Double Murder की सूचना पाकर पुलिस के उड़े होश

कुछ लोग पत्नी में कमियां निकाल कर उस से पीछा छुड़ाने के लिए अपराध का रास्ता चुनते हैं. इस में वे कामयाब भी हो जाते हैं लेकिन उस वक्त वे भूल जाते हैं कि हर अपराध की एक सजा भी होती है. थाना बनियाठेर के थानाप्रभारी प्रवीण सोलंकी रात भर गश्त कर के सुबह 5 बजे अपने कमरे पर पहुंचे. वह आराम करने के लिए लेटे ही थे कि मोबाइल की घंटी बज उठी. उन्होंने काल रिसीव की तो फोन करने वाले अज्ञात व्यक्ति ने बताया कि रसूलपुर के पास कैली गांव में मांबेटी की हत्या कर दी गई है.

डबल मर्डर की सूचना से उन की नींद काफूर हो गई. वह अपने मातहतों को ले कर घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. यह बात 19 जून, 2018 की है. थानाप्रभारी ने यह जानकारी उच्च अधिकारियों को भी दे दी. गांव कैली थाने से करीब एक किलोमीटर दूर है, इसलिए प्रवीण सोलंकी करीब 10 मिनट में कैली गांव पहुंच गए. गांव जा कर उन्हें पता चला कि घटना भारत सिंह के घर में घटी है. थानाप्रभारी ने वहां जा कर देखा तो एक कमरे में एक ही चारपाई पर बेटी पूनम और उस के ऊपर उस की मां शांति की लाशें पड़ी थीं. मां के गले में उसी की साड़ी का फंदा कसा हुआ था, साथ ही उस का गला भी कटा हुआ था. चारपाई के पास जमीन पर काफी खून पड़ा था.

शुरुआती जांच में यही लगा कि दोनों को गला घोंट कर मारा गया है और बाद में गला काटा गया है. चारपाई से दूर एक कोने में कुछ टूटी हुई चूडि़यां पड़ी थीं. पूनम के शरीर पर खरोंचों के भी निशान थे, जिस से लग रहा था कि उस ने हत्यारों से अपने बचाव का प्रयास किया था. कुछ ही देर में घटनास्थल पर कप्तान राधेमोहन भारद्वाज, एडीशनल एसपी पंकज कुमार मिश्र और सीओ ओमकार सिंह यादव भी पहुंच गए. उन्होंने थानाप्रभारी को निर्देश दिए. इस के बाद थानाप्रभारी ने लाशें पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दीं.

कैली गांव उत्तर प्रदेश के जिला संभल की तहसील मुख्यालय से करीब 8 किलोमीटर दूर है. करीब 3 हजार की आबादी वाले इस गांव में चंद्रपाल का परिवार रहता था. उस के 4 बेटे और 2 बेटियां थीं. करीब 30 वर्ष पूर्व चंद्रपाल की दर्दनाक मौत हो गई थी. उस की मौत के पीछे की भी एक अलग कहानी थी. दरअसल गांव में पेयजल का संकट था. चंद्रपाल के घर के सामने कुएं की खुदाई चल रही थी. चंद्रपाल भी खुदाई कर रहा था. काफी गहराई तक मिट्टी निकाली जा चुकी थी. तभी अचानक ऊपर से मिट्टी की ढांग गिर कई और चंद्रपाल जिंदा ही दफन हो गया.

उस समय इतने संसाधन नहीं थे कि चंद्रपाल को जल्दी निकाला जा सके. फिर भी गांव वालों ने जैसेतैसे उसे बाहर निकाला लेकिन तब तक उस की मौत हो चुकी थी. इस के बाद गांव वालों ने वह कुआं फिर से मिट्टी से भर दिया. बाद में जब चंद्रपाल के बेटे जवान हुए तो उन्होंने गांव वालों के सहयोग से पिता के मिशन को पूरा किया. कुआं तैयार हो जाने के बाद गांव में पेयजल की समस्या दूर हो गई. जिस समय चंद्रपाल की मौत हुई थी, उस समय उस के सभी बच्चे छोटे थे यानी शांति भरी जवानी में विधवा हो गई थी. उस के सामने 6 बच्चों के पालनपोषण की समस्या थी. ऐसे में एक रिश्तेदार भारत सिंह ने शांति के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा.

भारत सिंह मुरादाबाद जिले की पुलिस चौकी जरगांव के अंतर्गत आने वाले भूड़ी गांव का निवासी था. उस की पत्नी की मौत भी एक हृदयविदारक घटना में हुई थी. भारत सिंह का विवाह करीब 32 साल पहले गांव नानपुर की मिलक, जिला रामपुर की महेंद्री नाम की युवती से हुआ था. एक दिन अचानक रात में डाकुओं ने भूड़ी गांव पर धावा बोल दिया. गांव वालों ने भी मोर्चा संभाला. डाकू लगातार फायरिंग कर रहे थे. ग्रामीण फायरिंग का जवाब ईंटपत्थरों से दे रहे थे. लेकिन उन का मुकाबला करने में वे नाकाम रहे. तब अधिकांश लोग जान बचाने के लिए जंगलों की ओर भागने लगे.

भारत सिंह भी अपने भाइयों राधेश्याम व सूरज सिंह के साथ जंगल में भाग गया. भारत सिंह की पत्नी महेंद्री गहरी नींद में सो रही थी. वह घर में अकेली रह गई. उस समय उस की कोख में 6 महीने का बच्चा था. महेंद्री की जब आंख खुली तो खुद को घर में अकेला देख वह घबरा गई. फायरिंग की आवाज सुन कर वह माजरा समझ गई. बदहवास महेंद्री ने भी जान बचाने की खातिर घर से जंगल की ओर दौड़ लगा दी. भागते वक्त वह ठोकर खा कर गिर गई. जब डाकू गांव में लूटपाट कर के चले गए, तब गांव के लोग घर वापस आए. रास्ते में लोगों ने महेंद्री को तड़पते हुए देखा. भारत सिंह भी पत्नी के पास पहुंच गया. उस की हालत देख कर उस के होश उड़ गए.

घर वाले महेंद्री को उठा कर घर ले आए. खून बहता देख वे लोग समझ गए कि पेट में पल रहे नवजात को हानि पहुंची है. महेंद्री भी बेहोशी की हालत में थी. आधी रात का समय था. इलाज के लिए शहर में ले जाने का कोई साधन नहीं था. घरों में लूटपाट होने की वजह से गांव में वैसे ही कोहराम मचा था. कोई भी गाड़ी ले कर जाने का साहस नहीं जुटा पा रहा था. फलस्वरूप सुबह होने से पहले ही महेंद्री की मौत हो गई. भारत सिंह की शादी हुए केवल 4 साल हुए थे. पत्नी की मौत के बाद वह खोयाखोया सा रहने लगा था. फिर एक रिश्तेदार के सुझाव पर उस ने 6 बच्चों की मां, विधवा शांति देवी के साथ कराव कर लिया. दरअसल हिंदू विवाह संस्कार के अनुसार अग्नि के सात फेरे और कन्यादान एक बार ही किया जाता है. चूंकि शादी के समय शांति सात फेरे ले चुकी थी और उस का कन्यादान भी हो चुका था, इसलिए भारत के साथ वह दूसरी बार अग्नि के फेरे नहीं ले सकती थी, इसलिए उस का कराव करा दिया गया.

इस के बाद भारत सिंह व शांति का दांपत्य जीवन हंसीखुशी से गुजरने लगा. कुछ दिनों बाद ही भारत सिंह अपने हिस्से की डेढ़ बीघा जमीन बेच कर और घर अपने भाइयों को दे कर कैली में आ कर रहने लगा. वह मेहनतमजदूरी कर के बच्चों का पालनपोषण करने लगा. इस बीच उस के 3 बच्चे और हुए. जैसेजैसे बच्चे बड़े हुए, भारत सिंह ने उन की शादी कर दी. उस ने सब से छोटी बेटी पूनम का विवाह इसी साल 18 फरवरी को अनिल के साथ कर दिया था. अनिल चंदौसी शहर के हनुमानगढ़ी मोहल्ले में रहता था. पूनम देहाती माहौल में पलीबढ़ी थी जबकि उस की शादी शहर के लड़के से हुई थी. कई महीने तक शहर में रहने के बावजूद  वह खुद को शहरी माहौल में नहीं ढाल पाई. ससुराल वाले उसे लाख समझाते पर वह खुद को बदलने के लिए तैयार नहीं थी.

अनिल विवाह आदि समारोहों में फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी का काम करता था. रात को देर से आना उस की पेशेगत मजबूरी थी. जब वह कहीं बुकिंग पर नहीं जाता, तब भी वह शराब के नशे में देर से घर आता था. पूनम को उस का शराब पीना पसंद नहीं था. वैचारिक मतभेद के साथ दोनों के बीच मनभेद भी बढ़ता चला गया. अनिल और पूनम के 4 महीने के वैवाहिक जीवन में घरेलू कलह रहने लगी थी. विवाद बढ़ने पर कई बार अनिल ने पूनम की पिटाई भी कर दी थी, जिस से उस के कान में चोट आई थी. ससुराल में पूनम की उपेक्षा बढ़ती जा रही थी. एक बार पूनम को बुखार आया तो अनिल उसे उस के मायके छोड़ आया. मायके वालों ने पूनम का इलाज कराया.

चोट की वजह से उस के कान में दर्द रहने लगा था. मायके वालों ने उस के कान का भी इलाज कराया. पूनम के मायके वाले  उस के दांपत्य जीवन को सुखी बनाए रखने के प्रयास में लगे रहे. 25 मई, 2018 को कैली गांव में किसी की शादी थी. शादी की दावत में पूनम व उस के पति अनिल को भी आमंत्रित किया गया था. अनिल ससुराल से पत्नी को साथ ला कर विवाह समारोह में शामिल हुआ. इस के बाद अनिल अपनी पत्नी पूनम को मायके में छोड़ कर रात में ही अपने गांव चला गया. ससुराल वालों ने उस से रात में वहीं रुकने का आग्रह करते हुए कहा कि सुबह पूनम को भी साथ ले कर चला जाए. इस पर अनिल ने कहा कि 2-4 दिन बाद आ कर उसे ले आएगा. लेकिन 15 दिन बीत गए और अनिल पूनम को लेने नहीं आया. पूनम उस से मोबाइल पर बात करना चाहती तो वह कोई न कोई बहाना बना कर उस से बात नहीं करता था. वह कहता था कि 2-4 दिन में उसे लेने आ जाएगा. इस तरह वह उसे टालता रहा.

19 जून को पूनम व उस की मां की हत्या से घर में कोहराम मच गया था. पूरा गांव शोक में डूबा था. भारत सिंह का रोरो कर बुरा हाल था. मांबेटी की अर्थी जब एक साथ उठी तो शवयात्रा में शामिल ग्रामीणों की आंखें नम हो गईं.  उधर पुलिस ने अपनी जांच भारत सिंह से शुरू की. भारत ने पुलिस को बताया कि 18 जून की रात अनिल के पिता फूल सिंह का फोन आया था. उन्होंने बताया था कि अनिल पूनम को लेने गांव गया हुआ है. उस समय वह खेतों पर लगी मेंथा की टंकी पर था. वहां वह किसानों का मेंथा औयल निकालता था. इस काम से उसे अच्छीखासी आमदनी हो जाती थी. उस रात वह घर नहीं आ सका था.

पुलिस को अन्य सूत्रों से भी पता चला कि अनिल उस रात गांव में देखा गया था. पुलिस ने अनिल के घर दबिश दी तो वह घर पर ही मौजूद था. पुलिस उसे पूछताछ के लिए थाने ले आई. जब उस से पूनम और उस की मां की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो वह काफी देर तक पुलिस को गुमराह करता रहा. पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो वह टूट गया और उस ने अपने जुर्म का इकबाल कर लिया. फिर डबल मर्डर की कहानी कुछ इस तरह सामने आई. अनिल ने बताया कि गंवार संस्कृति की पूनम से वह पीछा छुड़ाना चाहता था. वह उस के दिल से पूरी तरह उतर चुकी थी, इसलिए वह उसे मायके छोड़ गया था. लेकिन उस के घर वाले उसे साथ ले जाने के लिए दबाव बना रहे थे. उधर पूनम भी बारबार उसे आने के लिए फोन करती रहती थी. किसी भी तरह वह उस से पीछा छुड़ाना चाहता था.

18 जून, 2018 की शाम को उस के पास पूनम का फोन आया. तब अनिल ने अपनी ससुराल के लोगों के बारे में जानकारी की. पता चला कि उस के पिता व भाई घर पर नहीं हैं. पिता मेंथा टंकी पर हैं और भाई खेत पर. कुछ अपनी रिश्तेदारियों में गए हुए हैं. घर पर पूनम और उस की मां ही है. उसे ऐसे ही मौके की तलाश थी. पूनम अपनी मां के साथ गांव की हवेली से दूर अंतिम सिरे पर स्थित घेर कहे जाने वाले मकान में थी. सुनील जानता था कि पूनम के पांचों भाई अपने परिवार के साथ अंदर वाली हवेली में रहते हैं. पूनम की मां धार्मिक प्रवृत्ति की थी. वह ज्यादातर अपने हाथ का ही बना सादा भोजन करती थी. कभीकभी वह बहुओं द्वारा बनाया गया सादा भोजन भी खा लेती थी.

अनिल अपने दोस्त कौशल के साथ बाइक से घेर वाले उस मकान पर पहुंच गया. वह हाइवे से गांव को जाने वाली सड़क से न जा कर मकान के उत्तर में खाली प्लौटों से होता हुआ गया. उस ने बाइक भी कुछ दूर मकान की दीवार से सटा कर खड़ी कर दी थी. वहां से वह योजनानुसार पैदल ही घर पहुंचे, जिस से आसपड़ोस वालों को पता न चल सके कि पूनम के घर कोई आया है. पूनम अपनी मां शांति के साथ छत पर लेटी हुई थी. अनिल को देख पूनम की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा. मांबेटी ने दोनों का आदरसत्कार किया. चायनाश्ते के बाद अनिल ने अपनी सास व अपने दोस्त को यह कह कर ऊपर छत पर भेज दिया कि पूनम से कुछ बात करनी है. अनिल ने पूनम से कह कर चारपाई बरामदे से उठा कर कमरे में डलवाई. उस समय लाइट भी नहीं थी. पूनम समझ नहीं पा रही थी कि इतनी गरमी में अंदर बैठ कर वह क्या खास बात करेंगे.

अनिल चारपाई पर बैठी पत्नी से औपचारिक बातें करने लगा, तभी अचानक उस ने अपने दोनों हाथों से पूनम का गला पकड़ लिया. पूनम समझ नहीं पाई कि वह क्या कर रहा है. गले पर हाथों का दबाव बढ़ने पर पूनम ने अपने बचाव में हाथपैर चलाने शुरू कर दिए, जिस से उस की चूडि़यां भी टूट गईं और शरीर पर खरोचों के निशान भी पड़ गए. पति के सामने पूनम का संघर्ष असफल रहा. कुछ ही देर में वह चारपाई पर लुढ़क गई. जब अनिल को यकीन हो गया कि पूनम की सांसें थम गई हैं, तब उस ने अपने दोस्त कौशल को नीचे बुलाया. उस के साथ पूनम की मां शांति भी नीचे आ गई.

शांति जब नीचे आई तो पूनम उसे बरामदे में दिखाई नहीं दी. उस ने अनिल से पूनम के बारे में पूछा. अनिल ने इशारा करते हुए कहा कि वह अंदर कमरे में है. शांति जैसे ही कमरे की तरफ बढ़ी, अनिल ने उसे पीछे से दबोच लिया. दोस्त के सहयोग से उस ने सास को भी जमीन पर गिरा कर पहले उस के मुंह में कपड़ा ठूंसा, जिस से उस की आवाज न निकल सके. फिर कौशल ने पैर जकड़े और अनिल ने उसी की साड़ी से उस का गला घोंट दिया. शांति को मारने के बाद दोनों ने उसे जमीन से उठा कर पूनम की लाश के ऊपर डाल दिया. अनिल को यह अहसास हुआ कि सास शांति देवी की सांसें अभी थमी नहीं हैं, तब उस ने उस की गरदन चारपाई से नीचे की ओर लटकाई. कौशल ने लटकती गरदन को पकड़ा और अनिल ने सब्जी काटने के चाकू से गरदन रेत दी.

इस के बाद दोनों वहां से निकल गए. इस मकान से आगे केवल 2 मकान और हैं. उस के बाद आबादी नहीं है. उन्होंने वहां आड़ में खड़ी बाइक उठाई और चले गए. सामने व पड़ोस में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को इस दोहरे हत्याकांड की भनक तक नहीं लग सकी. पूनम का एक विकलांग भाई कुंवरपाल 5-6 मकान पहले गली के नुक्कड़ पर स्थित पशुशाला में सोने के लिए आया था. 4 साल की उम्र में उसे पोलियो हो गया था. उस की शादी भी एक विकलांग लड़की से हुई थी. वह बैसाखी के सहारे चलती है. कुंवरपाल रात 10 बजे सोने के लिए पशुशाला में चला जाता था. करीब 25 सदस्यों का इन का संयुक्त परिवार है. सभी का भोजन एक साथ बनता है. सभी भाइयों एवं उन की बहुओं में गजब का सामंजस्य है. कुंवरपाल को भी घटना की जानकारी नहीं लगी.

अनिल से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस के और उस के दोस्त कौशल के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर के अनिल को सीजेएम रवि कुमार के समक्ष पेश कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. पुलिस ने दूसरे अभियुक्त कौशल की तलाश में इधरउधर छापे मारे तो उस ने 28 जून, 2018 को अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. अनिल ने हत्या का कारण यह भी बताया कि पूनम मानसिक रोगी थी और यह बात उस के घर वालों ने उस से छिपाई थी. जबकि परिजनों का कहना है कि उस के इस आरोप के कारण पूनम का सीटी स्कैन कराया था, जिस में वह पूर्ण स्वस्थ पाई गई.

मामले की जांच थानाप्रभारी प्रवीण सोलंकी कर रहे हैं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Bathroom में संबंध बनाने के बाद विधवा को तीन टुकड़ों में काटा

प्रभाकर को लगता था कि अगर उस ने विधवा कांता से शादी की तो मांबाप की इज्जत बरबाद हो जाएगी. इस इज्जत को बचाने के लिए उस ने जो किया, उस से इज्जत तो बरबाद हुई ही, वह सलाखों के पीछे भी पहुंच गया. महानगर मुंबई के उपनगर चेंबूर की हेमू कालोनी रोड पर स्थित चरई तालाब घूमनेटहलने के लिए ठीक उसी तरह मशहूर है, जिस तरह दक्षिण मुंबई का मरीन ड्राइव यानी समुद्र किनारे की चौपाटी और उत्तर मुंबई का सांताकुंज-विलेपार्ले का जुहू. ये ऐसे स्थान हैं, जहां आ कर लोग अपना मन बहलाते हैं. इन में प्रेमी युगल भी होते हैं और घरपरिवार के लोग भी, जो अपनेअपने बच्चों के साथ इन जगहों पर आते हैं.

26 अक्तूबर, 2013 को रात के यही कोई 10 बज रहे थे. इतनी रात हो जाने के बावजूद चेंबूर के चरई तालाब पर घूमनेफिरने वालों की कमी नहीं थी. थाना चेंबूर के सहायक पुलिस उपनिरीक्षक हनुमंत पाटिल सिपाहियों के साथ क्षेत्र की गश्त करते हुए चरई तालाब के किनारे पहुंचे तो उन्होंने देखा कि एक स्थान पर कुछ लोग इकट्ठा हैं. एक जगह पर उतने लोगों को एकत्र देख कर उन्हें लगा कोई गड़बड़ है. पता लगाने के लिए वह उन लोगों के पास पहुंच गए.

पुलिस वालों को देख कर भीड़ एक किनारे हो गई तो उन्होंने जो देखा, वह स्तब्ध करने वाला था. उस भीड़ के बीच प्लास्टिक की एक थैली में लाल कपड़ों में लिपटा हाथपैर और सिर विहीन एक इंसानी धड़ पड़ा था. देखने में वह किसी महिला का धड़ लग रहा था. हत्या का मामला था, इसलिए सहायक पुलिस उपनिरीक्षक हनुमंत पाटिल ने तालाब से धड़ बरामद होने की सूचना थानाप्रभारी वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रहलाद पानसकर को दे दी. धड़ मिलने की सूचना मिलते ही वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रहलाद पानसकर ने मामले की प्राथमिकी दर्ज कराने के साथ ही इस घटना की जानकारी उच्च अधिकारियों और कंट्रोल रूम को दे दी.

इस के बाद वह स्वयं पुलिस निरीक्षक सुभाष खानविलकर, विजय दरेकर, शशिकांत कांबले, सहायक पुलिस निरीक्षक प्रदीप वाली, संजय भावकर, विजय शिंदे, पुलिस उप निरीक्षक वलीराम धंस और रवि मोहिते के साथ मौकाएवारदात पर पहुंच गए. अभी सिर्फ धड़ ही मिला था. उस के हाथपैर और सिर का कुछ पता नहीं था. धड़ के इन अंगों की काफी तलाश की गई, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चला. इस से पुलिस को लगा कि हत्यारा कोई ऐरागैरा नहीं, काफी चालाक है. उस ने स्वयं को बचाने के लिए सुबूतों को मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. उस ने मृतक की पहचान छिपाने के लिए उस के शव के टुकड़े कर के इधरउधर फेंक दिए थे. वहां एकत्र लोगों से की गई पूछताछ में पता चला कि हाथपैर और सिर विहीन उस धड़ को तालाब से वहां घूमने आए एक युवक ने निकाला था.

पुलिस ने जब उस युवक से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘मन बहलाने के लिए अकसर मैं यहां आता रहता था. हमेशा की तरह आज मैं यहां आया तो थकान उतारने के लिए तालाब के पानी में जा कर खड़ा हो गया. तभी मुझे लगा कि मेरे पैरों के पास कोई भारी पार्सल जैसी चीज पड़ी है.

‘‘मैं ने ध्यान से देखा तो सचमुच वह प्लास्टिक की थैली में लिपटा एक बड़ा पार्सल था. उत्सुकतावश मैं ने उस पार्सल को पानी से बाहर निकाल कर देखा तो उस में से यह धड़ निकला. डर के मारे मैं चीख पड़ा. मेरी चीख सुन कर वहां टहल रहे लोग मेरे पास आ गए. थोड़ी ही देर में यहां भीड़ लग गई. उस के बाद यहां कुछ पुलिस वाले आ गए.’’

पूछताछ के बाद वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रहलाद पानसकर ने धड़ का पंचनामा तैयार कर उसे डीएनए टेस्ट और पोस्टमार्टम के लिए घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद वह थाने आ कर साथियों के साथ विचारविमर्श करने लगे कि इस मामले को कैसे सुलझाया जाए. क्योंकि सिर्फ धड़ से लाश की शिनाख्त नहीं हो सकती थी और शिनाख्त के बिना जांच को आगे बढ़ाना संभव नहीं था. थाना चेंबूर पुलिस इस मामले को ले कर विचारविमर्श कर ही रही थी कि अपर पुलिस आयुक्त कैसर खालिद, पुलिस उपायुक्त लखमी गौतम, सहायक पुलिस आयुक्त मिलिंद भिसे थाने आ पहुंचे. सारी स्थिति जानने के बाद ये अधिकारी वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रहलाद पानसकर को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर चले गए.

उच्च अधिकारियों के दिशानिर्देश के आधार पर वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रहलाद पानसकर ने इस मामले की जांच के लिए एक टीम गठित की, जिस में पुलिस निरीक्षक विजय दरेकर, शशिकांत कांबले, सहायक पुलिस निरीक्षक प्रदीप वाली, विजय शिंदे, संजय भावकर, पुलिस उपनिरीक्षक वलीराम धंस, रवि मोहिते, सहायक पुलिस उपनिरीक्षक राजाराम ढिंगले, सिपाही अनिल घोरपड़े, नितिन सावंत, धर्मेंद्र ठाकुर और सुनील पाटिल को शामिल किया गया. इस टीम का नेतृत्व पुलिस निरीक्षक सुभाष खानविलकर को सौंपा गया.

पुलिस निरीक्षक सुभाष खानविलकर जांच को आगे बढ़ाने की रूपरेखा तैयार कर ही रहे थे कि मृतक महिला के हाथपैर और सिर भी बरामद हो गया. उस के हाथ और सिर चेंबूर ट्रांबे के जीटी तालाब में मिले थे तो पैर चेंबूर की सेल कालोनी से. पुलिस ने इन्हें भी कब्जे में ले कर अस्पताल भिजवा दिया था. बाद में डाक्टरों ने इस बात की पुष्टि कर दी थी कि ये अंग उसी मृतक महिला के धड़ के थे, जो चरई तालाब से बरामद हुआ था. इस तरह पुलिस का आधा सिर दर्द कम हो गया था.

अब उस मृतक महिला की शिनाख्त कराना था, क्योंकि बिना शिनाख्त के जांच आगे नहीं बढ़ सकती थी. इसलिए शिनाख्त कराने के लिए पूरी टीम बड़ी सरगरमी से जुट गई. महानगर के उपनगरों के सभी पुलिस थानों से पुलिस टीम ने पता किया कि किसी थाने में किसी महिला के गायब होने की शिकायत तो नहीं दर्ज है. इस के अलावा मुंबई महानगर से निकलने वाले सभी दैनिक अखबारों में मृतक महिला का हुलिया और फोटो छपवा कर शिनाख्त की अपील की गई. 2 दिन बीत गए. इस बीच हत्यारों को पकड़ने की कौन कहे, थाना पुलिस लाश की शिनाख्त तक नहीं करा सकी थी. मुंबई की क्राइम ब्रांच भी इस मामले की जांच कर रही थी. लेकिन क्राइम ब्रांच के हाथ भी अभी तक कुछ नहीं लगा था. मृतका कौन थी, कहां रहती थी, उस का हत्यारा कौन था? यह सब अभी रहस्य के गर्भ में था.

मामले की जांच कर रही पुलिस टीम हत्यारों तक पहुंचने की हर संभव कोशिश कर रही थी. वह महानगर के अस्पतालों, डाक्टरों, कसाइयों और पेशेवर अपराधियों की भी कुंडली खंगाल रही थी. क्योंकि मृतका की हत्या कर के जिस सफाई से उस के शरीर के टुकड़ेटुकड़े किए गए थे, यह हर किसी के वश की बात नहीं थी. पुलिस को लग रहा था कि यह काम किसी पेशेवर का ही हो सकता है. काफी कोशिश के बाद आखिर पुलिस ने 14 साल के एक ऐसे लड़के को खोज निकाला, जिस ने उस आदमी को देखा था, जो धड़ वाला पार्सल चरई तालाब में फेंक गया था.

पूछताछ में उस लड़के ने पुलिस को बताया था कि उस रात साढ़े नौ बजे के आसपास वह तालाब के किनारे बैठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था, तभी एक सुंदर स्वस्य युवक उस के पास आया. उस के हाथों में प्लास्टिक का एक थैला था, जिस में लाल रंग के कपड़ों में लिपटा एक बड़ा सा पैकेट पार्सल जैसा था. उस युवक ने उस से पानी में फेंकने के लिए कहा. इस के लिए वह उसे कुछ पैसे भी दे रहा था. पैकेट काफी भारी और गरम था. पूछने पर उस युवक ने उसे बताया था कि इस में पूजापाठ की सामग्री के अलावा कुछ ईंटे भी हैं, सामान अभी ताजा है, इसलिए गरम है. पैकेट भारी था, इसलिए लड़के ने उसे पानी में फेंकने के लिए कुछ अधिक पैसे मांगे. पैसे कम कराने के लिए वह युवक कुछ देर तक उस लड़के से झिकझिक करता रहा.

जब वह लड़का कम पैसे लेने को तैयार नहीं हुआ तो उसने खुद ही जा कर उस पैकेट को पानी में डाला और जिस आटोरिक्शे से आया था, उसी में बैठ कर चला गया. उस लड़के ने आटो वाले का भी हुलिया पुलिस को बताया था. इस में खास बात यह थी कि आटो वाला दाढ़ी रखे था. इस तरह पुलिस को अपनी जांच आगे बढ़ाने का एक रास्ता मिल गया. अब पुलिस उस दाढ़ी वाले आटो ड्राइवर को ढूंढ़ने लगी. आखिर पुलिस ने उस दाढ़ी वाले आटो ड्राइवर को ढूंढ़ निकाला. पुलिस टीम ने उसे थाने ला कर पूंछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘सर, वह आदमी मेरे आटो में चेंबूर के सुभाषनगर वस्ता से बैठा था. वापस ला कर भी मैं ने उसे वहीं छोड़ा था.’’

आटो ड्राइवर ने यह भी बताया था कि वह हिंदी और दक्षिणी भाषा मिला कर बोल रहा था. आटो ड्राइवर ने उस युवक का जो हुलिया बताया था, वह उस लड़के द्वारा बताए गए हुलिए से पूरी तरह मेल खा रहा था. इस से साफ हो गया कि हत्यारा कोई और नहीं, वही युवक था, जो दक्षिण भारतीय था. इस के बाद पुलिस की जांच दक्षिण भारतीय बस्तियों और दक्षिण भारतीय युवकों पर जा कर टिक गई. पुलिस ने आटो ड्राइवर और लड़के द्वारा बताए हुलिए के आधार पर हत्यारे का स्केच बनवा कर हर दक्षिण भारतीय बस्ती एवं सुभाषनगर में लगवा दिए. यह सब करने में 2 दिन और बीत गए. दुर्भाग्य से इस मामले की जांच कर रही पुलिस टीम को इस सब का कोई लाभ नहीं मिला. लेकिन पुलिस टीम इस सब से निराश नहीं हुई. वह पहले की ही तरह सरगरमी से मामले की जांच में लगी रही.

पुलिस टीम हत्यारे तक पहुंचने के लिए कडि़यां जोड़ ही रही थी कि तभी उसे थाना साकीनाका से एक ऐसी सूचना मिली, जिस से लगा कि अब उसे हत्यारे तक पहुंचने में देर नहीं लगेगी. 4 नवंबर, 2013 को दीपावली का दिन था. उसी दिन साकीनाका पुलिस ने फोन द्वारा सूचना दी कि चरई तालाब में मिले धड़ वाली मृतका का जो हुलिया बताया गया था, उस हुलिए की महिला की गुमशुदगी उन के थाने में दर्ज कराई गई है. थाना साकीनाका में जो गुमशुदगी दर्ज कराई गई थी, वह गुमशुदा महिला की बहन सुहासिनी प्रसाद हेगड़े ने दर्ज कराई थी. सूचना मिलते ही पुलिस निरीक्षक सुभाष खानविलकर ने सुहासिनी से संपर्क किया. उन्हें थाने बुला कर टुकड़ोंटुकड़ों में मिली लाश के फोटोग्राफ्सदिखाए गए तो फोटो देखते ही वह रो पड़ीं. सुहासिनी ने टुकड़ोंटुकड़ों में मिली उस लाश की शिनाख्त अपनी बहन कांता करुणाकर शेट्टी के रूप में कर दी, जो 29 अक्तूबर, 2013 से गायब थी.

कर्नाटक की रहने वाली 36 वर्षीया स्वस्थ और सुंदर कांता करुणाकर शेट्टी अपने 14 वर्षीय बेटे के साथ चांदीवली, साकीनाका की म्हाणा कालोनी के सनसाइन कौआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी की इमारत के ‘ए’ विंग के ग्राउंड फ्लोर पर रहती थी. वह फैशन डिजाइनर थी. उस के पति करणाकर शेट्टी का मिक्सर ग्राइंडर का अपना व्यवसाय था. लेकिन 2 साल पहले करुणाकर के व्यवसाय में ऐसा घाटा हुआ कि वह स्वयं को संभाल नहीं सके और आत्महत्या कर ली. इस के बाद कांता अकेली पड़ गई. अब उस का सहारा एकमात्र 12 साल का बेटा रह गया था. पति के इस कदम के बाद कांता पर मानो पहाड़ टूट पड़ा था.

लेकिन उच्च शिक्षित कांता ने अपने मासूम बेटे के भविष्य को देखते हुए खुद को संभाला और अपने काम में लग गई. अंत में सुहासिनी ने पुलिस को बताया था कि पिछले कुछ समय से कांता चेंबूर के रहने वाले किसी लड़के से प्रेमसंबंध चल रहा था. 29 अक्तूबर, 2013 की शाम को कांता घर से निकली थी तो लौट कर नहीं आई. पूरी रात उस का बेटा इंतजार करता रहा. घर में अकेले पड़े हैरानपरेशान 14 साल के उस के बेटे ने सुबह सुहासिनी को फोन कर के मां के वापस न आने की बात बताई. सुहासिनी ने परेशान और घबराए बच्चे को ढ़ांढ़स बधाया और थोड़ी देर में उस के पास जा पहुंची.

इस के बाद सुहासिनी बच्चे को ले कर कांता शेट्टी की तलाश में निकल पड़ी. जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी, सुहासिनी ने उस की तलाश की. जब कहीं से भी उन्हें कांता के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो वह थाना साकीनाका पहुंची और कांता की गुमशुदगी दर्ज करा दी. सुहासिनी की बातों से पुलिस टीम को उसी युवक पर संदेह हुआ, जिस से कांता का प्रेमसंबंध था. पुलिस कांता के बारे में जरूरी जानकारी लेने के साथसाथ उस के घर की तलाशी भी ली कि शायद उस युवक तक पहुंचने का कोई सूत्र मिल जाए. लेकिन काफी मेहनत के बाद भी कुछ नहीं मिला तो पुलिस कांता का मोबाइल फोन ले कर थाने आ गई. यह संयोग ही था कि उस दिन वह अपना मोबाइल फोन साथ नहीं ले गई थी.

पुलिस टीम ने कांता के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस नंबर से सब से अधिक जिस नंबर पर बात हुई थी, वह नंबर प्रभाकर कुट्टी शेट्टी का था. पुलिस ने उस के बारे में पता किया तो पता चला कि वह सुभाषनगर में बिल्डिंग नंबर 6 एम 224 आचार्यमार्ग जोलड़ी चेंबूर में रहता है और चेंबूर जिमखाना के रेस्टोरेंट के.वी. कैटरर्स में मैनेजर है. पुलिस टीम ने पहले प्रभाकर के नंबर पर संपर्क करना चाहा. लेकिन नंबर बंद होने की वजह से उस से संपर्क नहीं हो सका. इस के बाद पुलिस टीम ने उस के घर और रेस्टोरेंट पर छापा मारा. प्रभाकर पुलिस को दोनों जगहों पर नहीं मिला. इस से पुलिस का शक और बढ़ गया. पुलिस टीम ने उस की सरगरमी से तलाश शुरू कर दी. साथ ही मुखबिरों को भी लगा दिया. आखिर 8 नवंबर, 2013 को पुलिस ने मुखबिर की ही सूचना पर घाटकोपर की एक इमारत से प्रभाकर को गिरफ्तार कर लिया.

प्रभाकर कुट्टी शेट्टी को थाने ला कर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में पूछताछ की जाने लगी. पहले तो वह हीलाहवाली करता रहा. लेकिन जब पुलिस ने उस के सामने अकाट्य साक्ष्य रखे तो उस ने कांता की हत्या की बात स्वीकार कर ली. पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के पूछताछ एवं सुबूत जुटाने के लिए 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि के दौरान की गई पूछताछ में प्रभाकर ने कांता शेट्टी से प्रेमसंबंध से ले कर उस की हत्या करने तक की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी :

30 वर्षीय प्रभाकर कुट्टी शेट्टी कर्नाटक के जिला उडि़पी के गांव इन्ना का रहने वाला था. पढ़ाईलिखाई कर के नौकरी की तलाश में वह मुंबई चला आया था, लेकिन उस के मांबाप और एक भाई तथा बहन अभी भी रह रह रहे थे. उस का पूरापरिवार सभ्यसभ्रांत और पढ़ालिखा था, जिस की वजह से गांव में उस का परिवार सम्मानित माना जाता था. प्रभाकर काफी महत्वाकांक्षी था. पढ़ाई पूरी कर के उस ने होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया और काम की तलाश में मुंबई आ गया. मुंबई में उस का एक मित्र पहले से ही रह रहा था. वह उसी के साथ रहने लगा. थोड़ी भागदौड़ के बाद उसे एक रेस्टोरेंट में मैनेजर की नौकरी मिल गई.

लगभग डेढ़ साल पहले प्रभाकर कुट्टी शेट्टी की कांता से मुलाकात कर्नाटक से मुंबई आते समय ट्रेन में हुई थी. ट्रेन में दोनों की सीटें ठीक एकदूसरे के आमनेसामने थीं. पहले दोनों के बीच परिचय हुआ, इस के बाद बातचीत शुरू हुई तो मुंबई पहुंचतेपहुंचते दोनों एकदूसरे से इस तरह खुल गए कि अपनेअपने बारे में सब कुछ बता दिया. फिर तो ट्रेन से उतरतेउतरते दोनों ने एकदूसरे के नंबर भी ले लिए थे. कांता शेट्टी अपने घर तो आ गई थी, लेकिन उस का दिल युवा प्रभाकर के साथ चला गया था. क्योंकि यात्रा के दौरान प्रभाकर से हुई बातों ने पुरुष संबंध से वंचित कांता को हिला कर रख दिया था. प्रभाकर का व्यवहार, उस की बातें, उस की स्मार्टनेस और मजबूत कदकाठी ने उसे इस तरह प्रभावित किया था कि वह उस के दिलोदिमाग से उतर ही नहीं रहा था. प्रभाकर ने एक बार फिर उसे पति करुणाकर शेट्टी और वैवाहिक जीवन की याद जाती करा दी थी.

कांता को वह सुख याद आने लगा था, जो उसे पति से मिलता था. याद आता भी क्यों न, अभी उस की उम्र ही कितनी थी. भरी जवानी में पति छोड़ कर चला गया था. तब से वह बेटे के लिए अकेली ही जिंदगी बसर कर रही थी. वह अपने काम और बेटे में इस तरह मशगूल हो गई थी कि बाकी की सारी चीजें भूल गई थी. लेकिन प्रभाकर की इस मुलाकात ने उस की उस आग को एक बार फिर भड़का दिया था, जिसे उस ने पति की मौत के बाद दफन कर दिया था. जो हाल कांता का था, लगभग वही हाल अविवाहित प्रभाकर का भी था. पहली ही नजर में कांता की सुंदरता और जवानी उस के दिल में बस गई थी. वह किसी भी तरह कांता के नजदीक आना चाहता था. क्योंकि वह पूरी तरह उस के इश्क में गिरफ्तार हो चुका था. 2-4 दिनों तक तो किसी तरह उस ने स्वयं को रोका, लेकिन जब नहीं रहा गया तो उस ने कांता का नंबर मिला दिया.

प्रभाकर के इस फोन ने बेचैन कांता के मन को काफी ठंडक पहुंचाई. हालांकि उस दिन ऐसी कोई बात नहीं हुई थी, लेकिन बातचीत का रास्ता तो खुल ही गया. इस तरह बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो जल्दी ही दोनों मिलनेजुलने लगे. इस मिलनेजुलने में दोनों जल्दी ही एकदूसरे के काफी करीब आ गए. इस के बाद दोनों स्वयं को संभाल नहीं सके और सारी मर्यादाएं ताक पर रख कर एकदूसरे के हो गए. मर्यादा टूटी तो सिलसिला चल पड़ा. मौका निकाल कर वे शारीरिक भूख मिटाने लगे.

कांता प्रभाकर में कुछ इस तरह खो गई कि वह स्वयं को उस की पत्नी समझने लगी. फिर एक समय ऐसा आ गया कि वह प्रभाकर से शादी के लिए कहने लगी. लेकिन प्रभाकर कांता की तरह उस के प्यार में पागल नहीं था. वह पढ़ालिखा और होशियार युवक था. वह कांता के प्रति जरा भी गंभीर नहीं था. वह भंवरे की तरह था. उसे फूल नहीं, उस के रस से मतलब था. उस के मांबाप थे, जिन की गांव और समाज में इज्जत थी. अगर वह एक विधवा से शादी कर लेता तो उन की गांव और समाज में क्या इज्जत रह जाती. इसीलिए कांता जब भी उस से शादी की बात करती, बड़ी होशियारी से वह टाल जाता.

समय पंख लगाए उड़ता रहा. भंवरा फूल का रसपान करने में मस्त था तो फूल रसपान कराने में. अचानक कांता को कहीं से पता चला कि प्रभाकर मांबाप की पसंद की लड़की से शादी करने जा रहा है. यह जान कर उसे झटका सा लगा. उस ने जब इस बारे में प्रभाकर से बात की तो उस ने बड़ी ही लापरवाही से कहा, ‘‘यह तो एक दिन होना ही था. मांबाप चाहते हैं तो शादी करनी ही पड़ेगी.’’

‘‘लेकिन तुम ने वादा तो मुझ से किया था.’’ कांता ने कहा.

‘‘मांबाप से बढ़ कर तुम से किया गया वादा नहीं हो सकता. इसलिए मांबाप का कहना मानना जरूरी है.’’ कह कर प्रभाकर ने बात खत्म कर दी.

लेकिन कांता इस के लिए तैयार नहीं थी. इसलिए उस ने कहा, ‘‘आज तक मैं अपना तनमन तुम्हारे हवाले करती आई हूं. तुम ने जैसे चाहा, वैसे मेरे तन और मन का उपयोग किया. मैं ने तुम्हें हर तरह से शारीरिक सुख दिया. कभी नानुकुर नहीं की. तुम्हारी बातों से साफ लग रहा है कि तुम प्यार के नाम पर मुझे धोखा देते रहे. तुम्हें मुझ से नहीं, सिर्फ मेरे शरीर से प्यार था. लेकिन मैं इतनी कमजोर नहीं हूं कि तुम आसानी से मुझ से पीछा छुड़ा लोगे. अगर तुम ने मुझ से शादी नहीं की तो में तुम्हारे गांव जा कर तुम्हारे मांबाप से अपने संबंधों के बारे में बता दूंगी. अगर इस से भी बात नहीं बनेगी तो कानून का सहारा लूंगी.’’

कांता की इस धमकी से प्रभाकर के होश उड़ गए. उस समय तो उस ने किसी तरह समझाबुझा कर कांता को शांत किया. लेकिन वह मन ही मन काफी डर गया. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस कांता को फूल समझ कर वह सीने से लगा रहा था, एक दिन वह उस के लिए कांटा बन जाएगी. इस का मतलब यह हुआ कि जब तक कांता नाम का यह कांटा जीवित रहेगा, वह समाज में इज्जत की जिंदगी नहीं जी पाएगा. इसलिए उस ने कांता रूपी इस कांटे को अपने जीवन से निकाल फेंकने का फैसला कर लिया.

29 अक्तूबर, 2013 की शाम कांता के जीवन की आखिरी शाम साबित हुई. उस शाम कांता ने प्रभाकर को फोन कर के कहीं चलने के लिए अपने घर आने को कहा तो प्रभाकर ने उस के घर जाने के बजाय कांता को यह कह कर अपने घर बुला लिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है. इसलिए वही उस के घर आ जाए. प्रभाकर की तबीयत खराब है, यह जान कर कांता परेशान हो उठी. वह जल्दी से तैयार हुई और प्रभाकर के घर के लिए निकल पड़ी. इसी जल्दबाजी में वह अपना मोबाइल फोन ले जाना भूल गई. जिस समय कांता प्रभाकर के घर पहुंची, वह बीमारी का बहाना किए बेड पर लेटा था. कांता उस के पास बैठ गई तो वह उस से मीठीमीठी बातें कर के उसे खुश करने की कोशिश करने लगा. उसे खुश करने के लिए उस ने एक बार फिर उस से शादी का वादा किया. इस के बाद अपनी योजनानुसार उस ने कांता से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की.

कांता इस के लिए तैयार हो गई तो उस ने बाथरूम में चलने को कहा. पहले भी वह कई बार बाथरूम में उस के साथ शारीरिक संबंध बना चुका था, इसलिए कांता खुशीखुशी बाथरूम में चलने को तैयार हो गई. बाथरूम में जाने से पहले उस ने अपने सारे कपड़े उतार दिए. इस के बाद बाथरूम की फर्श पर कांता के साथ शारीरिक संबंध बनाने के दौरान ही प्रभाकर ने पहले से वहां छिपा कर रखे चाकू  से उस का गला काट दिया. कांता की मौत हो गई तो उस ने आराम से बाथरूम में ही शव के 3 टुकड़े किए. इस के बाद उन टुकड़ों को लाल कपड़ों में लपेट कर पैकेट बनाए और उन्हें पौलीथीन में लपेट कर आटो से अलगअलग स्थानों पर फेंक दिए. इस के बाद वापस आ कर बाथरूम को खूब अच्छी तरह से साफ किया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने प्रभाकर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में ही था. प्रभाकर ने मांबाप की जिस इज्जत को बचाने की खातिर कांता से पीछा छुड़ाने के लिए उस के खून से अपने हाथ रंगे, जेल जाने के बाद आखिर वह बरबाद हो ही गई.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

भाभी के प्यार में पागल देवर ने ली साले की जान

फौजी सुरेंद्र के संबंध अपनी भाभी से थे. भाई की मौत के बाद वह उसे अपने साथ रखना चाहता था, जबकि सुरेंद्र की पत्नी ममता ने इस का विरोध किया तब इस सनकी फौजी ने जो किया, उस से 2 घर बरबाद हो गए. कानपुर महानगर के थाना चकेरी के अंतर्गत आने वाले गांव घाऊखेड़ा में बालकृष्ण यादव अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी वीरवती के अलावा 2 बेटियां गीता, ममता और 3 बेटे मोहन, राजेश और श्यामसुंदर थे. बालकृष्ण सेना में थे, इसलिए उन्होंने अपने सभी बच्चों की परवरिश बहुत ही अच्छे ढंग से की थी. उन की पढ़ाईलिखाई भी का भी विशेष ध्यान रखा था.

नौकरी के दौरान ही उन्होंने अपने बड़े बेटे मोहन और बड़ी बेटी गीता की शादी कर दी थी. सन 2004 में बालकृष्ण सेना से रिटायर्ड हो गए थे. अब तक उन के अन्य बच्चे भी सयाने हो गए थे. इसलिए वह एकएक की शादी कर के इस जिम्मेदारी से मुक्ति पाना चाहते थे. इसलिए घर आते ही उन्होंने ममता के लिए अच्छे घरवर की तलाश शुरू कर दी. इसी तलाश में उन्हें अपने दोस्त लक्ष्मण सिंह की याद आई. क्योंकि उन का छोटा बेटा सुरेंद्र सिंह शादी लायक था.

लक्ष्मण सिंह भी उन्हीं के साथ सेना में थे. उन के परिवार में पत्नी लक्ष्मी देवी के अलावा 2 बेटे वीरेंद्र और सुरेंद्र थे. वीरेंद्र प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था, जबकि सुरेंद्र की नौकरी सेना में लग गई थी. वीरेंद्र की शादी कानपुर के ही मोहल्ला श्यामनगर के रहने वाले रामबहादुर की बहन निर्मला से हुई थी. सुरेंद्र की नौकरी लग गई थी, इसलिए लक्ष्मण सिंह भी उस के लिए लड़की देख रहे थे. सुरेंद्र का ख्याल आते ही बालकृष्ण अपने दोस्त के यहां जा पहुंचे. उन्होंने उन से आने का कारण बताया तो दोनों दोस्तों ने दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने का निश्चय कर लिया.

इस के बाद सारी औपचारिकताएं पूरी कर के ममता और सुरेंद्र की शादी हो गई. ममता सतरंगी सपने लिए अपनी ससुराल गांधीग्राम आ गई. यह सन 2005 की बात है. शादी के बाद ममता के दिन हंसीखुशी से गुजरने लगे. लेकिन जल्दी ही ममता की यह खुशी दुखों में बदलने लगी. इस की वजह यह थी कि सुरेंद्र पक्का शराबी था. वह शराब का ही नहीं, शबाब का भी शौकीन था. इस के अलावा उस में सभ्यता और शिष्टता भी नहीं थी. शादी होते ही हर लड़की मां बनने का सपना देखने लगती है. ममता भी मां बनना चाहती थी.

लेकिन जब ममता कई सालों तक मां नहीं बन सकी तो वह इस विषय पर गहराई से विचार करने लगी. जब इस बात पर उस ने गहराई से विचार किया तो उसे लगा कि एक पति जिस तरह पत्नी से व्यवहार करता है, उस तरह का व्यवहार सुरेंद्र उस से नहीं करता. उसी बीच ममता ने महसूस किया कि सुरेंद्र उस के बजाय अपनी भाभी के ज्यादा करीब है. लेकिन वह इस बारे में किसी से कुछ कह नहीं सकी. इस की वजह यह थी कि उस ने कभी दोनों को रंगेहाथों नहीं पकड़ा था. फिर भी उसे संदेह हो गया था कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है.

एक तो वैसे ही ममता को सुरेंद्र के साथ ज्यादा रहने का मौका नहीं मिलता था, दूसरे जब वह घर आता था तो उस से खिंचाखिंचा रहता था. सुरेंद्र ममता को साथ भी नहीं ले जाता था, इसलिए ज्यादातर वह मायके में ही रहती थी. आखिर शादी के 5 सालों बाद ममता का मां बनने का सपना पूरा ही हो गया. उस ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रखा गया सौम्य. ममता को लगा कि बेटे के पैदा होने से सुरेंद्र बहुत खुश होगा. उन के बीच की जो हलकीफुलकी दरार है, वह भर जाएगी. उस के जीवन में भी खुशियों की बहार आ जाएगी.

लेकिन ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि ममता को जैसे ही बेटा पैदा हुआ, उस के कुछ दिनों बाद ही सुरेंद्र के बड़े भाई वीरेंद्र की मौत हो गई. वीरेंद्र की यह मौत कुदरती नहीं थी. वह थोड़ा दबंग किस्म का आदमी था. उस का किसी से झगड़ा हो गया तो सामने वाले ने अपने साथियों के साथ उसे इस तरह मारापीटा कि अस्पताल पहुंचने से पहले ही उस की मौत हो गई. वीरेंद्र की मौत के बाद सुरेंद्र और उस की भाभी के जो नजायज संबंध लुकछिप कर बन रहे थे, अब घरपरिवार और समाज की परवाह किए बगैर बनने लगे. ममता का जो संदेह था, अब सच साबित हो गया. भाभी को हमारे यहां मां का दरजा दिया जाता है, लेकिन सुरेंद्र और निर्मला को इस की कोई परवाह नहीं थी. जेठ के रहते ममता ने इस बात पर खास ध्यान नहीं दिया था. लेकिन जेठ की मौत के बाद सुरेंद्र खुलेआम भाभी के पास आनेजाने लगा.

ममता ने इस का विरोध किया तो उस के ससुर ने कहा, ‘‘ममता, इस मामले में तुम्हारा चुप रहना ही ठीक है. दरअसल मैं ने अपनी सारी प्रौपर्टी पहले ही वीरेंद्र और सुरेंद्र के नाम कर दी थी. निर्मला अभी जवान है. अगर वह कहीं चली गई तो उस के हिस्से की प्रौपर्टी भी उस के साथ चली जाएगी. इसलिए अगर तुम बखेड़ा न करो तो सुरेंद्र उस से शादी कर ले. इस तरह घर की बहू भी घर में ही रह जाएगी और प्रौपर्टी भी.’’

सौतन भला किसे पसंद होती है. इसलिए ससुर की बातें सुन कर ममता तड़प उठी. वह समझ गई कि यहां सब अपने मतलब के साथी हैं. उस का कोई हमदर्द नहीं है. पति गलत रास्ते पर चल रहा है तो ससुर को चाहिए कि वह उसे सही रास्ता दिखाएं और समझाएं. जबकि वह खुद ही उस का समर्थन कर रहे हैं. बल्कि उस से यह कह रहे हैं कि वह सौतन स्वीकार कर ले. उस का पति तो वैसे ही उसे वह मानसम्मान नहीं देता, जिस की वह हकदार है. अगर उस ने भाभी से शादी कर ली तो शायद वह उसे दिल से ही नहीं, घर से भी निकाल दे. यही सब सोच कर ममता ने उस समय इस बात को टालते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, यह मेरी ही नहीं, मेरे बच्चे की भी जिंदगी से जुड़ा मामला है. इसलिए मुझे थोड़ा सोचने का समय दीजिए.’’

इस के बाद ममता मायके गई और घरवालों को पूरी बात बताई. ममता की बात सुन कर सभी हैरान रह गए. एकबारगी तो किसी को इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ, क्योंकि निर्मला 3 बच्चों की मां थी. उस समय उस की बड़ी बेटी लगभग 20 साल की थी, उस से छोटा बेटा 16 साल का था तो सब से छोटा बेटा 12 साल का. इस उम्र में निर्मला को अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए था, जबकि वह अपने बारे में सोच रही थी. उस की बेटी ब्याहने लायक हो गई थी, जबकि वह खुद अपनी शादी की तैयारी कर रही थी. ममता के घर वालों ने उस से साफसाफ कह दिया कि वह इस बात के लिए कतई न राजी हो. जेठानी को जेठानी ही बने रहने दे, उसे सौतन कतई न बनने दे.

मायके वालों का सहयोग मिला तो सीधीसादी ममता ने अपने ससुर से साफसाफ कह दिया कि वह कतई नहीं चाहती कि उस  का पति उस के रहते दूसरी शादी करे. ममता का यह विद्रोह न सुरेंद्र को पसंद आया, न उस के बाप लक्ष्मण सिंह को. इसलिए बापबेटे दोनों को ही ममता से नफरत हो गई. परिणामस्वरूप दोनों के बीच दरार बढ़ने लगी. ममता सुरेंद्र की परछाई बन कर उस के साथ रहना चाहती थी, जबकि सुरेंद्र उस से दूर भाग रहा था. अब वह छोटीछोटी बातों पर ममता की पिटाई करने लगा. ससुराल के अन्य लोग भी उसे परेशान करने लगे. इस के बावजूद ममता न पति को छोड़ रही थी, न ससुराल को. इतना परेशान करने पर भी ममता न सुरेंद्र को छोड़ रही थी, न उस का घर तो एक दिन सुरेंद्र ने खुद ही मारपीट कर उसे घर से निकाल दिया.

सुरेंद्र ने जिस समय ममता को घर से निकाला था, उस समय उस की पोस्टिंग लखनऊ के कमांड हौस्पिटल में थी. ममता के पिता बालकृष्ण और भाई श्यामसुंदर ने सुरेंद्र के अफसरों से उस की इस हरकत की लिखित शिकायत कर दी. तब अधिकारियों ने सुरेंद्र और ममता को बुला कर दोनों की बात सुनी. चूंकि गलती सुरेंद्र की थी, इसलिए अधिकारियों ने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, बल्कि आदेश दिया कि वह ममता को 10 हजार रुपए महीने खर्च के लिए देने के साथ बच्चों को ठीक से पढ़ाएलिखाए. इस के बाद अधिकारियों ने कमांड हौस्पिटल परिसर में ही सुरेंद्र को मकान दिला दिया, जिस से वह पत्नी और बच्चों के साथ रह सके.

अधिकारियों के कहने पर सुरेंद्र ममता को साथ ले कर उसी सरकारी क्वार्टर में रहने तो लगा, लेकिन उस की आदतों में कोई सुधार नहीं आया. उसे जब भी मौका मिलता, वह भाभी से मिलने कानपुर चला जाता. अगर ममता कुछ कहती तो वह उस से लड़नेझगड़ने लगता. साथ रहने पर सुरेंद्र से जितना भी हो सकता था, वह ममता को परेशान करता रहा, इस के बावजूद ममता उस का पीछा छोड़ने को तैयार नहीं थी. अगर सुरेंद्र ज्यादा परेशान करता तो वह उस की ज्यादतियों की शिकायत उस के अधिकारियों से कर देती, जिस से उसे डांटाफटकारा जाता. लखनऊ में रहते हुए ममता ने एक बेटी को जन्म दिया. बेटी के पैदा होने के समय वह मायके आ गई थी. लेकिन 2 महीने के बाद वह अकेली ही लखनऊ चली गई.

धीरेधीरे सुरेंद्र सेना के नियमों का उल्लंघन करने लगा. एक दिन वह शराब पी कर बिना हेलमेट के सैन्य क्षेत्र में मोटरसाइकिल चलाते पकड़ा गया तो उसे दंडित किया गया. लेकिन उस पर इस का कोई असर नहीं पड़ा. दंडित किए जाने के बाद भी उस में कोई सुधार नहीं आया. इसी तरह दोबारा शराब पी कर बिना हेलमेट के सैन्य क्षेत्र में मोटरसाइकिल चलाने पर सेना के गार्ड ने उसे रोका तो उस ने गार्ड को जान से मारने की धमकी दी. गार्ड ने इस बात की रिपोर्ट कर दी. निश्चित था, इस मामले में उसे सजा हो जाती. इसलिए सजा से बचने के लिए वह भाग कर कानपुर चला गया.

सुरेंद्र को लगता था कि इस सब के पीछे उस के साले श्यामसुंदर का हाथ है. यह बात दिमाग में आते ही श्यामसुंदर उस की आंखों में कांटे की तरह चुभने लगा. क्योंकि श्यामसुंदर काफी पढ़ालिखा और समझदार था. वह कानपुर में ही एयरफोर्स में नौकरी कर रहा था. बात भी सही थी. उसी ने अधिकारियों से उस की शिकायत कर के ममता को साथ रखने के लिए उसे मजबूर किया था. सुरेंद्र को लग रहा था कि जब तक श्यामसुंदर रहेगा, उसे चैन से नहीं रहने देगा. इसलिए उस ने सोचा कि अगर उसे चैन से रहना है तो उसे खत्म करना जरूरी है. इसी बात को दिमाग में बैठा कर सुरेंद्र 29 सितंबर को चकेरी के विराटनगर स्थित अपने ससुर की दुकान पर जा पहुंचा. उस समय शाम के सात बज रहे थे.

श्यामसुंदर ड्यूटी से आ कर दुकान पर बैठ कर पिता की मदद करता था. संयोग से उस दिन श्यामसुंदर दुकान पर अकेला ही था. सुरेंद्र ने पहुंचते ही अपने लाइसेंसी रिवाल्वर से श्यामसुंदर पर गोली चला दी. गोली लगते ही श्यामसुंदर गिर कर छटपटाने लगा. गोली की आवाज सुन कर आसपास के लोग दौड़े तो सुरेंद्र ने हवाई फायर करते हुए कहा, ‘‘अगर किसी ने रोकने या पकड़ने की कोशिश की तो उस का भी यही हाल होगा.’’

डर के मारे किसी ने सुरेंद्र को पकड़ने की हिम्मत नहीं की. सुरेंद्र आसानी से वहां से भाग निकला. पड़ोसियों की मदद से बालकृष्ण बेटे को एयरफोर्स हौस्पिटल ले गए, जहां निरीक्षण के बाद डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. श्यामसुंदर की मौत से उस के घर में कोहराम मच गया. श्यामसुंदर की पत्नी सीमा देवी, जिस की शादी अभी 3 साल पहले ही हुई थी, उस का रोरो कर बुरा हाल था. अपने 2 साल के बेटे कार्तिक को सीने से लगाए कह रही थी, ‘‘बेटा तू अनाथ हो गया. तुझे किसी और ने नहीं, तेरे फूफा ने ही अनाथ कर दिया.’’

इस घटना की सूचना ममता को मिली तो उस का बुरा हाल हो गया. वह दोनों बच्चों को ले कर रोतीपीटती किसी तरह लखनऊ से कानपुर पहुंची. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी भाभी को कैसे सांत्वना दे. वह तो यही सोच रही थी कि वह स्वयं विधवा हो गई होती तो इस से अच्छा रहता. घटना की सूचना पा कर अहिरवां चौकी प्रभारी विक्रम सिंह चौहान सिपाही रूप सिंह यादव, सीमांत सिकरवार, विनोद कुमार तथा योंगेंद्र को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंचे. घटना गंभीर थी, इसलिए उन्होंने घटना की सूचना थानाप्रभारी संगमलाल सिंह को दी. इस तरह सूचना पा कर थानाप्रभारी संगमलाल सिंह, पुलिस अधीक्षक (पूर्वी) राहुल कुमार और क्षेत्राधिकारी कैंट भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

इस के बाद श्यामसुंदर के भाई राजेश यादव द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर हत्या का यह मुकदमा थाना चकेरी में सुरेंद्र सिंह यादव पुत्र लक्ष्मण सिंह यादव निवासी गांधीग्राम, चकेरी के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. दूसरी ओर घटनास्थल और लाश का निरीक्षण करने पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. इस के बाद मामले की जांच की जिम्मेदारी थानाप्रभारी संगमलाल सिंह ने संभाल ली. अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद श्यामसुंदर का शव मिला तो घरवालों ने सुरेंद्र की गिरफ्तारी न होने तक अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया. मृतक के घर वालों की इस घोषणा से पुलिस प्रशासन सकते में आ गया. इस के बाद पुलिस सुरेंद्र की गिरफ्तारी के लिए दौड़धूप करने लगी. परिणामस्वरूप अगले दिन यानी 1 अक्तूबर, 2013 को रामादेवी चौराहे से सुबह 4 बजे अभियुक्त सुरेंद्र सिंह यादव को गिरफ्तार कर लिया गया.

इस के बाद पुलिस ने सुरेंद्र की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त उस की लाइसेंसी रिवाल्वर बरामद कर ली. पूछताछ में सुरेंद्र ने बताया, ‘‘मेरे अपनी भाभी निर्मला से अवैध संबंध थे. भाई के मरने के बाद मैं उसे अपने साथ रखना चाहता था, जबकि ममता और उस के घर वाले इस बात का विरोध कर रहे थे. श्यामसुंदर इस मामले में सब से ज्यादा टांग अड़ा रहा था, इसलिए मैं ने उसे खत्म कर दिया.’’

सुरेंद्र की गिरफ्तारी के बाद उसी दिन शाम को श्यामसुंदर को घर वालों ने उस का अंतिमसंस्कार कर दिया. इस तरह एक सनकी फौजी ने अपनी सनक की वजह से 2 घर बरबाद कर दिए. साले के बच्चे को तो अनाथ किया ही, अपने भी बच्चों को अनाथ कर दिया.

ममता भी पति के रहते न सुहागिन रही न विधवा. उस के लिए विडंबना यह है कि वह मायके में भी रहे तो कैसे? अब उस की और उस के बच्चों की परवरिश कौन करेगा? सुरेंद्र को सजा हो गई तो उस के मासूम बच्चों का क्या होगा?

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story : 27 साल बाद बदले की आग में 5 हत्याएं

बचपन में जिस विक्की ने अपने मांबाप का खून होते हुए अपनी आंखों से देखा था, उसे वह चाह कर भी भुला नहीं पाया था. उस के अंदर जल रही बदले की आग 27 साल बाद जब ज्वाला बनी तो उस में 5 लोग भस्म हो गए. आखिर कौन थे वो लोग?

इस बार दीपावली के पहले 33 वर्षीय विशाल उर्फ विक्की गुप्ता अहमदाबाद से घर आया और अपनी दादी शारदा देवी से बोला, ”दादी, मैं दीवाली के दिन मम्मीपापा के हत्यारे को जिंदा नहीं छोड़ूंगा. उस दिन दीवाली के पटाखों के शोर में किसी को पता भी नहीं चलेगा.’’

अपने पोते के मुंह से यह बात सुनते ही शारदा देवी चिंता में पड़ गईं. उन्होंने विक्की को पास बुलाया और उस के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे समझाते हुए बोलीं, ”देख विक्की, जो बीत गया, उसे भूल जा. वैसे ही मेरे पास बस यही एक बेटा राजेंद्र बचा है. बेटा, इस तरह का खयाल मन से निकाल दे, खूनखराबा करने से आखिर क्या हासिल होगा.’’

”दादी, आखिर मैं कैसे भूल जाऊं कि 27 साल पहले राजेंद्र ताऊ ने मेरे मम्मीपापा को किस तरह मेरे सामने गोलियों से भून दिया था और तो और, जेल से आने के बाद दादाजी को मरवा डाला था.’’ विक्की आवेश में आते हुए बोला.

”मुझे देख ले बेटा, तेरे दादाजी की मौत का गम सह कर भी मैं ने राजेंद्र को माफ कर दिया है. आखिर इतना बड़ा कारोबार संभालता कौन? दीवाली खुशियों का त्यौहार है, इसे मातम में मत बदल देना.’’ शारदा देवी उसे पुचकारते हुए बोलीं.

”आखिर हम कब तक ताऊ के टुकड़ों पर पलेंगे, हमारा भी तो हक है इस प्रौपर्टी पर. हम बेगानों की तरह इस घर में कब तक रहेंगे?’’ विक्की ने दादी से कहा.

”विक्की बेटा, थोड़ा धीरज रख, मैं तुझे प्रौपर्टी का हिस्सा भी दिला दूंगी. मगर कोई ऐसा कदम मत उठाना कि मुझे इस बुढ़ापे में बुरे दिन देखने पड़ें.’’ शारदा देवी के समझाने के बाद विक्की चला गया.

वाराणसी के भदैनी इलाके में पावर हाउस के सामने की गली में 56 साल के शराब कारोबारी राजेंद्र गुप्ता का 5 मंजिला मकान है. मकान के अगले हिस्से में पहले, दूसरे और तीसरे तल पर राजेंद्र का एकएक फ्लैट है, जबकि अन्य फ्लैट और उस से सटे टिनशेड में 40 किराएदार रहते हैं. राजेंद्र गुप्ता के साथ घर में 80 साल की मां शारदा देवी के अलावा उस की पत्नी नीतू, 24 साल का बेटा नवनेंद्र व 15 साल का सुबेंद्र और 17 साल की बेटी गौरांगी रहते थे.

विक्की राजेंद्र के भाई कृष्णा गुप्ता का बेटा था, जो तमिलनाडु के वेल्लोर से एमसीए करने के बाद अहमदाबाद में सौफ्टवेयर डेवलेपर था. अक्तूबर महीने के आखिरी हफ्ते में अपने घर वाराणसी आया हुआ था. विक्की का एक छोटा भाई प्रशांत उर्फ जुगनू और एक बहन अनुप्रिया है, जिस की शादी हो चुकी है.

उस दिन 5 नवंबर, 2024 की सुबह 11 बजे घर में काम करने वाली नौकरानी रीता जैसे ही फ्लैट में घुसी तो अम्मा ने ऊपर की मंजिल से आवाज दे कर पूछा, ”क्यों रीता, खाना बनाने वाली रेनू आई है कि नहीं?’’

”अभी तक तो नहीं आई अम्मा.’’ रीता ने नीचे से चिल्ला कर कहा.

”देख तो जरा नीतू क्या अभी तक सो कर नहीं उठी, कोई आवाज नहीं आ रही.’’ अम्मा ने पूछा.

”अम्मा, अभी दरवाजा लगा हुआ है. हो सकता है बाहर गई हों. फिर भी मैं देख कर बताती हूं.’’ रीता ने कहा.

इतना कह कर रीता ने झाड़ू उठाई और सफाई करते हुए नीतू भाभी के कमरे तक पहुंची. रीता ने प्रथम तल स्थित फ्लैट पर पहुंच कर दरवाजा खटखटाया, लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आई. थोड़ा इंतजार के बाद रीता ने दरवाजे पर धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया. अंदर जाने पर रीता ने जो दृश्य देखा तो उस की चीख निकल गई. कमरे में नीतू फर्श पर खून से लथपथ निढाल पड़ी थी. रीता चिल्लाती हुई दूसरी मंजिल की तरफ गई, जहां नीतू के बड़े बेटे नवनेंद्र का कमरा था. उस ने बाहर से ही आवाज दे कर पुकारा, ”बाबू भैया, बाबू भैया, नीचे जा कर तो देखो, मम्मी को क्या हुआ है.’’

कोई उत्तर नहीं मिलने पर उस ने अंदर जा कर देखा तो वहां एक कमरे में नवनेंद्र फर्श पर खून से लथपथ पड़ा था और गौरांगी एक कोने में मृत पड़ी थी. तो सुबेंद्र का शव बाथरूम में मिला. रीता फ्लैट के नीचे आई और आसपास के लोगों को उस ने घटना की जानकारी दी. आसपास रहने वाले लोगों ने घटना की सूचना पुलिस को दी. पुलिस ने इस वारदात की मौके पर पहुंच कर जांच शुरू की. सभी के सिर और सीने में एकएक गोली मारी गई थी. जबकि इतनी बड़ी वारदात के बावजूद हैरानी की बात यह थी कि घर का मुखिया राजेंद्र गुप्ता गायब था.

पुलिस जिसे कातिल समझ रही थी, उस का भी हो गया मर्डर

पूछताछ में पता चला कि राजेंद्र गुप्ता कुछ समय से पत्नी से अनबन के चलते परिवार से अलग रह रहा था. लोगों के साथ पुलिस को लगा कि शायद इन चारों कत्ल के पीछे राजेंद्र गुप्ता का ही हाथ है, जिस ने किसी वजह से अपने पूरे परिवार की जान ले ली और खुद फरार हो गया. आखिरी नतीजे पर पहुंचने से पहले पुलिस के लिए इस बात की तस्दीक जरूरी थी. जब पुलिस ने राजेंद्र गुप्ता के मोबाइल फोन की लोकेशन ट्रेस की तो फोन की लोकेशन मौकाएवारदात से दूर रोहनिया पुलिस थाना के मीरापुर-रामपुर गांव में मिल रही थी.

पुलिस यह सोच कर हैरान थी कि जिस के पूरे परिवार का कत्ल हो गया, वह शहर से दूर एक गांव में आखिर क्या कर रहा है? पुलिस की एक टीम फौरन मीरापुर-रामपुर गांव के लिए रवाना हुई. मोबाइल की लोकेशन के मुताबिक टीम एक अंडर कंस्ट्रक्शन मकान में पहुंची. यहां पुलिस को जो कुछ मिला, वो और भी हैरान करने वाला था. इस मकान के अंदर बिस्तर पर राजेंद्र गुप्ता की लाश पड़ी थी. ठीक अपने परिवार के बाकी लोगों की तरह उस के भी सिर और सीने में एकएक गोली लगी थी.

इस वारदात में एक बात परिवार के बाकी लोगों से अलग थी, वो थी राजेंद्र गुप्ता की लाश का बिलकुल बिना कपड़ों के होना. राजेंद्र गुप्ता की इस हाल में मिली लाश ने इस केस को मानो अचानक से पलट दिया. क्योंकि अब तक पुलिस यह मान कर चल रही थी कि राजेंद्र गुप्ता ने ही अपने पूरे परिवार की हत्या की होगी. कुछ लोग यह भी मान रहे थे कि हत्या करने के बाद उस ने खुद को भी गोली मार कर जान दे दी होगी, लेकिन वहां जिस तरह से उस के सिर और सीने में एकएक गोली लगी थी, उस से साफ था कि राजेंद्र गुप्ता ने कम से कम खुदकुशी तो नहीं की है. क्योंकि खुदकुशी करने वाला आदमी अपने सिर और सीने में एकएक कर 2 गोलियां नहीं मार सकता. और फिर जिस हथियार से खुद को गोली मारी, वह भी वहीं होना चाहिए था.

पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि आखिर कातिल कौन है? पुलिस ने घटनास्थल से मिले खोखे के आधार पर यह दावा किया कि हत्या में .32 बोर की पिस्टल का इस्तेमाल किया गया था. उत्तर प्रदेश के शहर वाराणसी के भेलूपुर थाना इलाके में हुई इस घटना से पूरे इलाके में दहशत फैल गई. काशी जोन के डीसीपी गौरव बांसवाल के निर्देश पर पुलिस ने सभी लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, राजेंद्र गुप्ता को 3 गोलियां मारी गई थीं, 2 उस के सिर पर और एक सीने पर. उस के बड़े बेटे नवनेंद्र को 4 गोलियां मारी गई थीं, जिन में 2 सिर पर और 2 सीने पर थीं.

नीतू गुप्ता को भी 4 गोलियां मारी गईं, जबकि बेटी गौरांगी और छोटे बेटे सुबेंद्र को 2-2 गोलियां मारी गईं. रिपोर्ट के अनुसार, एक ही प्रकार की पिस्टल से गोली मारी गई थी, इस से पता चलता है कि यह सुनियोजित हत्याएं थीं. 6 नवंबर को सभी 5 शवों का पोस्टमार्टम करवाने के बाद पुलिस की मौजूदगी में अंतिम संस्कार करवाया गया. जब घर से एक साथ 5 अर्थियां उठीं तो देखने वालों की आंखें नम हो गईं. वाराणसी में पिता, पत्नी और 3 बच्चों के शव हरिश्चंद्र घाट पर जैसे ही पहुंचे, वैसे ही श्मशान घाट पर लोगों का जमावड़ा लग गया. हर कोई एक साथ परिवार के सभी सदस्यों की एक साथ जलती चिताओं को देख हैरान था.

वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट पर भतीजे प्रशांत उर्फ जुगनू ने अपने ताऊ राजेंद्र गुप्ता, ताई नीतू, चचेरी बहन गौरांगी और चचेरे भाइयों सुबेंद्र के साथ नवनेंद्र के शवों का अंतिम संस्कार करते हुए मुखाग्नि दी. अंतिम संस्कार के बाद भतीजे जुगनू को पुलिस ने हिरासत में रखा. अंतिम संस्कार के दौरान हरिश्चंद्र घाट पर राजेंद्र गुप्ता की मां शारदा भी मौजूद रहीं और नम आंखों से अपने परिवार के सदस्यों की जलती चिताओं को देर तक निहारती रहीं.

वाराणसी पुलिस की तफ्तीश आगे बढ़ी और अब पुलिस ने परिवार में जिंदा बची सब से बुजुर्ग महिला राजेंद्र गुप्ता की मां शारदा देवी से पूछताछ की. शारदा देवी ने इस कत्ल को ले कर जो कहानी सुनाई, उस ने मामले को एक और ही नया मोड़ दे दिया. शारदा देवी ने शक जताया कि इस वारदात के पीछे उन का पोता और राजेंद्र का भतीजा विशाल उर्फ विक्की गुप्ता हो सकता है. असल में विक्की पहले भी राजेंद्र गुप्ता के पूरे परिवार के कत्ल की बात कह चुका था और विक्की की अपने ही ताऊ राजेंद्र गुप्ता से पुरानी दुश्मनी भी थी.

राजेंद्र ने क्यों किया था छोटे भाई व भाभी का मर्डर

फिल्म ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ में नवाजुद्दीन सिद्ïदीकी का फैजल खान वाला रोल आज भी याद है. उस के डायलौग की डिलीवरी इतनी परफेक्ट थी कि वह फिल्म दर्शकों पर जादू छोड़ गई थी. विशाल गुप्ता उर्फ विक्की ने भी जब फिल्म ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ देखी और नवाजुद्ïदीन सिद्ïदीकी द्वारा बोला गया डायलौग ‘बाप का, दादा का, भाई का, सब का बदला लेगा रे तेरा फैजल’ सुना तो इस डायलौग ने किसी चिंगारी की तरह सीने में पड़ी सुस्त राख में दबी बदले की आग को सुलगा दिया.

उस के मन में दबी बदले की आग फिर से ज्वाला बनने को बेताब होने लगी. आखिर उसे अपने मम्मीपापा के कत्ल का बदला जो लेना था. 27 साल पहले 1997 में विक्की केवल 5 साल का मासूम बच्चा था, लेकिन उसे याद है कि किस तरह उस के पापा कृष्णा गुप्ता और मम्मी बबीता का बेरहमी से मर्डर कर दिया गया था. मर्डर करने वाला कोई गैर नहीं, बल्कि विक्की का सगा ताऊ राजेंद्र गुप्ता था. असल में वाराणसी के भदैनी इलाके में रहने वाले राजेंद्र गुप्ता के पिता लक्ष्मी नारायण गुप्ता बनारस के बड़े कारोबारी थे. उन का प्रौपर्टी और शराब का लंबाचौड़ा काम था.

लक्ष्मी नारायण के 2 बेटे राजेंद्र गुप्ता और कृष्णा गुप्ता थे. लेकिन लक्ष्मी नारायण अपने बड़े बेटे राजेंद्र गुप्ता के लापरवाह रवैए को ले कर हमेशा नाखुश रहते थे, क्योंकि राजेंद्र कारोबार पर ध्यान देने के बजाय अय्याशी की राह पर चल पड़ा था. इस वजह से उन्होंने अपने कारोबार का ज्यादातर हिस्सा अपने छोटे बेटे कृष्णा गुप्ता के हवाले कर दिया था. इस बात को ले कर राजेंद्र का अपने पिता से झगड़ा भी होता था. इस का नतीजा यह हुआ कि गुस्से में आ कर राजेंद्र ने 1997 के नवंबर महीने में एक रोज अपने छोटे भाई कृष्णा गुप्ता और उस की पत्नी की सोते समय गोली मार कर हत्या कर दी थी.

इस घटना के बाद राजेंद्र को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया, लेकिन इस वारदात से अपने बड़े बेटे राजेंद्र पर लक्ष्मी नारायण गुप्ता का गुस्सा और बढ़ गया. मांबाप का साया छिन जाने के बाद लक्ष्मी नारायण ने कृष्णा के दोनों बेटों विक्की और जुगनू को काम सिखाना शुरू कर दिया.

उधर, जेल में बंद राजेंद्र अब भी अपने पिता के रवैए से गुस्से में था. करीब 6 साल जेल में गुजारने के बाद साल 2003 में उसे जैसे ही पैरोल मिली, बाहर आ कर उस ने एक और बड़ी वारदात को अंजाम दे दिया. असल में राजेंद्र अपने पिता से प्रौपर्टी और कारोबार का हिस्सा मांग रहा था, लेकिन लक्ष्मी नारायण इस के लिए तैयार नहीं थे.

राजेंद्र ने क्यों कराया पिता का मर्डर

अचानक एक रोज वाराणसी शहर के आचार्य रामचंद्र शुक्ल चौराहे के पास गुमनाम कातिलों ने लक्ष्मी नारायण गुप्ता और उन के पर्सनल सिक्योरिटी गार्ड की गोली मार कर हत्या कर दी. इस मामले में पुलिस के शक की सूई पहले ही दिन से बेटे राजेंद्र गुप्ता पर ही थी. ऐसे में जब जांच आगे बढ़ी तो पुलिस को पता चला कि राजेंद्र गुप्ता ने ही सुपारी दे कर अपने पिता और उन के सिक्योरिटी गार्ड का कत्ल करवा दिया.

राजेंद्र की पहली शादी 1995 में हुई थी, पहली पत्नी से उसे एक बेटा भी हुआ था. राजेंद्र के जिद्ïदी स्वभाव और हिंसक होने से पहली पत्नी बुरी तरह डर गई. उसे हर पल यही डर सताता कि जो शख्स अपने सगे भाई का मर्डर कर सकता है, वह उसे भी नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए राजेंद्र के जेल जाते ही पहली पत्नी अपने मायके पश्चिम बंगाल के आसनसोल चली गई. इस के बाद साल 2003 में जब राजेंद्र जेल से बाहर आया तो उस ने नीतू से दूसरी शादी की, जिस से उसे 3 बच्चे नवनेंद्र, सुबेंद्र और गौरांगी हुए. इन बच्चों के सिर पर तो खैर मांबाप का साया था, लेकिन राजेंद्र की वजह से ही कृष्णा के बच्चे कई साल अनाथ की तरह रहे.

कहने को तो विक्की, जुगनू और उन की बहन अनुप्रिया को राजेंद्र ने ही पाला था, लेकिन परवरिश के मामले में भी उस का परिवार अपने भतीजों के साथ सौतेला व्यवहार करता था. राजेंद्र हर समय अपने भतीजों के साथ गालीगलौज करता था और यह धमकी भी देता था कि उन के मम्मीपापा की तरह उन का भी कत्ल कर देगा. जैसेजैसे राजेंद्र के भतीजे बड़े हो रहे थे, वे गुस्से और बदले की आग में जल रहे थे. और अब जब ये वारदात हुई तो शक की सूई राजेंद्र के बड़े भतीजे विक्की पर ही जा कर टिक गई थी. क्योंकि पुलिस को उस के खिलाफ कई सबूत भी मिल चुके थे और वारदात के बाद से ही वह फरार भी था. राजेंद्र की बुजुर्ग मां शारदा देवी ने भी पुलिस को बताया था कि विक्की अपने चाचा से बदला लेना चाहता था.

विक्की और उस का भाई जुगनू दोनों दिल्ली एनसीआर में ही रह कर अपना काम करते थे. इस वारदात के बाद जुगनू तो बनारस पहुंच गया, लेकिन विक्की का कोई पता नहीं चला. इस बीच जब पुलिस ने विक्की के बारे में जानकारी जुटाई तो ये पता चला कि उस ने अपने करीबियों से कई बार राजेंद्र गुप्ता और उस के परिवार को जान से मार डालने की बात कही थी. पुलिस ने इस वारदात के बाद विक्की के बहनोई को नोएडा से हिरासत में लिया, जिस ने पूछताछ में इस बात पर मुहर लगाई. बहनोई ने बताया कि विक्की ने उस से कहा था कि इस बार दीवाली में वो अपने ताऊ और उस के परिवार को मार डालेगा.

पुलिस को मामले की छानबीन के दौरान मिली एक पर्सनल डायरी ने इस मौत की गुत्थी को और भी उलझा दिया. यह डायरी वारदात में मारे गए शख्स राजेंद्र गुप्ता की थी. डायरी में राजेंद्र ने किसी से उस की लड़की के साथ शादी करने की इच्छा जताई थी और खुद को एक काबिल, कर्मठ, सच्चा और संस्कारी लड़का बता रहा था.

डायरी से उजागर हुए राज

डायरी में लिखी लाइनों के साथ एक सवाल यह भी खड़ा हो गया कि क्या राजेंद्र गुप्ता तीसरी शादी करना चाहता था? क्योंकि डायरी में ये बातें जिन पन्नों पर लिखी थीं, उस के साथ वाले दूसरे पन्ने पर 6 नवंबर, 2016 की तारीख है.

जेल से बाहर आने के बाद राजेंद्र ने दूसरा प्रेम विवाह अपने ही घर के सामने रहने वाली ब्राह्मण परिवार की नीतू से किया था. हत्याकांड के बाद अब राजेंद्र गुप्ता का खुद लिखा हुआ लगभग ढाई पन्ने का हैंडनोट मिला, जो नवंबर 2016 का था. इस हैंडनोट में राजेंद्र किसी के सामने अपनी सफाई पेश कर रहा था कि वह किस तरह का निहायत सीधा और सरल इंसान है. साथ ही उस का पहली पत्नी से तलाक हो चुका है. इतना ही नहीं, डायरी में तमाम लोगों के नाम, नंबर और बनाई गई कुंडलियां पेन से कट की गई थीं.

राजेंद्र गुप्ता वर्ष 2016 में तीसरी शादी करने की फिराक में था. अधेड़ हो चुका राजेंद्र कहीं न कहीं अपने दिल में तीसरी शादी का सपना बुन रहा था. हैंडनोट में वह कथित तौर पर लड़की के पिता को अंकल कह कर संबोधित कर रहा था. ऐसे में पुलिस ने आशंका जताई कि कहीं यही बात तो उस की हत्या की वजह नहीं बन गई? शायद कातिल नहीं चाहता था कि राजेंद्र की अकूत संपत्ति का कोई नया वारिस आए या उस की जिदंगी में तीसरी औरत की एंट्री हो.

राजेंद्र के हैंडनोट में लिखा मिला, ‘नमस्ते अंकल, सौ बात की एक बात मैं आप से कहना चाहता हूं कि मुझ जैसा काबिल, कर्मठ, सच्चा, संस्कारी, चरित्रवान कुल मिला कर सर्वगुण संपन्न इंसान आप को ढूंढने से भी शायद न मिले. मैं अपने अंदर हमेशा कमी ढूंढता रहता हूं, लेकिन आज तक मुझे अपने अंदर कभी कोई कमी नहीं मिली. फोन पर थोड़ी देर बात कर के कोई भी, किसी को कितना समझ सकता है, फ्री माइंड हो कर आप से ठीक से बात नहीं कर पाया. घबराहट में शायद गलत बोल गया.’

हैंडनोट में राजेंद्र ने आगे लिखा था, ‘मेरा तलाक फाइनल हो चुका है, जो एकदम सत्य है. मेरी पत्नी ने अब दूसरी शादी कर ली है. मेरी ससुराल बहुत संपन्न है. बच्चों की पढ़ाई का मुझे कोई खर्च नहीं देना, सब हो चुका. हालांकि, बच्चों के लगाव की वजह से कुछ भेज देता हूं, इसलिए कि बच्चे नफरत न करें. बच्चे अपनी मां के साथ ही रहते हैं. मैं अकेला हूं. ‘अब आप लोग जो कहेंगे वो करूंगा. जीवनसाथी से कई फोन काल आते रहते हैं, लेकिन मुझे कुंडली मिला कर ही शादी करनी है. इसलिए सब को सौरी कहना पड़ रहा है. आप मुझे गलत मत समझिए. आप की बेटी से कुंडली मिला, तभी मैं ने इंटरेस्ट भेजा, नहीं मिलता तो नहीं भेजता.

‘कुंडली को गुरुजी को भी दिखाया, उन्होंने ओके बोल दिया. यदि आप की बेटी की शादी होती है तो मैं विश्वास दिलाता हूं कि उस को लाइफ में कोई कष्ट नहीं होने दूंगा. दुनिया की सब से बेहतरीन लाइफ उसे मिलेगी. आप एक राजा के घर शादी कर रहे हैं. मैं जानता हूं कि आप एक ऐसे पिता हैं, जिसे अपनी बेटी के भविष्य की चिंता है.’

विक्की को हर महीने 10 हजार रुपए क्यों भेजती थी ताई

विक्की भले ही अपने ताऊ से नफरत करता था और उन से बदला भी लेना चाहता था, मगर उस की ताई नीतू उस की काफी चिंता करती थी. विक्की की हर जरूरत का ध्यान नीतू रखती थी. विशाल का बैंक अकाउंट खंगालने पर चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि नीतू गुप्ता यानी विशाल की ताई (राजेंद्र गुप्ता की पत्नी) उस के खर्च के लिए हर महीने 10 हजार रुपए भेजती थी.

सालों बाद इस बार दीवाली पर जब विक्की घर आया तो यम द्वितीया पर नीतू की बेटी गौरांगी ने विशाल की लंबी उम्र की कामना करते हुए भाई दूज पर टीका लगाया था और काफी वक्त एक साथ बिताया था. इन सब के बावजूद भी पुलिस को यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर विशाल के हाथ अपनों पर गोली दागने से पहले कांपे क्यों नहीं?

राजेंद्र गुप्ता ने विक्की की बहन और अपनी भतीजी अनुप्रिया की शादी कपड़ा फैक्ट्री मालिक से करने के लिए झूठ बोला था. पुलिस को यह बात अनुप्रिया के पति ने बताई, जब उन से सवाल किया कि 4 हत्याओं के आरोपी के घर उस ने शादी कैसे की?

जिस पर अनुप्रिया के पति ने बताया कि राजेंद्र ने उन से झूठ बोलते हुए कहा था, ”मेरे छोटे भाई कृष्णा और उन की पत्नी बबीता की रोड एक्सीडेंट में मौत हो गई. इसलिए भतीजी के मम्मीपापा मैं और मेरी पत्नी नीतू ही हैं. अनुप्रिया भी मुझ से यह बात छिपाए रही. मुझे सच्चाई की जानकारी 5 हत्याओं से संबंधित खबर मीडिया में पढऩे के बाद हो पाई.’’

राजेंद्र गुप्ता से विक्की को इतनी नफरत थी कि वह बहन अनुप्रिया की शादी में नहीं आया था. जब उसे अनुप्रिया ने फोन लगा कर कहा था कि विक्की मेरी शादी में आना है तो उस ने फोन कर के बोला था, ”दीदी तुम शादी कर लो, मेरा आना ठीक नहीं रहेगा.’’

वह महीने-2 महीने में एक बार अनुप्रिया को जरूर फोन कर के उस का हालचाल पूछ लेता था. अपनी बहन पर वह बहुत प्यार दर्शाता था. इस बार भी दीवाली की मिठाई भी उस ने औनलाइन भेजी थी.

 

दादी का लाडला था विक्की

27 साल पुरानी चली आ रही इस रंजिश की असली वजह जायदाद है. इस केस में कई चौंका देने वाले खुलासे भी हुए हैं. 5 लोगों की हत्या करने का आरोपी विक्की अपनी दादी शारदा देवी से काफी क्लोज था. इस वारदात से पहले वह उन के पास घर पर आया था. दादी ने उस के लिए खाने में रोटियां भी बनवाई थीं. इस के लिए उन्होंने राजेंद्र गुप्ता की दूसरी पत्नी नीतू से कहा था कि वो नौकरानी से 3 रोटी अधिक बनवा ले.

डीसीपी गौरव बंसवाल और उन की टीम को इस हत्याकांड में पहले यह शक हुआ था कि मर्डर की इस घटना में कई शूटर शामिल होंगे, लेकिन गहराई से हुई जांच और पूछताछ में दादी शारदा देवी ने स्पष्ट बताया कि विक्की ने मंशा जाहिर की थी कि वह पूरे परिवार को खत्म कर देगा. विक्की ने 22 अक्तूबर से ही अपना मोबाइल बंद कर लिया. उस की कोई लोकेशन भी नहीं मिली. वह बगैर फोन के ही दीवाली के समय आ कर घर में रुका भी था. डीसीपी ने आगे बताया कि वारदात वाली रात में राजेंद्र गुप्ता को सोते हालत में ही उन के रोहनिया स्थित निर्माणाधीन मकान में सिर में 2 गोलियां मारी गई थीं. उस के बाद विक्की ने भदैनी के घर पर सुबह 5-6 बजे के बीच में आ कर 4 मर्डर किए थे.

विक्की घर के हर कोने से वाकिफ था. पहले उस ने पहली मंजिल पर सो रही नीतू को गोली मारी फिर वह सेकेंड फ्लोर पर गया, जहां गौरांगी और छोटू सो रहे थे. उस ने उन दोनों को भी गोली मार दी. उन की मच्छरदानी में भी गोलियों से छेद हो गए. गौरांगी का शव फर्श पर मिला था. ऐसा लगता है कि उस ने संघर्ष किया था, जबकि दूसरे बड़े बेटे का शव बाथरूम में मिला था. ऐसे में कहा जा सकता है कि दोनों ने संघर्ष कर के अपनी जान बचाने की पूरी कोशिश की थी.

विक्की की गतिविधियों को खंगालने पर पता चला है कि अहमदाबाद में उस ने 22-24 नवंबर के बीच अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया था. इस के बाद वह बनारस आया था और यहीं पर भाईदूज तक रुका था.

कथा लिखने तक पुलिस को आरोपी विशाल विक्की के बारे में कहीं से कोई सुराग नहीं मिल सका था. पुलिस उस की तलाश में जुटी थी.

—कथा मीडिया रिपोर्ट पर आधारित

Love Passion Crime Story : सुहागन बनने से पहले प्रेमिका बनी विधवा

23 वर्षीय गुलशन गुप्ता ड्यूटी से थकामांदा कुछ ही देर पहले घर पहुंचा था, तभी उस ने फोन देखा तो पता चला कि उस के जिगरी यार राहुल सिंह का कई बार फोन आ चुका था. उस ने सोचा कि पता नहीं राहुल ने क्यों फोन किया है. झट से उस ने राहुल को फोन कर वजह पूछी तो राहुल बोला, ”गुलशन, तू घर पहुंच गया हो तो मेरे घर आ जा, कहीं चलना है.’’

”ठीक है, मैं आता हूं.’’ गुलशन ने कहा और उस ने अपनी मम्मी से चाय बनवाई.

वह चाय की चुस्की ले फटाफट हलक के नीचे गरमागरम उतारता गया. मिनटों में चाय की प्याली खाली कर अपनी बाइक निकाली और मम्मी को दोस्त राहुल के घर जाने की बात कह कर चल दिया. कुछ देर बाद वह राहुल के घर पहुंच गया था. यह बात 16 सितंबर, 2023  की है. गुलशन गुप्ता पंजाब के लुधियाना जिले की डाबा थानाक्षेत्र के न्यू गगन नगर कालोनी में मम्मी सोनी देवी और 3 बहनों के साथ रहता था. उस के पापा की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी. मां सोनी देवी और खुद गुलशन यही दोनों मिल कर परिवार की जिम्मेदारी संभाले हुए थे.

गुलशन का दोस्त 25 वर्षीय राहुल सिंह लुधियाना के माया नगर में अपने मम्मीपापा के साथ रह रहा था. वह अपने मम्मीपापा की इकलौती संतान था. सब का लाडला था. उस की एक मुसकान से मांबाप की सुबह होती थी. वह अपनी जो भी ख्वाहिश उन के सामने रखता था, वह पूरी कर देते थे. पापा अशोक सिंह एक प्राइवेट कंपनी में थे, पैसों की उन के पास कोई कमी नहीं थी, बेटे पर वह अपनी जान छिड़कते थे.

गुलशन को देख कर राहुल का चेहरा खुशी से खिल उठा था तो गुलशन ने भी उसी अंदाज में राहुल के साथ रिएक्ट किया था. वैसे ऐसा कोई दिन नहीं होता था, जब वे एकदूसरे से न मिलते हों. इन की यारी ही ऐसी थी कि बिना मिले इन्हें चैन नहीं आता था. ये जिस्म से तो दो थे, लेकिन जान एक ही थी. खैर, राहुल गुलशन के ही आने का इंतजार कर रहा था. उस के आते ही उस की बाइक अपने घर के सामने खड़ी कर दी और बाहर खड़ी अपनी एक्टिवा ड्राइव कर गुलशन को पीछे बैठा कर मम्मी से थोड़ी देर में लौट कर आने को कह निकल गया.

दोनों दोस्त कैसे हुए लापता

राहुल सिंह के साथ गुलशन गुप्ता को निकले करीब 4 घंटे बीत गए थे, लेकिन न तो राहुल घर लौटा था और न गुलशन ही घर लौटा था. और तो और दोनों के सेलफोन भी बंद आ रहे थे. राहुल के जितने भी दोस्त थे, पापा अशोक सिंह ने सब के पास फोन कर के उस के बारे में पूछा. यही नहीं लुधियाना में रह रहे अपने रिश्तेदारों और चिरपरिचितों से भी राहुल के बारे में पूछ लिया था, लेकिन किसी ने भी उस के वहां आने की बात नहीं कही.

दोनों के घर वालों ने रात आंखों में काट दी थी. अगले दिन 17 सितंबर को सुबह 10 बजे राहुल के पापा अशोक सिंह और गुलशन की मम्मी सोनी देवी दोनों डाबा थाने जा पहुंचे. उन्होंने राहुल और गुलशन के गायब होने की पूरी बात बता दी. गुलशन की मम्मी सोनी देवी ने बताया कि सर, हमें पूरा यकीन है कि हमारे बच्चों का अमर यादव ने अपहरण किया है.

”क्या..?’’ सोनी देवी की बात सुन कर इंसपेक्टर सिंह उछले, ”अमर यादव ने आप के बच्चों का अपहरण किया है? लेकिन यह अमर यादव है कौन और उस ने दोनों का अपहरण क्यों किया?’’

अमर यादव पर क्यों लगाया अपहरण का आरोप

सोनी देवी ने राहुल और गुलशन के अपहरण किए जाने की खास वजह इंसपेक्टर कुलवीर सिंह को बता दी. उन की बातों में दम था. फिर इंसपेक्टर ने राहुल और गुलशन की एक एक फोटो मांगी तो उन्होंने दोनों के फोटो उन के वाट्सऐप पर सेंड कर दिए. सोनी ने लिखित तहरीर इंसपेक्टर कुलवीर सिंह को सौंप दी थी. इस बीच एक जरूरी काल आने के बाद अशोक सिंह वहां से जा चुके थे. उधर कुलदीप सिंह ने सोनी देवी से तहरीर ले कर अपने पास रख ली और आवश्यक काररवाई करने का आश्वासन दे कर उन्हें वापस घर भेज दिया था.

राहुल सिंह के पिता अशोक सिंह को एक परिचित ने फोन कर के बताया कि टिब्बा रोड कूड़ा डंप के पास लावारिस हालत में राहुल की एक्टिवा खड़ी है और वहीं मोबाइल फोन भी पड़ा है. यह सुन कर वह इंसपेक्टर कुलवीर सिंह से टिब्बा रोड चल दिए थे. वह जैसे ही वहां पहुंचे, सफेद एक्टिवा और मोबाइल देख कर अशोक पहचान गए, दोनों ही चीजें उन के बेटे राहुल की थीं. अभी वह खड़े हो कर कुछ सोच ही रहे थे कि उसी वक्त एक और चौंका देने वाली सूचना उन्हें मिली. टिब्बा रोड से करीब 2 किलोमीटर दूर वर्धमान कालोनी से गुलशन का मोबाइल फोन बरामद कर लिया गया.

राहुल की एक्टिवा और दोनों के लावारिस हालत में पड़े हुए फोन की सूचना अशोक ने डाबा थाने के इंसपेक्टर कुलवीर सिंह को फोन द्वारा दे दी थी. सूचना मिलने के बाद कुलवीर सिंह मय दलबल के मौके पर पहुंच गए, जहां अशोक सिंह खड़े उन के आने का इंतजार कर रहे थे.

दोनों मोबाइल फोन बंद थे. इंसपेक्टर कुलवीर सिंह ने दोनों फोन औन किए. उन्होंने राहुल के फोन की काल हिस्ट्री चैक की तो पता चला कि बीती रात साढ़े 5 बजे के करीब उस के फोन पर एक नंबर से फोन आया था. उसी नंबर से 15 सितंबर को करीब 3 बार काल आई थी.

इंसपेक्टर सिंह ने इस नंबर पर काल बैक किया तो वह नंबर लग गया. काल रिसीव करने वाले से उस का नाम पूछा गया तो उस ने अपना नाम अमर यादव बताया और टिब्बा रोड स्थित रायल गेस्टहाउस का कर्मचारी होना बताया.

अमर यादव का नाम सुन कर वह चौंक गए, क्योंकि सोनी देवी ने भी बच्चों के अपहरण करने की अपनी आशंका इसी के प्रति जताई थी और राहुल के फोन में आखिरी काल भी अमर यादव की ही थी. इस का मतलब था कि राहुल और गुलशन के गायब होने में कहीं न कहीं से अमर यादव का हाथ हो सकता है.

पुलिस ने बरामद कीं दोनों दोस्तों की लाशें

फिर देर किस बात की थी. पुलिस रायल गेस्टहाउस पहुंच गई, जो मौके से कुछ ही दूरी पर स्थित था. गेस्टहाउस पहुंच कर इंसपेक्टर सिंह अमर यादव को पूछते हुए सीधे अंदर घुस गए. मैनेजर वाले कमरे में एक 23 वर्षीय सांवले रंग का दुबलापतला गंदलुम कपड़े पहने युवक बैठा मिला. सामने पुलिस को देख उस को पसीना छूट गया.

”अमर यादव तुम हो?’’ गुर्राते हुए इंसपेक्टर सिंह बोले.

”हां जी सर, मैं ही अमर यादव हूं.’’ बेहद सम्मानित तरीके से उस ने जवाब दिया था, ”बात क्या है, क्यों मुझे खोज रहे हैं.’’

”अभी पता चल जाएगा बेटा. राहुल और गुलशन कहां हैं? तुम ने कहां छिपा कर दोनों को रखा है? सीधे तरीके से बता दे वरना…’’

”बताता हूं सर, बताता हूं. दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं,’’ बिना किसी डर के वह आगे कहता गया, ”मैं ने अपने साथियों के साथ मिल कर दोनों को मौत के घाट उतार दिया है और मैं करता भी क्या. मेरे पास इस के अलावा कोई और रास्ता भी नहीं बचा था.

”राहुल मेरे प्यार को मुझ से छीनने की कोशिश कर रहा था, इसलिए मैं ने अपने रास्ते का कांटा सदा के लिए हटा दिया. यहीं नहीं जो जो भी मेरे प्यार के रास्ते का रोड़ा बनेगा, मैं उसे ऐसे ही मिटाता रहूंगा.’’ और फिर अमर ने पूरी पूरी घटना विस्तार से उन्हें बता दी.

इंसपेक्टर कुलवीर सिंह ने अमर यादव को गिरफ्तार कर लिया और उसी की निशानदेही पर 3 और आरोपियों अभिषेक राय, अनिकेत उर्फ गोलू और नाबालिग मनोज को शेषपुर से गिरफ्तार कर लिया. चारों को हिरासत में ले कर पुलिस ताजपुर रोड स्थित सेंट्रल जेल के पास बहने वाले कक्का धौला बुड्ढा नाला (भामियां) पास पहुंची, जहां आरोपियों ने हत्या कर राहुल और गुलशन की लाश कंबल में लपेट कर बोरे में भर कर फेंकी थीं.

थोड़ी मशक्कत के बाद राहुल और गुलशन गुप्ता की लाशें बरामद कर ली थीं. इस के बाद दोहरे हत्याकांड की घटना पल भर में समूचे लुधियाना में फैल गई थी. घटना से जिले में सनसनी फैल गई थी. लोगबाग कानूनव्यवस्था पर सवाल उठाने लगे थे.

खैर, इस घटना की सूचना मिलते ही पुलिस कमिश्नर मनदीप सिंह सिद्धू, डीसीपी (ग्रामीण) जसकिरनजीत सिंह तेजा, एडीसीपी (सिटी-2) सुहैल कासिम मीर और एसीपी (इंडस्ट्रियल एरिया-15) संदीप बधेरा मौके पर पहुंच गए थे.

खुशियां कैसे बदलीं मातम में

मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारियों ने लाशों का निरीक्षण किया. दोनों में से राहुल की लाश विकृत हो चुकी थी. हत्यारों ने धारदार हथियार से उस की गरदन पर हमला किया था. उसे इतनी बेरहमी से मारा था कि उस की बाईं आंख बाहर निकल गई थी. मौके पर मौजूद मृतक राहुल के पापा ने दिल पर पत्थर रख कर बेटे की पहचान कर ली थी. 4 महीने बाद उस की शादी होने वाली थी, उस से पहले ही वह दुनिया से विदा हो गया. घर में शादी की खुशियां मातम में बदल गई थीं. घर वालों का रोरो कर हाल बुरा हुए जा रहा था.

बहरहाल, पुलिस ने दोनों लाशों का पंचनामा तैयार कर उन्हें पोस्टमार्टम के लिए लुधियाना जिला अस्पताल भेज दिया और चारों आरोपियों को अदालत में पेश कर उन्हें जेल भेज दिया. आरोपियों से की गई कड़ी पूछताछ के बाद इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी पुलिस के सामने आई, वह मंगेतर के बीच मोहब्बत की जंग पर रची हुई थी. 25 वर्षीय राहुल सिंह मम्मीपापा का इकलौता था. वही मांबाप के आंखों का नूर था और उन के जीने का सहारा भी. वह जवान हो चुका था और एक प्राइवेट कंपनी में एचआर की नौकरी भी करता था. अच्छा खासा कमाता था.

चूंकि राहुल जवान भी हो चुका था और कमा भी रहा था, इसलिए पापा अशोक सिंह ने सोचा कि बेटे की शादी वादी हो जाए. घर में बहू आ जाएगी तो उस की मम्मी को भी सहारा हो जाएगा. यही सोच कर अशोक सिंह ने अपने जानपहचान और रिश्तेदारों के बीच में बेटे की शादी की बात चला दी थी कि कोई अच्छी और पढ़ीलिखी बहू मिले जो घरगृहस्थी संभाल सके.

जल्द ही राहुल के लिए कई रिश्ते आए. उन में से जमालपुर थाना क्षेत्र स्थित मुंडिया कलां के रहने वाले अजय सिंह की बेटी स्नेहा घर वालों को पसंद आ गई. खुद राहुल ने भी उसे पसंद किया था. स्नेहा पढ़ीलिखी और सुंदर थी. 2 बहनों और एक भाई में वह सब से बड़ी थी. राहुल और स्नेहा की शादी पक्की हो गई और फरवरी 2023 में दोनों की मंगनी भी हो गई और शादी फरवरी 2024 में होने की बात पक्की हुई.

इंस्टाग्राम के किस फोटो को ले कर हुई कलह

अपनी शादी तय होने से राहुल बहुत खुश था. अपने दिल का हर राज अपने खास दोस्तों गुलशन और सूरज के बीच शेयर करता था. मंगनी के दिन राहुल ने स्नेहा को देखा तो अपनी सुधबुध खो दी थी. वह थी ही इतनी सुंदर. उस की सुंदरता पर वह फिदा था. उस के बाद दोनों के बीच फोन पर अकसर दिल की बातें होती रहती थीं. वह अपने दिल की बात स्नेहा से करता और स्नेहा अपने दिल की बातें मंगेतर से करती. धीरेधीरे दोनों के बीच प्यार हो गया था और वे चाहते थे कि उन का मिलन जल्द से जल्द हो जाए.

लेकिन उन का मिलन होने में अभी 4 महीने बचे थे. जैसे तैसे वे अपने दिल पर काबू किए थे. वह जून-जुलाई, 2023 का महीना रहा होगा, जब राहुल के परिवार पर दुखों के बादल मंडराने लगे थे.

एक दिन की बात थी. इंस्टाग्राम पर गुलशन अपना अकाउंट देख रहा था. अचानक उस की एक नजर ठहर गई और 2 फोटो देख कर वह चौंक गया.फोटो में स्नेहा किसी अमर यादव के साथ गलबहियों में चिपकी पड़ी थी. फिर उस ने फोटो का स्क्रीनशौट ले कर सेव कर लिया और सूरज को दिखाया. फोटो देख कर वह हैरान था, ये तो राहुल की होने वाली पत्नी स्नेहा है. उस के पीठ पीछे क्या गुल खिलाया जा रहा है. दोनों ने राहुल से सारी बातें साफसाफ बता दीं.

फिर राहुल ने समझदारी का परिचय देते हुए इंस्टाग्राम पर स्नेहा का अकाउंट चैक किया तो बात सच साबित हो गई थी. इस के बाद उस ने स्नेहा से बात की. स्नेहा अपनी ओर से सफाई देती हुई बोली, ”आप ने जिस फोटो को देखा था, वो उस का अतीत था. कभी अमर नाम के लड़के से वह प्यार करती थी, लेकिन शादी पक्की होने के बाद से उस ने उस से अपनी ओर से रिश्ता तोड़ लिया है. वह अब अमर से नहीं मिलती. पुरानी बातों को मुद्दा बना कर वह उसे हर समय परेशान करता रहता है.’’

पूर्व प्रेमी और मंगेतर के बीच बढ़ता गया विवाद

राहुल को अपनी मंगेतर स्नेहा की बातों पर पूरा विश्वास हो गया था कि वह जो कह रही है, सच कह रही है. उस के बाद राहुल ने अमर यादव को सावधान करते हुए पोस्ट लिखा कि स्नेहा उस की होने वाली पत्नी है. आने वाले साल 2024 में हमारी शादी होनी है. तुम उस का पीछा करना छोड़ दो. उसे बदनाम न करो वरना इस का परिणाम बुरा हो सकता है.

इस पर अमर यादव ने भी पलट कर जवाब दिया था, ”स्नेहा उस का प्यार है. उसे वह टूट कर प्यार करता है. तेरे कारण उस ने उस से बात करनी बंद कर दी है और दूरदूर रहती है. मुझ से इस की जुदाई, उस की तन्हाई जीने नहीं देती. मेरे और मेरे प्यार के बीच में जो भी रोड़ा बनने की कोशिश करेगा, उसे हमेशा हमेशा के लिए मिटा दूंगा और तू भी समझ ले, अभी वक्त है हम दोनों के बीच से हट जा, उसी में तेरी भलाई है. नहीं तो मैं किस हद तक चला जाऊंगा, मुझे खुद भी नहीं पता.’’

उस दिन के बाद राहुल और अमर यादव के बीच स्नेहा को ले कर वर्चस्व की टेढ़ी लकीर खिंच गई थी. बारबार राहुल इंस्टाग्राम पर फोन कर के स्नेहा से दूर रहने को धमकाता था. वहीं अमर भी स्नेहा से दूर हट जाने को धमकाता था. राहुल ने अप्रत्यक्ष तौर पर अपने घर वालों को बता भी दिया था कि अमर यादव नाम का एक लड़का स्नेहा को बदनाम करने के एवज में उसे परेशान करता रहता है. घर वालों ने इस बात को हल्के में लिया और समझा दिया कि शादी हो जाने के बाद सब ठीक हो जाएगा. नाहक परेशान होने की जरूरत नहीं है. इस के बाद राहुल भी थोड़ा बेफिक्र हो गया था.

शादी के दिन जैसे जैसे नजदीक आ रहे थे, अमर को प्रेमिका स्नेहा से जुदाई के दिन साफ नजर आ रहे थे. यह सोच कर गुस्से से पागल हो जाता था कि उस के जीते जी कोई उस के प्यार को उड़ा ले जाए, ये कैसे हो सकता है. क्यों न रास्ते के कांटे को ही जड़ से ही उखाड़ दिया जाए. न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी.

जैसे ही उस के दिमाग में यह विचार आया, खुशी से उछल पड़ा. उस ने अपने दोस्तों को रायल गेस्टहाउस बुला लिया. यह गेस्टहाउस टिब्बा थाने के टिब्बा रोड पर स्थित था, गेस्टहाउस एक डीसीपी (पुलिस अधिकारी) का था, जो इन दिनों उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में तैनात है.

नौकर क्यों समझता था खुद को डीसीपी

अमर यादव मूलरूप से बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला था, लेकिन सालों से वह लुधियाना के शेषपुर मोहल्ले में किराए का मकान ले कर रहता था. उस के मांबाप घर रहते थे. उज्जवल भविष्य की कामना ले कर ही वह दरभंगा से लुधियाना चला था. पहले से वहां उस के कई परिचित रहते थे. उन्हीं के सहारे वह यहां रहने आया था. देखने में तो वह एकदम दुबलापतला मरियल जैसा लगता था, लेकिन था वह अपराधी प्रवृत्ति वाला. बातबात पर हर किसी से झगड़ जाना उस की आदत थी और अपराधियों और नशे का कारोबार करने वालों से उस की खूब बनती थी.

जिस दिन से डीसीपी के गेस्टहाउस पर काम करना शुरू किया था, खुद को ही अमर डीसीपी समझ बैठा. दूसरों पर डीसीपी जैसा रौब झाड़ता था और इसी गेस्टहाउस के तले नशे का कारोबार भी करता था. कुछ महीनों पहले भी यह गेस्टहाउस खासी चर्चा का विषय बना था. उस के दोस्तों में अभिषेक राय, अनिकेत ऊर्फ गोलू और मनोज खास थे. अमर जब भी कोई जुर्म करता था तो इन्हीं को अपना हमराज बनाता था. इन के मुंह बंद करने के लिए वह इन पर खर्च भी खूब करता था.

बहरहाल, राहुल को रास्ते से हटाने के लिए अमर ने अभिषेक राय, अनिकेत उर्फ गोलू और मनोज को 14 सितंबर, 2023 को रायल गेस्टहाउस बुलाया और चारों ने आपस में बैठ कर मीटिंग की कि राहुल की हत्या कैसे करनी है और फिर लाश को कैसे ठिकाने लगाना है.

सब कुछ तय हो जाने के बाद 15 सितंबर, 2023 को अमर ने बाजार से लोहे का दांत और रौड खरीद लाया और गेस्टहाउस के एक कमरे में छिपा दिए.

15 सितंबर, 2023 की शाम करीब 5 बजे अमर यादव ने राहुल को फोन किया और उसे मिलने के लिए रायल गेस्टहाउस बुलाया. इस पर राहुल ने कोई जवाब नहीं दिया और उस का फोन काट दिया था. इस के बाद उस ने 3 बार और उसे फोन कर के गेस्टहाउस बुलाया, लेकिन राहुल नहीं गया.

किस वजह से राहुल अपने दुश्मन के पास जाने को मजबूर हुआ

16 सितंबर की शाम को अमर यादव ने फिर से राहुल को फोन किया और बताया कि उस के पास स्नेहा के साथ आपत्तिजनक स्थिति का एक वीडियो है, जो उसे देना चाहता है. आ कर ले जा सकता है.

इस पर राहुल ने कहा, ”ठीक है, वह आज मिलने जरूर आएगा.’’

और फिर ड्यूटी से राहुल जल्दी छुट्टी ले कर घर पहुंच आया. ड्यूटी से निकलते हुए राहुल ने गुलशन को भी फोन कर दिया कि अमर ने फोन कर के बताया है कि स्नेहा की कोई खास वीडियो उस के पास है, आ कर ले जाए. मेरे दोस्त, वो वीडियो किसी तरह से हासिल करनी है तो तुम्हें मेरे साथ उस से मिलने टिब्बा रोड रायल गेस्टहाउस चलना होगा.

साढ़े 8 बजे गुलशन गुप्ता जब घर से अपनी बाइक ले कर निकला तो मम्मी को बता दिया था कि वह राहुल से मिलने उस के घर जा रहा है, थोड़ी देर बाद वह लौट आएगा. कौन जानता था इस के बाद वह कभी नहीं आएगा.थोड़ी देर बाद वह राहुल के सामने खड़ा था. दोनों ने चाय की चुस्की ली और अमर से मिलने टिब्बा रोड पहुंच गए. सनद रहे, गुलशन ने अपनी बाइक राहुल के घर खड़ी कर दी थी और राहुल अपनी एक्टिवा ले कर गया था. आधे घंटे बाद राहुल और गुलशन रायल गेस्टहाउस के बाहर खड़े थे. उस ने अपनी एक्टिवा गेस्टहाउस के बाहर खड़ी कर दी थी.

”अमर…अमर…’’ की आवाज लगाते हुए राहुल गेस्टहाउस के अंदर दाखिल हुआ तो गुलशन भी उसी के पीछे हो लिया था. 2 मिनट बाद एक लड़का बाहर निकला और राहुल के सामने खड़ा हो गया. उसे अपनी बातों में उलझा लिया. तब तक वहां अभिषेक राय और मनोज भी पहुंच गए और स्नेहा को ले कर राहुल से भिड़ गए.

अभी यह सब हो ही रहा था कि तभी अचानक अमर यादव लोहे का दांत लिए बाहर निकला और राहुल की गरदन पर जोरदार तरीके से वार किया. वहां कटे वृक्ष के समान हवा में लहराते हुए धड़ाम से फर्श पर जा गिरा. उस के बाद अभिषेक उसे लोहे की रौड से मारता गया.

राहुल को देख कर अमर गुस्से से इतना पागल हो गया था कि लोहे के दांत उस के बाईं आंख में घुसेड़ कर आंख बाहर निकाल दी थी. राहुल मर चुका था. उस के सिर से खून बह रहा था. यह देख गुलशन सन्न रह गया और वहां से भागने लगा लेकिन चारों ने उसे घेर लिया और उसे भी मार डाला. अमर यादव उसे नहीं मारना चाहता था. चूंकि पूरी घटना गुलशन की आंखों के सामने घटी थी और हत्या का वह एकमात्र चश्मदीद गवाह था, इसलिए अमर और उस के साथियों ने उसे भी उसी लोहे के दांत से मौत के घाट उतार दिया था.

इस के बाद चारों ने मिल कर राहुल और गुलशन की लाश कंबल में लपेट दीं. राहुल की ही एक्टिवा पर दोनों की लाश बारीबारी से सेंट्रल जेल के ताजपुर रोड स्थित कक्का धौला बुड्ढा नाले में फेंक आए. फिर गेस्टहाउस में फर्श पर फैले खून को पानी से धो कर सारे सबूत मिटा दिए और राहुल की एक्टिवा टिब्बा रोड कूड़ा डंप के पास खड़ी कर दी. स्विच औफ कर के उस के मोबाइल फोन को भी गाड़ी के बगल में गिरा दिया.

अमर वहीं गेस्टहाउस में ही रुका रहा जबकि अभिषेक राय, मनोज और अनिकेत उर्फ गोलू अपने घर शेषपुर निकल गए. घर जाते हुए तीनों ने गुलशन के मोबाइल को वर्धमान कालोनी में स्विच औफ कर के फेंक दिया था. इश्क की जंग में पागल प्रेमी अमर यादव इस कदर हैवान बन चुका था कि उसे स्नेहा के अलावा कुछ नहीं दिख रहा था जबकि स्नेहा ने उस से अपना संबंध तोड़ लिया था. वह एक नई जिंदगी बसाने का हसीन ख्वाब देख रही थी, लेकिन सुहागन बनने से पहले ही विधवा बन गई.

खैर, कथा लिखे जाने तक पुलिस चारों आरोपियों अमर यादव, अभिषेक राय, अनिकेत उर्फ गोलू और मनोज को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी थी और हत्या में प्रयुक्त लोहे की दांत, रौड, 2 मोबाइल फोन बरामद कर लिए थे. पुलिस ने अपहरण की धारा को 302, 201, 120बी व 34 आईपीसी में तरमीम कर दिया.

ASI रंजना ने पुलिस अफसरों पर दुष्कर्म का आरोप लगा कर वसूले लाखों

सामान्य दिनों की तरह शुक्रवार 24 जून, 2022 को इंदौर महानगर के पुलिस कमिश्नर के औफिस में चहलपहल बनी हुई थी. पुलिसकर्मी दोपहर बाद के अपने रुटीन वाले काम निपटाने में व्यस्त थे. साथ ही उन के द्वारा कुछ अचानक आए काम भी निपटाए जा रहे थे.दिन में करीब 3 बजे का समय रहा होगा.

वहीं पास में स्थित पुलिस आयुक्त परिसर में गोली चलने की आवाज आई. सभी पुलिसकर्मी चौंक गए. कुछ सेकेंड में ही एक और गोली चलने की आवाज सुन कर सभी दोबारा चौंके. अब वे अलर्ट हो गए थे और तुरंत उस ओर भागे, जिधर से गोलियां चलने की आवाज आई थी. पुलिस आयुक्त के कमरे के ठीक बाहर बरामदे का दृश्य देख कर सभी सन्न रह गए.

पुलिस कंट्रोल रूम में ही काम करने वाली एएसआई रंजना खांडे जमीन पर अचेत पड़ी थी. उस के सिर के नीचे से खून रिस रहा था. कुछ दूरी पर ही भोपाल श्यामला हिल्स थाने के टीआई हाकम सिंह पंवार भी अचेतावस्था में करवट लिए गिरे हुए थे.खून उन की कनपटी से तेजी से निकल रहा था. उन्हें देख कर कहा जा सकता था कि दोनों पर किसी ने गोली चलाई होगी. किंतु वहां किसी तीसरे के होने का जरा भी अंदाजा नहीं था. हां, टीआई के पैरों के पास उन की सर्विस रिवौल्वर जरूर पड़ी थी.

एक महिला सिपाही ने रंजना खांडे के शरीर को झकझोरा. वह उठ कर बैठ गई. उसे गोली छूती हुई निकल गई थी. वह जख्मी थी. उस की गरदन के बगल से खून रिस रहा था. उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया. जबकि टीआई के शरीर को झकझोरने पर उस में कोई हरकत नहीं हुई. उन की सांसें बंद हो चुकी थीं.

रंजना के साथ टीआई को भी अस्पताल ले जाया गया.गोली चलने की इस वारदात की सूचना पुलिस कमिश्नर हरिनारायण चारी मिश्र को भी मिल गई. वह भी भागेभागे घटनास्थल पर पहुंच गए. तब तक की हुई जांच के मुताबिक टीआई हाकम सिंह के गोली मार कर खुदकुशी करने की बात चर्चा में आ चुकी थी. सभी को यह पता था कि यह प्रेम प्रसंग का मामला है. मरने से पहले टीआई ने ही एएसआई रंजना खांडे पर गोली चलाई थी.

इस के बाद अपनी कनपटी पर रिवौल्वर सटा कर गोली मार ली थी. रंजना खांडे की गरदन को छूती हुई गोली निकल गई थी. गरदन पर खरोंच भर लगी थी, किंतु वह वहीं धड़ाम से गिर पड़ी थी. रंजना के गिरने पर टीआई ने उसे मरा समझ लिया था. परंतु ऐसा हुआ नहीं था. पुलिस जांच में यह बात भी सामने आई कि रंजना ने टीआई पंवार पर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था. जबकि पंवार रंजना पर ब्लैकमेल करने का आरोप लगा चुके थे.

रंजना टीआई को कर रही थी ब्लैकमेल,रंजना और टीआई पंवार के बीच गंभीर विवाद की यही मूल वजह थी. इसे दोनों जल्द से जल्द निपटा लेना चाहते थे. इस सिलसिले में उन की कई बैठकें हो चुकी थीं, लेकिन बात नहीं बन पाई थी.टीआई पंवार तनाव में चल रहे थे. इस कारण 21 जून को बीमारी का हवाला दे कर छुट्टी पर इंदौर चले गए थे. उन्हें घटना के दिन रंजना ने 24 जून को मामला निपटाने के लिए दिन में डेढ़ बजे कौफीहाउस बुलाया था.

जबकि रंजना खुद अपने भाई कमलेश खांडे के साथ 10 मिनट देरी से पहुंची थी. उन के बीच काफी समय तक बातचीत होती रही. उसे बातचीत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे एकदूसरे से बहस कर रहे थे, जो आधे घंटे बीत जाने के बाद भी खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी. बगैर किसी नतीजे पर पहुंचे दोनों सवा 2 बजे कौफीहाउस से बाहर निकल आए थे.

पुलिस कमिश्नर औफिस के पास रीगल थिएटर है. उसी के सामने कौफीहाउस बना हुआ है. यह केवल पुलिस वालों के लिए ही है. बाहर निकलने पर भी दोनों में बहस होती रही. बताते हैं कि वे काफी तैश में थे. बहस करीब 40 मिनट तक चलती रही. इसी सिलसिले में यह भी बात सामने आई कि रंजना टीआई को ब्लैकमेल कर 50 लाख रुपए वसूल चुकी थी. वह उस का इकलौता शिकार नहीं थे, बल्कि पहले भी 3 पुलिसकर्मियों पर दुष्कर्म का आरोप लगा कर उन से लाखों रुपए वसूल चुकी थी. रंजना खांडे मूलरूप से खरगोन के धामनोद की रहने वाली थी.

उस के बाद ही करीब 3 बजे पुलिस कमिश्नर के औफिस के बाहर गोलियां चली थीं. टीआई पंवार इस वारदात को ले कर घर से ही पूरा मन बना कर आए थे. यहां तक कि वह अपनी पत्नी तक से आक्रोश जता चुके थे. उन्होंने कहा था कि गोविंद जायसवाल से पैसे ले कर ही लौटेंगे. कपड़ा व्यापारी गोविंद को उन्होंने 25 लाख रुपए दिए थे, जो लौटाने में आनाकानी कर रहा था. उन्होंने पत्नी लीलावती उर्फ वंदना से यह भी कहा था कि यदि उस ने पैसे नहीं दिए तो वह उसे मार डालेंगे. बात नहीं बनी तो अपनी जान भी दांव पर लगा देंगे.

58 साल के हाकम सिंह पंवार की नियुक्ति इसी साल 6 फरवरी को भोपाल के श्यामला हिल्स थाने में हुई थी. इस से पहले वह गौतमपुर, खुडेल, सर्राफा थाना, इंदौर कोतवाली, खरगोन, भिकमगांव महेश्वर, राजगढ़ में पदस्थापित रह चुके थे.उन का निवास स्थान वटलापुर इलाके में था. वहां उन्होंने एक फ्लैट किराए पर ले रखा था, लेकिन रहने वाले मूलत: उज्जैन जिले के तराना कस्बे के थे. वह भोपाल में अकेले रहते थे. मध्य प्रदेश पुलिस में वह सन 1988 में कांस्टेबल के पद पर भरती हुए थे. बताया जाता है कि उन्होंने 5 शादियां कर रखी थीं.

पहली शादी उन्होंने लीलावती उर्फ वंदना से की थी. बताया जाता है कि दूसरी शादी उन्होंने सीहोर की रहने वाली सरस्वती से की. गौतमपुरा में पोस्टिंग के दौरान उन की मुलाकात रेशमा उर्फ जागृति से हुई जो मूलरूप से इंदौर की पुरामत कालोनी की रहने वाली थी. वह उन की तीसरी पत्नी बनी. मजीद शेख की बेटी रेशमा ने टीआई हाकिमसिंह पंवार पर अपना इस तरह प्रभाव जमा लिया था कि वह उनसे जब चाहे तब पैसे ऐंठती रहती थी. चौथी प्रेमिका के रूप में रंजना खांडे उन के जीवन में आई. हाकमसिंह की सर्विस बुक में लता पंवार का नाम है. चर्चा यह भी है कि भोपाल में तैनाती के दौरान उन्होंने माया नाम की महिला से शादी की थी. पुलिस इन सब की जांच कर रही है.

रंजना 3 पुलिस वालों से ऐंठ चुकी थी ,70 लाख रुपए जांच में पता चला कि सन 2012 में मध्य प्रदेश पुलिस में भरती हुई रंजना धार जिले के कस्बा धामनोद की रहने वाली थी और मौजूदा समय में इंदौर की सिलिकान सिटी में रह रही थी. उस की पंवार से अकसर मुलाकात महेश्वर थाने में होती थी. वह महेश्वर थाने पर पंवार से मिलने के लिए 12 किलोमीटर की दूरी तय कर आती थी. रंजना के साथ उसका भाई कमलेश खांडे भी पंवार से मिलता रहता था.

रजंना और कमलेश ने मिल कर ब्लैकमेलिंग का तानाबाना बुना था. 28 वर्षीय कमलेश रंजना का भाई था. उस के बारे में मालूम हुआ कि वह एक आवारा किस्म का व्यक्ति था. 3 पुलिसकर्मियों को ब्लैकमेल करने में उस की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी. तीनों से दोनों बहनभाई ने करीब 70 लाख रुपए की वसूली की थी. उन का तरीका एक औरत के लिए शर्मसार करने वाला था, लेकिन रंजना को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता था. वह पैसे की इस कदर भूखी थी कि उस ने अपनी इज्जत, शर्म और मानमर्यादा को ताक पर रख दिया था.

एएसआई रंजना की दिलफेंक अदाओं पर पंवार तभी फिदा हो गए थे, जब वह पहली बार महेश्वर थाने में मिली थी. दरअसल, रंजना 2018 में थाने के काम से महेश्वर आई थी, वहां उस की मुलाकात टीआई पंवार से हुई थी.पंवार ने उस की मदद की थी, जिस से रंजना ने उसे साथ कौफी पीने का औफर दे दिया था. पंवार उस के औफर को ठुकरा नहीं पाए थे. उन के बीच दोस्ती की पहली शुरुआत कौफी टेबल पर हुई, जो जल्द ही गहरी हो गई.

साथ में पैग छलका कर टीआई से बनाए थे शारीरिक संबंध फिर एक दिन अपने भाई के साथ पंवार के कमरे पर आ धमकी. उस ने बताया कि उस के भाई का बिजनैस में किसी के साथ झगड़ा हो गया है. मामला उन्हीं के थाने का है. वह चाहें तो मामले को निपटा सकते हैं. इस संबंध में पंवार ने रंजना को मदद करने का वादा किया. इस खुशी में रंजना ने उन्हें एक छोटी सी पार्टी देने का औफर दिया और भाई से शराब की बोतलें मंगवा लीं. कमलेश विदेशी शराब की बोतलें और खाने का सामान रख कर चला गया.

पंवार के सामने शराब और शबाब दोनों थे. वह उस रोज बेहद खुश थे. उन की खुशी को बढ़ाने में रंजना ने भी खुले मन से साथ दिया था. देर रात तक शराब का दौर पैग दर पैग चलता रहा. इस दरम्यान रंजना ने टीआई हाकम सिंह पंवार के लिए न केवल अपने दिल के दरवाजे खोल दिए, बल्कि पंवार के सामने कपडे़ खोलने से भी परहेज नहीं किया.

बैडरूम में शराब की गंध के साथ दोनों के शरीर की गंध कब घुलमिल गई, उन्हें इस का पता ही नहीं चला. बिस्तर पर अधनंगे लेटे हुए जब उन की सुबह में नींद खुली, तब उन्होंने एकदूसरे को प्यार भरी निगाह से देखा. आंखों- आखों में बात हुई और एकदूसरे को चूम लिया. कुछ दिनों बाद रंजना पंवार से मिलने एक बार फिर अपने भाई के साथ आई. उस ने पंवार को धन्यवाद दिया और कहा कि उस की बदौलत ही उस का मामला निपट पाया. इसी के साथ रंजना ने एक दूसरी घरेलू समस्या भी बता दी. वह समस्या नहीं, बल्कि पैसे से मदद करने की थी.

रंजना ने बताया कि उस के परिवार को तत्काल 5 लाख रुपए की जरूरत है. पंवार पहले तो इस बड़ी रकम को ले कर सोच में पड़ गए, किंतु जब उस ने शराब की बोतल दिखाई तब वह पैसे देने के लिए राजी हो गए. टीआई पंवार ने उसी रोज कुछ पैसे अपने घर से मंगवाए और कुछ दोस्तों से ले कर रंजना को दे दिए. बदले में रंजना को पहले की तरह ही रात रंगीन करने में जरा भी हिचक नहीं हुई. इस तरह पंवार को रंजना से जहां यौनसुख मिलने लगा, वहीं रंजना के लिए पंवार सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन चुके थे. धीरेधीरे रंजना उन से लगातार पैसे की मांग करने लगी. पंवार भी उस की पूर्ति करते रहे. लेकिन आए दिन की जाने वाली इन मांगों से पंवार काफी तंग आ चुके थे.

हद तो तब हो गई जब रंजना ने एक बार पूरे 25 लाख रुपए की मांग कर दी. उस ने न केवल रुपए मांगे, बल्कि भाई के लिए एक कार तक मांग ली. इस मांग के बाद पंवार का पारा बढ़ गया. वह गुस्से में आ गए. फोन पर ही धमकी दे डाली. किंतु रंजना ने बड़ी शालीनता से उन की धमकी का जवाब एक वीडियो क्लिपिंग के साथ दे दिया.

टीआई की रखैल रेशमा भी करने लगी ब्लैकमेल रंजना ने कुछ मिनट की एक वीडियो क्लिपिंग उन्हें वाट्सऐप कर दी. उसे देखते ही पंवार का दिमाग सुन्न हो गया. तभी रंजना के भाई ने फोन कर धमकी दी कि उस तरह के कई वीडियो उस के पास हैं. उन्होंने अगर जरा सी भी होशियारी दिखाई और पैसे नहीं दिए, तब वह सीधा बहन के साथ बलात्कार का आरोप लगा देगा. उस के बाद की पूरी प्रक्रिया क्या हो सकती है, उसे वह अच्छी तरह जानता है.

बाद में रेशमा उर्फ जागृति भी रंजना से मिल गई. फिर इन्होंने मिल कर टीआई पंवार को मानसिक रूप से प्रताडि़त करना शुरू कर दिया. इस की पुष्टि पंवार के मोबाइल नंबर की साइबर फोरैंसिक जांच से हुई.इस बारे में पंवार के घर वालों ने भी पुलिस से शिकायत की थी. पूछताछ में पंवार की पत्नी लीलावती, भाई रामगोपाल, भतीजा भूपेंद्र पंवार, मुकेश पंवार और पिता भंवरसिंह पंवार ने फोन पर धमकी मिलने की बात बताई.

उन्होंने बताया कि हाकम सिंह से रंजना ही नहीं, बल्कि उस की बहन और भाई भी पैसे की मांग करते थे. पैसे नहीं देने पर बलात्कार के झूठे मुकदमे में फंसा देने की धमकी भी देते थे.पंवार की मौत गोली मार कर आत्महत्या किए जाने की पुष्टि के बाद पुलिस की जांच में 4 लोगों के खिलाफ प्रताडि़त करने की एफआईआर दर्ज की गई. उन 4 लोगों में मुख्य आरोपी रंजना खांडे, रेशमा उर्फ जागृति, कमलेश और गोविंद जायसवाल का नाम था.

एफआईआर में उन्होंने झूठी रिपोर्ट दर्ज करवा कर जेल भेजने की धमकी देने और पैसा मांगने की बात कही गई थी. जांच में पाया गया कि 31 मार्च से 24 जून, 2022 के बीच मृतक के मोबाइल पर रेशमा उर्फ जागृति ने फोन कर के धमकियां दी थीं. ये धमकियां पूरी तरह से ब्लैकमेल करने और मानसिक प्रताड़ना की थीं. टीआई पंवार ने अपने मोबाइल में इन की रिकौर्डिंग कर रखी थी. मोबाइल पर मिली कुल 7 धमकियां तिथिवार रिकौर्ड थीं.

धमकी देने वाले आरोपियों में रेशमा ने पंवार से मकान के लिए पैसे और रजिस्ट्री के लिए प्रताडि़त किया था. ऐसा नहीं करने पर बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज कराने और अश्लील फोटो वायरल करने की धमकी दी थी. ऐसे ही रंजना और उस के भाई कमलेश 25 लाख रुपए और गाड़ी की मांग कर रहे थे. रंजना ने टीआई पंवार से कहा था कि उन्होंने कपड़ा व्यापारी गोविंद जायसवाल को रखने के लिए जो 25 लाख रुपए दिए थे, वह उस से मांग कर दें. दूसरी तरफ गोविंद जायसवाल पैसा वापस नहीं कर रहा था. वह टालमटोल कर रहा था.

पंवार को रेशमा ने 24 जून को गोविंद से पैसा लाने का दबाव बनाया था. उसी समय रंजना और कमलेश भी पैसा और गाड़ी के लिए पंवार को इंदौर में इंडियन कैफे हाउस के सामने बुलाया था. इस तरह से पंवार दोतरफा मानसिक तनाव में आ चुके थे.मुख्यालय के प्रांगण में ही बहा खून

टीआई पंवार को गोविंद से पैसे ले कर अश्लील वीडियो के वायरल होने से रोकने के लिए रंजना, रेशमा और कमलेश को देने थे. पंवार ने कमलेश और रंजना से इंडियन कौफीहाउस में बातचीत के दौरान गोविंद से मोबाइल पर काल कर अपने रुपए मांगे थे. उन्होंने बातचीत में खुद को बहुत परेशान बताया था और अनर्थ होने तक की बात कही थी. इसी क्रम में रेशमा काल कर पंवार को मोबाइल पर धमकियां देती रही. उस ने फोन पर यहां तक कह दिया था कि जो पैसा और चैक नहीं दे रहा है, उसे मार कर खुद मर जाए.

यह बात पंवार के दिमाग में बैठ गई. और फिर उन्होंने जो निर्णय लिया वह उन्हें खतरनाक राह पर ले गया. रेशमा, रंजना, कमलेश और गोविंद जायसवाल की एक साथ मिली प्रताड़नाओं से पंवार टूट गए.

करीब 50 मिनट तक वह मानसिक उत्पीड़न से जूझते रहे. एक समय आया जब उन्होंने मानसिक संतुलन खो दिया और अपनी सर्विस रिवौल्वर हाथ में पकड़ ली. कौफीहाउस से निकलने के बाद बरामदे में उन्होंने रंजना के हाथ से उस का मोबाइल छीनने की कोशिश की, क्योंकि उसी में अश्लील वीडियो थीं. मोबाइल रंजना के हाथ से नीचे गिर गया, जिसे रंजना ने तुरंत उठा लिया.

तभी उन्होंने रिवौल्वर रंजना खांडे पर तान दी. जब तक रंजना कुछ कहतीसुनती, तब तक रिवौल्वर से गोली निकल चुकी थी. गोली चलते ही रंजना वहीं जमीन गिर पड़ी थी. पंवार ने तुरंत रिवौल्वर को अपनी कनपटी से सटाया और दूसरी गोली चला दी. इस तरह हत्या और आत्महत्या की इस वारदात में हत्या तो नहीं हो पाई लेकिन आत्महत्या जरूर हो गई.

इस मामले की जांच पूरी होने के बाद रेशमा, रंजना खांडे, कमलेश खांडे, कपड़ा व्यापारी गोविंद जायसवाल को भादंवि की धारा 384, 385, 306 के तहत अजाक थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद एडिशनल पुलिस कमिश्नर राजेश हिंगणकर ने एएसआई रंजना खांडे को निलंबित कर दिया. आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम ने उन के ठिकानों पर दबिश डाली, लेकिन वह वहां से फरार मिले. मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने महाकाल मंदिर क्षेत्र में बसस्टैंड के पास से उसे गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में रंजना ने टीआई पंवार से अपने अवैध संबंधों की बात कुबूली. उस ने बताया कि उन्हीं संबंधों की वीडियो से ब्लैकमेल कर वह टीआई से क्रेटा कार मांग रही थी.इस के बाद पुलिस ने टीआई की पत्नी का दावा करने वाली रेशमा को भी गिरफ्तार कर लिया.

वारदात के करीब 2 हफ्ते बाद रंजना के भाई कमलेश की आग से झुलस कर मौत हो गई. दरअसल, कमलेश धामोद स्थित अपने घर पर दालबाटी बना रहा था. उस समय उपले गीले होने की वजह से जल नहीं पा रहे थे. उन्हें जलाने के लिए कमलेश ने जैसे ही पैट्रोल डाला, तभी उस के कपड़ों में आग लग गई. घर में आग से वह काफी देर तक छटपटाता रहा. घर वालों ने किसी तरह उस की आग बुझाई और उसे इलाज के लिए धार अस्पताल ले गए. हालत गंभीर होने की वजह से उसे एमवाई अस्पताल रैफर कर दिया. जहां इलाज के दौरान उस की मौत हो गई.

इंदौर के हनुमान मंदिर के पास एलआईजी सोसायटी में रहने वाला व्यापारी गोविंद जायसवाल कथा लिखने तक गिरफ्तार नहीं हो सका था. पुलिस ने आरोपी रंजना खांडे और रेशमा उर्फ जागृति से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

ठगी का नया मामला : 11 हजार जमा करो और हर महीने 4 हजार पाओ

इंसान की एक सब से बड़ी कमजोरी होती है लालच. कुछ लोग इंसान की इसी कमजोरी का फायदा उठा कर उस की गाढ़ी कमाई इस तरह लूट लेते हैं कि उसे अपने लुटने का पता तब चलता है, जब वह स्वयं अपने हाथों से उसे अपना सब कुछ सौंप चुका होता है. दिल्ली के पीतमपुरा के रहने वाले रामवीर शर्मा की आटोपार्ट्स बनाने की फैक्ट्री थी. विभिन्न आटो कंपनियों के और्डर पर वह आटोपार्ट्स बना कर सप्लाई करते थे. काम अच्छा चल रहा था, इसलिए उन्हें किसी तरह की कोई चिंता नहीं थी. सन 1988 से उन की यह फैक्ट्री मध्य दिल्ली के झंडेवालान में चल रही थी.

काम बढ़ने लगा तो उन्होंने और मशीनें लगाने की सोची. लेकिन फैक्ट्री की जो जगह थी, उस में और मशीनें नहीं लग सकती थीं. वह फैक्ट्री लगाने के लिए जगह की तलाश करने लगे. उन्हें हरियाणा के राई में एक बढि़या प्लौट मिल गया तो उसे खरीद कर उन्होंने झंडेवालान वाली फैक्ट्री को वहीं शिफ्ट कर दिया. अब फैक्ट्री में पहले से ज्यादा मशीनें लग गई थीं, इसलिए पहले से ज्यादा काम भी हो गया और आमदनी भी बढ़ गई. चूंकि वह और्डर का माल समय से पहले तैयार करा कर पहुंचा देते थे, इसलिए इस क्षेत्र में उन की अच्छीखासी साख बनी थी. इसी का नतीजा था कि उन्हें जरमन की एक आटो कंपनी का और्डर मिल गया. विदेशी कौन्ट्रैक्ट मिलने के बाद वह फूले नहीं समा रहे थे, क्योंकि पार्ट्स तैयार करने के लिए उन्हें अच्छे पैसे मिल रहे थे.

वह विदेशी आटो कंपनी के पार्ट्स तैयार कराने लगे. उस विदेशी कंपनी के साथ कुछ दिनों तो उन का तालमेल ठीक चला, लेकिन सन 2006-07 के दौरान उन्हें गर्दिश ने ऐसा घेरा कि वह उबर न सके. दरअसल वह जिस जरमन कंपनी के लिए आटोपार्ट्स तैयार करा रहे थे, किसी वजह से उस कंपनी ने तैयार माल लेने से मना कर दिया. उस माल को तैयार कराने में वह मोटी रकम खर्च कर चुके थे. जिस की वजह से उन्हें मोटा घाटा उठाना पड़ा. इंडिया की जिस आटो कंपनी के पार्ट्स वह तैयार करते थे, वह काम जरमन कंपनी से कौन्ट्रैक्ट होने के बाद उन्होंने बंद कर दिया था. काफी कोशिशों के बाद भी उन्हें इंडिया की भी किसी कंपनी से कोई और्डर नहीं मिल रहा था.

उन की आमदनी बंद हो चुकी थी, जबकि फैक्ट्री के कर्मचारियों के वेतन से ले कर अन्य मदों पर होने वाले खर्च जारी थे. इस के अलावा रामवीर शर्मा के अपने और घर के खर्च भी थे. वह सोचसोच कर परेशान हो रहे थे कि फैक्ट्री फिर से कैसे चले. एक समय ऐसा आया कि रामवीर शर्मा को फैक्ट्री बंद करनी पड़ गई. फैक्ट्री बंद होने के बाद वह कोई दूसरा काम करने की कोशिश करने लगे. उसी बीच उन की मुलाकात अनिल खत्री से हुई, जो पीतमपुरा के ही डी ब्लौक में रहता था. अनिल खत्री ने उन्हें स्पीक एशिया नाम की कंपनी के बारे में बताया. उस ने बताया कि स्पीक एशिया एक कंपनी है, जिस में 11 हजार रुपए जमा करने 4 हजार रुपए हर महीने एक साल तक मिलते रहेंगे.

11 हजार लगा कर एक साल तक 4 हजार रुपए महीने यानी साल भर में करीब 50 हजार रुपए कमाने की बात सुन कर रामवीर के कान खड़े हो गए. उन्हें स्कीम के बारे में जानने की उत्सुकता हुई. उन्होंने अनिल खत्री से इस स्कीम के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘स्पीक एशिया एक औनलाइन कंपनी है. इस में 11 हजार रुपए जमा करने पर कंपनी एक लौग इन आईडी और पासवर्ड देती है. उस आईडी पर कंपनी हर सप्ताह एक सर्वे भेजती है. वह सर्वे औनलाइन ही 5 मिनट में भर जाता है. सर्वे पूरा होने पर कंपनी एक हजार रुपए आप के एकाउंट में भेज देगी. इस तरह कंपनी एक साल में 52 सर्वे भेजेगी, जिन्हें भरने पर 52 हजार रुपए मिलेंगे.’’

इस इनकम के बारे में सुन कर रामवीर शर्मा को लालच आ गया. इतनी इनकम तो उन्हें अपनी आटोपार्ट्स की फैक्ट्री से भी नहीं होती थी. उन्हें स्कीम तो अच्छी लगी, लेकिन उन के मन में एक दुविधा थी कि पता नहीं जो इनकम अनिल बता रहे हैं, वह आती भी है या नहीं? उन्होंने अपनी संशय अनिल खत्री से बताई तो उस ने अपनी बैंक की पासबुक और स्टेटमेंट दिखाते हुए कहा, ‘‘शर्माजी, यहां कुछ भी गलत नहीं है. सब कुछ औनलाइन है. आप खुद ही देख लीजिए कि मैं अब तक इस कंपनी से कितना कमा चुका हूं.’’

वास्तव में अनिल खत्री के एकाउंट में सिंगापुर की एक बैंक से लाखों रुपए भेजने का रिकौर्ड था. बैंक पासबुक देखने के बाद रामवीर शर्मा को विश्वास हो गया कि कंपनी सर्वे के पैसे भेजती है. रामवीर शर्मा की बौडी लैंग्वेज देख कर अनिल खत्री ने कहा, ‘‘शर्माजी सोचनाविचारना बंद करो और जल्द ही काम चालू कर दो. आप अपनी क्षमता के मुताबिक जितनी आईडी चाहो, ले सकते हो. जितनी आईडी लोगे, उतना ज्यादा कमाओगे. सर्वे की एक दूसरी इनकम भी है, वह है जौइनिंग की. अपनी आईडी के नीचे तुम जितने नए लोगों को जोड़ोगे, हजार रुपए प्रति जौइनिंग मिलेगा.’’

रामवीर शर्मा अनिल खत्री को पहले से जानते ही थे, इसलिए उन्हें उस की बातों पर भरोसा हो गया. उन्होंने अनिल के माध्यम से 33 हजार रुपए जमा करा दिए. पैसे जमा करने के बाद रामवीर शर्मा को 3 लौग इन आईडी और पासवर्ड मिल गए. फिर उन की आईडी पर भी सर्वे आने शुरू हो गए. वह जल्दी से सर्वे भर कर खुश होते कि 11 हफ्ते में उन के द्वारा जमा कराए गए पैसे वापस आ जाएंगे. उस के बाद उन की कमाई ही कमाई है. रामवीर शर्मा के एकाउंट में सर्वे के पैसे आने लगे तो उन्हें तसल्ली हो गई. अनिल खत्री के कहने पर उन्होंने कई और आईडी ले लीं. अनिल खत्री उन्हें कंपनी की ओर से आयोजित किए जाने वाले सेमिनारों में भी ले जाने लगा. वहां पर वह उन की बड़ेबड़े लीडरों से मुलाकात भी कराता.

सन 2011 में कंपनी ने गोवा में एक सेमिनार का आयोजन किया. उस सेमिनार में हिंदुस्तान की तमाम बड़ी प्रोडक्ट बेस कंपनियों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया. उस सेमिनार के बाद कंपनी से जुड़े पेनलिस्टों में उत्साह भर गया. इस के बाद कंपनी की ओर से दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में एक बड़े सेमिनार का आयोजन किया गया. उस सेमिनार में कंपनी के शीर्ष लीडर मनोज कुमार शर्मा, रामनिवास पाल, रामसुमिरन पाल आदि आए. उन्होंने सेमिनार में आए लोगों को कंपनी की उन्नति और खुशहाली के बारे में बताया. चूंकि अनिल खत्री की गिनती दिल्ली में कंपनी के सीनियर लीडर के रूप में होती थी, इसलिए सेमिनार में आए अधिकांश लीडर उसे व्यक्तिगत रूप से जानते थे. वह सेमिनार इतना बड़ा था कि वहां पेनलिस्टों के बैठने के लिए सीटें भी कम पड़ गई थीं. इस सेमिनार से पेनलिस्टों में और जोश भर गया था.

अनिल खत्री रामवीर शर्मा की हैसियत के बारे में अच्छी तरह से जानता था, इसलिए सेमिनार खत्म होने के बाद उस ने रामवीर शर्मा की मुलाकात मनोज कुमार शर्मा, रामनिवास पाल और रामसुमिरन पाल से कराई. इन सभी लीडरों ने उन्हें और ज्यादा पैसे लगा कर और ज्यादा कमाने को कहा. पहले से ली गई आईडी पर रामवीर शर्मा के पैसे आ ही रहे थे, इसलिए उन की बातों में फंस कर उन्हें भी लालच आ गया और सोचा कि अगर वह मोटी रकम लगा देते हैं तो आमदनी और ज्यादा हो सकती है. रामवीर शर्मा ने अपनी सारी जमापूंजी, पत्नी के गहने बेच कर और अपने जानकारों से पैसे उधार ले कर करीब 25 लाख रुपए इकट्ठा कर के स्पीक एशिया कंपनी में लगा दिए. इतनी बड़ी रकम लगाने के बाद उन की आमदनी भी मोटी होने लगी.

तभी अचानक उन्हें मीडिया द्वारा जानकारी मिली कि स्पीक एशिया कंपनी लोगों का पैसा ले कर भाग गई है. यह सुनते ही वह सन्न रह गए. उन के अलावा जिन लोगों ने इस कंपनी में मोटी रकम लगाई थी, यह खबर सुन कर वे भी परेशान हो गए. सभी अपनेअपने सीनियर्स को फोन कर के मामले की सच्चाई जानने लगे. रामवीर शर्मा ने भी इस बारे में अनिल खत्री से बात की तो उस ने कहा कि ये सब विरोधियों द्वारा फैलाई जा रही अफवाहें हैं. इन पर ध्यान मत दो और अपना काम करते रहो. रामवीर शर्मा को अनिल खत्री ने समझा तो दिया, लेकिन उन के मन में संशय बना रहा. उन्हें अनिल की बात पर विश्वास नहीं हुआ. वह सर्वे भरते रहे, लेकिन वह तब हैरान रह गए, जब 18 मई, 2011 से सर्वे के पैसे उन के खाते में आने बंद हो गए.

उन्होंने अनिल खत्री से फिर संपर्क किया. उस ने एक बार फिर उन्हें समझाया कि कंपनी की वेबसाइट पर कुछ काम चल रहा है, जिस की वजह से यह प्रौब्लम आ रही है. उस ने कहा कि इतनी बड़ी कंपनी है और उस से लाखों लोग जुड़े हैं, इस तरह कंपनी एकदम से थोड़े ही बंद हो जाएगी. अब तक मीडिया से स्पीक एशिया द्वारा लोगों को ठगे जाने की खबरें लगातार आने लगी थीं. जून, 2011 में मुंबई की आर्थिक अपराध शाखा और पाईघुनी थाने में कंपनी के संचालकों, अधिकारियों, लीडरों आदि के खिलाफ भांदंवि की धारा 406/34/120 बी के अलावा प्राइज चिट्स एंड मनी सर्कुलेशन स्कीम (बैनिंग) एक्ट-1978 के सैक्शन 3, 4, 5, 6 के तहत मामला दर्ज हुआ तो कंपनी से जुड़े पेनलिस्टों में खलबली मच गई.

सब से ज्यादा वे पेनलिस्ट परेशान होने लगे, जिन्होंने कंपनी ने मोटी रकम लगा रखी थी और उन की वह रकम लौटी नहीं थी. रामवीर शर्मा अनिल खत्री के यहां पहुंचे तो उस ने बातें बना कर उन्हें टाल दिया. इस के बाद तो कंपनी के खिलाफ मुंबई, हैदराबाद, छत्तीसगढ़, रायगढ़, लखनऊ, गाजियाबाद, जैसे तमाम शहरों के अनेक थानों में कंपनी के संचालकों, अधिकारियों, लीडरों आदि के खिलाफ मामले दर्ज होने लगे. इस के बाद तो पुलिस स्पीक एशिया से जुड़े बड़े अधिकारियों, एजेंटों आदि की सरगर्मी से तलाश करने लगी. मुंबई में इस मामले की जांच आर्थिक अपराध शाखा कर रही थी तो छत्तीसगढ़ में स्पेशल इनवैस्टीगैशन सेल अभियुक्तों की तलाश में थी.

आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई और स्पीक एशिया के बड़े लीडर रवि जनकराज खन्ना, शेख रईस लतीफ, राजीव मनमोहन मल्होत्रा, राहुल पन्नालाल शाह गिरफ्तार कर लिए गए. इन सभी से पूछताछ के बाद पुलिस ने स्पीक एशिया के सीईओ (इंडिया) तारक विमलेंदु वाजपेई को गिरफ्तार किया. इस के बाद तो मुंबई में स्पीक एशिया के फ्रेंचाइजी दीपांकर दुलालचंद सरकार, मेलविन रोनाल्ड क्रेस्टो, सौरभ सिंह, सुरेश बी. पधि, तबरेज लतीफ अंसारी, सईद अहमद माजगोंकर भी पुलिस गिरफ्त में आ गए. स्पीक एशिया के चार्टर्ड एकाउंटेंट और वित्त सलाहकार संजीव एस. डनडोना, कंपनी के वेब डिजाइनर और कौन्टेंट राइटर नयन कांतिलाल खंदोर, गुजरात और महाराष्ट्र के रीजनल मैनेजर आशीष विजय डंडेकर एवं अभिषेक एस. कुलश्रेष्ठ भी पुलिस से बच न सके.

पुलिस ने कंपनी के 200 से अधिक बैंक खाते सीज करा दिए थे, जिन में करीब 142 करोड़ रुपए जमा थे. इस के अलावा यूएई के भी कई बैंकों में कंपनी के खाते होने की जानकारी मिली. पुलिस को यह भी पता चला कि स्पीक एशिया कंपनी से जुड़े वांछित लोग विदेश भागने की फिराक में हैं, इसलिए उन के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी करा दी. पुलिस को जांच में पता चला चुका था कि स्पीक एशिया कंपनी ने 24 लाख लोगों को झांसा दे कर 2276 करोड़ रुपए कमाए हैं. इस कंपनी की ग्लोबल सीईओ हरेंदर कौर सिंगापुर में बैठ कर काम को अंजाम दे रही थी. भारत में कंपनी के मुख्य कर्ताधर्ता मनोज कुमार शर्मा, रामनिवास पाल और रामसुमिरन पाल थे. ये सभी फरार चल रहे थे.

मुंबई पुलिस इन्हें भी सरगर्मी से तलाशने लगी. पुलिस मुंबई स्थित इन के ठिकानों पर गई तो ये फरार मिले. वहां पर रामनिवास की मर्सिडीज कार मिली, जिसे पुलिस ने बरामद कर लिया. 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले को गंभीरता लेते हुए कहा कि स्पीक एशिया कंपनी ने जिन लोगों के पैसे लिए हैं, वह उन्हें वापस करे. मुंबई आर्थिक अपराध शाखा को कहीं से सूचना मिली की रामनिवास पाल और उस के साथी दिल्ली या एनसीआर इलाके में हैं. मुंबई पुलिस कमिश्नर ने यह जानकारी दिल्ली पुलिस कमिश्नर से शेयर की और उन की गिरफ्तारी में सहयोग करने की मांग की. चर्चित और खास तरह के मामलों में अलगअलग शहरों की पुलिस संबंधित शहरों की पुलिस से जानकारी शेयर कर के अभियुक्तों की गिरफ्तारी में सहयोग करने की अपील करती है. इसी तरह के सहयोग की मांग मुंबई पुलिस ने दिल्ली पुलिस से की थी.

दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने मामला क्राइम ब्रांच को सौंपते हुए काररवाई करने के आदेश दिए. क्राइम ब्रांच के अतिरिक्त आयुक्त रविंद्र यादव ने क्राइम ब्रांच के उपायुक्त कुमार ज्ञानेश की अध्यक्षता में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में स्पैशल औपरेशन स्क्वायड के एसीपी सुरेश कौशिक, इंसपेक्टर अशोक कुमार, संजीव कुमार, सबइंस्पेक्टर अशोक कुमार वेद, वीरेंद्र सिंह, चंदर प्रकाश, विवेक मंडोला, देवेंद्र सिंह, एएसआई जसवंत राठी, हेडकांस्टेबल देवेंद्र कुमार, संजीव कुमार हरविंदर, संजय, रविंदर पाल, कांस्टेबल सुरेंद, जमील, साजिद आदि को शामिल किया गया.

मुंबई पुलिस द्वारा दिए गए इनपुट के आधार पर दिल्ली क्राइम ब्रांच इन की तलाश करने लगी. पुलिस टीम को एक महत्त्वपूर्ण जानकारी यह भी मिली कि रामनिवास पाल और रामसुमिरन पाल सगे भाई हैं. स्पीक एशिया से अरबों रुपए कमाने के बाद इन लोगों ने रीयल एस्टेट में पांव पसारने शुरू कर दिए हैं. इसी सिलसिले में वे अकसर दिल्ली आते रहते हैं. मुंबई पुलिस द्वारा इन की फोटो मिलने के बाद दिल्ली क्राइम ब्रांच ने अपने मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया था. इसी बीच पुलिस को मुखबिर द्वारा सूचना मिली कि रामसुमिरन पाल अपने एक साथी के साथ 25 नवंबर, 2013 की शाम को कनाट प्लेस स्थित रीगल पहुंचेगा. पुलिस टीम रीगल सिनेमा के आसपास बिना वर्दी के खड़ी हो गई.

शाम साढ़े 6 बजे के करीब रीगल सिनेमा के पास स्थित एक दुकान पर 2 शख्स टाई खरीदते हुए दिखे. एसीपी सुरेश कौशिक ने मुंबई पुलिस द्वारा दिए गए फोटो से उन के चेहरों का मिलान किया तो उन में से एक युवक का चेहरा फोटो से मिल रहा था. फिर क्या था, उन्होंने अपनी टीम को इशारा कर दिया. पुलिस टीम ने घेर कर दोनों युवकों को दबोच लिया. दोनों को हिरासत में ले कर पुलिस औफिस आ गई. दोनों युवकों से पुलिस ने पूछताछ की तो वह पहले तो अपना नाम व पता फरजी बताते रहे, लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे उन्हें सच उगलना ही पड़ा. उन में से एक युवक ने अपना नाम रामसुमिरन पाल और दूसरे ने सतीशसोहन पाल बताया. उन्होंने बताया कि वे स्पीक एशिया कंपनी से जुड़े थे. रामसुमिरन पाल उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर का रहने वाला था तो सतीशसोहन पाल दिल्ली के नजफगढ़ का.

रामसुमिरन पाल की गिरफ्तारी पर दिल्ली क्राइम ब्रांच की टीम फूली नहीं समा रही थी. क्योंकि वह स्पीक एशिया का भारत में मुख्य कर्ताधर्ता था. काफी कोशिशों के बाद भी मुंबई क्राइम ब्रांच उसे और उस के भाई रामनिवास पाल को गिरफ्तार नहीं कर सकी थी. सतीशसोहन पाल स्पीक एशिया का दिल्ली में मुख्य फें्रचाइजी था. उस ने भी स्पीक एशिया के नाम पर दिल्ली के हजारों लोगों से करोड़ों रुपए ठगे थे. पुलिस ने उन से जरूरी पूछताछ की. चूंकि इन के खिलाफ दिल्ली में कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं थी. मुंबई के कई थानों में इन के खिलाफ मामले दर्ज थे, इसलिए इन की गिरफ्तारी की सूचना मुंबई क्राइम ब्रांच को दे दी गई.

इस के बाद दोनों ठगों को सीआरपीसी की धारा 41.1 बी (किसी दूसरे थाने के वांटेड आरोपी को गिरफ्तार करना) के तहत गिरफ्तार कर 26 नवंबर को पटियाला हाउस न्यायालय में ड्यूटी मजिस्ट्रेट पुनीथ पावा के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. रामसुमिरन पाल की गिरफ्तारी की खबर पा कर 27 नवंबर को मुंबई क्राइम ब्रांच की टीम दिल्ली पहुंची और कोर्ट से दोनों ठगों को मुंबई ले गई. स्पीक एशिया के ठग रामसुमिरन पाल और सतीशसोहन पाल के गिरफ्तार होने की खबर जैसे ही फोटो सहित मीडिया में आई तो रामवीर शर्मा रामसुमिरन पाल को पहचान गए. उन के मन में भी स्पीक एशिया में लगाए गए पैसे पाने की उम्मीद जागी और वह दिल्ली क्राइम ब्रांच के डीसीपी कुमार ज्ञानेश के पास पहुंच गए.

उन्होंने डीसीपी को अनिल खत्री, मनोज कुमार शर्मा, रामसुमिरन पाल और रामनिवास पाल के उकसावे में आ कर स्पीक एशिया कंपनी में 25 लाख रुपए लगाए जाने की पूरी बात बताई. उन्होंने उक्त चारों ठगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने की मांग भी की. रामवीर शर्मा की शिकायत पर क्राइम ब्रांच थाने में उक्त चारों आरोपियों के खिलाफ एफआईआर संख्या 198 पर भादंवि की धारा 420, 406, 120-बी को तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. स्पीक एशिया कंपनी से जुड़े तमाम लोगों के खिलाफ भले ही देश के विभिन्न थानों में तमाम रिपोर्ट दर्ज थीं, लेकिन दिल्ली में कोई मामला दर्ज नहीं हुआ था. पहली रिपोर्ट रामवीर शर्मा ने दर्ज कराई. मामला दर्ज होने के बाद दिल्ली क्राइम ब्रांच ने खुद भी इस मामले की जांच करनी शुरू कर दी.

रामसुमिरन पाल और सतीशसोहन पाल से पूछताछ में दिल्ली क्राइम ब्रांच को रामनिवास पाल के बारे में कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिली थीं. रामनिवास पाल वह शख्स था, जो स्पीक एशिया को भारत में लाया था. इतना ही नहीं, स्पीक एशिया के प्लान आदि सब उस के ही तैयार कराए थे. एक तरह से वह कंपनी का मास्टर माइंड था. इस मास्टर माइंड की तलाश के लिए क्राइम ब्रांच की एक टीम बंगलुरू रवाना हो गई. पुलिस को सूचना मिली थी कि वह वहां एक आईटी कंपनी में सलाहकार है. जिस कंपनी में वह काम कर रहा था, पुलिस को उस का पता मिल चुका था.

30 नवंबर, 2013 को दिल्ली क्राइम ब्रांच की टीम बंगलुरू पहुंच गई और व्हाइट फील्ड रोड इलाके से एक शख्स को हिरासत में ले लिया. लेकिन उस ने अपना नाम अभय सिंह चंदेल बताया. बातचीत के दौरान पुलिस को लगा कि अभय सिंह चंदेल नाम का यह शख्स झूठ बोल रहा है, इसलिए पुलिस ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि वह रामनिवास पाल है और स्पीक एशिया कंपनी से जुड़ा था. बंगलुरू की स्थानीय अदालत में पेश कर के पुलिस ट्रांजिट रिमांड पर उसे दिल्ली ले आई. चूंकि स्पीक एशिया के इस मास्टर माइंड से पुलिस को विस्तार से पूछताछ करनी थी, इसलिए 2 दिसंबर, 2013 को उसे रोहिणी न्यायालय में ड्यूटी एमएम के समक्ष पेश कर के 9 दिसंबर तक का पुलिस रिमांड ले लिया गया.

पुलिस ने रामनिवास पाल से जब पूछताछ की तो स्पीक एशिया से उस के जुड़ने से ले कर ठगी तक की जो दिलचस्प कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी. रामनिवास पाल मूलरूप से उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के गांव नागरपाल का रहने वाला था. उस के पिता वेदराम एक किसान थे. रामनिवास पाल के अलावा वेदराम के 2 और बेटे थे, रामसुमिरन पाल और रजनीश पाल. रामनिवास पाल बीएससी कर रहा था, तभी उस का सेलेक्शन भारतीय वायु सेवा में एयरमैन (टेक्निकल) के पद पर हो गया था. यह सन 1991 की बात है. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उस की पोस्टिंग जोधपुर (राजस्थान) की हेलिकौप्टर यूनिट में हुई. बाद में उस का तबादला हैदराबाद हो गया. रामनिवास पाल महत्त्वाकांक्षी था. एयरफोर्स में 10 साल नौकरी के बाद वह कोई ऐसा काम करने की सोचने लगा, जिस में उसे मोटी कमाई हो.

इसलिए सन 2001 में अधिकारियों को बिना कोई सूचना दिए घर चला आया. एयरफोर्स ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया. बाद में वह एयरफोर्स अधिकारियों के संपर्क में आया तो उसे कोर्टमार्शल के बाद नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया. एयरफोर्स की नौकरी छोड़ने के बाद वह 2002 में मुंबई चला गया और बहुराष्ट्रीय बैंकों को सलाह देने के लिए स्मार्ट कनेक्ट नाम की कंपनी बनाई. इस के बाद वह टीवी कलाकार अमर उपाध्याय की कंपनी मिहिर विरानी मल्टी ट्रेड प्रा.लि. में निदेशक के रूप में काम करने लगा. यह कंपनी आयुर्वेदिक उत्पादों की बिक्री करती थी. कंपनी के प्रबंधन से विवाद हो जाने के बाद रामनिवास पाल ने नौकरी छोड़ दी. वहीं उस का संपर्क मनोज कुमार शर्मा से हुआ.

मनोज कुमार शर्मा डाइरेक्ट मार्केटिंग एसोसिएशन का अध्यक्ष था. रामनिवास बातचीत में दूसरों को प्रभावित करने में माहिर था, इसलिए मनोज से उस के अच्छे संबंध बन गए. वह मनोज की सारी कंपनियों का काम देखने लगा. इसी दौरान वह कुछ विदेशी कंपनियों के संपर्क में आया. रामनिवास पाल का छोटा भाई रामसुमिरन पाल मुंबई में ही एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता था. उस ने मुंबई से मार्केटिंग में एमबीए किया था. रामनिवास पाल ने रामसुमिरन पाल को भी अपने काम में लगा लिया.

रामनिवास पाल ने मनोज कुमार शर्मा और रामसुमिरन पाल के साथ हालैंड की मैंगो यूनिवर्स, ऐड मैट्रिक्स, इटली की सेविन रिंग्स आदि मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों को भारत में लांच किया. इन कंपनियों में रामनिवास पाल कभी संरक्षक, कभी सलाहकार तो कभी कंपनी की योजनाएं बनाने व विकसित करने वाले की भूमिका में होता था. ये भारत के मध्यमवर्गीय लोगों की मानसिकता को जानते थे, इसलिए इन्होंने सन 2008 में सिंगापुर में रजिस्टर्ड एमएलएम कंपनी स्पीक एशिया को भारत में लांच किया. कंपनी का रजिस्ट्रेशन उन्होंने सिंगापुर, ब्राजील व इटली में भी कराया, लेकिन वहां बिजनेस स्टार्ट नहीं किया. कंपनी के प्लान, पेआउट, सर्वे आदि की रूपरेखा रामनिवास पाल ने ही तैयार की.

उसी ने ही स्पीक एशिया कंपनी के मल्टी लेवल मार्केटिंग स्कीम का डिजाइन तैयार किया. बड़ेबड़े महानगरों में उस ने कंपनी की फ्रैंचाइजी दे दी. 11 हजार रुपए जमा कर के 4 हजार रुपए हर महीने एक साल तक पाने के लालच में बड़ी तेजी से लोग इस से जुड़ने लगे. ज्यादा कमाने के लालच में कुछ लोगों ने कंपनी में लाखों रुपए लगा दिए. कंपनी अपने साथ जुड़ने वाले लोगों को पेनलिस्ट कहती थी. विश्वास जमाने के लिए कंपनी ने पेनलिस्टों के बैंक एकाउंटों में पैसे भी भेजने शुरू कर दिए. फिर क्या था, लोगों का कंपनी के प्रति इतना विश्वास बढ़ा कि कुछ ही दिनों में हिंदुस्तान भर में स्पीक एशिया के लाखों पेनलिस्ट बन गए. कंपनी को पेनलिस्टों से सैकड़ों करोड़ की आमदनी होने लगी.

वे फाइव स्टार होटलों में पेनलिस्टों के साथ मीटिंग करते और अलगअलग शहरों में बड़ेबड़े सेमिनारों में प्रभावशाली स्पीच देते. उन की लाइफस्टाइल और स्पीच से पेनलिस्ट बहुत प्रभावित होते. 2011 के मध्य हिंदुस्तान भर से करीब 24 लाख लोग स्पीक एशिया से जुड़ गए. मास्टर माइंड रामनिवास पाल जानता था कि यदि स्पीक एशिया के कार्यक्रम में फिल्मी कलाकारों को शामिल कर लिया जाए तो लोगों का कंपनी पर विश्वास और बढ़ेगा, जिस से उन की कमाई भी बढ़ेगी. तब उस ने 2011 में गोवा में एक बड़े सेमिनार का आयोजन किया. इस के लिए दिल्ली से गोवा तक एक विशेष टे्रन भी चलवाई. तब उस ने गोवा के ज्यादातर बड़े होटल भी बुक करा लिए थे. कई फिल्मी कलाकारों को भी वहां बुलाया था. बताया जाता है कि कंपनी ने इस सेमिनार के आयोजन पर करीब 200 करोड़ रुपए खर्च किए थे.

गोवा में हुए सेमिनार के बाद स्पीक एशिया कंपनी पर अंगुलियां उठने लगी थीं. अपना विश्वास बनाए रखने और लोगों को आकर्षित करने के लिए कंपनी ने दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में भी एक बड़े सेमिनार का आयोजन किया था. इस के बाद जून, 2011 में कंपनी से जुड़े लोग अंडरग्राउंड हो गए. यानी स्पीक एशिया कंपनी लोगों के 2276 करोड़ रुपए ले कर छूमंतर हो गई. जिन लोगों ने कंपनी में फरवरी, 2011 के बाद पैसे लगाए थे, वे घाटे में रहे. लोगों ने स्पीक एशिया के संचालकों के खिलाफ विभिन्न थानों में रिपोर्ट लिखानी शुरू कर दी.

मुंबई में इस मामले की जांच आर्थिक अपराध शाखा को सौंपी गई. मुंबई पुलिस संचालकों को खोजने लगी. चूंकि रामनिवास पाल और रामसुमिरन पाल ने इटली की सेवन रिंग्स इंटरनेशनल और हालैंड की ऐड मैट्रिक्स प्रा.लि. कंपनी भी खरीद ली थी, इसलिए इन्होंने स्पीक एशिया द्वारा 900 करोड़ रुपए मनी लांड्रिंग के जरिए सिंगापुर पहुंचा दिए. वहां से वे उस रकम को दुबई, इटली, यूके के जरिए दोबारा कंपनी के खाते में भारत ले आए.

पाल बंधुओं ने स्पीक एशिया की दिल्ली की फ्रेंचाइजी सतीशसोहन पाल को दी थी. सतीशसोहन पाल ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट किया था. इस के बाद उस ने विभिन्न इंस्टीट्यूटों में काम करते हुए सन 2007 में मुंबई शिफ्ट हो गया था. वहीं पर वह रामनिवास पाल और रामसुमिरन पाल के संपर्क में आया और उन के साथ मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों में काम करने लगा. जब इन्होंने भारत में स्पीक एशिया कंपनी की शुरुआत की तो सतीशसोहन पाल ने दिल्ली की फ्रेंचाइजी ले ली और लोगों से करोड़ों रुपए इकट्ठे किए. यह पाल बंधुओं का बिजनैस एडवाइजर भी था.

स्पीक एशिया कंपनी के बंद होते ही सतीशसोहन पाल मलेशिया भाग गया था. वहां उस ने वेब एक्सल सौल्युशन कंपनी खरीद कर एमएलएम का बिजनेस शुरू किया. 2012 में अपने परिवार को भी मलेशिया ले गया और क्वालालामपुर में रहने लगा. वहां बैठे हुए भी वह भारत में मौजूद अपने शुभचिंतकों द्वारा पुलिस द्वारा स्पीक एशिया के खिलाफ की जा रही काररवाई के बारे में जानकारी लेता रहा. सन 2012 में पुलिस से बचते हुए रामसुमिरन पाल मलेशिया में सतीश के पास रुका था. सन 2013 में सतीश के परिवार के साथ वह दिल्ली लौट आया. चूंकि मुंबई पुलिस उस के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी कर चुकी थी. इसलिए वह काठमांडू तक प्लेन से आया और वहां से सड़क मार्ग से दिल्ली आया.

रामनिवास पाल और रामसुमिरन पाल ने स्पीक एशिया द्वारा कमाए गए पैसों से मुंबई, शाहजहांपुर, देहरादून आदि शहरों में प्रौपर्टी खरीदी थी. इन्होंने नेपाल और मलेशिया में भी अपने ठिकाने बना रखे थे. रामसुमिरन पाल पुलिस से बचने के लिए अपना हुलिया बदलता रहता था. वह कभी मूंछे रखता था तो कभी सिर मुंडवा लेता था. दाढ़ी बढ़ाने के साथ अचानक ही वह फ्रेंच कट में भी आ जाता था. रामसुमिरन पाल फिलहाल देहरादून में ससुराल पक्ष के लोगों के यहां रह रहा था. दूसरों की गाढ़ी कमाई ठग कर उस ने देहरादून में रीयल एस्टेट कारोबार में लगा दी थी. वहां पर उस के विला और डुप्लेक्स फ्लैट के प्रोजेक्ट चल रहे थे.

रीयल एस्टेट कारोबार के सिलसिले में ही वह दिल्ली आता रहता था. दिल्ली में वह एक फाइवस्टार होटल बनवाने के लिए जगह तलाश रहा था. 25 नवंबर, 2013 को भी वह सतीशसोहन पाल के साथ कनाट प्लेस दिल्ली आया था. उन्हें क्या पता था कि दिल्ली पुलिस भी उस के पीछे लगी है. इसी वजह से वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. रामनिवास पाल पुलिस से बचता हुआ बंगलुरू भाग गया. उस ने अपने परिजनों से फोन पर बात तक करनी बंद कर दी थी. वह व्हाइट फील्ड रोड इलाके में हुलिया और नाम बदल कर रह रहा था. वहां की एक आईटी कंपनी में वह सलाहकार के रूप पर काम कर रहा था. इस के अलावा वह मलेशिया की एक आईटी कंपनी के जरिए विभिन्न वेबसाइटों पर औनलाइन विज्ञापनों की लोकप्रियता प्रमाणपत्र वितरण संबंधी अपना बिजनेस प्लान तैयार कर रहा था.

इस कंपनी के जरिए वह देश भर में दोबारा से ठगी का मायाजाल फैलाना चाह रहा था. इस से पहले कि वह अपने मंसूबे पूरे करता, पुलिस की गिरफ्त में आ गया. रामनिवास पाल से पूछताछ के बाद पुलिस ने मुंबई की एक्सिस बैंक में खुले उस के 3 एकाउंट सीज कर दिए. 9 दिसंबर को उसे पुन: न्यायालय में पेश कर 14 दिसंबर तक का पुलिस रिमांड लिया. दिल्ली क्राइम ब्रांच ने मुंबई पुलिस की कस्टडी में रामसुमिरन पाल, सतीशसोहन पाल को ट्रांजिट रिमांड पर ले कर फिर से पूछताछ की. स्पीक एशिया कंपनी से जुड़े लोगों के खिलाफ देश भर में अब तक 800 से भी ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं. पुलिस अब तक 17 ठगों को गिरफ्तार कर के 210 बैंक खाते सीज कर चुकी है. 150 के करीब संदिग्ध खातों की जांच की जा रही है. दिल्ली में रामवीर शर्मा द्वारा दर्ज कराए गए मामले के बाद क्राइम ब्रांच में स्पीक एशिया द्वारा ठगे गए लोगों के आने की संख्या बढ़ने लगी है. जिस से दिल्ली में गिरफ्तार होने वालों की संख्या बढ़ सकती है.

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

 

 

family dispute : साली बनी जीजा की कातिल

काजल को अपने बहनोई अनिल से इस कदर नफरत थी कि उस ने उस की हत्या करते समय यह भी नहीं सोचा कि पकड़े जाने पर उस की खुद की जिंदगी तो बरबाद होगी. बड़ी बहन की भी जिंदगी नरक हो जाएगी…

काजल उत्तराखंड के जिला हरिद्वार की कोतवाली लक्सर के गांव कलसिया के रहने वाले वीर सिंह की बेटी थी. 9 जून, 2014 को उस की शादी थी. शादी की वजह से घर में खूब गहमागहमी थी. बारात आने में ज्यादा समय नहीं रह गया था, इसलिए लगभग सारे नातेरिश्तेदार और दोस्तपरिचित वीर सिंह के घर इकट्ठा हो  गए थे. उसी बीच जब काजल को सजाने के लिए ब्यूटीपार्लर ले जाने की बात चली तो उस ने साफ कहा कि वह सजने के लिए ब्यूटीपार्लर अनिल जीजा के साथ जाएगी.

शादी के माहौल में काजल को ब्यूटीपार्लर ले जाने वाले तमाम लोग थे, लेकिन जब उस ने स्वयं अनिल जीजा के साथ ब्यूटीपार्लर जाने की बात कही थी तो भला कोई दूसरा चलने की बात कैसे करता. नातेरिश्तेदारों तथा घर वालों को लगा कि काजल जीजा से अकेले में कुछ व्यक्तिगत बातें करना चाहती होगी, इसीलिए उस के साथ जाना चाहती है. घर में भीड़भाड़ थी, कुछ औरतों ने हंसी भी की, लेकिन किसी बात पर ध्यान दिए बगैर काजल ब्यूटीपार्लर जाने के लिए जीजा के साथ निकल पड़ी.

इधर अनिल और काजल निकले, उधर बारात आ गई. सभी बारात के स्वागत में लग गए. घर वाले जरूरी रस्में पूरी करने लगे तो बराती नाश्ते और खाने में जुट गए. द्वारपूजा की तैयारी हो रही थी कि तभी वीर सिंह के मोबाइल फोन की घंटी बजी. उन्होंने जेब से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर नंबर देखा तो फोन काजल का था. उन्होंने जल्दी से फोन रिसीव कर के मोबाइल कान से लगाया, ‘‘हां बोलो बेटा, क्या बात है?’’

‘‘पापा, बड़ी गड़बड़ हो गई, बदमाशों ने अनिल जीजा को गोली मार दी है.’’ काजल ने कहा.

यह सुन कर वीर सिंह सन्न रह गया. उस ने घबरा कर पूछा, ‘‘कहां…?’’

‘‘सैदाबाद के पास.’’ दूसरी ओर से काजल ने कहा.

इस के बाद वीर सिंह ने जैसे ही फोन काटा, आसपास खड़े लोग उस की ओर सवालिया नजरों से ताकने लगे. क्योंकि फोन पर बातचीत के दौरान उस के चहरे पर जो भाव आए थे, उसी से उन लोगों ने अंदाजा लगा लिया था कि कहीं कुछ गड़बड़ हुई है. वीर सिंह के सामने बड़ी विषम परिस्थिति थी. जो कुछ हुआ था, उसे बताने पर उस की सारी तैयारी, सारे खर्च पर पानी फिर जाने वाला था. जबकि बताना भी जरूरी था. इसलिए उस ने सिर थाम कर बैठते हुए कहा, ‘‘काजल का फोन था, लक्सर जाते समय सैदाबाद के पास बदमाशों ने अनिल को गोली मार दी है.’’

वीर सिंह का इतना कहना था कि वहां खड़े लोग सन्न रहे. घर में कोहराम मच गया. पल भर में ही यह बात घर से ले कर जहां बारात ठहरी थी, वहां तक पहुंच गई. बैंड बाजा बज रहा था, डीजे पर लोग डांस कर रहे थे, सब बंद हो गया. चारों ओर खुसुरफुसुर होने लगी कि अब क्या होगा. वीर सिंह अपने खास रिश्तेदारों तथा घर वालों के साथ घटनास्थल की ओर भागा. काजल वहां गांव के ही सुभाष के साथ घायल अनिल को अस्पताल ले जाने की कोशिश कर रही थी. सभी लोग गाडि़यों से आए थे, इसलिए जल्दी से अनिल को उठा कर गाड़ी में डाला और लक्सर स्थित सरकारी अस्पताल में गए, जहां जांच के बाद डाक्टरों ने बताया कि यह मर चुका है.

अस्पताल से ही इस घटना की सूचना कोतवाली लक्सर पुलिस को दे दी गई थी. अब तक काफी रात हो चुकी थी. जिस समय इस घटना की सूचना कोतवाली लक्सर को दी गई थी, उस समय कोतवाली प्रभारी भुवनेश कुमार शर्मा गश्त पर थे. उस समय थाने में सीनियर सबइंसपेक्टर प्रशांत बहुगुणा मौजूद थे. उन्होंने तत्काल इस घटना की सूचना कोतवाली प्रभारी भुवनेश कुमार शर्मा को देने के साथ एसएसपी डा. सदानंद दाते, एसपी (देहात) अजय सिंह तथा क्षेत्राधिकारी जी.बी. पांडेय को दे दी.

पुलिस अधिकारियों को घटना की सूचना दे कर एसएसआई प्रशांत बहुगुणा थाने से कुछ सिपाहियों को साथ ले कर सरकारी अस्पताल पहुंच गए. वह लाश का निरीक्षण कर  रहे थे कि कोतवाली प्रभारी भुवनेश कुमार शर्मा और क्षेत्राधिकारी जी.बी. पांडेय भी आ गए. इस के बाद सभी पुलिस अधिकारियों ने लाश का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र 30-35 साल रही होगी. उस के सीने में गोली मारी गई थी. घाव देख कर ही लग रहा था कि गोली एकदम करीब से मारी गई थी.

अस्पताल में मृतक अनिल की ससुराल वालों के अलावा तमाम नातेरिश्तेदार तथा गांव वाले इकट्ठा थे. सभी को इस बात पर गुस्सा था कि हंसीखुशी के मौके पर बदमाशों ने ऐसा काम कर दिया कि सारी खुशियों पर तो पानी फिर गया. एक बेटी की जिंदगी बरबाद हो गई और दूसरी के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया. अनिल की ससुराल वालों का रोरो कर बुरा हाल था. उस की पत्नी ममतेश तो सिर पटकपटक कर रो रही थी. माहौल बड़ा गमगीन था, फिर भी पुलिस को अपनी काररवाई तो करनी ही थी. अब तक एसएसपी डा. सदानंद दाते और एसपी (देहात) अजय सिंह भी आ गए थे. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में कोतवाली प्रभारी भुवनेश कुमार शर्मा ने अनिल की लाश को कब्जे में ले कर पंचनामा की सारी काररवाई पूरी कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल का भी निरीक्षण किया. अनिल को जिस जगह गोली मारी गई थी, वहां उस के शरीर से निकला खून सूख चुका था. सारी स्थितियों से अंदाजा लगाया गया कि अनिल मोटरसाइकिल से उतर कर खड़ा था, तभी उसे गोली मारी गई थी. जिस तरह हत्या की गई थी, उस से यही लगता था कि अनिल की रंजिशन हत्या की गई थी. गोली सामने से मारी गई थी तो क्या अनिल सामने से आने वाले अपने दुश्मनों को पहचान नहीं पाया था. पुलिस ने घटनास्थल से वह तमंचा भी बरामद कर लिया था, जिस से इस वारदात को अंजाम दिया गया था.

सारी बातों को ध्यान में रख कर पुलिस अधिकारियों ने जब घटना के बारे में मृतक की ससुराल वालों से पूछताछ की तो पता चला कि मृतक अनिल अपनी साली काजल, जिस की शादी थी, उस का मेकअप कराने अपनी मोटरसाइकिल से लक्सर जा रहा था. वह रायसी-लक्सर रोड पर स्थित गांव सैदाबाद के पास पहुंचा तो काजल ने उसे लघुशंका के लिए रोक लिया. वह सड़क के किनारे लघुशंका करने लगा तो काजल भी थोड़ी दूर स्थित झाडि़यों में लघुशंका के लिए चली गई. काजल लघुशंका कर रही थी कि तभी उसे गोली चलने और अनिल के चीखने की आवाज सुनाई दी. वह जल्दी से उठी. पलट कर देखा तो अनिल जमीन पर पड़ा तड़प रहा था. उस ने इधरउधर देखा तो थोड़ी दूर पर मोटरसाइकिल से 2 लोग लक्सर की ओर जाते दिखाई दिए. शायद उन्हीं लोगों ने अनिल को गोली मारी थी.

काजल भाग कर अनिल के पास पहुंची. वह अकेली तो कुछ कर नहीं सकती थी. तभी संयोग से उस के गांव का सुभाष आ गया. उस ने सुभाष से अपने पिता को फोन कराया. थोड़ी देर बाद सभी लोग आ गए तो अनिल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां पता चला कि वह मर चुका है. इस पूछताछ से जब पुलिस को पता चला कि घटना के समय मृतक की साली साथ थी तो पुलिस को लगा कि काजल से पूछताछ में हत्यारों का जरूर कोई सुराग मिल सकता है. इस के बाद पुलिस ने काजल से पूछताछ की. उस ने भी वही सब बताया, जो उस के पिता वीर सिंह बता चुके थे.

क्योंकि वीर सिंह को उसी ने यह सब बताया था. अंत में जब उस ने कहा कि हत्यारे जीजाजी के सीने में गोली मार कर तमंचा वहीं फेंक कर भाग गए थे तो पुलिस को थोड़ा हैरानी हुई कि हत्यारे जब मोटरसाइकिल से आए थे और मोटरसाइकिल से चढ़ेचढ़े ही गोली मारी थी तो उन्होंने तमंचा वहां क्यों फेंक दिया था. इस के बाद जब काजल से पूछा गया कि उस ने बदमाशों को देखा था, वे किस रंग की कौन सी मोटरसाइकिल से थे? तो वह पुलिस के इन सवालों पर हकबका सी गई. फिर खुद को संयत करते हुए उस ने बताया था कि उस के बाहर आतेआते बदमाश इतनी दूर निकल गए थे कि वह न तो बदमाशों को देख पाई थी और न उन की मोटरसाइकिल को.

पुलिस ने काजल को बहुत कुरेदा, लेकिन उस से उन्हें मतलब की कोई जानकारी नहीं मिली. लेकिन इस बातचीत में पुलिस को यह आभास जरूर हो गया कि काजल को जीजा की हत्या के बाद जिस तरह दुखी और परेशान होना चाहिए, वैसा दुख और परेशानी न तो उस के चेहरे पर दिखाई दे रही है न बातचीत में. वह इस तरह बातचीत कर रही थी, जैसे हत्या उस के अपने सगे जीजा की न हो कर गांव के किसी आदमी की हुई है. बहरहाल, उस समय ऐसा माहौल था कि इस तरह की कोई बात नहीं की जा सकती थी. वैसे भी वहां इकट्ठा लोगों का मूड ठीक नहीं लग रहा था. मृतक अनिल की पत्नी की हालत ऐसी थी कि उस समय उस से पूछताछ नहीं की जा सकती थी. घटना की सूचना अनिल के घर वालों को भी दे दी गई थी. इस स्थिति में शादी होने का सवाल ही नहीं उठता था, इसलिए बारात बिना शादी के ही लौट गई थी.

अनिल की हत्या की सूचना पा कर उस का छोटा भाई सुनील आ गया था. अगले दिन उसी की ओर से अनिल की हत्या का मुकदमा कोतवाली लक्सर में अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने इस मामले की जांच कोतवाली प्रभारी भुवनेश कुमार शर्मा को सौंपते हुए क्षेत्राधिकारी जी.बी. पांडेय को इस मामले पर नजर रखने का आदेश दिया. पुलिस को संदेह ही नहीं, पूरा विश्वास था कि अनिल की हत्या रंजिश की वजह से की गई थी. उस की किस आदमी से ऐसी रंजिश थी, जो उस की हत्या कर सकता था? यह बात घर वाले ही बता सकते थे. भाई सुनील से पूछा गया तो वह इस बारे में पुलिस की कोई मदद नहीं कर सका. क्योंकि वह गांव में रहता था, जबकि अनिल हरिद्वार में रहता था.

पत्नी ममतेश अभी इस स्थिति में नहीं थी कि उस से पूछताछ की जा सकती. बहरहाल अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद शव घर वालों को मिला तो उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार अनिल को गोली एकदम करीब से मारी गई थी, जो तिरछी लगी थी. पुलिस को काजल पर संदेह था, इसलिए उस के बारे में पता करने के लिए मुखबिरों को तो लगाया ही गया, उस के घर के सभी फोन नंबरों को भी सर्विलांस पर लगवा दिया गया कि शायद उन की आपसी बातचीत से हत्यारे के बारे में कोई जानकारी मिल सके. इस के अलावा काजल और उस के घर वालों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए पुलिस ने ग्रामप्रधान विनोद चौधरी से भी पूछताछ की.

अनिल के घर वालों ने पुलिस को बताया था कि उन्हें उस के ऐसे दुश्मन के बारे में कोई जानकारी नहीं है, जो उस की हत्या कर सकता था. लेकिन जब इस बारे में ममतेश से पूछा गया तो उस ने कहा कि और कोई भले न जानता हो, लेकिन काजल को हत्यारों के बारे में जरूर पता होगा. पुलिस को तो काजल पर पहले से ही संदेह था, ममतेश की इस बात ने पुलिस के संदेह को और बढ़ा दिया. 18 जून, 2014 को मृतक अनिल की पत्नी ममतेश क्षेत्राधिकारी जी.बी. पांडेय से मिली और उस ने उन से साफसाफ कहा कि उस के पति की हत्या में उस के मायके वालों की अहम भूमिका हो सकती है. उन्हीं लोगों ने साजिश रच कर हत्या की है. अगर उन लोगों से सख्ती से पूछताछ की जाए तो निश्चित इस हत्याकांड से परदा उठ सकता है.

क्षेत्राधिकारी ने ममतेश से वजह पूछी कि उस के मायके वाले उस के पति की हत्या क्यों करेंगे तो उस ने बताया कि उस की मंझली बहन मीना की आत्महत्या के बाद से उस के मायके वाले उस के पति से रंजिश रखने लगे थे. उसी की वजह से करीब 4 साल तक आनाजाना बंद रहा. इस साल काजल की शादी तय हुई तो आनाजाना शुरू हुआ. इस के अलावा मुखबिरों से पुलिस को जो सूचनाएं मिली थीं, वे भी अनिल की ससुराल वालों को हत्यारा बता रही थीं. ये सारी बातें काजल और उस के पिता वीर सिंह को थाने बुला कर पुलिस को पूछताछ करने के लिए मजबूर कर रही थीं. जब सारी बातें एसएसपी डा. सदानंद दाते को बताई गईं तो उन्होंने काजल और वीर सिंह को थाने ला कर सख्ती से पूछताछ करने का आदेश दिया.

इस के बाद कोतवाली प्रभारी भुवनेश कुमार शर्मा एसएसआई प्रशांत बहुगुणा और कुछ सिपाहियों के साथ वीर सिंह के घर पहुंचे और बापबेटी को पकड़ कर थाने ले आए. थाने में काजल और वीर सिंह से पूछताछ शुरू हुई. दोनों वही बातें दोहराते रहे, जो उन्होंने पुलिस को पहले बताई थीं. लेकिन अब उन बातों पर पुलिस को विश्वास नहीं था, इसलिए पुलिस उन से सच उगलवाना चाहती थी, जबकि बापबेटी सच बोलने को राजी नहीं थे. क्षेत्राधिकारी जी.बी. पांडेय ने देखा कि ये सीधे सच बताने को तैयार नहीं हैं तो उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘तुम दोनों को ही पता होना चाहिए कि कानून और पुलिस, दोनों के ही हाथ बहुत लंबे होते हैं. इसलिए इन से कोई भी अपराधी नहीं बच सकता.

अपने सूत्रों से मुझे पता चल गया है कि अनिल की हत्या तुम्हीं लोगों ने की है. अब तुम लोग सच्चाई अपने आप बता दो तो अच्छा रहेगा, वरना हम अपनी तरह से उगलवाएंगे तो तुम दोनों को बहुत परेशानी होगी.’’

वीर सिंह और काजल कोई पेशेवर अपराधी तो थे नहीं. उन्होंने भले ही पुलिस की मार नहीं देखी थी, लेकिन फिल्मों और सीरियलों में तो देखा ही था. इस के अलावा पुलिस की थर्ड डिग्री के तमाम किस्से भी सुन रखे थे. जब उन्होंने देखा कि अब पुलिस का रुख कड़ा हो रहा है तो बापबेटी, दोनों ही फफकफफक कर रो पड़े. उन दोनों के रोते ही क्षेत्राधिकारी समझ गए कि अब उन का काम हो गया है. ये दोनों अब अपना अपराध स्वीकार कर लेंगे. इसलिए पुलिस ने उन्हें रोने दिया, जिस से मन हलका हो जाए.

और सचमुच रो कर मन हलका हो गया तो काजल और वीर सिंह ने अनिल की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. काजल ने बताया कि उसी ने अनिल की गोली मार कर हत्या की थी. यह हत्या उस ने अपनी बहन की मौत का बदला लेने के लिए की थी. इस के बाद वीर सिंह और काजल ने अनिल की हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी. उत्तराखंड के जिला हरिद्वार की कोतवाली लक्सर के गांव कलसिया के रहने वाले वीर सिंह अपनी 3 बेटियों में बड़ी बेटी ममतेश की शादी मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के थाना मंडावर के गांव फतेहपुर के रहने वाले चंद्रपाल के बेटे अनिल के साथ की थी. अनिल हरिद्वार में हर की पौड़ी में फोटोग्राफी करता था. उस का जमाजमाया काम था, इसलिए शादी के बाद ममतेश को भी वहीं ले आया. यह करीब 10 साल पहले की बात है.

ममतेश से छोटी थी मीना, जो उन दिनों इंटर में पढ़ रही थी. इंटर पास करने के बाद वह बीए करना चाहती थी. इस के लिए मांबाप से अनुमति ले कर उस ने हरिद्वार के डिग्री कालेज में दाखिला ले लिया. घर से रोजना हरिद्वार जा कर पढ़ाई करना संभव नहीं था, इसलिए पढ़ाई के लिए उस ने हरिद्वार में ही रहने का फैसला किया. वहां उस की बहन और बहनोई रहते ही थे, इसलिए उसे वहां रहने में कोई दिक्कत नहीं थी. मीना बहन ममतेश के घर साथ रह कर बीए की पढ़ाई करने लगी. उस का बीए का अंतिम साल था. अब तक मीना पूरी तरह जवान हो चुकी थी. खूबसूरत वह थी ही. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक एक दिन वीर सिंह को सूचना मिली की मीना ने आत्महत्या कर ली है.

वीर सिंह कुछ खास लोगों के साथ हरिद्वार पहुंचा और बेटी का शव चुपचाप ले कर गांव आ गया. उस ने सोचा कि शोरशराबा करने पर बात पुलिस तक पहुंचेगी तो परेशानी भी बढ़ जाएगी और इज्जत का भी तमाशा बनेगा. इसलिए उस ने वहां किसी से कोई बात तक नहीं की. घर लाने के बाद उस ने शव देखा तो उसे कहानी कुछ और ही लगी. उसे मीना के शरीर पर चोट और खरोंच के निशान दिखाई दिए. वीर सिंह बेवकूफ नहीं था कि चोट और खरोंच के निशानों का मतलब न समझता. सब कुछ जानसमझ कर भी वह इज्जत की खातिर चुप रहा कि अगर बात खुलेगी तो उसी की बदनामी होगी और गांव वाले उसी की हंसी उड़ाएंगे. यह 4 साल पहले की बात है.

उस समय वीर सिंह भले ही चुप रह गया था, लेकिन उसे दामाद से ही नहीं, बेटी से भी नफरत हो गई थी. क्योंकि उस ने स्वार्थ के लिए पति का साथ दिया था. स्थितियां बता रही थीं कि मीना ने ऐसे आत्महत्या नहीं की थी, उसे इस के लिए इस तरह मजबूर कर दिया गया था कि उस ने खुद को जीने लायक नहीं समझा था और इस सब में उस की बेटी का भी हाथ था. वीर सिंह का सोचना था कि अनिल तो पराया था, लेकिन ममतेश तो उस की अपनी थी. वह पति के प्यार में इस तरह अंधी हो गई थी कि उस ने मांबाप की इज्जत का भी नहीं खयाल किया. उस बहन के बारे में भी नहीं सोचा, जिस को उस ने बचपन में खेलायाकुदाया था. यही सब सोचसोच कर उन्हें दामाद से ही नहीं, बेटी से भी नफरत हो गई और उन्होंने बेटीदामाद से संबंध तो तोड़ ही लिए, यह भी तय कर लिया कि वह मीना की मौत का बदला जरूर लेगा.

समय धीरेधीरे बीतता रहा. समय बीतने के साथ वीर सिंह के मन में बेटी और दामाद के लिए जो नफरत थी, वह कम होने के बजाय बढ़ती गई. मीना से छोटी काजल भी समझदार हो गई थी. कभीकभार घर में मीना की चर्चा होती तो घर वालों को गुस्सा होते देख काजल को भी बहनबहनोई पर गुस्सा आता कि उन्होंने उस के मांबाप की इज्जत का जरा भी खयाल नहीं किया. यही नहीं, उन्हीं की वजह से उस की बहन को मौत को गले लगाना पड़ा. घर वालों की बातें सुनसुन कर काजल को भी बहनबहनोई से नफरत हो गई थी और वह भी बहन की मौत का बदला लेने के बारे में सोचने लगी. इस साल उस की शादी तय हुई तो उसने वीर सिंह से कहा कि उस की शादी में जीजा और बहन को भी बुलाएं. वीर सिंह इस के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन काजल ने जब उन्हें मन की बात बताई तो वह अनिल और ममता को बुलाने को तैयार हो गए. यह कीरब 4 महीने पहले की बात है.

काजल के कहने पर वीर सिंह हरिद्वार स्थित ममतेश के घर गए और उसे घर आने को कहा. इस के बाद अनिल और ममतेश कलसिया आनेजाने लगे. संबंध सुधर गए तो काजल की शादी की तैयारी में अनिल और ममतेश ने भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. 9 जून, 2014 को काजल की शादी थी. शादी में अनिल और ममतेश को भी बुलाया गया था. बहुत दिनों बाद संबंध सुधरे थे, इसलिए शादी में दोनों आए भी थे. शाम को दुल्हन के रूप में सजने के लिए काजल को लक्सर स्थित ब्यूटीपार्लर जाना था. वैसे तो काजल को ले जाने वाले बहुत लोग थे, लेकिन काजल ने जीजा अनिल के साथ जाने की इच्छा व्यक्त की. अनिल भला क्यों मना करता. मना करने की कोई वजह भी नहीं थी. उस का सोचना था कि मन की सारी कड़वाहट धुल चुकी है, इसलिए वह मोटरसाइकिल ले कर तैयार हो गया.

अनिल तैयार हो गया तो काजल ने घर में रखा तमंचा, जिसे वीर सिंह ने मुजफ्फरनगर के अपने एक रिश्तेदार की मदद से खरीदा था, उसे पर्स में रख कर ऊपर से शाल ओढ़ कर अनिल की मोटरसाइकिल पर बैठ गई. अनिल मोटरसाइकिल ले कर सैदाबाद गांव के पास सुनसान जगह पर पहुंचा तो लघुशंका की बात कह कर काजल ने मोटरसाइकिल रुकवा ली. लघुशंका करने के बहाने वह झाडि़यों की ओट में गई और वहां उस ने तमंचे में गोली भरी. अनिल मोटरसाइकिल पर ही बैठा था. काजल झाडि़यों से निकल कर उस के पास आई और तमंचा उस के सीने से सटा कर गोली चला दी. गोली लगते ही अनिल जमीन पर गिर कर छटपटाने लगा. काजल को लगा कि उस का काम हो गया है तो उस ने शोर मचा दिया.

संयोग से उसी समय उस के गांव का सुभाष वहां पहुंच गया. सुभाष की मदद से उस ने घटना की सूचना घर वालों को दी. थोड़ी ही देर में घर वाले भी आ गए. इस के बाद अनिल को अस्पताल पहुंचाया गया, जहां पता चला कि वह मर चुका है. इस के बाद वीर सिंह ने भी माना कि उन्हें अनिल की हत्या की जानकारी ही नहीं थी, बल्कि काजल के साथ वह भी हत्या की इस योजना में शामिल थे. काजल ने बताया कि अनिल की हत्या के लिए शादी वाला दिन उस ने इसलिए चुना था कि कोई भी नहीं सोचेगा कि जिस की शादी के लिए दरवाजे पर बारात आ गई हो, ऐसे समय में हत्या जैसा अपराध करेगी. वह भी अपने सगे बहनोई की हत्या.

काजल ने होशियारी तो बहुत दिखाई, लेकिन बच नहीं सकी. पुलिस ने वह तमंचा पहले ही बरामद कर लिया था, जिस से अनिल की हत्या की गई थी. काजल के बयान के बाद कोतवाली लक्सर पुलिस ने पहले से दर्ज मुकदमे में अज्ञात लोगों की जगह बापबेटी यानी काजल और वीर सिंह का नाम दर्ज कर दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कोतवाली प्रभारी भुवनेश्वर कुमार शर्मा सुभाष की भूमिका की जांच कर रहे हैं कि वह अनिल की हत्या के बाद वहां संयोग से पहुंचा था या उसे पहले से मालूम था. कथा लिखे जाने तक सुभाष के बारे में कुछ पता नहीं चला था. काजल और वीर सिंह जेल में थे.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

एक लड़की की दो पत्नियां

कृष्णा सेन उर्फ स्वीटी की सोच भले ही पुरुष की तरह थी, लेकिन वह एक लड़की थी. लड़की होते हुए उस ने एक नहीं, 2-2 शादियां कीं. आखिर वह दोनों पत्नियों के साथ कैसे निभाती थी पत्नीधर्म?

हल्द्वानी के कस्बा काठगोदाम की रहने वाली प्रियंका पिछले कई महीनों से महसूस कर रही थी कि उस के पति कृष्णा सेन के व्यवहार में बड़ा परिवर्तन आ गया है. जहां पहले वह उसे अपनी आंखों पर बिठाए रखता था. उस के हर नाजनखरे सहता था. वहीं अब उसे उस की हर बात कांटे की तरह चुभती है. इतना ही नहीं, वह हर समय उस के साथ झगड़े पर उतारू रहता है. प्रियंका यदि किसी बात पर उस से बहस करती तो वह उस की पिटाई कर देता था.

यानी अब वह ज्यादा चिढ़चिढ़ा सा हो गया था. शराब पी कर वह उस से अकसर रोजाना ही झगड़ता था. पति की प्रताड़ना से तंग आ कर वह अपने मायके चली जाती थी.

शादीशुदा बेटी को ज्यादा दिनों तक घर पर बैठाना कुछ लोग सही नहीं समझते. प्रियंका के मातापिता भी उन्हीं में से एक थे. बेटी के हावभाव से वे समझ जाते थे कि वह ससुराल से गुस्से में आई है. तब वह अपनी बेटी के साथसाथ दामाद को फोन पर समझाते थे. मांबाप के समझाने के बाद प्रियंका अपने भाई के साथ ससुराल लौट जाती थी.

एक बार की बात है, एक महीना मायके में रहने के बाद प्रियंका जब अकेली ही हल्द्वानी की तिकोनिया कालोनी में रह रहे पति के पास पहुंची तो वहां कमरे पर एक लड़की मिली. उस के पहनावे और साजशृंगार से लग रहा था, जैसे उस की शादी हाल में ही हुई है. कमरे में पति कृष्णा और उस लड़की के अलावा और कोई नहीं था. प्रियंका ने पति से उस लड़की के बारे में पूछा तो कृष्णा ने बताया कि यह उस की पत्नी सरिता है. उस ने इस से हाल ही में शादी की है.

इतना सुनते ही प्रियंका के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. गुस्से से उस का चेहरा लाल हो गया. कोई भी शादीशुदा औरत हर चीज सहन कर सकती है पर यह बात वह हरगिज सहन नहीं कर सकती कि उस का पति उस के होते हुए शौतन ले आए. वह गुस्से में बोली, ‘‘मुझ में और मेरे प्यार में क्या कमी थी जो तुम इसे ले आए. मैं कहे देती हूं कि मेरे जीतेजी इस घर में कोई और नहीं रह सकती. तुम तो बड़े ही छिपे रूस्तम निकले. लगता है मेरे मायके जाने का तुम इंतजार कर रहे थे, जो मेरे जाते ही इसे ले आए.’’ कहते हुए प्रियंका की आंखों में आंसू भर आए.

पत्नी की बातों पर कृष्णा को गुस्सा तो बहुत आ रहा था, लेकिन गलती कृष्णा की थी, इसलिए वह पत्नी की बातें सुनता रहा. नईनवेली दुलहन के सामने उसे बेइज्जती का सामना करना पड़ रहा था. प्रियंका का गुस्सा शांत हो गया तो कृष्णा ने उसे मनाने की कोशिश करते हुए समझाया, ‘‘प्रियंका, मेरी मजबूरी ऐसी हो गई थी जिस की वजह से मुझे यह शादी करनी पड़ी. इस से तुम हरगिज परेशान मत हो. मैं तुम्हारा पूरा ध्यान रखूंगा. तुम्हारे प्रति मेरा प्यार वैसा ही बना रहेगा. तुम दोनों ही इस घर में रहना.’’

प्रियंका को पति की बात पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था, लेकिन अब बोल कर कोई फायदा नहीं था. पहले ही वह उसे काफी सुना चुकी थी. इसलिए वह चुप्पी साधे रही. उस से कुछ कहने के बजाय वह कमरे में चली गई और रो कर उस ने अपना मन हलका किया.

कृष्णा ने फिर की 5 लाख की डिमांड

 

अब प्रियंका के मन में पति के प्रति पहले जैसा सम्मान नहीं रहा. खुद भी वह बेमन से वहां रही. कृष्णा उस के बजाए दूसरी पत्नी को ज्यादा महत्त्व देने लगा. वहां प्रियंका की स्थिति दोयम दरजे की हो कर रह गई थी. एक दिन कृष्णा ने प्रियंका से कहा कि बिजनेस के लिए उसे 5 लाख रुपए की जरूरत है. वह अपने मायके से 5 लाख रुपए ला दे.

‘‘मैं अब और पैसे नहीं लाऊंगी. सीएफएल बल्ब की फैक्ट्री लगाने के लिए तुम मेरे घर वालों से 8 लाख रुपए पहले ही ले चुके हो. तुम ने वो पैसे तो लौटाए नहीं हैं.’’ प्रियंका बोली.

‘‘क्या मैं कहीं भागा जा रहा हूं, जो तुम इस तरह की बात कर रही हो. पिछली बात को तुम भूल जाओ. अब यह बात ध्यान से सुन लो कि तुम्हें हर हालत में 5 लाख रुपए लाने ही होंगे वरना इस घर में नहीं रह सकोगी. यहां तुम्हारी कोई जगह नहीं रहेगी.’’ कृष्णा सेन ने दो टूक कह दिया.

प्रियंका पति के सामने गिड़गिड़ाई कि अब उस के मायके वालों की ऐसी स्थिति नहीं है कि वह इतनी बड़ी रकम की व्यवस्था कर सकें, पर पति का दिल नहीं पसीजा. उस ने प्रियंका को दुत्कारते हुए कहा कि वह यहां से चली जाए. पति के दुत्कारने के बाद प्रियंका के सामने मायके जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. लिहाजा उस ने अपने भाई को फोन कर दिया और उस के साथ मायके चली गई.

 

प्रियंका ने मायके में पति कृष्णा द्वारा दूसरी शादी करने की बात बताई तो सभी आश्चर्यचकित होते हुए बोले, ‘‘पहली पत्नी के होते हुए उस ने दूसरी शादी कैसे कर ली.’’ इस के बाद प्रियंका ने अपने मांबाप को एकएक बात बता दी. कृष्णा के द्वारा प्रियंका पर ढाए गए जुल्मोसितम की बात सुन कर सभी को गुस्सा आ गया. मायके वालों ने तय कर लिया कि वे फरेबी कृष्णा सेन के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज करा कर उस के किए की सजा दिलाएंगे.

एक दिन प्रियंका अपने मांबाप के साथ थाना काठगोदाम पहुंची. वहां मौजूद थानाप्रभारी को उस ने अपनी प्रताड़ना की सारी कहानी बता दी. उस ने यह भी कह दिया कि शादी में अच्छाखासा दहेज देने के बाद भी पति कृष्णा सेन दहेज के लिए उसे प्रताडि़त करता था. एक बार उस ने पति के कहने पर अपने मांबाप से 8 लाख रुपए ला कर दिए थे वह पैसे तो उस ने लौटाए नहीं, अब 5 लाख रुपए और मांगने की जिद पर अड़ गया. पैसे न देने पर उस ने उसे घर से निकाल दिया.

थानाप्रभारी ने प्रियंका की पीड़ा सुनने के बाद भरोसा दिया कि वह उस के पति के खिलाफ सख्त काररवाई करेंगे. एक सप्ताह गुजर जाने के बाद भी थाना पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज नहीं की तो प्रियंका फिर थाने पहुंची. थानाप्रभारी ने उसे फिर टरका दिया. थाने वाले 4 महीने तक उसे ऐसे ही टरकाते रहे. 4 महीने तक थाने के चक्कर लगातेलगाते वह थक चुकी थी पर थाने वाले कृष्णा सेन के खिलाफ रिपोर्ट नहीं लिख रहे थे.

9 अक्तूबर, 2017 को प्रियंका अपने भाई के साथ हल्द्वानी के एसएसपी जयप्रभाकर खंडूरी से मिली और काठगोदाम थानापुलिस द्वारा उस के पति के खिलाफ अभी तक कोई काररवाई न करने की शिकायत की.

एसएसपी ने प्रियंका की शिकायत को गंभीरता से लिया. उन्होंने उसी समय काठगोदाम एसएसआई संजय जोशी को फोन कर के आदेश दिया कि प्रियंका की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कर आरोपी के खिलाफ तत्काल काररवाई करें.

थाने पहुंच कर प्रियंका एसएसआई से मिली तो उन्होंने बड़े गौर से उस की समस्या सुनी और उस की तहरीर पर उस के पति कृष्णा सेन के खिलाफ भादंवि की धारा 417, 419, 420, 467, 468, 471, 323, 504 व 506 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

चूंकि इस मामले में आदेश कप्तान साहब का था, इसलिए एसएसआई संजय जोशी एसआई मंजू ज्वाला और पुलिस टीम के साथ हल्द्वानी स्थित तिकोनिया कालोनी गए. आरोपी कृष्णा सेन तिकोनिया कालोनी में ही रहता था.

पुलिस जब उस के कमरे पर पहुंची तो वह वहां नहीं मिला. पता चला कि वह अपना किराए का मकान खाली कर के कहीं चला गया है.

पुलिस ने आरोपी कृष्णा सेन के बारे में जांच की तो पता चला कि वह कालाढूंगी में रह रहा है. पुलिस टीम ने कलाढूंगी में दबिश दी तो जानकारी मिली कि कृष्णा वहां से भी मकान छोड़ कर कहीं और जा चुका है और अब वह हरिद्वार के ज्वालापुर में अपनी दूसरी बीवी सरिता के साथ रह रहा है.

काठगोदाम पुलिस प्रियंका को ले कर ज्वालापुर पहुंची तो जानकारी मिली कि वह वहां पत्नी के साथ रहता तो था लेकिन कुछ देर पहले पत्नी को ले कर वहां से चला गया है.

पुलिस पड़ गई कृष्णा सेन के पीछे

 

कृष्णा सेन और पुलिस के बीच चूहेबिल्ली का खेल चल रहा था. कृष्णा सेन इतना शातिर था कि हर बार पुलिस को चकमा दे जाता था. उसे इस बात की तो जानकारी मिल ही गई थी कि उस की पत्नी प्रियंका ने उस के खिलाफ रिपोर्ट लिखा दी है. यदि वह किसी तरह प्रियंका को मना ले तो पुलिस से बचा सकता है. प्रियंका पर मुकदमा वापस लेने का दबाव बनाने के लिए वह 14 फरवरी, 2018 को कोठगोदाम की चांदमारी कालोनी में पहुंचा.

प्रियंका इसी कालोनी में रहती थी. उसी दौरान किसी मुखबिर ने कृष्णा के बारे में थाने में सूचना दे दी. खबर मिलते ही एसएसआई संजय जोशी पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. उन्होंने कृष्णासेन को हिरासत में ले लिया.

थाने ला कर जब उस से पूछताछ की तो वह अपने ऊपर लगे आरोपों को नकारता रहा. एसआई मंजू ज्वाला ने उस से कहा, ‘‘तुम सीधे नहीं बताओगे. लेकिन जब तुम पत्नी को धोखा देने, उस के साथ मारपीट करने. धमकी देने के अलावा दहेज कानून के तहत जेल जाओगे तब पता लगेगा.’’

‘‘मैडम, दहेज एक्ट तो मेरे ऊपर लग ही नहीं सकता. क्योंकि मैं खुद एक महिला हूं.’’ कृष्णा सेन ने कहा.

यह बात सुनते ही एसआई मंजू ज्वाला के साथ वहां मौजूद सभी पुलिसकर्मी कृष्णा सेन को गौर से देखने लगे.

‘‘मैडम मैं सही कह रही हूं, लड़का नहीं बल्कि मैं लड़की हूं.’’ उस ने फिर जोर दे कर कहा. अब पुलिस को मामला गंभीर नजर आने लगा. एसआई मंजू ज्वाला के दिमाग में एक सवाल यह भी आया कि जब यह लड़की है तो इस ने एक नहीं, बल्कि 2-2 लड़कियों से शादी क्यों की. एसआई संजय जोशी ने यह बात एसएसपी को बताई तो उन्होंने अभियुक्त को उन के सामने पेश करने को कहा.

 

एसएसआई संजय जोशी और एसआई मंजू ज्वाला अभियुक्त कृष्णासेन को कप्तान साहब के पास ले गए. एसएसपी ने भी आरोपी से पूछताछ की तो कृष्णा ने वही बात उन के सामने भी दोहरा दी.

कप्तान साहब को भी ताज्जुब इस बात से हो रहा था कि कृष्णा सेन ने लड़का बन कर प्रियंका के साथ शादी ही नहीं की बल्कि वह 4 सालों तक उस के साथ रही और प्रियंका को सच्चाई का पता ही नहीं चला. बहरहाल उन्होंने पुष्टि के लिए कृष्णा सेन को डाक्टरी के लिए महिला अस्पताल भेज दिया. महिला डाक्टर ने कृष्णा सेन का मैडिकल किया तो वास्तव में कृष्णा सेन एक महिला निकली. पुलिस को चकित कर देने वाला यह पहला मामला था.

 

लड़की होते हुए कृष्णा ने क्यों कीं 2 शादियां

 

कृष्णा सेन जब एक लड़की थी तो उस ने लड़का बन कर 2-2 लड़कियों के साथ शादी क्यों की. फिर वह अपना पति धर्म किस तरह से निभाती थी. इन सब बातों के बारे में पुलिस ने उस से पूछताछ की तो एक ऐसी कहानी निकल कर आई जिसे जान कर आप भी दंग रह जाएंगे.

कृष्णा सेन मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के धामपुर की गंगा कालोनी की रहने वाली थी. उस के पिता चंद्रसेन की मृत्यु के बाद मां निर्मला देवी ही घर संभालती थीं. कुल मिला कर वे लोग 2 बहन और 2 भाई थे. कृष्णा तीसरे नंबर की थी. कृष्णा सेन को घर में सब प्यार से स्वीटी कहते थे. कृष्णा को बचपन से ही लड़कों की तरह रहने की आदत थी. घर वाले भी उसे लड़कों के कपड़े पहनाते थे. वह लड़कियों के बजाय लड़कों के साथ ही खेलती थी.

वह खुद को लड़का ही समझती थी. इतना ही नहीं उस ने अपने मांबाप से भी कह दिया था कि उसे लड़का ही समझें. घर में और बाहर भी वह बातचीत लड़कों की तरह करती थी. लड़कों की तरह ही वह छोटेछोटे बाल रखती यानी संबोधन में पुर्ल्ंिलग शब्द प्रयोग करती थी.

जब वह जवान हुई तो हार्मोन असंतुलन की वजह से उस के वक्षों का भी उभार नहीं हुआ. तब उस ने अपनी मां निर्मला देवी से कहा, ‘‘देख मम्मी, मैं लड़की नहीं लड़का ही हूं इसलिए शादी भी लड़की से ही करूंगा.’’ कृष्णा सेन लड़कों के कपड़े पहनती, मोटरसाइकिल भी तेज गति से चलाती थी.

कृष्णा ने फेसबुक पर कई दोस्त बना रखे थे. सन 2012 में उस की दोस्ती काठगोदाम निवासी प्रियंका से हुई. कृष्णा ने खुद को एक बिजनेसमैन का बेटा बताया. उस ने कहा कि उस के पिता चंद्रसेन की अलीगढ़ में सीएफएल बल्ब बनाने की फैक्ट्री है और वह पोस्टग्रैजुएशन कर रहा है.

अपनी लच्छेदार बातों में कृष्णा ने उसे फांस लिया. प्रियंका उसे लड़का ही समझ कर बात करती थी. दोनों ने एकदूसरे को अपने फोटो भी भेज दिए. फिर प्रियंका उसे दिलोजान से चाहने लगी.

करीब 6 महीने बाद 19 जनवरी, 2013 को प्रियंका की छोटी बहन की काठगोदाम में शादी थी. प्रियंका ने बहन की शादी में कृष्णा को भी आने का निमंत्रण दिया. अपनी शानशौकत दिखाने के लिए कृष्णा सेन किराए की कार ले कर प्रियंका की बहन की शादी में शमिल होने के लिए पहुंची.

 

प्रियंका ने उस की मुलाकात अपने घर वालों से कराई. प्रियंका के घर वाले भी कृष्णा को लड़का ही समझे. घर वालों को जब पता चला कि कृष्णा के पिता की सीएफएल बल्ब बनाने की फैक्ट्री है और वह खुद भी पोस्ट ग्रेजुएट है तो वह बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने उस की अच्छी आवभगत की.

कृष्णा और प्रियंका की पहले की तरह ही दोस्ती चलती रही. कृष्णा ने जब प्रियंका से शादी की बात की तो प्रियंका ने कह दिया कि इस बारे में वह खुद आ कर उस के मांबाप से मिल ले.

 

बनठन कर रहने से कृष्णा जमाती थी अपना प्रभाव

 

जनवरी 2014 में कृष्णा सेन किसी की सफारी कार ले कर काठगोदाम में प्रियंका के घर पहुंच गई. अचानक कृष्णा को देख कर घर वाले चौंक गए. कृष्णा सेन ने उन्हें बताया कि वह प्रियंका को प्यार करता है और उस से शादी करना चाहता है.

प्रियंका के मातापिता को अब तक कृष्णा सेन के बारे में जो जानकारी मिली थी उस से यही पता चला कि कृष्णा एक अच्छे परिवार का पढ़ालिखा लड़का है. प्रियंका के भविष्य को देखते हुए वह उन्हें सही लगा, इसलिए उन्होंने कृष्णा की शादी वाली बात मान ली. घर वालों के सहमत होने पर प्रियंका और कृष्णा बहुत खुश हुए.

उधर कृष्णा सेन ने अपने घर वालों से कह दिया कि वह काठगोदाम की रहने वाली प्रियंका से शादी करना चाहता है. प्रियंका के घर वाले इस के लिए तैयार हैं.

 

यह बात सही थी कि प्रियंका और उस के घर वाले नहीं जानते थे कि कृष्णा लड़की है. वह तो उसे लड़का ही समझते थे, लेकिन कृष्णा की मां निर्मला देवी अच्छी तरह जानती थीं कि कृष्णा लड़का नहीं लड़की है. इस के बावजूद उस ने कृष्णा की शादी वाली बात का विरोध नहीं किया बल्कि खुशीखुशी उस की शादी प्रियंका से कराने के लिए तैयार हो गई. इतना ही नहीं, वह इस संबंध में प्रियंका के मांबाप से मिली और बातचीत कर के सगाई का दिन भी निश्चित कर दिया.

 

होटल में रचाई शादी

 

प्रियंका के घर वालों ने लेमन होटल में सगाई के कार्यक्रम का दिन निश्चित किया. तब निर्धारित तिथि पर कृष्णा अपनी मां निर्मला देवी, बहन सोनल और भाई गौरव को ले कर लेमन होटल पहुंच गई. सगाई के बाद 14 फरवरी, 2018 को कृष्णा घोड़ी, बैंडबाजे के साथ बारात ले कर प्रियंका के यहां पहुंची. बारात में उस के घर वाले, रिश्तेदार सहित करीब 50 लोग भी शामिल थे.

अब यह बात समझ में नहीं आ रही थी कि बारात में शामिल अधिकांश लोग जानते थे कि कृष्णा लड़का नहीं लड़की है. वह पति की जिम्मेदारियां कैसे निभाएगी. इस के बावजूद भी वे प्रियंका की जिंदगी बरबाद होने की शुरुआत होने के गवाह बनने को आतुर थे. लड़की वालों ने शादी के लिए हल्द्वानी का देवाशीष होटल बुक करा रखा था.

बहरहाल 14 फरवरी, 2018 को बैंडबाजे के साथ कृष्णा सेन की बारात हल्द्वानी के देवाशीष होटल पहुंची और सामाजिक रीतिरिवाज से विवाह संपन्न होने के बाद प्रियंका कृष्णा सेन की पत्नी बन कर धामपुर चली गई.

प्रियंका के घर वालों ने अपनी हैसियत के अनुसार उसे दहेज भी दिया. शादी के बाद अपनी नवविवाहिता से शारीरिक संबंध बनाने के लिए कृष्णा ने औनलाइन  बुकिंग कर के कृत्रिम लिंग मंगा लिया था. कमरे में अंधेरा करने के बाद उस कृत्रिम लिंग को बेल्ट से बांध कर उस ने अपनी सुहागरात मनाई. इसी के द्वारा वह प्रियंका को संतुष्ट करती थी. प्रियंका उस के साथ रह कर खुश थी.

किसी को उस पर शक न हो इसलिए वह सिगरेट और शराब भी पीने लगी थी. लड़कों की तरह वह तेज गति से मोटरसाइकिल चलाती थी.

 

एक दिन कृष्णा ने प्रियंका को विश्वास में ले कर कहा, ‘‘प्रियंका मैं भी अपने पिता की तरह सीएफएल बल्ब की फैक्ट्री लगाना चाहता हूं. मैं काम शुरू करने के लिए अपने पिता से कोई आर्थिक सहयोग नहीं लेना चाहता. ऐसा करो कि तुम अपने घर वालों से ही 8 लाख रुपए का इंतजाम करा दो तो मैं हल्द्वानी या हरिद्वार में सीएफएल बल्ब की अपनी फैक्ट्री लगा लूंगा.’’

यह बात प्रियंका को भी अच्छी लगी कि जब अपनी फैक्ट्री लग जाएगी तो वह भी पति के काम में हाथ बंटा दिया करेगी. यही सोच कर प्रियंका ने अपने मांबाप से जिद कर के कृष्णा के लिए 8 लाख रुपए दिलवा दिए.

ससुराल से पैसे मिले ही कृष्णा ने सेवरले कंपनी की एक नई कार और एक बाइक खरीदी. प्रियंका के घर वालों को शक हुआ कि दामाद ने तो बिजनेस शुरू करने के लिए पैसे लिए थे पर वह तो गाडि़यां खरीद लाया. उन्होंने इस बारे में कृष्णा से बात की तो उस ने बताया कि बड़ा कारोबार है. फैक्ट्री खोलने के लिए मेरे पास पैसा है, लेकिन कारोबार चलाने के लिए कार का होना जरूरी है.

शादी के बाद कृष्णा सेन प्रियंका से दूर रहने लगी थी. वह 10-15 दिन तक घर नहीं आती थी. बाद में कृष्णा ने हल्द्वानी की तिकोनिया कालोनी में एक मकान किराए पर ले लिया. किराए के मकान में भी वह 10-15 दिन तक घर नहीं आती तो प्रियंका उस से इस बारे में पूछती. तब वह कह देती कि बिजनैस के सिलसिले में उसे अलगअलग शहरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं.

 

अब वह शराब पी कर भी आने लगी थी. प्रियंका उस से शराब पीने को मना करती तो वह उसे धमका देती थी. इस के अलावा धमकी भी दे देती कि मेरे बडे़ लोगों से संबंध हैं. उस के डर की वजह से प्रियंका डरीसहमी सी रहती थी. धीरेधीरे उन का जुबानी झगड़ा मारपीट पर पहुंचने लगा. इस परेशानी के चलते जब प्रियंका का मन होता, वह कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली जाती थी.

इसी बीच कृष्णा सेन ने कालाढूंगी के रहने वाले अपने दोस्त की बहन सरिता को भी अपने प्रेमजाल में फांस लिया. सरिता उस समय 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी. फिर दोस्त के घर वालों की सहमति से उस ने 14 अप्रैल, 2016 को सरिता से भी शादी कर ली. प्रियंका उस समय अपने मायके में थी. कृष्णा सेन दूसरी पत्नी सरिता को अपने तिकोनिया कालोनी वाले घर में ले आई. साथ रहने के बावजूद सरिता को यह पता नहीं लग सका कि जिस कृष्णा को वह पति समझती है, वह खुद एक लड़की है.

सरिता को यह भी जानकारी नहीं थी कि कृष्णा पहले से शादीशुदा है. उस के पहले से शादीशुदा होने वाली बात तो तब पता लगी जब प्रियंका ने हंगामा किया था. इस के बाद कृष्णा अपनी दोनों बीवियों को धमकी देती रही कि वे शांत हो कर रहें, नहीं तो उन के मायके वालों को नुकसान हो सकता है.

दोनों पत्नियां करीब 4 महीने तक साथसाथ रहीं. यानी कृष्णा दोनों को धमकाती रही. इस के बाद प्रियंका और सरिता अपने मायके चली गईं. उन के जाने के बाद कृष्णा ने तिकोनिया कालोनी वाला मकान खाली कर दिया.

प्रियंका कृष्णा सेन के साथ करीब 4 सालों तक रही लेकिन वह उस की सच्चाई नहीं जान सकी. पति की कुछ बातों को ले कर प्रियंका को एक दो बार शक जरूर हुआ लेकिन उस ने उसे गंभीरता से नहीं लिया.

कृष्णा कभी भी खुले में अपने कपड़े नहीं बदलती थी. दूसरे वह अन्य मर्दों की तरह खुले में पेशाब नहीं करती थी. जब वह उस के साथ वैष्णो देवी गई तो कृष्णा ने हमेशा दरवाजे वाला बाथरूम ही प्रयोग किया था. अब हकीकत सामने आने पर प्रियंका की समझ में आ गया कि वह ऐसा क्यों करती थी.

कृष्णा के गिरफ्तार होने के बाद पुलिस को एक और जानकारी यह मिली कि वह एक जालसाज है. उस ने शहर के कई लोगों के साथ ठगी की थी. उस ने हल्द्वानी के एक कारोबारी से करीब डेढ़ लाख रुपए का फरनीचर बनवाया था, जिस के पैसे उस ने कारोबारी को नहीं दिए थे.

 

और लोगों को भी ठगा कृष्णा ने

 

शहर में ही मंगल पड़ाव स्थित मोबाइल की एक दुकान से उस ने करीब डेढ़ लाख रुपए की कीमत का एक आईफोन लिया था. उस ने दुकानदार को इस के बदले जो चेक दिया था वह वाउंस हो गया था. तब दुकानदार ने कृष्णा सेन के खिलाफ न्यायालय में केस दायर कर दिया था.

दूसरी पत्नी सरिता के घर वालों से भी उस ने 65 हजार रुपए ठगे थे. इस के अलावा उस ने हरिद्वार के ज्वालापुर में रहने वाली एक शादीशुदा महिला को भी अपने प्रेमजाल में फांस रखा था.

 

पुलिस ने कृष्णा सेन उर्फ स्वीटी से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उसे न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया. जेल में बैरक में भेजने से पहले जेल प्रशासन ने उस की 2 बार जांच कराई. जेल अधीक्षक मनोज आर्य ने खुद पुलिस और न्यायालय से आए सभी दस्तावेजों को गौर से देखा.

जेल में महिला कर्मचारियों ने उस की 2 बार सघन तलाशी ली. जब जेल प्रशासन को इस बात की पुष्टि हो गई कि कृष्णा सेन महिला है, तभी उसे महिला बैरक में भेजा गया.

पुलिस को यह बात समझ नहीं आ रही कि कृष्णा सेन के घर वालों को जब उस के लड़की होने की जानकारी थी तो उन्होंने प्रियंका से उस की शादी क्यों कराई. पुलिस उस के घर वालों से पूछताछ कर यह पता लगाएगी कि कहीं ठगी के धंधे में घर वाले तो शरीक नहीं थे.

पुलिस ने कृष्णा सेन का राशन कार्ड बरामद कर लिया है, जिस में वह फीमेल के रूप में दर्ज है. जबकि उस के पैन कार्ड और वोटर आईडी कार्ड में उसे मेल दर्शाया गया है. कथा लिखे जाने तक पुलिस मामले की जांच कर रही थी.

— कथा में सरिता परिवर्तित नाम है.

 

धर्मभाई निकला कसाई

लोकगायक सुरेंद्र चंचल और जसवंत कौर ने कभी सोचा भी नहीं था कि उन का ड्राइवर मोहिंदर उन्हें हानि पहुंचाने वाला अपराध भी कर सकता है. लेकिन जब जसवंत कौर का यह धर्मभाई अपने असली रूप में आया तो उस ने…

 

लाश का सिर पूर्व की तरफ था, टांगें पश्चिम की ओर. आंखें बंद और मुंह खुला हुआ. दोनों पैर बिस्तर से नीचे लटके थे, जिन में जूती पहनी हुई थी. घटनास्थल को देख कर पहली ही नजर में लग रहा था कि अपराधियों को मृतका जानती थीं. उन्होंने बिस्तर से उठ कर पैरों में जूती पहनने के बाद इत्मीनान से मुख्य दरवाजे तक पहुंच कर कुंडी खोली होगी.

मृतका के सिर पर 2 गहरे घाव थे. खून बह कर बिस्तर पर फैल गया था. गरदन में सलवार का पोंहचा कस कर बंधा हुआ था. बैड पर ही करीब 8 वर्षीया लड़की की लाश भी पूर्व-पश्चिम दिशा में ही पड़ी थी. लाल रंग के ऊनी स्कार्फ से उस के गले पर भी कस कर गांठ बांध दी गई थी.

अंबाला के थाना बलदेवनगर के प्रभारी रामचंदर राठी ने फोन से मिली सूचना पर राजविहार क्षेत्र की उस कोठी में जा कर उक्त दर्दनाक मंजर देखा था. उस वक्त दिन के साढ़े 11 बज रहे थे.

कोठी के भीतरबाहर लोगों का हुजूम था.

‘‘थाने में फोन किस ने किया था?’’ राठी ने लोगों से पूछा.

‘‘जी सर, मैं ने किया था.’’ करीब 45 वर्ष के दिखने वाले एक सिख ने आगे आते हुए कहा.

उस ने खुद को राजविहार के साथ लगते गांव बरनाला पंजोखरा का सरपंच जसमेर सिंह बता कर आगे कहना शुरू किया, ‘‘अभी कुछ देर पहले मैं इधर से गुजर रहा था कि इस कोठी के सामने भीड़ देख कर रुक गया. दरियाफ्त करने पर कोठी में 2 कत्ल हो जाने का पता चला तो अपना फर्ज समझ कर मैं ने थाने में फोन कर दिया.’’

‘‘ठीक है, धन्यवाद. अब आप पुलिस की इतनी मदद करें कि अपनी तहरीर हमें दे दें, जिस पर एफआईआर दर्ज करवा कर हम अपनी काररवाई आगे बढ़ाएं.’’

इस के बाद राठी ने इस कांड की सूचना कंट्रोलरूम के माध्यम से फ्लैश करवा दी.

इधर जसमेर सिंह से तहरीर ले कर एफआईआर दर्ज करने के लिए थाने भिजवाई गई, उधर क्राइम टीम के इंचार्ज कुलविंदर सिंह व डौग स्क्वायड के हैंडलर महिंद्रपाल के अलावा पुलिस फोटोग्राफर महेंद्र सिंह भी घटनास्थल पर आ पहुंचे. इन्होंने अपनी काररवाई शुरू की ही थी कि सीआईए इंसपेक्टर रिसाल सिंह और डीएसपी (मुख्यालय) करण सिंह भी वहां आ गए.

कुछ वक्त में सभी ने अपनी काररवाइयां पूरी कर लीं. प्रशिक्षित डौग मुख्य सड़क पर पहुंच कर रुक जाता था. लिहाजा यही अनुमान लगाया गया कि हत्यारे वारदात को अंजाम दे कर मुख्य सड़क तक पैदल गए होंगे और वहां से किसी वाहन पर सवार हो कर निकल भागे होंगे.

 

सीआरपीसी की धारा 174 के अंतर्गत काररवाई करते हुए दोनों लाशों का पंचनामा तैयार कर शवों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवाने के बाद राठी ने खून सने बिस्तर कपड़े वगैरह कब्जे में लेने की काररवाई की. फिर उपस्थित लोगों की सहायता से घटना के सूत्र जोड़ने शुरू किए.

वह मकान प्रसिद्ध लोकगायक जोड़ी सुरेंद्र सिंह चंचल और जसवंत कौर का था. मरने वाली बच्ची इन की 8 वर्षीया बेटी मनप्रीत कौर उर्फ श्रेया थी. 65 वर्षीया मृतक वृद्धा थीं जसवंत कौर की मां दलजीत कौर. गायक पतिपत्नी अपने ट्रुप के साथ अकसर दौरे पर रहा करते थे. पीछे नानीदोहती इस कोठी में अकेली रहती थीं. गायक जोड़ी उन दिनों भी अमेरिका गई हुई थी.

सिवाय इन चंद बातों के राठी को उस वक्त अन्य कोई जानकारी नहीं मिल पाई. घटनास्थल की काररवाई पूरी कर वह थाने लौट गए. तब तक थाने में सरपंच जसमेर सिंह की तहरीर के आधार पर भादंवि की धारा 302 के तहत एफआईआर दर्ज हो चुकी थी. पहली नजर में यह मामला लूटपाट के लिए हत्या का लग रहा था. मगर घर के किसी सदस्य के वहां मौजूद न होने से इस संबंध में फिलहाल निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता था.

मैं उन दिनों शिमला गया हुआ था. डीएसपी करण सिंह से मुझे इस हत्याकांड की जानकारी मिली तो मैं ने राठी को फोन कर के मामले में तेजी लाने और हत्यारों को जल्दी से जल्दी गिरफ्तार करने संबंधी दिशानिर्देश दिए. उस रोज राठी के लिए शायद इस से आगे बढ़ पाना संभव नहीं था. अलबत्ता अब तक के घटनाक्रम का विस्तृत ब्यौरा देने के साथसाथ वह आगे की काररवाई के बारे में भी मुझे विस्तार से बताता रहा.

इस के अगले दिन उस ने जो कुछ मुझे बताया, उस के अनुसार एक लड़का थाने में उस से मिलने आया था. उस ने अपना नाम रंजीत सिंह बताते हुए राठी से कहा था कि वह पटियाला में रहता है और अपनी बुआ जसवंत कौर व फूफा सुरेंद्र चंचल के साथ गानेबजाने का काम करता है. 2 दिन पहले जब उस के फूफा और बुआ को प्रोग्राम देने अमेरिका जाना था, वह पटियाला से पहले लुधियाना गया था और वहां से ड्राइवर मोहिंदर कुमार को साथ ले कर अंबाला आया था.

 

रंजीत द्वारा राठी को बताए अनुसार, फालतू सामान कोठी के कमरे में रखते समय बुआ ने उस की दादी दलजीत कौर को खर्चे के लिए 50 हजार रुपए नकद दिए थे. इस के बाद वह और मोहिंदर दिल्ली एयरपोर्ट तक के लिए टैक्सी करने अंबाला छावनी चले गए.

जब भी फूफा और बुआ को प्रोग्राम के लिए बाहर जाना होता था तो वह कार घर पर पार्क करवा कर ड्राइवर मोहिंदर को छुट्टी दे देते थे. कभीकभी वह वह कार अपने घर लुधियाना भी ले जाया करता था. उन दिनों वह एक रोज के लिए कार ले कर गया था. रंजीत के जरिए उसे वापस बुलवा लिया गया था.

‘‘कार घर पर पार्क कर के हम लोग टैक्सी से पालम एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए. गाड़ी में टैक्सी ड्राइवर के अलावा मोहिंदर, मैं और बुआ फूफा थे. फ्लाइट का समय होने पर फूफा और बुआ एयरपोर्ट के अंदर चले गए. टैक्सी वाले को भी हम ने फारिग कर दिया था.

फ्लाइट चली जाने पर मैं और मोहिंदर बस से अंबाला के लिए चल पड़े. इस से पहले विदा होते वक्त बुआ ने मोहिंदर और मुझ से कहा था कि हम पहले अंबाला बीबी (दलजीत कौर) के पास जा कर उन की जरूरतों की बाबत पूछे और उस के बाद ही कहीं और जाएं.’’ रंजीत ने राठी को बताया था.

 

उस के आगे बताए अनुसार मोहिंदर ने एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही अपनी मजबूरी जता दी थी कि उसे लुधियाना में जरूरी काम है सो वह अंबाला नहीं जा पाएगा. दिल्ली से हमें लुधियाना के रूट वाली बस मिल गई, जिस पर सवार हो कर रंजीत अंबाला के बलदेवनगर में उतर गया व मोहिंदर उसी बस से लुधियाना चला गया.

उसी शाम करीब 4 बजे दलजीत कौर से मुलाकात करने के बाद रंजीत पटियाला जाने के लिए जब बलदेवनगर स्टापेज से बस पर चढ़ा तो उसे लुधियाना की ओर से आने वाली बस से मोहिंदर उतरते दिखा. उसे देख कर उस के मन में यही बात आई कि वह बीबी से मिलने आया होगा.

मगर इस के अगले दिन उसे किसी से इस हत्याकांड की खबर मिली. उस ने अमेरिका फोन कर के फूफा और बुआ को घटना के बारे में बताया. यह दुखद समाचार सुनते ही फूफा ने उसे तुरंत अंबाला पहुंचने को कहा. साथ ही कहा कि जब तक वे लोग वापस नहीं आ जाते, लाशों का संस्कार न किया जाए.

राठी ने सीआरपीसी की धारा 161 के तहत रंजीत का बयान दर्ज कर लिया.

अगले दिन मैं भी शिमला से लौट आया. मैं ने देखा इस केस को ले कर अंबाला पुलिस की काफी किरकिरी हो रही थी. मेरे अंबाला पहुंचते ही अखबार वालों ने मुझे घेर लिया. वाकई यह केस हमारे लिए चुनौती बना हुआ था. उसी रोज मैं ने पुलिस की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई. इस मीटिंग में जो अंतिम निष्कर्ष निकला, वह यही था कि किसी भी तरह मोहिंदर को राउंडअप कर के उस से पूछताछ की जाए.

मगर उस का पता किसी को मालूम नहीं था. रंजीत ने हमें उस के लुधियानावासी होने की जानकारी दी थी. फिर वह हमें वहां के एक घर में ले भी गया था, लेकिन मालूम पड़ा कि 2 दिन पहले वह यहां का अपना किराए का कमरा खाली कर के चला गया था. कहां गया था, इस की किसी को खबर नहीं थी. न ही किसी को उस के मुस्तकिल पते की जानकारी थी.

 

हमें लगा कि उस का पक्का पता सुरेंद्र चंचल अथवा जसवंत कौर के पास जरूर होगा. अब उन से फोन पर भी संपर्क नहीं हो पा रहा था. वे इंडिया के लिए निकल चुके थे. मोबाइल फोंस की तब तक शुरुआत नहीं हुई थी.

खैर, उसी दिन गायक दंपति अंबाला पहुंच गए. सब से पहले उन्होंने मुझ से ही संपर्क किया. मैं ने थाने में इन के भी 161 के बयान दर्ज करवा दिए.

ये लोग मूलरूप से लुधियाना के गोपालनगर के रहने वाले थे. अंबाला में उन का हवेलीनुमा मकान था. मगर आतंकवाद के दिनों में इन लोगों ने अंबाला के बलदेवनगर में अपना मकान बनवा लिया था.

दोनों व्यावसायिक सिंगर थे. प्रोग्राम देने के लिए उन्हें अकसर घर से बाहर जाना पड़ता था. इस के लिए उन्होंने अंबेसडर कार रखी हुई थी, जिसे मोहिंदर कुमार पुत्र मनोहरलाल निवासी गोराया, जालंधर चलाया करता था. इन दिनों वह लुधियाना में रहता था, जहां उस की पत्नी किसी फैक्ट्री में नौकरी करती थी.

 

गायक जोड़ी को जब प्रोग्राम देने विदेश जाना होता था, कार अंबाला वाले घर में पार्क कर दी जाती थी. किसी को भी यह कार चलाने की मनाही होती थी. इन दिनों मोहिंदर अपने परिवार के साथ लुधियाना चला जाया करता था. इस बार भी ऐसा ही हुआ था.

पिता के देहांत के बाद परिवार में होने वाले संपत्ति विवाद से परेशान हो कर पिछले कुछ समय से जसवंत कौर अपनी मां को अपने साथ रखे हुए थीं. उन की एकलौती बेटी स्थानीय कौनवेंट स्कूल की तीसरी कक्षा में पढ़ती थी.

अपने बयान दर्ज करवाने के बाद गायक दंपति ने घर पहुंच कर चोरी गए सामान की सूची तैयार की. नकदी और गहने वगैरह मिला कर यह भारीभरकम चोरी का मामला था. हालांकि इन लोगों को इस नुकसान की बजाए परिवार के 2 सदस्यों के कत्ल हो जाने का गहरा सदमा था. वे यही गुहार लगाए हुए थे कि कातिलों को जल्दी से जल्दी पकड़ा जाए.

 

मैं ने मामले में रुचि लेते हुए उन लोगों को अपने औफिस में बुलवा कर हत्याकांड में किसी पर शक होने की बाबत पूछा. उन्होंने स्पष्ट रूप से तो कुछ नहीं कहा, अलबत्ता उन की बातों से यह जरूर लगा कि उन्हें मोहिंदर पर शक था. हमारे शक की सुई पहले ही उस तरफ जा रही थी. लिहाजा उन्हें साथ ले कर एक पुलिस पार्टी लुधियाना के अलावा कुछ अन्य जगहों पर भी भेजी गई, लेकिन मोहिंदर पुलिस के हत्थे न चढ़ा.

इस तरह 5 दिनों का समय और निकल गया, मगर हम लोग उसे पकड़ पाने में नाकाम रहे.

उन दिनों इस केस को ले कर यह चर्चा भी जोरों पर थी कि पंजाब के डीजीपी के.पी.एस. गिल के औपरेशन हीलिंग टच में इस गायक दंपति ने गिल के कंधे से कंधा मिला कर गांवगांव में जा कर अपनी कला बिखेरते हुए उन्हें अपना सहयोग दिया था. इस वजह से वे लोग भी आतंकवादियों की निगाहों में आ गए थे. हो सकता है कि उन के घर पर बरपा कहर आतंकवादियों की ही देन हो.

मगर हम लोग इसे आतंकी वारदात कतई नहीं मान रहे थे, इसलिए इस दिशा में हम ने कदम बढ़ाए ही नहीं. हम अपने पहले वाले प्रयासों से ही जुडे़ रहे.

हमारे प्रयास रंग लाए. आखिर हम ने लुधियाना के शिमलापुरी इलाके से मुखबिरी के आधार पर मोहिंदर को पकड़ लिया. उस ने छूटते ही कहा, ‘‘मेरी बहन बनी हुई है जसवंत कौर, मुझे पिछले कई सालों से राखी बांधती आ रही है. घर के सब लोग मुझ पर पूरा विश्वास करते थे. बीबी और श्रेया का कत्ल होने की बात मुझे अब आप लोगों से मालूम पड़ रही है.’’

मगर जब उसे अंबाला ला कर कस्टडी रिमांड में ले कर पूछताछ शुरू की गई तो उसे टूटते देर नहीं लगी. दोनों हत्याओं का अपराध कबूल करते हुए उस ने बताया कि लूटे गए रुपए व जेवरात उस की बीवी किरनबाला के पास थे. इस पर किरन को भी लुधियाना के एक घर से गिरफ्तार कर लिया गया. उसे भी अदालत पर पेश कर के कस्टडी रिमांड हासिल करने के बाद हम ने पतिपत्नी से व्यापक पूछताछ की.

इस पूछताछ में जो कुछ उन्होंने हमें बताया, उस से इस डबल मर्डर के पीछे की कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

 

किरनबाला की शादी लुधियाना के गांव अमरोली निवासी धर्मपाल के साथ हुई थी, जिस की 8 महीने बाद सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. इस के कुछ समय बाद ही किरन ने एक बेटे को जन्म दिया. इसे ले कर विधवा के रूप में वह अपने पिता के साथ लुधियाना में जा कर रहने लगी.

कुछ अरसा बाद पिता ने उस की शादी मोहिंदर कुमार से कर दी. गायक जोड़ी उन दिनों लुधियाना में ही रह रही थी, जिन के यहां मोहिंदर नौकरी करता था. मोहिंदर भले ही कार ड्राइवर था, लेकिन मालकिन जसवंत कौर ने उसे अपना धर्मभाई बना लिया था.

इस सिलसिले में मोहिंदर ने हमें बताया था कि धर्मभाई तो वह बन गया था, मगर जसवंत कौर ने धर्मभाई के नाम पर कम पैसों में ज्यादा काम लेने का सिलसिला बना लिया था. वह उसे कई बार अपने प्रोग्रामों में भी ले जाया करती थी, जहां इन लोगों के साथ पूरी रात जागने पर उसे 50 रुपए मिला करते थे.

किरनबाला के पास पहले से लड़का था, मोहिंदर से शादी के बाद 2 लड़कियां और हो गईं. हालांकि मियांबीवी दोनों कमाते थे तो भी इतनी कमाई न थी कि घर की गुजर सलीके से हो पाती. बकौल मोहिंदर उस की मालकिन के पास खूब पैसा था, लुटाती भी दोनों हाथों से थी मगर अपने व अपने परिवार पर. उस ने उन लोगों की समस्या को समझने का कभी प्रयास नहीं किया था. बस धर्मभाई कह कर ही अपना उल्लू साधती रहती थी.

मोहिंदर के बताए अनुसार, विदेश जाते वक्त महज कुछ दिनों के गुजारे के लिए जसवंत कौर ने अपनी मां के हाथ पर नोटों की गड्डियां रख दी थीं, जबकि उस से केवल यह बोला गया था कि धर्मभाई होने के नाते उसे उस की मां का पूरा ध्यान रखना होगा, भले ही उसे लुधियाना से कितनी बार भी अंबाला आना पड़े. इस के लिए जसवंत ने उसे 500 रुपए दिए थे.

बकौल मोहिंदर दिल्ली से लौटने के बाद वह पसोपेश में था. जसवंत कौर पर उसे गुस्सा था, साथ ही पैसों की जरूरत भी थी. आखिर एक योजना बना कर वह उस रोज रात के 11 बजे राजविहार वाली कोठी पर जा पहुंचा. हालांकि इस से पहले लुधियाना जा कर वह 4 बजे अंबाला भी आ आया था. मगर इधरउधर घूम कर टाइम पास कर के रात गहराने का इंतजार करता रहा था.

 

खैर, रात में 11 बजे कोठी पर पहुंच कर उस ने घंटी बजाई तो वृद्धा दलजीत कौर ने दरवाजा खोलते हुए उस से पूछा, ‘‘तुम! इतनी रात गए?’’

मोहिंदर ने बस खराब होने का बहाना बना दिया. मोहिंदर द्वारा हमें बताए अनुसार, इस के बाद दलजीत कौर ने उस से भीतर चल कर खाना खा लेने को कहा. इस पर खाना खा चुकने की बात कहते हुए उस ने दलजीत कौर से उस का एक काम कर देने को कहा. इस तरह बातचीत करते हुए वे दोनों भीतर चले गए.

भीतर श्रेया अभी जाग रही थी. वह बैड पर रजाई में दुबकी बैठी थी. सामने टीवी चालू था. दलजीत कौर भी उस के पास बैड के किनारे बैठ गईं.

 

बकौल मोहिंदर वह कुछ देर वहीं खड़ा टीवी पर आते दृश्यों को देखता रहा. फिर दलजीत कौर की ओर इत्मीनान से बढ़ते हुए बोला, ‘‘बीबी, मैं ने आप से कहा है कि आप मेरा एक काम कर दो.’’

‘‘हां, कहो क्या काम है?’’ दलजीत कौर ने सहज भाव से पूछा.

‘‘जसवंत ने चलते वक्त जो पैसा आप को दिया है, वह मुझे दे दो.’’

‘‘क्यों, तुम्हें इतने पैसों का क्या करना है?’’

‘‘और आप को इन रुपयों का क्या करना है?’’

‘‘मेरी बहुत सी जरूरतें हैं.’’

‘‘आप लोगों की ऐसी कोई खास जरूरत नहीं, जिस के लिए इतना पैसा चाहिए. मेरी जरूरतें आप से भी कहीं ज्यादा और अहम हैं.’’

‘‘तुम्हें तनख्वाह नहीं मिलती क्या? उस से अपनी जरूरतें पूरी किया करो. फिर प्रोग्राम पर जाने का अलग से पैसा मिलता है. खानेओढ़ने को भी अकसर यहां से मिल जाता है. तो और कौन सी जरूरतें रह गईं तुम्हारी?’’

‘‘देखो बीबी, रुपया चुपचाप मेरे हवाले कर दो. तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, मेरे कई काम संवर जाएंगे. न दिए तो तुम्हें मार डालूंगा और तुम्हारी इस नवासी को भी.’’

मोहिंदर के बताए मुताबिक, उस ने यह बात कहते वक्त श्रेया की ओर इशारा भी किया. वह अभी तक टीवी देखने में मस्त थी. बात उस के कानों में पड़ी तो उस ने पास पड़ा लकड़ी का सोटा उठा कर मोहिंदर पर वार कर दिया.

‘‘एक छोटी बच्ची से मुझे यह उम्मीद कतई न थी. फिर उस का दुस्साहस देख कर मैं एकबारगी चौंका, वहीं गुस्से से भी भर उठा. तेजी से पीछे घूम कर मैं ने सोटा श्रेया से छीन लिया. फिर उसी से दलजीत कौर व श्रेया पर दनादन वार करने लगा. दोएक दफा दोनों चीखीं, फिर उन की आवाजें गले में ही घुट कर रह गईं.

दोनों निढाल हो कर बैड पर गिर पड़ीं. सोटे के वार से दलजीत कौर का सिर 2 जगह से फट गया. उन दोनों के मर जाने का विश्वास मुझे हो गया था तो भी मैं ने पास पड़े स्कार्फ से श्रेया की ओर सलवार के पोंहचे से दलजीत कौर की गरदन बुरी तरह कस कर गला घोंट दिया. इस के बाद जो कुछ हाथ लगा, बैग में डाल लिया.

रात में ही मैं वापस लुधियाना जा कर लूटा गया सारा सामान और नकद पैसा अपनी घरवाली के हवाले कर आया. पहले तो वह घबराई, फिर रातोंरात अमीर बनते देख सहज हो गई. इस के बाद अगले ही दिन किराए का मकान छोड़ कर हम शिमलापुरी में रहने लग गए.’’ मोहिंदर ने हमें बताया.

पूछताछ के बाद हम लोगों ने मोहिंदर व उस की घरवाली की निशानदेही पर लूटा गया सारा सामान मय नकदी के बरामद कर लिया.

आगे की काररवाई के लिए विवेचक रामचंदर राठी ने  केस के अभियुक्तों के खिलाफ चार्जशीट अभी अदालत में दाखिल नहीं की थी, तभी उस का तबादला कुरुक्षेत्र हो गया. उस की जगह आए इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह ने चालान तैयार कर अदालत में पेश कर दिया. इस के बाद मेरा ट्रांसफर भी अंबाला पुलिस चीफ से एसपी (क्राइम) के पद पर हो गया. केस सेशन कमिट हो कर अंबाला के सत्र न्यायालय में चलता रहा, जहां से मोहिंदर को उम्रकैद और उस की पत्नी किरनबाला को 3 साल कैद बामशक्कत की सजा हुई.

मुझे याद है कि एक दिन जब मैं मोहिंदर से पूछताछ कर रहा था तो उस ने मुझ से एक साथ 3 बातें बोली थीं, ‘‘साहब, आज जितनी भी ज्यादतियां हो रही हैं, सब रिश्तों के नाम पर ही होती हैं. जसवंत कौर ने मुझे अपना धर्मभाई बना कर जो मान बख्शा, उस रिश्ते की आड़ में वह मुझ से ज्यादतियां भी करती रही. ज्यादती और बेबसी की अगली सीढ़ी अपराध ही होती है जो मैं ने किया.’’

मुझ से कहे बिना न रहा गया था कि आधार कोई भी हो, अपराध तो अपराध है. अपराध को अंजाम देने के बाद अपराधी को उस अपराध की सजा तो भुगतनी ही पड़ती है.

कथा में पात्रों के नाम बदले हुए हैं.

— बलजीत सिंह संधू    डीजीपी हरियाणा