के लिए बहुत प्रताडि़त किया गया. उस पर दबाव डाला गया, 3 करोड़ रुपए का लालच दिया गया. पर वह अपनी बात पर अडिग रहा. आखिर उस की भी तो बेटियां हैं. इस मामले में कुल 167 गवाह थे, जिन में से लगभग सब मुकर गए थे.