21 मार्च, 2019 की बात है. उस दिन होली थी. होलिका दहन के अगले दिन रंग गुलाल से खेले जाने वाले त्यौहार का आमतौर पर दोपहर तक ही धूमधड़ाका रहता है. दोपहर में रंगेपुते लोग नहाधो कर अपने चेहरों से रंग उतारते हैं. फिर अपने कामों में लग जाते हैं. कई जगह शाम के समय लोग अपने परिचितों और रिश्तेदारों से मिलने भी जाते हैं.
भीलवाड़ा के पाटील नगर का रहने वाला शिवदत्त शर्मा भी होली की शाम अपने दोस्त राजेश त्रिपाठी से मिलने के लिए अपनी वेरना कार से बापूनगर के लिए निकला था. शिवदत्त ने जाते समय पत्नी शर्मीला से कहा था कि वह रात तक घर आ जाएगा. थोड़ी देर हो जाए तो चिंता मत करना.
शिवदत्त जब देर रात तक नहीं लौटा तो शर्मीला को चिंता हुई. रात करीब 10 बजे शर्मीला ने पति के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन मोबाइल स्विच्ड औफ मिला. इस के बाद शर्मीला घरेलू कामों में लग गई. उस के सारे काम निबट गए, लेकिन शिवदत्त घर नहीं आया था. शर्मीला ने दोबारा पति के मोबाइल पर फोन किया. लेकिन इस बार भी उस का फोन स्विच्ड औफ ही मिला. उसे लगा कि शायद पति के मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई होगी, इसलिए स्विच्ड औफ आ रहा है.
शर्मीला बिस्तर पर लेट कर पति का इंतजार करने लगी. धीरेधीरे रात के 12 बज गए, लेकिन शिवदत्त घर नहीं आया. इस से शर्मीला को चिंता होने लगी. वह पति के दोस्त राजेश त्रिपाठी को फोन करने के लिए नंबर ढूंढने लगी, लेकिन त्रिपाठीजी का नंबर भी नहीं मिला.
शर्मीला की चिंता स्वाभाविक थी. वैसे भी शिवदत्त कह गया था कि थोड़ीबहुत देर हो जाए तो चिंता मत करना, लेकिन घर आने की भी एक समय सीमा होती है. शर्मीला बिस्तर पर लेटेलेटे पति के बारे में सोचने लगी कि क्या बात है, न तो उन का फोन आया और न ही वह खुद आए.
पति के खयालों में खोई शर्मीला की कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला. त्यौहार के कामकाज की वजह से वह थकी हुई थी, इसलिए जल्दी ही गहरी नींद आ गई.
वाट्सऐप मैसेज से मिली पति के अपहरण की सूचना
22 मार्च की सुबह शर्मीला की नींद खुली तो उस ने घड़ी देखी. सुबह के 5 बजे थे. पति अभी तक नहीं लौटा था. शर्मीला ने पति को फिर से फोन करने के लिए अपना मोबाइल उठाया तो देखा कि पति के नंबर से एक वाट्सऐप मैसेज आया था.
शर्मीला ने मैसेज पढ़ा. उस में लिखा था, ‘तुम्हारा घर वाला हमारे पास है. इस पर हमारे एक करोड़ रुपए उधार हैं. यह हमारे रुपए नहीं दे रहा. इसलिए हम ने इसे उठा लिया है. हम तुम्हें 2 दिन का समय देते हैं. एक करोड़ रुपए तैयार रखना. बाकी बातें हम 2 दिन बाद तुम्हें बता देंगे. हमारी नजर तुम लोगों पर है. ध्यान रखना, अगर पुलिस या किसी को बताया तो इसे वापस कभी नहीं देख पाओगी.’
मोबाइल पर आया मैसेज पढ़ कर शर्मीला घबरा गई. वह क्या करे, कुछ समझ नहीं पा रही थी. पति की जिंदगी का सवाल था, घबराहट से भरी शर्मीला ने अपने परिवार वालों को जगा कर मोबाइल पर आए मैसेज के बारे में बताया.
ये क्राइम स्टोरी भी पढ़ें – कहानी कुछ और थी : प्रेमिका का किया अपहरण
मैसेज पढ़ कर लग रहा था कि शिवदत्त का अपहरण कर लिया गया है. बदमाशों ने शिवदत्त के मोबाइल से ही मैसेज भेजा था ताकि पुष्टि हो जाए कि शिवदत्त बदमाशों के कब्जे में है. यह मैसेज 21 मार्च की रात 9 बज कर 2 मिनट पर आया था, लेकिन उस समय शर्मीला इसे देख नहीं सकी थी.
शिवदत्त के अपहरण की बात पता चलने पर पूरे परिवार में रोनापीटना शुरू हो गया. जल्दी ही बात पूरी कालोनी में फैल गई. चिंता की बात यह थी कि अपहर्त्ताओं ने शिवदत्त पर अपने एक करोड़ रुपए बकाया बताए थे और वह रकम उन्होंने 2 दिन में तैयार रखने को कहा था.
शर्मीला 2 दिन में एक करोड़ का इंतजाम कहां से करती? शिवदत्त होते तो एक करोड़ इकट्ठा करना मुश्किल नहीं था लेकिन शर्मीला घरेलू महिला थी, उन्हें न तो पति के पैसों के हिसाब किताब की जानकारी थी और न ही उन के व्यवसाय के बारे में ज्यादा पता था. शर्मीला को बस इतना पता था कि उस के पति बिल्डर हैं.
शर्मीला और उस के परिवार की चिंता को देखते हुए कुछ लोगों ने उन्हें पुलिस के पास जाने की सलाह दी. शर्मीला परिवार वालों के साथ 22 मार्च को भीलवाड़ा के सुभाषनगर थाने पहुंच गई और पुलिस को सारी जानकारी देने के बाद अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी.
पुलिस ने शर्मीला और उन के परिवार के लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि कपड़ा नगरी के नाम से देश भर में मशहूर भीलवाड़ा के पथिक नगर की श्रीनाथ रेजीडेंसी में रहने वाले 42 साल के शिवदत्त शर्मा की हाइपर टेक्नो कंसट्रक्शन कंपनी है. शिवदत्त का भीलवाड़ा और आसपास के इलाके में प्रौपर्टी का बड़ा काम था. उन के बिजनैस में कई साझीदार हैं और इन लोगों की करोड़ों अरबों की प्रौपर्टी हैं.
रिपोर्ट दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी अजयकांत शर्मा ने इस की जानकारी एडिशनल एसपी दिलीप सैनी को दे दी. इस के बाद पुलिस ने शिवदत्त की तलाश शुरू कर दी. साथ ही शिवदत्त की पत्नी से यह भी कह दिया कि अगर अपहर्त्ताओं का कोई भी मैसेज आए तो तुरंत पुलिस को बता दें.
चूंकि शिवदत्त अपने दोस्त राजेश त्रिपाठी के घर जाने की बात कह कर घर से निकले थे, इसलिए पुलिस ने राजेश त्रिपाठी से पूछताछ की. राजेश ने बताया कि शिवदत्त होली के दिन शाम को उन के पास आए तो थे लेकिन वह रात करीब 8 बजे वापस चले गए थे.
ये क्राइम स्टोरी भी पढ़ें – गर्लफ्रेंड के लिए विमान का अपहरण – भाग 2
जांचपड़ताल के दौरान 23 मार्च को पुलिस को शिवदत्त की वेरना कार भीलवाड़ा में ही सुखाडि़या सर्किल से रिंग रोड की तरफ जाने वाले रास्ते पर लावारिस हालत में खड़ी मिल गई. पुलिस ने कार जब्त कर ली. पुलिस ने कार की तलाशी ली, लेकिन उस से शिवदत्त के अपहरण से संबंधित कोई सुराग नहीं मिला. कार भी सहीसलामत थी. उस में कोई तोड़फोड़ नहीं की गई थी और न ही उस में संघर्ष के कोई निशान थे.
पुलिस ने शिवदत्त के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा दिया. लेकिन मोबाइल के स्विच्ड औफ होने की वजह से उस की लोकेशन नहीं मिल रही थी. जांच की अगली कड़ी के रूप में पुलिस ने शिवदत्त, उस की पत्नी और कंपनी के स्टाफ के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. इस के अलावा शिवदत्त के लेनदेन, बैंक खातों, साझेदारों के लेनदेन से संबंधित जानकारियां जुटाईं. यह भी पता लगाया गया कि किसी प्रौपर्टी को ले कर कोई विवाद तो नहीं था.
दिल्ली से सटे गाजियाबाद में हिंडन नदी किनारे स्थित साईं उपवन बड़ा ही रमणीक स्थल है. यहां पर साईंबाबा का प्रसिद्ध मंदिर है. 25 मार्च, 2019 सोमवार को सुबह का वक्त था. श्रद्धालुजन साईं मंदिर में आते जा रहे थे. उसी समय लाल रंग की स्कूटी से गोरे रंग की खूबसूरत युवती और एक स्मार्ट सा दिखने वाला युवक वहां पहुंचे.
स्कूटी को उपवन परिसर के बाहर एक ओर खड़ी कर वे दोनों मंदिर में प्रवेश कर गए. कोई 10 मिनट के बाद जब वे दोनों साईंबाबा के दर्शन कर के बाहर निकले तो उन के चेहरे खिले हुए थे. यह हसीन जोड़ा आसपास से गुजरने वाले लोगों की नजरों का आकर्षण बना हुआ था. लेकिन उन दोनों को लोगों की नजरों की रत्ती भर भी परवाह नहीं थी. वे अपनी ही दुनिया में मशगूल थे.
जैसे ही दोनों बाहर निकले वह रमणीक इलाका गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा. किसी की समझ में कुछ नहीं आया. तभी वहां मौजूद लोगों को एक आदमी युवक युवती की लाशें बिछा कर तेजी से लिंक रोड की तरफ भागता हुआ दिखाई दिया. लोगों ने देखा कि लाशें उसी नौजवान खूबसूरत जोड़े की थीं, जो अभीअभी वहां से हंसते मुसकराते हुए मंदिर से बाहर निकला था. इसी दौरान किसी ने इस सनसनीखेज घटना की सूचना 100 नंबर पर गाजियाबाद पुलिस को दे दी.
थोड़ी ही देर में सिंहानी गेट के थानाप्रभारी जयकरण सिंह पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. मंदिर परिसर के अंदर लाल सूट पहने एक युवती और एक युवक की रक्तरंजित लाशें औंधे मुंह पड़ी थीं. जयकरण सिंह ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया.
युवक युवती के कपड़े खून से सने थे. वहां पर काफी लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी. जयकरण सिंह ने उन की नब्ज टटोली, लेकिन उन की सांसें उन का साथ छोड़ चुकी थीं. उन्होंने जल्दी से क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को बुला कर घटनास्थल की फोटोग्राफी करवाई और वहां उपस्थित चश्मदीदों से इस घटना के बारे में पूछताछ करनी शुरू की.
कुछ लोगों ने बताया कि मृतक युवती और युवक कुछ ही देर पहले लाल स्कूटी से एक साथ मंदिर आए थे, जब दोनों साईं बाबा के दर्शन करने के बाद बाहर निकल रहे थे, तभी पहले से घात लगाए हत्यारे ने इस वारदात को अंजाम दे दिया.
पुलिस ने जब दोनों लाशों की शिनाख्त कराने की कोशिश की तो भीड़ ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया. यह देख इंसपेक्टर जयकरण सिंह ने आरटीओ औफिस से उस लाल रंग की स्कूटी का विवरण मालूम किया, जिस से वे आए थे. आरटीओ औफिस से मृतका की शिनाख्त प्रीति उर्फ गोलू, निवासी विजय विहार (गाजियाबाद) के रूप में हुई.
तय हो गई थी शादी
पुलिस द्वारा सूचना मिलने पर थोड़ी देर में युवती के घर वाले भी रोते बिलखते हुए घटनास्थल पर आ गए. उन्होंने युवती की शिनाख्त के साथसाथ युवक की भी शिनाख्त कर दी. मृतक सुरेंद्र चौहान उर्फ अन्नू था. उन्होंने यह जानकारी भी दी कि उन की बेटी प्रीति और सुरेंद्र चौहान बहुत जल्द परिणय सूत्र में बंधने वाले थे. सुरेंद्र के मातापिता भी इस रिश्ते के लिए राजी थे.
घटनास्थल की जांच के दौरान वहां पर पौइंट 9 एमएम पिस्टल के कुछ खोखे और मृतका प्रीति की लाल रंग की स्कूटी बरामद हुई, जिसे पुलिस टीम ने अपने कब्जे में ले लिया. मृतका के पिता प्रमोद कुमार से युवक सुरेंद्र चौहान के पिता खुशहाल सिंह के बारे में जानकारी मिल गई. पुलिस ने उन्हें भी इस दुखद घटना के बारे में बता दिया. इस के बाद खुशहाल सिंह भी अपने परिजनों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.
चूंकि दोनों लाशों की शिनाख्त हो चुकी थी, लिहाजा थानाप्रभारी ने मौके की काररवाई पूरी करने के बाद लाशें पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दीं.
25 मार्च को ही मृतका प्रीति के पिता प्रमोद कुमार की शिकायत पर इस दोहरे हत्याकांड का मुकदमा कोतवाली सिंहानी गेट में अज्ञात अपराधियों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया.
इस केस की आगे की तफ्तीश थानाप्रभारी जयकरण सिंह ने खुद संभाली. उन्होंने इस घटना के बारे में एसपी श्लोक कुमार और सीओ सिटी धर्मेंद्र चौहान को भी अवगत करा दिया.
एसएसपी उपेंद्र कुमार अग्रवाल ने इस दोहरे हत्याकांड को सुलझाने के लिए एसपी श्लोक कुमार के निर्देशन और सीओ धर्मेंद्र चौहान के नेतृत्व में एक टीम बनाई. इस टीम में थानाप्रभारी जयकरण सिंह के साथ इंसपेक्टर (क्राइम ब्रांच) राजेश कुमार, एसआई श्रीनिवास गौतम, हैडकांस्टेबल राजेंद्र सिंह, माइकल बंसल, कांस्टेबल अशोक कुमार, संजीव गुप्ता, सेगेंद्र कुमार, संदीप कुमार और गौरव कुमार को शामिल किया गया.
जांच टीम ने एक बार फिर साईं उपवन पहुंच कर वहां के लोगों से घटना के बारे में पूछताछ शुरू की तो पता चला कुछ लोगों ने एक लंबी कदकाठी के आदमी को वहां से भागते हुए देखा था. वह अधेड़ उम्र का आदमी था जो कुछ दूरी तक भागने के बाद वहां खड़ी एक कार में सवार हो कर फरार हो गया था.
हालांकि मंदिर परिसर में 8 सीसीटीवी कैमरे लगे थे लेकिन दुर्भाग्यवश सभी खराब थे. मृतका के पिता प्रमोद कुमार ने बताया कि प्रीति सुबह 7 बजे ड्यूटी पर जाने के लिए निकली थी. वह वसुंधरा के वनस्थली स्कूल के यूनिफार्म स्टौल पर नौकरी करती थी.
उस के काम पर चले जाने के बाद वह बुलंदशहर जाने वाली बस में सवार हो गए थे. अभी उन की बस लाल कुआं तक ही पहुंची थी कि उन्हें मोबाइल फोन पर प्रीति को गोली मारे जाने का दुखद समाचार मिला. जिसे सुनते ही वह फौरन घटनास्थल पर आ गए थे.
पिता ने बताई उधार की कहानी
प्रमोद कुमार से पूछताछ के बाद पुलिस ने मृतक सुरेंद्र चौहान के पिता खुशहाल सिंह को भी कोतवाली बुला कर उन से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि उन के बेटे की हत्या में कल्पना नाम की औरत का हाथ हो सकता है. दरअसल, सुरेंद्र का गाजियाबाद के ही प्रताप विहार में शीशे के सामान का कारोबार था, इसी कारोबार के लिए सुरेंद्र ने कुछ समय पहले कल्पना से कुछ रुपए उधार लिए थे. कल्पना रुपए वापस करने के लिए लगातार तकादा कर रही थी.
चूंकि सुरेंद्र के पास उसे देने लायक पैसे इकट्ठे नहीं हुए थे. इसलिए वह कल्पना को कुछ दिन तक और रुकने को कह रहा था.
2 दिन पहले शनिवार के दिन भी कल्पना उन के घर पर अपने रुपए लेने आई थी, इस दौरान कल्पना ने गुस्से में आ कर सुरेंद्र को बहुत बुराभला कहा था.
यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस टीम इस हत्याकांड की गुत्थी को सुलझाने के लिए उन तमाम पहलुओं पर विचारविमर्श करने लगी, जिस पर आगे बढ़ कर हत्यारे तक पहुंचा जा सकता था. इस में पहला तथ्य घटनास्थल पर मिले पौइंट 9 एमएम पिस्टल से फायर की गई गोलियों के खोखे थे. इस प्रकार के पिस्टल का इस्तेमाल आमतौर पर पुलिस अधिकारी करते हैं. यह सुराग इस तथ्य की ओर इशारा कर रहा था कि हत्यारे का कोई न कोई संबंध पुलिस डिपार्टमेंट से है.
दूसरा तथ्य मृतक सुरेंद्र उर्फ अन्नू के पिता खुशहाल सिंह के अनुसार उन के बेटे को कर्ज देने वाली औरत कल्पना से जुड़ा था. तीसरा सिरा मृतका प्रीति और उस के मंगेतर सुरेंद्र की बेमेल उम्र से ताल्लुक रखता था.
दरअसल प्रेमी सुरेंद्र की उम्र अभी केवल 26 साल थी जबकि उस की प्रेमिका प्रीति की उम्र 32 साल थी. इसलिए यहां इस बात की संभावना थी कि उन के बीच उम्र का यह फासला उन के परिवार के लोगों में से किसी सदस्य को पसंद नहीं आ रहा हो और आवेश में आ कर उस ने इस घटना को अंजाम दे दिया हो.
इस के अलावा एक और भी महत्त्वपूर्ण बिंदु था, जिसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था. प्रीति उर्फ गोलू की उम्र अधिक थी. यह भी संभव था कि उस के प्रेम संबंध पहले से किसी और युवक के साथ रहे हों. पहले प्रेमी को पता चल गया हो कि प्रीति की शादी सुरेंद्र चौहान से हो रही है. संभव था कि उस ने प्रीति को सबक सिखाने के लिए सुरेंद्र का काम तमाम कर दिया.
चूंकि वारदात के समय उस के साथ उस का मंगेतर सुरेंद्र चौहान भी था, इसलिए गुस्से से बिफरे पहले प्रेमी ने उस को भी मार डाला हो. बहरहाल इन तमाम बिंदुओं पर विचार विमर्श कर के पुलिस टीम हत्यारे तक पहुंचने के प्रयास में जुटी थी.
पुलिस टीम ने 27 मार्च को एक बार फिर दोनों के परिवार के पुरुष और महिला सदस्यों तथा वारदात के वक्त साईं उपवन में मौजूद चश्मदीदों को बुला कर पूछताछ की. साथ ही प्रीति और सुरेंद्र के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर उन की गहन जांच की.
इस जांच में चौंकाने वाली बातें सामने आईं. प्रीति के पिता प्रमोद कुमार ने बताया कि उन का एक रिश्तेदार दिनेश कुमार दिल्ली ट्रैफिक पुलिस में एएसआई के पद पर तैनात है. उस का चौहान परिवार के घर पर काफी आनाजाना था.
लेकिन जिस दिन यह दोहरा हत्याकांड हुआ उस दिन के बाद वह बुलाए जाने के बावजूद वारदात वाली जगह पर नहीं आया था. और तो और प्रीति के अंतिम संस्कार में भी वह शामिल नहीं हुआ था. यह बात प्रमोद कुमार और उन के परिवार के सदस्यों को बहुत अटपटी लगी थी. जब पुलिस ने उन से डिटेल्स में बात की तो प्रमोद कुमार ने अपने मन की सब बातें विस्तार से बता दीं.
जिन्हें सुनते ही पुलिस टीम ने दिल्ली पुलिस में ट्रैफिक विभाग में तैनात एएसआई दिनेश कुमार से पूछताछ करने का मन बना लिया. चूंकि घटनास्थल पर पौइंट 9 एमएम पिस्टल के खाली खोखे मिले थे, जिस की वजह से भी वारदात में किसी पुलिस वाले के शामिल होने का शक था, इसलिए अब एएसआई दिनेश कुमार से पूछताछ करना बेहद जरूरी हो गया था.
पुलिस वाला आया शक के घेरे में
थानाप्रभारी जयकरण सिंह ने एएसआई दिनेश कुमार से संपर्क करने की कोशिश की मगर कामयाब नहीं हुए. आखिरकार 30 मार्च की सुबह एक मुखबिर की सूचना पर उसे पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया गया. जब उस से इस दोहरे हत्याकांड के बारे में पूछताछ शुरू की गई तो उस ने जो कुछ बताया उस से रिश्तों में उलझी एक सनसनीखेज कहानी उभर कर सामने आई.
प्रमोद कुमार अपने परिवार के साथ गाजियाबाद के विजय विहार में रहते हैं. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटियां थीं. वह बड़ी बेटी के हाथ पीले कर चुके थे. दूसरी बेटी प्रीति उर्फ गोलू और उस से छोटी बेटी अभी पढ़ाई कर रही थी. 22 वर्षीय प्रीति मिलनसार स्वभाव की थी. वह जिंदगी के हर एक पल का पूरा लुत्फ उठाने में विश्वास रखती थी.
बड़ी बेटी की शादी के एक साल बाद प्रमोद कुमार ने प्रीति के भी हाथ पीले कर देने की सोची. उन्होंने उस के लिए कई जगह रिश्ते की बात चलाई, मगर आखिर अपनी हैसियत के अनुसार मौके पर प्रीति किसी न किसी बहाने से शादी करने से इनकार कर देती थी.
प्रीति का अपनी बड़ी बहन के घर काफी आनाजाना था. अपने हंसमुख स्वभाव की वजह से वह बहन की ससुराल में भी काफी घुलमिल गई थी. उस के जीजा का जीजा दिनेश कुमार दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल था. दिनेश मूल रूप से उत्तर प्रदेश के पिलखुआ का रहने वाला था.
उस की पत्नी और बच्चे पिलखुआ में ही रहते थे. दिनेश जब भी रमेश के घर आता वह प्रीति से खूब बातेें करता था. बला की हसीन और दिलकश प्रीति की चुलबुली मीठी बातें सुन कर वह भावविभोर हो जाता था.
प्रीति को भी दिनेश से बातें करने में खुशी मिलती थी. वह उस समय उम्र के उस पड़ाव पर भी पहुंच गई थी, जहां एक मामूली सी चूक भविष्य के लिए नासूर बन जाती है. लेकिन इस समय प्रीति या उस की बहन सीमा ने इन बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी.
धीरेधीरे प्रीति की जिंदगी में दिनेश का दखल बढ़ने लगा. अब वह प्रीति से उस के गाजियाबाद स्थित घर पर भी मिलने आने लगा था. इतना ही नहीं जब कभी प्रीति या उस के परिवार में अधिक रुपयों की जरूरत होती वह अपनी ओर से आगे बढ़ कर उन की मदद करता था.
प्रीति के पिता प्रमोद कुमार भी दिनेश कुमार के बढ़ते अहसानों के बोझ तले इतने दब चुके थे कि दिनेश के रुपए वापस करना उन के वश के बाहर हो गया. दिनेश कुमार ये रुपए प्रीति के घर वालों को यूं ही उधार नहीं दे रहा था.
रिश्तों में सेंध
दरअसल दिनेश कुमार अपनी उम्र से लगभग आधी उम्र की प्रीति के ऊपर न केवल पूरी तरह से फिदा था बल्कि उस के साथ उस के शारीरिक संबंध भी स्थापित हो चुके थे. वह प्रीति को किसी न किसी बहाने से अपने साथ घुमाने ले जाता था, जहां दोनों अपनी हसरतें पूरी कर लेते थे.
समय का पहिया अपनी गति से आगे बढ़ता रहा, दिनेश कुमार सन 1994 में कांस्टेबल के पद पर दिल्ली पुलिस में भरती हुआ था. सन 2008 में उस का प्रमोशन हेड कांस्टेबल के पद पर हो गया. इस के 8 साल बाद एक बार फिर उस का प्रमोशन हुआ और वह एएसआई बन गया. इन दिनों वह ट्रैफिक विभाग में सीमापुरी सर्कल में तैनात था.
प्रीति के साथ जिस सुरेंद्र कुमार नाम के युवक की जान गई थी, वह मूलरूप से उत्तराखंड का रहने वाला था. उस के पिता खुशहाल सिंह सेना में रह चुके थे. रिटायरमेंट के बाद वह अपने गांव में सेटल हो गए. 2 बेटों के अलावा उन की 2 बेटियां थीं. सब से बड़ा बेटा सुधीर हरिद्वार में रहता था. वह अपनी दोनों बेटियों की शादी कर चुके थे और इन दिनों एक पोल्ट्री फार्म चला रहे थे.
करीब 2 साल पहले उन का छोटा बेटा सुरेंद्र कुमार उर्फ अन्नू उत्तराखंड से गाजियाबाद आ गया था और प्रताप विहार में शीशे का बिजनैस करने लगा था. 2 साल तक अथक मेहनत करने के बाद आखिर उस का काम चल निकला.
इस के बाद उस ने अपने मातापिता को भी अपने पास बुला लिया था. कुछ ही महीने पहले उस की मुलाकात प्रीति उर्फ गोलू से हुई थी. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.
सुरेंद्र से मुलाकात होने के बाद प्रीति फोन से सुरेंद्र से अकसर बात करती रहती थी. दिन गुजरने लगे उन के प्यार का रंग गहरा होता चला गया. कुछ दिनों के बाद सुरेंद्र और प्रीति का प्यार ऐसा परवान चढ़ा कि दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. प्रीति के घर वाले इस के लिए राजी हो गए थे. शादी की बात तय हो जाने पर दोनों प्रेमी खुश हुए. हालांकि प्रीति की उम्र सुरेंद्र से करीब 6 साल ज्यादा थी मगर दोनों में से किसी को इस पर जरा भी एतराज नहीं था.
प्रीति सुरेंद्र के साथ शादी के लिए तो दिलोजान से रजामंद थी किंतु उस के सामने सब से बड़ी समस्या यह थी कि दिनेश के साथ उस के विगत कई सालों से जो प्रेमिल संबंध थे उन से निकलना आसान नहीं था. वजह यह कि दिनेश कुमार किसी भी हालत में उस की शादी किसी और से नहीं होने देना चाहता था.
प्रीति को अपने काबू में रखने के लिए उस ने उस की हर जायज नाजायज मांगें पूरी की थीं. हाल ही में उस ने प्रीति के पिता को 3 लाख रुपए उधार भी दिए थे. एएसआई दिनेश कुमार के बयान कितने सच और कितना झूठ है यह तो पुलिस की जांच के बाद पता चलेगा. परंतु इतना तय है कि प्रीति के घर में उस का इतना दखल था कि वह बेधड़क जब चाहे तब उस के घर आ जा सकता था.
प्रीति और सुरेंद्र के बीच जब से प्यार का सिलसिला शुरू हुआ था तब से प्रीति ने एएसआई दिनेश से मिलनाजुलना कम कर दिया था. पहले तो दिनेश कुमार प्रीति और सुरेंद्र के प्यार से अनजान था, लेकिन 4-5 दिन पहले जब प्रीति ने उस का फोन रिसीव करना बंद कर दिया तो वह सोच में पड़ गया.
दिल्ली पुलिस में 25 सालों से नौकरी कर रहे एएसआई दिनेश कुमार को यह समझने में देर नहीं लगी कि मामला बेहद गंभीर है. फिर भी उस ने किसी तरह प्रीति को फोन कर के उस से बातें करने की कोशिश जारी रखी. लेकिन 2 दिन पहले प्रीति ने दिनेश कुमार के लगातार आने वाले फोन से परेशान हो कर अपने मोबाइल फोन का सिम बदल लिया.
मामला बिगड़ता देख एएसआई दिनेश कुमार समझ गया कि प्रीति किसी कारण उस से संबंध तोड़ने पर आमादा है. जिस के फलस्वरूप उस ने प्रीति को सबक सिखाने की ठान ली. 24 मार्च, 2019 को दिनेश की रात की ड्यूटी थी.
25 मार्च की सुबह अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद वह शाहदरा निवासी अपने दोस्त पिंटू शर्मा के पास गया. उस की मारुति स्विफ्ट कार पर सवार हो कर वह प्रीति के घर जा पहुंचा. कार पिंटू शर्मा चला रहा था. प्रीति के घर पहुंच कर जब उसे पता चला कि प्रीति साईं उपवन मंदिर गई है तो वह उस का पीछा करता हुआ वहां भी पहुंच गया.
अचानक की गईं दोनों की हत्याएं
उधर साईं मंदिर में दर्शन करने के बाद जैसे ही प्रीति और सुरेंद्र अपने जूतों की ओर बढ़े, तभी एएसआई दिनेश कुमार प्रीति से बातें करने के लिए आगे बढ़ा. उस ने प्रीति को अपनी ओर बुलाया मगर प्रीति ने उस की ओर देख कर अपनी नजरें फेर लीं.
यह देख दिनेश कुमार की त्यौरियां चढ़ गईं. वह आगे बढ़ा और प्रीति का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचने लगा, मगर प्रीति ने उस का हाथ झटक दिया. प्रीति की यह बात एएसआई दिनेश कुमार को बहुत बुरी लगी. तभी उस ने अपना सर्विस पिस्टल निकाला और प्रीति के ऊपर फायर कर दिए.
प्रीति को खतरे में देख कर सुरेंद्र उसे बचाने के लिए दौड़ा तो दिनेश ने उस के भी सीने में 3 गोलियां उतार दीं. इस के बाद वह बाहर स्विफ्ट कार में इंतजार कर रहे पिंटू शर्मा के साथ वहां से फरार हो गया.
गाजियाबाद पुलिस की नजरों से बचने के लिए 5 दिनों तक दिनेश कुमार अपने रिश्तेदारों के घर छिपा रहा. दिनेश की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने शाहदरा से इस हत्याकांड में शामिल रहे उस के दोस्त पिंटू को भी गिरफ्तार कर लिया.
वारदात में प्रयोग की गई एएसआई दिनेश कुमार की सर्विस पिस्टल, 3 जीवित कारतूस तथा स्विफ्ट कार भी गाजियाबाद पुलिस ने बरामद कर ली. 2 अप्रैल, 2019 को दिल्ली पुलिस ने भी एएसआई दिनेश कुमार को उस के पद से बर्खास्त कर दिया. इस समय दोनों हत्यारोपी जेल में बंद हैं.
उधर गाजियाबाद पुलिस के आला अधिकारियों ने इस सनसनीखेज वारदात की गुत्थी सुलझाने वाली टीम का मनोबल बढ़ाते हुए 25 हजार रुपए के पुरस्कार से नवाजा है, पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है.
शाम तक घर का माहौल खुशनुमा था. डिंपल ने हंसीखुशी शाम का खाना बनाया और सभी ने अपने पापा सुंदर लाल के साथ बैठ कर खाना खाया. उस के कुछ देर बाद ही सुंदर लाल के घर से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं.
चूंकि सुंदर लाल अपने घर में अकेले ही रहते थे. इसी कारण अचानक ही उन के घर से रोनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर पड़ोस में रह रहे उन के भाई ओमप्रकाश व अन्य लोग उन के घर पर पहुंचे. सुंदर लाल के घर पहुंचते ही उन्होंने कई बार घर के दरवाजे पर दस्तक दी, लेकिन किसी ने भी दरवाजा नहीं खोला. काफी आवाज लगाने पर भी घर का दरवाजा नहीं खुला तो लोगों ने घर का दरवाजा तोड़ डाला.
जब लोग घर में घुसे तो अंदर सुंदर लाल का खून से लथपथ शव पड़ा हुआ था. जिस ने भी सुंदर लाल का शव देखा, वह सिहर उठा. सुंदर लाल के मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था. उन के हाथपांव रस्सी से बांधे हुए थे.
अल्मोड़ा जिले के लमगड़ा थाने से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव पड़ता है भांगा देवली. इसी गांव में रहते थे भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के सेवानिवृत्त जवान सुंदर लाल. सुंदर लाल की पत्नी की 2018 में मृत्यु हो गई थी. उन के 3 बच्चे थे, जिन में सब से बड़ी बेटी 25 वर्षीय डिंपल, उस के बाद 21 वर्षीय बेटा रितिक और सब से छोटी नाबालिग बेटी अंशिका (काल्पनिक नाम) थी. तीनों ही बच्चे अपने पिता के देहरादून स्थित सरकारी क्वार्टर में रहते थे.
सुंदर लाल की सब से बड़ी बेटी डिंपल एक निजी स्कूल में टीचर थी. बेटा रितिक वहीं पर एक जिम में ट्रेनर था, जबकि सब से छोटी बेटी अंशिका कक्षा 9 में पढ़ रही थी.
ये सभी अपने पापा सुंदर लाल से मिलने के लिए 28 दिसंबर, 2023 को देहरादून से अपने गांव भांगा देवली पहुंचे थे. लेकिन उसी रात को ही उन के घर से रोनेचिल्लाने की आवाजें आ रही थीं. आवाज सुन कर ही पड़ोसी उन के घर पहुंचे थे. तब घर में सुंदर लाल की लाश मिली थी.
उस के बाद ओमप्रकाश ने इस की सूचना गांव प्रहरी प्रधान पति को दी. उस वक्त तक सुंदर लाल के घर पर काफी लोग इकट्ठा हो गए थे. सुंदर लाल का बेटा और बेटियां घर में ही थे. जब उन्होंने गांव वालों को घर के अंदर आते देखा तो उन्होंने उन्हें घर से भगाने की कोशिश की.
अपने पापा की मौत पर बच्चों द्वारा कोई शोक भी नहीं मनाया जा रहा था. इस से गांव वालों को उन तीनों बच्चों पर ही शक हुआ कि जरूर इन बच्चों ने ही सुंदर लाल की हत्या की होगी. लिहाजा गांव वाले वहां से गए नहीं बल्कि उन्होंने तीनों बच्चों को एक कमरे में बंद करने के बाद तुरंत पुलिस को इस की सूचना दे दी.
सूचना मिलने के कुछ देर बाद ही लमगड़ा थाने के एसएचओ दिनेश नाथ महंत वहां पहुंच गए. उन्होंने मृतक के तीनों बच्चों और एक अन्य व्यक्ति को हिरासत में ले लिया. इन चारों में 3 बच्चे सुंदर लाल के थे, जबकि उन में एक शख्स ऐसा था, जिसे न तो सुंदर लाल के परिवार वाले जानते थे और न ही उसे इस से पहले कभी उन के घर पर देखा गया था.
पुलिस ने सब से पहले उसी शख्स से जानकारी ली तो पता चला कि वह सुंदर लाल की बड़ी बेटी डिंपल का प्रेमी था, जो दिल्ली के संगम विहार में रहता था.
इस घटना की जानकारी एसएचओ दिनेश नाथ महंत ने अपने उच्चाधिकारियों को दी, जिस की सूचना पाते ही सीओ (अल्मोड़ा) विमल प्रसाद व एसएसपी रामचंद्र राजगुरु घटनास्थल पर पहुंच गए.
घटनास्थल का पुलिस ने बारीकी से निरीक्षण किया. सुंदर लाल को बड़ी ही बेरहमी के साथ डंडों से पीटपीट कर मारा गया था. उस के शरीर पर अनगिनत चोटों के निशान मौजूद थे.
सुंदर लाल के घर में तीनों बच्चों और डिंपल के प्रेमी के पाए जाने से यह तो साफ हो ही गया था कि उन की हत्या इन्हीं चारों ने साथ मिल कर की थी. पुलिस ने इस मामले में चारों से पूछताछ की तो उन्होंने हत्या की जो कहानी बताई, वह वास्तव में चौंकाने वाली ही थी.
पुलिस ने फिलहाल उन चारों को ही हिरासत में ले लिया. इस के बाद सुंदर लाल की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय भेज दी. पूर्व सैनिक की हत्या से उस के परिवार वालों के साथसाथ गांव वाले भी दुखी थे. पोस्टमार्टम हो जाने के बाद देर रात को पुलिस ने सुंदर लाल का शव उस के परिवार वालों को सौंप दिया था. तत्पश्चात नगर के नजदीक विश्वनाथ घाट पर उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया. इस दौरान ग्रामीणों ने आरोपियों के खिलाफ सख्त काररवाई की भी मांग की.
अल्मोड़ा जिले के गांव लमगड़ा निवासी सुंदर लाल इंडो तिब्बत बौर्डर पुलिस (आईटीबीपी) में कार्यरत थे. उन की नौकरी ही कुछ ऐसी थी कि उन की पोस्टिंग अधिकांश बाहर ही होती थी. इसी कारण सभी बच्चों की परवरिश उन की मां की देखरेख में ही हुई थी. जिस के कारण तीनों बच्चों को अपने पापा से पहले से ही ज्यादा लगाव नहीं था.
अब से लगभग 9 साल पहले उन की पत्नी गीता देवी अचानक बीमार हो गईं. पीलिया के कारण एक दिन उन की मृत्यु हो गई. पत्नी की मौत के समय सुंदर लाल बाहर ही नौकरी कर रहे थे. मम्मी की मृत्यु के बाद बच्चे अकेले पड़ गए थे.
हालांकि गांव में उन के परिवार वाले भी रहते थे. लेकिन बिना मांबाप के बच्चों का रहना गांव में मुश्किल हो गया था.
अपनी पत्नी के खत्म होने के बाद सुंदर लाल सर्विस पर जहांजहां गए, बच्चों को भी साथ ले गए थे. लेकिन जैसे ही बच्चे समझदार हुए तो उन की पढ़ाई डिस्टर्ब होने लगी थी.
बच्चों की परेशानी को देखते हुए सुंदर लाल ने आईटीबीपी की ओर से सीमाद्वार परिसर देहरादून में मिले सरकारी क्वार्टर में बच्चों के रहने की व्यवस्था कर दी.
वहीं पर बच्चे पढऩे लगे थे. देहरादून में रहते ही उन की बड़ी बेटी डिंपल ने पीएचडी कर ली थी. उन के बेटे ने एम.काम. पास कर लिया था. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन की बड़ी बेटी डिंपल ने देहरादून के ही एक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया था. जबकि बेटे ने वहीं पर एक जिम में नौकरी कर ली थी.
नौकरी के अंतिम पड़ाव में सुंदर लाल की पोस्टिंग लद्ïदाख में थी. उस के बावजूद भी वह हर रोज सुबहशाम फोन पर अपने बच्चों की खैरखबर लेते रहते थे. देहरादून में रहते ही बड़ी बेटी डिंपल का फेसबुक के माध्यम से दिल्ली के संगम विहार निवासी हर्षवर्धन से संपर्क हो गया. दोनों की आपस में दोस्ती भी हो गई थी. उसी दोस्ती के सहारे हर्षवर्धन का उस के पास देहरादून आनाजाना भी शुरू हो गया था.
बाद में यह बात सुंदर लाल को पता चल गई थी. उस के कुछ समय बाद ही सुंदर लाल देहरादून आए तो उन्होंने बेटी डिंपल को समझाने की कोशिश की. लेकिन डिंपल उन की एक भी बात मानने को तैयार न थी. ऐसे में सुंदर लाल को डर था कि हर्षवर्धन के उन के कमरे पर आनेजाने से उन के और बच्चों पर भी बुरा असर पड़ सकता है. इसी कारण उन के भविष्य को ले कर वह परेशान हो उठे.
बेटी को समझानेबुझाने के बाद सुंदर लाल फिर से अपनी ड्यूटी पर चले गए थे. लेकिन ड्यूटी पर जाने के बाद भी उन का मन बच्चों की तरफ ही लगा रहता था. उसी दौरान एक दिन उन्हें पता चला कि डिंपल छोटे भाईबहन को देहरादून में अकेला छोड़ कर अपने प्रेमी के पास भी चली गई थी.
बेटी के बारे में सोचसोच कर सुंदर लाल कुछ ज्यादा ही परेशान थे. इस से उन्हें लगने लगा था कि बेटी कहीं उन की बिना मरजी के हर्षवर्धन के साथ ही शादी न कर ले. जबकि सुंदर लाल उस की शादी किसी अच्छे घराने में अपने हिसाब से करना चाहते थे.
हर्षवर्धन के प्यार में पडऩे के बाद डिंपल ने अपने पापा से और अधिक पैसों की डिमांड करनी शुरू कर दी थी, जिस के कारण सुंदर लाल परेशान हो उठे और उन का बच्चों के प्रति रुख बदलता गया.
अब से लगभग 3 महीने पहले ही सुंदर लाल सेवानिवृत्त हुए थे. सेवानिवृत्त होने के बाद वह अपने बच्चों के पास देहरादून में ही आ कर रहने लगे थे. लेकिन उन के वहां आने के बाद भी उन की बड़ी बेटी डिंपल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही थी. उन्होंने बच्चों को सबक सिखाने के लिए अकेले ही गांव का रुख कर लिया.
गांव आ कर वह अपने भाई के साथ रहने लगे. उस के बाद उन्होंने बेटी के व्यवहार से तंग आ कर बच्चों को खर्च के लिए पैसे भेजने भी बंद कर दिए थे.
हालांकि उन की बेटी के साथसाथ बेटा भी कमाने लगा था. लेकिन उन की छोटी बेटी रितिका इस वक्त पढ़ाई कर रही थी. उसे जब कभी भी पैसों की जरूरत होती तो वह अपने भाई से पैसे मांगती थी. एक बाप के होते उस का भाई से पैसे मांगना उसे कुछ खलने लगा था.
सुंदर लाल के गांव जा कर रहने पर उन के बच्चों को भी शक होने लगा था कि कहीं उन के परिवार वाले उन की संपत्ति पर कब्जा न कर लें. अपने पिता के इस व्यवहार से तंग आ कर उन के बच्चे उन के बारे में गलत अर्थ लगाने लगे थे.
उन्हें शक होने लगा था कि उन के पापा के गांव में किसी औरत के साथ अवैध संबंध तो नहीं हैं, जिस के प्यार में पड़ कर वह अपना सारा पैसा उसी औरत के नाम पर न कर दें. यह बात डिंपल ने अपने प्रेमी से भी कह दी थी.
सुंदर लाल को रिटायरमेंट पर काफी मोटी रकम मिली थी. उन के रिटायरमेंट होते ही बच्चों की निगाहें उसी पैसे पर अटकी हुई थीं. उस के बाद से ही उन की बड़ी बेटी और बेटा उन से पैसों की मांग कर रहे थे. लेकिन सुंदर लाल उन पैसों को उन के बेहतर भविष्य के लिए संजो कर रखना चाहते थे. इसी गलतफहमी की वजह से बच्चों और पिता में आए दिन विवाद रहने लगा था.
इसी विवाद के चलते ही डिंपल ने अपने प्रेमी हर्षवर्धन को देहरादून बुला लिया. उस के देहरादून आते ही उस ने सब कुछ उस के सामने रखते हुए उस से उन के साथ गांव चलने को कहा. हर्षवर्धन पहले ही पैसों का लालची था. उसे पता था कि अगर डिंपल के पापा किसी तरह से डिंपल की शादी उस के साथ करने के लिए राजी हो गए तो वह मालामाल हो जाएगा.
लेकिन सब कुछ हाथ से निकलते देख उस का माथा भी ठनकने लगा था. इसी कारण ही वह जल्दी ही उन के साथ गांव जाने के लिए तैयार हो गया. घर से निकलने से पहले ही चारों ने सोचा था कि वह किसी भी तरह से सुंदर लाल को समझाबुझा कर अपने साथ देहरादून ले आएंगे.
28 दिसंबर, 2023 को योजना बना कर सभी गांव पहुंचे. गांव पहुंचते ही चारों ने सुंदर लाल को समझाने की कोशिश की. उन्होंने बारबार उन से विनती की कि बच्चों को इस तरह से शहर में छोड़ कर आप का गांव में आ कर रहना ठीक नहीं. इस से आप के बच्चों की ही बदनामी होती है. लेकिन सुंदर लाल किसी भी कीमत पर न तो गांव छोड़ कर उन के साथ रहने को तैयार थे और न ही उन्हें कोई पैसा देने के लिए राजी हुए.
सुंदर लाल के तीनों बच्चे क्यों बने जल्लाद
29 दिसंबर की रात को दोनों के बीच यह विवाद और भी तूल पकड़ गया. सुंदर लाल शराब के नशे में किसी की भी सुनने को तैयार न थे. उस के बाद उन की बेटी, बेटे और हर्षवर्धन ने उन को खत्म करने की योजना बनाई, ताकि उन की संपत्ति उन्हीं के पास रहे.
उस शाम जब बातों ही बातों में बात आगे बढ़ गई तो चारों ने सब से पहले सुंदर लाल के पैर बांधे, ताकि वह घर से निकल कर कहीं भाग न सकें. उस के बाद लाठीडंडों से उन्हें पीटना शुरू किया.
जैसे ही सुंदर लाल ने चीखना शुरू किया तो उन की आवाज सुन कर उन के चाचा और पड़ोसी उन के घर पहुंचे. घर पहुंचते ही सभी ने उन के घर का दरवाजा खुलवाने की कोशिश की तो किसी ने भी दरवाजा नहीं खोला और उन्होंने उन के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया ताकि चीख बाहर न निकले.
जब बाहर खड़े लोगों ने सुंदर लाल को बचाने के लिए उन के घर का दरवाजा जोरजोर से पीटना शुरू किया तो हर्षवर्धन ने घर में रखे एक स्टील के पाइप को कपड़े में छिपा कर गांव वालों को धमकाने की कोशिश की. उस ने कहा कि यह उन के घर का मामला है, अगर किसी ने भी उन के मामले में हस्तक्षेप करने की कोशिश की तो वह गोली चला कर उन की हत्या कर देगा.
गांव वालों ने उस पाइप को बंदूक समझा और फिर सभी डर के मारे वहां से भाग गए. उन के वहां से जाते ही उन्होंने फिर से सुंदर लाल पर जुल्म ढहाना शुरू कर दिया. उस के बाद हर्षवर्धन जल्लाद बन बैठा था. वह उसी वक्त घर में रखी एक दरांती उठा लाया. उस के बाद उस ने उस दरांती से वार कर सुंदर लाल की हत्या कर दी थी.
फिर गांव वाले भी दरवाजा तोड़ कर घर में घुस आए थे. इस से पहले कि वे भागने की कोशिश करते, गांव वालों ने उन्हें एक कमरे में बंद करने के बाद पुलिस को फोन कर दिया. जिस के बाद पुलिस ने चारों को गिरफ्तार कर लिया था.
पुलिस ने इस हत्याकांड में प्रयुक्त लाठी, डंडे व दरांती भी बरामद कर ली थी. इस मामले में मृतक सुंदर लाल के भाई ओमप्रकाश निवासी भांगा देवली के द्वारा चारों आरोपियों के खिलाफ हत्या करने की रिपोर्ट दर्ज करा दी गई.
इस मामले के हत्यारोपी डिंपल, उस के पे्रमी हर्षवर्धन व बेटे रितिक को पुलिस ने न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया था. जबकि चौथी आरोपी नाबालिग बेटी अंशिका को बाल सुधार गृह भेजा गया था.
सुंदर लाल के 3 बच्चे थे, उन के बाद सब कुछ उन्हीं के नाम आने वाला था. फिर ऐसे में उन्होंने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया. उन सभी ने अपने बाप के खून से हाथ रंगते हुए अपना भविष्य ही चौपट कर लिया था.
पैसे का लालच इंसान को किस कदर अंधा बना देता है कि वह उस के लालच में अपनेपराए के मायने भी भूल जाता है और उसी के लिए खूनखराबा भी कर डालता है. चाहे भले ही उस के बाद उसे धनदौलत मिले न मिले, लेकिन वह उस के बाद अपनी जिंदगी को पूरी तरह से तबाह कर डालता है. यही सब किया इन तीनों बच्चों ने. उन्होंने अपने पापा की रिटायर रकम को एकमुश्त हड़पने के लिए अपनी जिंदगी को ही दागदार बना डाला था.
अपनी नौकरी के चलते गीता को घर का काम निपटा कर जल्दी सोना होता था और सुबह जल्दी ही उठना पड़ता था. लेकिन उस दिन उठने में थोड़ी देर हो गई थी. अब उस के पास एक ही रास्ता था कि जल्दी से रसोई का काम निपटाए. काम भी कम नहीं था. सुबह के नाश्ते से ले कर दोपहर का खाना तक बनाना होता था. इस की वजह यह थी कि उस की बेटी सुदीक्षा कालेज जाती थी, जो दोपहर को घर लौटती थी. इसलिए उस का खाना बनाना जरूरी था. साथ ही यह भी कि उसे खुद को और पति कुलदीप को अपना लंच बौक्स साथ ले कर जाना होता था.
दरअसल 37 वर्षीय गीता पंजाबी भाषा की प्रोफेसर थी और पिछले 15 सालों से सिविल लाइंस लुधियाना स्थित एक शिक्षण संस्थान में पढ़ाती थी. उस का पति कुलदीप रेलवे में बतौर इलेक्ट्रिशियन तैनात था.
कुलदीप सुबह साढ़े 8 बजे अपनी ड्यूटी पर चला जाता था और शाम को साढ़े 5 बजे घर लौटता था. कुलदीप के चले जाने के बाद साढ़े 9 बजे गीता भी अपने कालेज चली जाती थी. जबकि सुदीक्षा कालेज के लिए 10 बजे घर से निकलती थी. सब के जाने के बाद घर में कुलदीप का छोटा भाई हरदीप अकेला रह जाता था.
हरदीप नगर निगम लुधियाना की पार्किंग के एक ठेकेदार के पास काम करता था. उस की रात की ड्यूटी होती थी. वह अपने भाईभाभी के पास ही रहता था. हरदीप रात 8 बजे घर से ड्यूटी पर जाता था और सुबह 9 बजे लौटता था. काम से लौट कर वह दिन में घर पर ही सोता था.
कुलदीप, उस की पत्नी गीता, बेटी सुदीक्षा और हरदीप सहित 4 सदस्यों का यह परिवार लुधियाना के अजीत नगर, बकौली रोड, हैबोवाल के मकान नंबर 1751/21 ए की गली नंबर-3 में रहता था. कुलदीप के पिता राममूर्ति की कुछ वर्ष पहले मौत हो चुकी थी.
पिता की मौत के बाद कुलदीप ही घर का एक मात्र बड़ा सदस्य था. कुलदीप को मिला कर परिवार में 3 कमाने वाले थे, सो घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था.
पिता की दुश्मन बेटी
उस दिन कुलदीप, गीता और सुदीक्षा घर से जाने की तैयारी कर रहे थे. अपनेअपने हिसाब से सभी को जल्दी थी. गीता ने नाश्ता तैयार कर लिया था. उस ने पति को आवाज दी, ‘‘नाश्ता लग गया है, जल्दी आ जाइए. मुझे कालेज के लिए देर हो रही है.’’
कुलदीप नाश्ते की टेबल पर आ कर बैठ गया तो गीता ने उसे परांठे परोस दिए. कुलदीप नाश्ता करने लगा तो उसे बेटी का ध्यान आया. उस ने गीता से पूछा, ‘‘सुदीक्षा कहां है?’’
‘‘अपने कमरे में होगी, तुम नाश्ता करो.’’
कुलदीप ने वहीं बैठेबैठे सुदीक्षा को आवाज दे कर पुकारा, पर वह नहीं आई. कुलदीप ने 2-3 बार आवाज दी पर सुदीक्षा के कमरे से कोई जवाब नहीं आया. गीता ने एक बार फिर टोका, ‘‘तुम नाश्ता करो, वह आ जाएगी.’’ पर कुलदीप को चैन नहीं आया, क्योंकि उसे सुबह का नाश्ता और रात का खाना पत्नी और बेटी के साथ खाना पसंद था.
पत्नी के मना करने के बावजूद कुलदीप नाश्ता छोड़ कर बेटी के कमरे में गए. सुदीक्षा के कमरे में जा कर उन्होंने देखा कि सुदीक्षा कानों में हैडफोन लगाए किसी से हंसहंस कर बातें कर रही थी. यह देख कर कुलदीप को गुस्सा आ गया. उस ने आगे बढ़ कर देखा तो स्क्रीन पर तरुण का नाम था.
तरुण उर्फ तेजपाल सिंह भाटी, सुदीक्षा का बौयफ्रैंड था, यह बात कुलदीप अच्छी तरह जानता था. तरुण हंसबड़ारोड पर पंज पीर के पास मेहर सिंह नगर में रहता था, उस की मैडिकल शौप थी. पिछले 3 सालों से सुदीक्षा और तरुण के प्रेमसंबंध थे. कुलदीप शुरू से ही इन संबंधों का विरोध करता था. इसे ले कर उस ने सुदीक्षा को कई बार फटकारा भी था. इतना ही नहीं तरुण को ले कर बापबेटी म७ें कई बार कहासुनी भी हुई थी. फिर भी सुदीक्षा ने तरुण का साथ नहीं छोड़ा.
कुलदीप उसे बराबर समझाता था कि फालतू के प्यारव्यार के चक्कर में न पड़ कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. लेकिन सुदीक्षा ने पिता की बात कभी नहीं मानी. वह खुद को आजाद मानती थी और आजाद ही रहना चाहती थी. अपनी जिंदगी में उसे किसी की दखलंदाजी बरदश्त नहीं थी. तरुण के मामले में तो वह किसी की भी नहीं सुनती थी.
फोन की स्क्रीन पर तरुण का नंबर देख कर कुलदीप के तनबदन में आग लग गई. उस ने डांटते हुए सुदीक्षा से कहा, ‘‘हजार बार मना किया है कि इस लफंगे से संबंध नहीं रखना, पर तुम हो कि मानती ही नहीं. क्या मेरी बातें तुम्हारी समझ में नहीं आतीं, या सब कुछ जानसमझ कर अनजान बनने का नाटक करती हो.’’
सुदीक्षा के कमरे से पति के जोरजोर से बोलने की आवाज सुन कर गीता भी वहां आ गई. उस ने भी बेटी को डांट कर चुप रहने के लिए कहा. लेिकन बापबेटी के बीच फोन पर तरुण से बातचीत को ले कर कहासुनी चालू रही. इस बहस में दोनों में से कोई हारने को तैयार नहीं था.
कुलदीप पिता होने का अधिकार समझ कर बेटी को गलत राह पर जाने से रोक रहा था, जो अपनी जगह पर ठीक भी था. जब बच्चे अपना लक्ष्य भूल कर रास्ता भटकने लगते हैं, तो पिता का कर्तव्य बन जाता है कि वह अपनी संतान को गलत राह पर जाने से रोके और अपनी समझ के अनुसार उस का सही मार्गदर्शन करे. यही कुलदीप कर रहा था.
दूसरी ओर कोई तरुण को भलाबुरा कहे यह सुदीक्षा को बरदाश्त नहीं था. यही कारण था कि कुलदीप जब भी बेटी को समझाने की कोशिश करता तो वह हत्थे से उखड़ जाती थी. इस के साथ ही बापबेटी के बीच तरुण को ले कर महाभारत शुरू हो जाता था.
तरुण के मामले में सुदीक्षा अपने पिता को अपना कट्टर दुश्मन मानती थी. उस दिन कहासुनी से शुरू हुई बात अचानक इतनी ज्यादा बढ़ गई कि गुस्से में कुलदीप ने सुदीक्षा के हाथों से मोबाइल छीन कर फर्श पर पटक दिया. इस के बाद वह गुस्से में नाश्ता किए बिना ही घर से निकल गया. खाने का टिफिन भी घर पर ही छोड़ दिया था.
परिवार में किसी तीसरे का दखल भी बढ़ाता है कलह
कुलदीप के बिना कुछ खाएपीए घर से निकल जाने के बाद गीता और सुदीक्षा भी बिना नाश्ता किए अपनेअपने कालेज चली गईं. रात को कुलदीप ने एक बार फिर बेटी को प्यार से समझाने के लिए खाने की टेबल छत पर लगवाई. कुलदीप का भाई हरदीप खाना खा कर काम पर जाने की तैयारी कर रहा था.
गीता, सुदीक्षा और कुलदीप ने जब तक खाना शुरू किया तब तक हरदीप जा चुका था. मांबाप और बेटी के बीच जो थोड़ा बहुत मनमुटाव था, वह एक साथ खाना खाने से खत्म हो गया. खाना खाने के बाद कुलदीप नीचे अपने कमरे में सोने के लिए चला गया. गीता और सुदीक्षा छत पर ही सो गईं. यह बीती 19 जुलाई की बात है.
अगली सुबह यानी 20 जुलाई, 2018 की सुबह साढ़े 5 बजे उठ कर गीता छत से नीचे आई. यह उस का रोज का नियम था. नित्यकर्म से फारिग हो कर जब वह पति कुलदीप को जगाने उस के कमरे में की ओर जा रही थी, तभी अचानक उस की नजर खुले हुए मुख्य दरवाजे पर पड़ी, मुख्यद्वार खुला हुआ था.
वह तेजी से कुलदीप के कमरे की ओर लपकी. कमरे के भीतर का दृश्य देख कर उस की आत्मा तक कांप उठी. सामने बेड पर खून से लथपथ कुलदीप की लाश पड़ी थी.
गीता ने डर कर जोरजोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. उस के रोने चिल्लाने की आवाज सुन कर अड़ोसीपड़ोसी जमा हो गए. किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन पर सूचना दी कि अजीत नगर की गली नंबर-3 के मकान नंबर-1715/21 ए में एक आदमी की हत्या हो गई है, जल्दी पहुंचें.
पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना संबंधित थाने हैबोवाल को दे दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी परमदीप सिंह अपने सहायक पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.
सुबह का समय था, दिन अभी पूरी तरह से नहीं निकला था. इस के बावजूद वहां अपेक्षा से अधिक भीड़ जमा थी. जहां हत्या हुई थी, वह 40 वर्षीय कुलदीप सिंह संघड़ उर्फ मोनू का था. हत्या भी उसी की हुई थी. थानाप्रभारी परमदीप सिंह ने घटनास्थल का मुआयना किया. कुलदीप की लाश कमरे में बैड पर पड़ी थी. उस की हत्या किसी तेजधार हथियार से गला रेत कर की गई थी. कटने पर गले से बहा खून बैड पर फैला हुआ था.
खून देख कर ऐसा लगता था, जैसे कुलदीप की हत्या कुछ घंटे पहले ही की गई हो, क्योंकि खून का रंग अभी तक लाल था, काला नहीं हुआ था. घनी आबादी वाली उस मध्यमवर्गीय परिवारों की कालोनी के एक मकान में इस तरह हत्या हो जाना आश्चर्य वाली बात थी.
मामले की गंभीरता को देखते हुए परमदीप सिंह ने घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों और क्राइम टीम को दे दी थी. सूचना मिलते ही लुधियाना पुलिस कमिश्नर डा. सुखचैन सिंह गिल, एडीसीपी गुरप्रीत कौर पोरवाल, एसीपी (वेस्ट) गुरप्रीत सिंह, स्पैशल स्टाफ की टीम और क्राइम ब्रांच टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.
डौग स्क्वायड भी मौके पर बुला लिया गया था. सब ने आते ही अपनाअपना काम शुरू कर दिया. घटनास्थल से कुछ फिंगरप्रिंट भी उठाए गए. खोजी कुत्ते ज्यादा मदद नहीं कर पाए. वह मृतक के कमरे से निकल कर आंगन में चक्कर लगाने के बाद बाहर सड़क पर आ कर रुक गए.
साथसाथ खाना खा कर अलग सोए थे
थानाप्रभारी परमदीप सिंह को मृतक कुलदीप की 37 वर्षीय पत्नी गीता ने बताया कि कुलदीप ने रात को करीब साढे़ 9 बजे मेरे और 17 वर्षीय बेटी सुदीक्षा के साथ छत पर खाना खाया था. खाना खाने के बाद लगभग 10 बजे वह नीचे अपने कमरे में सोने चले गए थे. बाद में मैं ने नीचे आ कर घर का मुख्य द्वार बंद कर के ताला लगाया था, फिर मैं छत पर बेटी के साथ सोने चली गई थी.
रोज की तरह सुबह साढ़े 5 बजे जब मैं छत से उतर कर नीचे आई, तो मैं ने कुलदीप के कमरे में उन की लाश देखी. उस समय घर का मुख्य द्वार खुला हुआ था. यह देख मैं ने घबरा कर शोर मचा दिया. जिस से अड़ोसीपड़ोसी जमा हो गए. उन्हीं में से किसी ने पुलिस को फोन किया होगा.
मृतक कुलदीप के भाई हरदीप ने बताया कि वह रात के करीब साढे़ 9 बजे जब काम पर जा रहा था, तब भाईभाभी और सुदीक्षा छत पर बैठ कर खाना खा रहे थे. सुबह साढ़े 5 बजे मेरे दोस्त और पड़ोसी लाला ने फोन पर मुझे यह खबर दी. हरदीप ने यह भी बताया कि रात को रोजाना कुलदीप ही बाहर वाले मुख्य दरवाजे पर ताला लगाया करता था.
उस ने यह भी बताया कि कुलदीप को शराब पीने की आदत थी. अपनी ड्यूटी से आने के बाद वह सोने से पहले तक 1-2 घंटे घर पर ही बैठ कर शराब पीया करता था. हरदीप के अनुसार घर से उस के भाई की काले रंग की स्पलेंडर मोटर साइकिल और 2 फोन भी गायब थे, जिन में एक फोन ओप्पो कंपनी का था और दूसरा चाइनीज सेट था.
मृतक की बेटी सुदीक्षा ने अपने बयान में सिर्फ इतना ही बताया कि मां के रोने की आवाज सुन कर वह छत से नीचे आई थी.
बहरहाल सब थानाप्रभारी ने मृतक कुलदीप के भाई हरदीप के बयानों के आधार पर कुलदीप की हत्या का मुकदमा भादंवि की धारा 302, 120 बी, 34 के अंतर्गत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ दर्ज कर लिया. प्राथमिक काररवाई कर के उन्होंने लाश पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दी. इस हत्याकांड से पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया था.
पुलिस को नहीं मिला क्लू
खुद को हाईटेक सिस्टम से लैस बताने वाली लुधियाना पुलिस ने घटनास्थल की हाईटेक तरीके से ही जांच की थी. पुलिस की पूरी टीम ने डेढ़ से 2 घंटे में पूरे घटनास्थल की जांच की. अब तक की जांच पड़ताल में यह बात सामने आई कि कुलदीप के हत्यारे जो भी रहे हों, वह थे जानने वाले.
क्योंकि घटनास्थल से ऐसा कोई चिह्न नहीं मिला था, जिस से पता चलता कि हत्यारों ने घर में प्रवेश करने के लिए कोई जोर जबरदस्ती की हो. संभवत: कुलदीप की हत्या में किसी नजदीकी का हाथ था.
बहरहाल, परमजीत सिंह ने आगामी तफ्तीश शुरू करते हुए घटनास्थल के आसपास लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक की. मृतक की पत्नी गीता, बेटी सुदीक्षा और नजदीकी रिश्तेदारों के अलावा कुलदीप के दोस्तों और सहकर्मियों से भी पूछताछ की गई. लेकिन परमदीप सिंह के हाथ ऐसा कोई सूत्र नहीं लगा जिसे कुलदीप की हत्या से जोड़ कर देखा जा सके.
पूछताछ के दौरान पड़ोसियों ने बताया था कि कुलदीप और उस की पत्नी गीता के बीच अकसर झगड़ा होता था. इस बारे में जब गीता से पूछा गया तो उस ने बताया कि कुलदीप अनुशासनप्रिय था. लेकिन शाम को थोड़ी पीने के बाद वह और भी ज्यादा अनुशासित हो जाता था. वह जब तब सुदीक्षा को ठीक से पढ़ने और कोई अधिकारी बनने के बारे में कहा करता था, जिसे ले कर दोनों के बीच कहासुनी हो जाती थी.
बाहर से कौन और कैसे आया?
थानाप्रभारी परमदीप सिंह के लिए यह केस चुनौतीपूर्ण बन चुका था. उन्होंने एक बार फिर सारे घटनाक्रम का शुरू से अध्ययन किया. कत्ल के वक्त केवल मांबेटी ही घर पर थीं. पुलिस को यह बात खटक रही थी कि आखिर कातिल घर में दाखिल कैसे हुए. क्योंकि बिना फ्रैंडली एंट्री के घर में दाखिल होना संभव नहीं था.
वारदात के वक्त मृतक कुलदीप का छोटा भाई हरदीप भी अपनी ड्यूटी पर गया हुआ था. छानबीन में वह न केवल निर्दोष पाया गया, बल्कि उस के बयान ने पुलिस के शक की सुई मृतक की पत्नी गीता की ओर घुमा दी थी.
गीता ने बताया था कि खाना खाने के बाद उस ने खुद मुख्यद्वार बंद किया था. जबकि हरदीप का कहना था कि मुख्यद्वार उस का भाई कुलदीप ही बंद करता था. सोने से पहले कुलदीप को 5-7 मिनट टहलने की आदत थी. टहलने के बाद वह मुख्यद्वार बंद कर चाबी कमरे में खूंटी के पास लटका देता था ताकि सुबह गीता को चाबी ढूंढने में परेशानी न हो. सोचने वाली बात यह भी थी कि जब घर में 2 लोग मौजूद थे तो किसी तीसरे ने बाहर से आ कर कुलदीप की हत्या कैसे कर दी.
इस का मतलब घर का एक आदमी बाहर वाले से मिला हुआ था. या दोनों ही मिले हुए थे. अथवा दोनों ने ही मिल कर कुलदीप की हत्या की थी और मामले को लूटपाट का जामा पहना दिया गया था. जो भी खिचड़ी पकी थी, वह घर के अंदर ही पकी थी. यह बात जेहन में आते ही परमदीप सिह ने गीता और सुदीक्षा की पिछले एक हफ्ते की काल डिटेल्स निकलवाई.
काल डिटेल्स में एक ऐसा नंबर सामने आया जिस पर सुदीक्षा की बहुत बात होती थी. कई काल्स तो घंटे भर से भी ज्यादा की थीं और कई काल देर रात भी की गई थीं. यहां तक कि घटना वाली रात 19 जुलाई को थोड़ेथोड़े अंतराल से दोनों की उस समय तक बात होती रहती थी, जिस समय कुलदीप की हत्या की जा रही थी.
सोचने वाली बात यह थी कि क्या ऐसा संभव था कि नीचे वाले कमरे में लूटपाट के साथ किसी की हत्या की जा रही हो और ऊपर छत पर फोन पर बातें करने वाले को भनक तक ना लगे.
कोई खटका, कोई आहट सुनाई ना दे, ऐसा कैसे संभव था? यह बात परमदीप सिंह को हजम नहीं हो रही थी.
उन्होंने तत्काल उस नंबर के मोबाइल की काल डिटेल्स चैक कीं तो पुलिस के कान खड़े हो गए. थोड़ी सख्ती करने पर सारी सच्चाई सामने आ गई. पुलिस ने सुदीक्षा के 21 वर्षीय प्रेमी तरुण उर्फ तेजपाल सिंह भाटी को हिरासत में ले लिया, जो हंबड़ा स्थित पंजपीर रोड के मेहर सिंह नगर का रहने वाला था. उस की मैडिकल शौप थी. वह बीए सैकेंड ईयर में पढ़ रहा था.
11 वर्षीय आदर्श सिंह अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था, तभी उस के कानों में आवाज आई, ‘‘हैलो आदर्श!’’ आदर्श ने पलट कर देखा तो कमरे के दरवाजे पर मुकेश खड़ा था. आदर्श मुकेश पांडेय को अच्छी तरह जानता था. वह पड़ोस में रहने वाली चांदमती का भतीजा था. मुकेश बुआ के पास घूमने आया था. मुकेश को देखते ही आदर्श बोला, ‘‘नमस्ते मुकेश भैया.’’
‘‘नमस्ते नमस्ते, क्या कर रहे हो आदर्श?’’ मुकेश ने सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठते हुए पूछा.
‘‘कुछ भी नहीं भैया, किताबों में मन नहीं लग रहा था इसलिए चंपक पढ़ रहा हूं.’’ आदर्श ने शालीनता से उत्तर दिया.
‘‘अच्छा, मुझे भी बचपन में चंपक पढ़ने का बड़ा शौक था,’’ मुकेश ने कहा, ‘‘लगता है तुम्हें कहानियों और कार्टून का बहुत शौक है.’’
‘‘हां भैया,’’ आदर्श ने कहा.
‘‘तो ठीक है, मैं तुम्हें तुम्हारे ही काम की एक चीज दिखाता हूं.’’
कहने के बाद मुकेश ने अपनी पैंट की जेब से एक बड़े आकार का चमचमाता हुआ सेलफोन निकाला. नया मोबाइल फोन देख कर आदर्श के चेहरे पर मुसकान थिरक उठी. मुकेश के हाथ से मोबाइल ले कर आदर्श उत्सुकतावश उसे उलटपलट कर देखने लगा, ‘‘ये तो काफी महंगा होगा भैया?’’
‘‘हां, महंगा तो है,’’ मुकेश ने जवाब दिया, फिर उस की ओर देख कर पूछा, ‘‘तुम्हें पसंद हो तो तुम इसे अपने पास रख सकते हो.’’
आदर्श उस की तरफ आश्चर्य से देखते हुआ बोला, ‘‘इतना महंगा फोन भला कोई दूसरे को देता है क्या, जो आप मुझे दे दोगे.’’
‘‘तुम्हारे लिए यह फोन क्या चीज है, आदर्श मैं तो तुम्हारे लिए जान भी दे दूं, एक बार कह कर तो देखो.’’
‘‘नहीं भैया, मुझे आप की जान नहीं चाहिए. आप सहीसलामत रहें. यही मेरे लिए काफी होगा. आप मुझे एक काम की कोई चीज दिखा रहे थे. वो क्या है?’’ आदर्श ने पूछा.
‘‘ठीक है बाबा, दिखाता हूं तुम्हें वो चीज, तुम भी क्या याद रखोगे कि मुकेश भैया जो कहता है वह कर के दिखाता भी है.’’
मुकेश ने अपने फोन में इंटरनेट औन कर के बच्चों वाली एक कार्टून फिल्म चला दी. फिल्म चालू कर के उस ने फोन उस के हाथों में थमा दिया. कार्टून फिल्म देख कर आदर्श का चेहरा खुशियों से खिल उठा और वह पूरी तन्मयता से फिल्म देखने लगा.
मोबाइल के जरिए मुकेश और आदर्श के बीच धीरेधीरे दोस्ती गहरी होती गई. शाम के वक्त जब भी आदर्श स्कूल से घर लौटता, उस के थोड़ी देर बाद ही मुकेश उस के पास पहुंच जाता था.
फिर मोबाइल में उस की पसंदीदा कार्टून फिल्म चालू कर के उसे मोबाइल पकड़ा देता था. आदर्श भी स्कूल का काम छोड़कर घंटों फिल्म देखने में मशगूल हो जाता था. ये देख कर आदर्श की मां और पिता दोनों परेशान रहते थे कि मुकेश मोबाइल में फिल्म दिखा कर उन के बेटे को बिगाड़ रहा है.
एक दिन जयप्रकाश सिंह ने आदर्श को अपने पास बैठा कर बड़े लाड़प्यार से घंटों तक समझाया कि वह मुकेश से दूर रहा करे. मुकेश अच्छा लड़का नहीं है, जिस तरह वह तुम्हें मोबाइल दे कर बिगाड़ रहा है, उस की हरकतें उन्हें पसंद नहीं हैं. बेटा, तुम उस से दूर ही रहा करो, यही तुम्हारे लिए बेहतर होगा.
आदर्श पिता की बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था. उस ने पिता की बातों पर अमल भी किया. उस दिन के बाद आदर्श ने मुकेश के मोबाइल पर कार्टून फिल्म देखनी बंद कर दी. इतना ही नहीं, उस ने मुकेश से मिलना भी कम कर दिया.
बात 4 अक्तूबर, 2018 की है. शाम के 5 बज रहे थे. आदर्श अब तक स्कूल से घर नहीं लौटा था. उस की मां पूनम सिंह बेटे को ले कर बेहद परेशान और चिंतित थी. पूनम के 2 और बेटे रितिक व बैजनाथ भी भाई की वजह से परेशान थे. जबकि तीनों बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते थे.
उन की स्कूल की छुट्टी भी साथ ही होती थी और साथ ही घर से निकलते भी थे. लेकिन उस दिन पता नहीं कैसे तीनों का साथ छूट गया. उस दिन घर के लिए आगे पीछे निकले थे. रितिक और बैजनाथ तो घर लौट आए थे, लेकिन आदर्श नहीं लौटा था.
पूनम ने बच्चों से आदर्श के बारे में पूछा तो रितिक ने कहा कि वह आ रहा होगा. हो सकता है, छुट्टी के समय हम से पहले निकल लिया होगा, तभी छुट्टी होने पर हमें दिखाई नहीं दिया था. थोड़ी देर इधरउधर तलाशने के बाद जब वह हमें नहीं मिला तो हम यह सोच कर घर आ गए कि वह घर पहुंच गया होगा. शायद अपने दोस्तों के साथ पीछे आ रहा होगा. बेटे का जवाब सुन कर पूनम चुप हो गई और अपने कामों में लग गई.
शाम के 5 बज रहे थे. अब से पहले आदर्श को घर लौटने में इतनी देर कभी नहीं हुई थी. बेटे की चिंता में पूनम का दिल बुरी तरह घबरा रहा था. उस ने पति जयप्रकाश सिंह को फोन कर के यह बात बता दी. बेटे के स्कूल से घर न लौटने की बात सुन कर जयप्रकाश सिंह घर पहुंच गए.
उन्होंने अपने मोहल्ले के लोगों के साथ बेटे को संभावित जगहों पर ढूंढा लेकिन उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. वह मायूस हो कर घर लौट आए.
रहस्यमय तरीके से गायब बेटे को ले कर जयप्रकाश सिंह काफी परेशान थे. धीरेधीरे अंधेरा भी घिरता जा रहा था. जयप्रकाश सिंह की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें. मोहल्ले के लोग भी उन्हें तरह तरह की सलाह देने लगे.
अंतत: अपने शुभचिंतकों के साथ वह अपने नजदीकी थाने सिकरीगंज पहुंच गए. यह थाना गोरखपुर जिले के अंतर्गत आता है. जयप्रकाश ने वहां मौजूद इंसपेक्टर दिनेश मिश्र को बेटे के गायब होने की जानकारी दे दी.
पुलिस ने आदर्श की गुमशुदगी दर्ज कर जांच शुरू कर दी. दूसरे दिन शाम को पुलिस को एक अहम सुराग हाथ लगा. किसी ने इंसपेक्टर को बताया कि बीती शाम लगभग 4 बजे आदर्श स्कूल ड्रेस और बैग लिए गांव के ही मुकेश पांडेय और गौतम पांडेय के साथ गांव के बाहर पुलिया के पास कहीं जाते हुए दिखा था.
पुलिस ने जयप्रकाश सिंह से मुकेश और गौतम के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि मुकेश और गौतम पड़ोस में रहने वाली चांदमती का भतीजा और नाती हैं. ये दोनों कई दिनों से यहां आ कर रह रहे हैं. इतना ही नहीं पिछले कई दिनों से मुकेश घर आ कर आदर्श से मिलता था.
आदर्श उस के साथ घंटों मोबाइल पर खेलता था. उन्होंने कई बार बेटे को समझाया भी, पर वह नहीं माना. यह सुन कर पुलिस का माथा ठनका कि कहीं आदर्श के गायब होने में उन दोनों का हाथ तो नहीं है.
उसी शाम पुलिस चांदमती देवी के घर पहुंची और उस से मुकेश और गौतम के बारे में से पूछताछ की. पूछताछ के दौरान पता चला कि मुकेश और गौतम बीती रात अपने अपने घर चले गए. मुकेश गोपालगंज (बिहार) के मीरगंज के बड़कागांव में रहता था, जबकि गौतम संत कबीर नगर जिले की धनघटा के मझौरा का रहने वाला था.
यह बात पुलिस को कुछ हजम नहीं हुई कि आदर्श के अचानक लापता होते ही मुकेश और गौतम भी गांव से अचानक गायब क्यों हो गए. यह बात इत्तफाक नहीं हो सकती थी. इस में उन्हें जरूर कोई न कोई लोचा दिखाई दिया.
2 दिन बीत जाने के बाद आदर्श का कहीं पता नहीं चला तो गांव वालों के दिलों में पुलिस के प्रति आक्रोश बढ़ने लगा. धीरेधीरे माहौल विस्फोटक बनता जा रहा था. इंसपेक्टर दिनेश मिश्र माहौल को भांप गए और इस से एसएसपी को अवगत करा दिया. एसएसपी शलभ माथुर ने गुत्थी को सुलझाने के लिए इंसपेक्टर दिनेश मिश्र को अहम दिशानिर्देश दिए.
एसएसपी के आदेश पर इंसपेक्टर दिनेश मिश्र ने आदर्श के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर ली. चूंकि आदर्श के पिता ने गौतम और मुकेश पर शक जताया था, इसलिए इन की तलाश में एक पुलिस टीम उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर और दूसरी टीम बिहार के गोपालगंज रवाना कर दी गई. लेकिन दोनों जगहों पर गईं पुलिस टीमें खाली हाथ वापस लौट आईं.
पता चला कि मुकेश और गौतम अपने गांव नहीं पहुंचे थे. इस से यह बात साफ हो गई कि आदर्श के अपहरण में दोनों का कहीं न कहीं हाथ जरूर है, तभी दोनों पुलिस से बचने के लिए इधरउधर भागते फिर रहे थे.
इधर पुलिस अपहरण की गुत्थी सुलझाने की कोशिश में जुटी हुई थी कि 8 अक्तूबर, 2018 की दोपहर बारी गांव के बाहर रामपाल अपने धान के खेत में सिंचाई करने गया तो उस ने वहां लाश पड़ी देखी. वह उलटे पैर गांव लौट आया और यह सूचना थाना सिकरीगंज को दे दी.
सूचना मिलते ही इंसपेक्टर दिनेश मिश्र मय फोर्स के मौके पर पहुंच गए. उन्होंने लाश का मुआयना किया तो वह किसी बच्चे की लाश निकली. लाश इतनी क्षतविक्षत थी कि उसे पहचाना नहीं जा सकता था. जंगली जानवरों और चील कौओं ने उसे नोचनोच कर खा लिया था. साथ ही तेज बदबू भी आ रही थी.
लाश की सूचना मिलते ही मौके पर गांव वालों का मजमा लग गया. सूचना मिलते ही जयप्रकाश सिंह भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने जब वह लाश देखी तो उस की कमर पर अंडरवियर के अलावा कोई कपड़ा नहीं था. उस की कदकाठी और चेहरे की बनावट देख कर जयप्रकाश सिंह पहचान गए. उन्होंने उस की पुष्टि अपने बेटे आदर्श के रूप में की.
बेटे की लाश देख कर जयप्रकाश सिंह वहीं गश खा कर गिर पड़े. थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश आया तो वह दहाड़ें मार कर रोने लगे. इंसपेक्टर दिनेश मिश्र ने अपहरण हुए बच्चे की लाश मिलने की सूचना एसएसपी शलभ माथुर, एसपी (साउथ) और सीओ (बासगांव) को दे दी.
सूचना मिलते ही पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने लाश का मुआयना कर के अंदाजा लगाया कि आदर्श जिस दिन लापता हुआ था, शायद उसी दिन उस की हत्या कर दी गई होगी.
पुलिस ने मौके की आवश्यक काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल गोरखपुर भिजवा दी. पुलिस ने पहले से दर्ज अपहरण की रिपोर्ट में भादंवि की धारा 302 और 201 और जोड़ दीं.
4 दिनों से रहस्यमय तरीके से गायब आदर्श की हत्या से परिवार वाले दुखी थे. वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि बदमाशों ने उन के मासूम बेटे की हत्या क्यों की थी? उन्हें उन के बेटे या उन से क्या चाहिए था? जिस की वजह से उस की हत्या कर दी.
पुलिस ने दोनों नामजद आरोपियों की तलाश तेज कर दी. कहीं से पुलिस को दोनों आरोपियों मुकेश और गौतम के मोबाइल नंबर मिल गए. दोनों नंबरों को पुलिस ने सर्विलांस पर लगा दिया और उन का पता लगाने के लिए मुखबिर भी लगा दिए.
5वें दिन यानी 12 अक्तूबर, 2018 को पुलिस को बड़ी सफलता मिली. इंसपेक्टर दिनेश मिश्र को मुखबिर से सूचना मिली कि दोनों आरोपी मुकेश और गौतम सिकरीगंज के पिपरी तिराहे के पास खड़े हैं. वे कहीं भागने की फिराक में हैं.
मुखबिर की सूचना मिलते ही इंसपेक्टर दिनेश मिश्र सादे कपड़ों में अपनी टीम के साथ पिपरी चौराहा पहुंच गए. सरकारी जीप उन्होंने चौराहे से थोड़ी दूर खड़ी कर दी और आरोपियों को चारों ओर से घेर लिया ताकि वे भाग न सकें.
सादा वेश में कुछ लोगों को अपनी ओर आता देख मुकेश और गौतम समझ गए कि शायद वे पुलिस वाले हैं. जैसे ही वह भागने को हुए तो पुलिस टीम ने दोनों को पकड़ लिया. पुलिस दोनों को थाने ले आई.
थाने ला कर इंसपेक्टर दिनेश मिश्र ने मुकेश और गौतम से अलगअलग पूछताछ की. पूछताछ के दौरान दोनों आरोपी पुलिस के सामने टूट गए और आदर्श का अपहरण करने के बाद उस की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया.
उन की निशानदेही पर पुलिस ने चांदमती के घर से हत्या में इस्तेमाल चाकू, खून से सनी शर्ट, ताबीज, स्कूल के जूतेमोजे और स्कूल बैग बरामद कर लिया. पूछताछ के बाद आदर्श सिंह अपहरण और हत्याकांड की सनसनीखेज कहानी इस तरह सामने आई—
मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के सिकरीगंज थाने के बारीगांव के रहने वाले जयप्रकाश के 3 बेटे थे, जिन में 11 वर्षीय आदर्श कुमार सिंह मंझले नंबर का था. आदर्श पढ़ाई में बहुत होशियार था. जयप्रकाश सिंह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. उन के वेतन से परिवार का भरणपोषण होता था.
जयप्रकाश अपनी सैलरी के सारे पैसे पत्नी के हाथों पर रख देते थे. आदर्श अकसर पिता द्वारा मां को पैसे देते देखता था. पैसे देख कर उस के बालमन को लगता था कि उस के पिता की महीने की कमाई लाखों रुपए है. उस के पापा के पास बहुत सारा पैसा है.
यह बात आदर्श अकसर बाहर वालों को बता भी देता था कि उस के पापा के पास बहुत सारा पैसा है. वह पैसे घर की अलमारी में रखते हैं.
यह बात आदर्श के पड़ोस में रहने वाली 80 वर्षीय विधवा चांदमती देवी के 30 वर्षीय भतीजे मुकेश पांडेय ने भी सुन ली थी. उस ने मासूम आदर्श के मुंह से जब से रुपए वाली बात सुनी थी, उस दिन से उस के दिमाग में शैतानी कीड़े कुलबुलाने लगे थे.
चूंकि मुकेश अपनी बुआ चांदमती के यहां अकसर आता रहता था, इसलिए गांव वाले उसे अच्छी तरह जानते और पहचानते थे. जयप्रकाश सिंह के यहां भी मुकेश का आनाजाना लगा रहता था. वह मोबाइल चार्ज करने के बहाने जयप्रकाश सिंह के घर आता था और घंटों बैठा रहता था.
धीरेधीरे उस ने आदर्श की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया. मुकेश आदर्श को अपने फोन में कार्टून फिल्म दिखाता था. आदर्श चूंकि बच्चा था, इसलिए वह उस की बातों में फंसता गया.
30 वर्षीय मुकेश पांडेय मूलरूप से बिहार के गोपालगंज के मीरगंज थाना क्षेत्र के बड़का गांव का रहने वाला था. वह पढ़ालिखा और परिश्रमी युवक था. पढ़लिख कर उस ने सरकारी नौकरी पाने की कोशिश की थी, लेकिन उसे नौकरी नहीं मिली थी.
मुकेश कुछ ऐसा करना चाहता था जिस से कम मेहनत और कम समय में वह लखपति बन जाए. वह जिस गांव में रहता था, उस गांव में कम ही लोगों के घरों में शौचालय थे. सरकार गांवों में शौचालय बनवाने के लिए गांव वालों को प्रोत्साहन राशि मुहैया कराती थी.
मुकेश के दिमाग में आया कि क्यों न वह सरकारी योजनाओं का लाभ उठाए, जिस से गांव वालों को भी लाभ पहुंचे और उस की भी जेब गरम होती रहे. मुकेश ने सरकार से मिलने वाली योजनाओं का लाभ गांव वालों को समझाया कि शौचालय बनवाने के लिए कुछ पैसे सरकार उन्हें दे रही है और कुछ पैसे उन्हें अपने पास से लगाने होंगे. तब जा कर एक बेहतर शौचालय बन सकता है.
मुकेश ने गांव वालों को इस शातिराना अंदाज से बातों में फंसाया कि वे उस के झांसे में आ गए. करीब 20-25 लोगों ने उसे 10-10 हजार रुपए इकट्ठा कर के दे दिए. इस तरह उस के पास जब ढाई लाख रुपए जमा हो गए तो वह गांव से गायब हो गया. महीनों बीत गए, न तो मुकेश का पता चला और न ही उन के शौचालय बने.
गांव वालों को अपने साथ धोखे का अहसास हुआ तो वे मुकेश के घर वालों पर रुपए लौटाने के लिए दबाव बनाने लगे. मुकेश ने सारे पैसे खर्च कर डाले थे. उस के पास फूटी कौड़ी तक नहीं बची थी. तब वह बिहार से भाग कर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की सिकरीगंज थाने के बारीगांव में अपनी बुआ चांदमती के यहां जा कर छिप गया.
उधर गांव वाले रुपए को ले कर उस के घर वालों पर जबरदस्त दबाव बनाए हुए थे. मुकेश का दिमाग काम नहीं कर रहा था कि वह दो ढाई लाख रुपयों का इंतजाम कहां से करे. उसे डर था कि अगर उस ने उन के रुपए वापस नहीं किए तो वह उस पर मुकदमा कर देंगे. इस से मुकेश डर गया. वह नहीं चाहता था कि उस पर पुलिस केस हो. पुलिस केस हो जाने से उस का जीवन बरबाद हो सकता था.
इसी बीच उस की मुलाकात गांव के जयप्रकाश सिंह के बेटे आदर्श से हो गई. आदर्श ने बताया कि उस के पिता के पास लाखों रुपए हैं. आदर्श को ले कर मुकेश के दिमाग में एक खतरनाक योजना यह पनपी कि यदि आदर्श का अपहरण कर लिया जाए तो फिरौती के तौर पर उसे 10-20 लाख रुपए आसानी से मिल सकते हैं.
वह उन्हीं रुपयों से गांव वालों के रुपए लौटा देगा और बाकी के रुपयों से ऐश करेगा. यह बात दिमाग में आते ही उस के चेहरे पर शैतानी मुसकान थिरक उठी.
यह काम मुकेश के अकेले के वश का नहीं था. इत्तफाक से उन्हीं दिनों चांदमती की बेटी का बेटा यानी उन का नाती गौतम पांडेय अपनी ननिहाल में रहने के लिए आया. मुकेश और गौतम रिश्ते में मामाभांजे थे. मुकेश ने रुपए का लालच दे कर भांजे गौतम को अपनी योजना में शामिल कर लिया.
योजना के मुताबिक, मुकेश फोन चार्ज करने के बहाने जयप्रकाश सिंह के घर जाया करता था और आदर्श को मोबाइल पर कार्टून फिल्म दिखा कर उस से घर का सारा भेद ले लेता था. भावावेश में आ कर मासूम आदर्श घर की सारी जानकारी मुकेश को दे देता था. जानकारी पाने के बाद मुकेश ने अपनी योजना गौतम को बताई.
योजना के अनुसार आदर्श का अपहरण करने के बाद उसी दिन उस की हत्या कर देनी थी. उस के बाद उस के कपड़े, बैग, जूते आदि को हथियार बना कर आदर्श को जिंदा बताया जाता. फिर उस के पिता जयप्रकाश से 15 लाख की फिरौती वसूली जाती. यह योजना गौतम को जंच गई. यह 4 अक्तूबर, 2018 की बात है.
योजना के अनुसार 4 अक्तूबर की शाम आदर्श के स्कूल से आने की प्रतीक्षा में मुकेश और गौतम गांव के बाहर पुलिया के पास खड़े हो गए. आदर्श को अकेला आता देख कर दोनों के चेहरे पर शातिराना मुसकान थिरक उठी.
जैसे ही आदर्श पुलिया के पास पहुंचा मुकेश ने मोबाइल फोन दिखा कर उसे अपनी बातों में उलझा लिया और पुलिया से ही उसे दूसरी ओर ले कर चल दिया. गौतम भी उस के साथ था. गांव के एक युवक ने आदर्श को मुकेश और गौतम के साथ जाते हुए देख लिया था. उसी ने पुलिस को यह जानकारी दी थी.
गौतम और मुकेश आदर्श को अपनी बातों के जाल में उलझा कर शाम ढलने की प्रतीक्षा कर रहे थे. शाम ढलते ही दोनों आदर्श को ले कर रामपाल के धान के खेत में पहुंचे. खेत में पहुंचते ही मुकेश ने आदर्श का गला घोंट कर उस की हत्या कर दी. फिर चाकू से उस का गला रेत दिया ताकि वह जीवित न बचे. क्योंकि उस के जीवित रहने से उन्हें जेल की हवा खानी पड़ती.
आदर्श की हत्या के बाद मुकेश और गौतम ने उस के कपड़े, जूते, बैग और गले में पहना ताबीज अपने पास रख लिया ताकि वह जयप्रकाश सिंह को यह विश्वास दिला सकें कि उन का बेटा जिंदा है, जिस से फिरौती की रकम आसानी से वसूली जा सके.
मुकेश और गौतम चांदमती के जिस कमरे में रह रहे थे, उसी में उन्होंने आदर्श का सामान छिपा कर रख दिया. जब आदर्श की खोज तेज हुई और मामला पुलिस तक पहुंचा तो दोनों डर गए और गांव छोड़ कर भाग गए.
लेकिन एक चश्मदीद गवाह ने मुकेश के इरादों पर पानी फेर दिया और वे दोनों जा पहुंचे जेल. कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में बंद थे. पुलिस अदालत में दोनों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
थाने में आने के बाद एसआई हरेंद्र ने दोनों को अपने सामने बिठाया तो रवि परेशान स्वर में बोला, ”सर, हमें यह तो बताइए, आप किस जुर्म में हम दोनों को थाने लाए हैं?’’
”आलोक सिंह की हत्या के जुर्म में तुम्हें यहां लाया गया है.’’ एसआई अपने स्वर को गंभीर बना कर बोले, ”आलोक सिंह को तो तुम पहचानते होगे? उस की हत्या हुई है.’’
”कौन आलोक?’’ रवि हैरानी से बोला, ”मेरे पहचान के 2-3 लोग हैं साहब, जिन का नाम आलोक सिंह है.’’
”मै देवला गांव, पक्षी विहार में रहने वाले आलोक सिंह की बात कर रहा हूं.’’
”अरे.’’ रवि बुरी तरह चौंका, ”क्या आलोक सिंह की हत्या हो गई है? कब, कैसे?’’
”बनो मत.’’ एसआई हरेंद्र गुर्राए, ”आलोक सिंह की तुम ने ही हत्या की है.’’
”यह झूठ है साहब, मैं तो आलोक को बड़े भाई की तरह मानता था. बहुत इज्जत करता था उन की.’’
”ओह!’’ एसआई हरेंद्र सिंह मुसकराए, ”तभी उस की इज्जत से खेल रहे थे. क्या तुम्हारे आलोक की बीवी प्रियंका के साथ नाजायज संबंध नहीं हैं?’’
रवि ने सिर झुका लिया. कुछ क्षणों तक वह खामोश रहा फिर बोला, ”यह ठीक है साहब कि मेरे प्रियंका के साथ नाजायज संबंध हैं. लेकिन इस में मेरा जितना दोष है, उतना दोष प्रियंका का भी है. उसी ने मुझे अपने प्रेमजाल में फांसा था. मुझे उस ने खुला निमंत्रण दिया था तो मैं बहक गया. वैसे प्रियंका अच्छी औरत नहीं है साहब, उस का पहले सर्वेश से भी प्रेम संबंध रहा है.’’ रवि ने बात खत्म कर सिर खुजाया फिर बोला, ”मैं समझ गया साहब, हत्या किस ने की है?’’
”किस ने की है?’’ एसआई ने उसे घूरा.
”सर्वेश ने की होगी साहब. मेरा पूरा यकीन है कि वही ऐसा करेगा, क्योंकि आलोक के साथ मैं ने 29 अक्तूबर, 2023 को सर्वेश की अच्छे से ठुकाई कर दी थी. सर्वेश ने आलोक से उसी ठुकाई का बदला लिया होगा.’’
”तुम ने और आलोक ने सर्वेश की पिटाई की थी, भला क्यों?’’ एसआई हरेंद्र सिंह ने पूछा.
”साहब, आलोक सिंह ने मुझे बताया था कि सर्वेश प्रियंका को रास्ते में परेशान करता है. गंदेगंदे कमेंट करता है.’’
”तुम तो कह रहे हो कि प्रियंका का सर्वेश भी आशिक था.’’
”हां साहब, सर्वेश से भी प्रियंका ने इश्क लड़ाया था. उस से मिलती थी, फिर उसे घर भी लाने लगी. आलोक सीधासादा इंसान था, वह प्रियंका को पाकसाफ समझता था, उसे प्रियंका पर यह संदेह नहीं था कि वह दूसरे व्यक्ति से शारीरिक संबंध बनाती होगी. वह तो सर्वेश को उस का हमदर्द दोस्त समझता था.
”प्रियंका ने काफी दिनों तक सर्वेश से रिश्ता रखा, फिर न जाने क्यों वह उस से कटने लगी. शायद इसीलिए सर्वेश उसे रास्ते में तंग करने लगा था. वह तिलमिलाया हुआ इंसान था. प्रियंका ने इस की शिकायत अपने पति आलोक से की होगी, तभी आलोक ने सर्वेश को सबक सिखाने के लिए मुझ से मदद मांगी थी. मैं ने आलोक का साथ दिया था साहब. इसी से नाराज हो कर सर्वेश ने आलोक की हत्या कर दी होगी. मैं अपनी मां की कसम खा कर कहता हूं साहब, मैं ने आलोक की हत्या नहीं की है.’’
”ठीक है, मैं सर्वेश को चैक करता हूं. लेकिन तुम भी शक के दायरे में हो, कहीं जाओगे नहीं, जब तक यह मालूम न हो जाए कि आलोक का कातिल कौन है.’’ एसआई हरेंद्र ने कांस्टेबल नवीन मलिक को इशारे से पास बुला कर कहा, ”इन दोनों को दूसरे कमरे में बिठा दो और इन पर नजर रखना.’’
”ठीक है सर.’’ नवीन मलिक ने कहा और दोनों को ले कर एसआई के कक्ष से बाहर निकल गया.
प्रियंका ने सुना दी डबल इश्क की दास्तां
एसभाई हरेंद्र सिंह ने महिला कांस्टेबल को भेज कर मृतक आलोक की पत्नी प्रियंका को थाने में बुलवा लिया. प्रियंका पति की मौत से बेहद दुखी दिखाई दे रही थी. उस की आंखें रोने के कारण सूज गई थीं.
आलोक सिंह की लाश पोस्टमार्टम के बाद उस के घर वालों को सौंपी जा चुकी थी और उस के बड़े भाई रामवीर ने बहुत गमगीन हालत में छोटे भाई की अंत्येष्टि कर दी थी.
इश्क के रंग में रंगी प्रियंका को शायद अब समझ में आ रहा था कि उस के गलत आचरण के कारण ही उस का खुद का घर उजड़ चुका है और वह पति को गंवा बैठी.
उस ने थाने में चुपचाप कुबूल कर लिया कि उस के सर्वेश और रवि के साथ नाजायज संबंध थे. सर्वेश उस की जिंदगी में पहले आया था, जिस के साथ उस ने काफी दिन मौजमस्ती की, फिर रवि की ओर झुक गई. इस से सर्वेश चिढ़ गया. वह उसे बीच राह में परेशान करने लगा था. वह उसे बदनाम करने की धमकियां देता था.
यह बात उस ने अपने पति को बताई तो उन्होंने सर्वेश को 2-3 बार प्यार से समझाया. प्रियंका ने बताया कि जब सर्वेश अपनी हरकतों से बाज नहीं आया तो उन्होंने रवि के साथ मिल कर सर्वेश की धुनाई कर दी थी. शायद इसी बात से खफा हो कर उस ने मेरे पति आलोक की हत्या कर दी है.
प्रियंका ने आगे कहा कि मैं बेशक बदचलनी पर चली, लेकिन मैं बच्चों की कसम खा कर कहती हूं कि मैं ने किसी से नहीं कहा कि मेरे पति की हत्या कर दो. यह काम सर्वेश का है. उसे गिरफ्तार कर लीजिए साहब.
एसआई हरेंद्र सिंह ने प्रियंका से सर्वेश का पता मालूम किया तो उस ने बता दिया. सर्वेश, गांव धनसिंह पुरवा, जिला हरदोई का रहने वाला था. पुलिस टीम ने सर्वेश के पते पर दबिश दी तो वह घर से फरार मिला. उस के पीछे मुखबिर लगा दिए गए. जल्द ही एक विश्वासपात्र मुखबिर ने बताया कि सर्वेश अपने फुफेरे भाई रिंकू उर्फ भूपेंद्र सिंह के साथ सूरजपुर में पैरामाउंट अंडरपास पर आने वाला है. इस सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने घेराबंदी कर ली. सर्वेश वहां रिंकू के साथ आया तो उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

सर्वेश ने क्यों की थी आलोक की हत्या
थाने में पूछताछ हुई तो सर्वेश ने बताया कि वह प्रियंका से प्रेम करता था. प्रियंका ने उस से किनारा करना चाहा तो वह सहन नहीं कर पाया, वह प्रियंका से अपना प्यार लौटाने के लिए गिड़गिड़ाता था. प्रियंका उसे दुत्कार रही थी. उस ने अपने पति से कहा कि मैं उसे आते जाते राह में परेशान करता हूं.
उस ने कहा कि आलोक ने प्रियंका के दूसरे प्रेमी रवि के साथ मिल कर मेरे मोहल्ले में मेरी पिटाई कर दी थी. मैं इस से काफी अपमानित महसूस करने लगा था. मैं ने अपने फुफेरे भाई रिंकू उर्फ भूपेंद्र सिंह को साथ लिया और रवि को सबक सिखाने के लिए उस की तलाश में निकला, लेकिन रवि हमें नहीं मिला.
तब हम सनप्लास्ट कंपनी साईट-बी, इंडस्ट्रियल एरिया पहुंचे. आलोक यहां नौकरी करता था. वह शाम को ड्यूटी कर के कंपनी से बाहर आया और घर जाने लगा तो मैं ने और रिंकू ने उसे घेर लिया.
हम उसे ट्राला के केबिन में ले आए. वहां उस से मारपीट की. मैं ने लोहे के टायर लीवर से आलोक के सिर पर वार किया तो उस का सिर फट गया. सर्वेश ने बताया कि वह बेहोश हो कर गिरा तो मैं ने उस का गला दबा कर जान ले ली. मैं साथ दो निशाने साधना चाहता था. मैं ने रिंकू की मदद से आलोक की लाश मिग्सन ग्रीन सोसायटी की ग्रीन बेल्ट (ग्रेटर नोएडा) में फेंक दी, ताकि यहां रहने वाले रवि पर हत्या का शक जाए. रवि यदि हत्या के शक में पकड़ा जाता और जेल जाता तो प्रियंका फिर मेरी तरफ झुक जाती.
लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पुलिस ने मुझे और रिंकू उर्फ भूपेंद्र सिंह, मैस कटरा, जिला कानपुर देहात को पैरामाउंट अंडरपास से गिरफ्तार कर लिया.

आरोपी रिंकू
सर्वेश ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया तो उसे और रिंकू को उसी दिन कोर्ट में पेश कर के रिमांड पर ले लिया गया.
कड़ी पूछताछ से उन से हत्या में प्रयुक्त टायर लीवर, ट्राला जिस का रजिस्ट्रेशन नंबर- पीबी 10एचडी 1859 था और जिस के केबिन में आलोक की हत्या की गई थी, बरामद कर लिया गया.
ट्राला की खून सनी सीट बैल्ट, सीट कवर और ट्राला में गिर कर सूख चुके खून के नमूने भी एकत्र कर लिए गए. केस को मजबूती देने वाले साक्ष्य इकट्ठा करने के बाद जब रिमांड अवधि खत्म हुई तो पुलिस ने रिंकू उर्फ भूपेंद्र और सर्वेश को कोर्ट में पेश कर दिया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.
रवि और उस के दोस्त बबलू उर्फ अशरफ अली को रिहा कर दिया गया. छोड़ तो प्रियंका को भी दिया गया था, लेकिन उसे अब अपने आप से नफरत हो गई थी. पति की मौत का वह खुद को जिम्मेदार मानती थी. वह काफी गुमसुम हो गई थी और बच्चों के साथ सादगी भरा जीवन जी रही थी. शायद यही उस का पछतावा था. अब घटना की जांच मौजूदा एसएचओ पुष्पराज कर रहे हैं.
खूबसूरती और महत्त्वाकांक्षा बनी पतन का कारण
जवानी के साथ बढ़ती खूबसूरती ने आंचल के ख्वाबों की ऊंचाई भी बढ़ा दी. वह ग्लैमर की दुनिया में नाम कमाने के बारे में सोचने लगी. लेकिन इस के लिए न तो उस के पास अनुभव था और न ही ग्लैमर की दुनिया तक पहुंचने का रास्ता उसे पता था. अपने ख्वाबों को पूरा करने के लिए वह आधुनिक परिवेश में ढलती गई और इसी चक्कर में उस के कदम बहक गए.
उन्हीं दिनों वह वन विभाग के एक रेंजर के प्यार में उलझ गई. बाद में आंचल ने उस रेंजर की अश्लील सीडी बना ली. इस सीडी के बहाने वह रेंजर को ब्लैकमेल कर 3 करोड़ रुपए मांगने लगी. रेंजर ने पुलिस में मुकदमा दर्ज करा दिया. इस मामले में सन 2014 में पुलिस ने आंचल को गिरफ्तार किया था. आंचल को करीब ढाई महीने तक जेल में रहना पड़ा. बाद में वह जमानत पर छूट गई.
बेटी की ऐसी गुश्ताखियों से लगे सदमे के कारण पिता राकेश यादव की मौत हो गई. जेल से छूटने के बाद आंचल ज्यादा स्वच्छंद हो गई. उस ने धमतरी शहर छोड़ दिया और वह रायपुर जा कर रहने लगी.
रायपुर में उस की जानपहचान कई रईसजादों से हो गई. जल्दी ही उस की दोस्ती का दायरा रायपुर, भिलाई और दुर्ग के अलावा कई अन्य शहरों के हाईप्रोफाइल लोगों तक फैल गया. वह रायपुर में होने वाली हाईप्रोफाइल नाइट पार्टियों की शान बन गई.
रईसजादों से दोस्ती हुई तो आंचल ने रायपुर की फ्लावर वैली में किराए का एक बंगला ले लिया. साथ ही उस ने लग्जरी कार भी ले ली.
वह आधुनिक तौरतरीकों और शानोशौकत से ग्लैमरस लाइफ जीने लगी. कभीकभी वह धमतरी भी आ जाती थी. साथ ही कभी उस की मां या भाई भी रायपुर आ जाते थे. इस बीच भाई सिद्धार्थ ने धमतरी में किराए पर टैक्सी चलाने का काम शुरू कर दिया था.
आंचल भले ही रायपुर में रहती थी, लेकिन उस की स्वच्छंदता और चालचलन के किस्से धमतरी में रह रहे भाई सिद्धार्थ और मां ममता के कानों तक पहुंच जाते थे. उन्हें मौडर्न लाइफ स्टाइल के नाम पर आंचल का अश्लीलता बिखेरने वाले छोटेछोटे कपड़े पहन कर पार्टियों में शामिल होना और शराब पीना अच्छा नहीं लगता था. इस से उन के परिवार की बदनामी हो रही थी.
आंचल के कारण सिद्धार्थ और ममता को लोगों के ताने सुनने पड़ते थे. बदनामी की वजह से सिद्धार्थ की शादी भी नहीं हो रही थी. इसे ले कर आंचल और सिद्धार्थ में अकसर विवाद होता रहता था. आंचल और सिद्धार्थ के बीच पिता की संपत्ति का भी विवाद था.
आंचल ने 3 डौगी पाल रखे थे. इन में से एक डौगी का नाम उस ने अपने छोटे भाई सिद्धार्थ उर्फ जिमी के नाम पर जिमी रखा हुआ था. कई बार आंचल अपने भाई को जलील करने के लिए उस के टुकड़ों पर पलने वाला कुत्ता तक कह देती थी. बेटी के रहने सहने के ढंग और भाई के साथ उस के व्यवहार से मां भी परेशान थी.
गुस्से में उबला खून बना खतरनाक
25 मार्च को आंचल रायपुर से पेशी के सिलसिले में धमतरी आई थी. वह अपनी कार से अपने 3 पालतू कुत्ते भी लाई थी. शाम करीब 7 बजे अपनी काले रंग की कार से वह घर पहुंची. थोड़ी देर बाद उस का भाई सिद्धार्थ से पुरानी बातों को ले कर विवाद हो गया.
इस पर आंचल ने भाई से कहा कि तुम मेरी कमाई पर पल रहे हो. तुम्हारी औकात घर के पालतू कुत्ते जिमी जैसी है. यह सुन कर सिद्धार्थ को गुस्सा आ गया. उस ने आंचल को 2 तमाचे जड़ दिए.
चांटे खाने से तिलमिलाई आंचल ने अपने बैग से चाकू निकाला और सिद्धार्थ पर हमला कर दिया. इस से सिद्धार्थ के हाथ पर जख्म हो गया और खून रिसने लगा. खून बहता देख कर सिद्धार्थ अपना आपा खो बैठा.
उस ने आंचल से चाकू छीन लिया और उसी से आंचल के पेट पर कई वार किए. फिर उस ने तब तक उस पर गला दबाए रखा जब तक कि उस के प्राण नहीं निकल गए.
इस घटना के वक्त आंचल की मां ममता घर में ही थी. वह बाथरूम में काम कर रही थी. ममता बाथरूम से कमरे में आई तो आंचल फर्श पर पड़ी थी उस के पेट से खून बह रहा था और सांसें थम चुकी थीं. सिद्धार्थ ने मां को सारी बात बता दी. मां भी आंचल की हरकतों और तानों से त्रस्त थी. इसलिए वह बेटे का साथ देने को तैयार हो गई. आखिर मांबेटे ने मिल कर आंचल का शव ठिकाने लगाने की योजना बनाई.
आंचल का शव घर में पड़ा छोड़ कर सिद्धार्थ उस का मोबाइल ले कर बाइक से मकई चौक गया. वहां उस ने पान खाया, फिर म्युनिसिपल स्कूल के पास आ कर आंचल का मोबाइल स्विच औफ कर दिया. इस के बाद सिद्धार्थ घर लौट आया.
सिद्धार्थ ने मां की मदद से आंचल की कार की डिक्की में उस की लाश रखी. फिर वह पुलिस और सीसीटीवी कैमरों से बचने के लिए कार ले कर जिला अस्पताल के बगल से जाने वाली पतली गली में हो कर म्युनिसिपल स्कूल के पास पहुंचा.
वहां से वह बस्तर रोड पर निकल गया. गुरुर और कनेरी होते हुए वह गंगरेल नहर पर पहुंच गया. नहर पर पहुंच कर उस ने डिक्की से आंचल की लाश कार से निकाली. नहर के किनारे ले जा कर उस ने लाश को रस्सी के सहारे एक भारी पत्थर से बांधा और लाश नहर में लुढ़का दी.
नहर में आंचल का शव फेंकने के बाद सिद्धार्थ ने उस की घड़ी, मोबाइल फोन, सोने का ब्रेसलेट आदि चीजें वालेदगहन के पास फेंक दीं.
घर वापस लौट कर सिद्धार्थ ने आंचल की कार में लगे खून के धब्बों को साफ किया. इस से पहले मां ने कमरे में फर्श पर फैले खून को साफ कर दिया था. आंचल की लाश ठिकाने लगाने के बाद मांबेटे ने पुलिस को बताने के लिए झूठी कहानी रच ली.
दूसरे दिन नहर में आंचल का शव मिलने और शिनाख्त होने के बाद वे पुलिस को यही बताते रहे कि 25 मार्च की रात 9 बजे आंचल जब घर आई तो उस के मोबाइल पर काल आ गई थी. इस के बाद वह काल करने वाले को अपशब्द कहते हुए बाहर चली गई और फिर वापस नहीं लौटी.
पूछताछ के दौरान पुलिस को सिद्धार्थ की कलाई पर कटे का निशान नजर आया. कलाई में कट का निशान लगने के बारे में सिद्घार्थ और उस की मां ने अलगअलग बातें बताईं. इलाज कराने की बात पर भी दोनों ने अलगअलग अस्पतालों के नाम बताए. इस से पुलिस का शक मांबेटे पर गहरा गया.
छिप न सका अपराध
पुलिस ने आंचल की कार की तलाशी ली तो उस में खून के निशान मिले. इस के अलावा सीसीटीवी कैमरे खंगालने पर भगवती अस्पताल के पास से रात करीब 9 बजे आंचल की कार जाती हुई दिखाई दी. आंचल की कार में सिद्धार्थ के फिंगरप्रिंट भी मिल गए.
कई ठोस सबूत मिलने के बाद पुलिस ने जब सिद्धार्थ को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो वह जल्दी ही टूट गया. इस के बाद उस ने आंचल की हत्या की सारी कहानी पुलिस को बता दी.
पुलिस ने सिद्धार्थ के बयानों के आधार पर उस की मां ममता यादव को भी गिरफ्तार कर लिया. सिद्धार्थ की निशानदेही पर आंचल की घड़ी, मोबाइल फोन ब्रैसलेट आदि बरामद हो गए. वह चाकू भी बरामद हो गया, जिस से आंचल की हत्या की गई थी.
यह विडंबना रही कि ग्लैमरस जिंदगी जीने की तमन्ना में आधुनिकता का लबादा ओढ़ कर स्वच्छंद उड़ान भरने वाली आंचल न तो अपनी जिंदगी जी सकी और ना ही अपने परिवार को सुकून से रहने दिया. उस के जिंदगी जीने के तौरतरीकों से हंसता खेलता परिवार बिखर गया. आंचल के खून से हाथ रंग कर भाई और मां जेल पहुंच गए.