UP Crime News: बीमा रकम के लिए बीवीबेटे को जिंदा जलाया

UP Crime News: इंश्योरेंस की रकम हासिल करने के लिए पहले भी तिकड़म लगाए जाते रहे हैं. हत्या कर बीमे की राशि वसूलने की घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं, किंतु यूपी के एक व्यक्ति ने जो किया, वह बहुत ही क्रूरता के चरम पर पहुंचने वाली वारदत बन गई.

उत्तर प्रदेश में रामपुर जिले के मिलक थाना क्षेत्र के गांव बेहटरा के रहने वाले दान सिंह ने अपनी ही पत्नी लता के खिलाफ एक खतरनाक साजिश रच डाली. लता यूपी पुलिस में सिपाही थी और उस ने 2022 में दान सिंह के साथ लव मैरिज की थी. उन दोनों का एकलौता बेटा था अयांश. उसे वे प्यार से लड्डू बुलाते थे. पतिपत्नी बेटे को खूब लाड़प्यार करते थे. एक रोज लता ने पति और देवर रवि के साथ नैनीताल घूमने की योजना बनाई. वे प्लान के मुताबिक कार से नैनीताल के लिए निकल पड़े. रास्ते में कार में आग लग गई. इस हादसे में लता और अयांश की जान चली गई. जबकि दान सिंह और उस का भाई रवि बच गए.

लता के मायके वालों ने इस घटना को हादसा मान कर पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई, जबकि 25 फरवरी, 2026 को नैनीताल हाईवे पर हुई इस कार दुर्घटना का पुलिस ने सनसनीखेज खुलासा कर दिया. इस घटना में महिला पुलिसकर्मी लता और उस के 3 वर्षीय बेटे अयांश की जल कर मौत हो गई थी. पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम करवाया तो लता के सिर पर गहरी चोट के निशान पाए गए. इस पर पुलिस को शक हो गया. पुलिस ने रवि और दान सिंह की कौल डिटेल्स की जांच की. उस के बाद दोनों से अलगअलग पूछताछ की गई.

दान सिंह ने जल्द ही सारा राज उगल दिया. उस ने बताया कि पत्नी की हत्या की गई है. इस में उस ने अपने भाई और अपने 3 दोस्तों की मदद ली है. पत्नी को मारने की योजना उसी ने बनाई थी. इस के पीछे का कारण इंश्योरेंस की रकम हासिल करनी थी. इस के लिए उस ने अपने बेटे और पत्नी को नशीला पदार्थ पिला दिया था. बाद में गाड़ी में आग लगा दी थी, जिस में बेटे की मौके पर ही जान चली गई, किंतु उस ने पत्नी की सांसें चलते पाया. तब उस ने उसे हथौड़े से वार कर मार दिया.

इस घटना के बारे में दान सिंह ने इसे अज्ञात वाहन की टक्कर बताया था, लेकिन पुलिस जांच में सामने आया कि यह कोई हादसा नहीं, बल्कि सोचीसमझी साजिश थी, जिसे दान सिंह ने अपने साथियों नूर हसन और सलमान के साथ मिल कर बीमा क्लेम के लालच में अंजाम दिया था. इस दोहरे हत्याकांड में पुलिस ने मुख्य आरोपी पति दान सिंह सहित 3 लोगों को आरोपी बनाया. एसपी सुमेंद्र मीणा के अनुसार, आरोपी दान सिंह ने योजना बना कर अपनी पत्नी लता और बेटे अयांश को कार में बिठाया था.

उन्हें नशीली गोलियां कोल्ड ड्रिंक में घोल कर पिला दी थी. इस के बाद उस ने कार पर पेट्रोल डाल कर आग लगा दी. UP Crime News

Social Crime: रेप करने के बाद न्यूड फोटो खींचता निर्मल बाबा

Social Crime: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है, जहां एक ढोंगी बाबा ने महिलाओं के साथ रेप किया और उस के बाद उन की न्यूड फोटो खींच लीं. चलिए जानते हैं आखिर कौन था यह ढोंगी बाबा जिस ने महिलाओं की इज्जत के साथ खेला था. पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं पूरी स्टोरी को विस्तार से, जिस से आप होंगे ऐसी घटनाओं के प्रति सजग और सचेत.

यह घटना छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा जिले से सामने आई है. यहां एक महिला निर्मल बाबा के पास शरीर का दर्द ठीक कराने के लिए आई हुई थी. इस के बाद बाबा ने महिला के शरीर का दर्द ठीक करने का वायदा किया. महिला को इस तथाकथित बाबा ने मैहर के एक होटल में बुलाया. बाबा ने महिला को प्रसाद खिलाया. प्रसाद खा कर जब महिला बेहोश हो गई तो उस ने उस के साथ दुष्कर्म किया. दुष्कर्म करने के बाद उस ने महिला के न्यूड फोटो खींच लिए थे. महिला ने जब इस का विरोध किया तो उस ने अश्लील फोटो इंस्टाग्राम पर वायरल कर दिए.

पुलिस के अनुसार, यह मामला 11 अप्रैल, 2026 को पामगढ़ थाने में आया है, जहां एक पीड़ित महिला ने थाने में शिकायत दर्ज कराई. महिला ने पुलिस को बताया कि निर्मल बाबा चैत्र नवरात्रि में पदयात्रा करते हुए आया था. निर्मल बाबा ने खुद को एक चमत्कारी बाबा बताया और कहा कि वह सारी समस्याएं दूर कर देता है. इस के बाद महिला अपने शरीर के दर्द की बीमारी को ठीक कराने के लिए अपनी सहेली के साथ बाबा के पास गई थी. इस के बाद बाबा ने उस का नंबर ले लिया.

महिला ने पुलिस को बताया कि इस के बाद बाबा ने कौल करके मार्केट बुलाया और प्रसाद का झांसा दिया और कहा इस से सब ठीक हो जाएगा. फिर वह उसे अपने साथ बिलासपुर ले गया, फिर ट्रेन से मध्य प्रदेश पहुंचा, जहां उसे एक होटल में ठहराया गया. वहां उस ने उस के साथ कई बार दुष्कर्म किया और अश्लील फोटो खींचीं और उसे छोड़कर भाग निकला.

बाबा महिला को बारबार कौल करके परेशान करने लगा, जिस से महिला ने परेशान हो कर उसे ब्लौक कर दिया. फिर बाबा ने महिला के नाम से एक इंस्टाग्राम आईडी बनाई और अश्लील फोटो वायरल कर उसे ब्लैकमेल करने लगा.

एसपी उमेश कश्यप के मार्गदर्शन और एसडीओपी (अकलतरा) प्रदीप कुमार सोरी ने बाबा की लोकेशन ट्रेस की. इस के बाद आरोपी को पुलिस ने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में दबिश दे कर गिरफ्तार कर लिया.

बाबा के खिलाफ बीएन्स की धारा 64(2)(एम) और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत मामला दर्ज किया गया है और उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है.
अगर आप भी ऐसे ढोंगी बाबाओं से सावधान रहना चाहते हैं, जो झूठी कहानियां सुनाकर लोगों को ठग लेते हैं तो इन घटनाओं को जरूर पढ़ें. मनोहर कहानियां आप को ऐसी घटनाओं के प्रति सचेत और जागरूक बनाती है, ताकि आप हर तरह की धोखाधड़ी और ठगी से खुद को बचा सकें. Social Crime

Suspense Story: चोट

Suspense Story:  योगेन को प्रेमप्रकाश पर तब संदेह हुआ, जब उस ने कहा कि इस के सिर के पीछे चोट लगी है. उसे लगा कि प्रेमप्रकाश को कैसे पता चला कि उस के सिर पर पीछे वार किया गया है?

योगेन नपेतुले कदमों से आगे बढ़ते हुए साफ महसूस कर रहा था कि आगे चल रही महिला उस से डर रही है. उस अंधेरे कौरीडोर में वह बारबार पीछे मुड़ कर देख रही थी. उस की आंखों में एक अंजाना सा डर था और वह बेहद घबराई हुई लग रही थी. शायद उसे लग रहा था कि वह उस का पीछा कर रहा है. बिजनैस सेंटर में ज्यादातर औफिस थे, जिन में अब तक काफी बंद हो चुके थे. इस बिजनैस सेंटर में खास बात यह थी कि इस के औफिस में किसी भी समय आयाजाया जा सकता था. इसीलिए सेंटर के गेट पर एक रजिस्टर रख दिया गया था, जिस में आनेजाने वालों को अपना नामपता और समय लिखना होता था.

महिला रजिस्टर में अपना नामपता और समय लिख कर तेजी से आगे बढ़ गई. उस के बाद योगेन भी नामपता और समय लिख कर महिला के साथ लिफ्ट में सवार हो गया था. लिफ्ट में महिला ने एक बार भी नजर उठा कर उस की ओर नहीं देखा.

शायद वह अपने खौफ पर काबू पाने की कोशिश कर रही थी. योगेन ने लिफ्ट औपरेटर से कहा, ‘‘सातवीं मंजिल पर जाना है.’’

इस पर महिला ने चौंक कर उस की ओर देखा, क्योंकि उसे भी उसी मंजिल पर जाना था. यह सोच कर उस की सांस रुकने लगी कि यह आदमी क्यों उस के पीछे लगा है? चंद पलों में ही सातवीं मंजिल आ गई. लिफ्ट का दरवाजा खुलते ही महिला तेजी से निकली और उसी रफ्तार से आगे बढ़ गई. उस की ऊंची ऐड़ी के सैंडल फर्श पर ठकठक बज रहे थे. तेजी से चलते हुए उस ने पलट कर देखा तो गिरतेगिरते बची. योगेन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह उस महिला को कैसे समझाए कि वह उस का पीछा नहीं कर रहा, इसलिए उसे उस से डरने की कोई जरूरत नहीं है.

आगे बढ़ते हुए योगेन दोनों ओर बने धुंधले शीशे वाले औफिसों पर नजर डालता जा रहा था. अंधेरा होने की वजह से दरवाजों पर लिखे नंबर ठीक से दिखाई नहीं दे रहे थे. कौरीडोर खत्म होते ही महिला बाईं ओर मुड़ गई. वह भी उसी ओर मुड़ा तो महिला और ज्यादा सहम गई. वह और तेजी से आगे बढ़ कर एक औफिस के आगे रुक गई. उस की लाइट जल रही थी. दरवाजे के हैंडल पर हाथ रख कर उस ने योगेन की ओर देखा. लेकिन वह उस के करीब से आगे बढ़ गया. आगे बढ़ते हुए योगेन ने दरवाजे पर नजर डाली थी. उस पर डा. साहिल परीचा के नाम का बोर्ड लगा था. उस के आगे बढ़ जाने से महिला हैरान तो हुई ही, उसे यकीन भी हो गया कि वह उस का पीछा नहीं कर रहा था.

योगेन अंधेरे में डूबे दरवाजों को पार करते हुए आगे बढ़ता रहा. उस कौरीडोर में आखिरी दरवाजे से रोशनी आ रही थी. आगे बढ़ते हुए उस ने अपनी दोनों जेबें थपथपाई. एक जेब में पिस्तौल था, जिसे इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ी थी. दूसरी जेब में 50 लाख रुपए की कीमत का बहुमूल्य हीरे का नेकलैस मखमल की एक डिब्बी में रखा था. जिसे लेने से पहले योगेन ने अच्छी तरह चैक किया था. वह वही नेकलैस पहुंचाने यहां आया था. दरवाजा खोलने से पहले योगेन ने पलट कर देखा तो वह महिला अभी तक दरवाजे पर खड़ी उसी को देख रही थी. योगेन ने उसे घूरा तो वह हड़बड़ा कर जल्दी से अंदर चली गई.

योगेन ने एक बार फिर खाली कौरीडोर को देखा और दरवाजा खोल कर अंदर चला गया. सामने रिसैप्शन में बैठी लड़की उसे देख कर मुसकराते हुए उठी और उस के गले लग गई. योगेन कुछ कहता, उस के पहले ही वह बोली, ‘‘तुम एकदम सही समय साढ़े 8 बजे आए हो डियर. उसे साथ ले आए हो न?’’

‘‘हां, ले आया हूं.’’ योगेन ने जेब पर हाथ फेरते हुए कहा.

‘‘कैसा है, क्या बहुत खूबसूरत है?’’ लड़की ने बेचैनी से पूछा.

योगेन ने लड़की का हाथ पकड़ कर उस के बाएं हाथ की हीरे की अंगूठी देखते हुए कहा, ‘‘रीना, नेकलैस के सारे हीरे इस से बड़े और काफी कीमती हैं.’’

‘‘योगेन फिर कभी ऐसा मत कहना. मेरे लिए यह अंगूठी दुनिया की सब से कीमती चीज है. जानते हो क्यों? क्योंकि इसे तुम ने दिया है. यह तुम्हारे प्यार की निशानी है.’’ रीना योगेन की आंखों में झांकते हुए प्यार से कहा.

रीना की इस बात पर योगेन मुसकराया.

रीना ने अपने बैग से टिशू पेपर निकालते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे गाल पर मेरी लिपस्टिक का निशान लग गया है…’’ रीना इतना ही कह पाई थी कि उस की आंखें हैरानी से फैल गईं और आगे की बात मुंह में ही रह गई.

रीना की हालत से ही योगेन अलर्ट हो गया. वह समझ गया कि उस के पीछे जरूर कोई मौजूद है. उस ने मुड़ने की कोशिश की कि तभी उस के सिर के पिछले हिस्से पर कोई भारी चीज लगी और वह रीना की बांहों में गिर कर बेहोश हो गया. जब उसे होश आया तो उसे लगा कि वह किसी मुलायम चीज पर लेटा है. सिर के पिछले हिस्से में तेज दर्द हो रहा था. उस के होंठों से कराह निकली. आंखें खोलने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा.

उसे लगा जैसे उस की आंखों पर भारी बोझ रखा है. फिर भी उस ने हिम्मत कर के आंखें खोल दीं. लेकिन तेज रोशनी से उस की आंखें बंद हो गईं. उस के कानों में कुछ आवाजें पड़ रही थीं. कोई कह रहा था, ‘‘ओह गाड, यह क्या हुआ?’’

‘‘पता नहीं, मैं ने इसे इसी तरह पड़ा पाया था.’’ किसी ने जवाब दिया.

‘‘अरे इसे होश आ रहा है.’’ किसी ने कहा.

इस के बाद 2-3 लोगों ने मिल कर योगेन को उठाया तो उस के हलक से कराह निकल गई.

‘‘आराम से, शायद यह जख्मी है. शायद इसे दिमागी चोट आई है. रुको डा. परीचा के औफिस में लाइट जल रही है. मैं उन्हें बुला कर लाता हूं.’’ किसी ने भारी आवाज में कहा.

‘‘ठीक है, डाक्टर को जल्दी ले कर आओ.’’ किसी अन्य ने कहा.

अब तक योगेन को पूरी तरह से होश आ गया था. कोई धीरेधीरे उस के शरीर को टटोल रहा था. शायद चोट तलाश रहा था. जैसे ही उस का हाथ योगेन के सिर के पीछे पहुंचा, उसके मुंह से कराह निकल गई. उस का शरीर कांप उठा.

‘‘इस का मतलब सिर के पिछले हिस्से में काफी गहरी चोट लगी है. इसे उठा कर सोफे पर लिटाओ, उस के बाद देखता हूं.’’

योगेन को उठा कर मुलायम और आरामदेह सोफे पर लिटा दिया गया. इस के बाद कोई उस के जख्म की जांच करने लगा तो उसे तकलीफ हुई और वह दोबारा बेहोश हो गया. योगेन को दोबारा होश आया तो उस का दर्द काफी कम हो चुका था. उसे ऐसा लग रहा था, जैसे वह नींद से जागा हो. किसी की कोमल अंगुलियों ने उस के सिर को छुआ तो उस ने आंखें खोल दीं. उस की आंखों के सामने उसी औरत का चेहरा था, जो कौरीडोर में उस से डर रही थी. लेकिन अब डर की जगह उस के चेहरे पर मुसकराहट थी.

उस ने हमदर्दी से पूछा, ‘‘अब तुम कैसा फील कर रहे हो?’’

‘‘ठीक हूं.’’ योगेन ने मुश्किल से जवाब दिया.

‘‘मुझे पहचाना मैं लिलि… लिलि पराशर. मैं वही हूं, जो तुम्हारे आगेआगे बिजनैस सेंटर में आई थी. तुम मेरे पीछे थे.’’ लिलि ने बेहद नरमी से कहा.

‘‘लेकिन मैं तुम्हारा पीछा नहीं कर रहा था.’’

‘‘तुम्हें याद है, मैं डा. परीचा के औफिस में गई थी?’’ लिलि ने पूछा.

योगेन ने ‘हां’ में सिर हिला दिया.

‘‘तुम से मेरी एक रिक्वैस्ट है. अगर तुम ने मेरी बात मान ली तो मुझ पर एक बड़ा एहसान करोगे.’’ लिलि ने कहा.

‘‘इस की वजह?’’ योगेन ने पूछा.

‘‘दरअसल, मेरे पति अतुल पराशर बहुत ही शक्की स्वभाव के हैं. मैं और डा. परीचा बहुत अच्छे दोस्त हैं. शादी के पहले से हम एकदूसरे को जानते हैं. अतुल उन से जलता है, इसलिए मैं चाहती हूं कि तुम यह बात भूल जाओ कि मैं डाक्टर के औफिस में गई थी. इस समय तुम मेरे पति के ही औफिस में हो.’’

योगेन चुपचाप उसे देखता रहा. लिलि ने आगे कहा, ‘‘मेरी बात मानोगे न? बाहर पुलिस आ चुकी है. कहीं ऐसा न हो कि तुम कह दो कि मैं डाक्टर के पास गई थी.’’

‘‘पुलिस… पुलिस क्यों आई है?’’ यह कह योगेन उठा और दरवाजे की ओर बढ़ा. लिलि ने उसे रोकना चाहा, लेकिन वह रुका नहीं. उसे चक्कर आ गया तो उस ने दीवार का सहारा ले कर दरवाजा खोला. दूसरे कमरे में काफी लोग जमा थे. फर्श पर रीना चित लेटी थी. उस की आंखें खुली थीं, चेहरा सफेद पड़ गया था. उस के सीने में चमकदार चीज घुसी थी. वह जोर से चीखा, ‘‘रीना…’’

इसी के साथ वह लड़खड़ा कर गिरने लगा तो 2 लोगों ने उसे संभाल कर सोफे पर लिटा दिया. थोड़ी देर बाद एक स्मार्ट सा आदमी उस के पास आ कर बोला, ‘‘मैं इंसपेक्टर पटेल…क्या तुम इस लड़की को जानते हो?’’

‘‘जी, रीना मेरी मंगेतर थी.’’ उस ने उदासी से कहा.

‘‘जी, मुझे अफसोस है. इस लड़की का कातिल यहीं मौजूद है. वह कौन है? हम पता करने की कोशिश कर रहे हैं.’’ पटेल ने हमदर्दी से कहा, ‘‘मैं उसे जल्दी ही पकड़ लूंगा.’’

योगेन चुपचाप भरी आंखों से पटेल को देखता रहा. इंसपेक्टर पटेल ने पूछा, ‘‘तुम मि. अतुल पराशर को हीरो का नेकलैस डिलीवर करने आए थे न?’’

यह सुन कर योगेन का हाथ जेब पर गया. जेब में न नेकलैस था, न पिस्तौल. उस ने कहा, ‘‘सर, नेकलैस की डिबिया गायब है.’’

‘‘मुझे पता है. मैं तुम्हारी तलाशी ले चुका हूं. तुम्हारी पिस्तौल मेरे पास है. तुम पूरी बात मुझे बताओ.’’ पटेल ने कहा.

योगेन ने शुरू से अंत तक पूरी बात बता दी. उस के बाद पटेल ने कहा, ‘‘तुम्हारे और मृतका लड़की के अलावा बाहर के कमरे में 4 लोग मौजूद हैं. वे चारों इसी फ्लोर पर थे. इन में से किसी ने तुम्हारे ऊपर हमला कर के तुम्हारी मंगेतर का कत्ल किया और तुम्हारी जेब से वह नेकलैस लिया.’’

‘‘क्या, सचमुच कातिल और चोर बाहर मौजूद हैं?’’ योगेन ने पूछा.

‘‘हां, क्योंकि इन लोगों के अलावा यहां कोई और नहीं था. लिफ्ट से कोई आया नहीं, सीढि़यों वाले दरवाजे में ताला बंद था.’’ पटेल ने बताया.

‘‘वे 4 लोग कौन हैं?’’ योगेन ने पूछा.

‘‘मि. अतुल, उन की बीवी लिलि, डा. परीचा और एक इंश्योरैंस एजेंट प्रेमप्रकाश.’’

‘‘आप ने उन लोगों से कुछ पता किया?’’

‘‘हम ने सभी की अच्छी तरह तलाशी ले ली है. डा. परीचा और अतुल के औफिसों की भी अच्छी तरह तलाशी ले ली गई है. लेकिन नेकलैस नहीं मिला. कोई सुराग भी नहीं मिल रहा है.’’ पटेल ने कहा.

‘‘हो सकता है, किसी तरह नेकलैस बाहर पहुंचा दिया गया हो?’’ योगेन ने कहा.

‘‘सवाल ही नहीं उठता. हम ने लगभग सभी दरवाजे लौक करवा दिए हैं. सारे रास्ते बंद करा दिए हैं. सब से जरूरी है कातिल को पकड़ना. नेकलैस को बाद में भी ढूंढ़ लेंगे.’’

‘‘रीना को किस ने और कैसे मारा?’’ योगेन ने रुंधे गले से पूछा.

‘‘किसी ने लिफाफे खोलने वाली छुरी, जो उस की मेज पर रखी रहती थी, उसी को उस के सीने में घोंप कर मार दिया है. तुम्हारे सिर पर पीछे से एक पाइप से वार किया गया था, जिस पर कपड़ा लपेटा हुआ था.’’

‘‘अब आप क्या करेंगे?’’ उस ने पूछा.

‘‘मैं तुम्हारे सामने उन चारों को बुला कर पूछताछ करूंगा. तुम सारी बातें सुनते रहना, शायद उस में काम की कोई बात निकल आए.’’ इंसपेक्टर पटेल ने कहा.

इस के बाद उन्होंने लिलि और अतुल को बुलवाया. लिलि ने सवालिया नजरों से योगेन की ओर देखा तो योगेन ने उसे नजरंदाज कर के उस के पति की ओर देखा. वह एक छोटे कद का भारीभरकम आम सा आदमी था, जबकि लिलि काफी खूबसूरत थी. अतुल ने आते ही ऐतराज करते हुए कहा, ‘‘मैं पुलिस का हर तरह से सहयोग कर रहा हूं, फिर भी मुजरिमों की तरह मेरी तलाशी ली जा रही है. मेरी बीवी को भी पूछताछ में शामिल किया गया है.’’

पटेल ने उस के ऐतराज पर ध्यान दिए बगैर योगेन का उस से परिचय कराया. अतुल ने हमदर्दी से कहा, ‘‘तो तुम्हीं से रीना की शादी होने वाली थी?’’

योगेन ने ‘हां’ में सिर हिलाया.

‘‘उस की मौत का मुझे बहुत अफसोस है. रीना अकसर तुम्हारा जिक्र किया करती थी. उसी के कहने पर मैं ने तुम्हारी फर्म की नेकलैस का और्डर दिया था. काश, मैं ऐसा न करता.’’ अफसोस जाहिर करते हुए अतुल ने कहा.

‘‘इस का मतलब तुम ने रीना की सिफारिश पर नेकलैस का और्डर दिया था?’’ पटेल ने कहा.

‘‘जी, मेरे और्डर पर इस लड़के को फायदा होता. हालांकि यह उस फर्म का सेल्समैन नहीं है, फिर भी रीना के कहने पर मैं ने उस फर्म से संपर्क कर और्डर देते हुए कहा था कि वह नेकलैस योगेन के जरिए मुझे भिजवा दिया जाए, ताकि उसे फायदा हो जाए.’’

‘‘मि. अतुल, सब से पहले तुम ने रीना और योगेन को देखा था?’’ पटेल ने पूछा.

‘‘मैं अपने औफिस में बैठा था. रिसेप्शन पर मुझे शोर सुनाई दिया तो मैं ने घंटी बजाई कि रीना को बुला कर इस शोर के बारे में पता करूं. लेकिन रीना की तरफ से कोई जवाब नहीं आया तो मैं बाहर निकला. तब ये दोनों मुझे फर्श पर पड़े मिले. रीना के सीने में लिफाफे खोलने वाली छूरी घुसी हुई थी और यह योगेन बेहोश पड़ा था.’’

‘‘फिर…?’’

‘‘मैं मामला समझ ही रहा था कि प्रेमप्रकाश अंदर आए. मैं ने उन से डा. परीचा को बुलाने को कहा. इस के बाद पुलिस को फोन किया.’’

‘‘मिसेज अतुल पराशर मैं यह जानना चाहता हूं कि तुम अपने पति के औफिस में आने से पहले डा. परीचा के औफिस में क्यों गई थीं? और तुम ने योगेन से यह क्यों कहा कि वह इस बात का किसी से जिक्र न करे?’’

लिलि ने गुस्से से योगेन की ओर देखा. उस के बाद बोली, ‘‘इंसपेक्टर योगेन या तो ख्वाबों की दुनिया में रहता है या बहुत बड़ा झूठा है.’’

‘‘ठीक है, हम डा. परीचा से पता कर लेते हैं, लेकिन उस से पहले प्रेमप्रकाश से बात करूंगा. वहीं डा. परीचा को बुलाने गया था. अगर तुम वहां थीं तो उस ने तुम्हें जरूर देखा होगा?’’ पटेल ने रूखेपन से कहा.

‘‘जरूरजरूर, अगर सच में मैं डा. परीचा के पास थी तो प्रेमप्रकाश जरूर बता देगा.’’ लिलि ने कहा.

इस के बाद उस ने अतुल की ओर देखा, जो कभी पटेल को देख रहा था और कभी लिलि को. उस के चेहरे पर उलझन थी. लिलि समझ गई थी कि योगेन ने ही इंसपेक्टर पटेल को यह बताया होगा.

‘‘इंसपेक्टर, आप मुझ से सवाल पर सवाल किए जा रहे हैं और इस आदमी से कुछ नहीं पूछ रहे हैं, जिस के गाल पर अभी तक लिपस्टिक का निशान है.’’ लिलि ने कहा.

‘‘तुम चुपचाप आराम से बैठो. यह पुलिस की जांच है, कोई मजाक नहीं. बेकार की बातें करने के बजाय यह बताओ कि तुम डाक्टर के औफिस में क्यों गई थी?’’ इंसपेक्टर पटेल ने पूछा.

‘‘तुम्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए.’’ लिलि ने गुस्से में कहा.

इस बात पर उस का पति अतुल गुस्से में बोला, ‘‘पर मुझे मतलब है लिलि. मुझे बताओ कि तुम डा. परीचा के औफिस में क्यों गई थीं?’’

‘‘अतुल, तुम क्यों पागल हो रहे हो?’’

‘‘मैं तुम्हारा पति हूं. मेरा पूरा हक है यह जानने का कि तुम डाक्टर के पास क्यों गई थीं? क्या मैं बेवकूफ हूं कि इतनी बड़ी रकम खर्च कर के तुम्हारे लिए हीरों का नेकलैस खरीद रहा था? मेरी यही मंशा थी कि तुम डाक्टर का खयाल तक न करो, पूरी तरह मेरी वफादार बन जाओ. रीना ने ही मुझ से कहा था कि मैं वह हीरों का नेकलैस इस के मंगेतर योगेन के जरिए खरीदूं, ताकि उस का कुछ भला हो जाए. उसे कमीशन मिल सके. यह इतना कीमती नेकलैस मैं ने तुम्हारे लिए ही खरीदा था और इस के बदले मैं तुम्हारी वफा चाहता था, लेकिन मुझे खुशी है कि वह नेकलैस चोरी हो गया. अच्छा हुआ जो तुम जैसी बेवफा औरत को नहीं मिला. वैसे भी मैं ने कौन सी अभी उस की कीमत अदा की है. अच्छा हुआ कि तुम्हारे चेहरे से नकाब उतर गया. तुम्हारी असली सूरत सामने आ गई. शक तो मुझे पहले भी था, अब तो इस का सबूत भी मिल गया.’’

‘‘जहन्नुम में जाओ तुम और तुम्हारा नेकलैस. मामूली सी बात का बतंगड़ बना दिया सब ने.’’ लिलि गुस्से से बोली.

‘‘तुम दोनों लड़नाझगड़ना बंद करो. यह तुम्हारा आपस का मामला है. घर जा कर सुलझाना. यहां जांच हो रही है, उस में अड़ंगे मत डालो.’’ इंसपेक्टर पटेल ने कहा.

इंसपेक्टर पटेल ने डा. परीचा और प्रेम प्रकाश को अंदर बुलाया. डा. परीचा सेहतमंद और काफी स्मार्ट था. प्रेमप्रकाश लंबा और स्लिम था. वह इंश्योरैंस एजेंट था.

‘‘प्रेमप्रकाश जब तुम डाक्टर को बुलाने उस के औफिस में गए थे तो वह अकेला था या उस के साथ कोई और था?’’ इंसपेक्टर ने पहला सवाल किया.

‘‘मैं सिर्फ बाहरी कमरे तक ही गया था. वह वहां अकेला ही था. अंदर के कमरे में कोई रहा हो तो मुझे मालूम नहीं.’’ प्रेमप्रकाश ने कहा.

‘‘तुम क्या कहते हो डा. परीचा?’’ पटेल ने डा. परीचा से पूछा.

‘‘मैं अकेला था.’’ डाक्टर धीरे से बोला.

‘‘लिलि पराशर तुम्हारे साथ नहीं थीं?’’

उस ने इनकार में सिर हिला दिया.

‘‘पर लिलि ने तो मान लिया है कि वह तुम्हारे साथ थी.’’ इंसपेक्टर पटेल ने कहा.

पर डाक्टर इनकार करता रहा.

‘‘डाक्टर पुलिस के काम में उलझन मत पैदा करो. तुम्हें अंदाजा नहीं है कि तुम्हारा यह झूठ तुम्हें मुश्किल में डाल सकता है. लिलि और उस के पति ने मान लिया है कि वह तुम्हारे कमरे में थी. पर तुम लगातार इनकार कर रहे हो. आखिर कारण क्या है?’’

‘‘मि. अतुल एक शक्की आदमी है. मैं नहीं चाहता कि मेरे सच बोलने की वजह से लिलि के लिए कोई मुसीबत खड़ी हो. वह पागल आदमी उस का जीना मुश्किल कर देगा.’’ डा. परीचा ने कहा.

‘‘तुम और लिलि शादी के पहले से दोस्त हो?’’

पटेल ने अचानक प्रेमप्रकाश से सवाल किया, ‘‘तुम ने मि. अतुल को इस लड़की और योगेन को करीब खड़े देखा था, ये दोनों फर्श पर पड़े थे, तुम अपने औफिस से इस औफिस में क्यों आए थे?’’

‘‘मैं यहां शोर सुन कर वजह जानने आया था.’’

‘‘तुम्हें नेकलैस के बारे में मालूम था?’’ पटेल ने घूरते हुए पूछा.

‘‘जी, अतुल ने मुझ से ही उस कीमती नेकलैस का इंश्योरैंस करवाया था. मुझे यह भी पता था कि वह नेकलैस आज ही उन्हें मिलने वाला है.’’ प्रेमप्रकाश ने कहा.

‘‘उस नेकलैस के चोरी होने से तुम्हें तो नुकसान होगा?’’ पटेल ने पूछा.

‘‘मुझे तो नहीं, हां मेरी कंपनी को जरूर नुकसान होगा. इस के लिए पुलिस जांच की रिपोर्ट की जरूरत पड़ेगी.’’ प्रेमप्रकाश ने बताया.

‘‘क्या तुम रेस खेलते हो, घोड़ों पर रकम लगाते हो, यह बहुत महंगा शौक है?’’ पटेल ने पूछा.

‘‘तुम्हारा मतलब है नेकलैस मैं ने चुराया है?’’ प्रेमप्रकाश ने खीझ कर पूछा.

पटेल ने उसे जवाब देने के बजाय डाक्टर से पूछा, ‘‘तुम इतनी रात तक अपने औफिस में क्या कर रहे थे? लिलि की राह देख रहे थे क्या?’’

‘‘मुझे लिलि के आने के बारे में कुछ भी पता नहीं था. वह जिस वक्त मेरे पास आई, घबराई हुई थी. उस ने बताया कि कोई उस का पीछा कर रहा है. उस ने यह भी कहा कि वह आदमी उस के पति के औफिस में गया है. इस के बाद हम बातें करने लगे. तभी प्रेमप्रकाश आ गया. मैं ने लिलि को अंदर वाले कमरे में भेज दिया और अपना बैग ले कर उस के साथ यहां आ गया. लिलि को मुझे छिपाना नहीं चाहिए था.’’ डाक्टर ने कहा.

‘‘उस के बाद क्या हुआ?’’ पटेल ने पूछा.

‘‘जब मैं अतुल के औफिस में पहुंचा तो रीना मर चुकी थी. मगर यह लड़का जिंदा था. इस के सिर पर चोट आई थी. अगर चोट जरा भी गहरी होती तो यह मर भी सकता था.’’ डाक्टर ने कहा.

‘‘अच्छा, तुम दोनों जा सकते हो.’’ पटेल ने कहा.

‘‘क्या मैं भी जा सकता हूं?’’ योगेन ने पूछा.

इंसपेक्टर पटेल ने उसे भी इजाजत दे दी.

योगेन की चोट तकलीफ दे रही थी. सिर के पिछले हिस्से में दर्द था. उस की नजरों के सामने बारबार रीना की लाश आ रही थी. कैसी हंसतीमुसकराती लड़की मिनटों में मौत की गोद में समा गई. नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. रीना से मुलाकात का दृश्य उस की आंखों में घूम रहा था, कानों में उस की आवाज गूंज रही थी.

वह उन आवाजों के बारे में सोचने लगा, जो जरा होश में आने पर उस के कानों में पड़ी थी.

अचानक एक आवाज उसे याद आई तो वह उछल पड़ा. उस ने उसी वक्त इंसपेक्टर पटेल को फोन किया. पटेल ने झुंझला कर कहा, ‘‘अभी तुम सो जाओ, सुबह बात करेंगे.’’

‘‘इंसपेक्टर साहब, सुबह तक बहुत देर हो जाएगी. सारा खेल खतम हो जाएगा. हमें अभी और इसी वक्त बिजनैस सेंटर चलना होगा. मुझे उम्मीद है कि नेकलैस भी बरामद कर लेंगे और कातिल को भी पकड़ लेंगे.’’

आधे घंटे बाद दोनों अतुल के औफिस में बैठे थे. इंसपेक्टर पटेल थोड़ा नाराज थे. योगेन जबरदस्ती उन्हें औफिस ले आया था. गार्ड से चाबी ले कर अतुल का औफिस खोल कर दोनों उस में बैठे थे.

‘‘मुझे रीना के कातिल का पता चला गया है.’’ योगेन ने कहा.

‘‘कौन है वह?’’ इंसपेक्टर पटेल ने पूछा.

‘‘यह बड़ी होशियारी से तैयार किया गया प्लान था. कातिल किसी का कत्ल नहीं करना चाहता था. उस ने पाइप में भी कपड़ा लपेट रखा था, ताकि अपने शिकार को बेहोश कर के नेकलैस उड़ा सके. न जाने क्यों उस ने लिफाफे खोलने वाली छुरी से रीना पर हमला कर दिया? शायद उसे अंदाजा नहीं था कि यह छुरी किसी को मार भी सकती है.’’

‘‘यह सब छोड़ो, तुम यह बताओ कि हम यहां क्यों आए हैं? रीना का कातिल कौन है?’’ इंसपेक्टर पटेल ने पूछा.

‘‘जिस वक्त रीना मेरी बांहों में थी, उसी वक्त उस ने चौंक कर मेरे पीछे देखा था. मतलब उस ने मुझ पर हमला करने वाले को देख लिया था. हमला करने वाला मुझे बेहोश कर के नेकलैस हासिल करना चाहता था. मगर रीना ने उसे देख लिया था, इसलिए हमला करने वाले को मजबूरन उस का कत्ल करना पड़ा.’’ योगेन ने कहा.

‘‘आखिर वह है कौन?’’ पटेल ने झुंझला कर पूछा.

‘‘इस के लिए आप को थोड़ा इंतजार करना होगा. सुबह होते ही कातिल आप की गिरफ्त में होगा.’’ योगेन ने जवाब में कहा.

दोनों बैठे इंतजार करते रहे. जैसे ही सुबह का उजाला फैला, योगेन ने उठ कर अतुल के औफिस के दरवाजे में हलकी सी झिरी कर दी और बाहर झांकने लगा. पटले भी उसी के साथ खड़ा था. धीरेधीरे लोग आने लगे. सभी अपनेअपने औफिसों में जा रहे थे. कुछ देर बाद डा. परीचा नजर आया, वह भी अपने औफिस का दरवाजा खोल कर अंदर चला गया. अतुल और प्रेमप्रकाश भी नजर आए. दोनों साथसाथ बातें करते आ रहे थे. प्रेमप्रकाश अपने औफिस में चला गया. जैसे ही अतुल ने अपने औफिस के दरवाजे के हैंडल पर हाथ रखा, योगेन ने दरवाजा खोल दिया.

योगेन को अंदर देख कर अतुल हैरान रह गया. कभी वह इंसपेक्टर पटेल को देखता तो कभी योगेन को. योगेन ने कहा, ‘‘अतुलजी अंदर आ जाइए. थोड़ी देर में आप को सब मालूम हो जाएगा.’’

उन दोनों को हैरानी से देखते हुए अतुल अंदर आ गया. फिर वह अंदर के कमरे में चला गया. योगेन झिरी से बाहर की तरफ देखता रहा. अचानक उस ने एकदम से दरवाजा खोल  कर कहा, ‘‘आइए पटेल साहब.’’

दोनों तेजी से दरवाजा खोल कर बाहर आ गए. सामने ही मरदाना टौयलेट था. योगेन ने पटेल से चाबियों का गुच्छा मांगा, जो उस ने गार्ड से ले रखा था. उस में से एक चाबी ढूंढ़ कर टौयलेट में लगाई, दरवाजा खुल गया, सामने का सीन साफ नजर आने लगा. प्रेमप्रकाश फर्श पर झुका बेसिन के नीचे कुछ तलाश रहा था.

उन दोनों को देख कर वह सीधा खड़ा हो गया. योगेन ने उसे एक तरफ धकेल कर बेसिन के नीचे हाथ डाला तो अगले पल उस के हाथ में वह मखमली डिबिया थी, जिस में हीरों का नेकलैस था. यह वही डिबिया थी, जो रात योगेन अतुल पराशर को देने लाया था.

‘‘मिल गया न इंसपेक्टर साहब नेकलैस.’’ योगेन ने कहा.

इंसपेक्टर पटेल प्रेमप्रकाश को घूर रहे थे. उस का चेहरा पीला पड़ गया था. वह हकलाते हुए बोला, ‘‘मैं तो… बस अंदाजे से तलाश रहा था. इस से पहले कि मैं सफल होता, आप लोग आ गए. मैं तो…’’

‘‘प्रेमप्रकाश झूठ मत बोलो.’’ योगेन ने कहा.

‘‘मैं सच कह रहा हूं,’’ उस ने कहा.

‘‘बेकार की बकवास मत करो.’’ पटेल ने घुड़का.

‘‘तुम झूठे हो, पहले तुम ने मेरी मंगेतर रीना का खून किया, उस के बाद नकेलैस ले कर इस बेसिन के नीचे छिपा दिया.’’ योगेन ने कहा.

प्रेमप्रकाश घबरा गया. वह दोनों को देखता रहा. उस की जुबान बंद हो चुकी थी.

‘‘जब मैं नेकलैस ले कर अतुल के औफिस की तरफ जा रहा था, तब तक तुम अपने औफिस में अंधेरा किए खड़े थे और मेरी निगरानी कर रहे थे. जब मैं औफिस में रीना की बांहों में था तो तुम अंदर आए. रीना ने तुम्हें देख लिया. पहले तुम ने मुझ पर हमला किया, उस के बाद रीना को छुरी घोप कर मार दिया, क्योंकि वह तुम्हें देख चुकी थी.

मेरी बेहोशी का फायदा उठा कर तुम नेकलैस ले उड़े. नेकलैस तुम ने मरदाना टौयलेट में छिपा दिया. इस के बाद यहां आ कर ड्रामा करने लगे. तुम्हारी जुबान से निकले एक वाक्य ने तुम्हें फंसवा दिया. वह मैं ने सुन लिया था. बाद में तुम्हारी भारी आवाज पहचान ली थी. जब मुझे थोड़ाथोड़ा होश आ रहा था, तब तुम ने कहा था, ‘पीछे देखो, शायद इस के दिमाग पर चोट आई है.’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि मेरे सिर के पीछे चोट लगी थी. हमलावर जा चुका था, हम दोनों फर्श पर पड़े थे. इस से यह साबित होता है कि चोट तुम ने ही मारी थी. इसलिए तुम इस के बारे में जानते थे.’’

योगेन ने सारी बात का खुलासा कर दिया. रीना की मौत का दुख उस की आंखों में छलक आया.

‘‘प्रेमप्रकाश, तुम्हारा खेल खत्म हो चुका हूं. मैं तुम्हें रीना के कत्ल और हीरों के नेकलैस की चोरी के इल्जाम में गिरफ्तार करता हूं. तुम ही कातिल हो.’’ इंसपेक्टर पटेल ने सख्ती से कहा. Suspense Story

प्रेमप्रकाश ने सिर झुका लिया. योगेन ने दरवाजा खोला और आंसू पोंछते हुए चला गया.

 

Crime Story: करोड़ो का घोटाला छिपाने के चक्कर में हत्या

Crime Story: राजू और गौरी शादी करना चाहते थे, लेकिन दोनों की जाति अलगअलग थीं, इसलिए गौरी के घर वालों ने उस की शादी राजू से नहीं की. तब दोनों ने साथसाथ मरने का फैसला कर लिया और…

मोहब्बत की आखिरी मंजिल शादी होती है, अधिकतर प्यार करने वालों का यही मानना है. प्यार करने वाले साथसाथ जीना चाहते हैं, लेकिन कभीकभी उन की यह चाहत सपना बन कर रह जाती है. समाज अपने लोगों को अपने नियमकायदे के अनुसार ही चलाना चाहता है. लेकिन प्रेम करने वालों को समाज की कहां परवाह होती है. आगरा को मोहब्बत की नगरी माना जाता है. इस की वजह यह है कि पूरी दुनिया को मोहब्बत का पैगाम देने वाला ताजमहल यहीं है. हजारों प्रेमी जोड़े हर साल इसे देखने आगरा आते हैं.

राजू और गौरी भी कई सौ किलोमीटर का सफर तय कर के प्रेम की इस इमारत को देखने आए थे. लेकिन उसे देखते ही उन्हें पता नहीं क्या हुआ कि वे आगरा से वापस नहीं जा सके? कर्नाटक के जिला गदग के कोन्नूर में रहता था हनुमंत का परिवार. राजू हनुमंत का बेटा था. राजू के अलावा हनुमंत की 2 संतानें और थीं. हनुमंत की टेलरिंग की दुकान थी. लोगों के कपड़े सिल कर वह परिवार को पालपोस रहा था. बेटा राजू जब हाईस्कूल से आगे नहीं पढ़ सका तो उस ने उसे भी अपने टेलरिंग के काम में लगा दिया. 2-3 सालों में काम सीख कर वह अच्छा टेलर बन गया. राजू खुद कमाने लगा तो बनठन कर रहने लगा.

राजू को गली की गौरी बचपन से ही बहुत अच्छी लगती थी. वह उस के घर से थोड़ा दूर रहती थी, इसलिए उस से कभी बातचीत का मौका नहीं मिला. वह उस की दुकान के सामने से ही स्कूल आतीजाती थी, इसलिए उस के स्कूल आतेजाते समय वह उसे देखने के लिए अपनी दुकान से बाहर आ कर खड़ा हो जाता था.

इसी तरह देखतेदेखते वह उसे मन ही मन चाहने लगा. लेकिन जब एक दिन गौरी उस की दुकान पर कपड़े सिलवाने आ गई तो उसे बात करने का भी मौका मिल गया. नाप लेने के बाद राजू ने पूछा, ‘‘क्या नाम लिखूं?’’

‘‘रघु, रघु लिख दो.’’ गौरी ने कहा.

‘‘तुम्हारा नाम रघु है?’’ राजू ने हैरानी से पूछा तो वह खिलखिला कर हंसते हुए बोली, ‘‘मैं तुम्हें रघु दिखती हूं?’’

‘‘नहीं, यह तो लड़कों का नाम है. लेकिन तुम्हीं ने तो कहा है कि रघु लिख दो.’’

‘‘हां, कहा तो है, रघु मेरे मामा हैं. मेरा नाम तो गौरी है.’’ उस ने कहा.

‘‘यह तो बहुत अच्छा नाम है.’’ राजू तारीफ करते हुए बोला.

‘‘मेरी तरह मेरा नाम भी है.’’ कह कर गौरी फिर खिलखिला कर हंसी.

उस की यह हंसी राजू के दिल में उतरती चली गई. उस ने उसे गौर से देखते हुए कहा, ‘‘गौरी, तुम सचमुच बहुत अच्छी हो.’’

उस की इस बात पर गौरी मुसकराई और चली गई. गौरी की निश्छल हंसी का राजू दीवाना सा हो गया. 4 दिनों बाद उस ने गौरी को सिले कपड़ों को ले जाने को कहा था, लेकिन वह अगले दिन से ही उस के आने का इंतजार करने लगा था. जिस अंदाज में राजू ने उस से बातें की थीं, उस से गौरी भी उस का मतलब समझ गई थी, लेकिन यह बात उस ने राजू को महसूस नहीं होने दी थी. दूसरी तरफ राजू ने सोच लिया था कि जैसे ही गौरी कपड़े लेने आएगी, वह अपने मन की बात उस से कह देगा. चौथे दिन शाम को गौरी राजू की दुकान पर आई तो संयोग से उस समय वह अकेला था. आते ही गौरी ने पूछा, ‘‘हमारे कपड़े सिल गए?’’

‘‘हां…हां सिल गए,’’ कह कर राजू ने शोकेस से कपड़े निकाल कर गौरी के सामने रख दिए. गौरी कपड़ों को देखने लगी तो राजू ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘अच्छे सिले हैं?’’

‘‘हां.’’ कह कर गौरी ने राजू को सिलाई के पैसे दिए और मुसकराती हुई चली गई. राजू मन की बात उस से कह नहीं पाया.

यह मुलाकात कोई खास नहीं थी. फिर भी गौरी के दिल में राजू की तसवीर उतर गई थी. 15 साल की गौरी का भावुक मन राजू की ओर खिंचता चला जा रहा था. राजू ने जो कहा था, वे बातें उस के दिमाग में घूम रही थीं. आतेजाते उन की नजरें टकराने लगीं. राजू की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. वह उस से मिलना चाहता था, लेकिन समझ नहीं पा रहा था कि कैसे मिले. उस के मन में इस बात का भी डर था कि कहीं वह बुरा न मान जाए.

हिम्मत कर के एक दिन राजू छुट्टी के समय गौरी के कालेज के समाने जा कर खड़ा हो गया. गौरी सहेलियों के साथ कालेज से निकली तो राजू को देख कर उस का दिल तेजी से धड़क उठा. राजू ने उसे एक तरफ आने का इशारा किया तो वह उस का इशारा समझ गई. वह अपनी सहेलियों से अलग हो कर राजू के पास आ गई. जैसे ही वह उस के पास आई, राजू ने उसे मोटरसाइकिल पर बैठने का इशारा किया. गौरी बैठ गई तो वह तेजी से चल पड़ा. गौरी ने कहा, ‘‘कहां जा रहे हो, मुझे घर जाना है?’’

‘‘चली जाना, आज मुझे तुम से कुछ कहना है.’’ राजू ने कहा तो गौरी ने हंसते हुए कहा, ‘‘यही न कि तुम मुझ से प्यार करते हो.’’

राजू ने बिना किसी संकोच के कहा, ‘‘गौरी, सचमुच मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’

गौरी मुसकरा कर बोली, ‘‘मैं भी तो तुम से प्यार करती हूं.’’

राजू ने उसे हैरानी से देखा तो गौरी ने नजरें झुका लीं. यह थी गौरी और राजू के प्यार की शुरुआत. अकसर प्रेम करने वालों के प्यार की शुरुआत कुछ इसी तरह से होती है. लेकिन इस के बाद कभीकभी यही प्यार जीवन के लिए ऐसा नासूर बन जाता है कि जीवन ही लील लेता है. गौरी के पिता की मौत हो चुकी थी. वह अपनी मां शैला और बड़ी बहन रजनी के साथ अपने मामा रघु के घर रहती थी. पिता की मौत के बाद मामा उन्हें अपने साथ ले आए थे. रजनी बीएससी कर रही थी, जबकि गौरी दसवीं में पढ़ रही थी. इसी नादान उम्र में गौरी को राजू से प्यार हो गया था.

प्यार ऐसी चीज है, जिसे कितना छिपा कर रखा जाए, वह कभी न कभी समाज की नजरों में आ ही जाता है. राजू और गौरी की मुलाकातें मोबाइल के जरिए तय होने लगीं. दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. उन के प्यार को मंजिल मिल पाएगी, इस बात को ले कर उन्हें शक था. दरअसल, उन के रास्ते में सब से बड़ा रोड़ा था उन की जाति. गौरी कन्नड़ थी और राजू मराठी. दोनों को ही पता था कि समाज की नजरों में जैसे ही उन का प्यार आएगा, तूफान आ जाएगा. एक दिन गौरी ने राजू से कहा,

‘‘राजू अगर समाज ने हमारे संबंधों को कबूल नहीं किया तो हम क्या करेंगे?’’

राजू ने गौरी को भरोसा दिलाया कि दुनिया वाले कुछ भी कहें, वह उस का साथ हरगिज नहीं छोड़ेगा. दुनिया की कोई भी ताकत उसे जुदा नहीं कर सकेगी. दोनों साथ जिएंगे और साथ मरेंगे. प्यार की दीवानगी राजू के दिलोदिमाग पर छाने लगी तो उस का मन काम से उचट गया. एक दिन उस के पिता ने टोका, ‘‘क्या बात है बेटा, आजकल तुम्हारा मन काम में नहीं लग रहा है. कुछ दिनों से देख रहा हूं कि तुम दुकान से गायब हो जाते हो. कस्टमर भी परेशान होते हैं. बताओ क्या बात है?’’

‘‘कोई बात नहीं है पापा. बस ऐसे ही थोड़ा मन उचट गया था. लेकिन अब आप चिंता न करें, मैं काम पर पूरा ध्यान दूंगा.’’ राजू ने कहा.

इस के बाद वह गौरी से उस समय मिलता, जब दुकानदारी पर कोई असर न पड़ता. उस के मन में एक ही बात घूमा करती थी कि वह ऐसा क्या करे, जिस से उस के प्यार के बीच जाति न आए. उस का ध्यान फिल्म ‘एकदूजे के लिए’ की तरफ गया, जिस में नायक कमल हासन और नायिका रति अग्निहोत्री अलगअलग जाति के थे. फिल्म का ध्यान आते ही राजू ने सोच लिया कि वह भी उसी तरह अपने प्यार के लिए करेगा. लेकिन एक दिन गौरी की मां शैला ने उसे फोन पर हंसहंस कर बातें करते देखा तो उसे शक ही नहीं हुआ, बल्कि उसे लगा कि उस की किशोर बेटी इश्क की खतरनाक राह पर चल पड़ी है. शैला परेशान हो उठी. उस ने गौरी से पूछा तो उस ने झूठ बोल दिया.

कुछ दिनों बाद शैला के दूर के रिश्तेदार नीलकंठ ने उसे बताया कि उस ने गौरी को बाजार में राजू टेलर के साथ देखा है तो पूरी बात उस की समझ में आ गई. इस बार उस ने बेटी से सख्ती से पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मम्मी, मैं राजू से प्यार करती हूं और वह भी मुझे बहुत चाहता है. हम दोनों शादी करना चाहते हैं.’’

‘‘शादी, प्यार यह सब क्या कह रही है तू. तू जानती है तेरी उम्र क्या है? फिर वह हमारी जाति का भी तो नहीं है. इसलिए यह बात तू मन से निकाल दे. तेरी शादी उस से किसी भी तरह नहीं हो सकती.’’

‘‘मम्मी, राजू बहुत अच्छा लड़का है. तुम भी उस से बात करोगी तो वह तुम्हें भी पसंद आ जाएगा.’’ गौरी बोली.

छोटी सी लड़की के मुंह से ऐसी बातें सुन कर शैला हैरान रह गई. उस ने सख्ती से कहा, ‘‘गौरी, अब बहुत हो चुका. कल से तुम कालेज नहीं जाओगी.’’

‘‘क्यों मम्मी?’’ गौरी ने हैरानी से पूछा.

‘‘कह दिया न, नहीं जाना है तो नहीं जाना है.’’ कह कर शैला अपने काम में लग गई. शाम को शैला का भाई घर लौटा तो उसे शैला ने सारी बात बता दी.

भांजी के प्यार और शादी की जिद के बारे में सुन कर रघु चिंतित हो उठा. लेकिन उस ने बहन से कहा कि वह सब संभाल लेगा. अगले दिन रघु राजू की दुकान पर गया और उसे धमकाते हुए बोला, ‘‘तू गौरी का पीछा छोड़ दे, यही तेरे लिए अच्छा रहेगा.’’

‘‘मामा, मैं गौरी से प्यार करता हूं.’’

‘‘यह प्यारव्यार कुछ नहीं होता. अगर तू नहीं माना तो मुझे दूसरे तरीके से समझाना पड़ेगा.’’ रघु ने धमकाते हुए कहा.

जिस समय रघु राजू से बात कर रहा था, नीलकंठ ने उसे देख लिया. नीलकंठ ने तो पहले भी गौरी और राजू को बाजार में देखा था. वह भी रघु के पास आ गया. उस ने रघु से कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, इसे मैं सभाल लूंगा.’’

इस के बाद नीलकंठ ने राजू को धमकाते हुए कहा, ‘‘तुम संभल जाओ, वरना तुम्हें जेल की हवा खिला दूंगा.’’

जेल का नाम आते ही राजू डर गया. क्योंकि वह नीलकंठ की दबंगई को जानता था. लेकिन गौरी को छोड़ना उस के लिए नामुमकिन था. उस ने उस के साथ जीनेमरने की कसमें जो खाई थीं.

नीलकंठ की दबंगई के कारण अब मोहल्ले में राजू और गौरी के प्यार के चर्चे कुछ ज्यादा ही होने लगे. परिवार वालों को बदनामी का डर सताने लगा. गौरी पर पाबंदियां भी लगने लगीं. पाबंदियों की वजह से वह प्रेमी से नहीं मिल पा रही थी. इस से दोनों बेचैन हो रहे थे. राजू जल्द ही गौरी से कोर्टमैरिज करना चाहता था, लेकिन समस्या यह थी कि अभी गौरी 16 साल की थी.

राजू ने गौरी से शादी करने की बात अपने घर में कही तो एक दिन राजू की मां अन्नपूर्णा और पिता हनुमंत रघु के घर गए. उन्होंने रघु से कहा कि अगर बच्चे एकदूसरे से प्यार करते हैं तो वे क्यों उन का विरोध कर रहे हैं. गौरी को अपने घर की बहू बनाने में उन्हें कोई ऐतराज नहीं है.

‘‘लेकिन मुझे है.’’ रघु ने कहा, ‘‘क्योंकि हम दोनों की जाति अलग है. इसलिए यह संबंध कभी नहीं हो सकता.’’

राजू के मांबाप निराश हो कर वापस आ गए. अगले दिन गौरी ने राजू को फोन कर के कहा कि घर वाले उस के लिए रिश्ता तलाश रहे हैं और जल्दी ही उस की शादी कर देना चाहते हैं. जबकि वह उसी से शादी करना चाहती है, क्योंकि वह उस के बिना जी नहीं सकती. राजू ने उसे विश्वास दिलाया कि कुछ भी हो, कोई उन दोनों को अलग नहीं कर सकता. वह चिंता न करे. इस समाज से कहीं दूर जा कर वह उस के साथ अपनी दुनिया बसाएगा. गौरी को राजू पर पूरा भरोसा था. वह अपने प्यार के साथ इस जालिम समाज से कहीं दूर चली जाना चाहती थी, जहां वह अपने सपनों की दुनिया बसा सके.

एक दिन राजू ने फोन कर के गौरी से कहा कि आगरा में ताजमहल है, जिसे बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज की यादगार में बनवाया था. हम दोनों उसी ताज के साए में अपनी दुनिया बसाएंगे. गौरी उस के साथ चलने को तैयार हो गई. राजू ने गौरी को तैयार रहने को कह कर कहा कि वह कभी भी फोन कर के उसे आगरा चलने को कह सकता है. राजू जानता था कि जाति का यह अड़ंगा उसे कभी गौरी के साथ अपनी दुनिया बसाने नहीं देगा. गौरी के बालिग होने में अभी 2 साल बाकी थे. इस बीच कुछ भी हो सकता था. उसे सब से ज्यादा डर दबंग नीलकंठ का था, जो उसे किसी केस में फंसा कर जेल भिजवाने की धमकी दे रहा था.

6 अक्तूबर, 2015 को राजू और गौरी योजना बना कर घर से निकले और दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बैठ गए. उस समय राजू की जेब में 50 हजार रुपए थे. वह देश की राजधानी में गौरी के साथ अपनी दुनिया बसाना चाहता था, ताकि राजधानी की भीड़ में कोई उन्हें ढूंढ़ न पाए. दिल्ली पहुंच कर दोनों 3 दिनों तक एक होटल में रुके. वे ताज के दीदार को बेताब थे. 10 अक्तूबर की सुबह 11 बजे आगरा के नजदीक ईदगाह रेलवे स्टेशन पर उतरे. वहां से औटो कर के वे होटल ताज पैलेस गए, जहां कमरा नंबर 304 बुक कराया. होटल के रिसैप्शन पर राजू ने गौरी को अपना दोस्त बताया.

आगरा पहुंच कर दोनों बहुत खुश थे. उन की बरसों की तमन्ना पूरी होने वाली थी. ताजमहल को या तो उन्होंने किताबों में पढ़ा था या फिर फिल्मों में देखा था. अब वे अपनी आंखों से उस का दीदार करने वाले थे. होटल में फ्रैश होने के बाद दोनों एक औटो से ताजमहल देखने गए. ताजमहल परिसर में प्रवेश करने पर उन्हें लगा, जैसे सारा वातावरण प्यार की खुशबू से सराबोर है. ताज के सामने पार्क की हरीभरी मुलायम घास पर बैठ कर उन्होंने खाना खाया. उस के बाद राजू ने पूछा, ‘‘गौरी, अब आगे क्या करना है?’’

गौरी की मन:स्थिति अजीब सी थी. वह पहली बार घर से बाहर निकली थी. उम्र नादान थी और जीवन का कोई तजुरबा नहीं था. घर से निकल कर पीछे लौटने के सारे दरवाजे वह बंद कर आई थी. उस ने ठंडी सांस ले कर कहा, ‘‘मैं क्या जानूं.’’

25 साल के राजू की भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था. उस के लिए अब एक ओर कुआं था तो दूसरी ओर खाई. घर वापसी का मतलब था जेल जाना. उसे लग रहा था कि नाबालिग लड़की को भगाने के जुर्म में उसे उम्रकैद की सजा हो सकती है. वह जानता था कि समाज उसे कभी माफ नहीं करेगा. इन्हीं सब बातों ने उसे निराश कर दिया. राजू गौरी का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘गौरी हम ने साथ जीनेमरने की कसमें खाई हैं, अगर हम साथ जी नहीं सकते तो साथ मर तो सकते हैं?’’

गौरी राजू की बात सुन कर हैरान रह गई. करीब एक साल से दोनों मोहब्बत कर रहे थे, गजब का जोश था राजू में. उस की जिंदादिली से प्रभावित हो कर ही वह उस के साथ दुनिया बसाने चली आई थी. लेकिन  ज राजू उसे कुछ थका हुआ सा लग रहा था. राजू ने आगे कहा, ‘‘शाहजहां और मुमताज की मोहब्बत उन की मौत के बाद अमर हो गई थी. शाहजहां ने मुमताज की विरह में जीवन के आखिरी दिन गुजारे थे. लेकिन हम दोनों खुशनसीब हैं कि साथसाथ हैं. अगर साथसाथ मौत को गले लगा लें तो अगले जनम में हम एक साथ रहेंगे.’’

गौरी को भी लगा कि इस दुनिया में जीने से अच्छा है कि एकदूसरे की बांहों में मर जाएं. समाज का डर जीने नहीं दे रहा है. दोनों घर से सैकड़ों मील दूर थे. कोई कुछ कहनेसुनने वाला नहीं था. उन्होंने एक भयानक फैसला ले लिया. रात करीब 8 बजे दोनों होटल पहुंचे और औटो वाले से उन्होंने सुबह आने को कहा कि कल कहीं और घूमने चलेंगे. दोनों बाहर से खाना पैक करा कर लाए थे, साथ में एक कोल्डड्रिंक की बोतल भी थी. इस के बाद उन्होंने कमरा अंदर से बंद किया तो उस रात उस कमरे में क्या हुआ, कोई नहीं जानता.

सुबह औटो वाले ने कमरा नंबर 304 का दरवाजा खटखटाया. लेकिन काफी देर तक अंदर से कोई आवाज नहीं आई. तब उस ने होटल के मैनेजर आशीष को इस बात की जानकारी दी. आशीष ने तुरंत थाना रकाबगंज पुलिस को सूचना दी. सूचना मिलते ही पुलिस आ गई और कमरे का दरवाजा तोड़ दिया. पुलिस अंदर पहुंची तो हैरान रह गई. पलंग पर 2 लाशें पड़ी थीं. टेबल पर पुलिस को कफ सीरप की 2 शीशियां मिलीं, जिन्हें जांच के लिए भेज दिया गया. दोनों ने कोल्डड्रिंक में शायद कोई जहरीला पदार्थ मिला कर पी लिया था. 2 गिलासों में कोल्डड्रिंक भी मिली थी. उन के सामान से एक सुसाइड नोट मिला. गौरी के हाथ पर लिखा था ‘लव यू राजू’.

पुलिस को उन के सामान में हुबली से हजरत निजामुद्दीन तक का ट्रेन टिकट मिला था.  सूचना पा कर सीओ असीम चौधरी और एसपी सिटी आर.के. सिंह भी आ गए थे. पुलिस को जो सुसाइड नोट मिला था, वह कन्नड़ भाषा में था. उस सुसाइड नोट में दोनों ने अपनी मौत का जिम्मेदार नीलकंठ को ठहराया था. उस में लिखा था कि उसी के कारण वे घर छोड़ कर आगरा आए थे. उन्होंने नीलकंठ को कड़ी सजा देने की गुजारिश की थी और अपने घर वालों को तंग न करने का अनुरोध किया था.

सुसाइड नोट पर गौरी और राजू के दस्तखत के अलावा 2 मोबाइल नंबर भी लिखे थे. पुलिस को अभी तक यह नहीं मालूम था कि प्रेमी युगल कहां से आया था. पुलिस ने दिए गए मोबाइल नंबरों पर बात की तो पता चला कि वे नंबर कर्नाटक में रहने वाले अमृत के थे. अमृत राजू का मामा था. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया राजू पड़ोसी लड़की के साथ कहीं भाग गया है. पुलिस ने दोनों के आत्महत्या करने की सूचना अमृत को दे दी. राजू और गौरी की मौत की सूचना पा कर राजू के घर हाहाकार मच गया. लेकिन गौरी का परिवार खामोश रहा. उस की मां शैला ने कहा कि उन के लिए तो गौरी उसी दिन मर गई थी, जिस दिन घर से भागी थी. गौरी के मामा ने शव लेने से भी इनकार कर दिया.

हनुमंत अपने दूसरे बेटे परशु के साथ आगरा आए. उन्होंने दोनों शवों की शिनाख्त की और उन का दाहसंस्कार आगरा के ताजगंज श्मशान घाट पर कर दिया. राजू और गौरी साथसाथ जी तो नहीं पाए, पर उन की चिताएं जरूर आसपास लगी थीं. हनुमंत को अपने जवान बेटे के खोने का गम था. वह तो बेटे को खुशियां देना चाहता था, पर जाति की दीवार ने उसे ऐसा गम दिया, जिसे वह पूरी जिंदगी नहीं भुला पाएगा. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Family Dispute: भाभी के लिए भाई बना दुश्मन

Family Dispute: निठल्ले अंग्रेज सिंह की नीयत अपनी खूबसूरत भाभी पर ही नहीं, भाई की दौलत पर भी खराब थी. यह सब पाने के लिए उस ने दोस्तों की सलाह पर जो किया, वह किसी भी कीमत पर उचित नहीं था.  खेतों का काम निपटा कर सुखविंदर सिंह ने दोपहर का खाना खाने के लिए घर जाने से पहले जानवरों के कमरे में जा कर उन का चारा वगैरह देख लिया था. पूरी तरह संतुष्ट हो कर वह घर के लिए चल पड़ा. उस के खेतों से कुछ दूरी पर कुलदीप सिंह के खेत थे. उस के आगे लखविंदर और जसबीर के खेत थे.

चूंकि कुलदीप दूर के रिश्ते में उस का भाई लगता था और गांव जाने का रास्ता उस के खेतों से था, इसलिए उस ने सोचा कि वह उस से भी पूछ ले कि अगर वह भी घर चल रहा है तो दोनों साथसाथ बातचीत करते चले जाएंगे. यही सोच कर सुखविंदर खेतों में बने कुलदीप के नलकूप वाले कमरे की ओर बढ़ा. जैसे ही वह नलकूप की टंकी के पास पहुंचा, उस के पैर जहां थे, वहीं रुक गए. उस का शरीर कांप उठा और मारे डर के उस का चेहरा पीला पड़ गया. एकाएक उस के मुंह से कोई आवाज नहीं निकली.

नलकूप वाले कमरे के दरवाजे के ठीक बीचोबीच कुलदीप सिंह की लहूलुहान लाश पड़ी थी. उस के सिर, पेट और शरीर के अन्य अंगों से खून अभी भी रिस रहा था. कुलदीप को उस हालत में देख कर सुखविंदर घबरा गया. उसे कुछ नहीं सूझा तो वह तेजी से गांव की ओर भागा. गांव पहुंच कर सीधे वह कुलदीप के घर पहुंचा और एक ही सांस में उस की पत्नी करमजीत कौर को पूरी बात बता दी. संयोग से उस समय करमजीत कौर का भाई रछपाल सिंह भी बहन से मिलने आया था. सुखविंदर की बात सुन कर करमजीत कौर भाई रछपाल, सुखविंदर और गांव के कुछ अन्य लोगों के साथ खेतों की ओर भागी.

नलकूप पर इन लोगों ने जो देखा, सब की सांसें अटक गईं. करमजीत तो दहाड़ मार कर पति के ऊपर गिर पड़ी. कुछ लोगों ने कुलदीप की नाड़ी देखी तो पता चला कि वह मर चुका है. तुरंत इस बात की जानकारी पुलिस को दी गई. यह घटना 9 सितंबर, 2015 की है. हत्या की सूचना मिलते ही थाना सुलतानपुर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरप्रीत सिंह, एसआई जसप्रीत सिंह, एएसआई लखविंदर सिंह, हैडकांस्टेबल जसविंदर सिंह, वतन सिंह, सुखदेव सिंह और कमलजीत सिंह के साथ गांव माछीछोआ पहुंच गए. अब तक वहां लगभग पूरा गांव जमा हो चुका था.

हत्या की सूचना मिलने के तुरंत बाद हरप्रीत सिंह ने घटना की सूचना एसपी (डी) जगजीत सिंह सरोआ के साथसाथ क्राइम टीम को भी दे दी थी. इसलिए उन के घटनास्थल पर पहुंचतेपहुंचते क्राइम टीम भी पहुंच गई थी. हरप्रीत सिंह ने लाश का गहराई से निरीक्षण किया तो मृतक के सिर और पेट पर चोटों के गंभीर निशान नजर आए. शायद वे किसी तेजधार हथियार से किए गए थे. यही गंभीर चोटें मौत का कारण बनी थीं. उन्होंने आसपास का भी निरीक्षण किया कि शायद कोई ऐसी चीज मिल जाए, जिस की मदद से जांच आगे बढ़ सके.

बहरहाल, क्राइम टीम को जो सबूत मिले, उन्हें कब्जे में ले लिए तो हरप्रीत सिंह ने अन्य औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाना लौट कर उन्होंने मृतक की पत्नी करमजीत कौर की ओर से कुलदीप सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर दिया. इस के बाद इस अंधे कत्ल के खुलासे के लिए एसएसपी राजेंद्र सिंह ने सीआईए स्टाफ की एक टीम गठित कर दी.

काफी प्रयास के बाद भी पता नहीं चला कि कुलदीप की हत्या किस ने और क्यों की थी? पहले पुलिस ने इस हत्या को अवैध संबंधों से जोड़ कर देखा और कुछ मुखबिरों को करमजीत कौर पर नजर रखने के लिए लगा दिया. मृतक कुलदीप की भी कुंडली खंगाली गई. पुलिस को संदेह था कि अवैध संबंधों में रोड़ा बनने की वजह से करमजीत कौर ने ही पति को मरवा दिया होगा. इस बात पर भी गौर किया जा रहा था कि कहीं कुलदीप के ही किसी से नाजायज संबंध न रहे हों और उस के घर वालों ने कुलदीप को रास्ते से हटा दिया हो.

थाना सुलतानपुर लोधी पंजाब के जिला कपूरथला के अंतर्गत आता है. इसी थाने का एक गांव है माछोछीआ, जिस में सरदार समुंद्र सिंह परिवार के साथ रहते थे. उन के पास काफी उपजाऊ जमीन थी, गांव में पक्का मकान था. खेतों से इतनी पैदावार हो जाती थी कि साल का खर्च निकालने के बाद भी उन के पास काफी कुछ बच जाता था, जिस में से गुरु का आदेश ‘वंड छक्को’ मान कर काफी पैसा वह गरीबों और जरूरतमंदों को दे देते थे. कुल मिला कर समुंद्र सिंह अपने नाम की ही तरह नेकदिल और दरियादिल थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे थे. बड़ा कुलदीप सिंह, उस से छोटा अंग्रेज सिंह और सब से छोटा रणजीत सिंह.

रणजीत सिंह थोड़ा मंदबुद्धि था. जबकि अंग्रेज सिंह काफी चालाक और शातिरदिमाग था. वह जिस तरह का दिखाई देता था, उस तरह का था नहीं. बड़ा कुलदीप सिंह पिता की ही तरह धार्मिक सोच वाला सीधासादा नेक इंसान था. दूसरों और जरूरतमंदों के काम आना उसे अच्छा लगता था. उस की व्यवहार कुशलता और स्वभाव की वजह से गांव में उस की बड़ी इज्जत थी. सभी उस से प्यार भी करते थे. जबकि उस के छोटे अंग्रेज सिंह को गांव का कोई भी आदमी पसंद नहीं करता था. तीनों भाई अपने पुश्तैनी मकान में एक साथ रहते थे.

हरप्रीत सिंह ने मृतक की पत्नी करमजीत कौर और गांव वालों से पूछाताछ की. सब का यही कहना था कि कुलदीप की किसी से न कोई दुश्मनी थी और न अदावत. वह सब के काम आने वाला इंसान था. लोग उस की बहुत इज्जत करते थे. मुखबिरों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि मृतक और उस की पत्नी करमजीत कौर का चरित्र एकदम पाकसाफ था. ना तो मृतक के किसी औरत से नाजायज संबंध थे और न ही करमजीत कौर की किसी अन्य मर्द से बोलचाल थी. कुलदीप पूरा दिन अपने खेतों में व्यस्त रहता था. फालतू बातों के लिए पतिपत्नी के पास जरा भी समय नहीं था. मुखबिरों ने यह भी बताया था कि यह काम किसी बाहरी आदमी ने किया है.

हरप्रीत सिंह ने मृतक के रिश्तेदारों तथा अगलबगल के गांव वालों से भी पूछताछ की. लेकिन इस का भी कुछ नतीजा नहीं निकला. हर किसी ने मृतक की तारीफ ही की. किसी ने उस के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा. जब इस मामले की जांच आगे नहीं बढ़ सकी तो एसएसपी राजेंद्र कुमार ने तीन टीमें बना कर जांच में लगा दीं. थानाप्रभारी हरप्रीत सिंह ने इस मामले को चुनौती के रूप में लिया. उन्हें लगता था कि कहीं कोई ऐसी बात है, जो उन की नजरों के सामने नहीं आ रही है.

हरप्रीत सिंह ने मृतक के छोटे भाई अंग्रेज सिंह को बुला कर पूछाताछ की तो उस के बयानों में तमाम बातें विरोधाभासी मिलीं. वह किसी भी सवाल का सीधा जवाब नहीं दे रहा था. वह हर बात को घुमाफिरा कर ही कहता था. पूछताछ के बाद उन्होंने उसे जाने तो दिया, लेकिन उस पर नजर रखने के लिए अपने कुछ चालाक मुखबिरों को लगा दिया. 2 दिनों बाद ही मुखबिरों ने अंग्रेज सिंह के बारे में जो सूचनाएं दीं, उसे सुन कर हरप्रीत सिंह को लगा कि अब हत्यारे उन की पहुंच से ज्यादा दूर नहीं हैं.

हरप्रीत सिंह अंग्रेज सिंह को पकड़ कर थाने ले आए और सख्ती से पूछताछ शुरु कर दी. हर अपराधी की तरह अंग्रेज सिंह भी खुद को निर्दोष बताता रहा. लेकिन हरप्रीत सिंह के पास जो सबूत थे, उन्हें सामने रख कर जब पूछताछ की तो वह टूट गया और उस ने भाई की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

उस ने कहा कि उसी ने अपने दोस्तों, बगीचा सिंह पुत्र निम्मा सिंह निवासी गांव थेहवाला, जसवंत सिंह पुत्र गुरबचन सिंह निवासी गांव हुसैनपुर दुल्लेवाला, राजू पुत्र दर्शन सिंह निवासी गांव हुसैनपुर दुल्लेवाला, परविंदर सिंह पुत्र दर्शन सिंह निवासी गांव मुहालम, जिला फिरोजपुर तथा चरणजीत सिंह पुत्र सुच्चा सिंह निवासी गांव थेहवाला के साथ मिल कर भाई की हत्या की थी. इस के लिए उस ने अपने इन दोस्तों को 2 लाख रुपए देने का वादा किया था, जिस में से एक लाख रुपए उस ने किसी से उधार ले कर दे भी दिए थे.

उसी दिन हरप्रीत सिंह ने इस हत्या में शामिल लोगों के घरों पर छापे मारे, जिस में से बगीचा सिंह और परविंदर उर्फ पिंटू पकड़ लिए गए. बाकी के 3 लोग फरार होने में सफल रहे. शायद उन्हें पुलिस की काररवाई की भनक लग गई थी. गिरफ्तार किए गए तीनों अभियुक्तों से पूछताछ में कुलदीप सिंह की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह हीनभावना से ग्रस्त एक ईर्ष्यालु भाई की घृणित मानसिकता का परिणाम था. कुलदीप सिंह और उस के छोटे भाई अंग्रेज सिंह की सोच में जमीनआसमान का अंतर था.

कुलदीप सिंह जहां धार्मिक सोच वाला दयालु आदमी था, वहीं अंग्रेज सिंह शैतानी सोच वाला ईर्ष्यालु आदमी था. तीसरा भाई रणजीत सिंह मंदबुद्धि था, इसलिए उसे परिवार की किसी चीज से कोई मतलब नहीं था. उस का ज्यादातर समय गुरुद्वारा में बीतता था. गांव वाले अकसर कुलदीप सिंह की बड़ाई किया करते थे. यह बात अंग्रेज को बिलकुल नहीं भाती थी. गांव में कोई समारोह होता तो कुलदीप सिंह को उस में सब से आगे रखा जाता. यह सब देख कर अंग्रेज सिंह जल उठता था. उसे इस बात पर गुस्सा आता था कि कुलदीप सिंह की तरह लोग उस की इज्जत क्यों नहीं करते.

एक दिन शराब पीते समय यही बात उस ने अपने दोस्त बगीचा सिंह से कही तो उस ने कहा, ‘‘उस के रहते तुझे कोई नहीं पूछेगा भाई, इसलिए तू उसे खत्म क्यों नहीं कर देता.’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ अंग्रेज सिंह ने हैरानी से कहा.

‘‘भाई बढि़या आइडिया दे रहा हूं. तुझे भाभी बहुत अच्छी लगती है न? कब से तू उस के पीछे पड़ा है, लेकिन वह तुझे हाथ नहीं रखने दे रही है. कुलदीप को मार देगा तो वह तेरी हो जाएगी. इस के अलावा उस की जमीन भी तेरी हो जाएगी. तेरा छोटा भाई पागल ही है, उस के हिस्से की भी जमीन तुझे ही मिलेगी. इस तरह पूरी प्रौपर्टी का मालिक तू अकेला हो जाएगा.’’ बगीचा सिंह ने कहा.

अंग्रेज सिंह की आंखे हैरानी से फैल गईं. उस ने कहा, ‘‘यार बगीचा, तू ने यह बात पहले क्यों नहीं बताई. तू ने कितनी सच बात कही है, भाई के न रहने पर भाभी करमजीत कौर न खुद को संभाल पाएगी और न इतनी जमीन को. मजबूरन उसे मेरा सहारा लेना पड़ेगा. फिर तो मेरी चांदी ही चांदी हो जाएगी.’’

यह बात दिमाग में आते ही अंग्रेज सिंह भाई कुलदीप की हत्या की योजना बनाने लगा. 2 बार तो उस ने नलकूप की मोटर के स्टार्टर में बिजली का नंगा तार बांध दिया कि कुलदीप मोटर स्टार्ट करने आए तो करंट से उस की मौत हो जाए. लेकिन तार पर नजर पड़ जाने की वजह से कुलदीप बच गया. इस के बाद अंग्रेज ने कुएं के ऊपर रखा लकड़ी का पटरा हटा कर पतली सी प्लाई रख दी, जिस से कुलदीप उस पर चढ़े तो वह टूट जाए और कुलदीप सीधे कुएं में गिर जाए. नीचे पंखा लगा था, अगर कुलदीप उस पर गिरता तो मर जाता. लेकिन उस पर भी कुलदीप की नजर पड़ गई. उस ने उसे हटा कर मोटा पटरा रख दिया.

इस तरह कुलदीप सिंह को मारने की अंग्रेज सिंह की सारी कोशिशें विफल हो गईं. अपनी इन कोशिशों में असफल होने के बाद अंग्रेज सिंह ने कुलदीप की हत्या पैसे ले कर हत्या करने वालों से कराने पर विचार किया और बगीचा सिंह के माध्यम से उस ने राजू, परविंदर और चरणजीत सिंह को 2 लाख रुपए में बड़े भाई की हत्या की सुपारी दे दी. एक लाख रुपए उस ने एक आदमी से उधार ले कर एडवांस भी दे दिए. रुपए देने के बाद अंग्रेज सिंह ने पांचों को पिस्तौल खरीदने के लिए उत्तर प्रदेश भेजा. ये सभी बरेली, अलीगढ़ आदि शहरों में घूम कर 7 सितंबर को लौट आए. इन्हें कहीं पिस्तौल नहीं मिली. आखिर में तय हुआ कि किसी तेजधार हथियार से कुलदीप सिंह की हत्या कर दी जाए.

9 सितंबर की दोपहर को जब कुलदीप सिंह खेतों का काम निपटा कर मोटर बंद करने के लिए नलकूप के कमरे में गया तो वहां बगीचा सिंह और परविंदर उर्फ पिंटू पहले से बैठे थे. कुलदीप मोटर बंद करने के लिए जैसे ही कमरे में घुसा, दोनों ने एकदम से कुलदीप पर हंसिया और चाकू से हमला कर दिया. अचानक हुए इस हमले से कुलदीप चकरा कर जमीन पर गिर पड़ा और कुछ देर तड़प कर मर गया. कुलदीप सिंह मर गया तो अंग्रेज सिंह बगीचा और परविंदर को अपनी मोटरसाइकिल से सुलतानपुर लोधी छोड़ आया. इस के बाद घर लौट कर वह इस तरह सामान्य बना रहा, जैसे उसे किसी बात का पता ही नहीं है.

इंसपेक्टर हरप्रीत सिंह ने मुखबिरों को तो अंग्रेज सिंह के पीछे लगाया ही था, उसी समय उस के फोन की काल डिटेल्स भी निकलवा ली थी. इसी काल डिटेल्स से पता चला था कि कुलदीप के कत्ल वाले दिन 9 सितंबर को कुलदीप की हत्या से कुछ देर पहले और बाद में अंग्रेज सिंह ने 4-5 लोगों से 60-70 बार बात की थी. उन्हीं पांचों नंबरों से ही अंग्रेज सिंह के पांचों साथियों का पता चला था. बहरहाल, गिरफ्तार अंग्रेज सिंह, बगीचा सिंह और परविंदर का बयान लेने के बाद उन्हें अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान बगीचा सिंह और परविंदर की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हंसिया और चाकू बरामद कर लिया गया.

रिमांड खत्म होने पर 15 सितंबर को तीनों अभियुक्तों को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों अभियुक्त जेल में थे, किसी की जमानत नहीं हुई थी. बाकी बचे तीनों अभियुक्तों की पुलिस तलाश कर रही थी. कथा लिखे जाने तक वे पकड़े नहीं गए थे. Family Dispute

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Hindi: अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का

True Crime Hindi: नेहा मौडलिंग के जरिए बौलीवुड में एंट्री के लिए स्ट्रगल कर रही थी. लेकिन दोस्त से पति बने प्रिंस ने उसे प्यार का ऐसा सिला दिया कि…

दक्षिणपूर्वी दिल्ली के हरिनगर कालोनी की रहने वाली 21 वर्षीय नेहा मिश्रा मुंबई में रह कर मौडलिंग कर रही थी. वह कई छोटीमोटी ऐड फिल्मों में काम कर चुकी थी और बौलीवुड फिल्मों में एंट्री पाने के लिए स्ट्रगल कर रही थी. अपने घर वालों को बताए बिना उस ने करीब 5-6 महीने पहले दिल्ली के रीयल एस्टेट कारोबारी प्रिंस तेवतिया से एक मंदिर में शादी कर ली थी. लेकिन शादी के बाद नेहा को यह बात अपने घर वालों को बतानी ही पड़ी. बेटी के फैसले पर प्रदीप मिश्रा आहत तो हुए लेकिन उन्होंने सोचा कि जब बेटी ने प्रिंस को अपनी मरजी से चुना है तो उस की खुशी की खातिर उन्होंने उस की पसंद पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी. इस के बाद प्रिंस तेवतिया ने भी नेहा के घर आना शुरू कर दिया.

करीब 3 महीने पहले नेहा की तबीयत खराब हो गई तो वह मुंबई से पिता के यहां दिल्ली आ गई थी. उस से मिलने के लिए प्रिंस उस के यहां जाता रहता था. 16 अप्रैल, 2015 को भी वह नेहा के यहां गया था. 2 दिनों से वह नेहा के यहां ही था. 17-18 अप्रैल की रात को नेहा और प्रिंस एक कमरे में सोए हुए थे जबकि नेहा के मातापिता और भाईबहन दूसरे कमरे में सो रहे थे. आधी रात के बाद हुई तेज आवाज से प्रदीप मिश्रा की नींद खुल गई. वह आवाज गोली चलने जैसी थी. उन्होंने पत्नी रोमा को भी जगा दिया. वह आवाज उन की बेटी नेहा के कमरे से आई थी, इसलिए उन की घबराहट बढ़ गई.

दोनों पतिपत्नी बेटी के कमरे की तरफ जाने ही वाले थे कि तभी बेटी के कमरे का दरवाजा खुल गया. उस का पति प्रिंस दरवाजा खोलते हुए बाहर निकला. वह घबराया हुआ था. इस से पहले कि प्रदीप मिश्रा उस के कमरे से आई गोली चलने जैसी आवाज के बारे में उस से पूछते, प्रिंस खुद ही बोल पड़ा, ‘‘मैं ने नेहा को गोली मार दी है.’’

इतना सुनते ही प्रदीप और उन की पत्नी के जैसे होश ही उड़ गए. वह तेज कदमों से बेटी के कमरे में गए. उन्होंने देखा तो नेहा बेड पर पड़ी थी और उस के पेट के निचले हिस्से से खून निकल रहा था. रोमा मिश्रा ने बेटी को हिलायाडुलाया. उस में कोई हलचल नहीं दिखी तो वह जोरजोर से रोने लगीं. बेटी की हालत देखते ही प्रदीप मिश्रा आटोरिक्शा बुलाने के लिए तेजी से निकल गए ताकि उसे जल्द अस्पताल पहुंचाया जा सके. तभी प्रिंस भी घायल नेहा को दोनों बाहों में थामे चौथी मंजिल से नीचे उतर आया. रोमा के रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी भी जाग गए थे. वे भी अपनेअपने घरों से गली में आ गए थे. सभी लोग आपस में कानाफूसी कर रहे थे. कोई भी यह नहीं समझ पा रहा था कि आखिर पति ने नेहा को गोली क्यों मारी?

कुछ ही देर में प्रदीप मिश्रा एक आटोरिक्शा वाले को बुला लाए. प्रदीप मिश्रा और उन की पत्नी आटो में बैठ गए और बेटी को उन्होंने अपनी गोद में लिटा लिया. वे उसे एम्स के ट्रामा सेंटर के लिए ले कर चल पड़े जबकि प्रिंस तेवतिया ने उन से यह कह दिया कि वह अपनी कार से ट्रामा सेंटर पहुंच रहा है. नेहा के पेट से खून रिस रहा था. खून रोकने के लिए प्रदीप ने उस के घाव पर एक कपड़ा भी रख दिया था ताकि खून रुक सके. पत्नी को आटो में लिटाने के बाद प्रिंस अस्पताल नहीं गया बल्कि वहां से फरार हो गया. उधर प्रदीप मिश्रा घायल बेटी को ले कर ट्रामा सेंटर पहुंचे तो डाक्टरों को यह पुलिस केस लगा. इसलिए अस्पताल प्रशासन ने इस की सूचना ट्रामा सेंटर बिल्डिंग में ही स्थित पुलिस चौकी में दे दी.

चूंकि यह मामला दक्षिणपूर्वी दिल्ली के सनलाइट थानाक्षेत्र का था, इसलिए पुलिस चौकी से सूचना थाने को दे दी गई. थाने में सूचना मिलते ही एसआई शैलेंद्र सिंह कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह को ले कर ट्रामा सेंटर पहुंच गए. वहां डाक्टर नेहा के इलाज में जुटे थे. नेहा मिश्रा की हालत नाजुक बनी हुई थी. वह उस समय बयान देने की स्थिति में नहीं थी. वहां पर उस के पिता प्रदीप मिश्रा मौजूद थे. उन्होंने अपने दामाद द्वारा नेहा को गोली मारने वाली बात पुलिस को बता दी. उन्होंने यह भी बता दिया कि वह गोली मार कर फरार हो गया है. एसआई शैलेंद्र सिंह ने पूरी जानकारी से थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल को अवगत करा दिया.

थानाप्रभारी सब से पहले घटनास्थल पर गए जहां नेहा की छोटी बहन और भाई मिला. जिस कमरे में नेहा को गोली मारी गई थी, उसे उन्होंने बाहर से बंद कर दिया, जिस से वहां कोई भी आजा न सके और उस कमरे का कोई सुबूत नष्ट न हो. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी घटना की सूचना दे कर मौके पर बुला लिया. टीम ने मौके से सुबूत इकट्ठे किए. पुलिस को घटनास्थल से कारतूस के 2 खोखे भी मिले. घटनास्थल की आवश्यक काररवाई निपटाने के बाद थानाप्रभारी एक पुलिसकर्मी को मौके पर छोड़ कर नेहा का बयान लेने के लिए खुद एम्स ट्रामा सेंटर चले गए.

अस्पताल में जो डाक्टर नेहा का इलाज कर रहे थे, उन्होंने थानाप्रभारी को बताया कि गोली नेहा के पेट के निचले हिस्से में लगी है. उस का काफी मात्रा में खून निकल चुका है और अभी भी गोली उस के शरीर में है. हालत में सुधार आने के बाद ही वह बयान दे सकेगी. नेहा के पिता प्रदीप मिश्रा ने थानाप्रभारी को भी बता दिया कि नेहा को गोली उस के पति प्रिंस तेवतिया ने ही मारी थी और वह गोली मार कर फरार हो गया. प्रदीप मिश्रा ने उन्हें प्रिंस का पता भी बता दिया था. थाने लौट कर थानाप्रभारी ने प्रदीप मिश्रा की तरफ से प्रिंस तेवतिया के खिलाफ जान से मारने की नीयत से गोली मारने का केस दर्ज कर लिया. अगली सुबह इलैक्ट्रौनिक मीडिया में मौडल को पति द्वारा गोली मारने की खबर प्रमुखता से प्रसारित हुई तो जिले के पुलिस अधिकारी भी हरकत में आ गए.

डीसीपी मंदीप सिंह रंधावा ने थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल की अध्यक्षता में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में सराय कालेखां चौकी के इंचार्ज ललित कुमार, एसआई शैलेंद्र सिंह, हेडकांस्टेबल विपिन सांगवान, विनोद, गोपाल, कांस्टेबल देवेंद्र, प्रवीण आदि को शामिल किया गया. टीम का निर्देशन न्यू फ्रैंड्स कालोनी के एसीपी अनिल यादव को सौंपा गया. टीम के ऊपर अभियुक्त प्रिंस की गिरफ्तारी का दबाव बढ़ रहा था. पुलिस ने दिल्ली के दक्षिणपुरी की गली नंबर-10 स्थित उस के घर पर दबिश दी. लेकिन वहां पर प्रिंस के बजाय रमेश नाम का व्यक्ति मिला. उस ने बताया कि यह मकान प्रिंस के पिता श्यामलाल तेवतिया ने 5-6 साल पहले उसे बेच दिया था. मकान बेच कर वे कहां चले गए, इस का उसे कुछ पता नहीं.

प्रिंस ने नेहा को यही बताया था कि वह दक्षिणपुरी की गली नंबर-10 के मकान नंबर-217 में रहता है. जबकि उस के पिता उस मकान को कई साल पहले बेच चुके थे. आखिर प्रिंस ने अपनी पत्नी से इतना बड़ा झूठ क्यों बोला था, यह बात पुलिस नहीं समझ पाई. पुलिस के पास प्रिंस तेवतिया का फोटो था ही. उस फोटो के माध्यम से पुलिस ने स्थानीय लोगों से पूछताछ की. इस तफ्तीश में पुलिस को चौंकाने वाली जानकारी मिली. पुलिस को पता चला कि प्रिंस रीयल एस्टेट का कारोबारी और आपराधिक प्रवृत्ति वाला है. उस के खिलाफ दिल्ली के अंबेडकरनगर थाने में कई मुकदमे दर्ज हैं.

साल 2010 में उस ने एक व्यक्ति की चाकू मार कर हत्या कर दी थी. इस की वजह सिर्फ यह थी कि उस की प्रिंस के पिता श्यामलाल से कहासुनी हो गई थी और उस ने श्यामलाल को थप्पड़ मार दिया था. उस थप्पड़ के बदले उसे मौत मिली. हत्या के इस केस में प्रिंस जेल गया. 2014 में जेल से आने के बाद वह आयानगर में रहने वाले बदमाश रोहित चौधरी के संपर्क में आया. फिर उस के साथ ही अपराध करने लगा. रोहित थाना महरौली में एक हत्या के मामले में वांछित है. बाद में प्रिंस बदमाशों के बीच शूटर के नाम से मशहूर हो गया. वह अपने पास अकसर पिस्टल रखता था.

बताया जाता है कि प्रिंस गुस्सैल स्वभाव का है. छोटीछोटी बात पर वह अपना आपा खो बैठता है. बात इसी साल की है. एक बार वह अपनी कार से कहीं जा रहा था. हौर्न बजाने के बावजूद भी एक कार वाले ने उसे साइड नहीं दी तो कुछ देर बाद उस ने ओवरटेक कर के उस कार वाले पर गोली चला दी. इत्तफाक से वह गोली उसे नहीं लगी. इस मामले की रिपोर्ट अंबेडकरनगर थाने में दर्ज करा दी गई थी. पुलिस को पता चला कि प्रिंस तेवतिया का फेसबुक पर भी एकाउंट है. फेसबुक खंगालने पर पुलिस को यह जानकारी मिली कि उस की जितेश नाम के एक शख्स के साथ अच्छी दोस्ती है. जितेश भी आपराधिक प्रवृत्ति का है. जितेश स्नैचिंग और लूटपाट करता था.

बताया जाता है कि अपने केसों की सुनवाई के सिलसिले में जितेश का अकसर साकेत कोर्ट जाना लगा रहता था. वहीं पर एक वकील की शालिनी नाम की असिस्टैंट से जितेश की अच्छी जानपहचान हो गई थी. बाद में दोनों में दोस्ती हो गई. इन की दोस्ती की खबर जितेश की पत्नी को हुई तो उसे बहुत बुरा लगा. उस ने पति को समझाया कि वह शालिनी से न मिले. लेकिन जितेश नहीं माना तो एक दिन वह पति को ले कर शालिनी के घर पहुंच गई और उसे खरीखोटी सुनाते हुए हाथापाई भी की. जब बात बढ़ गई तो जितेश ने हवाई फायर भी किया. जितेश और अन्य के खिलाफ इस मामले की रिपोर्ट थाना अंबेडकरनगर में दर्ज हुई.

इसी जांच की कड़ी में पुलिस को यह भी पता चला कि मार्च, 2015 में प्रिंस ने मालवीय नगर क्षेत्र में किसी को गोली मारी थी. इस घटना के बाद वह अपने दोस्त जितेश के साथ ही कहीं रह रहा था. प्रिंस ने अपना मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ कर रखा था इसलिए यह पता नहीं लग पा रहा था कि वह कहां रह रहा है. किसी तरह पुलिस को जितेश का मोबाइल नंबर मिल गया. उस मोबाइल की लोकेशन से पता चला कि वह रोहिणी सेक्टर-7 में कहीं रह रहा है. पुलिस टीम रोहिणी सेक्टर-7 पहुंच गई. सर्विलांस टीम के सहयोग से जांच करतेकरते पुलिस टीम इस सेक्टर के जी-21/326 फ्लैट पर पहुंच गई. उस फ्लैट में 2 लड़के मिले.

पुलिस के पास केवल प्रिंस का ही फोटोग्राफ था, उसी के आधार पर यह पता लगा कि उन दोनों में से प्रिंस कोई नहीं है. जितेश को वह नहीं जानती थी. उन दोनों लड़कों में से कोई जितेश तो नहीं है, जानने के लिए पुलिस ने उन दोनों से ही सख्ती से पूछताछ की. लेकिन उन में से कोई भी जितेश नहीं निकला. पुलिस ने उन लड़कों को प्रिंस तेवतिया का फोटो दिखाया तो उन्होंने तुरंत कहा कि एक लड़का और लड़की के साथ यह इसी ब्लौक में अकसर दिखाई देता है. उस ने यह भी बताया कि इन के पास एक मारुति रिट्ज कार भी है. यह जानकारी पा कर पुलिस को थोड़ी तसल्ली हुई.

जितेश के फोन की लोकेशन और इन दोनों लड़कों से मिली जानकारी के बाद पुलिस को इतना तो यकीन हो गया था कि प्रिंस सेक्टर-7 के जी ब्लौक में ही कहीं रहता है. उन लड़कों से उस रिट्ज कार का नंबर भी मिल गया, जिस से ये लोग आतेजाते थे. पुलिस सादे कपड़ों में थी. वह उसी ब्लौक में अलगअलग गलियों में खड़े हो कर रिट्ज कार संख्या डीएल3सी 4302 के आने का इंतजार करने लगी. शाम के समय हेडकांस्टेबल विनोद ने उक्त नंबर की कार एक गली में आती हुई देखी तो उस ने फोन द्वारा इस की सूचना दूसरी गली में तैनात थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल को दे दी. हेडकांस्टेबल विनोद ने कार का पीछा किया तो वह कार फ्लैट नंबर जी-20/30 के पास आ कर रुक गई. उस कार से 2 युवक और एक युवती उतर कर फ्लैट में दाखिल हो गए.

कुछ ही देर में पूरी पुलिस टीम उस फ्लैट के पास आ गई. टीम ने उस फ्लैट में दबिश दी तो वहां से 2 युवक और एक युवती मिले.  पूछताछ में उन युवकों ने अपने नाम प्रिंस तेवतिया व जितेश बताए. उन के साथ जो युवती मिली वह जितेश की पत्नी थी. पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया. पूछताछ के लिए पुलिस उन्हें थाने ले आई. यह 20 अप्रैल, 2015 की बात है. चूंकि जितेश और उस की पत्नी थाना अंबेडकरनगर के एक केस में वांछित थे इसलिए उन्हें हिरासत में लेने की सूचना अंबेडकरनगर थाने को दी तो वहां की पुलिस जितेश और उस की पत्नी को कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के अपने साथ ले गई. थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल ने एसीपी अनिल यादव की मौजूदगी में प्रिंस तेवतिया से मौडल नेहा मिश्रा को गोली मारने की बाबत पूछताछ की तो इस घटना के पीछे की एक दिलचस्प कहानी सामने आई.

नेहा मिश्रा दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना सनलाइट कालोनी के हरिनगर में रहने वाले प्रदीप मिश्रा की बड़ी बेटी थी. नेहा के अलावा प्रदीप मिश्रा के एक बेटा और एक बेटी और थी. कैटरिंग का काम करने वाले प्रदीप मिश्रा मूलरूप से उड़ीसा के जिला भद्रक के गांव उलग के रहने वाले थे. काफी दिनों पहले वह काम की तलाश में दिल्ली आए थे. दिल्ली आ कर उन्होंने हलवाई का काम किया. बाद में वह कैटरिंग के धंधे से जुड़ गए. काम जम गया तो वे अपनी पत्नी रोमा को भी दिल्ली ले आए. उन के 3 बच्चे हुए जिन में 2 बेटियां और 1 बेटा था. प्रदीप मिश्रा साधनसंपन्न थे इसलिए वह अपने तीनों बच्चों को एक नामी प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहे थे.

बड़ी बेटी नेहा जितनी खूबसूरत थी, पढ़ाई में भी उतनी ही तेज थी. नेहा के फिगर की उस की सहेलियां बड़ी तारीफ करती थीं. वे उसे दीपिका पादुकोण कह कर बुलाती थीं. अपनी तारीफ पर नेहा भी इतराए बिना नहीं रहती थी. नेहा को फिल्में और टीवी देखने का बहुत शौक था. वह जब भी कोई फिल्म या नाटक देखती तो टीवी या सिल्वर स्क्रीन पर आने की लालसा करती. उस की यह चाहत दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही थी. वह फिल्मों या टीवी धारावाहिकों में काम करने के सपने देखने लगी. मगर उस के लिए यह काम आसान नहीं था. क्योंकि उस के नातेरिश्तेदारों या परिचितों में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था, जिस से उसे अपनी मंजिल पाने में सहयोग मिल सके.

अब उसे एक ही रास्ता दिखाई दे रहा था, वह रास्ता था मौडलिंग का. वह जानती थी कि तमाम हीरोइनें मौडलिंग के जरिए ही बौलीवुड में पहुंच कर अपना मुकाम हासिल कर चुकी हैं. इसलिए 10+2 परीक्षा पास करने के बाद उस ने अपने मन की बात अपने घर वालों को बताई और उन की अनुमति के बाद वह अपनी एक जानकार के साथ दिल्ली की एक मौडलिंग एजेंसी चली गई. नेहा का चेहरा फोटोजेनिक था.  इसलिए फोटोग्राफर ने फोटो शूट के लिए उसे 2 दिन बाद आने को कहा. 2 दिन बाद नेहा फिर से उस स्टूडियो में पहुंची तो फोटोग्राफर ने उस के कई फोटो खींचे. वहां हुए अपने फोटोसेशन के फोटो देख कर नेहा को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था. फोटोग्राफर ने फोटो में उस का जो व्यक्तित्व उभारा था, उसे देख कर वह दंग रह गई.

वह फोटो देख कर नेहा का आत्मविश्वास जागा. उसे लगा कि उस का चेहरा और फिगर कई हीरोइनों से काफी अच्छी और आकर्षक है. दिल्ली में मौडलिंग के दौरान ही उस की मुलाकात अर्पित नाम के एक प्रोड्यूसर से हुई जो मुंबई में काम करता था और दिल्ली आताजाता रहता था. अर्पित का मुंबई में एक स्टूडियो भी था. नेहा का फोटोजेनिक चेहरा देख कर अर्पित बेहद खुश हुआ. उस ने नेहा को अपनी मुंहबोली बहन बनाया. उस ने नेहा से कहा कि तुम जैसी खूबसूरत लड़कियों की जरूरत तो मुंबई में है. कोशिश करने पर वहां तुम्हें कहीं न कहीं काम मिल ही जाएगा. नेहा भी तो यही चाहती थी. उस के कहने पर वह मुंबई चली गई.

मुंबई में अर्पित ने नेहा का पोर्टफोलियो तैयार किया. इस के बाद उस के पोर्टफोलियो तमाम म्यूजिक व ऐड कंपनियों को भेजे. इस का नतीजा यह निकला कि एक ऐड कंपनी में नेहा को काम करने का मौका मिल गया. वह कंपनी सूरत की कई साड़ी कंपनियों के ऐड तैयार करती थी. नेहा को पहली बार किसी व्यावसायिक विज्ञापन में काम करने का मौका मिला था. इसलिए उस ने पूरे मन लगा कर काम किया. इस के बाद उसे एकदो ऐड फिल्में और मिलीं तथा उस ने कई रियलिटी शो में भी भाग लिया. अब नेहा बहुत खुश थी. उसे लग रहा था कि इसी तरह उसे काम मिलता रहा हो सिल्वर स्क्रीन पर चमकने का उस का सपना जल्द ही पूरा हो जाएगा. अर्पित भी उस के लिए बहुत मेहनत कर रहा था. वह उसे एकता कपूर के बालाजी प्रोडक्शन के एक सीरियल में कोई ढंग का रोल दिलाने की कोशिश कर रहा था.

चूंकि अर्पित नेहा का कैरियर बनाने में लगा था इसलिए नेहा उसे अपने सगे भाई से भी ज्यादा महत्त्व देती थी. वह बीचबीच में अपने घर दिल्ली भी आती रहती थी. दिल्ली आ कर वह अपने पुराने दोस्तों से भी मिलती थी. उन के साथ वह खूब हंसीठिठोली करती थी. उसी दौरान अपनी एक दोस्त की मार्फत उस की मुलाकात प्रिंस तेवतिया नाम के युवक से हुई. प्रिंस तेवतिया के पिता मूलरूप से उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के निलोखेड़ा गांव के रहने वाले थे. वह दिल्ली विकास प्राधिकरण में नौकरी करते थे. प्रिंस के अलावा उन के एक बेटा और एक बेटी थी. 23 साल का प्रिंस भी हैंडसम था. वह प्रौपर्टी खरीदने व बेचने का धंधा करता था. इस धंधे में उसे अच्छीखासी कमाई हो जाती थी, जिस से वह बनठन कर रहता था.

इस के अलावा वह आपराधिक प्रवृत्ति का भी था. उस के ऊपर हत्या, हत्या का प्रयास, मारपीट आदि के कई मुकदमे चल रहे थे. गुस्सैल स्वभाव का प्रिंस अकसर अपने साथ रिवाल्वर रखता था. छोटी सी बात पर ही वह गोली चला देता था. इसलिए वह अपने दोस्तों के बीच शूटर के नाम से जाना जाता था. नेहा प्रिंस से मिल कर बहुत प्रभावित हुई. पहली मुलाकात में ही दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर दे दिए थे. जब भी उन्हें मौका मिलता वे फोन पर बातें करते थे. बातों ही बातों में उन की दोस्ती और गहरी होती गई. नेहा जब भी मुंबई से आती, प्रिंस के साथ कार से सैरसपाटे करती थी. इसी दौरान वे एकदूसरे के बेहद करीब पहुंच गए. वे एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे.

प्रिंस की तरफ प्यार के कदम बढ़ाने से पहले नेहा उस के बैकग्राउंड के बारे में कुछ नहीं जानती थी. उस की नजरों में तो प्रिंस एक शरीफ व होनहार युवक था. तभी तो उस ने अपना दिल उस के हवाले कर दिया था. उसे लगा कि प्रिंस के साथ उस की लाइफ हंसीखुशी से कटेगी इसलिए उस ने अपने मीत को प्रियतम बनाने का फैसला कर लिया. प्रिंस भी उसे दिलोजान से चाहता था. कुछ दिनों तक उन के प्यार की गाड़ी ऐसे ही चलती रही. दोनों ही शादी करना चाहते थे इसलिए उन्होंने एक मंदिर में शादी कर ली. यह बात 5-6 महीने पहले की है. नेहा ने इस शादी की खबर अपने घर वालों तक को नहीं दी थी.

चूंकि वह मौडलिंग के पेशे से जुड़ी थी इसलिए उस ने प्रिंस से कह दिया था कि वह शादी वाली बात प्रचारित न करे ताकि उस के प्रोफेशन पर कोई फर्क न पड़े. पत्नी की बात को ध्यान में रखते हुए प्रिंस ने शादी की बात अपने घर वालों के अलावा किसी को नहीं बताई. नेहा का लक्ष्य हिंदी फिल्मों में एंट्री पाना था, इसलिए वह शादी के बाद अकसर मुंबई में ही रहती थी. उस का जल्दीजल्दी दिल्ली आना संभव नहीं था. प्रिंस के सामने अब एक ही रास्ता बचा था कि वह खुद भी मुंबई जाए. लेकिन उस के लिए ऐसा संभव नहीं था क्योंकि दिल्ली में उस का कारोबार जमाजमाया था. पत्नी के मुंबई रहने पर वह उस से मिलने के लिए बेचैन रहता था.

करीब 3 महीने पहले नेहा की तबीयत खराब हो गई तो वह अपने पिता के यहां दिल्ली आ गई थी. उसी दौरान उस ने अपनी मां को बता दिया था कि उस ने दिल्ली के प्रिंस तेवतिया से शादी कर ली है. यह सुन कर रोमा चौंक गईं. उन्होंने बात पति को बताई तो उन्हें भी आघात पहुंचा. जवान बेटी पर नाराज होने के बजाय उन्होंने उस से इतना जरूर कहा कि शादी से पहले कम से कम वह प्रिंस के बारे में उन्हें बता तो देती. जांचनेपरखने के बाद वह फिर सामाजिक रीतिरिवाज से शादी कर देते. नेहा मुंह लटकाए ऐसे ही बैठी रही, वह कुछ नहीं बोली.

खैर, जो होना था हो चुका था. इस में अब वह कुछ नहीं कर सकते थे. इस के बाद प्रिंस ने भी उनके यहां आना शुरू कर दिया. प्रिंस नहीं चाहता था कि नेहा मौडलिंग करे इसलिए वह बारबार मुंबई से दिल्ली लौटने के लिए कहता था. वह चाहता था कि नेहा उस के घर पर ही रहे लेकिन अपने कैरियर को ध्यान में रखते हुए नेहा ऐसा करने को तैयार नहीं थी. एक दिन नेहा ने प्रिंस के फोन की मेमोरी खंगाली तो उस में अनेक मैसेज ऐसे मिले जो लड़कियों या महिलाओं द्वारा भेजे गए थे. इस बारे में नेहा ने प्रिंस से पूछा तो उस ने बताया कि वह उस की दोस्त हैं. लेकिन नेहा को शक हो गया कि प्रिंस के उन के साथ जरूर ही दूसरी तरह के रिश्ते होंगे. यानी नेहा के दिमाग में शक के कीड़े ने जन्म ले लिया. प्रिंस ने लाख सफाई दी लेकिन नेहा कहां मानने वाली थी.

प्रिंस 16 अप्रैल, 2015 को भी हरिनगर में स्थित नेहा के घर गया. 2 दिन वह वहीं रहा. 17-18 अप्रैल की रात को उस ने नेहा के कमरे में शराब पी. फिर खाना खाने के बाद वह सोने के लिए नेहा के कमरे में चला गया. घर के बाकी लोग दूसरे कमरे में सो गए. आधी रात तक नेहा और प्रिंस बातें करते रहे. उसी दौरान प्रिंस ने नेहा से कहा, ‘‘नेहा, मैं तुम से कई बार कह चुका हूं कि तुम मौडलिंग छोड़ दो. लेकिन तुम मेरी बात मान ही नहीं रही.’’

‘‘देखो प्रिंस, मैं बौलीवुड में एंट्री करने के लिए स्ट्रगल कर रही हूं. मुझे मुंबई में जम जाने दो, फिर तुम भी वहीं रहना.’’ नेहा बोली.

‘‘नहीं, मुझे यह सब पसंद नहीं है. मुझे मालूम है कि फिल्मों में काम करने की ख्वाहिश लिए कितनी लड़कियां मुंबई जाती हैं और उन्हें वहां क्याक्या करना पड़ता है. फिल्मों में काम मिलना इतना आसान नहीं होता, जितना तुम समझ रही हो. मेरा काम ठीकठाक चल रहा है इसलिए तुम यह सब छोड़ कर मेरे घर चलो. मैं तुम्हें किसी तरह की परेशानी नहीं होने दूंगा.’’ प्रिंस ने समझाया. लेकिन नेहा पर तो दूसरी तरह का भूत सवार था. इसलिए उस ने साफ कह दिया कि वह मौडलिंग हरगिज नहीं छोड़ेगी. दोनों के बीच बात बढ़ी तो नेहा ने कह दिया, ‘‘मेरे मुंबई में रहने पर तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि तुम्हारे कई लड़कियों से संबंध हैं.’’

‘‘जिस तरह तुम मेरे लिए कह रही हो उसी तरह तुम्हारे भी कई बौयफ्रैंड हैं. तुम भी उन के साथ मटरगश्ती करती होगी इसलिए मुंबई नहीं छोड़ना चाहती.’’ प्रिंस ने भी आरोप लगाया.

‘‘तुम्हें इस तरह की फालतू बकवास करते हुए शर्म नहीं आती. मैं इस तरह की लड़की नहीं हूं जैसा तुम सोच रहे हो.’’ नेहा ने उसे झिड़का.

‘‘अब तुम यह बताओ कि तुम मेरे घर चलोगी या नहीं.’’ पिं्रस ने गुस्से में पूछा तो नेहा ने भी गुस्से में कह दिया, ‘‘नहीं, मैं अभी न तो मौडलिंग छोड़ूंगी और न ही तुम्हारे घर जाऊंगी.’’

प्रिंस गुस्से में तमतमाया हुआ था. उस ने पैंट से पिस्तौल निकाला और नेहा पर गोली चला दी. गोली नेहा के पेट के निचले हिस्से में लगी. उस ने उस पर दूसरी गोली चलानी चाही तभी नेहा ने हिम्मत कर के उस की पिस्तौल छीनने की कोशिश की. उसी दौरान ट्रिगर दब गया और गोली छत पर जा लगी. कुछ ही पल में नेहा के पेट से खून बहने लगा. उस की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा और वह बेड पर गिर कर बेहोश हो गई. उधर गोली की आवाज सुन कर दूसरे कमरे में सो रहे प्रदीप मिश्रा की नींद टूट गई. उन्होंने पत्नी रोमा को जगाया. चूंकि गोली की आवाज नेहा के कमरे की ओर से आई थी, इसलिए वह उस के कमरे की तरफ भागे.

उधर प्रिंस ने गुस्से में अपनी पत्नी को गोली मार तो दी, लेकिन उस की हालत देख कर वह घबरा गया था. उस ने जल्दी से दरवाजा खोला तो सामने खड़े अपने सासससुर को नेहा को गोली मारने वाली बात बता दी. यह बात सुन कर प्रदीप मिश्रा और उन की पत्नी तेज कदमों से बेटी के कमरे में गए तो बिस्तर पर लहूलुहान पड़ी बेटी को देख कर वे घबरा गए. तभी प्रदीप मिश्रा दौड़ेदौड़े आटो बुलाने के लिए निकल पड़े तो प्रिंस बांहों में नेहा को उठा कर चौथी मंजिल से नीचे ले गया. जैसे ही प्रदीप आटो लाए, उस ने नेहा को आटो में लिटा दिया और खुद वहां से फरार हो गया.

प्रिंस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के खिलाफ भादंवि की धारा 307 और 25, 27, 54, 59 आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर के 21 अप्रैल, 2015 को साकेत कोर्ट में पेश कर एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उस की निशानदेही पर वारदात में प्रयुक्त पिस्तौल और एक जीवित कारतूस बरामद किया. इस के बाद उसे 22 अप्रैल को महानगर दंडाधिकारी अशोक कुमार की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. उधर एम्स ट्रामा सेंटर में भरती नेहा की हालत सीरियस बनी हुई थी. डा. कुट्टी शारदा विनोद की टीम ने 20 अप्रैल को उस का औपरेशन कर पेट से गोली निकाली. इस के बाद धीरेधीरे उस की हालत में सुधार होता गया तो 28 अप्रैल, 2015 को उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर घर भेज दिया.

इस हादसे के बाद नेहा मिश्रा बेहद डरीसहमी हुई है. जिस प्रिंस को उस ने अपना सब कुछ मान लिया था, उस से उसे ऐसा दर्द मिलने की उम्मीद नहीं थी. पुलिस द्वारा जब नेहा को प्रिंस की आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी मिली तो वह चौंक गई. अब नेहा को अपने फैसले पर पछतावा हो रहा है. मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल कर रहे हैं. True Crime Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों व नेहा के बयान पर आधारित. कथा में शालिनी व अर्पित परिवर्तित नाम हैं.

 

Hindi Stories: बांदी से बेगम

Hindi Stories: अवध के नवाब नसीरूद्दीन हैदर अय्याश तो थे ही, तोताचश्म भी थे. उन की रंगीन नजरें बांदियों से बेगमों तक फिसलती रहती थीं…

अवध के दूसरे नवाब नसीरूद्दीन हैदर जितने अय्याश और आशिकमिजाज थे,उतने ही तोताचश्म भी थे. वह कब किस से निगाहें फेर लें और कब किस को सिर पर बैठा लें, किसी को नहीं मालूम. उन की इसी फितरत ने जहां सैकड़ों मामूली औरतों को शाही हरम में पहुंचा दिया था, वही उन की निगाह पलटते ही कितनी ही बेगमें कनीजों से भी बदतर जिंदगी जीने या फिर मौत से दामन जोड़ने को मजबूर हो गई थीं. हजारों बेगमें होने के बावजूद नसीरूद्दीन बेऔलाद थे. उन दिनों नवाब के दिलोदिमाग पर बेगम मलिका जमानी की हुकूमत थी.

 

नसीरूद्दीन ने मलिका जमानी के नाम अवध के बैसवारा परगना की जागीर लिख दी थी. इस जागीर की सालाना आमदनी 6 लाख रुपए थी. मलिका जमानी नसीरूद्दीन हैदर के दिल पर इस कदर छा गई थी कि उस के इशरों पर दरबार के दस्तूर करवटें बदलते थे. हर रात नवाब मलिका जमानी के महल में ही गुजारा करते थे. यही कारण था कि अवध की सब बेगमों पर मलिका जमानी का दबदबा था. एक रात जब नवाब उस की ड्योढ़ी में दाखिल हुए तो वह कुछ परेशान थे. उन के हाथों में 50 लाख रुपए का एक रुक्का था. मलिका जमानी ने बड़ी अदा से उन की परेशानी का सबब जानना चाहा, ‘‘हुजूरेआलम की तबीयत कुछ नासाज नजर आती है. क्या हम वजह जान सकते हैं?’’

‘‘कोई खास वजह नहीं बेगम, बस यूं ही…’’ नसीरूद्दीन ने कहा.

‘‘खास न सही, मामूली ही सही. लेकिन जरा मैं भी तो जानूं, हुजूर की परेशानी की वजह…’’

‘‘हमारे दिमाग पर इस दौलत का बोझ है.’’ अपने हाथ में मौजूद 50 लाख रुपए के रुक्के की ओर आंख से इशरा करते हुए नसीरूद्दीन ने कहा.

‘‘साहबेआलम, आप के हर बोझ को अपनी जिंदगी पर उतार लेना बंदी का फर्ज है.’’ यह कहते हुए मलिका जमानी ने नसीरूद्दीन के हाथ से ले कर उस रुक्के को अपनी चोली के भीतर रख लिया. नवाब आराम से मसनद के सहारे बिस्तर पर अधलेटे हो कर मलिका के हुस्न से खेलने लगे.

थोड़ी देर बाद उन्हें प्यास लगी. मलिका जमानी ने फौरन अपनी खास बांदी बिसमिल्ला खानम को पानी पेश करने का हुक्म दिया. बिसमिल्ला खानम ने सिर पर पड़े दुपट्टे को दुरुस्त करते हुए पानी भरे चांदी के गिलास को सोने की तश्तरी में रखा, फिर बड़े ही अदब से उसे नवाब के आगे पेश किया. नवाब ने पानी का गिलास उठाने के लिए ज्यों ही हाथ बढ़ाया, उन की नजर बिसमिल्ला खानम के रुखसार पर जम कर रह गई. हलके घूंघट में वह बेहद हसीन नजर आ रही थी. नसीरूद्दीन एकटक उसे निहारे जा रहे थे. बेगम जमानी को यह बेहद नागवार गुजर रहा था.

‘‘सुबहान अल्लाह.’’ नसीरूद्दीन ने बिसमिल्ला खानम के बेपनाह हुस्न की तारीफ करते हुए कहा. उन्हें तफरीह सूझी. उन्होंने गिलास उठाया और पानी पीने के बजाय बिसमिल्ला खानम के सिर पर उड़ेल दिया. बादशाह की इस हरकत पर एक पल तो बिसमिल्ला खानम शरमा कर रह गई, लेकिन फिर मजाक का जवाब मजाक से देने के लिए खुद को तैयार कर लिया. जो थोड़ासा पानी गिलास से तश्तरी में छलक गया था, बिसमिल्ला खानम ने फुर्ती से उसे बादशाह की पोशाक पर छिड़क दिया.

उस की इस बेहूदी हरकत से बेगम मलिका जमानी और नसीरूद्दीन, दोनो की त्यौरियां चढ़ गईं. बिसमिल्ला खानम की इस बेबाकी से नसीरूद्दीन अवाक रह गए थे. बेगम जमानी बिसमिल्ला खानम से कुछ कहतीं, इस से पहले ही वह बोल उठे, ‘‘इस तरफ पानी फेंकने की तुम ने जुर्रत कैसे की?’’

‘‘हुजूरेआलम, बांदी खता की माफी चाहती है. वैसे अगर हुजूर गुस्ताखी माफ करें तो एक बात अर्ज करूं?’’ बिसमिल्ला खानम ने अपनी घबराहट पर काबू पाते हुए शालीनता से कहा.

‘‘इजाजत है.’’ न जाने क्या सोच कर नसीरूद्दीन ने बिसमिल्ला खानम को अपनी बात कहने का मौका दे दिया.

‘‘हुजूर, जब बच्चे आपस में चुहल करते हैं तो छोटाईबड़ाई का कुछ खयाल नहीं करते… और न ही बुरा मानते हैं.’’ बिसमिल्ला खानम ने यह बात कुछ इस अदा से कही कि नसीरूद्दीन की चढ़ी हुई त्यौरियां उतर गईं. इस बेबाकी से वह इतने खुश हुए कि उन्होंने अपने गले का बेशकीमती हार उतारा और अपने हाथों से बिसमिल्ला खानम के गले में पहना दिया.

दूसरी ओर बेगम जमानी को यह सब कतई बरदाश्त नहीं हो रहा था. लेकिन नवाब की मरजी के खिलाफ कुछ कहना भी उस के बस की बात नहीं थी. बात इस हद तक बढ़ जाने की उसे कतई उम्मीद नहीं थी. उस ने इस रफ्तार को वहीं रोक देना मुनासिब समझा. बिसमिल्ला खानम को बाहर जाने का इशारा कर के वह नवाब को इधरउधर की बातों में उलझाने लगी. लेकिन उस दिन नवाब के दिल को मलिका जमानी की कोई भी बात, कोई भी अदा बहला न सकी. रंगीनमिजाज नवाब का दिल तो बिसमिल्ला खानम ले उड़ी थी. यह बात बेगम जमानी से छिपी न रही. नतीजतन उस दिन नवाब के जाने के बाद बिसमिल्ला खानम की अच्छी तरह खबर ली गई. बेगम जमानी की ओर से उसे सख्त हिदायत दी गई कि आइंदा वह नवाब को अपनी शक्ल न दिखाए.

अगले दिन जब नवाब मलिका जमानी की ड्योढ़ी में आए तो उन की निगाहें बिसमिल्ला खानम को ही तलाश रही थीं. उन्होंने फिर पानी पीने की ख्वाहिश जाहिर की. लेकिन आज उन्हें पानी पेश करने वाली बांदी बिसमिल्ला खानम नहीं, कोई और थी. यह देख कर बादशाह बेचैन हो उठे. उन्हें अपने होंठों की नहीं, बल्कि अपनी निगाहों की प्यास बुझानी थी, जो सिर्फ बिसमिल्ला खानम के सामने आने से ही बुझ सकती थी.

‘‘खानम कहां है?’’ अपनी बेताबी दूर करने के लिए नवाब ने मलिका जमानी से जवाब तलब किया.

‘‘आज वह छुट्टी पर है हुजूर.’’ मलिका जमानी ने जब नपातुला जवाब दिया तो नवाब को उस की करतूत समझते देर नहीं लगी. उन्हें इस बात का अहसास हो चला कि बेगम जमानी ने जानबूझ कर बिसमिल्ला खानम को उन की नजरों तले पड़ने से रोका है. फिर अगले दिन अवध के दरबार में उस वक्त हंगामा बरपा हो गया, जब मुंतिजिमउद्दौला ने नवाब को खबर दी कि मलिका जमानी ने उन की नजरों से बचाने के लिए बिसमिल्ला खानम को 7 तालों में कैद करवा रखा था. यह खबर सुनते ही नवाब आगबबूला हो उठे. उन का गुस्सा मलिका जमानी की मौत भी बन सकता था, लेकिन वजीर ने उन्हें शांत रहने की सलाह दी. दरअसल वजीर मन ही मन बेगम जमानी से रंजिश रखते थे.

वजीर मुंतिजिमउद्दौला ने कुछ ऐसी चालें चलीं कि बिसमिल्ला खानम का शौहर मीर हैदर शाही मुजरिम करार दे दिया गया. गिरफ्तारी के डर से बेचारा मीर हैदर अपनी बीवी बिसमिल्ला खानम को तलाक दे कर कानपुर भाग गया. यह वजीर मुंतिजिमउद्दौला की योजना की पहली कड़ी थी, जिस में उन्हें सफलता मिल गई थी. अब उन्होंने बिसमिल्ला खानम के घर के हालात पर गौर करना शुरू किया. उन्हें मलिका जमानी से शाही बागडोर छीनने के लिए यह मोहरा ठीक जंचा. बिसमिल्ला खानम अपने पिता की संतानों में सब से बड़ी थी. उस की एक छोटी बहन थी नाजुक अदा, जिस का निकाह नवाब दूल्हा नामक एक सौदागर के साथ हुआ था.

हसीन बिसमिल्ला खानम का निकाह मीर हैदर नामक एक सितारबंद के साथ हुआ था. मीर हैदर से बिसमिल्ला खानम को 2 औलादें हुईं, जिन में से एक बचपन में ही खुद को प्यारी हो गई. दूसरी औलाद बिसमिल्ला खानम को जान से भी ज्यादा प्यारी थी और वह था बेटा मीरन. लेकिन उस के शौहर को न तो उस से कोई खास लगाव था और न अपने बेटे मीरन से. पेशे से सितारबंद होने के कारण मीर हैदर का उठनाबैठना तवायफों के बीच रहा करता था. नाचनेवालियों के साथ साजदारी करतेकरते उस का दिमाग बदल गया था. दिलरुबा नामक एक तवायफ का वह इस कदर दीवाना हो गया था कि बिसमिल्ला खानम की उसे जरा भी परवाह नहीं रही.

बिसमिल्ला खानम का अंजाम भी वही हुआ, जो किसी औरत के शौहर का किसी तवायफ के चंगुल में पड़ने के बाद होता है. वह कौड़ीकौड़ी को मोहताज रहने लगी. उसे अपने से ज्यादा अपने बेटे मीरन की परवरिश की चिंता थी. एक दिन बिसमिल्ला खानम ने जब अपनी पड़ोसिन के आगे अपना दुखड़ा रोया तो उस ने बिसमिल्ला खानम को दिलासा दी कि वह उसे नवाब की किसी बेगम की ड्योढ़ी में नौकरी दिलवा देगी. बिसमिल्ला खानम खूबसूरत तो थी ही. अत: उस पड़ोसिन की मदद से उसे बेगम बादशाह महल की ड्योढ़ी में कनीज की नौकरी मिल गई. यह उस वक्त की बात है, जब बादशाह नसीरूद्दीन के अक्लोहोश पर बेगम मलिका जमानी की हुकूमत थी.

बिसमिल्ला खानम हर काम को एक खास सलीके से करना जानती थी. उसे तहजीब और सलीके की पुतली कहा जाने लगा. उस की तहजीब का जिक्र जब बेगम जमानी ने सुना तो नसीरूद्दीन हैदर से कह कर बिसमिल्ला खानम को अपनी ड्योढ़ी में नियुक्त करवा लिया. फिर वहीं एक दिन नसीरूद्दीन की नजर उस पर पड़ गई थी. बिसमिल्ला खानम के घरेलू हालात को जानने के बाद वजीर को यकीन हो गया कि अगर वह बिसमिल्ला खानम का निकाह नवाब के साथ पढ़वा दें, तो वह उस के एहसान तले दब कर उन की मुट्ठी में रहेगी. इस निकाह में कोई खास दिक्कत भी नहीं थी. बिसमिल्ला खानम का शौहर तो पहले ही उसे तलाक दे कर लखनऊ छोड़ गया था और नवाब भी बिसमिल्ला खानम के हुस्न पर लट्टू थे. बस, नवाब को थोड़ीसी हवा देने की जरूरत थी.

इसलिए मुंतिजिमउद्दौला ने मलिका के खिलाफ नवाब के कान भरने शुरू कर दिए. फिर एक दिन नवाब को खुश देख कर उन से कहा, ‘‘हुजूर, आप के दिल का हाल मुझ पर रोशन है. खुदा की कसम, झूठ बोलूं तो मुझ पर कहर बरसे… बिसमिल्ला खानम बांदी बनने के काबिल नहीं. उसे तो आप के पहलू में होना चाहिए.’’

‘‘तुम ठीक कहते हो.’’ नसीरूद्दीन ने कहा. वह तो पहले ही बिसमिल्ला खानम को पाने के लिए बेचैन थे. उन की बेकरारी ने बिसमिल्ला खानम के तलाक की इद्दत (तलाक के बाद 3 महीने की मियाद, जिस के पूरा न होने तक दूसरा निकाह नहीं किया जा सकता) खत्म होने का भी इंतजार नहीं किया. वह 16 दिसंबर, 1831 की तारीख थी, जब बिसमिल्ला खानम ने नवाब की बेगम बन कर महलसरा में कदम रखा. बिसमिल्ला खानम को पा कर नसीरूद्दीन इतना खुश हुए कि उन्होंने उसे ‘मलका आफाक कुदसिया सुलतान मरियम बानो बेगम साहिबा’ का खिताब अता किया. बिसमिल्ला खानम, जो कल तक मामूली बांदी थी, अब बेगम कुदसिया महल बन गई.

उस की नजाकत, नफासत और हुस्न ने नवाब पर ऐसा जादू किया कि वह हर वक्त उसी से दामन जोड़े बैठे रहते थे. उन पर उस का ऐसा रंग चढ़ा कि पिछली सारी बेगमों के रंग फीके पड़ गए. यहां तक कि अवध की सल्तनत के बंदोबस्त में भी कुदसिया महल का दखल होने लगा. उस के इस रुतबे ने उस के और बेगम जमानी के बीच दुश्मनी पैदा कर दी. कल तक जो नवाब की आंखों का तारा थी, आज वह अपनी ही एक मामूली बांदी की वजह से नवाब की नजरों से गिर गई थी. उस के लिए इस से बढ़ कर तौहीन की और क्या बात हो सकती थी? लिहाजा बेगम जमानी ने कुदसिया महल उर्फ बिसमिल्ला खानम से बदला लेने का मन बना लिया. लेकिन कुदसिया महल के दिल में बेगम जमानी के लिए कोई मैल नहीं था.

नसीरूद्दीन की मेहरबानी से कुदसिया महल को 50 हजार रुपए माहवार बतौर खर्च मिलने लगा. इस के अलावा मौरावां, गोसाईगंज, बिजनौर, कांठ, ससेंडी, परसेंडी और काकोरी आदि आसपास के परगने उसे जागीर में मिले थे. बेगम कुदसिया महल नवाब के दिल की धड़कन बन गई. वह हर तरह से नवाब का खयाल रखती थी. उसे अच्छी तरह मालूम था कि नवाब को बड़ी बेताबी से औलाद की तमन्ना है. इस के लिए कुदसिया महल ने लाख जतन किए और फिर एक दिन वह गर्भवती हो भी गई. बेगम कुदसिया महल के पांव भारी हुए हैं, यह खबर सुनते ही नवाब खुशी से झूम उठे. उन की जिस तमन्ना को शाही हरम की कोई बेगम पूरा न कर सकी थीं, उसे कुदसिया महल ने पूरी कर दिखाया था. कुदसिया महल के गर्भवती होने की खबर मामूली नहीं थी. यह खबर जब शाही हरम तक पहुंची तो हजारों बेगमों के सीने में सांप लोट गए.

बेगम मलिका जमानी को सब से ज्यादा रंज हुआ. उस ने जादूटोने और तरहतरह की तरकीबों से बेगम कुदसिया महल का गर्भपात करवा दिया. इन तरकीबों में एक प्यारी नामक महलदारिनी का भी हाथ था. जब इस घटना की जानकारी नवाब को हुई तो उन्होंने तुरंत महलदारिनी प्यारी को अपने सामने पेश करने का हुक्म दिया. फिर प्यारी के सामने आते ही नवाब ने अपनी तलवार निकाल कर एक ही झटके में उस का सिर धड़ से अलग कर डाला. इस घटना के बाद नवाब कुदसिया बेगम को उस के महल ‘दर्शन विलास’ से हटा कर अपने साथ दिलकुशा कोठी में ले गए. दिलकुशा कोठी में आए अभी एक माह ही गुजरा था कि कुदसिया महल पुन: गर्भवती हो गई. इस बार वह पूरी तरह से सजग थी. अपने गर्भ की सलामती के लिए उस ने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी. लेकिन उसे क्या खबर थी कि इस बार उस के दुश्मन क्या सियासत खेलेंगे.

बेगम कुदसिया महल के दूसरी बार गर्भवती होते ही मलिका जमानी ने भयंकर साजिश रची. उस ने नवाब की एक मुंहलगी कनीज को अपनी साजिश में शरीक कर लिया. एक दिन नवाब को अकेला पा कर उस कनीज ने अपनी जान की सलामती मांगते हुए नसीरूद्दीन के आगे कुछ इस तरह अपनी बात कहनी शुरू की, ‘‘आलीजाह, कैसे कहूं, कुछ कहते नहीं बनता…’’

‘‘क्यों, ऐसी कौनसी बात है, जिसे कहने में तुम्हें इतनी हिचक है? हमारा हुक्म है, जो कहना चाहती हो, साफसाफ कह डालो.’’ नसीरूद्दीन बोले.

‘‘जहांपनाह, खुदा झूठ न बुलवाए तो यह होने वाली औलाद आप की नहीं है.’’

‘‘खामोश,’’ नसीरूद्दीन दहाड़ उठे, ‘‘जानती हो, तुम क्या कह रही हो?’’

‘‘मैं सच कह रही हूं हुजूर. अगर आप को मेरी बात पर यकीन न हो तो आप नूरन दाई को बुलवा लीजिए. खुदा कसम वह सब जानती है.’’ कनीज ने हाथ जोड़ते हुए इस अंदाज से कहा कि नसीरूद्दीन को उस की बात पर यकीन आने लगा.

नसीरूद्दीन ने पहले तो नूरन दाई को बुलवा कर सच्चाई जानने का इरादा किया. लेकिन ऐसा करने से बात फैलने और बदनामी का डर था. इसलिए उन्होंने इरादा बदल दिया. इस खबर ने उन्हें बुरी तरह तोड़ कर रख दिया. वह सोचने लगे कि अगर कुदसिया महल की कोख में मेरी औलाद नहीं है तो फिर किस की है? अपने इस सवाल का जवाब पाने के लिए उन्होंने उसी कनीज से पूछा, ‘‘तो फिर बेगम कुदसिया महल की कोख में किस की औलाद पल रही है?’’

‘‘हुजूर, यह उसी शख्स की करतूत है, जो पहले कभी बेगम साहिबा (कुदसिया महल) का शौहर हुआ करता था. तब बेगम फकत बिसमिल्ला खानम हुआ करती थीं.’’ उस कनीज ने भेदभरे अंदाज में बताया.

अब उस कनीज की बातों पर नवाब को पूरी तरह यकीन आ गया. वह आपे से बाहर हो चले. उधर इन सारी बातों से बेखबर बेगम कुदसिया महल अपनी होने वाली औलाद को ले कर सुनहरे ख्वाबों में डूबी थी. उसे नवाब की नाराजगी की खबर अगले दिन सुबह तब हुई, जब पिछली रात नवाब के इंतजार में ही गुजर गई और वह नहीं आए. नसीरूद्दीन की नाराजगी के इस आलम कुदसिया बेगम ने अकेले में उन से मुलाकात करनी चाही तो नसीरूद्दीन ने लिख कर भिजवा दिया, ‘‘अब मुझे तुम से कोई सरोकार नहीं और न ही मुझे इस मामले में कोई सफाई सुननी है.’’

नवाब की इस बेरुखी से कुदसिया बेगम के दिल पर बिजलियां टूट पड़ीं. उसे लगा कि उसे उस की वफादारी की सजा दी जा रही है. नवाब ने उस की ओर से निगाहें फेर लीं, इस अहसास ने कुदसिया महल को भीतर ही भीतर तोड़ कर रख दिया. इसी बेजारी के आलम में उस ने नसीरूद्दीन को कहला भेजा, ‘‘हुजूर ने जो मेरी वफा पर शक किया है, उस में आप का कसूर नहीं. दरअसल दुश्मनों की तरकीबें काम कर गई हैं, जो हमारी खराबी चाहते हैं. हुजूर की तबीयत मुझ से भर गई है और हुजूर ने मुझे अपनी नजरों से गिरा दिया है, यह जान गई हूं. लेकिन आप इतना जान लें, हमेशा से मेरा यही इरादा रहा है कि जिस दिन खुद को आप की निगाह से गिरी समझूंगी, उस दिन से मेरे लिए जिंदगी बेमानी हो जाएगी.’’

नसीरूद्दीन ने उस खत को पढ़ कर नफरत से जवाब दिया, ‘‘कहते सब हैं, मगर साबित करते किसी को नहीं देखा.’’

कुदसिया महल को नवाब से ऐसे जवाब की कतई उम्मीद नहीं थी. वह बेतरह बेजार हो उठी. उस ने अपनी वफा को साबित करने का मन बना लिया. अब नवाब से कुछ कहनेसुनने की गुंजाइश बाकी नहीं बची थी. कुछ सोच कर वह बादशाह बाग वाली अपनी कोठी पर जा पहुंची. वहां उस ने एक कनीज को अपने बेटे मीरन को बुलवाने भेज दिया. इस के बाद वह खुद नहाने के लिए गुसलखाने में चली गई. कोई और दिन होता तो उसे नहलाने के लिए दर्जनों कनीज उस के साथ जातीं. लेकिन आज उस ने सब को मना कर दिया. आज वह सब कुछ अकेले ही करना चाहती थी. थोड़ी देर बाद उस का बेटा मीरन भी आ गया.

वह गुसलखाने से बाहर निकली. उस ने बड़े प्यार से अपने बेटे को अपने करीब बुलाया और उसे गले लगा कर रोने लगी. बेगम कुदसिया के मुंह से कोई बोल नहीं फूट रहा था. बेटे को जी भर के प्यार करने के बाद उस ने अपने सारे जेवरात और बेशुमार दौलत नौकरों और कनीजों में तक्सीम कर दी. फिर उस ने एक कनीज से शिकंजी लाने को कहा. थोड़ी ही देर में कनीज शिकंजी का गिलास ले कर उस के सामने पेश हुई. उस ने गिलास एक हाथ में पकड़ा और फिर दूसरे हाथ से अपनी चोली से कोई चीज निकाली और फिर फुर्ती से उसे गिलास में डाल कर एक ही सांस में गिलास खाली कर दिया.

अब मौत धीरेधीरे उस की दामनगीर हो रही थी. कुदसिया बेगम ने शिकंजी में संखिया मिला कर पी लिया था. जहर ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. उस का जिस्म नीला पड़ने लगा. आंखें रहरह कर भिच रही थीं. देखते ही देखते महल में हड़कंप मच गया. जब यह खबर नवाब तक पहुंची तो दरबार में तूफान उठ खड़ा हुआ. नसीरूद्दीन को इस बात का जरा भी गुमान नहीं था कि कुदसिया बेगम अपनी बात सच कर दिखाएगी. वह घबराए हुए उस महल में जा पहुंचे, जहां बेगम कुदसिया जिंदगी और मौत के बीच आंख-मिचौली खेल रही थी.

नवाब को तशरीफ लाए देख, डूबती जान कुदसिया बेगम ने लड़खड़ाती जुबान से बस इतना ही कहा, ‘‘साहबेआलम, मेरी आप से पहली शर्त यही थी कि मुझे शक की निगाह से कभी नहीं देखेंगे. लेकिन इस शर्त को हुजूर ने तोड़ दिया. हुजूर, बांदी ने आप से पहले ही अर्ज किया था कि आप की नजरेइनायत खत्म होते ही यह खाकसार हस्ती मिट जाएगी. मुझे ज्यों ही मालूम हुआ कि हुजूर की खुशी इसी में है, मैं ने अपना कहा सच कर दिखाया.’’ इतना कहतेकहते कुदसिया बेगम के गले से आवाज निकलनी बंद हो गई. उस के होठ सिर्फ खुलतेबंद होते रहे, जैसे उस के शिकवे अभी खत्म न हुए हों.

बेगम की हालत देख कर नसीरूद्दीन हैदर दीवाने हो उठे. वह पागलों की तरह अपना सिर धुनने लगे. उन्हें खास अफसोस इस बात का था कि कुदसिया बेगम बावफा थी और उन का असली वारिस इस वक्त भी उस की कोख में था. बेगम के खत्म होने के साथ ही उस की कोख और नसीरूद्दीन की औलाद का नष्ट होना लाजिमी था. देखते ही देखते शहर के तमाम नामी हकीम वहां जुट गए. बेगम कुदसिया महल को बचाने की जीतोड़ हिकमत की गई. लेकिन कोई कोशिश कामयाब न हो सकी. केवल 24 वर्ष की उम्र में कुदसिया बेगम इस दुनिया-ए-फानी से कूच कर गई. वह तारीख थी 21 अगस्त, 1839.

कुदसिया बेगम की आंखें मुंदते ही ऐसा वक्त आ गया कि दिनरात मौजमस्ती में डूबे रहने वाले नसीरूद्दीन चारों पहर गम में डूबे रहते. इसी उदासी के आलम में उन्होंने कुदसिया बेगम की याद में मकबरा बनवाया. बाद में जब नसीरूद्दीन को उन्हीं की खास महरी धनिया ने जहर दे दिया तो उन की मय्यत को भी कुदसिया बेगम के मकबरे में ही दफना दिया गया. आज लखनऊ के इरादतनगर वाली कर्बला में कुदसिया बेगम की कब्र है. उसी के बगल में नसीरूद्दीन हैदर की कब्र भी मौजूद है.

कुदसिया बेगम की मौत के बाद मलिका जमानी को खुदा का खौफ सताने लगा. इस हादसे ने उस के दिल को दहला कर रख दिया था. वह दिनरात सागरोमीना में डूबी रहती. उस के दोनों फेफड़े खराब हो गए. जिंदगी बोझ लगने लगी. 4 साल तक इस बोझ को ढोने के बाद मलिका जमानी ने भी दम तोड़ दिया. वह तारीख थी 22 दिसंबर, 1843. उस की लाश को लखनऊ के गोलागंज वाले उस के ही बनवाए इमामबाड़े में दफना दिया गया. आज भी गोलागंज के चौराहे पर मलिका जमानी की मस्जिद खामोश खड़ी है और उस के साये में तमाम कहानियां बिखरी पड़ी हैं… वफा, मोहबत, सियासत के फरेबों, साजिशों, विलासिता और पतन की कहानियां. Hindi Stories

Love Story: एक बहन ऐसी भी

Love Story: आरती जिस अनमोल को प्यार करती थी, उस की बड़ी बहन पूजा भी उसी से प्यार करती थी. जबकि अनमोल सिर्फ आरती से प्यार करता था. अंत में पूजा ने ऐसा क्या किया कि अनमोल न उस का हो सका और न आरती का  पूजा ने अपनी छोटी बहन को डांटने वाले अंदाज में कहा, ‘‘आरती, मैं ने तुम से कितनी बार कहा कि पड़ोसियों के घरों में ताकझांक मत किया करो, पर तुम हो कि सुनती ही नहीं हो.’’

‘‘नहीं दीदी, मैं ताकझांक नहीं कर रही थी. बिल्ली रसोई की ओर जा रही थी, मैं तो उसे भगा रही थी.’’ आरती ने अपनी सफाई में कहा तो पूजा हलके गुस्से में बोली, ‘‘जानती हूं, कौन सी बिल्ली थी और कौन सा बिल्ला. तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, टयूशन का वक्त हो गया है. और हां, सीधे जाना और सीधे लौट आना. रास्ते में बिल्लीबिल्ले का खेल मत खेलना, समझी.’’

आरती बड़बड़ाती हुई कमरे में चली गई और पूजा घर के कामों में लग गई. 17 वर्षीया आरती शर्मा और 20 वर्षीया पूजा शर्मा, दोनों सगी बहनें थीं. दोनों में बहुत प्रेम था. दोनों बहनों की तरह नहीं, बल्कि सखीसहेलियों की तरह मिलजुल कर रहती थीं, मिलबांट कर खाना, मिलबांट कर पहनना, सब कुछ साथसाथ चलता था. लेकिन पिछले करीब 2 महीनों से दोनों बहनें एकदूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाती थीं, खास कर पूजा को आरती. आरती पूजा की आंखों में हर समय खटकती रहती थी, इसीलिए दोनों बहनों में छोटीछोटी बात को ले कर तकरार होने लगती थी. ऐसे में छोटी होने के नाते आरती को ही चुप रह जाना पड़ता था.

लुधियाना के औद्योगिक क्षेत्र ढंडारी खुर्द में वीरेंद्र शर्मा का परिवार रहता था. शर्माजी के परिवार में पत्नी संजू शर्मा व 3 बेटियां क्रमश: पूजा, आरती और कुसुम तथा 10 साल का एक बेटा था. वीरेंद्र शर्मा मूलत: समस्तीपुर, बिहार के निवासी थे. कई साल पहले वह यहां काम की तलाश में आए थे. बाद में जब उन्हें एक इलैक्ट्रिकल फैक्ट्री में काम मिल गया तो उन्होंने किराए का मकान लेकर अपनी पत्नी और बच्चों को भी लुधियाना बुलवा लिया. फिलहाल वह मकान नंबर 950, नजदीक सुजीत सिनेमा, बलदेव सिंह दा बेहड़ा, ढंडारी कला, लुधियाना में रह रहे थे. वीरेंद्र शर्मा ने अपनी पत्नी संजू को भी पास की एक एक्सपोर्ट गारमेंट की फैक्ट्री में अच्छे मासिक वेतन पर लगवा दिया था. परिवार का गुजरबसर बड़े मजे से हो रहा था. पूजा और आरती 10वीं में पढ़ रही थीं. छोटी बेटी कुसुम भी सातंवी में थी. घर में किसी प्रकार की कमी नहीं थी.

वीरेंद्र शर्मा की बड़ी बेटी पूजा पढ़ाई के साथसाथ एक डाक्टर के क्लिनिक पर नर्सिंग एंड कंपाउंडर का काम भी सीख रही थी. शर्मा दंपति के काम पर चले जाने के बाद पूजा ही छोटी बहनों एवं भाई का ख्याल रखती थी. उन के खानपान से ले कर स्कूल भेजने तक का जिम्मा उसी पर था, जिसे वह बखूबी निभा रही थी. लेकिन इन दिनों अपनी छोटी बहन आरती को ले कर पूजा काफी परेशान थी. उस की इस परेशानी का कारण था अनमोल. अनमोल जिस दिन शर्मा परिवार के पड़ोस में रहने आया था, उसी दिन से पूजा की मुश्किलें बढ़ गई थीं. अनमोल 20 साल का सुदंर और स्मार्ट युवक था, स्वभाव से हंसमुख और मिलनसार. वह मूलत: गया, बिहार का रहने वाला था और लुधियाना के फोकल प्वाइंट क्षेत्र की किसी फैक्ट्री में काम करता था.

अपने अच्छे व्यवहार के कारण वह जल्दी ही पूरे मोहल्ले वालों से घुलमिल गया था. मोहल्ले की कई जवान लड़कियां उसे पसंद करती थीं. जबकि अनमोल किसी की ओर आंख तक उठा कर नहीं देखता था. वह बस अपने काम से मतलब रखता था. सुबह जल्दी उठ कर वर्जिश करना, फिर स्नान वगैरह से फारिग हो कर खाना बनाना और साढ़े 8 बजे तक काम पर चले जाना. शाम को 7 बजे काम से लौट कर खाना बनाना, अपने कमरे में बैठ कर टीवी देखना, खाना और उस के बाद सो जाना. अनमोल की रोजाना की यही दिनचर्या थी. छुट्टी वाले दिन भी अधिकांश समय वह अपने कमरे में बैठ कर गुजारता था. आरती ने जब से अनमोल को देखा था, तभी से वह उस की दीवानी बन गई थी. उस की नजरें अक्सर अनमोल का पीछा किया करती थीं.

सुबह काम पर जाने से ले कर, छत पर एक्सरसाइज करने तक आरती अनमोल को देखा करती थी, इस के बावजूद अभी तक उसे अनमोल से बात करने का एक भी मौका नहीं मिला था. उस के मन में यह डर भी बना हुआ था कि कहीं अनमोल उस की किसी बात का बुरा न मान जाए. कमोबेश यही हालात अनमोल की भी थी. वह भी मन ही मन आरती को चाहने लगा था. आरती भी इतनी खूबसूरत थी कि कोई भी उसे देख कर नजरअंदाज नहीं कर सकता था. गोरा रंग, गोल चेहरा, पूरी पीठ पर घने बाल, गुदाज शरीर और गजगामिनी जैसी चाल. मोहल्ले के कई युवक उसे देख कर आहें भरा करते थे, परंतु आरती केवल अनमोल की ओर आकर्षित थी.

चाहत दोनों ओर थी. आखिर एक दिन अनमोल के दिल ने आरती के दिल की बात सुन ली. उस दिन अनमोल के मकान मालिक घर पर नहीं थे. आरती का परिवार भी कहीं गया हुआ था. दोनों अपनेअपने घरों में अकेले थे. आरती को यह मौका सही लगा. वह अपनी नोटबुक उठा कर गणित का एक सवाल पूछने के बहाने अनमोल के कमरे पर जा पहुंची. आरती को इस तरह अपने सामने, अपने कमरे में देख कर अनमोल चौंका. उस ने अपनी घबराहट पर काबू पा कर आरती से पूछा.‘‘आप,आप यहां..?’’

‘‘जी हां, आप से मिलना चाहती थी, इसलिए चली आई.’’

‘‘अच्छा किया आपने. आइए बैठिए.’’ अनमोल ने कहा तो आरती कमरे में बिछे एकमात्र तख्त पर बैठते हुए बोली,‘‘अनमोलजी, सच कहूं, मैं आई तो गणित का सवाल पूछने के बहाने हूं, पर सच्चाई यह है कि मैं आप से दोस्ती करना चाहती हूं,’’ आरती ने अनमोल की आखों में झांकते हुए कहा, ‘‘बताइए, करेंगे मुझ से दोस्ती?’’

आरती द्वारा दिए गए इस खुले निमंत्रण से अनमोल गदगद हो उठा. वह आरती के पास आ कर पर बैठ गया और उस का हाथ अपने हाथ में ले कर बोला, ‘‘आरती, मैं तुम्हें दिल की गहराइयों से प्यार करता हूं. अगर तुम मुझ से शादी करने का वादा करो तो मुझे तुम्हारी दोस्ती स्वीकार है, मैं केवल टाइम पास करने के लिए तुम से दोस्ती नहीं करना चाहता.’’

अनमोल की बातें सुन कर आरती जैसे उस की दीवानी हो गई. उस ने अपने आप को अनमोल की बाहों के  हवाले करते हुए मन की गहराइयों से कहा, ‘‘मैं मरते दम तक अपना प्यार निभाऊंगी अनमोल.’’

उस दिन के बाद से आरती और अनमोल के बीच प्रेम का अटूट बंधन बंध गया. इस के बाद आरती के स्कूल जाते समय रास्ते में, अनमोल के काम पर जाने या वापस लौटते वक्त, फिर सुबह छत पर उस के वर्जिश करते समय, जहां कहीं भी मौका मिलता, दोनों मिल लेते. इस मामले में दोनों बहुत ऐहतियात बरतते थे कि किसी को उन के प्रेम की भनक न लगे. पर इश्कमुश्क ऐसी चीजें हैं, जो कभी छिपाए नहीं छिपतीं. आखिर एक दिन उन दोनों की प्रेम कहानी की भनक आरती की बहन पूजा को लग ही गई. एक बार अनमोल के मकान मालिक 2 दिनों के लिए शहर से बाहर गए हुए थे. शर्मा दंपति अपनेअपने काम पर चले गए. पूजा की छोटी बहन और भाई स्कूल गए हुए थे. दोपहर बाद पूजा डाक्टर के क्लिनिक पर चली गई. घर पर केवल आरती ही थी. उस दिन अनमोल ने भी काम से छुट्टी ले रखी थी और अपने कमरे पर आरती का इंतजार कर रहा था.

पूजा के क्लिनिक पर चले जाने के बाद आरती अनमोल के कमरे पर पहुंच गई. अंदर से कमरे का दरवाजा बंद कर के दोनों एकदूसरे की बाहों में समा गए. जब 2 युवा दिल एकदूसरे की बाहों में सिमट कर एक साथ धड़कने लगते हैं तो सारी दूरियां खुद ब खुद खत्म हो जाती हैं. आरती और अनमोल के साथ भी यही हुआ. सारे बंधन तोड़ कर अनमोल और आरती एकाकार हो गए. इत्तफाक से उस दिन किसी वजह से पूजा क्लिनिक से घर लौट आई . उस वक्त घर पर आरती नहीं थी.

‘घर खुला छोड़ कर कहां चली गई यह लड़की?’ बड़बड़ाते हुए पूजा आरती को खोजने के लिए घर से बाहर निकल आई. तभी अचानक उस की नजर साथ वाले मकान पर गई. पूजा ने देखा, आरती अनमोल के कमरे से बाहर निकल रही थी. उस के पीछे अनमोल भी था. आरती के बाल और कपड़े अस्तव्यस्त थे. आरती की हालत देख कर पूजा को समझते देर नहीं लगी कि आरती अनमोल के साथ बंद कमरे में कौन सा खेल खेल कर निकली है. पूजा को खड़ा देख कर अनमोल अपने कमरे में लौट गया, जबकि आरती सिर झुकाए अपने घर आ गई. पूजा ने आरती को आड़े हाथों लिया और साथ ही कभी फिर अनमोल से न मिलने की चेतावनी दी.

पूजा ने उसे कलमुंही, बदचलन और बेशरम तक कहा. आखिर अपने अपमान से तिलमिला कर आरती ने अपने और अनमोल के संबंधों के बारे में सब कुछ उजागर करते हुए कह दिया, ‘‘दीदी, मैं कोई आवारा या बदचलन नहीं हूं. मैं अनमोल से प्यार करती हूं और हम दोनों शादी करना चाहते हैं.’’

‘‘अच्छा, अपनी अय्याशी को प्यार का नाम दे कर प्रेम शब्द को ही बदनाम करने लगी. अभी तू इतनी बड़ी नहीं हुई है कि अपनी शादी के फैसले खुद ही करने लगी,’’ पूजा ने चीखते हुए कहा, ‘‘एक बात कान खोल कर सुन ले. तेरी या मेरी शादी वहीं होगी, जहां मम्मीपापा चाहेंगे.’’

अनमोल को ले कर दोनों बहनों में खूब तकरार हुई. बढ़तेबढ़ते बात यहां तक पहुंच गई कि आरती ने चुनौती दे दी कि वह अनमोल से शादी कर के दिखाएगी. जबकि पूजा कह रही थी कि उस के जीते जी उस का यह सपना पूरा नहीं होगा. दरअसल, आरती को अनमोल से मिलने के लिए रोकना पूजा का फर्ज नहीं, बल्कि स्वार्थ था. वह अनमोल पर बुरी तरह से फिदा थी और चाहती थी कि उस की शादी अनमोल से हो जाए. अपने इसी स्वार्थ की वजह से पूजा ने आरती और अनमोल के संबंधों को ले कर अपने मम्मीपापा के कान भरने शुरू कर दिए. उन्होंने भी आरती को खूब बुराभला कहा और घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी.

दरअसल, आरती पटना में अपने दादादादी के पास रह कर पढ़ती थी. यहां वह केवल एग्जाम की तैयारी के लिए आई थी, ताकि पढ़ने में आसानी रहे. पटना में आरती के एग्जाम 17 मार्च को शुरू होने थे. 13 मार्च, 2015 को आरती को अपने पिता वीरेंद्र शर्मा के साथ एग्जाम देने पटना जाना था. इस के लिए अभी एक, डेढ़ महीने का समय था. इसलिए वीरेंद्र शर्मा ने पूजा को सख्त निर्देश दे कर आरती पर नजर रखने का जिम्मा सौंप दिया. कहते हैं, प्रेमियों पर अगर अंकुश लगा दिया जाए तो उन की भावनाएं और ज्यादा भड़कती हैं. यही हाल आरती का भी हुआ. हर वक्त पूजा द्वारा रोकटोक करने से आरती इतना परेशान हो गई कि एक दिन दोपहर के समय वह पूरी तैयारी के साथ अनमोल की फैक्ट्री जा पहुंची.

उस ने अनमोल को सब कुछ साफसाफ बता कर कहा ‘‘अनमोल, मैं रोजरोज के लड़ाईझगड़ों से तंग आ चुकी हूं. इसलिए आज मैं हमेशा के लिए अपना घर छोड़ कर तुम्हारे पास आ गई हूं. हम दोनों शादी कर के अपनी अलग दुनिया बसाएंगे, जहां रोकनेटोकने वाला कोई नहीं होगा.’’

आरती का इरादा जानने के बाद अनमोल घबरा गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे कैसे समझाए. ऐसा नहीं था कि अनमोल आरती से प्यार नहीं करता था. वह वाकई उसे बहुत चाहता था, वह उस से अलग रहने की कल्पना तक नहीं कर सकता था, लेकिन जैसा आरती कह रही थी, ऐसा करने के लिए उस ने अभी सोचा नहीं था. अनमोल चाहता था कि यह शादी आरती के मातापिता के आशीर्वाद से हो. लेकिन जब आरती अपनी जिद पर अड़ी रही तो वह उसे अपने एक दोस्त के घर ले गया. 2 दिनों तक दोनों उस दोस्त के घर ठहरे. इस बीच वह आरती को हर तरह से समझाने का प्रयास करता रहा. उस ने आरती से वादा किया कि जल्द ही वह अपने मातापिता से बात कर के उन्हें उस के मम्मीपापा के पास भेजेगा. इस वादे के बाद आरती अपने घर वापस लौटने को तैयार हो गई.

इधर आरती के लापता होने से शर्मा दपंति परेशान थे, सब से अधिक पेरशानी पूजा को थी. उसे डर था कि कहीं आरती और अनमोल शादी न कर लें. खैर, सब मिल कर आरती को ढूंढते रहे. इसी बीच 2 दिनों बाद आरती सकुशल घर लौट आई तो सब ने चैन की सांस ली. शर्मा दंपति ने तय किया कि आरती पर अब भविष्य में इतनी सख्ती न की जाए. लेकिन पूजा अपनी हरकतों से बाज नहीं आई. मौका मिलते ही वह आरती को जलीकटी सुनाने से बाज नहीं आती थी. बहरहाल वक्त इसी तरह गुजरता रहा. आरती और अनमोल का छिपछिप कर मिलना जारी रहा, दोनों मोबाइल फोन पर भी आपस में बातें कर लिया करते थे. चाह कर भी पूजा आरती का कुछ नहीं बिगाड़ पा रही थी.

28 फरवरी, 2015 की बात है. प्रदीप सिंह अपने घर से खेतों की ओर जा रहा था. रास्ते में उस के ताऊ बलदेव सिंह का मकान पड़ता था. हालांकि बलदेव सिंह इस मकान में नहीं रहते थे. यह मकान उन्होंने वीरेंद्र शर्मा को किराए पर दे रखा था. इस मकान की देखभाल का जिम्मा उन्होंने अपने भतीजे प्रदीप सिंह को सौंप रखा था. प्रदीप सिंह जब अपने ताऊ के घर के पास पहुंचा तो उस ने मकान के अंदर चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुनीं.

‘‘बचाओ… बचाओ, मार दिया… ओह.’’ का शोर सुन कर वह रुक गया. तभी उस ने देखा वीरेंद्र शर्मा की बड़ी बेटी तेजी से मकान से निकल कर एक ओर चली गई. उस के पीछे शर्मा की छोटी बेटी कुसुम चिल्लाते हुए निकली, ‘‘पूजा ने आरती को मार डाला, बचाओ.’’

शोर सुन कर प्रदीप सिंह ने मकान के भीतर जा कर देखा तो आरती रसोई में फर्श पर खून से लथपथ पड़ी थी. उस के शरीर पर गहरेगहरे घाव साफ दिखाई दे रहे थे. आरती की छोटी बहन कुसुम जोरजोर से रो रही थी. प्रदीप सिंह ने नीचे झुक कर आरती की नब्ज टटोल कर देखी, वह मर चुकी थी. समय व्यर्थ न करते हुए प्रदीप सिंह ने तुरंत इस घटना की सूचना थाना फोकल प्वाइट को दी, साथ ही उस ने वीरेंद्र शर्मा को भी आरती की मौत के बारे में बता दिया. वह अभी फोन कर के हटे ही थे कि अस्पताल की एंबुलैंस वहां आ गई. दरअसल पुलिस को गुमराह करने के लिए पूजा ने ही 108 नंबर पर एंबुलैंस के लिए फोन किया था कि उस की छोटी बहन आरती गिर कर घायल हो गई है.

कुछ ही देर में थाना फोकल प्वाइंट के थानाप्रभारी इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह पुलिस चौकी ढडारी के इंचार्ज एएसआई जोगिदंर सिंह, चौकीइंचार्ज ईश्वर कालोनी एएसआई जसबीर सिंह, हेडकांस्टेबल जसपाल सिंह, कांस्टेबल बलजीत कुमार व लेडी कांस्टेबल किरनपाल घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया गया. मृतका आरती के शरीर पर अनगिनत गहरे घाव थे, जिन में से उस समय भी खून रिस रहा था. घाव देख कर ऐसा लगता था, जैसे मृतका की हत्या गहरी रंजिश और नफरत के तहत की गई थी. जिस छुरी से उस की हत्या की गई थी, वह भी घटनास्थल से बरामद हो गई थी. कुछ ही देर में क्राइम टीम व डीसीपी जसवंत संधु, एसीपी रूपेंद्र कौर तथा मृतका के मातापिता भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. क्राईम टीम ने कई कोणों से लाश के फोटो लिए और कई जगह से फिंगरप्रिंट उठाए.

सुरेंद्र सिंह ने मृतका के पिता वीरेंद्र शर्मा और मां संजू शर्मा के बयान लिए गए. वीरेंद्र शर्मा के अनुसार, मृतका आरती के पड़ोस में रहने वाले युवक अनमोल के साथ प्रेमसंबंध थे. घटना वाले दिन से पहले 27 फरवरी को अनमोल उन के पड़ोस वाला कमरा खाली कर के कहीं चला गया था. इसी बात को ले कर आरती की अपनी बड़ी बहन पूजा के साथ तकरार हुई थी. शायद वैसा आज भी हुआ हो और उसी झगड़े में आरती की हत्या हो गई हो. बहरहाल, सुरेंद्र सिंह ने मृतका के पिता व पड़ोसियों के बयान दर्ज करने के बाद लाश को अपने कब्जे में ले कर लाश पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दी. थाने लौट कर सुरेंद्र सिंह ने इस मामले को पूजा को नामजद करते हुए हत्या का मुकदमा दर्ज कर उस की तलाश शुरू कर दी.

अपनी बहन आरती की हत्या कर के पूजा घटनास्थल से फरार तो हो गई थी, पर उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह कहां जाए? क्योंकि उस समय उस के पास एक भी पैसा नहीं था. यह बात सुरेंद्र सिंह भी अच्छी तरह जानते थे. वह यह भी समझते थे कि अक्सर बिना पैसे वाले लोग ट्रेन में ही यात्रा करते हैं. इसलिए उन्होंने एएसआई जसबीर सिंह को ढंडारी रेलवे स्टेशन की ओर भेजा. इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह का अनुमान सही निकला. ढंडारी रेलवे स्टेशन के पास से ही एएसआई जसबीर सिंह ने पूजा को गिरफ्तार कर लिया.

थाने में हुई पूछताछ में पूजा ने स्वीकार कर लिया कि गुस्से में उसी ने अपनी छोटी बहन आरती की हत्या की थी. पूजा ने बताया कि आरती के पड़ोस में रहने वाले अनमोल के साथ प्रेमसंबंध थे. आरती के संबंध का पूरा परिवार विरोध करता था. पिताजी की इच्छा थी कि आरती पढ़लिख कर उच्चशिक्षा प्राप्त करे. 17 मार्च, 2015 को आरती के एग्जाम पटना सरकारी स्कूल में होने वाले थे. पिताजी उसे ले कर 13 मार्च को पटना जाने वाले थे. अनमोल ने जब हमारे पड़ोस वाला कमरा खाली किया तो हमें संदेह हुआ कि कहीं आरती और अनमोल की यह कोई चाल न हो. अनमोल ने शायद किसी योजना के अंतर्गत कमरा खाली किया है.

अब दोनों घर से भाग जाना चाहते हैं. क्योंकि इस घटना से लगभग डेढ़ महीना पहले आरती कहीं चली गई थी. अनमोल भी 2 दिन अपने घर से गायब रहा था. 2 दिनों बाद आरती घर लौट आई थी. हमें संदेह था कि आरती अनमोल, दोनों घर से भागने की नीयत से गायब हुए थे और किन्हीं कारणों से वापस लौट आए थे. इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए जब अनमोल ने अपना कमरा खाली किया तो हमें संदेह हुआ कि यह आरती और अनमोल के घर से भागने की योजना है. यह बात मैं ने मातापिता को बता कर अपना संदेह व्यक्त किया और उसी दिन से मैं आरती पर नजर रखने लगी. अनमोल के कमरा बदलने के बाद आरती लगातार फोन द्वारा अनमोल से संपर्क बनाए रही.

घटना वाले दिन भी सुबहसुबह काफी देर आरती फोन पर किसी से बातें करती रही. मुझे यकीन था कि वह फोन अनमोल का ही था. उस के बाद मैं नहाने के लिए बाथरूम में गई. नहाने के लिए जैसे ही मैं कपड़े उतारने लगी, तभी जिद कर के आरती जबरदस्ती नहाने बैठ गई. उस ने कहा.‘‘सौरी दीदी, मुझे जरा जल्दी है, कहीं जाना है.’’

उस की यह बात सुन कर मुझे विश्वास हो गया कि आरती अनमोल के साथ भाग जाने वाली है. अभी मैं यह सोच ही रही थी कि तभी आरती के फोन पर किसी का फोन आया. नहाना छोड़ कर आरती फोन सुनने लगी. मैं ने आरती को यह कहते सुना, ‘तुम थोड़ा इंतजार करो, मैं तैयार हो कर अभी आती हूं.’

यह सुनते ही मेरा संदेह विश्वास में बदल गया. मैं ने आरती से पूछा, ‘‘क्या तुम अनमोल के साथ कहीं भाग जाना चाहती हो?’’

मेरी बात सुन कर आरती आगबबूला हो गई, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. उस ने चिल्लाते हुए कहा, ‘तुम ऐसे ही मेरा पीछा करोगी तो नहीं भागना होगा, तब भी भाग जाऊंगी.’ आरती की इस विद्रोही भाषा से मेरे तनबदन में आग लग गई. मैं ने आव देखा न ताव, पास में पड़ी सब्जी काटने वाली छुरी उठा कर आरती पर अंधाधुंध वार कर के उस की हत्या कर दी. जो लड़की कुल की मर्यादा को कलंकित करे, उस का मर जाना ही बेहतर है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, आरती के शरीर पर कुल 20 घाव थे. सब से घातक घाव वे थे जो आरती के पेट पर किए गए थे. इन्ही घावों की वजह से आरती के फेफड़े फट गए थे और हार्ट पंक्चर हो गया था, जिस से उस ने दम तोड़ दिया था.

पूछताछ के बाद एसआई अश्विनी कुमार ने 1 मार्च, 2015 को पूजा को सीजीएम रणजीव कुमार की आदलत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. हत्या में प्रयुक्त छुरी पहले ही बरामद हो चुकी थी, सो रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद पूजा को 3 मार्च, 2015 को अदालत में दोबारा पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में जिला कारगार भेज दिया गया. Love Story

कथा पुलिस सुत्रों पर आधारित.

 

Gujarat Crime Story: पूत जब बना कपूत

Gujarat Crime Story: अदनान की बुरी आदतों से परेशान हो कर पिता ने उसे घर से ही नहीं निकाल दिया, बल्कि अपनी जायदाद से भी बेदखल कर दिया. इस के बाद अपना हक पाने के लिए अदनान ने जो किया, क्या वह उचित था.रोज की तरह शुक्रवार 20 मार्च, 2015 की रात लगभग 8 बजे फर्नीचर सामग्री के व्यापारी खुजेमा बैगवाला अपनी दुकान बंद कर के मोटरसाइकिल से सैफीनगर स्थित अपने घर की ओर चल पड़े. अलग मोटरसाइकिल से उन के 2 कर्मचारी भी उन के साथसाथ चल रहे थे. 57 वर्षीय खुजेमाभाई ने जैसे ही अपने मोहल्ले में प्रवेश किया, अचानक एक मोटरसाइकिल उन के बराबर में आई, जिस पर 2 लोग सवार थे. मोटरसाइकिल चला रहे व्यक्ति ने हेलमेट पहन रखा था, जबकि पीछे बैठे व्यक्ति ने अपने चेहरे पर कपड़ा बांध रखा था.

उस के पीछे एक अन्य मोटरसाइकिल पर अपने चेहरों पर कपड़े बांधे 2 युवक और चल रहे थे. दोनों मोटरसाइकिलें खुजेमाभाई के करीब आईं तो उन चारों में से किसी ने चिल्ला कर कहा, ‘यही है खुजेमा?’ उस का इतना कहना था कि खुजेमाभाई कुछ समझ पाते, उन के बगल चल रही मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे व्यक्ति ने तमंचा निकाला और उन पर गोली चला दी. गोली खुजेमाभाई के बाएं कान के पास लगी. गोली लगते ही वह मोटरसाइकिल सहित सड़क पर गिर पड़े और बेहोश हो गए.

आसपास के लोग मामला समझ पाते, खुजेमाभाई पर हमला करने वाले दोनों मोटरसाइकिल सवार फरार हो गए. खुजेमाभाई के साथ चल रहे उन के दोनों कर्मचारी घबरा गए. तुरंत भीड़ लग गई. एंबुलैंस को फोन किया गया. एंबुलैंस आई, साथ आए डाक्टर ने खुजेमा की जांच की. गोली बाईं ओर कान के पास लगी थी, जिस से खून बह रहा था. खुजेमा की सांस चल रही थी. उन्हें तुरंत घटनास्थल से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित इंदौर के चोईराम अस्पताल ले जाया गया. खुजेमाभाई को तुरंत भरती कर के औपरेशन की तैयारी शुरू कर दी गई. घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी गई थी, जिस से घटनास्थल से संबंधित थाना जूनी के थानाप्रभारी पवन सिंघल तो अस्पताल पहुंचे ही, अन्य पुलिस अधिकारी भी धीरेधीरे वहां पहुंचने लगे. अस्पताल के डाक्टरों ने तुरंत औपरेशन कर के खुजेमाभाई के कान के पास फंसी गोली, जो खोखे सहित थी, निकाल लिया था.

खुजेमाभाई पर हमले की खबर जैसेजैसे सैफीनगर मोहल्ले में फैलती गई, लोग इकट्ठा होते गए. सैफीनगर में लगभग 95 प्रतिशत बोहरा समाज के लोग रहते हैं और खुजेमाभाई भी बोहरा समाज के ही हैं. खुजेमाभाई न केवल एक बड़े और प्रतिष्ठित व्यापारी थे, समाज में भी उन की काफी इज्जत थी. वह मृदुभाषी होने के साथ समाज की सेवा के लिए भी हमेशा सब से आगे रहते थे. यही वजह थी कि पूरी रात उन की समाज के लोग अस्पताल में मजमा लगाने के साथसाथ वे पुलिस से जल्दी से जल्दी हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग करते रहे.

अगले दिन यानी 21 मार्च, दिन शनिवार की सुबह जब डाक्टरों ने खुजेमाभाई को खतरे से बाहर बताया तो उन के घर वालों को ही नहीं, समाज और पुलिस की भी जान में जान आई. अस्पताल में खुमेजाभाई का हालचाल पूछने वालों का तांता लगा था. लेकिन डाक्टरों ने साफ कह दिया था कि अभी वह किसी से नहीं मिल सकते. केवल घर के 2 लोग ही उन के पास रह सकते थे. वह भी इस शर्त पर कि कोई भी खुजेमाभाई से बात नहीं करेगा. इस के बावजूद अस्पताल के बाहर उन के समाज के लोगों की भीड़ लगी थी. बोहरा समाज के दबाव की वजह से पुलिस तेजी से हरकत में आ गई थी. थानापुलिस एवं क्राइम ब्रांच की टीमें जांच में जुट गई थीं. फोरेंसिक एक्सपर्ट डा. सुधीर शर्मा ने खुजेमाभाई के कान के पास से निकली गोली देखी तो वह सिहर उठे. गोली खोखा समेत थी.

उन्होंने बताया कि यह गोली जिस तमंचे से चलाई गई थी, उस में कोई खराबी थी, वरना अगर यह गोली सही तरीके से सही तमंचे से चली होती तो खुजेमाभाई के सिर के परखच्चे उड़ जाते. ऐसी गोली को ‘बर्स्ट बोल’ कहा जाता है. यह गोली पिस्टल से निकल कर आदमी के शरीर से टकराती है तो बम की तरह फट जाती है. उस स्थिति में आदमी का बचना बेहद मुश्किल होता है. 2 दिनों बाद खुजेमाभाई को आईसीयू से प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट किया गया तो वह स्वयं को काफी अच्छा महसूस कर रहे थे. इस के बाद डाक्टरों ने मिलने की इजाजत दे दी थी, लेकिन बात करने और एक समय में 2 से अधिक लोगों के अंदर जाने से साफ मना कर दिया था.

पुलिस अपने हिसाब से हमलावरों तक पहुंचने की पूरी कोशिश में लगी थी. दूसरी ओर बोहरा समाज के जो लोग पुलिस के आला अधिकारियों से ज्ञापन देने की तैयारी कर रहे थे, तभी उन्हें एक बड़ा झटका तब लगा, जब समाज में हो रही यह खुसुरफुसुर उन के कानों में पड़ी कि खुजेमाभाई पर परिवार के ही किसी सदस्य ने हमला किया है या फिर किराए के हमलावरों से कराया है. इस के बाद समाज के लोगों ने पुलिस अधिकारियों से मिलने का अपना कार्यक्रम स्थगित कर दिया. थानाप्रभारी पवन सिंघल को जांच के दौरान अपने किसी मुखबिर से पता चला था कि खुजेमाभाई का बड़ा बेटा अदनान इस घटना के लिए जिम्मेदार हो सकता है.

क्योंकि उस की अपने पिता से गहरी अनबन चल रही थी. इस के बाद पवन सिंघल ने अदनान को उस के घर से उठवा लिया. थाने में उस से पूछताछ की गई तो वह अकड़ गया, ‘‘मेरे ही बाप को गोली मारी गई है और आप लोग हमलावरों को पकड़ने के बजाय मुझे ही पकड़ लाए हैं.’’

लेकिन ज्यादा समय तक अदनान की अकड़ कायम नहीं रह सकी. जब पुलिस ने अपने सवालों से उसे घेरा तो वह टूट गया. उस ने पिता को जान से मरवाने की जो साजिश रची थी, उस का अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने पिता की हत्या की जो साजिश रची थी, उस की पूरी कहानी पुलिस को सुना दी, जो कुछ इस तरह थी. इंदौर के मोहल्ला सैफीनगर में रहने वाले बोहरा समाज के खुजेमा बैगवाला की 3 संतानें थीं, 27 साल का बड़ा बेटा अदनान, उस से छोटा 22 साल का अली अकबर और सब से छोटी 12 साल की बेटी. खुजेमाभाई का फर्नीचर सामग्री का विशाल शोरूम इंदौर के महंगे इलाके सपना संगीता रोड पर था, जिस में फोम, रैक्सीन, कपड़े आदि मिलते थे.

उन के इस शोरूम का नाम एलिगेंट फोम एंड फर्निशिंग प्रा.लि. था. खुजेमा ने अपनी सूझबूझ से कारोबार में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की की थी. कई नौकरों और अपने बड़े बेटे अदनान के साथ वह अपने इस शोरूम को चला रहे थे. कारोबार बढि़या चल रहा था, किसी चीज की कमी नहीं थी. दौलत की रेलमपेल थी. लेकिन कभीकभी अधिक पैसा भी अभिशाप बन जाता है. कुछ ऐसा ही खुजेमाभाई के साथ भी हुआ. उन का बड़ा बेटा अदनान गलत संगत में पड़ गया. उस की गलत आदतों और अनापशनाप खर्च को देख कर खुजेमाभाई चिंतित रहने लगे थे.

उन्होंने अदनान को खूब समझाया कि वह गलत संगत और गलत आदतें छोड़ दे. पिता के आगे वह आज्ञाकारी बेटे की तरह सिर झुकाए उन की हिदायतें सुनता रहता और भविष्य में कोई गलत काम न करने की बात भी कहता, लेकिन आगे से हटते ही वह सब भूल जाता. परेशान हो कर खुजेमाभाई ने अदनान पर आर्थिक पाबंदियां लगानी शुरू कर दीं. इस से अदनान सुधरने के बजाए और उग्र हो गया. परिणामस्वरूप बापबेटे में तकरार होने लगी. उसी बीच अदनान को एक लड़की से प्यार हो गया और वह उस से शादी करने के बारे में सोचने लगा. उस ने अपनी यह इच्छा मांबाप को बताई तो उन्होंने साफ मना कर दिया.   इस की वजह थी अंधविश्वास. वैसे तो वह लड़की उन्हीं की बिरादरी की थी, लेकिन उन्हें कहीं से पता चला था कि उस के घर वाले जादूटोना करते हैं, इसीलिए उन्होंने शादी से मना कर दिया था. यह सन 2012 की बात थी.

खुजेमाभाई ने अदनान को भले ही पैसे देने बंद कर दिए थे, लेकिन उस के खर्च में कोई कमी नहीं आई थी. अब वह अपने खर्च के लिए जानपहचान वालों से कर्ज लेने लगा था. कुछ दिनों बाद कर्ज देने वालों के तकादे आने लगे तो परेशान हो कर खुजेमाभाई ने अदनान को अपनी प्रौपर्टी से बेदखल कर दिया. वह सब कुछ बरदाश्त कर सकते थे, लेकिन बदनामी उन्हें बरदाश्त नहीं थी. घरपरिवार से बेदखल होने के बाद अदनान को अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा. उस के पास बैंक में भी ज्यादा पैसे नहीं थे. घर से निकाले जाने के बाद सब से पहले तो उस ने अपने रहने के लिए एक बेडरूम का छोटा सा फ्लैट किराए पर लिया.

इस के बाद अपने बचपन के अजीज दोस्त अली असगर से सलाहमशविरा कर के साझे में कोई कारोबार करने का विचार किया. आखिर थोड़ीबहुत जो पूंजी थी, उस से दोनों ने रियल एस्टेट एम.सी. एक्स एवं कपड़ों का कारोबार करने की बात की. अली असगर भी अच्छी हैसियत वाला था. उस के पिता हकीम थे. हकीमी शफाखाना यूनानी के नाम से इंदौर की घनी आबादी वाले मारोठया बाजार में उन का यह शफाखाना पुरखों के समय से चला आ रहा था. चूंकि यहां भी बोहरा समाज की आबादी एवं दुकानें अधिक हैं, इसलिए इसे बोहरा बाजार के नाम से भी जाना जाता है. उन के इस शफाखाने की एक शाखा मुंबई में भी है, जहां अली असगर के पिता हकीम सादिक अली हर महीने की 5 से 10 तारीख तक मरीजों को देखते हैं.

संयोग से अदनान और अली असगर का कारोबार चल निकला. ठीकठाक कमाई होने लगी तो अदनान ने किराए का फ्लैट छोड़ कर अपना एक बड़ा फ्लैट खरीद लिया. इस के बाद अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ अपनी प्रेमिका से शादी कर ली और हनीमून मनाने के लिए स्विटजरलैंड गया. इतना सब होने के बाद भी अदनान की बुरी आदतों ने पीछा नहीं छोड़ा. जबकि दोस्त और पार्टनर अली असगर ने भी उसे बहुत समझाया, लेकिन उस पर दोस्त के समझाने का भी जरा असर नहीं हुआ. हालांकि कारोबार में होने वाले फायदे को वे आधाआधा बांट लेते थे. अदनान अपने हिस्से से ही अपनी जरूरी और गैरजरूरी जरूरतें पूरी करता था.

अदनान ने एक आल्टो कार एवं हर्ले डेविडसन मोटरसाइकिल खरीद ली थी. इस के बाद 2 बातें हुईं. एक तो उन के कारोबार में नुकसान होने लगा, दूसरे इस नुकसान की भरपाई के लिए वे कर्ज लेने लगे. धीरेधीरे यह कर्ज बढ़तेबढ़ते 75 लाख रुपए तक पहुंच गया. अली असगर ने तो अपनी साख बचाए रखी, लेकिन अदनान बुरी आदतों की वजह से अपनी साख नहीं बचा सका. नुकसान और कर्ज की वजह से उन का साझे का यह कारोबार बंद हो गया. कर्ज देने वालों के तकादे बढ़ने लगे तो अदनान परेशान रहने लगा. तब अली असगर ने उसे सलाह दी कि वह पिता से माफी मांग कर कर्ज चुकाने के लिए पैसा या जायदाद में हिस्सा मांग ले. अदनान अकेला नहीं जाना चाहता था, इसलिए उस ने उस से भी साथ चलने को कहा. लेकिन अली असगर ने यह कह कर मना कर दिया कि इस मामले में वह बीच में नहीं पड़ना चाहता.

मरता क्या न करता, अदनान पत्नी को साथ ले कर जायदाद में हिस्सा मांगने अपने पिता के घर पहुंच गया. लेकिन खुजेमाभाई ने साफ कह दिया कि न वह हिस्सा देंगे और न किसी तरह की मदद ही करेंगे. उन्होंने अदनान की पत्नी को भी बहू मानने से मना कर दिया था. अदनान मायूस हो कर लौट आया. यह 4-5 महीने पहले की बात थी. मायूसी और परेशानियों ने खतरनाक मनसूबों को जन्म देना शुरू कर दिया. खुजेमाभाई के पास बड़ा कारोबार ही नहीं, अथाह धनदौलत और काफी जमीनजायदाद थी. उन्हें अपने छोटे बेटे अली अकबर से भी कम ही उम्मीद थी. वह भी शानोशौकत से रहता था. वैसे खुजेमाभाई को इतनी जल्दी मायूस नहीं होना चाहिए था,  क्योंकि अली अकबर अभी बच्चा ही तो था. लेकिन खुजेमाभाई उस से ज्यादा अपने वफादार मैनेजर हुसैन पर भरोसा करते थे.

कहने को तो हुसैन खुजेमाभाई का नौकर था, लेकिन अब वह परिवार का एक अहम सदस्य बन चुका था और एकएक पाई का हिसाब रखता था. खुजेमाभाई और हुसैन ने अपने कारोबार पर ऐसी पकड़ बना रखी थी कि एक तिनका भी इधर से उधर नहीं हो सकता था. जब अदनान को पता चला कि उस के पिता अपनी सारी संपत्ति का वारिस मैनेजर हुसैन को बनाने वाले हैं तो उस का दिमाग खराब हो गया. फिर जैसी कहावत है कि ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ वैसा ही अदनान ने पिता खुजेमाभाई को रास्ते से हटाने की योजना बना डाली.

अदनान ने बाजार में पिता की हैसियत का लाभ लेते हुए एक कारोबारी से 5 लाख रुपए उधार लिए. ये रुपए उस ने एक ऐसे गिरोह को देने के लिए लिए थे, जो रुपए ले कर हत्याएं करता था. उस ने उन रुपयों में से उस गैंग को पिता की हत्या के लिए ढाई लाख रुपए एडवांस दे दिए. बाकी रकम काम होने के बाद देने की बात हुई. उस गैंग ने रुपए तो ले लिए, पर काम नहीं किया. अदनान उन से जब भी काम की बात करता, वे यही कहते कि उस का काम हो जाएगा. अदनान उन से जबरदस्ती भी नहीं कर सकता था. मजबूर हो कर अदनान ने किसी दूसरे गिरोह से बात की. इस दूसरे गिरोह से खुजेमा के मुनीम सुरेश यादव ने बात कराई थी. किसी बात से नाराज हो कर वह खुन्नस में अदनान से मिल गया था.

खुजेमा की हत्या करने के लिए सुरेश अदनान को निमरानी गांव के एक बाबा के पास ले गया, जो जादूटोना से ले कर हत्या तक करवाता था. बाबा ने अदनान को धरमपुरी के रहने वाले कुख्यात गुंडे इदरीस का मोबाइल नंबर दे दिया. इदरीस ने अदनान को इंदौर के पिपली बाजार के रहने वाले विशाल उर्फ सोनू पहलवान से मिलवाया. सोनू ने खुजेमा भाई की हत्या के लिए 25 लाख रुपए मांगे. एडवांस में भी उस ने आधे पैसे देने को कहा, तब अदनान ने अपनी आल्टो कार एवं हर्ले डेविडसन मोटरसाइकिल को 3 लाख रुपए में बेच कर, बाकी रुपए इधरउधर से ले कर 12 लाख रुपए की व्यवस्था कर के सोनू को दे दिए.

पैसे मिलने के बाद सोनू ने अपने गुर्गों को तैयार किया और खुद भी कार से खुजेमाभाई की रेकी करने लगा. पूरी तैयारी कर लेने के बाद 20 मार्च, 2015 को खुजेमाभाई की हत्या की तैयारी कर ली गई. उस दिन उन की निगरानी में करीब दरजन भर लोग लगे थे. खुजेमाभाई का घर दुकान से कोई डेढ़ किलोमीटर दूर था. 8 बजे दुकान बंद कर के वह घर के लिए रवाना हुए. उन के निकलते ही मुनीम सुरेश यादव ने अदनान को सूचना दे दी कि खुजेमाभाई रवाना हो गए हैं, उन के साथ अलग मोटरसाइकिल से 2 कर्मचारी भी हैं. खुजेमाभाई अपने घर पहुंचते, उस के पहले ही शूटरों ने अपना काम कर दिया. यह संयोग ही था कि तमंचा और गोली ने धोखा दे दिया. पूछताछ में पता चला कि देशी पिस्तौल और 25 कारतूस अदनान ने इदरीस के माध्यम से जिला धार के गांव गुजरी के रहने वाले प्रताप सिंह से 50 हजार रुपए में खरीदा था. देशी पिस्तौल 315 बोर का था.

लेकिन इदरीस ने प्रताप सिंह को मात्र 15 हजार रुपए ही दिए थे. प्रताप सिंह पुलिस में वांटेड था और उस पर 5 हजार रुपए का इनाम था. उधर जब डाक्टरों ने खुजेमाभाई को पूरी तरह खतरे से बाहर बताया तो अदनान सन्न रह गया. उस के किए पर पानी फिर गया था. शूटरों से पिस्तौल और बचे कारतूस वापस लिए और खुद ही पिता को मारने का निश्चय ही नहीं किया, बल्कि पिस्तौल ले कर अस्पताल गया भी, लेकिन भीड़ लगी होने के कारण वह अपने इरादे में कामयाब नहीं हुआ. अदनान मौके की तलाश में था. लेकिन वह अपना काम कर पाता, उस के पहले ही पकड़ा गया. अदनान के पकड़े जाने के बाद मात्र 24 घंटे में थानाप्रभारी पवन सिंघल ने इस घटना में शामिल विशाल पहलवान, प्रताप सिंह, इदरीस, शहनवाज, मोहम्मद आसिफ, अब्दुल मन्नान, मुनीम सुरेश यादव को गिरफ्तार कर लिया, जबकि अली असगर, मोंटी, शूटर सलमान शेख एवं राजू दूधवाला फरार हो गए.

अली असगर पर आरोप है कि उस ने पिता की हत्या के लिए सुपारी देने के लिए अदनान को 5 लाख रुपए उधार दिए थे. पुलिस ने पूछताछ के बाद पकड़े गए सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां बाकी आरोपियों को तो जेल भेज दिया, लेकिन अदनान और विशाल उर्फ सोनू को साक्ष्य जुटाने के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि के दौरान अदनान और विशाल की निशानदेही पर इंदौर से 80 किलोमीटर दूर धरमपुरी से अदनान की वह सफेद रंग की आल्टो कार, जिस का नंबर एमपी09सी ई4616 था, को बरामद कर लिया गया.

पुलिस ने वह देशी पिस्तौल और कारतूस भी बरामद कर लिए थे, जिस से खुजेमाभाई पर गोली चलाई गई थी. रिमांड समाप्त होने पर पुलिस ने अदनान एवं विशाल उर्फ सोनू पहलवान को पुन: अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें भी जेल भेज दिया गया. 30 मार्च, 2015 को शूटर सलमान शेख और मोहम्मद जीशान को भी गिरफ्तार कर लिया गया. ये दोनों कुछ दिनों तक शहर से बाहर कहीं छिपे थे. जब उन्हें लगा कि शायद उन का नाम सामने नहीं आया है, तब वे अपनेअपने घर वापस आ गए थे. उन के घर आते ही पुलिस ने छापा मार कर उन्हें पकड़ लिया था. पुलिस ने वह मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली थी, जिस पर सवार हो कर शूटरों ने उन पर गोली चलाई थी.

पुलिस की अब तक की जांच में पता चला है कि खुजेमाभाई की हत्या की योजना में अदनान की मदद उस के दोस्त अली असगर ने भी की थी. यह बात उन के फोन के काल डिटेल्स से पता चली है. पुलिस अन्य अभियुक्तों की भी काल डिटेल्स निकलवा कर जांच कर रही है. शूटर सलमान शेख, इंदौर के नंदलाल पुरा, कबूतर खाना का रहने वाला था. जीशान और शूटर शेख ने अपना अपराध स्वीकार कर के मामले से जुड़ी सारी बातें विस्तार से पुलिस को बता दी हैं. दोनों ने बताया है कि उन्होंने जो भी किया है, वह अदनान, अली असगर और विशाल उर्फ सोनू पहलवान के कहने पर किया है. 31 मार्च को बजरिया के रहने वाले उन के साथी शहनवाज उर्फ गोलू कुरैशी को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने इन तीनों को भी अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया है.

अली असगर और राजू दूधवाला अभी पुलिस की गिरफ्त से दूर हैं. कथा लिखे जाने तक जेल गए मुजरिमों में से किसी की भी जमानत नहीं हुई थी. पुलिस फरार अभियुक्तों की तलाश कर रही थी. Gujarat Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Rajasthan Desert Culture: श्रृंगार से ऊंटों को शाही सवारी बनाने वाले अशोक टाक

Rajasthan Desert Culture: राजस्थान के अशोक टाक का अपना व्यक्तित्व तो है ही, उन की राजस्थानी कला का भी कोई जवाब नहीं. उन्होंने ऊंट शृंगार में महारत हासिल की है और इस के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ने उन की सराहना की है. मरुधरा मारवाड़ अंचल में हमेशा से पानी का अभाव रहा है. पानी के अभाव की वजह से ही यहां रेगिस्तान का जहाज कहलाने वाले ऊंट का बहुत महत्त्व है. क्योंकि यह ऐसा प्राणी है, जो कई दिनों तक बिना पानी के रह सकता है. ज्ञातव्य हो मोटरगाडि़यों के आविष्कार से पहले यहां घोड़े और ऊंट ही सवारियों में प्रयुक्त होते थे. राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में तो शुरू से ही सारी व्यापारिक गतिविधियां ऊंटों द्वारा चलती रही हैं.

कभी राजामहाराजाओं के दरबार में ऊंट की सवारी आनबानशान का प्रतीक हुआ करती थी. राजाओं के ऊंटों का तो खास तरह से शृंगार किया जाता था. मांगलिक उत्सवों में आज भी ऊंटों का शृंगार किया जाता है. विभिन्न रियासतों के बीच ऊंट दौड़ के आयोजन का भी खूब प्रचलन था. फिलहाल राजस्थान अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत की वजह से विश्व भर में पर्यटन का केंद्र बना हुआ है. विदेशी पर्यटक यहां के तीजत्यौहार और मेलों में राजस्थानी संस्कृति को नजदीक से देखतेसमझते हैं. यहां की विभिन्न विशेषताओं, खानपान, रहनसहन, धार्मिक परंपरा, वेशभूषा, घोड़ेऊंट की सवारी के साथसाथ ऊंट का शृंगार उन्हें विशेष रूप से लुभाता है. राजस्थान की सर्वाधिक विशेषता है, यहां की परंपराएं और तीजत्यौहार.

इन तीजत्यौहारों और परंपराओं को भिन्नभिन्न तरीकों से उल्लासपूर्वक पारंपरिक वेशभूषा से सजधज कर मनाया जाता है. यहां की संस्कृति की समानता विश्व भर में कहीं नजर नहीं आती. यहां राजामहाराजा, सेठसाहूकार, ठाकुरठिकानेदार, चौधरीपटेल और गरीबमजदूर सभी की पहचान उन की पारंपरिक पोशाक और गहनों से होती आई है. इतना ही नहीं, व्यक्ति के साथसाथ उस के रथ, हाथी, घोड़े और ऊंटों को भी विशेष अवसरों पर उस के अनुरूप ही सजाया जाता था. खास अवसरों की झांकियां देखते ही बनती थीं. विज्ञान का युग आया तो सवारियों का स्थान स्वचालित वाहनों ने ले लिया. वेशभूषा भी पश्चिम के प्रभाव में आ गई. ऐसे में राजस्थान की संस्कृति को सहेजने का बीड़ा उठाया पुष्कर (राजस्थान) के अशोक टाक ने. अशोक टाक ऊंट शृंगार व पर्यटन के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ हैं.

उन का जन्म 15 जनवरी, 1962 को पुष्कर में हुआ था. बीकौम तक शिक्षा अजमेर में ली, लेकिन बचपन से ही उन का रुझान प्रदेश की पुरातन पोशाकों, गहनों और ऊंट, हाथी के शृंगार की तरफ था. पुष्कर अंतरराष्ट्रीय नक्शें में एक महत्त्वपूर्ण पर्यटनस्थल है और यहां प्रतिवर्ष लाखों पर्यटक घूमने आते हैं. पर्यटक पुष्कर आ कर जब अपने जैसे ही अर्धनग्न लोगों को देखते तो अशोक टाक से पूछ बैठते, ‘‘वेयर इज योर राजस्थानी कल्चर?’’

यह शब्द अशोक टाक को चुभने लगा तो उन्होंने राजामहाराजाओं, सेठसाहूकारों से ले कर झोपड़ों में रहने वाले मजदूर, किसान तथा घुमक्कड़ लोगों तक की मूल पोशाकें गांवगांव, ढाणीढाणी जा कर खरीद कर संग्रहित कीं और ऊंट की सभी प्रकार की शृंगार सामग्री के उपकरण भी खरीद कर संग्रहित किए. पर्यटन सांस्कृतिक मेलों व समारोहों में आयोजित प्रदर्शनियों में भाग ले कर टाक ने राजस्थानी संस्कृति का परिचय ‘म्हारो छैल छबीलो नखरालो काजलियों’ ऊंट सजा कर लुप्त होती हुई कला को उजागर करना आरंभ कर दिया.

धीरेधीरे टाक पर्यटकों और पर्यटन विभाग की नजर में ऐसे चढ़े कि अब कोई प्रदर्शनी या मेला अशोक टाक की प्रदर्शनी के बिना बेजान तथा अधूरा लगता है. टाक की प्रसिद्धि और मांग ने सरकार के उच्च पदाधिकारियों और संस्थानों को भी आकृष्ट किया. अशोक टाक को ऊंट शृंगार व संस्कृति प्रचारक के कारण विवेकानंद सेवा संस्थान द्वारा 2005 में पुरस्कार से नवाजा गया. इस मौके पर उन्होंने गांव में एक ऊंट का शृंगार किया, जिस में 3 घंटे से अधिक का समय लगा. इस के बाद नागौर जिले के कोलिया गांव में ऊंट की राजसी सवारी निकाली गई. 300 प्रकार के गहने से ऊंट का शृंगार करने के बाद ऊंट की आभा ही बदल गई थी. ऊंट शृंगार पर 2 लाख रुपए से अधिक की शृंगार सामग्री लगाई गई. सभी ग्रामीणों ने उन की इस शृंगार कला को सराहा.

बचपन से ही पुरानी वस्तुओं के प्रति आकर्षण ने उन्हें हाथी और ऊंट के शृंगार की कला को सिखाया. उन्होंने इसी क्षेत्र में परिश्रम कर विशेषता हासिल की. अशोक टाक बताते हैं कि वह ऊंट व हाथी के सजावटी सामान को ढूंढने राजस्थान के मारवाड़, मेवाड़, ढूंढाड़ व शेखावटी क्षेत्र के छोटेबड़े गांवों में गए और घूमघूम कर दुर्लभ शृंगार की पुरानी वस्तुओं का संग्रह किया. इतनी मेहनत के बाद आज पुष्कर में उन का अपना निजी संग्रहालय और आर्ट गैलरी ‘कल्पवृक्ष’ है. अशोक टाक की इस कला ने उच्चाधिकारियों को भी आकृष्ट किया है. 2002 में अशोक टाक को सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर ने शृंगार कला पर शिल्प सम्मान दिया.

तत्कालीन राज्यपाल बलिराम भगत व अंशुमान सिंह तथा जोधपुर नरेश गज सिंह सहित सैकड़ों प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने टाक की कला की प्रशंसा की. उन के पारंपरिक शृंगारित वस्तुओं के संग्रह को देख कर कोई भी आश्चर्यचकित रह जाएगा. पुष्कर मेला, नागौर पशु मेला, बीकानेर ऊंट उत्सव, जैसलमेर मरू महोत्सव, मारवाड़ जोधपुर समारोह, जयपुर हाथी समारोह, उदयपुर शिल्पग्राम, चुरू उत्सव, पाटा सम्मेलन जयपुर, तरनेतर मेला, गुजरात, हैदराबाद और कशीदा सेमिनार में अशोक टाक ने अपनी शृंगार कला का प्रदर्शन कर के कई महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त किए.

लुप्त होती शृंगारित कला को जीवंत रखने का उन के द्वारा पिछले 17 सालों से निरंतर प्रयास जारी है. आयुक्त, जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक से ले कर राज्यपाल ही नहीं, अनेक प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों और राज्य सरकारों ने टाक को सम्मानित किया और राजस्थान की लोक कला तथा अमूल्य पारंपरिक शृंगारों, पोशाकों तथा ऊंटों के शृंगारों को देख कर आश्चर्य व्यक्त किया. उन्हें अजमेर जिला कलेक्टर ने लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान भी दिया.

सन 2006 में गुजरात के रणोत्सव में टाक को प्रथम पुरस्कार देते हुए वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें राजस्थानी और राजस्थान का मोबाइल म्यूजियम बताया. अशोक टाक की संकलित की गई दुर्लभ कशीदाकारी व सोनेचांदी की शुद्ध जरी से बनी राजसी पोशाकें देशीविदेशी पर्यटकों को भी आकृष्ट करती हैं. वह इस कला को गांव, ढाणी, शहर, राज्य, राष्ट्र व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करने के लिए प्रयासरत हैं. अशोक निश्चित रूप से प्रोत्साहन व बधाई के पात्र हैं. विगत 18 सालों से इन के साथ कंधे से कंधा मिला कर उन की पत्नी शिवानी भी उन्हें पूरा सहयोग दे रही हैं. Rajasthan Desert Culture