सुधा का एक आपराधिक प्रवृत्ति का दोस्त था उमेश चौधरी. वह हरिद्वार के थाना कनखल के रहने वाले मदनपाल का बेटा था. उस के खिलाफ अलगअलग जिलों में हत्या के 4 मुकदमे दर्ज थे. उमेश की दोस्ती सुधा से भी थी और हरिओम से भी. बात कर के सुधा ने युद्धवीर को खत्म करने के लिए उमेश को 5 लाख रुपए की सुपारी दे दी. रकम काम होने के बाद देना था.
उमेश तैयार हो गया तो सुधा ने कहा, ‘‘तुम्हें हरिओम के साथ ही देहरादून आना है, लेकिन तुम इस बारे में उसे कुछ नहीं बताओगे.’’
‘‘सुपारी ली है मैडम तो बात भी मानूंगा.’’ उमेश ने कहा.
इस के बाद सुधा ने हरिओम को फोन किया, ‘‘1 अगस्त को तुम देहरादून आ जाना. इंतजाम कर के तुम्हारे पैसे दे दूंगी.’’
सुधा की इस बात से खुश हो कर हरिओम ने कहा, ‘‘इस बार मुझे मेरे पूरे पैसे देने होंगे.’’
‘‘ठीक है, हरिओम मैं खुद ही तुम्हारे पैसे दे देना चाहती हूं. लेकिन मेरी भी कुछ मजबूरियां हैं. और हां, तुम एक काम करना.’’
‘‘क्या?’’
‘‘आते समय अपने साथ उमेश को भी लेते आना.’’
‘‘ठीक है.’’ इस के बाद फोन काट दिया गया.
1 अगस्त को हरिओम अपनी स्कार्पियो से पहले हरिद्वार पहुंचा और वहां से उमेश को ले कर देहरादून पहुंच गया. वह उमेश के साथ त्यागी रोड स्थित एक होटल में ठहरा. सुधा हरिओम से मिलने आई तो 3-4 दिनों में उस ने रुपए देने की बात कही. इस के बाद भी सुधा की हरिओम से मोबाइल पर तो बात होती ही रहती थी, वह उस से मिलने भी आती रही. वह हरिओम को एकएक दिन कर के टाल रही थी.
8 अगस्त को हरिओम ने हरिद्वार के रहने वाले अपने दोस्त संजीव को फोन कर के बुला लिया. उसी दिन सुधा ने हरिओम को बताया कि उसे युद्धवीर की हत्या करनी है, क्योंकि युद्धवीर को 14 लाख रुपए वापस करने हैं. अगर उस ने उस के पैसे नहीं लौटाए तो वह उस की हत्या करा देगा. इस काम में उसे उस का साथ देना होगा. इस के बाद वह उस के बाकी पैसे वापस कर देगी.
उसी बीच उमेश ने सुधा का समर्थन करते हुए कहा, ‘‘क्या फर्क पड़ता है यार हरिओम. मुझे इस काम के लिए मैडम ने 5 लाख रुपए देने को कहा है. काम होने पर उस में से मैं आधे तुम्हें दे दूंगा. इस के अलावा तुम्हें अपनी डूबी रकम भी मिल जाएगी. इसलिए तुम्हें मैडम का साथ देना चाहिए.’’
हरिओम इस बात से बेखबर था कि युद्धवीर की हत्या का उमेश से पहले ही सौदा हो चुका है. आखिर कुछ देर की बातचीत के बाद हरिओम साथ देने को तैयार हो गया. सुधा का सोचना था कि युद्धवीर की हत्या के बाद उसे 14 लाख रुपए वापस नहीं करने पड़ेंगे. इस के अलावा अगर युद्धवीर का लाया एडमिशन हो गया तो 60 लाख में से बाकी के 46 लाख रुपए भी उसे मिल जाएंगे. इस के बाद वह हरिओम को भी ब्लैकमेल करतेहुए उस के रुपए देने से मना कर देगी.
8 अगस्त को बलराज अपने पैसे लेने आया तो युद्धवीर ने सुधा को फोन किया. सुधा ने उसे गुरुद्वारा साहिब पहुंचने को कहा. प्रदीप चौहान ने उसे गुरुद्वारा साहिब छोड़ दिया. इस के बाद सुधा ने उसे चकराता रोड आने को कहा. उस ने हरिओम को भी वहीं बुला लिया था. हरिओम अपने साथियों के साथ स्कार्पियो से था, जबकि सुधा अपनी स्कूटी से आई थी. उस ने हरिओम का परिचय छद्म नाम से कराते हुए युद्धवीर से कहा, ‘‘यह अनिल श्रीवास्तव हैं.यही कालेज के एडमिशन हेड हैं. इन्हीं को मैं ने 14 लाख रुपए दिए थे. हमें राजपुर रोड चलना होगा. वहीं यह हमें पैसे देंगे.’’
युद्धवीर को क्या पता था कि उसे जाल में उलझाया जा रहा है. पैसों के लिए वह साथ चलने को तैयार हो गया. सुधा युद्धवीर को स्कूटी से ले कर आगेआगे चलने लगी तो उस के पीछेपीछे हरिओम भी अपने साथियों के साथ स्कार्पियो से चल पड़ा. राजपुर रोड पर आ कर सभी रुक गए.
सुधा ने अपनी स्कूटी वहीं खड़ी कर दी और गाड़ी चला रहे हरिओम के बगल वाली सीट पर बैठ गई. युद्धवीर पिछली सीट पर उमेश और संजीव के साथ बैठ गया. स्कार्पियो एक बार फिर चल पड़ी. उन लोगों के मन में क्या है, युद्धवीर को पता नहीं था. चलते हुए ही युद्धवीर ने रुपए लौटाने की बात शुरू की तो सुधा का चेहरा तमतमा उठा.
सुधा के इस अंदाज और अंजान लोगों के साथ होने से युद्धवीर को उस पर शक हुआ तो उस ने भागना चाहा. लेकिन स्कार्पियो के दरवाजे से सिर टकरा जाने की वजह से वह गाड़ी के अंदर ही गिर गया. तभी उमेश ने उस के गले में रस्सी डाल कर एकदम से कस दिया. युद्धवीर जान बचाने के लिए छटपटाया, लेकिन उन की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वह कुछ नहीं कर सका. अंतत: उस की मौत हो गई.
युद्धवीर की हत्या कर के वे उस की लाश को सहस्रधारा नदी की उफनती धारा में फेंकना चाहते थे. युद्धवीर की लाश को उन्होंने बाएं दरवाजे की ओर इस तरह बैठा दिया कि देखने वाले को लगे कि वह सो रहा है. युद्धवीर के मोबाइल फोन जेब से निकाल कर स्विच औफ कर दिए.
रास्ते में एक जगह पुलिस वाहनों की चैकिंग कर रही थी, जिसे देख कर हरिओम घबरा गया और आगे जाने से मना कर दिया. सुधा और उमेश ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं माना और गाड़ी घुमा ली. लौटते हुए ही उन्होंने लाश आनंदमयी आश्रम के पास सड़क के किनारे फेंक दी. सुधा अपनी स्कूटी ले कर अपने घर चली गई, जबकि हरिओम, उमेश और संजीव स्कार्पियो से हरिद्वार चले गए.
युद्धवीर की हत्या कर सुधा निश्चिंत हो गई कि अब उसे किसी के पैसे नहीं देने पड़ेंगे. उसे विश्वास था कि अगर उस का नाम सामने आया भी तो अपने प्रभाव से वह छूट जाएगी. लेकिन उस के मंसूबों पर पानी फिर गया. हरिओम और सुधा से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त रस्सी भी बरामद कर ली. पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.
इस के बाद पुलिस ने उमेश को भी गिरफ्तार कर लिया. जबकि संजीव हरिद्वार में अपने खिलाफ पहले से दर्ज छेड़छाड़ के एक मामले की जमानत रद्द करवा कर जेल चला गया. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हुई थी. सुधा ने महत्त्वाकांक्षाओं में जिंदगी को न उलझाया होता और युद्धवीर ने उस पर विश्वास न किया होता तो शायद यह नौबत न आती.
— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
मुकेश ने हसन से विकृत तरीके से बनाए समलैंगिक संबंध
घर आने के बाद मुकेश ने अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया, क्योंकि उसे पता था कि पत्नी कृष्णा देर रात तक उसे कई बार फोन करेगी और वह नहीं चाहता था कि अपने नए प्रेमी से हो रही पहली मुलाकात में कोई खलल डाले. मुकेश और हसन ने रात को करीब साढ़े 9 बजे तक बियर पी और खाना खाया. दोनों ने मिल कर बियर की बोतल कूड़ेदान में डाल दी और खाने के बरतन साफ कर के रख दिए.
उस के बाद दोनों बेडरूम में आ गए और वहां एकदूसरे के कपड़े उतार कर एकदूसरे के जिस्म से खिलवाड़ करने लगे. मुकेश के मुकाबले हसन शारीरिक बनावट में थोड़ा कमजोर था, जबकि मुकेश का शरीर थोड़ा कद्दावर था. मुकेश समलैंगिक तो था ही लेकिन उस के साथ ही उस में कुछ ऐसी आदतें भी थीं, जो आमतौर पर यौन विकृत लोगों में होती हैं.
मसलन उसे हाथपांव बांध कर प्यार करने में बेहद आनंद आता था. मुकेश ने जब अपनी ख्वाहिश हसन को बताई तो उस को बड़ा अजीब सा लगा. लेकिन थोड़ी नानुकुर के बाद अपने हाथ और पांव बंधवाने के लिए तैयार हो गया. इस के बाद मुकेश ने हसन के साथ शारीरिक संबंध बनाए, लेकिन अपने विकृत अप्राकृतिक प्यार के दौरान मुकेश ने हसन को इतनी बुरी यातनाएं दीं कि हसन का दिल दहल गया.
हसन मुकेश से लाख मिन्नतें करता रहा, लेकिन उन्माद में अंधे हो चुके मुकेश के ऊपर उस की चीखों का भी कोई असर नहीं हुआ, बल्कि इस सब से मुकेश को और ज्यादा आनंद की अनुभूति हो रही थी. जिस्मानी संबंध बना कर मुकेश तो जरूर आनंदित हुआ, लेकिन हसन के दिल में उस के लिए अचानक इतना गुस्सा और नफरत भर गई कि उस ने तय कर लिया वह मुकेश को इस की सजा जरूर देगा.
जो दौर मुकेश ने हसन के साथ किया था, वही बारी अब हसन की थी. अब बारी मुकेश के हाथ और पांव बांधने की थी. जिस के बाद हसन ने उसे बिस्तर पर उलटा लिटा दिया. हसन ने भी उस के साथ संबंध बनाए. पानी पीने के बहाने वह किचन की तरफ गया. वहां उसे और तो कुछ नहीं मिला, लेकिन वहां पड़ा लोहे का तवा देख उस ने उसी को उठा लिया.
हसन के मन में भर गई थी नफरत
मुकेश ने हसन के साथ जो भी किया था, उसे ले कर हसन के दिल और दिमाग में इतना गुस्सा भरा हुआ था कि वह बेडरूम में आया और आते ही उस ने तवे से मुकेश के सिर और चेहरे पर ताबड़तोड़ वार करने शुरू कर दिए. हसन ने करीब 25 से 30 बार मुकेश के सिर और चेहरे पर वार किए. मुकेश कुछ समझता, उस से पहले कुछ ही क्षण में खून से सराबोर हो कर उस का शरीर निढाल हो गया. हाथ और पांव बंधे होने कारण वह कोई बचाव भी नहीं कर सका.
नफरत में उस ने मुकेश के निष्प्राण हो चुके शरीर को बिस्तर से नीचे जमीन पर गिरा दिया और उस के बाद शरीर पर जहां तहां तवे के फिर वार किए. तब कहीं जा कर उस का गुस्सा ठंडा हुआ. कुछ देर तक हसन वहीं बैठ रहा. जब गुस्सा शांत हुआ तो उसे लगा कि उस ने कुछ ज्यादा ही कर दिया. क्योंकि मुकेश की मौत हो चुकी थी.
लेकिन अब कोई चारा नहीं था. देखा उस समय रात के साढ़े 12 बजे थे. इतनी रात को अगर वह घर से निकाल कर जाता तो न ही उसे कोई सवारी मिलनी थी, ऊपर से पकड़े जाने का खतरा भी था. लिहाजा उस ने कुछ घंटे तक वहीं रुकने का फैसला किया. मुकेश की हत्या करने के बाद हसन सुबह करीब 4 बजे तक उसी के बेडरूम में रहा.
इस दौरान उस ने बाथरूम में जा कर अपने शरीर पर लगे खून के धब्बे साफ किए और अपने कपड़े पहन लिए. उस ने रसोई में जा कर चाय बना कर भी पी. सुबह होने से पहले उस ने मुकेश के पैंट में रखे पर्स से कुछ पैसे निकाले और घर से बाहर निकला.
गली में सन्नाटा पसरा था. उस ने घर की कुंडी बाहर से लगा दी और पैदल चहलकदमी करते हुए सडक़ पर आ गया. कुछ दूर जाने के बाद वह एक आटो में बैठ कर बसअड्डे पहुंचा. बसअड्डे से सुबह 6 बजे चलने वाली बस में सवार हो कर मोदीनगरआया.
मुकेश की हत्या के बाद हसन को विश्वास था कि पुलिस उसे पकड़ नहीं पाएगी, क्योंकि मुकेश के साथ उसे किसी ने देखा नहीं था. फिर भी हसन के दिल में एक डर बैठा हुआ था, इसीलिए वह केवल एक बार कुछ देर के लिए अपनी दुकान पर गया था और वहां अपने कपड़े बदलने के बाद वह दुकान बंद कर के चला गया. 3 दिनों तक हसन अपनी जानपहचान वालों के यहां बहाने बना कर समय काटता रहा.
25 सितंबर, 2023 को भी वह हापुड़ केवल इसलिए गया था, ताकि वहां एक दिन रह कर यह पता लगा सके कि पुलिस ने मुकेश की हत्या में अभी तक किसी को गिरफ्तार किया है या नहीं. क्योंकि उसे लग रहा था कि पुलिस उस के पास तक तो पहुंच नहीं पाएगी, इसलिए हत्याकांड का खुलासा करने के लिए वह किसी बेगुनाह को मुकेश की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज देगी.
लेकिन हसन की सोच गलत निकली, पुलिस की कार्यशैली और जांच करने के तरीकों के बारे में उसे पता नहीं था. कत्ल के बाद खुद तक पहुंचने वाले सबूत यानी मोबाइल को तो वह अपने साथ ले कर ही घूम रहा था. उसी के जरिए पुलिस आसानी से उस तक पहुंच गई.
जांच अधिकारी इंसपेक्टर नीरज कुमार ने आरोपी हसन से पूछताछ कर उसे मुकेश की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने हसन से 25 सितंबर, 2023 को अधिकारियों और मुकेश के परिजनों के समक्ष भी पूछताछ की और 26 सितंबर को उसे सक्षम अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.
(कथा पुलिस की जांच आरोपी के बयान और परिजनों की शिकायत पर आधारित)
पुलिस को उस पर शक हुआ तो उस के मोबाइल फोन की लोकेशन और काल डिटेल्स निकलवाई. इस से पता चला कि उस के मोबाइल की लोकेशन चकराता रोड और लाश मिलने के स्थान की भी थी. इस के साथ एक और मोबाइल की लोकेशन मिल रही थी, जिस से सुधा की लगातार बात होती रहती थी.
उस नंबर के बारे में पता किया गया तो वह नंबर हरिओम वशिष्ठ उर्फ बिट्टू का निकला. वह उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ के थाना नौचंदी के शास्त्रीनगर के रहने वाले बृजपाल का बेटा था. उस के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा कर एक पुलिस टीम उस की गिरफ्तारी के लिए निकल पड़ी. आखिर सर्विलांस से मिल रही लोकेशन के आधार पर पुलिस ने सुधा और हरिओम को हिरासत में ले लिया.
पहले तो सुधा ने अपने राजनीतिक संपर्कों की धौंस दिखा कर पुलिस को रौब में लेने कोशिश की थी. लेकिन पुलिस के पास ऐसे सुबूत थे कि उस की यह धौंस जरा भी नहीं चली. फिर तो पूछताछ में उस ने पुलिस के सामने जो खुलासा किया, सुन कर पुलिस दंग रह गई. दरअसल युद्धवीर की हत्या की साजिश सुधा ने ही रची थी. उस ने शातिर चाल चल कर एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की थी.
सुधा और हरिओम से की गई पूछताछ में युद्धवीर की हत्या की चौंकाने वाली जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी.
मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर की रहने वाली सुधा का परिवार कई साल पहले मेरठ में आ कर बस गया था. मेरठ आने के बाद सुधा ने देहरादून के रहने वाले देवराज पटवाल से विवाह कर लिया था. देवराज कंप्यूटर इंस्टिट्यूट तो चलाता ही था, साथ ही कंप्यूटर का बिजनेस भी करता था. वह बड़ेबड़े व्यापारिक और सरकारी संस्थानों में कंप्यूटर सप्लाई करता था.
सुधा बेहद महत्त्वाकांक्षी और शातिर दिमाग महिला थी. अंगे्रजी के अलावा फे्रंच पर भी उस की अच्छी पकड़ थी. जिंदगी को जीने का उस का अपना एक अलग ही अंदाज था. उसे रसूख भी पसंद था और ऊंचे ओहदे वाले लोगों से रिश्ता भी. इस के लिए वह कांगे्रस पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर के रसूख वाले लोगों से संपर्क बनाने लगी.
पैसे कमाने के लिए सुधा पार्टटाइम प्रौपर्टी डीलिंग के साथसाथ छात्रछात्राओं के बड़े कालेजों में एडमिशन कराने लगी. करीब 4 साल पहले सुधा के पति देवराज को लकवा मार गया, जिस से वह चलनेफिरने में लाचार हो गया. इस का असर उस के बिजनेस पर पड़ा. घटतेघटते एक दिन ऐसा आया कि उस का बिजनेस पूरी तरह से बंद हो गया.
पति के बिस्तर पर पड़ने के बाद सुधा आजाद हो गई. दौड़धूप कर के उस ने तमाम छोटेबड़े नेताओं से संबंध बना लिए. इस का उसे लाभ भी मिलने लगा. संपर्कों की ही वजह से उस का दलाली का काम बढि़या चल निकला. अब सब कुछ सुधा के हाथ में था. उस की एक बेटी थी, जो दिल्ली से बीटेक कर रही थी. वह बेटी को पढ़ाई के लिए विदेश भेजना चाहती थी.
सुधा की पकड़ मोहल्ले से ले कर सत्ता के गलियारों तक हो गई थी. दलाली की कमाई से वह ठाठबाट से रह रही थी. इंदिरानगर की वह जिस कोठी में रहती थी, उस का किराया 20 हजार रुपए महीने था. ऐशोआराम की जिंदगी के लिए वह पैसा पानी की तरह बहाती थी. लोगों पर रौब गांठने के लिए वह नेताओं से अपने संबंधों की धमकी देती थी.
हरक सिंह रावत के यहां भी सुधा का आनाजाना था. इसी आनेजाने में उस की मुलाकात युद्धवीर से हुई तो बातचीत में पता चला कि वह भी एडमिशन कराता है. दोनों की राह एक थी, इसलिए उन में अच्छी पटने लगी. जुलाई में युद्धवीर ने मैडिकल कालेज में एडमिशन कराने की बात की तो उस ने 60 लाख रुपए मांगे.
युद्धवीर ने एडमिशन कराने के लिए 14 लाख रुपए एडवांस के रूप में सुधा को दे दिए. लेकिन दिक्कत तब आई, जब एडमिशन नहीं हुआ. ये 14 लाख रुपए बलराज के थे. वह अपने रुपए वापस मांगने लगा तो युद्धवीर सुधा को टोकने लगा.
सुधा इस पेशे की खिलाड़ी थी. ऐसे लोगों को टरकाना उसे अच्छी तरह आता था. इसी तरह के एक मामले में उस पर थाना पिलखुआ में ठगी का एक मुकदमा भी दर्ज हो चुका था. लौबिस्ट के रूप में उस की पहचान बन चुकी थी, इसलिए तमाम लोग उस के पास एडमिशन के लिए आते रहते थे. ऐसे में इस तरह की बातें उस के लिए आम थीं.
हरिओम वशिष्ठ भी उस का ऐसा ही शिकार था. सुधा से उस की मुलाकात मेरठ में हुई थी. बातचीत में उस ने हरिओम से देहरादून में प्रौपर्टी में पैसा लगाने को कहा. सुधा की बातचीत और ठाठबाट से हरिओम समझ गया कि यह बेहद प्रभावशाली महिला है. कुछ महीने पहले देहरादून के झाझरा इलाके में 4 बीघा जमीन दिलाने के नाम पर सुधा ने हरिओम से 8 लाख रुपए ले लिए.
बाद में जमीन के कागज फर्जी निकले तो हरिओम को अपने ठगे जाने का भान हुआ. उस ने सुधा से रुपए मांगे तो वह उसे टरकाने लगी. लेकिन हरिओम भी कमाजेर नहीं था. वह उस के पीछे पड़ गया. मजबूर हो कर सुधा ने गहने बेच कर उस के 3 लाख रुपए लौटाए, बाकी रुपए देने का वादा कर लिया.
हरिओम को सुधा झेल ही रही थी. अब युद्धवीर वाला मामला भी फंस गया था. दोनों ही पैसे वापस करने के लिए उस पर दबाव बना रहे थे. हरिओम रकम डूबने से काफी खफा था. वैसे तो इस तरह के मामले सुधा अपने रसूख के बल पर दबा देती थी, लेकिन युद्धवीर और हरिओम का मामला ऐसा था, जिस में उस का रसूख काम नहीं कर रहा था. उस की परेशानी तब और बढ़ गई, जब जुलाई के अंतिम सप्ताह में हरिओम ने उसे फोन कर के पैसे वापस करने के लिए धमकी दे दी.
हरिओम की धमकी से सुधा की चिंता बढ़ गई. वह समझ गई कि अगर उस ने हरिओम के पैसे नहीं लौटाए तो वह कुछ भी कर सकता है. आदमी के दिमाग में कब क्या आ जाए, कोई नहीं जानता. परेशानी में दिमाग बचाव के लिए तरहतरह के रास्ते खोजता है.
सुधा भी बचाव के लिए दिमाग दौड़ाने लगी. फिर उस के दिमाग में जो आया, उस से उसे लगा कि इस से वह सुकून से रह सकेगी. इंसान की फितरत भी है कि वह अपने हिसाब से सिर्फ अपने पक्ष में ही सोचता है. ऐसे में उसे गलत रास्ता भी सही नजर आता है. सुधा के साथ भी ठीक ऐसा ही हो रहा था.
जांच अधिकारी को मिला सुराग
जांच अधिकारी नीरज को कातिल तक पहुंचने का क्लू तो मिल गया था, लेकिन अभी हसन के बारे में जानकारी जुटाना और हत्या का कारण जानना जरूरी था. आगे की तफ्तीश में पता चला कि हसन और मुकेश करीब एक माह से फेसबुक पर फ्रेंड बने थे और दोनों के बीच अकसर मैसेंजर चैट पर बातचीत होती थी. पुलिस ने जब मैसेंजर चैट को खंगाला तो कुछ ऐसी जानकारी हाथ लगी, जिस से कत्ल की इस वारदात की गुत्थी लगभग सुलझने के करीब पहुंच गई.
इसी बीच कालोनी के सीसीटीवी फुटेज की जांच कर रही पुलिस टीम को पता चला की करीब साढ़े 7 बजे मुकेश एक आदमी के साथ अपने घर में प्रवेश हुआ था और सुबह करीब 4 बजे वह व्यक्ति अकेला घर से बाहर निकला था. पुलिस ने करीब 100 से अधिक सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक की थी, तब जा कर यह सफलता मिली. इंसपेक्टर नीरज कुमार ने मोबाइल कंपनी के रिकौर्ड में दर्ज हसन का फोटो हासिल कर लिया.
पुलिस की एक टीम को उसी दिन हसन के मेरठ जिले के गांव धौलड़ी स्थित पते पर भेजा गया, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. पुलिस ने हसन के घर वालों से पूछताछ की तो पता चला कि वह मोदीनगर के राज चोपला पर जर्राह का काम करता है. हसन ने वहां एक दुकान ले रखी थी. वह दुकान में ही रात को सोता था. सप्ताह में एक बार वह अपने घर जाता था. गांव में उस के मातापिता और पत्नी नसरीन व 3 से 5 साल की उम्र के 2 बच्चे रहते थे.
पुलिस की टीम हसन के घर वालों से उस की मोदीनगर स्थित दुकान का पता ले कर जब मोदीनगर पहुंची तो वहां दुकान पर ताला लगा मिला. आसपड़ोस के दुकानदारों से पूछताछ करने पर पता चला कि पिछले 3 दिनों से हसन ने अपनी जर्राह की दुकान नहीं खोली है. थकहार कर पुलिस टीम वापस हापुड़ लौट गई. इंसपेक्टर नीरज कुमार समझ गए कि अब टेक्निकल सर्विलांस ही हसन तक पहुंचने का इकलौता रास्ता है. उन्होंने हसन के मोबाइल की निगरानी शुरू कर दी. जल्द ही इस का परिणाम भी सामने आया.
हसन चढ़ गया पुलिस के हत्थे
25 सितंबर, 2023 को पुलिस टीम को सर्विलांस की निगरानी से पता चला कि हसन हापुड़ की मोर्चरी रोड पर एक छोलेभटूरे की दुकान पर मौजूद है. इंसपेक्टर नीरज कुमार ने तत्काल अपनी टीम ले कर मोर्चरी रोड की घेराबंदी कर ली और छोले भटूरे की दुकान के बाहर खड़े हसन को उस की फोटो से पहचान कर हिरासत में ले लिया.
खुद को पुलिस के चंगुल में फंसा देख कर हसन के होश उड़ गए और वह उलटे पुलिस से सवाल करने लगा कि एक शरीफ आदमी को उन्होंने क्यों पकड़ा है. जब पुलिस ने उसे बताया कि उसे मुकेश कर्दम की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है तो वह अनजान बनते हुए उलटा सवाल करने लगा कौन मुकेश कर्दम? वह किसी मुकेश कर्दम को नहीं जानता.
इंसपेक्टर नीरज कुमार को अपने अनुभव से यह बात बखूबी पता थी कि अपराधी इतनी आसानी से अपना गुनाह कबूल नहीं करता. लिहाजा पुलिस की टीम पहले उसे कोतवाली ले कर आई, उस के बाद मामूली सी सख्ती के बाद ही हसन टूट गया और उस ने अपने गुनाह की पूरी कहानी बयां कर दी.
हसन बचपन से ही समलैंगिक संबंधों का शौकीन था. उस के कई दोस्त थे, जिन के साथ उस के शारीरिक संबंध थे. हालांकि वह शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था, लेकिन इस के बावजूद समलैंगिक संबंधों का उस का शौक कम नहीं हुआ. हसन मोदीनगर स्थित अपनी दुकान में ही सोता था, यदाकदा वहीं पर वह अपने समलैंगिक दोस्तों को बुला कर अपना शौक भी पूरा करता था.
समलैंगिक मुकेश की हसन से फेसबुक पर हुई दोस्ती
मुकेश कर्दम से करीब एक माह पहले फेसबुक के माध्यम से उस की दोस्ती हुई थी. मुकेश के साथ फेसबुक के मैसेंजर पर चैट करते हुए जब उसे पता चला कि वह भी समलैंगिक संबंधों का शौकीन है तो दोनों की दोस्ती और गाढ़ी हो गई. इस के बाद तो अकसर दोनों वाट्सऐप काल और चैट पर भी बात करने लगे.
3 बच्चों का पिता मुकेश कर्दम भी समलैंगिक संबंधों का शौकीन था. हसन और मुकेश की दोस्ती की खास बात यह थी कि दोनों ऐसे समलैंगिक थे, जिन में लडक़े और लडक़ी यानी मर्द व औरत दोनों तरह के रिश्ते बनाने की खूबियां थीं. मुकेश और हसन में बातें तो लगभग रोज ही हो रही थीं, लेकिन दोनों में इस बात की तड़प थी कि वह एक बार मौका पा कर एकदूसरे से प्यार करें. इस के लिए मुकेश को किसी मौके का इंतजार था.
मुकेश को वह मौका मिला 18 सितंबर, 2023 को जब उस की पत्नी बच्चों के साथ बुलंदशहर स्थित अपने मायके गई थी. मुकेश ने हसन को 18 सितंबर की सुबह ही बता दिया था कि आज वह अपने हापुड़ स्थित घर पर रात को अकेला रहेगा. मुकेश ने हसन से पूछा कि क्या वह आज की रात उस की मेहमाननवाजी कबूल करेगा.
हसन ने थोड़ी आनाकानी करते हुए कहा कि उस के काम का बड़ा नुकसान हो जाएगा तो मुकेश ने कहा, ‘‘अरे यार कोई बात नहीं, तुम आ तो जाओ. नुकसान का हरजा खर्चा मैं दे दूंगा.’’
इस के बाद हसन ने मुकेश की मेहमाननवाजी कबूल कर ली और वह शाम को 5 बजे दुकान बंद कर के बस में सवार हो कर हापुड़ पहुंच गया. इस दौरान हसन और मुकेश की कई बार वाट्सऐप पर चैट भी हुई और फोन पर बातचीत भी हुई.
दूसरी तरफ मुकेश भी पत्नी और बच्चों को ससुराल में छोड़ कर दोपहर तक वापस हापुड़ आ गया. उस के बाद मुकेश ने दिनभर अपनी किराने की दुकान पर काम किया. एक नए प्रेमी से मिलने की तड़प में वह दोपहर से ही बेहद उतावला था, इसलिए उस ने शाम को करीब 7 बजे अपनी दुकान बंद कर दी. उस के बाद वह बसअड्ïडे पहुंचा, जहां हसन उस का इंतजार कर रहा था.
फोन और फेसबुक की एक माह पुरानी मुलाकात के बाद 2 चाहने वाले दोस्त एकदूसरे के सामने थे, दोनों के लिए ही यह पल बेहद रोमांच पैदा करने वाला था. काफी देर तक दोनों वहीं इधरउधर की बातें करते रहे. उस के बाद मुकेश ने अपने और हसन के लिए बीयर की बोतलें और कुछ खानेपीने का सामान खरीदा और मुकेश उसे अपने घर ले आया.
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से पहाड़ों की रानी मंसूरी जाने वाले राजपुर रोड पर आनंदमयी आश्रम के पास पड़ी लाश पर सुबहसुबह किसी की नजर पड़ी तो धीरेधीरे वहां भीड़ लग गई. एकदूसरे को देख कर उत्सुकतावश लोग वहां रुकने लगे थे. लाश देख कर सभी के चेहरों पर दहशत थी.
इस की वजह यह थी कि लाश देख कर ही लग रहा था कि उस की हत्या की गई थी. किसी ने लाश पड़ी होने की सूचना थाना राजपुर को दी तो थानाप्रभारी अमरजीत सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. लाश और घटनास्थल का निरीक्षण शुरू हुआ. मृतक की उम्र 50 साल के आसपास थी. उस के गले पर दबाए जाने का निशान साफ झलक रहा था. इस का मतलब था कि उस की हत्या गला दबा कर की गई थी. उस की कनपटी पर भी चोट का निशान था.
मामला हत्या का था और यह भी साफ था कि हत्यारों ने कहीं और हत्या कर के शव को यहां ला कर फेंका था. क्योंकि वहां संघर्ष का कोई निशान नहीं था. फिर उस व्यस्त मार्ग पर किसी की हत्या करना भी आसान नहीं था.
कब कौन सा मामला पुलिस के लिए महत्त्वपूर्ण बन जाए, इस बात को खुद पुलिस भी नहीं जानती. हत्या की वारदात में जांच को आगे बढ़ाने के लिए मृतक की पहचान जरूरी होती है. इसलिए सब से पहले पुलिस ने वहां एकत्र लोगों से लाश की शिनाख्त करानी चाही. लेकिन जब कोई उस की पहचान नहीं कर सका तो पुलिस ने इस आशय से उस की जेबों की तलाशी ली कि शायद ऐसा कुछ मिल जाए, जिस से उस की शिनाख्त हो सके.
पुलिस की यह युक्ति काम कर गई. तलाशी में उस के पास से 2 मोबाइल फोन, एटीएम कार्ड और कुछ कागजात के साथ 5 लाख रुपए का एक डिमांड ड्राफ्ट मिला. इस सब से मृतक की पहचान हुई तो पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया, क्योंकि मृतक राज्य के रसूखदार कृषि मंत्री हरक सिंह रावत का निजी सचिव रहा था. वैसे तो वह जिला रुद्रप्रयाग के जखोली ब्लाक का रहने वाला था, लेकिन देहरादून में वह यमुना कालोनी स्थित हरक सिंह रावत के सरकारी आवास में रहता था.
घटना की सूचना पा कर एसएसपी केवल खुराना, एसपी (सिटी) डा. जगदीशचंद्र और सीओ (मंसूरी) जया बलूनी भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. घटनास्थल से पुलिस को ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला था, जिस से हत्यारों तक पहुंचा जा सकता. पुलिस ने लाश का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. मृतक का नाम युद्धवीर था. चूंकि वह एक मंत्री से जुड़ा था, इसलिए राजनीतिक गलियारों में सनसनी फैल गई. यह 1 अगस्त, 2013 की घटना थी.
मामला राजनीतिक व्यक्ति से जुड़ा था, इसलिए पुलिस की जवाबदेही बढ़ गई थी. पुलिस महानिदेशक बी.एस. सिद्धू और आईजी (कानून व्यवस्था) राम सिंह मीणा ने इस मामले का जल्द से जल्द खुलासा करने के निर्देश दिए. डीआईजी अमित कुमार सिन्हा ने अधीनस्थ अधिकारियों से बातचीत कर के जांच में थाना पुलिस की मदद के लिए स्पेशल औपरेशन गु्रप के प्रभारी रवि सैना को भी टीम के साथ लगा दिया था. सूचना पा कर मृतक युद्धवीर का भाई प्रदीप रावत देहरादून आ गया था. जिस की ओर से थाना राजपुर में अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया था.
अब तक की जांच में पता चला था कि युद्धवीर 2 मोबाइल नंबरों का उपयोग करता था. ये दोनों ही नंबर ड्यूअल सिम वाले मोबाइल में उपयोग में लाए जाते थे. पुलिस ने दोनों ही नंबरों की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवा ली. पूछताछ में पता चला था कि 9 अगस्त को वह सुबह ही घर से निकल गए थे. चलते समय उन्होंने कोठी के माली का मोबाइल फोन मांग लिया था. ऐसा उन्होंने पहली बार किया था.
पुलिस ने उन लोगों से पूछताछ शुरू की, जिन की युद्धवीर से 8 अगस्त को बात हुई थी. उन्हीं में से एक बलराज था. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में बलराज ने पुलिस को बताया था कि उस ने एसजीआरआर मैडिकल कालेज में अपनी भांजी का एडमिशन कराने के लिए युद्धवीर से बात की थी. इस के लिए उस ने उस से 60 लाख रुपए मांगे थे. उस ने उन्हें 5 लाख रुपए का ड्राफ्ट और 14 लाख रुपए नकद दे भी दिए थे. बाकी रकम एडमिशन होने के बाद देनी थी. लेकिन एडमिशन नहीं हुआ तो वह अपने 14 लाख रुपए वापस मांगने लगा था.
उन्हीं पैसों के लिए बलराज भी सुबह उस के पास गया था. तब उस ने उस से कहा था कि वह उस का इंतजार करे. आज वह एडमिशन करा कर आएगा या फिर पैसे वापस ले कर आएगा. कई घंटे तक वह उस का इंतजार करता रहा. जब वह नहीं आया तो उस ने उसे कई बार फोन किया. लेकिन उस ने कोई जवाब नहीं दिया. तब वह लौट गया था. रात में उस के मोबाइल फोन का स्विच औफ हो गया था.
आवास पर रहने वाले अन्य लोगों ने भी पुलिस को बताया था कि बलराज वहां आया था. उन्हीं लोगों से पूछताछ में पता चला था कि युद्धवीर दोपहर 2 बजे तक कृषि मंत्री हरक सिंह रावत के पीएसओ प्रदीप चौहान के साथ था. उस ने कहीं जाने की बात कही थी तो प्रदीप चौहान ने उसे 3 बजे के आसपास दरबार साहिब पर छोड़ा था. अंतिम लोकेशन और पूछताछ से पता चला था कि युद्धवीर शाम 6 बजे चकराता रोड स्थित नटराज सिनेमा के बाहर दिखाई दिया था.
मृतक राजनीतिक आदमी से तो जुड़ा ही था, उस का अपना भी राजनीतिक वजूद था. वह रुद्रप्रयाग के अगस्त्य मुनि क्षेत्र से जिला पंचायत सदस्य और जखोली ब्लाक का ज्येष्ठ प्रमुख भी रह चुका था. मंत्री हरक सिंह रावत ने भी उस के परिजनों को सांत्वना दे कर घटना का शीघ्र से शीघ्र खुलासे का आश्वासन दिया था. हत्या को ले कर रंजिश, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और प्रेमप्रसंग को ले कर चर्चाएं हो रही थीं. पुलिस को लूटपाट की भी संभावना लग रही थी. लेकिन यह बात समझ में नहीं आ रही थी कि वह माली का मोबाइल फोन मांग कर क्यों ले गया था.
पुलिस ने अपना सारा ध्यान इसी बात पर केंद्रित कर दिया. जांच में यह भी पता चला था कि युद्धवीर छात्र छात्राओं के एडमिशन कराने का काम करता था. ऐसे में यह भी संभावना थी कि एडमिशन न होने से खफा हो कर किसी व्यक्ति ने उस की हत्या कर दी हो. तरहतरह के सवाल उठ रहे थे, जिन का माकूल जवाब पुलिस के पास नहीं था.
जांच कर रही पुलिस टीम के हाथ एक सुबूत यह लगा था कि युद्धवीर को चकराता रोड पर जब अंतिम बार देखा गया था, तब उस के साथ एक महिला थी. अब पुलिस को यह पता लगाना था कि वह महिला कौन थी? पुलिस ने काल डिटेल्स की बारीकी से जांच की तो उस में देहरादून के ही पौश इलाके इंदिरानगर की रहने वाली सुधा पटवाल का नंबर सामने आया.
पुलिस ने उस के बारे में पता किया तो मिली जानकारी चौंकाने वाली थी. सुधा प्रौपर्टी डीलिंग से ले कर मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में एडमिशन कराने वाली शहर की जानीमानी रसूखदार लौबिस्ट थी. कई राजनैतिक लोगों से भी उस के घनिष्ठ रिश्ते थे.
दिल भी क्या अजीब चीज है, किसी पर आने से पहले यह भी नहीं सोचता कि जिस पर आ रहा है, उस पर आना भी चाहिए या नहीं? उसे तो जो भा गया, उसी पर आ गया. तब वह न तो यह देखता है कि उस से उस का रिश्ता क्या है और न ही यह देखता है कि बाद में परेशानी कितनी होगी.
ऐसा ही कुछ मथुरा के थाना वृंदावन के गांव कौथर के रहने वाले वीरेंद्र सिंह के बेटे सुभाष के साथ हुआ था. पढ़लिख कर वह मगोरा के स्कूल में पढ़ाने लगा था. उसी दौरान उस का दिल उसी स्कूल में पढ़ने वाली हेमलता पर आ गया था. हेमलता मगौरा के ही रहने वाले राधेश्याम की बेटी थी.
हेमलता उस की शिष्या थी. शिष्या और गुरु का संबंध बापबेटी की तरह होता है. लेकिन दिल ही तो है. अगर किसी पर आ गया तो न रिश्ता देखता है न अच्छाबुरा. हेमलता दिल को भायी तो सुभाष का दिल भी इस पवित्र रिश्ते से बगावत कर बैठा और शिष्या को चाहतभरी नजरों से देखने लगा. लेकिन दिल की बात हेमलता तक पहुंचाना सुभाष के लिए आसान नहीं था. इस के बावजूद दिल के हाथों मजबूर हो कर वह चाहतभरी नजरों से उस की ओर ताकने लगा. उस की इन्हीं हरकतों की वजह से जल्दी ही हेमलता उस के दिल की बात जान गई.
सुभाष ठीकठाक घर का तो था ही, देखने में भी सुंदर था ही कुंवारा भी था. इस के अलावा नौकरी भी कर रहा था. इसलिए सुभाष के दिल में उस के लिए जो है, यह जान कर हेमलता को अच्छा ही लगा. सुभाष को जैसे ही आभास हुआ कि हेमलता उस के दिल की बात का बुरा नहीं मान रही है, इस के बाद वह अपने दिल की बात को अपने दिल में नहीं रख सका.
एक दिन हेमलता अकेली ही घर जा रही थी तो सुभाष ने उसे रास्ते में रोक लिया. उस समय हेमलता भले ही अकेली थी, लेकिन रास्ता सुनसान नहीं था. इसलिए वहां दिल की बात नहीं कही जा सकती थी. मिनट, 2 मिनट बात करने पर भले ही कोई संदेह न करता, लेकिन दिल की बात कहने में समय जरूर लगता.
फिर एक बात यह भी थी कि जब दिल का गुबार निकलता है तो चेहरे के हावभाव से ही देखने वालों को पता चल जाता है कि क्या बातें हो रही हैं. यही वजह थी कि उस समय दिल की बात कहने के बजाय सुभाष ने सिर्फ इतना कहा, ‘‘हेमलता, क्या आज शाम 7 बजे तुम मुझ से मिलने स्कूल के पास आ सकती हो?’’
हेमलता कुछ कहती, उस के पहले ही सुभाष ने एक बार फिर कहा, ‘‘मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.’’
इस के बाद हेमलता का जवाब सुने बगैर सुभाष चला गया. हेमलता हैरानी से उसे जाते तब तक देखती रही, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो गया. वह जानती थी कि सुभाष ने उसे क्यों बुलाया है? अब सवाल यह था कि वह उस से मिलने आए या न आए, यही सोचते हुए वह घर पहुंच गई.
घर पहुंच कर भी हेमलता का मन बेचैन रहा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. वह कितना भी बेचैन रही, लेकिन शाम को सुभाष से मिलने जाने से खुद को रोक नहीं सकी. सहेली के घर जाने का बहाना बना कर वह स्कूल के पास पहुंची तो सुभाष मोटरसाइकिल पर बैठा उस का इंतजार कर रहा था.
उसे देख कर सुभाष ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास था कि तुम जरूर आओगी.’’
‘‘सर, यह अच्छी बात है कि आप का विश्वास नहीं टूटा. अब यह बताइए कि मुझे क्यों बुलाया है?’’
‘‘पहली बात तो यह कि अब तुम मुझे ‘सर’ नहीं कहोगी, दूसरी बात मैं ने तुम्हें यह बताने के लिए बुलाया है कि मैं तुम से प्यार करता हूं.’’
सुभाष की इस बात पर हेमलता को कोई हैरानी नहीं हुई, क्योंकि उसे पहले से ही पता था कि सुभाष ने यही कहने के लिए एकांत में बुलाया है. फिर भी बनावटी हैरानी व्यक्त करते हुए उस ने कहा, ‘‘आप यह क्या कह रहे हैं सर?’’
‘‘हेमा, मेरे दिल में जो था, वह मैं ने कह दिया, बाकी तुम जानो. यह बात सच है कि मैं तुम्हें दिल से चाहता हूं.’’
सुभाष की इन बातों से हेमलता के दिल की धड़कन एकदम से बढ़ गई. सुभाष उसे अच्छा लगता ही था. वह उसे चाहने भी लगी थी, इसलिए उस ने सुभाष को चाहतभरी नजरों से देखते हुए बड़ी ही धीमी आवाज में कहा, ‘‘प्यार तो मैं भी आप से करती हूं, लेकिन डर लगता है.’’
सुभाष ने हेमलता का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘डर किस बात का हेमा, मैं हूं न तुम्हारे साथ.’’
‘‘फिर तो मैं तुम्हारा साथ आखिरी सांस तक निभाऊंगी.’’ अपना दूसरा हाथ सुभाष के हाथ पर रखते हुए हेमलता ने कहा.
इस तरह इजहार हो गया तो हेमलता और सुभाष की दुनिया ही बदल गई थी. अब अकसर दोनों क्लास में तो मिलते ही थे, चोरीछिपे बाहर भी मिलने लगे थे. एकांत में बैठ कर दोनों भविष्य के सपने बुनते. जबकि उन्हें पता था कि वे जो सोच रहे हैं, वह उतना आसान नहीं है.
जिला मथुरा के थाना वृंदावन के गांव मगोरा के रहने वाले राधेश्याम की 3 संतानों में हेमलता उस की सब से बड़ी बेटी थी. बच्चों में सब से बड़ी होने की वजह से राधेश्याम उसे पढ़ालिखा कर किसी काबिल बनाना चाहता था. लेकिन पढ़ाई के दौरान ही पड़ोसी गांव कौथरा के रहने वाले वीरेंद्र सिंह के बेटे सुभाष से उसे प्यार हो गया.
कौथरा निवासी वीरेंद्र सिंह के 2 बेटे थे, बड़ा अरविंद और छोटा सुभाष. अरविंद उस के साथ खेती कराता था, जबकि सुभाष इंटर कालेज में जूनियर कक्षाओं में पढ़ाने वाला अध्यापक था.
मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ तो साथसाथ जीनेमरने की कसमें खाई जाने लगीं. हालांकि दोनों की जाति अलगअलग थी, इसलिए यह इतना आसान नहीं था. फिर भी दोनों ने तय कर लिया था कि कुछ भी हो, वे अपनी दुनिया बसा कर ही रहेंगे.
प्यारमोहब्बत ज्यादा दिनों तक छिपने वाली चीज तो है नहीं, इसलिए कुछ दिनों बाद राधेश्याम को भी शुभचिंतकों से पता चल गया कि बेटी गलत राह पर चल पड़ी है. पतिपत्नी ने बेटी को डांटाफटकारा भी और प्यार से समझाया भी. इस के बावजूद भी उन्हें बेटी पर विश्वास नहीं हुआ. उन्हें लगा कि जवानी की दहलीज पर खड़ी हेमलता गलत कदम उठा सकती है, इसलिए उन्होंने उस की शादी करने का विचार बना लिया.
शादी के बारे में हेमलता को पता चला तो वह घबरा गई. क्योंकि उस ने तो पहले से ही तय कर रखा था कि कुछ भी हो, वह शादी सुभाष से ही करेगी. अगले दिन उस ने यह बात सुभाष को बताई तो उस ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘तुम इतना परेशान क्यों हो? मैं हर हाल में तुम्हारे साथ हूं. तुम्हें कोई भी किसी भी हालत में मुझ से अलग नहीं कर सकता.’’
मांबाप की सख्ती के बावजूद हेमलता छिपछिप कर सुभाष से मिलती रही. जब किसी ने यह बात राधेश्याम को बताई तो बेटी के इस दुस्साहस से वह हैरान रह गया. उस ने सारी बात पत्नी निर्मला को बताई तो उस ने उसी समय हेमलता को बुला कर डांटा, ‘‘तुझे तो अपनी इज्जत की परवाह है नहीं, कम से कम हम लोगों की इज्जत का खयाल किया होता. मना करने के बावजूद तू उस से मिलती है. अब आज से तेरा स्कूल जाना बंद.’’
‘‘अगर मैं सुभाष से मिलती हूं तो इस से तुम लोगों की इज्जत कैसे बरबाद हो रही है.’’ हेमलता ने हिम्मत कर के कहा, ‘‘वह पढ़ालिखा और समझदार है. ठीकठाक घर का होने के साथ नौकरी भी करता है. फिर मैं उस से प्यार करती हूं. एक लड़की को जैसा लड़का चाहिए, उस में वे सारे गुण हैं. जीवनसाथी के रूप में उसे पा कर मैं खुश रहूंगी. इसलिए मैं उस से शादी करना चाहती हूं.’’
‘‘तेरा यह सपना कभी पूरा नहीं होगा,’’ निर्मला गुस्से से बोली, ‘‘उस से फिर कभी शादी की बात की तो काट के रख देंगे.’’
‘‘सुभाष के बिना तो मैं वैसे भी नहीं जी सकती. कहीं और शादी करने के बजाय आप लोग मुझे मार दें, मेरे लिए यही अच्छा रहेगा.’’ हेमलता ने कहा.
हेमलता ने देखा कि घर वाले नहीं मान रहे हैं तो उस ने सुभाष को फोन कर के कहा, ‘‘सुभाष जल्दी कुछ करो, वरना मेरी शादी कहीं और कर दी जाएगी. जबकि तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकती.’’
सुभाष हेमलता को सच्चा प्यार करता था, इसलिए उस ने उसे साथ भाग चलने के लिए कहा ही नहीं, बल्कि 22 जनवरी, 2014 की रात को सचमुच भगा ले गया. निर्मला और राधेश्याम को जब हेमलता के भाग जाने का पता चला तो वे सन्न रह गए. सुभाष भी घर से गायब था, इसलिए साफ हो गया कि हेमलता उसी के साथ भागी है. राधेश्याम ने जब यह बात वीरेंद्र सिंह को बताई तो वह भी परेशान हो गया. उस ने राधेश्याम को आश्वासन दिया कि वह किसी भी हालत में दोनों को ढूंढ़ कर उस की बेटी को उस के हवाले कर देगा.
लेकिन राधेश्याम को अब किसी पर भरोसा नहीं रहा था, इसलिए उस ने थाने में बेटी के भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. थानाप्रभारी अरविंद सिंह ने हेमलता को बरामद करने की कोशिश शुरू कर दी. इस के लिए उन्होंने वीरेंद्र सिंह पर दबाव बनाना शुरू किया. लेकिन उसे खुद ही बेटे के बारे में कुछ पता नहीं था, इसलिए वह मजबूर था. जबकि पुलिस उस पर लगातार दबाव बनाए हुए थी.
उसी बीच 28 जनवरी को वृंदावन के एक नाले की सफाई के दौरान एक लाश मिली. लाश का एक हाथ कटा हुआ था और उस का चेहरा बुरी तरह जलाया गया था. शायद ऐसा शिनाख्त मिटाने के लिए किया गया था. घटनास्थल पर उस की शिनाख्त नहीं हो सकी. इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और थाने लौट कर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करवा दिया.
इस बात की जानकारी वीरेंद्र सिंह को हुई तो वह थाना वृंदावन जा पहुंचा. उस ने लाश देखने की इच्छा व्यक्त की तो उसे मोर्चरी भेजा गया, जहां लाश देख कर उस ने कहा कि यह उस के बेटे सुभाष की लाश है. इस का हाथ इसलिए काट दिया गया है, क्योंकि उस हाथ पर उस का नाम गुदा हुआ था.
इस के बाद वीरेंद्र सिंह ने राधेश्याम और उस के रिश्तेदारों पर सुभाष की हत्या का आरोप लगाते हुए थाना वृंदावन में कुल 5 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.
थाना वृंदावन पुलिस ने वीरेंद्र सिंह की ओर से रिपोर्ट भले ही दर्ज कर ली थी, लेकिन पुलिस को विश्वास नहीं हो रहा था कि नाले से मिली लाश सुभाष की है. इसलिए पुलिस ने उस का डीएनए टेस्ट कराने के लिए नमूना ले कर विधि अनुसंधान प्रयोगशाला, लखनऊ भेज दिया. क्योंकि अगर लाश सुभाष की थी तो हेमलता कहां गई? मुखबिरों ने भी पुलिस को बताया था कि वह लाश सुभाष की नहीं थी.
पुलिस को भले ही वीरेंद्र सिंह के दावे पर संदेह था, फिर भी पोस्टमार्टम के बाद लाश उसे सौंप दी गई थी. इस के बाद पूरे विधिविधान से उस का अंतिम संस्कार कर दिया था.
राधेश्याम को तो पता ही था कि वह लाश सुभाष की नहीं थी. वह जिंदा है. वीरेंद्र सिंह ने सभी को बेवकूफ बनाने के लिए उस अंजान की लाश को सुभाष की लाश बता कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया था. यही वजह थी कि राधेश्याम ने गांव वालों की पंचायत इकट्ठा की और वीरेंद्र सिंह, उस के भाई राजेंद्र सिंह तथा बेटे अरविंद को भी उस पंचायत में बुलाया.
पहले तो वीरेंद्र सिंह नानुकुर करता रहा, लेकिन जब राधेश्याम ने सुभाष के जीवित होने के सुबूत पेश किए तो वीरेंद्र को मानना पड़ा कि वह जीवित है. दरअसल सब से बड़ा सुबूत तो यही था कि हेमलता का कुछ पता नहीं था. तब राधेश्याम ने पंचायत की मदद से वीरेंद्र सिंह और उस के भाई राजेंद्र सिंह को बंधक बना कर अरविंद से कहा कि वह हेमलता को ले कर आए, तभी उस के पिता और चाचा को छोड़ा जाएगा.
आखिर काफी मिन्नतों और इस वादे के बाद उन दोनों को छोड़ दिया गया कि वे जल्दी ही हेमलता को ढूंढ़ कर उस के हवाले कर देंगे.
वीरेंद्र सिंह ने पंचायत के सामने भले ही वादा कर लिया था कि वह हेमलता को ढूंढ़ कर राधेश्याम के हवाले कर देगा, लेकिन घर के आने के बाद वह अपने उस वादे को भूल गए.
इस मामले ने तब तूल पकड़ा, जब मई में डीएनए रिपोर्ट आई. डीएनए रिपोर्ट से पता चला कि नाले में मिला शव सुभाष का नहीं था. इस बीच पुलिस को पता चल गया था कि सुभाष जीवित है और दिल्ली में कहीं रह रहा है. लेकिन ठोस सुबूत न होने की वजह से पुलिस उस के घर वालों पर दबाव नहीं बना पा रही थी. लेकिन डीएनए रिपोर्ट आते ही पुलिस के हाथ ठोस सुबूत लग गया तो पुलिस ने उस के घर वालों पर दबाव बनाना शुरू किया.
पुलिस ने वीरेंद्र सिंह के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा कर पता कर लिया था कि उस के फोन से दिल्ली से फोन आता है. इस तरह पुलिस को सुभाष का नंबर ही नहीं मिल गया था, बल्कि उस के लोकेशन का भी पता चल गया था. इस के बाद पुलिस ने वीरेंद्र सिंह पर दबाव बनाया तो वह परेशान हो उठा. वीरेंद्र सिंह कुछ करता, उस के पहले ही पुलिस ने मोबाइल की मदद से जून के पहले सप्ताह में सुभाष और हेमलता को वृंदावन के बसअड्डे से गिरफ्तार कर लिया.
पुलिस सुभाष और हेमलता को थाने ले आई. पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां मजिस्ट्रेट के सामने दोनों ने स्वीकार किया कि वे एकदूसरे से प्यार करते हैं और उन्होंने दिल्ली में शादी भी कर ली है. वे बालिग हैं, इसलिए उन्हें उन की मर्जी से साथ रहने दिया जाए.
मजिस्ट्रेट के आदेश पर जहां सुभाष को जेल भेज दिया गया, वहीं हेमलता को इस आदेश के साथ नारी निकेतन भेज दिया गया कि अगली तारीख पर उस की मैडिकल जांच करा कर रिपोर्ट के साथ अदालत में पेश किया जाए.
अगली पेशी पर पुलिस ने मैडिकल रिपोर्ट के साथ हेमलता और सुभाष को अदालत में पेश किया तो मैडिकल रिपोर्ट के अनुसार हेमलता बालिग थी. वह 3 माह की गर्भवती भी थी.
हेमलता ने अपने बयान में साफ कहा था कि वह अपनी मर्जी से सुभाष के साथ गई थी और शादी भी की थी. अब वह उसी के साथ रहना भी चाहती है.
जबकि राधेश्याम हेमलता को अपनी अभिरक्षा में लेना चाहता था. वह अदालत से गुहार लगाता रहा, लेकिन अदालत ने उस की एक नहीं सुनी और हेमलता को उस की मर्जी के अनुसार सुभाष के साथ भेज दिया. सुभाष हेमा को ले कर अपने घर आ गया.
अब सवाल यह था कि नाले में मिली लाश सुभाष की नहीं थी तो फिर किस की थी. सुभाष के घर वालों को पता था कि वह लाश सुभाष की नहीं है, फिर भी उन्होंने उस की शिनाख्त ही नहीं की, बल्कि उस का अंतिम संस्कार भी किया. उन्होंने ऐसा क्यों किया?
यह जानने के लिए पुलिस ने वीरेंद्र सिंह से पूछताछ की तो उस ने कहा, ‘‘साहब, हेमलता दूसरी जाति की तो थी ही, उस के घर वाले भी काफी दबंग थे. हेमलता के घर वाले तो दबाव डाल ही रहे थे, पंचायत का भी उस पर काफी दबाव था. इस के अलावा पुलिस भी परेशान कर रही थी. जबकि उस समय सुभाष के बारे में मुझे कुछ पता नहीं था.
‘‘उसी बीच जब मुझे नाले में लाश मिलने की सूचना मिली तो मुझे लगा कि अगर मैं उस लाश की शिनाख्त सुभाष की लाश के रूप में कर देता हूं तो एक तो पुलिस के झंझट से मुक्ति मिल जाएगी, दूसरे सुभाष की हत्या का आरोप लड़की के घर वालों पर लगा दूंगा तो वे दबाव बनाने के बजाय खुद दबाव में आ जाएंगे.’’
लेकिन वीरेंद्र सिंह ने अपने बचाव के लिए जो चाल चली थी,्र इस का राधेश्याम को पता चल गया था. उसी ने पुलिस को बताया था कि नाले में मिली लाश वीरेंद्र सिंह के बेटे सुभाष की नहीं थी. क्योंकि अगर सुभाष मारा गया था तो फिर हेमलता कहां थी. उसी की बात पर पुलिस ने लाश का डीएनए टेस्ट कराया था. क्योंकि स्थितियों से पुलिस को भी आभाष हो गया था कि वीरेंद्र सिंह झूठ बोल रहा है.
दूसरी ओर दिल्ली में हेमलता के साथ रह रहे सुभाष को जब पता चला कि घर वालों ने उसे मृत घोषित कर दिया है तो वह घबरा गया. उसे लगा कि अगर उसे मृत मान लिया गया तो वह खुद को कभी जीवित साबित नहीं कर पाएगा. उस अवस्था में कहीं का नहीं रहेगा. नौकरी तो जाएगी ही, घर की प्रौपर्टी में भी वह हिस्सा नहीं ले पाएगा. यही सब सोच कर वह हेमलता को ले कर वापस आ गया था. पुलिस उस की ताक में थी ही, आते ही उसे पकड़ लिया था.
पुलिस ने वीरेंद्र सिंह के खिलाफ पुलिस को गुमराह करने का मुकदमा दर्ज कर के अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक हेमलता ससुराल में रह रही थी. वीरेंद्र सिंह की जमानत हो गई थी.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
हत्यारे की घर में हुई फ्रेंडली एंट्री
एक दूसरी बात प्राथमिक जांच में साफ हो रही थी, वह यह थी कि कातिल मुकेश का परिचित था. क्योंकि घर में किसी तरह की जोरजबरदस्ती से प्रवेश के कोई निशान नहीं मिले थे. इतना ही नहीं कातिल वारदात को अंजाम देने के बाद घर के दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद करके चला गया था. दूसरी बात जो एकदम साफ थी वो यह कि घर के अंदर से कोई भी कीमती सामान गायब नहीं हुआ था. यानी कत्ल करने वाले का मकसद चोरी या लूट करने का नहीं था, बल्कि मुकेश की हत्या करना ही था.
हत्यारे ने जिस बेरहमी से मुकेश का कत्ल किया था, उस से लग रहा था कि वह बेहद गुस्से में रहा होगा, क्योंकि उस ने तवे से मुकेश पर ताबड़तोड़ वार किए थे. फोरैंसिक टीम ने अपना काम खत्म कर लिया था, लिहाजा एसपी अभिषेक वर्मा ने एसएचओ नीरज कुमार को शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने का आदेश दिया. जिस के बाद शव का पंचनामा तैयार किया गया और उसे पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया गया.
इंसपेक्टर नीरज कुमार ने मृतक मुकेश के साले की शिकायत पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ 21 सिंतबर को भादंसं की धारा 302 (हत्या) और 201 (सबूत नष्ट करने की धारा) में मुकदमा दर्ज कर जांच का काम अपने हाथों में ले लिया. उच्चाधिकारियों के आदेश पर उन की मदद के लिए एक टीम का गठन कर दिया गया, जिस में एसआई राकेश कुमार, हैडकांस्टेबल अजीत सिंह, रविंद्र सिंह, दीपक कुमार, दिनेश कुमार और विष्णु के साथ कांस्टेबल सुनील कुमार को जांच दल में शामिल किया गया.
पोस्टर्माटम के बाद शव परिजनों को सौंपा जा चुका था. परिवार के लोग जब अंतिम संस्कार के काम से फारिग हो गए और माहौल थोड़ा शांत हो गया तो जांच अधिकारी नीरज कुमार ने सब से पहले मृतक मुकेश की पत्नी कृष्णा से यह जानना जरूरी समझा कि उन्हें अपने पति की हत्या में किसी पर शक तो नहीं है.
लेकिन कृष्णा ने जो कुछ बताया, उसे जान कर इंसपेक्टर नीरज कुमार का दिमाग ही घूम गया. कृष्णा ने बताया कि उस के पति मुकेश का अपने दोनों भाइयों राकेश और विनोद से पैतृक संपत्ति को ले कर मनमुटाव चल रहा था. उसे शक था कि उन दोनों ने ही मुकेश की या तो खुद हत्या की है या उन्होंने किसी से करवाई है.
जब तक कातिल पुलिस के हाथ में न आ जाए, तब तक पुलिस की नजर में हर शख्स कातिल ही लगता है. चूंकि मुकेश की पत्नी कृष्णा ने दोनों जेठों पर सीधे आरोप लगाया था. लिहाजा पहले जांच इसी बिंदु से शुरू हुई. पुलिस ने दोनों भाइयों को सब से पहले हिरासत में ले लिया.
उन के बारे परिवार के दूसरे सदस्यों से जानकारी ली गई तो पता चला कि दोनों बड़े भाइयों का मुकेश से एक पैतृक प्लौट को ले कर विवाद जरूर था, लेकिन विवाद ऐसा नहीं था कि दोनों भाई अपने छोटे भाई की हत्या कर दें. दोनों भाई मुकेश से बेहद प्यार करते थे. उल्टा मुकेश ही यदाकदा बड़े भाइयों से लड़ जाता, लेकिन वे नजरअंदाज कर देते थे.
पुलिस ने सच का पता लगाने के लिए मुकेश के दोनों भाइयों के मोबाइल नंबरां की काल डिटेल्स, उन की लोकेशन और वाट्सऐप चैट निकलवाई तो पता चला कि दोनों भाइयों की वारदात वाले दिन या इस के आसपास मुकेश के घर के आसपास लोकेशन भी नहीं थी. यानी उन के खिलाफ आरोप सिर्फ शक की वजह से थे, लेकिन उन के पीछे ठोस सबूत नहीं था.
हालांकि इंसपेक्टर नीरज कुमार ने मुकेश के दोनों भाइयों को अभी शक के दायरे से बाहर नहीं किया था, लेकिन उन्होंने दोनों को हिरासत से रिहा कर दिया और अपने 2 हैडकांस्टेबल को दोनों की निगरानी और कुछ अन्य जानकारियां एकत्र करने के काम पर लगा दिया.
अलगअलग टीमें जुटी जांच में
जांच अधिकारी नीरज कुमार ने अब हत्याकांड के दूसरे पहलुओं पर जांच शुरू कर दी. पुलिस की नौकरी के दौरान नीरज कुमार ने अपने अनुभव से एक बात सीखी थी कि जिस आदमी के साथ अपराध घटित होता है, उस का कारण भी उसी इंसान के इर्दगिर्द होता है. नीरज कुमार समझ गए कि हो न हो, मुकेश की हत्या का राज उसी से जुड़ा हुआ है. कातिल तक पहुंचने के लिए उन्होंने सब से पहले मुकेश कर्दम की छानबीन करने का फैसला किया.
उन्होंने अपनी टीम को 2 भागों में बांट दिया. एक टीम को मुकेश के मोबाइल की काल डिटेल्स, उस की लोकेशन और वाट्सऐप से जुड़ी सारी चैट निकालने के काम पर लगाया और साथ ही मुकेश के फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म का पता लगा कर उन की छानबीन करने का काम शुरू कर दिया. पुलिस की एक टीम मुकेश के घर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की छानबीन करने लगी.
24 घंटे के भीतर इस जांच के परिणाम सामने दिखने लगे. मोबाइल की काल डिटेल्स से पता चला कि जिस रात मुकेश की हत्या हुई थी, उस से पहले दिन में और शाम को एक मोबाइल नंबर पर मुकेश की कई बार बातचीत हुई थी. मुकेश के मोबाइल में आखिरी काल भी इस नंबर पर की गई थी और उस के बाद मुकेश का मोबाइल स्विच्ड औफ हो गया. यह करीब शाम साढ़े 7 बजे की बात है.
जांच अधिकारी इंसपेक्टर नीरज कुमार के लिए अब यह जानना बहुत जरूरी हो गया था कि वह नंबर आखिर किस का था. उस नंबर की काल डिटेल्स निकाली गई तो पता चला कि वह किसी हसन नाम के व्यक्ति के नाम पर पंजीकृत था. हसन का पता मेरठ जिले के धोलड़ी गांव का था.
काल डिटेल्स से यह भी पता चला कि मुकेश और हसन के बीच पिछले एक महीने से बातचीत का सिलसिला चल रहा था. जब हसन की लोकेशन चेक की गई तो पता चला दिन में उस की लोकेशन मोदीनगर के राज चोपड़ा के आसपास थी, जबकि शाम साढ़े 7 बजे के बाद से 19 सितंबर की सुबह 4 बजे तक उस के मोबाइल की लोकेशन मुकेश के घर के आसपास ही थी.
इस का मतलब साफ था कि हसन वारदात वाली रात को मुकेश के घर पर था. यह जानकारी बेहद काम की थी, लेकिन हत्या की गुत्थी सुलझाने और कातिल तक पहुंचने के लिए अभी कई सवालों के जवाब ढूंढे जाने बाकी थे.
जब तक बीजी और बाबूजी जिंदा थे और सुमन की शादी नहीं हुई थी, तब तक सुरेश और वंदना को बेऔलाद होने की उदासी का अहसास इतना गहरा नहीं था. घर की रौनक उदासी के अहसास को काफी हद तक हलका किए रहती थी. लेकिन सुमन की शादी के बाद पहले बाबूजी, फिर जल्दी ही बीजी की मौत के बाद हालात एकदम से बदल गए. घर में ऐसा सूनापन आया कि सुरेश और वंदना को बेऔलाद होने का अहसास कटार की तरह चुभने लगा. उन्हें लगता था कि ठीक समय पर कोई बच्चा गोद न ले कर उन्होंने बहुत बड़ी गलती की.
लेकिन इसे गलती भी नहीं कहा जा सकता था. अपनी औलाद अपनी ही होती है, इस सोच के साथ वंदना और सुरेश आखिर तक उम्मीद का दामन थामे रहे. लेकिन उन की उम्मीद पूरी नहीं हुई. कई रिश्तेदार अपना बच्चा गोद देने को तैयार भी थे, लेकिन उन्होंने ही मना कर दिया था. उम्मीद के सहारे एकएक कर के 22 साल बीत गए.
अब घर काटने को दौड़ता था. भविष्य की चिंता भी सताने लगी थी. इस मामले में सुरेश अपनी पत्नी से अधिक परेशान था. आसपड़ौस के किसी भी घर से आने वाली बच्चे की किलकारी से वह बेचैन हो उठता था. बच्चे के रोने से उसे गले लगाने की ललक जाग उठती थी. सुबह सुरेश और वंदना अपनीअपनी नौकरी के लिए निकल जाते थे. दिन तो काम में बीत जाता था. लेकिन घर आते ही सूनापन घेर लेता था. सुरेश को पता था कि वंदना जितना जाहिर करती है, उस से कहीं ज्यादा महसूस करती है.
कभीकभी वंदना के दिल का दर्द उस की जुबान पर आ भी जाता. उस वक्त वह अतीत के फैसलों की गलती मानने से परहेज भी नहीं करती थी. वह कहती, ‘‘क्या तुम्हें नहीं लगता कि अतीत में किए गए हमारे कुछ फैसले सचमुच गलत थे. सभी लोग बच्चा गोद लेने को कहते थे, हम ने ऐसा उन की बात मान कर गलती नहीं की?’’
‘‘फैसले गलत नहीं थे वंदना, समय ने उन्हें गलत बना दिया.’’ कह कर सुरेश चुप हो जाता.
ऐसे में वंदना की आंखों में एक घनी उदासी उतर आती. वह कहीं दूर की सोचते हुए सुरेश के सीने पर सिर रख कर कहती, ‘‘आज तो हम दोनों साथसाथ हैं, एकदूसरे को सहारा भी दे सकते हैं और हौसला भी. मैं तो उस दिन के खयाल से डर जाती हूं, जब हम दोनों में से कोई एक नहीं होगा?’’
‘‘तब भी कुछ नहीं होगा. किसी न किसी तरह दिन बीत जाएंगे. इसलिए ज्यादा मत सोचा करो.’’ सुरेश पत्नी को समझाता, लेकिन उस की बातों में छिपी सच्चाई को जान कर खुद भी बेचैन हो उठता.
भविष्य तो फिलहाल दीवार पर लिखी इबारत की तरह एकदम साफ था. सुरेश को लगता था कि वंदना भले ही जुबान से कुछ न कहे, लेकिन वह किसी बच्चे को गोद लेना चाहती है. घर के सूनेपन और भविष्य की चिंता ने सुरेश के मन को भी भटका दिया था. उसे भी लगता था कि घर की उदासी और सूनेपन में वंदना कहीं डिप्रैशन की शिकार न हो जाए.
लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी था कि उम्र के इस पड़ाव पर किसी बच्चे को गोद लेना क्या समझदारी भरा कदम होगा? सुरेश 50 की उम्र पार कर चुका था, जबकि वंदना भी अगले साल उम्र के 50वें साल में कदम रखने जा रही थी. ऐसे में क्या वे बच्चे का पालनपोषण ठीक से कर पाएंगे?
काफी सोचविचार और जद्दोजहद के बाद सुरेश ने महसूस किया कि अब ऐसी बातें सोचने का समय नहीं, निर्णय लेने का समय है. बच्चा अब उस की और वंदना की बहुत बड़ी जरूरत है. वही उन के जीवन की नीरसता, उदासी और सूनेपन को मिटा सकता है.
सुरेश ने इस बारे में वंदना से बात की तो उस की बुझी हुई आंखों में एक चमक सी आ गई. उस ने पूछा, ‘‘क्या अब भी ऐसा हो सकता है?’’
‘‘क्यों नहीं हो सकता, हम इतने बूढ़े भी नहीं हो गए हैं कि एक बच्चे को न संभाल सकें.’’ सुरेश ने कहा.
बच्चे को गोद लेने की उम्मीद में वंदना उत्साह से भर उठी. लेकिन सवाल यह था कि बच्चा कहां से गोद लिया जाए. किसी अनाथालय से बच्चा गोद लेना असान नहीं था. क्योंकि गोद लेने की शर्तें और नियम काफी सख्त थे. रिश्तेदारों से भी अब कोई उम्मीद नहीं रह गई थी. किसी अस्पताल में नाम लिखवाने से भी महीनों या वर्षों लग सकते थे.
ऐसे में पैसा खर्च कर के ही बच्चा जल्दी मिल सकता था. मगर बच्चे की चाहत में वे कोई गलत और गैरकानूनी काम नहीं करना चाहते थे. जब से दोनों ने बच्चे को गोद लेने का मन बनाया था, तब से वंदना इस मामले में कुछ ज्यादा ही बेचैन दिख रही थी. शायद उस के नारी मन में सोई ममता शिद्दत से जाग उठी थी.
एक दिन शाम को सुरेश घर लौटा तो पत्नी को कुछ ज्यादा ही जोश और उत्साह में पाया. वह जोश और उत्साह इस बात का अहसास दिला रहा था कि बच्चा गोद लेने के मामले में कोई बात बन गई है. उस के पूछने की नौबत नहीं आई, क्योंकि वंदना ने खुद ही सबकुछ बता दिया.
वंदना के अनुसार, वह जिस स्कूल में पढ़ाती थी, उस स्कूल के एक रिक्शाचालक जगन की बीवी को 2 महीने पहले दूसरी संतान पैदा हुई थी. उस के 2 बेटे हैं. जगन अपनी इस दूसरी संतान को रखना नहीं चाहता था. वह उसे किसी को गोद देना चाहता था.
‘‘उस के ऐसा करने की वजह?’’ सुरेश ने पूछा, तो वंदना खुश हो कर बोली, ‘‘वजह आर्थिक हो सकती है. मुझे पता चला है, जगन पक्का शराबी है. जो कमाता है, उस का ज्यादातर हिस्सा पीनेपिलाने में ही उड़ा देता है. शराब की लत की वजह से उस का परिवार गरीबी झेल रहा है. मैं ने तो यह भी सुना है कि शराब की ही वजह से जगन ने ऊंचे ब्याज पर कर्ज भी ले रखा है. कर्ज न लौटा पाने की वजह से लेनदार उसे परेशान कर रहे हैं.
सुनने में आया है कि एक दिन उस का रिक्शा भी उठा ले गए थे. उन्होंने बड़ी मिन्नतों के बाद उस का रिक्शा वापस किया था. मुझे लगता है, जगन अपना यह दूसरा बच्चा किसी को गोद दे कर जिम्मेदारी से छुटकारा पाना चाहता है. इसी बहाने वह अपने सिर पर चढ़ा कर्ज भी उतार देगा.’’
‘‘इस का मतलब वह अपनी मुसीबतों से निजात पाने के लिए अपने बच्चे का सौदा करना चाहता है?’’ सुरेश ने व्यंग्य किया.
‘‘कोई भी आदमी बिना किसी स्वार्थ या मजबूरी के अपना बच्चा किसी दूसरे को क्यों देगा?’’ वंदना ने कहा तो सुरेश ने पूछा, ‘‘जगन की बीवी भी बच्चा देने के लिए तैयार है?’’
‘‘तैयार ही होगी. बिना उस के तैयार हुए जगन यह सब कैसे कर सकता है?’’
वंदना की बातें सुन कर सुरेश सोच में डूब गया. उसे सोच में डूबा देख कर वंदना बोली, ‘‘अगर तुम्हें ऐतराज न हो तो मैं जगन से बच्चे के लिए बात करूं?’’
‘‘बच्चा गोद लेने का फैसला हम दोनों का है. ऐसे में मुझे ऐतराज क्यों होगा?’’ सुरेश बोला.
‘‘मैं जानती हूं, फिर भी मैं ने एक बार तुम से पूछना जरूरी समझा.’’
2 दिनों बाद वंदना ने सुरेश से कहा, ‘‘मैं ने स्कूल के चपरासी माधोराम के जरिए जगन से बात कर ली है. वह हमें अपना बच्चा पूरी लिखापढ़ी के साथ देने को राजी है. लेकिन इस के बदले 15 हजार रुपए मांग रहा है. मेरे खयाल से यह रकम ज्यादा नहीं है?’’
‘‘नहीं, बच्चे न तो बिकाऊ होते हैं और न उन की कोई कीमत होती है.’’
‘‘मैं जगन से उस का पता ले लूंगी. हम दोनों कल एकसाथ चल कर बच्चा देख लेंगे. तुम कल बैंक से कुछ पैसे निकलवा लेना. मेरे खयाल से इस मौके को हमें हाथ से नहीं जाने देना चाहिए.’’ वंदना ने बेसब्री से कहा.
उस की बात पर सुरेश ने खामोशी से गर्दन हिला दी.
अगले दिन सुरेश शाम को वापस आया तो वंदना तैयार बैठी थी. सुरेश के आते ही उस ने कहा, ‘‘मैं चाय बनाती हूं. चाय पी कर जगन के यहां चलते हैं.’’
कुछ देर में वंदना 2 प्याले चाय ला कर एक प्याला सुरेश को देते हुए बोली, ‘‘वैसे तो अभी पैसों की जरूरत नहीं लगती. फिर भी तुम ने बैंक से पैसे निकलवा लिए हैं या नहीं?’’
‘‘हां.’’ सुरेश ने चाय की चुस्की लेते हुए उत्साह में कहा.
चाय पी कर दोनों घर से निकल पड़े. आटोरिक्शा से दोनों जगन के घर जा पहुंचे. जगन का घर क्या 1 गंदी सी कोठरी थी, जो काफी गंदी बस्ती में थी. उस के घर की हालत बस्ती की हालत से भी बुरी थी. छोटे से कमरे में एक टूटीफूटी चारपाई, ईंटों के बने कच्ची फर्श पर एक स्टोव और कुछ बर्तन पड़े थे. कुल मिला कर वहां की हर चीज खामेश जुबान से गरीबी बयां कर रही थी.
जगन का 5 साल का बेटा छोटे भाई के साथ कमरे के कच्चे फर्श पर बैठा प्लास्टिक के एक खिलौने से खेल रहा था, जबकि उस की कुपोषण की शिकार पत्नी तीसरे बच्चे को छाती से चिपकाए दूध पिला रही थी. इसी तीसरे बच्चे को जगन सुरेश और वंदना को देना चाहता था. जगन ने पत्नी से बच्चा दिखाने के लिए मांगा.
पत्नी ने खामोश नजरों से पहले जगन को, उस के बाद सुरेश और वंदना को देखा, फिर कांपते हाथों से बच्चे को जगन को थमा दिया. उसी समय सुरेश के मन में शूल सा चुभा. उसे लगा, वह और वंदना बच्चे के मोह में जो करने जा रहे हैं, वह गलत और अन्याय है.
जगन ने बच्चा वंदना को दे दिया. बच्चा, जो एक लड़की थी सचमुच बड़ी प्यारी थी. नाकनक्श तीखे और खिला हुआ साफ रंग था. वंदना के चेहरे के भावों से लगता था कि बच्ची की सूरत ने उस की प्यासी ममता को छू लिया था.
बच्ची को छाती से चिपका कर वंदना ने एक बार उसे चूमा और फिर जगन को देते हुए बोली, ‘‘अब से यह बच्ची हमारी हुई जगन. लेकिन हम इसे लिखापढ़ी के बाद ही अपने घर ले जाएंगे. कल रविवार है. परसों कचहरी खुलने पर किसी वकील के जरिए सारी लिखापढ़ी कर लेंगे. एक बात और कह दूं, बच्चे के मामले में तुम्हारी बीवी की रजामंदी बेहद जरूरी है. लिखापढ़ी के कागजात पर तुम्हारे साथसाथ उस के भी दस्तखत होंगे.’’
‘‘हम सबकुछ करने को तैयार हैं.’’ जगन ने कहा.
‘‘ठीक है, हम अभी तुम्हें कुछ पैसे दे रहे हैं, बाकी के सारे पैसे तुम्हें लिखापढ़ी के बाद बच्चा लेते समय दे दूंगी.’’
जगन ने सहमति में गर्दन हिला दी. इस के बाद वंदना ने सुरेश से जगन को 3 हजार रुपए देने के लिए कहा. वंदना के कहने पर उस ने पर्स से 3 हजार रुपए निकाल कर जगन को दे दिए.
जगन को रुपए देते हुए सुरेश कनखियों से उस की पत्नी को देख रहा था. वह बच्चे को सीने से कस कर चिपकाए जगन और सुरेश को देख रही थी. सुरेश को जगन की पत्नी की आंखों में नमी और याचना दिखी, जिस से सुरेश का मन बेचैन हो उठा.
जगन के घर से आते समय सुरेश पूरे रास्ते खामोश रहा. बच्चे को सीने से चिपकाए जगन की पत्नी की आंखें सुरेश के जेहन से निकल नहीं पा रही थीं, सारी रात सुरेश ठीक से सो नहीं सका. जगन की पत्नी की आंखें उस के खयालों के इर्दगिर्द चक्कर काटती रहीं और वह उलझन में फंसा रहा.
अगले दिन रविवार था. दोनों की ही छुट्टी थी. वंदना चाहती थी कि बच्चे को गोद लेने के बारे में किसी वकील से पहले ही बात कर ली जाए. इस बारे में वह सुरेश से विस्तार से बात करना चाहती थी. लेकिन नाश्ते के समय उस ने उसे उखड़ा हुआ सा महसूस किया.
उस से रहा नहीं गया तो उस ने पूछा, ‘‘मैं देख रही हूं कि जगन के यहां से आने के बाद से ही तुम खामोश हो. तुम्हारे मन में जरूर कोई ऐसी बात है, जो तुम मुझ से छिपा रहे हो?’’
सुरेश ने हलके से मुसकरा कर चाय के प्याले को होंठों से लगा लिया. कहा कुछ नहीं. तब वंदना ही आगे बोली. ‘‘हम एक बहुत बड़ा फैसला लेने जा रहे हैं. इस फैसले को ले कर हम दोनों में से किसी के मन में किसी भी तरह की दुविधा या बात नहीं होनी चाहिए. मैं चाहती हूं कि अगर तुम्हारे मन में कोई बात है तो मुझ से कह दो.’’
चाय का प्याला टेबल पर रख कर सुरेश ने एक बार पत्नी को गहरी नजरों से देखा. उस के बाद आहिस्ता से बोला, ‘‘जगन के यहां हम दोनों एक साथ, एक ही मकसद से गए थे वंदना. लेकिन तुम बच्चे को देख रही थी और मैं उसे जन्म देने उस की मां को. इसलिए मेरी आंखों ने जो देखा, वह तुम नहीं देख सकीं. वरना तुम भी अपने सीने में वैसा ही दर्द महसूस करती, जैसा कि मैं कर रहा हूं.’’
वंदना की आंखों में उलझन और हैरानी उभर गई. उस ने कहा, ‘‘तुम क्या कहना चाहते हो, मैं समझी नहीं?’’
सुरेश के होठों पर एक फीकी मुसकराहट फैल गई. वह बोला, ‘‘जगन के यहां से आने के बाद मैं लगातार अपने आप से ही लड़ रहा हूं वंदना. बारबार मुझे लग रहा है कि जगन से उस का बच्चा ले कर हम एक बहुत बड़ा गुनाह करने जा रहे हैं. मैं ने तुम्हारी आंखों में औलाद के न होने का दर्द देखा है. मगर मुझे जगन की बीवी की आंखों में जो दर्द दिखा, वह शायद तुम्हारे इस दर्द से भी कहीं बड़ा था. इन दोनों दर्दों का एक ही रंग है, वजह भले ही अलगअलग हो.’’
बहुत दिनों से खिले हुए वंदना के चेहरे पर एकाएक निराशा की बदली छा गई. उस ने उदासी से कहा, ‘‘लगता है, तुम ने बच्चे को गोद लेने का इरादा बदल दिया है?’’
‘‘मैं ने बच्चा गोद लेने का नहीं, जगन के बच्चे को गोद लेने का इरादा बदल दिया है.’’
‘‘क्यों?’’ वंदना ने झल्ला कर पूछा.
‘‘जगन एक तरह से अपना कर्ज उतारने के लिए बच्चा बेच रहा है. वंदना यह फैसला उस का अकेले का है. इस में उस की पत्नी की रजामंदी बिलकुल नहीं है. जब वह बच्चे को अपने सीने से अलग कर के तुम्हें दे रही थी. तब मैं ने उस की उदास आंखों में जो तड़प और दर्द देखा था, वह मेरी आत्मा को आरी की तरह काट रहा है. हमें औलाद का दर्द है. अपने इस दर्द को दूर करने के लिए हमें किसी को भी दर्द देने का हक नहीं है.’’
सुरेश की इस बात पर वंदना सोचते हुए बोली, ‘‘हम बच्चा लेने से मना भी कर दें तो क्या होगा? जगन किसी दूसरे से पैसे ले कर उसे बच्चा दे देगा. हम जैसे तमाम लोग बच्चे के लिए परेशान हैं.’’
‘‘अगर हम बच्चा नहीं लेते तो किसी दूसरे को भी जगन को बच्चा नहीं देने देंगे.’’
‘‘वह कैसे?’’ वंदना ने पूछा.
‘‘जगन अपना कर्ज उतारने के लिए बच्चा बेच रहा है. अगर हम उस का कर्ज उतार दें तो वह बच्चा क्यों बेचेगा? पैसे देने से पहले हम उस से लिखवा लेंगे कि वह अपना बच्चा किसी दूसरे को अब नहीं देगा. इस के बाद अगर वह शर्त तोड़ेगा तो हम पुलिस की मदद लेंगे. साथ ही हम बच्चा गोद लेने की कोशिश भी करते रहेंगे. मैं कोई ऐसा बच्चा गोद नहीं लेना चाहता, जिस के पीछे देने वाले की मजबूरी और जन्म देने वाली मां का दर्द और आंसू हो.’’
सुरेश ने जब अपनी बात खत्म की, तो वंदना उसे टुकरटुकर ताक रही थी.
‘‘ऐसे क्या देख रही हो?’’ सुरेश ने पूछा तो वह मुसकरा कर बोली, ‘‘देख रही हूं कि तुम कितने महान हो, मुझे तुम्हारी पत्नी होने पर गर्व है.’’
सुरेश ने उस का हाथ अपने हाथों में ले कर हलके से दबा दिया. उसे लगा कि उस की आत्मा से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया है.