शराफत का इनाम – भाग 3

करीमभाई को कुछ सालों पहले ऐनजाइमा की तकलीफ हुई थी. डाक्टर ने उन्हें जुबान के नीचे रखने वाली गोली दी थी. उन्होंने कांपते हाथों से गोली जुबान के नीचे रखी. आंखें बंद कर के गहरीगहरी सांसें लेने लगे. थोड़ी तबीयत संभली तो घर के लिए रवाना हो गए.

‘‘क्या बात है, आप कुछ परेशान से लग रहे हैं?’’ रूमाना ने उन के घर पहुंचते ही पूछा.

‘‘हां, कुछ परेशानी है. तुम बहुत खुश लग रही हो?’’

‘‘हां, खबर ही खुशी की है. लेकिन पहले आप बताइए कि क्यों परेशान हैं?’’

करीमभाई कुछ देर टहलते रहे, उस के बाद सोच कर बोले, ‘‘आज हारुन हमारे औफिस में आया था.’’

‘‘हारुन आया था?’’ रूमाना ने हैरानी से पूछा. इस के बाद बिफर कर बोली, ‘‘आप ने उसे औफिस से निकलवा क्यों नहीं दिया?’’

‘‘मैं यही करता, लेकिन रूमाना, तुम यह बताओ कि हारुन ने तुम्हें जबानी तलाक दिया था या लिख कर दिया था?’’

‘‘जबानी दिया था. मगर इस से क्या फर्क पड़ता है. तलाक तो तलाक है, जबानी दे या लिख कर दे. तलाक तो हो जाता है.’’ वह सादगी से बोली. करीमभाई ने सिर पर हाथ मार कर कहा, ‘‘तुम बड़ी मासूम हो. तुम्हें नहीं मालूम कि आजकल जमाना कितना खराब हो गया है. अगर तुम्हारे पास कोई सुबूत नहीं है तो अदालत में यही माना जाएगा कि उस ने तुम्हें तलाक नहीं दिया है.’’

रूमाना हैरान रह गई, ‘‘आप…आप का मतलब है कि वह कमीना आदमी 4 साल बाद यह दावा ले कर आया है कि तलाक नहीं हुआ है.’’

‘‘हां, उस के पास निकाहनामे की कौपी है. रजिस्ट्रार औफिस की रजिस्टर्ड कौपी है.’’ यह कह कर निकाह की कौपी रूमाना के हाथ में दे दी, जो हारुन छोड़ कर गया था.

‘‘बकवास करता है कमबख्त.’’ रूमाना ने गुस्से से निकाहनामा फाड़ कर फेंक दिया. इस के बाद गुस्से से कांपते हुए बोली, ‘‘कोई संबंध नहीं है हारुन से मेरा, मैं आप की बीवी हूं.’’ कह कर रूमाना रोने लगी.

‘‘मैं जानता हूं.’’ करीमभाई ने कहा और रोती हुई रूमाना को सीने से लगा कर चुप कराने लगे.

‘‘आज मैं आप को एक खुशखबरी सुनाने वाली थी कि यह मनहूस खबर आ गई.’’

‘‘कैसी खुशखबरी?’’ सेठ करीमभाई ने पूछा.

रूमाना ने शरमाते हुए कहा, ‘‘मैं मां बनने वाली हूं. आज ही मैं डाक्टर के पास गई थी.’’

करीमभाई खुश हो गए. उन्होंने बड़े विश्वास के साथ कहा, ‘‘अब तुम फिक्र मत करो, मैं सारा मामला निपटा लूंगा.’’

‘‘आप क्या करेंगे? पुलिस में जाएंगे?’’

‘‘नहीं, पुलिसअदालत में जाने से मामला बिगड़ जाएगा. मेरे पास एक तरीका है, मैं उस का मुंह बंद कर दूंगा.’’

बाद में हारुन ने रूमाना को फोन कर के कहा, ‘‘तुम ने अपनी भूमिका बहुत अच्छी तरह अदा की है. बच्चे के बारे में सुन कर बुड्ढा तो दीवाना हो गया होगा?’’

‘‘हां हारुन, लेकिन मुझे डर लग रहा है. उस ने कहा है कि उस के पास उस का मुंह बंद करने का एक तरीका है.’’

‘‘अरे वह रकम दे कर मुंह बंद कराने की बात कर रहा होगा.’’ हारुन ने कहा.

‘‘नहीं, सोचो वह अरबपति है. उस के पास दौलत की ताकत है. अगर उस ने इस ताकत को तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल किया तो..? मैं ने 2 बार पूछा कि कौन सा तरीका है तो उस ने कोई जवाब नहीं दिया. रकम की बात होती तो वह मुझ से जरूर बता देता.’’

रूमाना की इस बात से हारुन परेशान हो गया. इस से पहले उन्होंने जिन 5 लोगों को इसी तरह फांसा था, उन में से कोई भी इतना दौलतमंद नहीं था.

वैसे तो करीमभाई देखने में बहुत शरीफ था, दौलत का इस्तेमाल कर के पुलिस को मिलाने और किराए के किलर की व्यवस्था करने में उसे कोई परेशानी नहीं होगी. उस के पास कई औप्शन थे. हारुन बुनियादी तौर पर बुजदिल आदमी था. उस ने रूमाना से पूछा, ‘‘तुम क्या सोचती हो?’’

‘‘मेरी सलाह तो यही है कि अब तुम उस के सामने मत जाना. फोन पर बात करो और यह सिम बंद कर दो या जब बात करनी हो तभी चालू करो, क्योंकि यह सिम तुम्हारे नाम है. वह तुम्हें ब्लैकमेलिंग में फंसा सकता है. एक बात और याद रखना हारुन, तुम ने वादा किया था कि यह आखिरी बार है. इस के बाद हम बाहर चले जाएंगे.’’

हारुन ने एक बार फिर वही यकीन दिलाया, जो पहले भी कई बार दिला चुका था. वह चालबाज, शातिर आदमी था. उस का और रूमाना का 7 साल से ज्यादा का साथ था.

दोनों ने घर से भाग कर शादी की थी. रूमाना एक बहुत अच्छे खानदान की लड़की थी, लेकिन कमउम्र में मोहब्बत के जज्बात में आ कर उस के साथ भाग गई थी और शादी कर ली थी. रूमाना के घर वाले हारुन को बिलकुल नहीं पसंद करते थे. हारुन को घरगृहस्थी में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उस का मकसद बस दौलत कमाना और अय्याशी करना था.

दोनों कई शहरों में रहे और हर जगह इसी तरह चक्कर चला कर कई लोगों को ब्लैकमेल किया. रूमाना मजबूर थी. वह घर भी वापस नहीं जा सकती थी. घर जाने पर उस के दोनों भाई उसे जिंदा जला देते.

हारुन ने रूमाना को जिस रास्ते पर चलाया था, वह उस पर चलने को मजबूर थी. इसी वजह से उन्होंने काफी दौलत जमा कर ली थी. इस के अलावा भी हारुन उल्टेसीधे तरीकों से पैसे कमाता रहता था. ऐसे कामों में रूमाना उस का साथ देतेदेते तंग आ चुकी थी. यह भी कह सकते हैं कि वह थक चुकी थी. उस का कहना था कि यह आखिरी बार है, इस के बाद वे बाहर चले जाएंगे.

करीमभाई लगातार कोशिश कर रहे थे, लेकिन हारुन का नंबर नहीं लग रहा था. वह लगातार बंद बता रहा था. उस ने 2 दिन का समय दिया था. एक ही दिन उन के पास था. वह सोच रहे थे कि हारुन न जाने कितनी रकम पर राजी होगा? काम में उन का मन बिलकुल नहीं लग रहा था. उन्होंने फाइलें बंद कर दीं. बारबार उन का ध्यान मोबाइल पर जा रहा था. इस के पहले वह कभी इतना परेशान नहीं हुए थे.

कहां खुशी मनाने का मौका था और वह परेशान थे. फोन की घंटी बजी तो उन्होंने लपक कर उठाया. लेकिन यह रूमाना का फोन था. उस ने पूछा, ‘‘हारुन का कोई फोन आया? मुझे डर लग रहा है.’’

‘‘तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है, मैं सब संभाल लूंगा. अगर घी सीधी अंगुली से नहीं निकला तो मुझे अंगुली टेढ़ी करना भी आता है. मुझे पता है कि मुझे क्या करना है.’’ करीमभाई ने दृढ़ता से कहा.

रूमाना ने धीरे से कहा, ‘‘शादी के बाद मैं बहुत खुश थी. खुद को बहुत महफूज समझ रही थी, लेकिन यह बखेड़ा खड़ा हो गया.’’

‘‘तुम बिलकुल फिक्र मत करो, सब ठीक हो जाएगा.’’

बेईमान बनाया प्रेम ने

अगर पत्नी पसंद न हो तो आज के जमाने में उस से छुटकारा पाना आसान नहीं है. क्योंकि दुनिया इतनी तरक्की कर चुकी है कि आज पत्नी को आसानी से तलाक भी नहीं दिया जा सकता. अगर आप सोच रहे हैं कि हत्या कर के छुटाकारा पाया जा सकता है तो हत्या करना तो आसान है, लेकिन लाश को ठिकाने लगाना आसान नहीं है.

इस के बावजूद दुनिया में ऐसे मर्दों की कमी नहीं है, जो पत्नी को मार कर उस की लाश को आसानी से ठिकाने लगा देते हैं. ऐसे भी लोग हैं जो जरूरत पडऩे पर तलाक दे कर भी पत्नी से छुटकारा पा लेते हैं. लेकिन यह सब वही लोग करते हैं, जो हिम्मत वाले होते हैं.

हिम्मत वाला तो पुष्पक भी था, लेकिन उस के लिए समस्या यह थी कि पारिवारिक और भावनात्मक लगाव की वजह से वह पत्नी को तलाक नहीं देना चाहता था. पुष्पक सरकारी बैंक में कैशियर था. उस ने स्वाति के साथ वैवाहिक जीवन के 10 साल गुजारे थे. अगर मालिनी उस की धडक़नों में न समा गई होती तो शायद बाकी का जीवन भी वह स्वाति के ही साथ बिता देता.

उसे स्वाति से कोई शिकायत भी नहीं थी. उस ने उस के साथ दांपत्य के जो 10 साल बिताए थे, उन्हें भुलाना भी उस के लिए आसान नहीं था. लेकिन इधर स्वाति में कई ऐसी खामियां नजर आने लगी थीं, जिन से पुष्पक बेचैन रहने लगा था. जब किसी मर्द को पत्नी में खामियां नजर आने लगती हैं तो वह उस से छुटकारा पाने की तरकीबें सोचने लगता है. इस के बाद उसे दूसरी औरतों में खूबियां ही खूबियां नजर आने लगती हैं. पुष्पक भी अब इस स्थिति में पहुंच गया था.

उसे जो वेतन मिलता था, उस में वह स्वाति के साथ आराम से जीवन बिता रहा था, लेकिन जब से मालिनी उस के जीवन में आई, तब से उस के खर्च अनायास बढ़ गए थे. इसी वजह से वह पैसों के लिए परेशान रहने लगा था. उसे मिलने वाले वेतन से 2 औरतों के खर्च पूरे नहीं हो सकते थे. यही वजह थी कि वह दोनों में से किसी एक से छुटकारा पाना चाहता था.

जब उस ने मालिनी से छुटकारा पाने के बारे में सोचा तो उसे लगा कि वह उसे जीवन के एक नए आनंद से परिचय करा कर यह सिद्ध कर रही है. जबकि स्वाति में वह बात नहीं है, वह हमेशा ऐसा बर्ताव करती है जैसे वह बहुत बड़े अभाव में जी रही है. लेकिन उसे वह वादा याद आ गया, जो उस ने उस के बाप से किया था कि वह जीवन की अंतिम सांसों तक उसे जान से भी ज्यादा प्यार करता रहेगा.

पुष्पक इस बारे में जितना सोचता रहा, उतना ही उलझता गया. अंत में वह इस निर्णय पर पहुंचा कि वह मालिनी से नहीं, स्वाति से छुटकारा पाएगा. वह उसे न तो मारेगा, न ही तलाक देगा. वह उसे छोड़ कर मालिनी के साथ कहीं भाग जाएगा.

यह एक ऐसा उपाय था, जिसे अपना कर वह आराम से मालिनी के साथ सुख से रह सकता था. इस उपाय में उसे स्वाति की हत्या करने के बजाय अपनी हत्या करनी थी. सच में नहीं, बल्कि इस तरह कि उसे मरा हुआ मान लिया जाए. इस के बाद वह मालिनी के साथ कहीं सुख से रह सकता था.

उस ने मालिनी को अपनी परेशानी बता कर विश्वास में लिया. इस के बाद दोनों इस बात पर विचार करने लगे कि वह किस तरह आत्महत्या का नाटक करे कि उस की साजिश सफल रहे. अंत में तय हुआ कि वह समुद्र तट पर जा कर खुद को लहरों के हवाले कर देगा. तट की ओर आने वाली समुद्री लहरें उस की जैकेट को किनारे ले आएंगी. जब उस जैकेट की तलाशी ली जाएगी तो उस में मिलने वाले पहचानपत्र से पता चलेगा कि पुष्पक मर चुका है.

उसे पता था कि समुद्र में डूब कर मरने वालों की लाशें जल्दी नहीं मिलतीं, क्योंकि बहुत कम लाशें ही बाहर आ पाती हैं. ज्यादातर लाशों को समुद्री जीव चट कर जाते हैं. जब उस की लाश नहीं मिलेगी तो यह सोच कर मामला रफादफा कर दिया जाएगा कि वह मर चुका है. इस के बाद देश के किसी महानगर में पहचान छिपा कर वह आराम से मालिनी के साथ बाकी का जीवन गुजारेगा.

लेकिन इस के लिए काफी रुपयों की जरूरत थी. उस के हाथों में रुपए तो बहुत होते थे, लेकिन उस के अपने नहीं. इस की वजह यह थी कि वह बैंक में कैशियर था. लेकिन उस ने आत्महत्या क्यों की, यह दिखाने के लिए उसे खुद को लोगों की नजरों में कंगाल दिखाना जरूरी था. योजना बना कर उस ने यह काम शुरू भी कर दिया.

कुछ ही दिनों में उस के साथियों को पता चला गया कि वह एकदम कंगाल हो चुका है. बैंक कर्मचारी को जितने कर्ज मिल सकते थे, उस ने सारे के सारे ले लिए थे. उन कर्जों की किस्तें जमा करने से उस का वेतन काफी कम हो गया था. वह साथियों से अकसर तंगी का रोना रोता रहता था. इस हालत से गुजरने वाला कोई भी आदमी कभी भी आत्महत्या कर सकता था.

पुष्पक का दिल और दिमाग अपनी इस योजना को ले कर पूरी तरह संतुष्ट था. चिंता थी तो बस यह कि उस के बाद स्वाति कैसे जीवन बिताएगी? वह जिस मकान में रहता था, उसे उस ने भले ही बैंक से कर्ज ले कर बनवाया था. लेकिन उस के रहने की कोई चिंता नहीं थी. शादी के 10 सालों बाद भी स्वाति को कोई बच्चा नहीं हुआ था. अभी वह जवान थी, इसलिए किसी से भी विवाह कर के आगे की जिंदगी सुख और शांति से बिता सकती थी. यह सोच कर वह उस की ओर से संतुष्ट हो गया था.

बैंक से वह मोटी रकम उड़ा सकता था, क्योंकि वह बैंक का हैड कैशियर था. सारे कैशियर बैंक में आई रकम उसी के पास जमा कराते थे. वही उसे गिन कर तिजोरी में रखता था. उसे इसी रकम को हथियाना था. उस रकम में कमी का पता अगले दिन बैंक खुलने पर चलता. इस बीच उस के पास इतना समय रहता कि वह देश के किसी दूसरे महानगर में जा कर आसानी से छिप सके.

लेकिन बैंक की रकम में हेरफेर करने में परेशानी यह थी कि ज्यादातर रकम छोटे नोटों में होती थी. वह छोटे नोटों को साथ ले जाने की गलती नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने सोचा कि जिस दिन उसे रकम का हेरफेर करना होगा, उस दिन वह बड़े नोट किसी को नहीं देगा. इस के बाद वह उतने ही बड़े नोट साथ ले जाएगा, जितने जेबों और बैग में आसानी से जा सके.

पुष्पक का सोचना था कि अगर वह 20 लाख रुपए भी ले कर निकल गया तो उन्हीं से कोई छोटामोटा कारोबार कर के मालिनी के साथ नया जीवन शुरू करेगा. 20 लाख की रकम इस महंगाई के दौर में कोई ज्यादा बड़ी रकम तो नहीं है, लेकिन वह मेहनत से काम कर के इस रकम को कई गुना बढ़ा सकता है.

जिस दिन उस ने पैसे ले कर भागने की तैयारी की थी, उस दिन रास्ते में एक हैरान करने वाली घटना घट गई. जिस बस से वह बैंक जा रहा था, उस का कंडक्टर एक सवारी से लड़ रहा था. सवारी का कहना था कि उस के पास पैसे नहीं हैं, एक लौटरी का टिकट है. अगर वह उसे खरीद ले तो उस के पास पैसे आ जाएंगे, तब वह टिकट ले लेगा. लेकिन कंडक्टर मना कर रहा था.

पुष्पक ने झगड़ा खत्म करने के लिए वह टिकट 50 रुपए में खरीद लिया. उस टिकट को उस ने जैकेट की जेब में रख लिया.

आत्महत्या के नाटक को अंजाम तक पहुंचाने के बाद वह फोर्ट पहुंचा और वहां से कुछ जरूरी चीजें खरीद कर एक रेस्टोरैंट में बैठ गया. चाय पीते हुए वह अपनी योजना पर मुसकरा रहा था. तभी अचानक उसे एक बात याद आई. उस ने आत्महत्या का नाटक करने के लिए अपनी जो जैकेट लहरों के हवाले की थी, उस में रखे सारे रुपए तो निकाल लिए थे, लेकिन लौटरी का वह टिकट उसी में रह गया था.

उसे बहुत दुख हुआ. घड़ी पर नजर डाली तो उस समय रात के 10 बज रहे थे. अब उसे तुरंत स्टेशन के लिए निकलना था. उस ने सोचा, जरूरी नहीं कि उस टिकट में इनाम निकल ही आए इसलिए उस के बारे में सोच कर उसे परेशान नहीं होना चाहिए. ट्रेन में बैठने के बाद पुष्पक मालिनी की बड़ीबड़ी कालीकाली आंखों की मस्ती में डूब कर अपने भाग्य पर इतरा रहा था. उस के सारे काम बिना व्यवधान के पूरे हो गए थे, इसलिए वह काफी खुश था.

फर्स्ट क्लास के उस कूपे में 2 ही बर्थ थीं, इसलिए उन के अलावा वहां कोई और नहीं था. उस ने मालिनी को पूरी बात बताई तो वह एक लंबी सांस ले कर मुसकराते हुए बोली, “जो भी हुआ, ठीक हुआ. अब हमें पीछे की नहीं, आगे की जिंदगी के बारे में सोचना चाहिए.”

पुष्पक ने ठंडी आह भरी और मुसकरा कर रह गया.

ट्रेन तेज गति से महाराष्ट्र के पठारी इलाके से गुजर रही थी. सुबह होतेहोते वह महाराष्ट्र की सीमा पार कर चुकी थी. उस रात पुष्पक पल भर नहीं सोया था, उस ने मालिनी से बातचीत भी नहीं की थी. दोनों अपनीअपनी सोचों में डूबे थे. भूत और भविष्य, दोनों के अंदेशे उन्हें विचलित कर रहे थे.

दूर क्षितिज पर लाललाल सूरज दिखाई देने लगा था. नींद के बोझ से पलकें बोझिल होने लगी थीं. तभी मालिनी अपनी सीट से उठी और उस के सीने पर सिर रख कर उसी की बगल में बैठ गई. पुष्पक ने आंखें खोल कर देखा तो ट्रेन शोलापुर स्टेशन पर खड़ी थी. मालिनी को उस हालत में देख कर उस के होंठों पर मुसकराहट तैर गई.

हैदराबाद के होटल के एक कमरे में वे पतिपत्नी की हैसियत से ठहरे थे. वहां उन का यह दूसरा दिन था. पुष्पक जानना चाहता था कि मुंबई से उस के भागने के बाद क्या स्थिति है. वह लैपटौप खोल कर मुंबई से निकलने वाले अखबारों को देखने लगा.

“कोई खास खबर?” मालिनी ने पूछा.

“अभी देखता हूं.” पुष्पक ने हंस कर कहा.

मालिनी भी लैपटौप पर झुक गई. दोनों अपने भागने से जुड़ी खबर खोज रहे थे. अचानक एक जगह पुष्पक की नजरें जम कर रह गईं. उस से सटी बैठी मालिनी को लगा कि पुष्पक का शरीर अकड़ सा गया है. उस ने हैरानी से पूछा, “क्या बात है डियर?”

पुष्पक ने गूंगों की तरह अंगुली से लैपटौप की स्क्रीन पर एक खबर की ओर इशारा किया. समाचार पढ़ कर मालिनी भी जड़ हो गई. वह होठों ही होठों में बड़बड़ाई, “समय और संयोग. संयोग से कोई नहीं जीत सका.”

“हां संयोग ही है,” वह मुंह सिकोड़ कर बोला, “जो हुआ, अच्छा ही हुआ. मेरी जैकेट पुलिस के हाथ लगी, जिस पुलिस वाले को मेरी जैकेट मिली, वह ईमानदार था, वरना मेरी आत्महत्या का मामला ही गड़बड़ा जाता. चलो मेरी आत्महत्या वाली बात सच हो गई.”

इतना कह कर पुष्पक ने एक ठंडी आह भरी और खामोश हो गया.

मालिनी खबर पढऩे लगी, ‘आर्थिक परेशानियों से तंग आ कर आत्महत्या करने वाले बैंक कैशियर का दुर्भाग्य.’

इस हैडिंग के नीचे पुष्पक की आर्थिक परेशानी का हवाला देते हुए आत्महत्या और बैंक के कैश से 20 लाख की रकम कम होने की बात लिखते हुए लिखा था—

‘इंसान परिस्थिति से परेशान हो कर हौसला हार जाता है और मौत को गले लगा लेता है. लेकिन वह नहीं जानता कि प्रकृति उस के लिए और भी तमाम दरवाजे खोल देती है. पुष्पक ने 20 लाख बैंक से चुराए और रात को जुए में लगा दिए कि सुबह पैसे मिलेंगे तो वह उस में से बैंक में जमा कर देगा. लेकिन वह सारे रुपए हार गया.

इस के बाद उस के पास आत्महत्या करने के अलावा कोर्ई चारा नहीं बचा, जबकि उस के जैकेट की जेब में एक लौटरी का टिकट था, जिस का आज ही परिणाम आया है. उसे 2 करोड़ रुपए का पहला इनाम मिला है.

सच है, समय और संयोग को किसी ने नहीं देखा है.’

शराफत का इनाम – भाग 2

उस ने 3 साल बड़ी मुश्किल से गुजारे. इस के बाद एक दिन हारुन ने उसे नशे में तलाक दे दिया. उस के तलाक को चार साल हो चुके थे. अभी उस की उम्र 30 साल थी. एक ही रिश्तेदार डैडी थे, 4-5 साल पहले उन का भी इंतकाल हो गया. डैडी काफी कुछ छोड़ गए थे. जिंदगी आराम से गुजर रही थी. खाने के बाद उस ने ग्रीन टी बनाई, जो करीमभाई को बहुत पसंद आई. वैसे भी वह बस ग्रीन टी ही पीते थे.

खुशीखुशी घर पहुंच कर करीमभाई रूमाना के खयालों में डूबे रहे. औरत जब खुद बढ़ती है तो मर्द की हिचक खत्म हो जाती है. तीसरी मुलाकात में बात शादी तक पहुंच गई. रूमाना ने कहा कि पहले तजुर्बे के बाद उसे शादी से डर लगने लगा था. कई लोग उस की तरफ बढ़े, पर वही पीछे हट गई. उस ने स्वीकार किया कि उन्होंने उस के दिल पर दस्तक दी और उसे वह बहुत भले इंसान लगे.

रूमाना ने शादी के लिए हां कर दी. शादी बहुत साधारण तरीके से हुई. करीमभाई के बच्चे और कुछ दोस्त ही शामिल हुए. रूमाना सिर्फ हसीन ही नहीं, बल्कि बहुत समझदार और मोहब्बत करने वाली बीवी साबित हुई.

नौकरानी के साथ मिल कर खाना वगैरह खुद पकाती. करीमभाई का खयाल था कि रूमाना शादी के बाद कुछ शर्तें रखेगी या सिक्योरिटी के लिए कुछ खास रखने को कहेगी. लेकिन उस ने न कुछ मांगा, न कुछ कहा. करीमभाई ने मेहर 10 लाख रखा था, जो मुंह दिखाई से पहले दे दिया. उसे जो अंगूठी पहनाई थी, उस का हरा पत्थर ही करीब 50 लाख का था. बाकी जेवर अलग थे.

इस शादी से रूमाना बहुत खुश थी. करीम भाई की जिंदगी खुशियों से भर उठी. रूमाना घर की मलिका थी, जो चाहे कर सकती थी. शादी के बाद दोनों वर्ल्ड टुअर पर गए. एक महीने खूब घूमेफिरे, ऐश किया. उस के बाद रूटीन जिंदगी शुरू हो गई.

शुरूशुरू में करीमभाई के बच्चे जरा खिंचेखिंचे रहे, लेकिन जल्दी ही सब नौर्मल हो गए. पहले की तरह आनेजाने लगे. उन्होंने रूमाना को नई कार गिफ्ट की. करीमभाई को लगता था कि वह फिर से जवान हो गए हैं. जिंदगी बेपनाह खूबसूरत लगने लगी थी. रूमाना भी उन का खूब खयाल रखती और खूब प्यार लुटाती. दिन हंसीखुशी गुजरते रहे.

एक दिन काम के दौरान एक अजनबी नंबर से करीमभाई को फोन आया. फोन उठा कर उन्होंने कहा, ‘‘हैलो, कौन बोल रहा है?’’

‘‘हारुन.’’ दूसरी ओर से सपाट लहजे में कहा गया.

करीमभाई शौक्ड रह गए.

‘‘मुझे पहचाना करीमभाई?’’

‘‘हां, फोन क्यों किया?’’

‘‘यह बताने के लिए कि मैं तुम्हारे औफिस के बाहर खड़ा हूं. तुम से मिलने आ रहा हूं. कुछ जरूरी बातें करनी हैं.’’

करीमभाई सोच में डूब गए. उन के माथे पर पसीना चमकने लगा. उन्होंने सेक्रेटरी से कहा, ‘‘हारुन नाम का एक आदमी आ रहा है. गार्ड से चैक करवा कर उसे अंदर भेजो.’’

2 मिनट बाद एक 35-36 साल का स्मार्ट सा आदमी अंदर आया. उस की आंखों में चालाकी और कमीनापन साफ झलक रहा था. करीमभाई ने उसे बैठने को भी नहीं कहा, लेकिन वह बैठ गया.

करीमभाई ने बेरुखी से कहा, ‘‘मैं बहुत मसरूफ हूं, जो कहना है जल्दी कहो.’’

‘‘मैं अपनी बीवी के बारे में बात करने आया हूं.’’

‘‘यह क्या बकवास है? अब वह तुम्हारी बीवी कहां है?’’

‘‘जो औरत पहले से ही शादीशुदा हो, अगर वह दूसरी शादी कर लेती है, तब भी वह पहले शौहर की बीवी कहलाएगी.’’

‘‘पहले से शादीशुदा थी. लेकिन तुम तो उसे तलाक दे चुके हो.’’

‘‘अगर मैं ने रूमाना को तलाक दिया है तो इस का तुम्हारे पास कोई तो सुबूत होगा?’’

करीमभाई को खयाल आया कि ऐसी कोई चीज रूमाना ने उन्हें नहीं दिखाई थी और दूसरे निकाह के वक्त पहले निकाह का कोई जिक्र भी नहीं किया था. वैसे भी एक निकाह पर दूसरा निकाह हराम है, इसलिए दूसरे निकाह के वक्त तलाकनामा पेश करना जरूरी होता है. उन का लहजा कमजोर पड़ गया, ‘‘तुम ने रूमाना को मुंहजबानी तलाक दिया था.’’

‘‘अदालती मामलों में जबानी तलाक का कोई महत्त्व होता है क्या? यह तुम अच्छी तरह जानते हो. लगता है, रूमाना के हुस्न ने तुम्हारी अक्ल को घास चरने भेज दिया था. तुम ने उस से पूछा तक नहीं.’’ हारुन ने कहा.

‘‘रूमाना ने मुझे बताया था कि 4 साल पहले तुम ने उसे तलाक दे दिया था.’’ करीमभाई ने कहा.

‘‘…और तुम ने मान लिया. तुम इतना बड़ा बिजनैस चलाते हो, इतने जहीन आदमी हो, ऐसी गलती कैसे कर सकते हो?’’ वह बोला.

करीमभाई ने जल्दी से कहा, ‘‘तुम्हारे पास क्या सुबूत है कि रूमाना तुम्हारी बीवी है?’’

हारुन ने लिफाफे से निकाहनामे की फोटोकौपी सामने रखते हुए कहा, ‘‘यह है निकाहनामा. इस पर रूमाना के दस्तखत हैं. उस के आईडी कार्ड की कौपी भी मौजूद है. यह निकाह रजिस्ट्रार औफिस में बाकायदा रजिस्टर्ड है. काजी ने निकाह करवाया था. निकाह औफिस के रिकौर्ड के अनुसार रूमाना आज भी मेरी बीवी है. यह तो हुआ कानूनी सुबूत. अब कहो तो बता दूं कि रूमाना के बदन पर कहां और कितने तिल हैं?’’

करीमभाई ने मुश्किल से खुद को जब्त किया. उन्हें लगा कि हार्टअटैक आ जाएगा. उन की दराज में पिस्तौल रखा था. उन का दिल कह रहा था कि उठा कर हारुन को गोली मार दें. वह उन की बीवी के बारे में ऐसी गंदी बातें कर रहा था. उन्होंने पानी पिया और बेरुखी से कहा, ‘‘कहो, चाहते क्या हो तुम?’’

‘‘मैं क्या चाहता हूं. मैं अपनी बीवी वापस चाहता हूं.’’

‘‘वह 4 साल पहले तुम्हारी बीवी थी. अब उस से तुम्हारा कोई संबंध नहीं है.’’

‘‘4 साल की जुदाई को तलाक नहीं मान लिया जाता. वह आज भी मेरी बीवी है.’’

‘‘तुम उसे तलाक दे चुके हो. तुम ने उसे जबानी तलाक दिया है. अब मैं तुम्हारा मतलब समझ गया हूं. बोलो, कितना चाहिए 10 लाख, 20 लाख, बोलो?’’

‘‘मुझे अपनी बीवी वापस चाहिए. मैं तुम्हें 2 दिन की मोहलत देता हूं. इस के बाद मैं अदालत जाऊंगा. अगर तुम नहीं जानते तो वकील से पूछ लेना, तुम पर कौनकौन से केस बनेंगे.’’ हारुन ने सपाट लहजे में कहा और कमरे से बाहर निकल गया.

ट्यूटर ही निकला अपहर्ता

उत्तराखंड के शहर जसपुर की नई बस्ती कालोनी में रहने वाले इकरामुल हक एक एनजीओ में मैनेजर थे, जिस की वजह से उन की समाज में अच्छी पकड़ थी. समाज के लोग भी उन का काफी सम्मान करते थे. लेकिन 21 नवंबर को उन के परिवार में एक ऐसी घटना घटी कि वही नहीं, उन के घर तथा मोहल्ले वाले भी परेशान हो उठे.

दरअसल, हुआ यह कि उस दिन इकरामुल हक का 11 साल का बेटा रिहानुल हक उर्फ रिहान अचानक अपने घर के मुख्य दरवाजे के पास खेलतेखेलते गायब हो गया था. घर वालों ने उसे गली में इधरउधर देखा, लेकिन वह दिखाई नहीं दिया. दरवाजे के सामने खेलतेखेलते वह कहां गायब हो गया, यह बात किसी की समझ में नहीं आ रही थी.

रिहानुल हक के गायब होने की जानकारी मोहल्ले वालों को हुई तो वे भी उसे ढंूढऩे में मदद करने लगे. सभी ने मोहल्ले की गलीगली छान मारी, पर बच्चे का पता नहीं चला. इकरामुल हक उस समय नजीबाबाद स्थित संस्था के औफिस में थे. बेटे के लापता होने की जानकारी उन्हें मिली तो वह तुरंत घर के लिए चल पड़े. घर पहुंचने तक शाम हो चुकी थी. उन की पत्नी और घर के अन्य लोग चिंता में बैठे थे.

इकरामुल हक ने अपने सभी रिश्तेदारों को फोन कर के बेटे के बारे में पूछा, पर कहीं से भी उस के बारे में कुछ पता नहीं चला. देर रात तक उन्होंने बेटे को संभावित जगहों पर तलाशा, पर कोई नतीजा नहीं निकला. पूरी रात घर के लोग परेशान होते रहे. सुबह होते ही इकरामुल हक रिश्तेदारों और मोहल्ले के कुछ लोगों के साथ शहर की कोतवाली पहुंचे. थानाप्रभारी डी.आर. आर्य को बच्चे के रहस्यमय ढंग से गायब होने की बात बता कर उस के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराने की मांग की.

बच्चे को गायब हुए 20 घंटे से ज्यादा हो चुके थे, इसलिए डी.आर. आर्य ने अज्ञात लोगों के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज कर लिया. उन्होंने इस मामले की जानकारी एसएसपी केवल खुराना को दी तो उन्होंने इस संवेदनशील मामले को सुलझाने के लिए 4 टीमें बनाईं.

पहली टीम में थानाप्रभारी डी.आर. आर्य के नेतृत्व में एसआई योगेंद्र कुमार, मदन सिंह विवट, कांस्टेबल मोहम्मद आसिफ को शामिल किया गया. दूसरी टीम काशीपुर के थानाप्रभारी वी.के. जेठा के नेतृत्व में और तीसरी टीम परतापपुर के चौकीइंचार्ज जसवीर सिंह चौहान के नेतृत्व में बनाई गई.

चौथी टीम में एसओजी के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों को भी शामिल किया गया. चारों टीमों का नेतृत्व सीओ (काशीपुर) जी.सी. टम्टा कर रहे थे. एसएसपी ने पूरे केस की कमान एएसपी कमलेश उपाध्याय के हाथों सौंपी थी.

चारों पुलिस टीमें अलगअलग एंगल से इस मामले में लग गईं. चूंकि इकरामुल हक सम्मानित आदमी थे, इसलिए पुलिस को पूरी संभावना थी कि बच्चे का अपहरण फिरौती के लिए किया गया है. इस संभावना को देखते हुए पुलिस ने इकरामुल हक से कह दिया था कि अगर उन के पास किसी का फिरौती के लिए फोन आता है तो उन्हें किस तरह बात करनी है.

इकरामुल हक ने पुलिस को बताया था कि उन की किसी से कोई रंजिश नहीं है. इस के बावजूद पुलिस मोहल्ले में और जहां वह नौकरी करते थे, वहां के लोगों से पूछताछ की. रिहान को गायब हुए कई दिन बीत गए, पर पुलिस को उस के बारे में कोई सुराग नहीं मिला, इस से घर वालों की चिंता बढ़ती जा रही थी.

पुलिस रिहान की खोज में लगी थी, तभी जसपुर से एक और बच्चा गायब हो गया. उस बच्चे के गायब होने के बाद शहर में यह अफवाह फैल गई कि शहर में बच्चे उठाने वाला गैंग सक्रिय है. इस के बाद लोगों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया. उन का पुलिस से भी विश्वास उठने लगा.

पुलिस ने भी अपनी जांच बच्चा चोरी करने वाले गैंग की ओर मोड़ दी. बिजनौर, धामपुर, नजीबाबाद तक छानबीन की गई, लेकिन बच्चे का कुछ पता नहीं चला. आगे की जांच में पुलिस ने इकरामुल हक के घर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकाली. फुटेज में रिहान घर से निकलते हुए खुश दिखाई दे रहा था. उस के साथ उसे ट्यूशन पढ़ाने वाला रवि कुमार भी था.

पुलिस ने पूछताछ के लिए रवि कुमार को थाने बुला लिया. उस से भी पूछताछ की गई, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला. पुलिस ने उसे दोबारा पूछताछ के लिए बुलाया तो उस ने पुलिस को आत्महत्या की धमकी दे दी.

काफी खोजबीन के बाद भी जब रिहान का कहीं कुछ पता नहीं चला तो 28 नवंबर को जसपुर वालों ने एएसपी कमलेश उपाध्याय का घेराव किया, साथ ही रिहान के जल्दी न मिलने पर आंदोलन करने की चेतावनी दी. इस चेतावनी के बाद एसओजी टीम ने जसपुर में डेरा डाल दिया. पुलिस अभी बच्चे की खोज में इधरउधर हाथपांव मार ही रही थी कि उसी बीच 21 दिसंबर को रिहान के पिता को फिरौती का एक पत्र मिला. फिरौती के उस पत्र ने जांच की दिशा मोड़ दी.

पत्र में लिखा था, ‘बधाई हो आप का बेटा मिल गया. वह अभी जिंदा है. वह बारबार आप को याद कर रहा है. आप उसे सहीसलामत वापस पाना चाहते हैं तो दोपहर 12 बजे जसपुर से हरिद्वार को जाने वाली रोडवेज बस में एक बैग में 6 लाख रुपए रख दीजिए. जैसे हमें 6 लाख रुपए मिल जाएंगे, आप का बच्चा आप को सहीसलामत मिल जाएगा. अगर आप ने भूल से भी इस बात का जिक्र पुलिस से किया तो अपने बच्चे की मौत के आप खुद जिम्मेदार होंगे. इस पत्र को गंभीरता से लेना, क्योंकि आप के बच्चे की जिंदगी का सवाल है.’

इकरामुल हक नहीं चाहते थे कि उन के इकलौते बेटे की जिंदगी पर कोई आंच आए, इसलिए उन्होंने फिरौती के पत्र के बारे में पुलिस को कुछ नहीं बताया. उन्होंने एक बैग में 6 लाख रुपए भर कर अपने एक निजी संबंधी इकराम को दे दिए. इकराम वह पैसे ले कर दोपहर 12 बजे हरिद्वार जाने वाली परिवहन निगम की एक बस में बैठ गया.

हरिद्वार डिपो में पहुंचते ही इकराम नोटों से भरा बैग सीट पर छोड़ कर नीचे उतर गया. काफी देर बाद भी जब कोई उस बैग को लेने नहीं आया तो इकराम ने इकरामुल हक को फोन कर के पूछा कि अब वह क्या करे? जब पैसे लेने कोई नहीं आया तो इकरामुल हक ने पैसे ले कर उसे घर आने को दिया. इकराम वह बैग ले कर घर लौट आया.

उधर पुलिस के शक की सुई बारबार रिहान को ट्यूशन पढ़ाने वाले रवि कुमार पर जा रही थी. लेकिन रिहान के घर वालों को रवि पर इतना विश्वास था कि वे पुलिस से यही कह रहे थे कि वह रवि को परेशान न करे. इस के बाद पुलिस ने रवि के बारे में खुफिया जानकारी इकट्ठी करनी शुरू कर दी. पुलिस को पता चला कि जिस दिन से रिहान लापता हुआ था, रवि का उसी दिन से मोबाइल बंद था. रिहान को रवि से बेहद लगाव था. लेकिन उस के लापता होने के कई दिनों बाद भी रवि रिहान के बारे में पूछने उस के घर नहीं गया.

रवि को जब लगने लगा कि पुलिस उस के पीछे पड़ी हुई है तो वह जसपुर छोड़ कर धामपुर चला गया. इकरामुल हक के घर से कुछ दूरी पर किसी के घर के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगा था. पुलिस ने उस कैमरे की फुटेज देखी तो उस में काले रंग की एक स्कूटी, जिस का नंबर यूपी 020 एएल 9540 था, नजर आई. उस पर 2 लोग सवार थे. रिहान उन दोनों के बीच बैठा था.

पुलिस ने वह वीडियो रिहान के घर वालों को दिखाई तो उन्होंने रिहान के आगेपीछे बैठे दोनों लोगों की पहचान रिहान के टीचर रवि कुमार और उस के मौसेरे भाई उमेश के रूप में की. उमेश जसपुर के छिपियान मोहल्ले में रहता था. इस फुटेज को देखने के बाद पुलिस को पूरा विश्वास हो गया कि रिहान के अपहरण में रवि का ही हाथ है. इस के बाद रिहान के घर वालों को भी रवि कुमार पर शक हो गया था.

पुलिस रवि की तलाश करने लगी तो पता चला कि वह धामपुर में किसी कोचिंग सेंटर में पढ़ा रहा है. इस के बाद पुलिस ने कांस्टेबल आसिफ और रिहान के मामा सरफराज को उस के पीछे लगा दिया. दोनों ही धामपुर के उस कोचिंग सेंटर पहुंच गए, जहां रवि पढ़ाता था. वह कोचिंग सेंटर किसी अनिल कुमार का था.

रहस्य खुलवाने के लिए आसिफ और सरफराज ने स्टूडेंट बन कर उस कोचिंग सेंटर में 2 दिनों की डैमो क्लास अटैंड करने का फैसला लिया. कांस्टेबल आसिफ ने क्लास अटैंड करने के बाद पहले दिन ही रवि कुमार से दोस्ती गांठ ली. 2 दिनों में ही वह उस से इतना घुलमिल गया कि आसिफ ने उस के पेट की सारी हकीकत निकाल ली.

रवि आसिफ और सरफराज के बारे में नहीं जानता था. वह परेशान नजर आ रहा था, इसी का फायदा दोनों ने उठाया था. कांस्टेबल आसिफ ने सारी बातें थानाप्रभारी डी.आर. आर्य को बता दीं. इस के बाद पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उस की निशानदेही पर उस के मौसेरे भाई उमेश को भी पुलिस ने पकड़ लिया.

दोनों से रिहान के बारे में पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि रिहान का अपहरण उन्होंने ही किया था और अब वह इस दुनिया में नहीं है. उन दोनों से उस की लाश के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उस की लाश आजमगढ़ के जंगल में है.

रात में ही उन दोनों को ले कर पुलिस आजमगढ़ पहुंची. उस घने जंगल में रवि और उमेश वह जगह भूल गए, जहां उन्होंने रिहान की लाश छिपाई थी. वह पुलिस को जंगल में घुमाते रहे. सर्च लाइट में कई घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद आखिर एक जगह रिहान के कपड़े मिल गए. जहां पर कपड़े मिले थे उस जगह पर पहुंच कर रवि और उमेश को जगह याद आ गई.

वे पुलिस को जंगल में एक ऐसी जगह ले गए, जहां जमीन में एक बड़ी बिल बनी थी. उसी बिल में ही उन्होंने रिहान की लाश छिपाई थी. पुलिस ने उस बिल की खुदाई कराई तो उस में से एक कंकाल बरामद हुआ. वह कंकाल रिहान का ही हो सकता था. डेढ़ महीने में उस के शरीर को जंगली जानवर खा गए होंगे.

29 दिसंबर की सुबह पुलिस ने घटनास्थल की आवश्यक काररवाई कर के कंकाल और उस के कपड़ों को अपने कब्जे में ले लिया. इस के बाद दोनों अभियुक्तों को ले कर जसपुर लौट आई. रेहान के घर वालों को उस की हत्या का पता चला तो घर में कोहराम मच गया.

पुलिस द्वारा दोनों अभियुक्तों से की गई पूछताछ में रिहान के अपहरण और हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

रवि उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के कस्बा नजीबाबाद निवासी गजराम का बेटा था. गजराम सरकारी स्कूल में अध्यापक थे. उन के 4 बच्चों में रवि सब से छोटा था. रवि ने बिजनौर के वर्धमान डिग्री कालेज से बीएससी की थी. इस के बाद वह नौकरी के लिए तैयारी करने लगा था. काफी कोशिश के बाद भी उसे नौकरी नहीं मिली तो वह अप्रैल से जसपुर के एक निजी स्कूल में पढ़ाने लगा. खाली समय में वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दिया करता था.

रवि कोई ऐसा काम करना चाहता था, जिस से उसे अच्छी कमाई हो. वह सोचता था कि अगर वह अपना कोचिंग सैंटर खोल ले तो उस से उसे अच्छी कमाई हो सकती है. लेकिन कोचिंग सेंटर खोलने के लिए उस के पास पैसे नहीं थे. पैसे कहां से आएं, इस के लिए वह अपने दिमागी घोड़े दौड़ाने लगा.

उस के दिमाग में आया कि अगर वह किसी बच्चे का अपहरण कर के मोटी फिरौती ले कर अपना कोचिंग सेंटर खोल सकता है. उसे यह उपाय तो सही लगा, लेकिन पकड़े जाने के डर की वजह से वह किसी बच्चे के अपहरण का साहस नहीं कर पा रहा था. उस ने जब भी हिम्मत की, हर बार हिम्मत जवाब दे गई.

इस बारे में उस ने अपने मौसेरे भाई उमेश से सलाह की. उमेश जसपुर के मोहल्ला छिपियान में रहता था. उस के पिता राकेश कुमार का कुछ साल पहले निधन हो चुका था. उस के बाद उस के यहां आर्थिक समस्या खड़ी हो गई थी. उस की मां घर का खर्च चलाने के लिए कुछ लोगों के घरों में काम करती थी.

उमेश थोड़ा बड़ा हुआ तो काशीपुर में एक कलर लैब में नौकरी करने लगा. परिवार की सीमित आमदनी थी, जिस से उस के शौक पूरे नहीं हो पाते थे. यही वजह थी कि जब रवि ने उस से किसी बच्चे के अपहरण के बारे में सलाह मांगी तो वह खुद यह काम करने के लिए तैयार हो गया.

बिना मेहनत के अमीर बनने की बात आई तो वे सोचने लगे कि किस बच्चे को निशाना बनाया जाए. जिस के अपहरण से उन्हें मोटी रकम मिल जाए. उसी बीच रवि की निगाहों में रिहानुल हक उर्फ रिहान चढ़ गया. वह रिहान को ट्यूशन पढ़ाता ही था. उस के घर में उस की अच्छी पैठ भी थी. एक तरह से रिहान के घर वाले उसे अपने घर का सदस्य मानते थे. रवि उसे उसी के घर में ट्यूशन पढ़ाने के बाद अपने साथ स्कूल भी ले जाता था.

इसी वजह से उसे लगा कि रिहान का अपहरण करने से उस के घर वाले व अन्य लोग उस पर शक नहीं करेंगे. इस के बाद उस ने उमेश से बात की. रिहान के पिता अच्छी हैसियत वाले थे, इसलिए फिरौती में उन से मोटी रकम मिल सकती थी. वह उन का एकलौता बेटा था. योजना बनाने के बाद दोनों मौके की तलाश में लग गए.

21 नवंबर को रवि और उमेश ने रिहान के अपहरण की योजना बनाई और स्कूटी ले कर उस के घर की ओर चल पड़े. रिहान अपने दरवाजे पर खड़ा था. उन्हें देखते ही वह उन के पास आ गया. रवि ने उसे स्कूटी पर बैठा लिया. उस के बैठते ही वे तुरंत वहां से निकल गए. रिहान ने उन से पूछा कि वे कहां जा रहे हैं तो रवि ने कह दिया कि वे घूमने जा रहे हैं.

बच्चों को घूमना अच्छा लगता है. इसलिए जब वह पतरामपुर वाली रोड से होते हुए जंगल की तरफ चले तो जंगल देख कर रिहान खुश हो गया. उस समय वह अपने घर वालों को भूल गया. रिहान को घुमातेफिराते उस से बातें करते वे शहर से 20 किलोमीटर दूर कालू सिद्ध की मजार से आगे अमानगढ़ के जंगल में पहुंच गए. यह जंगल जिला बिजनौर में पड़ता है. रवि और उमेश रिहान को नदी तक स्कूटी से ले गए. इस के बाद नदी पार कर के जंगल में चले गए.

जंगल में रिहान डरने लगा. वह रोने लगा तो रवि ने उसे समझाने की कोशिश की. लेकिन वह चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था. वह जोरजोर से रोनेचिल्लाने लगा तो कहीं कोई उस के रोनेचिल्लाने की आवाज सुन न ले, रवि और उमेश डर गए. उन्होंने उस के मुंह पर कपड़ा बांध दिया. वह कहीं भाग न जाए, इस के लिए उन्होंने उसे एक पेड़ से बांध दिया. इस के बाद वहीं बैठ कर आगे की योजना बनाने लगे.

उसी बीच दम घुटने से रिहान की मौत हो गई. उस के मरने से दोनों बुरी तरह घबरा गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वे क्या करें. फिरौती मांगने वाली बात उन के दिमाग से उड़ गई. उन्होंने जल्दी से उस के कपड़े उतारे और उसे वहीं किसी जानवर की बिल में डाल दिया. वहां से कुछ दूरी पर उस के कपड़े फेंक दिए.

रिहान को ठिकाने लगाने के बाद रवि ने 6 लाख की फिरौती के लिए इकरामुल हक के पते पर एक पत्र भेजा. उन्होंने फिरौती की रकम एक बैग में रख कर जसपुर से हरिद्वार को दोपहर 12 बजे जाने वाली बस में रखने को कहा. वह बस हरिद्वार करीब 4 बजे पहुंचती थी. इसलिए निर्धारित समय पर वह हरिद्वार के बसअड्डे पर खड़े हो कर जसपुर से आने वाली बस का इंतजार करने लगे.

वह बस हरिद्वार बसअड्डे पर पहुंची तो उन्होंने देखा कि उस में से एक आदमी नहीं उतरा था. रवि को लगा कि शायद वह पुलिस वाला है, इसलिए बैग लेने के लिए वह बस में नहीं घुसा और उमेश को ले कर वहां से चला गया.

जब लोगों को पता चला कि रिहान की हत्या किसी और ने नहीं, उस के टीचर ने की है तो लोग हैरान रह गए. गांवसमाज के ही नहीं, राजनैतिक लोग भी सांत्वना देने इकरामुल हक के यहां आने लगे. जिस स्कूल में रिहान पढ़ता था, उस स्कूल की प्रधानाचार्य मीनाक्षी चौहान भी शोक प्रकट करने आईं. शहर के अन्य स्कूलों के बच्चों ने कैंडिल मार्च निकाला.

कुमाऊं रेंज के डीआईजी ने मामले का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को 5 हजार रुपए तो एसएसपी केवल खुराना ने ढाई हजार रुपए का पुरस्कार दिया है. इस के अलावा एसएसपी ने कांस्टेबल मोहम्मद आसिफ को 1000 रुपए का नकद पुरस्कार दे कर उस के कार्य की सराहना की.

पूछताछ के बाद दोनों अभियुक्तों को पुलिस ने भादंवि की धारा 364ए/302/201 के तहत गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस ने शव के अवशेष को फोरेंसिक जांच व डीएनए जांच के लिए प्रयोगशाला भेज दिया है. इस केस की जांच एसएसआई एस.सी. जोशी कर रहे हैं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दोस्ती में विश्वास की हत्या

दीपक कई दिनों से घरवालों से पहले की तरह ज्यादा बात नहीं कर रहा था. इस बात को उस की मां राजबाला अच्छे से समझ रही थीं. उन्होंने उस से कई बार  परेशानी की वजह जाननी भी चाही लेकिन वह कोई न कोई बहाना बना कर मां की बात टाल जाता था.

एक दिन दोपहर के समय दीपक घर लौटा तो राजबाला ने उस से बड़े प्यार से कहा, ‘‘क्या बात है बेटा, मैं कई दिनों से देख रही हूं कि आजकल तू किसी से ज्यादा बात भी नहीं करता और खोयाखोया सा रहता है.’’

‘‘नहीं मां, कोई खास बात नहीं है.’’ दीपक ने टालने वाले अंदाज में कहा. फिर वह विषय को बदलते हुए बोला, ‘‘मां मुझे तेज भूख लगी है. खाना लगा दो.’’

राजबाला ने भी सोचा कि जब यह खाना खा लेगा उस के बाद परेशानी की वजह बूझेगी. बेटे को खाना लाने के लिए रसोई में चली गईं और खाना परोस कर उसे दे दिया. दीपक ने खाना खाना अभी शुरू ही किया था कि उस के मोबाइल की घंटी बजी. दीपक ने मोबाइल स्क्रीन पर देखा तो वह नंबर उसे अनजाना लगा. इसलिए काल रिसीव करने के बजाय काट दी.

उस ने एकदो निवाले ही खाए थे कि फोन की घंटी फिर बजी. फोन उसी नंबर से था जिस से कुछ पल पहले आया था. दीपक झुंझला रहा था कि पता नहीं कौन है, जो ठीक से खाना भी नहीं खाने दे रहा. झुंझलाहट में उस ने काल रिसीव की.

दूसरी ओर से न मालूम किस की आवाज आई कि उसे सुनने के बाद उस का गुस्सा उड़न छू हो गया और बोला, ठीक है, मैं थोड़ी देर बाद पहुुंचता हूं.’’ कह कर फोन काट दिया.

उस समय राजबाला वहीं बैठी थीं. उन्होंने बेटे से मालूम भी किया कि किस का फोन था लेकिन दीपक ने नहीं बताया. फोन पर बात करने के बाद दीपक ने फटाफट खाना खाया और घर से बाहर की ओर निकल गया.

‘‘तू, मेरा मोबाइल लाने वाला था, क्या हुआ?’’ जाते समय मां ने पीछे से आवाज लगाई.

‘‘मम्मी, मुझे ध्यान है. आज वो भी ले लूंगा. पैसे मेरे पास ही हैं.’’ कह कर दीपक चला गया. यह बात 11 फरवरी की है.

दोपहर को घर से निकला दीपक जब देर शाम तक घर नहीं लौटा, तो राजबाला को चिंता हुई. उन्होंने उस का फोन मिलाया तो वह भी बंद आ रहा था, उन का बड़ा बेटा नितिन उस समय अपने काम पर गया हुआ था. राजबाला ने फोन कर के सारी बात नितिन को बता दी.

कुछ देर बाद वह भी घर आ गया. घर पहुंच कर नितिन ने सभी संभावित जगहों पर दीपक की तलाश की, लेकिन देर रात तक भी कोई नतीजा सामने नहीं आया. जवान बेटे के गायब हो जाने पर घर के सभी लोग परेशान थे. पिता जसवंत अग्रवाल थाना मुरादनगर पहुंचे और थानाप्रभारी को 25 वर्षीय बेटे दीपक अग्रवाल के गायब होने की जानकारी दी.

पुलिस ने भी सोचा कि दीपक कोई नासमझ तो है नहीं जो कहीं खो जाएगा. यारदोस्तों के साथ कहीं चला गया होगा और 2-4 दिन में घूमघाम कर लौट आएगा. यही सोच कर पुलिस ने उस की गुमशुदगी को गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन दीपक के मांबाप के दिलों पर क्या गुजर रही थी. इस बात को केवल वे ही महसूस कर रहे थे. बेटे की चिंता में एकएक दिन बड़ी मुश्किल से गुजर रहा था.

जसवंत अग्रवाल थाने के चक्कर लगातेलगाते परेशान हो रहे थे मगर पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी थी. इस के 3 दिन बाद 14 फरवरी को मुरादनगर पुलिस को सूचना मिली कि एनटीपीसी के जंगलों के पास खुर्रमपुर गांव के रहने वाले टीटू के गन्ने के खेत में एक लाश पड़ी है. यह इलाका थाना मुरादनगर क्षेत्र में ही आता है इसलिए खबर मिलते ही थानाप्रभारी अवधेश प्रसाद उस जगह पर पहुंच गए जहां लाश पड़ी होने की सूचना मिली थी.

उन्होंने देखा कि खेत में 25-30 साल के युवक की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. जितनी तादाद में वहां खून फैल कर जम चुका था, उस से लग रहा था कि उस की हत्या वहीं पर की होगी. उस के गले पर गोली का निशान दिख रहा था.

निरीक्षण में पता चला कि हत्यारों ने उस की पहचान मिटाने के लिए उस के चेहरे और लिंग को जला दिया था. इस से ऐसा लगा कि मारने वालों को उस से गहरी खुन्नस रही होगी. लाश विकृत अवस्था में थी, थानाप्रभारी ने वहां मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त करानी चाही लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका.

चूंकि मामला मर्डर का था इसलिए थानाप्रभारी ने जिले के आलाअधिकारियों को भी यह सूचना दे दी, तो जिले से एसएसपी और एसपी (आरए) भी घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश और घटनास्थल का मुआयना करने के बाद उन्होंने वहां मौजूद लोगों से बात की और थानाप्रभारी को कुछ निर्देश दे कर चले आए. थानाप्रभारी अवधेश प्रसाद ने लाश का पंचनामा करने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए गाजियाबाद में हिंडन स्थित मोर्चरी भेज दिया.

हत्या के इस मामले की जांच थाना प्रभारी अवधेश प्रसाद ने शुरू कर दी. थानाप्रभारी के सामने सब से बड़ी समस्या यह थी कि लाश की शिनाख्त न होने की वजह से उन्हें ऐसा कोई क्लू नहीं मिल पा रहा था, जिस से जांच आगे बढ़ सके. फिर उन्होंने इस काम में मुखबिरों को भी लगा दिया. इस से पहले कि उन्हें अज्ञात लाश के बारे में कहीं से कोई क्लू मिलता उन का वहां से तबादला हो गया.

इधर जसवंत अग्रवाल अपने लापता बेटे का पता लगवाने के लिए थाने के चक्कर लगाते रहे. पुलिस ने टीटू के गन्ने के खेत से जिस अज्ञात युवक की लाश बरामद की थी उस के बारे में भी जसवंत को कुछ नहीं बताया. जबकि अज्ञात लाश का हुलिया जसवंत के गायब बेटे दीपक से मिलताजुलता था.

जसवंत अग्रवाल ने भी हिम्मत नहीं हारी. उस ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के सामने अपना दुखड़ा रोया. इस का नतीजा यह निकला कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के आदेश पर मुरादनगर के नए थानाप्रभारी ने 19 फरवरी को दीपक की गुमशुदगी के मामले को भांदंवि की धारा 364 के तहत दर्ज कर लिया और इस मामले की जांच के लिए एक पुलिस टीम बनाई गई. टीम में एसआई राजेश शर्मा, कांस्टेबल पुष्पेंद्र, कुंवर पाल, अवश्री आदि को शामिल किया गया.

सबइंस्पेक्टर राजेश शर्मा ने सब से पहले दीपक के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. इस से पता चला कि दीपक के मोबाइल पर आखिरी काल जिस नंबर से आई थी, वह नंबर एक पीसीओ का था. पुलिस ने उस पीसीओ के मालिक का पता लगा कर उसे पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया.

उस से पूछा गया कि 11 फरवरी को दोपहर के समय उस के यहां से किस ने काल की थी. उस के पीसीओ पर रोजाना तमाम लोग काल करने आते हैं. उन में से कुछ परिचित होते हैं, कुछ अपरिचित. अब 8-10 दिन पहले दोपहर को किनकिन लोगों ने बात की. उस के लिए यह बताना आसान नहीं था. उस से पूछताछ में कोई सफलता नहीं मिली तो पुलिस ने उसे घर भेज दिया.

पुलिस को गन्ने के खेत से मिली लाश के बारे में भी कोई जानकारी नहीं मिल रही थी. हत्या के इस केस की तरह पुलिस टीम को दीपक के अपहरण के बारे में भी कोई सुराग न मिला तो पुलिस ने इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया. थाने के चक्कर लगातेलगाते जसवंत भी थकहार गए.

7-8 महीने बीत गए पुलिस न तो उस अज्ञात लाश की ही शिनाख्त करा पाई और न ही दीपक के बारे में पता लगा पाई. इसी दौरान नए थानाप्रभारी रामप्रकाश शर्मा से जसवंत अग्रवाल ने मुलाकात की और बेटे का पता लगाने की अपील की.

थानाप्रभारी दीपक ने फोन की काल डिटेल्स का अध्ययन किया. जांच करने पर उन्हें यह पता चला कि दीपक की दोस्ती मोहित शर्मा नाम के एक युवक से थी. वह कृष्णा कालोनी में रहता था. वह एक अपराधी किस्म का व्यक्ति था. उस से खिलाफ थाना मुरादनगर में ही हत्या और आर्म्स एक्ट के तहत 2 मुकदमे दर्ज थे. जबकि दीपक एक शरीफ लड़का था.

अब थानाप्रभारी के दिमाग में यह बात घूम गई कि एक अपराधी के साथ दीपक का क्या रिश्ता हो सकता है? उन्हें लग रहा था कि तफ्तीश अब कुछ आगे बढ़ सकती है. उन्होंने मोहित शर्मा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई.

इस का अध्ययन करने पर पता चला कि मोहित 2 और फोन नंबरों पर ज्यादा बातें करता था. जिन नंबरों पर उस की ज्यादा बातें होती थीं. जांच में वह शशि और लक्ष्मण नाम के शख्स के पाए गए, जोकि मुरादनगर में ही रहते थे. उन दोनों के खिलाफ भी थाना मुरादनगर में कई मुकदमे दर्ज थे.

पुलिस ने मोहित शर्मा, शशि और लक्ष्मण को पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया. तीनों से दीपक के बारे में मालूमात की तो उन्होंने दीपक के बारे मे अनभिज्ञता जताई. जिस दिन मोहित गायब हुआ था उस दिन की इन तीनों के मोबाइल फोनों की लोकेशन जांची तो वह कहीं और की पाई गईं. इस से पुलिस को वे बेकुसूर लगे. उन के खिलाफ कोई सुबूत न मिला तो पुलिस ने तीनों को छोड़ दिया.

थानाप्रभारी ने दीपक के फोन की काल डिटेल्स का फिर से अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि जिन नंबरों पर दीपक की अकसर बात होती थी उन में से एक नंबर दीपक के गुम होने के बाद से लगातार बंद आ रहा था. अब पुलिस ने यह पता लगाने की कोशिश की कि जिस फोन में वह नंबर चल रहा था. उस में अब कौन सा नंबर चल रहा है.

फोन के आईएमईआई नंबर के सहारे थानाप्रभारी को इस काम में सफलता मिल गई. उस फोन में जो नंबर चल रहा था वह कनक नाम की एक लड़की की आईडी पर लिया गया था. पुलिस ने कनक को पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया.पू छताछ में पता चला कि वह दीपक की दोस्त है लेकिन उस ने दीपक के बारे में कोई भी जानकारी होने से इंकार कर दिया. जब सिम बदलने की वजह पूछी तो वह कोई उचित जवाब ना दे सकी और घबराहट में इधरउधर देखने लगी.

थानाप्रभारी को लगा कि दाल में जरूर कुछ काला है, इसलिए उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की तो वह अधिक देर ना टिक सकी और बोली कि दीपक अब इस दुनिया में नहीं है. उस के दोस्तों मोहित, लक्ष्मण और शशि ने उस की हत्या कर दी है.

कनक ने जिन लोगों के नाम बताए थे पुलिस ने उन के ठिकानों पर दविशें डालीं लेकिन वे फरार हो चुके थे और उन्होंने अपने मोबाइल फोन भी बंद कर दिए थे. फिर पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर 29 दिसंबर को तीनों को पाइपलाइन रोड से हथियार सहित गिरफ्तार कर लिया. उन सभी से पूछताछ करने पर ऐसे 2 मामलों का खुलासा हो गया जो पिछले 9 महीने से पुलिस के गले की फांस बने हुए थे. उन से पूछताछ के बाद दीपक की हत्या की जो कहानी सामने आई वह इस प्रकार निकली.

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले का एक थाना है मुरादनगर. मुरादनगर की ही कृष्णा कालोनी में जसवंत अग्रवाल अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी राजबाला के अलावा 4 बच्चे थे. 2 बेटे व 2 बेटियां. बेटियों की शादी वह अपनी नौकरी के दौरान ही कर चुके थे. बेटा नितिन फरीदाबाद में स्थित प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. जबकि छोटे बेटे दीपक को फरीदाबाद में जूतों की दुकान खुलवा दी थी.

कुछ समय बाद ही दीपक का मन इस दुकान से उचट गया, तो अपने घर वालों से बात कर के वह औनेपौने दामों में दुकान का सारा सामान बेच कर अपने घर मुरादनगर आ गया. दीपक मुरादनगर में ही रह कर कोई ऐसा काम करना चाहता था जिस से अच्छी आमदनी हो. मुरादनगर में ही कनक नाम की एक लड़की रहती थी उसी से जफर और लक्ष्मण के अवैध संबंध थे.

दीपक की लक्ष्मण और जफर से दोस्ती थी. इसलिए उसे कनक के अवैध संबंधों की जानकारी थी. चूंकि कनक के कदम बहक चुके थे, इसलिए उस ने दीपक से भी नजदीकी बना ली थी. बाद में उस ने लक्ष्मण और जफर को किनारे कर के 25 वर्षीय दीपक से अवैध संबंध बना लिए.

लक्ष्मण और जफर ने जब प्रेमिका की तरफ से बेरुखी महसूस की तो उन्होंने इस की वजह खोजनी शुरू कर दी. तब उन्हें पता चला कि इस की असली वजह दीपक है. यानी दीपक ने उन के प्यार में सेंध लगा दी है. ऐसे विश्वासघाती दोस्त को उन्होंने सबक सिखाने की योजना बना ली और तय कर लिया कि वह उसे ठिकाने लगा कर ही रहेंगे, इस योजना में उन्होंने अपने एक और दोस्त शशि को भी शामिल कर लिया.

फरीदाबाद की जूतों की दुकान बंद कर के दीपक बेरोजगार हो गया था. घर का खर्चा उस का बड़ा भाई नितिन ही चला रहा था. दीपक अकसर अपने कामधंधे को ले कर तनाव में रहने लगा था. इस बात को घर वाले भी महसूस कर रहे थे.

योजनानुसार 11 फरवरी को मोहित ने पीसीओ से दीपक को फोन किया और एक जरूरी काम का बहाना कह कर घर से बुला लिया. बाइक पर बिठा कर वह उसे एनटीपीसी के जंगल में ले गया. वहां पहले से ही लक्ष्मण, शशि के साथ जफर भी मौजूद था. इन सभी ने पहले वहां बैठ कर जम कर शराब पी. जब दीपक को अधिक नशा हो गया तो वे उसे पास ही के गन्ने के खेत में ले गए.

वहां पहुंचते ही जफर ने उस की गरदन पर  तमंचा सटा कर गोली चला दी. गोली लगते ही दीपक नीचे गिर गया. कुछ देर बाद उस की मौत हो गई. पहचान मिटाने के लिए उन्होंने उस के चेहरे और गुप्तांग पर पैट्रोल डाल कर आग लगा दी और वहां से चले गए. इस से पहले उन्होंने उस की जेब में रखे 10 हजार रुपए निकाल लिए. वह पैसे उस की मां ने फोन खरीदने के लिए दिए थे.

दीपक की हत्या के बाद जफर और शशि ने बिजनौर के पास दिल्ली के एक कार ड्राइवर से 2 लाख रुपए लूट लिए. विरोध करने पर उन्होंने उस की हत्या कर दी. बाद में जब यह मामला खुला तो बिजनौर पुलिस ने जफर और शशि को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

कुछ समय बाद शशि जमानत पर बाहर आ गया. जबकि जफर की जमानत नहीं हो सकी. उन से पूछताछ के बाद पता चला कि पुलिस ने 14 फरवरी को खुर्रमपुर के टीटू के खेत से जो अज्ञात लाश बरामद की थी, वह दीपक अग्रवाल की ही थी.

हत्याकांड की हर बिखरी कड़ी अब जुड़ चुकी थी. सो सभी अभियुक्तों से पूछताछ के बाद उन्हें भादंवि की धारा 364, 302, 201, 34, 120बी के तहत गिरफ्तार कर गाजियाबाद की जिला अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें डासना जेल भेज दिया गया.

पुलिस हत्या में शामिल चौथे अभियुक्त जफर को अदालत में प्रार्थना पत्र दे कर, ट्रांजिट रिमांड पर लाने की तैयारी कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों एवं जनचर्चा पर आधारित. कनक परिवर्तित नाम है

सावधान! ऐसे दोस्तों से : दोस्त की बेटी पर बुरी नजर

शराफत का इनाम – भाग 1

हारुन 36 साल का स्मार्ट, खूबसूरत और कसरती बदन का मालिक था. रूमाना बेहद हसीन नाजुक सी 25-26 साल की युवती थी. हारुन ने  उसे एक तसवीर दिखाते हुए कहा, ‘‘रूमाना, यह एक बड़ा आसामी है. इस से काफी माल मिल सकता है. इस के बाद हम मुल्क छोड़ कर बाहर चले जाएंगे. यह मेरा वादा है.’’

रूमाना ने निर्णायक स्वर में कहा, ‘‘याद रखना, यह आखिरी बार है. अब मैं थक चुकी हूं. इस का नाम क्या है?’’

‘‘करीमभाई. उम्र 55 साल. सीधासादा शरीफ बंदा है. बहुत बड़ा बिजनैसमैन है. सब से बड़ी बात यह है कि यह एकदम अकेला है. ग्रे बालों के साथ काफी स्मार्ट और सोबर लगता है. तंदुरुस्त और चाकचौबंद रहने वाला यह आदमी अपनी उम्र से 10 साल कम लगता है.’’

‘‘ठीक है,’’ रूमाना ने कहा.

करीम भाई काफी अमीर और मशहूर बिजनैसमैन थे. 15-16 साल की उम्र में मैट्रिक कर के उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया था. उन के पिता भी बड़े कारोबारी थे, पर उन्होंने बेटे की कोई मदद नहीं की थी. करीमभाई ने अपनी पहली डील मां से रुपए उधार ले कर की थी.

जब वह कमाने लगे थे तो उन्होंने मां के रुपए वापस कर कर दिए थे, लेकिन वह अपने वालिद के शुक्रगुजार थे कि उन्होंने अपने आप कारोबार जमाने का उन्हें आत्मविश्वास दिया. उन्होंने अपने आप अपना बिजनैस खड़ा किया था. बाद में यही सबक उन्होंने अपने बेटों को दिया. उन्होंने अपने बेटों को रकम तो दी, पर बिजनैस सेट हो जाने पर उन्हें उन का कारोबार, घर सब अलग कर दिया था. अब वे अपनाअपना कारोबार अलग चला रहे थे.

करीमभाई ने शुरू से ही उसूल बना रखा था कि औफिस में औरत को नौकरी पर नहीं रखेंगे. उन का खयाल था कि औरत घर की मलिका है, उसे औफिस के धक्के नहीं खाना चाहिए. शायद इसीलिए उन की बीवी हाजरा घर की रानी थीं. घर के सारे फैसले वही करती थीं.

उम्र में करीमभाई से 5 साल छोटी थीं, पर उम्र बढ़ने पर भी बहुत खूबूसरत थीं. 2 जवान बेटों और एक बेटी की मां थीं. सब की शादियां हो चुकी थीं. सब अपनेअपने घरों में खुश थे. हाजरा बेटों को अलग नहीं करना चाहती थीं, लेकिन करीमभाई ने समझाया था कि दूरी से मोहब्बत बढ़ेगी, आनाजाना मिलनाजुलना होता रहेगा. इस घर की मलिका सिर्फ हाजरा रहेगी, हंसीखुशी राज करेगी.

बात उन की समझ में आ गई थी. लेकिन वह ज्यादा दिनों तक राज नहीं कर सकीं. एक साल पहले कैंसर से उन की मौत हो गई. बहुत इलाज हुए, पर जान न बच सकी. तब से करीमभाई अकेले हो गए थे. अब लंच वह घर पर करते थे, जबकि रात का खाना बाहर खा कर आते थे.

उस रात भी वह होटल में डिनर करने गए थे. लौन उन की पसंदीदा जगह थी, जहां समुद्र से आने वाले नम हवा के झोंके अलग ही मजा देते थे. डिनर के बाद वह पार्किंग में आए और अपनी कार के करीब पहुंचे तो देखा एक औरत बोनट पर झुकी सिसकियां ले रही थी.

उस ने अपना बायां पैर थाम रखा था. उस ने खूबसूरत रेशमी अनारकली सूट पहन रखा था. लंबे बालों ने गोरा खूबसूरत चेहरा आधा ढंक रखा था. करीमभाई ने आगे बढ़ कर पूछा, ‘‘मैडम, कोई प्रौब्लम है क्या?’’

उस ने अपना चेहरा ऊपर उठाया. करीमभाई आंसुओं से भीगा हसीन चेहरा देखते रह गए. उस की उम्र करीब 26 साल रही होगी. उस ने बेहद सुरीली आवाज में धीरे से कहा, ‘‘मेरे पैर में मोच आ गई है, बहुत दर्द हो रहा है.’’

करीमभाई ने उस का पैर देखा. दूधिया टखने के पास सूजन नजर आ रही थी. वह बेहद नाजुक लग रही थी.

‘‘डाक्टर को दिखाना पड़ेगा. आप के साथ कोई है?’’ करीमभाई ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं अकेली ही आई हूं. यह सामने मेरी कार है, लेकिन अब मैं ड्राइव कैसे करूं?’’ उस ने नए मौडल की कार की तरफ इशारा कर के कहा.

करीमभाई ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘आप को ऐतराज न हो तो मैं आप को डाक्टर के पास ले चलूं? मेरा नाम करीमभाई है. मेरा छोटा सा बिजनैस है. यह रहा मेरा कार्ड?’’

‘‘मैं आप को जानती हूं. आप अकसर यहां आते हैं.’’

करीमभाई ने उसे सहारा दे कर आगे की सीट पर बिठाया. हाजरा के बाद वह पहली औरत थी, जो उन के साथ बैठी थी. उस की खुशबू और खूबसूरती से करीमभाई प्रभावित हो रहे थे. उन्होंने पूछा, ‘‘आप का नाम क्या है?’’

‘‘मैं रूमाना अनीस.’’

‘‘अनीस आप के हसबैंड हैं?’’

‘‘नहीं, अनीस मेरे वालिद का नाम है. अब वह इस दुनिया में नहीं हैं.’’

न जाने क्यों उन्हें यह जान कर खुशी हुई कि रूमाना शादीशुदा नहीं है. वह उसे एक बड़े अस्पताल की ओपीडी में ले गए, जहां पट्टी कर के दवाएं और क्रीम दे दी गईं. दवा देते हुए डाक्टर ने कहा, ‘‘आप की मिसेज बहुत नाजुक हैं, खयाल रखा करें.’’

दोनों बुरी तरह झेंप गए.

सहारा दे कर वापस आते समय करीमभाई के दिल की धड़कन बढ़ गई थी. रूमाना का फ्लैट पहली मंजिल पर था. एक बार फिर उन्हें खुशी  हुई. वह उसे सहारा दे कर ऊपर ले गए. उस ने करीमभाई का शुक्रिया अदा किया, लेकिन अंदर आने को नहीं कहा. इस हालत में वह वैसे भी उन्हें अंदर नहीं बुला सकती थी. जाते हुए करीमभाई ने कहा, ‘‘कार्ड पर मेरा मोबाइल नंबर है. जरूरत पड़ने पर बेहिचक फोन कर दीजिएगा.’’

रूमाना ने पर्स से चाबी निकाल कर देते हुए कहा, ‘‘मेरी कार अपने ड्राइवर से भिजवा दें तो मेहरबानी होगी.’’

इसी के साथ उस ने अपना मोबाइल नंबर भी दे दिया था.

उस रात करीमभाई बहुत खुश थे. उन की तनहाई खूबसूरत खयालों और ख्वाबों से सज गई थी. उन्हें हाजरा का खयाल नहीं आया. अगली सुबह दफ्तर जाते हुए उन्होंने रूमाना को फोन किया, ‘‘आप की तबीयत कैसी है?’’

‘‘अब काफी बेहतर है. गरम पानी से काफी आराम मिला है. मुझे लग रहा था कि आप का फोन आएगा.’’ उस ने धीमे से कहा.

‘‘आप को ऐसा क्यों लग रहा था?’’

‘‘मेरे दिल ने कहा था. यह मुझे अच्छा नहीं लगा कि आप को मैंने कल बाहर से ही जाने दिया. मैं चाहती हूं कि आप मेरे घर आएं, ताकि मैं आप का शुक्रिया अदा कर सकूं.’’

करीमभाई के दिल में घंटियां बजने लगीं. उन्होंने कहा, ‘‘वैसे शुक्रिया अदा करने की जरूरत नहीं है. मैं आप को देखने कल शाम को आऊंगा.’’

अगले दिन की शाम तक का समय करीमभाई ने बड़ी बेचैनी से गुजारा. औफिस से वह सीधे होटल गए. वहां पार्किंग में अपनी गाड़ी छोड़ी और रूमाना की गाड़ी ले कर उस के फ्लैट पर पहुंचे. रास्ते से फूल और केक भी ले लिया था. रूमाना उन्हें देख कर खिल उठी. उस ने गुलाबी अनारकली जोड़ा पहन रखा था, जिस में वह गजब ढा रही थी.

घर बेहद सलीके से सजा हुआ था. सारा सामान बहुत कीमती था. केक व फूल देख कर उस ने कहा, ‘‘इस की क्या जरूरत थी.’’

उस का पैर काफी ठीक था. उस ने उन्हें इसरार कर डिनर के लिए रोक लिया. अंधा क्या चाहे, दो आंखें. उस की बातें सीधीसादी थीं. उस ने बताया कि उस की एक बार शादी हो चुकी थी, पर चली नहीं. उस की शादी उस के डैडी ने हारुन से की थी. पता नहीं वह कैसे धोखा खा गए. वह अच्छा इंसान नहीं था.

वो कमजोर पल: सीमा ने क्या चुना प्यार या परिवार?

वही हुआ जिस का सीमा को डर था. उस के पति को पता चल ही गया कि उस का किसी और के साथ अफेयर चल रहा है. अब क्या होगा? वह सोच रही थी, क्या कहेगा पति? क्यों किया तुम ने मेरे साथ इतना बड़ा धोखा? क्या कमी थी मेरे प्यार में? क्या नहीं दिया मैं ने तुम्हें? घरपरिवार, सुखी संसार, पैसा, इज्जत, प्यार किस चीज की कमी रह गई थी जो तुम्हें बदचलन होना पड़ा? क्या कारण था कि तुम्हें चरित्रहीन होना पड़ा? मैं ने तुम से प्यार किया. शादी की. हमारे प्यार की निशानी हमारा एक प्यारा बेटा. अब क्या था बाकी? सिवा तुम्हारी शारीरिक भूख के. तुम पत्नी नहीं वेश्या हो, वेश्या.

हां, मैं ने धोखा दिया है अपने पति को, अपने शादीशुदा जीवन के साथ छल किया है मैं ने. मैं एक गिरी हुई औरत हूं. मुझे कोई अधिकार नहीं किसी के नाम का सिंदूर भर कर किसी और के साथ बिस्तर सजाने का. यह बेईमानी है, धोखा है. लेकिन जिस्म के इस इंद्रजाल में फंस ही गई आखिर.

मैं खुश थी अपनी दुनिया में, अपने पति, अपने घर व अपने बच्चे के साथ. फिर क्यों, कब, कैसे राज मेरे अस्तित्व पर छाता गया और मैं उस के प्रेमजाल में उलझती चली गई. हां, मैं एक साधारण नारी, मुझ पर भी किसी का जादू चल सकता है. मैं भी किसी के मोहपाश में बंध सकती हूं, ठीक वैसे ही जैसे कोई बच्चा नया खिलौना देख कर अपने पास के खिलौने को फेंक कर नए खिलौने की तरफ हाथ बढ़ाने लगता है.

नहीं…मैं कोई बच्ची नहीं. पति कोई खिलौना नहीं. घरपरिवार, शादीशुदा जीवन कोई मजाक नहीं कि कल दूसरा मिला तो पहला छोड़ दिया. यदि अहल्या को अपने भ्रष्ट होने पर पत्थर की शिला बनना पड़ा तो मैं क्या चीज हूं. मैं भी एक औरत हूं, मेरे भी कुछ अरमान हैं. इच्छाएं हैं. यदि कोई अच्छा लगने लगे तो इस में मैं क्या कर सकती हूं. मैं मजबूर थी अपने दिल के चलते. राज चमकते सूरज की तरह आया और मुझ पर छा गया.

उन दिनों मेरे पति अकाउंट की ट्रेनिंग पर 9 माह के लिए राजधानी गए हुए थे. फोन पर अकसर बातें होती रहती थीं. बीच में आना संभव नहीं था. हर रात पति के आलिंगन की आदी मैं अपने को रोकती, संभालती रही. अपने को जीवन के अन्य कामों में व्यस्त रखते हुए समझाती रही कि यह तन, यह मन पति के लिए है. किसी की छाया पड़ना, किसी के बारे में सोचना भी गुनाह है. लेकिन यह गुनाह कर गई मैं.

मैं अपनी सहेली रीता के घर बैठने जाती. पति घर पर थे नहीं. बेटा नानानानी के घर गया हुआ था गरमियों की छुट्टी में. रीता के घर कभी पार्टी होती, कभी शेरोशायरी, कभी गीतसंगीत की महफिल सजती, कभी पत्ते खेलते. ऐसी ही पार्टी में एक दिन राज आया. और्केस्ट्रा में गाता था. रीता का चचेरा भाई था. रात का खाना वह अपनी चचेरी बहन के यहां खाता और दिनभर स्ट्रगल करता. एक दिन रीता के कहने पर उस ने कुछ प्रेमभरे, कुछ दर्दभरे गीत सुनाए. खूबसूरत बांका जवान, गोरा रंग, 6 फुट के लगभग हाइट. उस की आंखें जबजब मुझ से टकरातीं, मेरे दिल में तूफान सा उठने लगता.

राज अकसर मुझ से हंसीमजाक करता. मुझे छेड़ता और यही हंसीमजाक, छेड़छाड़ एक दिन मुझे राज के बहुत करीब ले आई. मैं रीता के घर पहुंची. रीता कहीं गई हुई थी काम से. राज मिला. ढेर सारी बातें हुईं और बातों ही बातों में राज ने कह दिया, ‘मैं तुम से प्यार करता हूं.’

मुझे उसे डांटना चाहिए था, मना करना चाहिए था. लेकिन नहीं, मैं भी जैसे बिछने के लिए तैयार बैठी थी. मैं ने कहा, ‘राज, मैं शादीशुदा हूं.’

राज ने तुरंत कहा, ‘क्या शादीशुदा औरत किसी से प्यार नहीं कर सकती? ऐसा कहीं लिखा है? क्या तुम मुझ से प्यार करती हो?’

मैं ने कहा, ‘हां.’ और उस ने मुझे अपनी बांहों में समेट लिया. फिर मैं भूल गई कि मैं एक बच्चे की मां हूं. मैं किसी की ब्याहता हूं. जिस के साथ जीनेमरने की मैं ने अग्नि के समक्ष सौगंध खाई थी. लेकिन यह दिल का बहकना, राज की बांहों में खो जाना, इस ने मुझे सबकुछ भुला कर रख दिया.

मैं और राज अकसर मिलते. प्यारभरी बातें करते. राज ने एक कमरा किराए पर लिया हुआ था. जब रीता ने पूछताछ करनी शुरू की तो मैं राज के साथ बाहर मिलने लगी. कभी उस के घर पर, कभी किसी होटल में तो कभी कहीं हिल स्टेशन पर. और सच कहूं तो मैं उसे अपने घर पर भी ले कर आई थी. यह गुनाह इतना खूबसूरत लग रहा था कि मैं भूल गई कि जिस बिस्तर पर मेरे पति आनंद का हक था, उसी बिस्तर पर मैं ने बेशर्मी के साथ राज के साथ कई रातें गुजारीं. राज की बांहों की कशिश ही ऐसी थी कि आनंद के साथ बंधे विवाह के पवित्र बंधन मुझे बेडि़यों की तरह लगने लगे.

मैं ने एक दिन राज से कहा भी कि क्या वह मुझ से शादी करेगा? उस ने हंस कर कहा, ‘मतलब यह कि तुम मेरे लिए अपने पति को छोड़ सकती हो. इस का मतलब यह भी हुआ कि कल किसी और के लिए मुझे भी.’

मुझे अपने बेवफा होने का एहसास राज ने हंसीहंसी में करा दिया था. एक रात राज के आगोश में मैं ने शादी का जिक्र फिर छेड़ा. उस ने मुझे चूमते हुए कहा, ‘शादी तो तुम्हारी हो चुकी है. दोबारा शादी क्यों? बिना किसी बंधन में बंधे सिर्फ प्यार नहीं कर सकतीं.’

‘मैं एक स्त्री हूं. प्यार के साथ सुरक्षा भी चाहिए और शादी किसी भी स्त्री के लिए सब से सुरक्षित संस्था है.’

राज ने हंसते हुए कहा, ‘क्या तुम अपने पति का सामना कर सकोगी? उस से तलाक मांग सकोगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि उस के वापस आते ही प्यार टूट जाए और शादी जीत जाए?’

मुझ पर तो राज का नशा हावी था. मैं ने कहा, ‘तुम हां तो कहो. मैं सबकुछ छोड़ने को तैयार हूं.’

‘अपना बच्चा भी,’ राज ने मुझे घूरते हुए कहा. उफ यह तो मैं ने सोचा ही नहीं था.

‘राज, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम बच्चे को अपने साथ रख लें?’

राज ने हंसते हुए कहा, ‘क्या तुम्हारा बेटा, मुझे अपना पिता मानेगा? कभी नहीं. क्या मैं उसे उस के बाप जैसा प्यार दे सकूंगा? कभी नहीं. क्या तलाक लेने के बाद अदालत बच्चा तुम्हें सौंपेगी? कभी नहीं. क्या वह बच्चा मुझे हर घड़ी इस बात का एहसास नहीं दिलाएगा कि तुम पहले किसी और के साथ…किसी और की निशानी…क्या उस बच्चे में तुम्हें अपने पति की यादें…देखो सीमा, मैं तुम से प्यार करता हूं. लेकिन शादी करना तुम्हारे लिए तब तक संभव नहीं जब तक तुम अपना अतीत पूरी तरह नहीं भूल जातीं.

‘अपने मातापिता, भाईबहन, सासससुर, देवरननद अपनी शादी, अपनी सुहागरात, अपने पति के साथ बिताए पलपल. यहां तक कि अपना बच्चा भी क्योंकि यह बच्चा सिर्फ तुम्हारा नहीं है. इतना सब भूलना तुम्हारे लिए संभव नहीं है.

‘कल जब तुम्हें मुझ में कोई कमी दिखेगी तो तुम अपने पति के साथ मेरी तुलना करने लगोगी, इसलिए शादी करना संभव नहीं है. प्यार एक अलग बात है. किसी पल में कमजोर हो कर किसी और में खो जाना, उसे अपना सबकुछ मान लेना और बात है लेकिन शादी बहुत बड़ा फैसला है. तुम्हारे प्यार में मैं भी भूल गया कि तुम किसी की पत्नी हो. किसी की मां हो. किसी के साथ कई रातें पत्नी बन कर गुजारी हैं तुम ने. यह मेरा प्यार था जो मैं ने इन बातों की परवा नहीं की. यह भी मेरा प्यार है कि तुम सब छोड़ने को राजी हो जाओ तो मैं तुम से शादी करने को तैयार हूं. लेकिन क्या तुम सबकुछ छोड़ने को, भूलने को राजी हो? कर पाओगी इतना सबकुछ?’ राज कहता रहा और मैं अवाक खड़ी सुनती रही.

‘यह भी ध्यान रखना कि मुझ से शादी के बाद जब तुम कभी अपने पति के बारे में सोचोगी तो वह मुझ से बेवफाई होगी. क्या तुम तैयार हो?’

‘तुम ने मुझे पहले क्यों नहीं समझाया ये सब?’

‘मैं शादीशुदा नहीं हूं, कुंआरा हूं. तुम्हें देख कर दिल मचला. फिसला और सीधा तुम्हारी बांहों में पनाह मिल गई. मैं अब भी तैयार हूं. तुम शादीशुदा हो, तुम्हें सोचना है. तुम सोचो. मेरा प्यार सच्चा है. मुझे नहीं सोचना क्योंकि मैं अकेला हूं. मैं तुम्हारे साथ सारा जीवन गुजारने को तैयार हूं लेकिन वफा के वादे के साथ.’

मैं रो पड़ी. मैं ने राज से कहा, ‘तुम ने पहले ये सब क्यों नहीं कहा.’

‘तुम ने पूछा नहीं.’

‘लेकिन जो जिस्मानी संबंध बने थे?’

‘वह एक कमजोर पल था. वह वह समय था जब तुम कमजोर पड़ गई थीं. मैं कमजोर पड़ गया था. वह पल अब गुजर चुका है. उस कमजोर पल में हम प्यार कर बैठे. इस में न तुम्हारी खता है न मेरी. दिल पर किस का जोर चला है. लेकिन अब बात शादी की है.’

राज की बातों में सचाई थी. वह मुझ से प्यार करता था या मेरे जिस्म से बंध चुका था. जो भी हो, वह कुंआरा था. तनहा था. उसे हमसफर के रूप में कोई और न मिला, मैं मिल गई. मुझे भी उन कमजोर पलों को भूलना चाहिए था जिन में मैं ने अपने विवाह को अपवित्र कर दिया. मैं परपुरुष के साथ सैक्स करने के सुख में, देह की तृप्ति में ऐसी उलझी कि सबकुछ भूल गई. अब एक और सब से बड़ा कदम या सब से बड़ी बेवकूफी कि मैं अपने पति से तलाक ले कर राज से शादी कर लूं. क्या करूं मैं, मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था.  मैं ने राज से पूछा, ‘मेरी जगह तुम होते तो क्या करते?’

राज हंस कर बोला, ‘ये तो दिल की बातें हैं. तुम्हारी तुम जानो. यदि तुम्हारी जगह मैं होता तो शायद मैं तुम्हारे प्यार में ही न पड़ता या अपने कमजोर पड़ने वाले क्षणों के लिए अपनेआप से माफी मांगता. पता नहीं, मैं क्या करता?’

राज ये सब कहीं इसलिए तो नहीं कह रहा कि मैं अपनी गलती मान कर वापस चली जाऊं, सब भूल कर. फिर जो इतना समय इतनी रातें राज की बांहों में बिताईं. वह क्या था? प्यार नहीं मात्र वासना थी? दलदल था शरीर की भूख का? कहीं ऐसा तो नहीं कि राज का दिल भर गया हो मुझ से, अपनी हवस की प्यास बुझा ली और अब विवाह की रीतिनीति समझा रहा हो? यदि ऐसी बात थी तो जब मैं ने कहा था कि मैं ब्याहता हूं तो फिर क्यों कहा था कि किस किताब में लिखा है कि शादीशुदा प्यार नहीं कर सकते?

राज ने आगे कहा, ‘किसी स्त्री के आगोश में किसी कुंआरे पुरुष का पहला संपर्क उस के जीवन का सब से बड़ा रोमांच होता है. मैं न होता कोई और होता तब भी यही होता. हां, यदि लड़की कुंआरी होती, अकेली होती तो इतनी बातें ही न होतीं. तुम उन क्षणों में कमजोर पड़ीं या बहकीं, यह तो मैं नहीं जानता लेकिन जब तुम्हारे साथ का साया पड़ा मन पर, तो प्यार हो गया और जिसे प्यार कहते हैं उसे गलत रास्ता नहीं दिखा सकते.’

मैं रोने लगी, ‘मैं ने तो अपने हाथों अपना सबकुछ बरबाद कर लिया. तुम्हें सौंप दिया. अब तुम मुझे दिल की दुनिया से दूर हकीकत पर ला कर छोड़ रहे हो.’

‘तुम चाहो तो अब भी मैं शादी करने को तैयार हूं. क्या तुम मेरे साथ मेरी वफादार बन कर रह सकती हो, सबकुछ छोड़ कर, सबकुछ भूल कर?’ राज ने फिर दोहराया.

इधर, आनंद, मेरे पति वापस आ गए. मैं अजीब से चक्रव्यूह में फंसी हुई थी. मैं क्या करूं? क्या न करूं? आनंद के आते ही घर के काम की जिम्मेदारी. एक पत्नी बन कर रहना. मेरा बेटा भी वापस आ चुका था. मुझे मां और पत्नी दोनों का फर्ज निभाना था. मैं निभा भी रही थी. और ये निभाना किसी पर कोई एहसान नहीं था. ये तो वे काम थे जो सहज ही हो जाते थे. लेकिन आनंद के दफ्तर और बेटे के स्कूल जाते ही राज आ जाता या मैं उस से मिलने चल पड़ती, दिल के हाथों मजबूर हो कर.

मैं ने राज से कहा, ‘‘मैं तुम्हें भूल नहीं पा रही हूं.’’

‘‘तो छोड़ दो सबकुछ.’’

‘‘मैं ऐसा भी नहीं कर सकती.’’

‘‘यह तो दोतरफा बेवफाई होगी और तुम्हारी इस बेवफाई से होगा यह कि मेरा प्रेम किसी अपराधकथा की पत्रिका में अवैध संबंध की कहानी के रूप में छप जाएगा. तुम्हारा पति तुम्हारी या मेरी हत्या कर के जेल चला जाएगा. हमारा प्रेम पुलिस केस बन जाएगा,’’ राज ने गंभीर होते हुए कहा.

मैं भी डर गई और बात सच भी कही थी राज ने. फिर वह मुझ से क्यों मिलता है? यदि मैं पूछूंगी तो हंस कर कहेगा कि तुम आती हो, मैं इनकार कैसे कर दूं. मैं भंवर में फंस चुकी थी. एक तरफ मेरा हंसताखेलता परिवार, मेरी सुखी विवाहित जिंदगी, मेरा पति, मेरा बेटा और दूसरी तरफ उन कमजोर पलों का साथी राज जो आज भी मेरी कमजोरी है.

इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. पति को भनक लगी. उन्होंने दोटूक कहा, ‘‘रहना है तो तरीके से रहो वरना तलाक लो और जहां मुंह काला करना हो करो. दो में से कोई एक चुन लो, प्रेमी या पति. दो नावों की सवारी तुम्हें डुबो देगी और हमें भी.’’

मैं शर्मिंदा थी. मैं गुनाहगार थी. मैं चुप रही. मैं सुनती रही. रोती रही.

मैं फिर राज के पास पहुंची. वह कलाकार था. गायक था. उसे मैं ने बताया कि मेरे पति ने मुझ से क्याक्या कहा है और अपने शर्मसार होने के विषय में भी. उस ने कहा, ‘‘यदि तुम्हें शर्मिंदगी है तो तुम अब तक गुनाह कर रही थीं. तुम्हारा पति सज्जन है. यदि हिंसक होता तो तुम नहीं आतीं, तुम्हारे मरने की खबर आती. अब मेरा निर्णय सुनो. मैं तुम से शादी नहीं कर सकता. मैं एक ऐसी औरत से शादी करने की सोच भी नहीं सकता जो दोहरा जीवन जीए. तुम मेरे लायक नहीं हो. आज के बाद मुझ से मिलने की कोशिश मत करना. वे कमजोर पल मेरी पूरी जिंदगी को कमजोर बना कर गिरा देंगे. आज के बाद आईं तो बेवफा कहलाओगी दोनों तरफ से. उन कमजोर पलों को भूलने में ही भलाई है.’’

मैं चली आई. उस के बाद कभी नहीं मिली राज से. रीता ने ही एक बार बताया कि वह शहर छोड़ कर चला गया है. हां, अपनी बेवफाई, चरित्रहीनता पर अकसर मैं शर्मिंदगी महसूस करती रहती हूं. खासकर तब जब कोई वफा का किस्सा निकले और मैं उस किस्से पर गर्व करने लगूं तो पति की नजरों में कुछ हिकारत सी दिखने लगती है. मानो कह रहे हों, तुम और वफा. पति सभ्य थे, सुशिक्षित थे और परिवार के प्रति समर्पित.

कभी कुलटा, चरित्रहीन, वेश्या नहीं कहा. लेकिन अब शायद उन की नजरों में मेरे लिए वह सम्मान, प्यार न रहा हो. लेकिन उन्होंने कभी एहसास नहीं दिलाया. न ही कभी अपनी जिम्मेदारियों से मुंह छिपाया.

मैं सचमुच आज भी जब उन कमजोर पलों को सोचती हूं तो अपनेआप को कोसती हूं. काश, उस क्षण, जब मैं कमजोर पड़ गई थी, कमजोर न पड़ती तो आज पूरे गर्व से तन कर जीती. लेकिन क्या करूं, हर गुनाह सजा ले कर आता है. मैं यह सजा आत्मग्लानि के रूप में भोग रही थी. राज जैसे पुरुष बहका देते हैं लेकिन बरबाद होने से बचा भी लेते हैं.

स्त्री के लिए सब से महत्त्वपूर्ण होती है घर की दहलीज, अपनी शादी, अपना पति, अपना परिवार, अपने बच्चे. शादीशुदा औरत की जिंदगी में ऐसे मोड़ आते हैं कभीकभी. उन में फंस कर सबकुछ बरबाद करने से अच्छा है कि कमजोर न पड़े और जो भी सुख तलाशना हो, अपने घरपरिवार, पति, बच्चों में ही तलाशे. यही हकीकत है, यही रिवाज, यही उचित भी है.

वो कैसे बना 40 बच्चों का रेपिस्ट व सीरियल किलर?