Suspense Love Story: प्रेमजाल

Suspense Love Story: उद्योगपति का बेटा अंकुर सोच भी नहीं सकता था कि उसे प्यार करने वाली, उस पर जान छिड़कने वाली शमा का एक दूसरा रूप भी है. यह रहस्य तब खुला जब एक दिन भूलवश शमा का मोबाइल उस की गाड़ी में रह गया. फिर तो मोबाइल के वाट्सअप से ऐसे राज खुले कि…

आधी रात हो जाने के बाद भी अंकुर की आंखों में नींद नहीं थी. शाम की घटना ने उसे इस कदर बेचैन कर दिया था कि वह सो नहीं पा रहा था. उसे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि कोई लड़की इस तरह का छलावा भी कर सकती है? शमा केवल उस की दोस्त ही नहीं थी बल्कि वह उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहता था. जबकि वह दोस्ती और प्यार का खेल इस तरह खेल रही थी कि अंकुर विश्वास ही नहीं कर पा रहा था. रविवार का दिन था, दोनों ने एक दिन पहले ही तय कर लिया था कि रविवार को मल्टीप्लेक्स सिनेमा घर में मूवी देखेंगे. शमा आटो में बैठ कर थिएटर पहुंच गई थी. अंकुर पहले से ही 2 टिकट ले कर उस का इंतजार कर रहा था.

‘‘हाय शमा.’’ कहते हुए अंकुर ने अपने पर्स से पैसे निकाल कर आटो वाले को दिए. पर्स जेब में रखते हुए वह मुड़ा तो शमा चहकी, ‘‘मैं लेट तो नहीं हुई अंकुर?’

‘‘अरे नहीं, बिलकुल सही टाइम पर आई हो.’’

‘‘चलो चलते हैं.’’ शमा ने अंकुर का हाथ थामते हुए कहा.

‘‘हांहां चलो.’’ कहते हुए अंकुर शमा के साथ थिएटर में चला गया.

शमा जब कभी आटो पर आती थी तो किराया अंकुर ही देता था. अगर कभी वह मैट्रो में आती थी तो अंकुर स्टेशन के बाहर कार में उस का इंतजार करते हुए मिलता था. शमा एक बड़े पब्लिक स्कूल में अध्यापिका थी. उस का ताल्लुक एक मध्यमवर्गीय परिवार से था. जबकि अंकुर एक रईस परिवार का बेटा था. शमा उसे बहुत ही संस्कारवान, पढ़ीलिखी और समझदार लड़की जान पड़ती थी. उसे लगता था कि वह उस की जीवनसंगिनी बनने के योग्य है. अंकुर की यह धारणा पिछले 2 सालों से बनी हुई थी.

थिएटर पूरी तरह से भरा हुआ था. उन दोनों ने जैसे ही हाल में प्रवेश किया, फिल्म सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट परदे पर चल रहा था. यानी मूवी बस शुरू ही हुई थी. गेटकीपर ने टौर्च जला कर उन्हें उन की सीटों का रास्ता दिखाया. दोनों अपनी सीटों पर बैठ गए. अंकुर को शमा के साथ मूवी देखने में कुछ अलग ही मजा आता था. इधरउधर कार में घूमने या किसी रेस्तरां में बैठने के बजाय उसे थिएटर में पासपास बैठना ज्यादा अच्छा लगता था. शमा का हाथ अपने हाथों में ले कर मूवी देखने में यह मजा दोगुना हो जाता था. जब परदे पर कोई प्यारभरा गीत चलता था या कोई रोमांटिक दृश्य चल रहा होता था तो उसे लगता था जैसे परदे पर वह और शमा ही हों. उस वक्त दोनों उन दृश्यों में खो जाते थे.

शमा से अंकुर की मुलाकात उस के स्कूल के एक कल्चरल प्रोग्राम में ही हुई थी. उस प्रोग्राम में अंकुर विशिष्ट अतिथि के तौर पर आया था. उस प्रोग्राम के लिए उस के उद्योगपति पिता ने बतौर प्रायोजक बड़ा आर्थिक सहयोग दिया था. इसी नाते उस के पिता को विशिष्ट अतिथि बनाया गया था. लेकिन ऐन वक्त पर उन्हें उद्योगपतियों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए बाहर जाना पड़ गया था. पापा ने स्कूल कमेटी के प्रेसीडेंट से विनम्रतापूर्वक क्षमा मांगते हुए कहा था कि वे जरूरी काम से बाहर हैं, इसलिए प्रोग्राम में नहीं आ पाएंगे.

स्कूल कमेटी के प्रेसीडेंट को बड़ी निराशा हुई. उन्हें यह अच्छा नहीं लग     रहा था कि प्रोग्राम के प्रायोजक ही प्रोग्राम में मौजूद न हों. आखिर तय हुआ कि उन की गैरमौजूदगी में प्रतिनिधि के तौर उन का बेटा अंकुर प्रोग्राम में मौजूद रहेगा. लंदन से एमबीए करने के बाद अंकुर ने पापा की टैक्सटाइल इंडस्ट्रीज में बैठना शुरू कर दिया था. निर्धारित दिन अंकुर ही प्रोग्राम में आया. बहुत बड़े स्कूल कैंपस में रखे गए प्रोग्राम में क्षेत्र के सांसद मुख्य अतिथि थे और भारतीय पुलिस सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी विशिष्ट अतिथि. विद्यार्थियों के घर वालों के अलावा भी विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्टजनों को प्र्रोग्राम में बुलाया गया था. कुल मिला कर वहां करीब 15 सौ के आसपास लोग मौजूद थे.

प्रोग्राम की एंकरिंग स्कूल की खूबसूरत और ऊर्जावान अध्यापिका शमा कर रही थीं.

‘‘और अब मैं गुजारिश करूंगी आज के प्रोग्राम की शान युवा उद्यमी अंकुर गुप्ता से कि वे मंच पर आएं.’’ शमा ने एक विशेष अंदाज में अंकुर का नाम मंच से पुकारा, तो वह उस से खासा प्रभावित हुआ. मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि के भाषण खत्म हो चुके थे. अंकुर यंत्रवत उठा और मंच की ओर चल पड़ा.

शमा ने मंच की सीढि़यों पर ही हाथ आगे बढ़ा कर अंकुर का स्वागत किया. हुस्न की मलिका सी शमा के हाथों की गरमी अंकुर ने अपने हाथों में महसूस की. गजब की खूबसूरत थी वह. पलभर के लिए अंकुर की नजरें उस से मिलीं. उस की बातचीत से उसे लगा कि शमा बहुत ही तहजीब वाली संस्कारवान लड़की है. अंकुर मंच के डायस पर खड़ा था और पूरा विद्यालय प्रांगण उस के स्वागत में बज रही तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था. अन्य अतिथियों के संबोधन के बाद उस ने अपने अनुभवों और आधुनिक विचारों से परिपूर्ण भाषण दिया. अंकुर अच्छा वक्ता था. हर क्षेत्र की खबरों से वह अपडेट रहता था और अच्छा बोल लेता था. वह कालेज स्टूडेंट यूनियन का प्रेसीडेंट भी रह चुका था.

शमा भी अंकुर से खासी प्रभावित हुई. अंकुर उसे पहली ही नजर में भा गया था. स्कूल प्रोग्राम के बाद शमा से अंकुर की फिर मुलाकात हुई. शिष्टाचारवश वह उसे गाड़ी तक छोड़ने गई थी. उन चंद मिनटों की मुलाकात में ही शमा ने उसे अपना परिचय दे दिया था. उस ने बताया कि वह एक मध्यम वर्गीय शर्मा परिवार से ताल्लुक रखती है. उस के पापा एक न्यूज चैनल में कैमरामैन हैं. वह 2 बहनों और एक भाई में सब से छोटी है. अध्यापन उस का शौक भी है और रोजगार भी.

‘कभी हमारे औफिस आइए.’’ अंकुर ने अपना विजिटिंग कार्ड शमा को देते हुए कहा.

‘‘जरूर, कभी आऊंगी.’’ शमा मुसकान बिखेरते हुए बोली.

उस दिन शमा से हुई मुलाकात अंकुर को बेचैन कर गई थी. रहरह कर उस की आंखों के सामने शमा का खूबसूरत चेहरा घूम रहा था. शमा मिले भी तो कहां मिले. उस ने अपना कार्ड तो शमा को दिया था पर उस का अतापता नहीं पूछा था. न ही मोबाइल नंबर लिया था.

एक दिन अचानक वाट्सअप पर आए एक मैसेज ने अंकुर को चौंका दिया. ‘‘हैलो सर, गुड मौर्निंग.’’

बिलकुल नया नंबर था. अंकुर समझ नहीं पाया कि ये किस का नंबर है. उस ने चैट की डीपी में देखा, किसी लड़की की तसवीर लगी थी. उस ने उसे क्लोज कर के देखा, वह शमा ही थी.

‘वेरी गुड मौर्निंग जी.’ अंकुर ने लिखा.

दूसरी ओर शमा आनलाइन थी. उस ने फिर टाइप किया, ‘कैसे हैं सर आप?’

‘फाइन. आप कैसी हैं, शमाजी?’ अंकुर ने पूछा.

‘मैं भी ठीक हूं सर. पर आप मुझे शमाजी मत बोलिए. सिर्फ शमा चलेगा.’

‘ओके. और आप मुझे सर नहीं, अंकुर बोलें. आप मुझे इतना बड़ा मत बनाइए.’ अंकुर ने लिखा.

और शमा ने मुसकान वाली स्माइली के साथ लिखा, ‘ओके, अंकुर सर.’

उस दिन पहली मोबाइल चैट के बाद अंकुर और शमा नजदीक आते चले गए. मोबाइल चैट के बाद मुलाकात. फिर मुलाकात दोस्ती में और दोस्ती प्यार में बदल गई.

अंकुर और शमा की मुलाकातों का सिलसिला चल रहा था. वह जब भी मिलती अंकुर विदा होते हुए कहता, ‘‘फिर कब और कहां मिलना है?’’

‘‘अभी एक हफ्ते तो बहुत बिजी हूं. बहुत सारे काम करने हैं.’’

‘‘यानी एक हफ्ते की छुट्टी.’’

‘‘अरे यार छुट्टी क्यों? मोबाइल है न, मैसेज कर लेना. फ्री हुई तो बात कर लूंगी.’’ शमा कहती.

और आज अंकुर ने शमा के साथ मूवी देखने का प्रोग्राम बनाया था. बहुत ही रोमांटिक लव स्टोरी वाली मूवी थी. दोनों ने मूवी में खूब एंजौय किया.

थिएटर से बाहर आ कर अंकुर ने शमा से कहा, ‘‘एकएक कप कौफी पीते हैं, सामने ही कैफे कौफीडे है.’’

‘‘हां अंकुर, यह ठीक रहेगा. मेरा भी बहुत मन कर रहा है. आज ठंड भी बहुत है.’’

‘तो चलो, देर किस बात की, आप की ठंड दूर किए देते हैं.’

अंकुर ने टेढ़ी नजरों से शरारतपूर्ण अंदाज में कहा तो शमा ने प्यार भरा एक घूंसा अंकुर की बाजू पर दे मारा. और बोली, ‘‘तुम कभी नहीं सुधरोगे.’’

‘‘तुम मुझे सुधारना क्यों चाहती हो शमा?’ अंकुर ने शरारत से कहा, तो शमा ने उस की बाजू पर एक और घूंसा जड़ दिया.

‘‘चलो, शमा मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं.’’ अंकुर ने कैफे कौफीडे से निकलते हुए कहा.

‘‘घर नहीं, घर के नजदीक बोलो.’’

‘‘ओके बाबा, घर के नजदीक.’’ अंकुर ने कहा.

शमा का घर अंकुर के रास्ते में ही पड़ता था. कभीकभी वह शमा को उस के घर के नजदीक बने मदर डेयरी बूथ के पास छोड़ देता था. वहीं से शमा का घर चंद कदमों की दूरी पर था.

‘‘ओके डार्लिंग, सीयू, मिलते हैं. अपना खयाल रखना.’’ कार से उतरते हुए शमा ने अंकुर से कहा.

‘‘ओके जरूर रखूंगा. आप का आदेश सिर आंखों पर.’’ अंकुर ने कहा, तो शमा उस की नाक खींचते हुए बोली, ‘‘नाटी बौय.’’

अंकुर कुछ ही दूरी पर गया था कि उस की नजर बराबर वाली सीट पर पड़ी. उस ने देखा शमा का मोबाइल सीट पर पड़ा रह गया था. वह मोबाइल ले जाना भूल गई थी. लेकिन अब क्या करे, शमा को मोबाइल कैसे लौटाए? उस के पास कोई और नंबर भी नहीं था, जिस पर काल कर के शमा को बता देता. शमा के घर वह जा नहीं सकता था. अंकुर ने सोचा शमा खुद ही काल करेगी, तभी बता दूंगा. एक पल के लिए उस के मन में खयाल आया, चलो देखते हैं मोबाइल में क्या कुछ है? लेकिन दूसरे पल उस ने सोचा इस तरह चोरीछिपे किसी का मोबाइल देखना गलत है. फिर सोचा देख भी ले तो क्या गलत है? आखिर उस ने घर के रास्ते में ही कार को साइड में पार्क किया.

शमा का मोबाइल उस ने अपने हाथ में लिया. कीपैड का पासवर्ड उसे पता था. उस ने कई बार शमा को खोलते हुए देखा था, लेकिन कभी इस का फायदा नहीं उठाया था. शमा के मोबाइल का पासवर्ड ‘शमा 22’ था. यानी नाम और उस के बर्थडे की तारीख. अंकुर ने शमा टाइप किया तो मोबाइल का लौक खुल गया. मोबाइल को खुला देख अंकुर की इच्छा उस का वाट्सअप खोलने की हुई. उस ने वाट्सअप खोला. उसे यह देख कर घोर आश्चर्य हुआ कि उस में एक भी नया मैसेज नहीं था. शमा उस के साथ पिछले 5-6 घंटे से थी. शमा ने एक बार भी मोबाइल नहीं छुआ था. इस का मतलब शमा वाट्सअप ज्यादा यूज नहीं करती थी. एक पल के लिए उसे बहुत अच्छा लगा.

‘कहीं ऐसा तो नहीं कि नेटवर्क काम नहीं कर रहा हो.’ अंकुर बुदबुदाया. उस ने स्क्रीन को नीचे कर के देखा. फिर देख कर बोला, ‘ओहो, डाटा नेट ही बंद कर रखा है.’ अंकुर ने जैसे ही मोबाइल डाटा के आइकोन को टच किया, नेट शो करने लगा. जैसे ही नेट औन हुआ, एक साथ 8-10 अलगअलग नंबरों से कई मैसेज आ गए. इस का मतलब शमा का फोन कई नंबरों के चैट पर था. अंकुर यह जानने को बेचैन हुआ कि वे किन कं नंबर हैं? पलभर के लिए उसे लगा कि कहीं गलत तो नहीं कर रहा, किसी के मोबाइल को खोल कर? कई सवाल उस के दिमाग में कौंधे. आखिर उस से रहा नहीं गया और उस ने सभी चैट पढ़ने का निर्णय कर लिया.

चैट पढ़ कर अंकुर सन्न रह गया. मानों उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई हो. उस की स्थिति काटो तो खून नहीं वाली थी. जिस शमा को वह बहुत संस्कारवान समझता था, जिसे वह अपनी जीवन संगिनी बनाने के बारे में सोचने लगा था, उस का दूसरा रूप उस के सामने था. मोबाइल में कई लड़कों के मैसेज थे.

‘‘यार शमा तुम ने 3 घंटे मैसेज नहीं करने को कहा था, अब नहीं रहा जा रहा, कहां हो. अपने पापा के साथ क्या कर रही हो आज.’’ एक नंबर से मैसेज था. तो दूसरे में ‘‘शमा डार्लिंग, अपना मोबाइल संभाल कर रखा करो. आखिर बहन को देती ही क्यों हो, जो 5-6 घंटे के लिए बैन करना पड़े.’’ शमा ने भी कई चैट में रोमांटिक बातें कर रखी थीं. अंकुर का सिर चकरा गया. कई चैट में अश्लील जोक्स और पोर्न मूवी की छोटीछोटी क्लिपिंग भी थीं.

कुछ नंबरों पर शमा और कुछ लड़कों के अंतरंग चित्र थे. इन चित्रों को शमा ने आदान प्रदान किया था. अंकुर ने देखा कुछ लड़के तो उस के परिचित थे, जिन्हें वह अच्छी तरह से जानता था. ज्यादातर अमीर घरानों के बिगड़ैल लड़के थे. अंकुर की समझ में आ गया था कि शमा अपनी खूबसूरती और अदाओं से अमीरजादों पर अपना दिल लुटाती है और अमीरजादे उस पर अपनी दौलत. अंकुर ज्योंज्यों शमा के मोबाइल के चैट पढ़ता जा रहा था, उस का माथा घूम रहा था. उस ने शमा की एक सहेली की चैट खोली. दोनों ने एकएक पल सांझा किया हुआ था.

सहेली की चैट में अपना नाम देख कर अंकुर चौंक गया था. शमा ने लिखा था कि प्रसिद्ध टैक्सटाइल मिल ओनर का पुत्र अंकुर उस पर जान छिड़कता है.

‘‘ओ गौड!’’ अंकुर ने माथा पीट लिया.

शमा ने अपनी सहेली को वह सेल्फी भी भेज रही थी, जो शमा ने अंकुर के साथ अंतरंग पलों में ली थी. वह इस खयाल से ही कांप गया कि वह सेल्फी किसी के हाथ लग गई तो उस के परिवार की बड़ी बदनामी होगी. जबकि शमा बड़ी बेशर्मी से उस सेल्फी को अपनी सहेली से शेयर कर चुकी थी. अंकुर के मन में आया कि शमा का मोबाइल ही तोड़ कर फेंक दें. न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी. लेकिन अगले ही पल उस ने सोचा इस से होगा क्या? सेल्फी तो उस की सहेली के पास भी भेजी गई है. शमा उस सेल्फी को ले कर कुछ भी कर सकती है. हो सकता है ब्लैकमेल करे?

वह सोचने लगा कि शमा से छुटकारा कैसे पाए? क्योंकि वह आसानी से तो पीछा छोड़ेगी नहीं. जीवनसंगिनी बनाना तो दूर वह तो दोस्ती के भी काबिल नहीं है. इसी उधेड़बुन में अंकुर लगातार शमा के मोबाइल के वाट्सअप पर अलगअलग चैट पढ़ता जा रहा था. आखिर में उस ने एक बहुत बिगड़े अमीरजादे की चैट खोली. लिखा था, ‘‘शमा तुम मुझे यूं ब्लैकमेल नहीं कर सकती. जो भी हम दोनों के बीच था, उस में हम दोनों की सहमति थी. तुम्हारा मन मुझ से भर गया तो तुम ने मुझे छोड़ दिया. जब तक मैं ने तुम पर पैसा लुटाया तब तक तुम मुझ पर मर मिटने का नाटक कर रही थीं. और अब जब तुम्हें नएनए लड़के मिल गए तो मुझे दूध से मक्खी की तरह निकल फेंका.’’

यह सब पढ़ते ही अंकुर का सिर चकरा गया. ‘उफ्फ, इतना गंदा खेल.’ वह बुदबुदाया. उसे शमा पर गुस्सा आया और खुद पर खीझ. आखिर वह शमा के प्रेमजाल में फंसा ही क्यों? जो हुआ सो हुआ, पर अब इस बला से कैसे छुटकारा मिले? वह सोच ही रहा था कि उस के दिमाग में एक आइडिया आया. उस ने सभी चैट की फोटो शमा के मोबाइल से अपने मोबाइल में फारवर्ड किए और शमा के मोबाइल से अपनी चैट डिलीट कर दी. अंकुर ने उस लड़के का मोबाइल नंबर भी नोट कर लिया, जिस ने शमा पर गुस्सा निकाल रखा था.

उस ने तय कर लिया कि वह शमा को इस बात का एहसास तक नहीं होने देगा कि उस की हरकतों को वह जान गया है. वह शमा को उसी के बुने जाल में फंसा कर छुटकारा पाएगा. उस ने शमा के मोबाइल के वाट्सअप पर सभी चैट को अनरीड कर दिया. यानी अब फिर से ये लगने लगा था कि उस की चैट किसी ने पढ़ी नहीं है. यह वाट्सअप का नया वर्जन था, जिस का उस ने फायदा उठाया.

तभी अंकुर के मोबाइल की घंटी बजी. यह कोई नया नंबर था. उस ने मोबाइल को औन किया.

‘‘अंकुर.’’ उधर से आवाज आई. वह शमा ही थी.

‘‘क्या हुआ शमा, ये किस का नंबर है. तुम्हारा मोबाइल कहां गया.’’

‘‘अरे यार, तुम से मिल कर होश कहां रहता है. होशोहवास खो देती हूं.’’

‘‘क्या हुआ बताओ ना?’’

‘‘तुम अपनी गाड़ी में देखो, वहीं पड़ा होगा मेरा मोबाइल. भूल गई हूं शायद.’’

‘‘अरे हां, ये पड़ा है. चलो कल ले लेना ओके.’’

‘‘नहीं, अभी वापस आओ, मुझे अभी चाहिए.’’ शमा ने बड़ी आतुरता से कहा.

‘‘सुबह औफिस जाते हुए दे दूंगा भई, विश्वास रखो.’’ अंकुर ने उसे समझाने की कोशिश की.

‘‘नहीं अभी वापस आ कर दे कर जाओ. मुझे चाहिए.’’ शमा ने घबराई हुई सी आवाज में कहा.

‘‘ओके, आता हूं.’’

शमा की घबराई हुई आवाज और मोबाइल के प्रति इतनी व्याकुलता अंकुर को समझ आ रही थी.

अंकुर ने कार का यूटर्न लिया और फिर से शमा के घर की तरफ चल पड़ा.

शमा मदर डेयरी बूथ पर ही मिल गई. अंकुर की कार देखते ही वह उस तरफ लपकी.

‘‘अंकुर, बड़ी मुश्किल से कुछ काम का बहाना कर के घर से बाहर आई हूं.’’

‘‘ओके बेबी. इस में घबराने वाली क्या बात थी.’’ अंकुर ने कहा.

‘‘चलो छोड़ो, अभी जल्दी में हूं. चलती हूं.’’ कह कर शमा ने अपना मोबाइल लिया और वापस चली गई.

घर आ कर अंकुर ने जरूरी काम निपटाए और अपने बैडरूम में आ गया. उस के मन में कई तरह की उथलपुथल चल रही थी. उस ने शमा के मोबाइल से फारवर्ड की गई सभी फोटो कंप्यूटर में डाउनलोड कीं. कई लड़कों के साथ शमा के अंतरंग पलों की सेल्फी थीं. उस ने फोटोशौप में जा कर सभी सेल्फी में लड़कों के चेहरों को धुंधला कर दिया. अब सिर्फ शमा ही दिख रही थी. लड़कों के चेहरों के सिवा सब कुछ पूर्ववत था. इस के बाद अंकुर ने अपने कंप्यूटर के कलर प्रिंटर से कुछ कलर प्रिंट निकाले. इस के बाद उस ने एक मोबाइल नंबर डायल किया. यह नंबर उस लड़के का था, जो शमा की हरकतों से परेशान था. अगले दिन अंकुर ने प्रिंटर से निकाले सारे कलर प्रिंट उस लड़के को निर्धारित जगह पर भिजवा दिए.

शमा के स्कूल में हलचल मची थी. स्कूल खुलते ही देखा गया कि बहुत सारे रंगीन पैंफ्लेट स्कूल कैंपस में बिखरे पड़े हैं. इन पर शमा के अंतरंग पलों की वे तमाम फोटो थीं, जो उस ने खुद सेल्फी के रूप में ली थीं. पूरे स्कूल में एक ही चर्चा थी. शमा मैडम ऐसी है. शमा जैसे ही स्कूल पहुंची, एक बच्चा बड़े ही भोलेपन से एक पैंफ्लेट उस के हाथों में थमा कर बोला, ‘‘मैडम आप की सेल्फी बहुत अच्छी है.’’ शमा ने देखा तो जड़ हो गई. मारे शरम के उस से हिला नहीं गया. वह खुद को अपने ही बुने जाल में फंसा हुआ महसूस कर रही थी. Suspense Love Story

लेखक – रवि चमडि़या  

 

 

Delhi News: 2 बेटियों को मारकर मां ने की खुदकुशी

Delhi News: देश की राजधानी से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिस ने हर किसी को हैरान कर रख दिया है. जहां एक मां ने पहले अपनी 2 बेटियों की जान ले ली, इस के बाद खुद भी सुसाइड करने की कोशिश की. आखिर कौन थी वह मां, जिस ने यह कदम उठाया और क्या मजबूरी रही होगी. जिस से वह इतना खौफनाक कदम उठाने के लिए मजबूर हो गई? चलिए जानते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से, जो आप को होने वाली ऐसी घटनाओं से सावधान भी करेगी.

यह घटना दक्षिणी दिल्ली के मालवीय नगर से सामने आई है, जहां बड़ी बेटी राधिका और छोटी बेटी गुनिशा एक घर के अंदर मृत मिलीं. वहीं मां सुनीता एक कमरे में बेहोश मिली. इस घटना की जानकारी मिलते ही इलाके में सनसनी फैल गई.

पुलिस के अनुसार, उन्हें सूचना मिली कि एक घर में कमरा काफी देर से बंद है और दरवाजा कोई खोल नहीं रहा है. इस के बाद पुलिस मौके पर पहुंची तो देखा कि दरवाजा अंदर से बंद है. पुलिस ने दरवाजा खोला तो एक कमरे में एक युवती का शव पड़ा हुआ था, जिस के चेहरे पर एक तकिया भी रखा हुआ था. वहीं दूसरे कमरे में पुलिस को एक शव और मिला, जिस के गले पर निशान थे. बाद में दोनों की पहचान सगी बहनों के रूप में हुई. वहीं इन दोनों बहनों की मां सुनीता एक कमरे में बेहोश मिली. पुलिस ने तीनों को ट्रामा सेंटर में भरती करा दिया गया.

पुलिस ने आशंका जताई है कि दोनों बेटियों की हत्या  सुनीता ने की, इस के बाद खुद आत्महत्या करने की कोशिश की थी.

पुलिस ने मौके पर ही क्राइम टीम और एफएसएल की टीम को भी बुला लिया, जिस से इन की जांच की जा रही है. घटना की जानकारी मिलते ही मालवीय नगर के विधायक सतीश कुमार भी मौके पर पहुंचे. पुलिस का कहना है कि बड़ी बेटी राधिका बीमार रहती थी, वहीं गुनिशा कानून की पढ़ाई कर रही थी. पुलिस पूरे मामले की विस्तार से जांच कर रही है. Delhi News

Shoes Offer: एक रुपए के जूते की सेल, बेकाबू भीड़ पर किया लाठीचार्ज

Shoes Offer: एक ऐसा मामला सामने आया है जिस ने हर किसी को चौंका दिया है. जहां एक दुकान पर एक रुपए में महंगे जूते देने का औफर दिया गया. इसी औफर की वजह से इतनी ज्यादा भीड़ इकट्ठा हो गई कि पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ गया. आखिर किस तरह से एक रुपए में जूते का औफर चल रहा था. इस पूरी कहानी को जानने के लिए पढ़ते हैं आगे.

यह घटना केरल से सामने आई है, जहां एक दुकान पर जरूरत से ज्यादा भीड़ जमा हो जाने के कारण पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा. जानकारी के मुताबिक दुकानदार ने एक रुपए में जूते देने का औफर रखा था, जिस के बाद काफी बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंच गए.

इस के बाद कई जिलों से भी लोग उस की दुकान पर आने लगे. दुकान के बाहर देर रात से ही लोगों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया, जिस के बाद भीड़ लगातार बढ़ती चली गई. हालात इतने बिगड़ गए कि मौके पर भगदड़ जैसी स्थिति बन गई. आखिरकार पुलिस को भीड़ को काबू करने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा.

दुकान के औफर के मुताबिक वह पहले 100 ग्राहकों को एक रुपए में एक जोड़ी जूते देने वाला था, जिस वजह से सबसे पहले पहुंचने की होड़ मच गई थी.

जानकारी के मुताबिक वायरल विज्ञापन से आकर्षित हो कर सैकड़ों ग्राहक तड़के ही उस की दुकान के पास पहुंच गए, जिस से भगदड़ जैसी स्थिति बन गई. भीड़ की वजह से इलाके में ट्रैफिक भी प्रभावित होने लगा, जिस के बाद पुलिस को ऐक्शन लेना पड़ा.

पुलिस ने बताया कि भीड़ इतनी ज्यादा थी कि दुकान की क्षमता से कहीं अधिक ग्राहक पहुंच गए, जिन में बच्चे भी शामिल थे. हैरानी की बात यह रही कि वायनाड जैसे जिलों से भी लोग वहां आए थे. वायनाड से आए एक लड़के ने बताया कि वह देर रात करीब ढाई बजे दुकान पर पहुंचा, लेकिन वहां पहले से ही भारी भीड़ मौजूद थी. लोगों की भारी भीड़ के कारण इलाके में अफरातफरी फैल गई और यातायात पूरी तरह बाधित हो गया.

जब स्थिति बेकाबू हो गई, तो पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और भगदड़ रोकने के लिए हल्का लाठीचार्ज भी किया गया. इस अफरातफरी के बाद इलाके में तनाव फैलाने के आरोप में दुकान मालिक को हिरासत में ले लिया गया. 1 Rupee Shoes Offer

Delhi Crime News: एसिड अटैक रोकने में कानून नाकाम

Delhi Crime News: एसिड अटैक रोकने  में कानून नाकाम   देश की राजधानी दिल्ली में अपनी छोटी बहन के साथ जा रही एक लड़की पर द्वारका मोड़ के पास एक लड़के ने एसिड अटैक कर दिया. लड़की ने इस मामले में 2-3 लोगों पर शक जाहिर किया. पुलिस ने सभी 3 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.

लड़की के पिता ने बताया, ‘‘मेरी दोनों बेटियां सुबह स्कूल के लिए निकली थीं. कुछ देर बाद मेरी छोटी बेटी भागती हुई आई और उस ने बताया कि 2 लड़के आए और दीदी पर एसिड फेंक कर चले गए.  हर साल देश में एसिड अटैक के 1,000 से ज्यादा मामले सामने आते हैं. आरोपी पकड़े जाते हैं. पुलिस अपना काम करती है. इस के बावजूद लड़की की जिंदगी खराब हो जाती है. एसिड अटैक को ले कर साल 2013 में कानून बना था.

यह भी एसिड की शिकार लड़कियों की पूरी मदद नहीं कर पा रहा है. कानून के तहत एसिड हमलों को अपराध की श्रेणी में ला कर भारतीय दंड संहिता की धारा 326ए और धारा 326बी जोड़ी गई. इन धाराओं के तहत कुसूरवार पाए जाने पर कम से कम  10 साल की जेल की सजा का प्रावधान किया गया है. कुछ मामलों में उम्रकैद का भी प्रावधान रखा गया है. सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में एक पीडि़ता की अर्जी पर सुनवाई के दौरान कहा था, ‘एसिड हमला हत्या से भी बुरा है.

इस से पीडि़त की जिंदगी पूरी तरह बरबाद हो जाती है.’ इस के बाद एसिड अटैक के पीडि़तों के इलाज और सुविधाओं के लिए भी नई गाइडलाइंस जारी की गई थीं. सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों को एसिड हमले के शिकार को तुरंत कम से कम 3 लाख रुपए की मदद देने का प्रावधान है. पीडि़ता का मुफ्त इलाज भी सरकार की जिम्मेदारी है.  देखने में यह बेहतर लगता है, पर हकीकत में इस को संभालना बहुत मुश्किल होता है. एसिड की खुली बिक्री पर रोक लगी, इस के बाद भी एसिड मिल रहा है.

साल 2018 से साल 2020 के बीच देश में महिलाओं पर एसिड हमलों के 386 मामले दर्ज किए गए थे. इन में से केवल 62 मामलों के आरोपियों को कुसूरवार पाया गया था. एसिड अटैक की शिकार अपना मुकदमा सही से नहीं लड़ पाती हैं. उन के पास अच्छा वकील करने के लिए पैसे नहीं होते हैं.

एसिड अटैक की शिकार अंशु बताती हैं, ‘‘एसिड अटैक के बाद जिंदगी बेहद मुश्किल हो जाती है. इलाज में लाखों रुपए खर्च होते हैं. सरकार से मिलने वाली मदद लेना बेहद मुश्किल होता है. वह मदद इतनी नहीं होती कि सही तरह से इलाज हो सके.  ‘‘इस के बाद जिंदगी में किसी का साथ नहीं मिलता. एसिड अटैक की शिकार लड़कियों के लिए सरकार को पुख्ता कदम उठाने चाहिए.’’

UP Crime: मुखौटा लगा कर ली पत्नी की जान

UP Crime: एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां एक पति ने पत्नी के अफेयर के चलते उस की चाकू से हत्या कर डाली. पत्नी आरती अपने प्रेमी के साथ लिवइन में रह रही थी. अब सवाल उठता है कि आखिर आरती पति के होते हुए प्रेमी के साथ लिवइन में क्यों रह रही थी? आखिर क्या वजह थी इस हत्या की? पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से, जो आप को सावधान और होने वाले क्राइम से सतर्क करेगी.

यह दर्दनाक घटना उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर से सामने आई है, जहां होली के दिन मनमोहन पांडेय ने मुखौटा लगा कर पत्नी आरती की हत्या कर डाली. वहीं आरती के प्रेमी बृजदीप के ऊपर तेजाब फेंक दिया, जिस से वह बुरी तरह झुलस गया.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आरती का मनमोहन पांडेय से पिछले 2 सालों से तलाक का केस चल रहा था. इसी वजह से वह अपने पति से अलग रहती थी. इस के बाद वह करीब 6 महीने से अपने प्रेमी बृजदीप के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी. मनमोहन होली वाले दिन ही पत्नी के किराए के घर पहुंच गया. उस समय उस का प्रेमी भी वहीं रुका हुआ था. मनमोहन ने दरवाजा खटखटाया. जब बृजदीप दरवाजा खोलने आया तो मनमोहन ने उस की आंखों में रंग डाल दिया.

इस की चीख सुनकर आरती बाहर आई तो मनमोहन ने उसे दबोच लिया और चाकू से उस की हत्या कर डाली. बृजदीप ने बताया कि होली के मौके पर मैं आरती के साथ रुका था. सुबह हम बैठकर बातें कर रहे थे, तभी डोर बेल बजी. दरवाजा खोला तो सामने एक आदमी चेहरे पर मुखौटा पहने खड़ा था. उस ने मेरी आंखों में रंग झोंक दिया. कुछ समझ में आता, उस से पहले ही हमलावर ने मेरे चेहरे पर तेजाब उड़ेल दिया.

मैं चीखते हुए मकान के बाहर आ गया. मेरी चीख सुनकर आरती दौड़ते हुए कमरे से बाहर आ गई. मैं ने कहा तुम भाग जाओ. तब तक हमलावर ने आरती को दबोच लिया. जब मैं ने हमलावर का मुखौटा खींचा तो पता चला कि वह उस का पति मनमोहन था.

मनमोहन ने चाकू से आरती का गला रेत दिया. आरती की चीख सुनकर मैं भागकर कमरे में आया. देखा तो आरती लहूलुहान पड़ी थी और मनमोहन उस पर चाकू से और वार करने जा रहा था. तभी मैं उस पर टूट पड़ा. मैं ने मनमोहन को लातघूंसे से बुरी तरह पीटा और ईंट से उस के सिर पर ताबड़तोड़ कई वार कर दिए. इस घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और मामले की जांच शुरू कर दी. UP Crime

Suspense Story: बेवफाई का दर्द

Suspense Story: धनदौलत, सुखसुविधाओं के अलावा औरत की और भी जरूरतें होती हैं. मर्चेंट नेवी में इंजीनियर धु्रवकांत ठाकुर अपनी  विवाहिता सुष्मिता की उन्हीं जरूरतों को पूरी नहीं  कर पा रहा था. इस का अंजाम इतना भयानक निकला कि…

9 दिसंबर, 2015 की सुबह के 6 बजे महाराष्ट्र के जिला रायगढ़ की तहसील पनवेल, नवी मुंबई के थाना मानसरोवर कामोठे के सीनियर इंसपेक्टर श्रीराम मल्लेमवार को किसी ने फोन द्वारा सूचना दी कि सेक्टर-19 की वेदांत दृष्टि सोसायटी की दूसरी मंजिल पर फ्लैट नंबर 201 में एक हादसा हो गया है, जिस में 3 लोग मारे गए हैं. तीनों लाशें फ्लैट में पड़ी हैं. सूचना गंभीर थी. श्रीराम मल्लेमवार तत्काल अपने साथ सहायक पुलिस इंसपेक्टर चंद्रशेखर भोइर, सबइंसपेक्टर जनार्दन पार्टे, हैडकांस्टेबल मोहन मुलीक, सुनील होलार, दिलीप मिनमिणे और रवि गर्जे को ले कर घटनास्थल पर जा पहुंचे.

सुबहसुबह सोसायटी में पुलिस देख कर सुरक्षागार्डों से ले कर वहां रहने वाले तक इस आशंका से घिर गए कि यहां ऐसा क्या हो गया कि पुलिस को आना पड़ा. देखते ही देखते पूरी सोसायटी के लोग इकट्ठा हो गए. पुलिस ने फ्लैट नंबर 201 के अंदर जाने से पहले उस में रहने वालों के बारे में पूछा तो पता चला कि उस में मर्चेंट नेवी में काम करने वाले इंजीनियर धु्रवकांत ठाकुर अपनी पत्नी सुष्मिता ठाकुर के साथ रहते थे. इसे उन्होंने एक साल पहले ही 10 हजार रुपए महीने के किराए पर लिया था.

धु्रवकांत नौकरी की वजह से अधिकतर बाहर ही रहते थे, इसलिए उन की पत्नी सुष्मिता ठाकुर यहां अकेली ही रहती थीं. साल भर में धु्रवकांत को एकदो बार ही देखा गया है. जबकि उन के एक दोस्त अजय सिंह को अकसर उन के यहां देखा गया है. करीब एक सप्ताह से वह सुष्मिता के साथ ही रह रहा था. कल रात ही धु्रवकांत अपने फ्लैट पर आए थे. सोसायटी के सुरक्षागार्डों से पूछताछ कर के श्रीराम मल्लेमवार ने यह जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी और सहयोगियों के साथ फ्लैट नंबर 201 के सामने जा पहुंचे. फ्लैट का दरवाजा अंदर से बंद था. दरवाजा तोड़ कर वह अंदर दाखिल हुए तो उन्हें जो सूचना दी गई थी, वह सच साबित हुई.

सामने के हाल में फर्श पर एक युवक की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस के शरीर से निकला खून फर्श पर फैला हुआ था. उस के शरीर और गले पर किसी तेजधार वाले चाकू के कई गहरे घाव थे. हाल के सामने वाले बैडरूम में एक युवा और खूबसूरत महिला की लाश पड़ी थी. उस के शरीर पर किसी तरह का कोई घाव नहीं था. उस के नाकमुंह पर एक तकिया पड़ा था, इस का मतलब उस की हत्या उसी तकिए से मुंहनाक दबा कर की गई थी. उसी कमरे में एक कोने में एक युवक बेहोश पड़ा था, जिस के गले में एक टूटी हुई टाई बंधी थी, पास ही एक छोटा सा टेबल गिरा पड़ा था, टाई का आधा हिस्सा छत में लगे पंखे से बंधा था. इस से श्रीराम मल्लेमवार ने अंदाजा लगाया कि इस ने आत्महत्या की कोशिश की होगी. लेकिन टाई के टूट जाने की वजह से वह उस में सफल नहीं हुआ.

श्रीराम मल्लेमवार ने तुरंत उसे अस्पताल भिजवाया. गार्डों और पड़ोसियों ने उस की शिनाख्त धु्रवकांत ठाकुर के रूप में की. मृतका सुष्मिता ठाकुर थी और मृतक उस का दोस्त अजय सिंह था. श्रीराम मल्लेमवार घटनास्थल और लाशों का निरीक्षण कर रहे थे कि नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर प्रभात रंजन, एडीशनल पुलिस कमिश्नर विश्वास पाढरे, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर शेषराव सूर्यवंशी भी आ गए थे. अधिकारियों के साथ ही प्रैस फोटोग्राफर, डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट ब्यूरो की टीम भी आई थी. इन लोगों का काम खत्म हो गया तो वरिष्ठ अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस के बाद वे इस मामले की जांच की जिम्मेदारी श्रीराम मल्लेमवार को सौंप कर चले गए.

श्रीराम मल्लेमवार ने सहायकों की मदद से घटनास्थल की औपचारिकताएं निभा कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ग्रामीण अस्पताल भिजवा दिया. घटनास्थल की स्थिति, 2 लोगों की हत्या और एक के आत्महत्या करने की कोशिश से ही पुलिस समझ गई थी कि यह अवैध संबंधों का मामला है. लेकिन पूरी सच्चाई तो तभी सामने आ सकती थी, जब बेहोश पड़े धु्रवकांत को होश आ जाता. लेकिन जब पुलिस ने उन के फ्लैट की तलाशी ली तो वहां पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला, जिसे धु्रवकांत ने अपनी बहन रंजना झा के नाम लिखा था.

उस सुसाइड नोट को पढ़ने के बाद हत्याओं और आत्महत्या का कुछ रहस्य तो उजागर हो गया, जो रहस्य बाकी बचा था, वह धु्रवकांत के होश में आने के बाद दिए गए उन के बयान से उजागर हो गया. यह सचमुच अवैध संबंधों में की गई हत्याओं का मामला था. यह पूरी कहानी कुछ इस तरह थी. 29 वर्षीय धु्रवकांत ठाकुर बिहार के जिला मुजफ्फरपुर के थाना कस्बा मडि़यारपुर के रहने वाले विमलकांत ठाकुर के दूसरे नंबर के बेटे थे. विमलकांत के पास खेती की ठीकठाक जमीन थी, इसलिए उन के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे तथा एक बेटी रंजना थी.

बड़ा बेटा पढ़लिख कर बाप के साथ खेती करने लगा तो उन्होंने उस की शादी कर दी. उस के बाद रंजना की भी शादी कर दी. वह नवी मुंबई के एटौली में पति के साथ रहती थी. धु्रवकांत सब से छोटा था. उस ने विज्ञान विषय से पढ़ाई की थी, इसलिए एयरफोर्स या नेवी की नौकरी करना चाहता था. गांव में रह कर वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकता था, इसलिए बहन के पास मुंबई आ गया और सपनों की तलाश में जुट गया.

आखिर धु्रवकांत का सपना साकार हुआ. उस ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और मर्चेंट नेवी में भरती हो गया. उसे चैंबूर गोवड़ी की जीएसएम साईं कमर्शियल कंपनी में नौकरी मिल गई थी. उसे अच्छी तनख्वाह तो मिलती ही थी, विदेश घूमने का भी मौका मिल रहा था. अब उस का ज्यादा समय विदशों में ही बीतता था. नौकरी लगने के बाद वह स्थाई रूप से मुंबई में ही बसने के बारे में सोचने लगा था. नौकरी लगते ही घर वालों को उस की शादी की चिंता सताने लगी थी. विमलकांत बेटे के विवाह के लिए जैसे ही तैयार हुए, उन के यहां रिश्तों की लाइन लग गई. उन रिश्तों में उन्होंने अपने ही जिले की तहसील महुआ के रहने वाले चंद्रमोहन ठाकुर की सुंदरसुशिक्षित बेटी सुष्मिता को पसंद कर लिया.

धु्रवकांत ने भी सुष्मिता को देखा. उन्हें भी सुष्मिता पसंद आ गई तो मई, 2010 में धु्रवकांत और सुष्मिता की शादी धूमधाम के साथ हो गई. शादी के बाद धु्रवकांत सुष्मिता को मांबाप के पास छोड़ना चाहता था, लेकिन सुष्मिता इस के लिए तैयार नहीं हुई. मजबूरन उसे पत्नी को मुंबई लाना पड़ा.

मुंबई आने के बाद धु्रवकांत मात्र एक सप्ताह पत्नी के साथ रहा. उस के बाद पत्नी को बहन के पास छोड़ कर अपनी नौकरी पर चला गया. नईनवेली दुलहन सुष्मिता का दिन तो किसी तरह बीत जाता था, लेकिन रातें उस के लिए पहाड़ सी बन जाती थीं. लगभग 6 महीने बाद धु्रवकांत विदेश से वापस आया तो सुष्मिता शिकायतों का पिटारा ले कर उस के सामने बैठ गई. सुष्मिता की शिकायतें वाजिब थीं, क्योंकि एक औरत को शादी के बाद जो चाहिए, वह उन्हें पूरी नहीं कर सका था. लेकिन उस की भी मजबूरी थी. लिहाजा पत्नी को समझाबुझा कर और आश्वासन दे कर चुप करा दिया.

कुछ दिनों पत्नी के साथ रह कर धु्रवकांत फिर नौकरी पर चला गया. लेकिन इस बार वह लौटा तो घर का माहौल काफी बदला हुआ था. इस बार सुष्मिता ने उस की बहन रंजना के साथ रहने से साफ मना कर दिया. इस की वजह यह थी कि उन दोनों के बीच काफी मनमुटाव हो गया था. पत्नी की बात मानना धु्रवकांत की मजबूरी थी, इसलिए सुष्मिता के कहने पर उस ने बहन से अलग रहने का फैसला कर लिया और सुष्मिता के रहने की व्यवस्था जुईनगर के एक वूमंस हौस्टल में कर दी. सुष्मिता को किसी तरह की कोई तकलीफ न हो और उस का मन बहलता रहे, इस के लिए उस ने घर में कंप्यूटरइंटरनेट की भी व्यवस्था कर दी.

यही नहीं, सुष्मिता का समय व्यतीत करने के लिए उस ने उस का दाखिला एमजीएम अस्पताल में औपरेशन थिएटर में तकनीकी सहायक के कोर्स में करा दिया. लेकिन सुष्मिता जिस उम्र में थी, वह उम्र नदी में आई बाढ़ की तरह होती है. अगर बांध मजबूत न हुआ तो वह उसे तोड़ कर बह निकलने में देर नहीं लगाती. सुष्मिता ने भी कुछ ऐसा ही किया. भले ही मन बहलाने की सारी सुविधाएं मौजूद थीं, लेकिन पति से अलग रह कर वह खुश नहीं थी.

धीरेधीरे उस की शादी को 3 साल हो गए थे. अब तक न तो उस के तन की प्यास बुझी थी और न ही उसे मातृत्व सुख मिला था, जिस की चाहत हर औरत को होती है.

यह सब सोच कर जब कभी वह बेचैन होती तो सोशल मीडिया का सहारा लेती. धु्रवकांत से वह घंटों चैटिंग करती. फेसबुक पर भी उस के दोस्तों की लंबी सूची थी. उन्हीं दोस्तों में एक था अजय सिंह, जिस के सामने उस की नजरों में धु्रवकांत की तसवीर फीकी पड़ गई थी. सुष्मिता ने अजय की प्रोफाइल खोल कर देखी तो मजबूत कदकाठी का स्मार्ट दिखने वाला अजय उसी के जिले का रहने वाला निकला. वह दुबई की एक बैंक में नौकरी करता था. उस का फोटो और प्रोफाइल देख कर सुष्मिता उस की ओर आकर्षित हो गई. उस ने उस की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो उस ने दोस्ती स्वीकार कर ली.

दिसंबर, 2014 में अजय भारत आया तो मुंबई के मैकडोनाल्ड में दोनों की मुलाकात हुई. इस मुलाकात में अजय के बातव्यवहार से वह उस पर मर मिटी. अजय अविवाहित था. उसे भी सुष्मिता इतनी भायी कि उस ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि वह विवाहित है. दोनों का मिलनाजुलना शुरू हुआ तो मर्यादा की दीवार टूटते देर नहीं लगी. इस पर सुष्मिता को कोई पछतावा भी नहीं हुआ. इस की वजह शायद यह थी कि अजय की बांहों में उसे जो सुख और सुकून मिला था, धु्रवकांत की बांहों में उसे कभी नहीं मिला था.

इस के बाद धु्रवकांत छुट्टी पर मुंबई आया तो किसी वजह से हौस्टल बंद हो गया. इस के बाद उस ने कामोठे की वेदांत दृष्टि सोसायटी में किराए का फ्लैट ले कर सुष्मिता को उस में शिफ्ट कर दिया. यहीं पर सुष्मिता ने अजय सिंह को अपने पति धु्रवकांत से मिलवाया. धु्रवकांत भी अजय की बातों और स्वभाव से काफी प्रभावित हुआ, इसलिए उस ने भी उस से दोस्ती कर ली.

लेकिन इस बार धु्रवकांत ने सुष्मिता के व्यवहार में काफी बदलाव महसूस किया. यह बदलाव उस ने जाने के बाद भी महसूस किया. पहले सुष्मिता उस से इंटरनेट पर घंटों चैटिंग करती रहती थी, फोन पर प्यार से बातें करती थी, अब वह उसे फोन ही नहीं करती थी. वह जब भी उसे फोन करता, उस का फोन बिजी रहता. फोन उठाती भी तो सीधे मुंह बात नहीं करती थी. नेट पर चैटिंग तो एकदम से बंद कर दी थी. इस से उसे काफी तकलीफ होती थी.

जब कभी धु्रवकांत शिकायत करता तो वह टाल देती. आखिर उसे चिंता ही किस बात की थी. उस की जिंदगी में तो कोई और धु्रव आ गया था. धु्रवकांत 6-7 महीने में आता था, जबकि सुष्मिता अजय सिंह को जब भी याद करती थी, वह 2 घंटे में उस के पास पहुंच जाता था. हौस्टल में सुष्मिता किसी पुरुष को साथ नहीं रख सकती थी, जबकि फ्लैट में तो कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. अजय सिंह का जब मन होता, वह उस के यहां रुक भी जाता था.

सुष्मिता क्यों बदल गई है, जब इस बात की जानकारी धु्रवकांत को हुई तो वह सन्न रह गया. वह सुष्मिता को बहुत प्यार करता था. वह तुरंत मुंबई आया और सुष्मिता को समझाने की कोशिश की. लेकिन अब सुष्मिता कहां समझने वाली थी. उस ने प्रेमी के लिए पति से झगड़ा ही नहीं कर लिया, बल्कि उसे छोड़ने को भी तैयार हो गई. धु्रवकांत ने सारी बातें सासससुर को बता कर सुष्मिता को समझाने को कहा तो उन लोगों ने उस की बात पर जरा भी ध्यान नहीं दिया. शायद सुष्मिता ने अपने मातापिता को सारी बात बता कर पहले ही अपने पक्ष में कर लिया था. इसी वजह से वे भी बेटी की बेवफाई पर चुप थे.

धु्रवकांत सुष्मिता को समझाबुझा कर अपनी ड्यूटी पर चला गया. लेकिन सुष्मिता मर्यादा में आने के बजाय और बाहर चली गई. उस ने अजय से शादी करने का फैसला कर लिया. इस से मुंबई से ले कर गांव तक धु्रवकांत की बदनामी हो रही थी. बदनामी उस से सहन नहीं हो पा रही थी. लेकिन वह कुछ कर पाने की स्थिति में भी नहीं था. वह एक मर्द था, अपनी पत्नी को दूसरे मर्द की बांहों में कैसे देख सकता था. उस के यारदोस्त भी उस की हंसी उड़ाते थे कि वह अपनी पत्नी को संभाल नहीं पाया. इस से वह और परेशान रहता था कि सुष्मिता को वह अजय के चंगुल से कैसे मुक्त कराए. वह इसी सोच में डूबा था कि सुष्मिता ने उस से जो कहा, उस से वह बेचैन हो उठा.

उस समय धु्रवकांत का जहाज फ्रांस के बंदरगाह पर था. सुष्मिता ने उसे फोन कर के कहा कि वह 2 दिनों में मुंबई पहुंचे और उसे तलाक दे. अब वह उस के साथ नहीं रहना चाहती. वह अजय से शादी कर के उस के साथ गृहस्थी बसाना चाहती है. धु्रवकांत ने उसे समझाना चाहा तो वह गुस्से में बोली, ‘‘तुम्हीं बताओ, मैं ऐसा क्यों न करूं? आज तक तुम ने मुझे दिया ही क्या है? हर औरत मां बनना चाहती है. तुम आज तक मुझे मां नहीं बना सके. आखिर मैं तुम से क्या उम्मीद करूं? औरत को धनदौलत की उतनी चाह नहीं होती, जितनी पति और बच्चों की होती है. जब उसे ये चीजें पति से नहीं मिलतीं, तभी वह भटक जाती है. शादी के बाद तुम ने मेरे साथ कितने दिन और रातें गुजारी हैं, इसे अंगुलियों पर गिन कर बताया जा सकता है.’’

‘‘सुष्मिता, मैं तुम्हारे दर्द को अच्छी तरह समझता हूं. लेकिन क्या करूं, मेरी भी मजबूरी है. मेरी नौकरी ही ऐसी है कि मैं चाह कर भी तुम्हारे साथ ज्यादा दिन नहीं रह सकता. जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा.’’ धु्रवकांत ने सुष्मिता को समझाते हुए कहा. इस के बाद वह फ्लाइट पकड़ कर सीधे मुंबई आ गया. 8 दिसंबर, 2015 की रात 12 बजे जब वह अपने फ्लैट पर पहुंचा तो दरवाजे पर ताला लगा था. सुष्मिता घर पर नहीं थी. गार्डों से पूछने पर पता चला कि वह 8 दिन पहले फ्लैट पर आए अजय सिंह के साथ कहीं बाहर गई है.

इस जानकारी के बाद धु्रवकांत अपना गुस्सा पी कर फ्लैट पर पहुंचा और अपनी चाबी से फ्लैट का दरवाजा खोल कर अंदर आया और हाल में बैठ कर सुष्मिता का इंतजार करने लगा. रात एक बजे जिस हालत में सुष्मिता अजय सिंह के साथ आई, वह सब देख कर धु्रवकांत का खून खौल उठा. सुष्मिता काफी कम कपड़ों में अजय की कमर में बांहें डाले अंदर आई थी. पत्नी को किसी गैर की बांहों में इस तरह देखना बरदाश्त के बाहर की बात थी. फ्लैट के अंदर रोशनी में बैठे धु्रवकांत को देख कर एक पल के लिए तो उन के चेहरे का रंग उड़ गया था, लेकिन अगले ही पल दोनों संभल गए. सुष्मिता ने बेरुखी से पूछा, ‘‘अरे, तुम कब आए?’’

पत्नी की बेरुखी से धुंवकांत का चेहरा लाल हो उठा. उस ने भी उसी की भाषा में कहा, ‘‘मैं कब आया, यह छोड़ो. पहले तुम यह बताओ कि इतनी रात गए तुम पराए मर्द के साथ कहां से आ रही हो?’’ इस के बाद अजय की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘इसे तुरंत यहां से बाहर करो.’’

‘‘यह तो कहीं नहीं जाएंगे, अगर जाना ही है तो तुम चले जाओ.’’ सुष्मिता ने अजय का पक्ष लेते हुए कहा, ‘‘हम दोनों कल मंदिर में शादी करने वाले हैं. इस के लिए मैं ने सारा इंतजाम कर लिया है.’’ इतना कह कर सुष्मिता अजय सिंह का हाथ पकड़ कर बैडरूम में चली गई.

सुष्मिता की इन बातों और हरकत से धु्रवकांत का कलेजा छलनी हो गया. उस की आंखों में खून के आंसू आ गए. उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिसे वह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था, एक दिन वह उस के साथ इस तरह का व्यवहार करेगी. सुष्मिता और अजय सिंह तो सो गए, जबकि धु्रवकांत को नींद नहीं आ रही थी. सुबह 5 बजे तक वह हाल के सोफे पर ही बैठा रहा. उस की आंखों के सामने सुष्मिता के साथ शादी से ले कर अब तक के बिताए पल चलचित्र की तरह घूम रहे थे. सुष्मिता ने जो किया था, कोई भी होता उसे नफरत हो जाती. अजय ने भी उस के साथ विश्वासघात किया था.

विश्वास, नफरत और हिकारत की आंधी ने धु्रवकांत की बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया. उस ने तुरंत एक भयानक फैसला कर लिया और किचन में जा कर सब्जी काटने वाला चाकू उठा लाया. चाकू ले कर वह बैडरूम पहुंचा और बातें करने के बहाने सुष्मिता के साथ गहरी नींद में सोए अजय सिंह को जगा कर हाल में ले आया. हाल में आते ही नींद में डूबे अजय का मुंह पकड़ कर उस ने उस पर हमला कर दिया. उस ने उसे तभी छोड़ा, जब तक वह मर नहीं गया. इस के बाद वह सुष्मिता के पास पहुंचा और उस से संबंध बनाने की इच्छा जताई. लेकिन उसे खून में नहाया देख कर सुष्मिता के होश उड़ गए. वह बैड से उठ कर भागी, लेकिन धु्रवकांत उसे दबोच कर उस के सीने पर सवार हो गया.

सुष्मिता ने विरोध तो बहुत किया, लेकिन धु्रवकांत ने तकिया उस के चेहरे पर रख कर दबा दिया. वह तकिए को तब तक दबाए रहा, जब तक वह मर नहीं गई. दोनों की हत्या कर धु्रवकांत ने अपना लैटरपैड उठाया और अपनी बहन रंजना के नाम एक पत्र लिखा, जिस में उस ने अपनी पत्नी सुष्मिता की बेवफाई और अजय सिंह के विश्वासघात का जिक्र करते हुए अपनी आत्महत्या के बारे में बताया कि वह सुष्मिता से बहुत प्यार करता था. वह उस का खून नहीं देख सकता था, इसलिए उस ने उस पर चाकू से वार नहीं किया. उस ने उस की हत्या तकिए से की. सुष्मिता और उस का प्रेमी अजय सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं. अब वह भी जीना नहीं चाहता, इसलिए वह भी आत्महत्या कर रहा है.

सुसाइड नोट लिखने के बाद धु्रवकांत ने थाना पुलिस को फोन कर के घटना की सूचना दी. उस का सोचना था कि जब तक पुलिस उस के फ्लैट पर पहुंचेगी, तब तक वह भी मर चुका होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. संयोग से वह बच गया. उस ने जिस टाई से आत्महत्या करने की कोशिश की थी, वह काफी कमजोर थी. इसलिए उस के लटकते ही वह टूट गई. लेकिन टाई गले में कस गई थी, जिस से वह फर्श पर गिर कर बेहोश हो गया.

श्रीराम मल्लेमवार के दिशानिर्देश में असिस्टैंट इंसपेक्टर चंद्रशेखर भोइर ने जांच पूरी कर के इस मामले को अपराध संख्या 234/2015 पर भादंवि की धारा 302, 164 के तहत दर्ज कर 1 जनवरी, 2016 को धु्रवकांत ठाकुर को अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story Hindi: शिल्पा शेट्टी के – परिवार को ठगने वाला बाबा

Crime Story Hindi: योगगुरु बाबा रामदेव के तथाकथित शिष्य देवेंद्र ने मशहूर अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के परिवार के अलावा भी कई लोगों को ठगा था. लेकिन जब उस के कारनामों की पोल खुली तो हर कोई दंग रह गया. चेहरे पर दाढ़ी और सिर पर लंबे बाल रखने वाला वह लंबातगड़ा शख्स खुद को पहुंचा हुआ बाबा बताता था. मैडिकल साइंस को चुनौती देने वाले रोगों को भी वह ठीक करने का दावा करता था. सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि वह खुद को करोड़ों का कारोबार करने वाले ट्रस्ट पतंजलि के योगगुरु बाबा रामदेव का शिष्य भी बताता था, साथ ही वह बौलीवुड की मशहूर अदाकारा शिल्पा शेट्टी के साथसाथ कई और विख्यात हीरोइनों से अपने खास ताल्लुकात बताया करता था.

उस के कई नाम थे और उस का सब से बड़ा हथियार था धर्म. यही वजह थी कि तमाम लोग उस के मुरीद थे, लेकिन जब उस की करतूतों का खुलासा हुआ तो उस की हकीकत जान कर हर कोई दंग रह गया. वास्तव में वह महाठग था. उस ने न सिर्फ शिल्पा शेट्टी के परिवार से एक करोड़ रुपए से ज्यादा ठग लिए थे, बल्कि अन्य कई लोगों को भी चूना लगाया था. इस शख्स का नाम था देवेंद्र कुमार योगी उर्फ देवेंद्र कुमार आचार्य उर्फ योगी महाराज उर्फ स्वामी कृष्णदेव योगी. इस तथाकथित योगी का उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद स्थित हस्तिनापुर इलाके में आश्रम था. गेरुआ व सफेद वस्त्र धारण करने वाला यह बाबा धर्म के नाम पर लोगों को अपना मुरीद बनाता था.

लोगों को धर्म के नाम पर किस तरह बहलाफुसला कर काबू में लाया जाता है, यह हुनर वह बखूबी जानता था. इस के लिए वह सोशल नेटवर्किंग साइट का भी सहारा लेता था. वैसे भी समाज में ऐसे अंधविश्वासियों की कोई कमी नहीं है, जो अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं. देवेंद्र के कई चेलेचपाटे गांवगांव जा कर उस का प्रचार किया करते थे. वह लोगों को योग सिखाने के साथसाथ खुद को कैंसर स्पैशलिस्ट भी बताता था. वैसे तो उस के पास कोई डिग्री नहीं थी, लेकिन वह दावा करता था कि जिस मर्ज का इलाज डाक्टर नहीं कर सकते, उस का इलाज वह कर देगा.

वह जिन मर्जों को दूर करने की बात करता था, उन में गुप्तरोग, दमा, अस्थमा, हृदय रोग, थायराइड, एनीमिया, साइनस, किडनी स्टोन, शुगर, प्रोस्टेट, पाइल्स, कोरोनरी आर्टरीज, मोटापा, कब्ज, आर्थराइटिस, ब्लड प्रेशर व जोड़ों का दर्द आदि रोग शामिल थे.

धनी भक्तों के घर जा कर वह योगा क्लास चलाता था. वह अपनी फीस भक्तों की हैसियत के हिसाब से निर्धारित करता था. आश्रम में आने वाले भक्तों को वह अपनी कामयाबियों के मनगढ़ंत किस्से सुना कर प्रभावित करता था. उस ने खुद को कारोबारी बाबा के रूप में पहचान बना चुके बाबा रामदेव का खास शिष्य घोषित किया हुआ था. उस के अनुसार, वह पिछले 10 सालों से बाबा से जुड़ा हुआ था. अपने इस दावे को सच साबित करने के लिए उस ने बाबा रामदेव के साथ वाली अपनी कई तसवीरें आश्रम की दीवारों पर टांग रखी थीं.

रौबरुतबे के लिए इतना ही काफी नहीं था. वह फिल्म हीरोइन शिल्पा शेट्टी समेत उन के पूरे परिवार को अपना भक्त बताता था. शिल्पा शेट्टी और उन के परिवार के साथ भी उस ने कई तसवीरों को दीवार पर सजा रखा था. वह अपने भक्तों को बताता था कि जब वह मुंबई जाता है तो प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण, करिश्मा कपूर, बिपाशा बसु, सोनाक्षी सिन्हा, अनिल कपूर, रितिक रोशन जैसे कई हीरोहीरोइन उस से मिलने आते हैं. वे लोग अपने कई काम उस के कहे अनुसार करते हैं और टेलीफोन पर बराबर संपर्क में रहते हैं.

साधारण लोग सोचते थे कि जब इतने बड़ेबड़े स्टार बाबा के भक्त हैं तो फिर वे क्यों पीछे रहें. भक्तों की बढ़ती कतार के साथ उस के चेहरे की रौनक बढ़ जाती थी. उस के भक्त बाबा को खुशीखुशी रुपयापैसा भी देते थे. देवेंद्र की दुकान ठीक जमी हुई थी कि 20 नवंबर, 2015 को मुंबई के वरसोवा थाने के सबइंसपेक्टर भारत शिवाजी के नेतृत्व में पुलिस टीम की छापेमारी से खलबली मच गई. दरअसल मुंबई में बाबा के खिलाफ धोखाधड़ी व गबन का मामला दर्ज था. पुलिस ने बाबा देवेंद्र को गिरफ्तार कर लिया.

इस के साथ ही उस की कलई खुली तो उस के भक्त भी सिर थाम कर बैठ गए, क्योंकि हकीकत हैरान करने वाली थी. बाबा कोई छुटभैया नहीं, बल्कि महाठग निकला. उस ने हीरोइन शिल्पा शेट्टी के मातापिता से 1 करोड़ 20 लाख रुपए की रकम ठगी थी. कानून का फंदा कसते ही देवेंद्र हक्काबक्का रह गया. वजह यह कि शायद उसे इस की कतई उम्मीद नहीं थी.

दरअसल, देवेंद्र ने जनवरी, 2014 में एक कारोबारी के माध्यम से शिल्पा के पिता सुरेंद्र शेट्टी व मां सुनंदा शेट्टी से जानपहचान बढ़ाई. बाबा के लिबास और धर्म की बड़ीबड़ी बातों से वह उस के झांसे में आ गए. इस के बाद वह अकसर उन के घर आनेजाने लगा. उस ने उन से खुद को रामदेव का खास शिष्य व आयुर्वेदिक औषधियों का बड़ा जानकार बताया था. उस ने उन्हें सपना दिखाया कि औषधियों का बड़ा कारोबार किया जा सकता है. उस के झांसे में आए सुरेंद्र शेट्टी ने उसे मोटी रकम दे दी. दिखावे के लिए देवेंद्र ने मुंबई में औफिस भी खोल लिया था.

देवेंद्र जब शिल्पा के घर जाता था तो प्रभाव जमाने के लिए श्वेत वस्त्रों के साथ ही लकड़ी की खड़ाऊ पहन कर जाता था. जबकि हकीकत में वह फैशनपरस्त था. वह जींस टीशर्ट पहन कर डांस बारों से ले कर सिनेमाघरों तक में मौजमस्ती करता था. शिल्पा का परिवार उस की इस हकीकत से अनजान था. दवा सप्लाई के नाम पर जब उस ने धीरेधीरे एक करोड़ से ज्यादा की रकम झटक ली तो एक दिन वह चुपके से बोरियाबिस्तर समेट कर अपने मूल ठिकाने पर आ गया. शिल्पा शेट्टी के परिवार की एक लग्जरी कार भी वह अपने साथ ले आया था. ठगी का अहसास होने पर शिल्पा के पिता ने वरसोवा थाने में बाबा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया था.

आश्रम आ कर देवेंद्र ने अपना काम ठीक से जमा लिया था. उस ने योग के नाम से एक फेसबुक पेज भी बनाया, जिस पर विदेशी मौडल्स की कई उत्तेजक तसवीरें लगाईं. फेसबुक पेज पर उस ने खुद को योग अध्यापक घोषित कर रखा था. देवेंद्र की गिरफ्तारी के साथ ही उस की ठगी के कारनामे खुलने लगे. उस ने कई लोगों को चूना लगाया था. अजय ठाकुर नामक एक युवक से उस ने पीसीएस परीक्षा में चयन करवाने के नाम पर 10 लाख रुपए मांगे थे. उन्होंने उसे पेशगी के तौर पर 4 लाख रुपए दे भी दिए थे. लेकिन चयन के नाम पर बाबा टरकाने का काम करता रहा. इस के अलावा कई बड़े व्यापारियों को भी उस ने यह कह कर चूना लगाया था कि वह उन के किसी प्रोग्राम में शिल्पा शेट्टी को बुलवा देगा.

चूंकि शिल्पा और उन के परिवार के साथ उस के फोटोग्राफ थे, इसलिए लोग भरोसा कर लेते थे. पुलिस का कहना है कि देवेंद्र ने कई और लोगों को ठगने की प्लानिंग कर रखी थी. पुलिस इस बाबा को जेल भेज चुकी है. पुलिस कस्टडी में उस ने दावा किया कि वह रामदेव के ट्रस्ट पतंजलि से जुड़ा है. देवेंद्र कोई अकेला ठग नहीं है. समाज में ऐसे लोगों की भरमार है, जो धर्म के नाम पर लोगों को बहका कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. जरूरत है ऐसे ठगों को पहचान कर उन से सावधान रहने की. Crime Story Hindi

 

Crime Story: हम मर जाएंगे – परिवार वालों ने किया जुदा

Crime Story: 22 फरवरी की सुबह 6 बजे रामपुर गांव के कुछ लोग मार्निंग वाक पर निकले तो उन्होंने पानी की टंकी के पास लिंक मार्ग से 50 मीटर दूर खेत में एक युवक को बुरी तरह से जख्मी हालत में पड़े देखा. युवक की जान बचाने के लिए उन में से किसी ने थाना खानपुर पुलिस को सूचना दे दी.

सूचना प्राप्त होते ही खानपुर थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को भी सूचित कर दिया था. विश्वनाथ यादव जिस समय वहां पहुंचे, उस समय ग्रामीणों की भीड़ जुटी थी. भीड़ को परे हटाते हुए वह खेत में पहुंचे, जहां युवक जख्मी हालत में पड़ा था. युवक की उम्र 24 साल के आसपास थी. उस के सिर में गोली मारी गई थी, जो आरपार हो गई थी. उस के एक हाथ में पिस्टल थी तथा दूसरी पिस्टल उस के पैर के पास पड़ी थी.

जामातलाशी में उस के पास से 2 मोबाइल फोन, आधार कार्ड तथा पुलिस विभाग का परिचय पत्र मिला, जिस में उस का नामपता दर्ज था. परिचय पत्र तथा आधार कार्ड से पता चला कि युवक का नाम अजय कुमार यादव है तथा वह बभरौली गांव का रहने वाला है. तुरंत उस के घर वालों को सूचना दे दी गई.

इंसपेक्टर विश्वनाथ यादव अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह, एएसपी गोपीनाथ सोनी तथा डीएसपी राजीव द्विवेदी आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा युवक के पास से बरामद सामान का अवलोकन किया. देखने से ऐसा लग रहा था कि युवक ने आत्महत्या का प्रयास किया था. अब तक अजय के पिता रामऔतार यादव भी घटनास्थल आ गए थे. वह आत्महत्या की बात से सहमत नहीं थे.

चूंकि अजय यादव मरणासन्न स्थिति में था, अत: पुलिस अधिकारियों ने उसे इलाज हेतु तत्काल सीएचसी (सैदपुर) भिजवाया लेकिन वहां के डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और उसे बीएचयू ट्रामा सेंटर रैफर कर दिया. इलाज के दौरान अजय यादव की मौत हो गई. चूंकि अजय यादव सिपाही था, अत: उस की मौत को एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह ने गंभीरता से लिया. उन्होंने जांच के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया, जिस में क्राइम ब्रांच, सर्विलांस टीम तथा स्वाट टीम को शामिल किया गया.

इस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया, फिर बरामद सामान को कब्जे में लिया. सर्विलांस सेल प्रभारी दिनेश यादव ने अजय के पास से बरामद दोनों फोन की काल डिटेल्स निकाली तो पता चला कि 22 फरवरी की रात 3 बजे एक फोन से अजय के फोन पर एक वाट्सऐप मैसेज भेजा गया था, जिस में लिखा था, ‘तत्काल मिलने आओ, नहीं तो हम मर जाएंगे.’

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जिस मोबाइल फोन से मैसेज भेजा गया था, उस फोन की जानकारी की गई तो पता चला कि वह मोबाइल फोन इचवल गांव निवासी राजेश सिंह की बेटी सोनाली सिंह के नाम दर्ज था. जबकि फोन मृतक अजय की जेब से बरामद हुआ था. अजय और सोनाली का क्या रिश्ता है? उस ने 3 बजे रात को अजय को मैसेज क्यों भेजा? जानने के लिए पुलिस टीम सोनाली सिंह के गांव इचवल पहुंची और उस के पिता राजेश सिंह से पूछताछ की.

राजेश सिंह ने बताया कि उस की बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह आज सुबह से गायब है. हम ने सैदपुर कैफे से उस की औनलाइन एफआईआर भी कराई है. राजेश सिंह ने एफआईआर की कौपी भी दिखाई. राजेश सिंह की बात सुन कर पुलिस टीम का माथा ठनका. राजेश सिंह को गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज करानी थी, तो थाना खानपुर में करानी चाहिए थी. आनलाइन रिपोर्ट क्यों दर्ज कराई? दाल में जरूर कुछ काला था. यह औनर किलिंग का मामला हो सकता था. संभव था अजय और सोनाली सिंह प्रेमीप्रेमिका हों और इज्जत बचाने के लिए राजेश सिंह ने अपनी बेटी की हत्या कर दी हो.

ऐसे तमाम प्रश्न टीम के सदस्यों के दिमाग में आए तो उन्होंने शक के आधार पर राजेश सिंह के घर पर पुलिस तैनात कर दी. साथ ही पुलिस सानिया उर्फ सोनाली सिंह की भी खोज में जुट गई. अजय का मोबाइल फोन खंगालने पर उस का और सोनाली सिंह का विवाह प्रमाण पत्र मिला, जिस में दोनों की फोटो लगी थी.

प्रमाण पत्र के अनुसार दोनों 5 नवंबर, 2018 को कोर्टमैरिज कर चुके थे. इस प्रमाण पत्र को देखने के बाद पुलिस टीम का शक और भी गहरा गया. पुलिस टीम ने सोनाली सिंह के पिता राजेश सिंह व परिवार के 4 अन्य सदस्यों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. 23 फरवरी, 2021 की सुबह पुलिस टीम को इचवल गांव में राजेश सिंह के खेत में एक युवती की लाश पड़ी होने की सूचना मिली. पुलिस टीम तथा अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे और लाश का निरीक्षण किया.

मृतका राजेश सिंह की 25 वर्षीय बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह थी. उस के सिर में गोली मारी गई थी. चेहरे को भी कुचला गया था. निरीक्षण के बाद पुलिस ने सोनाली सिंह के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल गाजीपुर भेज दिया. शव के पास से पिस्टल या तमंचा बरामद नहीं हुआ, लेकिन एक जोड़ी मर्दाना चप्पल तथा टूटी हुई चूडि़यां जरूर मिलीं. चप्पलों की पहचान मृतक सिपाही अजय के घर वालों ने की. उन्होंने पुलिस को बताया कि चप्पलें अजय की थीं.

पुलिस टीम ने हिरासत में लिए गए राजेश सिंह से बेटी सोनाली सिंह की हत्या के संबंध में पूछताछ की तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो वह टूट गया और उस ने सोनाली सिंह तथा उस के प्रेमी अजय यादव की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. यही नहीं, उस ने हत्या में इस्तेमाल अजय यादव की बाइक यूपी81 एसी 5834 भी बरामद करा दी.

राजेश सिंह ने बताया कि उस की बेटी सानिया सिपाही अजय यादव से प्यार करती थी और दोनों ने कोर्ट में शादी भी कर ली थी. तब अपनी इज्जत बचाने के लिए उस ने दोनों को मौत की नींद सुलाने की योजना बनाई. इस योजना में उस ने अपने पिता अवधराज सिंह, बेटे दीपक सिंह, भतीजे अंकित सिंह तथा पत्नी नीलम सिंह को शामिल किया. इस के बाद पहले सानिया की हत्या की फिर अजय की. उस के बाद दोनों के शव अलगअलग जगहों पर डाल दिए.

पुलिस अजय की हत्या को आत्महत्या समझे, इसलिए उस के एक हाथ में पिस्टल थमा दी तथा बेटी का मोबाइल फोन अजय की जेब में डाल दिया, ताकि लगे कि अजय ने पहले सोनाली सिंह की गोली मार कर हत्या की फिर स्वयं गोली मार कर आत्महत्या कर ली. बेटी के शव के पास अजय की चप्पलें छोड़ना, सोचीसमझी साजिश का ही हिस्सा था. राजेश के बाद अन्य आरोपियों ने भी जुर्म कबूल कर लिया.

थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव ने डबल मर्डर का परदाफाश करने तथा आरोपियों को गिरफ्तार करने की जानकारी एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह को दी तो उन्होंने पुलिस लाइन स्थिति सभागार में प्रैसवार्ता की और आरोपियों को मीडिया के समक्ष पेश कर डबल मर्डर का खुलासा कर दिया.

चूंकि आरोपियों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव ने मृतक के पिता रामऔतार यादव की तहरीर पर धारा 302 आईपीसी के तहत राजेश सिंह, अवधराज सिंह, दीपक सिंह, अंकित सिंह तथा नीलम सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा सभी को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में जो कहानी प्रकाश में आई, उस में दोनों की हत्याओं की वजह मोहब्बत थी.

गाजीपुर जिले के खानपुर थाना अंतर्गत एक गांव है इचवल कलां. इसी गांव में ठाकुर राजेश सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी नीलम सिंह के अलावा बेटा दीपक सिंह तथा बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह थी. राजेश सिंह के पिता अवधराज सिंह भी उन के साथ रहते थे. पितापुत्र दबंग थे. गांव में उन की तूती बोलती थी. उन के पास उपजाऊ जमीन थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

राजेश सिंह की बेटी सोनाली उर्फ सानिया सुंदर, हंसमुख व मिलनसार थी. पढ़ाई में भी तेज थी. वह पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजकीय डिग्री कालेज सैदपुर से बीए की डिग्री हासिल कर चुकी थी और बीएड की तैयारी कर रही थी. दरअसल, सानिया टीचर बन कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. इसलिए वह कड़ी मेहनत कर रही थी.

सानिया उर्फ सोनाली के आकर्षण में गांव के कई युवक बंधे थे. लेकिन अजय कुमार यादव कुछ ज्यादा ही आकर्षित था. सानिया भी उसे भाव देती थी. सानिया और अजय की पहली मुलाकात परिवार के एक शादी समारोह में हुई थी. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे के प्रति आकर्षित हो गए थे. इस के बाद जैसे जैसे उन की मुलाकातें बढ़ती गईं, वैसेवैसे उन का प्यार बढ़ता गया.

अजय कुमार यादव के पिता रामऔतार यादव सानिया के पड़ोस के गांव बभनौली में रहते थे. वह सीआरपीएफ में कार्यरत थे. लेकिन अब रिटायर हो गए थे और गांव में रहते थे. उन की 5 संतानों में 4 बेटियां व एक बेटा था अजय कुमार. बेटियों की वह शादी कर चुके थे और बेटा अजय अभी कुंवारा था. रामऔतार यादव, अजय को पुलिस में भरती कराना चाहते थे, सो वह उस की सेहत का खास खयाल रखते थे. अजय बीए पास कर चुका था और पुलिस भरती की तैयारी कर रहा था. उस ने पुलिस की परीक्षा भी दी.

एक दिन अजय ने सानिया के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह गहरी सोच में डूब गई. कुछ देर बाद वह बोली, ‘‘अजय, मुझे तुम्हारा शादी का प्रस्ताव तो मंजूर है, लेकिन मुझे डर है कि हमारे घर वाले शादी को कभी राजी नही होंगे.’’

‘‘क्यों राजी नही होंगे?’’ अजय ने पूछा.

‘‘क्योंकि मैं ठाकुर हूं और तुम यादव. मेरे पिता कभी नहीं चाहेंगे कि ठाकुर की बेटी यादव परिवार में दुलहन बन कर जाए. मूंछ की लड़ाई में वह कुछ भी अनर्थ कर सकते हैं.’’

‘‘घर वाले राजी नहीं होंगे, फिर तो एक ही उपाय है कि हम दोनों कोर्ट में शादी कर लें.’’

‘‘हां, यह हो सकता है.’’ सानिया ने सहमति जताई.

इस के बाद 5 नवंबर, 2018 को सानिया उर्फ सोनाली और अजय कुमार ने गाजीपुर कोर्ट में कोर्टमैरिज कर के विवाह प्रमाण पत्र हासिल कर लिया. कोर्ट मैरिज करने की जानकारी सानिया के घर वालों को नहीं हुई, लेकिन अजय के घर वालों को पता था. उन्होंने सानिया को बहू के रूप में स्वीकार कर लिया.

दिसंबर, 2018 में अजय का चयन सिपाही के पद पर पुलिस विभाग में हो गया. ट्रेनिंग के बाद उस की पोस्टिंग अमेठी जिले के गौरीगंज थाने में हुई. अजय और सानिया की मुलाकातें चोरीछिपे होती रहती थीं. मोबाइल फोन पर भी उन की बातें होती रहती थीं. कोर्ट मैरिज के बाद उन का शारीरिक मिलन भी होने लगा था. इस तरह समय बीतता रहा.

जनवरी, 2021 के पहले हफ्ते में राजेश सिंह को अपनी पत्नी नीलम सिंह व बेटे दीपक सिंह से पता चला कि सानिया पड़ोस के गांव बभनौली के रहने वाले युवक अजय यादव से प्रेम करती है और दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली है. दरअसल, नीलम सिंह ने बेटी को देर रात अजय से मोबाइल फोन पर बतियाते पकड़ लिया था. फिर डराधमका कर सारी सच्चाई उगलवा ली थी. यह जानकारी नीलम ने पति व बेटे को दे दी थी.

राजेश सिंह ठाकुर था. उसे यह गवारा न था कि उस की बेटी यादव से ब्याही जाए, अत: उस ने सानिया की जम कर पिटाई की और घर से बाहर निकलने पर सख्त पहरा लगा दिया. नीलम हर रोज डांटडपट कर तथा प्यार से बेटी को समझाती लेकिन सानिया, अजय का साथ छोड़ने को राजी नहीं थी. 21 फरवरी को अजय की चचेरी बहन की सगाई थी. वह 15 दिन की छुट्टी ले कर अपने गांव बभनौली आ गया. सिपाही अजय के आने की जानकारी राजेश सिंह को हुई तो उस ने अपने पिता अवधराज सिंह, बेटे दीपक सिंह, भतीजे अंकित सिंह तथा पत्नी नीलम के साथ गहन विचारविमर्श किया.

जिस में तय हुआ कि पहले अजय व सानिया को समझाया जाए, न मानने पर दोनों को मौत के घाट उतार दिया जाए. अवैध असलहा घर में पहले से मौजूद था. योजना के तहत 22 फरवरी की रात 3 बजे राजेश सिंह व नीलम सिंह ने सानिया को धमका कर सिपाही अजय यादव के मोेबाइल फोन पर एक वाट्सऐप मैसेज भिजवाया, जिस में लिखा, ‘तत्काल मिलने आओ, नहीं तो हम मर जाएंगे.’

अजय ने मैसेज पढ़ा, तो उसे लगा कि सानिया मुसीबत में है. अत: वह अपनी मोटरसाइकिल से सानिया के गांव इचबल की ओर निकल पड़ा. इधर मैसेज भिजवाने के बाद राजेश सिंह, नीलम सिंह, दीपक सिंह, अवधराज सिंह व अंकित सिंह ने सानिया उर्फ सोनाली को अजय का साथ छोड़ने के लिए हर तरह से समझाया. लेकिन जब वह नहीं मानी तो राजेश सिंह ने उसे गोली मार दी. फिर लाश को घर में छिपा दिया.

कुछ देर बाद अजय आया, तो उसे भी समझाया गया. लेकिन वह ऊंचे स्वर में बात करने लगा. इस पर वे सब अजय को बात करने के बहाने गांव के बाहर अंबिका स्कूल के पास ले गए. वहां अजय सानिया को अपनी पत्नी बताने लगा तो उन सब ने उसे दबोच लिया और पिस्टल से उस के सिर में गोली मार दी और मरा समझ कर रामपुर गांव के पास सड़क किनारे खेत में फेंक दिया. एक पिस्टल उस के हाथ में पकड़ा दी तथा दूसरी उस के पैर के पास डाल दी. सानिया का मोबाइल फोन भी अजय की पाकेट में डाल दिया. इस के बाद वे सब वापस घर आए और सानिया का शव घर के पीछे गेहूं के खेत में फेंक दिया. अजय की चप्पलें भी शव के पास छोड़ दीं.

सुबह राजेश व नीलम ने पड़ोसियों को बताया कि उन की बेटी सानिया बिना कुछ बताए घर से गायब है. फिर सैदपुर कस्बा जा कर कैफे से औनलाइन एफआईआर दर्ज करा दी. उधर रामपुर गांव के कुछ लोगों ने युवक को मरणासन्न हालत में देखा तो पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने काररवाई शुरू की तो डबल मर्डर की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

24 फरवरी, 2021 को थाना खानपुर पुलिस ने अभियुक्त राजेश सिंह, दीपक सिंह, अंकित सिंह, अवधराज सिंह तथा नीलम सिंह को गाजीपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story: मधुर व सईद जाफरी – सफल प्रेम असफल संबंध

Love Story: सईद जाफरी ने फिल्मों में भले ही कोई भी भूमिका निभाई हो, हकीकत में वह शाही मिजाज के अभिनेता थे. इतने शाही कि शराब पीने के लिए वह अपना चांदी का गिलास जेब में रखते थे. बड़ीबड़ी पार्टियों में वह उसी में शराब पीते थे. लेकिन यह सफल चरित्र अभिनेता अपने दांपत्य जीवन में असफल था.

सन 1985 में रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी ‘सागर’. इस फिल्म को काफी पसंद किया गया था, खासकर इस के गानों को. इस की कई वजहें थीं. इन में पहली वजह तो थी फिल्म ‘बौबी’ के बाद डिंपल कपाडि़या की ऋषि कपूर के साथ वापसी. दूसरी वजह थी प्रेमत्रिकोण, जिस में नायक रवि (ऋषि कपूर) विदेश से लौट कर एक मछुआरन लड़की मोना को चाहने लगता है. दरअसल उसे पता नहीं होता कि राजा यानी कमल हासन मोना से बचपन से प्यार करता है. बाद में जब हकीकत पता चलती है तो दोस्ती की खातिर वह अपने प्यार को कुरबान कर देता है.

इस फिल्म के हिट होने से यह बात साफ हो गई थी कि किसी घिसेपिटे कथानक पर भी अच्छी फिल्म बनाई जा सकती है. बशर्ते उस में अभिनय करने वाले कलाकार दमदार अभिनय करें. फिल्म में रवि की दादी कमलादेवी एक औद्योगिक घराने की मालकिन दिखाई गई थीं, जिन के चेहरे, वेशभूषा और हावभाव से संपन्नता साफ झलकती थी. यह बात उन की बरदाश्त के बाहर थी कि उन का एकलौता पोता एक गरीब मछुआरन से प्यार करे.

यही वजह थी कि रवि और मोना को अलग करने के लिए उन्होंने तरहतरह के हथकंडे अपनाए. यहां तक कि आखिर में उन के आदमी हिंसा पर उतारू हो जाते हैं, जिस में ऋषिकपूर को बचाने में कमल हासन की जान चली जाती है. लेकिन मरतेमरते वह डिंपल का हाथ ऋषिकपूर के हाथों में दे जाते हैं.

फिल्म में कमला देवी यानी दादी का यह किरदार मधुर जाफरी ने निभाया था, जिन्हें दर्शक नाम से भले नहीं जानते थे, लेकिन उन के अभिनय से काफी प्रभावित हुए थे. मधुर जाफरी हिंदी फिल्मों का कोई खास जानापहचाना चेहरा नहीं था, लेकिन इस फिल्म में सशक्त अभिनय के चलते वह दर्शकों के दिल में बस गई थीं. आमतौर पर इस तरह के किरदार ललिता पवार या सुषमा सेठ जैसी अभिनेत्रियां निभाती आई थीं, ऐसी स्थिति में दर्शक खुद से यह सवाल पूछने से रोक नहीं पाए कि आखिर ऋषि कपूर की दादी का किरदार निभाने वाली यह ऐक्ट्रेस कौन है?

इस फिल्म में मधुर जाफरी ऐंग्लो इंडियन सी लगीं, जिन्हें अपनी दौलत पर काफी गुरूर और गुमान था. इसी के चलते वह गरीबों और गरीबी से नफरत करती थीं. यह मधुर जाफरी कोई और नहीं, हाल ही में दिवंगत हुए मशहूर अभिनेता सईद जाफरी की पहली पत्नी थीं, जिन्होंने एक संपन्न एवं क्रूर दादी की भूमिका इसलिए सहजता से निभाई, क्योंकि वह इस किरदार के लिए एकदम फिट थीं. सन 1933 में दिल्ली के एक संपन्न कायस्थ परिवार में पैदा हुईं मधुर परंपराओं और आधुनिकता का अद्भुत मेल थीं. उन के दादा को अंगरेजों से राय बहादुर का खिताब मिला था. वह शाही परिवार से भले नहीं थीं, लेकिन उन का रहनसहन और ठाठबाट किसी शाही परिवार से कम नहीं था.

यह वह दौर था, जब अंगरेज शासकों से नजदीकियां रखने वाले परिवारों की समाज में एक अलग पहचान हुआ करती थी. वे बड़ेबड़े बंगलों में शानोशौकत से रहते थे, बड़ीबड़ी गाडि़यों में घूमते थे. इस तरह के लोग आमतौर पर कला या साहित्य प्रेमी होते थे. उन की लड़कियां बौबकट बाल रख सकती थीं और स्कर्ट पहन कर सड़कों पर घूम सकती थीं, विदेशी कुत्तों को सड़कों पर घुमाया करती थीं. वे फर्राटे से अंगरेजी बोलती थीं. उन के लिए स्कूल और कालेज की शिक्षा इसलिए जरूरी होती थी, क्योंकि समाज में उन्हें अपनी अलग पहचान कायम करनी होती थी. इस तरह के परिवार मध्यमवर्गीय परिवारों के आदर्श हुआ करते थे. रिश्तेदारों और समाज में चर्चा का विषय होते थे.

मधुर इस का अपवाद इसलिए नहीं रह पाईं, क्योंकि बंदिशें न होते हुए भी उन्होंने कायस्थ परिवारों के संस्कार यथासंभव ढोए. वह बेइंतहा खूबसूरत और प्रतिभावान थीं. अभिनय और नाटकों के प्रति उन का लगाव बचपन से ही था, लेकिन बाद में वह एक इंटरनेशनल शैफ के रूप में जानी गईं. पहले कानपुर और फिर दिल्ली में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मधुर स्थाई रूप से दिल्ली में बस गईं. देश आजाद हो चुका था, लेकिन सामाजिक माहौल बहुत ज्यादा नहीं बदला था, बल्कि विभाजन के वक्त हुए हिंदूमुसलिम दंगों की वजह से कड़वाहट बढ़ गई थी. मधुर को इस सब से कोई सरोकार नहीं था, उन की दुनिया तो नाटकों और पढ़ाईलिखाई तक सिमटी रहती थी. अपनी दोनों बड़ी बहनों ललिता और कमल के साथ वह दिल्ली की सड़कों पर घूमतीं तो किसी राजकुमारी से कम नहीं लगती थीं.

मधुर के दादा राय बहादुर राजनारायण का अपना अलग रसूख और रुतबा था. लेकिन घर से बाहर और अंदर एक नई संस्कृति और संस्कार पनप रहे थे, जिन में शिक्षा के साथसाथ दीगर शौक पूरे करने की आजादी सभी सदस्यों को थी. दिल्ली के क्वीन मेरी हायर सैकेंडरी स्कूल की छात्रा रहते मधुर ने नाटकों में हिस्सा लेना शुरू किया तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा. जिस अभिजात्य वर्ग की वह थीं, वह अंगरेजी नाटकों खासतौर से विलियम शेक्सपियर को ज्यादा पसंद करता था. तब ऐसे ही नाटक ज्यादा खेले जाते थे. सन 1951 आतेआते वह एक कलाकार के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने लगी थीं.

18 साल की यह नवयौवना अभी तक प्यार के अहसास से अछूती थी. दिल्ली की कई नामी कला संस्थाओं के साथसाथ मधुर अब तक आकाशवाणी से भी जुड़ गई थीं, जो उस समय एक उपलब्धि की बात मानी जाती थी. सन 1953 में दिल्ली के मिरांडा हाउस कालेज से मधुर ने बीए कर लिया तो घर में उन की शादी की बात चलने लगी.

लेकिन इस बीच 2 सालों में मधुर काफी बदल चुकी थीं, क्योंकि उन्हें सईद जाफरी नाम के एक मुसलिम युवक से प्यार हो गया था. उन का यह प्यार एकदम या पहली नजर का नहीं था, बल्कि धीरेधीरे परवान चढ़ा था. खुद मधुर को भी इस का पता काफी बाद में चला था. पंजाब के मलेरकोटला में सन 1929 में पैदा हुए सईद की पहचान मूलत: ब्रिटिश अभिनेता की रही थी. मुसलिम पंजाबी परिवार के सईद भी उस समय दिल्ली में एक कलाकार के रूप में संघर्ष कर रहे थे. वह आकाशवाणी से जुड़े थे. वहीं उन की मुलाकात मधुर से हुई थी.

केवल मधुर और उन की रुचियों में ही समानता नहीं थी, बल्कि दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी काफी मेल खाती थी. सईद के पिता डा. हामिद हुसैन जाफरी अपने जमाने के मशहूर फिजीशियन थे. वह उत्तर प्रदेश के कई शहरों के सरकारी अस्पतालों में पदस्थ रहे थे. सईद के नाना खान बहादुर फैजल ईमान मलेरकोटला रियासत के दीवान थे. इस नाते उन की भी नजदीकियां ब्रिटिश शासकों और अधिकारियों से थीं.

सईद के पास भी न आत्मविश्वास की कमी थी और न पैसों की. स्कूली जीवन से ही वह रंगमंच से जुड़े हुए थे. वह भी एक खूबसूरत युवक थे, सुर्ख गुलाबी रंगत, चौड़ा माथा, झूलते घुंघराले बाल उन की शख्सियत में चार चांद लगाते थे. उन के बोलने का अंदाज भी हर किसी को लुभाता था. उर्दू, हिंदी, पंजाबी और अंगरेजी भाषाओं पर गहरी पकड़ रखने वाले सईद जाफरी ने स्कूल और कालेज में नाटक कर के खूब तारीफ हासिल की थी. तब के हिंदी फिल्मों के अभिनेता पृथ्वीराज कपूर और मोतीलाल के वह मुरीद थे और उन की फिल्में देख उन की नकल उतारा करते थे.

सईद जाफरी बेशक महत्त्वाकांक्षी और प्रतिभावान थे, लेकिन खुद को साबित करने के लिए उन्हें संघर्ष भी खूब करना पड़ा. कुछ कर गुजरने का जज्बा उन्हें दिल्ली ले आया, जहां उन के सामने रहने और खाने की समस्या थी. इस के लिए उन्होंने सन 1951 में आकाशवाणी में 250 रुपए महीने वेतन पर नौकरी कर ली. हालांकि यह वेतन उन के लिए पर्याप्त नहीं था, लेकिन इतना भी कम नहीं था कि वह गुजरबसर न कर पाते. शुरुआती दिनों में वह आकाशवाणी के पीछे पार्क में बनी बैंच पर सोते थे. एक दिन उन्हें इस हालत में देख कर आकाशवाणी के स्टेशन डायरेक्टर मसानी मेहरा ने उन्हें वाईएमसीए में 30 रुपए महीने पर एक कमरा किराए पर दिला दिया.

आकाशवाणी में नौकरी करते हुए ही ‘द ईगल हैज टू हैड्स’ नाटक के दौरान उन की मुलाकात मधुर से हुई थी. वह उन के साथ प्रमुख भूमिका में थीं. मधुर सईद के आकर्षक व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थीं. सईद उन से ज्यादा पढ़ेलिखे थे. उन्होंने सन 1948 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए किया था. उन के अंदर अभिनय का कीड़ा कुलबुला रहा था, जिस की वजह से वह सरकारी नौकरी में नहीं गए थे.

पहले मधुर और सईद की निकटता बढ़ी, फिर धीरेधीरे उन की यह निकटता कब प्यार में तब्दील हो गई, दोनों को ही पता नहीं चला. अभिनय में पारंगत दोनों युवा कलाकार अपनेअपने अव्यक्त तरीके से रोमांस कर रहे थे. संस्कारी परिवार से होने की वजह से मधुर पहल नहीं कर पा रही थीं. दूसरी ओर अपने पिता की गोरखपुर की नियुक्ति के दौरान महंतों और मठों में हिंदू धर्म को नजदीक से देख चुके सईद भी उन्हें प्रपोज करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. उन्हें पूरा विश्वास था कि मधुर के घर वाले इस रिश्ते के लिए कभी राजी नहीं होंगे.

लेकिन प्यार हो चुका था. मधुर और सईद दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित गेलार्ड रेस्टोरेंट, जिस में अनगिनत प्रेमकथाओं की पटकथा लिखी गई थी, में घंटों बैठ कर थिएटर, सिनेमा और दुनियाजहान की बातें किया करते थे. लेकिन इजहार की बात आते ही दोनों हिचकिचा जाते थे. इस में धर्म ही नहीं, समाज और देश के हालात भी आड़े आ रहे थे. दोनों एकदूसरे को जाननेसमझने लगे थे, पसंद करने लगे थे और प्यार भी करने लगे थे. यह सच है कि प्यार एक मियाद से ज्यादा खामोश नहीं रह सकता.

सन 1955 में मधुर को राडा (रायल एकेडमी औफ ड्रामेटिक आर्ट) में काम करने के लिए अमेरिका जाने का प्रस्ताव मिला तो सईद खुद को रोक नहीं पाए और एक दिन हिम्मत कर के उन्होंने मधुर के घर वालों से शादी की इच्छा व्यक्त कर दी. उम्मीद के मुताबिक जवाब ना में मिला, लेकिन वजह धर्म नहीं, बल्कि कमाई बताई गई. मधुर के घर वालों, खासतौर पर पिता जो खुद पिता की मौत के बाद आर्थिक परेशानियां झेल चुके थे का खयाल था कि एक कलाकार इतना नहीं कमा सकता कि उन की बेटी को सुखी रख सके.

लेकिन उन के जवाब से सईद निराश नहीं हुए. वह भी अमेरिका चले गए और अपने दिल की बात, जिसे मधुर सालों से जानती थीं, कह दी. मधुर को पता था कि घर वाले तैयार नहीं हैं, इसलिए उन्होंने भी वही जवाब दिया. लेकिन सईद समझ रहे थे कि मधुर का यह इनकार दिल से नहीं है. प्रेमिका की दुविधा वह समझ रहे थे. अनमने मन से न कहने के बावजूद मधुर ने उन के सामने राडा से जुड़ने का प्रस्ताव रखा. बहुत कुछ हासिल करने से पहले सईद मधुर को पा लेना चाहते थे, जिन में उन्हें एक नेक और प्यार करने वाली उदार पत्नी दिख रही थी. बचपन से ही पिता के साथ उत्तर प्रदेश में शहरशहर भटक चुके सईद की ख्वाहिश अपना घर बसाने की थी, कमोवेश यही इच्छा मधुर की भी थी.

आखिर एक दिन हैरतअंगेज तरीके से दोनों ने शादी कर ली और हनीमून मनाने न्यूयार्क चले गए. मधुर सचमुच सईद को बहुत चाहती थीं और शायद इसीलिए उन्होंने अपना नाम सईद की इच्छा के मुताबिक बदल कर मेहरुन्निमा रख लिया था. एक औरत किस हद तक समर्पित होती है, इस से सईद पहली बार रूबरू हुए थे. औरत के समर्पण के बारे में कला और साहित्य की बड़ीबड़ी किताबों में उन्होंने काफी कुछ पढ़ा और सुना था, लेकिन उस सब को खुद की जिंदगी में उतरते देखा तो निहाल हो उठे. प्यार में एक औरत इतनी सहजता से अपना नाम, जाति, धर्म और पहचान सब कुछ बदलने को तैयार हो जाती है, यह उन्होंने मधुर के समर्पण भाव से ही जाना.

दोनों के पास काम की कमी नहीं थी. लंदन, अमेरिका और भारत घूम कर नाटक करते हुए इन का दांपत्य जीवन शुरू हुआ, जिस में वक्त की कमी के चलते रोमांस शायद उतना नहीं रह गया था, जितना एक नवदंपति में होना चाहिए. इस के बाद भी दोनों संतुष्ट और खुश थे और भविष्य के लिए बहुत सा पैसा कमा लेना चाहते थे. उसी दौरान दोनों मशहूर फिल्मकार इस्माइल मर्चेंट के संपर्क में आए, जिन्हें ऐसे ही प्रतिभाशाली कलाकारों की जरूरत थी. दोनों शिद्दत के साथ मर्चेंट से जुड़ गए और इस्माइल आइवरी प्रोडक्शन के लिए काम करने लगे.

शादी के एक साल बाद ही बेटी जिया पैदा हुई. 2 सालों के अंतर से मीरा और सकीना हुईं. लगातार मां बनने के कारण मधुर जितना थिएटर से दूर होती गईं, सईद उतना ही काम में व्यस्त होते गए. उन्हें पहले के मुकाबले नाम और पैसा ज्यादा मिलने लगा था. इस दौरान अमेरिका और लंदन में रहते हुए उन्हें मुकम्मल शोहरत और दौलत मिली, जिस के लिए वह कोशिश कर रहे थे.

बेटियों की परवरिश कर रहीं मधुर ने पूरी तरह से काम नहीं छोड़ा था. वह शौकिया ही सही, पहले की तरह यात्रा संस्मरण लिख रही थीं, इसी के साथ वह भारतीय व्यंजनों पर लिखने का काम भी करने लगी थीं. यह उन का बचपन से पसंदीदा काम था. जिंदगी एक ढर्रे पर आ कर ठहर गई थी, जिस में बेटियों की किलकारियां, मासूम शरारतें और जिया के पहली बार स्कूल जाने का अनुभव था. लेकिन इस बीच पति का साथ कम होता गया था. सईद लगातार व्यस्त होते जा रहे थे, लेकिन अच्छी बात यह थी कि वह कामयाब हो रहे थे.

सईद पत्नी, बच्चों और खुद पर खुले हाथों खर्च करने वालों में थे. उन के शौक अब परवान चढ़ते जा रहे थे, जिस में महंगे सूट, सिगरेट और महंगी शराब खास थे. लेकिन वह खुद समझ नहीं पा रहे थे कि ये साधारण सफलताएं उन्हें उदंड क्यों बना रही हैं? वह बेवजह चिड़चिड़े होते जा रहे थे. इंगलैंड और अमेरिका से उन का मन ऊबने लगा था, लिहाजा उन्होंने भारत वापस आने का फैसला ले लिया. मेहरुन्निमा इस फैसले से असहमत नहीं थी. सन 1961 में वे दिल्ली वापस आए और भारत सरकार के टूरिस्ट औफिस में बतौर पब्लिसिटी औफिसर नौकरी कर ली.

लेकिन सईद और मधुर के बीच अब सन्नाटा सा पसरने लगा था. सईद ब्रिटिश संस्कृति से प्रभावित थे, जबकि मधुर उन की तरह पाश्चात्य सभ्यता की दीवानी  नहीं थीं. सईद पत्नी में बदलाव देखना चाहते थे और इस के लिए उन पर दबाव भी बना रहे थे. वैसे तो मधुर एक आज्ञाकारी पत्नी थीं, लेकिन उन्हें दबाव सहन करने की आदत नहीं थी. अपनी तरफ से उन्होंने पूरी कोशिश की कि कोई विवाद और कलह न हो, पर ऐसा होने लगा था.

कुछ दिनों बाद सईद और मधुर की मुलाकात एक बार फिर इस्माइल मर्चेंट और उन के सहयोगी आइवरी से हुई और फिल्मों पर काम शुरू हो गया. अब मधुर के पास ज्यादा वक्त था, लिहाजा मौके भी उन्हें ही ज्यादा मिले. लेकिन ऐसा भी नहीं था कि मधुर का नाम सईद से ज्यादा चलने लगा था. हां, उन की पूछ जरूर बढ़ रही थी. इस के बावजूद सईद उन से पहले की तरह संतुष्ट नहीं थे. जबकि असंतुष्ट रहने की वजह भी उन की समझ में नहीं आ रही थी. मधुर से वह कुछ ज्यादा ही उम्मीदें रखने लगे थे, पर वे उम्मीदें किस तरह की हैं और उन से हासिल क्या होगा, यह वह नहीं समझ पा रहे थे.

अलगाव के बीज अंकुरित हो उठे थे. दोनों ही अभिजात्य और कुलीन पृष्ठभूमि से थे, लिहाजा उन के बीच का तनाव भी अभिजात्य और कुलीन था, जिस से बचने की वे जितनी ज्यादा कोशिश कर रहे थे, उतना ही ज्यादा उस की गिरफ्त में आते जा रहे थे. किशोरवय की मेलमुलाकातें, कनाट प्लेस का घूमनाफिरना, गेलार्ड में घंटों एकदूसरे के साथ बैठ कर बातें करना, दीवानों की तरह एकदूसरे को चाहना और डूब कर प्यार करना, गुजरे कल की बातें हो चली थीं.

खटपट शुरू हुई और मुंह खुले तो सन 1966 में दोनों का तलाक हो गया. यह सईद का पुरुषोचित अहं था या फिर शादी से पहले मधुर और उन के अभिभावकों के सामने शादी के लिए गिड़गिड़ाने का प्रतिशोध या ग्लानि, यह तय कर पाना मुश्किल था. उधर मधुर जैसी पत्नी के लिए जिंदगी के वे दिन बेहद कठिन दिन थे. क्योंकि पति ही उन के लिए सब कुछ था. बेटियां छोटी थीं और उन्हें मां के साथसाथ पिता की भी जरूरत थी. लेकिन बात नहीं बनीं. विधिवत तलाक के बाद दोनों अलग हो गए. बेटियां मां के साथ ही रहीं. हैरानी की बात यह थी कि इस तलाक से न सईद टूटे और न ही मधुर विचलित हुईं. इस के बजाए दोनों और ज्यादा ऊर्जा से अपनेअपने कामों में लग गए.

मधुर ने पाक कला पर लिखना शुरू किया तो अमेरिका और इंगलैंड में उन की रैसिपीज को हाथोंहाथ लिया गया. परंपरागत भारतीय व्यंजनों पर उन्होंने पूरी शृंखला लिख डाली, जिस का ताजा संस्करण भारतीय शाकाहारी करी है. पत्रपत्रिकाओं से ले कर टेलीविजन तक मधुर शैफ के रूप में दिखने लगीं. आज भी वह चर्चित और लोकप्रिय शैफों की रोल मौडल हैं. दूसरी ओर मधुर से तलाक के बाद सईद जाफरी जेनिफर ईरीन सोरेल नाम की अमेरिकन महिला से प्यार करने लगे थे, जो पेशे से फ्रीलांस कास्टिंग डायरेक्टर थी.

वह वैसी ही थी जैसी छवि जाफरी उस में देखना चाहते थे. इस बार उन्होंने प्रपोज करने और शादी का फैसला लेने में देर नहीं की. उन्होंने तलाक के तुरंत बाद शादी कर ली. सईद एक कलाकार जरूर थे, लेकिन उन के दिल में आममर्दों की तरह यह ख्वाहिश भी कहीं दबी थी कि अब मधुर पछताएगी, उन्हें याद करेगी और उन के पास आ कर गिड़गिड़ाएगी.

लेकिन हुआ इस का उलटा. शादी के चंद महीनों बाद ही जेनिफर ने जता दिया कि उसे पति की उतनी परवाह नहीं है, जितनी एक पत्नी को होनी चाहिए. महत्त्वाकांक्षी जेनिफर को अपने काम की फिक्र ज्यादा रहती थी, सईद की बिलकुल नहीं. भारतीय और पाश्चात्य पत्नियों में कितना फर्क है, यह बात सईद की समझ में आ गई थी, लेकिन अब पछतावे के सिवाय उन के पास कुछ नहीं था. फिर भी सईद ने हिम्मत नहीं हारी. सईद को स्टेज कलाकार के रूप में वह सब नहीं मिला था, जो व्यावसायिक हिंदी फिल्मों में काम कर के मिला.

70 के दशक से ले कर 2015 तक उन्होंने सौ से भी ज्यादा हिंदी फिल्मों में अभिनय किया और सभी में खासे सराहे गए. पैसा भी उन्हें उम्मीद से ज्यादा मिला. गांधी फिल्म में वल्लभभाई पटेल की भूमिका में उन्होंने मानों पटेल के रौबीले व्यक्तित्व को साकार कर दिया था. शुरुआती फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ से ही उन्होंने जता दिया था कि वह बेहद मंझे और सधे अभिनेता हैं, जिस की संवाद अदायगी की अपनी खास शैली है, जिस के चेहरे के हावभाव किसी दूसरे पेशेवर ऐक्टर से ज्यादा बेहतर तरीके से बदलते हैं. शतरंज के खिलाड़ी में सईद जाफरी ने संजीव कुमार के सामने शतरंज खेलते हुए उन से कमतर अभिनय नहीं किया था. ‘हिना’ से ले कर ‘राम तेरी गंगा मैली’ तक में उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा कर ही दम लिया.

सईद जाफरी ने फिल्म इंडस्ट्री के तमाम दिग्गजों के साथ काम किया और हर फिल्म में बेहतर से बेहतर अभिनय कर के पहले से ज्यादा वाहवाही लूटी. ‘चश्मेबद्दूर’ और ‘मासूम’ जैसी दर्जनों फिल्मों में वह एकदम अलग रोल में थे. इस के बावजूद वह हर चुनौतीपूर्ण भूमिका में खरे उतरे. सईद जाफरी बेशक बेहतरीन कलाकार थे. लेकिन उन के बारे में यह बात गिनेचुने लोग ही जानते थे कि वह एक असफल पति हैं. मधुर को तलाक दे कर वह जिंदगी भर पछताते रहे. खुद उन का मानना था कि जेनिफर की बेरुखी उन्हें अकसर मेहरुन्निमा की याद दिलाती रही, जो एक आज्ञाकारी नेक और उदार पत्नी थीं. तलाक के 7 सालों बाद उन्होंने कहीं शैफ मधुर जाफरी के बारे में पढ़ा और उन की तसवीर देखी तो चौंक पड़े और उन से मिलने अमेरिका जा पहुंचे, जहां मधुर सेनफोर्ड एलन से शादी कर के दोबारा घरगृहस्थी बसा चुकी थीं.

सईद से तलाक के करीब 3 सालों बाद उन्होंने दोबारा शादी का फैसला लिया था. इस की अहम वजह बेटियों को पिता का प्यार दिलाना था. इस मामले में सेनफोर्ड मधुर से किए अपने वादे पर एकदम खरे उतरे थे. मधुर का दूसरी शादी का फैसला सईद की तरह न गलत था, न चयन में कोई त्रुटि. सईद जब उन से मिलने पहुंचे तो मधुर ने मिलने से साफ मना कर दिया, पर तीनों बेटियों जिया, मीरा और सकीना ने एक बार उन से मिलना जरूर मुनासिब समझा. मुनासिब इसलिए नहीं कि उन्हें सईद से कोई लगाव था, बल्कि इसलिए कि वे सईद को बताना चाहती थीं कि उन के नए पिता दुनिया के बेहतरीन पिता हैं और वह जानते हैं कि सच्चा प्यार क्या होता है. मम्मी जैसी थीं, उन्हें वैसा ही उन्होंने स्वीकार कर लिया और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में पूरी मदद की.

यह सईद जाफरी की जिंदगी का सब से कड़वा दिन था. जब संतान पिता को अच्छाबुरा सिखाने और समझाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि दुनिया और रिश्तेनाते हमेशा आप के मुताबिक नहीं चलते, क्योंकि आप उन के मुताबिक नहीं चले थे. मधुर के प्रति अपनी क्रूरता को स्वीकारना बताता है कि सईद जाफरी में कन्फैशन की हिम्मत थी, जो आमतौर पर लोगों में नहीं होती. उस दिन सईद की समझ आया कि शायद वह किसी को प्यार नहीं करते, इसलिए कोई उन्हें प्यार नहीं करता.

एक कामयाब रंगमंचीय और फिल्मी कलाकार की इस हालत पर तरह खाया जा सकता है, जिस का जिम्मेदार भी वह खुद ही था. लेकिन दाद उन की चाहत को भी देनी पड़ेगी कि वह अपनी पहली पत्नी मधुर को कभी भुला नहीं पाए. सईद ने बेहद स्वस्थ मन से माना कि दांपत्य में जीवनसाथी को बदलने की कोशिश से ही रिश्ता टूटता है. शायद मधुर के प्रति इसी चाहत का नतीजा था कि फिल्म ‘सागर’, जिस में वह डिंपल कपाडि़या के पिता के रोल में थे. सेट पर आमनासामना होने पर मधुर ने कभी सिर उठा कर उन्हें देखने की जहमत नहीं उठाई, न ही जरूरत महसूस की. लेकिन सईद ने मधुर को जरूर जी भर के देखा होगा. ठीक वैसे ही, जैसे कभी आकाशवाणी और कनाट प्लेस में देखा करते थे. इसलिए अपनी तमाम फिल्मों में सागर उन के लिए ज्यादा अहम थी.

बीते 14 नवंबर को जब सईद की भतीजी शाईन अग्रवाल ने उन की मौत की खबर सोशल मीडिया के जरिए दी तो बौलीवुड में उन्हें नजदीक से जानने वाले कलाकारों ने यह जरूर सोचा होगा कि जरूरी नहीं कि एक सफल अभिनेता सफल पति भी हो. Love Story

 

Delhi Crime Story: प्यार में भटका पुजारी

Delhi Crime Story: मंदिर का पुजारी बन कर गजानन ने न जाने कितनी औरतों को पथभ्रष्ट किया, लेकिन जब उन में से एक सुनीता ने उस से अपनी देह की कीमत 10 लाख रुपए वसूल ली तो ऐसा क्या हुआ कि पुजारी को जान गंवानी पड़ी…

दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के नजदीक नांगली राजपुर स्थित यश गैस्टहाऊस में 27 अक्तूबर, 2015 को एक ऐसी घटना घटी कि गैस्टहाऊस के मैनेजर और कर्मचारी सिहर  उठे. शाम के करीब 4 बजे गैस्टहाऊस के कमरा नंबर 24 से अचानक चीखने की आवाजें आने लगीं. चीखें सुन कर मैनेजर सुमित कटियार 2 कर्मचारियों के साथ उस कमरे की ओर भागे. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा कि कमरे से धुआं भी निकल रहा है.

उस कमरे में सुबह ही एक आदमी अपनी पत्नी के साथ आया था. कमरे से चीखने की जो आवाज आ रही थी, वह उसी आदमी की थी. मैनेजर की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उस आदमी के साथ ऐसा क्या हो गया, जो वह इस तरह चीख रहा है. चीखों और धुआं निकलने से उस ने यही अंदाजा लगाया कि शायद वह आदमी जल रहा है. यह सोच कर सुमित कटियार घबरा गए. कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था. उन्होंने दरवाजा थपथपाया, लेकिन वह नहीं खुला. वह परेशान हो उठे. जब उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने अन्य कर्मचारियों के साथ मिल कर कमरे का दरवाजा तोड़ दिया. कमरे के अंदर का खौफनाक दृश्य देख कर सब की घिग्घी बंध गई.

कमरे में पड़े बैड के नीचे एक आदमी आग में जलते हुए तड़प रहा था. उस के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था. बैड के पास खड़ी उस की पत्नी हैरत से उसे जलता देख रही थी. वह भी उसी हालत में थी. सुमित कटियार ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के इस घटना की सूचना दे दी. थोड़ी ही देर में पुलिस कंट्रोल रूम की गाड़ी वहां पहुंच गई, जिस में 4 पुलिसकर्मी थे. यह क्षेत्र दक्षिणीपूर्वी दिल्ली के थाना सनलाइट कालोनी के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से इस घटना की सूचना थाना सनलाइट कालोनी को भी दे दी गई थी.

खबर मिलते ही थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल 2 हैडकांस्टेबलों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. निरीक्षण में उन्हें कमरे में एक अधेड़ आदमी फर्श पर झुलसा पड़ा मिला. वह बेहोशी की हालत में लगभग 90 प्रतिशत जला था. उस के कपड़े बैड के पास रखी मेज पर रखे थे. मेज के नीचे एक कोल्डड्रिंक्स की 2 लीटर की खाली बोतल रखी थी, जिस में थोड़ा पैट्रोल था. थानाप्रभारी ने एक हैडकांस्टेबल के साथ उस जले हुए आदमी को इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया.

जिस व्यक्ति के साथ यह घटना घटी थी, वह कौन था, कहां का रहने वाला था और यह घटना कैसे घटी थी, इस बारे में थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल ने गैस्टहाऊस के मैनेजर सुमित कटियार से पूछा तो उन्होंने बताया कि जो आदमी आग से झुलसा है, उस का नाम गजानन है. वह सुबह साढ़े 10 बजे अपनी पत्नी सुनीता के साथ आया था. उस ने आईडी के रूप में अपने वोटर कार्ड की फोटोकौपी जमा कराई थी.

तब उसे कमरा नंबर 24 दे दिया गया था. इस के बाद अभी थोड़ी देर पहले कमरे से चीखने की आवाज सुनाई दी तो वह कुछ कर्मचारियों के साथ वहां पहुंचा. तब उस ने कमरे से धुआं निकलते देखा. उस ने दरवाजा खुलवाने की कोशिश की. जब दरवाजा नहीं खुला तो उस ने दरवाजा तोड़ दिया. इस के आगे मैनेजर ने बताया कि जब उस ने गजानन की पत्नी सुनीता से आग लगने के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि उस की शादी को 15 साल हो गए हैं, लेकिन अभी तक उन्हें संतान नहीं हुई. बड़ेबड़े डाक्टरों को दिखाया, तांत्रिकों के पास भी गए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

संतान न होने की वजह से दोनों काफी परेशान थे. एक दिन पहले उस के पति ने उस से कहा कि कल उन्हें महाराष्ट्र के नागपुर शहर चलना है. वहां एक बहुत पहुंचे हुए फकीर हैं, जो दुआ पढ़ा हुआ पानी देते हैं. वह पानी पीने के बाद संतान सुख का लाभ मिलता है. चूंकि जिस ट्रेन से उन्हें नागपुर जाना था, वह रात 9 बजे की थी. इतना टाइम वे सड़क पर नहीं बिता सकते थे, इसलिए आराम करने के लिए इस गैस्टहाऊस में आ गए. शारीरिक संबंध बनाने के बाद पति पर न जाने क्या फितूर सवार हुआ कि उन्होंने साथ लाए कपड़े के बैग से 2 लीटर वाली प्लास्टिक की बोतल निकाली और उस में भरा पैट्रोल खुद पर उड़ेल लिया. वह कुछ समझ पाती पति ने माचिस की तीली जला कर खुद को आग लगा ली.

‘‘कहां है गजानन की पत्नी सुनीता?’’ ओमप्रकाश लेखवाल ने पूछा तो मैनेजर इधरउधर देखने लगा. उस ने पूरा गैस्टहाऊस छान मारा, लेकिन सुनीता कहीं नहीं मिली.

‘‘तुम्हारी लापरवाही की वजह से वह भाग गई,’’ ओमप्रकाश लेखवाल ने कहा, ‘‘तुम ने गजानन की उस पत्नी की कोई आईडी ली थी?’’

‘‘सर, पति की आईडी मिल गई तो मैं ने उस की आईडी लेना जरूरी नहीं समझा.’’ कह कर मैनेजर ने सिर झुका लिया.

‘‘वह गजानन की पत्नी ही थी, मुझे नहीं लगता. वह मौजमस्ती के लिए उस के साथ यहां आई थी. मुझे पूरा यकीन है कि वह पैट्रोल गजानन नहीं वही लाई थी. अपना काम कर के वह रफूचक्कर हो गई. उस ने तुम्हें झूठी कहानी सुना कर विश्वास में ले लिया और कपड़े पहन कर चली गई. लापरवाही तुम लोग करते हो और भुगतना पुलिस को पड़ता है.’’ ओमप्रकाश लेखवाल ने  नाराजगी प्रकट करते हुए कहा.

थानाप्रभारी ने गैस्टहाऊस का रजिस्टर चैक किया तो उस में गजानन का पता चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली का लिखा था. जबकि उस ने अपने वोटर आईडी कार्ड की जो छायाप्रति जमा कराई थी, उस में उस का पता गांव कामनवास, सवाई माधोपुर, राजस्थान लिखा था. पुलिस ने गैस्टहाऊस के मैनेजर को वादी बना कर भादंवि की धारा 307 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. गजानन का हाल जानने के लिए ओमप्रकाश लेखवाल अस्पताल पहुंचे तो उन्हें पता चला कि गजानन की मौत हो चुकी है. मरने से पहले उस ने डाक्टरों को बताया था कि उसे सुनीता उर्फ रिंकू ने जलाया था.

गजानन की मौत की खबर उस के घर वालों को देना जरूरी था, इसलिए उस ने गैस्टहाऊस में दिल्ली का जो पता लिखाया था, पुलिस चांदनी चौक स्थित उस पते पर गौरीशंकर मंदिर पहुंची तो वहां से पता चला कि गजानन पहले इसी मंदिर में महंत था. लेकिन कुछ दिनों पहले उसे वहां से हटा दिया गया था. अब वह सवाई माधोपुर स्थित अपने गांव में रहता था. दिल्ली वह 10-15 दिनों में आताजाता रहता था. इस के बाद दिल्ली पुलिस ने राजस्थान पुलिस को गजानन की हत्या की खबर भिजवा कर संबंधित थाने द्वारा उस के घर वालों को उस की हत्या की खबर भिजवा दी. खबर सुन कर गजानन के घर वाले थाना सनलाइट कालोनी पहुंच गए.

डीसीपी संजीव रंधावा ने सुनीता की तलाश के लिए पुलिस की एक टीम बनाई, जिस में एसआई ललित कुमार, हैडकांस्टेबल मान सिंह, कांस्टेबल सूबे सिंह, महिला कांस्टेबल संगीता सिंह को शामिल किया गया. टीम का नेतृत्व ओमप्रकाश लेखवाल को सौंपा गया. गजानन चांदनी चौक के जिस गौरीशंकर मंदिर में महंत था, पुलिस टीम ने वहीं से जांच शुरू की. वहां से पुलिस को कई चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं. पता चला कि गजानन 10 साल पहले दिल्ली आया था और गौरीशंकर मंदिर का महंत बन गया था. मंदिर में पूजापाठ कराने के साथसाथ वह ज्योतिषी एवं तंत्रमंत्र का भी काम करता था. उस के पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पुरुषों के साथसाथ महिलाएं भी आती थीं.

इन में कुछ महिलाओं से उस की अच्छी जानपहचान हो गई थी. वह शराब भी पीने लगा था. इन में से कुछ महिलाओं से उस के अनैतिक संबंध भी बन गए थे. बाद में जब यह बात गौरीशंकर मंदिर की प्रबंधक कमेटी को पता चली तो कमेटी ने सन 2008 में गजानन को मंदिर से निकाल दिया था. इस के बाद गजानन ने मंदिर के बाहर फूल एवं पूजा सामग्री बेचने की दुकान खोल ली. उस की यह दुकान बढि़या चलने लगी थी. उस ने दुकान पर काम करने के लिए 2 नौकर रख दिए और खुद राजस्थान स्थित अपने घर चला गया. यह 2-3 साल पहले की बात है. वह हफ्तादस दिन में दुकान पर आता और नौकरों से हिसाब कर के चला जाता था. यह जानकारी हासिल कर के पुलिस टीम थाने लौट आई.

उधर पोस्टमार्टम के बाद 20 अक्तूबर, 2015 को लाश गजानन के परिजनों को सौंप दी गई. घर वालों ने निगमबोध घाट पर ही उस की अंत्येष्टि कर दी. एसआई ललित कुमार ने घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी पर शक नहीं जताया. पुलिस ने गैस्टहाऊस में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी. फुटेज में सुनीता उर्फ रिंकू का चेहरा तो नजर आ रहा था, लेकिन पुलिस के लिए मुश्किल यह थी कि इतनी बड़ी दिल्ली में उसे कहां ढूंढ़ा जाए. पुलिस के पास सुनीता का कोई मोबाइल नंबर भी नहीं था, जिस से उस के द्वारा उसे ढूंढने में आसानी हो.

गैस्टहाऊस में गजानन के कपड़ों से एक मोबाइल फोन मिला था. घर वालों ने बताया था कि वह मोबाइल गजानन का ही है. ललित कुमार ने सुनीता का फोन नंबर जानने के लिए गजानन के मोबाइल की काल लौग देखी तो एक नंबर पर उन की नजर टिक गई. क्योंकि वह नंबर ‘माई लव’ के नाम से सेव था. ललित कुमार जानना चाहते थे कि यह नंबर किस का है. उन्होंने अपने सैल फोन से वह नंबर मिलाया. कुछ देर बाद एक महिला ने फोन रिसीव कर के ‘हैलो’ कहा तो ललित कुमार बोले, ‘‘कार में चलने का शौक है तो इस के लोन की किस्तें भी समय से जमा करा दिया करो. 3 महीने हो गए, आप ने अभी तक किश्तें नहीं जमा कीं.’’

‘‘अरे भाई, आप कौन बोल रहे हैं? मैं ने कार के लिए कब लोन लिया?’’ दूसरी ओर से महिला ने कर्कश स्वर में कहा.

‘‘आप रुखसार बोल रही हैं न?’’ ललित कुमार ने पूछा.

‘‘नहीं बाबा, मैं रुखसार नहीं, सुनीता हूं. रौंग नंबर.’’

‘‘सौरी मैडम, गलत नंबर लग गया.’’ ललित कुमार ने कहा. इस के बाद उन्होंने फोन काट दिया. इस बातचीत के बाद उन की आंखों में चमक आ गई. क्योंकि सुनीता के फोन नंबर की पुष्टि हो गई थी.

ललित कुमार ने सुनीता का फोन नंबर सर्विलांस पर लगवाया तो उस की लोकेशन लाल किला, रेलवे कालोनी की मिली. वह टीम के साथ रेलवे कालोनी पहुंचे तो वहां के लोगों से सुनीता के बारे में पूछने पर पता चला कि सुनीता का पति रेलवे में नौकरी करता है. वह पहले इसी कालोनी में पति के साथ रहती थी, पर 4 सालों से वह परिवार के साथ नोएडा में कहीं रहने चली गई है. पता चला कि रेलवे कालोनी का वह क्वार्टर उस ने किसी को किराए पर दे रखा था. किराएदार से वह उस दिन मिलने आई थी. उस से मिल कर वह नोएडा चली गई थी. नोएडा में सुनीता कहां रह रही है, यह बात रेलवे कालोनी में रहने वाला कोई नहीं बता सका.

अलबत्ता सुनीता ने जिस परिवार को अपना क्वार्टर किराए पर दिया था, उस ने पुलिस को बताया कि उस का कुछ जरूरी सामान एक कमरे में रहता है, जिस की चाबी सुनीता के पास रहती है. आज जब वह मिलने आई थी तो वहां से कुछ सामान अपने बैग में भर कर ले गई थी. इतनी जानकारी मिलने के बाद ललित कुमार ने सर्विलांस द्वारा सुनीता के फोन की लोकेशन पता की तो इस बार लोकेशन नोएडा सैक्टर-29 की निकली. 28 अक्तूबर, 2015 की सुबह ललित कुमार ने टीम में शामिल महिला कांस्टेबल के साथ नोएडा के सैक्टर- 29 स्थित एक मकान पर दबिश दी तो वहां सुनीता मिल गई.

थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने कहा, ‘‘मेरा गजानन से रिश्ता जरूर था, मगर मैं ने उन्हें जला कर नहीं मारा. उन्होंने खुद ही पैट्रोल डाल कर आग लगाई थी.’’

‘‘तो फिर तुम वहां से भागी क्यों?’’ थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल ने पूछा.

‘‘स…सर, मैं डर गई थी.’’ वह बोली.

‘‘गजानन भला खुद को आग क्यों लगाएगा?’’ ओमप्रकाश लेखवाल ने पूछा.

‘‘सर, बात यह है कि गजानन की पत्नी बीमार रहती है. जब मुझ से उन का रिश्ता बना तो वह मुझ पर शादी करने का दबाव बनाने लगे. मैं 2 बच्चों की मां हूं. बच्चों को छोड़ कर मैं ऐसा कैसे कर सकती थी?’’ कह कर सुनीता सिसकने लगी.

पलभर बाद वह हिचकियां लेते हुए बोली, ‘‘26 अक्तूबर की शाम गजानन ने  फोन कर के कहा कि मुझ से मिलने की उस की काफी इच्छा है. अगले दिन उन्होंने सुबह 10 बजे मुझे हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के बाहर बुलाया. अगले दिन तयशुदा समय पर मैं स्टेशन के बाहर पहुंची तो उन्हें मैं ने इंतजार करते पाया. उन के कंधे पर कपड़े का एक बैग था.

‘‘गजानन मुझे यश गैस्टहाऊस ले गए. उन्होंने वहां मुझे अपनी पत्नी बताया था. कमरे में जा कर हम ने शारीरिक संबंध बनाए. उस के बाद गजानन ने साथ लाए बैग से प्लास्टिक की 2 लीटर की बोतल निकाली और उस का ढक्कन खोला. उस में पैट्रोल भरा था.

‘‘गजानन ने मुझ से कहा कि वह आखिरी बार पूछ रहा है कि मैं उस से शादी करूंगी या नहीं? मैं ने साफ इनकार कर दिया. तब उन्होंने कहा कि जब तुम नहीं मान रही तो मैं खुदकुशी कर लूंगा, लेकिन पुलिस यही समझेगी कि उसे तुम ने जलाया है. इस के बाद गजानन ने पूरा पैट्रोल अपने शरीर पर छिड़क कर आग लगा ली.’’

फिर सुनीता जोरजोर से रोते हुए बोली, ‘‘सर, मैं ने उन्हें नहीं मारा. मुझे फंसाने के लिए उन्होंने खुदकुशी की थी.’’

ओमप्रकाश लेखवाल को लगा कि सुनीता की आंखों के आंसू घडि़याली हैं, यह जरूर कुछ छिपा रही है. उन्होंने महिला कांस्टेबलों को इशारा किया. महिला कांस्टेबल ने सुनीता को एक अलग कमरे में ले जा कर थोड़ी सख्ती की तो उस ने सहजता से अपना जुर्म कबूल कर लिया. सुनीता उर्फ रिंकू मूलरूप से पटना, बिहार की रहने वाली थी. 13 साल पहले उस की शादी विजय कुमार के साथ हुई थी. विजय कुमार दिल्ली में रहता था और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर बतौर टैक्नीशियन नौकरी करता था. वह पति के साथ खुश थी. वह 2 बच्चों की मां बनी.

विजय कुमार को रेलवे की ओर से जामामस्जिद के पास बनी रेलवे कालोनी में क्वार्टर मिला था. उस में वह पत्नी सुनीता और बच्चों के साथ रहता था. सुनीता आजादखयालों की थी, जबकि विजय कुमार पंरपरावादी. सुनीता को घूमने एवं सिनेमाहौल में फिल्में देखने का शौक था. अपने शौक पूरे करने के लिए वह पति से अनापशनाप खर्च लेती रहती थी. सुनीता अकसर गौरीशंकर मंदिर भी जाया करती थी. वहीं 8 साल पहले उस की मुलाकात मंदिर के महंत गजानन से हुई. गजानन पुजारी होने के साथसाथ ज्योतिषी भी था. यही वजह थी कि उस के पास महिलाओं की भीड़ लगी रहती थी. सुनीता गजानन से मिली तो वह उस का दीवाना हो गया. इस के बाद दोनों के बीच संबंध बन गए.

कुछ दिनों बाद गजानन और सुनीता के संबंधों की बात मंदिर की प्रबंधक कमेटी को पता चली तो उसे मंदिर से निकाल दिया गया. तब वह मंदिर के बाहर फूल व पूजा सामग्री बेचने लगा. सुनीता और गजानन के संबंध पहले की ही तरह जारी रहे. गजानन ने चांदनी चौक में किराए का मकान ले रखा था. जब भी उस की इच्छा होती, वह सुनीता को अपने कमरे पर बुला लेता. वह सुनीता को शौक पूरे करने के लिए अच्छेखासे पैसे भी देता था. सन 2014 के अगस्त महीने में गजानन ने सवाई माधोपुर में अपना एक प्लौट 25 लाख रुपए में बेचा तो सुनीता के मांगने पर उस ने उसे 10 लाख रुपए उधार दे दिए. सितंबर, 2015 के अंतिम दिनों में गजानन ने उस से अपने रुपए मांगे तो सुनीता बहाने बनाने लगी.

दरअसल, अब तक गजानन का मन सुनीता से भर चुका था. वह अपने 10 लाख रुपए ले कर उस से हमेशा के लिए पीछा छुड़ाना चाहता था. लेकिन सुनीता की नीयत में खोट आ गई थी. वह गजानन के 10 लाख रुपए किसी भी सूरत में लौटाना नहीं चाहती थी. वह टालमटोल करने लगी तो गजानन धमकी देने लगा कि उस ने उस के अंतरंग क्षणों की वीडियो बना रखी है. अगर उस ने उस के पैसे नहीं लौटाए तो वह वीडियो उस के पति को दिखा देगा.

सुनीता डर गई. उस ने गजानन की हत्या करने की योजना बना डाली. सुनीता ने 26 अक्तूबर, 2015 की रात गजानन को फोन किया. उस समय गजानन सवाई माधोपुर स्थित अपने घर में था. सुनीता ने कहा, ‘‘कल सुबह तुम हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के बाहर 11 बजे मिलना. मैं तुम्हारे 10 लाख रुपए लौटा दूंगी.’’

पैसों के लालच में गजानन रात में ही ट्रेन द्वारा राजस्थान से चल पड़ा और 27 अक्तूबर की सुबह 9 बजे हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंच गया. वह स्टेशन के बाहर खड़ा हो कर सुनीता का इंतजार करने लगा. 10 बजे के करीब सुनीता वहां पहुंची. वह गजानन को नांगली राजपुर स्थित यश गैस्टहाऊस ले गई. वहां गजानन ने एक कमरा बुक कराया. जैसे ही वे दोनों कमरे में पहुंचे, तभी सुनीता ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. मौके का फायदा उठाने के लिए गजानन ने उसे आगोश में ले लिया.

इस के बाद दोनों ने कपड़े उतार कर शारीरिक संबंध बनाए. हसरतें पूरी करने के बाद दोनों बिस्तर पर निर्वस्त्र लेटे थे, तभी गजानन ने उस से अपने 10 लाख रुपए मांगे. तब सुनीता ने कहा, ‘‘पंडितजी, 8-10 सालों से मैं तुम्हारी सेवा करती आ रही हूं. अब तो आप उन पैसों को भूल जाइए.’’

‘‘नहीं सुनीता, घर वालों को इस की जानकारी हो गई है. वे सब मुझ से झगड़ा करते हैं. इसलिए मैं  पैसे मांग रहा हूं.’’ गजानन ने कहा.

सुनीता उठी और साथ लाए बैग से पैट्रोल से भरी बोतल निकाल कर उस के ऊपर उड़ेल दी. इस से पहले कि गजानन कुछ समझ पाता, सुनीता ने उस पर आग लगा दी. जलता हुआ गजानन चीखने लगा. उस की चीख सुन कर गैस्टहाऊस का मैनेजर वहां आ पहुंचा. इस के बाद क्या हुआ, आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं. सुनीता से पूछताछ कर के पुलिस ने 29 अक्तूबर, 2015 को उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Delhi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित