हिमांशु के सीने पर गांव वालों ने दागी गोलियां, प्रेमिका सोनी लापता

बिहार के जिला भागलपुर स्थित कजरैली इलाके का एक गांव है गौराचक्क. वैसे तो इस गांव में सभी जातियों के लोग रहते हैं. लेकिन यहां बहुतायत यादवों की है. यहां के यादव साधनसंपन्न हैं. उन में एकता भी है. उन की एकजुटता की वजह से पासपड़ोस के गांवों के लोग उन से टकराने से बचते हैं.

इसी गांव में परमानंद यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 1 बेटी और 2 बेटे थे. बेटी बड़ी थी, जिस का नाम सोनी था. साधारण शक्लसूरत और भरेपूरे बदन की सोनी काफी मिलनसार और महत्त्वाकांक्षी थी. उस के अंदर काफी कुछ कर गुजरने की जिजीविषा थी.

2 बेटों के बीच एकलौती बेटी होने की वजह से सोनी को घर में सभी प्यार करते थे. उस की हर एक फरमाइश वह पूरी करते थे. सोनी के पड़ोस में हिमांशु यादव रहता था. रिश्ते में सोनी उस की बुआ लगती थी. यानी दोनों में बुआभतीजे का रिश्ता था. दोनों हमउम्र थे और साथसाथ पलेबढे़ पढ़े भी थे. वह बचपन से एकदूसरे के करीब रहतेरहते जवानी में पहुंच कर और ज्यादा करीब आ गए. यानी बचपन के रिश्ते जवानी में आ कर सभी मर्यादाओं को तोड़ते हुए प्यार के रिश्ते की माला में गुथ गए.

सोनी और हिमांशु एकदूसरे से प्यार करते थे. इतना प्यार कि एकदूसरे के बिना जीने की सोच भी नहीं सकते थे. वे जानते थे कि उन के बीच बुआभतीजे का रिश्ता है. इस के बावजूद अंजाम की परवाह किए बगैर प्यार की पींग बढ़ाने लगे. बुआभतीजे का रिश्ता होने की वजह से घर वालों ने भी उन की तरफ कोई खास ध्यान नहीं दिया.

एक दिन दोपहर का वक्त था. सोनी से मिलने हिमांशु उस के घर गया. कमरे का दरवाजा खुला हुआ था. सोनी सोफे पर अकेली बैठी कुछ सोच रही थी. हिमांशु को देखते ही मारे खुशी के उस का चेहरा खिल उठा. हिमांशु के भी चेहरे पर रौनक आ गई. वह भी मुसकरा दिया. तभी सोनी ने उसे पास बैठने का इशारा किया तो वह उस के करीब बैठ गया.

‘‘क्या बात है सोनी, घर में इतना सन्नाटा क्यों है?’’ हिमांशु चारों तरफ नजर दौड़ाते हुए बोला, ‘‘चाचाचाची कहीं बाहर गए हैं क्या?’’

‘‘हां, आज सुबह ही मम्मीपापा किसी काम से बाहर चले गए. वे शाम तक ही घर लौटेंगे और दोनों भाई भी स्कूल गए हैं.’’ वह बोली.

‘‘इस एकांत में बैठी तुम क्या सोच रही थी?’’  हिमांशु ने पूछा.

‘‘यही कि सामाजिक मानमर्यादाओं को तोड़ कर जिस रास्ते पर हम ने कदम बढ़ाए हैं, क्या समाज हमारे इस रिश्ते को स्वीकार करेगा?’’ सोनी बोली.

‘‘शायद समाज हमारे इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करेगा.’’ हिमांशु ने तुरंत कहा.

‘‘फिर क्या होगा हमारे प्यार का? मुझे तो उस दिन की सोच कर डर लगता है, जिस दिन हमारे इस रिश्ते के बारे में मांबाप को पता चलेगा तो पता नहीं क्या होगा?’’ सोनी ने लंबी सांस लेते हुए कहा.

‘‘ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, वे हमें जुदा करने की कोशिश करेंगे.’’ सोनी की आंखों में आंखें डाले हिमांशु आगे बोला, ‘‘इस से भी जब उन का जी नहीं भरेगा तो हमें सूली पर चढ़ा देंगे. अरे हम ने प्यार किया है तो डरना क्या? सोनी, मेरे जीते जी तुम्हें किसी से भी डरने की जरूरत नहीं है.’’

‘‘सच में इतना प्यार करते हो मुझ से?’’ वह बोली.

‘‘चाहो तो आजमा लो, पता चल जाएगा.’’ हिमांशु ने तैश में कहा.

‘‘ना बाबा ना. मैं ने तो ऐसे ही तुम्हें तंग करने के लिए पूछ लिया.’’

‘‘अच्छा, अभी बताता हूं, रुक.’’ कहते हुए हिमांशु ने सोनी को बांहों में भींच लिया. वह कसमसाती हुई उस में समाती चली गई. एकदूसरे के स्पर्श से उन के तनबदन की आग भड़क उठी. कुछ देर तक वे एकदूसरे में समाए रहे, जब होश आया तो वे नजरें मिला कर मुसकरा पड़े. फिर हिमांशु वहां से चला गया.

लेकिन उन का यह प्यार और ज्यादा दिनों तक घर वालों की आंखों से छिपा हुआ नहीं रह सका. सोनी के पिता को जब जानकारी मिली तो उन के पैरों तले जमीन खिसक गई. परमानंद यादव बेटी को ले कर गंभीर हुए तो दूसरी ओर उन्होंने हिमांशु से साफतौर पर मना कर दिया कि आइंदा वह न तो सोनी से बातचीत करेगा और न ही उन के घर की ओर मुड़ कर देखने की कोशिश करेगा. अगर उस ने दोबारा ऐसी ओछी हरकत करने की कोशिश की तो इस का अंजाम बहुत बुरा होगा.

प्रेम प्रसंग की बातें गांवमोहल्ले में बहुत तेजी से फैलती  हैं. परमानंद ने बहुत कोशिश की कि यह बात वह किसी और के कानों तक न पहुंचे पर ऐसा हो नहीं सका. लाख छिपाने के बावजूद पूरे मोहल्ले में सोनी और हिमांशु की प्रेम कहानी के चर्चे होने लगे. इस से परमानंद का मोहल्ले में निकलना दूभर हो गया.

परमानंद ने सोनी पर कड़ा पहरा बिछा दिया. सोनी के घर से बाहर अकेला जाने पर पाबंदी लगा दी. पत्नी से भी उन्होंने कह दिया कि सेनी को अगर घर से बाहर जाना भी पड़ेगा तो उस के साथ घर का कोई एक सदस्य जरूर जाएगा.

पिता द्वारा पहरा बिठा देने से हिमांशु और सोनी की मुलाकात नहीं हो पा रही थी. सोनी की हालत जल बिन मछली की तरह हो गई थी. उसे न तो खानापीना अच्छा लगता था और न ही किसी से मिलनाजुलना. उस के लिए एकएक पल काटना पहाड़ जैसा लगता था.

सोनी की एक झलक पाने के लिए वह बेताब था. पागलदीवानों की तरह वह यहांवहां भटकता फिरता था. उस की हालत देख कर मां जेलस देवी काफी परेशान रहती थी. मां ने भी बेटे को काफी समझाया कि उस ने जो किया, उसे समाजबिरादरी कभी मान्यता नहीं दे सकती. रिश्ते के बुआभतीजे की शादी को कोई स्वीकार नहीं करेगा. बेहतर है, तुम इसे बुरा सपना समझ कर भूल जाओ.

मगर हिमांशु मां की बात को मानने को तैयार नहीं था. उधर सोनी ने भी अपनी मां से कह दिया कि वह हिमांशु के अलावा किसी और लड़के से शादीनहीं करेगी. मां ने बहुत समझाया लेकिन प्रेम में अंधी सोनी की समझ में नहीं आया. वह अपनी जिद पर अड़ी रही.

मां भी क्या करती, जब समझातेसमझाते वह थक गई तो उस ने कुछ भी कहना छोड़ दिया. काफी देर बाद सोनी की समझ में आया कि उसे आजादी पानी है तो पहले घर वालों को विश्वास दिलाना होगा कि वह हिमांशु को पूरी तरह भूल चुकी है. घर वालों को जब उस पर विश्वास हो जाएगा तब वह इस का फायदा उठा कर हिमांशु तक पहुंच सकती है. अगर एक बार वह उस के पास पहुंच गई तो उसे कोई रोक नहीं पाएगा.

ये दिमाग में विचार आते ही सोनी का चेहरा खिल उठा और वह घडि़याली आंसू बहाते हुए मां की गोद में जा कर समा गई, ‘‘मां मुझे माफ कर दो. वाकई मुझ से बड़ी भूल हो गई थी. मैं ने आप की बात नहीं मानी, इसलिए आप के मानसम्मान को ठेस पहुंची. मेरी ही वजह से आप को और पापा को बेइज्जती का सामना करना पड़ा. पता नहीं ये सब कैसे हो गया. बताओ अब मैं क्या करूं.’’

‘‘देख बेटी, सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते. फिर तू तो मेरा अपना खून है.’’ मां ने सोनी को समझाया, ‘‘मैं तो कहती हूं बेटी कि जो हुआ उसे बुरा सपना समझ कर भूल जा. तेरी शादी मैं अच्छे से अच्छे खानदान में करूंगी.’’

उस के बाद मांबेटी एकदूसरे के गले मिल कर पश्चाताप के आंसू पोंछती रहीं. मां को विश्वास में ले कर सोनी मन ही मन खुश थी. उस के होंठों पर एक अजीब सी कुटिल मुसकान थिरक उठी थी.

मांबाप को भी जब पक्का यकीन हो गया कि सोनी ने हिमांशु से बात तक करनी बंद कर दी है तो उन्होंने धीरेधीरे उस के ऊपर की पाबंदी हटा ली. पिता परमानंद अब उस के लिए लड़का ढूंढने लगे ताकि वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकें.

परमानंद को इस बात की जरा भी भनक नहीं थी, उन की बेटी मांबाप की आंखों में धूल झोंक रही है. जबकि उस की योजना प्रेमी के साथ फुर्र हो जाने की है.

योजना मुताबिक, सोनी ने मां के सामने ननिहाल जाने की इच्छा प्रकट की तो मां उसे मना नहीं कर सकी. सोचा कि बेटी ननिहाल घूम आएगी तो मन भी बदल जाएगा. यही सोच कर सितंबर, 2016 में उसे बेटे के साथ ननिहाल भेजवा दिया.

ननिहाल पहुंचते ही सोनी आजाद पंछी की तरह हो गई. उस ने हिमांशु को फोन कर दिया कि वह ननिहाल में आ गई है. यहां उस पर किसी तरह की कोई पाबंदी या बंदिश नहीं है. इसलिए वह यहां आ कर उस से मिल सकता है. यह खबर मिलते ही हिमांशु उस की ननिहाल पहुंच गया.

महीनों बाद दोनों एकदूसरे से मिले थे. उन्होंने पहले जी भर कर एकदूसरे को प्यार किया. उसी वक्त सोनी ने हिमांशु से कह दिया कि वह उस के बिना जी नहीं सकती. वो उसे यहां से कहीं दूर ऐसी जगह ले चले, जहां उन के अलावा कोई तीसरा न हो. हिमांशु भी यही चाहता था कि सोनी को ले कर वह इतनी दूर चला जाए, जहां अपनों का साया तक न पहुंच सके.

सोनी घर से भागने के लिए हिमांशु पर दबाव बनाने लगी. प्यार के सामने विवश हिमांशु यार दोस्तों से कुछ रुपयों का बंदोबस्त कर के उसे ले कर दिल्ली भाग गया. परमानंद को जब पता चला तो वह आगबबूला हो उठा. उस ने हिमांशु और उस के घर वालों के खिलाफ कजरैली थाने में बेटी के अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया.

अपहरण का मुकदमा दर्ज होते ही कजरैली  थाने की पुलिस सक्रिय हुई. पुलिस ने हिमांशु के घर पर दबिश दी. हिमांशु घर से गायब मिला तो पुलिस हिमांशु की मां जेलस देवी को थाने ले आई. उस से सख्ती से पूछताछ की लेकिन वह कुछ नहीं बता पाई. तब पुलिस ने जेलस देवी को घर भेज दिया.

कई महीने बाद भी जब सोनी का पता नहीं चला तो पुलिस हिमांशु और सोनी को हाजिर कराने के लिए जेलस देवी पर बारबार दबाव बनाती रही. कहीं से यह बात हिमांशु को पता चल गई कि पुलिस उस की मां को बारबार परेशान कर रही है. तब 8 महीने बाद हिमांशु सोनी को ले कर घर लौट आया.

सोनी ने अदालत में हाजिर हो कर न्यायाधीश के सामने यह बयान दिया कि वह बालिग हो चुकी है. अपनी मनमरजी से कहीं आजा सकती है. उसे अच्छेबुरे का ज्ञान है. अब रही बात मेरे अपहरण करने की तो मैं अपने मरजी से ननिहाल गई थी. वहीं रह रही थी, हिमांशु ने मेरा अपहरण नहीं किया था. बल्कि मैं अपनी मरजी से कहीं गई थी. हिमांशु निर्दोष है.

भरी अदालत में सोनी के बयान सुन कर परमानंद और उन के साथ आए लोग दंग रह गए, क्योंकि उस ने हिमांशु के पक्ष में बयान दिया था. सोनी के बयान के आधार पर अदालत ने उसे मुक्त दिया.

यह सब सोनी की वजह से ही हुआ था. इसलिए परमानंद भीतर ही भीतर जलभुन कर रह गया. उस समय तो उस ने समझदारी से काम लिया. वह सोनी को ले कर घर आ गया और हिमांशु अपने घर चला गया. घर ला कर परमानंद ने सोनी को बंद कमरे में खूब मारापीटा. फिर उसे उसी कमरे में बंद कर के बाहर से ताला लगा दिया.

इस के बाद परमानंद ने ठान लिया कि हिमांशु की वजह से ही पूरे समाज में उस के परिवार की नाक कटी है, इसलिए वह उसे ऐसा सबक सिखाएगा कि सब देखते रह जाएंगे. वह धीरेधीरे गांव के लोगों को भी हिमांशु के खिलाफ भड़काने लगा कि उस की वजह से ही पूरे गांव की बदनामी हुई है.

योजना को अंजाम देने के लिए परमानंद ने एक योजना बनाई. योजना के अनुसार, वह और उस का परिवार एकदम शांति से रहने लगा ताकि हिमांशु को रास्ते से हटाने के बाद सभी को यही लगे कि इस में उस का कोई हाथ नहीं है. परमानंद अभी यह तानाबाना बुन ही रहा था कि एक नई घटना घट गई.

20 अप्रैन, 2017 को सोनी फिर हिमांशु के साथ भाग गई. इस बार हिमांशु के साथ हिमांशु का परिवार भी खड़ा था. दोनों का प्यार देख कर घर वालों ने दोनों की सहमति से मंदिर में शादी करा दी थी. शादी के 15 दिनों बाद हिमांशु और सोनी फिर गांव लौट आए. इस बार सोनी अपने घर के बजाय हिमांशु के घर गई.

हिमांशु और सोनी के लौटने की खबर पूरे गांव में जंगल की आग की तरह फैल गई. गांव वाले दोनों की हिम्मत देख कर हतप्रभ थे कि हिम्मत तो देखिए रिश्तों को कलंकित करते कलेजे को ठंडक नहीं पहुंची जो गांव को बदनाम करने फिर से यहां आ गए. खैर, जैसे ही ये खबर परमानंद को मिली तो उस का खून खौल उठा. वह आपे से बाहर हो गया.

अगले दिन यानी 5 जून, 2017 को सुबह के करीब 10 बजे गांव में पंचायत बुलाई गई. पंचायत परमानंद के दरवाजे के सामने रखी गई. उस में सैकड़ों की तादाद में गांव वालों के अलावा 21 पंच जुटे. सभी पंच परमानंद के पक्ष में खड़े उस की हां में हां मिला रहे थे. पंचायत में हिमांशु के परिवार का कोई भी सदस्य शामिल नहीं था.

पंचायत की अगुवाई गांव का गणेश यादव कर रहा था. एक दिन पहले ही गणेश यादव जेल से जमानत पर रिहा हुआ था. पंचायत में प्रताप यादव सिपाही भी था. वह बक्सर में तैनात था और कुछ दिनों की छुट्टी पर घर आया था. इसी की मध्यस्थता में पंचायत शुरू हुई थी.

10 बजे शुरू हुई पंचायत शाम 5 बजे तक चली. अंत में पंचों ने एकमत हो कर हिमांशु के खिलाफ तुगलकी फरमान सुना दिया कि हिमांशु ने जो किया वह बहुत गलत किया. उस की करतूतों से गांव की भारी बदनामी हुई है. उसे उस की गलती की सजा तो मिलनी ही चाहिए ताकि आइंदा गांव का कोई दूसरा युवक ऐसी जुर्रत करने के बारे में सोच भी न सके.

सभी पंचों ने कहा कि हिमांशु की गलती की सजा मौत है. उसे जान से मार देना चाहिए. इस पर पंचायत के सभी लोग सहमत हो गए. सभी ने लाठी, डंडा, तलवार, पिस्टल, ईंट आदि ले कर उस के घर पर एकाएक हमला बोल दिया.

हिमांशु यादव घर पर ही था. उस के घर का दरवाजा बंद था. दरवाजे को तोड़ कर लोग उसे घर के भीतर से खींच लाए और उस का शरीर गोलियों से छलनी कर के पूरी भड़ास निकाल दी. इस के बाद महिलाएं उस की गर्भवती पत्नी सोनी को भी कमरे से खींच कर कहीं ले गईं. उस दिन के बाद से आज तक उस का कहीं पता नहीं चला कि वह जिंदा भी है या उस के साथ कोई अनहोनी हो चुकी है.

बेटे और बहू को बचाने गई हिमांशु की मां जेलस देवी भी पंचों के कोप का शिकार बन गई. उसे भी मारमार कर अधमरा कर दिया गया. पंच बने आतताइयों का जब इस से भी जी नहीं भरा तो उन्होंने उस के घर को आग लगा दी और फरार हो गए.

दिल दहला देने वाली घटना की सूचना जैसे ही थाना कजरैली के थानाप्रभारी विजय कुमार को मिली तो उन के हाथपांव फूल गए. वह तत्काल मयफोर्स के घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. मौके पर पहुंचते ही सूचना उच्चाधिकारियों को दे दी गई. सूचना मिलते ही एसएसपी मनोज कुमार, एसपी (सिटी)  और सीओ गौराचक्क गांव पहुंच गए. पीडि़त परिवार के लोगों से मिलने के बाद पुलिस ने आतताइयों के घर दबिश दी लेकिन वे सभी अपनेअपने घरों से फरार मिले.

पुलिस ने हिमांशु की घायल मां जेलस देवी को इलाज के लिए मायागंज अस्पताल पहुंचवा दिया. हिमांशु की लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. मौके से कई खाली खोखे बरामद हुए. गांव का तनावपूर्ण माहौल देखते हुए एसएसपी ने वहां पीएसी की 2 टुकडि़यां तैनात कर दीं ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे.

पुलिस ने अस्पताल में जेलस देवी के बयान लिए तो उस ने पूरी घटना सिलसिलेवार बता दी. उस के बयान के आधार पर कजरैली थाने में हत्या, हत्या का प्रयास और बलवा करने की विभिन्न धाराओं में 21 आरोपियों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज हुआ.

मामले में बहू सोनी के पिता और मुख्य आरोपी परमानंद यादव सहित सुनील यादव, भितो यादव, सुमन यादव, सीताराम यादव, विवेक यादव, प्रकाश यादव उर्फ विक्की, पूसो यादव, राजा यादव, पंकज यादव, प्रकाश यादव, अधिक यादव, प्रताप यादव (सिपाही), विजय यादव, अजब लाल यादव, गणेश यादव, वरुण यादव, सुमन यादव, अरुण यादव, कुशी यादव और गोपाल यादव को नामजद आरोपी बनाया गया.

हिमांशु यादव की पत्नी सोनी यादव के अपहरण का अलग से मुकदमा दर्ज किया गया. इस मुकदमे में आरोपी आशा देवी, राधा देवी, रुक्मिणी देवी, मनीषा देवी, अंजू देवी, अन्नू देवी, नागो यादव और अब्बो देवी को नामजद दिया गया. यह सब भी अपनेअपने घर से फरार मिलीं. पर 2 हमलावर प्रकाश यादव और राजा यादव पुलिस के हत्थे चढ़ गए. पुलिस ने उन से पूछताछ कर उन्हें जेल भेज दिया. घटना के बाद गांव के लोग 2 खेमों में बंट गए.

धीरेधीरे 10-12 दिन बीत गए. हिमांशु हत्याकांड और सोनी अपहरण के आरोपियों का पुलिस पता तक नहीं लगा सकी. समाचार पत्र इस लोमहर्षक घटना की खबरें छापछाप कर पुलिस की नाक में दम कर रहे थे. दबाव बनाने के लिए पुलिस ने 20 जून, 2017 को न्यायालय से आरोपियों की संपत्ति के कुर्कीजब्ती के आदेश ले लिए.

आरोपियों को जब पता चला कि पुलिस ने न्यायालय से उन की संपत्ति के कुर्कीजब्ती के आदेश ले लिए हैं तो सीताराम यादव, सुनील यादव, विवेक यादव, अरुण यादव, कुशो यादव और सुमन यादव ने 14 जुलाई, 2017 को अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी रंजन कुमार मिश्रा की कोर्ट में सरेंडर कर दिया. कोर्ट से सभी आरोपियों को जेल भेज दिया.

इस के पहले भी 2 आरोपियों ने कोर्ट में सरेंडर किया था और 3 को पुलिस पहले गिरफ्तार कर चुकी थी. बाकी अभियुक्तों को भी पुलिस तलाशती रही. 30 जुलाई, 2017 को मुख्य आरोपी परमानंद यादव को पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर बांका जिले से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उस से सोनी के बारे में पूछताछ की तो उस ने अनभिज्ञता जताई.

इस केस में अजब लाल यादव भी आरोपी था. जबकि उस के घर वालों का कहना है कि उस का इस मामले से कोई लेनादेना नहीं है. उस की बेटी अनुष्ठा ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयेग को पत्र लिख कर कहा कि उस के पिता को गलत फंसाया गया है. मानवाधिकार आयोग ने 8 जनवरी, 2018 को एसएसपी मनोज कुमार से हिमांशु हत्याकांड की ताजा रिपोर्ट देने को कहा.

आयोग के सवालों के जवाब देने के लिए एसएसपी ने डीएसपी (सिटी) को अधिकृत कर दिया. कथा लिखे जाने तक जवाब तैयार नहीं हुआ था. अपहृत सोनी का कुछ पता नहीं चल सका था. हिमांशु के घर वालों ने अपहरण कर के सोनी की हत्या की आशंका जताई है.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बेवफा बीवी का कातिल कौन : पति या आशिक

रविवार 21 जनवरी, 2018 का अलसाया हुआ दिन था. बसंत ऋतु ने दस्तक दे दी थी, लेकिन सूरज की किरणों में फिर भी तेजी नहीं आई थी. सिहराती सर्द हवाओं के बीच आसमान दिन भर मटमैले बादलों से ही अटा रहा. लेकिन मौसम की बदमिजाजी से लोगों की आमदरफ्त में कोई तब्दीली नहीं आई थी.

कोटा स्टेशन की बाहरी हदों से शुरू होने वाले बाजार में रोजमर्रा की रौनक जस की तस कायम थी. अगर कोई फर्क था तो इतना कि लोगों के चेहरों पर कशमकश के भाव थे और शौपिंग की बजाय उन की उत्सुकता चोपड़ा फार्म जाने वाली गली नंबर-2 की तरफ थी, जिसे पूरी तरह पुलिसकर्मियों ने घेर रखा था.
तेज होती खुसुरफुसुर से ही पता चला कि किसी ने एक महिला और उस के बेटे की हत्या कर दी है. यह वारदात वहां रहने वाले चर्चित भाजपा नेता नीरज पाराशर के परिवार में हुई थी.

दमाशों ने घर में घुस कर नीरज पाराशर की पत्नी सोहनी और 12 साल के बेटे पीयूष को गोली मार दी थी.

बेटी तान्या वारदात का शिकार होने से बच गई थी. दरअसल, गोली लगने से पहले ही सोहनी ने उसे घर से बाहर फेंक दिया था. शोर मचा तो आसपास के रहने वाले लोग फौरन मौके पर पहुंच गए, लेकिन बदमाश तब तक भाग चुके थे.

खबर मिलने पर भीममंडी के थानाप्रभारी रामखिलाड़ी पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए थे. इस दोहरे हत्याकांड की खबर जब उन्होंने आला अधिकारियों को दी तो एएसपी समीर कुमार, डीएसपी शिवभगवान गोदारा, राजेश मेश्राम भी वहां आ गए. 10 मिनट बाद आईजी विशाल बंसल और एसपी अंशुमान भोमिया भी वहां पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों के सामने जो चुनौती मुंह बाए खड़ी थी, उस से निपटना आसान नहीं था. क्योंकि कुछ ही दिनों पहले स्टेशन क्षेत्र में एक और भाजपा नेता की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी. इस के अलावा शहर में हत्या की और भी कई वारदातें अनसुलझी पड़ी थीं. इस सब को ले कर एसपी साहब के चेहरे पर तनाव साफ दिखाई दे रहा था.

केस बड़ा पेचीदा था. पुलिस इस बात पर भी हैरान थी कि इस चहलपहल वाले इलाके में नीरज पाराशर के मकान में बदमाश बेखौफ हो कर आए और मांबेटे को गोलियों से भून कर चले गए.

सोहनी की करपटी और उस के बेटे पीयूष के सीने में गोलियां लगी थीं. लग रहा था जैसे उन्हें गोली बहुत करीब से मारी गई थी. एक गोली कमरे की दीवार पर भी लगी थी, दीवार पर गोली टकराने का निशान बन गया था. पुलिस ने मौके से गोली का खोल भी बरामद कर लिया.

सूचना मिलने पर पुलिस फोटोग्राफर, क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम, डौग स्क्वायड और एफएसएल की टीमें भी वहां पहुंच गई थीं. सभी टीमें अपनेअपने ढंग से काम कर के लौट गईं. थानाप्रभारी रामखिलाड़ी मीणा ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और आगे की जांच में जुट गए.

उन्होंने नीरज पाराशर से बात की तो उस ने बताया कि घटना के वक्त वह सब्जी लेने के लिए बाजार गया हुआ था. सरेआम हुई इस वारदात ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी थी. गोली चलाने वाले कौन थे, किस तरफ भागे थे, किसी को कुछ पता नहीं था. पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज भी खंगाले, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

पुलिस ने पड़ोसियों से बात की तो उन्होंने बताया कि हम ने गोलियां चलने की आवाज तो नहीं सुनी अलबत्ता मार दिया…मार दिया… की चीखपुकार जरूर सुनी थी. जिस के बाद वे लोग पाराशर के मकान की तरफ दौड़े. हालांकि कुछ लोगों ने पाराशर के मकान से एक आदमी को भागते देखा, लेकिन वह कौन था, कैसे आया और कहां गया, इस बाबत कुछ नहीं बता पाए.

पुलिस पूछताछ में रोताबिलखता नीरज ठीक से कुछ नहीं बता पा रहा था. टुकड़ों में जो कुछ वह कह रहा था, उस से पुलिस सिर्फ इतना समझ पाई कि उस की पत्नी सोहनी मुरैना की रहने वाली थी, जहां पड़ोस में रहने वाले चंद्रकांत पाठक उर्फ दिलीप से उस का अफेयर था. 2 महीने पहले सोहनी उस के साथ भाग गई थी, जिस की गुमशुदगी की सूचना उस ने थाना भीममंडी में दर्ज करा रखी थी.

पिछले दिनों उसे सोहनी के मुरैना में होने का पता चला तो वह मुरैना जा कर उसे ले आया. नीरज ने पुलिस को बताया कि वारदात करने वाला चंद्रकांत पाठक के अलावा कोई नहीं हो सकता. थानाप्रभारी ने यह सारी जानकारी एसपी अंशुमान भोमिया को दे दी.

इन सब बातों से अंशुमान भोमिया को लगा कि पूरे घटनाक्रम में सोहनी की कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका रही होगी. इसलिए उन का पूरा ध्यान उस के अतीत और उस के प्रेमी चंद्रकांत पाठक पर अटक गया.
नीरज ने एसपी साहब से मुलाकात की. उस ने उन्हें एक नई जानकारी यह दी कि चंद्रकांत पाठक ने चेतन शर्मा के नाम से एक फरजी फेसबुक आईडी बना रखी थी. चंद्रकांत एक उच्चशिक्षित युवक था, साथ ही अच्छा शूटर भी. मध्य प्रदेश में उसे शार्पशूटर का अवार्ड मिल चुका था.

पुलिस ने नीरज से इस बारे में विस्तार से जानकारी मांगी कि सोहनी कब और कैसे गायब हुई थी? इस पर नीरज ने बताया, ‘‘नवंबर, 2017 में मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अपनी ससुराल मुरैना गया था. वहां से 20 नवंबर को हम कोटा लौट आए थे. 22 नवंबर को मैं गोवर्धन परिक्रमा के लिए वृंदावन चला गया था.

मेरी गैरमौजूदगी में चंद्रकांत पाठक आया और जबरन पत्नी को ले कर चला गया. उस समय दोनों बच्चे भी घर पर थे, जो सो रहे थे. बाद में जब बेटा पीयूष सो कर उठा और उस ने मां को नहीं देखा तो उस ने मुझे फोन किया. तब मैं ने पत्नी की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कराई और अपने स्तर पर भी उस की तलाश करता रहा, लेकिन निराशा ही हाथ लगी.’’

उस ने आगे बताया, ‘‘सर, जनवरी, 2018 में अचानक मेरे पास पत्नी का फोन आया. उस ने किसी और के मोबाइल से फोन किया था. पत्नी ने मुझे बताया कि चंद्रकांत ने उसे कैद कर रखा है, आ कर उसे छुड़ा लें. यह जानने के बाद मैं मुरैना गया और पत्नी को साथ ले कर कोटा आ गया. चंद्रकांत पत्नी से कोई संपर्क न कर सके, इसलिए मैं ने पत्नी का फोन नंबर भी बदल दिया था. इस से खीझ कर एक दिन चंद्रकांत ने मुझे फोन पर ही धमकी दी कि सोहनी से बात करवा दो वरना पूरे परिवार को जान से मार देगा.’’

नीरज से पूछताछ के समय एसपी अंशुमान भोमिया भी वहीं मौजूद थे. उन्होंने नीरज को तीखी नजरों से देखा, वह उन से आंखें नहीं मिला सका. नीरज के हावभाव और बातों से उन्हें उसी पर शक होने लगा था. लेकिन उन्होंने जानबूझ कर उसे ज्यादा कुरेदना उचित नहीं समझा. इसी बीच एक नई जानकारी ने पुलिस की तहकीकात का रुख मोड़ दिया.

पता चला कि चंद्रकांत पाठक शनिवार 20 जनवरी, 2018 की देर रात कोटा पहुंचा था और स्टेशन क्षेत्र के ही एक होटल में ठहरा था. पुलिस का मानना था कि निश्चित रूप से उस ने अगले रोज 21 जनवरी को दिन भर नीरज के घर के आसपास रेकी की होगी और जैसे ही उसे मौका मिला, वह वारदात को अंजाम दे कर भाग गया.

पुलिस ने नीरज और सोहनी की फेसबुक देखी तो इस प्रेम कहानी का काफी कुछ खुलासा हो गया. फेसबुक पर मोहब्बत और नफरत के जज्बात साथसाथ मौजूद थे. पत्नी के इस तरह छोड़ कर चले जाने से नीरज पाराशर इस हद तक परेशान था कि उस की यादें सहेजने के लिए पुराने फोटो शेयर करने के साथ मोहब्बत और हिकारत दोनों उगल रहा था.

15 दिसंबर, 2017 को नीरज ने अपनी फेसबुक पर लिखा, ‘आई हेट सोहनी पाराशर एंड माई लाइफ…’ 28 दिसंबर को सुर बदला तो उस के मन में सोहनी के लिए तड़प पैदा हुई. उस ने लिखा, ‘आप कहां हो सोहनी, कम बैक प्लीज…’

31 दिसंबर को मोहब्बत ने जोर मारा तो नए साल की मुबारकबाद देते हुए लिखा, ‘विश यू ए हैप्पी न्यू ईयर सोहनी पाराशर’. 5 जनवरी को वैराग्य का भाव जागा तो कुछ अलग ही असलियत उजागर हुई, ‘सोहनी पैसे की दीवानी थी’. नीरज ने आगे लिखा, ‘इस दुनिया में कोई रिश्ता इंपोर्टेंट नहीं है, सब कुछ केवल पैसा है.’

पुलिस ने चंद्रकांत पाठक के फरजी नाम चेतन शर्मा की फेसबुक सर्च की तो चंद्रकांत और सोहनी की तूफानी मोहब्बत खुल कर सामने आ गई. 15 जनवरी को चंद्रकांत ने सोहनी के साथ करीब डेढ़ सौ फोटो शेयर किए थे, जो होटलों में मौजमस्ती और घूमनेफिरने की तस्दीक कर रहे थे.

17 जनवरी, 2018 को चंद्रकांत ने जो कुछ फेसबुक पर लिखा, उस ने उस के इरादों पर मुहर लगा दी. चंद्रकांत ने लिखा था, ‘इस दुनिया को अलविदा, मेरी जिंदगी यहीं तक थी. माफ कर देना, सभी का दिल दुखाया, बट गलत मैं था. माफ कर देना… लव यू आल…सौरी.’

टूटे हुए दिल से निकले अल्फाज चंद्रकांत की उस मनोदशा की तसदीक कर रहे थे, जब कोई शख्स खुदकुशी का फैसला करता है जबकि सोहनी का कत्ल तो कुछ और ही कहानी की तरफ इशारा कर रहा था.

मामला काफी संदिग्ध था. नीरज अपनी बात पर अडिग था कि उस की पत्नी सोहनी की हत्या चंद्रकांत पाठक ने की है. लेकिन एसपी अंशुमान भोमिया के इस सवाल का उस के पास कोई जवाब नहीं था कि अगर तुम्हारी पत्नी से उस का अफेयर था तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि वह उस की हत्या करने पर आमादा हुआ और मासूम बच्चे से चंद्रकांत की क्या दुश्मनी थी जो उस ने उसे भी गोली मार दी?

नीरज इस बाबत भी चुप्पी साधे रहा. एसपी अंशुमान भोमिया ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार की अगुवाई में तेजतर्रार अफसरों डीएसपी शिवभगवान गोदारा, राजेश मेश्राम और भीमंडी नयापुरा और रेलवे कालोनी के थानाप्रभारियों को शामिल कर के एक पुलिस टीम बनाई और चंद्रकांत की तलाश में भेज दी. इस टीम ने उसे बिलासपुर, श्योपुर और देहरादून में तलाशा.

पुलिस की यह कोशिश रंग लाई. चंद्रकांत को मध्य प्रदेश के श्योपुर से गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो पता चला कि वह उच्चशिक्षित था. उस ने मैथ्स, कैमिस्ट्री और कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री प्राप्त की थी. पीजीडीए किए चंद्रकांत पाठक के पास मास्टर औफ फाइन आर्ट्स की भी डिग्री थी.इतना ही नहीं, वह सटीक निशानेबाज भी था. उसे बेस्ट शूटर का प्रोसीडेंट अवार्ड भी मिल चुका था. वह एनसीसी का सी सर्टिफिकेट होल्डर भी था.

एसपी भोमिया ने उस से पूछा कि इतना क्वालीफाइड हो कर भी उस ने इतनी संगीन वारदात को अंजाम कैसे दिया. इस बारे में उस ने जो कुछ बताया, उस से पूरी कहानी मोहब्बत पर आ कर सिमट गई.

चंद्रकांत पाठक उर्फ दिलीप उर्फ चेतन शर्मा मूलरूप से मुरैना के दत्तपुरा का रहने वाला था. सोहनी का परिवार उस के घर के ठीक सामने ही रहता था. दोनों का बचपन एक साथ खेलते पढ़ते बतियाते बीता था. बचपन की यह दोस्ती कब प्यार में बदल गई, दोनों ही नहीं समझ सके. अलबत्ता दोनों मोहब्बत में इस कदर डूबे थे कि एकदूसरे के बिना रहने की कल्पना करना भी उन्हें गवारा नहीं था.

लेकिन पारिवारिक बंदिशों के कारण यह मोहब्बत जीवनसाथी की डोर में नहीं बंध पाई. कालांतर में सोहनी का विवाह कोटा के नीरज पाराशर से हो गया और चंद्रकांत ने भी परिवार की जिद के आगे सिर झुका कर कहीं दूसरी जगह शादी कर ली.

दोनों अलगअलग रिश्तों की डोर में बंध तो गए, लेकिन आशिकी खत्म नहीं हुई. चंद्रकांत के पिता का मुरैना में डीजे का काम था. वह पिता के काम में ही हाथ बंटाने लगा. बाद में चंद्रकांत के भी एक बेटा हो गया और सोहनी भी 2 बच्चों की मां बन गई.

इस के बावजूद सोहनी और चंद्रकांत के संबंध बने रहे. सोहनी अपने मायके मुरैना आती तो वह चंद्रकांत से जरूर मिलती. किसी तरह नीरज को इस बात की भनक लग गई. इस के बाद दोनों ने मिलने में ऐहतियात बरतनी शुरू कर दी. चंद्रकांत का कहना था, ‘कोई 2 महीने पहले मैं बिलासपुर में था. सोहनी वहीं आ गई थी. सोहनी अपनी ससुराल वालों को बिना बताए आई थी. इस के बाद चंद्रकांत ने सोहनी के साथ रहना शुरू कर दिया था.

‘इसी दौरान चंद्रकांत ने 20 लाख रुपए में अपनी दुकान बेची थी. वह रकम उस के पास मौजूद थी. इस बीच सोहनी उस की गैरहाजिरी में अपने पति के साथ कोटा चली गई. जाते समय वह मेरे 2 लाख रुपए और गहने अपने साथ ले गई थी. सोहनी ने मेरे साथ फरेब किया था.’

‘‘सोहनी के कत्ल की नौबत क्यों आई? अगर फरेब की कोई वजह थी तो उस मासूम बच्चे को क्यों मारा?’’ एसपी भोमिया ने पूछा.

‘‘नहीं सर, मेरा इरादा ऐसा नहीं था. मैं नीरज की गैरमौजूदगी में ही सोहना से मिलना चाहता था. ऐसा मैं ने किया भी.’’ एक पल रुकते हुए चंद्रकांत ने कहना शुरू किया, ‘‘मैं ने अपनी रकम और जेवरात सोहनी से मांगे तो वह उल्टे मुझ पर ही बरस पड़ी. मैं ने उसे डराने के लिए पिस्टल दिखाई, लेकिन अचानक बच्चा मेरे ऊपर झपट पड़ा और पिस्टल छीनने की कोशिश करने लगा. इस छीनाझपटी में ही ट्रिगर दब गया और बच्चे को गोली लग गई.

‘‘सोहनी को तो मुझे मजबूरी में मारना पड़ा. उसे नहीं मारता तो वह बेटे की हत्या की गवाह बन जाती. बेटे की मौत से सोहनी को अपनी बेटी की जान भी खतरे में नजर आई तो उस ने बच्ची को दरवाजे की तरफ फेंक दिया. सोहनी पर मैं ने 2 गोलियां चलाईं. अफरातफरी में निशाना चूक गया और एक गोली दीवार में धंस गई. एक गोली उस की कनपटी पर लगी थी. उस के बाद मैं बुरी तरह दहशत में आ गया था. इस के बाद मैं पहले दिल्ली चला गया फिर श्योपुर आ गया.’’

पुलिस ने उस से पूछताछ करने के बाद उसे भादंसं की धारा 302 के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 2 लाख की रकम और जेवरात अभी पुलिस बरामद नहीं कर पाई. कथा लिखे जाने तक चंद्रकांत जेल में बंद था.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अवैध संबंधों में हुई थी भाजपा नेता की हत्या

उत्तर प्रदेश के महानगर कानपुर के एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा को दोपहर 12 बजे के करीब थाना फीलखाना से सूचना मिली कि भाजपा के दबंग नेता सतीश कश्यप तथा उन के सहयोगी ऋषभ पांडेय पर माहेश्वरी मोहाल में जानलेवा हमला किया गया है. दोनों को मरणासन्न हालत में हैलट अस्पताल ले जाया गया है.

मामला काफी गंभीर था, इसलिए वह एसपी (पूर्वी) अनुराग आर्या को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल पर थाना फीलखाना के थानाप्रभारी इंसपेक्टर देवेंद्र सिंह मौजूद थे. सत्तापक्ष के नेता पर हमला हुआ था, इसलिए मामला बिगड़ सकता था.

इस बात को ध्यान में रख कर एसएसपी साहब ने कई थानों की पुलिस और फोरैंसिक टीम को घटनास्थल पर बुला लिया था. माहेश्वरी मोहाल के कमला टावर चौराहे से थोड़ा आगे संकरी गली में बालाजी मंदिर रोड पर दिनदहाड़े यह हमला किया गया था. सड़क खून से लाल थी. अखिलेश कुमार मीणा ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस के बाद फोरैंसिक टीम ने अपना काम किया.

घटनास्थल पर कर्फ्यू जैसा सन्नाटा पसरा हुआ था. दुकानों के शटर गिरे हुए थे, आसपास के लोग घरों में दुबके थे. वहां लोग कितना डरे हुए थे, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि वहां कोई कुछ भी कहने सुनने को तैयार नहीं था. बाहर की कौन कहे, छज्जों पर भी कोई नजर नहीं आ रहा था. यह 29 नवंबर, 2017 की बात है.

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घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद अखिलेश कुमार मीणा हैलट अस्पताल पहुंचे. वहां कोहराम मचा हुआ था. इस की वजह यह थी कि जिस भाजपा नेता सतीश कश्यप तथा उन के सहयोगी ऋषभ पांडेय पर हमला हुआ था, डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था. पुलिस अधिकारियों ने लाशों का निरीक्षण किया तो दहल उठे.

मृतक सतीश कश्यप का पूरा शरीर धारदार हथियार से गोदा हुआ था. जबकि ऋषभ पांडेय के शरीर पर मात्र 3 घाव थे. इस सब से यही लगा कि कातिल के सिर पर भाजपा नेता सतीश कश्यप उर्फ छोटे बब्बन को मारने का जुनून सा सवार था.

अस्पताल में मृतक सतीश कुमार की पत्नी बीना और दोनों बेटियां मौजूद थीं. सभी लाश के पास बैठी रो रही थीं. ऋषभ की मां अर्चना और पिता राकेश पांडेय भी बेटे की लाश से लिपट कर रो रहे थे. वहां का दृश्य बड़ा ही हृदयविदारक था. अखिलेश कुमार मीणा ने मृतकों के घर वालों को धैर्य बंधाते हुए आश्वासन दिया कि कातिलों को जल्दी ही पकड़ लिया जाएगा.

अखिलेश कुमार मीणा ने मृतक सतीश कश्यप की पत्नी बीना और बेटी आकांक्षा से हत्यारों के बारे में पूछताछ की तो आकांक्षा ने बताया कि उस के पिता की हत्या शिवपर्वत, उमेश कश्यप और दिनेश कश्यप ने की है. एक महिला से प्रेमसंबंधों को ले कर शिवपर्वत उस के पिता से दुश्मनी रखता था. उस ने 10 दिनों पहले धमकी दी थी कि वह उस के पिता का सिर काट कर पूरे क्षेत्र में घुमाएगा.

मृतक सतीश कश्यप ने इस की शिकायत थाना फीलखाना में की थी, लेकिन पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया और एक महिला सपा नेता के कहने पर समझौता करा दिया. अगर पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया होता और शिवपर्वत पर काररवाई की होती तो आज भाजपा नेता सतीश कश्यप और ऋषभ पांडेय जिंदा होते.

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अखिलेश कुमार मीणा ने मृतक ऋषभ के घर वालों से पूछताछ की तो उस की मां अर्चना पांडेय ने बताया कि उन का बेटा अकसर नेताजी के साथ रहता था. वह उन का विश्वासपात्र था, इसलिए वह जहां भी जाते थे, उसे साथ ले जाते थे. आज भी वह उन के साथ जा रहा था. ऋषभ स्कूटी चला रहा था, जबकि नेताजी पीछे बैठे थे. रास्ते में कातिलों ने हमला कर के दोनों को मार दिया.

मृतक सतीश कश्यप की बेटी आकांक्षा ने जो बताया था, उस से साफ था कि ये हत्याएं प्रेमसंबंध को ले कर की गई थीं. इसलिए एसएसपी साहब ने थानाप्रभारी देवेंद्र सिंह को आदेश दिया कि वह लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर तुरंत रिपोर्ट दर्ज करें और हत्यारों को गिरफ्तार करें.

मृतक सतीश कश्यप के घर वालों ने शिवपर्वत पर हत्या का आरोप लगाया था, इसलिए देवेंद्र सिंह ने सतीश कश्यप के बड़े भाई प्रेम कुमार की ओर से हत्या का मुकदमा शिवपर्वत व 2 अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी.

जांच में पता चला कि बंगाली मोहाल का रहने वाला शिवपर्वत नगर निगम में सफाई नायक के पद पर नौकरी करता था. वह दबंग और अपराधी प्रवृत्ति का था. उस के इटावा बाजार निवासी राकेश शर्मा की पत्नी कल्पना शर्मा से अवैधसंबंध थे. इधर कल्पना शर्मा का मिलनाजुलना सतीश कश्यप से भी हो गया था. इस बात की जानकारी शिवपर्वत को हुई तो वह सतीश कश्यप से दुश्मनी रखने लगा. इसी वजह से उस ने सतीश की हत्या की थी.

शिवपर्वत को गिरफ्तार करने के लिए एसपी अनुराग आर्या ने एक पुलिस टीम बनाई, जिस में उन्होंने थाना फीलखाना के थानाप्रभारी इंसपेक्टर देवेंद्र सिंह, चौकीप्रभारी फूलचंद, एसआई आशुतोष विक्रम सिंह, सिपाही नीरज, गौतम तथा महिला सिपाही रेनू चौधरी को शामिल किया.

शिवपर्वत की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किए, लेकिन वह पकड़ा नहीं जा सका. इस के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने के लिए उस के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगाया तो उस की लोकेशन के आधार पर उसे फूलबाग चौराहे से गिरफ्तार कर लिया गया. शिवपर्वत को गिरफ्तार कर थाना फीलखाना लाया गया.

एसपी अनुराग आर्या की मौजूदगी में उस से पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी बहानेबाजी के सीधे सतीश कश्यप और ऋषभ पांडेय की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि उस की प्रेमिका कल्पना शर्मा की बेटी की शादी 30 नवंबर को थी. इस शादी का खर्च वही उठा रहा था, जबकि सतीश कश्यप भी शादी कराने का श्रेय लूटने के लिए पैसे खर्च करने लगे थे. यही बात उसे बुरी लगी थी.

उस ने उन्हें चेतावनी भी दी थी, लेकिन वह नहीं माने. उस की नाराजगी तब और बढ़ गई, जब कल्पना शर्मा ने सतीश कश्यप को भी शादी में निमंत्रण दे दिया. इस के बाद उस ने सतीश कश्यप की हत्या की योजना बनाई और शादी से एक दिन पहले उन की हत्या कर दी. ऋषभ को वह नहीं मारना चाहता था, लेकिन वह सतीश कश्यप को बचाने लगा तो उस पर भी उस ने हमला कर दिया. इस के अलावा वह जिंदा रहता तो उस के खिलाफ गवाही देता.

पूछताछ के बाद पुलिस ने उस से हथियार, खून सने कपड़े बरामद कराने के लिए कहा तो उस ने फेथफुलगंज स्थित जगमोहन मार्केट के पास के कूड़ादान से चाकू और खून से सने कपडे़ बरामद करा दिए. बयान देते हुए शिवपर्वत रोने लगा तो अनुराग आर्या ने पूछा, ‘‘तुम्हें दोनों की हत्या करने का पश्चाताप हो रहा है क्या?’’

शिवपर्वत ने आंसू पोंछते हुए तुरंत कहा, ‘‘सर, हत्या का मुझे जरा भी अफसोस नहीं है. मैं यह सोच कर परेशान हो रहा हूं कि मेरी प्रेमिका इस बात को ले कर परेशान हो रही होगी कि पुलिस मुझे परेशान कर रही होगी.’’

सतीश कश्यप और ऋषभ की हत्याएं कल्पना शर्मा की वजह से हुई थीं, इसलिए पुलिस को लगा कि कहीं हत्या में कल्पना शर्मा भी तो शामिल नहीं थी. इस बात का पता लगाने के लिए पुलिस टीम ने कल्पना शर्मा के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि घटना से पहले और बाद में शिवपर्वत की उस से बात हुई थी.

इसी आधार पर पुलिस पूछताछ के लिए कल्पना को भी 3 दिसंबर, 2017 को थाने ले आई, जहां पूछताछ में उस ने बताया कि सतीश कश्यप उर्फ छोटे बब्बन की हत्या की योजना में वह भी शामिल थी. इस के बाद देवेंद्र सिंह ने उसे भी साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. शिवपर्वत और कल्पना शर्मा से विस्तार से की गई पूछताछ में भाजपा नेता सतीश कश्यप और उन के सहयोगी ऋषभ पांडेय की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

महानगर कानपुर के थाना फीलखाना का एक मोहल्ला है बंगाली मोहाल. वहां की चावल मंडी में सतीश कश्यप अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी बीना के अलावा 2 बेटियां मीनाक्षी, आकांक्षा और एक बेटा शोभित उर्फ अमन था.

सतीश कश्यप काफी दबंग था. उस की आर्थिक स्थिति भी काफी अच्छी थी, इसलिए वह किसी से भी नहीं डरता था. इस की वजह यह थी कि उस का संबंध बब्बन गैंग के अपराधियों से था. इसीलिए बाद में उसे लोग छोटे बब्बन के नाम से पुकारने लगे थे.

इसी नाम ने सतीश को दहशत का बादशाह बना दिया था.फीलखाना के बंगाली मोहाल, माहेश्वरी मोहाल, राममोहन का हाता और इटावा बाजार में उस की दहशत कायम थी. लोग उस के नाम से खौफ खाते थे. उस पर तमाम मुकदमे दर्ज हो गए. वह हिस्ट्रीशीटर बन गया. 10 सालों तक इलाके में सतीश की बादशाहत कायम रही. लेकिन उस के साथ घटी एक घटना से उस का हृदय परिवर्तित हो गया. उस के बाद उस ने अपराध करने से तौबा कर ली.

दरअसल उस के बेटे का एक्सीडेंट हो गया, जिस में उस की जान बच गई. इसी के बाद से सतीश ने अपराध करने बंद कर दिए. अदालत से भी वह एक के बाद एक मामले में बरी होता गया.

अपराध से किनारा करने के बाद सतीश राजनीति करने लगा. पहले वह बसपा में शामिल हुआ. सपा सत्ता में आई तो वह सपा में चला गया. सपा सत्ता से गई तो वह भाजपा में आ गया. राजनीति की आड़ में वह प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा करता था. वह विवादित पुराने मकानों को औने पौने दामों में खरीद लेता था. इस के बाद उस पर नया निर्माण करा कर महंगे दामों में बेचता था. इस में उसे अच्छी कमाई हो रही थी.

ऋषभ सतीश कश्यप का दाहिना हाथ था. उस के पिता राकेश पांडेय इटावा बाजार में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी अर्चना के अलावा बेटा ऋषभ और बेटी रेनू थी. वह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. 8वीं पास कर के ऋषभ सतीश कश्यप के यहां काम करने लगा था.

वह उम्र में छोटा जरूर था, लेकिन काफी होशियार था. सतीश कश्यप का सारा काम वही संभालता था. हालांकि सतीश का बेटा अमन और बेटी आकांक्षा भी पिता के काम में हाथ बंटाते थे, लेकिन ऋषभ भी पूरी जिम्मेदारी से सारे काम करता था. इसलिए सतीश हमेशा उसे अपने साथ रखते थे. एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा था.

बंगाली मोहाल में ही शिवपर्वत वाल्मीकि रहता था. उस के परिवार में पत्नी रामदुलारी के अलावा 2 बेटियां थीं. वह नगर निगम में सफाई नायक था. उसे ठीकठाक वेतन तो मिलता ही था, इस के अलावा वह सफाई कर्मचारियों से उगाही भी करता था. लेकिन वह शराबी और अय्याश था, इसलिए हमेशा परेशान रहता था. उस की नजर हमेशा खूबसूरत महिला सफाईकर्मियों पर रहती थी, जिस की वजह से कई बार उस की पिटाई भी हो चुकी थी.

एक दिन शिवपर्वत इटावा बाजार में बुटीक चलाने वाली कल्पना शर्मा के घर के सामने सफाई करा रहा था, तभी उस की आंख में कीड़ा चला गया. वह आंख मलने लगा और दर्द तथा जलन से तड़पने लगा. उसे परेशान देख कर कल्पना शर्मा ने रूमाल से उस की आंख साफ की और कीड़ा निकाल दिया. कल्पना शर्मा की खूबसूरत अंगुलियों के स्पर्श से शिवपर्वत के शरीर में सिहरन सी दौड़ गई. वह भी काफी खूबसूरत थी, इसलिए पहली ही नजर में शिवपर्वत उस पर मर मिटा.

इस के बाद शिवपर्वत कल्पना के आगेपीछे घूमने लगा, जिस से वह उस के काफी करीब आ गया. वह उस पर दिल खोल कर पैसे खर्च करने लगा. कल्पना अनुभवी थी. वह समझ गई कि यह उस का दीवाना हो चुका है. कल्पना का पति राजेश कैटरर्स का काम करता था. वह अकसर बाहर ही रहता था. ज्यादातर रातें उस की पति के बिना कटती थीं, इसलिए उस ने शिवपर्वत को खुली छूट दे दी, जिस से दोनों के बीच मधुर संबंध बन गए.

नाजायज संबंध बने तो शिवपर्वत अपनी पूरी कमाई कल्पना पर उड़ाने लगा, जिस से उस के अपने घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई. पत्नी और बच्चे भूखों मरने लगे. पत्नी वेतन के संबंध में पूछती तो वह वेतन न मिलने का बहाना कर देता. पर झूठ कब तक चलता. एक दिन रामदुलारी को पति और कल्पना शर्मा के संबंधों का पता चल गया. वह समझ गई कि पति सारी कमाई उसी पर उड़ा रहा है.

औरत कभी भी पति का बंटवारा बरदाश्त नहीं करती तो रामदुलारी ही कैसे बरदाश्त करती. उस ने पति का विरोध भी किया, लेकिन शिवपर्वत नहीं माना. वह उस के साथ मारपीट करने लगा तो आजिज आ कर वह बच्चों को ले कर मायके चली गई. इस के बाद तो शिवपर्वत आजाद हो गया. अब वह कल्पना के यहां ही पड़ा रहने लगा. उस की बेटी उसे पापा कहने लगी.

खूबसूरत और रंगीनमिजाज कल्पना शर्मा की सतीश कश्यप से भी जानपहचान थी. सतीश की उस के पति राजेश से दोस्ती थी. उसी ने कल्पना से उस को मिलाया था. उस के बाद दोनों में दोस्ती हो गई, जो बाद में प्यार में बदल गई थी. लेकिन ये संबंध ज्यादा दिनों तक नहीं चल सके. दोनों अलग हो गए थे.

कल्पना शर्मा की बेटी सयानी हुई तो वह उस की शादी के बारे में सोचने लगी. बेटी की शादी धूमधाम से करने के लिए वह मकान का एक हिस्सा बेचना चाहती थी. सतीश कश्यप को जब इस बात का पता चला तो वह कल्पना शर्मा से मिला और उस का मकान खरीद लिया. मकान खरीदने के लिए वह कल्पना शर्मा से मिला तो एक बार फिर दोनों का मिलना जुलना शुरू हो गया. सतीश ने उसे आश्वासन दिया कि वह उस की बेटी की शादी में हर तरह से मदद करेगा.

मदद की चाह में कल्पना शर्मा का झुकाव सतीश की ओर हो गया. अब वह शिवपर्वत की अपेक्षा सतीश को ज्यादा महत्त्व देने लगी. एक म्यान में 2 तलवारें भला कैसे समा सकती हैं? प्रेमिका का झुकाव सतीश की ओर देख कर शिवपर्वत बौखला उठा. उस ने कल्पना शर्मा को आड़े हाथों लिया तो वह साफ मुकर गई. उस ने कहा, ‘‘शिव, तुम्हें किसी ने झूठ बताया है. हमारे और नेताजी के बीच कुछ भी गलत नहीं है.’’

कल्पना शर्मा ने बेटी की शादी तय कर दी थी. शादी की तारीख भी 30 नवंबर, 2017 रख दी गई. गोकुलधाम धर्मशाला भी बुक कर लिया गया. वह शादी की तैयारियों में जुट गई. शिवपर्वत शादी की तैयारी में हर तरह से मदद कर रहा था. लेकिन जब उसे पता चला कि सतीश कश्यप भी शादी में कल्पना की मदद कर रहा है तो उसे गुस्सा आ गया.

शिवपर्वत ने कल्पना शर्मा को खरीखोटी सुनाते हुए कहा कि अगर सतीश उस की बेटी की शादी में आया तो ठीक नहीं होगा. अगर उस ने उसे निमंत्रण दिया तो अनर्थ हो जाएगा. प्रेमिका को खरीखोटी सुना कर उस ने सतीश को फोन कर के धमकी दी कि अगर उस ने कल्पना से मिलने की कोशिश की तो वह उस का सिर काट कर पूरे इलाके में घुमाएगा. देखेगा वह कितना बड़ा दबंग है.

शिवपर्वत सपा का समर्थक था. सपा के कई नेताओं से उस के संबंध थे. उस के भाई भी सपा के समर्थक थे और उस का साथ दे रहे थे. सतीश ने शिवपर्वत की धमकी की शिकायत पुलिस से कर दी. सीओ कोतवाली ने शिवपर्वत को थाने बुलाया तो वह सपा नेताओं के साथ थाने आ पहुंचा. सपा नेताओं ने विवाद पर लीपापोती कर के समझौता करा दिया.

शिवपर्वत के मना करने के बावजूद कल्पना शर्मा ने बेटी की शादी का निमंत्रण सतीश कश्यप को दे दिया था. जब इस की जानकारी शिवपर्वत को हुई तो उस ने कल्पना शर्मा को आड़ेहाथों लिया. तब कल्पना ने कहा कि सतीश कश्यप दबंग है. उस से डर कर उस ने उसे शादी का निमंत्रण दे दिया है. अगर वह चाहे तो उसे रास्ते से हटा दे. इस में वह उस का साथ देगी.

‘‘ठीक है, अब ऐसा ही होगा. वह शादी में शामिल नहीं हो पाएगा.’’ शिवपर्वत ने कहा.

इस के बाद उस ने शादी के एक दिन पहले सतीश कश्यप की हत्या करने की योजना बन डाली. इस के लिए उस ने फेरी वाले से 70 रुपए में चाकू खरीदा और उस पर धार लगवा ली. 29 नवंबर की सुबह सतीश किसी नेता से मिल कर घर लौटे तो उन्हें किसी ने फोन किया. फोन पर बात करने के बाद वह ऋषभ के साथ स्कूटी से निकल पड़े. पत्नी बीना ने खाने के लिए कहा तो 10 मिनट में लौट कर खाने को कहा और चले गए.

करीब 11 बजे वह बालाजी मंदिर मोड़ पर पहुंचे तो घात लगा कर बैठे शिवपर्वत ने स्कूटी रोकवा कर उन पर हमला कर दिया. सतीश कश्यप सड़क पर ही गिर पड़े. सतीश को बचाने के लिए ऋषभ शिवपर्वत से भिड़ गया तो उस ने उस पर भी चाकू से वार कर दिया. ऋषभ जान बचा कर भागा, लेकिन आगे गली बंद थी. वह जान बचाने के लिए घरों के दरवाजे खटखटाता रहा, लेकिन किसी ने दरवाजा नहीं खोला.

पीछा कर रहे शिवपर्वत ने उसे भी घायल कर दिया. ऋषभ जमीन पर गिर पड़ा. इस पर शिवपर्वत का गुस्सा शांत नहीं हुआ. लौट कर उस ने सड़क पर पड़े तड़प रहे सतीश कश्यप पर चाकू से कई वार किए. एक तरह से उस ने उस के शरीर को गोद दिया. इस के बाद इत्मीनान से चाकू सहित फरार हो गया.

शिवपर्वत ने इस बात की सूचना मोबाइल फोन से कल्पना शर्मा को दे दी थी. इस के बाद रेल बाजार जा कर कपड़ों की दुकान से उस ने एक जींस व शर्ट खरीदी और सामुदायिक शौचालय जा कर खून से सने कपड़े उतार कर नए कपड़े पहन लिए और फिर रेलवे स्टेशन पर जा कर छिप गया.

इस वारदात से इलाके में दहशत फैल गई थी. दुकानदारों ने शटर गिरा दिए थे और गली के लोग घरों में घुस गए थे. लेकिन किसी ने घटना की सूचना पुलिस और सतीश कश्यप के घर वालों को दे दी थी.

खबर पाते ही सतीश कश्यप की पत्नी बीना अपनी दोनों बेटियों मीनाक्षी और आकांक्षा तथा बेटे अमन के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचीं. उन की सूचना पर ऋषभ के पिता राकेश और मां अर्चना भी आ गईं. थाना फीलखाना के प्रभारी देवेंद्र सिंह भी आ गए. उन्होंने घायलों को हैलट अस्पताल भिजवाया और वारदात की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दे दी.

पूछताछ के बाद थाना फीलखाना पुलिस ने अभियुक्त शिवपर्वत और कल्पना शर्मा को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें नहीं हुई थीं. कल्पना शर्मा के जेल जाने से उस की बेटी का रिश्ता टूट गया.

सोचने वाली बात यह है कि शिवपर्वत को मिला क्या? उस ने जो अपराध किया है, उस में उसे उम्रकैद से कम की सजा तो होगी नहीं. उस ने जिस कल्पना के लिए यह अपराध किया, क्या वह उसे मिल पाएगी? उस ने अपनी जिंदगी तो बरबाद की ही, साथ ही कल्पना और उस की बेटी का भी भविष्य खराब कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

फोन बना दोधारी तलवार

पूनम का मूड सुबह से ही ठीक नहीं था. बच्चों को स्कूल भेजने का भी उस का मन नहीं हो रहा था. पर बच्चों को स्कूल भेजना जरूरी था, इसलिए किसी तरह उस ने बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेज दिया. पूनम के चेहरे पर एक अजीब सा खौफ था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी परेशानी किस से कहे. वह सिर पकड़ कर सोफे पर बैठ गई.

पूनम का मूड खराब देख कर उस के पति विनय ने हंसते हुए पूछा, ‘‘डार्लिंग, तुम कुछ परेशान सी लग रही हो. आखिर बात क्या है?’’

पूनम ने पलकें उठा कर पति को देखा. फिर उस की आंखों से आंसू बहने लगे. वह फूट फूट कर इस तरह रोने लगी, जैसे गहरे सदमे में हो.

विनय ने करीब आ कर उसे सीने से लगा लिया और उस के आंसुओं को पोंछते हुए कहा, ‘‘क्या हुआ पूनम, तुम मुझ से नाराज हो क्या? क्या तुम्हें मेरी कोई बात बुरी लग गई?’’

‘‘नहीं,’’ पूनम सुबकते हुए बोली.

‘‘तो फिर क्या बात है, जो तुम इस तरह रो रही हो?’’ विनय ने हमदर्दी दिखाई.

पति का प्यार मिलते ही पूनम ने मोबाइल की ओर इशारा कर के सुबकते हुए बोली, ‘‘मेरी परेशानी का कारण यह मोबाइल है.’’

विनय ने हैरत से एक नजर मेज पर रखे मोबाइल फोन पर डाली, उस के बाद पत्नी से मुखातिब हुआ, ‘‘मैं समझा नहीं, इस मोबाइल से तुम्हारी परेशानी का क्या संबंध है? साफसाफ बताओ, तुम कहना क्या चाहती हो?’’

पूनम मेज से मोबाइल उठा कर पति के हाथ में देते हुए बोली, ‘‘आप खुद ही देख लो. इस के मैसेज बौक्स में क्या लिखा है?’’

विनय की उत्सुकता बढ़ गई. उस ने फटाफट फोन के मैसेज का इनबौक्स खोल कर देखा. जैसे ही उस ने मैसेज पढ़ा, उस के चेहरे पर एक साथ कई रंग आए गए.

मैसेज में लिखा था, ‘मेरी जान, तुम ने मुझे अपने रूप का दीवाना बना दिया है. मैं ने जब से तुम्हें देखा है, चैन से जी नहीं पा रहा हूं. मैं तुम्हें जब भी विनय के साथ देखता हूं, मेरा खून खौल जाता है. आखिर तुम उस के साथ जिंदगी कैसे गुजार रही हो. मैं ने जिस दिन से तुम्हें देखा है, मेरी आंखों से नींद उड़ चुकी है.’

मैसेज पढ़ कर विनय को गुस्सा आ गया. फोन को मेज पर रख कर उस ने पत्नी से कहा, ‘‘ये सब क्या है?’’

‘‘मैं कुछ नहीं जानती.’’ पूनम दबी जुबान से बोली.

विनय कुछ देर सोचता रहा, फिर उस ने पत्नी की आंखें में झांका. उसे लगा कि पत्नी सच बोल रही है, क्योंकि अगर वह उस के साथ गेम खेल रही होती तो इस तरह परेशानी और रुआंसी नहीं होती. उसे लगा कि वाकई कोई उस की पत्नी को परेशान कर रहा है.

उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के कल्याणपुर थाने का एक मोहल्ला है शारदानगर. इसी मोहल्ले के इंद्रपुरी में विनय झा अपने परिवार के साथ रहता था. उस का अपना आलीशान मकान था, जिस में सभी भौतिक सुखसुविधाएं थीं. उस का हौजरी का व्यवसाय था. इस से उसे अच्छीखासी आमदनी होती थी, जिस से उस की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत थी.

विनय झा इस से पहले अपने भाइयों के साथ दर्शनपुरवा में रहता था. वहां उस का अपना छोटा सा कारखाना था. उस का परिवार काफी दबंग किस्म का था. दबंगई से ही इन लोगों ने पैसा कमाया और फिर उसी पैसे से हौजरी का काम शुरू किया. व्यवसाय अच्छा चलने लगा तो विनय ने इंद्रपुरी में मकान बनवा लिया.

पूनम से विनय की शादी कुछ साल पहले हुई थी. पूनम बेहद खूबसूरत थी. पहली ही नजर में विनय उस का दीवाना हो गया था. उस की दीवानगी पूनम को भी भा गई. दोनों की पसंद के बाद उन की शादी हो गई. दोनों ही अपने गृहस्थ जीवन में खुश थे. 8 साल के अंतराल में पूनम 2 बच्चों की मां बन गई.

ससुराल में सभी भौतिक सुखसुविधाएं थीं. उसे किसी भी चीज की कमी नहीं थी. पति भी चाहने वाला मिला था. सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक पूनम को अश्लील मैसेज तथा प्रेमप्रदर्शन वाले फोन आने लगे. पूनम पति का गुस्सा जानती थी, अत: पहले तो उस ने पति को कुछ नहीं बताया, पर जब अति हो गई तो मजबूरी में बताना पड़ा.

विनय झा ने जब पत्नी के फोन में आए हुए मैसेज पढ़े तो उस की आंखों में खून उतर आया. जिस फोन नंबर से मैसेज आए थे, विनय ने उस नंबर पर काल की तो फोन रिसीव नहीं किया गया. इस पर विनय गुस्से में बड़बड़ाया, ‘‘कमीने…तू एक बार सामने आ जा. अगर तुझे जिंदा दफन न कर दिया तो मेरा नाम विनय नहीं.’’

गुस्से में कांपते विनय ने पूनम से पूछा, ‘‘क्या वह तुम्हें फोन भी करता है?’’

‘‘हां,’’ पूनम ने सिर हिलाया.

‘‘क्या कहता है?’’

‘‘नाजायज संबंध बनाने को कहता है. अब कैसे बताऊं आप को, इस ने तो मेरी जान ही सुखा दी है. लो, आप दूसरे मैसेज भी पढ़ लो. इन से पता चल जाएगा कि उस की मानसिकता क्या है.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ कि वह तुम्हें फोन कब करता है या मैसेज कब भेजता है?’’ विनय ने पूछा.

‘‘जब आप घर पर नहीं होते, तभी उस के फोन आते हैं. जब आप घर पर होते हो तो न फोन आता है न मैसेज.’’ वह बोली.

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि वह मुझ पर निगाह रखता है. उसे मेरे घर जानेआने का वक्त भी मालूम है.’’ कहते हुए विनय ने मैसेज बौक्स खोल कर दूसरे मैसेज भी पढ़े. एक मैसेज तो बहुत जुनूनी था, ‘‘तुम मुझ से क्यों नहीं मिलतीं? रात को सपने में तो खूब आती हो. अपने गोरे बदन को मेरे बदन से सटा कर प्यार करती हो. आह जान, तुम कितनी प्यारी हो. एक बार मुझ से साक्षात मिल कर मेरी जन्मों की… नहीं तो समझ लेना मैं तुम्हारी चौखट पर आ कर जान दे दूंगा. अभी तो मैं इसलिए चुप हूं कि तुम्हें रुसवा नहीं करना चाहता.’’

मैसेज पढ़ कर विनय की मुट्ठियां भिंच गईं, ‘‘कमीने, तेरी प्यास तो मैं बुझाऊंगा. तू जान क्या देगा, मैं ही तेरी जान ले लूंगा.’’

पति का रूप देख कर पूनम का कलेजा कांप उठा. उसे लगा कि उस ने पति को बता कर कहीं गलती तो नहीं कर दी. विनय ने डरीसहमी पत्नी को मोबाइल देते हुए समझाया, ‘‘अब जब उस का फोन आए तो उस से बात करना. मीठीमीठी बातें कर के उस का नाम व पता हासिल कर लेना. इस के बाद मैं उस के सिर से प्यार का भूत उतार दूंगा.’’

पति की बात पर सहमति जताते हुए पूनम ने हामी भर दी.

एक दिन विनय जैसे ही घर से निकला, पूनम के मोबाइल पर उस का फोन आ गया. पूनम के हैलो कहते ही वह बोला, ‘‘पूनम, तुम मुझे भूल गई, लेकिन मैं तुम्हें नहीं भूला और न भूलूंगा. याद है, हम दोनों की पहली मुलाकात कब और कहां हुई थी?’’

पूनम अपने दिमाग पर जोर डाल कर कुछ याद करने की कोशिश करने लगी. तभी उस ने कहा, ‘‘2 साल पहले, जब मैं तुम्हारे घर फर्नीचर बनाने आया था. याद है, उस समय मैं तुम्हारे इर्दगिर्द रहा करता था. तुम्हारी खूबसूरती को निहारता रहता था. तुम इतराती इठलाती होंठों पर मुसकान बिखेरती इधर से उधर निकल जाती थी और मैं तड़पता रह जाता था.’’

‘‘अच्छा, तब से तुम मेरे दीवाने हो. पागल, तब प्यार का इजहार क्यों नहीं किया? अच्छा, तुम्हारा नाम मुझे याद नहीं आ रहा, अपने बारे में थोड़ा बताओ न.’’ पूनम खिलखिला कर हंसी.

‘‘हाय मेरी जान, तुम हंसती हो तो मेरे दिल में घंटियां सी बज उठती हैं. सो स्वीट यू आर.’’ उधर से रोमांटिक स्वर में कहा गया, ‘‘मैं तुम्हारा दीवाना विजय यादव बोल रहा हूं.’’

विजय यादव का नाम सुनते ही पूनम चौंकी. अब उसे उस की शक्लसूरत भी याद आ गई. इस के बाद पूनम ने उसे समझाया, ‘‘देखो विजय, अब बहुत हो गया. मैं किसी की पत्नी हूं, तुम्हें ऐसे मैसेज भेजते हुए शर्म आनी चाहिए. मैं कह देती हूं कि आइंदा मुझे न फोन करना और न मैसेज करना, वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा.’’

पूनम ने फोन काटा ही था कि उस का पति विनय आ गया. उस ने पूछा, ‘‘किस का फोन था?’’

‘‘उसी का जो फोन करता है और अश्लील मैसेज भेजता है. आज मैं ने जान लिया कि वह कौन है.’’ पूनम ने विनय को बताया, ‘‘विजय यादव जो अपने यहां फर्नीचर बनाने आया था, वही यह सब कर रहा है. वैसे मैं ने उसे ठीक से समझा दिया है, शायद अब वह ऐसी हरकत न करे.’’

विजय यादव उर्फ   के पिता रामकरन यादव रावतपुर क्षेत्र के केशवनगर में रहते थे. रामकरन फील्डगन फैक्ट्री में काम करते थे. उन के 3 बेटों में इंद्रबहादुर मंझला था. वह बजरंग दल का नेता था और प्रौपर्टी तथा फर्नीचर का व्यवसाय करता था. ब्रह्मदेव चौराहा पर उस की फर्नीचर की दुकान थी. दुकान पर करीब आधा दर्जन से ज्यादा कारीगर काम करते थे.

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इंद्रबहादुर आर्थिक रूप से संपन्न होने के साथ दबंग भी था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटियां थीं. वह बजरंग दल का जिला संयोजक था. उस की एक बड़ी खराब आदत थी उस का अय्याश होना. घर में खूबसूरत बीवी होने के बावजूद वह इधर धर मुंह मारता रहता था.

करीब 2 साल पहले इंद्रबहादुर इंद्रपुरी में  विनय झा के घर फर्नीचर बनाने आया था. उस समय जब उस ने खूबसूरत पूनम को देखा तो वह उस पर मर मिटा. उस ने उसी समय उसे अपने दिल में बसा लिया. उस के बाद वह किसी न किसी बहाने उस के आगे पीछे मंडराने लगा. किसी बहाने से उस ने पूनम का फोन नंबर ले लिया. फिर वह उसे फोन करने लगा और अश्लील मैसेज भेजने लगा.

पूनम के समझाने के बाद वाकई कुछ दिनों तक इंद्रबहादुर ने उसे न तो फोन किया और न ही मैसेज भेजे. इस से पूनम को तसल्ली हुई. पर 15-20 दिनों बाद उस की यह खुशी परेशानी में बदल गई. वह फिर से उसे फोन करने लगा.

एक रोज तो विजय ने हद कर दी. उस ने फोन पर पूनम से कहा कि अब उस से रहा नहीं जाता. उस की तड़प बढ़ती जा रही है. वह उस से मिल कर अपने अरमान पूरे करना चाहता है. गुरुदेव चौराहा आ कर मिलो. उस ने यह भी कहा कि अगर वह नहीं आई तो वह खुद उस के घर आ जाएगा.

इंद्रबहादुर की धमकी से पूनम डर गई. वह नहीं चाहती थी कि वह उस के घर आए. क्योंकि वह पति व परिवार के अन्य सदस्यों की निगाहों में गिरना नहीं चाहती थी. इसलिए वह उस से मिलने गुरुदेव चौराहे पर पहुंच गई. वहां वह उस का इंतजार कर रहा था. पूनम ने उस से घरपरिवार की इज्जत की भीख मांगी, लेकिन वह नहीं पसीजा. वह एकांत में मिलने का दबाव बनाता रहा.

इस के बाद तो यह सिलसिला ही बन गया. इंद्रबहादुर जब बुलाता, पूनम डर के मारे उस से मिलने पहुंच जाती. इस मुलाकात की पति व परिवार के किसी अन्य सदस्य को भनक तक न लगती. एक दिन तो इंद्रबहादुर ने पूनम को जहरीला पदार्थ देते हुए कहा, ‘‘मेरी जान, तुम इसे अपने पति को खाने की किसी चीज में मिला कर खिला देना. कांटा निकल जाने पर हम दोनों मौज से रहेंगे.’’

पूनम जहरीला पदार्थ ले कर घर आ गई. उस ने उस जहर को पति को तो नहीं दिया, लेकिन खुद उस का कुछ अंश दूध में मिला कर पी गई. जहर ने असर दिखाना शुरू किया तो वह तड़पने लगी. विनय उसे तुरंत अस्पताल ले गया, जिस से पूनम की जान बच गई. विनय ने पूनम से जहर खाने की बाबत पूछा तो उस ने सारी सच्चाई बता दी.

इस के बाद पूनम को ले कर इंद्रबहादुर और विनय में झगड़ा होने लगा. दोनों एकदूसरे को देख लेने की धमकी देने लगे. इसी झगड़े में एक दिन आमनासामना होने पर इंद्रबहादुर ने छपेड़ा पुलिया पर विनय के पैर में गोली मार दी. विनय जख्मी हो कर गिर पड़ा. उसे अस्पताल ले जाया गया. वहां किसी तरह विनय की जान बच गई.

विनय ने थाना कल्याणपुर में इंद्रबहादुर के खिलाफ भादंवि की धारा 307 के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी. विनय ने घटना के पीछे की असली बात को छिपा लिया. उस ने लेनदेन तथा महिला कर्मचारी को छेड़ने का मामला बताया. पुलिस ने भी अपनी विवेचना में पूनम का जिक्र नहीं किया. पुलिस ने इंद्रबहादुर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

लगभग 10 महीने तक इंद्रबहादुर जेल में रहा. इस के बाद 9 अक्तूबर, 2017 को वह कानपुर जेल से जमानत पर रिहा हुआ. जेल से बाहर आने के बाद वह फिर पूनम से मिलने की कोशिश करने लगा. लेकिन इस बार पूनम की ससुराल वाले सतर्क थे. उन्होंने पूनम का मोबाइल फोन बंद करा दिया था और घर पर कड़ी निगरानी रख रहे थे.

काफी मशक्कत के बाद भी जब वह पूनम तक नहीं पहुंच पाया, तब उस ने एक षडयंत्र रचा. षडयंत्र के तहत उस ने एक लड़की को सेल्सगर्ल बना कर विनय के घर भेजा और उस के जरिए पूनम को अपने नाम से लिया गया सिमकार्ड और मोबाइल फोन भिजवा दिया. पूनम के पास फोन पहुंचा तो विजय एक बार फिर पूनम के संपर्क में आ गया.

अब वह दिन में कईकई बार पूनम को फोन करने लगा. दोनों के बीच घंटों बातचीत होने लगी. बातचीत में विजय पूनम से एकांत में मिलने की बात कहता था. पूनम ने उसे उस की शादीशुदा जिंदगी और परिवार की इज्जत का हवाला दिया तो वह पूनम को बरगलाने की कोशिश करने लगा.

उस ने पूनम को समझाया कि वह अपने पति विनय की कार में चरस, स्मैक और तमंचा रख दे. यह सब चीजें वह उसे मुहैया करा देगा. इस के बाद वह पुलिस को फोन कर के विनय को पकड़वा देगा. विनय के जेल जाने के बाद दोनों आराम से साथ रहेंगे.

पूनम ने इंद्रबहादुर द्वारा फोन देने तथा बातचीत करने की जानकारी पति विनय को नहीं दी थी. दरअसल पूनम डर रही थी कि पति को बताने से वह भड़क जाएगा और उस से झगड़ा करेगा. इस झगड़े और मारपीट में कहीं उस के पति की जान न चली जाए. क्योंकि इंद्रबहादुर गोली मार कर विनय को पहले भी ट्रेलर दिखा चुका है.

इधर पति का साथ छोड़ने और अवैध संबंध बनाने की बात जब पूनम ने नहीं मानी तो इंद्रबहादुर ने एक और षडयंत्र रचा. उस ने पूनम को बदनाम करने के लिए रिचा झा और राधे झा नाम की फरजी आईडी से फेसबुक एकाउंट बना लिया. इस के बाद इंद्रबहादुर उर्फ विजय यादव ने पूनम के साथ अपनी अश्लील फोटो फेसबुक पर अपलोड कर इस की जानकारी उस के पति विनय, परिवार के अन्य लोगों तथा रिश्तेदारों को दे दी, ताकि वह बदनाम हो जाए.

विनय झा ने जब पूनम के साथ इंद्रबहादुर की अश्लील फोटो फेसबुक पर देखी तो उस का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने पूनम से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने सारी सच्चाई विनय को बता दी.

सच्चाई जानने के बाद विनय ने इस गंभीर समस्या पर अपने बड़े भाई विनोद झा और भतीजे सत्यम उर्फ विक्की से बात की. विनोद व सत्यम भी फेसबुक पर पूनम अश्लील फोटो देख चुके थे. वे दोनों भी इस समस्या का निदान चाहते थे. गहन मंथन के बाद पूनम, विनय, विनोद तथा सत्यम उर्फ विक्की ने इंद्रबहादुर उर्फ विजय यादव की हत्या की योजना बनाई. हत्या की योजना में विनय ने अपने मामा के साले के लड़के अनुपम को भी शामिल कर लिया.

अनुपम गाजियाबाद का रहने वाला था. उस का आपराधिक रिकौर्ड था. वह पूर्वांचल के एक बड़े माफिया के संपर्क में भी रहा था. इस के बाद अनुपम ने पूनम, विनय, विनोद व सत्यम उर्फ विक्की के साथ विजय की हत्या की अंतिम रूपरेखा तैयार की और हत्या के लिए एक चापड़ खरीद कर रख लिया. इस के बाद अनुपम वापस गाजियाबाद चला गया.

24 सितंबर, 2017 को अनुपम अपने एक अन्य साथी के साथ कानपुर आया और विनय झा के घर पर रुका. उस ने इंद्रबहादुर की हत्या के संबंध में एक बार फिर पूनम, विनोद व सत्यम उर्फ विक्की से विचारविमर्श किया. इस के बाद वह उन के साथ वह जगह देखने गया, जहां इंद्रबहादुर उर्फ विजय यादव को षडयंत्र के तहत बुलाना था.

शाम पौने 6 बजे पूनम झा ने योजना के तहत इंद्रबहादुर को फोन किया. उस ने उसी मोबाइल से बात की, जो उस ने पूनम को भिजवाया था. फोन पर पूनम ने उस से कहा कि वह पति विनय को फंसा कर जेल भिजवा कर उस के साथ रहने को तैयार है, लेकिन इस से पहले वह उस की सारी योजना समझना चाहती है, इसलिए वह उस से मिलने अरमापुर थाने के पीछे मजार के पास आ जाए. चरस, स्मैक व असलहा भी साथ ले आए, ताकि मौका देख कर वह उस सामान को पति की गाड़ी में रख सके.

पूनम की बातों में फंस कर इंद्रबहादुर उर्फ विजय यादव अपनी बोलेरो गाड़ी से अरमापुर थाने के पीछे पहुंच गया. यह सुनसान इलाका है. वहां पूनम व उस का पति तथा अन्य साथी पहले से मौजूद थे. इंद्रबहादुर पूनम से बात करने लगा. उसी समय अनुपम ने रेंच से विजय के सिर पर पीछे से वार कर दिया. विजय लड़खड़ा कर जमीन पर गिरा तो पूनम के पति विनय झा, जेठ विनोद झा, भतीजे सत्यम उर्फ विक्की तथा अनुपम ने उसे दबोच लिया.

उसी समय पूनम विजय की छाती पर सवार हो गई और बोली, ‘‘कमीने, तूने मेरी और मेरे परिवार की इज्जत नीलाम कर बदनाम किया है. आज तुझे तेरे पापों की सजा दे कर रहूंगी.’’ कहते हुए पूनम ने चापड़ से विजय की गरदन पर वार कर दिया. गरदन पर गहरा घाव बना और खून बहने लगा. इस के बाद विनय ने चापड़ से कई वार किए. इस के बाद वे सब उसे मरा समझ कर वहां से भाग निकले. चापड़ उन्होंने पास की झाड़ी में छिपा दिया.

इंद्रबहादुर गंभीर घायलावस्था में पड़ा कराह रहा था. कुछ समय बाद उधर से एक राहगीर निकला तो इंद्रबहादुर ने आवाज दे कर उसे रोक लिया. उस ने राहगीर को अपने बड़े भाई वीरबहादुर यादव का नंबर दे कर कहा कि वह फोन कर के उसे उस के घायल होने की सूचना दे दे. उस राहगीर ने वीरबहादुर को सूचना दे दी.

सूचना पाते ही वीरबहादुर अपने साथियों के साथ वहां पहुंच गया. गंभीर रूप से घायल इंद्रबहादुर ने अपने बड़े भाई को बता दिया कि उस की यह हालत पूनम झा, उस के पति विनोद, भतीजे सत्यम उर्फ विक्की तथा रिश्तेदार अनुपम व उस के साथी ने की है. यह बता कर विजय बेहोश हो गया. वीरबहादुर ने भाई विजय यादव के बयान की मोबाइल पर वीडियो बना ली थी.

वीरबहादुर अपने घायल भाई इंद्रबहादुर को साथियों के साथ हैलट अस्पताल ले गया. पर उस की हालत गंभीर बनी हुई थी, इसलिए उसे वहां से रीजेंसी अस्पताल भेज दिया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. बजरंग दल के नेता इंद्रबहादुर की हत्या की खबर फैली तो हड़कंप मच गया.

उस के सैकड़ों समर्थक अस्पताल पहुंच गए. एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा को खबर लगी तो वह भी रीजेंसी अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने मृतक के परिजनों व समर्थकों को आश्वासन दिया कि हत्यारों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा.

मीणा ने अरमापुर थानाप्रभारी समीर गुप्ता को आदेश दिया कि वह शव को पोस्टमार्टम हाउस भिजवाएं तथा रिपोर्ट दर्ज कर अभियुक्तों के खिलाफ सख्त काररवाई करें. मीणा ने घटनास्थल का भी निरीक्षण किया और पोस्टमार्टम हाउस व अस्पताल के बाहर भारी पुलिस फोर्स भी तैनात कर दिया.

एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा का आदेश पाते ही अरमापुर थानाप्रभारी समीर गुप्ता ने मृतक विजय यादव के भाई वीरबहादुर यादव से घटना के संबंध में बात की. उस ने भाई के मरने से पहले रिकौर्ड किया वीडियो उन्हें सौंप दिया.

वीरबहादुर की तहरीर पर पुलिस ने भादंवि की धारा 302 के तहत पूनम झा, उस के पति विनय, जेठ विनोद झा, भतीजे सत्यम उर्फ विक्की, रिश्तेदार अनुपम तथा उस के साथी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली.

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चूंकि हत्या का यह मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए नामजद अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए एसएसपी ने एक पुलिस टीम का गठन किया, जिस में अरमापुर थानाप्रभारी समीर गुप्ता, क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर मनोज मिश्रा, क्राइम ब्रांच प्रभारी विनोद मिश्रा, सर्विलांस सेल प्रभारी देवी सिंह, कांस्टेबल चंदन कुमार गौड़, देवेंद्र कुमार, भूपेंद्र कुमार, धर्मेंद्र, ललित, राहुल कुमार तथा महिला कांस्टेबल पूजा को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने ताबड़तोड़ छापे मार कर 25 नवंबर की दोपहर पूनम झा, उस के पति विनय झा, जेठ विनोद झा तथा भतीजे सत्यम उर्फ विक्की को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उन से पूछताछ की गई.

प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी खुद को बेकसूर बताते रहे, लेकिन जब पुलिस ने पूनम झा के मोबाइल की काल डिटेल्स खंगाली तो उस में इंद्रबहादुर से घंटों बातचीत होने और घटना से पहले भी इंद्रबहादुर से बातचीत होने का रिकौर्ड सामने आ गया.

इस के बाद सख्ती करने पर सभी आरोपी टूट गए और हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उन की निशानदेही पर झाडि़यों में छिपाया गया चापड़ तथा पूनम ने अपनी साड़ी बरामद करा दी, जो उस ने हत्या के समय पहनी थी.

पुलिस टीम ने सभी आरोपियों को एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा के सामने पेश किया. मीणा ने आननफानन प्रैस कौन्फ्रैंस बुला कर पत्रकारों के समक्ष घटना का खुलासा कर दिया. आरोपी विनय ने पत्रकारों को बताया कि इंद्रबहादुर जबरन उस की पत्नी के साथ संबंध बनाना चाहता था. इस के लिए वह पूनम पर दबाव बना रहा था. वह पूनम की मार्फत उसे तथा उस के परिवार को गलत धंधे में भी फंसाना चाहता था.

पूनम जब तैयार नहीं हुई तो उस ने फरजी फेसबुक आईडी बना कर पूनम को बदनाम किया. इसी के बाद उस ने विजय की हत्या की योजना बनाई और उसे मौत की नींद सुला दिया.

पुलिस ने 26 नवंबर, 2017 को सभी अभियुक्तों को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उन की जमानत स्वीकृत नहीं हुई थी. अभियुक्त अनुपम व उस का साथी फरार था. पुलिस उन की गिरफ्तारी का प्रयास कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

शेख के चंगुल में फंसी रीना की वतन वापसी

अक्तूबर, 2017 महीने में सोशल मीडिया पर एक ऐसा वीडियो वायरल हो रहा था, जिसे जो  कोई भी देखता था, उस का कलेजा दहल उठता था. वीडियो में एक महिला पंजाब के जिला संगरूर के आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान को संबोधित करते हुए गुहार लगा रही थी कि वह बहुत ही गरीब परिवार से है. एक साल पहले वह नौकरी के लिए सऊदी अरब के दावाद्मी शहर आई थी. वह जहां नौकरी करती है, उसे कई कई दिनों तक खाना नहीं दिया जाता. कमरे में बंद कर के बाहर से ताला बंद कर दिया जाता है. उस के साथ बेरहमी से मारपीट करने के साथसाथ अन्य तरह से भी यातनाएं दी जाती हैं.

महिला के कहने के अनुसार, उस का पति है, बच्चे हैं, मां है, जो बहुत बीमार है. उन का औपरेशन होना है. वह अपने घर वालों के बीच आना चाहती है. लेकिन उसे आने नहीं दिया जा रहा है. वीडियो में अपनी दुखभरी कहानी बयान करते हुए वह महिला पंजाब के लड़कों और लड़कियों से अपील कर रही थी कि वे भूल कर भी नौकरी के लिए सऊदी अरब न आएं, क्योंकि यहां न केवल शोषण किया जाता है, बल्कि तरह तरह से प्रताडि़त भी किया जाता है.

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किसी तरह निकल कर वह स्थानीय थाने भी गई थी, लेकिन पुलिस ने उस की मदद करने के बजाय उसे डरा धमका कर वापस भेज दिया, जहां उस की जम कर पिटाई की गई. इस तरह वह फिर उसी घर पहुंच गई.

अपनी दुखभरी कहानी सुनाने के बाद वह महिला सांसद भगवंत मान को संबोधित करते हुए कह रही थी, ‘भगवंत मान साहब, मेरी मदद कीजिए. मैं यहां बहुत दुखी हूं. मैं यहां मुसीबत में फंसी हूं. मुझे यहां आए एक साल हो गया है. मैं एक साल से जुल्म सह रही हूं. आप ने होशियारपुर की एक लड़की की मदद की थी, उसे यहां से निकलवाया था, उसी तरह मुझे भी निकलवाइए. मैं आप की बेटी की तरह हूं.

‘मुझे पता नहीं था कि मेरे साथ इस तरह होगा. यहां मुझे कई कई दिनों तक खाना नहीं दिया जाता. मेरे साथ मारपीट की जाती है. मैं सऊदी अरब के दावाद्मी शहर में रहती हूं. मैं यहां नौकरी करने आई थी, लेकिन यहां आ कर मैं बुरी तरह फंस गई हूं.

‘अब आप किसी तरह मुझे यहां से निकलवाइए. अगर आप ने मुझे यहां से नहीं निकलवाया तो मैं मर जाऊंगी. मुझे ये लोग मार डालेंगे. मैं अपने बच्चों के पास वापस आना चाहती हूं. मेरी मां का औपरेशन होना है. वह बहुत बीमार हैं.’

अपनी शरीर पर लगी चोटों की ओर इशारा करते हुए वह आगे कह रही थी, ‘देखिए, मेरे साथ किस तरह मारपीट की गई है. जगहजगह से खून निकल रहा है. ये लोग बहुत गंदे हैं. मैं अपने भाईबहनों से यही कहूंगी कि वे कभी सऊदी अरब न आएं. मेरी हालत देख लीजिए, मैं जिस तरह से दिन काट रही हूं, उस से यही विनती है कि आप लोग यहां कभी मत आना.’

सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस वीडियो से पंजाब में जैसे तूफान आ गया. समाजसेवी संस्थाओं ने जनता के साथ मिल कर पंजाब के शहरों में जगहजगह पर भारत सरकार और राज्य सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने और जुलूस निकालने शुरू कर दिए.

सभी जिलों के डीसी औफिसों के घेराव किए गए. सऊदी अरब में शेखों के चंगुल में फंसी उस महिला की शीघ्र वापसी के लिए ज्ञापन दिए गए. इसी के साथ समाचारपत्रों में भी उस महिला के बारे में प्रमुखता से समाचार छपे.

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जिसजिस ने भी वह वीडियो देखा, उन सब की यही प्रार्थना थी कि यह महिला किसी तरह मुक्त हो जाए. सांसद भगवंत मान कुछ करते, उस के पहले ही भारत सरकार की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उस वीडियो को देखा और उस महिला की परेशानी को गंभीरता से लेते हुए खुद ही संज्ञान ले कर ट्वीट किया.

इसी के साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सऊदी अरब स्थित भारतीय दूतावास को उस महिला के बारे में पता करने का आदेश दिया. उन्हीं की पहल पर उस लड़की को शेख के चंगुल से मुक्त करा कर भारत लाने के प्रयास शुरू कर दिए गए.

बाद में पता चला कि उस महिला का नाम रीना रानी था. 9 अक्तूबर को उस ने अपनी मां चंदरानी को यह वीडियो भेजा था. इस वीडियो को देख कर घर वाले परेशान हो उठे. चंदरानी ने भारत सरकार व आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान को वह वीडियो भेज कर प्रार्थना की कि किसी भी तरह उन की बेटी को शेखों के चंगुल से मुक्त कराया जाए.

रीना रानी ने वीडियो में जो अपनी परेशानी बताई थी, उसे ले कर अखबारों में खबरें छपने लगी थीं. खबर पढ़ कर भगवंत मान ने रीना रानी की मां चंदरानी से फोन द्वारा संपर्क किया और उन्हें सांत्वना दी कि वह रीना को सऊदी अरब से जल्द ही भारत लाएंगे.

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भगवंत मान ने रीना के मामले में गंभीरता दिखाते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से बात की तो पता चला कि यह पूरा मामला उन के संज्ञान में है और उन्होंने रीना के बारे में पता कर के उसे मुक्त करा कर भारत लाने की काररवाई शुरू कर दी है. इस के बाद सुषमा स्वराज ने रीना रानी की मां चंदरानी से फोन पर बात की और रीना का पता और फोन नंबर हासिल कर गृह मंत्रालय को भेज दिया.

सऊदी अरब में फंसी रीना होशियारपुर के थाना दसूहा के गांव बोदल कोटली के रहने वाले किशन की पत्नी थी. किशन से उस की शादी सन 1991 में हुई थी. इस समय उस की एक बेटी नवजोत 21 साल की और बेटा हरीश 17 साल का है. किशन दुबई में नौकरी करने गया था, लेकिन पारिवारिक परेशानी की वजह से वापस आ गया. भारत आने के बाद दुर्घटना में उस के दोनों पैर बेकार हो गए, जिस से वह चलफिर नहीं सकता था.

वही अकेला कमाने वाला था. उस के अपंग होने से घर में भूखों मरने की नौबत आ गई. दोनों बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई. इस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. घर चलाने के लिए रीना मेहनत मजदूरी करने लगी. किसी तरह दो जून की रोटी का जुगाड़ तो हो जाता था, लेकिन पति की दवा, बच्चों की पढ़ाई और कपड़ों का जुगाड़ नहीं हो पाता था.

पंजाब के तमाम लोग विदेशों में जा कर नौकरी कर रहे हैं. उन में तमाम महिलाएं भी हैं. महिलाओं को विदेशों में घरों में काम करने के लिए अच्छा पैसा मिलता है. रीना के गांव की भी तमाम महिलाएं विदेशों में जा कर नौकरी कर रही हैं और अच्छाखासा पैसा कमा रही हैं. घर की परेशानी को देखते हुए रीना ने भी विदेश जाने का मन बनाया.

किसी से ब्याज पर रुपए ले कर विगत 24 अक्तूबर, 2016 को किसी एजेंट के जरिए वह 2 साल के वीजा पर सऊदी अरब चली गई. उसे वहां एक शेख के घर में काम करना था. एजेंट ने उसे बताया था कि उस परिवार में 12 लोग हैं.

रीना सऊदी अरब के दावाद्मी शहर के रहने वाले उस शेख के घर पहुंच कर काम करने लगी. 4 महीने तक तो सब ठीक रहा, लेकिन उस के बाद उसे परेशान किया जाने लगा. उसे बुरी तरह से मारापीटा जाने लगा. एक तरह से वह नरक की जिंदगी जीने लगी. अब रीना की समझ में आया कि उस के साथ धोखा हुआ है.

एजेंट ने उसे मलेशिया भेजने की जगह सऊदी अरब भेज दिया. वह भी ऐसे जालिम लोगों के यहां, जिन्होंने उस का जीना हराम कर दिया. वह वहां हंसने की कौन कहे, किसी से बात भी नहीं कर सकती थी. किसी तरह उस ने अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों की वीडियो बना कर मां को भेजी तो उसे भारत वापस लाने के प्रयास शुरू कर दिए गए.

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विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के आदेश पर सऊदी अरब स्थित भारतीय दूतावास रीना को शेख के घर से मुक्त करा कर दूतावास ले आया, ताकि रीना को भारत भेजने की काररवाई की जा सके. क्योंकि रीना को एजेंट ने धोखे से ट्रैवल वीजा पर सऊदी भेजा था. इसलिए उसे वापस भेजने में कानूनी अड़चनें आ रही थीं.

लेकिन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का आदेश था, इसलिए दूतावास अधिकारी दोनों देशों के बीच कानूनी अड़चनों को दूर कर रीना को भारत भेजने की तैयारी शुरू कर दी. जब तक कानूनी अड़चनें दूर नहीं हुईं, तब तक रीना को सऊदी अरब के लेबर कोर्ट में रखा गया. लेकिन रीना शेख के चंगुल से आजाद हो चुकी थी. अब वह रोजाना पंजाब में रह रहे अपने घर वालों से बात करने लगी थी.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इस मामले में निजी तौर पर दिलचस्पी ले रही थीं और रीना रानी की सुरक्षित वापसी के लिए जीजान से जुटी थीं. उन्हें पता चल चुका था कि रीना होशियारपुर से टूरिस्ट वीजा पर पहले दुबई गई थी, जहां से उसे सऊदी अरब ले जाया गया था.

2 देशों, सऊदी अरब और दुबई की इमिग्रेशन पौलिसी की कानूनी अड़चन की वजह से रीना की वापसी में देर हो रही थी. उन्होंने जल्दी से जल्दी इस समस्या का समाधान करा कर रीना के घर वापसी का रास्ता खोल दिया. इस तरह 17 नवंबर, 2017 को रीना सऊदी अरब से सकुशल भारत आ गई.

18 नवंबर की शाम रीना अपने घर पहुंची. घर वालों के गले लग कर रोते हुए उसे अजीब सा सुख मिल रहा था. उस ने लोगों से जो अपनी आपबीती बताई, वह इस प्रकार थी—

अपने घर को गरीबी से उबारने की चाहत में रीना 16 अक्तूबर, 2016 को सऊदी अरब पहुंची. शुरू में तो 3-4 महीने तक सब ठीक रहा. लेकिन उसे 25 हजार के वेतन पर जहां ले जाया गया था, लेकिन उसे 25 हजार की जगह 15 हजार रुपए ही वेतन दिया गया. इस के बाद उसे परेशान किया जाने लगा. वे इंसान को इंसान नहीं, मशीन समझते थे.

रीना से 20-20 घंटे काम करवाते थे.

वे काम में जरा भी ढील होने पर जानवरों की तरह पीटते थे. कई कई दिनों तक खाना नहीं देते थे. उन की यातनाओं से तंग आ कर उस ने कई बार आत्महत्या करने का मन बनाया, लेकिन परिवार और मां के बारे में सोच कर हिम्मत नहीं कर पाई.

किसी तरह उस ने बच्चों से वाईफाई का पासवर्ड ले कर अपनी परेशानी की वीडियो बनाई और वाट्सऐप के जरिए मां को वह वीडियो भेज दिया. उसी की बदौलत वह वहां से मुक्त हो सकी.

वीडियो भेजने के कुछ दिनों बाद सऊदी पुलिस रीना को खोजते हुए पहुंची. शेख के घर की एक लड़की ने रीना को अंगरेजी में समझाने की कोशिश की कि पुलिस उसे भारत ले जाने आई है, लेकिन शेख ने नहीं जाने दिया.

इस के बाद 2 बार फिर पुलिस आई, लेकिन उसे नहीं भेजा गया. अंत में 16 नवंबर को पुलिस आई और उसे जबरदस्ती अपने साथ ले गई. इस के बाद सारी काररवाई पूरी कर उसे भारत लाया गया.

दो सगे भाइयों की करतूत : 20 साल तक बहन को दी यातना

दुनिया में इंसान को सब कुछ मिल जाता है, लेकिन एक ही मां से पैदा हुए भाईबहन कभी नहीं मिलते. भाईबहन का प्यार दुनिया के लिए एक मिसाल है. भाई अपनी बहन को इतना प्यार करता है कि उस के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है. बहन भी शादी के बाद ससुराल चली जाती है तो हमेशा अपने भाई की खुशी की कामना करती रहती है.

लेकिन आज की इस रंग बदलती दुनिया में मुंबई के रहने वाले 2 भाइयों रविंद्र वेर्लेकर और मोहनदास वेर्लेकर ने अपनी सगी बहन सुनीता वेर्लेकर को 20 सालों तक एक अंधेरी कोठरी में कैद कर के रखा. बिना किसी कसूर के उस ने उस कोठरी में जो जिंदगी गुजारी, उसे जान कर हर किसी का मन द्रवित हो उठेगा.

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11 जुलाई, 2017 की बात है. हमेशा की तरह उस दिन भी सवीना मार्टिंस अपनी संस्था के औफिस में समय से पहुंच गई थीं. वह अपने कंप्यूटर पर आए ईमेल मैसेज चैक करने लगीं. मैसेज को पढ़ते पढ़ते उन की नजर एक निवेदन पर आ कर रुक गई. वह निवेदन बहुत ही गंभीर और अत्यंत मार्मिक था. किसी अजनबी व्यक्ति द्वारा भेजे गए उस मैसेज को पढ़ कर सवीना मार्टिंस सन्न रह गईं. उन्हें उस संदेश पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसे भी लोग हैं, जो इंसान और इंसानियत के नाम पर कलंक है.

सवीना मार्टिंस गोवा के पणजी शहर की एक जानीमानी समाजसेवी संस्था की अध्यक्ष हैं. उन की संस्था नारी उत्पीड़न रोकने का काम करती है. औनलाइन भेजे गए उस मार्मिक संदेश में उस व्यक्ति ने लिखा था कि ‘पणजी बांदोली गांव सुपर मार्केट के आगे एक बंगले के पीछे बनी कोठरी में सुनीता वेर्लेकर नामक महिला कई सालों से कैद है. मेरी आप से विनती है कि आप उस की मदद कर के उसे उस कैद से मुक्त कराएं.’

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                                                           सवीना मार्टिंस

सवीना मार्टिंस ने उस ईमेल मैसेज का प्रिंटआउट निकाल कर अपने पास रख लिया. अपने सहयोगियों के साथ बांदोली गांव जा कर उस मैसेज की सच्चाई का पता लगाया. इस के बाद उन्होंने पणजी महिला पुलिस थाने जा कर वहां की महिला थानाप्रभारी रीमा नाइक से मुलाकात कर उन्हें पूरी बात बता कर ईमेल मैसेज का प्रिंट उन के सामने रख दिया. सवीना ने सुनीता वेर्लेकर को बंदी बना कर रखने वाले उस के दोनों भाइयों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा कर उसे कैद से मुक्त कराने की मांग की.

थानाप्रभारी रीमा नाइक ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इस की जानकारी अपने सीनियर अधिकारियों को दे दी. अधिकारियों का निर्देश मिलते ही वह पुलिस टीम के साथ तुरंत घटनास्थल की तरफ रवाना हो गईं. जिस समय पुलिस टीम बताए गए पते पर पहुंची, उस से पहले ही समाजसेवी संस्था के सदस्य, डाक्टर, प्रैस वाले और एंबुलैंस वहां पहुंच चुकी थी.

पुलिस टीम और संस्था के सदस्यों को पहले तो सुनीता वेर्लेकर के दोनों भाइयों और भाभियों ने गुमराह करने की कोशिश की. उन्होंने बताया कि सुनीता कई साल पहले पागल हो कर कहीं चली गई थी. पर पुलिस और संस्था के सदस्यों को उन की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने उन के मकान की तलाशी ली तो एक मकान में ताला बंद मिला.

उस मकान से तेज बदबू आ रही थी. थानाप्रभारी को शक हुआ कि ये लोग झूठ बोल रहे हैं. उन्होंने उस मकान का ताला खोलने को कहा तो वे आनाकानी करने लगे. पुलिस ने उन्हें डांटा तो उन्होंने मकान का ताला खोल दिया.

मकान का गेट खुलते ही अंदर से दुर्गंध का ऐसा झोंका आया, जिस से वहां लोगों का खड़े रहना दूभर हो गया. सभी को अपनीअपनी नाक पर रूमाल रखना पड़ा. मकान के एक कमरे में पुलिसकर्मियों ने झांक कर देखा तो उस में एक महिला बैठी मिली. उस से बाहर आने को कहा गया तो वह चारपाई से उठ कर एक कोने में चली गई. वह सुनीता वेर्लेकर थी.

संस्था के सदस्य और पुलिस नाक पर रूमाल रख कर कमरे के अंदर गई. अंदर का दृश्य देख कर सभी स्तब्ध रह गए. कमरे के एक कोने में डरीसहमी सुनीता वेर्लेकर दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपाए बैठी थी. उस के बदन पर कपड़े भी नाममात्र के थे. यही वजह थी कि शरम की वजह से वह बाहर आने को तैयार नहीं थी. संस्था के सदस्यों ने उसे कपड़े ला कर दिए तो वह उन्हें पहन कर कोठरी से बाहर आई.

पिछले 20 सालों से एक कमरे में कैद सुनीता वेर्लेकर ने बाहर आ कर उजाला देखा तो वह अपने आप को संभाल नहीं पाई. खुशी से उस की आंखों से आंसू टपकने लगे. वह बेहोश जैसी हो गई. संस्था के सदस्यों ने उसे संभाला और पीने का पानी दिया.

घटनास्थल पर मौजूद डाक्टरों ने सुनीता का सरसरी तौर पर निरीक्षण किया और उसे एंबुलैंस में लिटा दिया. डाक्टर उसे पहले गोवा के आयुर्वेदिक मैडिकल अस्पताल ले गए.

प्राथमिक उपचार के बाद वहां के डाक्टरों ने उसे बांदोली के मानसरोवर अस्पताल भेज दिया. सुनीता का परीक्षण किया गया तो वह मानसिक रूप से ठीक पाई गई. उपचार के बाद अस्पताल से उसे छुट्टी दे दी गई.

सुनीता को अस्पताल भेज कर पुलिस और संस्था के सदस्यों ने कमरे का निरीक्षण किया, जिस में सुनीता रहती थी तो पाया कि उस कमरे में सुनीता की जिंदगी बद से बदतर बनी हुई थी. वह उसी कमरे में नित्यक्रिया करती थी, जिस के कारण कोठरी में कीड़ों मकोड़ों और मच्छरों की भरमार थी.

पता चला कि पिछले 20 सालों से सुनीता वेर्लेकर नहाई नहीं थी. उस के खाने के लिए एक टूटी प्लेट और सोने के लिए एक चारपाई थी. उसे खाना दरवाजा खोल कर देने के बजाय दरवाजे की निकली हुई एक पट्टी के बीच से ऐसे डाला जाता था, जैसे किसी कुत्ते बिल्ली को दिया जाता है.

घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण करने और आसपास के लोगों से पूछताछ करने के बाद पुलिस टीम ने सुनीता के भाई रविंद्र वेर्लेकर, मोहनदास वेर्लेकर, भाभी अनीता वेर्लेकर और अमिता वेर्लेकर को हिरासत में ले लिया. थाने में जब इन सभी से पूछताछ की गई तो सभी ने अपना अपराध स्वीकार कर सुनीता पर किए गए अत्याचारों की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

45 साल की सुनीता शिरोडकर उर्फ वेर्लेकर जितनी ही सुंदर थी, उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी. पिता का नाम रामदेव वेर्लेकर था. सुनीता वेर्लेकर उन की एकलौती बेटी थी, जिसे वह बहुत ही प्यार करते थे. रामदेव वेर्लेकर के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे रविंद्र वेर्लेकर और मोहनदास वेर्लेकर थे. दोनों की शादियां हो चुकी थीं. घर में सब से छोटी होने की वजह से सुनीता दोनों भाभियों अनीता और अमिता की भी लाडली थी.

सुनीता वेर्लेकर ने भी भाइयों की ही तरह पणजी के कालेज से पढ़ाई की. अच्छे नंबरों से बारहवीं पास करने के बाद वह उच्च शिक्षा हासिल कर अपना भविष्य तय करना चाहती थी. लेकिन मातापिता इस पक्ष में नहीं थे. पुरानी सोच वाले मातापिता का मानना था कि बेटियों को अधिक पढ़ाना ठीक नहीं है. उन्होंने उस की पढ़ाई बंद करा दी.

20 साल की उम्र में मातापिता उस के लिए योग्य वर की तलाश में जुट गए. अपनी जानपहचान वालों के माध्यम से शीघ्र ही उन्हें सुनीता के लिए लड़का भी मिल गया. लड़के का नाम था रमेशचंद्र शिरोडकर. मुंबई की एक निजी कंपनी में वह नौकरी करता था. उस के घर की आर्थिक स्थिति भी ठीकठाक थी.

सुनीता के पिता रामदेव वेर्लेकर को यह रिश्ता पसंद आ गया. इस के बाद सामाजिक रीतिरिवाज से दोनों की शादी कर दी गई. यह 25 साल पहले की बात है. शादी के बाद रमेशचंद्र शिरोडकर और सुनीता मुंबई में हंसीखुशी से रहने लगे.

2-3 साल कैसे गुजर गए, उन्हें पता ही नहीं चला. इस के बाद समय जैसे ठहर सा गया था, क्योंकि सुनीता इतने सालों बाद भी मां नहीं बन सकी थी. जिस की वजह से रमेशचंद्र उदास रहने लगा और धीरेधीरे सुनीता से दूर जाने लगा. सुनीता भी इस बात को ले कर काफी दुखी थी. एक दिन ऐसा आया कि रमेशचंद्र की जिंदगी में दूसरी लड़की आ गई.

उस लड़की के आने के बाद रमेशचंद्र काफी बदल गया. अब वह आए दिन सुनीता को प्रताडि़त करने लगा. उस ने सुनीता से साथ मारपीट भी शुरू कर दी. उस के चरित्र पर भी कीचड़ उछालने लगा. उसी लड़की की वजह से एक दिन वह सुनीता को उस के मायके यह कह कर छोड़ आया कि सुनीता का किसी लड़के से चक्कर चल रहा है.

सुनीता को मायके पहुंचा कर रमेशचंद्र ने उस लड़की से विवाह कर नई गृहस्थी बसा ली. इस के बाद वह सुनीता को भूल गया. रमेशचंद्र जिस तरह सुनीता पर घिनौना लांछन लगा कर मायके छोड़ आया था, उस से वेर्लेकर परिवार काफी दुखी था. सुनीता भी पति के इस आरोप और व्यवहार से इस प्रकार आहत थी कि उस का हंसना मुसकराना सब बंद हो गया था.

वह उदास और खोईखोई सी रहने लगी थी. उस की आंखों से अकसर आंसू बहते रहते थे. शादी के कुछ दिनों पहले ही उसे छोड़ कर चली गई थी. एक पिता ही था, जो बेटी के मन की स्थिति को समझता था.

रामदेव बेटी का पूरा खयाल रखते थे. वह उसे समझाते बुझाते रहते थे. पिता भी अपनी लाडली बेटी का दुख अधिक दिनों तक सहन नहीं कर सके और एक दिन बेटी के दर्द को सीने से लगा कर हमेशा हमेशा के लिए यह संसार छोड़ गए. उन्हें हार्टअटैक हुआ था.

पिता की मौत के बाद सुनीता अकेली रह गई. एक तरफ पति की बेवफाई और दूसरी तरफ पिता की मौत ने सुनीता को तोड़ कर रख दिया. अब सुनीता की देखभाल करने वाला कोई नहीं था. दोनों भाई और भाभियां उस की उपेक्षा करने लगीं. इस से सुनीता का स्वभाव चिड़चिड़ा सा हो गया. वह अपने प्रति लापरवाह हो गई. वह अकसर अकेली बैठी बड़बड़ाती रहती. जहां बैठती, वहां घंटोंघंटों बैठी रह जाती. जहां जाती, वहां से जल्दी लौट कर नहीं आती. रातदिन का उस के लिए कोई मायने नहीं रह गया था.

सुनीता के इस व्यवहार से उस के भाइयों और भाभियों ने उस का ध्यान रखने के बजाय उसे पागल करार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. फिर एक दिन बिना किसी कसूर के उस के भाइयों और भाभियों ने उसे एक कमरे में बंद कर दिया. 10×10 फुट के उस कमरे में हमेशा अंधेरा रहता था. इस के बाद भाईभाभियों ने यह अफवाह फैला दी कि सुनीता पागल हो कर पता नहीं कहां चली गई.

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा. सुनीता उस अंधेरी कोठरी में रह कर अपने भाइयों और भाभियों द्वारा दी गई सजा काट रही थी. भाभियां तो दूसरे घरों से आई थीं, लेकिन भाई तो अपने थे. ताज्जुब की बात यह थी कि उन सगे भाइयों का दिल भी इतना कठोर हो गया था कि उन्हें भी उस पर दया नहीं आई. वे बड़े बेदर्द हो गए थे.

अंधेरी कोठरी में कैद सुनीता पर उस के भाई भाभी जिस प्रकार का जुल्म ढा रहे थे, उस प्रकार का तो अंगरेजी हुकूमत ने भी शायद अपने कैदियों पर नहीं ढाया होगा.

घर का जूठा और बचाखुचा खाना ही उसे कोठरी के अंदर पहुंचाया जाता था. नित्यक्रिया के लिए भी उसे उसी कोठरी के कोने का इस्तेमाल करना पड़ता था. न तो नहाने के लिए पानी मिलता था, न पहनने के लिए कपड़े और न सोने के लिए बिस्तर था. उस कोठरी में इंसान तो क्या, जानवर भी नहीं रह सकता था.

यदि उसे वहां से मुक्त नहीं कराया जाता तो एक दिन उस की लाश ही बाहर आती. अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद पुलिस ने सुनीता को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे गोवा के पर्वभरी प्रायदोरिया आश्रम गृह भेज दिया गया.

पुलिस ने पूछताछ के बाद सुनीता वेर्लेकर के बड़े भाई रविंद्र वेर्लेकर, छोटे भाई मोहनदास वेर्लेकर, भाभी अमिता वेर्लेकर, अनीता वेर्लेकर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक चारों की जमानत हो चुकी थी और वे जेल से बाहर आ चुके थे. सुनीता वेर्लेकर गोवा के आश्रम में थी, जहां उस की अच्छी देखरेख हो रही थी.

—कथा में रामदेव और रमेशचंद्र काल्पनिक नाम हैं

कैमरे में कैद दर्द-ए-दिल

एक नहीं, बल्कि कई बार डा. रिपुदमन सिंह भदौरिया के दिल में यह खयाल आया था कि बैंक खाते से सारी जमापूंजी निकाल कर और कुछ यहां वहां से जुगाड़ कर 10 लाख रुपए इकट्ठा करे और दे मारे उस कमबख्त ब्लैकमेलर राजाबाबू के मुंह पर, जिस के एक फोन और सीडी ने उन के दिन का चैन और रातों की नींद छीन रखी है.

सोतेजागते, उठतेबैठते और खातेपीते एक ही डर उन के दिलोदिमाग में समाया था कि उन की और उस महाकमबख्त मनीषा की रंगरलियों वाली सीडी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई तो क्या होगा. इतना सोचते ही उन के हाथपैर फूल जाते और दिमाग सुन्न हो जाता था.

उन के दिमाग में यह बात भी आई कि अगर सीडी वायरल हो गई तो उन के सारे यारदोस्त, नातेरिश्तेदार, जानपहचान वाले ही नहीं, अंजान लोग भी ढूंढढूंढ कर उन्हें नफरत और तरस भरी निगाहों से देखेंगे. वे उन की खिल्ली उड़ाते हुए कहेंगे कि यही है वह डाक्टर, जो मरीज ठीक करने के बहाने औरतों से अय्याशी करता है.

लानत है इस सरकारी डाक्टर पर, इस के पास तो महिलाओं को ले जाना ही खतरे वाली बात है. यह तो अच्छा करने के बजाय उन्हें हमेशा के लिए बिगाड़ देता है. मरीजों के ब्लडप्रेशर का इलाज करने वाले डा. रिपुदमन सिंह का ब्लडप्रेशर उस वक्त और बढ़ जाता, जब वह सोचते कि हकीकत सामने आने पर सरकार उन्हें सस्पैंड कर के उन का मैडिकल प्रैक्टिस का लाइसेंस भी रद्द कर सकती है.

अगर ऐसा हो गया तो वह किसी काम के नहीं रहेंगे. उन की पूरी मेहनत और इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी. लोग भी उन से कतराने लगेंगे. यारदोस्त भी उन से कन्नी काटने लगेंगे. ब्लैकमेलर राजाबाबू ने उन से जो 10 लाख रुपए मांगे थे, उन के लिए खास बड़ी रकम नहीं थी, पर खौफ और डर इस बात का था कि ये 10 लाख रुपए उसे दे भी दें तो इस बात की क्या गारंटी कि वह उन का पिंड छोड़ देगा.

हो सकता है कि कुछ दिनों बाद वह फिर उसी सीडी का डर दिखा कर उन से और रकम ऐंठने की कोशिश करे, तब क्या होगा.

चंबल इलाके के भिंड जिले के एक सरकारी अस्पताल में डा. रिपुदमन पिछले 4 दिनों से जिस कशमकश से गुजर रहे थे, उस का रास्ता और मंजिल एक ही था कि जिंदगी भर इन ब्लैकमेलर्स के हाथों लुटते रहो और ऐसा नहीं कर सकते तो बेइज्जती का पंचनामा बनवाने को तैयार रहो.

कोई और रास्ता उन्हें समझ नहीं आ रहा था. बात भी कुछ ऐसी थी, जिस की चर्चा या जिक्र वह किसी से नहीं कर सकते थे.

रहरह कर वह 30 अगस्त, 2017 की दोपहर को कोस रहे थे, जब उन की पहली मुलाकात मनीषा पाल नाम की युवती से हुई थी. उस दिन वह मरीजों से फुरसत पा कर अपनी केबिन में आ कर बैठे थे कि एक बेइंतहा खूबसूरत 25-26 साल की युवती उन के केबिन में दाखिल हुई.

युवती की खूबसूरती का उन पर कोई खास असर नहीं हुआ. क्योंकि डाक्टरी पेशे में आए दिन तरहतरह के मरीज डाक्टरों के पास आते रहते हैं, उन का मरीज से रिश्ता 5-6 मिनट का ही होता है. बीमारी देखी, दवा लिखी, हिदायतें दीं और बात खत्म. दोबारा मरीज उसी हालत में आता था, जब उसे फायदा न हुआ हो.

पर यहां बात कुछ और ही थी. मनीषा की तरफ देखते ही रिपुदमन ने निहायत ही पेशेवर अंदाज में कहा, ‘‘कहिए, क्या तकलीफ है?’’

‘‘तकलीफ बहुत है डाक्टर साहब, इसीलिए तो आप के पास आई हूं.’’ मनीषा ने कुछ शोखी और कुछ परेशानी भरे स्वर में जवाब दिया तो रिपुदमन अचकचा उठे.

उन्होंने रूटीनी अंदाज में मनीषा को मरीजों वाले स्टूल पर बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘हां बताइए, क्या तकलीफ है?’’

इस थोड़ी सी देर में एक बात जो उन्हें न चाहते हुए भी नोटिस में लेनी पड़ी थी कि युवती की टाइट जींस और उस से भी ज्यादा टाइट टौप उभारों को ढंकने के बजाय उन्हें और ज्यादा दिखा रहे थे.

आजकल की मौडर्न युवतियां छोटे शहरों में भी ऐसी ड्रैस पहनने लगी हैं, इसलिए उन्होंने इस बात से अपना ध्यान झटका और मनीषा की तरफ दोबारा सवालिया निगाहों से देखा तो जवाब में मनीषा ने कहा तो कुछ नहीं, पर जो किया, वह उन की उम्मीद से परे था.

एक झटके में मनीषा ने अपनी टीशर्ट उठाई और उसे कंधों तक ले जाते हुए बोली, ‘‘डाक्टर साहब, सीने में बहुत तेज दर्द है.’’

ऐसे लगा मानो विश्वामित्र के सामने कोई मेनका आ कर अपनी पर उतारू हो आई हो. मनीषा के उन्नत वक्षों को देख कर रिपुदमन ने घबरा कर अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं. पर चंद सेकेंड पहले जो नजारा उन्होंने देखा था, वह आंखों से चढ़ कर दिमाग तक पहुंच गया था. आंखें बंद कर लेने से कोई फायदा नहीं हुआ. क्योंकि सब कुछ उन के दिमाग में घूमने लगा.

खुद को संभालने में उन्हें चंद सैकेंड ही लगे और वह संभल कर बोले, ‘‘इस के लिए तो आप को किसी लेडी डाक्टर के पास जाना चाहिए.’’

‘‘क्यों?’’ मनीषा बिंदास स्वर में बोली, ‘‘लेडी डाक्टर ही क्यों, आप क्यों नहीं? क्या आप दिल के दर्द का इलाज नहीं जानते?’’

इस जवाब से उन की समझ में आ गया कि लड़की खब्त मिजाज और बेशर्म भी है. तरहतरह के मरीजों से उन का पाला पड़ता रहता था, लेकिन ऐसी मरीज से पहली दफा वास्ता पड़ा था. समझाने और टरकाने के अंदाज में वह बोले, ‘‘देखिए, कोई लेडी डाक्टर ही आप को देख पाएगी.’’

‘‘ठीक है, दिखा लूंगी, पर हाल फिलहाल तो आप देख लीजिए. दर्द वाकई ज्यादा है, जिसे डाक्टर से छिपाना मैं ठीक नहीं समझती.’’ मनीषा अब दार्शनिकों के से अंदाज में बोली तो रिपुदमन की समझ में यह भी आ गया कि यह सनकी युवती आसानी से उन का पीछा नहीं छोड़ने वाली.

उन्होंने अपना स्टेथकोप उठाया और उसे पीठ व छाती पर जगहजगह लगाया, फिर पर्चे पर कुछ दवाइयां उसे लिख कर दे दीं. इस दौरान मनीषा नादान बनती वाचाल लड़की की तरह अपनी बीमारी से ताल्लुक रखती कई बातें उन से पूछती रही, जिन का वह सब्र से जवाब देते रहे.

मनीषा चली गई तो उन्होंने मीलों लंबी सांस ली. केबिन में बिखरी खुशबू नथुनों और दिमाग में समा रही थी. इसी दौरान दूसरा मरीज आ गया तो वह उसे देखने में व्यस्त हो गए और कुछ देर पहले का नजारा भी दिलोदिमाग से निकल सा गया.

रोजाना की तरह घर आ कर वह अपने कामकाज में लग गए और अस्पताल की बातों को भूल गए. लेकिन देर रात मोबाइल फोन की घंटी से उन की नींद खुली तो वह स्क्रीन पर अंजान नंबर देख झल्ला उठे.

‘क्या पता कौन होगा आधी रात में,’ सोचते हुए उन्होंने काल रिसीव की तो दूसरी तरफ से बगैर किसी भूमिका के हायहैलो की आवाज आई, ‘‘डाक्टर साहब, दवाइयां लेने के बाद भी दिल का दर्द नहीं जा रहा है, ऐसा लग रहा है, मानो कोई मसल रहा हो.’’

रिपुदमन को पहचानने में देर नहीं लगी कि यह आवाज उसी खूबसूरत युवती यानी मनीषा की है, जो दोपहर में उन के पास आई थी और उन के दिल में हलचल मचा गई थी. फिर भी अंजान बनने की एक्टिंग करते हुए उन्होंने पूछा, ‘‘कौन बोल रही हैं आप?’’

‘‘अरे, मैं हूं मनीषा, जिसे दोपहर में आप ने चैक किया था. डाक्टर साहब तब मैं ने सब कुछ तो दिखा दिया था, पर दर्द है कि ठीक नहीं हो रहा है. क्या करूं समझ नहीं आ रहा. अब प्लीज, आप ही कुछ कीजिए.’’ उस ने कहा.

आवाज में दर्द कम, एक आमंत्रण ज्यादा था, जिसे डा. रिपुदमन तो क्या कोई मामूली मर्द भी आसानी से भांप सकता था कि युवती चाहती क्या है और उस के कहने का मतलब क्या है. रिपुदमन के दिमाग का फ्यूज इस बार मनीषा की आवाज से उड़ गया था. फिर भी खुद की प्रतिष्ठा और डाक्टरी पेशे की गरिमा को बनाए रखते हुए उन्होंने फोन पर ही मनीषा को दूसरी गोली का नाम लिखाते उसे खा लेने की सलाह दी.

मनीषा का फोन काटने का इरादा नहीं लग रहा था, इसलिए वह बेवजह के सवाल किए जा रही थी. सवाल भी एक पुरुष को भड़काने वाले थे. लंबी द्विअर्थी बातें करने के बाद उन्होंने इतिश्री करते हुए मनीषा को फिर किसी लेडी डाक्टर को दिखाने की सलाह दे डाली.

इति तो नहीं, पर अति जरूर हो रही थी. मनीषा पाल की बातों और खूबसूरती ने फिर बाकी रात रिपुदमन को सोने नहीं दिया.

बारबार उन की आंखों के सामने वह दृश्य घूम उठता था, जब मनीषा ने एक झटके में अपनी गुलाबी टीशर्ट कंधे तक उठा दी थी. फिर थोड़ी देर पहले की गई बातों से तो बिलकुल साफ लग रहा था कि वह उन के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार है.

युवा रिपुदमन की हालत किशोरों जैसी हो गई थी. जैसे ही वह नींद में जाने को होते, गदराई मनीषा उन्हें जगा देती. उस से हुई मुलाकात और बातों से मैडिकल के दौरान फिजियोलौजी नाम के विषय की पढ़ाई हवा हो गई थी. बाकी रात संस्कारों और वासना का युद्ध होता रहा, जिस में रिपुदमन की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन भारी पड़ रहा है.

जितना वह मनीषा को अपने से दूर करने की कोशिश करते थे, वह न्यूटन के नियम की तरह वापस उन्हीं की तरफ आ जाती थी. अगले 3 दिन सुकून से कटे. मनीषा का कोई फोन नहीं आया तो रिपुदमन को लगा कि वह लड़की उन की जिंदगी में हवा के महकते झोंके की तरह आई थी और चली गई.

31 अगस्त को छुट्टी ले कर वह अपने घर ग्वालियर आ गए. तीसरे दिन अचानक फिर उन के पास उस का फोन आया. वह पहले की ही तरह बगैर किसी औपचारिकता के बोली, ‘‘अब दर्द में आराम तो है, लेकिन वह पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है. इसलिए बेहतर होगा कि आप एक बार और चैक कर लें.’’

‘‘यह तो मुमकिन नहीं है. क्योंकि इस समय मैं ग्वालियर में हूं.’’ डा. रिपुदमन ने कहा.

‘‘वाह क्या हसीन इत्तफाक है,’’ मनीषा चहक कर बोली, ‘‘मैं भी ग्वालियर आई हुई हूं. आप घर का पता दे दें तो मैं वहीं आ कर दिखा दूं.’’

न चाहते हुए भी रिपुदमन ने उसे अपने घर का पता दे दिया. उस वक्त वह घर में अकेले थे. कुछ देर बाद ही मनीषा उन के घर पहुंच गई. उसे घर आया देख कर रिपुदमन घबरा उठे, पर क्या करते. आ बैल मुझे मार वाली बात भी उन्हीं ने पता दे कर की थी. उन्हें घबराया देख कर मनीषा ने साथ लाए बैग से कोल्डड्रिंक की 2 बोतलें निकाल कर कहा, ‘‘आप तो करेंगे नहीं, लीजिए मैं ही आप का स्वागत करती हूं.’’

रिपुदमन के चेहरे पर शंका देख कर वह हंसते हुए बोली, ‘‘अरे बाबा रास्ते में अपने लिए सेनेटरी नैपकिन खरीद रही थी तो दुकान वाले के पास खुल्ले पैसे नहीं थे, इसलिए सोचा कि कोल्डड्रिंक ही ले लूं. कम से कम आप के साथ कोल्डड्रिंक पीने का सौभाग्य तो मिलेगा. यकीन मानें, इस में कोई जहरवहर नहीं है.’’

इस बार मनीषा और भी उत्तेजक कपड़ों में आई थी. वाकई वह कहर ढा रही थी, जिस से रिपुदमन खुद को बचा नहीं पाए और मनीषा के हाथों कोल्डड्रिंक पी लिया. कोल्डड्रिंक पीने के कुछ देर बाद ही धीरेधीरे उन पर बेहोशी छाने लगी और इस के बाद उन्हें कुछ होश नहीं रहा कि कमरे में क्याक्या हुआ.

जब होश आया तो मनीषा वहां नहीं थी. रिपुदमन याद करने की कोशिश भर करते रहे कि क्या हुआ था, पर याद्दाश्त ने उन का एक हद से ज्यादा साथ नहीं दिया. अच्छी बात यह थी कि घर का सारा सामान सलामत था यानी मनीषा कोई चोरनी या लुटेरन नहीं थी. यह बात सुकून देने वाली थी.

छुट्टी बिता कर वह ग्वालियर से भिंड चले आए, लेकिन फिर मनीषा का कोई फोन नहीं आया न ही चैक कराने या दिखाने वह खुद आई तो उन्हें स्वाभाविक तौर पर हैरानी हुई. धीरेधीरे रिपुदमन फिर अपने अस्पताल की जिंदगी में व्यस्त हो गए और मनीषा की यादों का काफिला भी धीमा होता चला गया.

8 सितंबर, 2017 को एक अंजान आदमी का फोन उन के पास आया. उस ने बेहद शातिर और दबी आवाज में इतना कह कर फोन काट दिया कि मैं राजाबाबू बोल रहा हूं. शाम तक एक पार्सल आप को मिलेगी, उस में एक सीडी है उसे देख लेना कि कैसे आप एक महिला मरीज का इलाज कर रहे हैं. और हां, 10 लाख रुपयों का इंतजाम भी कर के रखना, नहीं तो बहुत जल्द यह सीडी हर कोई देख रहा होगा. फैसला आप के हाथ में है.

इतना सुनते ही रिपुदमन के हाथों के तोते उड़ गए. पलभर में ही वह सारा वाकिया और माजरा समझ गए. धौंस सुनते ही उन का गला सूखने लगा और वह शाम होने का इंतजार करने लगे. फोन करने वाले ने गलत कुछ नहीं कहा था, सचमुच शाम तक सीडी उन के पते पर आ गई थी.

जैसे हाईस्कूल के बच्चे अपने रिजल्ट का इंतजार करते हैं, वैसे ही डा. रिपुदमन सीडी कंप्यूटर में लगा कर इंतजार करने लगे कि आखिर इस में है क्या. पांव तले जमीन खिसकना किसे कहते हैं, यह उन्हें सीडी देख कर समझ में आ गया, जिस में वह और मनीषा एकदम निर्वस्त्र हालत में पलंग पर थे और बिलकुल ब्लू फिल्मों जैसी हरकतें कर रहे थे. उन के और मनीषा के कुछ नग्न हालत के फोटो भी सीडी में थे.

अब सोचनेसमझने के लिए कुछ नहीं रह गया था. एक गलती इतनी भारी पड़ेगी, यह उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था. 4 दिन तो उधेड़बुन में उन्होंने किसी तरह गुजार दिए, पर यह तय नहीं कर पाए कि अब क्या करें और कैसे इज्जत बचाएं. यह तो उन्हें साफ समझ में आ गया था कि मनीषा अकेली नहीं है. चूंकि फोन किसी मर्द ने किया था, इसलिए जाहिर था उस के और भी साथी थे. अब रिपुदमन को लगा कि वह एक गिरोह के चक्रव्यूह में फंस कर अभिमन्यु जैसे छटपटा रहे हैं.

जब बदनामी झेलनी ही है तो क्यों न एक दफा पुलिस की मदद ले कर देखी जाए, यह सोचते ही उन्हें उम्मीद की एक किरण नजर आई कि शायद पुलिस वाले उन की मदद कर बेड़ा पार लगा दें. आखिर कोशिश करने में जाता ही क्या है. नहीं तो मनीषा और फोन पर अपना नाम राजाबाबू बताने वाला शख्स तो जोंक की तरह उन का खून चूसते रहेंगे.

13 सितंबर, 2017 की दोपहर डा. रिपुदमन सिंह हिम्मत जुटा कर ग्वालियर के एसपी डा. आशीष कुमार से व्यक्तिगत रूप से मिले और उन्हें सारी बात बताई. तजुर्बेकार एसपी साहब को माजरा समझते देर न लगी कि डा. रिपुदमन सिंह ब्लैकमेलर्स गिरोह के चंगुल में फंस गए हैं. लिहाजा उन्होंने तुरंत क्राइम ब्रांच के टीआई दिलीप सिंह को मामला सौंपते हुए रिपोर्ट दर्ज कर काररवाई करने के निर्देश दिए.

तेजतर्रार इंसपेक्टर दिलीप सिंह ने डा. रिपुदमन सिंह की सारी कहानी सुनी. चूंकि डा. रिपुदमन ने ब्लैकमेलर्स को अभी कोई पैसे नहीं दिए थे, इसलिए उन्होंने तुरंत योजना बना डाली कि बेहतर होगा कि राजाबाबू नाम के ब्लैकमेलर को उन से रकम लेते दबोचा जाए. दिलीप सिंह ने अपनी टीम में एएसआई गंभीर सिंह, धर्मेंद्र और हरेंद्र के अलावा लेडी कांस्टेबल अर्चना कसाना को शामिल किया.

योजना के मुताबिक, अगले दिन डा. रिपुदमन सिंह ने राजाबाबू को फोन कर दिया कि वह उन से पैसे ले कर मामले को निपटा दे. तयशुदा स्थान पर जैसे ही राजाबाबू रिपुदमन सिंह से ब्लैकमेलिंग के पैसे ले रहा था, आसपास छिपी पुलिस टीम ने उसे रंगेहाथों धर दबोचा.

खुद को पुलिस की गिरफ्त में आया देख कर राजाबाबू की समझ में आ गया कि अब खेल खत्म हो चुका है, इसलिए मार ठुकाई से बचने के लिए यही बेहतर है कि संगी साथियों के बारे में बता दिया जाए. लिहाजा उस ने अपने साथियों के नाम पुलिस को बता दिए. उस की जानकारी के आधार पर जल्द ही पुलिस टीम ने मनीषा पाल के साथसाथ इन के तीसरे साथी अनिल वाल्मीकि को भी गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में पता चला कि राजाबाबू का असली नाम कृष्णकुमार और मनीषा का असली नाम नेहा कुशवाह है. नेहा कुशवाह शादीशुदा है और वह उत्तर प्रदेश के उरई की रहने वाली है. उस ने पुलिस को बताया कि उस ने नर्सिंग का कोर्स किया है. नेहा की गिरफ्तारी की बात जब उस के घर वालों को बताई गई तो उस का पति रामलखन उरई से ग्वालियर पहुंच गया.

उस ने बताया कि अब से करीब 13 साल पहले नेहा ने उस से लवमैरिज की थी. मूलरूप से सूरत, गुजरात की रहने वाली नेहा को सूरत में ही औटोरिक्शा चलाने वाले रामलखन से प्यार हो गया था. दोनों शादी कर के उरई आ कर बस गए थे.

रामलखन ने यह भी बताया कि नेहा ने नर्सिंग का कोर्स नहीं किया है, बल्कि वह उरई के एक नर्सिंगहोम में काम करने लगी थी और धीरेधीरे नर्सिंग का काम सीख कर नर्स कहलाने लगी थी. पुलिस वाले भी यह जान कर दंग रह गए कि एकदम लड़कियों सी दिखने वाली नेहा 2 बच्चों की मां है. उरई के नर्सिंगहोम में ही नेहा की मुलाकात वहां के सफाईकर्मी अनिल वाल्मीकि से हुई थी.

यहां काम करतेकरते दोनों ने महसूस किया था कि डाक्टर लोग खूब रंगीनमिजाजी करते हैं. कुछ दिनों बाद नेहा की पहचान अनिल के जरिए राजाबाबू उर्फ कृष्णकुमार से हुई और फिर कृष्णकुमार के जरिए वह विकास गुप्ता के संपर्क में आई. नेहा कब कैसे ब्लैकमेलिंग के धंधे में आ गई, इस बारे में रामलखन ने अनभिज्ञता जाहिर की.

इस शातिर चौकड़ी ने योजना बनाई कि क्यों न डाक्टरों की रंगीनमिजाजी की वीडियो बना कर उन्हें ब्लैकमेल किया जाए. इस योजना में तय हुआ कि नेहा मरीज बन कर डाक्टरों के पास जा कर उन्हें फंसाएगी और उन के साथ की गई रंगीनमिजाजी और शारीरिक संबंधों की फिल्म बनाएगी. ब्लैकमेलिंग और पैसा वसूली का काम बाकी के 3 लोग करेंगे.

आइडिया चल निकला. कैमरा चलाना सीख कर नेहा उसे ऐसी जगह फिट कर देती थी, जहां से उस की और डाक्टर के शारीरिक संबंधों की फिल्म आसानी से शूट हो सके. पूछताछ में पता चला कि इस गिरोह ने पहली फिल्म विकास गुप्ता की साली की बनाई थी. पर तब उन का मकसद केवल उस की शादी तोड़ना था.

दरअसल, विकास के संबंध अपनी साली से थे, जिस की शादी लहार के एक डाक्टर से तय हो गई थी. उस डाक्टर को नेहा के जरिए इन्होंने फंसाया था. इस के बाद तो इन के हौसले बुलंद हो गए और ये चारों इसे फुलटाइम जौब बना बैठे.

नेहा ने अपना नाम और पहचान बदल कर मनीषा पाल रख लिया. विकास जो इस गिरोह का मास्टरमाइंड था, उस ने उस का फरजी आधार कार्ड मनीषा पाल के नाम से बनवा दिया था.

नेहा दिल की मरीज बन कर डाक्टर के पास जाती थी और अपनी खूबसूरती के जाल में डाक्टरों को फंसा कर उन्हें शारीरिक संबंध बनाने के लिए उकसाती थी. डाक्टर भी तो आखिरकार मर्द ही है, इसलिए जल्द ही नेहा के देहजाल में उलझ जाता था. यह गिरोह ग्वालियर, चंबल में ही अब तक 2 डाक्टरों से लगभग 15 लाख रुपए ऐंठ चुका है.

भोपाल के एक नामी डाक्टर से 25 लाख रुपए ऐंठने की बात भी इन्होंने कबूली. इस के अलावा 20 और ऐसे डाक्टरों के नाम बताए, जो इन का अगला शिकार बनने वाले थे. इन डाक्टरों से संबंधित सारी जानकारी विकास ने कंप्यूटर में डाल रखी थी. इन में ग्वालियर, झांसी और विदिशा के डाक्टरों के नाम हैं. यानी इस ब्लैकमेलर गिरोह के रोडमैप में सैंट्रल रेलवे के स्टेशन खास मुकाम थे.

ये लोग फंसाए जाने वाले डाक्टर की पूरी जानकारी पहले से ही हासिल कर लेते थे, जिस से शिकार करने में आसानी हो. प्राथमिकता उन डाक्टरों को ही दी जाती थी, जो कुंवारे हों या अकेले रहते हों और वे जल्द ही खूबसूरत महिलाओं के मुरीद हो जाते हों.

पूछताछ में नेहा ने भी सारा सच उगल दिया. उस की निशानदेही पर पुलिस ने उस का स्पाई कैमरा यानी खुफिया कैमरा भी जब्त कर लिया. नेहा ने यह भी बताया कि उसे अब तक महज 5 हजार रुपए ही दिए गए हैं. बाकी रकम विकास गुप्ता के पास है. पुलिस ने विकास की गिरफ्तारी के लिए कई जगहों पर दबिशें दीं, पर वह नहीं मिला.

नेहा, अनिल और कृष्णकुमार उर्फ राजाबाबू से रिमांड पर पूछताछ करने के बाद जेल भेज दिया गया. रिपुदमन ने हिम्मत दिखाते हुए पुलिस की मदद ली तो न केवल खुद को बल्कि अपनी बिरादरी के और भी डाक्टरों को बचा लिया, जिन्हें लाखों का चूना यह गिरोह लगाने वाला था.

यह सबक दूसरे डाक्टरों को मिल गया कि वे दिलफेंक और नेहा जैसी बड़े दिल की मरीजों के सामने अपने दिल को काबू में रखें, नहीं तो जो हश्र ऐसे मामलों में होता है, उस से बच पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि नामुमकिन है. रिपुदमन का झूठ ग्वालियर में चर्चा का विषय है कि कैसे एक बेहोश आदमी पूरे जोश से सैक्स क्रियाएं कर रहा है, लेकिन ऐसी रिपोर्ट लिखाना शायद उन की मजबूरी हो गई थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित और रिपुदमन सिंह परिवर्तित नाम है.

मिलावटी मसालों वाला गिरोह

गाजियाबाद के कस्बा लोनी में स्थित विकास नगर में कुछ उत्साही युवकों ने भंडारे का आयोजन किया था. गली नंबर 8 के पास हलवाई के लिए टेंट लगाया जा चुका था. सब्जी, आटा, घी, तेल वगैरह एकत्र हो चुका था. हलवाई के साथ आए कारीगरों ने भट्ठी तैयार कर ली थी.

सब्जी आलू की बनाई जानी थी, आलू काट लिए गए थे. सब सामान तैयार था, कमी मिर्चमसालों की थी. यह सब लाने का जिम्मा अतुल ने उठाया था. वह अभी तक मसाले देने नहीं आया था, जबकि अतुल के दोस्तों का कहना था, ‘मसाले तो अतुल ने एक हफ्ता पहले ही खरीद लिए थे. मसालों को उसे सुबह ही पहुंचा देना चाहिए था.’ वह नहीं आया, इस के पीछे क्या वजह है कोई नहीं जानता था.

”रामू, तुम अतुल के घर जा कर देखो. कहीं अतुल आज के भंडारे की डेट भूल तो नहीं गया है.’’ गणेश नाम के एक व्यक्ति ने वहां मौजूद एक युवक को संबोधित कर के कहा.

”देखता हूं दादा.’’ रामू सिर हिला कर बोला और गली नंबर 8 में ही स्थित अतुल जैन के घर की तरफ चल पड़ा.

अभी रामू दोचार कदम ही चला था कि सामने से अतुल अपनी स्कूटी से आता हुआ नजर आ गया. रामू के पांव रुक गए. अतुल पास आया, तब रामू को उस की स्कूटी पर मसालों का कट्टा नजर आ गया.

”सब तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं अतुल. मैं तुम्हें बुलाने जा रहा था कि तुम आ गए.’’

”मैं देर से सोया था, थोड़ी देर पहले ही जागा हूं. अभी नहाया भी नहीं, पहले मसाले पहुंचाने आ गया.’’ अतुल ने कहा और स्कूटी आगे बढ़ा कर टेंट के नजदीक रोक दी.

रामू भी लौट आया. मसाले का कट्टा उतार कर उसी ने हलवाई के पास पहुंचाया, ”लो उस्ताद, मसाले भी आ गए.’’

हलवाई ने कट्टे की रस्सी खोली और टेबल पर कट्टे से मसाले के पैकेट निकाल कर रखने लगा.

अतुल वहां से हट कर गणेश के पास आ गया और बात करने लगा. अभी थोड़ी ही देर हुई थी कि हलवाई उन के पास आ कर खिन्न होते हुए बोला, ”मसाले कहां से उठा कर लाए हो भाई. सारे मसाले नकली हैं. इन से सब्जी में कोई टेस्ट नहीं आएगा.’’

”यह क्या कह रहे हो उस्ताद? मसाले नकली कैसे हो गए, मैं ने तो बाजार भाव में ही खरीदे हैं, किसी रेहड़ी या पटरी से नहीं खरीदे हैं.’’ अतुल हैरान परेशान स्वर में बोला.

”बेशक बाजार भाव से खरीदे हैं लेकिन मैं रातदिन पार्टी भंडारे का काम करता हूं, मुझे मसालों की अच्छे से पहचान है. तुम जो मसाले लाए हो, सब मिलावटी और नकली हैं.’’

”अतुल, उस्तादजी अगर कह रहे हैं कि मसाले नकली हैं तो नकली ही होंगे. तुम जहां से इन्हें लाए हो वापस दे कर अच्छी दुकान से मसाले खरीद लाओ.’’ गणेश ने गंभीर होते हुए कहा.

”मैं ने करावल नगर से ये मसाले खरीदे थे. मैं इन्हें बाद में वापस कर दूंगा. आप ये 2 हजार रुपए रखो और मसाले खरीद लाओ.’’ अतुल ने जेब से 2 हजार रुपए निकाल कर हलवाई को दे दिए.

”मुझे अपनी स्कूटी दे दो, मैं जवाहर नगर से मसाले खरीद कर लाता हूं.’’

”ले जाइए.’’ अतुल ने स्कूटी की चाबी हलवाई की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ”रामू, तुम उस्तादजी के साथ चले जाओ.’’

रामू ने सिर हिलाया. हलवाई उसे ले कर मसाले खरीदने चला गया.

नकली मसालों की इस तरह पुलिस को लगी भनक

जब ये बातें हो रही थीं, वहीं पास से गुजर रहा पतला सा व्यक्ति रुक कर उन की बातें सुनने लगा था. हलवाई गया तो वह व्यक्ति लपक कर उन के पास आ गया.

”हलवाई मसालों को नकली बता रहा है, कहीं तुम ये मसाले करावल नगर की उस मसाला फैक्ट्री से तो नहीं लाए हो, जो न्यू नाइस चिकन कार्नर के पास में है?’’ उस व्यक्ति ने गंभीर हो कर पूछा.

”हां, मसाले मैं ने वहीं से खरीदे हैं.’’ अतुल जल्दी से बोला, ”किंतु आप कौन हैं और उस फैक्ट्री के बारे में आप को कैसे जानकारी है?’’

युवक मुसकराया फिर आगे मुंह कर फुसफुसाया, ”मुझे उस के बारे में सब पता है. उस नकली मसाला बनाने वाली फैक्ट्री के ऊपर मेरी कई दिनों से नजर जमी हुई है. मैं तय नहीं कर पा रहा था कि उस फैक्ट्री में असली मसाले तैयार होते हैं या नकली. आज पारखी (हलवाई) ने मेरी परेशानी दूर कर दी. उस फैक्ट्री में नकली मसाले बनाए जाते हैं. अब उस फैक्ट्री पर पुलिस रेड होगी. हां, तुम अभी यह बात कहीं लीक मत करना और कल सुबह अपना माल बदल लेना.’’

”ठीक है.’’ अतुल ने कहा.

वह युवक आराम से टहलता हुआ पैदल ही एक ओर बढ़ गया. अतुल और गणेश उसे हैरानी से देखते रह गए. दरअसल, वह युवक दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच का मुखबिर था.

ASI kanwarpal

       एएसआई कंवर पाल

पहली मई, 2024 को करीब साढ़े 10 बजे मुखबिर साइबर सेल क्राइम ब्रांच के औफिस में पहुंचा. उस वक्त अपने कक्ष में एएसआई कंवर पाल एक जरूरी फाइल देख रहे थे. मुखबिर ने उन्हें सैल्यूट किया तो कंवरपाल मुसकरा पड़े, ”पुलिस की संगत में रह कर तुम भी खुद को पुलिस वाला ही समझने लग गए हो.’’

मुखबिर ने खींसे निपोरी, ”ऐसी बात नहीं है साहब, कहां आप पढ़ेलिखे अफसर और कहां मैं तीसरी पास सड़कछाप आदमी. बस तहजीब कहती है, अपने से बड़े को सम्मान करो, सो कर लेता हूं. आप को तो खुश होना चाहिए साहब.’’

”तुम्हें देख कर खुशी ही होती है, क्योंकि तुम कभी बिना वजह नहीं आते हो.’’ कंवरपाल मुसकरा कर बोले, ”बोलो, क्या खबर है?’’

”साहब, मुझे आप ने करावल नगर में नकली मसाले तैयार होने का पता ठिकाना मालूम करने के काम पर लगाया था.’’

”याद है. हमारी एक टीम नकली मसालों के धंधे का पता लगाने में जुटी हुई है. इस में एसआई प्रवेश, मैं और हैडकांस्टेबल विपिन और अनुज शामिल हैं. तुम ने क्या मालूम किया है?’’

”बहुत कुछ मालूम कर लिया है साहब.’’ मुखबिर एएसआई कंवरपाल के सामने आ कर कुरसी पर बैठते हुए बोला, ”करावल नगर में नकली मसालों को बना कर सप्लाई किया जा रहा है. एक ऐसा गवाह भी मुझे मिल गया है, जिस ने उसी फैक्ट्री से भंडारा करने के लिए मसाले खरीदे थे. भंडारा लोनी के विकास नगर में होना था, मैं कल सुबह वहीं से गुजर रहा था. मुझे पता लगा, जो मसाले करावल नगर से भंडारा करने के लिए खरीदे गए थे, हलवाई ने उन्हें देख कर बता दिया कि वे नकली हैं.’’

”यह पक्की जानकारी है या…’’

”एकदम पक्की है साहब. एक हफ्ते से मैं उस मसाला फैक्ट्री की टोह ले रहा था. वह फैक्ट्री न्यू नाइस चिकन कार्नर के पास स्थित है. मैं ने कल फैक्ट्री में घुस कर पूरी जानकारी जुटाई है. फैक्ट्री में मसाला पीसने की चक्की भी है. वहां बड़े पैमाने पर मसालों में हानिकारक पदार्थ मिलाए जाते हैं.

”लाल मिर्च, हल्दी, धनिया पाउडर, गरम मसाले आदि में सड़ा हुआ सामान डाला जा रहा है जो आम लोगों के लिए बहुत खतरनाक है. इस के प्रयोग से उन की सेहत खराब हो सकती है. साहब, कुछ नामी ब्रांड के नाम से इन मिलावटी मसालों को पैकेटों में भरा जाता है. इन्हें पकड़ा नहीं गया तो ये अपने मुनाफे के लिए दिल्ली ही नहीं, एनसीआर तक में लोगों की तबियत खराब कर डालेंगे. आप इन पर तुरंत ऐक्शन लीजिए.’’

”अगर तुम्हारी सूचना सही हुई तो तुम्हें मोटा ईनाम दिया जाएगा. तुम कुछ देर बाहर रुको, मैं अफसरों को इस की जानकारी दे कर रेड डालने की इजाजत लेता हूं.’’

मुखबिर उठ कर कंवरपाल के कक्ष से बाहर निकल गया. एएसआई कंवरपाल ने इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह को फोन से मुखबिर द्वारा दी गई नकली मसाला फैक्ट्री के बारे में जानकारी दे दी. उन्होंने मुखबिर के साथ तुरंत एएसआई कंवरपाल को अपने कक्ष में आने को कहा.

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                  इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह

एएसआई कंवरपाल अपने कक्ष से निकल कर बाहर आए. मुखबिर बाहर खड़ा था. एएसआई कंवरपाल को देखते ही मुखबिर सावधान हो कर खड़ा हो गया.

”आओ मेरे साथ.’’ एएसआई कंवरपाल ने मुखबिर को इशारा किया और उसे ले कर इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह के औफिस में आ गए.

इंसपेक्टर को सैल्यूट कर के उन्होंने मुखबिर की तरफ देख कर कहा, ”साहब, मैं ने नकली मसाला बनाने वाली फैक्ट्री की टोह में एक सप्ताह पहले इसे लगाया था. यह पक्की जानकारी ले कर आया है.’’

”क्या उस फैक्ट्री में नकली मसाले तैयार किए जाते हैं?’’ इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह ने मुखबिर से पूछा.

”जी हां, साहब. मसालों में हानिकारक चीजें मिला कर वे लोग नामी कंपनियों के पैकेट तैयार करते हैं.’’ मुखबिर ने गंभीर स्वर में कहा, ”वहां तुरंत रेड डालने की जरूरत है.’’

नकली मसाला फैक्ट्री पर रेड के लिए बन गई पुलिस टीम

इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह ने उच्चाधिकारियों से बात कर के उन के निर्देश पर तुरंत एक रेड पार्टी का गठन कर दिया. इस रेड पार्टी में एसआई हरविंदर, प्रवेश राठी, एएसआई विनोद, हैडकांस्टेबल विपिन, अनुज को शामिल किया गया. इन के साथ मुखबिर को जाना था, क्योंकि वह उस फैक्ट्री के बारे में जानता था, जहां नकली मसाले तैयार किए जा रहे थे.

HC Anuj kumar                            HC vipin

                       हैडकांस्टेबल अनुज                                                 हैडकांस्टेबल विपिन

सादे कपड़ों में रेड पार्टी मुखबिर के साथ करावल नगर में स्थित मसाला फैक्ट्री के पास पहुंच गई. दरवाजे खुलवा कर पुलिस टीम फैक्ट्री में घुसी तो वहां काम करने वाले घबरा गए.

HC vinod                                     HC-anand

            एएसआई विनोद                                                             हैडकांस्टेबल आनंद 

एक साथ इतने लोगों को अंदर आया देख कर टेबल के पास बैठा एक व्यक्ति चौंक कर खड़ा हो गया. वह उन्हें देख कर हैरान होते हुए बोला, ”कौन हैं आप लोग? क्या आप यहां पर मसाले खरीदने आए हैं?’’

”हम क्राइम ब्रांच से हैं. काफी समय से हमारी एक टीम तुम लोगों की टोह में थी. आज तुम तक पहुंचने में हमें सफलता मिली है.’’

वह व्यक्ति बुरी तरह घबरा गया. वह हड़बड़ा कर बोला, ”सर, ऐसा कुछ नहीं है. यहां कोई नकली मसाला नहीं बनाया जाता.’’

एसआई हरविंदर ने एक करारा झापड़ उस की कनपटी पर रसीद कर दिया, ”मैं ने यह कहां कहा कि यहां नकली मसाला बनता है! तुम क्यों सफाई देने लगे?’’

”जी, मैं सच कह रहा हूं.’’ वह थप्पड़ खा कर अपना गाल सहलाते हुए बोला.

”हम देख लेंगे, सच क्या है.’’ एसआई हरविंदर ने टीम को इशारा किया, ”आप अंदर देखिए.’’

टीम के सभी सदस्य अंदर लपके.

SI Harvinder singh                    SI parvesh

            एसआई हरविंदर                                                           एसआई प्रवेश राठी

अंदर एक अधेड़ व्यक्ति मैन्युफैक्चरिंग यूनिट के अंदर हल्दी पीसता मिला. उसे अपने काबू में कर के टीम यूनिट का मुआयना करने लगी. अंदर काफी कट्टे रखे थे. इन में देखा गया तो पूरी टीम के होश उड़ गए.

अंदर कट्टों में खराब चावल की किनकी, सड़े हुए गोले (नारियल), पशुओं को खिलाने वाला चोकर, सड़े हुए बेर, जामुन की गुठलियां, हल्दी की गांठ, अमचूर पाउडर, मसाले की पत्तियां, साबुत धनिया, लाल मिर्च साबुत, लाल मिर्च के डंठल, आर्टिफिशियल कलर, तेल आदि मिले. कुछ बोरों में यूकेलिप्टस के पत्ते, लकड़ी का बारीक बुरादा भी भरा मिला.

Nakli masale

चक्की के पास पिसी हुई हल्दी पड़ी थी. क्राइम ब्रांच की टीम हैरान थी कि रुपया कमाने के लिए ये लोग सब की जिंदगी और सेहत के साथ खतरनाक खिलवाड़ कर रहे थे. सड़े हुए चावल, सड़े हुए गोले, यूकेलिप्टस के पत्ते, लकड़ी का बुरादा मसाला तैयार करने में इस्तेमाल किया जा रहा था.

पुलिस ने बुलाया फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट के अफसरों को

इस में जहरीला कलर, सड़ा हुआ सरसों तेल, पशुओं का चोकर, सड़े बेर, जामुन की गुठलियां, सड़ा नारियल तक पीसा जा रहा था. साइट्रिक एसिड भी मिलाया जाता था.

यहां 2 व्यक्ति थे. इन के नाम पूछे गए. एक ने अपना नाम खुर्शीद मलिक (42 वर्ष). पता गिरी मार्केट, लोनी, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश, बताया. दूसरे का नाम दिलीप सिंह उर्फ बंटी (46 वर्ष) निवासी दयालपुर, मेन रोड करावल नगर, दिल्ली.

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       आरोपी खुर्शीद मलिक

यह फैक्ट्री दिलीप सिंह की थी. यह पिछले 6-7 महीने से बी-24ए दयालपुर, करावल नगर, दिल्ली, नजदीक न्यू नाइस चिकन कार्नर में किराए पर यह मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चला रहा था.

दिलीप सिंह ने पूछताछ में बताया कि वह मिलावटी मसाला तैयार कर नामी ब्रांड के मसालों के नकली रैपर्स में भर कर दिल्ली की खारी बावली, मिठाई पुल, मुस्तफाबाद, लोनी, गाजियाबाद, सदर बाजार में थोक व फुटकर में बेच कर मोटी कमाई कर रहा था.

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      आरोपी दिलीप उर्फ बंटी

सभी नकली मसालों के सैंपल लेना जरूरी था. एसआई प्रवेश ने फूड सेफ्टी औफिसर (जीएनसीटी) को सूचित कर के सारी बात बताई और टीम को करावल नगर आने के लिए कहा.

यह काररवाई चल ही रही थी कि अपनी स्कूटी पर अतुल जैन वह मसालों का कट्टा ले कर वहां आ गया, जो उस ने 23 अप्रैल को ही भंडारे के लिए वहां से खरीदे थे.

आते ही वह दिलीप उर्फ बंटी से झगड़ा करने लगा, ”तुम से मैं ने जो मसाले खरीदे थे, वे नकली हैं. तुम यहां नकली मसाले बनाने का धंधा करते हो?’’ अतुल जैन गुस्से में बोला, ”मैं तुम्हारी पुलिस में शिकायत करूंगा.’’

”हम क्राइम ब्रांच से हैं.’’ एसआई हरविंदर ने अतुल के पास आ कर कहा, ”यह मिलावटी मसाले बनाने और बेचने के जुर्म में हमारी गिरफ्त में है. क्या तुम इस के खिलाफ गवाही दोगे मिस्टर अतुल?’’

”अवश्य दूंगा सर, ऐसे लोगों को कानून की तरफ से सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए.’’ वह बोला.

”गुड बौय.’’ एसआई हरविंदर ने अतुल की पीठ थपथपाई, ”तुम अपनी कंप्लेंट हमें लिखवा दो. मिस्टर विनोद, आप अतुल की लिखित शिकायत ले लो.’’

”ओके सर.’’ एएसआई विनोद अपने साथ अतुल को ले कर एक तरफ चले गए.

थोड़ी ही देर में मंसूर अली, एफएसओ तथा फूड ऐंड सेफ्टी डिपार्टमेंट, दिल्ली सरकार अपनी टीम के साथ वहां आ गए. उन्होंने आते ही हल्दी पाउडर, मिर्च, मिर्च पाउडर, अमचूर, धनिया पाउडर, गरम मसाले की शुद्धता जांचने के लिए इन के सैंपल लिए. इसी प्रकार उपरोक्त सभी मसालों के सैंपल पौलीथिन में ले कर उन के नंबर लिखे गए. इस के बाद दिलीप सिंह उर्फ बंटी की निशानदेही पर निम्नलिखित सामान पुलिस कब्जे में लिया गया.

खुली पड़ी हल्दी को अलगअलग 3 प्लास्टिक कट्टों में भर कर उन कट्टों को वहां रखी इलैक्ट्रोनिक मशीन पर तौला गया. पहला कट्टा एस-1 का वजन 46 किलोग्राम, दूसरे कट्टे एस- 2 का वजन 41 किलोग्राम, तीसरे कट्टे एस-3 का वजन 42 किलोग्राम निकला था.

ऐसे ही सीरियल नंबर डाल कर सभी सड़े हुए गोले, सड़ी हुई चावल किनकी, लकड़ी का बुरादा, यूकेलिप्टस के पत्ते, एसिड, तेल, सड़े हुए बेर, जामुन की गुठलियां आदि का वजन कर के उन के सैंपल ले लिए गए.

छापे के दौरान एक और नकली मसाला बनाने वाली फैक्ट्री का पता चला

अभी यह सब काम निपटने ही वाला था कि एएसआई विनोद अपने साथ अतुल जैन को ले कर वापस आ गए. उन्होंने अतुल जैन द्वारा इस फैक्ट्री से खरीदे गए नकली मसालों का हवाला दे कर एक लिखित कंप्लेट लिख ली थी.

अतुल जैन ने आते ही एक धमाका किया. वह एसआई हरविंदर से बोला, ”सर, यहीं पास में ही काली घटा रोड पर एक दूसरी मैनुफैक्चरिंग यूनिट है, वहां भी इसी प्रकार नकली मसाला बनाया जाता है. यही सब जहरीली और नुकसान पहुंचाने वाली सड़ीगली चीजें मिला कर वहां भी नामी कंपनियों के पैकेट तैयार किए जाते हैं.’’

एसआई हरविंदर चौंके, ”ऐसा है तो वहां भी छापा डालते हैं, तुम हमें वहां ले चलो.’’

”आइए सर,’’ अतुल जैन ने कहा.

एसआई हरविंदर ने हैडकांस्टेबल विपिन कुमार और अनुज को वहां छोड़ा और अपनी टीम तथा फूड ऐंड सेफ्टी तथा एफएसओ मंसूर अली को साथ ले कर अतुल जैन के इशारे पर काली घटा रोड पर उस मैनुफैक्चरिंग यूनिट में पहुंच गए, जहां नकली मसालों को तैयार किया जा रहा था.

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           आरोपी सरफराज

यहां पर उन्हें सरफराज (32 वर्ष) निवासी 1385/15, मुस्तफाबाद, दिल्ली मिला. वहां फर्श पर हल्दी की तरह दिखने वाला पीला चाट मसाला पाउडर का मिक्सर पड़ा था. सरफराज से इस पाउडर के बारे में पूछा गया तो वह कोई जवाब नहीं दे पाया, न लाइसैंस संबंधित कागजात दिखा पाया. उसे क्राइम ब्रांच टीम ने गिरफ्त में ले लिया.

इस मसाला फैक्ट्री में भी सड़ा हुआ सामान जैसा करावल नगर की फैक्ट्री से बरामद किया गया, यहां भी भारी मात्रा में भरा हुआ था. उन के सैंपल लिए गए. जरूरी सैंपल निकाल कर दोनों फैक्ट्रियों को लौक लगा कर उन्हें सील लगा दी गई.

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क्राइम ब्रांच की टीम दिलीप सिंह उर्फ बंटी, सरफराज तथा खुर्शीद को साथ ले कर वापस औफिस में आ गई. लेडी एसआई निशा रानी (क्राइम ब्रांच) द्वारा मसाला फैक्ट्रियों में नकली और जहरीले मसाला बनाए जाने का मामला भादंवि की धारा 272/273/420/34 के तहत करवाया गया.

दिलीप उर्फ बंटी और सरफराज फैक्ट्री के मालिक थे, जबकि खुर्शीद इन से माल खरीद कर अपने टैंपो द्वारा दिल्ली तथा एनसीआर के बाजारों में सप्लाई करता था और मोटा मुनाफा कमाता था.  इन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया. मामले की जांच एएसआई कंवरपाल को सौंप दी गई.

कानून को तमाशा बनाने के चक्कर में

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के सुभाष रोड स्थित प्रदेश पुलिस मुख्यालय में उस दिन भी रोज की ही तरह पुलिस महानिदेशक बी.एस.  सिद्धू समेत अन्य अधिकारी अपनेअपने औफिसों में बैठे कार्य में लगे थे. पुलिस अधीक्षक ममता वोहरा भी अपने औफिस में जरूरी फाइलें निपटा रही थीं, तभी ड्यूटी पर तैनात उन के पीए ने इंटरकौम से सूचना दी, ‘‘मैडम, एक लड़की आप से मिलना चाहती है.’’

‘‘ठीक है, उसे अंदर भेज दो.’’ ममता वोहरा ने कहा.

उन के कहने के पल भर बाद एक लड़की दरवाजे पर टंगा परदा हटा कर अंदर आ गई. लड़की को देखते ही वह पहचान गईं. उस का नाम गुडि़या था और वह एक बहुचर्चित दुराचार मामले की वादी थी. उन्हें लगा, लड़की अपने केस की प्रगति के बारे में जानने आई है, इसलिए उन्होंने कहा, ‘‘कहिए सब ठीक तो है? हमारी पुलिस उसे गिरफ्तार करने की कोशिश में लगी है. वह जल्दी ही पकड़ा जाएगा.’’

‘‘वह तो ठीक है मैडम, लेकिन…’’ लड़की ने इतना ही कहा था कि ममता वोहरा ने पूछा, ‘‘लेकिन क्या…’’

‘‘मैडम, मैं अपना बयान दोबारा देना चाहती हूं.’’ गुडि़या ने कहा.

सवालिया नजरों से उसे घूरते हुए पूछा, ‘‘मतलब?’’

‘‘मैडम, रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद मैं ने जो बयान दिया था, अब उस में मैं कुछ बदलाव करना चाहती हूं.’’

‘‘क्यों?’’ एसपी वोहरा ने हैरानी से पूछा.

‘‘मैडम, उस समय मेरी तबीयत ठीक नहीं थी. उलझन में पता नहीं मैं ने क्या कुछ कह दिया था. गफलत में जो कह गई, अब उस में सुधार करना चाहती हूं.’’

इतना कह कर गुडि़या ने एक कागज उन की ओर बढ़ा दिया. ममता वोहरा ने उसे ले कर गौर से पढ़ा. उस में उस ने अपना बयान बदलने के बारे में लिखा था. उसे पढ़ कर उन्हें हैरानी हुई कि आखिर यह ऐसा क्यों करना चाहती है. उस का मामला काफी गंभीर ही नहीं था, बल्कि पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय भी बना हुआ था.

इसलिए विचारों से निकल कर उन्होंने गुडि़या से कहा, ‘‘देखो, मुझे इस मामले में अपने अधिकारियों से बात करनी पड़ेगी. तुम अपना यह प्रार्थना पत्र मेरे पास छोड़ जाओ.’’

गुडि़या ने अपना वह प्रार्थना पत्र उन्हीं के पास छोड़ दिया और बाहर आ गई. यह 5 मई, 2014 की बात थी.

पुलिस अधीक्षक ममता वोहरा के लिए यह हैरानी की बात थी कि लगातार न्याय की मांग करती आ रही लड़की अचानक अपनी बात से पलटना क्यों चाहती है. पीडि़त होने के नाते उस के साथ उन की शुरू से ही सहानुभूति रही थी.

पुलिस अधीक्षक ममता वोहरा ने गुडि़या द्वारा दिए गए प्रार्थना पत्र से अधिकारियों को अवगत करा दिया. इस मुद्दे पर डीजीपी बी.एस. सिद्धू ने अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) आर.एस. मीना और एसएसपी अजय रौतेला के साथ रायमशविरा किया.

अधिकारी गुडि़या के इस कदम से न केवल हैरान थे, बल्कि असमंजस की स्थिति में भी थे. मामला हाईप्रोफाइल था. इसलिए अधिकारियों को जब पता चला कि गुडि़या ने 2 दिन पहले अदालत में भी अपना बयान दोबारा कराने के लिए शपथ पत्र दिया है तो उन्हें चिंता हुई. यह बात अलग थी कि उस के उस शपथ पत्र पर अभी सुनवाई नहीं हुई थी.

गुडि़या के इस कदम से पुलिस को अनेक आशंकाएं हुईं. इस की वजह यह थी कि अभी अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. जबकि पुलिस की कई टीमें उस का गैरजमानती वारंट लिए अंतरराज्यीय स्तर पर उस की तलाश कर रही थीं.

अभियुक्त रसूख, राजनीतिक पहुंच और दौलत वाला था. लड़की को बयान बदलने के लिए डराया धमकाया भी जा सकता था. कहीं इसी वजह से तो गुडि़या बयान बदलने के लिए मजबूर नहीं है? अगर सचमुच में ऐसा था तो यह कानून के लिए एक बड़ी चुनौती थी. अभियुक्त के गिरफ्तार न होने से पुलिस वैसे ही सवालों के घेरे में थी.

दरअसल 18 अप्रैल, 2014 को गुडि़या ने देहरादून के थाना राजपुर में एक मुकदमा दर्ज कराया था. जिस से पूरे उत्तराखंड राज्य में सनसनी फैल गई थी. यह मुकदमा प्रदीप सांगवान के खिलाफ दर्ज कराया गया था.

सनसनी की वजह यह थी कि मूलरूप से सोनीपत का रहने वाला प्रदीप सांगवान कोई मामूली आदमी नहीं था. उस के पिता किशनचंद सांगवान भारतीय जनता पार्टी से सांसद रह चुके थे. वह खुद भी एक राष्ट्रीय पार्टी से जुड़ा हुआ था.

उस ने देहरादून और पहाड़ों की रानी मसूरी में अपना घर बना रखा था. इस के अलावा देहरादून के सहस्रधारा स्थित पिकनिक स्थल के रूप में विकसित किए गए जौयलैंड वाटर पार्क का मालिक भी था. देहरादून में उस के रहने की यही वजहें थीं.

गुडि़या ने आरोप लगाया था कि प्रदीप सांगवान ने उस के साथ न सिर्फ दुष्कर्म किया था, बल्कि उस दौरान उस की एक वीडियो क्लिप भी बना ली थी. जिस के बल पर वह उस का यौन शोषण कर रहा था. उस वीडियो क्लिप को सार्वजनिक करने और सोशल नेटवर्किंग साइट ‘फेसबुक’ पर डालने की धमकियां दे कर वह उस का मनचाहा इस्तेमाल कर रहा था. उसे जो धमकियां दी जा रही थीं, उस के सुबूत में उस ने अपने मोबाइल फोन में पुलिस को कुछ मैसेज भी दिखाए थे.

मामला बेहद गंभीर था. ऐसे मामलों में कानून हर तरह से पीडि़ता के साथ होता है. उस की बात को गंभीरता से सुना ही नहीं जाता, बल्कि तुरंत काररवाई भी की जाती है. राजपुर के थानाप्रभारी  प्रदीप राणा ने तुरंत इस बात की उच्चाधिकारियों को जानकारी दी थी, जहां से उन्हें उचित काररवाई के निर्देश मिले थे.

गुडि़या की शिकायत व बयानों के आधार पर थानाप्रभारी ने मुकदमा अपराध संख्या 33/14 पर नामजद मुकदमा दर्ज करा दिया था और मामले की जांच इंसपेक्टर अंशू चौधरी को सौंपी गई थी. चूंकि मामला रसूखदार आदमी से जुड़ा था, इसलिए यह मीडिया वालों के लिए सुर्खियां बन गया था.

मुकदमा दर्ज होते ही एसएसपी अजय रौतेला ने पुलिस अधीक्षक (नगर) नवनीत भुल्लर, होमीसाइड सेल के प्रभारी प्रदीप टमटा और स्पेशल टास्क फोर्स की टीम को भी प्रदीप सांगवान की गिरफ्तारी के लिए लगा दिया था. पुलिस उस की तलाश में निकली तो वह गायब मिला.

प्रदीप सांगवान से मिलने से ले कर दुराचार तक की जो कहानी गुडि़या ने पुलिस को बताई थी, वह कम चौंकाने वाली नहीं थी. वह पूरी कहानी कुछ इस प्रकार थी, जिस में वह एक खूबसूरत जाल में उलझ कर रह गई थी.

गुडि़या उत्तरप्रदेश के जिला बिजनौर की रहने वाली थी. नौकरी व सुनहरे भविष्य की तलाश में वह साल 2012 में देहरादून आ गई थी. देहरादून में वह अपनी एक सहेली के पास रुकी थी. यहां कोई नौकरी कर के वह अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. उस ने नौकरी की तलाश भी शुरू कर दी. कुछ जगह उसे अवसर मिले भी, परंतु काम पसंद नहीं आया.

तब उस की उस सहेली ने कहा, ‘‘तू किसी प्लेसमेंट एजेंसी का सहारा क्यों नहीं लेती?’’

‘‘मैं खुद ही कोई बढि़या नौकरी तलाश लूंगी. अखबार रोज देख ही रही हूं, कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी.’’

‘‘अरे हां, कल मैं ने देखा था, जौयलैंड वाटर पार्क में कैशियर की जगह खाली है. वहां ज्यादा काम भी नहीं है. कोशिश करो, शायद तुम्हें वहां नौकरी मिल ही जाए.’’

अगले ही दिन गुडि़या अपना बायोडाटा ले कर जौयलैंड पार्क जा पहुंची. थोड़े इंतजार के बाद वाटर पार्क के मालिक प्रदीप सांगवान से उस की मुलाकात भी हो गई. पहली नजर में प्रदीप सांगवान गुडि़या को अच्छा आदमी लगा. गुडि़या को इस से भी ज्यादा खुशी तब हुई, जब औपचारिक बातचीत के बाद उस ने उसे नौकरी पर रख लिया.

अगले दिन यानी 24 जून, 2012 से गुडि़या अपनी नौकरी पर जाने लगी. उसे कैशियर के पद पर रखा गया था, इसलिए वाटर पार्क में आनेजाने वाले पैसों का हिसाब उसे ही रखना था. बैंक के लेनदेन का हिसाब भी उसे ही देखना था, इस के अलावा पार्क से होने वाली प्रतिदिन कमाई की एंट्री भी उसे ही करनी थी.

गुडि़या मेहनत कर के जमाने की रफ्तार के साथ आगे बढ़ना चाहती थी. सोच की इसी इमारत पर नौकरी के रूप में उस ने पहली सीढ़ी पर कदम रखा. वह सुंदर भी थी और मेहनती भी. उत्तराखंड की आबोहवा उसे शुरू से ही पसंद थी. कुछ ही दिनों में अपने काम से उस ने सभी का दिल जीत लिया.

जल्दी ही वह वाटर पार्क में काम करने वाले अन्य लोगों से भी घुलमिल गई थी. उस का सोचना था कि वहां नौकरी करते हुए उस के सपने पूरे होंगे. अपवाद को छोड़ दिया जाए तो जिंदगी के सफर के रास्ते हर इंसान अपनी ओर से अच्छा ही चुनता है.

रास्ते सीधे भी होते हैं तो कई मोड़ से भी हो कर गुजरते हैं. मोड़ वाले रास्ते में कब, कौन, किस तरह की कड़वी हकीकत से रूबरू हो जाए, इस बात को कोई नहीं जानता. कभीकभी अचानक ऐसे भी मोड़ आ जाते हैं, जब इंसान को अपना अक्स भी धुंधला नजर आने लगता है. गुडि़या के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.

नौकरी के उस के 2 सप्ताह बड़ी अच्छी तरह बीते. वह बहुत खुश थी. वक्त पंख लगा कर उड़ रहा था. तीसरा सप्ताह चल रहा था. एक दिन प्रदीप ने कहा, ‘‘गुडि़या आज तुम्हें मेरे साथ मसूरी चलना है.’’

‘‘क्यों सर?’’

‘‘वहां एक प्रिंसिपल हैं. मैं तुम्हें उन से मिलवाना चाहता हूं, क्योंकि उन्हें मार्केटिंग का बहुत अच्छा नौलेज है. मैं चाहता हूं कि तुम उन से कुछ सीख लो, जिस का तुम्हें भी लाभ होगा और हमें भी.’’

‘‘ओके सर.’’ गुडि़या ने हामी भर दी. वह प्रदीप के यहां नौकरी करती थी. मन में कोई आशंका थी नहीं, जिस की वजह से वह उस के साथ जाने से मना कर देती. वह जाने के लिए तैयार हो गई. उसे क्या पता था कि उसे बहाने से एक ऐसे खूबसूरत जाल में उलझाया जा रहा है, जिस में फंस कर वह छटपटा कर रह जाएगी.

शाम तक वह प्रदीप के साथ पहाड़ों की रानी मसूरी पहुंच गई. देहरादून से वहां पहुंचने में एक घंटे से भी कम समय लगा. वहां पहुंच कर प्रदीप ने कहा, ‘‘हम तो आ गए, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या सर?’’ गुडि़या ने पूछा.

‘‘प्रिंसिपिल यहां हैं ही नहीं.’’

‘‘कब आएंगी?’’

‘‘कह नहीं सकता. क्योंकि उन का मोबाइल बंद है.’’

मसूरी में भी प्रदीप का घर था. उस ने कह उस रात गुडि़या को वहीं रुकने के लिए तैयार कर लिया. फिर वह रात गुडि़या के लिए कयामत की रात साबित हुई. गुडि़या के अनुसार प्रदीप ने शराफत का नकाब उतार कर उस रात कई बार उस के साथ जबरदस्ती की. उस ने उस दौरान की वीडियो क्लिप भी बना ली.

सुबह उस ने गुडि़या से साफसाफ कह दिया कि अगर उस ने इस बारे में किसी से कुछ कहा या आगे उस की बात नहीं मानी तो उस की इस क्लिप को फेसबुक पर अपलोड कर दिया जाएगा, जिसे सारी दुनिया देखेगी.

सब कुछ गंवा कर गुडि़या अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहा कर रह गई. इस के बाद से उस के यौन शोषण का सिलसिला चल निकला. यह सब होते धीरेधीरे एक साल से ज्यादा हो गया. वह आंसू बहा कर रह जाती थी.  वहां जब भी विरोध करती, उसे धमका दिया जाता. गुडि़या को अपनी जिंदगी दोजख सी लगने लगी. जब वह कुछ ज्यादा ही परेशान हो गई तो इंसाफ के लिए पुलिस की दहलीज पर जा पहुंची और प्रदीप के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.

मामला प्रकाश में आते ही चर्चा का विषय बन गया. इस की राजनीति के गलियारों में भी चर्चा हो रही थी. पुलिस ने गुडि़या का मैडिकल कराया. 22 अप्रैल को सिविल जज (तृतीय) के यहां धारा 164 के तहत उस का बयान दर्ज कराया. अगले दिन पुलिस ने गुडि़या का कलमबंद बयान दर्ज किया, जिस में उस ने अपने साथ हुई पूरी घटना को दोहरा दिया.

जांच अधिकारी इंसपेक्टर अंशू चौधरी ने सुबूत जुटाने के लिए घटनास्थल मसूरी के रिहाइशी इलाके और वाटर पार्क का निरीक्षण कर के नक्शा तैयार किया. पुलिस सुबूत जुटाने में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती थी, इसलिए वाटर पार्क के कर्मचारियों समेत करीब 16 लोगों के बयान दर्ज किए.

मामला पहुंच वाले आदमी से जुड़ा था, पुलिस तथ्यों के आधार पर ही आगे की काररवाई करना चाहती थी. प्रदीप की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की टीमें गठित कर दी गई थीं, जो लगातार उसे तलाश रही थीं. कई दिन बीत गए, वह हाथ नहीं आया.

3 मई को पुलिस ने उस के देहरादून स्थित आवास पर छापा मारा. वह तो फरार था, इसलिए कहां से मिलता. पुलिस ने वहां की जांचपड़ताल के दौरान मोबाइल, लैपटौप और अन्य समान बरामद किया. इस के बाद पुलिस ने अदालत से उस का गैरजमानती वारंट हासिल कर लिया. अदालत ने प्रदीप को भगोड़ा भी घोषित कर दिया.

प्रदीप के जहांजहां मिलने की संभावना थी, वहांवहां पुलिस टीमें छापा मार रही थीं. चंडीगढ़, दिल्ली, मेरठ में संभावित ठिकानों पर उस की तलाश की गई. मामले ने काफी तूल पकड़ा तो इस की जांच पुलिस अधीक्षक ममता वोहरा को सौंप दी गई. वह बिना किसी दबाव के पीडि़ता को इंसाफ दिलाना चाहती थीं. इस के लिए तमाम सामाजिक संगठन आवाज भी उठा रहे थे.

पुलिस प्रदीप सांगवान को पकड़ने के लिए जीजान से जुटी थी, तभी गुडि़या ने अचानक बयान बदलने का शपथ पत्र दिया तो पुलिस अधिकारी अजीब उलझन में पड़ गए. इस से पुलिस को आशंका हुई कि कहीं उस की जान खतरे में तो नहीं है. किसी दबाव में तो वह ऐसा नहीं कर रही है.

पुलिस महानिदेशक बी.एस. सिद्धू ने अधीनस्थों को निर्देश दिए कि पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि पीडि़ता की जान खतरे में तो नहीं है. इस के बाद यह पता लगाया जाए कि वह ऐसा कर क्यों रही है?

उसे प्रत्यक्ष रूप से सुरक्षा देने से उस की पहचान उजागर हो सकती थी, इसलिए उसे प्रत्यक्ष रूप से सुरक्षा न दे कर उस पर खुफिया नजर रखने के लिए एक टीम लगा दी गई. इसी के साथ उस का नंबर सर्विलांस पर लगा दिया गया कि अगर कोई उसे डराधमका रहा होगा तो यह बात भी सामने आ जाएगी.

इतना सब कर के प्रदीप की गिरफ्तारी के प्रयासों की समीक्षा कर के कोशिश और तेज कर दी गई. अधिकारियों के निर्देशानुसार पुलिस टीमें तेजी से काम में जुट गईं. इस में स्पेशल इन्वेस्टिगेटिव टीम के सदस्यों को भी शामिल किया गया था. पुलिस ने अदालत से प्रदीप का कुर्की वारंट भी हासिल कर लिया था.

12 मई को गुडि़या द्वारा अदालत में बयान बदलने संबंधी शपथ पत्र पर सुनवाई हुई. अदालत ने उस की अपील को नामंजूर करते हुए कहा, ‘‘न ऐसा कोई कानूनी प्रावधान है और न ही यह विधि सम्मत है.’’

गुडि़या की बात अदालत ने नहीं मानी थी. यह उस के लिए एक बड़ा झटका था.

अगले दिन यानी 13 मई को इस मामले में अचानक चौंकाने वाला मोड़ आ गया. पुलिस महानिदेशक बी.एस. सिद्धू ने आननफानन इस मामले को ले कर प्रेसवार्ता बुलाई तो सभी ने सोचा कि अभियुक्त गिरफ्तार हो गया होगा. लेकिन जो हुआ, उस की किसी ने कल्पना नहीं की थी.

दरअसल पुलिस ने गुडि़या को ही गिरफ्तार कर लिया था. उस पर पुलिस को गुमराह करने और अभियुक्त को ब्लैकमेल कर के समझौता करने का आरोप था. यह आरोप फोरैंसिक सुबूतों के साथ था, जिस में यह आरोप किसी और ने नहीं, पुलिस ने ही लगाया था.

गोपनीय रूप से गुडि़या की निगरानी कर रही पुलिस को जांच में पता चला था कि उस ने दुराचार के मामले में समझौते के लिए एक बड़ा सौदा कर लिया था.

उसी सौदे के बाद अभियुक्त प्रदीप को बचाने के लिए वह अपना बयान बदलना चाहती थी. इज्जत का यह सौदा मामूली रकम में नहीं, आधा करोड़ रुपयों से भी ज्यादा में हुआ था. रकम से गुडि़या ने मकान और सुखसुविधा के आधुनिक साधन जुटा भी लिए थे. पुलिस ने उस के पास से लाख रुपए नकद बरामद भी किए थे.

पुलिस ने गुडि़या के साथ उस के एक दोस्त सईद को भी गिरफ्तार किया था. इस सौदेबाजी में दिल्ली निवासी अजय मान ने अपने जीजा प्रदीप सांगवान को बचाने में सईद की मार्फत गुडि़या से बात की थी.

समझौता चूंकि दोनों पक्षों की रजामंदी से हुआ था, इसलिए कोई भी एकदूसरे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं करा सकता था. इसलिए गुडि़या, उस के साथी और अजय के खिलाफ थाना कोतवाली में सबइंस्पेक्टर नीलम रावत की ओर से ब्लैकमेलिंग का मुकदमा दर्ज किया गया था.

प्रदीप सांगवान पर दर्ज मुकदमों की धाराओं में सुबूतों को प्रभावित करने की धारा 201 बढ़ा दी गई थी. गुडि़या की गिरफ्तारी के पीछे चौंकाने वाली जो कहानी थी, वह इस प्रकार थी.

पुलिस ने गुडि़या पर नजर रखनी शुरू की तो उस की काल डिटेल्स में 2 संदिग्ध नंबर नजर आए. दोनों नंबरों की जांच की गई तो पता चला कि उन में से एक नंबर दिल्ली के रहने वाले अजय का था तो दूसरा सईद चौधरी का.

पुलिस को लगा कि वही दोनों गुडि़या को धमका रहे हैं. इसी शक के आधार पर गुडि़या के मोबाइल की रिकौर्डिंग शुरू की गई तो मामला कुछ दूसरा ही सामने आया. अजय प्रदीप सांगवान का साला था तो सईद गुडि़या का दोस्त. सईद उत्तराखंड के ही जिला ऊधमसिंहनगर के काशीपुर के रहने वाले इफ्तिखार हुसैन का बेटा था.

गुडि़या की उस से रोज ही बातें होती थीं. मोबाइल की काल रिकौर्डिंग से पता चला कि वे उसे धमकी नहीं देते थे, बल्कि समझौते की बात करते थे. गुडि़या की समझौते की बात हो चुकी थी.

एक दिन सईद ने फोन कर के पूछा, ‘‘क्या हाल है गुडि़या?’’

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘उस ने पैसे दिए कि नहीं?’’

‘‘अभी उस ने पैसे कहां दिए हैं?’’ गुडि़या ने कहा तो सईद बोला, ‘‘फिर भी तुम ने कोर्ट में अर्जी लगा दी.’’

‘‘हां, अर्जी तो लगा दी है, लेकिन मैं ने यह नहीं कहा है कि मैं बयान वापस ले रही हूं. मैं ने अर्जी में लिखा है कि पहले दिए गए बयान में कुछ तथ्य छूट गए हैं, जिस की वजह से मैं दोबारा बयान देना चाहती हूं. उस हिसाब से मैं कुछ भी कह सकती हूं.’’

‘‘ऐसा तो नहीं कि बयान बदल देने के बाद वह बाकी पैसे देने में दिक्कत करे?’’

‘‘कुछ कहा नहीं जा सकता. कर भी सकते हैं. इसीलिए मैं ने ऐसा लिखा है.’’

‘‘खैर, तुम दोनों तरफ से सेफ हो. मैं ने तुम्हारी हर तरह से मदद की है. पैसे के लिए क्या कह रहा था?’’

‘‘कह रहा था 5 लाख अभी ले लो, बाकी इलेक्शन के बाद दे दूंगा. मेरे नाम मकान की रजिस्ट्री तो करा दी है, कुछ पैसे भी दिए हैं, जिस से मैं ने घर का सामान खरीद लिया है.’’

‘‘वह डबल गेम तो नहीं खेल रहा?’’

‘‘मैं अजय से बात कर लूंगी. अगर वह पैसे दे देगा, तभी मैं अपना केस वापस लूंगी.’’

‘‘अभी तुम अजय से कोई बात मत करो. जब मैं कहूंगा, तभी करना. देख लेना और जैसा भी हो बता देना.’’

‘‘टेंशन मत लो, अभी गेंद मेरे ही पाले में है. ओके बाय.’’ अपनी बात पूरे आत्मविश्वास के साथ कह कर गुडि़या ने फोन काट दिया.

ये बातें सुन कर पुलिस सन्न रह गई थी. समझते देर नहीं लगी कि दुराचार के इस मामले में पुलिस और कानून को तमाशा बनाया जा रहा है.

पुलिस ने गुडि़या के खिलाफ सुबूत जुटाने शुरू कर दिए. उस ने अपने नाम मकान की रजिस्ट्री की बात की थी. इस के लिए दस्तावेजों की जांच जरूरी थी. पुलिस ने रजिस्ट्री औफिस से एक महीने के अंदर मकानों की खरीदफरोख्त करने वाले लोगों की सूची हासिल कर ली.

लेकिन इस सूची की जांच की गई तो उस में गुडि़या का नाम नहीं था. यह हैरान करने वाली बात थी. जबकि फोन टेपिंग में उस ने स्पष्ट कहा था कि उस के नाम एक मकान की रजिस्ट्री हुई थी.

पुलिस ने रजिस्ट्री औफिस जा कर जब हो चुकी रजिस्ट्री की एंट्री करने वाला रजिस्टर चेक किया तो सच्चाई का पता चल गया. क्योंकि उस रजिस्टर पर खरीदारों के फोटो चस्पा होते हैं. यह एक चौंकाने वाली जानकारी हाथ लगी. खरीदारों की सूची में फोटो तो गुडि़या का लगा था, लेकिन उस में नाम दूसरा था. शायद ऐसा उस ने चालाकी से किया था. उस ने नाम तो बदल दिया था, परंतु चेहरा कैसे बदलती.

वह मकान मोहल्ला बंजारावाला में मीनाक्षी बिष्ट से 2 मई, 2014 को 17 लाख रुपए में खरीदा गया था. पुलिस के अनुसार उस मकान की वास्तविक कीमत 35 लाख रुपए थी. शायद स्टांप ड्यूटी बचाने के लिए उस का बैनामा 17 लाख रुपए में कराया गया था.

अब तक प्राप्त सुबूतों में अभियुक्त को ब्लैकमेल करने की पुष्टि हो गई थी. सुबूत पक्के थे, इसलिए पुलिस ने गुडि़या की गिरफ्तारी की योजना बना कर अदालत से वारंट हासिल किया और छापा मार कर उसे गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में पता चला कि ब्लैकमेलिंग से मिली रकम से उस ने अपने लिए आधुनिक सुखसुविधाओं के तमाम साधन जुटा रखे थे.

ब्लैकमेलिंग में गुडि़या के दोस्त सईद ने मदद की थी, इसलिए उसे भी शिकंजे में लेना जरूरी था. गुडि़या और उस की बातचीत से पुलिस को पता चल चुका था कि अजय मान ने उसे नौकरी का औफर दिया था और साक्षात्कार के लिए देहरादून आने को कहा था. पुलिस ने इस का फायदा उठाते हुए एक कंपनी का नाम ले कर उसे नौकरी का औफर दिया और साक्षात्कार के लिए देहरादून बुलाया. नौकरी की खुशी में वह देहरादून आ गया. पुलिस पहले से उस की फिराक में ही थी. देहरादून आने पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस ने गुडि़या और सईद को आमनेसामने बैठा कर विस्तारपूर्वक पूछताछ की. विश्वास करना मुश्किल था कि एक लड़की ने दुराचार को हथियार बना कर किस तरह अपनी किस्मत को बदलने की कोशिश की तो दुराचार के अभियुक्त ने खुद को बचाने की. उस ने पैसे ऐंठने की योजना मुकदमा दर्ज होने के बाद तब बनाई थी, जब उस के पास समझौते के लिए प्रस्ताव आए. लाखों की रकम और मकान का प्रस्ताव उसे पसंद आ गया था.

इस के बाद गुडि़या ने अपने दोस्त सईद से बात की तो उस ने उसे समझौता कर लेने की सलाह दी. उस समय वह यह भूल गई कि दुराचार का सख्त कानून महिलाओं और लड़कियों के हक में उन्हें न्याय दिलाने के लिए बनाया गया है ना कि नाजायज इस्तेमाल कर के कमाई करने के लिए.

गुडि़या को एक ही झटके में लाखों रुपए मिलते नजर आ रहे थे. समझौते की शर्तों में उस के लिए बहुत जल्दी मोहल्ला बंजारावाला में मीनाक्षी बिष्ट का मकान तलाश लिया गया.

किसी को शक न हो, इस के लिए गुडि़या ने बैनामे के समय अपना वह नाम लिखवाया, जो शैक्षिक प्रमाण पत्रों में था. जबकि रिपोर्ट उस ने घरेलू नाम से लिखवाई थी. इसीलिए रजिस्ट्री औफिस की सूची में उस का नाम न देख कर पुलिस उलझ गई थी.

मकान मिल गया और कुछ नकद भी तो गुडि़या केस वापस लेने को तैयार हो गई. इसी प्रक्रिया के तहत उस ने जांच अधिकारी पुलिस अधीक्षक ममता वोहरा और अदालत में फिर से बयान कराने का प्रार्थना पत्र भी दे दिया. पुलिस ने उस के पत्र पर जांच शुरू कर दी और अदालत ने भी उस की बात नहीं मानी. इस तरह कानून को तमाशा बनाने के चक्कर में वह अपने ही बुने जाल में फंस गई.

पुलिस ने गुडि़या और सईद से काफी लंबी पूछताछ की थी. इस पूछताछ में पुलिस ने पुख्ता सुबूत जुटा लिए. अगले दिन दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. जेल भेजे जाने से पूर्व प्रयोगशाला के विशेषज्ञों ने जांच के लिए दोनों की आवाजों के सैंपल ले लिए थे, ताकि पुष्टि हो सके कि मोबाइल पर हुई बातचीत उन्हीं दोनों की थी.

इस के बाद पुलिस ने प्रदीप सांगवान के साथ उस के साले अजय की तलाश शुरू कर दी. पुलिस ने प्रदीप का पासपोर्ट जब्त कर के लुक औफ सर्कुलर जारी करा दिया है, ताकि वह विदेश न भाग सके. अजय का गैरजमानती वारंट हासिल कर लिया गया है. प्रदीप सांगवान पर पुलिस ने ढाई हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया.

कथा लिखे जाने तक जेल गई गुडि़या और उस के साथी सईद की जमानत नहीं हो सकी थी. प्रदीप और अजय को गिरफ्तार नहीं किया जा सका था. गुडि़या ने प्रदीप पर जो आरोप लगाए थे, अब वे कितना सच साबित होंगे यह तो वक्त ही बताएगा.

लेकिन उस ने खुद की गलती से दुराचार को हथियार बना कर जिस तरह खुद को कानून के फंदे में उलझा लिया है, अब उस से निकलना मुश्किल है. ऐसे में लोग कभी खुद पर तो कभी हालात पर खीझते हैं. यह भी सच है कि कानून सुरक्षा और न्याय के लिए बने हैं, न कि मनचाहे इस्तेमाल के लिए.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. गुडि़या परिवर्तित नाम है.

15 टुकड़ों में बंटी गीता

राजधानी पटना के थाना परसा बाजार के थानाप्रभारी नंदजी अपने औफिस में बैठे थे. तभी 60-65 साल का एक व्यक्ति अंदर आया. उन्होंने उस पर सरसरी निगाह डालने के बाद सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठने का इशारा किया. वह कुरसी पर बैठ गया. उस के माथे पर उभरी चिंता की लकीरों से साफ लग रहा था कि वह परेशान और चिंतित है.

नंदजी ने उस के आने का कारण पूछा तो वह बोला, ‘‘साहब, मेरा नाम राकेश चौधरी है, मैं तरेगना डीह गांव का रहने वाला हूं. मैं बहुत परेशान हूं, मेरी मदद कीजिए.’’

परेशानी पूछने पर वह बोला, ‘‘साहब, मेरी विवाहित बेटी गीता एक हफ्ते से घर से लापता है. उस का मोबाइल फोन भी बंद है. स्थानीय अखबारों में कई दिनों से टुकड़ों में मिली महिला की लाश की खबरें छप रही हैं. उस खबर को पढ़ कर ही मैं यहां आया हूं.’’

इस के बाद वह व्यक्ति अपने थैले से गीता की तसवीर निकाल कर नंदजी की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘यह गीता की तसवीर है, मुझे डर है कि कहीं उस के साथ कोई अनहोनी घटना तो नहीं घट गई.’’

‘‘आप फिक्र न करें.’’ नंदजी ने तसवीर पकड़ते हुए कहा, ‘‘वैसे आप कैसे इतने यकीन से कह सकते हैं कि गीता इसी थानाक्षेत्र से लापता हुई है?’’

‘‘साहब, मैं यह बताना भूल गया कि मेरी नातिन यानी गीता की बेटी जिस का नाम पूनम है, अपने पति रंजन के साथ कुसुमपुरम कालोनी में किराए के मकान में रहती है. जब मैं उस के घर गया तो ताला लगा मिला. पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि पूनम 18 तारीख से ही घर पर नहीं है. उस का फोन भी बंद है, इसलिए मैं यहां आ गया.’’

नंदजी के कहने पर राजेश चौधरी ने अपनी बेटी गीता की गुमशुदगी की तहरीर लिख कर दे दी.

दरअसल, 18 अप्रैल को पटना-गया पैसेंजर ट्रेन के गया रेलवे स्टेशन पर पैसेंजर ट्रेन की एक बोगी में ऊपर की सीट पर कोने में बादामी रंग के लेदर के 2 बड़े बैगों में किसी महिला के हाथपैरों के कटे हुए 3-3 टुकड़े मिले थे.

इस के 3 दिन बाद 20 अप्रैल को जक्कनपुर के पटना-गया रेलखंड पर गुमटी के पास रेलवे ट्रैक पर किसी महिला का कटा हुआ सिर और फ्लैक्स में बंधे हुए धारदार हथियार मिले थे. उसी दिन उन्हीं के थानाक्षेत्र परसा बाजार की कुसुमपुरम कालोनी में किसी महिला का धड़ से कमर तक का हिस्सा एक नाले से बरामद किया गया था.

दरअसल, 2 जिलों पटना और गया के 3 थानाक्षेत्रों गया जंक्शन, पटना के जक्कनपुर और परसा बाजार में 15 टुकड़ों में बंटा एक महिला का शव मिला था. शव एक अधेड़ महिला का था, जिस की उम्र करीब 40-50 साल के बीच रही होगी. 1-1 दिन के अंतराल में मिले शव के टुकड़ों से पटना और गया में सनसनी फैल गई थी.

गया, जक्कनपुर और परसा बाजार से मिले अंगों को एसएसपी मनु महाराज एक ही महिला के होने की आशंका जता रहे थे. उन का तर्क था कि हत्यारों ने लाश के टुकड़े 3 जगहों पर इसलिए फेंके होंगे, ताकि पुलिस आसानी से न तो महिला की शिनाख्त करा सके और न ही कातिलों तक पहुंच सके. इस से साबित हो रहा था कि कातिल जो भी था, बहुत चालाक था. स्थानीय अखबारों ने शव के टुकड़ों की सनसनीखेज खबर बना कर पुलिस की बखिया उधेड़ रखी थी.

राजेश चौधरी की बेटी गीता 17 अप्रैल से लापता थी. उस ने उस का जो हुलिया बताया था, शव के कटे अंगों को जोड़ कर देखने पर काफी मिलताजुलता लग रहा था. नंदजी ने सोचा कि कहीं शव के टुकड़े गीता के ही तो नहीं हैं.

नंदजी ने जक्कनपुर के इंसपेक्टर ए.के. झा को अपने थाने में बुला लिया. वह जब परसा बाजार थाना पहुंचे तो उन्होंने उन का परिचय राजेश चौधरी से करवाया और सारी बात उन्हें बता दी. इस के बाद वह राजेश चौधरी और इंसपेक्टर झा को साथ ले कर एसएसपी मनु महाराज के औफिस गए और उन्हें पूरी जानकारी दी.

एसएसपी मनु महाराज ने जक्कनपुर के थानाप्रभारी ए.के. झा से उस फ्लैक्स के बारे में जानकारी ली, जिसे जक्कनपुर के रेलवे ट्रैक से बरामद किया गया था और उस में खून से सने 3 धारदार हथियार मिले थे. उस फ्लैक्स पर फ्रैंड्स क्लब औफ कुसुमपुरम, नत्थूरपुर रोड, परसा बाजार लिखा था. फ्लैक्स पर लिखे पते के आधार पर पुलिस ने अनुमान लगाया कि हो न हो, महिला का कुसुमपुरम से कोई संबंध रहा होगा.

पुलिस की मेहनत तब रंग लाई. जब लापता बेटी की तलाश के लिए राजेश चौधरी थाने पहुंच गए. पुलिस को यकीन हो चला था कि टुकड़ों में मिला शव गीता का ही रहा होगा.

क्योंकि जिस दिन से गीता लापता हुई थी, उसी के अगले दिन से उस की बेटी और दामाद भी मकान पर ताला लगा कर फरार थे. पुलिस के शक की सूई मृतका की बेटी पूनम और दामाद रंजन की ओर घूम गई थी, लेकिन वह जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहती थी.

चूंकि यह सनसनीखेज मामला परसा बाजार थाने से जुड़ा था, इसलिए इस केस को गया राजकीय रेलवे थाने और जक्कनपुर थाने से स्थानांतरित कर के जांच के लिए परसा बाजार थाने को सौंप दिया गया.

एसएसपी मनु महाराज के आदेश पर इस मामले की जांच की जिम्मेदारी परसा बाजार थानाप्रभारी नंदजी को सौंपी गई. जक्कनपुर थाने के इंसपेक्टर ए.के. झा को कहा गया कि केस के खुलासे में वह नंदजी को सहयोग करें.

थानेदार नंदजी और ए.के. झा ने फ्लैक्स पर लिखे पते को ध्यान में रखते हुए जांच आगे बढ़ाई. फ्लैक्स पर फ्रैंड्स क्लब औफ कुसुमपुरम, नत्थूरपुर रोड, परसा बाजार लिखा था. पुलिस ने शक के आधार पर कुसुमपुरम के 6 युवकों को हिरासत में ले लिया. पूछताछ में उन युवकों ने बताया कि इस तरह के फ्लैक्स उन्होंने सरस्वती पूजा में लगाए थे. बाद में डेकोरेशन वाले फ्लैक्स में सामान लपेट कर ले गए थे.

उन युवकों से पूछताछ के आधार पर पुलिस उस डेकोरेटर तक पहुंच गई, जिस ने सरस्वती पूजा में सजावट की थी. डेकोरेटर ने पुलिस को बताया कि जेनरेटर देने वाला राजेश चौधरी फ्लैक्स को अपने साथ ले गया था. डेकोरेटर से पुलिस ने राजेश का पता लिया और शाहपुर थानाक्षेत्र स्थित उस के गांव खाजेकलां पहुंच गई. राजेश घर पर ही मिल गया. अचानक पुलिस को देख कर वह घबरा गया.

उस के चेहरे के उड़े रंग और पसीने को देख कर पुलिस का शक और पुख्ता हो गया. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के थाना परसा बाजार ले आई. वहां जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो उस ने सारा राज उगल दिया. पूछताछ में उस ने बताया कि मरने वाली गीता उस के दोस्त रंजन की सास थी. रंजन ने उसे 20 हजार रुपए देने का लालच दिया था. उस के कहने पर ही उस ने उस का साथ दिया था. हत्या के बाद उन दोनों ने मिल कर गीता के शरीर के 15 टुकडे़ किए थे. यह बात 22 अप्रैल की है.

राजेश के बयान के आधार पर पुलिस ने उसी रात खाजेकलां से मृतका के पति उमेशकांत चौधरी, उस की बेटी पूनम और प्रेमी अरमान मियां को गिरफ्तार कर लिया. रंजन पुलिस के आने से पहले ही फरार हो गया था.

पुलिस ने पूनम और उमेशकांत से गीता की हत्या और अरमान से उस के प्रेम के रिश्ते के बारे में पूछताछ की तो दोनों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. उमेशकांत ने पत्नी की हत्या का षडयंत्र कैसे रचा था, उस से परदा उठ गया.

गीता देवी हत्याकांड के आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उमेशकांत चौधरी, पूनम, रंजन चौधरी और राजेश को नामजद आरोपी बना कर भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर के अदालत पर पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस पूछताछ में गीता हत्याकांड की कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

48 वर्षीय उमेशकांत चौधरी मूलरूप से पटना के शाहपुर थाना के गांव जमसौर का रहने वाला था. वह शारीरिक रूप से विकलांग था. विकलांगता के आधार पर उसे पटना सचिवालय स्थित भवन निर्माण विभाग में ड्राफ्ट्समैन की नौकरी मिल गई थी. करीब 25 साल पहले उस का विवाह इसी जिले के मसौढ़ी, तरेगना डीह के रहने वाले राकेश चौधरी की बेटी गीता से हुआ था.

औसत कदकाठी की गीता को शादी के बाद जब पति के विकलांग होने की बात पता चली तो उस के अरमान आंसुओं में बह गए. उस के साथ अपनों ने ही धोखा किया था.

शादी से पहले मांबाप ने बेटी को उस के पति की विकलांगता के बारे में कुछ नहीं बताया था. अलबत्ता, उन्होंने इतना जरूर कहा था कि लड़का सरकारी नौकरी में है. अच्छा कमाता है, उस में कोई दुर्गुण नहीं है और वह परिवार व पैसे से भी मजबूत है.

बेटी के भावी जीवन के प्रति एक पिता की यह सोच गलत भी नहीं थी. खैर, पति जैसा भी था, उस का जीवनसाथी था. गीता से वह बहुत प्यार करता था. दोनों की जीवन नैया आहिस्ताआहिस्ता चलने लगी. धीरेधीरे गीता 3 बच्चों की मां बन गई. 3 बच्चों की मां बनने के बाद भी उस की शारीरिक बनावट को देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह 3 बच्चों की जन्म दे चुकी है.

उमेशकांत के बचपन का एक दोस्त उसी गांव में रहता था, जिस का नाम अरमान मियां था. वह गबरू जवान था. उस का आनाजाना घर के भीतर तक था. दोस्त की बीवी को वह भाभी कह कर बुलाता था और कभीकभी उस से मजाक भी कर लेता था. गीता इसे गंभीरता से नहीं लेती थी.

अरमान ने जब से दोस्त की पत्नी को देखा था, उस पर उस का दिल आ गया था. गीता भी अरमान के कसरती और सुडौल बदन को देख कर उस पर मर मिटी थी. जल्दी ही दोनों के संबंध बन गए. उमेशकांत भले ही शरीर से विकलांग था, लेकिन आंख से अंधा या कान से बहरा नहीं था.

उसे पत्नी और दगाबाज दोस्त की घिनौनी करतूतों का पता चला तो वह गुस्से से लाल हो उठा. उस ने पत्नी को समझाया कि वह अपनी हरकतों से बाज आए. लेकिन अरमान के प्यार में अंधी गीता को न तो पति की बात सुनाई दी और न ही उस की नसीहत का कोई असर हुआ. इसी बात को ले कर उमेश पत्नी से नाराज रहता था.

गीता और अरमान के अवैध संबंधों से परेशान हो कर उमेशकांत पत्नी गीता और बच्चों को ले कर ससुराल तरेगना डीह आ गया और वहीं पर परिवार के साथ रहने लगा. धीरेधीरे बच्चे बड़े होते गए. इस बीच उस के बडे़ बेटे को बैंक में नौकरी मिल गई और वह चुनार चला गया. बेटी पूनम की खाजेकलां के रंजन कुमार से शादी हो गई थी. छोटी बेटी को उस ने पढ़ाई के लिए परिवार से दूर भेज दिया था.

इस के बावजूद गीता में बदलाव नहीं आया था. वह अरमान से मिलने जमसौर चली जाती थी. इस बात को ले कर पतिपत्नी में विवाद काफी बढ़ गया था. फिर भी गीता ने अरमान को नहीं छोड़ा. अरमान की वजह से उमेशकांत की बसी बसाई गृहस्थी उजड़ गई थी. दोनों सिर्फ रिश्तों के पतिपत्नी रह गए थे.

गीता के मायके में रहने के दौरान अरमान का वहां भी आनाजाना लगा रहा. इस से परेशान हो कर उमेशकांत बेटी पूनम को ले कर कुसुमपुरम कालोनी में किराए का कमरा ले कर रहने लगा. पूनम पिता की तकलीफ को समझती थी. वह मां के चालचलन को भी अच्छी तरह जानती थी. दामाद रंजन भी ससुर के साथ ही खड़ा रहता था.

गीता हर महीने के आखिरी दिन कुसुमपुरम कालोनी वाले घर आती और जबरन पति की सारी तनख्वाह ले कर चली जाती. उस में से आधी रकम वह खुद रखती और आधी अपने आशिक को दे देती.

वह मायके में ही मांबाप के साथ रह रही थी. इस बात से उमेशकांत और पूनम उस से काफी नाराज थे. पत्नी की हरकतों से आजिज आया उमेशकांत समझ नहीं पा रहा था कि इस मुसीबत से हमेशा के लिए कैसे पीछा छुड़ाए. इस बारे में उस ने बेटी पूनम और दामाद रंजन से बात की. बेटी और दामाद भी गीता की हरकतों से आजिज आ चुके थे. वे भी उस से पीछा छुड़ाना चाहते थे.

दामाद रंजन ने ससुर को भरोसा दिलाया कि वह परेशान न हों. इस मुसीबत से छुटकारा पाने का वह कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेगा. रंजन आपराधिक सीरियल बड़े चाव से देखा करता था.

सीरियल देख कर ही उस ने सास को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. उस की योजना यह थी कि सास की हत्या कर के उस के शरीर के छोटेछोटे टुकड़े किए जाएं और बैग में भर कर उसे ट्रेन में डाल दिया जाए. उस के बाद सारा खेल ही खत्म हो जाएगा.

रंजन ने सास की हत्या की फूलप्रूफ योजना बना डाली. उस ने इस योजना के बारे में अपने ससुर उमेशकांत को भी बता दिया. उमेशकांत पत्नी से खुद इतना आजिज आ चुका था कि अब उसे उस के नाम से भी घृणा हो गई थी. वह चाहता था कि जितनी जल्दी हो सके, गीता नाम की बला से मुक्ति मिल जाए. उस ने हां कर दी.

रंजन चौधरी इस योजना को अकेला अंजाम नहीं दे सकता था. उसे एक ऐसे सहयोगी की जरूरत थी, जो उस का साथ भी दे और इस राज को अपने सीने में दफन भी रखे.

ऐसे में उसे अपने ही गांव का बचपन का साथी और कारोबारी पार्टनर राजेश याद आया. वह उस का हमराज था. उस ने 20 हजार रुपए का लालच दे कर उसे अपनी योजना में शामिल कर लिया. राजेश शादीविवाह में किराए पर जनरेटर चलाता था. रंजन उस के धंधे में बराबर का सहयोगी था.

योजना के मुताबिक, 17 अप्रैल 2017 को पूनम ने मां को फोन किया और विश्वास में ले कर उसे चिकन की दावत पर कुसुमपुरम वाले किराए के मकान पर बुलाया. दोपहर बाद गीता मायके से कुसुमपुरम पहुंच गई. घर से निकलते समय उस ने किसी को कुछ नहीं बताया था कि वह कहां जा रही है. जब वह बेटी के घर पहुंची तो वहां पूनम के अलावा उमेशकांत और दामाद रंजन भी मौजूद थे. थोड़ी देर चारों हंसीठिठोली करते रहे, ताकि गीता को शक न हो.

पूनम मां को रंजन से बातचीत करने को कह कर किचन में चली गई. उमेशकांत भी बेटी के पीछेपीछे हो लिया. उमेशकांत ने पहले ही नींद की दवा मंगा कर रख ली थी.

पूनम कटोरी में मीट और थाली में चावल परोस कर ले आई. नींद की 10 गोलियां पीस कर उस ने अच्छी तरह मीट की कटोरी में मिला दी थीं. पूनम ने मां को खाना खिलाया. खाना खाने के थोड़ी देर बाद गीता का सिर भारी होने लगा और उसे नींद आ गई. गोलियों ने अपना असर दिखा दिया था.

गीता के बेहोश होते ही पूनम, रंजन और उमेशकांत सक्रिय हो गए. योजना के अनुसार, रंजन ने उमेशकांत और पूनम को वहां से खाजेकलां भेज दिया, जहां उस का पुश्तैनी मकान था. इस के बाद रंजन ने खाजेकलां से अपने दोस्त राजेश को कुसुमपुरम बुला लिया. वह रात 9 बजे के करीब कुसुमपुरम आ गया.

बेहोश गीता को जब होश आया तो वह उल्टियां करने लगी. रंजन और उस का दोस्त राजेश आगे के कमरे में बैठे टीवी देख रहे थे. गीता समझ गई कि बेटी, पति और दामाद ने मिल कर उस के साथ धोखा किया है. बात समझ में आते ही वह अपने फोन से अरमान को फोन कर के सारी बातें बताने लगी.

रंजन ने सास को फोन करते सुन लिया. वह घबरा गया कि कहीं उन की योजना पर पानी न फिर जाए. वह दौड़ कर सास के पास पहुंचा और उस के हाथों से फोन छीन लिया. फोन छीनते समय दोनों के बीच गुत्थमगुत्था भी हुई, तब तक राजेश भी आ गया था.

रंजन ने सास को उठा कर बैड पर पटक दिया. राजेश ने उस के दोनों पैर पकड़ लिए और रंजन ने उस का गला घोंट कर हत्या कर दी. रंजन ने सास का मोबाइल फोन ले कर उसे स्विच्ड औफ कर दिया, ताकि कोई उस से संपर्क करने की कोशिश न कर सके. बाद में उस ने हथौड़ी से फोन का चूरा कर के नाले में फेंक दिया.

जब रंजन और राजेश दोनों को यकीन हो गया कि गीता मर चुकी है तो उन्होंने लाश को बैडरूम से निकाल कर बरामदे में रखी चौकी पर रख दिया. रंजन पहले ही लोहा काटने वाले 2 ब्लेड और 1 गड़ासा खरीद लाया था, वह कमरे से गड़ासा ले आया और उसी से उस ने गीता का गला काट दिया. उस ने एक बड़ा टब चौकी के नीचे रख दिया था, ताकि घर में खून न फैले. टब में खून जमा हो गया तो वह उसे बाथरूम में फेंक आया. बाथरूम में कई बाल्टी पानी गिरा कर उस ने खून नाली में बहा दिया.

धड़ को सिर से अलग करने के बाद रंजन और राजेश ने मिल कर गीता के दोनों पैरों के 6, दोनों हाथों के 6 और धड़ के कमर के बीच से 3 टुकड़े यानी कुल मिला कर 15 टुकड़े किए. योजना के अनुसार, पहले से खरीद कर लाए गए 2 बड़े लैदर के बैगों में हाथ और पैरों के टुकड़े भर दिए.

कटे सिर और धारदार हथियारों को रंजन ने फ्लैक्स के टुकड़े में लपेट दिया और उसे काले रंग की बड़ी सी पौलीथिन में रख दिया. यह सब करने में उन्हें ढाई घंटे का समय लगा. लाश के टुकड़ों को बैग में भरने के बाद दोनों बाथरूम में गए और शरीर पर लगे खून को अच्छी तरह साफ किया. इस के बाद दोनों ने बड़ी सफाई से सारे सबूत मिटा दिए. तब तक सुबह हो गई थी.

योजना के अनुसार, रंजन और राकेश को 18 अप्रैल को दोपहर के डेढ़ बजे एकएक बैग ले कर पटना-गया पैसेंजर ट्रेन में चढ़ना था. उन्होंने ऐसा ही किया और इत्मीनान से सीट पर बैठ गए. दोनों बैगों को उन्होंने ऊपर वाली सीट पर कोने में रख दिया. फिर पुनपुन स्टेशन पर उतर कर दोनों घर लौट आए. उन बैगों को उसी दिन रात में गया जंक्शन पर जीआरपी ने बरामद किया था.

अगले दिन 19 अप्रैल को रंजन और राजेश ने जक्कनपुर स्टेशन के बीच गुमटी के पास गीता का कटा हुआ सिर और रेलवे ट्रैक पर फ्लैक्स में लिपटे धारदार हथियार फेंक दिए.  फिर रात में ही धड़ और कमर के बीच से किए गए टुकड़ों को उन्होंने बोरे में भर कर कालोनी से दूर नाले में फेंक दिया. 20 अप्रैल को जक्कनपुर और परसा बाजार पुलिस ने सिर और धड़ बरामद कर लिए.

बहरहाल, रंजन चौधरी ने फूलप्रूफ योजना बनाई थी. हर चालाक कातिल की तरह उस से भी एक चूक यह हो गई थी कि उस ने धारदार हथियारों को फ्लैक्स में लपेट कर फेंका था. फ्लैक्स के ऊपर पता लिखा था. उस पते के आधार पर ही पुलिस टुकड़ों में बंटी गीता के कातिलों तक पहुंच गई और सनसनीखेज हत्या से परदा उठा दिया. इस मामले में अरमान मियां से भी पूछताछ की गई, लेकिन निर्दोष पाए जाने पर उसे छोड़ दिया गया.

कथा लिखे जाने तक गिरफ्तार किए गए चारों आरोपियों उमेशकांत, पूनम, राजेश जमानत पर जेल से बाहर आ गए थे. फरार चल रहा रंजन चौधरी गिरफ्तार कर लिया गया था. पुलिस ने चारों आरोपियों के खिलाफ न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल कर दिया था. राजेश और रंजन अभी भी जेल में हैं. पति, बेटी और दामाद को अपने किए पर जरा भी अफसोस नहीं है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित