True Crime Story: सरिता नायर – अजबगजब का अफसाना

True Crime Story: एक साधारण परिवार की सरिता नायर ने अपनी महत्वाकांक्षाओं की खातिर बड़ेबड़े लोगों तक पहुंच बनाई. यहां तक कि केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी भी उस की पहुंच से परे नहीं थे. लेकिन इस सब से सरिता नायर को जिल्लत की जिंदगी के अलावा क्या मिला?

कहानी शुरू होती है 1994 से. केरल प्रांत के चेनगन्नूर के शिक्षा विभाग कार्यालय परिसर में एक आयोजन किया जा रहा था, जिस में इस जिले के एक छोटे से गांव की एक लड़की को सम्मानित किया जाना था. उस लड़की की खूबी यह थी कि वह 10वीं क्लास में गांव के स्कूल में अव्वल आई थी और उस का नाम जिले के टौप 10 बच्चों की सूची में था. उस लड़की के साथ एक बड़ी त्रासदी यह हुई थी कि परीक्षा शुरू होने से 2 दिन पहले अचानक उस के पिता का देहांत हो गया था, हालांकि उस दिन सुबह तक वह पूरी तरह स्वस्थ थे.

पिता की मौत उस लड़की के लिए किसी बड़े हादसे से कम नहीं थी. फिर भी उस ने हौसला बरकरार रखते हुए परीक्षाएं दे कर एक मिसाल कायम की थी. इस परीक्षा में उस ने 600 में से 538 (करीब 90 प्रतिशत) अंक हासिल किए थे. उस क्षेत्र  में यह एक कीर्तिमान था. उन दिनों बोर्ड की परीक्षा में इतने अंक हासिल करना किसी आश्चर्य से कम नहीं था. वैसे भी उस लड़की ने विपरीत परिस्थिति में परीक्षा दी थी. शिक्षा विभाग के इस आयोजन में कांग्रेस विधायक सोभना जौर्ज मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे. उन्होंने अपने अभिभाषण में उस लड़की की प्रशंसा करते हुए अन्य विद्यार्थियों को उस से प्रेरणा लेने को कहा था.

वह बच्ची को अपनी जेब से नकद पुरस्कार देने को भी बेताब थे, लेकिन लड़की ने पैसा लेने से इनकार करते हुए कहा था कि उसे केवल बड़ों का आशीर्वाद चाहिए, यही उस के लिए सब से बड़ा पुरस्कार होगा. इस बात पर उस की बहुत सराहना हुई थी. इस की वजह यह थी कि उस का संबंध एक गरीब परिवार से था. वह नायर सर्विस सोसायटी के एक छोटे से फ्लैट में रहती थी. उस के पिता सोमाशेखरन नायर इस सोसायटी के औफिस में क्लर्क थे. यहां से मिलने वाली साधारण सी तनख्वाह से वह जैसेतैसे घर का खर्च चलाते थे. लड़की के परिवार में एक छोटी बहन और मां इंदिरा नायर थीं.

पति की मौत के कुछ दिनों बाद इंदिरा ने परिवार की गुजरबसर करने के लिए स्कूली बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के अलावा एक प्राइवेट  फाइनैंस कंपनी में एकाउंटैंट की नौकरी कर ली थी. दुनिया में 2 बेटियों के अलावा उन का अपना कोई नहीं था. उन्हें खुशी केवल इस बात की थी कि उन की दोनों बेटियां पढ़ाई में होशियार थीं. उन की बड़ी बेटी ने तो दसवीं में एक कीर्तिमान स्थापित किया था.

शिक्षा विभाग के आयोजन के अलावा नायर सर्विस सोसाइटी के पदाधिकारियों और उस सेंट एन्जींस स्कूल वालों ने भी लड़की को सम्मानित किया था, जहां वह पढ़ती थी. स्कूल में संपन्न आयोजन में प्रिंसिपल से ले कर अध्यापिकाओं तक ने उस लडकी को अपनी प्रिय विद्यार्थी कहते हुए घोषणा की थी कि वह जिंदगी में बहुत ऊंचाई पर जा कर अपने परिवार के अलावा इस स्कूल का भी नाम रोशन करेगी. अधिकांश अध्यापिकाओं ने उसे बांहों में भर कर इस तरह अपनत्व जताने की कोशिश की थी कि जैसे वह उन की स्टूडैंट न हो कर बेटी या बहन हो.

अब 22 साल बाद सरिता नायर नाम की वह लड़की 38 वर्ष की प्रौढ़ महिला बन चुकी है. इस बीच उस की जिंदगी में सब कुछ बदल  गया है. कह सकते हैं कि सब उथलपुथल हो चुका है. आज उसी के इलाके के लोग उस के बारे में बात करने से कतराते हैं. उस पर अपनत्व की बौछार करने वाली अध्यापिकाएं उसे पहचानने से इनकार करती हैं. 90 प्रतिशत  अंक लाने वाली इलाके की उस पहली लड़की के बारे में याद दिलाने पर भी कुछ याद न आने का अभिनय करती हैं.

दरअसल, ये लोग अब यह सोच कर भयभीत हो जाते हैं कि कहीं जांच एजेंसियां उन के बारे में यह धारणा न बना लें कि वे आज भी सरिता नायर के संपर्क में हैं. उन्हें डर है कि सरिता नायर के बारे में कुछ बोलने से वे बैठेबिठाए नाहक झमेले में उलझ सकती हैं. इस की वजह यह है कि सरिता नायर ने पिछले कुछ सालों से न केवल केरल के कई मंत्रियों और राजनेताओं, यहां तक कि कई पुलिस अधिकारियों को भी अपने निशाने पर ले रखा था, केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी के लिए भी वह खतरा बनी हुई थी. इन लोगों के खिलाफ मीडिया में रोजाना ही उस के बयान आ रहे थे. फिर वह खुद भी जेल की हवा खा चुकी थी. अपने बच्चों को भी उस ने  जेल में ही जन्म दिया था.

सरिता नायर की इस बदली जिंदगी के बारे में जानने के लिए हमें फिर से उसी मुकाम पर लौटना पड़ेगा, जब उस के पिता सोमाशेखरन का अचानक देहांत हुआ था और सरिता ने करीब 90 प्रतिशत अंकों के साथ दसवीं पास  कर के वाहवाही बटोरी थी. सरिता को बताया गया था कि उस के पिता की मौत हार्टअटैक से हुई थी. बाद में यह बात भी उड़ी कि नौकरी के दौरान उन पर पैसों की हेराफेरी का आरोप लगा था, जिस से परेशान हो कर उन्होंने आत्महत्या कर ली थी. सरिता ने इस सब की गहराई में जाने की कोशिश की थी, लेकिन वह किसी भी पुख्ता नतीजे पर नहीं पहुंच पाई थी.

मां इंदिरा तो अपनी दोनों बेटियों की परवरिश के लिए मेहनत करने में ही इतनी व्यस्त हो गई थीं कि उन के पास कुछ सोचने या करने का वक्त ही नहीं था. वह किसी भी तरह अपनी बेटियों को पढ़ालिखा कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती थीं. सरिता ने यप 1996 में चेनगन्नूर के क्रिश्चियन कौलेज से अपनी प्री-डिग्री (12वीं कक्षा) की पढ़ाई खत्म की. इस के बाद कोई प्रोफैशनल कोर्स कर के उस ने नौकरी हासिल करने की सोची. लेकिन प्रोफैशनल कोर्स महंगे थे. इंदिरा की इतनी हैसियत नहीं थी कि ऐसे किसी कोर्स में बेटी को दाखिला दिलवा देती.

इस पर सरिता ने थिरूवानानाथापुरम के पास अपने ननिहाल नैय्याटिंकारा के पौलिटेक्निक कौलेज में इंजीनियरिंग करने के लिए दाखिला ले लिया. बाद में उस ने यहां से पढ़ाई छोड़ दी और धानुवाथारापुरम के वीटीएमएनएसएस कालेज में पढ़ने लगी. यहां के लड़के उस से दोस्ती करने को लालायित रहते थे, लेकिन उस ने किसी को अपने नजदीक नहीं आने दिया. जवान होतेहोते सरिता खूब स्मार्ट हो गई थी. उस की कदकाठी भी बढि़या थी. अब वह फर्राटेदार अंग्रेजी भी बोलने लगी थी. पढ़ाई में वह अब भी तेज थी. कौलेज के किसी लड़के में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह उस का रास्ता रोक ले या उस से किसी तरह की बदतमीजी करने की हिमाकत करे.

उन दिनों कालेज कैंपस में राजनीति जोरों पर थी. विद्यार्थी अलगअलग खेमों में बंटे हुए थे. सरिता की किसी खेमे में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह आजाद घूमती थी. बस से कालेज आतीजाती थी. आखिर में उस के बारे में यही सोच लिया गया कि वह अलग किस्म की घमंडी लड़की है, जिसे किसी के साथ दोस्ती में कोई रुचि नहीं है, खासकर लड़कों से. शायद मौजमस्ती की लाइफ से उसे परहेज था. तभी एक दिन एक लड़का सरिता को मोटरसाइकिल पर कालेज छोड़ने आया. उन दिनों उस इलाके में किसी के पास मोटरसाइकिल होना धनाढ्य होने की निशानी थी. इस से कालेज के लड़कों को सरिता के चरित्र पर संदेह हुआ. उन्हें लगा कि वह एकदम छिपी रुस्तम है, जो कालेज में किसी को नजदीक नहीं फटकने देती, लेकिन बाहर किसी अमीरजादे से रिश्ता बनाए हुए थी.

विद्यार्थियों को हैरान करने और जलती पर घी का काम करने वाली बात तब सामने आई, जब सरिता ने अचानक वहां से पढ़ाई बीच में छोड़ कर एक सर्टिफिकेट प्रोग्रामिंग कोर्स करना शुरू कर दिया. यह एक महंगा प्रोफैशनल कोर्स था. इस कोर्स के बाद उसे ढाई लाख रुपए सलाना पैकेज की सैलरी पर कतर एयरलाइंस में एयर होस्टेस की नौकरी मिल गई.

सरिता के पिता की मौत के बाद उस के दूर के रिश्ते के एक अंकल इस परिवार के सुखदुख का ध्यान रखने लगे थे. घर की हर बात के लिए इंदिरा उन से हर तरह की सलाह लिया करती थी. सरिता की एयर होस्टेस की नौकरी की बात बताते हुए इंदिरा ने जब उन से सलाह मांगी तो उन्होंने इस नौकरी पर सख्त ऐतराज जताया. उन का कहना था कि एयर होस्टेस को शर्मनाक कपड़े पहनने पड़ते हैं, जो शरीफ घरों की लड़कियों को शोभा नहीं देते. इस पर सरिता ने गुस्से में आ कर अपौइंटमैंट लैटर फाड़ कर फेंक दिया.

उन अंकल ने प्रयास कर के सरिता की शादी खाड़ी देश में रहने वाले एक शख्स से करवा दी. उन दिनों वह भारत आया हुआ था. कुछ वक्त सरिता के साथ बिताने के बाद वह जल्दी ही उसे अपने पास बुलाने का वादा कर के वापस चला गया. लेकिन बाद में वह सरिता पर कई तरह के आरोप लगा कर उसे तलाक देने की बात कहने लगा.

सरिता फिर से अकेली हो गई थी. अब उस पर एक तरह से बेचारी का ठप्पा लग गया था. लेकिन सरिता ने किसी बात की परवाह न कर के एरनाकुलम की एक प्रसिद्ध शेयर ट्रैडिंग कंपनी में नौकरी कर ली. सरिता बनसंवर कर सलीके से रहती थी. उस के व्यक्तित्व में पहले से कहीं अधिक निखार आ गया था. उस का बातचीत का अंदाज भी बहुत अच्छा था. फर्राटेदार अंग्रेजी उस के व्यक्तित्व पर खूब फबती थी. अपनी नौकरी से जुड़ी हर जिम्मेदारी को वह अच्छी तरह समझती थी और बखूबी निभाती थी.

उस का पति उस से रिश्ता खत्म करने पर तुला था. अब सरिता के बारे में यह कहना शुरू कर दिया कि उस के कई लोगों से अनैतिक संबंध थे. आखिर सरिता ने भी उस पति से रिश्ता खत्म करने का मन बना लिया. दोनों के बीच तलाक की काररवाई शुरू हो गई. जिस फर्म में सरिता नौकरी करती थी, उस के एक मुलाजिम पोरिंजू वेलियाथ ने अपनी एक अलग कंपनी खोल ली थी. वह सरिता को बहुत पसंद करता था और उस की खूबियों से प्रभावित था. वह चाहता था कि वह उस की कंपनी में नौकरी कर ले. सरिता ने पिछली नौकरी छोड़ कर पोरिंजू की फर्म में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी कर ली.

जल्दी ही उस का इस नौकरी से मन भर गया और उस ने यहां से रिजाइन कर के पाथानामथिट्टा के नजदीक कोजैनचैरी स्थित केरल फाइनैंस कार्पोरेशन लिमिटेड कंपनी में सहायक ब्रांच मैनेजर की नौकरी कर ली. यहां वह पहले से भी अधिक कुशल कर्मचारी साबित हुई. उस ने कंपनी के लिए बेतहाशा निवेशक जुटाने में अहम भूमिका निभाई. लेकिन उन्हीं दिनों शराब की एक दुकान के मालिक के साथ उस का नाम जुड़ने की अफवाहें उड़ने लगीं.

वह आदमी था बीजू राधाकृष्णन, जो पहले से शादीशुदा था. वह शराब का अपना छोटामोटा कारोबार करने के अलावा उसी फर्म में नौकरी भी करता था, जहां सरिता नौकरी करती थी. सरिता और राधाकृष्णन दोनों एकदूसरे को पसंद करते थे. धीरेधीरे दोनों की नजदीकियां बढ़ती गईं. तब तक सरिता को बीजू के शादीशुदा होने की बात मालूम नहीं थी.

सन 2003 में सरिता और बीजू ने नौकरी छोड़ कर कम ब्याज पर ऋण देने के औफर के साथ क्रेडिट फाइनैंस शौप नाम से अपनी फर्म खोल ली. अभी यह धंधा जम भी न पाया था कि केरल फाइनैंस कार्पोरेशन लिमिटेड कंपनी ने सरिता के खिलाफ उन के यहां नौकरी करने के दौरान घपला करने का केस दर्ज करा दिया. बाद में पता चला कि उसे फंसाने के पीछे बीजू का हाथ था. इस से बीजू व सरिता के संबंधों में दरार आने लगी.

सन 2005 में एक दैनिक अखबार में सरिता नायर से संबंधित एक सनसनीखेज खबर छपी. खबर के अनुसार, सरिता के एक पुलिस अधिकारी से नजदीकी संबंध थे, जिन का वह भरपूर लाभ उठा रही थी. उसी अधिकारी के प्रभाव की वजह से वह लोगों को बेवकूफ बना कर उन की खूनपसीने की कमाई ऐंठ लेती थी. जबकि सरिता के अनुसार ऐसा कुछ नहीं था, बल्कि यह उसे फंसाने और बदनाम करने की साजिश थी. सरिता को इस के पीछे भी बीजू का ही दिमाग काम करता नजर आया.

सरिता ने गहराई में जाने की कोशिश की तो उसे पता चला कि बीजू ने उस से शादी करने के चक्कर में अपनी पत्नी की हत्या कर के उसे आत्महत्या का रूप दे दिया था. इस बीच वह सरिता के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहता रहा था. अब जब उस के एक फिल्म एक्ट्रैस से संबंध बन गए थे तो वह सरिता को अपने रास्ते से हटाने की कोशिश करने लगा था. अंतत: सरिता ने बीजू के खिलाफ पुलिस में लिखित शिकायत कर दी. इस पर विधिवत छानबीन शुरू हो गई.

उन्हीं दिनों सरिता ने आत्महत्या करने की भी कोशिश की. दरअसल वह अपने बारे में स्थानीय अखबारों में छपने वाली झूठी खबरों से परेशान हो गई थी. तब तक उस का अपने पति से तलाक भी हो चुका था. दूसरी ओर बीजू ने यह बात उड़ानी शुरू कर दी थी कि उस की पत्नी रेशमी ने सरिता नायर से परेशान हो कर आत्महत्या की थी. आखिर एक दिन सरिता ने कोजैनचैरी को अलविदा कहते हुए एरनाकुलम के एक काल सेंटर में नौकरी कर ली. यहां उसे एचएसबीसी बैंक के क्रैडिट कार्ड बनवाने के संबंध में लोगों से फोन पर संपर्क करने का काम मिला था. एरनाकुलम में उस का मन नहीं लगा तो उस ने निवेदन कर के अपना तबादला तिरुवनंतपुरम करवा लिया. यह सन 2006 की बात है.

दरअसल, अब वह एक तरह से बीजू से डरने लगी थी. लेकिन वह यहां भी एक दिन अपने गुंडों को ले कर आ धमका और सरिता से बोला, ‘‘तू अगर चाहती है कि तेरी जिंदगी सलामत रहे तो सीधेसीधे मेरा वह 5 लाख रुपया वापस कर दे, जो तूने मुझ से उधार ले रखा है. मेरे खिलाफ तू कितनी भी शिकायतें करती रह, मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला.’’

बकौल सरिता उस ने बीजू से कभी कोई पैसा नहीं लिया था. दरअसल वह उस पर इस तरह का आरोप लगा कर उसे भयभीत करना चाहता था, ताकि वह उस के खिलाफ पुलिस में की गई अपनी शिकायत वापस ले ले. बहरहाल, जो भी हुआ हो, उन दोनों का आपस में समझौता हो गया. उन्हीं दिनों सोलर एनर्जी प्रोजैक्ट को ले कर व्यापारियों के बीच काफी खुसरफुसर चल रही थी. सरकारी मदद से बड़े स्तर पर जो प्रोजैक्ट शुरू किए जाते हैं, उन में शुरू में लोगों को बहुत फायदा पहुंचने की गुंजाइश होती है. बीजू राधाकृष्णन और सरिता नायर ने भी इस सुनहरे अवसर का फायदा उठाने की सोची.

सन 2007 में बीजू राधाकृष्णन और सरिता नायर ने आईसीएमएस नाम से अपनी सोलर इक्विपमैंट कंपनी रजिस्टर करवा ली, साथ ही इन लोगों ने तिरुवनंतपुरम में कंपनी का औफिस भी खोल लिया. बीजू के अनुसार उस की सब से बड़ी ताकत उस के वे दोस्त थे, जिन की सीधी पहुंच सरकार तक थी. इन में कुछेक  मंत्रियों के बेटे वगैरह भी थे. सोलर प्रोजैक्ट के नाम पर फूलप्रूफ व्यवस्था का मुलम्मा चढ़ा कर इन लोगों ने आम लोगों से बहुत पैसा खींचा. आखिर इन लोगों के खिलाफ लोगों की शिकायत पर पुलिस ने धोखाधड़ी का केस दर्ज कर बीजू राधाकृष्णन व सरिता को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. गिरफ्तारी के वक्त सरिता 8 महीने की गर्भवती थी.

पूछताछ के वक्त उस ने पुलिस को बताया था कि उस के एक राजनेता से संबंध थे, जिस से वह गर्भवती हो गई थी. बाद में उस ने अपनी न्यायिक हिरासत के दौरान जेल में ही एक बेटे को जन्म दिया था. यहां जब उस से उस बच्चे के पिता का नाम पूछा गया था तो उस ने यह कहते हुए नाम बताने से इनकार कर दिया था कि यह उस की राइट टू प्राइवेसी का मामला है, इसलिए उसे बच्चे के पिता का नाम बताने के लिए मजबूर न किया जाए. खैर, जल्दी ही बीजू की जमानत हो गई और वह जेल से बाहर आ गया. जबकि सरिता को इस के बाद 6 महीनों तक जेल में ही रहना पड़ा था. बाद में उस की जमानत बीजू के प्रयासों से ही हो सकी थी.

केस चलता रहा, धीरेधीरे मामला ठंडा पड़ता गया. वक्त अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता गया. बीजू और सरिता के बीच संबंध बनतेबिगड़ते रहे. सन 2011 में केंद्र सरकार की ओर से जवाहर लाल नेहरू नैशनल सोलर मिशन योजना के तहत इच्छुक लोगों को इस मिशन का हिस्सा बनने के एवज में भारी ग्रांट देने की घोषणा हुई. इस मुद्दे पर बीजू और सरिता एक बार फिर साथसाथ हो गए. इस बार उन्होंने पुराना नाम रद्द कर के कंपनी का नया नाम रखा ‘टीम सोलर’.

सरिता नायर फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करने में माहिर थी. हालांकि वह किसी से कोई ठगी करना नहीं चाहती थी. लेकिन उस की इस कला और प्रभावशाली व्यक्तित्व से सामने वाला उस की बात मानने को मजबूर हो जाता था. बकौल सरिता अकेला बीजू ही ऐसा था, जिस के सामने न जाने क्यों उसे घुटने टेकने पड़े थे और वह हर तरह से उस का शोषण करता रहा था.

सरिता के बताए अनुसार, अपनी इस खूबी के सहारे उस ने तमाम बडे़बड़े लोगों से संपर्क बना लिए थे, जिन में कई पुलिस अधिकारियों, मंत्रियों और यहां तक कि मुख्यमंत्री ओमन चांडी तक शामिल थे. इन लोगों के यहां उसे बिना किसी औपचारिकता के आनेजाने की आजादी थी. वहां उसे सब पहचानते थे. न कोई उसे मुख्यमंत्री के औफिस में जाने से रोकता था न ही उस के लिए उन के निवास में प्रवेश करने पर कोई पाबंदी थी.

बकौल सरिता, इस के बावजूद सोलर मिशन से संबंधित ग्रांट देने के लिए मुख्यमंत्री ने 7 करोड़ की रिश्वत मांगी थी, जबकि पावर मिनिस्टर आर्यादन मोहम्मद ने अलग से 2 करोड़ रुपए की मांग की थी. सरिता के मुताबिक, तब उस ने 1.9 करोड़ रुपए  मुख्यमंत्री चांडी के सहायक थौमस कुरुविला को दिए थे और 40 लाख रुपए ले जा कर मोहम्मद के सैके्रट्री केसावान के हाथ पर रखे थे. लेकिन इन लोगों का साफ कहना है कि उन्होंने सरिता से कभी कोई रुपया नहीं लिया. वह झूठ बोल रही है. पता नहीं किस के इशारे पर वह उन्हें बदनाम करने के लिए इस तरह की मक्कारी भरा खेल खेल रही है.

सरिता के बताए अनुसार, रिश्वत में इतनी बड़ी रकम देने के बाद उसे पूरा विश्वास था कि उस का यह काम हो जाएगा. लेकिन उस का टैंडर ही गायब कर दिया गया. सरकारी ग्रांट मिलने का तो अब सवाल ही नहीं रह गया था. सरिता का ताश का महल भरभरा कर गिर चुका था. जिन लोगों ने इन के प्रोजैक्ट में पैसे लगाए थे, वे इन के विरुद्ध आ खड़े हुए. आखिर उन लोगों की शिकायत पर आपराधिक मामला दर्ज हुआ और जून, 2013 में सरिता नायर व बीजू राधाकृष्णन फिर से गिरफ्तार हो कर सलाखों के पीछे पहुंच गए.

सरिता के मुताबिक थिरुवानानाथापुरम के नजदीक जो जेल है, उसी में बैठ कर उस ने एक चिट्ठी लिखी. उस में उस ने उन तमाम अतिमहत्त्वपूर्ण लोगों के नाम दिए, जिन्होंने सोलर बिजनैस कौंट्रेक्ट दिलवाने के प्रौमिस के एवज में उस से शारीरिक संबंध बनाए थे. उपरोक्त 42 पृष्ठों की चिट्ठी में 13 वीआईपी लोगों के अलावा एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का भी जिक्र था. हर व्यक्ति के बारे में सरिता ने विस्तारपूर्वक खुलासा किया था कि किस वादे के एवज में किस तारीख को और कहां उस का जिस्म नोचा गया था.

बकौल सरिता, वह अपने इस पत्र को मूल आकार में रिलीज करना चाहती थी, लेकिन एक जेल अधिकारी ने उसे समझाया और कांटछांट कर के इसे 4 पन्नों का बनवा दिया था. बीजू के अनुसार, इस से संबंधित एक सीडी उस के पास है. बीजू राधाकृष्णन द्वारा अपनी पत्नी की हत्या करने के सबूत भी पुलिस के हाथ लग गए थे. इस अपराध में उस की मां का शामिल होना भी पाया गया था. रेशमी हत्याकांड में उन पर केस चलाया गया. सन 2006 में हुए इस मर्डर का फैसला जनवरी, 2014 में आया, जिस के तहत बीजू व उस की मां को उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

टीम सोलर के घपलों और सरिता नायर के गंभीर आरोपों के सिलसिले में सोलर कमीशन बना कर इस की व्यापक न्यायिक जांच पहले ही शुरू हो चुकी थी. इस जांच में एक से एक सनसनीखेज तथ्य सामने आ रहे हैं. इस सिलसिले में मुख्यमंत्री ओमन चांडी के गनमैन सलीमराज को गिरफ्तार करने के अलावा कई सरकारी उच्च अधिकारियों को नौकरी से निलंबित भी किया गया है. चांडी के खिलाफ सबूतों में सरिता ने उन नेताओं की रिकौर्डिंग भी कमीशन के हवाले की है, जिस में वे उसे चांडी के हक में बयान देने की बात समझा रहे हैं. मुख्यमंत्री ओमन चांडी इस सिलसिले में खुद को और अपनी सरकार को बचाने की जीतोड़ कोशिश कर रहे थे, जबकि सरिता नायर को आधार बना कर उन पर विपक्ष  के ताबड़तोड़ हमले जारी थे.

पहले सरिता, फिर नंदनी, फिर लक्ष्मी और अंत में फिर से सरिता नायर के रूप में आ कर इस अलग सी महिला ने जिंदगी से हर तरह की जंग लड़ने की ठान ली है. लड़के के बाद एक लड़की को भी उस ने जेल में ही जन्म दिया था. उस के ये दोनों बच्चे उस की मां की देखरेख में पल रहे हैं. जेल से जमानत पर छूटने के बाद सरिता नायर ने अपने खिलाफ लगे आरोपों को दरकिनार कर, अपनी जिंदगी का एक नया अध्याय लिखना शुरू कर दिया है. अपने को संगीत की दुनिया से जोड़ते हुए उस ने क्रिश्चियनैटी व हिंदुत्व के धार्मिक गीतों की 4 म्यूजिक एलबम निकाली हैं. 4 फिल्मों में काम करने का अनुबंध भी उस ने किया है. इन में एक फिल्म में वह महिला पुलिस अधिकारी का किरदार निभा रही है.

उस का कहना है, ‘‘मैं एक ऐसा डूबता जहाज हूं, जो कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे से टकराने की भूल कर के अपने आस्तित्व को डांवाडोल करता रहा. मैं हरेक पर भरोसा कर के गलती पर गलती करती गई. मैं नहीं चाहती कि कोई मुझे मेरी गलती के लिए माफी दे. जहां भी मैं गलत साबित हो जाऊं, मुझे मेरे कुसूर की बराबर सजा दी जाए.

‘‘मैं हंसतेहंसते यह सजा कबूल करूंगी और इस सजा के खिलाफ अपील करने की सोचूंगी भी नहीं. लेकिन मुझे चिंता है अपने दोनों बच्चों के भविष्य की. आगे मुझे जो भी वक्त मिलेगा, मैं उस का सदुपयोग कर के अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने की कोशिश करूंगी. फिल्में करूं या एलबम रिलीज करूं, करूंगी सब पैसा कमाने के लिए ही.’’

सराह जोसेफ मलयालम लेखक और एक्टिविस्ट हैं. सरिता नायर पर की गई उन की टिप्पणी के अनुसार, वह एक ऐसी महिला है, जो सिस्टम की पहचान अपने तरीके से करने की कोशिश कर के भ्रष्ट राजनीतिज्ञों का इस्तेमाल करने की सोच बैठी थी. लेकिन उन्होंने न केवल उस से मोटी रिश्वत खाई, उस का जिस्मानी शोषण भी किया. इस लिहाज से वे सरिता नायर से भी बड़े अपराधी हैं. सरिता ने इन्हें एक्सपोज करने का साहस दिखाया है. True Crime Story

 

Crime News: हुस्न का जाल

Crime News: राजनीति में आने के लिए विनय त्यागी को पैसों की जरूरत महसूस हुई तो उस ने किसी मोटे आसामी का अपहरण करने की योजना बनाई. शिकार को आसानी से फांसा जा सके, इस के लिए उस ने चारा के रूप में ममता को इस्तेमाल किया. उस ने मनोज गुप्ता का अपहरण तो कर लिया, लेकिन फिरौती वसूल पाता, उस के पहले ही खेल बिगड़ गया और…

दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित एक रेस्तरां की टेबल पर एकदूसरे के सामने बैठे मनोज गुप्ता और ममता मसीह के चेहरों पर खुशी की एक अनोखी चमक थी. वहां के खुशनुमा माहौल में वेटर को और्डर कर के उन्होंने खानेपीने की चीजें मंगा ली थीं. खानेपीने के साथ उन की बातें भी हो रही थीं.  दोनों की यह पहली मुलाकात थी, लेकिन ऐसा लग रहा था, जैसे वे एकदूसरे को बरसों से जानते हों. दिलोदिमाग संतुष्ट हुए तो मनोज ने ममता की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘ममता, तुम से मिल कर बहुत अच्छा लगा.’’

‘‘मुझे भी बहुत अच्छा लगा. बस आप से एक उम्मीद करती हूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘मुलाकातों और बातों का यह सिलसिला खत्म नहीं होना चाहिए. वैसे भी वे लोग खुशनसीब होते हैं, जिन्हें विश्वास करने वाले लोग मिलते हैं.’’

ममता की आंखों में चाहत का सागर नजर आ रहा था. उस की बातें सुन कर खुश हुए मनोज ने कहा, ‘‘तुम जैसी खूबसूरत लड़की से मिलने के बाद कौन कमबख्त इस सिलसिले को तोड़ना चाहेगा. यह कितना अच्छा है कि मुझे एक ऐसी लड़की मिली, जिस पर मैं भरोसा कर सकता हूं, वरना आज के जमाने में किसी पर भरोसा करना ठीक नहीं.’’

ममता ने मुसकरा कर जवाब दिया, ‘‘फिक्र न कीजिए, मैं कभी तुम्हारे इस विश्वास को टूटने नहीं दूंगी. मेरे लिए तुम्हारी खास अहमियत है. मैं तुम्हारे साथ हंसीखुशी से जीना चाहती हूं, क्योंकि मेरी जिंदगी में तो अब तक खुशियां रूठी हुई थीं.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘जाने भी दीजिए.’’ ममता ने टालना चाहा तो मनोज ने लगभग जिद वाले अंदाज में पूछा, ‘‘तुम ने बात शुरू की है तो अब बताना ही होगा.’’

इस के बाद ममता ने जो बताया, वह यकीनन दुखभरी दास्तान थी. उस के पिता एक बड़े कारोबारी थे. 4 साल पहले कारोबार में घाटा होने से परिवार पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. इस का नतीजा यह निकला कि सदमे से पिता की मौत हो गई. घर में वही बड़ी थी. लिहाजा मां और छोटे भाई की जिम्मेदारी उस पर आ गई. वह एयर होस्टेस बनना चाहती थी, लेकिन आर्थिक स्थिति खराब हो जाने से उसे पढ़ाई छोड़ कर नौकरी करनी पड़ी.

यह सब बतातेबताते ममता की आंखों में आंसू झिलमिला आए. नैपकीन से आंसुओं का वजूद मिटा कर उस ने आगे कहा, ‘‘मेरी तरफ कई लोगों ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया, लेकिन मुझे कभी कोई अच्छा नहीं लगा. तुम से बात हुई तो दिल ने कहा कि तुम बहुत अच्छे इंसान हो, इसलिए तुम से दोस्ती कर ली.’’

ममता की इन बातों ने मनोज के दिल में उस के लिए खास जगह बना ली. उसे लगा कि ममता पर भरोसा कर के उस ने कोई गलती नहीं की है. यह अच्छी लड़की है. इस मुलाकात में दोनों ने अपनेअपने जज्बातों को जाहिर किया. दोनों ही इस मुलाकात से कुछ इस तरह खुश थे, जैसे वे अपनेअपने मकसद में कामयाबी की सीढि़यां चढ़ रहे हों. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि चंद दिनों की बातचीत में उन के दिल इस तरह मिल जाएंगे.

जिंदगी मकसदों के लिए भटकती रहती है, लेकिन भरोसा किस पर किया जाए, इस की परख बहुत जरूरी होती है. भरोसा किसी इंसान की बातों, उस के चेहरे के हावभाव पढ़ कर किया जाता है. मनोज की नजरों की कसौटी पर ममता बिलकुल खरी उतर रही थी. मनोज गुप्ता उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर की कोतवाली के मोहल्ला स्वामीपाड़ा का रहने वाला था. उस का मेरठ और देहरादून में प्रौपर्टी का कारोबार था. कड़ी मेहनत से उस ने यह मुकाम हासिल किया था. शादीशुदा मनोज गुप्ता का हंसताखेलता परिवार था.

जनवरी, 2016 के दूसरे सप्ताह में उस के मोबाइल पर एक अंजान नंबर से मिस्डकाल आई तो जिज्ञासावश उस ने कालबैक की. दूसरी ओर से किसी लड़की ने मासूमियत से कहा, ‘‘सौरी सर, आप का नंबर गलती से लग गया था.’’

‘‘इट्स ओके.’’ कह कर मनोज ने बात खत्म कर दी. कुछ देर बाद उसी नंबर से मनोज के वाट्सऐप पर सौरी का मैसेज आया. नंबर देख कर मनोज समझ गया कि यह मैसेज उसी लड़की का है. उस ने प्रोफाइल देखी तो उस पर खूबसूरत लड़की का आकर्षक फोटो लगा था. उस ने जवाब दिया तो दोनों के बीच चैटिंग शुरू हो गई. वह लड़की कोई और नहीं, यही ममता थी.

27 वर्षीया ममता मूलरूप से मध्य प्रदेश के उज्जैन की रहने वाली थी. वर्तमान में वह दिल्ली के रंगपुरी महिपालपुर के मकान नंबर-418 में रहती थी और गुड़गांव के एक स्पा सैंटर में नौकरी करती थी. चैटिंग के बाद मनोज और ममता के बीच मोबाइल पर बातें भी होने लगी थीं. परिणामस्वरूप दोनों बहुत जल्दी अच्छे दोस्त बन गए. मनोज खुश था कि एक युवा लड़की उस की ओर आकर्षित है. इस रिश्ते को उस ने गहरा करने का मन बना लिया. उस ने मिलने की इच्छा जाहिर की तो ममता ने हामी भर दी. इस के बाद एक दिन मनोज उस से मिलने दिल्ली पहुंच गया.

इसी पहली मुलाकात में दोनों के रिश्ते गहरा गए. उन का यह खुफिया रिश्ता था. दुनिया में ऐसे बहुत रिश्ते होते हैं, जिन के अपने मकसद होते हैं और वह मकसद वक्त पर अपना असली रूप दिखा देता है. मनोज और ममता के रिश्ते में भी कुछ ऐसा ही मोड़ आने वाला था. मनोज को पूरा विश्वास था कि ममता उस के भरोसे का आईना कभी चटकने नहीं देगी. रिश्ते की गहराई ने मिलने की तमन्नाओं में इजाफा किया तो उन्होंने उत्तराखंड घूमने जाने का प्रोग्राम बनाया. मनोज अकसर देहरादून जाता रहता था. वहां से करीब 20 किलोमीटर दूर थाना प्रेमनगर के गांव डूंगा के छोर पर पार्टनरशिप में उस का दोमंजिला फार्महाउस था. वह जब भी देहरादून जाता था, अकसर वहीं रुकता था.

18 फरवरी की दोपहर तयशुदा प्रोग्राम के तहत ममता उसे मेरठ में दिल्लीदेहरादून बाईपास पर मिली. मनोज उसे अपनी इनोवा कार नंबर एचआर6ए डी-3251 से ले कर पहले मसूरी घुमाने ले गया, उस के बाद करीब साढ़े 8 बजे फार्महाउस पर पहुंचा. मनोज के साथ उस का ड्राइवर सन्नी भी था. फार्महाउस जाने से पहले उस ने ड्राइवर को देहरादून में ही छोड़ दिया था, जहां से वह अपनी रिश्तेदारी में चला गया था. मनोज और ममता फार्महाउस पर पहुंचे तो वहां केयरटेकर उमेश मौजूद था. इस बीच मनोज की अपने पार्टनर मुकेश से भी फोन पर बात हुई थी. मनोज के कहने पर उमेश दोनों के लिए बाहर से रात का खाना पैक करा कर लाया था और रख कर रात करीब 10 बजे चला गया था. उमेश वहीं गांव में ही रहता था.

उस के जाने के बाद फार्महाउस में ममता और मनोज ही रह गए थे. प्राकृतिक वातावरण के आनंद और रात को मादक बनाने के लिए दोनों ने शराब पी. इस के बाद खूबसूरत पल साथ बिताए. मनोज के पास लाइसेंसी पिस्तौल थी. उसे सिरहाने रख कर आधी रात तक वह सो गया, जबकि ममता की आंखों से नींद नदारद थी. वह मोबाइल पर चैटिंग में मशगूल थी. उस ने बैडरूम का दरवाजा भी खोल दिया था. इसी बीच वह बाहर गई और थोड़ी देर में लौट कर लेट गई.

फार्महाउस में सन्नाटा पसरा था. लगभग ढाई बजे एक आईटेन कार फार्महाउस में घुसी और उस में से 4 लड़के उतरे. चारों तेजी से बैडरूम  में पहुंचे और मनोज को उठा कर उस के साथ मारपीट शुरू कर दी. उन्होंने उस के ऊपर हथियार भी तान रखे थे, इसलिए वह विरोध करने की स्थिति में नहीं था.

हड़बड़ाहट में हुए इस हमले के बारे में मनोज समझ नहीं सका. ममता एक कोने में खड़ी थी. तंदुरुस्त होने के बावजूद कुछ ही देर में मनोज उन के सामने पस्त हो गया. इस मारपीट में उस का होंठ भी फट गया. उस से निकला खून बिस्तर और तकिए में लग गया. वे मनोज को पीटते हुए बाहर ले आए और उसी की कार में डाल दिया. ममता खुद ही कार में बैठ गई थी. उस का पिस्तौल भी उन्होंने कब्जे में ले लिया था. इस के बाद दोनों कारें फर्राटा भरती चली गईं. वहां क्या हुआ, किसी को पता नहीं चला.

अगले दिन सुबह 8 बजे केयरटेकर उमेश फार्महाउस पर पहुंचा तो मुख्य दरवाजा खुला पाया. मनोज की कार भी नहीं थी. ऊपरी मंजिल पर पहुंचा तो बैडरूम का भी दरवाजा खुला था. मनोज और उन की मित्र, दोनों ही नदारद थे. मनोज बिना बताए कहां चला गया, यह बात उसे परेशान कर रही थी. क्योंकि रात में उस ने उस से 2 दिन रुकने को कहा था. जब बिस्तर पर पड़े खून के छींटों पर उस की नजर पड़ी तो उसे किसी अनहोनी की आशंका हुई. उस ने मनोज के मोबाइल पर फोन किया तो वह बंद मिला. उमेश ने देहरादून में ही रहने वाले मनोज के पार्टनर मुकेश मित्तल को फोन किया तो थोड़ी ही देर में वह वहां पहुंच गए.

उस ने मनोज के घर वालों से बात की. उन्हें सिर्फ इतना पता था कि वह देहरादून जाने की बात कह कर घर से गया था. हालात आशंकाओं और रहस्य को जन्म दे रहे थे. मुकेश ने पुलिस कंट्रोल रूम को इस की सूचना दे दी. तब तक मनोज का ड्राइवर सन्नी भी आ गया था. सूचना पा कर थाना प्रेमनगर के थानाप्रभारी यशपाल सिंह बिष्ट कुछ ही देर में फार्महाउस पर पहुंच गए. मामला चौंकाने वाला था. आशंका अपहरण की हो रही थी. मनोज के साथ आई लड़की कौन थी, यह कोई नहीं जानता था.

यशपाल सिंह ने इस की जानकारी एसएसपी डा. सदानंद दाते को दी तो उन के निर्देश पर एसपी (सिटी) अजय सिंह, सीओ (सिटी) मनोज कत्याल, थाना सहसपुर के थानाप्रभारी मुकेश त्यागी, थाना बसंत विहार के थानाप्रभारी अबुल कलाम आदि भी वहां पहुंच गए थे. पुलिस ने फार्महाउस की बारीकी से जांच की. फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया गया था, जिस ने फिंगरप्रिंट के साथ खून सने कपड़ों को कब्जे में ले लिया. पुलिस के हाथ कोई खास सुराग नहीं लगा. फार्महाउस में सीसीटीवी कैमरा लगा था, लेकिन वह खराब था.

पहली नजर में मामला अपहरण का लग रहा था, लेकिन सवाल यह था कि अपहर्त्ता कौन हो सकते हैं और अपहरण किस मकसद से किया गया था? जिस लड़की के साथ मनोज चोरीछिपे आए थे, उस के बारे में किसी को कुछ पता नहीं था. मनोज के खिलाफ उस लड़की की भी कोई साजिश हो सकती थी. ड्राइवर सन्नी ने पुलिस को बताया था कि उस ने लड़की को मनोज के साथ पहली बार देखा था. बिस्तर पर लगा खून किसी अनहोनी की ओर इशारा कर रहा था.

मामला गंभीर था, लिहाजा पुलिस टीमों का गठन कर दिया गया. इन टीमों में एसपी सिटी अजय सिंह के नेतृत्व में एएसपी मंजूनाथ, सीओ स्वपन कुमार सिंह, मनोज कत्याल, कई थानों के थानाप्रभारियों के अलावा एसआई दिलबर सिंह, यादवेंद्र बाजवा, गिरीश नेगी, किशन देवरानी, रवि सैनी, कमल हसन, किशन देवरानी और जितेंद्र कुमार आदि को शामिल किया गया था. स्पैशल औपरेशन ग्रुप को भी इस में लगा दिया गया था. आईजी संजय गुंज्याल ने भी मामले का जल्द से जल्द खुलासा किए जाने के निर्देश दिए थे.

पुलिस जल्द से जल्द इस रहस्य से परदा उठाना चाहती थी. एक पुलिस टीम मनोज के घर वालों से मिलने मेरठ गई. पुलिस ने मनोज की रंजिशों और लड़की के बारे में घर वालों से जानना चाहा, लेकिन उन से कोई खास जानकारी नहीं मिली. पुलिस ने महसूस किया कि घर वाले पुलिस से बचने की कोशिश कर रहे हैं. इस से पुलिस को लगा कि मनोज का अपहरण किया गया है और अपहर्त्ता संभवत: घर वालों के संपर्क में हैं. पुलिस ने घर वालों के नंबर ले लिए. इस के बाद मनोज के दोस्त कृष्णकुमार की तहरीर पर अपराध संख्या 42/2016 पर अज्ञात लोगों के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पुलिस ने मनोज के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स हासिल कर ली. उस में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर उस की कई दिनों से दिन में कईकई बार बातें हुई थीं. वह नंबर किस के नाम तथा किस पते पर लिया गया था, पुलिस ने इस बारे में पता किया तो पता चला कि वह गलत पते पर लिया गया था. हैरानी की बात यह थी कि उस नंबर से ज्यादा फोन मनोज को ही किए गए थे. इस के बाद पुलिस ने यह पता किया कि वह सिम लिया कहां से गया था? वह सिम मुजफ्फरनगर जिले से लिया गया था. देर शाम मोबाइल के जरिए पुलिस को पता चल गया कि अपहर्त्ता मनोज के घर वालों के संपर्क में हैं.

पुलिस के सर्विलांस से उन की लोकेशन दिल्ली-लखनऊ हाईवे पर गाजियाबाद और मुरादाबाद जिलों के बीच की मिल रही थी. पुलिस टीमों ने उन का पीछा करना शुरू किया, साथ ही गाजियाबाद और मुरादाबाद पुलिस को अवगत भी करा दिया. 19 फरवरी की देर रात घेराबंदी होते देख बदमाशों ने मनोज को गढ़मुक्तेश्वर में हाईवे पर छोड़ दिया. मनोज पुलिस के हाथ लगा तो बेहद डरासहमा था. उस के चेहरे पर चोटों के निशान थे. अपहर्त्ता पुलिस को चकमा दे गए थे. पुलिस मनोज को देहरादून ले आई. उस का इलाज कराया गया. उस समय उस की मनोदशा बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए पुलिस ने उस से ज्यादा पूछताछ नहीं की.

पुलिस सर्विलांस और मोबाइल नंबरों की जांच करते हुए अगले दिन यानी 21 फरवरी को मुजफ्फरनगर पहुंच गई और सिम मुहैया कराने वाले 2 लड़कों, अंबुज त्यागी और विकास को हिरासत में ले लिया. प्राथमिक पूछताछ में पता चला कि उन्होंने फरजी आईडी पर 3 सिमकार्ड विनय त्यागी को मुहैया कराए थे. विनय त्यागी उर्फ टिंकू पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नामी शातिर अपराधी था. मुजफ्फरनगर के गांव खाइखेड़ी का रहने वाला विनय जुर्म की दुनिया का पुराना खिलाड़ी था. उस के खिलाफ विभिन्न थानों में अपहरण, लूट, हत्या, रंगदारी जैसे 30 से ज्यादा केस दर्ज थे.

वह 1 लाख रुपए का इनामी अपराधी रहा था और कई बार जेल जा चुका था. उस की पत्नी पुरकाजी ब्लौक की ब्लौकप्रमुख थी. चौंकाने वाली बात पुलिस को यह पता चली कि मनोज के साथ जो लड़की थी, वह भी अपहरण में शामिल थी. उसे मोहरा बना कर मनोज के सामने हुस्न का चारा डाला गया था. अपहरण का यह बिलकुल नया अंदाज था.

पुलिस ने विनय, अंबुज, विकास और ममता को नामजद कर लिया. पूरे मामले का खुलासा विनय और ममता के पकड़े जाने के बाद ही हो सकता था. पुलिस टीमों ने छापे मारने शुरू किए. आखिर 22 फरवरी को ममता पुलिस के हाथ लग गई. पुलिस ने मनोज और ममता से विस्तार से पूछताछ की तो एक लड़की को मोहरा बना कर अपहरण की साजिश की जो चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इस मामले में साजिश का मुख्य सूत्रधार विनय त्यागी था. अपने साथियों के साथ मिल कर उस ने कोई बड़ा अपहरण कर के फिरौती वसूलने की योजना बनाई. इस के लिए वह किसी लड़की को शामिल कर के आसानी से शिकार फांसना चाहता था. विनय का जुर्म से पुराना रिश्ता था. राजनीति का लबादा ओढ़ने के लिए उस ने सन 2007 में विधानसभा का चुनाव भी लड़ा था. लेकिन हार गया था. इस के बाद उस ने पत्नी को राजनीति में उतार दिया था.

वह सक्रिय राजनीति में आना चाहता था, इस के लिए उसे मोटी रकम की जरूरत थी. उस ने कुछ अपहरण कर के मोटी रकम जुटाने का फैसला किया. उस ने दिमाग चलाया तो कम रिस्क में अपहरण करने के लिए लड़की का चारा डाल कर शिकार फंसाना उसे आसान लगा. बीए पास ममता स्पा सैंटर में नौकरी करती थी और कई रंगीनमिजाज लोगों के संपर्क में थी. विनय को यह बात उस के रिश्तेदार विकास ने बताई थी. विनय को ममता काम की लड़की लगी तो वह उस से मिला. विनय ने उस से कहा कि उसे एक आदमी को फंसाना है, इस के लिए वह उसे 20 लाख रुपए देगा. ममता महत्त्वाकांक्षी थी, इसलिए बिना नानुकुर के राजी हो गई.

इस के बाद विनय ने गलत नामपतों पर अंबुज और विकास से 3 सिमकार्ड मंगवा लिए. एक सिमकार्ड ममता को दे कर मनोज और एक सर्राफ का नंबर दे कर उन्हें फंसाने को कहा. ममता ने पहले सर्राफ को मिस्डकाल मारी. सर्राफ ने कोई जवाब नहीं दिया. इस तरह वह फंसने से बच गया. इस के बाद मनोज को मिस्डकाल मारी तो वह आसानी से उस के जाल में फंस गया. सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से हुआ था. रुपयों के लालच में ममता ने मनोज को फांस लिया था. 18 फरवरी को जब मनोज के साथ उस का देहरादून घूमने का प्रोग्राम बना तो 17 फरवरी को ही वह मेरठ पहुंच गई. विनय त्यागी और उस के साथी उसे लेने आए थे. जागृति विहार में बैठ कर सभी ने आगे की योजना बनाई.

दरअसल, विनय त्यागी का एक ठिकाना जागृति विहार में भी था. दोपहर बाद वे ममता को कार से बाईपास पर छोड़ गए, जहां से मनोज ने उसे अपनी इनोवा गाड़ी में बैठा लिया. मनोज को अंदाजा भी नहीं था कि वह आफत में फंसने जा रहा है. इस के बाद ममता लगातार सारी जानकारी वाट्सऐप के जरिए विनय और उस के साथियों को देती रही.

रात में मनोज के सोने के बाद उस ने हरी झंडी दे दी तो देर रात विनय अपने साथियों के साथ फार्महाउस पर पहुंच गया. ममता ने सारे दरवाजे पहले ही खोल दिए थे. वे अंदर आए तो मनोज सो रहा था. उन्होंने मारपीट कर के उसे कब्जे में ले लिया और निकल गए. उन्होंने उसे नशे का इंजेक्शन लगा कर उस का मोबाइल बंद कर दिया था. अपहर्त्ताओं ने फिरौती के लिए मनोज की उस के घर वालों से बात करा कर उसे मारने की धमकी दी तो वे इतने डर गए कि उन्होंने पुलिस का सहयोग नहीं किया. विनय ने मनोज को मुजफ्फरनगर और मेरठ में रखा. वहां से वे रात में हाईवे की ओर ले कर चल दिए. उन्हें लगा कि पुलिस उन के पीछे लग गई है तो पुलिस से बचने के लिए उन्होंने मनोज को छोड़ दिया और ममता को दिल्ली भेज दिया.

ममता सोच रही थी कि उसे देरसवेर रकम मिल जाएगी और वह मजे की जिंदगी बिताएगी. लेकिन उस के पहले ही वह पुलिस के शिकंजे में फंस गई. पुलिस ने ममता समेत अन्य गिरफ्तार आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस टीमें अब मास्टरमाइंड विनय त्यागी की तलाश में जुटी हैं, लेकिन वह भूमिगत हो गया है. पुलिस ने अदालत से उस का गैरजमानती वारंट हासिल कर लिया है. विनय और उस के साथियों की तलाश में कई जगहों पर छापा मारा गया है. लेकिन वे हाथ नहीं लगे हैं.

कथा लिखे जाने तक पुलिस उन की सरगर्मी से तलाश कर रही थी. पुलिस जांच में सामने आया है कि अपहरण के राज को हमेशा के लिए दफन करने के लिए विनय और उस के साथी ममता की हत्या कर देना चाहते थे. आईजी संजय गुंज्याल ने मामले का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को पुरस्कृत करने की घोषणा की है. मनोज ने सकुशल रिहाई का श्रेय देहरादून पुलिस को तो दिया ही, साथ ही अपनी गलतियों को भी स्वीकार किया, क्योंकि अगर वह खूबसूरत लड़की के हुस्न के जाल में न फंसा होता तो यह नौबत कभी न आती. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story Hindi: जिस्म के चारे का बड़ा खिलाड़ी

Crime Story Hindi: प्रौपर्टी डीलर महेंद्र सिंह को बुलाया तो था मकान देखने के लिए, लेकिन उन के फ्लैट पर पहुंचते ही उन्हें कैद कर लिया गया और बदले में उन से 40 लाख रुपए तो वसूले ही गए, मुंह बंद रखने के लिए उन की एक महिला के साथ ब्लू फिल्म भी बना ली गई.

प्रौपर्टी डीलिंग का काम करने वाले महेंद्र सिंह यादव पश्चिमी दिल्ली के नांगलोई इलाके के कमरुद्दीन नगर में रहते थे. वहीं पर उन का औफिस भी था. कमीशन और ज्यादा कमाई के चक्कर में वह दूसरे शहरों की भी प्रौपर्टी की खरीदफरोख्त करा देते थे. 8 दिसंबर, 2015 को वह अपने औफिस में बैठे थे, तभी उन के मोबाइल पर किसी महिला का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘यादवजी, मैं विकासनगर, उत्तम नगर में रहती हूं. मैं अपना मकान बेचना चाहती हूं.’’

पार्टी की ओर से फोन आने पर महेंद्र सिंह खुश हुए. उन्होंने महिला से मकान के बारे में पूरी जानकारी ले ली. महिला ने उसी समय उन से मकान देखने को कहा, लेकिन उस समय उन्हें कहीं और जाना था, इसलिए उन्होंने महिला से कहा कि आज नहीं, फिर कभी आ कर वह मकान देख लेंगे.

अगले दिन यानी 9 दिसंबर को उन के मोबाइल पर महिला का फोन फिर आया. महिला ने कहा, ‘‘यादवजी, दरअसल मुझे पैसों की सख्त जरूरत है, जिस की वजह से मुझे मकान बेचना पड़ रहा है. इसीलिए मैं कह रही हूं कि आप मेरा मकान देख कर जल्द से जल्द बिकवा दें.’’

‘‘मैडम, आप चाह रही हैं कि मकान जल्दी बिक जाए, ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि आजकल प्रौपर्टी के रेट काफी गिर गए हैं. खरीदार जल्दी मिलते नहीं हैं. जैसे ही मुझे टाइम मिलेगा, मैं आप के यहां पहुंच जाऊंगा.’’ महेंद्र सिंह ने कहा.

उसी दिन उस महिला का एक बार फिर फोन आया, लेकिन काम की व्यस्तता की वजह से वह उस का मकान देखने नहीं जा सके. 10 दिसंबर को शाम 5 बजे महिला ने फोन कर के कहा, ‘‘यादवजी, मैं इस समय रणहोला बसस्टाप पर खड़ी हूं. अगर आप अभी आ जाते तो मैं आप के साथ चल कर मकान दिखा देती, मकान देख कर आप चले जाना.’’

महिला के बारबार फोन करने से महेंद्र सिंह को लगा कि शायद उसे पैसों की सख्त जरूरत है, तभी वह मकान बेचने में इतनी जल्दी कर रही है. फिर मकान देखने में हर्ज ही क्या है. जब कोई ग्राहक मिलेगा, उसे मकान का सौदा करा देंगे. यही सोच कर वह अपनी मोटरसाइकिल से रणहौला बसस्टाप की तरफ चल दिए. बसस्टाप पर जो लोग खड़े थे, उन में कई महिलाएं थीं. महेंद्र सिंह महिला को पहचानते नहीं थे, इसलिए उस की पहचान के लिए उन्होंने अपने मोबाइल से उस का नंबर मिलाया तो सामने खड़ी 24-25 साल की एक महिला ने फोन रिसीव कर लिया. वह समझ गए कि यही वह महिला है, जिस ने फोन कर के उन्हें बुलाया है. वह कुछ कहते, महिला खुद ही उन की मोटरसाइकिल के पास आ गई. वह जींस की पैंट और कोट पहने थी.

औपचारिक बातचीत के बाद महिला उन की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठ कर विकासनगर की ओर चलने को कहा. उसे ले कर महेंद्र सिंह दोढाई किलोमीटर गए होंगे कि एक मोटरसाइकिल आ कर उन के बराबर में चलने लगी. उस मोटरसाइकिल पर सवार आदमी की ओर इशारा कर के महिला ने कहा, ‘‘यादवजी, यह मेरे पति आ गए. आप मुझे उतार दीजिए, अब मैं इन के साथ चलूंगी. आप हमारी मोटरसाइकिल के पीछेपीछे आ जाइए.’’

महेंद्र सिंह ने मोटरसाइकिल रोकी तो बराबर में चल रहे युवक ने भी मोटरसाइकिल रोक दी. महिला जा कर युवक की मोटरसाइकिल पर बैठ गई. इस के बाद महेंद्र सिंह उस युवक की मोटरसाइकिल के पीछेपीछे अपनी मोटरसाइकिल से चलने लगे. कई गलियों से निकल कर वह युवक विकासनगर में एक आयुर्वेदिक दवा स्टोर के पास जा कर रुक गया. महेंद्र सिंह भी उसे देख कर वहीं रुक गए. वहीं सड़क किनारे महिला ने उन की मोटरसाइकिल खड़ी करा दी. इस के बाद वह महेंद्र सिंह को एक बिल्डिंग की चौथी मंजिल पर ले गई.

दरवाजे का ताला खोल कर महिला महेंद्र को फ्लैट में ले गई. उस महिला के साथ जो युवक था, वह भी फ्लैट में आ गया था. सोफा पर बैठने के बाद महिला ने महेंद्र सिंह को पानी दिया. वह पानी पी रहे थे कि तभी 3 युवक फ्लैट में आ पहुंचे. आते ही उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया. वे मंकी कैप पहने थे और काले चश्मे लगाए थे. उन युवकों ने महेंद्र सिंह से कपड़े उतारने को कहा. इस पर महेंद्र सिंह चौंके कि वे यह क्या कह रहे हैं? उन्हें तो मकान दिखाने के लिए बुलाया गया था. वह महिला की तरफ देखने लगे. लेकिन वह कुछ नहीं बोली.

महेंद्र सिंह ने डरते हुए उन युवकों से पूछा कि वह उन से कपड़े उतारने को क्यों कह रहे हैं? एक युवक ने कहा, ‘‘हमें तेरे मर्डर की 25 लाख की सुपारी मिली है.’’

‘‘सुपारी..किस ने दी है सुपारी?’’ महेंद्र सिंह ने चौंक कर पूछा.

‘‘तुझे इन बातों से क्या मतलब. तुझ से जितना कहा जा रहा है, उतना कर.’’ कह कर युवकों ने उन की पिटाई शुरू कर दी.

डर की वजह से महेंद्र सिंह ने अपने कपड़े उतार दिए. उन्हें लगा कि किसी साजिश के तहत उन्हें यहां बुलाया गया है. कपड़े उतारने के बाद युवकों ने महेंद्र सिंह के हाथ पीछे कर के बांध दिए. इस के बाद वे उन की लातघूंसों से पिटाई करने लगे. महेंद्र सिंह उन से अपनी जान बख्शने के लिए गिड़गिड़ा रहे थे.

‘‘हम तेरी जान बख्श देंगे, लेकिन उस के बदले हमें 50 लाख रुपए चाहिए.’’ एक युवक ने कहा.

‘‘यह तो बहुत ज्यादा हैं, इतने पैसे मेरे पास नहीं है.’’ महेंद्र सिंह ने कहा.

युवकों ने तमंचे निकाल कर उन के सामने उन में गोलियां भरीं. इस के बाद दाईं और बाईं ओर पेट पर सटा दिया, एक अन्य युवक ने चाकू निकाल कर पेट के बीचोबीच लगा दिया. इस से महेंद्र और घबरा गए. उन के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था. उन लोगों ने महेंद्र सिंह का मोबाइल, जो उन्होंने अपने कब्जे में ले रखा था, उन्हें देते हुए कहा, ‘‘अब तुम अपने घर वालों को फोन कर के कहो कि तुम एक प्लौट देखने हरिद्वार जा रहे हो, वहां से 2 दिन बाद लौटोगे.’’

डर की वजह से महेंद्र सिंह ने पत्नी को फोन कर के वैसा ही कह दिया, जैसा वे लोग कहलवाना चाहते थे. इस के बाद उन्होंने उन के पैर बांध कर फर्श पर नंगा छोड़ दिया. कड़ाके की सर्दी में महेंद्र सिंह फर्श पर पड़े थे. जब वह ठंड से कांपने लगे तो महिला ने उन के ऊपर कंबल डाल दिया. अगले दिन उन लोगों ने कहा, ‘‘अब तू यह बता कि तुझे पैसे कौन दे सकता है? जो लोग तुझे 50 लाख रुपए दे सकते हों, उन्हें अभी फोन करो.’’

महेंद्र सिंह परेशान थे कि वह पैसों के लिए किस से बात करें. घर पर भी इतने पैसे नहीं थे. पत्नी इतनी बड़ी रकम का इंतजाम नहीं कर सकती थी. लिहाजा उन्होंने अपने दोस्त तिलक को फोन किया. लेकिन तिलक ने उन का फोन रिसीव ही नहीं किया. उन की घबराहट बढ़ गई. इस के बाद उन्होंने अपने साले रमेश को फोन किया. उन्होंने रमेश से कहा, ‘‘मैं ने हरिद्वार में 50 लाख रुपए में 600 वर्गगज के प्लौट का सौदा किया है. तुम इतने पैसों का इंतजाम कर लो. मैं इस समय घर नहीं आ सकता. जैसे ही पैसों का इंतजाम हो जाए, बता देना. मैं किसी से मंगा लूंगा.’’

रमेश ने सोचा कि कोई अच्छा प्लौट होगा, तभी तो उन्होंने जल्दी से उस का सौदा कर लिया है. उन के पास भी इतने पैसे नहीं थे. इसलिए इधरउधर से इंतजाम कर के उन्होंने 40 लाख रुपए जुटा लिए. दोपहर एकडेढ़ बजे के करीब उन्होंने महेंद्र सिंह को फोन कर के कहा, ‘‘जीजाजी, 40 लाख रुपए का इंतजाम हो गया है. बताओ हरिद्वार में पैसे ले कर कहां आना है.’’

‘‘नहीं, पैसे ले कर तुम मत आओ. ऐसा करो, ये पैसे मेरे दोस्त राजेश के पास पहुंचा दो. वह मेरे पास पहुंचा देगा.’’ महेंद्र ने कहा.

रमेश निलोठी मोड़, नांगलोई के रहने वाले राजेश को जानते थे, इसलिए एक सफेद रंग के बैग में पैसे रख कर राजेश के पास पहुंचा दिए. उधर महेंद्र ने राजेश को फोन कर के पहले ही कह दिया था कि उस का साला उसे कुछ पैसे देने आएगा. उन पैसों को वह अपने पास रख लेंगे. किसी को भेज कर वह उस से पैसे मंगा लेगा. रमेश ने राजेश को जैसे ही पैसे दिए, राजेश ने महेंद्र को फोन कर दिया. उन लोगों के कहने पर महेंद्र ने राजेश को फोन किया, ‘‘राजेश, मैं एक लड़के को पैसे लेने के लिए भेज रहा हूं. तुम उसे कुंवर सिंह नगर में पुलिस बूथ के पास मिलना. वह युवक मेरी मोटरसाइकिल ले कर आएगा. उसे पैसे दे देना.’’

यह बातचीत हो जाने के बाद उन लोगों में से एक महेंद्र सिंह की मोटरसाइकिल ले कर कुंवर सिंह नगर में पुलिस बूथ के पास पहुंच गया. महेंद्र की मोटरसाइकिल पहचान कर राजेश उस युवक के पास पहुंच गए. बातचीत में उस युवक ने बता दिया कि उसे महेंद्र सिंह ने पैसे लेने के लिए भेजा है. इतनी मोटी रकम एक अनजान युवक को देने की राजेश की हिम्मत नहीं हो रही थी.  पुष्टि के लिए राजेश ने उसी समय महेंद्र को फोन किया. महेंद्र के हां कहने के बाद राजेश ने 40 लाख रुपए से भरा बैग उस युवक को दे दिया. पैसे ले कर वह युवक विकास नगर के उसी फ्लैट में लौट आया.

दूसरे कमरे में जा कर सब से पहले उन युवकों ने पैसे गिने. वे पूरे 40 लाख ही निकले. महेंद्र सिंह को उम्मीद थी कि पैसे लेने के बाद वे लोग उन्हें छोड़ देंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. मकान दिखाने के बहाने जो महिला उन्हें बुला कर लाई थी, उस ने उन के सामने अपने सारे कपड़े उतार दिए. महेंद्र सिंह ने अपनी नजरें झुका लीं. वह समझ नहीं पा रहे थे कि महिला ऐसा क्यों कर रही है. महेंद्र सिंह भी नग्नावस्था में थे.

इस के बाद एक युवक ने महेंद्र से कहा, ‘‘अब तुम इस के साथ वैसा ही करो, जैसा पत्नी के साथ करते हो.’’

45 साल के महेंद्र यह सुन कर हैरान रह गए. उन्होंने कहा, ‘‘आप लोगों को पैसे तो मिल ही गए हैं, फिर यह सब क्यों करा रहे हो?’’

इतना कहते ही एक युवक उन की पिटाई करने लगा. डर की वजह से महेंद्र को वह सब करना पड़ा, जो उन लोगों ने चाहा. उन युवकों ने अपनेअपने मोबाइल फोन से इस सब की उन की फिल्म बना ली थी. फिल्म बनाने के बाद उन्होंने महेंद्र सिंह को धमकी दी कि अगर उन्होंने यह बात पुलिस को बताई तो वे यह ब्लू फिल्म उन के सारे रिश्तेदारों को भेज देंगे, तब वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा. उन्होंने कहा कि पुलिस तो दूर, अपने घर में भी वह किसी को कुछ नहीं बताएगा.

रात करीब 8-9 बजे 2 युवक महेंद्र सिंह को उन की मोटरसाइकिल पर बिठा कर गलियों में होते हुए विकासपुरी के गंदे नाले के पास ले गए. उन्होंने महेंद्र सिंह को वहीं उतार दिया और कहा कि थोड़ी दूर आगे उन की मोटरसाइकिल सड़क किनारे खड़ी मिल जाएगी, वहां से उसे ले कर वह घर चले जाएंगे. पिटाई की वजह से महेंद्र सिंह के शरीर में दर्द हो रहा था, इस के बावजूद वह पैदल चल दिए. करीब 500 मीटर दूर चलने पर उन्हें सड़क किनारे मोटरसाइकिल खड़ी मिल गई तो वह उसे ले कर अपने घर पहुंचे.

हरिद्वार में प्लौट खरीद कर पति को खुश होना चाहिए था, लेकिन वह उस समय ऐसे दुखी थे, जैसे उन्हें कोई भारी नुकसान हुआ हो. पत्नी ने महेंद्र से दुखी होने की वजह जाननी चाही, पर उन्होंने पत्नी को कुछ नहीं बताया. उन बदमाशों ने उन्हें इतना डरा दिया था कि वह पत्नी को भी अपने साथ हुए हादसे के बारे में बताने से डर रहे थे. 12 दिसंबर की रात दर्द की वजह से उन का सारा शरीर दुख रहा था. जब उन से नहीं रहा गया तो उन्होंने पत्नी को सारी बात बता दी. पति के साथ इतनी बड़ी घटना घट गई और 40 लाख रुपए भी चले गए, भला पत्नी इस बात को कैसे छिपा सकती थी. उस ने तुरंत अपने भाई रमेश को यह खबर दे दी.

चूंकि 40 लाख रुपए रमेश के हाथ से गए थे, इसलिए उन्हें भी विश्वास हो गया कि उस के बहनोई को साजिश के तहत फांस कर यह खेल खेला गया है. रमेश ने महेंद्र को समझाया कि वह इस की शिकायत पुलिस से करें, वरना वे बदमाश उस ब्लू फिल्म के जरिए उन्हें आगे भी ब्लैकमेल करते रहेंगे. इस के बाद महेंद्र सिंह 16 दिसंबर, 2015 को शाम के समय थाना उत्तमनगर पहुंचे और थानाप्रभारी को अपने साथ हुए हादसे से अवगत करा दिया. महेंद्र सिंह यादव की शिकायत पर थानाप्रभारी ने अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 342/384/506/323/34 के तहत मामला दर्ज कर जांच सबइंसपेक्टर प्रताप सिंह को सौंप दी.

प्रताप सिंह ने इस मामले की जांच शुरू कर दी. वह विकासनगर में उस फ्लैट पर गए, जहां महेंद्र सिंह को रखा गया था. मकान मालिक ने बताया कि यह फ्लैट उस ने एक दंपति को किराए पर दिया था. वे इसे खाली कर के कहां चले गए, इस का उसे पता नहीं. इतनी बड़ी दिल्ली में बिना नाम व फोटो के उन्हें तलाश करना आसान नहीं था. फिर भी जांच अधिकारी ने उन बदमाशों की अपने स्तर से पता लगाने की कोशिश की, पर उन का पता नहीं चला. अंत में वह चुप मार कर बैठ गए. 2 महीने बीत जाने के बाद भी महेंद्र सिंह को अपने केस में काररवाई होती नहीं नजर आई तो उन्होंने जांच अधिकारी प्रताप सिंह से मुलाकात की. इस के बाद भी नतीजा कुछ नहीं निकला. जांच में कोई उन्नति नहीं हुई.

महेंद्र सिंह के एक दोस्त की दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल के डीसीपी संजीव कुमार यादव से जानपहचान थी. उन्होंने महेंद्र सिंह की मुलाकात डीसीपी से करा कर उन के साथ घटी घटना के बारे में बताया. घटना के बारे में सुन कर डीसीपी को लगा कि यह काम किसी गैंग का है. उन्होंने एसीपी निशांत गुप्ता के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर अतर सिंह, एसआई रमेश डबास, राकेश कुमार, संदीप कुमार, एएसआई संजय, हैडकांस्टेबल संजीव, कांस्टेबल परवेज आलम, विकास, संदीप आदि को शामिल किया.

टीम ने सब से पहले डोजियर सेल और अन्य माध्यमों से यह पता लगाना शुरू किया कि पहले इस तरह की दिल्ली में जो घटनाएं घटी हैं, उन में कौन लोग शामिल रहे थे और इस समय वे जेल में हैं या जेल से बाहर हैं. इस जांच में यह जानकारी मिली कि संदीप, अजय, रमेश तिवारी और 2 लड़कियों ने झज्जर (हरियाणा) निवासी प्रौपर्टी डीलर महा सिंह को इसी तरह प्रौपर्टी दिखाने के बहाने दिल्ली बुलाया और उन्हें अपने जाल में फांस कर उन से 9 लाख रुपए ऐंठ लिए थे. इस मामले की रिपोर्ट कंझावला थाने में दर्ज हुई थी.

इसी तरह दिल्ली के मुंडका निवासी बिजनेसमैन प्रकाश को कुछ लोगों ने 25 लाख की फिरौती के लिए अपहरण कर लिया था. बाद में 3 लाख फिरौती वसूल कर के उन्हें छोड़ दिया गया था. इस में भी उन्हीं लोगों के नाम सामने आए थे. इसी घटना की तरह झज्जर के ही दूसरे प्रौपर्टी डीलर रविंद्र सिंह को भी गिरोह ने अपने जाल में फांस कर उन से 7 लाख रुपए ऐंठे थे. इस घटना में भी संदीप दलाल, रमेश तिवारी के अलावा एक लड़की का नाम सामने आया था. इस केस में भी बदमाशों ने लड़की के साथ रविंद्र सिंह के अश्लील फोटो खींचे थे. इस की रिपोर्ट दिल्ली के रोहिणी (दक्षिण) थाने में 20 जनवरी, 2014 को दर्ज हुई थी.

महेंद्र सिंह के साथ जो घटना घटी थी, वह इन घटनाओं से पूरी तरह से मेल खा रही थी. जांच टीम ने जब इन घटनाओं में शामिल रहे लोगों के बारे में पता लगाया तो जानकारी मिली कि ये लोग जेल से जमानत पर छूटे हुए हैं. ये सभी नांगलोई इलाके के ही रहने वाले थे. पुलिस ने इन के घरों पर छापे मारे तो ये सभी अपनेअपने घरों से फरार मिले. पुलिस ने फरार बदमाशों के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की तो एक नंबर ऐसा मिला, जो रमेश तिवारी, अजय और संदीप के संपर्क में था. वह नंबर अरविन का था और वह नांगलोई के कुंवर सिंह नगर में रहता था.

पुलिस ने 6 मार्च, 2016 को अरविन के यहां छापा मार कर उसे हिरासत में ले लिया. औफिस में ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि महेंद्र सिंह के साथ जो वारदात हुई थी, उस में वह शामिल था. उस ने बताया कि इस वारदात का मास्टरमाइंड संदीप दलाल था. इस के अलावा नकाबपोश लोग कौन थे, इस की उसे जानकारी नहीं थी, क्योंकि उन की व्यवस्था खुद संदीप दलाल ने की थी. अरविन ने बताया था कि नांगलोई में उस की स्पेयर पार्ट्स बनाने की फैक्ट्री थी, जो किसी वजह से घाटा होने पर बंद करनी पड़ी थी. वह पैसेपैसे के लिए मोहताज था. कुछ दिनों पहले उस की मुलाकात नांगलोई के ही रहने वाले संदीप दलाल से हुई तो पैसों के लालच में वह उस के साथ ब्लैकमेलिंग के धंधे में शामिल हो गया.

इस धंधे में हुई कमाई से उस ने एक मारुति स्विफ्ट डिजायर कार खरीदी थी. पुलिस ने उस की निशानदेही पर उस की मरुति स्विफ्ट डिजायर कार बरामद कर ली थी. पुलिस को जानकारी मिली है कि महेंद्र के साथ हुई वारदात में संदीप दलाल, आकाश उर्फ सन्नी, रमेश तिवारी आदि भी शामिल थे. अरविन को गिरफ्तार करने की सूचना स्पैशल सेल औफिस से थाना उत्तमनगर पुलिस को मिल गई थी. 7 मार्च को स्पैशल सेल के एसआई संदीप कुमार ने अरविन को न्यायालय में पेश किया तो वहां मौजूद उत्तमनगर पुलिस ने अरविन को पूछताछ के लिए 2 दिनों की पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि में पूछताछ करने के बाद उसे फिर से न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया था.

कथा लिखे जाने तक अन्य अभियुक्त पुलिस की पकड़ में नहीं आ सके थे. इन के गिरफ्तार होने के बाद ही पता चल सकेगा कि इन लोगों ने कितने लोगों को हनीट्रैप में फांसा और उन से कितने रुपए ऐंठे. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP Crime: उजड़ गया आशियाना – बाप बना कातिल

UP Crime: गांवों में आज भी ज्यादातर घरों में दिन ढलते ही रात का खाना बन जाता है. शाम के यही कोई साढ़े 6 बजे खाना खा कर सुरेंद्र सोने के लिए जानवरों के बाड़े में चला गया था. उस के जाने के बाद सुरेंद्र की पत्नी ममता, बेटा कुलदीप, दीपक, रतन और बहू प्रभा खाना खाने की तैयारी करने लगी थी. सभी खाने के लिए बैठने जा रहे थे कि तभी प्रभा के पिता फूल सिंह पाल, चाचा रामप्रसाद, भाई लाल सिंह उस के मौसेरे भाई टुंडा के साथ उन के यहां आ पहुंचे.

किसी के हाथ में कुल्हाड़ी थी तो कोई चापड़ लिए था तो कोई डंडा. उन्हें इस तरह आया देख कर घर के सभी लोग समझ गए कि इन के इरादे नेक नहीं हैं. वे कुछ कर पाते, उस से पहले ही उन्होंने प्रभा को पकड़ा और कुल्हाड़ी से उस की हत्या कर दी. प्रभा की सास ममता बहू को बचाने के लिए दौड़ी तो हमलावरों ने उसे भी कुल्हाड़ी से काट डाला.

ममता प्रभा की 9 महीने की बेटी को लिए थी, हत्यारों ने उसे छीन कर एक ओर फेंक दिया था. 2 लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद हमलावरों ने कुलदीप को पकड़ कर जमीन पर गिरा दिया. कुलदीप जान की भीख मांगने लगा तो फूल सिंह ने कहा, ‘‘कुलदीप, तुझे हम जान से नहीं मारेंगे, तुझे तो अपाहिज बना कर छोड़ देंगे, ताकि तू उम्र भर चलने को तरसे और अपनी बरबादी पर रोता रहे.’’

इतना कह कर फूल सिंह ने कुलदीप के दोनों पैर कुल्हाड़ी से काट दिए. सुरेंद्र की बुआ श्यामा और छोटेछोटे बच्चे चीखतेचिल्लाते रहे और गांव वालों से मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन गांव का कोई भी उन की मदद को नहीं आया. लोग अपनीअपनी छतों पर खड़े हो कर इस वीभत्स नजारे को देखते रहे.

कुछ ही देर में इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दे कर जिस तरह हमलावर आए थे, उसी तरह फरार हो गए. सुरेंद्र का घर खून से डूब गया था. 2 महिलाओं की खून से लथपथ लाशें पड़ी थीं, जबकि कुलदीप दर्द से तड़प रहा था. हमलावरों के जाने के बाद गांव वाले जुटने शुरू हुए. खबर सुन कर सुरेंद्र और उस के मातापिता, भाई, चाचा आदि आ गए. लोमहर्षक नजारा देख कर वे सन्न रह गए.

सुरेंद्र ने पुलिस चौकी साढ़ को फोन कर के इस घटना की सूचना दी. सूचना मिलते ही चौकीप्रभारी वीरेंद्र प्रताप यादव घटना की सूचना कोतवाली घाटमपुर को दे कर हेडकांस्टेबल अरविंद तिवारी, कांस्टेबल रईस अहमद, भीम प्रकाश, प्रवेश मिश्रा, संजय कुमार के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

घटना की सूचना पा कर कोतवाली घाटमपुर के प्रभारी गोपाल यादव और सीओ जे.पी. सिंह गांव ढुकुआपुर के लिए चल पड़े थे. ढुकुआपुर से पुलिस चौकी 8 किलोमीटर दूर थी इसलिए पुलिस टीम को वहां पहुंचने में पौन घंटा लग गया. 3 लोगों को खून में लथपथ देख कर पुलिस हैरान रह गई. देख कर ही लग रहा था कि कि यह सब दुश्मनी की वजह से हुआ है.

2 महिलाओं की मौत हो चुकी थी. कुलदीप दर्द से तड़प रहा था. पुलिस ने कुलदीप को स्वरूपनगर के एसएनआर अस्पताल भिजवाया. सूचना मिलने पर एसपी (देहात) अनिल मिश्रा भी वहां आ गए थे. पुलिस अधिकारियों ने आसपास के लोगों से घटना के बारे में जानना चाहा, लेकिन पुलिस के सामने किसी ने मुंह नहीं खोला. लोग अलगअलग बहाने बना कर वहां से खिसकने लगे. पुलिस समझ गई कि डर या किसी अन्य वजह से लोग कुछ भी बताने से कतरा रहे हैं.

हमलावरों ने सुरेंद्र की पत्नी ममता और बहू प्रभा की हत्या कर दी थी, जबकि बेटे कुलदीप के दोनों पैर काट दिए थे. पुलिस ने जब सुरेंद्र से पूछताछ की तो उस ने बताया कि यह सब कुलदीप की ससुराल वालों ने किया है. पुलिस ने सुरेंद्र पाल की ओर से फूल सिंह, उस के बेटे, भाई रामप्रसाद पाल, लाल सिंह, टुंडा उर्फ मामा और रामप्रसाद उर्फ छोटे के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 307, 452, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए कानपुर भिजवा दिया था.

इस लोमहर्षक कांड के बाद गांव में दहशत फैल गई थी. गांव वाले दबी जुबान से तरहतरह की बातें कर रहे थे. एसएसपी यशस्वी यादव ने सीओ जे.पी. सिंह को निर्देश दिए कि वह जल्द से जल्द हमलावरों को गिरफ्तार करें. सीओ ने तुरंत ही प्रभारी निरीक्षक गोपाल यादव और चौकीप्रभारी वीरेंद्र प्रताप यादव के नेतृत्व में 2 टीमें गठित कीं.

पहली टीम में एसआई अखिलेश मिश्रा, कांस्टेबल धर्मेंद्र सिंह, प्रवेश बाबू और इरशाद अहमद को शामिल किया गया, जबकि दूसरी टीम में हेडकांस्टेबल अरविंद तिवारी, कांस्टेबल रईस अहमद, अजय कुमार यादव और भीम प्रकाश को भी शामिल किया गया. चूंकि आरोपी अपने घरों से फरार थे, इसलिए पुलिस टीमें उन की तलाश में संभावित जगहों पर छापे मारने लगीं. आखिर सुबह होतेहोते पुलिस को सफलता मिल ही गई. पुलिस ने फूल सिंह, लाल सिंह और रामप्रसाद उर्फ छोटे को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उन से पूछताछ की गई तो इस खूनी तांडव की जो कहानी सामने आई, वह प्यार की प्रस्तावना पर लिखी हुई थी.

उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर की एक तहसील है घाटमपुर. यहां से लगभग 50 किलोमीटर दूर बसा है एक गांव ढुकुआपुर. इस गांव में वैसे तो सभी जाति के लोग रहते हैं, लेकिन गड़रियों की संख्या कुछ ज्यादा है. इसी गांव में सुरेंद्र सिंह पाल भी अपने परिवार के साथ रहता था. वैसे सुरेंद्र पाल का पुश्तैनी मकान गांव के बीचोंबीच था, लेकिन भाइयों में जब बंटवारा हुआ तो वह गांव के बाहर खाली पड़ी जमीन पर मकान बना कर रहने लगा.

सुरेंद्र के परिवार में पत्नी ममता के अलावा 3 बेटे, कुलदीप, दीपक और करण थे. कुलदीप पढ़ाई के साथ पिता के काम में भी हाथ बंटाता था.  सुरेंद्र के पड़ोस में ही फूल सिंह पाल का परिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे और 1 बेटी प्रभा थी. प्रभा और कुलदीप एक ही स्कूल में पढ़ते थे. दोनों आसपास ही रहते थे, इसलिए स्कूल भी साथसाथ आतेजाते थे. दोनों साथसाथ खेलते और पढ़ते हुए जवान हुए तो उन की दोस्ती प्यार में कब बदल गई, उन्हें पता ही नहीं चला.

कुलदीप और प्रभा का प्यार कुछ दिनों तक तो चोरीछिपे चलता रहा, लेकिन वह इसे ज्यादा दिनों तक लोगों की नजरों से छिपा न सके. वैसे भी प्यार कहां छिप पाता है. दोनों के प्रेमसंबंधों की बात गांव के लोगों तक पहुंची तो लोग उन के बारे में चटखारे ले ले कर बातें करने लगे.

गांव वालों से होते हुए यह बात किसी तरह प्रभा और कुलदीप के घर वालों के कानों तक पहुंची तो फूल सिंह ने पत्नी रानी से बात कर के प्रभा पर पाबंदी लगा दी कि वह घर के बाहर अकेली नहीं जाएगी. कहते हैं, बंदिशें लगाने से मोहब्बत और बढ़ती है. प्रभा की कुलदीप से मुलाकात भले ही नहीं हो पा रही थी, लेकिन फोन के जरिए बात होती रहती थी.

चूंकि उन्होंने पहले से ही तय कर लिया था कि वे प्यार में आने वाली हर रुकावट का विरोध करेंगे, इसलिए वे बगावत पर उतर आए. जमाने की परवाह किए बगैर अपने प्यार को मंजिल तक पहुंचाने के लिए वे जनवरी, 2012 में अपनेअपने घरों को छोड़ कर हरियाणा के गुड़गांव शहर चले गए. गुड़गांव में कुलदीप का एक दोस्त रहता था. कुलदीप ने उसी की मदद से आर्यसमाज रीति से प्रभा के साथ विवाह भी कर लिया. दोस्त की मदद से उसे दिल्ली की एक फैक्ट्री में नौकरी भी मिल गई. इस के बाद कुलदीप दिल्ली में किराए पर कमरा ले कर प्रभा के साथ रहने लगा.

प्रभा के इस तरह भाग जाने से फूल सिंह की बहुत बदनामी हुई. उस ने 16 जनवरी, 2012 को थाना घाटमपुर में कुलदीप के खिलाफ प्रभा को बरगला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. रिपोर्ट में उस ने प्रभा को नाबालिग बताया था. मामला नाबालिग लड़की का था, इसलिए पुलिस ने सुरेंद्र पाल और उस के परिवार वालों पर शिकंजा कसा. मजबूरन कुलदीप को वापस जाना पड़ा.

चूंकि कुलदीप के खिलाफ पहले से रिपोर्ट दर्ज थी, इसलिए पुलिस ने कुलदीप को गिरफ्तार कर के पूछताछ की. प्रभा का मैडिकल परीक्षण कराया. मैडिकल में प्रभा की उम्र 18 साल से ऊपर निकली. वह संभोग की अभ्यस्त पाई गई.  प्रभा ने कुलदीप की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए कहा था कि उस ने कुलदीप के साथ अपनी मरजी से जा कर शादी की थी. प्रभा ने सुबूत के तौर पर अपने और कुलदीप के शादी के फोटो भी दिखाए. लेकिन पुलिस ने उस की एक न सुनी और कुलदीप को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया.

मजिस्ट्रेट के सामने प्रभा के बयान कराए गए तो प्रभा ने वही सब कहा जो उस ने पुलिस के सामने चीखचीख कर कहा था. प्रभा के बयान और उस के बालिग होने की रिपोर्ट के मद्देनजर मजिस्ट्रेट ने प्रभा को उस की मरजी के अनुसार जहां और जिस के साथ जाने व रहने की इजाजत दे दी.

अदालत के फैसले के बाद प्रभा ने अपने घर के बजाय सासससुर के साथ जाने की इच्छा जताई तो पुलिस ने उसे कुलदीप के घर पहुंचा दिया. बेटी के इस फैसले से फूल सिंह और उस के धर वालों ने बड़ी बेइज्जती महसूस की. कुछ दिनों बाद कुलदीप भी छूट कर घर आ गया. माहौल खराब न हो, इसलिए कुलदीप प्रभा को ले कर फिर से दिल्ली चला गया. जनवरी, 2013 में प्रभा ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने शिवानी रखा.

समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा. शिवानी भी 9 महीने की हो गई. अपने मातापिता से भी कुलदीप के संबंध ठीक हो गए थे. वह अकसर घर वालों से फोन पर बातचीत करता रहता था. लेकिन फूल सिंह ने बेटी से हमेशा के लिए संबंध खत्म कर लिए थे. कुलदीप बेटी का मुंडन संस्कार कराना चाहता था, इसलिए घर वालों से बात कर के वह पत्नी और बेटी को ले कर 9 अक्तूबर, 2013 को अपने गांव ढुकुआपुर आ गया.

सुरेंद्र पाल ने मुंडन संस्कार की सारी तैयारियां पहले से ही कर रखी थीं. 10 अक्तूबर को बड़ी धूमधाम से शिवानी का मुंडन संस्कार हुआ. प्रभा के मातापिता ने कुलदीप को अपना दामाद स्वीकार नहीं किया था. वह कुलदीप से खुंदक खाए बैठा था. इसलिए सुरेंद्र ने मुंडन कार्यक्रम में फूल सिंह और उस के परिवार वालों को नहीं बुलाया था.

गांव वाले मुंडन की दावत खा कर जब लौट रहे थे तो तरहतरह की बातें कर रहे थे. वे बातें फूल सिंह ने सुनीं तो उस का खून खौल उठा. उस ने उसी समय कुलदीप और उस के घर वालों को सबक सिखाने का निश्चय कर लिया. इस बारे में उस ने मोहद्दीपुर थाना बकेवर में रहने वाले अपने भाई रामप्रसाद से सलाह- मशविरा कर के उसे भी शामिल कर लिया. अब इंतजार था, सुरेंद्र के मेहमानों के चले जाने का. 13 अक्तूबर को उस के यहां से सभी मेहमान चले गए. केवल सुरेंद्र की बुआ श्यामा रह गई थीं.

14 अक्तूबर, 2013 की शाम सुरेंद्र खाना खा कर घर से करीब 50 मीटर दूर जानवरों के बाड़े में सोने चला गया. उस की पत्नी ममता बच्चों को खाना खिलाने की तैयारी कर रही थी तभी फूल सिंह, लाल सिंह, रामप्रसाद आदि कुल्हाड़ी, चापड़ और डंडे ले कर सुरेंद्र के घर में दाखिल हुए.

घर वाले कुछ समझ पाते उस से पहले उन्होंने प्रभा की हत्या की, क्योंकि उसी की वजह से समाज में उन की नाक कटी थी. ममता बहू को बचाने आई तो उन्होंने उसे भी काट डाला. उस के बाद कुलदीप के दोनों पैर काट दिए. इतना सब कर के वे फरार हो गए. पुलिस ने फूल सिंह, लाल सिंह, रामप्रसाद उर्फ छोटे पाल से पूछताछ कर के सभी को जेल भेज दिया.

पुलिस ने टुंडा उर्फ मामा से पूछताछ करने के बाद उसे छोड़ दिया. पुलिस का कहना था कि उस का एक हाथ कटा था. एक हाथ से वह किसी पर हमला नहीं कर सकता. दूसरे पुलिस जब उस के घर फरीदपुर पहुंची तो वह घर पर ही सोता मिला था. अगर वह हत्या जैसे जघन्य अपराध में शामिल होता तो अन्य हमलावरों की तरह वह भी घर से फरार होता. वह आराम से अपने घर में नहीं सो रहा होता.

उधर सुरेंद्र का कहना है कि टुंडा घटना में शामिल था. पुलिस ने जानबूझ कर उसे छोड़ दिया. सच्चाई जो भी हो, इस लोमहर्षक कांड ने यह तो साबित कर दिया है कि लोग खुद को कितना भी आधुनिक कहें, लेकिन अभी उन की सोच नहीं बदली है. अगर फूल सिंह बेटी की पसंद को स्वीकार कर लेता तो उसे इस जघन्य अपराध के आरोप में जेल न जाना पड़ता. कथा लिखे जाने तक कुलदीप अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्र और जनचर्चा पर आधारित

UP Crime: बेटी के प्यार में विलेन बने पापा

UP Crime: उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले का एक थाना है नौहझील. इस थाना क्षेत्र के गांव अड्डा मीना फिरोजपुर निवासी बदन सिंह उर्फ बलवीर सिंह ने 25 जनवरी, 2023 को अपनी 17 वर्षीय बेटी अनन्या को गांव के ही युवक रामगोपाल उर्फ गोपाल द्वारा भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. रिपोर्ट में बदन सिंह ने आरोप लगाया था कि 22 जनवरी को उन की बेटी अनन्या पशुओं के लिए चारा लेने खेत पर गई थी. उन के गांव का ही रहने वाला रामगोपाल उर्फ गोपाल उन की बेटी को वहां से बहलाफुसला कर अपने साथ भगा ले गया.

पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने के बाद आरोपी गोपाल को 27 जनवरी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. लेकिन अनन्या का कोई पता नहीं चल सका. इस के बाद भी पुलिस उस की तलाश में जुटी रही. अनन्या की तलाश में पुलिस ने हर उस जगह दबिश दी, जहां उस के होने की संभावना थी.

मुखबिर ने दी पुलिस को जानकारी

अनन्या की तलाश में जुटी नौहझील पुलिस को मुखबिर ने सूचना दी कि उस की हत्या की जा चुकी है. अब पुलिस के सामने प्रश्न यह था कि अनन्या 22 जनवरी को अपने प्रेमी के साथ गई थी. 25 जनवरी को रिपोर्ट दर्ज होने के बाद 27 जनवरी को रामगोपाल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया तो उस के जेल जाने के बाद अनन्या की हत्या किस ने, कब और कहां की? पुलिस को यह भी शक हो रहा था कि प्रेमी गोपाल के जेल चले जाने से दुखी अनन्या ने कहीं आत्महत्या तो नहीं कर ली?

लेकिन बाद में मुखबिर ने पुलिस को यह भी सूचना दी कि अनन्या की हत्या उस के पापा बदन सिंह और चाचा ने षडयंत्र के तहत मिल कर की है. वे लोग अब अपने घर पर बेफिक्र हो कर बैठे हुए हैं. मुखबिर से मिली सूचना के बाद पुलिस ने अनन्या के पापा बदन सिंह उर्फ बलवीर व चाचा तेजपाल को थाने बुलाया. उन से पूछताछ की गई.

दोनों ने बताया कि वे पलवल में अनन्या के होने की सूचना पर उस की तलाश में गए थे. लेकिन वहां काफी तलाश करने के बाद भी वह नहीं मिली. इस के बाद वह वापस गांव आ गए. अनन्या के बारे में सही जानकारी रामगोपाल ही दे सकता है. पलवल से वापस आने के बाद गांव वालों को भी दोनों भाइयों ने यही बात बताई कि अनन्या का कोई सुराग नहीं मिला.

पलवल जाने के बाद बंद कर दी तलाश

पुलिस को जांच में पता चला कि अनन्या की तलाश में घर वाले पलवल गए जरूर थे, लेकिन इस के बाद उन्होंने उस की तलाश बंद कर दी है. इस जानकारी के मिलने के बाद एसएचओ धर्मेंद्र भाटी ने बलवीर व तेजपाल दोनों की कल डिटेल्स निकलवाई, जिस से हत्या का राज खुल गया. सबूत मिलने के बाद दोनों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. जब पुलिस ने दोनों से सख्ती से पूछताछ की तो वे अपने गुनाह को ज्यादा देर तक छिपा नहीं सके. दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

दोनों ने बताया कि उन्होंने अनन्या की हत्या कर लाश अलीगढ़ की शिवाला नहर में फेंक दिया था. इस संबंध में पुलिस ने तहकीकात की तो पता चला कि अलीगढ़ जिले के थाना गोंडा पुलिस ने 31 जनवरी, 2023 को एक लडक़ी का शव बरामद किया था. पुलिस दोनों को थाना गोंडा ले गई. वहां लाश के फोटो और कपड़ों के आधार पर अनन्या के रूप में कर ली. इस के बाद उन्होंने अनन्या की हत्या किए जाने की बेहद चौंकाने वाली कहानी बताई—

अनन्या ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही था कि उसी दौरान उस की मुलाकात रामगोपाल से हुई. उसी के गांव का रहने वाला 22 वर्षीय रामगोपाल उर्फ गोपाल एक निजी टेलीकाम कंपनी में काम करता है. गांव में आतेजाते समय अनन्या और रामगोपाल की नजरें अकसर मिल जातीं. अनन्या मुसकरा कर नजरें झुका लेती. गोपाल को अनन्या की यह अदा भा गई. उस दिन के बाद से दोनों जब तक एकदूसरे को देख नहीं लेते, उन के दिलों को चैन नहीं मिलता था.

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दोनों के बीच हुई दोस्ती

दोनों के बीच मौन प्यार चल रहा था. रामगोपाल को अनन्या ने अपने मौन प्यार के बंधन में पूरी तरह बांध लिया था. आखिर एक दिन जब रास्ते में जाते हुए अनन्या मिली तो मौका देख कर रामगोपाल ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘अनन्या, तुम मुझ से बात क्यों नहीं करती?’’

“तुम ही कौन सा मुझ से बात करते हो.’’ अनन्या ने जवाब दिया. यह सुन कर गोपाल निरुत्तर हो गया. कुछ पल बाद वह बोला, ‘‘अनन्या, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. क्या मुझ से दोस्ती करोगी?’’

“करूंगी, जरूर करूंगी,’’ कहते हुए वह तेजी से कदम बढ़ाते हुए अपने घर की ओर चली गई. उस दिन के बाद से दोनों चोरीचोरी मिल लेते थे. धीरेधीरे दोनों का प्यार परवान चढऩे लगा. दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर दे दिए. अब दोनों घंटों तक एकदूसरे से बतियाते, अपने भविष्य के सुखद सपने संजोते हैं. रामगोपाल और अनन्या जमाने की सोच की परवाह किए बिना अपने प्यार की पींगें बढ़ाने में लगे हुए थे.

कहते हैं प्यार को चाहे लाख छिपाने की कोशिश की जाए, लेकिन वह उजागर हो ही जाता है. गांव के लोगों ने दोनों को एक साथ देख लिया. इस के बाद तो दोनों के घर वालोयं को उन के प्रेमप्रसंग के बारे में पता चल गया. अनन्या के घर वालों ने इस का विरोध किया. लेकिन अनन्या ने अपने घर वालों से साफ कह दिया कि रामगोपाल और वह एकदूसरे को प्यार करतेे हैं. वह उस के साथ शादी करेगी. बेटी की इस बेबाकी पर घर वाले सन्न रह गए. उन्होंने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानी.

तब घर वालों ने उस के रामगोपाल से मिलने पर सख्त पाबंदी लगा दी. पर अनन्या इस के बाद भी प्रेमी से फोन पर बातें करती रहती थी. अनन्या दिन और रात में अपने प्रेमी रामगोपाल उर्फ गोपाल से बात करती थी. इस की भनक अनन्या की दादी को लग गई. इस पर घटना से 2 महीने पहले दादी ने अनन्या से उस का फोन छीन लिया था. अनन्या तभी से फोन के लिए घर में झगड़ा करती रहती थी. उस के तेवर बगावती हो गए थे. उस ने अपने मम्मीपापा से साफ कह दिया था कि वह रामगोपाल के साथ ही शादी करेगी अन्यथा अपनी जान दे देगी.

प्रेमी के साथ भाग गई

22 जनवरी, 2023 को जब घर वाले गहरी नींद में सोए हुए थे, अनन्या सुबह के समय घर से अपने प्रेमी रामगोपाल के साथ भाग गई. दोनों ने एक दिन पहले ही भागने की योजना बना ली थी. इस बात का दोनों के घरवालों को पता नहीं चल सका था. अनन्या के घरवालों को बेटी के इस तरह घर से भाग जाना बेहद नागवार गुजरा. अनन्या के चले जाने पर घर वाले परेशान हो गए. अनन्या के प्रेमी के साथ भाग जाने की खबर पूरे गांव में जंगल की आग की तरह फैल गई. समाज में उन का सिर शर्म से झुक गया. उन्होंने अनन्या को काफी तलाशा, इस बीच उन्हें जानकारी मिली कि अनन्या अपने प्रेमी रामगोपाल के साथ पलवल चली गई है.

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एसएचओ धर्मेंद्र भाटी व एसआई मनोज चौधरी ने बताया कि अनन्या गोपाल के साथ ही शादी करने की जिद पर अड़ी थी. जबकि इस के लिए उस के घरवाले राजी नहीं थे. अनन्या के घर से भाग जाने की घटना ने आग में घी का काम किया. उस के पापा बदन सिंह उर्फ बलवीर सिंह का खून खौल उठा, क्योंकि उन का गांव में निकलना मुश्किल हो गया.

अनन्या के गायब होने के बाद जहां पुलिस उसे तलाश रही थी, वहीं घर वाले भी उस की तलाश में जुटे थे. पिता बदन सिंह को जानकारी मिली कि अनन्या हरियाणा के पलवल में मौजूद है. इस जानकारी पर बदन सिंह अपने छोटे भाई तेजपाल सिंह के साथ पलवल जा पहुंचा. दोनों ने अनन्या को ढूंढ लिया. लेकिन वह उन के साथ आने को तैयार नहीं हुई. आखिर गोपाल से शादी कराने की बात पर वह उन के साथ घर आने को तैयार हो गई.

झूठी आन की खातिर पिता बना हत्यारा

अनन्या को उस के पापा व चाचा बाइक पर बैठा कर टप्पल-जट्ïटारी मार्ग से होते हुए अलीगढ़ जिले के थाना खैर क्षेत्र में स्थित शिवाला नहर के पास पहुंचे. यहां दोनों भाइयों ने बाइक रोक ली. सुस्ताने के बहाने वे सब नहर किनारे बैठ गए. वहां पर पिता व चाचा ने अनन्या को एक बार फिर समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह रामगोपाल से शादी की बात पर अड़ी रही.

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फिर लोकलाज और समाज में अपनी इज्जत के डर से बदन सिंह ने अपने भाई तेजपाल की मदद से अनन्या का गला घोंट कर हत्या कर दी और शव नहर में फेंक दिया. नहर के गहरे पानी में वह डूब गई. यानी एक पिता ने ही बेटी की हत्या कर दी. दोनों भाई अनन्या को नहर में फेंक कर अपने गांव लौट आए. गांव में पूछने पर दोनों ने बताया कि उन्हें अनन्या का कोई सुराग नहीं मिला. इसलिए वे वापस आ गए. जबकि हकीकत यह थी कि दोनों ने उस की हत्या कर दी थी.

एसएचओ धर्मेंद्र भाटी के अनुसार, घर वालों ने अनन्या को 22 जनवरी को ही पलवल (हरियाणा) से बरामद कर लिया था. उसी दिन उन्होंने उस की हत्या कर लाश नहर में फेंक दी थी. इस घटना के 3 दिन बाद बदन सिंह ने प्रेमी रामगोपाल के खिलाफ बेटी को भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा उसे जेल भिजवा दिया था.

शव 15 किलोमीटर बह कर पहुंचा गोंडा क्षेत्र में

उधर अनन्या की लाश नहर में बहते हुए 15 किलोमीटर दूर अलीगढ़ जिले के थाना गोंडा क्षेत्र में पहुंच गई. नहर में एक युवती का शव मिलने की सूचना पर वहां की पुलिस ने गोताखोरों की मदद से शव को नहर से बाहर निकाला.

चूँकि शव नहर में कहीं से बह कर आया था, इस के चलते उस की पहचान नहीं हो सकी. पुलिस यह पता लगाने में जुट गई कि युवती ने आत्महत्या की है या यह औनर किलिंग का मामला तो नहीं है? थाना गोंडा पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था.

पुलिस ने 72 घंटे इंतजार किया. लेकिन युवती की शिनाख्त नहीं हो सकी. इस पर उस का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस ने युवती के फोटो कराने के साथ ही उस के कपड़ों को सुरक्षित रख लिया था. इस के साथ ही आसपास के थानों से संपर्क किया. तब अनन्या की लाश मिलने की बात पुलिस के संज्ञान में आई.

बेटी के प्रेमप्रसंग में विलेन बना बाप

मोहब्बत के दुश्मन बने बलवीर सिंह ने अपनी बेटी अनन्या को बहलाफुसला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट अनन्या के प्रेमी रामगोपाल के खिलाफ दर्ज कराई थी, वह अब भी इस आरोप में जेल में बंद है. अभी उस की जमानत नहीं हुई है.बेटी के प्रेम प्रसंग में हत्या कर के विलेन बने उस के पापा व चाचा यही सोच रहे थे कि उन की इस साजिश का किसी को पता ही नहीं चलेगा, लेकिन यह उस की भूल थी.

पुलिस ने अनन्या की हत्या की गुत्थी को सुलझा कर पिता बलवीर सिंह व चाचा तेजपाल सिंह को अनन्या की हत्या करने व सबूतों को छिपाने के आरोप में 21 फरवरी, 2023 को गिरफ्तार कर हत्या में प्रयोग की गई बाइक को भी बरामद कर ली. दोनों को न्यायालय के समक्ष पेश कर जेल भेज दिया गया.

अपराध करने वाला अपने आप को अपराध करते समय चाहे कितना भी होशियार समझे, लेकिन अंत में वह पकड़ा जरूर जाता है. झूठी आन की खातिर एक पिता ही अपनी बेटी का कातिल बन गया और एक प्रेमकहानी का दर्दनांक अंत हो गया. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में अनन्या नाम परिवर्तित है.

Love Story: बहन का प्यार – यार बना गद्दार

Love Story: निश्चित जगह पर पहुंच कर अखिलेश उर्फ चंचल को प्रियंका दिखाई नहीं दी तो वह बेचैन हो उठा. उस बेचैनी में वह इधरउधर  टहलने लगा. काफी देर हो गई और प्रियंका नहीं आई तो वह निराश होने लगा. वह घर जाने के बारे में सोच रहा था कि प्रियंका उसे आती दिखाई दे गई. उसे देख कर उस का चेहरा खुशी से खिल उठा. प्रियंका के पास आते ही वह नाराजगी से बोला, ‘‘इतनी देर क्यों कर दी प्रियंका. मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं. अच्छा हुआ तुम आ गईं, वरना मैं तो निराश हो कर घर जाने वाला था.

‘‘जब प्यार किया है तो इंतजार करना ही पड़ेगा. मैं तुम्हारी तरह नहीं हूं कि जब मन हुआ, आ गई. लड़कियों को घर से बाहर निकलने के लिए 50 बहाने बनाने पड़ते हैं.’’ प्रियंका ने तुनक कर कहा.

‘‘कोई बात नहीं, तुम्हारे लिए तो मैं कईकई दिनों तक इंतजार करते हुए बैठा रह सकता हूं. क्योंकि मैं दिल के हाथों मजबूर हूं,’’ अखिलेश ने कहा, ‘‘प्रियंका, मैं चाहता हूं कि तुम आज कालेज की छुट्टी करो. चलो, हम सिनेमा देखने चलते हैं.’’

प्रियंका तैयार हो गई तो अखिलेश पहले उसे एक रेस्टोरेंट में ले गया. नाश्ता करने के बाद दोनों सिनेमा देखने चले गए.

सिनेमा देखते हुए अखिलेश छेड़छाड़ करने लगा तो प्रियंका ने कहा, ‘‘दिनोंदिन तुम्हारी शरारतें बढ़ती ही जा रही हैं. शादी हो जाने दो, तब देखती हूं तुम कितनी शरारत करते हो.’’

‘‘शादी नहीं हुई, तब तो इस तरह धमका रही हो. शादी के बाद न जाने क्या करोगी. अब तो मैं तुम से शादी नहीं कर सकता.’’ अखिलेश ने कान पकड़ते हुए कहा.

‘‘अब मुझ से पीछा छुड़ाना आसान नहीं है. शादी तो मैं तुम्हीं से करूंगी.’’ प्रियंका ने कहा.

‘‘फिर तो मुझे यही गाना पड़ेगा कि ‘शादी कर के फंस गया यार.’’’ अखिलेश ने कहा तो प्रियंका हंसने लगी.

प्रियंका उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर के थाना सदर बाजार के मोहल्ला बाड़ूजई प्रथम के रहने वाले चंद्रप्रकाश सक्सेना की बेटी थी. वह ओसीएफ में दरजी थे. उन के परिवार में प्रियंका के अलावा पत्नी सुखदेवी, 2 बेटे संतोष, विपिन तथा एक अन्य बेटी कीर्ति थी. बड़े बेटे संतेष की शादी हो चुकी थी. वह अपनी पत्नी प्रीति के साथ दिल्ली में रहता था.

कीर्ति की भी शादी शाहजहांपुर के ही मोहल्ला तारोवाला बाग के रहने वाले राजीव से हुई थी. वह अपनी ससुराल में आराम से रह रही थी. गै्रजएुशन कर के विपिन ने मोबाइल एसेसरीज की दुकान खोल ली थी. जबकि प्रियंका अभी पढ़ रही थी. प्रियंका घर में सब से छोटी थी, इसलिए पूरे घर की लाडली थी. विपिन तो उसे जान से चाहता था.

प्रियंका बहुत सुंदर तो नहीं थी, लेकिन इतना खराब भी नहीं थी कि कोई उसे देख कर मुंह मोड़ ले. फिर जवानी में तो वैसे भी हर लड़की सुंदर लगने लगती है. इसलिए जवान होने पर साधारण रूपरंग वाली प्रियंका को भी आतेजाते उस के हमउम्र लड़के चाहत भरी नजरों से ताकने लगे थे. उन्हीं में एक था उसी के भाई के साथ मोबाइल एसेसरीज का धंधा करने वाला अखिलेश यादव उर्फ चंचल.

अखिलेश उर्फ चंचल शाहजहांपुर के ही मोहल्ला लालातेली बजरिया के रहने वाले भगवानदीन यादव का बेटा था. भगवानदीन के परिवार में पत्नी सुशीला देवी के अतिरिक्त 3 बेटे मुनीश्वर उर्फ रवि, अखिलेश उर्फ चंचल, नीलू और 2 बेटियां नीलम और कल्पना थीं. अखिलेश उस का दूसरे नंबर का बेटा था. भगवानदीन यादव कभी जिले का काफी चर्चित बदमाश था. उस की और उस के साथी रामकुमार की शहर में तूती बोलती थी.

रामकुमार की हत्या कर दी गई तो अकेला पड़ जाने की वजह से भगवानदीन ने बदमाशी से तौबा कर लिया और अपने परिवार के साथ शांति से रहने लगा. लेकिन सन 2002 में उस के सब से छोटे बेटे नीलू की बीमारी से मौत हुई तो वह इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर सका और कुछ दिनों बाद उस की भी हार्टअटैक से मौत हो गई.

बड़ी बेटी नीलम का विवाह हो चुका था. पिता की मौत के बाद घरपरिवार की जिम्मेदारी बड़े बेटे रवि ने संभाल ली थी. वह ठेकेदारी करने लगा था. हाईस्कूल पास कर के अखिलेश ने भी पढ़ाई छोड़ दी और मोबाइल एसेसरीज का धंधा कर लिया. एक ही व्यवसाय से जुड़े होने की वजह से कभी विपिन और अखिलेश की बाजार में मुलाकात हुई तो दोनों में दोस्ती हो गई थी.

दोस्ती होने के बाद कभी अखिलेश विपिन के घर आया तो उस की बहन प्रियंका को देख कर उस पर उस का दिल आ गया. फिर तो वह प्रियंका को देखने के चक्कर में अकसर उस के घर आने लगा. कहने को वह आता तो था विपिन से मिलने, लेकिन वह तभी उस के घर आता था, जब वह घर में नहीं होता था. ऐसे में भाई का दोस्त होने की वजह से उस की सेवासत्कार प्रियंका को करनी पड़ती थी. उसी बीच वह प्रियंका के नजदीक आने की कोशिश करता.

उस के लगातार आने की वजह से विपिन से उस की दोस्ती गहरी हो ही गई, प्रियंका से भी उस की नजदीकी बढ़ गई. इस के बाद विपिन और अखिलेश ने मिल कर मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली एक नामी कंपनी की एजेंसी ले ली तो उन का कारोबार भी बढ़ गया और याराना भी. इस से उन का एकदूसरे के घर आनाजान ही नहीं हो गया, बल्कि अब साथसाथ खानापीना भी होने लगा था.

अब अखिलेश को प्रियंका के साथ समय बिताने का समय ज्यादा से ज्यादा मिलने लगा था. उस ने इस का फायदा उठाया. उसे अपने आकर्षण में ही नहीं बांध लिया, बल्कि उस से शारीरिक संबंध भी बना लिए. वह विपिन की अनुपस्थिति का पूरा फायदा उठाने लगा. विपिन के चले जाने के बाद केवल मां ही घर पर रहती थी. वह घर के कामों में व्यस्त रहती थी. फिर उसे बेटी पर ही नहीं, बेटे के दोस्त पर भी विश्वास था, इसलिए उस ने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि वे दोनों क्या कर रहे हैं.

प्रियंका अपने भाई और परिवार को धोखा दे रही थी तो अखिलेश अपने दोस्त के साथ विश्वासघात कर रहा था. वह भी ऐसा दोस्त, जो उस पर आंख मूंद कर विश्वास करता था. उसे भाई से बढ़ कर मानता था. प्रियंका और अखिलेश क्या कर रहे हैं, किसी को कानोकान खबर नहीं थी. जबकि जो कुछ भी हो रहा था, वह सब घर में ही सब की नाक के नीचे हो रहा था.

संतोष की पत्नी प्रीति को बच्चा होने वाला था, इसलिए संतोष ने प्रीति को शाहजहांपुर भेज दिया. डिलीवरी की तारीख नजदीक आ गई तो उसे जिला अस्पताल में भरती करा दिया गया. प्रीति के अस्पताल में भरती होने की वजह से विपिन और उस की मां का ज्यादा समय अस्पताल में बीतता था.

छुट्टी न मिल पाने की वजह से संतोष नहीं आ सका था. उस स्थिति में प्रियंका को घर में अकेली रहना पड़ रहा था. विपिन को अखिलेश पर पूरा विश्वास था, इसलिए प्रियंका और घर की जिम्मेदारी उस ने उस पर सौंप दी थी. अखिलेश और प्रियंका को इस से मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई थी. जब तक प्रीति अस्पताल में रही, दोनों दिनरात एकदूसरे की बांहों में डूबे रहे.

26 फरवरी, 2014 को प्रीति को जिला अस्पताल में बेटा पैदा हुआ था. खुशी के इस मौके पर अखिलेश ने 315 बोर के 2 तमंचे और 10 कारतूस ला कर विपिन को दिए थे. भतीजा पैदा होने पर दोनों ने उन तमंचों से एकएक फायर भी किए थे. बाकी 8 कारतूस और दोनों तमंचे अखिलेश ने विपिन से यह कह कर उस के घर रखवा दिए थे कि भतीजे के नामकरण संस्कार पर काम आएंगे. विपिन ने दोनों तमंचे और कारतूस अपने कमरे में बैड पर गद्दे के नीचे छिपा कर रख दिए थे.

विपिन पुलिस में भरती होना चाहता था, इसलिए रोजाना सुबह 5 बजे उठ कर जिम जाता था. वहां से वह 9 बजे के आसपास लौटता था. कभीकभी उसे देर भी हो जाती थी. 23 मार्च को विपिन 9 बजे के आसपास घर लौटा तो मां नीचे बरामदे में बैठी आराम कर रही थीं. भाभी प्रीति बच्चे के साथ सामने वाले कमरे में लेटी थी. उस ने कपड़े बदले और ऊपरी मंजिल पर बने अपने कमरे में सोने के लिए चला गया.

विपिन ने दरवाजे को धक्का दिया तो पता चला वह अंदर से बंद है. इस का मतलब अंदर कोई था. उस ने आवाज दी, लेकिन अंदर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. उस ने पूरी ताकत से दरवाजे पर लात मारी तो अंदर लगी सिटकनी उखड़ गई और दरवाजा खुल गया. अंदर अखिलेश और प्रियंका खड़े थे. दोनों की हालत देख कर विपिन को समझते देर नहीं लगी कि अंदर क्या कर रहे थे. उन के कपड़े अस्तव्यस्त थे और वे काफी घबराए हुए थे.

विपिन के कमरे में घुसते ही प्रियंका निकल कर नीचे की ओर भागी. विपिन का खून खौल उठा था. उस ने गुस्से में अखिलेश को एक जोरदार थप्पड़ जड़ते हुए कहा, ‘‘तुझे मैं दोस्त नहीं, भाई मानता था. मैं तुझ पर कितना विश्वास करता था और तूने क्या किया? जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया.’’

‘‘भाई, मैं प्रियंका से सच्चा प्यार करता हूं और उसी से शादी करूंगा.’’ अखिलेश ने कहा, ‘‘वह मुझ से शादी को तैयार है.’’

‘‘तुम दोनों को पता था कि हमारी जाति एक नहीं है तो यह कैसे सोच लिया कि तुम्हारी शादी हो जाएगी?’’ विपिन गुस्से से बोला, ‘‘तुम ने जो किया, ठीक नहीं किया. मेरी इज्जत पर तुम ने जो हाथ डाला है, उस की सजा तो तुम्हें भोगनी ही होगी.’’

अखिलेश को लगा कि उसे जान का खतरा है तो उस ने जेब से 315 बोर का तमंचा निकाल लिया. वह गोली चलाता, उस के पहले ही विपिन ने उस के हाथ पर इतने जोर से झटका मारा कि तमंचा छूट कर जमीन पर गिर गया. अखिलेश ने तमंचा उठाना चाहा, लेकिन विपिन ने फर्श पर पड़े तमंचे को अपने पैर से दबा लिया.

अखिलेश कुछ कर पाता, विपिन ने बैड पर गद्दे के नीचे रखे दोनों तमंचे और आठों कारतूस निकाल कर उस में से एक तमंचा जेब में डाल लिया और दूसरे में गोली भर कर अखिलेश पर चला दिया. गोली अखिलेश के सीने में लगी. वह जमीन पर गिर गया तो विपिन ने एक गोली उस के बाएं हाथ और एक पेट में मारी. 3 गोलियां लगने से अखिलेश की तुरंत मौत हो गई.

अखिलेश का खेल खत्म कर विपिन नीचे आ गया. प्रियंका बरामदे में दुबकी खड़ी थी. उस के पास जा कर उस ने पूछा, ‘‘मैं ने सही किया या गलत?’’

प्रियंका ने जैसे ही कहा, ‘‘गलत किया.’’ विपिन ने उस की कनपटी पर तमंचे की नाल रख कर ट्रिगर दबा दिया. प्रियंका कटे पेड़ की तरह फर्श पर गिर पड़ी. इस के बाद उस ने एक गोली और चलाई, जो प्रियंका के सीने में बाईं ओर लगी. प्रियंका की भी मौत हो गई. प्रियंका को खून से लथपथ देख कर उस की मां और भाभी बेहोश हो गईं.

अखिलेश और प्रियंका की हत्या कर विपिन घर से बाहर निकला तो सामने पड़ोसी सचिन पड़ गया. सचिन से उस की पुरानी खुन्नस थी. उस ने उस की ओर तमंचा तान दिया. विपिन का इरादा भांप कर सचिन अपने घर के अंदर भागा. विपिन भी पीछेपीछे उस के घर में घुस गया. सचिन कहीं छिपता, विपिन ने उस पर भी गोली चला दी. गोली उस की कमर में लगी, जिस से वह भी फर्श पर गिर पड़ा.

सचिन के घर से निकल कर विपिन अपने एक अन्य दुश्मन सतीश के घर में घुस कर 2 गोलियां चलाईं. लेकिन ये गोलियां किसी को लगी नहीं. अब तक शोर और गोलियों के चलने की आवाज सुन कर आसपड़ोस वाले इकट्ठा हो गए थे. लेकिन विपिन के हाथ में तमंचा देख कर कोई उसे पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सका. इसलिए विपिन एआरटीओ वाली गली में घुस कर आराम से फरार हो गया.

किसी ने कोतवाली सदर बाजार पुलिस को इस घटना की सूचना दे दी थी. चंद मिनटों में ही कोतवाली इंसपेक्टर यतेंद्र भारद्वाज पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. इस के बाद उन की सूचना पर पुलिस अधीक्षक राकेशचंद्र साहू, अपर पुलिस अधीक्षक (नगर) ए.पी. सिंह, फोरेंसिक टीम और डाग स्क्वायड की टीम भी वहां आ गई थी.

पुलिस तो आ गई, लेकिन अपनी नौकरी पर गए चंद्रप्रकाश को किसी ने इस बात की सूचना नहीं दी. काफी देर बाद सूचना पा कर वह घर आए तो बेटी की लाश देख कर बेहोश हो गए. एक ओर बेटी की लाश पड़ी थी तो दूसरी ओर उस की और उस के प्रेमी की हत्या के आरोप में बेटा फरार था.

सचिन की हालत गंभीर थी. इसलिए पुलिस ने उसे तुरंत सरकारी अस्पताल भिजवाया. उस की हालत को देखते हुए सरकारी अस्पताल के डाक्टरों ने उसे कनौजिया ट्रामा सेंटर ले जाने को कहा. लेकिन वहां भी उस की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. तब उसे वसीम अस्पताल ले जाया गया. डा. वसीम ने उस का औपरेशन कर के फेफड़े के पार झिल्ली में फंसी गोली निकाली. इस के बाद उस की हालत में कुछ सुधार हुआ.

फोरेंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य उठा लिए. डाग स्क्वायड टीम ने खोजी कुतिया लूसी को छोड़ा. वह विपिन के घर से निकल कर सतीश के घर तक गई, जहां विपिन ने 2 गोलियां चलाई थीं. घटनास्थल के निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों को समझते देर नहीं लगी कि मामला अवैध संबंधों में हत्या का यानी औनर किलिंग का है.

पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर इंसपेक्टर यतेंद्र भारद्वाज ने अखिलेश के बड़े भाई मुनीश्वर यादव की ओर से विपिन सक्सेना के खिलाफ अखिलेश और प्रियंका की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस के बाद विपिन की तलाश शुरू हुई.

26 मार्च की सुबह पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर विपिन को पुवायां रोड पर चिनौर से पहले हाइड्रिल पुलिया के पास से गिरफ्तार कर लिया. उस समय वह अपने चचेरे भइयों सुशील और लल्ला के पास चिनौर जा रहा था. कोतवाली ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी हीलाहवाली के अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

पूछताछ में विपिन ने पुलिस को बताया कि जिस यार को मैं भाई की तरह मानता था, उस ने मेरी इज्जत पर हाथ डाला तो मुझे इतना गुस्सा आया कि मैं ने उस का खून कर दिया. घटना को अंजाम देने के बाद वह एआरटीओ वाली गली के पास से निकल रहे नाले में अखिलेश से छीना तमंचा और अपनी खून से सनी टीशर्ट निकाल कर फेंक दी थी.

खाली बनियान और जींस पहने हुए वह एआरटीओ गली से रोडवेड बसस्टैंड पहुंचा. यहां से उस ने निगोही जाने के लिए सौ रुपए में एक आटो किया. निगोही जाते समय रास्ते में उस ने दूसरा तमंचा फेंक दिया. निगोही से वह प्राइवेट बस से बरेली पहुंचा. बरेली में उस ने नई टीशर्ट खरीद कर पहनी. पूरे दिन वह इधरउधर घूमता रहा. रात को उस ने बरेली रेलवे स्टेशन से दिल्ली जाने के लिए टे्रन पकड़ ली.

दिल्ली में विपिन बड़े भाई संतोष के यहां गया. उसे उस ने पूरी बात बताई. संतोष को पता चल गया कि प्रियंका मर चुकी है, फिर भी वह उस के अंतिम संस्कार में शाहजहांपुर नहीं गया. संतोष को जब पता चला कि पुलिस विपिन की गिरफ्तारी के लिए घर वालों तथा रिश्तेदारों को परेशान कर रही है तो उस ने उसे घर भेज दिया.

26 मार्च को विपिन अपने चचेरे भाइयों के पास चिनौर जा रहा था, तभी पुलिस ने मुखबिरों से मिली सूचना पर गिरफ्तार कर लिया था. उस समय भी उस के पास एक तमंचा था.

पूछताछ में विपिन ने बताया था कि उस के पास कारतूस नहीं बचे थे. अगर कारतूस बचा होता तो वह खुद को भी गोली मार लेता. कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के पुलिस ने विपिन को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Punjab Crime: गर्भ में पल रहे बच्चे का सौदा करने वाला गिरोह

Punjab Crime: पंजाब के लुधियाना में औरतों का एक ऐसा गिरोह पकड़ा गया है, जो नवजात बच्चों की तो खरीदफरोख्त करता ही था, गर्भ में पलने वाले बच्चे का भी सौदा कर लेता था.

फोन पर दूसरी ओर से बारबार यही आवाज आ रही थी कि जिस नंबर पर आप बात करना चाहते हैं, वह या तो कवरेज एरिया से बाहर है या बंद है. लेकिन शामलाल ने हिम्मत नहीं हारी और थोड़ीथोड़ी देर पर वह उस नंबर को मिलाते रहे. आखिर उन की मेहनत रंग लाई और दूसरी ओर घंटी बज उठी. उस समय शाम के साढ़े 4 बज रहे थे और तारीख थी 15 फरवरी, 2016. दूसरी ओर से फोन रिसीव किया गया तो शामलाल के कानों में किसी आदमी की भारी आवाज गूंजी, ‘‘हां जी बताइए, किस से बात करनी है, कहीं किसी गलत नंबर पर तो फोन नहीं मिला दिया? मैं तो आप को जानता नहीं.’’

‘‘नहीं जी, मैं ने एकदम सही नंबर मिलाया है. काफी देर से कोशिश कर रहा हूं, तब कहीं जा कर आप का फोन लगा है.’’ शामलाल ने कहा.

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन आप बोल कौन रहे हैं? आप को किस से बात करनी है?’’ दूसरी ओर से अक्खड़ अंदाज में पूछा गया.

‘‘दरअसल, हमारी पहली बार बात हो रही है, इस से पहले हमारी कभी बात नहीं हुई. आप मिस्टर तेजवीर सिंह बोल रहे हैं न?’’

‘‘देखिए, पहले आप अपने बारे में बताइए. उस के बाद किस काम के लिए फोन किया है, यह बताइए. और हां, मेरा यह नंबर आप को कहां से मिला?’’ दूसरी ओर से उसी अक्खड़ अंदाज में पूछा गया.

‘‘आप का नंबर आप के एक खास दोस्त काला ने मुझे दिया है.’’

‘‘कहां रहता है यह काला?’’

‘‘यहीं लुधियाना में, उस का पता बताऊं?’’

‘‘तब तो आप भी लुधियाना से ही बोल रहे होंगे?’’ इस बार दूसरी ओर से थोड़ा नरमी से पूछा गया.

‘‘जी हां, मैं लुधियाना से ही बोल रहा हूं. वर्धमान चौक के पास मेरी कोठी है और घंटाघर के सामने वाली बिल्डिंग में मेरा औफिस है. यहां मुझे सब ठेकेदार शामलाल के नाम से जानते हैं. काला आप की बड़ी तारीफें कर रहा था. कह रहा था कि आप मेरा काम चुटकी बजा कर करवा देंगे.’’

‘‘बताइए, आप की परेशानी क्या है?’’

‘‘ऐसा है कि मेरी शादी हुए 5 साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन अभी तक मैं बच्चे का मुंह देखने को तरस रहा हूं. मां न बन पाने की वजह से मेरी पत्नी भी डिप्रैशन का शिकार हो गई है. न कहीं आतीजाती है और न किसी से ज्यादा मिलतीजुलती है, गुमसुम सी अपने कमरे में पड़ी रहती है.’’

‘‘डाक्टर को नहीं दिखाया, आखिर बच्चा क्यों नहीं हो रहा?’’

‘‘बड़ेबड़े डाक्टरों को दिखा दिया है, लेकिन कहीं से कोई फायदा नहीं हुआ. अब यही सोच रहे हैं कि किसी और का बच्चा ले कर पाल लें.’’

‘‘तो किसी अनाथ आश्रम से बच्चा गोद ले लीजिए. इस में परेशानी क्या है?’’

‘‘आप की बात सही है, लेकिन मेरी पत्नी इस के लिए राजी नहीं है. क्योंकि ऐसा करने से उस पर बांझ की मोहर लग जाएगी. हमें तुरंत का जन्मा बच्चा चाहिए, जिस के बारे में मेरी पत्नी कह सके कि उसे उस ने पैदा किया है. इस बारे में मेरी काला से बात हुई तो उस ने कहा कि पैसा ले कर आप मेरा काम आसानी से कर देंगे.’’

‘‘आसानी से कैसे कर देंगे भाई? यह बहुत ही मुश्किल काम है. कई लोगों से संपर्क करना पड़ेगा. वैसे भी यह काम मैं सीधे नहीं कर सकता. जो भी करेंगी, डाक्टर साहब करेंगी. मैं उन से एक बार बात कर लेता हूं, उस के बाद आप को बताता हूं. और हां, काला ने आप को यह भी बताया ही होगा कि इस तरह के काम में काफी पैसा लगता है.’’

‘‘बताया है न. मैं ने उस से भी कहा था और आप से भी कह रहा हूं कि आप पैसों की जरा भी चिंता न करें. बस मेरा काम होना चाहिए. आप जितना भी पैसा मांगेंगे, मैं उस से ज्यादा दूंगा. पैसों की मेरे पास कोई कमी नहीं है. बस हां, बच्चा इस तरह का होना चाहिए कि देखने में अच्छे घर का लगे. खूबसूरत भी होना चाहिए.’’

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन हम तो पेमेंट के हिसाब से बच्चा देते हैं. आप जैसा पेमेंट करेंगे, आप को वैसा ही बच्चा मिलेगा. मैं डाक्टर मैडम से बात करता हूं.’’ कह कर उस आदमी ने फोन काट दिया.

फरवरी, 2016 के दूसरे सप्ताह में लुधियाना के डीसीपी डा. नरेंद्र भार्गव को अपने किसी माध्यम से सूचना मिली थी कि शहर में कुछ महिलाओं का एक ऐसा गिरोह सक्रिय है, जो किसी गरीब महिला के गर्भवती होने पर उस के पेट में पल रहे बच्चे (भ्रूण) को अच्छेखासे दामों में बेच कर आपराधिक धंधा कर के अच्छीखासी कमाई कर रहा है. दरअसल, महिलाओं का यह गिरोह बिना औलाद वाली महिलाओं को नवजात बच्चा बेच कर उन से अच्छीखासी रकम वसूल करता था.

यही नहीं, इस गिरोह के सदस्य उन गरीब औरतों के बारे में पता लगाती रहती थीं, जिन के कई बच्चे पहले से ही होते थे, इस के बावजूद वे गर्भवती हो जाती थीं. ऐसी महिलाओं को गर्भ ठहरने की खुशी कम, समस्या ज्यादा प्रतीत होती थी. ऐसी ही महिलाओं को पैसों का लालच दे कर वे औरतें उस का बच्चा पैदा होते ही ले कर बेऔलाद अमीर महिलाओं को अच्छेखासे दामों में बेच देती थीं. नरेंद्र भार्गव ने इस गिरोह के बारे में पता लगाने के लिए एडिशनल डीसीपी (मुख्यालय) ध्रुव दहिया के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में सीआईए-2 के इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह, उन के रीडर सुखपाल सिंह, एएसआई सतनाम सिंह, हवलदार कुलवंत सिंह, राजेश कुमार, सिपाही दलजीत सिंह, होमगार्ड के जवान जितेंद्र कुमार एवं महिला सिपाही सुरेंद्र कौर को शामिल किया गया.

टीम नवजात बच्चों का सौदा करने वाले गिरोह के बारे में पता लगाने के लिए भागदौड़ करने लगी. इसी के साथ इस टीम ने अपने मुखबिरों को भी सहेज दिया था. पुलिस टीम ने बहुत जल्दी इस गिरोह के बारे में पता कर लिया. उस में एक पुरुष भी शामिल था, जिस का नाम तेजवीर सिंह था. वही फोन पर ग्राहकों से बात कर के सौदा करता था. उस का मोबाइल नंबर भी पुलिस के हाथ लग गया था. इस के बाद एक आदमी को नकली ग्राहक बना कर नवजात बच्चा खरीदने के लिए तेजवीर सिंह को फोन किया गया. नकली ग्राहक ने अपना नाम रखा था- ठेकेदार शामलाल.

15 फरवरी, 2016 की शाम 4 बजे नकली ग्राहक ठेकेदार शामलाल की तेजवीर से बात हुई थी. 6 बजे तक कोई जवाब नहीं मिला तो शामलाल ने उसे दोबारा फोन किया. दूसरी ओर से तेजबीर ने छूटते ही कहा, ‘‘ऐसा है ठेकेदार साहब, मैं ने डाक्टर मैडम से बात कर ली है, उन्होंने आप के काम के लिए आगे की काररवाई शुरू कर दी है. मेरे सामने ही उन्होंने कई लोगों को फोन किए हैं.’’

‘‘आप को क्या लग रहा है, मेरा काम हो जाएगा न?’’ शामलाल ने उतावलेपन से पूछा.

‘‘बिलकुल हो जाएगा जी. बस आप हमें थोड़ा समय दीजिए. मेरे पास कुछ बच्चे हैं, लेकिन उन में आप जैसा बच्चा चाहते हैं, वैसा नहीं है. आप के लिए हम एकदम गोराचिट्टा और सेहतमंद बच्चा देख रहे हैं, जो पहली ही नजर में अमीर घर का लगे. क्योंकि उसे बनाना भी तो अमीर घर की औलाद है.’’

‘‘यह बात आप ने एकदम सही कही. सुन कर मन इतना खुश हुआ कि अगर आप सामने होते तो डील की रकम से अलग लाख रुपए अभी निकाल कर इनाम के रूप में आप के हाथ में रख देता.’’

‘‘कोई बात नहीं ठेकेदार साहब, हम आप से इनाम जरूर लेंगे. लेकिन पहले आप के आदेश के अनुसार काम कर दूं. आप को ऐसा खूबसूरत बच्चा ला कर देंगे कि आप और आप की मेमसाहब देखते रह जाएंगे.’’

‘‘अच्छा, अब यह बताओ कि बच्चा हमें कब मिल रहा है? मैं ने इस बारे में अपनी पत्नी को भी बता दिया है. इसलिए वह बारबार फोन कर के एक ही बात पूछ रही है कि बच्चा कब ला कर उस की गोद में डाल रहा हूं.’’

‘‘आप को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा ठेकेदार साहब. जैसे ही बच्चा हमारे पास पहुंचेगा, हम तुरंत आप को फोन कर के बता देंगे और उसी समय आप के पास तक बच्चे को पहुंचाने चल देंगे. बस आप कैश तैयार रखिएगा. डील फाइनल होते ही मैं आप को पैसे के बारे में बता दूंगा.’’

‘‘मैं ने कहा न कि आप को पैसों की चिंता करने की जरूरत नहीं है. उम्मीद से कहीं ज्यादा पैसे मिलेंगे आप लोगों को.’’

फिलहाल बात यहीं खत्म हो गई.

इस के बाद उसी दिन रात 9 बजे तेजवीर सिंह का फोन आया. उस ने जल्दीजल्दी कहा, ‘‘निहायत खूबसूरत बच्चे की व्यवस्था हो गई है. हम उसे मारुति कार नंबर पीबी 10 एम 0685 से ले कर एक घंटे बाद यानी ठीक 10 बजे वर्धमान चौक पर पहुंच रहे हैं. इस के लिए आप को 5 लाख रुपए देने हैं, जो आप को कैश में लाना है. बच्चा अभी एक हफ्ते का भी नहीं हुआ है, उसे संभालने के लिए आप अपनी पत्नी को भी साथ ले आइएगा.’’

‘‘ठीक है, मैं रुपए ले कर 10 बजे से पहले ही वर्धमान चौक के बाईं ओर वाले फुटपाथ पर अपनी पत्नी के साथ खड़ा रहूंगा.’’ नकली ग्राहक बने ठेकेदार शामलाल ने कहा.  इस के बाद फोन कट गया.

तेजवीर सिंह से फोन पर यह बातचीत सीआईए के औफिस से ही हो रही थी. इस बात की जानकारी डीसीपी नरेंद्र भार्गव को दी गई तो उन्होंने कहा, ‘‘किसी की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर के वर्धमान चौक के पास पूरी फोर्स के साथ तैनात हो जाओ. नकली ग्राहक को ब्रीफकेस दे कर फुटपाथ पर खड़ा कर दो. उन लोगों के आने पर वह उन से बातचीत करे. गिरोह के बारे में पता चलते ही वह अपने फोन से तुम्हारे फोन पर मिस्डकाल करे. उस के बाद तुम अपनी टीम के साथ उन्हें घेर कर गिरफ्तार कर लो. और हां, नकली ग्राहक इस बात का भी ध्यान रखे कि उस समय बच्चा उन के पास मौजूद होना चाहिए.’’

‘‘जी हां, ऐसा ही होगा.’’ जितेंद्र सिंह ने कहा.

इस के बाद उन्होंने मुखबिरी को आधार बना कर एएसआई सतनाम सिंह से तहरीर ले कर भादंवि की धारा 370 एवं ह्यूमन ट्रैफिकिंग एक्ट की धारा 2 के तहत थाना डिवीजन नंबर 7 में अपराध क्रमांक 30 पर रिपोर्ट दर्ज करवा दी. इस के बाद अपनी पुलिस टीम के साथ नकली ग्राहक बने कथित ठेकेदार शामलाल को साथ ले कर वर्धमान चौक पहुंच गए. अब उन्हें इंतजार था तेजवीर सिंह के अगले फोन का. नकली ग्राहक ठेकेदार शामलाल को एक खाली ब्रीफकेस दे कर चौक के बाईं ओर फुटपाथ पर खड़ा कर दिया गया था. बाकी पुलिस टीम वहीं एक जगह छिप कर खड़ी हो गई थी. अपनी सरकारी गाड़ी बोलेरो पीबी 10 बीयू 8036 को भी उन्होंने छिपा दिया था.

ठीक 10 बजे तेजवीर सिंह ने शामलाल को फोन किया, ‘‘हां जी ठेकेदार साहब, हम वर्धमान चौक से थोड़ा पीछे हैं. बस 2 मिनट में पहुंच जाएंगे. आप पैसा ले कर पहुंच गए हैं न?’’

‘‘जी हां, मैं बताई गई जगह पर पैसों से भरा ब्रीफकेस लिए आप का ही इंतजार कर रहा हूं.’’ शामलाल ने कहा.

‘‘ठीक है ठेकेदार साहब, बस 2 मिनट में हम भी पहुंच रहे हैं आप तक.’’ कह कर तेजवीर ने फोन काट दिया. शामलाल ने तुरंत इस बारे में जितेंद्र सिंह को उन के मोबाइल पर बता दिया, जिस से उन्होंने अपनी पुलिस टीम को सतर्क कर दिया. मुश्किल से 5 मिनट गुजरे होंगे कि सफेद रंग की मारुति कार नंबर पीबी 10 एम 0685 फुटपाथ के पास वहीं आ कर रुकी, जहां ब्रीफकेस लिए शामलाल खड़े थे. कार के रुकते ही शामलाल तेज कदमों से उस के पास पहुंच कर कार के अंदर देखा तो उस की ड्राइविंग सीट पर एक सरदार बैठा था और बगल वाली सीट पर एक औरत बैठी थी.

शामलाल को देखते ही सरदार ने खिड़की से सिर बाहर निकाल कर कहा, ‘‘आप ठेकेदार शामलाल हो न?’’

‘‘और आप तेजवीर सिंह?’’

‘‘जी, मैं ही तेजवीर हूं, मुझ से ही आप की फोन पर बात हुई थी. मैं ने आप की आवाज पहचान ली है. अच्छा, यह ब्रीफकेस मुझे दे दो, पूरे 5 लाख हैं न?’’

‘‘उस से ज्यादा हैं, लेकिन पहले बच्चा तो दो. उस के बाद ही पैसे मिलेंगे.’’

‘‘हां…हां, क्यों नहीं. पिछली सीट पर देखो, कितना प्यारा बच्चा है.’’ कह कर तेजवीर ने कार के अंदर की लाइट जला दी.

शामलाल ने कार की उस रोशनी में पिछली सीट पर देखा तो वहां 2 औरतें बैठी थीं, जिन में से एक ने अपनी गोद में पड़े कपड़े को हटाया तो उस की गोद में बहुत ही खूबसूरत बच्चा लेटा दिखाई दिया. शामलाल ने खुशी का इजहार करते हुए कहा, ‘‘बच्चा तो ठीक वैसा ही है, जैसा मैं चाहता था.’’

‘‘तो जल्दी से बच्चा उठाइए और पैसे मेरे हवाले कीजिए.’’ तेजवीर ने इधरउधर देखते हुए कहा.

‘‘भई ये पैसे तो मैं आप के लिए ही लाया हूं. बस मेरी मिसेज जरा आ जाएं.’’

‘‘वह कहां हैं? उन्हीं को तो संभालना है यह छोटा सा बच्चा.’’

‘‘वह अपनी बहन को लेने गई हैं. बस आती ही होंगी. आप कहें तो मैं फोन कर के पूछ लूं.’’

‘‘बिलकुल पूछ लो.’’ तेजवीर ने जल्दी से कहा.

शामलाल ने तुरंत इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह का नंबर मिला दिया. लेकिन उन्होंने बात करने के बजाय मिस्डकाल कर के छोड़ दिया. इस के बाद तेजवीर से कहा, ‘‘फोन रिसीव करने के बजाय काट दिया. इस का मतलब वह पास में ही हैं.’’

‘‘चलो, कोई बात नहीं. थोड़ा इंतजार कर लेते हैं.’’ कह कर तेजवीर ने कार का इंजन बंद कर दिया.

तभी पुलिस टीम ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया. तेजवीर को समझते देर नहीं लगी कि ठेकेदार शामलाल ने ग्राहक बन कर होशियारी से उसे फंसाया है. जितेंद्र सिंह ने बच्चे को एक महिला सिपाही के हवाले कर दिया और वहीं पूछताछ शुरू कर दी. सइस पूछताछ में तेजवीर ने जो बताया, उस के अनुसार, वह पंजाब के जिला मोगा के कस्बा धर्मकोट का रहने वाला था. उस की बगल वाली सीट पर उस की पत्नी रछपाल कौर बैठी थी. वह आरएमपी डाक्टर थी. कार की पिछली सीट पर जो 2 महिलाएं बैठी थीं, उन के नाम बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर थे.

बलजिंदर कौर लुधियाना के शिमलापुरी के रहने वाले जागीर सिंह की पत्नी थी, जबकि गुरमीत कौर फरीदकोट के जैतो मंडी के रहने वाले हरभजन सिंह की पत्नी थी. उन्होंने वहीं स्वीकार कर लिया था कि वे सभी नवजात बच्चों की खरीदफरोख्त के अलावा गर्भ में पलने वाले बच्चों का भी सौदा करते थे. सीआईए केंद्र ला कर रात में पूछताछ करने के बजाय इन सभी के हवालात में बंद कर दिया गया था. अगले दिन चारों को लुधियाना के प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी अजयपाल सिंह की अदालत में पेश कर के विस्तार से पूछताछ के लिए 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. बच्चे को अदालत के आदेश पर एक धार्मिक संस्थान के बाल संरक्षण केंद्र के हवाले कर दिया गया.

रिमांड अवधि के दौरान पूछताछ में गिरफ्तार चारों अभियुक्तों ने जो बताया, उस से जो कहानी निकल कर सामने आई, वह हैरान करने वाली थी. ये लोग नवजात बच्चों की खरीदफरोख्त तो करते ही थे, ये गर्भ में पल रहे बच्चों तक का सौदा कर लेते थे. तेजवीर सिंह ड्राइवर था. वह टैक्सी के रूप में दूसरों की गाडि़यां चलाता था. अपनी कार खरीद कर उसे टैक्सी के रूप में चलाना उस का सपना था, जो अरसा बीत जाने के बाद भी पूरा नहीं हो रहा था. उस की पत्नी रछपाल कौर आरएमपी (रजिस्टर्ड मैडिकल प्रैक्टीशनर) डाक्टर थी. घर के एक कमरे में उस ने अपना क्लिनिक खोल रखा था, लेकिन उस के यहां मरीज नाममात्र के ही आते थे. लिहाजा उन का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था.

करीब 2 साल पहले की बात है. बगल के गांव की एक औरत रछपाल की क्लिनिक पर आई. वह गर्भवती थी. वह इस अजन्मे बच्चे से छुटकारा चाहती थी. यानी वह अपना गर्भपात कराना चाहती थी. इस काम के लिए रछपाल कौर को अच्छाखासा पैसा मिल सकता था, लेकिन यह सब करने का उसे अनुभव नहीं था. फिर यह गैरकानूनी भी था. इसलिए वह ऐसा करने से घबरा रही थी. लेकिन उस की क्लिनिक पर मुश्किल से यह मरीज आया था, इसलिए वह उसे खाली हाथ लौटाना भी नहीं चाहती थी.

उस के दिमाग में एक तरकीब आई. उस ने उस औरत को सुझाव दिया कि वह गर्भ गिराने के बजाय अपने इस बच्चे को जन्म दे कर उसे दे दे. वह उसे सर्टिफिकेट दे देगी कि उसे मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ था. उस ने सोचा कि इस के बाद वह बच्चा किसी बेऔलाद दंपत्ति को दे देगी. इस से वह जीव हत्या से भी बच जाएगी और किसी उदास परिवार को खुशियां मिल जाएंगी. उस औरत को रछपाल की बात जंच गई. रछपाल ने उस से जो कहा था, वह उस के लिए तैयार हो गई.

रछपाल ने औरत से बच्चे को जन्म देने के लिए कह तो दिया, लेकिन यह तय नहीं कर पाई थी कि वह उस बच्चे का करेगी क्या? इस के कुछ महीने बाद एक दिन रछपाल लुधियाना जा रही थी तो बस में उस की मुलाकात बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर से हो गई. तीनों एक ही सीट पर अगलबगल बैठी थीं. बातचीत शुरू हुई तो रछपाल ने उन्हें अपने बारे में बता कर उस महिला का किस्सा कह सुनाया. इस पर बलजिंदर और गुरमीत ने कहा, ‘‘वह बच्चा हमें दे देना, उस के लिए हम आप को एक लाख रुपए देंगे.’’

रछपाल की तो जैसे लौटरी लग गई. समय पर उस ने उस महिला की डिलिवरी करा कर उस से 2 हजार रुपए ले कर सर्टीफिकेट बना दिया कि उसे मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ था. इस के बाद रछपाल ने बच्चा बलजिंदर और गुरमीत को दे कर एक लाख रुपए ले लिए. दरअसल, बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर का यही धंधा था. वे नवजात बच्चा खरीद कर उसे दोगुनीतिगुनी कीमत पर निस्संतान लोगों को बेच देती थीं. यही नहीं, वे गर्भवती गरीब औरतों को एडवांस दे कर उन के पेट में पल रहे बच्चों का भी सौदा कर लेती थीं.

उन के गिरोह में कई आशा वर्करों के अलावा 2 महिलाएं और शामिल थीं. उन में एक थी परमजीत कौर. वह लुधियाना के जमालपुर के रहने वाले देवेंद्र सिंह की पत्नी थी. दूसरी थी मधु वर्मा. वह लुधियाना के बसंतनगर के रहने वाले मंजीत सिंह की विधवा थी. इस के बाद बलजिंदर और गुरमीत ने रछपाल कौर को असलियत बता कर उसे भी अपने गिरोह में शामिल कर लिया. इस के बाद रछपाल ने अपने पति तेजवीर सिंह को एक पुरानी मारुति कार दिला कर उसे भी इसी धंधे से लगा दिया.

पुलिस पूछताछ में इन लोगों ने 7 नवजात बच्चों को बेचने और गर्भ में पल रहे कई बच्चों का सौदा करने की बात स्वीकार की थी. इसी पूछताछ में यह भी पता चला था कि गुरमीत कौर और बलजिंदर कौर एक बार इसी तरह के मामले में फरीदकोट पुलिस द्वारा पकड़ी गई थीं. दोनों जमानत पर छूटी थीं. फरीदकोट की अदालत में अभी भी उन पर मुकदमा चल रहा है. एक बार फिर तेजवीर सिंह, रछपाल, बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

उसी दिन समरासा चौक से परमजीत कौर और मधु वर्मा को भी हिरासत में ले लिया गया. उन्हें भी 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर पूछताछ की गई. पूछताछ कर उन्हें भी अदालत के आदेश पर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. पुलिस के अनुसार, इस गिरोह ने पंजाब में अपना अच्छाखासा नैटवर्क बना रखा था. पुलिस इन से जुड़े तमाम लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी. इन लोगों ने जो बच्चा नकली ग्राहक शामलाल को बेचना चाहा था, उसे जिला फाजिल्का के गांव आरनीया के एक परिवार से ढाई लाख रुपए में खरीदा था.

लुधियाना पुलिस के वहां पहुंचने तक वह परिवार भूमिगत हो गया था. लुधियाना पुलिस इस मामले के पीछे हाथ धो कर पड़ी है. वह इस गिरोह से जुड़े हर आदमी को जल्दी से जल्दी गिरफ्तार करना चाहती है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, ठेकेदार शामलाल बदला हुआ नाम है Punjab Crime

Bhopal Crime Story: आधी हकीकत आधा फसाना

Bhopal Crime Story: कुछ लोग प्राकृतिक रूप से किन्नर होते हैं, जबकि कुछ को किन्नर बनाया जाता है. अबरार उर्फ सारिका के साथ भी ऐसा ही कुछ था. फैशनेबल सारिका जब शहर की सड़कों पर निकलती थी तो मनचलों की तो छोडि़ए, कई शरीफजादों तक की नीयत डोल जाती थी. पुराने भोपाल के कैंची छोला इलाके की रहने वाली इस खूबसूरत लड़की के बारे में लोग ज्यादा कुछ नहीं जानते थे. अलबत्ता कुछ लोगों को यह जरूर पता था कि सारिका हकीकत में लड़की नहीं, लड़का है, जिस का असली नाम अबरार है.

अबरार उर्फ सारिका भी उन लाखों लोगों में से एक था, जिस का जन्म तो लड़के के रूप हुआ था, लेकिन उस की शक्ल, सूरत, नजाकत और अदाएं लड़कियों जैसी थीं. आम बोलचाल की भाषा में ऐसे लोगों को किन्नर कहा जाता है. सारिका मूलरूप से कहां की रहने वाली थी, उस के मांबाप कौन थे, इस की जानकारी जिन लोगों को थी, उन में से अधिकांश अब जेल में हैं. कुछ दिनों पहले किन्नरों की एक टोली जो शहर में मंजू एंड पार्टी के नाम से जानी जाती थी, ने सारिका से ताल्लुक बढ़ाने के बाद झांसा दिया कि वह उन लोगों के साथ रहे और उन की टोली में शामिल हो जाए. काम के नाम पर उसे बधाई के समय बस उन के साथ डांस करना है. इस के एवज में उसे रोज 3 हजार रुपए मिलेंगे.

पेशकश बुरी नहीं थी. एक दिन में 3 हजार रुपए कमाना बड़ी बात थी, इसलिए सारिका मना नहीं कर पाई. मंजू एंड पार्टी भी उसे बेवजह इतना पैसा नहीं दे रही थी. दरअसल सारिका के जलवे और अदाएं देख कर पार्टी के सदस्यों को लगा था कि अगर वह भी उन के साथ आ जाए तो कमाई बढ़ जाएगी. वजह यह, हूबहू लड़कियों जैसे दिखने वाले किन्नरों की खासी पूछ रहती है. लोग इन पर पैसा लुटाने से परहेज नहीं करते. बातचीत के बाद सारिका ने टोली के साथ नाचनागाना शुरू कर दिया. साथसाथ काम करते हुए अभी कुछ ही दिन ही गुजरे थे कि सारिका पर शारीरिक रूप से किन्नर बनने का दबाव पड़ने लगा.

लेकिन सारिका के अंदर बैठे अबरार को यह मंजूर नहीं था. लिहाजा उस ने पूरी तरह किन्नर बनने से इनकार कर दिया. फलस्वरूप कुछ दिनों बाद ही मंजू एंड पार्टी ने उस पर चोरी का इलजाम लगा दिया. लेकिन तब तक अच्छाखासा पैसा कमा चुकी सारिका पर इस इलजाम का कोई खास फर्क नहीं पड़ा. वह इस की वजह भी समझ रही थी. अपने अतीत को छिपाए रखने वाली सारिका बीती 9 फरवरी, 2016 को अचानक उस समय सुर्खियों में आई जब उस ने जहांगीराबाद थाने जा कर यह रिपोर्ट लिखाई कि आधा दरजन किन्नरों ने उसे अगवा कर के किन्नर बना दिया.

उस दिन बदहवास सी सारिका जब पुलिस मुख्यालय में एसपी अंशुमान सिंह के पास पहुंची तो धारीदार फुल शर्ट और काले रंग की हाफ पैंट पहने थी. उसे देख कर एसपी ने भी यही सोचा कि इस लड़की के साथ जरूर कोई ज्यादती हुई है. बाद में पूछताछ करने पर सारिका ने पुलिस वालों को जो कुछ बताया, वह न केवल दिलचस्प था, बल्कि चौंका देने वाला भी था. सारिका के मुताबिक करीब 5 दिन पहले 6 किन्नर उस के घर आए और उसे अगवा कर के सुरैया मुजरा किन्नर के घर ले गए.

सुरैया किन्नर समुदाय का मुखिया है, इसलिए भोपाल में उसे सभी जानते थे. वह विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुका है. भोपाल का मंगलवारा इलाका किन्नरों की रिहाइश के लिए जाना जाता है. यहीं सुरैया मुजरा भी रहता है. सारिका ने आगे बताया कि किन्नर उसे मंगलवारा स्थित सुरैया के अड्डे पर ले गए और बेहोश कर दिया. 5 दिन बाद जब उसे होश आया तो उस का गुप्तांग गायब था. पूछने पर किन्नरों ने उसे बताया कि हम ने तुझे भी अपने जैसा बना दिया है.

सारिका उर्फ अबरार की जिंदगी में पहले से ही गमों की कमी नहीं थी, अब उसे यह बड़ा सदमा मिला था. वैसे किन्नर और उन की दुनिया उस के लिए नए और अनजाने नहीं थे. सच तो यह है कि धीरेधीरे उन की दुनिया उस की जिंदगी का हिस्सा बनती जा रही थी. ज्ञापन में उन्होंने बताया कि नकली किन्नरों के लीडर निम्मा और सुनील हैं. इन के ग्रुप में नैना, बुलबुल, तानिया, दिव्या, रूपाली, अलकिया, बिहारन, हिना, छमिया, बिल्लो, नेहा, रानी और सारिका शामिल हैं.

सारिका की बात सुन कर एसपी अंशुमान सिंह ने उसे रिपोर्ट लिखाने के लिए जहांगीराबाद थाने भेज दिया. जहां सारिका ने थाने में 6 किन्नरों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई. इन में सब से ऊपर जो नाम थे, उन में प्रमुख थे सुरैया मुजरा, खुशी और काजल. मामला पुलिस तक पहुंच गया था, इसलिए किन्नर गुटों के बीच भीतरी तौर पर तलवारें खिंचने लगी थीं.

सारिका के साथ जहां घटना घटी थी, वह इलाका मंगलवारा थानाक्षेत्र में आता था, इसलिए इस केस को मंगलवारा थाने में ट्रांसफर कर दिया गया. थाना पुलिस ने मैडिकल जांच के लिए सारिका को अस्पताल भेज दिया. इस दौरान सुरैया और उस के साथी किन्नर नेताओं, पत्रकारों, अफसरों और वकीलों के चक्कर काटते रहे. क्योंकि पुलिस ने आरोपी किन्नरों सुरैया, शिल्पा, सबा, नीतू और शबाब आदि के खिलाफ धारदार हथियार से जान लेने की कोशिश करने, बंधक बनाने, मारपीट करने और जान से मारने की धमकी देने का मामला दर्ज कर लिया था.

उसी दिन खुद को असली बताने वाले नगर के किन्नरों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया. उन का कहना था कि कुछ नकली किन्नर नाचगा कर पैसा वसूल रहे हैं, जिस से उन की छवि भी बिगड़ रही है और रोजीरोटी पर भी संकट खड़ा हो गया है. किन्नरों के एक गुट ने राजभवन जा कर राज्यपाल रामनरेश यादव के नाम एक ज्ञापन भी दिया था. सुरैया और उस के साथियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो गया तो गिरफ्तारी से बचने के लिए पांचों किन्नर फरार हो गए. लेकिन मुखबिर की सूचना पर सबा और नीतू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उन का कहना था कि अबरार उर्फ सारिका अपनी मरजी से किन्नर बना है. पूछताछ के बाद गिरफ्तार हुए किन्नरों को जेल भेज दिया गया.

जो किन्नर फरार चल रहे थे, उन्होंने अपर सत्र न्यायाधीश दिनेश प्रसाद मिश्रा की अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने उन की जमानत की अर्जी खारिज कर दी. आखिरकार 24 फरवरी, 2016 को पुलिस ने किन्नर वाली गली से सुरैया और सबा को भी धर दबोचा. दोनों को अदालत में पेश कर के उन का पुलिस कस्टडी रिमांड लिया गया, ताकि उन से विस्तृत पूछताछ की जा सके.

पूछताछ के बाद उन्हें अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. अब यह अदालत तय करेगी कि सारिका का गुप्तांग जबरन काटा था या इस में उस की कोई रजामंदी थी. और थी भी तो इस संबंध में कानून क्या कहता है. किन्नर जब इस तरह किसी का लिंग काट कर उसे किन्नर बनाते हैं तो कोई समारोह आयोजित नहीं करते और न ही पुलिस को सूचना देते हैं. असली किन्नर कौन और नकली किन्नर कौन, इस का कोई तयशुदा पैमाना नहीं है.

बहरहाल इस घटना से मध्य प्रदेश सरकार की किन्नरों को मुख्यधारा में जोड़ने की कोशिशों को झटका लगा है. पिछले साल किन्नर घरघर जा कर ताली बजाते सरकारी टैक्स वसूली करते नजर आए थे. इस साल उन्हें लोगों को हेलमेट पहनने के लिए जागरूक करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. कुछ दूसरी सरकारी योजनाओं का भी प्रचारप्रसार उन से करवाया गया था. खास बात यह कि सरकार की ओर से बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में उन के लिए अलग से स्टडी सेंटर खोलने की मंजूरी दी गई है.

इस लड़ाई के बाद किन्नरों का पुराना गुट तितरबितर हो गया है, जबकि एक नया गुट वजूद में आ रहा है. बहरहाल यह किन्नर वार कब, कैसे और कहां जा कर थमेगा, यह कह पाना मुश्किल है. Bhopal Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Andhra Pradesh: प्रेम के लिए हुई खौफनाक हत्या – मोनिका का शरीर टुकड़ों में मिला

Andhra Pradesh: प्यार से जुड़ा एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिस ने हर किसी को हैरान कर दिया है. इस घटना में एक प्रेमिका अपने प्रेमी के घर गई थी, क्योंकि प्रेमी ने उसे बताया कि उस की पत्नी कुछ दिनों के लिए मायके चली गई है. पत्नी के जाते ही प्रेमी ने महिला को घर बुला लिया, लेकिन वहां क्या हुआ कि अब उस के शव के टुकड़े बरामद हुए. आइए जानते हैं इस क्राइम की पूरी कहानी, जो आप को सावधान करेगी.

यह मामला आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम शहर से सामने आया है. जहां मोनिका और रविंद्र के बीच प्रेम प्रसंग चल रहा था. रविंद्र नेवी में टेक्नीशियन है और विजयनगरम जिले के राजम का निवासी है. पुलिस रिपोर्ट्स के अनुसार, रविंद्र की पत्नी कुछ हफ्ते पहले अपने मायके चली गई थी, जिस से वह घर में अकेला रह गया. रविंद्र के फोन करने पर रविवार दोपहर को मोनिका उन के घर पहुंची. दोनों कई घंटों तक घर में रहे, लेकिन बताया जा रहा है कि शाम को उन के बीच किसी बात पर विवाद हो गया.

गुस्से में आ कर रविंद्र ने चाकू का इस्तेमाल करते हुए मोनिका की हत्या कर दी. इस के बाद उस ने महिला के शव को टुकड़ों में काट दिया. रविंद्र ने शव के कुछ हिस्सों को नष्ट कर दिया और बाकी अंगों को अपने फ्रिज में रखा. आरोप है कि उस ने शरीर के कुछ अंगों को बैग में पैक कर किसी सुनसान जगह पर फेंक दिया, जबकि बाकी अंगों को फ्रिज में रख लिया.

पुलिस ने बताया कि रविंद्र बाद में थाने जाकर अपने अपराध को कबूल कर दिया और सरेंडर कर दिया. अधिकारियों ने उसके घर से शव के कुछ अंग बरामद किए, लेकिन सिर गायब था.

पुलिस को शक है कि उस ने सिर को कहीं और ठिकाने लगाया है. सिर और अन्य अंगों का पता लगाने के लिए पुलिस की विशेष टीम गठित की गई है. Andhra Pradesh

UP Crime: भंवरजाल में फंसी लड़की

UP Crime: रिंकू की हत्या के आरोप में पुलिस ने उस के घर वालों के दबाव में बवाल से बचने के लिए उस की दोस्त राशि और उस के घर वालों को जेल भेज कर जो गलती की, उस से उस की शादी तो टूटी ही, शायद इस की कीमत उसे आगे भी चुकानी पड़ेगी. जबकि रिंकू के mहत्यारे कोई और थे.

पुलिस गिरफ्त में बैठी राशि के चेहरे पर उदासी थी तो आंखों में आंसुओं का सैलाब. चंद घंटों में ही वह ऐसे बुरे हालात में उलझ गई थी, जिस की उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. एक महीने बाद ही उस की शादी होने वाली थी. जिस भंवर में वह फंसी थी, उस की वजह से उसे डर लग रहा था कि कहीं उस की शादी न टूट जाए. बदनामी की वजह से राशि को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा था. उस ने पुलिस को जो बयान दिया था, उस में विरोधाभास होने की वजह से पुलिस को उसी पर शक हो गया था. इस चक्रव्यूह से वह बाहर कैसे निकले, इस का कोई रास्ता उसे नजर नहीं आ रहा था. पुलिस अधिकारी उस से कई दौर की पूछताछ कर चुके थे.

थानाप्रभारी ने एक बार उस से फिर कहा, ‘‘देखो राशि, अगर तुम हमें सब कुछ सचसच बता दोगी तो शायद हम तुम्हारी कोई मदद कर सकें, वरना हमारे हाथ भी बंधे हैं.’’

‘‘सर, मैं बिलकुल सच बोल रही हूं. आखिर आप मेरा विश्वास क्यों नहीं करते. प्लीज मुझे छोड़ दीजिए.’’ वह हाथ जोड़ कर बोली.

‘‘मामला कत्ल का है. वैसे भी अब तक तुम 2 बार अपना बयान बदल चुकी हो.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘सर, मैं सच कह रही हूं कि मैं ने रिंकू की हत्या नहीं की. मैं भला उसे क्यों मारूंगी. वह तो मेरा दोस्त था.’’ कह कर राशि फिर रोने लगी. राशि अपनी बात पर अडिग थी और खुद को बेगुनाह कह रही थी. पुलिस के पास उस के खिलाफ कोई सबूत या गवाह भले ही नहीं था, पर परिस्थितियां उस के खिलाफ थीं.

दरअसल, 12 दिसंबर, 2015 की शाम को उत्तर प्रदेश के जनपद मेरठ के थाना मैडिकल पुलिस को सूचना मिली थी कि लोहिया नगर की निर्माणाधीन रिंग रोड पर बदमाशों ने एक युवक को पीटपीट कर घायल कर दिया है. सूचना पा कर तत्कालीन थानाप्रभारी बचन सिंह सिरोही पुलिस बल के साथ सूचना में बताई जगह पर पहुंच गए थे. वहां सचमुच 25-26 साल का एक युवक पड़ा था. उस के सिर से खून बह रहा था. वहीं पर एक मोटरसाइकिल खड़ी थी. पुलिस को जिस युवती ने सूचना दी थी, वह भी अपने घर वालों के साथ वहां मौजूद थी. पुलिस ने तुरंत युवक को इलाज के लिए अस्पताल भिजवाया, लेकिन वहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. थानाप्रभारी की सूचना पर सीओ बी.एस. बीर कुमार भी वहां पहुंच गए थे.

पूछताछ में पुलिस को पता चला कि मरने वाले युवक का नाम रिंकू कुमार था और वह मेरठ के ही कस्बा सरधना के गांव इकड़ी निवासी जयपाल का एकलौता बेटा था. जयपाल स्टेट बैंक में क्लर्क थे, जबकि रिंकू इंडियन ओवरसीज बैंक में नौकरी करता था. नौकरी के साथ वह आईएएस की तैयारी भी कर रहा था. रिंकू की तैनाती चूंकि शहर के गंगानगर क्षेत्र में थी, इसलिए वह शहर के शेरगढ़ी इलाके में अपनी रिश्तेदारी में रहता था. घटनास्थल पर जो युवती मौजूद थी, उस का नाम राशि त्यागी था. वह एक इंस्टीट्यूट में असिस्टैंट मैनेजर थी. वह भी रिंकू के ही गांव की रहने वाली थी और मेरठ के शास्त्रीनगर में अपने नाना के घर रहती थी.

दोनों एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए उन के बीच गहरी दोस्ती थी. दोनों के घर वाले भी इस बात को जानते थे. पुलिस ने रिंकू की मौत की जानकारी उस के घर वालों को भी दे दी थी. राशि ने पुलिस को जो बयान दिया था, उस के मुताबिक शाम करीब 6 बजे वह और रिंकू तेजगढ़ी चौराहे के पास खड़े बातचीत कर रहे थे, तभी मोटरसाइकिल सवार 3 युवक उस का पर्स छीन कर भागे. उस ने और रिंकू ने मोटरसाइकिल से लुटेरों का पीछा किया. पीछा करते हुए वे लोहियानगर सड़क पर पहुंचे तो वह इलाका एकदम सुनसान था.

बदमाशों ने वहां अपनी मोटरसाइकिल रोक दी तो रिंकू ने उन से पर्स वापस मांगा. बदमाश उस के साथ मारपीट करने लगे. उस ने रिंकू को बचाने की कोशिश की तो बदमाशों ने उसे भी पीटा.  रिंकू ने एक बदमाश को पकड़ रखा था. अपने साथी को छुड़ाने के लिए दूसरे बदमाश ने उस पर लोहे की रौड से हमला कर दिया, जिस से रिंकू की मौत हो गई. इस के बाद बदमाश उस का पर्स छोड़ कर भाग गए. उस ने इस बात की जानकारी पहले अपने घर वालों को, उस के बाद पुलिस को दी. एसएसपी डी.सी. दुबे ने इस मामले में तुरंत काररवाई करने के निर्देश दिए थे. इस बीच रिंकू के घर वाले भी आ गए थे. उन्होंने राशि और उस के घर वालों पर ही रिंकू की हत्या का आरोप लगा दिया था.

आरोपों और हालात के चलते राशि शक के दायरे में आ गई. इस की वजह भी थी, एक तो सोचने वाली बात यह थी कि पर्स लूटने पर उस ने शोर क्यों नहीं मचाया, दूसरे उस ने पुलिस से पहले अपने घर वालों को क्यों सूचना दी. वह चाहती तो उसी समय पुलिस कंट्रोल रूम के नंबर पर फोन कर सकती थी. पुलिस जब मौके पर पहुंची थी, उस के घर वाले वहां मौजूद थे. राशि चाहती तो पर्स लुटने के बाद बदमाशों का पीछा करते हुए शोर मचा सकती थी, लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया था.

पुलिस ने तेजगढ़ी चौराहे पर भी जा कर पूछताछ की थी. लेकिन वहां कोई भी शख्स ऐसा नहीं मिला था, जिस ने पर्स लूट की वारदात को देखा हो. राशि का शोर न मचाना संदेह पैदा कर रहा था. यह भी बड़ा सवाल था कि बदमाशों ने रिंकू की हत्या कर दी थी, जबकि राशि के साथ सिर्फ मारपीट की थी. इस के बावजूद राशि के घुटने पर मामूली खरोंच के अवाला कोई बड़ी चोट नहीं आई थी. दूसरी तरफ रिंकू के घर वालों ने आरोप लगाया था कि राशि ने धोखे से रिंकू को अपने पास बुला कर घर वालों के साथ षड्यंत्र रच कर रिंकू की हत्या की है. उन की तहरीर पर पुलिस ने राशि, उस के पिता ब्रजमोहन त्यागी, मामा कुलवीर त्यागी, भाई विक्रांत त्यागी और अन्य लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 302/34/147/148/149 व अनुसूचित जाति एवं जनजाति अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था.

पुलिस ने उसी समय राशि, उस के पिता व मामा को हिरासत में ले लिया था. रिंकू के घर वालों को किसी तरह पता चल गया था कि पुलिस हिरासत में आरोपियों से मामूली पूछताछ कर के छोड़ दिया जाएगा, इसलिए उन्होंने राशि व उस के घर वालों को जेल भेजे जाने की मांग को ले कर थाने में हंगामा शुरू कर दिया. उन का गुस्सा इतना बढ़ा कि उन्होंने थाने में तोड़फोड़ कर दी. हंगामे की सूचना पर तत्कालीन डीआईजी आशुतोष कुमार, रैपिड ऐक्शन फोर्स की टुकड़ी व आसपास के थाना की पुलिस ने पहुंच कर बमुश्किल हालात पर काबू पाया.

पुलिस ने तोड़फोड़ करने वालों के खिलाफ भी कांस्टेबल प्रकाशवीर की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर लिया था. पुलिस ने एक बार फिर राशि से पूछताछ की तो उस ने अपना बयान बदल दिया. इस बार उस ने बताया कि वह और रिंकू मिलते थे. दोनों ने शाम को इधर घूमने का प्रोग्राम बनाया. तय समय पर वह तेजगढ़ी चौराहे पर पहुंची तो रिंकू उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर अपने साथ लोहियानगर ले गया. उस वक्त वहां सुनसान था. वहां खड़े हो कर वे बातचीत कर रहे थे कि तभी कुछ लड़के वहां आ गए. लड़कों ने उस के साथ छेड़छाड़ की तो रिंकू ने विरोध किया. इसी बीच लड़कों ने रिंकू के सिर पर किसी चीज से प्रहार कर दिया. उस के लहूलुहान होते ही लड़के भाग गए. रिंकू अचेत हो चुका था.

वह रिंकू को बचाना चाहती थी. 4 फरवरी, 2016 को उस की शादी होने वाली थी. इसलिए वह बुरी तरह डर गई. उस की समझ में नहीं आया तो वह घर पहुंची और अपने मामा कुलवीर त्यागी को इस बारे में बताया. घर पर उस ने अपने कपड़े बदले और दोबारा उसी जगह आ गई, जहां रिंकू पड़ा था. इस के बाद पुलिस को सूचना दी. वह चाहती थी कि उस की बदनामी न हो, इसलिए उस ने पर्स लूट की झूठी कहानी गढ़ दी. पुलिस के लिए यह मामला चुनौती बन चुका था. राशि कितना सच बोल रही थी, यह वही जानती थी, लेकिन परिस्थिजन्य साक्ष्य उस के खिलाफ थे. वारदात उस के अलावा किसी दूसरे ने नहीं देखी थी.

यही वजह थी कि पुलिस उस से बारबार पूछताछ कर रही थी. उस का रोरो कर बुरा हाल था और वह हत्या से इंकार कर रही थी. राशि के पिता और मामा भी खुद को बेगुनाह बता रहे थे. पर पुलिस को मामला औनर किलिंग का लग रहा था. इसलिए पुलिस ने राशि, ब्रजमोहन और कुलदीप को गिरफ्तार कर के अगले दिन अदालत में पेश किया, जहां से तीनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था.

राशि के कुछ रिश्तेदारों ने एसएसपी से मिल कर कहा कि रिंकू के हत्यारे कोई और ही हैं, इसलिए इस केस की जांच फिर से कराई जाए, ताकि असली हत्यारे गिरफ्तार हो सकें और कोई बेगुनाह न फंसे. इसलिए एसएसपी ने एसपी (सिटी) ओमप्रकाश सिंह के निर्देशन में एक टीम का गठन किया, जिस में एसओजी टीम के प्रभारी एसआई संजीव यादव व अन्य को शामिल किया गया. उधर कई दिनों बाद पुलिस ने फरार आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया तो रिंकू के घर वाले उन्हें भी गिरफ्तार करने का दबाव बनाने लगे. इस तरह पुलिस के ऊपर दोनों ओर से दबाव पड़ रहा था.

रिंकू की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ चुकी थी. रिपोर्ट में उस के सिर के पिछले हिस्से और कनपटी के बाईं ओर चोट के निशान पाए गए थे. वही उस की मौत की वजह भी बने थे. पुलिस ने राशि के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. इस के अलावा घटना के समय उस क्षेत्र के मोबाइल टावरों के संपर्क में जोजो मोबाइल संचालित थे, उन का ब्यौरा एकत्र किया गया. सैकड़ों नंबरों का रिकौर्ड पुलिस को मिला. एक महीने तक पुलिस उसी में संदिग्ध नंबरों को खंगालती रही. इसी बीच थानाप्रभारी का ट्रांसफर हो गया. रविंद्र वशिष्ठ को मैडिकल थाने का प्रभारी बनाया गया. उन्होंने जांच में तेजी दिखाते हुए मुखबिरों को सक्रिय कर दिया. उधर एसओजी टीम ने संदिग्ध फोन नंबरों की सूची बना कर उन पर काम शुरू किया.

उन में से कुछ नंबर घटना के बाद कई दिनों तक बंद रहे थे. वे नंबर बंद क्यों रहे, इस पर पुलिस को शक हुआ. जांच में पता चला कि वे नंबर रिंग रोड से सटे गांव सरायकाजी के लड़कों के थे. पुलिस ने मुखबिरों की मदद से उन लड़कों के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वे आवारा प्रवृत्ति के लड़के थे और शाम को अकसर निर्माणाधीन रिंग रोड पर जा कर नशा करते थे. एसपी सिटी ओमप्रकाश सिंह, जो लगातार पुलिस टीम की जांच की मौनीटरिंग कर रहे थे, उन्हें भी लगा कि जांच सही दिशा में जा रही है. जो लड़के वहां नशा करने जाते थे, पुलिस ने उन की सूची बना ली. इस के बाद पूछताछ के लिए उन्हें 4 फरवरी, 2016 को थाने ले आई. थाने में जब उन से पूछताछ की गई तो उन्होंने आसानी से स्वीकार कर लिया कि रिंकू की हत्या उन्होंने ही की थी.

इस के बाद पुलिस ने एकएक कर के 11 लड़कों को गिरफ्तार कर लिया. इन लड़कों में थे नितिन पोल, अरुण उर्फ साइड गंजा, अक्षय सैनी, राहुल कुमार, नीटू, राजन, संजय उर्फ रिंकू, अंकित उर्फ लाला, विजय, सुरेंद्र उर्फ रफी और राजू. इन सब से पूछताछ के बाद रिंकू की हत्या की वजह तो सामने आई ही, साथ ही राशि के दामन पर जो कत्ल का दाग लगा था, वह भी धुल गया. राशि और रिंकू के परिवार इकड़ी गांव में आसपास रहते थे. दोनों के बीच बचपन की दोस्ती थी. बाद में दोनों ने मेरठ आ कर उच्च शिक्षा हासिल की तो यहां भी दोस्त बने रहे. यह दोस्ती दोनों की नौकरी करने तक जारी रही. उन की दोस्ती से उन के घर वाले भी वाकिफ थे.

दिसंबर, 2015 में राशि का रिश्ता उस के घर वालों ने सहारनपुर जिले के एक लड़के से तय कर दिया और विवाह की तारीख भी 4 फरवरी, 2016 रख दी. दोनों के बीच अकसर मुलाकातें होती रहती थीं. 12 दिसंबर को भी दोनों मिले और बातचीत करने के लिए निर्माणाधीन रिंग रोड पर पहुंच गए. सुनसान जगह पर दोनों ने बैठ कर बातें कीं और जैसे ही वहां से चलने लगे, वे आवारा लड़के उन के पास आ गए. दरअसल, ये लड़के भांग का नशा करते थे और शाम ढले अकसर उस सुनसान रोड पर टहलने निकल जाते थे. इस की वजह यह थी कि एकांत की वजह से प्रेमी युगल वहां आ जाते थे, जिन से वे छेड़छाड़ करते थे. अगर कोई विरोध करता था तो वे उस के साथ मारपीट भी करते थे. प्रेमी युगल बदनामी की वजह से इस की शिकायत पुलिस से करने के बजाय चुपचाप चला जाता था. इस से उन नशेडि़यों के हौसले बढ़े थे.

12 दिसंबर, 2015 को भी वे नशेड़ी लड़के निर्माणाधीन रिंग रोड की तरफ गए. वहां रिंकू और राशि बातें कर रहे थे. उस दिन उन नशेडि़यों ने तय कर लिया कि वे आज लड़की के साथ दुष्कर्म करेंगे. यही सोच कर वे उन की ओर बढ़े तो रिंकू व राशि को थोड़ा शक हुआ. रिंकू ने तुरंत मोटरसाइकिल स्टार्ट की और राशि को बिठा कर चल पड़ा. तभी नितिन पोल ने एक पत्थर उठा कर मारा. पत्थर रिंकू को लगा तो वह मोटरसाइकिल सहित गिर पड़ा. उन के गिरते ही लड़के उन के पास पहुंच गए और राशि से छेड़छाड़ करने लगे.

वे रशि को सड़क से नीचे खेत में खींच ले गए. राशि चिल्लाई तो उन्होंने उसे पीट कर चुप करा दिया. गिरने से उस के घुटने में खरोंच आ गई थी. रिंकू जल्दी से उठा और खेत में पहुंच गया. वह उन के चंगुल से राशि को छुड़ाने लगा. दूरदूर तक उन्हें बचाने वाला कोई नहीं था. रिंकू उन लड़कों से भिड़ गया तो अरुण उर्फ साइड गंजा ने सरिया से उस के सिर पर वार कर दिया. रिंकू खून से लथपथ हो कर गिर गया. तभी किसी कार की लाइट दिखाई दी तो लड़के वहां से भाग खड़े हुए.

राशि बुरी तरह डर गई थी. उस की समझ में कुछ नहीं आया. कुछ दिनों बाद उस की शादी होने वाली थी. इज्जत पर खतरा था, इसलिए वह रिंकू को वहीं छोड़ कर अपने मामा के पास पहुंची और उन्हें पूरी बात बताई. वह उस के साथ घटनास्थल पर आए और इस के बाद राशि ने पुलिस को सूचना दे दी. यह उस की बदकिस्मती थी कि हालात पूरी तरह से राशि के खिलाफ चले गए. तफ्तीश को समय न दिया जाए तो कई बार पुलिस न चाहते हुए भी जन दबाव में इस तरह की गलती कर बैठती है. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ. पुलिस ने किसी भी तरह के बवाल से बचने के लिए आननफानन में राशि और उस के घर वालों को जेल भेज दिया था.

वारदात के अगले दिन जब उन आवारा लड़कों को पता चला था कि जिस लड़के पर उन्होंने हमला किया था, उस की मौत हो गई है तो वे डर गए. कई ने डर की वजह से अपने मोबाइल फोन कई दिनों तक बंद रखे. इस मामले में पुलिस क्या कर रही है, जानने के लिए वे रोजाना अखबार पढ़ते थे. जब पुलिस ने इस मामले में राशि और उस के घर वालों को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया तो वे नशेड़ी बहुत खुश हुए. बाद में उन्होंने अपने मोबाइल फोन चालू कर लिए और मजे से रहने लगे कि पुलिस उन तक नहीं पहुंच पाई. लेकिन अचानक वे पकड़े गए.

पुलिस ने सभी आरोपियों को मीडिया के सामने पेश कर के पूरी कहानी का खुलासा किया और अगले दिन यानी 5 फरवरी, 2018 को सभी को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस राशि और उस के घर वालों को जेल से रिहा कराने की दरख्वास्त अदालत में पेश कर चुकी थी.

जिस लड़के के साथ राशि की शादी तय हुई थी, उस ने शादी तोड़ दी है. पुलिस द्वारा रिंकू के हत्यारों के गिरफ्तार होने के बाद राशि के दामन पर रिंकू के कत्ल का लगा दाग भले ही धुल गया, लेकिन हालात में उलझ कर उसे जो कीमत चुकानी पड़ी, उस की भरपाई शायद ही हो पाएगी. आवारागर्दी में उलझे उन लड़कों ने होनहार युवक रिंकू की तो जान ली ही, साथ ही अपना भी भविष्य बरबाद कर लिया. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित