Bride Scam : कातिल बनी दुल्हन

Bride Scam. निर्मल के बातबात में गुस्से से तंग आ कर उस की पत्नी दीप्ति दोनों बच्चों को ले कर मायके चली गई थी. निर्मल जैसेतैसे अपने दिव्यांग बेटे भरत को ले तो आया, पर उस की देखभाल के लिए उस ने 2 शादियां की. पहली बीवी उस के गुस्से को बरदाश्त नहीं कर सकी, जबकि दूसरी ने ऐसा खेल खेला कि…

उत्तर प्रदेश के शहर आगरा के थाना शाहगंज के गांव सहारा मिठाकुर के रहने वाले हरीसिंह सोलंकी सेना में नौकरी करते थे. उन का परिवार गांव में ही रहता था. इस परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे और 3 बेटियां थीं. बड़ा बेटा रणवीर एयरफोर्स में था और अपने परिवार के साथ गुड़गांव में रहता था. उस से छोटा दर्शन सिंह बैंक में था और गाजियाबाद में रहता था. सब से छोटा निर्मल सिंह सौफ्टवेयर इंजीनियर था, जो दिल्ली की किसी कंपनी में नौकरी करता था.

शादी के बाद निर्मल सिंह ने आगरा के सेक्टर 4 स्थित आवासविकास कालोनी में छोटी बहन विशेष के पड़ोस में मकान खरीद लिया था और पत्नी दीप्ति के साथ उसी में रहने लगा था. दीप्ति बीए तक पढ़ी थी. वह आगरा के ही मुरली विहार की रहने वाली थी. उस के पिता एयरफोर्स में नौकरी करते थे.

शुरूशुरू में तो निर्मल का दांपत्य सुखद रहा. दीप्ति ने बीएड की इच्छा जाहिर की तो निर्मल ने अनुमति दे दी. जब दीप्ति बीएड कर रही थी, तभी वह गर्भवती हो गई. समय आने पर उस ने बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम हिलोरी रखा गया. बेटी के पैदा होने के बाद दीप्ति का बीएड पूरा हो गया.

निर्मल की नौकरी दिल्ली में थी और वह रहता आगरा में था. नौकरी के लिए वह रोजाना आगरा से दिल्ली आताजाता था. इस की वजह यह थी कि वह पत्नी को बहुत प्यार करता था. हिलोरी 2 साल की हुई तो दीप्ति एक बार फिर गर्भवती हो गई, इसी बीच निर्मल को कंपनी की ओर से अमेरिका जाने का औफर मिला तो उस ने अमेरिका जाने की तैयारी शुरू कर दी. संयोग से जिस दिन उसे अमेरिका जाना था, उसी दिन दीप्ति ने बेटे को जन्म दिया.

निर्मल को बेटा जरूर पैदा हुआ, लेकिन उस के पैदा होने की किसी को खुशी नहीं हुई. इस की वजह यह थी कि बच्चा अपाहिज था. पैदा होते ही उसे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा था. एक ओर पत्नी और विकलांग बच्चा अस्पताल में भर्ती था, दूसरी ओर निर्मल को अमेरिका जाना था. स्थिति बहुत ही अजीब और संकट वाली थी.

निर्मल ने काफी सोचाविचारा, दीप्ति और बच्चे की देखभाल के लिए तो पूरा परिवार था, जिस से आराम से उन की देखभाल हो सकती थी. लेकिन अगर वह अमेरिका नहीं गया तो पता नहीं दोबारा मौका मिले या न मिले, यही सोच कर वह पत्नी और बेटे को उन की हालत पर छोड़ कर अमेरिका चला गया.

दीप्ति को पति का यह फैसला उचित नहीं लगा. पति का यह रवैया उसे मन में फांस की तरह चुभ गया. अपाहिज बच्चे को जन्म दे कर वह अपना दर्द पति के साथ सांझा करना चाहती थी, पर पति 7 समंदर पार चला गया था. बेटे का नाम भरत रखा गया.

अमेरिका से निर्मल फोन द्वारा बेटे और पत्नी का हालचाल लेता रहता था. एक साल बाद निर्मल अमेरिका से लौट आया. उस के आने से घर में खुशी छा जानी चाहिए थी. लेकिन हालात कुछ ऐसे थे कि घर में खुशहाली नहीं आई.

इस की वजह एक तो पतिपत्नी के बीच विकलांग बच्चा था, दूसरे निर्मल का गुस्सा. बच्चे की जैसेजैसे उम्र बढ़ रही थी, उसी के साथसाथ उस की विकलांगता भी बढ़ती जा रही थी. बच्चा बिस्तर से उठ नहीं पाता था. उसे ले कर पतिपत्नी तनाव में रहते थे. बातबात में दोनों के बीच लड़ाईझगड़ा होना आम बात हो गई थी.

निर्मल की सब से बड़ी कमजोरी यह थी कि उसे गुस्सा बहुत जल्दी आ जाता था. गुस्से में वह इस तरह आक्रामक हो जाता था कि दीप्ति पर हाथ तक उठा देता था. जल्दी ही निर्मल का यह व्यवहार दीप्ति के लिए असहनीय हो गया. तंग आ कर उस ने निर्मल को चेतावनी दे दी कि अगर उस का यही रवैया रहा तो वह घर छोड़ कर चली जाएगी. इस के बावजूद निर्मल खुद पर काबू नहीं रख पाया. इस की वजह शायद यह थी कि उसे लगता था कि दिव्यांग बच्चा दीप्ति की गलती से पैदा हुआ है.

धीरेधीरे हालात बेकाबू होते जा रहे थे. पति की हरकतों से तंग आ कर दीप्ति ने अपने मांबाप से भी कह दिया कि अब वह निर्मल के साथ नहीं रह सकती. मांबाप ने भी दामाद को समझाया, लेकिन निर्मल की आदतों में कोई सुधार नहीं आया. जब बात बरदाश्त के बाहर हो गई तो दीप्ति दोनों बच्चों को ले कर मायके चली गई. निर्मल ने सोचा कि 2-4 दिनों में गुस्सा शांत हो जाएगा तो दीप्ति वापस आ जाएगी. लेकिन दिन क्या, महीने गुजर गए, वह लौट कर नहीं आई.

निर्मल को अभी भी उम्मीद थी कि एक न एक दिन दीप्ति जरूर आ जाएगी. लेकिन उस की उम्मीद तब टूट गई, जब उस की ओर से तलाक का नोटिस आ गया. नोटिस आने से वह हैरान तो रह ही गया, उस की उम्मीद भी टूट गई. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि दीप्ति ऐसा भी कर सकती है. अब वह यह सोचने को मजबूर हो गया कि क्या उन के संबंध इतने खराब हो गए थे कि सुधर नहीं सकते थे.

निर्मल ने पत्नी को मनाने की काफी कोशिश की, लेकिन दीप्ति ने उस से मिलने से साफ मना कर दिया. अब दोनों की मुलाकात अदालत की सीढि़यों पर अजनबियों की तरह होती थी. पत्नी तो गई ही थी, अपने साथ बच्चों को भी ले गई थी. इसलिए वह एकदम अकेला पड़ गया था.

दिन भर का थकामांदा वह घर लौटता तो घर में अंधेरा होता. कोई उजाला करने वाला तक नहीं था. इस सब से उसे दुनिया वीरान सी लगने लगी. वह हमेशा तनाव में रहता. जिंदगी उसे किस ओर ले जा रही है, उसे पता ही नहीं था. नौकरी में भी उस का मन नहीं लगता था. हर तरह से संपन्न होने के बावजूद उस के हाथ खाली थे.

गृहस्थी का सुख शायद निर्मल के हिस्से में था ही नहीं. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि तलाक के बाद वह क्या करेगा? उस के अन्य भाईबहन अपनीअपनी दुनिया में मस्त थे. किसी को उस के दर्द का अहसास नहीं था. सन 2012 में उस का दीप्ति से तलाक हो गया तो सारी उम्मीद खत्म हो गईं. इस बीच दीप्ति को अध्यापिका की नौकरी मिल गई थी. अब वह आर्थिक रूप से सक्षम हो गई थी और अपने दोनों बच्चों को आराम से पालपोस सकती थी.

बच्चों के साथ होने की वजह से दीप्ति निर्मल से ज्यादा खुश थी. निर्मल की तरह वह अकेली नहीं थी. निर्मल बच्चों को अपने घर लाना चाहता था, लेकिन इस के लिए न तो उस के पास समय था, न समझदारी. फिर भी एक दिन वह जबरदस्ती बेटे को उठा लाया. लाना तो वह बेटी को भी चाहता था, लेकिन उसे ला नहीं पाया. बेटे के बहाने अब उसे जीने का मकसद मिल गया था.

कुछ दिनों तक दिव्यांग भरत की देखभाल निर्मल की बहन करती रही, पर निर्मल को लगा कि यह ठीक नहीं है. उसे इस बात का डर सताता रहता था कि उस के बाद विकलांग भरत का क्या होगा? वह भरत को इस लायक बनाना चाहता था कि वह बिना किसी सहारे के अपनी जिंदगी जी सके.

उस ने अच्छे से अच्छे डाक्टरों से उस का इलाज कराने के साथसाथ लाखों रुपए के उस की जरूरत के सामान खरीद दिए. यही नहीं, उस ने शास्त्रीनगर के एक अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूल में उस का दाखिला भी करा दिया. भरत स्कूल वैन से स्कूल जाने लगा. लेकिन कुछ दिनों बाद स्कूल प्रशासन ने भरत को स्कूल ले आने और घर पहुंचाने की जिम्मेदारी से हाथ खींच लिए तो निर्मल खुद उसे स्कूल पहुंचाने और घर लाने लगा.

लेकिन इस के लिए निर्मल को नौकरी छोड़नी पड़ी. अब वह घर पर ही रह कर काम करते हुए बेटे की देखभाल करने लगा. ऐसी स्थिति में उसे पत्नी की कमी महसूस होने लगी. उस के पास किसी चीज की कमी तो थी नहीं, इसलिए उस की शादी अभी भी आराम से हो सकती थी. पत्नी की जरूरत महसूस हुई तो निर्मल ने अपने मथुरा वाले बहनोई राकेश से बात की. राकेश से उस की कुछ ज्यादा ही पटती थी.

राकेश को भी लगा कि अगर घर में एक औरत आ जाएगी तो निर्मल की बहुत सारी समस्याओं का निदान हो जाएगा. वह बेटे की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगा तो कहीं नौकरी कर लेगा.

इस के बाद वैवाहिक विज्ञापन देखे जाने लगे. कई जगहों पर बातचीत करने के बाद निर्मल ने मेघालय की अंजना (बदला हुआ नाम) को पसंद कर लिया. दोनों की शादी हो गई. अंजना दुलहन बन कर निर्मल के घर आ गई. शादी से पहले निर्मल ने अंजना को अपने दिव्यांग बेटे के बारे में बता दिया था, इसलिए भरत को ले कर उस के मन में कोई दुराव नहीं था.

लेकिन अंजना ने खुशियां पाने के लिए शादी की थी. जबकि जिस घर में वह दुलहन बन कर आई थी, वहां एक तो दिव्यांग बच्चा था, दूसरे बातबात पर गुस्से में लाल होने वाला पति. अंजना को जल्दी ही अहसास हो गया कि उस के अरमानों पर पानी फिर गया है. ऐसे पति और बच्चे के साथ उसे जीवन काटना मुश्किल लगने लगा.

अंजना समझ गई कि निर्मल का तलाक उस के इसी स्वभाव की वजह से हुआ था. अंजना को उस घर में घुटन सी होने लगी. निर्मल ने उस के साथ भी मारपीट शुरू कर दी थी. जब अंजना को लगा कि वह न तो भरत को मां का प्यार दे सकती है और न ही निर्मल को पत्नी का तो एक दिन वह निर्मल और भरत को छोड़ कर मेघालय लौट गई.

बापबेटा एक बार फिर अकेले पड़ गए. इस के बाद भरत की देखभाल की जिम्मेदारी निर्मल की मां रत्ना देवी ने संभाल ली. लेकिन जल्दी ही उन की भी मौत हो गई. निर्मल के सामने एक बार फिर वही समस्या आ गई. निर्मल की समझ में नहीं आ रहा था कि भरत की देखभाल कैसे करे? वैसे तो मां की मौत के बाद बहन ने भरत की देखभाल की जिम्मेदारी ले ली थी, लेकिन इस तरह कब तक चल सकता था.

निर्मल ने एक बार फिर अपने बहनोई राकेश से बात की तो वह उस के लिए पत्नी की तलाश में लग गए. क्योंकि उस के दिव्यांग बेटे की देखभाल के लिए एक मां जरूरी थी. लेकिन ऐसे आदमी से कोई मजबूर लड़की ही शादी कर सकती थी. इसीलिए वह गरीब और मजबूर लड़की ढूंढने लगे.

अब तक भरत 16 साल का हो गया था. किशोर बच्चे की देखभाल के लिए किसी अच्छे घर की लड़की तो मिल नहीं सकती थी. इसलिए राकेश ने ऐसे लोगों से बात करनी शुरू की, जो गरीब और मजबूर लड़कियों की शादी लेदे कर कराते थे.

राकेश को कहीं से पता चला कि पटलोनी का कोई पंडित उत्तराखंड से कोई लड़की लाया था और उस के साथ सुख से जीवन बिता रहा था. उस ने बिचौलियों के माध्यम से और भी कई लड़कों की शादी कराई थी. सभी अपनीअपनी पत्नियों के साथ सुख से रह रहे थे. एक बिचौलिया देवेंद्र के माध्यम से राकेश ने उत्तराखंड के बिचौलिए से बातचीत शुरू की तो उस ने कई लड़कियों की जानकारी और फौटो भेजे.

राकेश और निर्मल 21 मई को देवेंद्र के साथ लड़की देखने उत्तराखंड गए, जहां देवेंद्र ने उन्हें 32 साल की एक तलाकशुदा अध्यापिका को दिखाया. लेकिन उस का 10 साल का बेटा था, जिस की वजह से निर्मल ने उस से शादी करने से मना कर दिया, जबकि वह उस के साथ शादी को तैयार थी. उस से शादी तो निर्मल भी करना चाहता था, लेकिन उस के बेटे की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता था.

इस के बाद उत्तराखंड के बिचौलिया ने एक लाख 25 हजार में तारा नाम की एक लड़की से निर्मल की शादी तय करा दी. तारा पांचवीं पास थी. बिचौलिए का कहना था कि तारा की मां पर काफी कर्ज हो गया है, इसीलिए वह रुपए ले कर बेटी की शादी कर रही है.

बिचौलिए ने निर्मल को 22 मई, 2016 को रुद्रपुर के सरकारी अस्पताल में तारा को दिखाया. तारा निर्मल को पसंद आ गई. लेकिन निर्मल को डर था कि कहीं विचौलिया पैसा और लड़की ले कर भाग न जाए, इसलिए उस ने 22 मई की दोपहर रुद्रपुर और किच्छा के बीच किसी मंदिर में तारा से शादी कर के रुद्रपुर से 25 किलोमीटर दूर आ कर बिचौलिए को पैसे दिए.

बिचौलिए ने ही निर्मल को रुद्रपुर की एक धर्मशाला में कमरा दिलाया था, क्योंकि उस के पास अपना कोई पहचान पत्र नहीं था. चूंकि बिचौलिया धर्मशाला के मैनेजर को जानता था, इसलिए उस के कहने पर मैनेजर ने उसे कमरा दे दिया था.

उसी दिन निर्मल अपनी नई दुलहन को ले कर घर आ गया. पत्नी के आ जाने से निर्मल काफी खुश था. उसी दिन भरत का जन्मदिन था, इसलिए पूरे परिवार ने दोहरी खुशी मनाई. पूरे घर ने तारा का बनाया खाना खाया.

रात को निर्मल और भरत तारा का दिया दूध पी कर सोए तो घर आई नईनवेली दुलहन तारा घर में रखे लाखों रुपए के गहने और नकद रकम ले कर गायब हो गई. जाते समय उस ने दरवाजे पर बाहर से ताला लगा दिया था. रात में उस के साथी गाड़ी ले कर आए थे, वह उन्हीं के साथ सारा माल ले कर भाग गई थी.

सुबह भरत की नींद टूटी तो देखा उस के पापा बिस्तर पर मुंह फैलाए पड़े थे, उन के मुंह से खून भी निकल रहा था. भरत किसी तरह मेन गेट पर पहुंचा और चिल्लाने लगा. उस की आवाज सुन कर पड़ोसी इकट्ठा हो गए और ताला तोड़ कर अंदर पहुंचे तो देखा निर्मल मरा पड़ा था.

पुलिस को सूचना दी गई तो थाना जगदीशपुरा के थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह, सीओ राजेंद्र यादव पुलिस टीम के साथ निर्मल सिंह के घर पर पहुंच गए. हालात का जायजा ले कर तारा के खिलाफ हत्या और लूट का मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी गई. पुलिस को तारा और बिचौलियों की तलाश थी.

बिचौलिए के 3 नंबर राकेश के पास थे, वे बंद हो चुके थे. काफी भागदौड़ के बाद पुलिस ने काशीपुर की आवासविकास कालोनी से तारा को ढूंढ निकाला, जो सीमा बन कर अपने भाई और प्रेमी के साथ रह रही थी. भाई और प्रेमी तो पुलिस को देख कर भाग निकले, लेकिन तारा पकड़ी गई .

तारा को आगरा ला कर पूछताछ की गई तो पता चला कि वह काशीपुर के गांव बैलजुड़ी निवासी मोहम्मद अली की बेटी रुबीना थी. पता चला कि वह लुटेरों के गिरोह की सदस्य थी. पहले भी ऐसी कई वारदातों को उस ने अंजाम दिया था.

उस ने माना कि जिस दुर्गा को पैसे देने की बात की गई थी, वह उस की नकली मौसी थी, जिसे मां का किरदार निभाने के लिए 5 हजार रुपए दिए गए थे.

रुबीना से पुलिस को पता चला कि उत्तराखंड के शहरों में रुबीना जैसी तमाम लुटेरी दुलहनें इसी तरह ब्याह कर लोगों को लूट रही हैं.  Bride Scam

Kidnapping Murder Case : जसकीरत अपहरण  हत्याकांड – चाचा से ही ईर्ष्या 

Kidnapping Murder Case. परविंदर को इस बात की ईर्ष्या थी कि उस के चाचा दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति क्यों करते जा रहे हैं. अपनी इसी ईर्ष्या की वजह से उस ने अपने चाचा को बरबाद करने के लिए जो योजना बनाई, आखिर उस का अंजाम क्या हुआ…

शाम के ठीक पौने 4 बजे जसकीरत कपड़ा ले कर अपनी स्कूटी को चमकाने लगा था, क्योंकि 4 बजे उसे सुलतानपुर लोधी रोड पर ट्यूशन पढ़ने जाना था. वह अपनी हर चीज को इसी तरह साफसुथरी रखता था. 14 साल का जसकीरत नौवीं में पढ़ता था. वह रोजाना स्कूटी साफ करता, कौपीकिताबें लेता और मां कुलदीप कौर के हाथों जूस पी कर ट्यूशन पढ़ने के लिए निकल जाता.

11 अप्रैल की शाम को भी जसकीरत मां के हाथों जूस पी कर ट्यूशन पढ़ने चला गया था. बेटे के जाने के बाद कुलदीप घर के कामों में व्यस्त हो गई. जसकीरत 4 बजे ट्यूशन पढ़ने जाता था तो साढ़े 6, 7 बजे तक लौटता था. लेकिन उस दिन वह रात 8 बजे तक नहीं लौटा तो मां को चिंता हुई. फिर उन्होंने सोचा कि ट्यूशन पढ़ कर वह अपने किसी दोस्त के साथ उस के घर या बाजार चला गया होगा, इसीलिए उसे देर हो रही है.

वह बेटे के बारे में ही सोच रही थी कि जसकीरत के पिता सरदार नरेंद्र सिंह फैक्ट्री से आ गए. ड्राइंगरूम में अपना ब्रीफकेस रख कर बेसिन में हाथमुंह धोते हुए उन्होंने पूछा, कुलदीप, जसकीरत नहीं दिख रहा, अभी ट्यूशन पढ़ कर नहीं लौटा क्या? जी नहीं, अभी तक तो नहीं लौटा. लगता है, दोस्तों के साथ बाजार चला गया है या फिर किसी के घर चला गया है. आप कपड़े बदलिए, मैं चाय बना कर लाती हूं. कुलदीप कौर ने कहा.

नरेंद्र सिंह कपड़े जरूर बदलने लगे, लेकिन पत्नी की बात उन्हें हजम नहीं हुई. क्योंकि जसकीरत बिना बताए कहीं जाने वालों में नहीं था. चाय पीने में आधा घंटा और गुजर गया. रात के साढ़े 9 बजे तक भी जसकीरत नहीं आया तो नरेंद्र और कुलदीप को चिंता हुई. नरेंद्र सिंह ने ट्यूशन पढ़ाने वाले मास्टर को फोन कर के जसकीरत के बारे में पूछा तो उस ने हैरानी जताते हुए कहा, सरदारजी, आज तो जसकीरत ट्यूशन पढ़ने आया ही नहीं था. क्या कहा…जसकीरत ट्यूशन पढ़ने नहीं गया था? पर घर से तो वह कौपीकिताब ले कर गया था? नरेंद्र सिंह ने हैरानी से कहा. इसी के साथ उन का शरीर कांप उठा. उन के मन में आया, जसकीरत ट्यूशन पढ़ने नहीं गया तो फिर गया कहां?

अब मामला गंभीर और चिंता का विषय बन गया था. जसकीरत बहुत ही सीधासादा और पढ़ने वाला लड़का था. बिना मतलब घूमनाफिरना उसे कतई पसंद नहीं था. इस तरह का लड़का बिना बताए कहां जा सकता था? बहरहाल, नरेंद्र सिंह और कुलदीप कौर खानापीना भूल कर बेटे की तलाश में जुट गए. सब से पहले उन्होंने जसकीरत के दोस्तों और साथ पढ़ने वालों को फोन किए. जिन के नंबर नहीं थे, उन के घर जा कर पता किया. पार्कों, बाजारों और सिनेमाघरों में जा कर देखा, लेकिन जसकीरत का कुछ पता नहीं चला.

थकहार कर पतिपत्नी घर लौट आए कि शायद वह घर आ गया हो, लेकिन तब तक वह नहीं आया था. रात के साढ़े 11 बज चुके थे. नरेंद्र सिंह के कई दोस्त और बिजनैस से जुड़े कुछ परिचित लोग भी जसकीरत के बारे में सुन कर उन की कोठी पर आ गए थे. सभी ने सलाह कर के फैसला लिया कि अब इस बारे में पुलिस को सूचित कर देना चाहिए.

सभी घर से निकल रहे थे कि नरेंद्र सिंह के बड़े भाई का बेटा परविंदर सिंह उर्फ शैली आ गया. उतनी रात को चाचा की कोठी पर उतने लोगों को देख कर उस ने पूछा, क्या हुआ चाचाजी? बेटा, जसकीरत न जाने कहां चला गया है? हम उसी की सूचना देने थाने जा रहे हैं. चाचाजी, मैं भी आप के साथ चलता हूं, लेकिन वह गायब कैसे हो गया? ये बातें बाद में करेंगे. पहले थाने चल कर उस के गायब होने की सूचना देते हैं. नरेंद्र सिंह ने कहा और घर के बाहर आ गए. सभी अपनीअपनी गाडि़यों से चले तो थाने जाने के बजाय वे एसपी (डी) जसबीर सिंह के आवास पर जा पहुंचे. उन्हें सारी बात विस्तार से बताई गई तो उन्हें भी हैरानी हुई.

चूंकि मामला शहर के एक उद्योगपति के बेटे के गायब होने का था, सो उन्होंने नरेंद्र सिंह को सांत्वना देते हुए कहा कि आज रात वे बच्चे को अस्पताल, रेलवे स्टेशन और अपने रिश्तेदारों के यहां खोज लें, मदद के लिए वह कुछ सिपाहियों को उन के साथ भेजे देते हैं. अगर बच्चा नहीं मिलता तो सुबह गुमशुदगी दर्ज करा कर पूरे जिले की पुलिस उस की तलाश में लगा देंगे.

एसपी आवास से निकल कर सभी अस्पताल की ओर जा रहे थे कि तभी नरेंद्र सिंह के मोबाइल फोन की घंटी बजी. फोन नंबर अंजान था, इसलिए नरेंद्र सिंह को थोड़ा हैरानी हुई. फिर भी उन्होंने फोन रिसीव किया कि कहीं से किसी ने जसकीरत के बारे में तो फोन नहीं किया.

जैसे ही उन्होंने ‘हैलो’ कहा, दूसरी ओर से थोड़ी कड़क आवाज में कहा गया, नरेंद्र सिंह, ध्यान से मेरी बात सुनो, तुम्हारा बेटा हमारे कब्जे में है. मंत्रीजी ने कहा है कि इलैक्शन नजदीक है, इसलिए खर्च की जरूरत है. अगर बेटा सहीसलामत चाहिए तो 30 लाख रुपए की व्यवस्था कर लो, वरना बेटा जिंदा नहीं मिलेगा. हैलो, कौन बोल रहे हैं? किस मंत्री ने कहा है? मैं 30 लाख रुपए दे दूंगा. 30 क्या, 50 लाख दे दूंगा, लेकिन मेरे बेटे को कुछ नहीं होना चाहिए.

नरेंद्र सिंह अपनी रौ में अपनी बात कहते रहे, जबकि दूसरी ओर से फिरौती की रकम मांग कर फोन काट दिया गया था. नरेंद्र सिंह अपना सिर पीट कर रह गए. सब की सलाह पर उन्होंने वापस जा कर यह बात एसपी साहब को बताई तो उन्होंने तुरंत थाना सिटी के थानाप्रभारी इंसपेक्टर सुक्खा सिंह को फोन कर के जसकीरत सिंह के अपहरण का मुकदमा दर्ज कर काररवाई करने का आदेश दे दिया.

इस के अलावा घटना की जानकारी एसएसपी को दे कर तुरंत पुलिस अधिकारियों की एक आपात मीटिंग बुलाई. जसकीरत के अपहरण का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर पुलिस ने काररवाई शुरू कर दी. सुक्खा सिंह ने रात में ही वायरलैस द्वारा सूचना दे कर कपूरथला शहर की नाकेबंदी करा दी. अगले दिन जसकीरत के फोटो वाले पैंफ्लेट छपवा कर शहर भर में चस्पा करवा दिए गए.

इस घटना की जानकारी आईजी को हुई तो हालात का जायजा लेने वह भी कपूरथला आ गए. उन्होंने जिले के सभी पुलिस अधिकारियों की मीटिंग कर अपहृत जसकीरत को अपहर्त्ताओं के चंगुल से सहीसलामत छुड़ाने के लिए एसपी जसबीर सिंह के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में डीएसपी दलजीत सिंह ढिल्लो, थानाप्रभारी इंसपेक्टर सुक्खा सिंह और सीआईए के प्रभारी इंसपेक्टर रविंदर सिंह को विशेष रूप से शामिल किया.

सीआईए प्रमुख होने की वजह से रविंदर सिंह के मुखबिरों का नेटवर्क बहुत अच्छा था. इन 5 पुलिस अधिकारियों की मदद के लिए लगभग 100 पुलिसकर्मियों को लगाया गया था, जिन में कई एएसआई और हैडकांस्टेबल भी थे.

इंसपेक्टर रविंदर सिंह ने अपने मुखबिरों को सतर्क कर दिया था. युद्धस्तर पर जसकीरत और अपहर्त्ताओं की तलाश जारी थी. पुलिस टीम को अपहर्त्ताओं के फोन का इंतजार था. क्योंकि उन्होंने फोन कर के केलव फिरौती की रकम बता कर धमकी दी थी. रकम कब और कहां पहुंचानी है, यह उन्होंने नहीं बताया था. इसीलिए इंसपेक्टर रविंदर सिंह ने नरेंद्र सिंह के घर के सभी फोन सर्विलांस पर लगवा दिए थे.

सुबह से शाम हो गई, पर कोई फोन नहीं आया. शाम को रविंदर सिंह के एक मुखबिर ने फोन द्वारा सूचना दी कि तरनतारन रोड पर वैरोवाल इलाके में फतेहाबाद के पास सुनसान में एक बच्चे की खुर्दबुर्द की गई लाश पड़ी है. सूचना मिलते ही एसपी जसबीर सिंह, डीएसपी दलजीत सिंह ढिल्लो, रविंदर सिंह जसकीरत के मातापिता और कुछ रिश्तेदारों के साथ वहां पहुंच गए. लाश बोरी में भरी थी.

तेजाब की वजह से बोरी का ऊपरी हिस्सा और लाश की पीठ बुरी तरह से जली हुई थी. ऊपर से पता चल गया था कि लाश बच्चे की है. बोरी से लाश निकाली गई तो पता चला कि लाश जसकीरत की थी. बेटे की लाश देख कर नरेंद्र सिंह और कुलदीप कौर बेहोश हो कर गिर पड़े. उन के साथ आए रिश्तेदारों ने उन्हें संभाला और उन्हें घर पहुंचा दिया.

इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया कि अपराधियों तक पहुंचने का कोई सुराग मिल जाए, पर वहां ऐसा कुछ नहीं मिला, जिस से अपराधियों तक पहुंचा जाता या जांच में मदद मिलती. ऐसा लगता था, जैसे हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. शिनाख्त मिटाने के लिए उस पर तेजाब डाल दिया गया था.

दलजीत सिंह ढिल्लो और रविंदर सिंह की समझ में नहीं आ रहा था कि अपहर्त्ताओं ने बिना फिरौती वसूले ही बच्चे की हत्या क्यों कर दी? इस का मतलब या तो जसकीरत अपहर्त्ताओं को पहचानता था या फिर यह अपहरण फिरौती के लिए नहीं, बल्कि दुश्मनी की वजह से किया गया था.

जांच को भटकाने के लिए फिरौती के लिए फोन किया गया था. क्योंकि अपहरण के मामले में ऐसा कम ही होता है कि अपहर्त्ता बिना रकम वसूले पकड़ को मार दें. जब तक रकम नहीं मिल जाती, अपहर्त्ता पकड़ को संभाल कर रखते हैं. पकड़ को तभी मारते हैं, जब अपहर्त्ताओं को लगता है कि रकम नहीं मिलने वाली और वे पुलिस के शिकंजे में फंसने वाले हैं.

बहरहाल, लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया गया. इस के बाद थाने आ कर सुक्खा सिंह ने इस मामले में हत्या और लाश खुर्दबुर्द करने की धाराएं जोड़ दीं. पुलिस ने नरेंद्र सिंह से पूछताछ की. इस पूछताछ में रविंदर सिंह भी शामिल थे. उन्होंने पहला सवाल यही किया, गंभीरता से सोच कर बताइए कि आप का कोई ऐसा दुश्मन तो नहीं है, जिस ने कभी देख लेने की धमकी दी हो? नहीं, हम सीधेसादे व्यापारी हैं. दुश्मनी या लड़ाईझगड़े से हम दूर ही रहते हैं.

नरेंद्र सिंह ने सच कहा था. उन के पिता स्व. बलदेव सिंह सीधेसादे किसान थे. बाद में उन्होंने व्यवसाय कर लिया था. उन के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. उन्होंने सब की शादियां कर दी थीं. बेटों में बड़ा बेटा जगपाल सिंह था, तो छोटा नरेंद्र सिंह.

जगपाल मस्त और लापरवाह किस्म का आदमी था, इसलिए वह कोई कारोबार नहीं जमा पाया. उस के 2 बेटे थे, परविंदर और दविंदर. परविंदर 12वीं पास कर के डाक्टरी की पढ़ाई कर रहा था. वह अपने चाचा नरेंद्र के काफी करीब था, इसलिए ज्यादातर वह उन्हीं के यहां रहता था. उस का घर नजदीक ही सैंट्रल टाउन में था. दूसरी ओर नरेंद्र सिंह कारोबार में सफल रहे, क्योंकि वह बचपन से ही होशियार थे. आज वह फैक्ट्री के मालिक थे. उन के पास सब कुछ था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने पर पता चला कि जसकीरत की हत्या गला दबा कर की गई थी. पोस्टमार्टम के बाद लाश घर वालों को मिली तो उस के अंतिम संस्कार में कारोबारी और रिश्तेदार ही नहीं, पूरा शहर उमड़ पड़ा. लोगों में पुलिस प्रशासन के प्रति इतना आक्रोश था कि उस के विरोध में जम कर नारेबाजी की गई. नाराज लोगों ने आईजी और एसएसपी के बंगले का घेराव भी किया.

पुलिस बड़ी तत्परता से कातिलों को पकड़ने में जुटी थी. इस घटना को घटे 17 दिन बीत चुके थे. 28 अप्रैल को शहर भर के लोगों ने शहीद भगत सिंह चौक पर धरना दे कर अमृतसरदिल्ली मार्ग जाम कर दिया. उस दिन और अगले दिन यानी 29 अप्रैल को पूरा कपूरथला शहर बंद रहा. काफी मेहनत के बाद पुलिस के हाथ सिर्फ यह सुराग लगा कि जिस फोन नंबर से अपहर्त्ताओं ने फिरौती के लिए फोन किया था, वह सीडीएमए नंबर था.

पुलिस पता करने लगी कि यह फोन कहां से किया गया था? दूसरी ओर नरेंद्र की कोठी से ले कर गली में जहांजहां सीसीटीवी कैमरे लगे थे, सभी की फुटेज खंगाली गई. लेकिन इस से भी कहीं कुछ हाथ नहीं लगा. डीएसपी दलजीत सिंह ढिल्लो के आदेश पर एक बार फिर नरेंद्र सिंह की कोठी से ले कर ट्यूशन पढ़ने की जगह तक की क्राइम सीन पर गौर किया गया. इस में पुलिस के हाथ कुछ सुराग लगा.

नरेंद्र सिंह की रोज एवेन्यू स्थित कोठी से कुछ दूरी पर गली के बाहर एक दुकान के छज्जे के नीचे लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज से कुछ अहम सुराग हाथ लगा था. यह कैमरा अब तक इसलिए नजरों से बचा था, क्योंकि यह ओट में था. फुटेज के अनुसार, जसकीरत स्कूटी से गली से निकल रहा था, तभी परमिंदर ने उसे रोक लिया था. इस के बाद जसकीरत स्कूटी की पिछली सीट पर बैठ गया था तो परविंदर स्कूटी चला कर ले गया था.

इस फुटेज से स्पष्ट हो गया कि उस दिन परविंदर ही जसकीरत को कहीं ले गया था. इस के बाद समय गंवाए बगैर रविंदर सिंह और सुक्खा सिंह ने परविंदर को धर दबोचा.  फिर तो थोड़ी देर बाद उस की निशानदेही पर हरनामनगर निवासी 19 वर्षीय मैडिकल के छात्र राजविंदर सिंह उर्फ राजा और शालीमार एवेन्यू निवासी 19 वर्षीय कौमर्स के छात्र अर्शदीप सिंह उर्फ अर्श को गिरफ्तार कर लिया गया.

तीनों को सीआईए स्पैशल स्टाफ के औफिस ला कर अधिकारियों के सामने जब पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए जसकीरत के अपहरण और हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ और नहीं, ईर्ष्या की उपज थी.

परविंदर सिंह उर्फ शैली को हर समय एक ही बात का दुख सालता रहता था कि उस के चाचा नरेंद्र सिंह दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति क्यों करते जा रहे हैं? वह एक सफल कारोबारी हैं, जबकि उस के पिता का कारोबार बैठता जा रहा है. चाचा के पास शानदार कोठी है, फैक्ट्री है, कारें हैं, उन का बेटा जसकीरत महंगे स्कूल में पढ़ता है. उन के पास जो शानोशौकत, इज्जत, रुतबा, धनदौलत और जो भौतिक सुखसुविधाएं हैं, वे सब उस के पास क्यों नहीं हैं?

परविंदर दिनरात इसी सोच और ईर्ष्या में डूबा रहता था. रातदिन एक ही बात सोचतेसोचते वह मानसिक रोगी बन गया.  कभी गुस्से में वह अपने स्व. दादा को गालियां देने लगता कि उस बूढ़े ने उस के लिए कुछ नहीं किया तो कभी अपने मांबाप को कोसता कि उन लोगों ने भी कुछ नहीं किया.

दिनरात सोचसोच कर उस की जलन बढ़ती जा रही थी. ईर्ष्या की ही वजह से वह चाचा नरेंद्र सिंह को अपना सब से बड़ा दुश्मन समझने लगा. पर दिखावे के लिए इतना प्यार दर्शाता था, जैसे वह उन का ही बेटा है. जबकि हर समय वह चाचा को लूटने और उन्हें कंगाल बनाने की योजनाएं बनाता रहता था, लेकिन उस की समझ में यह नहीं आता था कि वह यह सब कैसे करे?

बारहवीं करने के बाद वह डाक्टरी की पढ़ाई करने लगा. इस में नरेंद्र सिंह ने काफी मदद की थी. एक दिन वह टीवी पर अपराध और सच्ची घटना पर आधारित एक सीरियल देख रहा था.

सीरियल के उस दिन के एपीसोड की कहानी उसी जैसे भटके एक नवयुवक की थी. परविंदर बड़े ध्यान से सीरियल के एकएक पौइंट को देख रहा था. उस ने देखा कि किस तरह एक लड़के ने अपने सगे मामा को कंगाल बना दिया था, वह इस बात पर भी गौर कर रहा था कि वारदात होने के बाद पुलिस अपराध के किनकिन पहलुओं पर गौर करती है और चालाक अपराधी कैसे खुद को बचाते हुए पुलिस की पकड़ से दूर रहता है.

सीरियल देख कर परविंदर ने भी योजना बना डाली कि चाचा को कैसे बरबाद किया जाए. पर यह काम वह अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने 2 जिगरी दोस्तों राजविंदर और अर्शदीप को साथ मिला लिया.

परविंदर की योजना थी कि अपने चाचा के बेटे जसकीरत का अपहरण कर के 30-40 लाख रुपए फिरौती वसूल कर विदेश चला जाएगा. वहां उस की किस्मत खुद ही चमक जाएगी. एक ट्रैवल एजेंट से तीनों ने बात भी कर ली थी कि उन तीनों को विदेश भेजने में कितना खर्च आएगा. इस के बाद जसकीरत के अपहरण की योजना बन गई.

जसकीरत का अपहरण परविंदर के लिए कोई मुश्किल काम नहीं था. योजना को अच्छी तरह ठोकबजा कर टीवी के सीरियल की तर्ज पर उन्होंने सब से पहले सीसीटीवी कैमरों के बारे में पता किया कि वे उन्हें कहांकहां अड़चन पैदा कर सकते हैं. यह जान लेने के बाद योजना के अगले चरण में उन्होंने फरजी आईडी पर 25 मार्च, 2016 को 2 सिम लिए और अपने फोन घर पर छोड़ दिए, क्योंकि सीरियल में दिखाया गया था कि मोबाइल फोन के जरिए पुलिस अपराधी तक कैसे पहुंच जाती है.

यह सब कर के मास्टरमाइंड परविंदर 27 मार्च, 2016 को एक सुनसान सड़क पर एक मजदूर से तीनों ने उस का मोबाइल फोन छीन लिया. फोन की समस्या दूर होने के बाद तीनों 10 अप्रैल तक जसकीरत के ट्यूशन पढ़ने जाने की रेकी करते रहे कि वह किनकिन रास्तों से हो कर जाता है और कैमरे कहांकहां लगे हैं?

घटना वाले दिन 11 अप्रैल की शाम 4 बजे जसकीरत जैसे ही घर से ट्यूशन के लिए निकला, परविंदर ने उसे रास्ते में रोक लिया और स्कूटी खुद चलाते हुए फत्तूढींगा की ओर ले गया. जसकीरत ने पूछा कि वह उसे इधर कहां ले जा रहा है तो उस ने कहा, ‘‘आज मैं तुझे तेरी होने वाली भाभी से मिलवाने चल रहा हूं.’’

फत्तूढींगा के पास परविंदर के दोनों साथी राजा और अर्श आई-20 कार लिए खड़े थे. परविंदर ने जसकीरत को अपने दोस्तों से मिलवा कर कार में बैठा लिया और फिर रूमाल सुंघा कर उसे बेहोश कर दिया. रूमाल में उन्होंने क्लोरोफार्म डाल रखा था.

परविंदर उस की स्कूटी को हमीरा छोड़ आया. उस के वापस आते ही तीनों ने बेहोश पड़े जसकीरत का गला रस्सी से कस कर उसे मार दिया और पहले से ही अमृतसर रोड पर लिए किराए के एक कमरे में उस की लाश को बोरे में भर कर रख दिया.

इतना करने के बाद मजदूर से छीने मोबाइल से नरेंद्र सिंह को फोन कर के फिरौती मांगी. उस के बाद सभी पास के गुरुद्वारे में जा कर सेवा करने लगे. परविंदर अपने चाचा की छटपटाहट देखने देर रात घर पहुंचा और फिर पकड़े जाने तक वह चाचा के साथ ही रहा, ताकि किसी को उस पर शक न हो और पुलिस काररवाई का भी पता चलता रहे.

अगले दिन 12 अप्रैल, 2016 को तीनों लाश वाला बोरा फतेहाबाद के पास वीराने में फेंक कर उस पर तेजाब डाल दिया. इस तरह अपनी मानसिक कुंठा शांत करने के लिए एक नासमझ सनकी ने अपने चाचा का हंसताखेलता घर बरबाद कर दिया. तीनों अभियुक्तों को दिनांक 8 मई, 2016 को अदालत में पेश कर 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. इस के बाद 2 दिनों के लिए और रिमांड पर लिया गया.

रिमांड अवधि के दौरान तीनों अभियुक्तों की निशानदेही पर जसकीरत की स्कूटी, आई-20 कार बरामद करने के साथ उन जगहों की शिनाख्त कराई गई, जहांजहां वे जसकीरत को ले गए थे. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद एक एक बार फिर परविंदर उर्फ शैली, राजविंदर उर्फ राजा तथा अर्शदीप उर्फ अर्श को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story Hindi: पुलिस की गिरफ्त में पुलिस

Crime Story Hindi: खूबसूरत महिलाओं के साथ रंगरेलियां मनाने के चक्कर में कई लोग हनीट्रैप में कुछ इस तरह फंस जाते हैं कि पुलिस के पास जाने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते. आशीष के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ लेकिन समय रहते ही उन की बुद्धि काम कर गई और वह एक बड़ी मुसीबत से बच गए.

आशीष अपनी दुकान पर बैठे थे, उसी समय उन के मोबाइल पर किसी अज्ञात नंबर से केवल हाय लिखा हुआ वाट्सऐप मैसेज आया. वह उसे कोई तवज्जो न दे कर अपने काम में लग गए. कुछ देर बाद उसी नंबर से वाट्सऐप पर 2-3 खूबसूरत लड़कियों के फोटो आए. सुंदर लड़कियों के फोटो देख कर उन की जिज्ञासा बढ़ी तो उन्होंने उस नंबर पर फोन किया, जिस नंबर से मैसेज और फोटो आए थे.

दूसरी ओर किसी लड़की ने फोन उठाया तो आशीष ने पूछा, ‘‘आप के नंबर से मेरे पास 2-3 लड़कियों के फोटो भेजे गए हैं. क्या मैं जान सकता हूं कि ये फोटो मुझे क्यों भेजे गए हैं?’’

‘‘सौरी सर, दरअसल ये फोटो मुझे किसी और को भेजने थे, गलती से आप के नंबर पर चले गए. वैसे सर, अगर आप अन्यथा न लें तो क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन और कहां से बोल रहे हैं?’’ लड़की ने कहा.

‘‘मेरा नाम आशीष है और रानीबाग इलाके में मेरी कार एसेसरीज की दुकान है.’’ आशीष ने उसे अपने बारे में बताया.

कुछ लोग आदतन लड़कियों के फोन को ज्यादा तवज्जो देते हैं. ऐसे लोगों के फोन पर अगर किसी लड़की का फोन आ जाए तो वे उस से ज्यादा से ज्यादा देर तक बात करने की कोशिश करते हैं. आशीष भी ऐसे ही लोगों में थे.

‘‘ओके सर.’’ आशीष की हकीकत जान कर लड़की ने कहा.

‘‘वैसे मैडम, क्या मैं जान सकता हूं कि आप कौन हैं और कहां से बोल रही हैं?’’ आशीष ने पूछा.

‘‘जी मेरा नाम प्रीति है और मैं भी दिल्ली में ही रहती हूं. दरअसल, आप के मोबाइल पर जिन लड़कियों के फोटो आए हैं, वे मुझे किसी और को भेजने थे. वैसे अगर आप भी शौकीन हों तो उन में से कोई लड़की पसंद कर सकते हैं.’’ प्रीति ने मीठे स्वर में कहा.

37 साल के आशीष इतने नासमझ नहीं थे कि प्रीति की बातों का मतलब न समझ पाते. वह चूंकि बीवीबच्चों वाले थे, इसलिए मन ललचाने के बावजूद उन्होंने जल्दबाजी में कोई कदम उठाना उचित नहीं समझा. उन्होंने प्रीति को टालने के लिए कहा, ‘‘मैडम, अभी मैं काम में बिजी हूं, जब भी जरूरत होगी, आप को बता दूंगा.’’

‘‘ठीक है सर, आप जब भी चाहें बेझिझक बता दें. एक बार हमारी सेवा लेने के बाद आप की तबीयत खुश हो जाएगी.’’ कह कर प्रीति ने फोन काट दिया.

इस के बाद प्रीति और आशीष के बीच दोस्ती हो गई. दोनों वाट्सऐप पर अकसर बातें करने लगे. 5-6 महीने तक उन के बीच इसी तरह बातें चलती रहीं. एक बार प्रीति ने एक पता दे कर उन्हें मिलने के लिए बुलाया, पर व्यस्तता की वजह से वह जा नहीं सके. 14 मार्च, 2016 को भी आशीष की वाट्सऐप पर प्रीति से बात हुई. प्रीति ने शिकायती लहजे में कहा, ‘‘आप आए नहीं?’’

‘‘आ कर क्या करें, कोई बढि़या चीज तो आप के पास है नहीं. अगर कोई बढि़या माल हो तो बताइए?’’ आशीष ने कहा.

‘‘हमारे पास बढि़या माल भी है, अभी फोटो भेजती हूं.’’ प्रीति ने कहा.

कुछ देर बाद आशीष के वाट्सऐप पर एक लड़की की फोटो आई. वह लाल रंग का स्लीवलैस टौप पहने थी और वाकई खूबसूरत लग रही थी. फोटो देखते ही आशीष उस पर फिदा हो गए. उन्होंने उसी वक्त प्रीति को फोन कर के कहा, ‘‘मैडम, यह लड़की मुझे पसंद है.’’

‘‘आशीष साहब, इस की एक बार की कीमत 3 हजार रुपए है.’’ प्रीति ने कहा.

कीमत सुन कर आशीष चौंक गए क्योंकि इतने कम पैसों में इतनी सुंदर कालगर्ल नहीं मिल सकती. आशीष ने तुरंत कहा, ‘‘कोई बात नहीं मैडम, जब चीज पसंद आ जाए तो हम कीमत नहीं देखते. आप इसे हमारे पास रानीबाग भेज दीजिए.’’

‘‘सौरी सर, लड़की वहां नहीं जा सकती. दरअसल वह कालेज स्टूडेंट है. अपने घर वालों से कोई बहाना कर थोड़ीबहुत देर के लिए घर से निकल सकती है. ऐसा कीजिए, आप 3 बजे तक रोहिणी सेक्टर-15 में बंसल भवन के पास पहुंच जाइए. तब तक लड़की को मैं अपने फ्लैट में बुला लूंगी. आप को हम पिक कर लेंगे.’’

आशीष ने बात करते हुए दुकान में लगी दीवार घड़ी की तरफ देख कर कहा, ‘‘मैडम, 3 तो बजने वाले हैं. मैं इतनी जल्दी रोहिणी कैसे पहुंच पाऊंगा?’’

‘‘कोई बात नहीं सर, सवा 3-साढ़े 3 तक पहुंच जाइए. हम आप को वहीं मिलेंगे.’’ प्रीति बोली.

आशीष की दुकान पर मौजूद लड़के एक कार में एसेसरीज लगाने में जुटे थे. आशीष को सैक्टर-15 पहुंचने की जल्दी थी. उन्होंने लड़कों से कहा कि वह किसी से मिलने जा रहे हैं, थोड़ी देर में लौट आएंगे. इस के बाद वह अपनी कार से रोहिणी सेक्टर-15 के लिए रवाना हो गए. करीब आधे घंटे बाद वह बंसल भवन के नजदीक पहुंचे तो वहां 2 लड़कियां खड़ी मिलीं. उन में से एक तो वही थी, जिस की फोटो प्रीति ने उन्हें भेजी थी. प्रीति को उन्होंने देखा नहीं था. उस से केवल फोन पर ही बातें हुई थीं. इसलिए वह समझ गए कि दूसरी लड़की प्रीति ही होगी.

फिर भी संतुष्टि के लिए उन्होंने कार से उतर कर प्रीति का नंबर मिलाया और उन दोनों लड़कियों की ओर देखने लगे. नंबर मिलाते ही उन दोनों में से एक ने काल रिसीव करते हुए फोन कान से लगाया तो आशीष ने अपना एक हाथ उठा कर इशारा किया तो दोनों लड़कियां उन की कार के नजदीक आ गईं. उन में से एक लड़की ने अपना परिचय प्रीति और दूसरी का परिचय शिखा के रूप में दिया.

कार को वहीं पार्किंग में लगवा कर प्रीति आशीष को रोहिणी सेक्टर-15 के ही एक फ्लैट में ले जा कर बोली, ‘‘यहां कोई समस्या खड़ी हो सकती है, इसलिए यहां से कहीं और चलना होगा.’’

‘‘कहां?’’ आशीष ने पूछा.

‘‘यहीं रोहिणी के सेक्टर-2 में हमारा फ्लैट है, वहीं चलते हैं.’’ प्रीति बोली.

आशीष ने कार से चलने का प्रस्ताव रखा तो प्रीति बोली, ‘‘साथ चलना ठीक नहीं है, आप अपनी कार से सेक्टर-2 स्थित अवंतिका हौस्पिटल के पास पहुंचिए, हम वहीं मिलेंगे.’’

आशीष कार से सेक्टर-2 की तरफ चल दिए. सेक्टर-2 के अवंतिका हौस्पिटल से कहां जाना है, यह उन्हें पता नहीं था. इसलिए निश्चित जगह पर पहुंच कर उन्होंने प्रीति को फोन लगाया. इस पर प्रीति ने उन्हें सेक्टर-2 के ब्लौक-ए स्थित एक फ्लैट पर आने को कहा. कार खड़ी कर के आशीष ए-ब्लौक में प्रीति द्वारा बताई गई जगह पहुंच गए. वहां प्रीति उन्हें मिल गई. वह उन्हें साथ ले कर एक फ्लैट में पहुंची. उस फ्लैट में 2 कमरे थे. प्रीति ने आशीष से 3 हजार रुपए ले कर उन्हें शिखा के साथ दूसरे कमरे में भेज दिया. आशीष के लिए खुद पर काबू रखना मुश्किल हो रहा था. उन्होंने फटाफट दरवाजा बंद किया और शिखा को अपनी बांहों में समेट लिया.

‘‘इतनी भी क्या जल्दी है जनाब, थोड़ा सब्र रखिए.’’ कहते हुए शिखा ने आशीष की शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए.

‘‘नहीं शिखा, मैं अब और बरदाश्त नहीं कर सकता,’’ कह कर आशीष ने खुद ही अपने कपड़े उतार दिए. शिखा भी प्राकृतिक अवस्था में आ गई. आखिर आशीष ने अपनी हसरत पूरी कर ली.

इस के बाद शिखा फटाफट कपड़े पहन कर कमरे से बाहर निकल गई. उस के बाहर जाते ही 5 लोग उस कमरे में घुस आए. उन में से एक दिल्ली पुलिस की वर्दी पहने था, जिस की नेमप्लेट पर सुभाषचंद लिखा था. उन में से 2 लोग अपनेअपने मोबाइलों से आशीष की अर्द्धनग्नावस्था की वीडियो बनाने लगे. अचानक आए उन लोगों को देख आशीष के होश उड़ गए. आशीष समझ गए कि ये पुलिस के लोग हैं और वह बुरी तरह फंस गए हैं. पुलिस की वर्दी वाला एएसआई सुभाषचंद था. उस ने कहा, ‘‘रेड में तुम रंगेहाथों पकड़े गए हो.’’

‘‘सर, मुझ से क्या गलती हो गई?’’ आशीष ने डरते हुए पूछा.

‘‘जब तुम रेप के आरोप में जेल जाओगे तो गलती का खुद ही पता चल जाएगा.’’ पुलिस वाले ने धमकाते हुए कहा.

‘‘सर, मैं ने किसी के साथ रेप नहीं किया. वह लड़की तो खुद मुझे यहां ले कर आई थी.’’ आशीष ने सफाई दी.

‘‘चुप रह. उस लड़की का बयान और हमारी बनाई वीडियो फिल्म तुझे सजा दिलाने के लिए काफी है. अब तू खुद सोच ले कि तेरी इस करतूत की वजह से तेरी कितनी बदनामी होगी.’’ पुलिस वाले ने आशीष को हड़काया.

आशीष बुरी तरह डरे हुए थे. वह उन लोगों के सामने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगे. यह देख कर एएसआई सुभाषचंद ने कहा, ‘‘देख भई, तेरे खिलाफ बड़ा पक्का मामला बन रहा है. इस से बचने का एक ही तरीका है. लेकिन उस के लिए तुझे 15 लाख खर्च करने पड़ेंगे. क्योंकि जिस लड़की के साथ तूने रेप किया है, उसे काफी पैसे देने होंगे, वरना वह नहीं मानेगी.’’

‘‘सर, यह रकम तो बहुत ज्यादा हैं. इतने पैसे मैं कहां से लाऊंगा?’’ आशीष ने कहा.

‘‘यह बात तो तुझे उस के साथ कमरे में जाने से पहले सोचनी चाहिए थी.’’ एएसआई ने कहा.

‘‘सर, यह ऐसे नहीं मानेगा, इसे थाने ले चलो. वहां पर इस के घर वालों और रिश्तेदारों को बुला कर इस की करतूत बताई जाएगी तो यह समझेगा.’’ साथ में खड़े उस के साथी ने कहा.

‘‘नहीं सर, ऐसा मत करिए. मैं बरबाद हो जाऊंगा. आप यहीं मामला निपटा लीजिए.’’ आशीष ने हाथ जोड़ कर कहा.

‘‘तो चल, 10 लाख दे दे. मामला रफादफा कर देंगे.’’ सुभाषचंद ने कहा.

आशीष पुलिस के लफड़े से बचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने 10 लाख रुपए देने की हामी भर ली. उन लोगों ने आशीष से कहा कि 3 लाख रुपए अभी दे दे, बाकी कल ले लेंगे. लेकिन उस समय आशीष के पास इतने पैसे नहीं थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह 3 लाख रुपए का इंतजाम कहां से करें. मुसीबत के उस समय में उन्हें अपना दोस्त वैभव याद आया. उस की दिल्ली के मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिया में फैक्ट्री थी. वह अपनी फैक्ट्री में है या नहीं, यह जानने के लिए उन्होंने उसे फोन किया. वैभव उस समय फैक्ट्री में ही था.

वे पांचों लोग आशीष के साथ मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिया में पहुंच गए. आशीष ने अपनी कार दोस्त की फैक्ट्री के बाहर खड़ी कर दी. एएसआई सुभाषचंद और उस के साथी उस की कार में बैठे रहे. जबकि वह अपने दोस्त के पास चले गए. उन्होंने अपने दोस्त वैभव को खुद के फंसने की पूरी कहानी बता दी. वैभव समझ गया कि आशीष मुसीबत में फंस गया है लेकिन उस समय उस के पास भी 3 लाख रुपए नहीं थे. उस ने किसी तरह एक लाख रुपए का इंतजाम कर के उसे दे दिए. आशीष ने एक लाख रुपए कार में बैठे एएसआई सुभाषचंद को देते हुए कहा कि बड़ी मुश्किल से एक लाख का इंतजाम हो पाया है. इस के लिए भी मुझे अपनी कार गिरवी रखनी पड़ी है.

‘‘इतने से काम नहीं चलेगा. बात 3 लाख की हुई है. पूरी रकम का इंतजाम आज ही करना होगा.’’ उन में से एक शख्स ने कहा.

‘‘मैं ने काफी कोशिश की, लेकिन 3 लाख का इंतजाम नहीं हो पाया. आप मुझे कल तक का टाइम दो. मैं कल तक 2 लाख रुपए का जुगाड़ कर दूंगा.’’ आशीष ने अनुरोध किया.

‘‘2 लाख नहीं, बाकी के सारे पैसे भी कल ही देने होंगे. पैसे कहां पहुंचाने हैं, यह बात हम तुझे फोन कर के बता देंगे. और हां, ज्यादा स्याणा बनने की कोशिश मत करना, वरना तेरी वीडियो फिल्म हमारे मोबाइल में है.’’ उन के एक साथी ने कहा.

इस के बाद वे पांचों वहां से चले गए. आशीष ने राहत की सांस ली. तब तक शाम हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने फोन कर के अपनी दुकान पर काम करने वाले लड़के से कह दिया कि दुकान बंद कर के चाबी अपने साथ ले जाए और सुबह जल्दी आ कर दुकान खोल ले. इस के बाद वह भी वेस्ट पटेलनगर के पास शादी खामपुर गांव स्थित अपने घर चले गए. अन्य दिनों की अपेक्षा उस दिन उन का चेहरा मुरझाया हुआ था. पत्नी ने इस की वजह जाननी चाही तो उन्होंने झूठ बोल दिया कि काम की वजह से थकान हो गई है.

खाना खाने के बाद आशीष जब बिस्तर पर लेटे तो उन की आंखों से नींद गायब थी. उन्हें बस यही चिंता सता रही थी कि कल उन लोगों को पैसे कहां से ला कर देंगे. अगर पैसों का इंतजाम नहीं हुआ तो उन्हें रेप के इलजाम में जेल जाना पड़ेगा. रात भर उन के दिमाग में इसी तरह के विचार घूमते रहे. सुबह को वह रानीबाग स्थित अपनी दुकान पर चले गए. आशीष दुकान पर पहुंचे ही थे कि एक अनजान नंबर से उन के मोबाइल पर फोन आया. उन्होंने काल रिसीव की तो दूसरी ओर से एएसआई सुभाषचंद की आवाज आई, ‘‘पैसों का इंतजाम हुआ या नहीं?’’

यह सुन कर आशीष घबरा कर बोले, ‘‘सर, अभी नहीं हुआ है. मैं उसी के इंतजाम में लगा हूं.’’

‘‘जल्दी इंतजाम कर ले. पैसे ले कर तुझे आज ही शाम 7 बजे मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिया के अनुकंपा बैंक्वेट हौल के पास आना है.’’ कह कर एएसआई सुभाषचंद ने फोन काट दिया.

आशीष को शाम 7 बजे से पहलेपहले पैसों का जुगाड़ करना था. उन्होंने मार्केट में अपने जानने वालों से बात की, पर पैसों का इंतजाम नहीं हो पाया. ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था, आशीष की चिंता बढ़ती जा रही थी. तमाम कोशिशों के बाद भी पैसों का इंतजाम नहीं हो सका. फिर भी वह शाम 7 बजे से पहले ही निर्धारित जगह पर पहुंच गए. तभी पहले वाले नंबर से उन के मोबाइल पर फोन आया. आशीष ने कह दिया कि वह अनुकंपा बैंक्वेट हौल के सामने खड़े हैं. कुछ देर बाद 20-22 साल का एक युवक उन के पास आया. वह उसे देखते ही पहचान गए. वह युवक कल सुभाषचंद के साथ था. उस युवक ने अपना नाम अमित बताते हुए आशीष से पैसे मांगे.

आशीष ने उस के सामने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं ने बहुत कोशिश की, तमाम लोगों के पास गया और कई से फोन पर भी बात की, लेकिन कहीं भी बात नहीं बनी. आप मुझे थोड़ा वक्त और दे दो.’’

‘‘नहीं, अब तुझे कोई टाइम नहीं मिलेगा. क्या करेगा, कहां से पैसे लाएगा, हमें नहीं पता. जैसे भी हो, पैसे ले कर आज रात साढ़े 9 बजे बाहरी रिंग रोड स्थित काली माता मंदिर पर पहुंच जाना. यह तुझे आखिरी मौका मिल रहा है.’’

यह सुन कर आशीष मानसिक तनाव में आ गए. उन के पास ढाई घंटे का समय बचा था. इन ढाई घंटों में वह इतनी मोटी रकम कहां से लाएं, यह बात उन की समझ में नहीं आ रही थी. अपना दुखड़ा रोने के लिए वह फिर से अपने दोस्त वैभव की फैक्ट्री में चले गए. वैभव को आशीष की हालत पर तरस आ रहा था, पर उस के पास इतनी मोटी रकम नहीं थी. आखिर उस ने आशीष को पुलिस के पास जाने की सलाह दी. आशीष के पास पुलिस में शिकायत ले कर जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. काफी सोचनेसमझने के बाद वह दोस्त को साथ ले कर बाहरी जिले के थाना रोहिणी (दक्षिणी) चले गए.

थाने में मौजूद थानाप्रभारी संजय शर्मा को आशीष ने पूरी बात बता दी. थानाप्रभारी को जब यह पता चला कि उस गैंग में दिल्ली पुलिस का एक एएसआई भी शामिल है तो उन्हें आश्चर्य हुआ. वह एएसआई असली है या फरजी, यह जांच के बाद ही पता चल सकता था. उन्होंने पूरे मामले से बाहरी जिले के डीसीपी विक्रमजीत सिंह को अवगत करा दिया.

चूंकि उन लोगों ने आशीष को पैसे ले कर उसी रात साढ़े 9 बजे काली माता मंदिर पर बुलाया था, इसलिए उन्हें रंगेहाथों पकड़ने का अच्छा मौका था. डीसीपी विक्रमजीत सिंह ने एसीपी उमेश सिंह के नेतृत्व में एक टीम बनाई. इस टीम में थानाप्रभारी संजय शर्मा, सबइंसपेक्टर रजनीश, हैडकांस्टेबल राजकुमार और कांस्टेबल कुलवीर को शामिल किया गया.

एएसआई सुभाषचंद द्वारा जिस नंबर से आशीष को फोन किया गया था, पुलिस के कहने पर आशीष ने उसी नंबर पर फोन किया, ‘‘हैलो सर, मैं आशीष बोल रहा हूं.’’

तभी दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘हां भई, बोल. पैसों का इंतजाम हो गया क्या?’’

‘‘जी, 9 लाख तो नहीं हो पाए, पर मैं बड़ी मुश्किल से 4 लाख का इंतजाम कर पाया हूं.’’ आशीष ने पुलिस के निर्देशानुसार कहा.

‘‘ठीक है, तू पैसे ले कर वहीं काली माता मंदिर पर पहुंच, हम वहीं मिलेंगे.’’ दूसरी तरफ से आवाज आई.

बात हो जाने के बाद पुलिस टीम सादा कपड़ों में काली मंदिर पर पहुंच गई. इस के कुछ देर बाद ही आशीष भी अपनी कार से वहां पहुंच गए. अपने हाथ में बैग थामे जैसे ही वह कार से उतरे, एएसआई सुभाषचंद और अमित उन के पास पहुंच गए. उस समय सुभाषचंद पुलिस वर्दी में नहीं था. आशीष ने जैसे ही सुभाष के हाथ में बैग दिया, थाना रोहिणी (दक्षिणी) की पुलिस टीम ने दोनों को हिरासत में ले लिया.

पुलिस दोनों को थाने ले आई. अन्य अभियुक्त फरार न हो जाएं, इसलिए एसीपी उमेश सिंह ने इस पुलिस टीम में मंगोलपुरी थाने के सबइंसपेक्टर रोबिन त्यागी, हैडकांस्टेबल दिनेश, सुभाष और कांस्टेबल वीरेंद्र को शामिल कर उसी दिन नांगलोई, कंझावला में दबिशें दे कर कंझावला से टिंकू उर्फ साहिल, नांगलोई से ललित सिंह और आजम खान को गिरफ्तार कर लिया. रैकेट में शामिल युवतियों शिखा और प्रीति के घरों पर भी दबिश डाली गई, लेकिन वे फरार हो चुकी थीं. पुलिस ने पांचों अभियुक्तों से पूछताछ की तो पता चला कि इन का सरगना सुभाषचंद ही था. वह फरजी पुलिस वाला नहीं, बल्कि दिल्ली पुलिस के कम्युनिकेशन विभाग का एएसआई था. उस की पोस्टिंग बाहरी जिला के थाना मंगोलपुरी में थी.

मूलरूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला सुभाषचंद करीब 26 साल पहले दिल्ली पुलिस में भरती हुआ था. बाद में उस ने सुल्तानपुरी में अपना मकान बना लिया था और परिवार के साथ दिल्ली में ही रहने लगा था. उस की मुलाकात जेजे कालोनी सावदा, नांगलोई के रहने वाले टिंकू से हुई. टिंकू साप्ताहिक बाजारों में दुकान लगाता था. टिंकू की दोस्ती कृष्णा पार्क देवली, खानपुर के रहने वाले अमित से थी. टिंकू के 2 दोस्त और थे आजम खान और अमित. आजम एक निजी अस्पताल में डायलिसिस मशीन का टेक्नीशियन था और अमित बाल बियरिंग मैकेनिक था.

ये सभी जल्द से जल्द पैसे कमाने की सोचते रहते थे. 6 महीने पहले ही अमित की प्रीति उर्फ मनीषा से शादी हुई. इसलिए उस का भी खर्च बढ़ गया था. वह आए दिन अखबारों में हनीटै्रप द्वारा लोगों को ठगने की खबरें पढ़ता रहता था. मोटी रकम कमाने के लिए उसे यह काम सही लगा. क्योंकि इस तरह एक ही झटके में मोटी रकम ऐंठी जा सकती थी. यह बात उस ने अपने दोस्तों को बताई. फिर उन लोगों ने इस बारे में मंगोलपुरी थाने में तैनात एएसआई सुभाषचंद से बात की. पैसों के लालच में वह भी उन का साथ देने को तैयार हो गया. असली पुलिस वाले के शामिल होने पर सभी की हिम्मत बढ़ गई.

योजना तो बन गई, लेकिन समस्या यह थी कि किसे फांसा जाए. इस के लिए इन लोगों ने कुछ कालगर्ल्स से संपर्क कर के किसी तरह उन लोगों के फोन नंबर हासिल कर लिए, जो उन के पास मौजमस्ती के लिए आते थे. ग्राहकों को फंसाने की जिम्मेदारी अमित की पत्नी प्रीति उर्फ मनीषा ने संभाली. शिकार फंसाने के लिए वह पहले लोगों से वाट्सऐप पर दोस्ती करती थी. दोस्ती के जरिए वह फंसने वाले से अनौपचारिक बातें भी करने लगती थी. फिर उस के पास कुछ लड़कियों के फोटो भेज कर उन्हें पसंद करने के लिए कहती थी. फंसा हुआ ग्राहक जब किसी लड़की के साथ जाने को तैयार हो जाता था तो उसी दौरान वे लोग उस के आपत्तिजनक फोटो खींच लेते थे. उसी को मुद्दा बना कर ये लोग उस से मोटी रकम ऐंठते थे.

इसी तरह उन्होंने वेस्ट पटेलनगर के शादी खामपुर गांव के रहने वाले आशीष को फांसा था. उस से उन्होंने 15 लाख रुपए मांगे. मामला 10 लाख रुपए में तय हो गया. इस से पहले कि उन की मंशा पूरी हो पाती, 5 अभियुक्त पुलिस के शिकंजे में फंस गए. गिरफ्तार हुए अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने 30 हजार रुपए नकद, 4 मोबाइल फोन, एक डिजिटल कैमरा बरामद किया. पुलिस ने 16 मार्च, 2016 को अभियुक्त सुभाषचंद, ललित सिंह, टिंकू, अमित और आजम को गिरफ्तार कर महानगर दंडाधिकारी रविंद्र सिंह के समक्ष पेश किया. पुलिस ने अमित, ललित और सुभाषचंद को 2 दिनों के रिमांड पर लिया. जबकि आजम व टिंकू को जेल भेज दिया गया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने तीनों अभियुक्तों से विस्तार से पूछताछ कर के उन्हें 18 मार्च, 2016 को पुन: कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखने तक प्रीति और शिखा पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सकी थीं. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. आशीष और वैभव परिवर्तित नाम हैं.

 

True Crime Story: सहेली ने कराई प्रेमी से घिनौनी हरकत

True Crime Story: रोहित ने अपनी नाबालिग प्रेमिका रूबी के सामने जो शर्त रखी थी, अमूमन उस के लिए जल्दी कोई लड़की तैयार नहीं होती. लेकिन प्रेमी की बात मान कर उस ने सहेली के साथ गलत काम तो कराया ही, अपने बचाव में उस की जान भी ले ली.

मध्य प्रदेश के जिला भिंड के एक गांव के अशोक कुमार बरसों पहले हरियाणा के शहर कालका में आ कर बस गए थे. उन के परिवार में पत्नी सीतारानी के अलावा एक बेटा नरेश और बेटी दीक्षा थी. अशोक और उस की पत्नी सीता कालका की बगल में बसे हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक नगर परवाणू की अलगअलग फर्मों में नौकरी करते थे. अशोक की ड्यूटी सुबह साढ़े 5 बजे से शाम साढ़े 4 बजे तक रहती थी तो वहीं सीतारानी की ड्यूटी सुबह साढ़े 7 बजे से साढ़े 4 बजे तक की होती थी. दोनों ही अपनी ड्यूटी खत्म कर के पैदल ही घर चले आते थे. एक लंबे अरसे से इन की यही दिनचर्या थी.

कालका और परवाणू के बीच केवल 3 किलोमीटर का फासला है. यहां चलने वाली लोकल बसें अकसर ट्रैफिक में फंस जाती हैं, जिस की वजह से यह दूरी तय करने में उन्हें काफी समय लग जाता है. इसलिए यहां के लोग अकसर इस दूरी को पैदल ही तय कर लेते हैं. परवाणू में किराए के मकान मिलते ही नहीं और अगर मिल भी जाते हैं तो उन का किराया इतना ज्यादा होता है कि फैक्ट्रियों में काम करने वाले लोग उसे वहन नहीं कर पाते, इसलिए परवाणू में काम करने वाले अधिकांश लोगों ने अपनी रिहाइश कालका में ही बना रखी है. अशोक भी पिछले 4 सालों से कालका की एक घनी बस्ती में रह रहा था.

उस के बेटे नरेश ने दसवीं पास कर ली थी. आगे की पढ़ाई करने के बजाय वह नौकरी की तलाश में था. बेटी दीक्षा अभी 3 महीने पहले 13 बरस की हुई थी. वह स्थानीय सरकारी स्कूल की नौवीं कक्षा में पढ़ रही थी. इन दिनों उस की सालाना परीक्षाएं चल रही थीं. 11 मार्च, 2016 को दोपहर बाद 2 बजे उसे अपनी परीक्षा देने जाना था. उस दिन उस का भाई अपनी रिश्तेदारी में कालका से बाहर गया था. वह घर में अकेली ही थी. वैसे भी यहां डर जैसी कोई बात नहीं थी. पासपड़ोस में सब इन्हें जानतेपहचानते थे. शाम के वक्त वह अकसर रोजाना गली के बच्चों के साथ खेलती भी थी.

11 मार्च, 2016 की शाम 6 बजे तक वह घर से बाहर नहीं निकली तो कुछ बच्चे उसे खेलने को बुलाने के लिए उस के घर गए. उस का घर खुला हुआ था. बच्चों ने दीक्षा को आवाज लगाई. जवाब न आने पर उन्होंने भीतर जा कर देखा. वहां का दृश्य देख कर उन के होश उड़ गए. अर्धनग्न अवस्था में दीक्षा बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी. बच्चे बाहर आ कर शोर मचाने लगे तो मोहल्ले की औरतें और आदमी वहां आ गए. उन्होंने जा कर देखा तो दीक्षा मृत पड़ी थी. एक जानकार ने अशोक कुमार को फोन कर के कहा उस के यहां कुछ गड़बड़ है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके, वह घर आ जाए.

अशोक ने पत्नी को फोन कर दिया. उस के बाद दोनों साथसाथ पैदल घर की तरफ चल दिए. दोनों को एक ही बात बेचैन कर रही थी कि पता नहीं घर पर क्या हो गया है. खैर, वे तेज कदमों से चलते हुए घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उन के घर के पास काफी भीड़ जमा है. जब उन्होंने देखा कि किसी ने उन की बेटी की हत्या कर दी है तो वे फूटफूट कर रोने लगे. उन के पहुंचने से पहले ही किसी ने पुलिस को फोन कर दिया था.

थाना कालका के थानाप्रभारी उमेद सिंह एसआई रेशम सिंह, हवलदार प्रदीप कुमार, नरेश कुमार, महिला कांस्टेबल जसमीत कौर के अलावा कांस्टेबल रमेश कुमार के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. मामला पहले ही फ्लैश किया जा चुका था. सूचना पा कर कालका क्षेत्र के एसीपी राजेश कुमार व जिला पंचकूला के डीसीपी अनिल धवन भी वहां आ गए थे. पुलिस जांच में पहली ही नजर में मामला दुष्कर्म के बाद हत्या का लग रहा था. इसलिए पुलिस ने मृतका के पिता अशोक कुमार की तरफ से अज्ञात के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर लिया था.

लड़की के नीचे के कपड़े शरीर पर नहीं थे. बिस्तर पर जिस स्थिति में उस की लाश पड़ी थी, उस से साफ लग रहा था कि मरने से पहले उस के साथ दुराचार किया गया था. लेकिन बिना मैडिकल जांच के रेप का आरोप नहीं लगाया जा सकता था. देर शाम क्राइम इनवैस्टीगेशन व फोरैंसिक टीमें घटनास्थल पर पहुंच कर सबूत जुटाने में जुट गईं. मौके की प्रारंभिक काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए कालका के सिविल अस्पताल भेज दिया. अब तक काफी रात घिर आई थी. इस केस को हल करने में पुलिस को कोई सुराग नहीं मिल पाया था.

अगली सुबह एसएमओ डा. एस.एस. नरवाल की निगरानी में डाक्टरों के एक पैनल ने दीक्षा के शव का पोस्टमार्टम कर के रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी. रिपोर्ट में मौत की वजह दम घुटना बताते हुए दुष्कर्म की पुष्टि की गई थी. इस के अलावा मृतका की गरदन व जिस्म के कुछ अन्य हिस्सों पर ऐसे जख्मों के निशान पाए गए थे, जिस से यह बात साबित होती थी कि मरने से पहले मृतका ने हत्यारे से काफी संघर्ष किया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इस बात की भी पुष्टि की गई थी कि दुष्कर्म मरने से पहले किया गया था. मृतका का विसरा निकाल कर रासायनिक परीक्षण के लिए भिजवाने के लिए सुरक्षित रख लिया गया था. दुष्कर्म की पुष्टि हो जाने पर केस में भादंवि की धारा 376 भी जोड़ दी गई. तफ्तीश के नाम पर थाना पुलिस के हाथ अभी खाली थे.

डीसीपी अनिल धवन ने पहले से ही इस केस को गंभीरता से ले रखा था. इस केस का खुलासा करने के लिए उन्होंने पुलिस की 3 टीमें गठित कर दीं. जिन में से एक टीम ने अपनी जांच की शुरुआत मृतका के पड़ोसियों से पूछताछ कर के की. उन से जानकारी मिली कि पिछले कुछ दिनों से दीक्षा के घर के बाहर 2 लड़कों को चक्कर काटते देखा गया था. यह भी पता चला कि सांवले रंग की एक लड़की भी दीक्षा के पास आया करती थी.

पड़ोसियों से हुलिए हासिल कर के पुलिस ने उन के स्कैच तैयार करवाए, साथ ही मृतका का मोबाइल फोन भी चैक किया. पड़ोसियों ने सांवले रंग की जिस लड़की का जिक्र किया था, उसी के हुलिए से मिलतीजुलती एक लड़की का फोटो दीक्षा के वाट्सऐप पर मिल गया. पुलिस ने वह फोटो पड़ोसियों को दिखाया तो उन्होंने इस बात की पुष्टि कर दी कि यही लड़की दीक्षा से मिलने आया करती थी. पर दीक्षा के मातापिता ने उस लड़की को पहचानने से इंकार कर दिया. पुलिस ने वाट्सएप वाली उस लड़की का फोटो दीक्षा के स्कूल की कुछ लड़कियों को दिखाया तो उन्होंने छूटते ही कहा कि यह रूबी है.

वह लड़की भी उसी स्कूल में पढ़ती थी. पिछले साल आठवीं पास कर लेने के बाद इस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. स्कूल से रूबी के घर का पता हासिल कर के पुलिस उस के घर पहुंच गई और पूछताछ के लिए उसे थाने ले आई. महिला पुलिस द्वारा उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई तो नाबालिग रूबी पुलिस की शुरुआती पूछताछ में ही टूट गई. इस के बाद उस ने अपनी खास सहेली दीक्षा की हत्या की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. 15 साल की रूबी के पिता परवाणू में ही एक चाय की दुकान चलाते थे. स्कूल से लौटने के बाद रूबी अकसर पिता के काम में हाथ बंटाने के लिए दुकान पर बैठ जाया करती थी. उस से बड़ी 2 बहनें और थीं, जिन की शादियां हो चुकी थीं. सब से छोटा एक भाई था, जो परवाणू के एक स्कूल में पढ़ता था.

रूबी की दुकान पर रोहित नाम का एक युवक रोजाना चाय लेने आता था. वह वहीं की एक फैक्ट्री में नौकरी करता था. 22 साल का रोहित मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के गांव मुस्तफाबाद का रहने वाला था. वह करीब 4 साल पहले गांव के एक दोस्त के साथ काम के सिलसिले में परवाणू आया था. यहां उसे सैक्टर-2 स्थित गैसचूल्हा बनाने वाली एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई थी. वहां उस का काम चूल्हों की सफाई करना और फैक्ट्री के लोगों के लिए चाय वगैरह लाना था. रूबी की चाय की दुकान उस की फैक्ट्री के नजदीक थी, इसलिए वह वहीं से फैक्ट्री के कामगारों के लिए चाय लाता था. कई बार उसे दुकान पर रूबी बैठी मिलती थी.

रोहित का चाय का और्डर अन्य ग्राहकों के मुकाबले काफी बड़ा होता था. इस की पेमेंट भी उसी के जरिए होती थी, इसलिए रूबी उस का खास ध्यान रखती थी. रूबी थी तो काफी सांवली, पर उस के नयननक्श अच्छे थे, जिस की वजह से रोहित उसे चाहने लगा था. रूबी को खुश करने के लिए कई बार वह चाय के बिल में 10-12 कप ज्यादा लिखवा कर उसे अपनी फैक्ट्री से अतिरिक्त पैसे दिलवा दिया करता था. अपने पास से भी कई बार उस ने 100-50 का नोट उस के हाथों पर रख कर मुट्ठी बंद कर दी थी. इस से रूबी का झुकाव रोहित की तरफ हो गया. रोहित चौबीसों घंटे फैक्ट्री में रहता था.

फैक्ट्री के वर्करों की छुट्टी हो जाने के बाद एक दिन रोहित ने रूबी को फैक्ट्री में ही बुला लिया. उस दिन दोनों का शारीरिक मिलन हो गया. एक बार जिस्मानी संबंध बनने के बाद उन के बीच इस का सिलसिला चल निकला. पहले रोहित अपनी कमाई से हर महीने कुछ पैसे घर भेज दिया करता था. पर रूबी से संबंध बनने के बाद उस ने घर पैसे भेजने बंद कर दिए. उस ने सारे पैसे रूबी पर लुटाने शुरू कर दिए. रूबी के लिए वह एक तरह से सोने का अंडा देने वाली मुरगी बन गया था.

इसी तरह 2 बरस निकल गए. इस के बाद एक दिन अचानक कुछ ऐसा हो गया कि उन के संबंधों में दरार पड़ गई. दरअसल, एक दिन कालका के मुख्य बाजार में रोहित की रूबी से मुलाकात हुई तो उस के साथ एक गोरीचिट्टी लड़की भी थी. रूबी ने उस लड़की का परिचय अपनी सहेली दीक्षा के रूप में करा कर बताया कि दोनों दूसरी क्लास से आठवीं तक साथसाथ पढ़ी थीं. इसी पहली मुलाकात में रोहित का दिल दीक्षा पर आ गया. इस के बाद रूबी से जब भी उस की मुलाकात होती, वह उस से दीक्षा के बारे में ही बातें करता. इस तरह उस ने दीक्षा के बारे में उस से तमाम जानकारियां हासिल कर लीं.

इस के बाद दीक्षा की झलक पाने के लिए वह उस की गली के चक्कर लगाने लगा. लेकिन दीक्षा न तो किसी से फालतू बातें करती थी और न ही फिजूल में इधरउधर घूमती थी. वह अपनी पढ़ाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों को समझने वाली गंभीर प्रवृत्ति की लड़की थी. रोहित को जब लगा कि दीक्षा आसानी से उस के जाल में फंसने वाली नहीं है तो उस ने एक योजना बनाई. उस योजना के तहत उस ने एक दिन रूबी से सीधे कहा, ‘‘देख रूबी, मेरा मन तेरी सहेली दीक्षा पर आ गया है.

अगर तू चाहती है कि हमारा और तेरा रिश्ता हमेशा बना रहे तो कैसे भी तू उस से मेरी एक बार अकेले में मुलाकात करवा दे, सिर्फ एक बार. इस के बाद उस की तरफ देखना तो दूर, मैं कभी उस के बारे में सोचूंगा भी नहीं. अगर तुम ने मेरा यह काम नहीं किया तो समझ लो मेरा और तुम्हारा संबंध हमेशा के लिए खत्म.’’

इस तरह की स्थिति में अमूमन लड़कियां अपने प्रेमी से झगड़ा करने लगती हैं. वह अपने प्यार को हरगिज नहीं बंटने देती. पर रूबी न जाने कैसी घटिया सोच वाली लड़की निकली कि वह रोहित की बात मान गई. इतना ही नहीं, प्रेमी की ख्वाहिश पूरी करवाने के लिए वह दीक्षा के यहां जा पहुंची.  वह दीक्षा से रोहित के मन की बात तो कह नहीं सकती थी, पर साहस जुटा कर उस ने दीक्षा से यह जरूर कह दिया कि उस का दोस्त रोहित परीक्षा वाले दिन मिठाई और चौकलेट से उस का मुंह मीठा करा कर उसे अपनी शुभकामनाएं देना चाहता है.

दीक्षा ने इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. इस के बावजूद रूबी ने मिठाई खरीद कर उस में बेहोशी की दवा मिला दी. उस के बाद मिठाई और चौकलेट रोहित को देते हुए बोली, ‘‘वह मान तो गई है, लेकिन सिर्फ एक बार के लिए. तुम मेरे ही साथ उस के घर चलना. मैं दरवाजे पर खड़ी हो कर बाहर का ध्यान रखूंगी और तुम उस के कमरे में चले जाना.’’

रोहित खुश हो गया कि अब उस की इच्छा जल्द पूरी हो जाएगी. रूबी को पता था कि दीक्षा की वार्षिक परीक्षा शुरू हो चुकी है और मांबाप के ड्यूटी पर जाने के बाद वह अकेली ही कमरे पर रहती है. 11 मार्च, 2016 को दोपहर के 2 बजे से दीक्षा का पेपर था. उस दिन 11 बजे रूबी रोहित को ले कर दीक्षा के घर पहुंच गई. उस समय दीक्षा अकेली ही बैड पर बैठ कर पढ़ रही थी. अचानक अपनी सहेली रूबी को आया देख कर दीक्षा खुश हुई. 1-2 मिनट बात करने के बाद रूबी कमरे से बाहर चली गई. कमरे में रोहित और दीक्षा रह गए.

इधरउधर की बातें करते हुए रोहित बैड पर उस के नजदीक पहुंच गया. वह उस के साथ छेड़छाड़ करने लगा तो दीक्षा घबरा गई. उस ने उसे डांटा तो रोहित ने जबरदस्ती उस के मुंह में बेहोशी की दवा मिली मिठाई का टुकड़ा डाल दिया. थोड़ी देर में वह निढाल हो गई. इस के बाद रोहित ने उस के साथ मनमानी की. दवा का असर शायद कम था, जिस से दीक्षा थोड़ी देर में होश में आ गई. वह शोर मचाने को हुई तो रोहित ने उस का मुंह दबा लिया. उस की घुटीघुटी आवाज बाहर आ रही थी, जिसे सुन कर रूबी कमरे में आ गई.

उसे देख कर दीक्षा ने अपने मुंह से रोहित का हाथ हटा कर धमकाया कि वह इस बारे में अपने मम्मीपापा को बता कर उसे ऐसा सबक सिखाएगी कि वह याद रखेगी. इस से रूबी डर गई. उसे लगा कि अगर इस ने अपने मांबाप को यह बात बता दी तो उस की मोहल्ले में बदनामी तो होगी, साथ ही वह जेल भी जाएगी. इस से बचने के लिए रूबी ने पास पड़ा तकिया उठा कर उस के चेहरे पर रख दिया. रोहित ने दीक्षा के हाथ पकड़ लिए, जिस से वह ज्यादा विरोध नहीं कर सकी. कुछ ही देर में सांस घुटने से दीक्षा की मौत हो गई. उस वक्त वह अर्धनग्न अवस्था में थी. उसी अवस्था में वे उसे छोड़ कर चले गए.

रूबी से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसी दिन यानी 13 मार्च, 2016 को रोहित को भी हिरासत में ले लिया. रूबी चूंकि नाबालिग थी, इसलिए  उसे अगले दिन जुवेनाइल कोर्ट में पेश कर के करनाल स्थित नारी निकेतन भेज दिया गया, जबकि रोहित को कालका के प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी श्री दानेश गुप्ता की अदालत में पेश कर 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड अवधि में पुलिस ने रोहित से विस्तार से पूछताछ की. इस के बाद उसे फिर से अदालत में पेश कर अंबाला जेल भेज दिया गया. True Crime Story

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. रूबी, दीक्षा और दीक्षा के परिजनों के नाम परिवर्तित हैं)

 

Crime Story Hindi: 5 घंटे तालाब में डूबा रहा अपराधी

Crime Story Hindi: एक ऐसा शातिर अपराधी सामने आया, जिस की करतूत ने सभी को चौंका दिया. पुलिस से बचने के लिए वह करीब 5 घंटे तक पानी में डूबा रहा और भीतर छिप कर गिरफ्तारी से बचने की कोशिश करता रहा. उस की यह चालाकी और दुस्साहस सुनकर हर कोई दंग रह गया. आखिर कौन था यह शातिर अपराधी, जिसे पकड़ने के लिए पुलिस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी? आइए जानते हैं इस सनसनीखेज मामले की पूरी कहानी, जो आप को अलर्ट रहने का संदेश देगी.

यह शातिर अपराधी हरविंदर सिंह उत्तर प्रदेश के बिजनौर का रहने वाला है, जिस ने अब तक देशभर में 400 से अधिक चोरी की वारदातों को अंजाम दिया है. चौंकाने वाली बात यह है कि वह वर्ष 2017 में बिजनौर के हल्दौर नगर निकाय से निर्दलीय पार्षद भी रह चुका है. हरविंदर सिंह के खिलाफ मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मुंबई सहित कई स्थानों पर मामले दर्ज हैं. गिरफ्तारी से बचने के लिए वह हर वारदात के बाद सिम बदल लेता था और अपने साथ कोई पहचान पत्र नहीं रखता था. फिलहाल जबलपुर पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल द्वारा उस से अन्य मामलों में पूछताछ की जा रही है.

यह सनसनीखेज घटना मध्य प्रदेश के जबलपुर में सामने आई, जहां मंगलवार शाम पुलिस और एक अंतरराज्यीय चोर के बीच फिल्मी अंदाज में पीछा हुआ. पुलिस को चकमा देने के लिए आरोपी खितौला रेलवे स्टेशन के पास काई से भरे एक तालाब में कूद गया और करीब 5 घंटे तक पानी के भीतर छिपा रहा. उस की इस चालाकी ने पुलिस को भी हैरान कर दिया. हैरानी की बात यह रही कि आरोपी सांस लेने के लिए कमल की डंठल, जिसे कमलनाल कहा जाता है, का सहारा लेता रहा.

दरअसल, यह घटना रीवाइतवारी एक्सप्रैस ट्रेन की है, जहां एसी कोच में एक महिला का पर्स चोरी करने की कोशिश के दौरान वह आरपीएफ की नजर में आ गया. ट्रेन के सिहोरा रोड रेलवे स्टेशन के पास धीमी होते ही वह कूदकर भागा, लेकिन जवानों ने उस का पीछा जारी रखा और अंततः उसे घेर लिया. रात के अंधेरे और तालाब में फैली शैवाल के कारण आरोपी काफी देर तक पुलिस की नजरों से ओझल रहा, लेकिन गोताखोरों की मदद से उसे पकड़ लिया गया. गिरफ्तारी के बाद उस ने अपना नाम बबलू और पता चंडीगढ़ बताया, परंतु आरपीएफ इंसपेक्टर राजीव खरब को उस पर संदेह हुआ.

पुराने रिकौर्ड से मिलान करने पर उस की पहचान हरविंदर सिंह उर्फ सनी के रूप में हुई. इस खुलासे ने पुलिस को भी चौंका दिया और उस के आपराधिक नेटवर्क की परतें खुलने लगीं. Crime Story Hindi

Shocking Murder Case: पत्नी की हत्या कर शव सेप्टिक टैंक में छिपाया

Shocking Murder Case: ओडिशा के नबरंगपुर जिले से एक बेहद दर्दनाक और चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जिस ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया है. रायघर थाना क्षेत्र के जोड़िंगा पंचायत के बोरगांव  में सुबास गोंड नामक व्यक्ति ने अपनी पत्नी मनई गंड की बेरहमी से हत्या कर दी और फिर सबूत छिपाने के लिए उस के शव को घर के शौचालय के सेप्टिक टैंक में डाल दिया.

जानकारी के अनुसार, सुबास अपनी पत्नी और बच्चों के साथ एक शादी समारोह में शामिल होने गया था. वहां से लौटने के बाद पतिपत्नी के बीच किसी बात को ले कर विवाद शुरू हो गया. बताया जा रहा है कि सुबास को अपनी पत्नी के चरित्र पर शक था, जिस वजह से दोनों के बीच झगड़ा बढ़ गया और गुस्से में उस ने पत्नी पर हमला कर दिया, जिस से उस की मौके पर ही मौत हो गई.

हत्या के बाद आरोपी ने सबूत छिपाने के लिए शव को सेप्टिक टैंक में डाल दिया ताकि किसी को शक न हो. लेकिन इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ, जब उन के 4 साल के मासूम बेटे ने घटना देख ली और डर के कारण पड़ोसियों को सारी बात बता दी. बच्चे की बात सुनकर ग्रामीणों ने सुबास से पूछताछ की, जहां पहले तो वह इनकार करता रहा, लेकिन बाद में उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

सूचना मिलने पर रायघर थाना पुलिस मौके पर पहुंची और सेप्टिक टैंक से शव को बरामद किया. पुलिस ने आरोपी को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर दी है. वहीं, यह घटना पूरे क्षेत्र में सनसनी का कारण बन गई है, जहां एक तरफ पति की दरिंदगी ने लोगों को झकझोर दिया है, वहीं एक मासूम बच्चे द्वारा सच उजागर करने ने सभी को भावुक कर दिया है. Shocking Murder Case

Child Murder Case: पिता ने ली 6 साल के बेटे की जान

Child Murder Case: एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां एक पिता ने अपने ही 6 साल के मासूम बेटे की बेरहमी से हत्या कर दी. वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी ने सबूत मिटाने के इरादे से बच्चे को नदी में फेंक दिया. आखिर ऐसी क्या वजह थी, जिस ने एक पिता को ही अपने बेटे का कातिल बना दिया? इस दर्दनाक और चौंकाने वाली घटना की पूरी सच्चाई जानने के लिए पढ़िए यह विस्तृत कहानी, जो आप को सोचने पर मजबूर कर देगी और सतर्क रहने का संदेश भी देगी.

कर्नाटक के विजयपुरा से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जिस ने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया. विजयपुरा ग्रामीण पुलिस ने मल्लिकार्जुन हरिकेरी नामक व्यक्ति को अपने 6 साल के बेटे सिद्धार्थ की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया है. आरोप है कि उस ने मासूम को कृष्णा नदी में फेंक दिया, जिस से उस की मौत हो गई.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आरोपी को शक था कि बच्चा उस की संतान नहीं है. इसी संदेह ने उसे इतना क्रूर बना दिया कि उस ने अपने ही बेटे की जान ले ली. वह बच्चे को स्कूल में दाखिला कराने का बहाना बनाकर घर से बाहर ले गया और उसे नदी में धकेल दिया. घटना के बाद वह घर लौट आया और जब फेमिली वालों ने बच्चे के बारे में पूछा तो वह गुस्सा करने लगा.

मामला दर्ज होते ही उस ने भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.
विजयपुरा के एसपी लक्ष्मण निंबर्गी के अनुसार, यह घटना 15 मार्च, 2026 को हुई थी.

मल्लिकार्जुन अपने बेटे सिद्धार्थ को नए स्कूल में दाखिला दिलाने के बहाने घर से ले गया था, लेकिन कुछ दिनों बाद वह अकेला लौट आया. उस के विरोधाभासी बयानों से परिवार को शक हुआ. पहली अप्रैल, 2026 को सिद्धार्थ के जन्मदिन पर मां ने उस से मिलने की जिद की, जिस के बाद परिजनों ने गुमशुदगी की सूचना दर्ज कराई. पूछताछ में आरोपी ने स्वीकार किया कि वह बच्चे को महाराष्ट्र के कराड ले गया और कृष्णा नदी में धकेल दिया.

आरोपी के कुबूलनामे के बाद विजयपुरा पुलिस ने महाराष्ट्र पुलिस से संपर्क किया. जांच में पता चला कि कराड में पहले से एक अज्ञात बालक की ‘अप्राकृतिक मौत’ का मामला दर्ज था. कराड पुलिस द्वारा उपलब्ध कराए गए सबूतों से पुष्टि हुई कि बरामद शव सिद्धार्थ का ही था.
इस के बाद गुमशुदगी के मामले को हत्या में तरमीम कर दिया गया और आरोपी मल्लिकार्जुन हरिकेरी को गिरफ्तार कर लिया गया. Child Murder Case

Social Crime Story: सहेली ही निकली ब्लैकमेलर

Social Crime Story: मनजीत कौर ने प्रवीण कुमारी को सहेली समझ कर उस के कहने पर अपनी वीडियो क्लिप बनवा ली थी, तब उसे क्या पता था कि यही वीडियो क्लिप उस की जान का जंजाल बन जाएगी.

तनवीर सिंह ने अपनी बहन मनजीत कौर को एटीएम कार्ड देते हुए कहा, ‘‘पापा ने मुझे पैसे निकालने के लिए दिया था, लेकिन मेरा कालेज जाना जरूरी है. इसलिए तुम ऐसा करना कि थोड़ी देर में जा कर पहले एटीएम से रुपए निकाल लेना, उस के बाद बाजार जा कर दरजी से अपने कपड़े ले लेना और लौटते हुए दहीहांडी रेस्टोरेंट वाले शमीजी को 20 हजार रुपए दे देना.’’

‘‘ठीक है, तुम्हारा कालेज जाना जरूरी है तो तुम जाओ. मैं घर के काम करा कर चली जाऊंगी.’’ मनजीत ने कहा.

‘‘और हां, प्रेस वाले से भी पूछ लेना कि उस ने कार्ड छाप दिए या नहीं? अगर नहीं छापे हों तो उन से कह देना कार्ड जल्दी छाप दें. शादी में कुछ ही दिन बाकी रह गए हैं, कार्ड बांटने में भी बड़ा समय लगता है. यह काम जितनी जल्दी निपट जाए, उतना ठीक रहेगा.’’ तनवीर ने कपड़े पहनते हुए कहा.

मनजीत कौर ने भाई से एटीएम कार्ड ले कर अपने पर्स में रख लिया. इस के बाद वह मां के साथ घर के कामों में लग गई. घर के काम कराने के बाद खाना वगैरह खा कर मनजीत दोपहर को बाजार के लिए निकली. पहले उस ने एटीएम से रुपए निकाले.

उस के बाद औटो से गुमार मंडी बाजार गई, जहां दरजी के यहां से उस ने अपने कपड़े लिए. वहां से घंटाघर जा कर लहंगे वाले के यहां से होते हुए वह सिविल लाइन स्थित दहीहांडी रेस्टोरैंट पहुंची. रेस्टोरैंट के मालिक शमीजी को उस ने 20 हजार रुपए दिए, क्योंकि शादी में चायनाश्ते का इंतजाम शमीजी को ही करना था.

सारे काम निपटा कर मनजीत कौर औटो से घर पहुंची. औटो का किराया दे कर जैसे ही वह गेट में घुसी, उस के फोन की घंटी बजी. उस ने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से एक लड़की की आवाज आई. उस ने अपनी मोटी आवाज में लापरवाही से पूछा, ‘‘मनजीत बोल रही हैं?’’

‘‘जी हां, आप कौन?’’ मनजीत ने पूछा.

‘‘मनजीत है न तो ध्यान से सुन,’’ फोन करने वाली लड़की रौब से धमकी भरे लहजे में बोली. इस के बाद उस ने मनजीत से जो कहा, उसे सुन कर उस का चेहरा सफेद पड़ गया. हाथपैर कांपने लगे. उसे लगा, जैसे फोन हाथ से छूट कर गिर जाएगा. फोन ही नहीं, वह खुद भी गिर जाएगी.

उस लड़की की बातों से मनजीत इतना घबरा गई कि उस से एक कदम भी नहीं चला गया. फोन कटने के तुरंत बाद मनजीत के फोन पर एक वीडियो का एमएमएस आ गया. कांपते हाथों से उस ने इनबौक्स खोल कर वीडियो देखी तो उस के होश उड़ गए. उस का दिलदिमाग और शरीर से नियंत्रण खो गया, जिस से वह चकरा कर गेट के पास ही गिर गई.

संयोग से उसी समय उधर से उस की पड़ोसन गुजर रही थी. उस ने मनजीत को गिरते देखा तो शोर मचाते हुए वह उस के पास पहुंच गई. घर वालों के बाहर आतेआते शोर सुन कर अन्य पड़ोसी भी आ गए थे. पड़ोसियों की मदद से मनजीत के पिता जरनैल सिंह उसे उठा कर अंदर ले गए. डाक्टर को बुलाया गया. उस ने इंजैक्शन लगाया. पूछने पर बताया कि शायद इसे एकदम से किसी बात का गहरा सदमा लगा है.

कुछ दिनों बाद ही मनजीत की शादी होने वाली थी. ऐसे में इस तरह कुछ हो जाना चिंता की बात थी. घर वालों को कुछ पता नहीं था. मनजीत को जो सदमा लगा था, वह फोन पर बात होने और वीडियो देखने के बाद लगा था. आखिर किस ने उसे फोन किया था, फोन करने वाले ने ऐसा क्या कह दिया था और उस वीडियो में ऐसा क्या था, जिसे सुन कर उसे इस तरह का सदमा लगा कि वह बेहोश हो गई थी.

यह सब जानने से पहले आइए थोड़ा मनजीत और उस के घर वालों के बारे में जान लेते हैं. मनजीत के पिता सरदार जरनैल सिंह सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे. रिटायर होने के बाद उन्होंने लुधियाना के जस्सियां रोड स्थित नवीननगर में शानदार कोठीनुमा मकान बनवाया था. उन के परिवार में पत्नी के अलावा बेटा तनवीर सिंह और बेटी मनजीत कौर थी.

जरनैल सिंह का छोटा परिवार था. वह हर तरह से सुखी और संपन्न थे. दोनों बच्चों को उन्होंने अच्छी शिक्षा दिलाई थी. मनजीत कौर ने पटना साहिब हिमाचल से बीडीएस (दंत चिकित्सक) की पढ़ाई की थी, जबकि बेटा तनवीर सिंह लुधियाना के आर्य कालेज से बीबीए की पढ़ाई कर रहा था. मनजीत अभी और पढ़ना चाहती थी, लेकिन उस की उम्र शादी लायक हो गई थी, इसलिए मातापिता ने उस का विवाह करना उचित समझा. लड़का देख कर उन्होंने उस की शादी ही नहीं तय कर दी थी, बल्कि जल्दी ही उस की शादी होने वाली थी.

मनजीत सहित पूरा परिवार इस शादी से खुश था. घर में शादी की तैयारियां बड़े जोरोंशोरों से चल रही थीं. इसी बीच मनजीत कौर के साथ यह हादसा हो गया था. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक हंसतीखेलती मनजीत को यह क्या हो गया? मनजीत बिस्तर पर पड़ गई. उसे बिस्तर पर पड़े धीरेधीरे एक सप्ताह हो गया. वह न कुछ खातीपीती थी और न किसी से बात करती थी. अकेली पड़ीपड़ी आंसू बहाती रहती थी. कुछ पूछने पर ठीक से जवाब भी नहीं देती थी. हर समय खोईखोई सी रहती थी. घर का हंसीखुशी का माहौल एक अबूझ से सन्नाटे में तब्दील हो गया था.

शादी के दिन नजदीक आते जा रहे थे. कार्ड बांटे जा चुके थे, करीबी रिश्तेदार आने भी लगे थे. पहले की कुछ रस्में निभाई भी जाने लगी थीं, लेकिन उन रस्मों में भाग लेते समय मनजीत के चेहरे पर उदासी सी छाई रहती थी. पूरा परिवार परेशान था. सब लोग पूछपूछ कर थक गए थे, लेकिन मनजीत ने कुछ नहीं बताया. उस ने जैसे अपने होठों पर ताला जड़ लिया था. यही खामोशी उसे भीतरभीतर खाए जा रही थी.

आखिर इस तरह कब तक चलता. हर चीज का एक अंत होता है. एक दिन भाई तनवीर ने गुरुग्रंथ साहब के पावन स्वरूप श्री जपुजी साहब का गुटखा ले कर मनजीत के सिर पर रखते हुए कहा, ‘‘आप को गुरुग्रंथ साहबजी की कसम, सचसच बताओ क्या बात है, जो तुम अपनी यह हालत किए हो?’’

मनजीत काफी धार्मिक विचारों वाली थी. वह रोजाना सुबह ज्वालानगर स्थित गुरु निवारण साहब गुरुद्वारा जाती थी, शाम की अरदास में भी वह शामिल होती थी. इस के अलावा दिन में जब भी उसे समय मिलता था, वह नामसिमरन करती थी. लेकिन जब से उस की यह हालत हुई थी, उस ने गुरुद्वारा जाना बंद कर दिया था. उस दिन भाई तनवीर ने जब जपुजी साहब का गुटखा उस के सिर पर रखा तो गुटखा हाथ में ले कर वह जोरजोर से गुरु का नाम ले कर रोने लगी. तनवीर ने उसे चुप नहीं कराया. वह चुपचाप खड़ा उसे रोते देखता रहा. शायद वह चाहता था कि उस के मन में जो गुबार भरा है, वह निकाल दे, तभी ठीक रहेगा.

काफी देर तक रोने के बाद जब मनजीत का मन हलका हुआ तो उस ने तनवीर को जो बताया, उसे सुन कर तनवीर को भी चक्कर आने लगा. उस ने भाई को जो बताया था, वह कुछ इस तरह था. मनजीत रोजाना सुबह गुरुद्वारा साहब जाती थी. वहीं उस की मुलाकात प्रवीण कुमारी से हुई. वह भी लगभग रोज ही गुरुद्वारा आती थी. दोनों में परिचय हुआ तो बातचीत में उस ने खुद को मनजीत के सामने बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की बताया. इस की वजह यह थी कि मनजीत की गुरुघर में बड़ी श्रद्धा थी. इस तरह दोनों जल्दी ही गहरी दोस्त बन गईं. कुछ दिनों की मुलाकात में मनजीत उसे बहन मानने लगी थी.

गुरुद्वारा साहब में अरदास के बाद मनजीत प्रवीण कुमारी के साथ बैठ कर काफी देर तक बातें करती. इसी बातचीत में प्रवीण कुमारी ने मनजीत कौर के घरपरिवार, आर्थिक स्थिति और उस की शादी के बारे में जान लिया था. यही नहीं, उसे यह भी पता चल गया था कि उस के हाथों में काफी रुपए हैं.

इस के बाद एक दिन याद रखने के बहाने प्रवीण कुमारी ने गुरुद्वारा प्रांगण में मनजीत की एक छोटी सी वीडियो क्लिप बना ली. प्रवीण कुमारी यह वीडियो यादगार के लिए बना रही थी, इसलिए मनजीत कौर ने खुशीखुशी बनवा ली थी. तब उसे क्या पता था कि यही वीडियो उस की जान के लिए आफत बन जाएगी. उसे यह वीडियो बनवाने का पछतावा तो उस दिन हुआ, जिस दिन प्रवीण कुमारी ने उसे ब्लैकमेल करने के लिए फोन पर उस वीडियो  की क्लिप भेजी.

दरअसल, प्रवीण कुमारी ने उस समय तो यादगार के तौर पर मनजीत कौर की वह सीधीसादी वीडियो क्लिप बनाई थी, लेकिन बाद में उस ने उस वीडियो के साथ छेड़छाड़ कर के उसे अश्लील बना दिया था. दरअसल, वह वीडियो मिक्सिंग की एक्सपर्ट थी. अपना यह ज्ञान अच्छे काम में लगाने के बजाय वह गलत काम में लगाने लगी, जो एक तरह से अपराध था. अश्लील वीडियो बना कर उस ने अपने मोबाइल फोन से वीडियो मनजीत कौर के मोबाइल पर भेज कर उस से ढाई लाख रुपए मांगे. इसी के साथ उसे धमकी भी दी कि अगर उस ने उसे रुपए नहीं दिए तो वह उस वीडियो को उस की ससुराल वालों के पास भेजने के साथसाथ इंटरनैट पर भी डाल देगी.

प्रवीण कुमारी की धमकी सुन कर और अपना वीडियो देख कर मनजीत कौर की हालत खराब हो गई थी. क्योंकि ढाई लाख रुपए देना उस के वश की बात नहीं थी. अगर वह वीडियो उस की ससुराल पहुंच जाती तो उस का रिश्ता तो टूटता ही, बदनामी ऊपर से होती. मांबाप की छोड़ो, वह किसी को भी मुंह दिखाने लायक नहीं रहती. इसी बात को मन में लिए मनजीत कौर घुटघुट कर जी रही थी. कई बार तो उस के मन में आत्महत्या करने तक की बात आ चुकी थी.

प्रवीण कुमारी ने तो ढाई लाख रुपए की मांग करते हुए मनजीत कौर को धमकाया ही था, उस के 2 दिनों बाद किसी आदमी ने भी फोन कर के रुपए मांगे थे. उस ने भी रुपए न देने पर अंजाम भुगतने की धमकी दी थी. इस के बाद तो लगातार उस के फोन आने लगे थे. वह उस से रुपए तो मांगता ही था, अश्लील बातें भी करता था, जिस से मनजीत और ज्यादा डर गई थी. मनजीत कौर की पूरी बात सुनने के बाद इस विषय पर तनवीर काफी देर तक सोचता रहा. मामला गंभीर ही नहीं, बहुत नाजुक भी था. छोटी सी गलती उस की बहन की जिंदगी तबाह कर सकती थी. आखिर काफी सोचविचार कर उस ने जो कदम उठाया, वह एकदम सही था.

तनवीर सिंह मनजीत को साथ ले कर जगतपुरी पुलिस चौकी पहुंचा और चौकीइंचार्ज एएसआई जगतार सिंह को पूरी बात बता दी. उस ने जगतार सिंह से इस मामले को गुपचुप तरीके से निपटा कर दोषियों को गिरफ्तार करने की प्रार्थना की. मामले की गंभीरता को देखते हुए जगतार सिंह ने तुरंत इस बात की जानकारी थानाप्रभारी अवतार सिंह को देने के साथ, तनवीर की शिकायत डीडी नंबर 24 पर दर्ज कर के तुरंत काररवाई शुरू कर दी.

थानाप्रभारी अवतार सिंह ने इस मामले को सुलझाने के लिए हैडकांस्टेबल हरविंदर सिंह, जसवीर सिंह और कांस्टेबल जतिंदर सिंह की एक टीम बनाई, जिसे उन्होंने ज्वालानगर स्थित दुख निवारण गुरुद्वारा के पास लगा दिया. क्योंकि उन्हें लग रहा था कि प्रवीण कुमारी गुरुद्वारे जरूर आएगी, जहां से उसे पकड़ लिया जाएगा. लेकिन पुलिस की यह चाल बेकार गई, क्योंकि प्रवीण कुमार वहां आई ही नहीं. फिर भी वहां से यह जरूर पता चल गया कि वह अपने पति महेंद्र के साथ कहां रहती है.

इस का मतलब यह था कि मनजीत कौर को फोन पर प्रवीण के अलावा जिस आदमी ने धमकी दी थी, वह उस का पति महेंद्र रहा होगा. घर का पता मिलने के बाद चौकीइंचार्ज जगतार सिंह ने प्रवीण कुमारी के घर छापा मारा तो पतिपत्नी घर पर नहीं मिले. इस के बाद मुखबिरों को उन के पीछे लगा दिया गया, साथ ही उन के घर पर एक सिपाही भी तैनात कर दिया गया. सिपाही प्रवीण कुमारी के घर इस तरह नजर रख रहा था कि किसी को पता नहीं चल रहा था कि घर पर नजर रखी जा रही है.

30 दिसंबर को जगतार सिंह जैसे ही चौकी पर पहुंचे, मुखबिर ने उन्हें बताया कि प्रवीण कुमारी अपने पति महेंद्र के साथ बसअड्डे पर मौजूद है. उन्होंने देर करना उचित नहीं समझा और सहयोगियों को साथ ले कर तुरंत बसअड्डे पर पहुंच गए. लेकिन प्रवीण कुमारी उन्हें वहां नहीं मिली. तब वह जस्सिया रोड पर संगम पैलेस की ओर बढ़े. थोड़ी दूर जाने पर प्रवीण कुमारी उन्हें 2 लोगों के साथ जाते दिखाई दे गई. पुलिस ने उन्हें घेर कर पकड़ लिया. पूछने पर पता चला प्रवीण कुमारी के साथियों के नाम महेंद्र और सुखचरण थे. महेंद्र तो प्रवीण कुमारी का पति था, जबकि सुखचरण उन का साथी था. पुलिस तीनों को पकड़ कर जगतपुरी पुलिस चौकी ले आई.

चौकी में की गई पूछताछ में पता चला यह सारी योजना प्रवीण कुमारी और महेंद्र के साथ पकड़े गए सुखचरण सिंह ने बनाई थी. वह उसी गुरुद्वारे में ग्रंथी था, जहां मनजीत कौर रोज माथा टेकने आती थी. उसे मनजीत कौर के परिवार की आर्थिक स्थिति का पता था, इसलिए उस ने प्रवीण कुमारी और महेंद्र के साथ मिल कर उसे ब्लैकमेल करने की योजना बनाई थी.

गुंथी सुखचरण सिंह शादीशुदा था और काफी दिनों से उसी गुरुद्वारा में ग्रंथी था, जबकि महेंद्र उन दिनों बेकार था. महेंद्र का पहले अच्छाखासा काम चल रहा था. लेकिन वह और प्रवीण कुमारी अय्याश प्रवृति के थे, इसलिए अय्याशी के चक्कर में उन का कामधंधा बंद हो गया था. इस के बावजूद उन के शाही खर्चों में कोई कमी नहीं आई थी.

खर्चों की वजह से प्रवीण कुमारी और महेंद्र पर काफी कर्ज हो गया. कर्ज देने वाले परेशान करने लगे तो उन्होंने ग्रंथी सुखचरण सिंह के कहने पर मनजीत को ब्लैकमेल करने की योजना बना ली. सीधीसादी मनजीत उन के जाल में फंस भी गई. अच्छा तो यह हुआ कि उस का भाई समझदार था. वह पुलिस के पास चला गया, जिस से एक लड़की की जिंदगी बरबाद होने से बच गई. पूछताछ के बाद जगतार सिंह ने उसी दिन यानी 30 दिसंबर, 2015 को अपराध संख्या 221/15 पर भादंवि की धारा 389/120बी के तहत प्रवीण कुमारी, उस के पति महेंद्र और ग्रंथी सुखचरण सिंह के खिलाफ केस दर्ज कर तीनों को सक्षम अदालत में पेश कर एक दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया.

रिमांड के दौरान जगतार सिंह ने तीनों अभियुक्तों के मोबाइल फोन कब्जे में ले कर उन्हें जांच के लिए भेज दिए. रिमांड अवधि समाप्त होने पर सभी को एक बार फिर अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Social Crime Story

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, बदनामी की वजह से कुछ पात्रों के नाम बदले हुए हैं)

IPS Love Story: उत्तर प्रदेश के 2 आईपीएस की लव स्टोरी

IPS Love Story: यूपी के आईपीएस अधिकारियों की एक जोड़ी इन दिनों मीडिया की सुर्खी और इंटरनेट पर छाई हुई  है. आईपीएस अधिकारी कृष्ण कुमार बिश्नोई और आईपीएस अंकिता वर्मा की लव स्टोरी की शुरुआत मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के गृह जनपद गोरखपुर में तैनाती के दौरान हुई. इस के बाद दोनों 29 मार्च, 2026 को सामाजिक रीतिरिवाज से विवाह बंधन में बंध गए. इन के विवाह की कुछ बातें इतनी दिलचस्प रहीं कि…

संभल के एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई और बरेली की एएसपी अंशिका वर्मा आखिर 29 मार्च को विवाह बंधन में बंध गए. इन दोनों आईपीएस अधिकारियों के विवाह की खबरें देश भर की मीडिया और सोशल मीडिया में छाई रहीं. बाड़मेर से ले कर जोधपुर तक में आयोजित इस भव्य शादी और प्री वेडिंग कार्यक्रमों में दोनों अफसरों का फिल्मी और पारंपरिक अंदाज सोशल मीडिया की सुर्खी बना रहा.

उत्तर प्रदेश के जिला संभल के एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई और बरेली (दक्षिण) की एएसपी अंशिका वर्मा के विवाह की रस्में राजस्थान के बाड़मेर स्थित ‘कृष्ण निवास’ और जोधपुर के अजीत पैलेस में संपन्न हुईं. हालांकि आईपीएस अंशिका वर्मा मूलरूप से यूपी के प्रयागराज की रहने वाली हैं, लेकिन उन्होंने कृष्ण के साथ दांपत्य जीवन की शुरुआत करने के लिए राजस्थान में बिश्नोई समाज में होने वाली शादी की सभी रस्मों को पूरी शिद्दत से निभाया.

हल्दी कार्यक्रम में परिवार के सदस्यों के साथ आईपीएम कृष्ण कुमार विश्नोई

पहले बाड़मेर में बारात सभा की सभी रस्में पूरी हुईं, जिस में कृष्ण कुमार बिश्नोई पारंपरिक राजस्थानी जोधपुरी सूट, पगड़ी और कृपाण धारण कर शामिल हुए. ढोलनगाड़ों और फिल्मी गानों के बीच बारात जोधपुर के लिए रवाना हुई.

बारात सभा के दौरान एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई के हाथों में मेहंदी भी लगाई गई. मेहंदी की रस्म के दौरान वे काफी खुश नजर आए और संगीत की धुन पर जम कर झूमते भी दिखे. इस से पहले 27 मार्च को हल्दी और संगीत का कार्यक्रम हुआ था, जहां पूरे परिवार ने ढोलनगाड़ों के साथ जश्न मनाया. सोशल मीडिया पर इन रस्मों के वीडियो और तसवीरें खूब वायरल हुईं, जिस में कृष्ण कुमार बिश्नोई और अंशिका वर्मा का मस्ती भरा अंदाज दिखा.

सगाई और रिंग सेरेमनी के दौरान यह आईपीएस जोड़ी पूरी तरह फिल्मी रंग में रंगी दिखी. कृष्ण कुमार बिश्नोई ने ‘प्यार का सिग्नल…’ गाने पर जम कर डांस किया और फिर ‘चल प्यार करेगी…’ गाने पर शानदार स्टेज परफारमेंस दी. इस दौरान कृष्ण कुमार बिश्नोई ने अंशिका को गोद में उठा लिया, जिसे देख मेहमानों ने खूब तालियां बजाईं. उन्होंने अपने पापा सुजाना राम बिश्नोई के साथ ‘पापा कहते हैं…’ गाने पर भी डांस कर सब का दिल जीत लिया.

बाड़मेर से बारात जोधपुर के लिए रवाना होने के बाद जोधपुर के मशहूर अजीत पैलेस में 29 मार्च, 2026 को कृष्ण कुमार बिश्नोई ने अंशिका वर्मा के संग सात फेरे लिए और एकदूसरे के जीवनसाथी बन गए. शादी के बाद 30 मार्च को जोधपुर के ही लारिया रिसौर्ट में एक भव्य रिसैप्शन का आयोजन किया गया, जिस में संभल, बरेली व यूपी के अनेक पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल हुए. साथ ही कई दिग्गज हस्तियां भी इस शादी के गवाह बनीं.

आईएएस हो या आईपीएस, होते तो सब इंसान ही है. समाज का अभिन्न अंग होने के कारण उन की भी शादियां होती हैं. फिर अगर आईपीएस कृष्ण कुमार बिश्नोई और अंशिका वर्मा की शादी हो गई तो इतना प्रचारित किए जाने की क्या बात है? यह सवाल सभी के जेहन में होगा कि इंटरनेट की दुनिया इन दोनों की शादी पर इतनी सुर्ख क्यों है? शादी के पारंपरिक अंदाज की फोटो से ले कर बेहद खूबसूरत वीडियो क्यों लोगों को इस शादी से जोड़ रहे हैं? दरअसल, इस अनोखी शादी की कई बातें हैं, जो दूसरी शादियों से अलहदा हैं.

पहला तो यही कि कृष्ण कुमार बिश्नोई और अंशिका वर्मा दोनों भारतीय पुलिस सेवा से जुड़े हैं. दूसरे उन की पहली नियुक्ति शुरुआती दौर में एक ही शहर यूपी के गोरखपुर में रही. दोनों की प्रेम कहानी उसी समय शुरू हुई. बाद में एक दूजे की पसंद गहरे प्रेम में तब्दील हो गई और 3 साल बाद दोनों एक दूजे के हो गए. तीसरे पुलिस विभाग में लोकप्रियता की बुलंदियों को छूने वाले इस जोड़े ने आधुनिक तामझाम को छोड़ कर बेहद पारंपरिक ढंग से सभी रीतिरिवाजों और मान्यताओं को अपनाते हुए शादी की रस्में पूरी कीं, जो अधिकांश नौकरशाही से जुड़े लोग नहीं करते.

कृष्ण कुमार बिश्नोई ने इस शादी से दहेज प्रथा पर भी प्रहार किया. उन्होंने अपनी शादी में पारंपरिक दिखावे और दहेज के दिखावे को पूरी तरह नकार दिया. उन्होंने अपनी पत्नी अंशिका वर्मा से शादी में केवल एक रुपया और एक नारियल शगुन के तौर पर स्वीकार किया. यह शादी न केवल उन के सादगीपूर्ण जीवन को दर्शाती है, बल्कि दहेज प्रथा के खिलाफ एक मिसाल भी है. दोनों की शादी के बारे में विस्तार से जानना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कृष्ण कुमार बिश्नोई जहां संभल जिले में एसपी के पद पर रहते हुए कई कारणों ये राष्ट्रीय चर्चा का विषय बने तो वहीं अंशिका वर्मा बरेली जिले में एएसपी रहते हुए लेडी सिंघम के रूप में विख्यात हुईं.

ऐसे लोकप्रिय जोड़े की शादी और लव स्टोरी लोगों के लिए प्रेरणास्रोत साबित होगी, इसलिए उन की शादी और लव स्टोरी को बताना बेहद जरूरी है.

कौन हैं एसपी बिश्नोई

दरअसल, इस प्रेम कहानी के नायक हैं संभल के एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई, जो अपनी सख्त प्रशासनिक कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं. एक अनूठी प्रेम कहानी का नायक होने और आईपीएस बनने से पहले कृष्ण कुमार बिश्नोई के जीवन संघर्ष की भी एक गाथा है, जो देश से प्यार करने वालों और कुछ अलग करने वालों की चाह रखने वालों के लिए प्रेरणादायक है.

राजस्थान के बाड़मेर जिले में धोरीमना गांव से ताल्लुक रखने वाले साधारण किसान परिवार में कृष्ण कुमार बिश्नोई का जन्म हुआ था. वह बेहद ही साधारण परिवार से ताल्लुक रखते हैं. कृष्ण कुमार बिश्नोई 6 भाईबहनों में सब से छोटे हैं. उन के फादर का नाम सुजानाराम बिश्नोई है जबकि मम्मी गंगा देवी कुशल गृहिणी हैं. कृष्ण कुमार बिश्नोई के सब से बड़े भाई भजन लाल बिश्नोई ही गांव में खेतीबाड़ी का काम संभालते हैं.

वर कृष्ण कुमार विश्नोई और अंशिका वर्मा दोनों ही भारतीय पुलिस सेवा से जुड़े हैं

छोटी सी खेतीबाड़ी के जरिए कड़ी मेहनत से 6 बच्चों के बड़े परिवार को पालना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन कृष्ण के पापा जानते थे कि उन की कठिन मेहनत में ही उन के बच्चों का उज्जवल भविष्य छिपा है. वह अपने सभी बच्चों को उन की इच्छानुसार शिक्षा दिला कर कामयाब इंसान बनाना चाहते थे. परिवार के सभी बच्चों ने उन की इच्छा को पूरा भी किया.  सब से छोटे कृष्ण कुमार ने गांव के ही प्राइमरी स्कूल से पढ़ाई की. बचपन से ही वह पढऩेलिखने में काफी तेज थे. 8वीं क्लास में उन्होंने पूरे जिले में टौप किया. इस के बाद आगे की पढ़ाई सीकर और फिर जोधपुर के केंद्रीय विद्यालय में की.

उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कालेज से ग्रैजुएशन किया. फिर फ्रांस सरकार की स्कौलरशिप पर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा में मास्टर डिग्री हासिल की. इस के बाद उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में एक साल तक काम किया, जहां उन्हें 30 लाख रुपए सालाना का पैकेज मिल रहा था. लेकिन इस सब के बावजूद कुछ ऐसा था, जिस से उन्हें खालीपन महसूस होता था. क्योंकि उन का मन तो देश सेवा में लगा था, इसलिए उन्होंने इस जौब को अलविदा कह दिया. इस के बाद वह वापस अपने वतन लौट आए. शुरू में परिवार तथा दोस्तों ने इस बात के लिए खूब समझाया कि यूएन में इतने बड़े पैकेज की नौकरी छोड़ कर उन्होंने ठीक नहीं किया.

कृष्ण परिवार के साथ सभी दोस्तों की बातें एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देते थे. क्योंकि अब उन्होंने ठान लिया था कि भले ही कुछ भी हो, वे समाज सेवा के लिए कोई ऐसी नौकरी करेंगे जो सिस्टम से जुड़ी हो और उन्हें सेवा का अवसर मिले. बहुत विचार करने के बाद उन्हें सिविल सर्विस से जुड़ी सेवा ही एकमात्र ऐसी सेवा दिखी, जिस में रह कर वह अपने अरमानों को पूरा कर सकते थे. लिहाजा उन्होंने सिविल सर्विस में जाने का निश्चय कर लिया, लेकिन इस के लिए जरूरी था कि वह इस के योग्य हों. लिहाजा उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा देने का मन बना लिया.

कृष्ण ने दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिविर्सिटी को अपना अगला ठिकाना बनाया, जहां से उन्होंने पहले एम.फिल किया. इसी बीच उन्होंने विदेश मंत्रालय में भी संविदा कर्मी के रूप में काम किया. साथ ही वह यूपीएससी की तैयारी करते हुए पुलिस अफसर के रूप में अपना करिअर बनाने के सपने संजोने लगे. उन का सपना आईपीएस अफसर बनने का था. उन्होंने इस के लिए कड़ी मेहनत की, लेकिन 2017 के अपने पहले प्रयास में वह सफल नहीं हो पाए. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अगले साल 2018 में फिर जीतोड़ मेहनत की तो इस बार उन्हें सफलता मिल गई और वह मात्र 24 साल की उम्र में आईपीएस बन गए.

आईपीएस कृष्ण कुमार बिश्नोई अपने मम्मीपापा के साथ विवाह का निमंत्रण कार्ड ले कर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुंचे.

आईपीएस बनने का सपना पूरा होने के बाद उन्हें यूपी कैडर मिला. अंडर ट्रेनी आईपीएस की तैनाती के बाद उन्हें 2019 में मेरठ व 2021 में मुजफ्फरनगर में बतौर एएसपी तैनाती मिली. 2022 में उन्हें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जिले गोरखपुर में एसपी (सिटी) के रूप में बड़ी तैनाती मिली. गोरखपुर में 29 महीने तक एसपी (सिटी) रहते हुए उन्होंने संगठित अपराध पर कड़ा प्रहार किया था. वहां उन्होंने अपराधियों की लगभग 803 करोड़ रुपए की अवैध संपत्ति कुर्क की थी, जिस के डर से कई अपराधी शहर छोड़ कर भाग खड़े हुए थे.

इस दौरान वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के काफी करीब माने जाते रहे. जब भी मुख्यमंत्री गोरखपुर मठ आते थे तो बिश्नोई सुरक्षा व्यवस्था में पूरी मुस्तैदी के साथ कमान संभालते थे. उन्हें साल 2024 में गोरखपुर से संभल जिले में एसपी के रूप में तैनात किया गया. दरअसल, संभल पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक अति संवेदनशील जिला है, जहां मुसलिम आबादी की अधिकता के कारण अकसर छोटेछोटे धार्मिक कारणों से सांप्रदायिक तनाव पैदा हो जाते हैं. इस क्षेत्र में अकसर अल्पसंख्यक आबादी से जुड़े विपक्षी राजनीतिज्ञ पुलिस पर हावी हो जाते हैं. कड़े फैसले न लेने की इच्छा शक्ति और दबाव के चलते पुलिस का मनोबल गिरा रहता था.

सख्त फैसलों से बने सुपर कौप

संभल की सुरक्षा को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक ऐसे पुलिस अधिकारी की लंबे समय से तलाश थी, जो किसी भी दबाव में काम न करे. जिस में सही फैसले लेने की इच्छाशक्ति हो. ऐसा शख्स उन के सामने ही था, जिसे उन्होंने थोड़ी देर से पहचाना. वह शख्स कोई और नहीं, कृष्ण कुमार बिश्नोई थे, जो सीएम योगी के ही शहर गोरखपुर के एसपी (सिटी) थे. बस, सीएम योगी ने कृष्ण कुमार बिश्नोई को संभल भेजने का फैसला कर लिया. संभल में जौइनिंग से पहले बिश्नोई ने सीएम योगी से मुलाकात की थी, जहां सीएम ने उन्हें शासन की प्राथमिकता गिनाते हुए अपराधियों पर सख्त काररवाई के आदेश दिए.

संभल पहुंचने के बाद बिश्नोई ने कानूनव्यवस्था को ले कर कई सख्त फैसले लिए और प्रशासन के साथ मिल कर जिले में कानून व्यवस्था मजबूत करने के प्रयास किए. इसी के बाद नवंबर, 2024 का वह महीना आया, जब संभल जिले में जामा मसजिद सर्वे के दौरान तनाव की स्थिति पैदा हो गई. इस दौरान हिंसा की घटनाएं सामने आईं. हालात काफी बिगड़ गए, जिसे देख पुलिस प्रशासन ने तुरंत काररवाई की और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया.

पुलिस ने ऐसी व्यूह रचना की, जिस से सांप्रदायिक हिंसा करने वालों का दमन ही नहीं हुआ, बल्कि भविष्य में ऐसा करने की सोच रखने वालों के लिए नजीर बन गई. एसपी बिश्नोई इसी सांप्रदायिक तनाव के बीच उस वक्त सोशल मीडिया पर छा गए, जब उन्होंने उपद्रवी युवाओं को समझाते हुए कहा था कि ‘नेताओं के चक्कर में अपना भविष्य खराब न करें.’ यह वीडियो सोशल मीडिया पर जम कर वायरल हुआ. बताया जाता है कि पुलिस ने बेहद कम समय में हालात को नियंत्रित कर लिया था. हिंसा फैलाने वालों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए और कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया. कानूनव्यवस्था संभालने की इस काररवाई के बाद पुलिस प्रशासन की सक्रियता की चर्चा प्रदेश स्तर तक हुई.

संभल हिंसा पर बड़ी काररवाई करने वाले बिश्नोई को उन के साहसिक नेतृत्व के लिए 2025 में ‘मुख्यमंत्री मेडल’ से सम्मानित किया गया था. हालांकि राजनीतिक रूप से एसपी बिश्नोई की आलोचना जरूर हुई, लेकिन उन्होंने सारी काररवाई विधिसम्मत ढंग से की, इसलिए न्यायपालिका ने भी उन का साथ दिया.

संभल में पुलिस ने उन के नेतृत्व में कानूनव्यवस्था के साथसाथ आर्थिक अपराधों पर भी काररवाई की. बिजली चोरी के खिलाफ अभियान चलाते हुए पुलिस और बिजली विभाग की संयुक्त टीमों ने कई जगहों पर छापेमारी की. इस दौरान बड़ी संख्या में अवैध कनेक्शन पकड़े गए बिश्नोई ने संभल में अपने कार्यकाल में कई बड़े और चर्चित मामलों को सुलझाया है. संभल में 100 करोड़ से अधिक के बीमा धोखाधड़ी घोटाले का खुलासा उन के ही नेतृत्व में हुआ, जिस में 70 से अधिक गिरफ्तारियां की गईं. इस उपलब्धि के लिए उन्हें 26 जनवरी, 2025 को प्लैटिनम पदक और उत्कृष्ट सेवा पुलिस पदक से सम्मानित किया गया.

इस के अलावा नवंबर 2024 में जामा मसजिद सर्वे के दौरान भड़की हिंसा को उन्होंने कुशल रणनीति से नियंत्रित किया, जिस से उन की प्रशासनिक क्षमता की सराहना हुई. संभल में बिटकौइन निवेश के नाम पर ठगी करने वाले गिरोह के खिलाफ भी उन्होंने कड़ी काररवाई की. इस मामले में आरोपी के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी करवाया गया और पीडि़तों का पैसा वापस दिलाने की प्रक्रिया शुरू की गई.

इस तरह के मामलों में उन की सख्ती ने उन्हें एक प्रभावी और निर्णायक अधिकारी के रूप में स्थापित किया है. उन्हें पुलिस सेवा में उत्कृष्ट कार्य के लिए पुलिस मंथन-2025 सम्मेलन में बेस्ट पुलिस अवार्ड से सीएम योगी ने सम्मानित किया. जिस कारण उन की चर्चा प्रदेश भर में हुई. इस आईपीएस जोड़ी की प्रेम कहानी तब तक अधूरी है, जब तक इस की नायिका के बारे में जानकारी नहीं दी जाए. इस की नायिका हैं आईपीएस अंशिका वर्मा.

अंशिका का बैकग्राउंड

अंशिका वर्मा का जन्म 3 जनवरी, 1996 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हुआ था. उन के पापा अनिल वर्मा उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रिसिटी कारपोरेशन लिमिटेड के रिटायर्ड कर्मचारी हैं और उन की मम्मी हाउसमेकर. अंशिका की 2 बड़ी बहनें भी हैं, जो वर्किंग हैं. अंशिका की एक बहन इंजीनियर हैं और दूसरी अपना खुद का बिजनैस चलाती हैं. अंशिका प्रयागराज के सिविल लाइन इलाके की रहने वाली हैं. वह बचपन से ही पढ़ाई में तेज थीं. मजबूत एनालिटिकल और प्रौब्लम सौल्विंग स्किल्स ने उन्हें और बेहतर बनाया.

कृष्ण और अंशिका दोनों को लगने लगा कि वे एकदूसरे को इतना पसंद करते हैं कि जीवन भर का साथ निभाना जीवन को नई दिशा दे सकता है, कहते हैं इंसान की शिक्षा में ही उस की परिपक्वता छिपी होती है.

शुरुआती पढ़ाई प्रयागराज में करने के बाद उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई नोएडा के गलगोटिया कालेज औफ इंजीनियरिंग से की. जहां से उन्होंने 2018 में इलैक्ट्रौनिक ऐंड कम्युनिकेशन में बीटेक डिग्री हासिल की. टेक्निकल बैकग्राउंड होने के बाद भी सिविल सर्विस के प्रति उन के जुनून ने उन्हें यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा में बैठने के लिए प्रेरित किया.

2018 में यूपीएससी की तैयारी शुरू करने के बाद उन का उद्देश्य कानूनव्यवस्था के माध्यम से समाज में योगदान देना था. पहले प्रयास में कुछ दिक्कतें आईं, जिस से उन का पहला अटेंप्ट क्लियर नहीं हो सका. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. क्योंकि यूपीएससी पास करना उन का जुनून बन गया था. उन्होंने सेल्फ स्टडी से फिर तैयारी की. हर रोज 8 से 10 घंटे तक बगैर कोचिंग के सब्जेक्ट्स पर पढ़ाई करते हुए आगे बढ़ीं.

कहते हैं मेहनत और जुनून के आगे ऊपर वाला भी नतमस्तक हो जाता है. 2020 में अपने दूसरे प्रयास में अंशिका ने यूपीएससी सीएसई क्लियर कर लिया. अंशिका ने शानदार 136वीं आल इंडिया रैंक हासिल की. इसी के साथ उन का चयन भारतीय पुलिस सेवा के लिए हुआ. 2021 में वह इंडियन पुलिस सर्विस में शामिल हुईं और उन्हें कैडर मिला उत्तर प्रदेश. उन की पहली पोस्टिंग आगरा के फतेहपुर सीकरी पुलिस स्टेशन में स्टेशन हाउस औफिसर (एसएचओ) के तौर पर हुई.

किसी भी आईपीएस के लिए जरूरी होता है कि वह नौकरी करने के दौरान पहले 3 महीने किसी थाने में बतौर एसएचओ का कार्यकाल पूरा करे, ताकि वह पुलिसिंग के बेसिक काम सीख सके और एक पीडि़त इंसान किस तरह की पीड़ाओं से गुजारता है, उसे जान सके. 18 दिसंबर, 2023 को उन्हें गोरखपुर में असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट औफपुलिस (एएसपी) के पद पर प्रमोट किया गया. एएसपी के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई हाईप्रोफाइल मामलों से निपटने में अहम भूमिका निभाई. कुछ ही समय में अंशिका की गिनती तेजतर्रार पुलिस औफिसर के तौर पर होने लगी.

गोरखपुर में करीब 3 साल तक नौकरी करने के बाद अंशिका वर्मा की पहचान तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी के तौर पर होने लगी. अंशिका के तेवर और प्रशासनिक क्षमताओं के कारण मीडिया ने उन्हें ‘लेडी सिंघम’ का नाम दे दिया. नौकरी की शुरुआत से ही महिलाओं से जुड़े मुद्दों और उन की सुरक्षा को प्राथमिकता देना उन के कार्यकाल का मुख्य फोकस रहा है. इस वजह से वह काफी चर्चा में रहती हैं, साथ ही उन की सक्सेस स्टोरी भी लोगों के लिए एक मोटिवेशन का काम करती है.

अनुशासन और कठोर नियम के चलते अंशिका उन पुलिसकर्मियों के बीच दहशत बन गईं, जो लापरवाह और कामचोर थे. अंशिका वर्मा एक पुलिस अधिकारी के तौर पर लोगों की पीड़ा और दर्द को करीब से जानना चाहती थीं, इसलिए वह सादे कपड़ों में कभी भी और कहीं भी अकेले लोगों के बीच निकल पड़तीं. उन्हें कभी अपनी सुरक्षा का खौफ नहीं रहा, क्योंकि पढ़ाई के साथ उन्होंने मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ले कर आत्मरक्षा के गुर भी सीखे थे. गोरखपुर में 3 साल काम करने के बाद उन का तबादला बरेली जनपद में हो गया. वह बरेली में पहली महिला एसओजी (स्पैशल औपरेशन ग्रुप) कमांडो यूनिट का नेतृत्व कर रही हैं.

अंशिका वर्मा ने अपने कार्यकाल में कई अहम मामलों का खुलासा किया है. उन्होंने गोरखपुर में बदमाश डायना की गिरफ्तारी और स्टांप घोटाले का परदाफाश कर अपनी पहचान बनाई. तभी उन्हें लेडी सिंघम का खिताब भी मिला.

इस सराहनीय काम के लिए उन्हें डीजीपी सम्मान भी मिला. मार्च 2025 में दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स चैंबर औफ कौमर्स एंड इंडस्ट्री के महिला शिखर सम्मेलन में उन्हें ‘वीमन आइकन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया, जो उन के कार्य और महिला सशक्तिकरण के प्रति योगदान को दर्शाता है. जब आप सरकारी नौकरी में होते हैं तो बहुत सी बातें और काम ऐसे होते हैं, जिन्हें जनता तक आसानी से नहीं पहुंचाया जा सकता. इस के लिए आज की युवा पीढ़ी के पुलिस व प्रशासनिक अफसरों ने सोशल मीडिया का सहारा लेना शुरू किया है.

अंशिका वर्मा सोशल मीडिया पर भी ऐक्टिव रहने लगीं और अपने नायाब कामों के कारण वह जल्द ही सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हो गईं. इंस्टाग्राम पर तो उन के 6 लाख से अधिक फालोअर्स हैं. बरेली में तैनाती के दौरान अंशिका वर्मा ने कई चर्चित मामलों में सक्रिय भूमिका निभाई. धर्म परिवर्तन से जुड़े मामलों, एनडीपीएस ऐक्ट के तहत काररवाई और हत्या के मामलों में पुलिस टीमों का नेतृत्व करते हुए उन्होंने कई आरोपियों को गिरफ्तार कराया. संवेदनशील मामलों में उन की सक्रियता के कारण पुलिस की काररवाई को गति मिली और कई मामलों में कम समय में खुलासा संभव हुआ.

अंशिका वर्मा उस समय सब से ज्यादा सुर्खियों में आईं, जब उन्होंने महिला सुरक्षा के लिए एक नई पहल शुरू की. वर्ष 2025 में बरेली में उन्होंने ‘वीरांगना यूनिट’ का गठन कराया. यह उत्तर प्रदेश की पहली ऐसी यूनिट मानी जाती है, जिस में विशेष रूप से ट्रेंड महिला पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. इस यूनिट की महिला कमांडो को ताइक्वांडो, आत्मरक्षा और दंगा नियंत्रण जैसी ट्रेनिंग दी गई, ताकि वे संवेदनशील मामलों में तुरंत काररवाई कर सकें. महिला सशक्तिकरण की दिशा में इस पहल को महत्त्वपूर्ण कदम माना गया और इस के लिए उन्हें राज्य सरकार की ओर से सम्मानित भी किया गया.

कृष्ण और अंशिका की लव स्टोरी की शुरुआत 2024 से गोरखुपर में ही हो गई थी, जहां कृष्ण कुमार बिश्नोई एसपी (सिटी) थे और अंशिका वर्मा एएसपी थीं. एक दूजे की कार्यशैली और आदतों में समानता के कारण अंशिका वर्मा और कृष्ण कुमार बिश्नोई एकदूसरे को पंसद तो करने लगे थे. अंशिका जिस दंबग तरीके से काम करती थीं, जिस तरह के फैसले लेती थीं, काम करने के जो मानवीय तरीके अपनाती थीं, उन्हें ले कर कृष्ण कुमार बिश्नोई भरी मीटिग्ंस में न सिर्फ उन की तारीफें करते, बल्कि अपने उच्चाधिकारियों से भी उन की सराहना कर देते थे. कृष्ण कुमार अंशिका के काम करने के तरीकों से बेहद प्रभावित थे.

लेकिन एक ही जिले में दोनों तैनात थे, ऊपर से अंशिका कृष्ण की मातहत अधिकारी थीं, लिहाजा एकदूसरे को पंसद करने के बावजूद दोनों ने कभी एकदूसरे से अपनी पंसद का इजहार नहीं किया. बाद में जब 2025 के बीच अंशिका बरेली में एएसपी बन कर गईं और कृष्ण कुमार संभल में एसपी बन कर अपनी दंबगई दिखा रहे थे तो पहले अकसर फुरसत के पलों में दोनों एकदूसरे की कुशलक्षेम जानने के लिए फोन पर बातचीत करने लगे. बाद में गोरखपुर तैनाती के दौरान पुरानी यादों को ताजा करने लगे. बातचीत के इसी सिलसिले के दौरान कब आत्मीयता इतनी बढ़ गई कि दोनों निजता और परिवार की बातें करने लगे.

कृष्ण और अंशिका दोनों को लगने लगा कि वे एकदूसरे को इतना पसंद करते हैं कि जीवन भर का साथ निभाना जीवन को नई दिशा दे सकता है. कहते हैं इंसान की शिक्षा में ही उस की परिपक्वता छिपी होती है.

सुर्खियों में जोड़ी

कृष्ण और अंशिका का प्रेम भी उन्हीं की तरह परिपक्व था. उन्होंने जब अपने दिल की बात एकदूसरे से बताई तो जाहिर है एक ही सोच रखने वाले इंसानों के बीच सहमति बन ही जाती है. जब दोनों ने अपने प्रेम का इजहार किया तो बात आगे बढ़ी. दोनों ने पहले अपने परिवारों को यह बात बता कर उन की सहमति ली, इस के बाद दोनों परिवारों के बीच बात हुई और फिर इसी साल फरवरी में उन की शादी की बात सार्वजनिक हो गई. फरवरी माह में ही कृष्ण कुमार बिश्नोई तथा अंकिता वर्मा ने संभल में एक सादे समारोह में एकदूसरे को अंगूठी पहना कर अपने रिश्ते की घोषणा कर दी.

जब कृष्ण बिश्नोई तथा अंकिता वर्मा ने शादी का फैसला किया तो के.के. बिश्नोई अपने पेरेंट्स को ले कर सीएम योगी आदित्यनाथ को शादी का निमंत्रण देने पहुंचे थे, तब योगी ने उन के साथ जो फोटो खिंचवाई थी, वह भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई. पुलिस सेवा में काम करने वाले अधिकारियों के लिए व्यक्तिगत जीवन और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होता. ऐसे में इन दोनों तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों का जीवनसाथी बनने का फैसला अपने आप में चर्चा का विषय बन गया. दोनों अधिकारियों को उन के काम को ले कर प्रदेश स्तर पर पहचान मिल चुकी थी. कई मौकों पर उन की कार्यशैली की चर्चा भी होती रही है.

अब यह जोड़ी जीवन की नई पारी शुरू कर चुकी है. 29 मार्च को राजस्थान के जोधपुर में निजी जीवन में भी एकदूसरे का साथ निभाने की कसमें खा कर उत्तर प्रदेश पुलिस की यह जोड़ी फिर लोगों के बीच सेवा करने के लिए पहुंच गई है. IPS Love Story

Delhi News: 400 रुपए के विवाद में ली जान

Delhi News: अक्सर हम देखते हैं कि लोग पैसों के लिए झगड़ते हैं, लेकिन क्या आप ने कभी पैसे के लिए किसी की जान लेने की कहानी सुनी है? ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां 3 नाबालिगों ने सिर्फ 400 रुपए के लिए एक शख्स की चाकुओं से हत्या कर दी. अब सवाल उठता है कि क्या सच में केवल 400 रुपए ही इस हत्या की वजह थे या इस के पीछे कोई और राज छिपा था. चलिए जानते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से, जो आप को सोचने पर मजबूर कर देगी.

उत्तर पूर्वी दिल्ली के मुस्तफाबाद से एक खौफनाक घटना सामने आई है, जिस ने इलाके में सनसनी मचा दी. यहां 3 नाबालिगों ने सिर्फ 400 रुपए के मामूली विवाद के चलते 26 साल के कैफ की चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी, जबकि चौथा साथी पूरी वारदात का वीडियो बनाता रहा. शव मिलने के बाद गुस्साए परिजनों ने सड़क पर हंगामा किया, जिस से करीब एक घंटे तक यातायात बाधित रहा. पुलिस ने तुरंत तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, 3 अप्रैल, 2026 को देर शाम 25 फुटा रोड स्थित बाबू हलवाई की दुकान के पास कैफ को 3 नाबालिगों ने घेर लिया. भागते समय कैफ पास खड़ी साइकिल से टकरा कर गिर गया और तब नाबालिगों ने उस पर चाकुओं से ताबड़तोड़ वार किए. उसे गंभीर हालत में जगप्रवेश चंद्र अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल 3 चाकू बरामद किए और प्रारंभिक जांच में पता चला कि मामूली 400 रुपए के विवाद ने इतनी बड़ी वारदात को जन्म दिया. Delhi News