Aarushi Murder case : तलवार दंपति पर क्यों हुआ बेटी की हत्या का शक

अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को आधार मान कर भारत की सब से बड़ी मर्डर मिस्ट्री माने जाने वाले आरुषि और हेमराज मर्डर केस में डा. राजेश तलवार और उन की पत्नी डा. नूपुर तलवार को सजा तो सुना दी है, लेकिन अभी भी कई सवाल ऐसे हैं जिन का जवाब किसी के पास नहीं है.

25 नवंबर, 2013 को गाजियाबाद की कचहरी में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी थी. अदालत के बाहर और अंदर भारी संख्या में पुलिस तैनात की गई थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन कचहरी परिसर स्थित सीबीआई की विशेष अदालत में देश के सब से चर्चित आरुषि मर्डर केस का फैसला सुनाया जाना था. यह ऐसा मामला था, जिस पर पूरे देश की निगाहें लगी हुई थीं. आरुषि मर्डर केस विशेष सीबीआई अदालत के विशेष न्यायाधीश श्याम लाल की अदालत में चल रहा था. उन की अदालत के बाहर भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे. वकीलों और आरोपी तलवार दंपति के परिजनों के अलावा किसी अन्य को विशेष सीबीआई कोर्ट में नहीं जाने दिया जा रहा था. मीडियाकर्मियों को भी अदालत में जाने की मनाही थी. फिर भी अदालत खचाखच भरी थी. माननीय न्यायाधीश श्याम लाल जब अदालत में आ कर अपनी कुरसी पर बैठे तो माहौल एकदम शांत हो गया.

इस अदालत में आरुषि मर्डर केस की सुनवाई 5 साल 6 महीने 10 दिन चली थी और केस की 212 तारीखें पड़ी थीं. केस से जुड़े 46 लोगों ने कोर्ट में पेश हो कर गवाहियां दी थीं, जिस में 7 गवाहियां बचाव पक्ष की थीं. सीबीआई ने कोर्ट में जो चार्जशीट दाखिल की थी, उस में आरुषि की हत्या का इशारा डा. राजेश तलवार और उन की पत्नी नूपुर तलवार की ओर था. कोर्ट में अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष के वकीलों की जिरह पूरी होने के बाद माननीय न्यायाधीश ने 25 नवंबर को केस का फैसला सुनाने का दिन मुकर्रर किया. अदालत में मौजूद सभी लोगों की निगाहें जज साहब की तरफ लगी हुई थीं. अदालत में मौजूद आरोपी डा. राजेश तलवार और उन की पत्नी डा. नूपुर तलवार भी थे. माननीय न्यायाधीश श्याम लाल ने जब फैसला सुनाना शुरू किया तो लोगों की उत्सुकता और भी बढ़ गई.

माननीय न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि मांबाप अपने बच्चों के सब से बड़े रक्षक होते हैं. किसी की जिंदगी से किसी को भी खिलवाड़ करने का हक नहीं है. सीबीआई की जांच और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से यह साबित हो चुका है कि तलवार दंपति ने ही अपनी उस बेटी की जिंदगी छीन ली, जिस ने बमुश्किल 14 बसंत देखे थे. इतना ही नहीं, उन्होंने नौकर को भी मार डाला. ऐसा कर के इन्होंने धर्म और कानून दोनों का उल्लंघन किया है. माननीय न्यायाधीश ने 204 पेज के अपने आदेश में डा. तलवार दंपति को दोषी ठहराने की 26 वजहें बताई थीं. उन्होंने धर्मग्रंथों का भी जिक्र किया. कुरान का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अल्लाह ने जो पवित्र जिंदगी बख्शी है, उसे छीना नहीं जाना चाहिए. अगर हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म हमारी रक्षा करेगा. इसी तरह अगर हम कानून की हिफाजत करेंगे तो कानून हमारी हिफाजत करेगा. दोनों ही आरोपियों ने देश के कानून का उल्लंघन किया है.

जज ने डा. राजेश और नूपुर को अपनी बेटी और नौकर हेमराज की हत्या के साथसाथ सुबूत नष्ट करने का भी दोषी माना. पतिपत्नी को दोषी करार देने के बाद उन्होंने सजा सुनाने के लिए अगला दिन यानी 26 नवंबर तय कर दिया. फैसला सुनते ही अदालत में मौजूद डा. राजेश तलवार और डा. नूपुर तलवार के चेहरों पर मुर्दनी छा गई. डा. नूपुर की आंखों में आंसू छलक आए. कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने डा. राजेश और डा. नूपुर को हिरासत में ले लिया. दोपहर बाद 3 बज कर 25 मिनट पर जज द्वारा सुनाए गए फैसले की खबर न्यूज चैनलों पर प्रसारित होने लगी. जरा सी देर में पूरी दुनिया को पता चल गया कि डा. तलवार दंपति ने ही अपनी एकलौती बेटी आरुषि और नौकर हेमराज की हत्या की थी.

आरुषि की हत्या के बाद से ही इस केस में कई उतारचढ़ाव आए थे. उत्तर प्रदेश पुलिस से जांच सीबीआई तक पहुंची. कई जांच अधिकारी बदले. आरुषि मर्डर केस आखिर शुरू से ही इतना पेचीदा क्यों रहा, यह जानने के लिए इस केस की थोड़ी पृष्ठभूमि जान लेना जरूरी है. उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्धनगर (नोएडा) के सेक्टर-25, जलवायु विहार के फ्लैट नंबर एल-32 में रहने वाले डा. राजेश तलवार के परिवार में पत्नी डा. नूपुर तलवार के अलवा एक ही बेटी थी आरुषि. तलवार दंपति जानेमाने दंत चिकित्सक थे. आरुषि उन की शादी के 8 साल बाद 24 मई, 1993 को टेस्टट्यूब तकनीक से पैदा हुई थी, इसलिए वह मांबाप की बहुत लाडली थी.

दिल्ली पब्लिक स्कूल की छात्रा आरुषि का जन्मदिन हालांकि 24 मई को था, लेकिन वह अपना जन्मदिन 15 मई को मनाती थी. इस की वजह यह थी कि 15 मई को उस के स्कूल की गरमी की छुट्टियां शुरू हो जाती थीं और उस के ज्यादातर दोस्त जन्मदिन के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ जाते थे. सन 2008 में आरुषि के स्कूल की छुट्टियां 16 मई से हुईं तो उस ने डा. तलवार से 16 मई को ही जन्मदिन मनाने की बात कही. वह इस के लिए तैयार हो गए. डा. तलवार जन्मदिन के मौके पर बेटी को कोई न कोई महंगा गिफ्ट जरूर देते थे. जिज्ञासावश आरुषि ने इस बारे में उन से पूछा तो उन्होंने एक डिजिटल कैमरा दिखाते हुए कहा कि यही तुम्हारा बर्थडे गिफ्ट है.

कैमरा देख कर आरुषि बहुत खुश हुई. उस ने उसी समय उस से कई फोटो खींचे. डा. राजेश तलवार ने भी उसी कैमरे से आरुषि के कई फोटो लिए. 15 मई, 2008 की देर शाम बर्थडे कार्यक्रम की प्लानिंग के बाद डा. राजेश तलवार अपने कमरे में चले गए. आरुषि भी अपने कमरे में जा कर सो गई. अगले दिन 16 मई की सुबह डा. तलवार दंपति को पता लगा कि उन की 14 साल की बेटी आरुषि की हत्या हो गई है. डा. राजेश तलवार ने बेटी की हत्या की खबर पड़ोसियों को दी तो वे हैरान रह गए. पौश कालोनी में फ्लैट के अंदर हत्या हो जाना चौंकाने वाली बात थी. तलवार दंपति का रोरो कर बुरा हाल था. लोग उन्हें ढांढस बंधा रहे थे. बहरहाल, डा. राजेश तलवार ने थाना सैक्टर-20 को फोन कर के बेटी की हत्या की खबर दी. उस समय थानाप्रभारी दाताराम नौनेरिया थे.

डा. राजेश तलवार का फ्लैट सेकेंड फ्लोर पर था. पुलिस जब घटनास्थल पर पहुंची तो देखा आरुषि की लाश कमरे में उस के बेड पर पड़ी थी. उस का गला किसी तेज धारदार हथियार से कटा हुआ था. साथ ही उस के सिर पर भी गहरा घाव था. आरुषि के बगल वाले कमरे में डा. राजेश तलवार और डा. नूपुर तलवार सोते थे. जबकि दूसरे कमरे में नौकर हेमराज सोता था. तलवार दंपति ने बताया कि उन्हें बेटी के चीखने की कोई आवाज नहीं सुनाई दी. हेमराज अपने कमरे में नहीं था. उस के कमरे में बीयर की खाली बोतल और 3 गिलास रखे थे. जांच के दौरान पुलिस ने पाया कि फ्लैट के अंदर एंट्री जबरदस्ती नहीं हुई थी. वैसे भी किसी बाहरी व्यक्ति को आरुषि के कमरे तक पहुंचने के लिए 3 दरवाजों से गुजरना पड़ता. फ्लैट में आरुषि, उस के मातापिता के अलावा नौकर हेमराज रहता था.

जबकि डा. तलवार के अनुसार हेमराज फरार था. फरार होने की वजह से उस पर शक स्वाभाविक ही था. वैसे भी वह डा. तलवार के यहां 6-7 महीने से ही काम कर रहा था. शक की एक वजह यह भी थी कि दिल्ली और एनसीआर में घरेलू नौकरों द्वारा तमाम घटनाओं को अंजाम दिया गया था. घर का सारा सामान अपनी जगह था अलावा आरुषि के मोबाइल फोन के. हेमराज ने सिर्फ मोबाइल के लिए कत्ल किया होगा, यह बात गले उतरने वाली नहीं थी. हत्या की दूसरी वजह क्या हो सकती है, यह बात पोस्टमार्टम के बाद ही पता चल सकती थी. इस बीच मौके पर जिले के सभी बड़े पुलिस अधिकारी पहुंच गए थे. आवश्यक काररवाई के बाद पुलिस ने आरुषि की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

डा. राजेश तलवार ने हेमराज के खिलाफ आरुषि की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराते हुए कहा कि वह मर्डर कर के नेपाल भाग गया है. उस की गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम नेपाल रवाना हो गई. इस के अलावा संभावित स्थानों पर भी उस की खोज की जाने लगी. पुलिस ने उस की गिरफ्तारी पर 20 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया था. चूंकि डा. राजेश तलवार मैडिकल क्षेत्र से थे, इसलिए उन्होंने अपने ताल्लुकात का फायदा उठाते हुए 16 मई को दोपहर 12 बजे ही डा. सुनील डोगरे से लाश का पोस्टमार्टम करा कर आरुषि का अंतिम संस्कार करा दिया और अगले दिन अस्थियां विसर्जित करने के लिए हरिद्वार चले गए. उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व उपाधीक्षक के.के. गौतम नोएडा में ही रहते थे. वह डा. राजेश तलवार के भाई डा. दिनेश तलवार के मित्र थे. 17 मई, 2008 को वह भी डा. राजेश तलवार के यहां पहुंचे तो अचानक उन की नजर जीने पर पड़ी.

वहां उन्हें कुछ खून के धब्बे दिखाई दिए तो उन्होंने जीने के पास आ कर देखा. खून के धब्बे उन्हें ऊपर तक दिखाई दिए. लेकिन जीने के दरवाजे पर ताला लगा हुआ था. के. के. गौतम तेजतर्रार पुलिस अधिकारी रहे थे. उन का पुलिसिया दिमाग घूमने लगा. वहां नोएडा पुलिस भी थी. पुलिस ने डा. नूपुर तलवार से जीने का दरवाजा खोलने को कहा तो उन्होंने बताया कि उन के पास चाबी नहीं है. जब काफी खोजने के बाद भी जीने की चाबी नहीं मिली तो पुलिस ने दरवाजे पर लगा ताला तोड़ दिया. पुलिस छत पर पहुंची तो वहां भी खून के धब्बे मिले. खोजबीन में पुलिस की नजर कूलर के पास पहुंची तो वहां एक आदमी की लाश पड़ी थी. उस के ऊपर कूलर की जाली रखी हुई थी. डा. नूपुर तलवार से जब उस लाश के बारे में पूछा गया तो उन्होंने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. बाद में दूसरे लोगों ने लाश की शिनाख्त तलवार दंपति के नौकर हेमराज के रूप में की.

आरुषि की तरह हेमराज की हत्या भी सांस की नली काट कर की गई थी. पुलिस ने डा. राजेश तलवार को हेमराज की हत्या की सूचना दे कर जल्द लौटने को कहा. उस समय वह हरिद्वार के रास्ते में थे. पुलिस के बुलाने के बाद भी वह वापस नहीं लौटे. हेमराज की लाश मिलने से आरुषि की हत्या के मामले ने नया मोड़ ले लिया. हेमराज की लाश चूंकि दूसरे दिन मिली थी, इसलिए पुलिस पर अंगुलियां उठना स्वाभाविक था. इस की गाज गिरी इस केस के जांच अधिकारी दाताराम नौनेरिया और एसपी सिटी महेश कुमार मिश्रा पर. 18 मई, 2008 को दोनों का तबादला कर दिया गया.

दाताराम की जगह नए थानाप्रभारी संतराम यादव ने इस दोहरे हत्याकांड की जांच करनी शुरू की. आरुषि की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि उस का गला सर्जिकल इक्विपमेंट से काटा गया था. उस के सिर पर भी किसी नुकीली चीज का जख्म था. रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि उस की हत्या करीब 12 घंटे पहले हुई थी. इस का मतलब यह था कि आरुषि का कत्ल 15-16 मई की रात को 12-1 बजे के बीच हुआ था. रिपोर्ट में दुष्कर्म की बात से इनकार किया गया था. हेमराज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि उस की हत्या भी सांस की नली काट कर की गई थी. उस के सिर पर भी पीछे से किसी भारी चीज से वार किया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह बात साफ हो गई थी कि आरुषि और हेमराज की हत्या एक ही तरीके से की गई थी और हत्यारा भी संभवत: एक ही था.

जांच अधिकारी ने डा. राजेश तलवार से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वह सोते समय आरुषि के कमरे में बाहर से ताला लगा कर अपने कमरे में सोते थे, लेकिन 15 मई की रात को वह ताला लगाना भूल गए थे. वहीं उन की पत्नी डा. नूपुर तलवार ने बताया कि बेटी की लाश देखने के बाद वह सीधे हेमराज के कमरे में गईं. जब वह कमरे में नहीं मिला तो उन्होंने घर के लैंडलाइन फोन से उस के मोबाइल का नंबर ट्राई किया. उस समय सुबह को 6 बज रहे थे. फोन किसी ने रिसीव तो किया, पर बात किए बिना ही काट दिया. पुलिस ने हेमराज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो वास्तव में 16 मई को सुबह 6 बज कर 3 मिनट पर काल रिसीव हुई थी और उस समय उस का फोन जलवायु विहार स्थित मोबाइल फोन टावर के संपर्क में था. पुलिस की समझ में नहीं आ रहा था कि जब हेमराज की हत्या हो गई थी तो उस का फोन किस ने रिसीव किया?

पुलिस यह मान कर चल रही थी कि हत्यारा चाहे जो भी रहा हो, वह तलवार परिवार का करीबी रहा होगा. पुलिस ने डा. राजेश तलवार के कंपाउंडर किशन उर्फ कृष्णा से पूछताछ की और उस के मोबाइल की काल डिटेल्स भी निकलवाई. लेकिन कोई नतीजा हासिल नहीं हुआ. तलवार दंपति के यहां 4 लोग रहते थे. उन में से 2 का मर्डर हो गया था. वह भी उस स्थिति में जबकि कोई बाहरी आदमी फ्लैट में नहीं आया था. ऐसी स्थिति में पुलिस को डा. तलवार दंपति पर ही शक हो रहा था. इसी बीच इस केस की जांच संतराम यादव की जगह थाना सेक्टर-20 के इंचार्ज जगवीर सिंह को सौंप दी गई. उन्होंने केस की फाइल का अध्ययन करने के बाद घटनास्थल का मुआयना किया. केवल शक के आधार पर डा. राजेश तलवार को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था, इसलिए पुलिस उन के खिलाफ सुबूत जुटाने की कोशिश करने लगी. इस के लिए पुलिस ने उन के क्लीनिक, फ्लैट, कार, गैरेज आदि की जांच की, लेकिन कोई सुबूत नहीं मिला.

पुलिस ने डा. राजेश तलवार का मोबाइल फोन भी इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस पर लगा दिया, ताकि फोन पर होने वाली उन की बात सुनी जा सके. पुलिस द्वारा बारबार पूछताछ के बाद डा. राजेश तलवार को लगने लगा था कि पुलिस हत्या के आरोप में कहीं उन्हें ही गिरफ्तार न कर ले. इसलिए उन्होंने अपने दोस्त वकील को फोन कर के अपनी अग्रिम जमानत के बारे में बात की. पुलिस डा. राजेश तलवार की फोन पर हो रही बातचीत को सुन रही थी. अग्रिम जमानत की बात सुन कर पुलिस को यकीन हो गया कि दोनों की हत्या में डा. राजेश तलवार का हाथ रहा होगा, इसलिए उन्होंने अपनी अग्रिम जमानत के बारे में बात की. फिर क्या था, पुलिस ने आननफानन में डा. राजेश तलवार को उठा लिया.

उन से पूछताछ करने के बाद मेरठ जोन के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक ने एक प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित कर खुलासा किया कि आरुषि और हेमराज की हत्या और किसी ने नहीं, बल्कि डा. राजेश तलवार ने ही की थी. वजह थी आरुषि और हेमराज के बीच अवैध संबंध. डा. राजेश तलवार ने उन्हें आपत्तिजनक हालत में देख लिया था. परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने डा. राजेश तलवार को दोहरे मर्डर केस में गिरफ्तार कर के कोर्ट में पेश किया और 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. लेकिन रिमांड की अवधि में नोएडा पुलिस डा. राजेश तलवार से कत्ल में इस्तेमाल किए गए हथियार, खून सने कपड़े व आरुषि और हेमराज के मोबाइल फोन वगैरह बरामद नहीं कर सकी. पुलिस यह भी पता नहीं लगा सकी कि जीने पर खून के जो धब्बे मिले थे, वे कैसे लगे थे.

डा. राजेश तलवार चीखचीख कर कह रहे थे कि उन्होंने आरुषि और हेमराज की हत्याएं नहीं कीं, लेकिन नोएडा पुलिस ने उन की एक नहीं सुनी. उन के परिवार वाले भी उन की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे. उन का कहना था कि पुलिस ने डा. राजेश तलवार को झूठा फंसाया है. इसलिए वह इस मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग कर रहे थे. चूंकि पुलिस ने हत्या से संबंधित एक भी सुबूत बरामद नहीं किया था, इसलिए कई राजनैतिक पार्टियों के नेताओं और सामाजिक संगठनों ने भी पुलिस के खुलासे पर अंगुली उठानी शुरू कर दी थी. वे भी सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे. यह आवाज प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के कानों तक पहुंची तो उन्होंने इस दोहरे हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश कर दी.

इस के अलावा उन्होंने मेरठ जोन के पुलिस महानिरीक्षक गुरुदर्शन सिंह, पुलिस उपमहानिरीक्षक पी.सी. मीणा, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ए. सतीश गणेश के भी ट्रांसफर के आदेश दिए, ताकि वे जांच को प्रभावित न कर सकें. 1 जून, 2008 को जांच का आदेश मिलते ही सीबीआई जांच में जुट गई. सीबीआई की 25 सदस्यीय टीम फोरेंसिक एक्सपर्ट्स के साथ जलवायु विहार पहुंच गई. चूंकि सब से पहले घटनास्थल पर पहुंची नोएडा पुलिस ने वहां से सुबूत इकट्ठे नहीं किए थे, इसलिए तब तक सारे सुबूत नष्ट हो चुके थे. सीबीआई टीम ने आरुषि की मां डा. नूपुर तलवार, डा. राजेश तलवार के कंपाउंडर कृष्णा, डा. अनीता दुर्रानी, हेमराज के दामाद जीवन शर्मा, डा. दुर्रानी के नौकर राजकुमार, एक अन्य नौकर विजय मंडल, ट्रांसफर हुए एसपी सिटी महेश मिश्रा, पूर्व डीएसपी के.के. गौतम, डा. तलवार की नौकरानी भारती के अलावा सब्जी बेचने वालों, गार्डों और पड़ोसियों तक से पूछताछ की.

फोरेंसिक टीम ने इन्फ्रारेड कैमिकल इमेजिंग के जरिए खून के कुछ नमूने भी उठाए.  इन्फ्रारेड कैमिकल इमेजिंग एक ऐसी तकनीक है, जिस से किसी जगह या कपड़े पर पड़ा खून का पुराने से पुराना धब्बा भी खोजा जा सकता है. सीबीआई टीम ने छत पर जा कर भी कई बार जांच की. सीबीआई ने डा. राजेश तलवार का 2 बार लाई डिटेक्टर टेस्ट, साइको एनालिसिस टेस्ट व नारको एनालिसिस टेस्ट कराया. इस के अलावा उन की पत्नी डा. नूपुर तलवार का भी लाई डिटेक्टर टेस्ट व साइको एनालिसिस टेस्ट कराया गया. इस के अलावा सीबीआई ने डा. दुर्रानी के नौकर राजकुमार और डा. राजेश तलवार के पड़ोस में काम करने वाले नौकर विजय मंडल के भी पौलीग्राफिक टेस्ट कराए. इन सब टेस्ट रिपोर्टों और तफ्तीश के बाद सीबीआई ने कहा कि आरुषि और नौकर हेमराज की हत्या डा. राजेश तलवार ने नहीं, बल्कि उन के कंपाउंडर किशन उर्फ कृष्णा, डा. अनीता दुर्रानी के नौकर राजकुमार और एक अन्य नौकर विजय मंडल ने मिल कर की थी. सीबीआई के खुलासे के बाद डा. राजेश तलवार के परिजन और समर्थक खुश हुए.

सीबीआई की जांच ने नोएडा पुलिस द्वारा किए गए खुलासे की हवा निकाल दी थी और 50 दिन डासना जेल में रहने के बाद डा. राजेश तलवार घर आ गए थे. एक तरह से सीबीआई ने उन के ऊपर लगे हत्या के दाग को धो दिया था. लेकिन सीबीआई की यह थ्यौरी और पेश किए गए सुबूत अदालत के सामने टिक नहीं सके और गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने तीनों नौकरों, कृष्णा, राजकुमार और विजय मंडल को 12 सितंबर, 2008 को रिहा करने के आदेश दे दिए. नौकरों की रिहाई के बाद मीडिया में इस हत्याकांड को ले कर फिर से सवाल उठने लगे. न्यूज चैनलों पर फिर से इस मर्डर मिस्ट्री की कथाएं प्रसारित की जाने लगीं. जनमानस के भीतर फिर वही सवाल हिलोरें मारने लगा कि आखिर आरुषि और हेमराज का हत्यारा कौन है?

कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने फिर से मामले की गहनता से जांच शुरू कर दी. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर, फोरेंसिक जांच रिपोर्ट देने वाले अधिकारियों आदि के अलावा डा. तलवार दंपति से फिर से पूछताछ की गई. घूमफिर कर जांच एजेंसी को तलवार दंपति पर ही शक हो रहा था, लेकिन हत्या का कोई सुबूत नहीं मिल रहा था. जांच में जब कोई नतीजा नहीं निकला तो सीबीआई ने 29 दिसंबर, 2010 को विशेष सीबीआई अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करते हुए कहा, ‘‘अब तक की जांच के बाद आरुषि और हेमराज की हत्या का पूरा शक डा. राजेश तलवार और डा. नूपुर तलवार पर ही जाता है. लेकिन उन के खिलाफ हमारे पास पर्याप्त और पुख्ता सुबूत नहीं हैं. लिहाजा इस केस को बंद करने की अनुमति दी जाए.’’

लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार करने के बजाए क्लोजर रिपोर्ट को ही चार्जशीट मान कर तलवार दंपति को इस हत्याकांड में आरोपी बनाया. इस के बाद 9 फरवरी, 2011 से इस मामले की फिर से सुनवाई शुरू हो गई. इस मामले के विवेचनाधिकारी ए.जी.एल. कौल ने अपनी गवाही में कोर्ट के सामने साफ तौर पर कहा कि डा. राजेश तलवार हेमराज और आरुषि को आपत्तिजनक स्थिति में देख कर आपा खो बैठे थे और उन्होंने अपनी गोल्फ स्टिक से उन की हत्या कर दी थी. जबकि बचाव पक्ष ने दुनिया के जानेमाने डीएनए विशेष डा. आंद्रे सेमीखोस्की के अलावा एम्स के पूर्व फोरेंसिक एक्सपर्ट डा. आर.के. शर्मा सहित 7 लोगों की गवाही कराई. डा. सेमीखोस्की ने सीबीआई द्वारा पेश डीएनए रिपोर्ट को आधाअधूरा बताते हुए डीएनए जांच रिपोर्ट का रा डाटा मांगा.

उन्होंने कहा कि खुखरी और दीवार के टुकड़े जिस पर सीबीआई ने खून के दाग बरामद किए, उन की लंदन में दोबारा डीएनए जांच होनी चाहिए. लेकिन अदालत ने उन की इस मांग को खारिज कर दिया. अप्रैल, 2013 में सीबीआई की तरफ से इंस्टीट्यूट औफ फोरेंसिक साइंस के उपनिदेशक महेंद्र दहिया को कोर्ट में बतौर गवाह पेश किया गया. डा. दहिया ने अदालत से कहा कि आरुषि और हेमराज दोनों पर हमला आरुषि के कमरे में ही हुआ था. दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया गया था. हेमराज की लाश को हत्या के बाद छत पर ले जाया गया था. उन्होंने अदालत से यह भी कहा कि 9 अक्तूबर, 2009 को वह सीबीआई की टीम के साथ घटनास्थल पर गए थे तो फ्लैट का नजारा देख कर लग रहा था कि उस वक्त फ्लैट की पुताई कर दी गई थी.

मकान की स्थिति देख कर जांच में पता चला कि आरुषि-हेमराज की हत्या एक ही समय पर और एक ही जगह पर की गई थी. उन की हत्या में डा. राजेश तलवार ने अपनी गोल्फ स्टिक का इस्तेमाल किया था. बाद में दोनों के गले सर्जिकल औजार से काटे गए थे. उन्होंने आगे बताया कि जांच में यह भी पता चला कि हेमराज को मारने के बाद लाश को छत पर ले जाया गया. उस का गला छत पर ही काटा गया था. हत्यारे का पैर जीने के दरवाजे के पास पडे़ पाइप में उलझ गया था, इसलिए उस का खूनी पंजा दीवार पर लग गया था. दोनों के गले एक कान से दूसरे कान तक काटे गए थे और यह काम उन के लेटे होने की अवस्था में किया गया था. आरुषि के सिर में प्रेशर से चोट पहुंचाई गई थी, इसलिए उस के खून के छींटे दीवार पर आए. सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए डा. दहिया ने स्पष्ट किया था कि घटना में कोई बाहरी व्यक्ति शामिल नहीं था.

तमाम गवाहों और परिस्थितिजन्य सुबूतों के आधार पर विद्वान न्यायाधीश श्याम लाल ने 25 नवंबर, 2013 को सुनाए गए 204 पेज के अपने आदेश में डा. राजेश तलवार और उन की पत्नी डा. नूपुर तलवार को आरुषि और हेमराज की हत्या का दोषी ठहराया. सजा के लिए उन्होंने 26 नवंबर का दिन मुकर्रर कर दिया. चूंकि अदालत ने डा. तलवार दंपति को दोहरे हत्याकांड का दोषी ठहराया गया था, इसलिए लोगों में इस बात की चर्चा होने लगी थी कि उन्हें फांसी दी जाएगी या फिर उम्रकैद. 26 नवंबर को दोपहर 2 बज कर 20 मिनट पर सीबीआई के वकील आर.के. सैनी व बी.के. सिंह और बचाव पक्ष के वकील तनवीर अहमद, मनोज सिसौदिया व सत्यकेतु सिंह के बीच सजा के बिंदु पर 10 मिनट तक बहस हुई. सीबीआई के वकीलों ने हत्याकांड को रेयरेस्ट औफ रेयर करार देते हुए दोनों दोषियों को सजाएमौत देने की मांग की. जबकि बचाव पक्ष के वकीलों ने कहा कि दोनों ही चिकित्सक हैं, इन का कोई पुराना आपराधिक रिकौर्ड भी नहीं है, लिहाजा उन्हें कम से कम सजा दी जाए.

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद न्यायाधीश ने डा. राजेश तलवार व डा. नूपुर तलवार पर आईपीसी की धारा 302, 201 (समान मकसद से हत्या करने) पर आजीवन कारावास और 10 हजार रुपए का जुर्माना, आईपीसी की धारा 201 (साक्ष्यों को मिटाना) पर 5 साल की सजा और 5 हजार रुपए का जुर्माना तथा डा. राजेश तलवार पर आईपीसी की धारा 203 (झूठी रिपोर्ट दर्ज करा कर पुलिस को गुमराह करना) पर 1 साल की सजा और 2 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई. उन्होंने यह भी आदेश दिया कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी. सजा सुनने के बाद डा. तलवार दंपति को डासना जेल भेज दिया गया. अब जेल में डा. नूपुर तलवार का नया पता कैदी नंबर 9343 और बैरक नंबर 13 है, जबकि डा. राजेश तलवार को बैरक नंबर 11 के कैदी नंबर 9342 के रूप में जाना जाएगा.

हालांकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आरुषि-हेमराज हत्याकांड मामले में गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में सीबीआई की विशेष अदालत का निर्णय रद्द करते हुए राजेश राजेश तलवार और नुपुर तलवार को निर्दोष करार दिया. अदालत ने इस तरह से दोनों अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ देते हुए विशेष सीबीआई अदालत का 26 नवंबर, 2013 का फैसला निरस्त कर दिया.  अदालत ने तलवार दंपति की अपील स्वीकार करते हुए उन्हें तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया

धर्मभाई निकला कसाई

लोकगायक सुरेंद्र चंचल और जसवंत कौर ने कभी सोचा भी नहीं था कि उन का ड्राइवर मोहिंदर उन्हें हानि पहुंचाने वाला अपराध भी कर सकता है. लेकिन जब जसवंत कौर का यह धर्मभाई अपने असली रूप में आया तो उस ने…

 

लाश का सिर पूर्व की तरफ था, टांगें पश्चिम की ओर. आंखें बंद और मुंह खुला हुआ. दोनों पैर बिस्तर से नीचे लटके थे, जिन में जूती पहनी हुई थी. घटनास्थल को देख कर पहली ही नजर में लग रहा था कि अपराधियों को मृतका जानती थीं. उन्होंने बिस्तर से उठ कर पैरों में जूती पहनने के बाद इत्मीनान से मुख्य दरवाजे तक पहुंच कर कुंडी खोली होगी.

मृतका के सिर पर 2 गहरे घाव थे. खून बह कर बिस्तर पर फैल गया था. गरदन में सलवार का पोंहचा कस कर बंधा हुआ था. बैड पर ही करीब 8 वर्षीया लड़की की लाश भी पूर्व-पश्चिम दिशा में ही पड़ी थी. लाल रंग के ऊनी स्कार्फ से उस के गले पर भी कस कर गांठ बांध दी गई थी.

अंबाला के थाना बलदेवनगर के प्रभारी रामचंदर राठी ने फोन से मिली सूचना पर राजविहार क्षेत्र की उस कोठी में जा कर उक्त दर्दनाक मंजर देखा था. उस वक्त दिन के साढ़े 11 बज रहे थे.

कोठी के भीतरबाहर लोगों का हुजूम था.

‘‘थाने में फोन किस ने किया था?’’ राठी ने लोगों से पूछा.

‘‘जी सर, मैं ने किया था.’’ करीब 45 वर्ष के दिखने वाले एक सिख ने आगे आते हुए कहा.

उस ने खुद को राजविहार के साथ लगते गांव बरनाला पंजोखरा का सरपंच जसमेर सिंह बता कर आगे कहना शुरू किया, ‘‘अभी कुछ देर पहले मैं इधर से गुजर रहा था कि इस कोठी के सामने भीड़ देख कर रुक गया. दरियाफ्त करने पर कोठी में 2 कत्ल हो जाने का पता चला तो अपना फर्ज समझ कर मैं ने थाने में फोन कर दिया.’’

‘‘ठीक है, धन्यवाद. अब आप पुलिस की इतनी मदद करें कि अपनी तहरीर हमें दे दें, जिस पर एफआईआर दर्ज करवा कर हम अपनी काररवाई आगे बढ़ाएं.’’

इस के बाद राठी ने इस कांड की सूचना कंट्रोलरूम के माध्यम से फ्लैश करवा दी.

इधर जसमेर सिंह से तहरीर ले कर एफआईआर दर्ज करने के लिए थाने भिजवाई गई, उधर क्राइम टीम के इंचार्ज कुलविंदर सिंह व डौग स्क्वायड के हैंडलर महिंद्रपाल के अलावा पुलिस फोटोग्राफर महेंद्र सिंह भी घटनास्थल पर आ पहुंचे. इन्होंने अपनी काररवाई शुरू की ही थी कि सीआईए इंसपेक्टर रिसाल सिंह और डीएसपी (मुख्यालय) करण सिंह भी वहां आ गए.

कुछ वक्त में सभी ने अपनी काररवाइयां पूरी कर लीं. प्रशिक्षित डौग मुख्य सड़क पर पहुंच कर रुक जाता था. लिहाजा यही अनुमान लगाया गया कि हत्यारे वारदात को अंजाम दे कर मुख्य सड़क तक पैदल गए होंगे और वहां से किसी वाहन पर सवार हो कर निकल भागे होंगे.

 

सीआरपीसी की धारा 174 के अंतर्गत काररवाई करते हुए दोनों लाशों का पंचनामा तैयार कर शवों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवाने के बाद राठी ने खून सने बिस्तर कपड़े वगैरह कब्जे में लेने की काररवाई की. फिर उपस्थित लोगों की सहायता से घटना के सूत्र जोड़ने शुरू किए.

वह मकान प्रसिद्ध लोकगायक जोड़ी सुरेंद्र सिंह चंचल और जसवंत कौर का था. मरने वाली बच्ची इन की 8 वर्षीया बेटी मनप्रीत कौर उर्फ श्रेया थी. 65 वर्षीया मृतक वृद्धा थीं जसवंत कौर की मां दलजीत कौर. गायक पतिपत्नी अपने ट्रुप के साथ अकसर दौरे पर रहा करते थे. पीछे नानीदोहती इस कोठी में अकेली रहती थीं. गायक जोड़ी उन दिनों भी अमेरिका गई हुई थी.

सिवाय इन चंद बातों के राठी को उस वक्त अन्य कोई जानकारी नहीं मिल पाई. घटनास्थल की काररवाई पूरी कर वह थाने लौट गए. तब तक थाने में सरपंच जसमेर सिंह की तहरीर के आधार पर भादंवि की धारा 302 के तहत एफआईआर दर्ज हो चुकी थी. पहली नजर में यह मामला लूटपाट के लिए हत्या का लग रहा था. मगर घर के किसी सदस्य के वहां मौजूद न होने से इस संबंध में फिलहाल निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता था.

मैं उन दिनों शिमला गया हुआ था. डीएसपी करण सिंह से मुझे इस हत्याकांड की जानकारी मिली तो मैं ने राठी को फोन कर के मामले में तेजी लाने और हत्यारों को जल्दी से जल्दी गिरफ्तार करने संबंधी दिशानिर्देश दिए. उस रोज राठी के लिए शायद इस से आगे बढ़ पाना संभव नहीं था. अलबत्ता अब तक के घटनाक्रम का विस्तृत ब्यौरा देने के साथसाथ वह आगे की काररवाई के बारे में भी मुझे विस्तार से बताता रहा.

इस के अगले दिन उस ने जो कुछ मुझे बताया, उस के अनुसार एक लड़का थाने में उस से मिलने आया था. उस ने अपना नाम रंजीत सिंह बताते हुए राठी से कहा था कि वह पटियाला में रहता है और अपनी बुआ जसवंत कौर व फूफा सुरेंद्र चंचल के साथ गानेबजाने का काम करता है. 2 दिन पहले जब उस के फूफा और बुआ को प्रोग्राम देने अमेरिका जाना था, वह पटियाला से पहले लुधियाना गया था और वहां से ड्राइवर मोहिंदर कुमार को साथ ले कर अंबाला आया था.

 

रंजीत द्वारा राठी को बताए अनुसार, फालतू सामान कोठी के कमरे में रखते समय बुआ ने उस की दादी दलजीत कौर को खर्चे के लिए 50 हजार रुपए नकद दिए थे. इस के बाद वह और मोहिंदर दिल्ली एयरपोर्ट तक के लिए टैक्सी करने अंबाला छावनी चले गए.

जब भी फूफा और बुआ को प्रोग्राम के लिए बाहर जाना होता था तो वह कार घर पर पार्क करवा कर ड्राइवर मोहिंदर को छुट्टी दे देते थे. कभीकभी वह वह कार अपने घर लुधियाना भी ले जाया करता था. उन दिनों वह एक रोज के लिए कार ले कर गया था. रंजीत के जरिए उसे वापस बुलवा लिया गया था.

‘‘कार घर पर पार्क कर के हम लोग टैक्सी से पालम एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए. गाड़ी में टैक्सी ड्राइवर के अलावा मोहिंदर, मैं और बुआ फूफा थे. फ्लाइट का समय होने पर फूफा और बुआ एयरपोर्ट के अंदर चले गए. टैक्सी वाले को भी हम ने फारिग कर दिया था.

फ्लाइट चली जाने पर मैं और मोहिंदर बस से अंबाला के लिए चल पड़े. इस से पहले विदा होते वक्त बुआ ने मोहिंदर और मुझ से कहा था कि हम पहले अंबाला बीबी (दलजीत कौर) के पास जा कर उन की जरूरतों की बाबत पूछे और उस के बाद ही कहीं और जाएं.’’ रंजीत ने राठी को बताया था.

 

उस के आगे बताए अनुसार मोहिंदर ने एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही अपनी मजबूरी जता दी थी कि उसे लुधियाना में जरूरी काम है सो वह अंबाला नहीं जा पाएगा. दिल्ली से हमें लुधियाना के रूट वाली बस मिल गई, जिस पर सवार हो कर रंजीत अंबाला के बलदेवनगर में उतर गया व मोहिंदर उसी बस से लुधियाना चला गया.

उसी शाम करीब 4 बजे दलजीत कौर से मुलाकात करने के बाद रंजीत पटियाला जाने के लिए जब बलदेवनगर स्टापेज से बस पर चढ़ा तो उसे लुधियाना की ओर से आने वाली बस से मोहिंदर उतरते दिखा. उसे देख कर उस के मन में यही बात आई कि वह बीबी से मिलने आया होगा.

मगर इस के अगले दिन उसे किसी से इस हत्याकांड की खबर मिली. उस ने अमेरिका फोन कर के फूफा और बुआ को घटना के बारे में बताया. यह दुखद समाचार सुनते ही फूफा ने उसे तुरंत अंबाला पहुंचने को कहा. साथ ही कहा कि जब तक वे लोग वापस नहीं आ जाते, लाशों का संस्कार न किया जाए.

राठी ने सीआरपीसी की धारा 161 के तहत रंजीत का बयान दर्ज कर लिया.

अगले दिन मैं भी शिमला से लौट आया. मैं ने देखा इस केस को ले कर अंबाला पुलिस की काफी किरकिरी हो रही थी. मेरे अंबाला पहुंचते ही अखबार वालों ने मुझे घेर लिया. वाकई यह केस हमारे लिए चुनौती बना हुआ था. उसी रोज मैं ने पुलिस की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई. इस मीटिंग में जो अंतिम निष्कर्ष निकला, वह यही था कि किसी भी तरह मोहिंदर को राउंडअप कर के उस से पूछताछ की जाए.

मगर उस का पता किसी को मालूम नहीं था. रंजीत ने हमें उस के लुधियानावासी होने की जानकारी दी थी. फिर वह हमें वहां के एक घर में ले भी गया था, लेकिन मालूम पड़ा कि 2 दिन पहले वह यहां का अपना किराए का कमरा खाली कर के चला गया था. कहां गया था, इस की किसी को खबर नहीं थी. न ही किसी को उस के मुस्तकिल पते की जानकारी थी.

 

हमें लगा कि उस का पक्का पता सुरेंद्र चंचल अथवा जसवंत कौर के पास जरूर होगा. अब उन से फोन पर भी संपर्क नहीं हो पा रहा था. वे इंडिया के लिए निकल चुके थे. मोबाइल फोंस की तब तक शुरुआत नहीं हुई थी.

खैर, उसी दिन गायक दंपति अंबाला पहुंच गए. सब से पहले उन्होंने मुझ से ही संपर्क किया. मैं ने थाने में इन के भी 161 के बयान दर्ज करवा दिए.

ये लोग मूलरूप से लुधियाना के गोपालनगर के रहने वाले थे. अंबाला में उन का हवेलीनुमा मकान था. मगर आतंकवाद के दिनों में इन लोगों ने अंबाला के बलदेवनगर में अपना मकान बनवा लिया था.

दोनों व्यावसायिक सिंगर थे. प्रोग्राम देने के लिए उन्हें अकसर घर से बाहर जाना पड़ता था. इस के लिए उन्होंने अंबेसडर कार रखी हुई थी, जिसे मोहिंदर कुमार पुत्र मनोहरलाल निवासी गोराया, जालंधर चलाया करता था. इन दिनों वह लुधियाना में रहता था, जहां उस की पत्नी किसी फैक्ट्री में नौकरी करती थी.

 

गायक जोड़ी को जब प्रोग्राम देने विदेश जाना होता था, कार अंबाला वाले घर में पार्क कर दी जाती थी. किसी को भी यह कार चलाने की मनाही होती थी. इन दिनों मोहिंदर अपने परिवार के साथ लुधियाना चला जाया करता था. इस बार भी ऐसा ही हुआ था.

पिता के देहांत के बाद परिवार में होने वाले संपत्ति विवाद से परेशान हो कर पिछले कुछ समय से जसवंत कौर अपनी मां को अपने साथ रखे हुए थीं. उन की एकलौती बेटी स्थानीय कौनवेंट स्कूल की तीसरी कक्षा में पढ़ती थी.

अपने बयान दर्ज करवाने के बाद गायक दंपति ने घर पहुंच कर चोरी गए सामान की सूची तैयार की. नकदी और गहने वगैरह मिला कर यह भारीभरकम चोरी का मामला था. हालांकि इन लोगों को इस नुकसान की बजाए परिवार के 2 सदस्यों के कत्ल हो जाने का गहरा सदमा था. वे यही गुहार लगाए हुए थे कि कातिलों को जल्दी से जल्दी पकड़ा जाए.

 

मैं ने मामले में रुचि लेते हुए उन लोगों को अपने औफिस में बुलवा कर हत्याकांड में किसी पर शक होने की बाबत पूछा. उन्होंने स्पष्ट रूप से तो कुछ नहीं कहा, अलबत्ता उन की बातों से यह जरूर लगा कि उन्हें मोहिंदर पर शक था. हमारे शक की सुई पहले ही उस तरफ जा रही थी. लिहाजा उन्हें साथ ले कर एक पुलिस पार्टी लुधियाना के अलावा कुछ अन्य जगहों पर भी भेजी गई, लेकिन मोहिंदर पुलिस के हत्थे न चढ़ा.

इस तरह 5 दिनों का समय और निकल गया, मगर हम लोग उसे पकड़ पाने में नाकाम रहे.

उन दिनों इस केस को ले कर यह चर्चा भी जोरों पर थी कि पंजाब के डीजीपी के.पी.एस. गिल के औपरेशन हीलिंग टच में इस गायक दंपति ने गिल के कंधे से कंधा मिला कर गांवगांव में जा कर अपनी कला बिखेरते हुए उन्हें अपना सहयोग दिया था. इस वजह से वे लोग भी आतंकवादियों की निगाहों में आ गए थे. हो सकता है कि उन के घर पर बरपा कहर आतंकवादियों की ही देन हो.

मगर हम लोग इसे आतंकी वारदात कतई नहीं मान रहे थे, इसलिए इस दिशा में हम ने कदम बढ़ाए ही नहीं. हम अपने पहले वाले प्रयासों से ही जुडे़ रहे.

हमारे प्रयास रंग लाए. आखिर हम ने लुधियाना के शिमलापुरी इलाके से मुखबिरी के आधार पर मोहिंदर को पकड़ लिया. उस ने छूटते ही कहा, ‘‘मेरी बहन बनी हुई है जसवंत कौर, मुझे पिछले कई सालों से राखी बांधती आ रही है. घर के सब लोग मुझ पर पूरा विश्वास करते थे. बीबी और श्रेया का कत्ल होने की बात मुझे अब आप लोगों से मालूम पड़ रही है.’’

मगर जब उसे अंबाला ला कर कस्टडी रिमांड में ले कर पूछताछ शुरू की गई तो उसे टूटते देर नहीं लगी. दोनों हत्याओं का अपराध कबूल करते हुए उस ने बताया कि लूटे गए रुपए व जेवरात उस की बीवी किरनबाला के पास थे. इस पर किरन को भी लुधियाना के एक घर से गिरफ्तार कर लिया गया. उसे भी अदालत पर पेश कर के कस्टडी रिमांड हासिल करने के बाद हम ने पतिपत्नी से व्यापक पूछताछ की.

इस पूछताछ में जो कुछ उन्होंने हमें बताया, उस से इस डबल मर्डर के पीछे की कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

 

किरनबाला की शादी लुधियाना के गांव अमरोली निवासी धर्मपाल के साथ हुई थी, जिस की 8 महीने बाद सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. इस के कुछ समय बाद ही किरन ने एक बेटे को जन्म दिया. इसे ले कर विधवा के रूप में वह अपने पिता के साथ लुधियाना में जा कर रहने लगी.

कुछ अरसा बाद पिता ने उस की शादी मोहिंदर कुमार से कर दी. गायक जोड़ी उन दिनों लुधियाना में ही रह रही थी, जिन के यहां मोहिंदर नौकरी करता था. मोहिंदर भले ही कार ड्राइवर था, लेकिन मालकिन जसवंत कौर ने उसे अपना धर्मभाई बना लिया था.

इस सिलसिले में मोहिंदर ने हमें बताया था कि धर्मभाई तो वह बन गया था, मगर जसवंत कौर ने धर्मभाई के नाम पर कम पैसों में ज्यादा काम लेने का सिलसिला बना लिया था. वह उसे कई बार अपने प्रोग्रामों में भी ले जाया करती थी, जहां इन लोगों के साथ पूरी रात जागने पर उसे 50 रुपए मिला करते थे.

किरनबाला के पास पहले से लड़का था, मोहिंदर से शादी के बाद 2 लड़कियां और हो गईं. हालांकि मियांबीवी दोनों कमाते थे तो भी इतनी कमाई न थी कि घर की गुजर सलीके से हो पाती. बकौल मोहिंदर उस की मालकिन के पास खूब पैसा था, लुटाती भी दोनों हाथों से थी मगर अपने व अपने परिवार पर. उस ने उन लोगों की समस्या को समझने का कभी प्रयास नहीं किया था. बस धर्मभाई कह कर ही अपना उल्लू साधती रहती थी.

मोहिंदर के बताए अनुसार, विदेश जाते वक्त महज कुछ दिनों के गुजारे के लिए जसवंत कौर ने अपनी मां के हाथ पर नोटों की गड्डियां रख दी थीं, जबकि उस से केवल यह बोला गया था कि धर्मभाई होने के नाते उसे उस की मां का पूरा ध्यान रखना होगा, भले ही उसे लुधियाना से कितनी बार भी अंबाला आना पड़े. इस के लिए जसवंत ने उसे 500 रुपए दिए थे.

बकौल मोहिंदर दिल्ली से लौटने के बाद वह पसोपेश में था. जसवंत कौर पर उसे गुस्सा था, साथ ही पैसों की जरूरत भी थी. आखिर एक योजना बना कर वह उस रोज रात के 11 बजे राजविहार वाली कोठी पर जा पहुंचा. हालांकि इस से पहले लुधियाना जा कर वह 4 बजे अंबाला भी आ आया था. मगर इधरउधर घूम कर टाइम पास कर के रात गहराने का इंतजार करता रहा था.

 

खैर, रात में 11 बजे कोठी पर पहुंच कर उस ने घंटी बजाई तो वृद्धा दलजीत कौर ने दरवाजा खोलते हुए उस से पूछा, ‘‘तुम! इतनी रात गए?’’

मोहिंदर ने बस खराब होने का बहाना बना दिया. मोहिंदर द्वारा हमें बताए अनुसार, इस के बाद दलजीत कौर ने उस से भीतर चल कर खाना खा लेने को कहा. इस पर खाना खा चुकने की बात कहते हुए उस ने दलजीत कौर से उस का एक काम कर देने को कहा. इस तरह बातचीत करते हुए वे दोनों भीतर चले गए.

भीतर श्रेया अभी जाग रही थी. वह बैड पर रजाई में दुबकी बैठी थी. सामने टीवी चालू था. दलजीत कौर भी उस के पास बैड के किनारे बैठ गईं.

 

बकौल मोहिंदर वह कुछ देर वहीं खड़ा टीवी पर आते दृश्यों को देखता रहा. फिर दलजीत कौर की ओर इत्मीनान से बढ़ते हुए बोला, ‘‘बीबी, मैं ने आप से कहा है कि आप मेरा एक काम कर दो.’’

‘‘हां, कहो क्या काम है?’’ दलजीत कौर ने सहज भाव से पूछा.

‘‘जसवंत ने चलते वक्त जो पैसा आप को दिया है, वह मुझे दे दो.’’

‘‘क्यों, तुम्हें इतने पैसों का क्या करना है?’’

‘‘और आप को इन रुपयों का क्या करना है?’’

‘‘मेरी बहुत सी जरूरतें हैं.’’

‘‘आप लोगों की ऐसी कोई खास जरूरत नहीं, जिस के लिए इतना पैसा चाहिए. मेरी जरूरतें आप से भी कहीं ज्यादा और अहम हैं.’’

‘‘तुम्हें तनख्वाह नहीं मिलती क्या? उस से अपनी जरूरतें पूरी किया करो. फिर प्रोग्राम पर जाने का अलग से पैसा मिलता है. खानेओढ़ने को भी अकसर यहां से मिल जाता है. तो और कौन सी जरूरतें रह गईं तुम्हारी?’’

‘‘देखो बीबी, रुपया चुपचाप मेरे हवाले कर दो. तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, मेरे कई काम संवर जाएंगे. न दिए तो तुम्हें मार डालूंगा और तुम्हारी इस नवासी को भी.’’

मोहिंदर के बताए मुताबिक, उस ने यह बात कहते वक्त श्रेया की ओर इशारा भी किया. वह अभी तक टीवी देखने में मस्त थी. बात उस के कानों में पड़ी तो उस ने पास पड़ा लकड़ी का सोटा उठा कर मोहिंदर पर वार कर दिया.

‘‘एक छोटी बच्ची से मुझे यह उम्मीद कतई न थी. फिर उस का दुस्साहस देख कर मैं एकबारगी चौंका, वहीं गुस्से से भी भर उठा. तेजी से पीछे घूम कर मैं ने सोटा श्रेया से छीन लिया. फिर उसी से दलजीत कौर व श्रेया पर दनादन वार करने लगा. दोएक दफा दोनों चीखीं, फिर उन की आवाजें गले में ही घुट कर रह गईं.

दोनों निढाल हो कर बैड पर गिर पड़ीं. सोटे के वार से दलजीत कौर का सिर 2 जगह से फट गया. उन दोनों के मर जाने का विश्वास मुझे हो गया था तो भी मैं ने पास पड़े स्कार्फ से श्रेया की ओर सलवार के पोंहचे से दलजीत कौर की गरदन बुरी तरह कस कर गला घोंट दिया. इस के बाद जो कुछ हाथ लगा, बैग में डाल लिया.

रात में ही मैं वापस लुधियाना जा कर लूटा गया सारा सामान और नकद पैसा अपनी घरवाली के हवाले कर आया. पहले तो वह घबराई, फिर रातोंरात अमीर बनते देख सहज हो गई. इस के बाद अगले ही दिन किराए का मकान छोड़ कर हम शिमलापुरी में रहने लग गए.’’ मोहिंदर ने हमें बताया.

पूछताछ के बाद हम लोगों ने मोहिंदर व उस की घरवाली की निशानदेही पर लूटा गया सारा सामान मय नकदी के बरामद कर लिया.

आगे की काररवाई के लिए विवेचक रामचंदर राठी ने  केस के अभियुक्तों के खिलाफ चार्जशीट अभी अदालत में दाखिल नहीं की थी, तभी उस का तबादला कुरुक्षेत्र हो गया. उस की जगह आए इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह ने चालान तैयार कर अदालत में पेश कर दिया. इस के बाद मेरा ट्रांसफर भी अंबाला पुलिस चीफ से एसपी (क्राइम) के पद पर हो गया. केस सेशन कमिट हो कर अंबाला के सत्र न्यायालय में चलता रहा, जहां से मोहिंदर को उम्रकैद और उस की पत्नी किरनबाला को 3 साल कैद बामशक्कत की सजा हुई.

मुझे याद है कि एक दिन जब मैं मोहिंदर से पूछताछ कर रहा था तो उस ने मुझ से एक साथ 3 बातें बोली थीं, ‘‘साहब, आज जितनी भी ज्यादतियां हो रही हैं, सब रिश्तों के नाम पर ही होती हैं. जसवंत कौर ने मुझे अपना धर्मभाई बना कर जो मान बख्शा, उस रिश्ते की आड़ में वह मुझ से ज्यादतियां भी करती रही. ज्यादती और बेबसी की अगली सीढ़ी अपराध ही होती है जो मैं ने किया.’’

मुझ से कहे बिना न रहा गया था कि आधार कोई भी हो, अपराध तो अपराध है. अपराध को अंजाम देने के बाद अपराधी को उस अपराध की सजा तो भुगतनी ही पड़ती है.

कथा में पात्रों के नाम बदले हुए हैं.

— बलजीत सिंह संधू    डीजीपी हरियाणा

 

 

समलैंगिक काजल ने किया मां और भाई का कत्ल

सूचना पाते ही यमुना नगर की पुलिस आननफानन में मौका ए वारदात पर पहुंच गई. तब तक काजल के नाते रिश्तेदार और पड़ोसी भी वहां इकट्ठा हो चुके थे. पुलिस ने घटनास्थल का बहुत बारीकी से मुआयना किया. पुलिस ने जांच में पाया कि मीना और राहुल की हत्या उन के सिर पर किसी भारी चीज से हमला करने और गला घोंटने से की गई थी.

मौके पर ही मोबाइल चार्जिंग केबल पड़ा मिला था, जिसे देख कर पुलिस ने अनुमान लगाया कि उस से ही दोनों का गला घोंटा गया होगा. बारीकी से जांच के क्रम में पुलिस ने पाया कि हत्यारों ने घर में लगे इकलौते सीसीटीवी कैमरे को बंद कर दिया था. निश्चित तौर पर ऐसा बचने के लिए ही किया गया होगा. यह बात पुलिस को अटपटी लगी.

कारण, पुलिस ने घर में हुए ऐसे अनेक आपराधिक मामलों में बचाव के लिए चोर या बदमाश अकसर सीसीटीवी कैमरे को स्विच्ड औफ नहीं करते, बल्कि उसे तोडफ़ोड़ देते हैं. यहां तक कि वे कैमरे और उस की डीवीआर भी उठा ले जाते हैं.

कैमरे को बंद किया जाना पुलिस को अपने आप में एक अजीब बात लगी थी. हत्यारों ने सीसीटीवी का डीवीआर गायब करने की जगह उसे स्विच्ड औफ कर दिया था. सीसीटीवी कैमरे को स्विच्ड औफ करने का एक मतलब था कि इस के स्विच्ड औफ होने से पहले के फुटेज का कैमरे में कैद हो जाना.

पुलिस अब आश्वस्त हो गई थी कि उसे इसी बंद कैमरे और डीवीआर से हत्यारे का कोई न कोई सुराग अवश्य मिल जाएगा. इसी पक्के विश्वास के साथ जांच टीम ने सीसीटीवी कैमरे और डीवीआर को अपने कब्जे में करने के लिए टेक्निकल टीम को आदेश दे दिया.

शाम के करीब 4 बज चुके थे, लेकिन गरमी की तपिश में कोई कमी नहीं आई थी. तारीख थी 23 जून. हरियाणा के यमुनानगर में भी गरमी की आग बरस रही थी. आजाद नगर इलाके के मकान में अपनी 47 वर्षीया मां मीना और 23 साल के छोटे भाई राहुल के साथ रहने वाली 27 वर्षीया काजल स्कूटी से आई थी.

टाइट जींस पैंट और टीशर्ट में बगैर हेलमेट के थी. स्कूटी से उतर कर पसीने से लथपथ चेहरे को स्कार्फ से पोंछती हुई अपने घर की ओर 2 कदम ही बढ़ी थी कि सामने वाले घर की खिड़की से आवाज आई, ”क्यों री काजल! ते इत्ती गरमी में कहां से आवै से?…आज पूरे दिन थारी मम्मी भी न दिखे? कहीं गैर सी का?’’

”ना ताई! मम्मी घर में होवे. मैं तो उन के वास्ते जूस लावे गई सी.’’ काजल बोलती हुई जूस के पैकेट का थैला दिखाने के लिए हाथ ऊपर उठा लिया था.

”सब ठीक सै ना!…मम्मी की तबीयत! …राहुल कहीं गवा है का?…वो भी ना दिखा आज…’’ सामने वाली ताई ने एक साथ कई सवाल कर दिए.

काजल उन के सवालों को नजरंदाज करती हुई तेज कदमों से अपने घर में भुनभुनाती हुई दाखिल हो गई. उस की नजर सिर्फ हम पर टिकी रहती है… ”मम्मी कहां है? भाई कहां गया? भाभी मायके से कब आएगी?…ते बियाह कब करेगी?’’

घर में घुसते ही काजल चीख पड़ी. उस की चीख काफी तेज थी, जो पासपड़ोस के कई लोगों ने सुनी. उस चीख पर सब से पहली आवाज ताई की आई, ”क्या हुआ काजल? कुछ बात है क्या?’’

काजल चीखती चिल्लाती दौड़ती हुई घर के बाहर आ गई. तब तक ताई भी दुपट्टा संभालती हुई अपने घर से बाहर आ चुकी थी. काजल बुरी तरह हांफ रही थी… वह कुछ बोल नहीं पा रही थी… वहीं जमीन पर दोनों हाथों से सिर पकड़ कर बैठ गई.

”क्या हुआ कुछ बोलेगी भी!’’ ताई ने उसे उठाया और झकझोरती हुई बोली. अपने दुपट्टे से काजल के चेहरे का पसीना पोंछा, जबकि काजल की जुबान से आवाज ही नहीं निकल पा रही थी. कुछ सेकेंड बाद वह अपने घर की ओर इशारा कर इतना भर बोल पाई, ”उधर मां का मर्डर! …भाई भी मर गया…! …घर में दोनों की लाशें पड़ी हैं!’’

”मर गया?’’ ताई चौंकती हुई बोली.

”उधर भीतर कमरे में मम्मी और राहुल मरे हुए हैं…उन को किसी ने मार डाला…’’ काजल बोलते बोलते रोने लगी.

तब तक कुछ और लोग भी वहां आ गए थे. उन में से एक बोला, ”चलो, अंदर चल कर देखते हैं.’’

ताई भी बोली, ”हां, अंदर चलते हैं.’’

…लेकिन काजल ने हाथ के इशारे से किसी को भी घर के भीतर जाने से मना कर दिया, फिर कुछ सेकेंड बाद बोली, ”नहीं! भीतर कोई नहीं जाएगा. पहले पुलिस को फोन करती हूं.’’

काजल ने अपनी जींस पैंट से मोबाइल निकाला और पुलिस को सूचना देने के लिए 112 नंबर पर काल कर दी.

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बंद सीसीटीवी से कैसे मिला हत्या का सुराग

सूचना मिलते ही पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. घर के अंदर 2 लाशें देख कर पुलिस सन्न रह गई. इस दोहरे हत्याकांड का कोई भी चश्मदीद नहीं था. जो कुछ मालूम हो सकता था, उस के लिए घर की इकलौती बेटी काजल से ही संभव था. वह भी वारदात के वक्त मौके पर मौजूद नहीं थी, लेकिन उस ने ही अपनी मां और भाई की लाशों को पहली बार देखा था.

ऐसे में पुलिस ने काजल से ही पूछताछ शुरू की. उस से पुलिस ने सीधा सवाल किया, ”तुम घर से किस वक्त निकली थी?’’

”जी, दोपहर को.’’ काजल बोली.

”किसलिए?’’ पुलिस का अगला सवाल था.

”मेकअप करवाने के वास्ते ब्यूटी पार्लर गई थी…!’’ काजल तुरंत बोली.

”लेकिन चेहरे पर तो कोई मेकअप नहीं दिख रहा. वैसे भी तुम्हारा पहनावा लड़कियों जैसा नहीं दिख रहा.’’ पुलिस ने जिरह की.

”मुझे केश की कटिंग करवानी थी…और पार्लर में भीड़ भी थी, इसलिए कुछ समय इंतजार कर वापस आ गई.’’ काजल ने सफाई दी.

”इतनी भयंकर गरमी में तुम दोपहर को ब्यूटी पार्लर गई, बड़ी अजीब बात है. शाम को भी तो जा सकती थी!’’ पुलिस बोली.

”ऐसे ही साहब, मन हो गया सो चली गई. हां साहबजी, मां ने फोन पर मैसेज भेज कर घर लौटते वक्त जूस के 2 पैकेट लाने के लिए कहा था. ये देखिए…लेकिन मुझे क्या मालूम था साहबजी कि मेरे पीछे मेरी दुनिया ही उजड़ जाएगी…!’’ बोलते हुए काजल की आंखें नम हो गई थीं.

”मेरी मां और भाई को लुटेरों ने मार डाला है, उसे जल्दी पकडि़ए. मेरे पीछे वे घर में लूटपाट के लिए आए थे.’’ काजल बोली.

उस की बात के आधार पर पुलिस ने घर की छानबीन की. पाया कि घर की ज्वैलरी आदि गायब थी और काजल के लाए हुए जूस के पैकेट भी घर में मौजूद थे. काजल ने मां के मोबाइल से भेजा गया जूस लाने का मैसेज भी पुलिस को दिखाया.

इस अनुसार काजल बिलकुल सच बोल रही थी. फिर भी पुलिस को वही बात खटक रही थी कि घर में लगे इकलौते सीसीटीवी कैमरे को क्यों बंद किया गया होगा? इसे ले कर पुलिस ने काजल से दोबारा पूछना शुरू किया, ”घर का सीसीटीवी कैमरा बंद क्यों है? किस ने बंद किया?’’

”मुझे क्या पता!’’ काजल ने रूखेपन से जवाब दिया और इसे ले कर हैरानी जताई.

”विचित्र बात है, तुम घर की मेंबर हो. भाई की तरह तुम भी जिम्मेदार हो. घर में सुरक्षा के लिए कैमरा लगाया गया है. वह सहीसलामत चल रहा है या नहीं, इस का ध्यान तो तुम भी रखती ही होगी?’’ पुलिस ने सीसीटीवी कैमरे को ले कर एक साथ कई जानकारियां लेनी चाहीं, लेकिन वह एक भी ठोस जवाब नहीं दे पाई.

वह यह भी नहीं बता पाई कि कैमरा किस ने और क्यों बंद किया होगा? उस के बाद पुलिस ने मामले की तफ्तीश आगे बढ़ाने के लिए गली में लगे दूसरे सीसीटीवी कैमरों को खंगालना शुरू किया.

इस कोशिश में पुलिस को 2 नई जानकारियां मिलीं. फुटेज से मिली पहली जानकारी मुंह पर कपड़ा बांधे हुए एक नौजवान के सुबह के समय काजल के घर आने की थी. दूसरी जानकारी में वही युवक कुछ देर बाद कुछ सामान ले कर बाहर जाता हुआ भी दिखा था.

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शक के घेरे में कैसे आई काजल

दूसरे फुटेज को देख कर पुलिस एक बार फिर चौंक गई. वहीं मौजूद काजल से किया गया अगला सवाल था, ”इस फुटेज में लड़के के साथ तुम भी बाहर जाती दिख रही हो. तुम्हारे घर आया वह लड़का कौन है? क्या तुम उसे जानती हो? वह तुम्हारे घर आता दिखा था… मुंह पर कपड़ा क्यों बांध रखा है?’’

इन सवालों पर काजल सकपका गई. खासकर लड़के के बारे में पूछने पर काजल एकदम से नर्वस हो गई थी. चेहरे का उड़ा रंग देख कर पुलिस को उस पर संदेह हो गया और और सारी तफ्तीश उस की तरफ मोड़ दी गई.

पुलिस ने गौर किया कि घर का सीसीटीवी कैमरा सुबह को ही बंद कर दिया गया था. जबकि काजल के कहने के मुताबिक तब तक तो लुटेरों ने घर पर धावा भी नहीं बोला था और न ही किसी की हत्या हुई थी. यानी ये कैमरे घर के ही किसी मेंबर ने बंद किए थे. जबकि काजल का कहना था कि वह दोपहर 2 बजे के आसपास घर से निकली थी और 4 बजे तक वापस लौट आई थी.

यानी काजल द्वारा पुलिस को मिली जानकारी के अनुसार हत्याएं 2 से 3 या फिर 3 से 4 बजे के बीच हुई होगी. काजल से पूछताछ पूरी हो जाने के बाद मीना और राहुल की लाशों को बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया था.

साथ ही काजल को हत्याकांड में अपराधियों तक पहुंचने और लूटपाट के सामान की बरामदगी के लिए उस का साथ देने को कहा गया था. पुलिस को उस ने पूछताछ में बताया था कि हत्यारों ने घर से लाखों रुपए के जेवरात लूट लिए हैं.

अगले दिन ही मीना और राहुल की लाशों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई थी. रिपोर्ट चौंकाने वाली थी. हत्या का तरीका प्रारंभिक तहकीकात से मिलताजुलता था, लेकिन हत्या का समय काजल के बयान से मेल नहीं खा रहा था. इस तरह से पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार कातिल की पोल खुल गई थी. साथ ही काजल भी झूठी साबित हो गई थी.

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                                                      मृतक मां और बेटा

रिपोर्ट के अनुसार पुलिस का संदेह और भी गहरा हो गया कि काजल को हत्याकांड के संबंध में पूरी जानकारी है, जिसे उस ने छिपाने की कोशिश की है. अपनी मां और भाई की हत्या को ले कर काजल झूठ बोल रही है.

पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों के मुताबिक दोनों की हत्याएं लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लाए जाने से कोई 6 से 7 घंटे पहले हो चुकी थीं. यानी कि उन की मौत सुबह 10 बजे के आसपास ही हो गई थी. इस हिसाब से हत्याकांड के दौरान काजल घर में ही मौजूद थी.

पुलिस के लिए यह जानकारी काजल के खिलाफ अपराध में शामिल होने के सबूत के तौर पर थी. पुलिस ने बिना देर किए काजल को हिरासत में ले लिया. उस का मोबाइल फोन भी जब्त कर लिया. उस की जांच के लिए उस की काल डिटेल्स निकलवाई. पुलिस ने काजल के साथसाथ उस की मां और भाई के मोबाइल फोन की लोकेशन की भी जांच की.

इस तरत टेक्निकल जांच रिपोर्ट को देख कर पुलिस हैरान रह गई कि दोपहर को जब उस की मां के मोबाइल फोन से काजल के मोबाइल फोन पर जूस लाने का मैसेज भेजा गया था, तब उस की मां का मोबाइल फोन उन के घर में नहीं, बल्कि काजल के पास ही था. क्योंकि दोनों के मोबाइल फोन की लोकेशन साथसाथ घर से बाहर की थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने उस की जूस लाने की कहानी को भी गलत साबित कर दिया था. इस से पुलिस को पता चल गया था कि वह साजिश उस ने जांच टीम को गुमराह करने के लिए कहानी गढ़ी थी. खुद को अपनी मां के मोबाइल फोन से ही झूठा मैसेज भी भेजा था. एक साथ इतने सबूतों के सामने आने के बाद पुलिस ने काजल को गिरफ्तार कर लिया.

काजल ने क्यों रची मां के कत्ल की साजिश

हालांकि पुलिस के सामने मांबेटे के हत्यारों के बारे में जानकारी जुटानी बाकी थी. इस के लिए उस ने काजल से सख्ती से पूछताछ की. उस से पुलिस ने सीधा सवाल किया कि अपनी मां और छोटे भाई का कत्ल क्यों किया? उस की अपनी मां और भाई से आखिर ऐसी क्या दुश्मनी थी? जबकि उस के परिवार में उसे मिला कर सिर्फ 3 ही लोग थे… और अब मां और भाई के मारे जाने के बाद वह बिलकुल अकेली रह गई है.

काजल ने इन सवालों का जो जवाब दिया, वह काफी हैरान करने वाला निकला. इसी क्रम में काजल ने अपनी मां और भाई की हत्या करनी भी स्वीकार कर ली. उस ने हत्या संबंधी पूरे घटनाक्रम की सिलसिलेवार ढंग से परतें खोल कर रख दीं.

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                                                            आरोपी कृष

काजल ने बताया कि उस ने अपनी मां और भाई की जान लेने की साजिश पहले ही रच ली थी और इस में अपने एक ममेरे भाई कृष को भी शामिल कर लिया था.

उस रोज की तारीख 23 जून, 2024 को रविवार का दिन था. सुबह के वक्त भाई राहुल शेविंग करवाने के लिए घर से बाहर गया हुआ था. तभी काजल ने कृष को बुला लिया. इस के बाद दोनों ने मिल कर रौड की तरह एक भारी चीज से पहले मां मीना के सिर पर हमला कर दिया. इस हमले से मीना बेसुध हो गई.

उसी हालत में दोनों ने मिल कर मोबाइल फोन की चार्जिंग केबल से मीना का गला घोंट दिया. काजल मीना के पैर पकड़े थी और कृष चार्जिंग केबल से उस का गला कसने में लगा हुआ था. उन की कुछ सेकेंड में ही मौत हो गई.

तभी राहुल घर वापस आ गया. उसे आया देख कर दोनों ने मीना को छोड़ राहुल को पकड़ लिया. उन्होंने उस के भी सिर पर रौड से हमला किया. इस के बाद कृष ने राहुल का गला घोंट दिया, जबकि काजल भाई के पांव पकड़े रही.

इस तरह बैडरूम में पहले मीना की हत्या हो गई और और फिर उस के कुछ ही देर बाद मीना के बेटे यानी काजल का छोटे भाई राहुल मारा गया. वारदात के बाद दोनों ने मिल कर इसे लूटपाट का रूप देने के लिए घर का सारा सामान बिखेर दिया.

कुछ सामानों के साथ काजल ने कृष को घर से रवाना कर दिया. इस तरह काजल ने मामले को पूरी तरह से लूटपाट का बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कुछ कीमती चीजें गायब कर दी गईं. वारदात के पहले काजल ने घर में लगा सीसीटीवी कैमरा बंद कर दिया था, लेकिन उस के दिमाग में यह बात नहीं आई कि गली के दूसरे मकानों में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. उस में वारदात के सबूत कैद हो गए थे.

काजल की जीवनशैली अपने भाई से बिलकुल अलग थी. कहने को वह लड़की है, लेकिन उस में लड़कियों वाले लक्षण नहीं मिलते हैं.

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            आरोपी काजल

वह हमेशा लड़कों वाले कपड़ों में नजर आती थी. इसे ले कर उस की मां से हमेशा बकझक हो जाती थी. लड़के जैसे उस के हावभाव और रवैए को देख कर पुलिस भी हैरान थी. दूसरी लड़कियों की तरह मां और भाई की मौत पर काजल को किसी ने एक बार भी भरी आंखों से रोते हुए नहीं देखा.

ऊपर से वह पुलिस के सारे सवालों के जवाब पूरे आत्मविश्वास से देने की कोशिश कर रही थी. पड़ोसियों की निगाह में भी काजल दूसरी लड़कियों से एकदम अलग थी. वह न सिर्फ लड़कों की तरह टीशर्ट और पैंट पहनती, बल्कि उस का पूरा अपीयरेंस भी लड़कों की तरह ही होता था. वह बातचीत भी लड़कों के लहजे में करती थी.

भाभी से बनाना चाहती थी समलैंगिक संबंध

पुलिस ने उस के बारे में और भी कई जानकारियां जुटाईं, जिस से मालूम हुआ कि उस की बचपन से ही लड़कों की तरह रहने की आदत है. उस के  रिश्तेदारों ने पुलिस के सामने खुलासा किया वह असल में यह एक समलैंगिक लड़की है. जिस की असलियत का पता उस की मां और भाई को चल गया था.

इस कारण उस का दोनों से हमेशा झगड़ा भी होता रहता था. वह अकसर मां और भाई के साथ लड़ पड़ती थी. कई बार गुस्से में भाई उस से बोलता था कि उस की वजह से उस की शादीशुदा जिंदगी बरबाद हो गई है.

दरअसल, काजल ने अपनी एक सहेली की शादी अपने भाई राहुल से करवा दी थी. बताते हैं कि उस सहेली से काजल के पहले से ही समलैंगिक संबंध थे. इस कारण घर में कलह होने लगी थी और राहुल की वह शादी टूट गई थी.

कुछ दिनों बाद राहुल की दूसरी लड़की से शादी हुई. काजल की दूसरी भाभी के साथ भी नजदीकियां बढऩे लगीं, पास आने की कोशिश करने लगी, जिस से राहुल की शादी दूसरी बार भी टूट गई.

इस के बाद काजल से उस की मां और भाई के संबंध और भी खराब हो गए. इसी बीच एक घरेलू मामला मकान और प्लौट को ले कर आ गया. यह पहले से ही विवाद का कारण बना हुआ था. ये दोनों पहले से मीना के नाम थे और काजल को लगता था कि इस का हिस्सा उसे नहीं मिलेगा.

ये जायदाद मीना को अपने मायके से मिली थी. दूसरी तरफ मीना के एक भतीजे  कृष को लगता था कि उस की बुआ उसे अपनी प्रौपर्टी का कोई हिस्सा नहीं देगी. ऐसे में काजल और कृष दोनों प्रौपर्टी को ले कर आपस में बातें किया करते थे. वे इसे ले कर काफी परेशान थे.

उस के बाद ही दोनों ने मिल कर मीना और राहुल को रास्ते से हटाने की साजिश रच डाली थी. उन्होंने सोचा कि ऐसा करने से मीना की प्रौपर्टी पर उन का हक हो जाएगा. काजल प्रौपर्टी के साथसाथ अपनी आजाद जिंदगी पाने के लिए भी मां और भाई के अंकुशों से मुक्त होना चाहती थी.

इस हत्याकांड में काजल समेत उस के ममेरे भाई कृष की भी गिरफ्तारी हुई. पूछताछ में उस ने बताया कि काजल ने उसे 50 हजार रुपए का लालच दिया था. यह भी कहा था कि उसे पैतृक मकान भी मिल जाएगा.

इस मामले की पूरी जांच यमुना नगर थाना शहर के एसएचओ जगदीश की देखरेख में संपन्न हुई थी. वारदात यमुना नगर के आजाद नगर की गली नंबर 2 की है. पूरी जांच में यह भी पाया गया कि मीना और राहुल की हत्या के बाद आरोपी काजल घर में रखे गहने अपने साथ ले गई थी, जो 14 लाख रुपए से अधिक के थे.

उन्हें वह अपनी एक्टिवा की डिक्की में ले कर घंटों घूमती रही थी, ताकि पुलिस को विश्वास हो जाए कि घर में लूटपाट के दौरान दोनों की हत्या की गई है.

हत्याकांड का खुलासा करने के बाद पुलिस ने रिमांड पर आरोपी काजल से पूछताछ के दौरान एक्टिवा से सारे गहने बरामद कर लिए.

मामले में काजल के ममेरे भाई विश्वकर्मा मोहल्ला निवासी कृष को भी गिरफ्तार कर पुलिस ने 25 जून, 2024 को कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे भी रिमांड पर लिया गया. कथा संकलन तक पुलिस दोनों आरोपियों से पूछताछ कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

300 करोड़ के लिए अफसर बहू बनी कातिल

उस समय सुबह के करीब 11 बज रहे थे, तारीख थी 22 मई, 2024. डा. मनीष पुत्तेवार अपने हौस्पिटल में वार्ड का दौरा कर रहे थे, तभी उन के फोन की घंटी बजी. उन्होंने फोन में देखा तो काल चंद्रपुर में रहने वाले उन के बड़े भाई डा. हेमंत की थी.

”हां बड़े भैया, आज सुबह सुबह कैसे फोन किया?’’ डा. मनीष ने काल रिसीव करते हुए पूछा.

”मनीष एक दुखद सूचना है. मुझे अभीअभी अजनी थाने से फोन आया है कि पापा का बालाजी नगर में एक कार से ऐक्सीडेंट हो गया है. मैं नागपुर के लिए निकल रहा हंू. तुम भी सीधे अजनी थाने पर पहुंचो,’’ डा. मनीष के बड़े भाई हेमंत ने रोते हुए कहा.

”भैया, आप रो क्यों रहे हैं? मैं अभी वहां पर जा कर देखता हूं. अभी थोड़ी देर पहले ही तो पापा यहां पर मम्मी से मिल कर गए हैं. आप बिलकुल भी चिंता मत करो, मैं उन्हें अभी अपने हौस्पिटल ले कर आता हंू.’’ डा. मनीष ने कहा.

”भाई, मनीष हमारे पापा अब नहीं रहे. मुझे अभी अभी थाने से यही खबर मिली है. भाई, मैं आप मम्मी के बारे में, पापा से उन की तबीयत के बारे में पूछ रहा था, तभी दूसरी ओर से मुझे पुलिस द्वारा यह दुखद समाचार मिला है. कोई कार वाला पापा को कुचल कर भाग गया.’’ कह कर हेमंत फिर से फूटफूट कर रोने लगे.

”भाईसाहब, मुझे तो कभी ऐसी सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि हमारे पापा हम सब को ऐसे छोड़ कर चले जाएंगे. आप फिक्र मत कीजिए, अपना ध्यान रखिएगा. मैं तुरंत अजनी थाने पहुंच रहा हंू,’’ कहते हुए मनीष ने काल डिसकनेक्ट कर दी.

डा. मनीष पी. पुत्तेवार अजनी पुलिस स्टेशन पहुंचे तो अब तक पुलिस राहगीरों की मदद से पुरुषोत्तम को सरकारी अस्पताल ले गई थी, परंतु चोट इतनी घातक थी कि अस्पताल ले जाते हुए उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया था. अजनी थाने के सीनियर इंसपेक्टर अशोक भंडारे डा. मनीष को अपने साथ ले कर घटनास्थल पर भी गए.

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    मृतक पुरुषोत्तम पुत्तेवार

वहां सड़क पर चारों तरफ खून ही खून बिखरा हुआ था. डा. मनीष पुत्तेवार की तहरीर पर अजनी थाने में भादंवि की धारा 304 (ए) के तहत ऐक्सीडेंट का मामला दर्ज कर लिया गया और अज्ञात हत्यारे और अज्ञात कार की तलाश में पुलिस जुट गई.

उधर पुलिस ने लाश का पंचनामा बना कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और पोस्टमार्टम के बाद पुरुषोत्तम के शव को उन के परिजनों को सौंप दिया. 23 मई, 2024 को उन का अंतिम संस्कार भी कर दिया.

बड़े बेटे को क्यों आई षडयंत्र की बू

मृतक पुरुषोत्तम पुत्तेवार (82 वर्ष), नागपुर के शुभ नगर निवासी थे. उन के पास करोड़ों की प्रौपर्टी थी. उन के परिवार में पत्नी शकुंतला के अलावा 2 बेटे हेमंत पुत्तेवार, मनीष पुत्तेवार व एक बेटी योगिता थी. इन दिनों पुरुषोत्तम पुत्तेवार की पत्नी शकुंतला का औपरेशन हुआ था, जो एलेक्सिस मल्टीस्पेशलिटी हौस्पिटल, मनकापुर में भरती थीं. यह हौस्पिटल उन के छोटे बेटे डा. मनीष पुत्तेवार का था.

पुरुषोत्तम सुबह शाम अपनी पत्नी शकुंतला के लिए खाना खुद ही ले जाते थे. हौस्पिटल उन की बेटी योगिता के घर के नजदीक था, इसलिए वह अपनी बेटी योगिता के घर पर ही रह रहे थे.

22 मई, 2024 को भी सुबह पुरुषोत्तम अपनी पत्नी को नाश्ता दे कर वापस लौट रहे थे, तभी पीछे से तेज रफ्तार कार ने उन्हें टक्कर मार दी थी, जिस के कारण घटनास्थल पर ही उन की दर्दनाक मौत हो गई थी.

इन दिनों पुरुषोत्तम पुत्तेवार के बड़े बेटे डा. हेमंत भी चंद्रपुर से सपरिवार नागपुर आ गए थे. उन का चंद्रपुर में अपना निजी क्लीनिक था, वह जनरल फिजिशियन थे. मृतक पुरुषोत्तम पुत्तेवार की शोकसभा का तीसरा दिन था, तभी वहां पर डा. हेमंत का बचपन का दोस्त पंकज पंवार आ गया.

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            डा. मनीष पुत्तेवार                                                                      डा. हेमंत पुत्तेवार 

दोनों काफी देर तक बातचीत करते रहे. दोनों बचपन से जवानी तक एक साथ खेल कर पढ़ कर बड़े हुए थे. बाद में फिर हेमंत मैडिकल लाइन में चले गए और पंकज ने एमबीए करने के बाद अपनी फैक्ट्री संभाल ली थी.

”यार हेमंत, मुझे तुम काफी बुझेबुझे और परेशान से लग रहे हो. तुम्हारे दिल के भीतर जरूर कुछ न कुछ बात है. देखो, मैं तुम्हारा बचपन का दोस्त हूं. तुम किसी भी बात को काफी अधिक समय दिल में रख लेते हो. मुझे खुल कर बताओ, शायद हम दोनों मिलबैठ कर कुछ समाधान निकाल सकें.’’ पंकज ने यह बात कही और दोनों फिर एक अलग कमरे में बैठ गए.

”यार पंकज, मुझे लग रहा है कि पापा का किसी ने कत्ल किया है, पर वारदात ऐसी दिखाई गई है कि यह ऐक्सीडेंट का केस लगे.’’ यह कहते हुए डा. हेमंत फूटफूट कर रोने लगे थे.

”देख भाई हेमंत, मेरे साथ तू अभी चल, मेरे एक अच्छे मित्र हैं जो डीसीपी हैं. उन का नाम निमिष गोयल है. मैं तुझे उन के पास ले कर चलता हूं.’’ कहते हुए पंकज ने डीसीपी (क्राइम) निमिष गोयल को फोन कर दिया.

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     डीसीपी निमिष गोयल

थोड़ी ही देर के बाद पंकज अपने दोस्त हेमंत को ले कर डीसीपी निमिष गोयल के औफिस में पहुंच चुका था. पंकज ने कुछ बातें तो फोन पर ही निमिष गोयल को बता दी थीं. बाकी सारी जानकारी भी उस ने औफिस पहुंच कर निमिष गोयल को दे दी थी. डीसीपी निमिष गोयल पंकज के एक अच्छे मित्र थे, इसलिए उन्होंने सारी बातें तसल्ली से सुनीं.

”डा. हेमंत, आप को ऐसा क्यों लगता है कि आप के पापाजी का किसी ने मर्डर किया है. आप को किसी पर संदेह है?’’ डीसीपी ने सीधा प्रश्न हेमंत से किया.

”डीसीपी साहब, मेरे पापाजी का इस हादसे से पहले भी 2 बार खतरनाक ऐक्सीडेंट हुआ है. उस समय तो मेरी समझ में कुछ नहीं आया, मगर मुझे उन दोनों हमलों में भी किसी खतरनाक षडयंत्र की बू आ रही थी. इस बार तो मुझे पूरा यकीन है कि किसी गहरी साजिश के तहत मेरे पापाजी का प्रीप्लांड मर्डर किया गया है.’’

इस के बाद डा. हेमंत ने कई अन्य जानकारियां भी डीसीपी (क्राइम) निमिष गोयल से साझा कीं, ”डा. हेमंत, आप अब बेफिक्र हो कर यहां से जा सकते हैं. मैं इस बारे में सारी जांचपड़ताल करूंगा और मैं आप को विश्वास दिलाता हूं कि आप को पूरापूरा न्याय अवश्य मिलेगा.’’ डीसीपी (क्राइम) निमिष गोयल ने डा. हेमंत को आश्वस्त करते हुए अपने औफिस से विदा करते हुए कहा.

पुलिस ने क्यों समझा इसे सामान्य दुर्घटना

डीसीपी (क्राइम) निमिष गोयल ने अजनी थाने से संपर्क कर के जब जानकारी ली तो मामला संदिग्ध लगा. उन्होंने यह केस फिर नागपुर के कमिश्नर रवींद्र सिंघल को बताया तो मामले की गंभीरता को देखते हुए नागपुर कमिश्नर ने यह केस नागपुर क्राइम ब्रांच यूनिट- 4 को विस्तृत जांच के लिए सौंप दिया.

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        कमिश्नर रवींद्र सिंघल

22 मई की सुबह ये वारदात तब हुई थी, जब 82 साल के बुजुर्ग पुरुषोत्तम पुत्तेवार अस्पताल से पैदल ही अपनी बेटी के घर लौट रहे थे. अस्पताल में उन की पत्नी का औपरेशन होने के कारण वह वहां पर भरती थीं.

पिछले कुछ दिनों से पुरुषोत्तम पुत्तेवार का यही रुटीन चल रहा था, लेकिन पुरुषोतम अपनी बेटी घर पहुंच पाते, तभी नागपुर के बालाजी नगर इलाके में एक तेज रफ्तार कार ने उन्हें पीछे से टक्कर मार दी और कार उन्हें घसीटते हुए काफी दूर तक ले गई थी, जिस के कारण उन की जान चली गई. लेकिन कार चालक वहां से तुरंत फरार हो गया था.

पहले तो सभी को यह मामला ऐक्सीडेंट का लगा था. इसीलिए पुलिस ने भी आईपीसी की धारा 304-ए के तहत ऐक्सीडेंट का केस दर्ज किया था. उस के बाद अजनी पुलिस कार की नंबर प्लेट, सीसीटीवी फुटेज व आसपास के प्रत्यक्षदर्शियों के माध्यम से कार ड्राइवर नीरज ईश्वर निमजे तक पहुंची और उसे गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में ड्राइवर नीरज ने इसे गलती से हुआ ऐक्सीडेंट बताया और बाद में पुलिस ने नीरज निमजे को जमानत पर रिहा भी कर दिया.

सीसीटीवी फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के बाद जब आरोपी ड्राइवर नीरज निमजे को गिरफ्तार करने के बाद जब जमानत पर छोड़ दिया गया तो उस के तुरंत बाद नागपुर शहर में इस सनसनीखेज रोड एक्सीडेंट को ले कर तरह तरह की बातें होने लगी थीं. लोग पुलिस की कार्यप्रणाली को ले कर प्रश्नचिह्न लगाने लगे थे.

मृतक पुरुषोत्तम के बेटे और अन्य रिश्तेदारों व परिचितों के माध्यम से पुलिस के उच्च अधिकारियों को कत्ल की साजिश से अवगत कराया गया. चूंकि मृतक पुरुषोत्तम पुत्तेवार नागपुर में करोड़ों की प्रौपर्टी के मालिक भी थे और उन का इन प्रौपर्टीज को ले कर अपने रिश्तेदारों से कई सालों से विवाद भी चला आ रहा था.

उन के परिचित व रिश्तेदारों को लगता था कि शायद इस ऐक्सीडेंट के पीछे कोई गहरी साजिश छिपी हो सकती है. यह बात पुलिस के कानों तक भी पहुंच चुकी थी.

खुद मृतक पुरुषोत्तम के कुछ रिश्तेदारों ने इस सनसनीखेज केस को ले कर नागपुर के पुलिस कमिश्नर से व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात भी की थी, जिस के बाद मामला संदिग्ध पाए जाने पर पुलिस कमिश्नर डा. रवींद्र सिंघल ने इस मामले की जांच अजनी पुलिस से ले कर क्राइम ब्रांच के हवाले कर दी थी और फिर यहीं से मामले में ऐसा चौंकाने वाला ट्विस्ट सामने आया, जिस ने पूरे नागपुर शहर व महाराष्ट्र को ही नहीं, बल्कि समूचे देश को चौंका कर रख दिया.

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 आरोपी  नीरज ईश्वर निमजे

शराब पार्टियों ने कैसे खोला मर्डर का राज

नीरज ईश्वर निमजे जो एक छोटामोटा अपराधी था, जिस ने कभी भी अपने दोस्तों को एक पार्टी तक नहीं दी थी. उस ने हमेशा दोस्तों, परिचतों और लोगों से पैसे उधार लिए मगर उस ने उधार कभी चुकाया तक नहीं था. अचानक जब उस ने अपने दोस्तों को पार्टियां देनी शुरू कर दीं, महंगी महंगी ब्रांड की शराब दोस्तों को पेश की तो इस वजह से लोगों को उस पर शक हुआ.

मुखबिरों के माध्यम से यह खबर उड़ते उड़ते पुलिस के कानों भी जा पहुंची थी कि नीरज निमजे जो एक चिल्लर अपराधी है, उस के पास अचानक इतना सारा पैसा आखिर कहां से आ गया? कुबेर का खजाना उसे अचानक कब और कैसे मिल गया?

बुजुर्ग पुरुषोत्तम पुत्तेवार की बहू अर्चना निकली मास्टरमाइंड

पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जब इन रहस्यों को खंगालना शुरू किया और नीरज निमजे को एक बार फिर गिरफ्तार कर सख्ती से पूछताछ की तो उस ने कुबूल किया कि पुरुषोत्तम पुत्तेवार की मौत कोई हादसा नहीं थी, बल्कि एक सोचीसमझी साजिश के चलते इस हत्या को अंजाम दिया गया था.

नागपुर के रहने वाले एक बुजुर्ग शख्स के कत्ल की साजिश इतनी भयानक होगी, यह किसी ने कभी सोचा तक नहीं था. सीसीटीवी कैमरे में कैद हुई वे तसवीरें बहुत साफ तो नहीं थीं, लेकिन इन्हें देख कर फौरी तौर पर इतना तो कहा ही जा सकता था कि यह मामला महज एक ऐक्सीडेंट का नहीं था.

22 मई, 2024 की सुबह हुई इस वारदात की तसवीरों को देख कर शुरू में नागपुर पुलिस को भी कुछ ऐसा ही लगा था. क्योंकि सीसीटीवी की उन फुटेजों में जो दिखा था, वो असल सच नहीं था और जो हकीकत थी वह उन तसवीरों में दिखी नहीं.

पुलिस की पूरी जांच में पूरा केस हिट एंड रन का नहीं, बल्कि इरादतन की गई हत्या की एक बड़ी साजिश का निकला, पुलिस के मुताबिक इस खूनी साजिश की पूरी स्क्रिप्ट लिखने वाली मास्टरमाइंड मृतक की बहू अर्चना निकली, जिस ने करीब 300 करोड़ रुपए की संपत्ति के लालच में अपने ससुर के मर्डर का प्लान बनाया था.

पुरुषोत्तम पुत्तेवार के कत्ल के मास्टरमाइंड के तौर पर जिस महिला का नाम सामने आया, वह मृतक की बहू होने के साथसाथ महाराष्ट्र के ही गढ़चिरौली और चंद्रपुर के टाउन प्लानिंग डिपार्टमेंट की वर्तमान में असिस्टेंट डायरेक्टर है, यानी कि सरकारी महकमे की वह क्लास वन औफिसर भी है. जबकि इस साजिश में अर्चना का साथ उस के भाई प्रशांत पार्लेवार ने दिया, जोकि नागपुर के ही माइक्रो स्माल ऐंड मीडियम इंटरप्राइजेज के डायरेक्टर है.

2 क्लास वन अफसरों ने कैसे रची खूनी खौफनाक साजिश

प्रशांत अर्चना पुत्तेवार का सगा भाई है. असल में पुलिस की गिरफ्त में आए कातिलों ने कुबूल किया था कि पुरुषोत्तम पुत्तेवार का मर्डर करने के लिए अर्चना ने ही उन्हें पूरे एक करोड़ रुपए की सुपारी दी थी.

जब पुलिस ने इस खुलासे के बाद अर्चना को गिरफ्तार कर उस से विस्तृत पूछताछ की तो मास्टरमाइंड अर्चना के पीछे एक और मास्टरमाइंड प्रशांत पार्लेवार का नाम सामने आया. यानी एक ऐसा शख्स जो एक बड़ा सरकारी अफसर तो है ही, जो सत्ताधारी दल के नेताओं का भी बेहद करीबी माना जाता है.

अपने ही ससुर की हत्या की सुपारी देने वाली क्लास वन अधिकारी अर्चना ने अपने ससुर को अपने पिता के खिलाफ गवाही देने से रोकने और ससुर की संपत्ति हड़पने के लिए ससुर पुरुषोत्तम पुत्तेवार का मर्डर कराया था.

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मृतक की बहू आरोपी अर्चना

अर्चना के परिवार में 2 भाई एक बहन थे. बड़ा भाई प्रशांत पार्लेवार, उस से छोटा प्रवीण पार्लेवार व अर्चना, जबकि पुरुषोत्तम पुत्तेवार के परिवार में पत्नी शकुंतला, बेटे हेमंत, मनीष व एक बेटी योगिता थी. इन में अर्चना की शादी डा. मनीष पुत्तेवार से व अर्चना के भाई प्रवीण की शादी पुरुषोत्तम पुत्तेवार की बेटी योगिता के साथ हुई थी.

पुलिस को दिए गए अपने बयान में अर्चना ने कहा कि उस के भाई प्रवीण की मौत अकस्मात हो गई थी. प्रवीण की मृत्यु के बाद योगिता अपने पिता पुरुषोत्तम पुत्तेवार की संपत्ति में हिस्सा चाहती थी. इस के लिए योगिता ने कोर्ट में केस भी दाखिल किया था. इस मामले में अर्चना के ससुर पुरुषोत्तम पुत्तेवार गवाह थे.

वहीं दूसरी ओर अर्चना के पिता अपनी संपत्ति अपने दूसरे बेटे प्रशांत पार्लेवार और बेटी अर्चना को देना चाहते थे. अर्चना अपने पिता की ओर से योगिता को बेदखल तो करना ही चाहती थी, साथ ही वह यह भी चाहती थी कि योगिता को उस के पिता पुरुषोत्तम पुत्तेवार की संपत्ति से भी कुछ न मिले.

इस मामले में अर्चना ने अपने ससुर पुरुषोत्तम पुत्तेवार को कई बार गवाही न देने के लिए कहा भी था, लेकिन जब पुरुषोत्तम ने इंकार कर दिया तो फिर अर्चना ने अपने भाई प्रशांत पार्लेवार के साथ मिल कर ससुर को हमेशा हमेशा के लिए रास्ते से हटाने की योजना बना डाली.

अर्चना ने अपने बयान में पुलिस को बताया कि उस के पिता के पास भी करोड़ों की संपत्ति है. इस में नागपुर के ऊंटखाना इलाके में 6 हजार वर्ग फीट जमीन शामिल है. अर्चना और प्रशांत इसी जमीन पर माल बनाना चाहते थे. अगर योगिता इस जमीन में अपना हिस्सा ले लेती तो माल बनाने के लिए बहुत कम जमीन बच रही थी.

अपने ससुर पुरुषोत्तम पुत्तेवार की हत्या की साजिश अर्चना ने काफी योजनाबद्ध ढंग से रची थी. इस खूनी साजिश में उस ने अपने पति डा. मनीष पुत्तेवार के ड्राइवर सार्थक साहेबराव बागड़े, अपने भाई प्रशांत पार्लेवार और अपनी पीए पायल नागेश्वर को भी शामिल किया था. अर्चना ने इन को हत्या करने के लिए एक करोड़ रुपए का लालच भी दिया.

ड्राइवर सार्थक ने अपने प्लान में अपने 3 साथियों नीरज निमजे, सचिन धार्मिक और संकेत घोड़मारे को शामिल किया था. अर्चना ने जिन लोगों को अपने ससुर की सुपारी दी थी, उन्हें शुरुआत में 17 लाख रुपए और कुछ गोल्ड ज्वैलरी एडवांस में दी थी. बाकी पैसे काम होने पर देने की बात कही गई थी.

इस मामले में बहू अर्चना ने एक लाख 76 हजार में एक पुरानी आई20 कार खरीदी. इसी कार से टक्कर मारने के बाद पुरुषोत्तम पुत्तेवार की मौके पर ही मौत हो गई थी.

खास बात तो यह थी कि बहू ने अपने ससुर को मरवाने की एक ही महीने में 3 बार कोशिश की थी. 2 बार तो पुरुषोत्तम बच गए, मगर तीसरी बार वह उन का शिकार बन गए.

नागपुर के पुलिस कमिश्नर रवींद्र सिंघल ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया, ”पुरुषोत्तम पुत्तेवार को मारने के 2 अन्य प्रयास 8 मई, 2024 और 16 मई, 2024 को किए गए थे. 8 मई को सचिन धार्मिक ने उन्हें कार से कुचलने की कोशिश की थी, जबकि 16 मई को सचिन धार्मिक और नीरज निमजे ने पुरुषोत्तम के सिर पर लोहे की रौड से वार किया और फिर स्कूटर से भाग गए.

”चूंकि उन्हें ज्यादा चोटें नहीं आई थीं, इसलिए उन के बेटे डा. मनीष ने इसे दुर्घटना मानते हुए पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी.’’

इस संबंध में डीसीपी निमिष गोयल ने कहा, ”सीसीटीवी फुटेज से हमें पता चला कि यह महज दुर्घटना नहीं थी, क्योंकि पुरुषोत्तम सड़क के एकदम किनारे पर चल रहे थे और ड्राइवर ने जानबूझ कर उन्हें कार से कुचल कर नीचे गिरा दिया. साथ ही उन्हें काफी दूर तक घसीटा भी गया ताकि उन्हें गंभीर चोटें लगें और बचने की कोई उम्मीद न रहे.’’

डीसीपी ने आगे बताया, ”जांच के दौरान हमें पता चला कि एक एक्टिवा स्कूटी लगातार पुरुषोत्तम पुत्तेवार का पीछा कर रही थी. एक्टिवा भी घटनास्थल पर मिली थी. और दुर्घटना के तुरंत बाद एक्टिवा पर सवार 2 लोग वहां से भाग गए थे.

इस के आधार पर फिर से जांच की गई तब नीरज निमजे ने अपने साथी सचिन धार्मिक की भूमिका का खुलासा किया. इस के बाद भारतीय दंड संहिता और मोटर वाहन अधिनियम की हत्या, साजिश और सबूत नष्ट करने की संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई, फिर नीरज निमजे और सचिन धार्मिक को 4 जून, 2024 को गिरफ्तार कर लिया गया.

सचिन धार्मिक की काल डिटेल्स से पता चला कि वह लगातार अर्चना के संपर्क में था. उस के बाद जब गिरफ्तारी के बाद उस से पुलिस द्वारा कड़ी पूछताछ की गई तो उस ने अपना अपराध कुबूल कर लिया और फिर उस ने ड्राइवर सार्थक बागड़े की भूमिका का भी खुलासा कर दिया.

पुलिस ने बताया कि अर्चना ने पुलिस को गुमराह करने के लिए काफी कोशिशें की थीं और यह दावा भी किया था कि उस ने 6 महीने पहले सार्थक बागड़े को नौकरी से निकाल दिया था. इसलिए उस ने हमारे परिवार से बदला लेने के लिए यह अपराध बदले की भावना से किया था.

हालांकि पुलिस जांच में यह तथ्य सामने आया कि सार्थक बागड़े ने 20 मई, 2024 तक उन के साथ काम किया था और जिस के बाद अर्चना और सार्थक बागड़े की नागपुर पुलिस द्वारा 6 जून और 10 जून, 2024 को गिरफ्तार कर लिया गया था.

बहन द्वारा रची गई कत्ल की साजिश में भाई कैसे बना मददगार

इस कत्ल की मास्टरमाइंड अर्चना पत्नी डा. मनीष पुत्तेवार ने पहले अपने ड्राइवर सार्थक बागड़े को इस काम के लिए राजी किया, उसे पूरे एक करोड़ रुपए की सुपारी का लालच दिया. सार्थक बागड़े के साथसाथ नीरज निमजे, सचिन धार्मिक और संकेत घोड़मारे से विस्तृत बातचीत की गई, जिन्होंने पुरुषोत्तम का कत्ल करने के लिए हामी भर दी.

सचिन धार्मिक को एक बीयर बार लाइसेंस का लालच भी दिया गया. अर्चना ने ये काम पूरा कर देने पर अपने भाई एमएसएमई के डायरेक्टर प्रशांत पार्लेवार से लाइसेंस दिलाने में मदद करने का वादा किया.

प्रशांत पार्लेवार लगातार अपनी बहन अर्चना को इस कत्ल की साजिश को पूरा करने के लिए गाइड कर रहा था. क्राइम ब्रांच ने ऐक्सीडेंट वाली जगह के आसपास के कई किलोमीटर के सीसीटीवी फुटेज निकाल कर चैक किए तो इस कोशिश में पुलिस को कुछ अहम सुराग मिले.

पुलिस को यह पता चला कि उस दिन 22 मई, 2024 को जब आई20 कार ने पुरुषोत्तम पुत्तेवार को कुचला था, तब कार ड्राइवर नीरज निमजे के साथ उस का एक साथी सार्थक बागड़े भी मौजूद था. इस आई 20 कार के पीछे एक एक्टिवा भी आगेपीछे चल रही थी. अब पुलिस इन लोगों की पहचान करना चाहती थी.

दूसरी बार जब क्राइम ब्रांच ने नीरज निमजे और सार्थक बागड़े को हिरासत में ले कर जब नए सिरे से पुलिसिया ढंग से पूछताछ की तो पता चला कि उस दिन उन की कार के पीछे एक्टिवा पर चल रहे 2 लोग सचिन धार्मिक और संकेत घोड़मारे थे, जोकि पुरुषोत्तम पुत्तेवार की और उन की पहचान कराने के लिए बालाजी नगर पहुंचे थे, ताकि नीरज निमजे अपनी कार से पुरुषोत्तम पुत्तेवार को कुचल कर आसानी से वहां से भाग सकें.

आरोपी अर्चना पहले से है करोड़ों की मालकिन

ससुर पुरुषोत्तम पुत्तेवार मर्डर की मुख्य आरोपी अर्चना ने पुलिस पूछताछ में अपनी अकूत संपत्ति का भी खुलासा किया है. उस ने बताया कि नियोजन विभाग में काम करते हुए उस ने काफी संपत्ति अर्जित की थी. वह खुद बैरमजी टाउन में अपने एक आलीशान फ्लैट में रहती है. इस के अलावा उस के पास 2 और भी फ्लैट हैं और एक आलीशान फार्महाउस भी है.

उस ने पुलिस को दिए अपने बयान में स्वीकार किया कि उस ने अपने ससुर की हत्या करने के लिए एक करोड़ रुपए की सुपारी दी थी. इस में से उस ने 17 लाख रुपए नकद, 40 ग्राम सोने के कंगन और 100 ग्राम सोने के बिसकुट एडवांस के तौर पर हत्यारों को दिए थे. पुलिस ने हत्यारों से रुपए, सोने के बिसकुट गहने बरामद भी कर लिए हैं

पुलिस के अनुसार अर्चना ने सरकारी विभाग में काम करते हुए करोड़ों रुपए की संपत्ति बनाई है. वहीं पुलिस को बड़सा के एक व्यापारी के माध्यम से अर्चना द्वारा बेनामी संपत्ति खरीदे जाने का भी पता चला है. काली कमाई से बनाई गई संपत्ति की जांच एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा कराई जाएगी. पुलिस जल्द ही इस संबंध में एसीबी को पत्र भेजने वाली है.

इस के अलावा पुलिस जांच में अर्चना मनीष पुत्तेवार के कार्यस्थल पर कई अनियमितताएं भी उजागर हुई हैं. अर्चना पुत्तेवार अपने पद का इस्तेमाल काफी गलत ढंग से कर रही थी. उस के खिलाफ लोगों द्वारा कई शिकायतें भी दर्ज कराई गई थीं. अर्चना पर नियमों को तोडऩे और अनधिकृत लेआउट को मंजूरी देने जैसे कई गंभीर आरोप लगाए गए थे, हालांकि अर्चना के राजनीतिक संबंधों के कारण किसी भी आरोप को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया था.

कुछ साल पहले कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि बेटी का पिता की संपत्ति पर अधिकार होता है, इसे ले कर तमाम जगहों पर काफी होहल्ला भी हुआ था.

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         पायल नागेश्वर

अर्चना की 3 दिन की पुलिस रिमांड के दौरान पायल अर्चना के बैरमजी टाउन के आलीशान अपार्टमेंट में चली गई और उस ने अपने मोबाइल फोन से आपत्तिजनक संदेश और काल रिकौर्ड डिलीट कर दिए. पुलिस के अनुसार गिरफ्तारी के बाद पायल नागेश्वर ने अपने और अर्चना के मोबाइल से काल, चैट, मैसेज और तसवीरें मिटाने की बात स्वीकार की है.

पुलिस अब साइबर विशेषज्ञों के माध्यम से मिटाए गए सबूतों को वापस लाने और गैजेट को फोरैंसिक प्रयोगशाला में भेजने की तैयारी कर रही थी. पुलिस जांच दल का मानना है कि काल, चैट, संदेशों और तसवीरों से हत्या के कई सबूत सामने आ सकते हैं, जिस में प्रत्येक आरोपी की भूमिका और आपसी संबंध उजागर किए जा सकेंगे. पायल नागेश्वर ने मर्डर की सरगना अर्चना की ओर से हत्यारों के बीच सुपारी की रकम बांटने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

कहानी लिखे जाने तक नागपुर पुलिस पुरुषोत्तम पुत्तेवार मर्डर के आरोपी अर्चना पुत्तेवार (53 वर्ष) पत्नी डा. मनीष पुत्तेवार, प्रशांत एम. पार्लेवार (58 वर्ष) महाराष्ट्र के मध्यम एवं लघु उद्योग डायरेक्टर, अर्चना की पीए पायल नागेश्वर (28 वर्ष) निवासी बैरमजी टाउन नागपुर, सार्थक साहेबराव बागड़े (29 वर्ष) निवासी चैतन्येश्वर नगर वाथोडा नागपुर, नीरज ईश्वर निमजे (30 वर्ष) निवासी शक्ति माता नगर खरबी रोड नागपुर, सचिन मोहन धार्मिक (29 वर्ष) निवासी बगडग़ंज नागपुर और सातवें आरोपी संकेत घोड़मारे (23 वर्ष) निवासी नागपुर को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों व जनचर्चा पर आधारित है. तथ्यों का नाट्य रूपांतरण किया गया है. कथा में पंकज पवार नाम काल्पनिक है.

कौन सही कौन गलत : सनक में आकर कर दी पत्नी की हत्या

18 अक्तूबर, 2017 की सुबह मोहाली पुलिस कंट्रोल रूम को हैरान करने वाली सूचना  दी गई कि फेज-10 के मानवमंगल स्कूल के पास एक आदमी ने अपनी पत्नी को रिवौल्वर से 6 की 6 गोलियां मार दी हैं, जो शायद सब की सब उस के सिर में ही लगी हैं. लेकिन अभी उस औरत की सांसें चल रही हैं. आप तुरंत आ कर उसे किसी अच्छे अस्पताल में पहुंचा दीजिए तो शायद उस की जान बच जाए.

‘‘आप कौन बोल रहे हैं?’’ पूछा गया तो फोन करने वाले ने कहा, ‘‘मैं तो राहगीर हूं. अपनी आंखों से इस दर्दनाक हादसे को देखा, इसलिए इंसानियत के नाते आप को फोन कर दिया. पर आप लोग समय बरबाद मत कीजिए. किसी की जिंदगी का सवाल है. वह औरत मर सकती है. जल्दी आ कर उस बदनसीब को बचा लीजिए.’’

इस के बाद तुरंत पीसीआर वैन को सूचना में बताए गए पते पर भेज दिया गया, साथ ही घटना के बारे में उस इलाके के थाना फेज-2 को भी सूचना दे दी गई. फेज-2 के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अमरप्रीत सिंह उस समय थाने में ही थे. उन्होंने एएसआई सतनाम सिंह, नरिंदर कुमार, सतिंदरपाल सिंह, हवलदार जसवीर सिंह और निर्मल सिंह को साथ लिया और घटनास्थल की ओर चल पडे़.

थाना पुलिस के पहुंचने तक पीसीआर की गाड़ी पहुंच चुकी थी. घटनास्थल पर काफी लोग इकट्ठा थे. मानवमंगल स्कूल की ओर सड़क के किनारे सिल्वर रंग की एक इंडिगो कार खड़ी थी, जिस का बाईं ओर वाला अगला दरवाजा खुला था. उसी के पास एक औरत जमीन पर पड़ी थी.

उस से कुछ दूरी पर सड़क पर एक बूढ़ा लेटा था, जिस की दोनों टांगें ऊपर की ओर थीं. सिर को उस ने अपने दोनों हाथों से कुछ इस तरह से सहारा दे रखा था, जैसे वह बुरी तरह से किसी मानसिक परेशानी से घिरा हो.

पुलिस के आते ही वह धीरे से उठा. उस के उठते ही भीड़ में से किसी ने उस की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, यही वह आदमी है, जिस ने पहले इस औरत से झगड़ा किया, उस के बाद रिवौल्वर निकाल कर उसे धड़ाधड़ गोलियां मार दीं.’’

इंसपेक्टर अमरप्रीत सिंह ने पलट कर उस बूढ़े की ओर देखा तो वह उन्हीं की ओर आ रहा था. इस बीच अमरप्रीत सिंह ने सुना कि लोग कह रहे थे, ‘‘यह बुड्ढा तो बहुत खतरनाक है. बच के रहो, अब पता नहीं किस को गोली मार दे.’’

बूढ़े ने भी अपने बारे में कही जाने वाली बातें सुन ली थीं. इसलिए अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा कर अमरप्रीत सिंह की ओर देखते हुए उस ने कहा, ‘‘सर, मैं आत्मसमर्पण करने के लिए ही आप का इंतजार कर रहा था. मेरा खाली रिवौल्वर कार में पड़ा है. मैं ने उस की सारी गोलियां चला दी हैं, जो शायद उस के सिर में ही लगी हैं. फिर भी आप इसे अस्पताल पहुंचा दीजिए, शायद यह बच जाए.’’

‘‘इस का मतलब राहगीर बन कर पुलिस को आप ने ही फोन किया था?’’ अमरप्रीत सिंह ने पूछा.

‘‘जी हां, मैं ने ही फोन किया था. मैं अपनी गिरफ्तारी देने को तैयार हूं. लेकिन मेहरबानी कर के पहले आप घायल पड़ी मेरी पत्नी को अस्पताल पहुंचा दीजिए. शायद डाक्टर इसे बचा लें. मैं इसे इस तरह मरते नहीं देख सकता.’’ बूढ़े ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा.

‘‘आप परेशान मत होइए, हम इन्हें अस्पताल ही ले जा रहे हैं. फिलहाल आप हमारी गाड़ी में बैठ जाइए.’’ अमरप्रीत सिंह ने पुलिस की गाड़ी की ओर इशारा कर के कहा.

ऐंबुलैंस को पहले ही फोन कर दिया गया था. थोड़ी देर में ऐंबुलैंस आ गई. उस के बाद महिला को फोर्टिस अस्पताल ले जाया गया. डाक्टरों ने चैकअप के बाद महिला को मृत घोषित कर दिया. इस के बाद पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया.

पत्नी को गोलियां मारने वाले उस बूढ़े को हिरासत में ले तो लिया गया था, लेकिन उस के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज कराने को तैयार नहीं था. बूढे़ ने ही 100 नंबर पर फोन कर के पुलिस कंट्रोल रूम को घटना की सूचना दी थी. वही इस अपराध का दोषी था. वारदात में प्रयुक्त लाइसैंसी रिवौल्वर भी कब्जे में ले ली गई थी.

कोई दूसरा चारा न देख अमरप्रीत सिंह ने अपनी ओर से एक तहरीर तैयार की और एफआईआर दर्ज करवाने को हवलदार जसवीर सिंह के हाथों थाना भिजवा दिया. कुछ ही देर में थाना फेज-2 में भादंवि की धारा 302 के अलावा शस्त्र अधिनियम की धाराओं 25 और 27 के अंतर्गत निरंकार सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई, क्योंकि उस बूढ़े का नाम निरंकार सिंह था.

सारी काररवाई पूरी कर के निरंकार सिंह और उस की कार को कब्जे में ले कर पुलिस थाने लौट आई. थाना पहुंचते ही निरंकार सिंह की तबीयत बिगड़ने लगी. इस के बाद उन के कहने पर उन के मैनेजर अनीश शर्मा को फोन कर के उन की दवाएं मंगवाई गईं. अनीश शर्मा के आने पर निरंकार सिंह ने एक साथ 10 तरह की टैबलेट्स खाईं, तब कहीं जा कर उन की स्थिति में सुधार आना शुरू हुआ.

अनीश को जब इस दर्दनाक घटना के बारे में पता चला तो वह हैरान रह गए. पुलिस को उन्होंने जो बताया, उस के अनुसार सुबह दोनों पीजीआई अस्पताल जाने के लिए एक साथ निकले थे. निरंकार सिंह ने हलका नाश्ता किया था, जबकि उन की पत्नी ने ठीकठाक नाश्ता किया था. दोनों की बातचीत में किसी तरह का तनाव या मनमुटाव नहीं दिखाई दिया था. निरंकार सिंह जो इंडिगो कार ले कर आए थे, वह उन्हीं की थी.

निरंकार सिंह से पूछताछ करना आसान नहीं था. उन का मैडिकल करवाया गया तो पता चला कि वह दवाओं के सहारे जिंदगी जी रहे थे. दिल के मरीज होने के साथसाथ हाइपरटेंशन, शुगर और अन्य कई तरह की बीमारियों से वह इस तरह गंभीर रूप से ग्रस्त थे कि उन्हें अपना जीवन चलाने के लिए दिन में 3 बार 10 तरह की दवाओं को नियमित खाना पड़ता था. अगर एक भी गोली नहीं खाते थे तो उन की तबीयत इस तरह खराब हो जाती थी कि उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता था.

जो भी था, चिकित्सीय सुविधा के साथ पुलिस ने निरंकार सिंह से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की. इस पूछताछ में निरंकार सिंह और उन के मैनेजर अनीश शर्मा के बयान से जो कहानी सामने आई, वह एक अजीबोगरीब कहानी थी—

60 साल के निरंकार सिंह सराओ का मोहाली के फेज-10 में अच्छाखासा सराओ होटल था. उसी होटल के टौप फ्लोर में वह खुद रहते थे. सन 1977 में उन की शादी उन से 2 साल बड़ी कुलवंत कौर से हुई थी. कुलवंत कौर अनिवासी भारतीय थीं, जो लंदन में रहती थीं. शादी के बाद वह भारत में रहने आईं तो वहां के मुकाबले उन्हें भारत का रहनसहन अच्छा नहीं लगा.

इसलिए कुलवंत कौर ने पति से भी इंडिया छोड़ कर लंदन चल कर रहने को कहा, लेकिन निरंकार इस के लिए तैयार नहीं थे. उन्हें अपने देश में रहना ज्यादा अच्छा लगता था. उन्हें मोहाली से कुछ ज्यादा ही लगाव था. वहां उन का बढि़या होटल था, जो ठीकठाक चल रहा था.

कुलवंत कौर कभी लंदन चली जातीं तो कभी भारत आ कर पति के साथ रहतीं. उन के पास इंडिया और इंग्लैंड दोनों जगहों की नागरिकता थी. कभीकभी निरंकार सिंह भी इंग्लैंड चले जाते थे. जिस तरह कुलवंत कौर को इंडिया में अच्छा नहीं लगता था, उसी तरह निरंकार सिंह को इंग्लैंड में अच्छा नहीं लगता था. इसलिए वह कुछ दिनों के लिए ही इंग्लैंड जाया करते थे. इसी तरह यह सिलसिला चलता रहा.

देखतेदेखते सालों बीत गए. इस बीच दोनों बेटी अमनप्रीत कौर और बेटे नवप्रीत सिंह के मांबाप बन गए. दोनों बच्चे लंदन में ही रह रहे थे. वहीं पर उन की शादियां हो गई थीं. उन के भी बच्चे हो गए. लेकिन उन का लगाव पिता से कम, मां से ज्यादा था. अमनप्रीत कौर इस समय 39 साल की है तो नवप्रीत सिंह 37 साल को हो चुका है.

उम्र के साथ निरंकार सिंह को कई बीमारियां हो गई थीं. उन का इलाज चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल से चल रहा था. कुलवंत कौर तो पहले ही से कहती रहती थीं कि जो सुविधाएं इंग्लैंड में हैं, भारत में नहीं है. इधर वह पति से स्पष्ट कहने लगी थीं कि अगर उन्हें लंबा स्वस्थ जीवन जीना है तो वह अपनी सारी संपत्ति बेच कर हमेशा हमेशा के लिए इंग्लैंड चल कर बस जाएं, वरना यहां के अस्पतालों के आधारहीन इलाजों से वह जल्दी ही मौत के आगोश में समा जाएंगे.

लेकिन निरंकार सिंह किसी भी सूरत में ऐसा करने के हक में नहीं थे, इसलिए उन्होंने पत्नी से साफ कह दिया था कि वह चाहें तो उन की प्रौपर्टी से अपना हिस्सा ले उन से अलग रहने का अधिकार ले लें, लेकिन वह किसी भी कीमत पर भारत छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे. वह मरते दम तक मोहाली में ही रहेंगे.

घटना से करीब 2 हफ्ते पहले ही कुलवंत कौर अकेली ही भारत आई थीं. इस बार पति को अपने साथ इंग्लैंड ले जाने के चक्कर में उन्होंने भारत और इंग्लैंड के बीच बराबर तुलना करती रहीं. उस दिन कार में जाते समय भी वह वही सब कहती रहीं. पीछे से अगर कोई हौर्न बजाता तो कुलवंत कौर कहतीं, ‘‘इंग्लैंड में ऐसा नहीं होता.’’

होटल मैनेजर अनीश शर्मा ने पुलिस को जो बताया, उस के अनुसार निरंकार सिंह उस दिन चैकअप के लिए पीजीआई अस्पताल जा रहे थे. वह सुबह 9 बजे ही तैयार हो गए थे. उन के पास .32 बोर का लाइसैंसी रिवौल्वर था, जिसे उन्होंने अपने पास रख लिया था.

निरंकार सिंह के पास बीएमडब्ल्यू कार थी. लेकिन उस दिन उन्होंने अपनी कार सर्विस के लिए भिजवाने के लिए अनीश शर्मा को बोल कर उन की इंडिगो कार ले ली थी. नाश्ता वगैरह कर के वह पत्नी को साथ ले कर कार को खुद चलाते हुए होटल से निकल पड़े थे.

इस के बाद जो कुछ हुआ, उस के बारे में निरंकार ने पुलिस को बताया, ‘‘कार में बैठते ही कुलवंत ने हमेशा की तरह इंग्लैंड चलने को ले कर मेरा दिमाग चाटना शुरू कर दिया. उन का कहना था कि इंडिया के घटिया अस्पतालों में इलाज करवा कर मैं अपनी मौत को क्यों बुला रहा हूं. इंडिया छोड़ कर उन के साथ इंग्लैंड चलूं, जहां इतने बढि़या अस्पताल हैं कि वहां के इलाज से मैं एकदम भलाचंगा हो जाऊंगा.’’

इस के बाद एक लंबी सांस ले कर उन्होंने आगे कहा, ‘‘कुछ ही देर में मुझे पत्नी की इस बकबक पर ऐसा गुस्सा आया कि मैं ने कार को सड़क किनारे खड़ी की और कुलवंत कुछ समझ पाती, उस के पहले ही अपना रिवौल्वर निकाला और छहों की छहों गोलियां उस पर दाग दीं.

‘‘इस के बाद अचानक मुझे पछतावा हुआ. मैं कार से निकल कर दूसरी तरफ आया, कार का दरवाजा खोलते ही वह सड़क पर गिर गई. उस की सांसें अभी चल रही थीं. मैं ने अपना परिचय छिपाते हुए 100 नंबर पर फोन कर दिया.’’

पूछताछ के बाद पुलिस ने 19 अक्तूबर, 2017 को निरंकार सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. 28 नवंबर को विदेश से उन के बेटे बेटी ने मोहाली पुलिस को ईमेल भेजा है कि उन के सनकी पापा को मां से कभी प्यार नहीं था. यह सोची समझी साजिश के तहत की गई हत्या थी. इस के लिए उन के पिता को सख्त से सख्त सजा दिलाई जाए.

बहरहाल, इस मामले में अभी भी चर्चा चल रही है कि आखिर किस की सोच गलत थी और किस की सही, इस का फैसला अब शायद ही हो पाए.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दो सगे भाइयों की करतूत : 20 साल तक बहन को दी यातना

दुनिया में इंसान को सब कुछ मिल जाता है, लेकिन एक ही मां से पैदा हुए भाईबहन कभी नहीं मिलते. भाईबहन का प्यार दुनिया के लिए एक मिसाल है. भाई अपनी बहन को इतना प्यार करता है कि उस के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है. बहन भी शादी के बाद ससुराल चली जाती है तो हमेशा अपने भाई की खुशी की कामना करती रहती है.

लेकिन आज की इस रंग बदलती दुनिया में मुंबई के रहने वाले 2 भाइयों रविंद्र वेर्लेकर और मोहनदास वेर्लेकर ने अपनी सगी बहन सुनीता वेर्लेकर को 20 सालों तक एक अंधेरी कोठरी में कैद कर के रखा. बिना किसी कसूर के उस ने उस कोठरी में जो जिंदगी गुजारी, उसे जान कर हर किसी का मन द्रवित हो उठेगा.

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11 जुलाई, 2017 की बात है. हमेशा की तरह उस दिन भी सवीना मार्टिंस अपनी संस्था के औफिस में समय से पहुंच गई थीं. वह अपने कंप्यूटर पर आए ईमेल मैसेज चैक करने लगीं. मैसेज को पढ़ते पढ़ते उन की नजर एक निवेदन पर आ कर रुक गई. वह निवेदन बहुत ही गंभीर और अत्यंत मार्मिक था. किसी अजनबी व्यक्ति द्वारा भेजे गए उस मैसेज को पढ़ कर सवीना मार्टिंस सन्न रह गईं. उन्हें उस संदेश पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसे भी लोग हैं, जो इंसान और इंसानियत के नाम पर कलंक है.

सवीना मार्टिंस गोवा के पणजी शहर की एक जानीमानी समाजसेवी संस्था की अध्यक्ष हैं. उन की संस्था नारी उत्पीड़न रोकने का काम करती है. औनलाइन भेजे गए उस मार्मिक संदेश में उस व्यक्ति ने लिखा था कि ‘पणजी बांदोली गांव सुपर मार्केट के आगे एक बंगले के पीछे बनी कोठरी में सुनीता वेर्लेकर नामक महिला कई सालों से कैद है. मेरी आप से विनती है कि आप उस की मदद कर के उसे उस कैद से मुक्त कराएं.’

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                                                           सवीना मार्टिंस

सवीना मार्टिंस ने उस ईमेल मैसेज का प्रिंटआउट निकाल कर अपने पास रख लिया. अपने सहयोगियों के साथ बांदोली गांव जा कर उस मैसेज की सच्चाई का पता लगाया. इस के बाद उन्होंने पणजी महिला पुलिस थाने जा कर वहां की महिला थानाप्रभारी रीमा नाइक से मुलाकात कर उन्हें पूरी बात बता कर ईमेल मैसेज का प्रिंट उन के सामने रख दिया. सवीना ने सुनीता वेर्लेकर को बंदी बना कर रखने वाले उस के दोनों भाइयों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा कर उसे कैद से मुक्त कराने की मांग की.

थानाप्रभारी रीमा नाइक ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इस की जानकारी अपने सीनियर अधिकारियों को दे दी. अधिकारियों का निर्देश मिलते ही वह पुलिस टीम के साथ तुरंत घटनास्थल की तरफ रवाना हो गईं. जिस समय पुलिस टीम बताए गए पते पर पहुंची, उस से पहले ही समाजसेवी संस्था के सदस्य, डाक्टर, प्रैस वाले और एंबुलैंस वहां पहुंच चुकी थी.

पुलिस टीम और संस्था के सदस्यों को पहले तो सुनीता वेर्लेकर के दोनों भाइयों और भाभियों ने गुमराह करने की कोशिश की. उन्होंने बताया कि सुनीता कई साल पहले पागल हो कर कहीं चली गई थी. पर पुलिस और संस्था के सदस्यों को उन की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने उन के मकान की तलाशी ली तो एक मकान में ताला बंद मिला.

उस मकान से तेज बदबू आ रही थी. थानाप्रभारी को शक हुआ कि ये लोग झूठ बोल रहे हैं. उन्होंने उस मकान का ताला खोलने को कहा तो वे आनाकानी करने लगे. पुलिस ने उन्हें डांटा तो उन्होंने मकान का ताला खोल दिया.

मकान का गेट खुलते ही अंदर से दुर्गंध का ऐसा झोंका आया, जिस से वहां लोगों का खड़े रहना दूभर हो गया. सभी को अपनीअपनी नाक पर रूमाल रखना पड़ा. मकान के एक कमरे में पुलिसकर्मियों ने झांक कर देखा तो उस में एक महिला बैठी मिली. उस से बाहर आने को कहा गया तो वह चारपाई से उठ कर एक कोने में चली गई. वह सुनीता वेर्लेकर थी.

संस्था के सदस्य और पुलिस नाक पर रूमाल रख कर कमरे के अंदर गई. अंदर का दृश्य देख कर सभी स्तब्ध रह गए. कमरे के एक कोने में डरीसहमी सुनीता वेर्लेकर दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपाए बैठी थी. उस के बदन पर कपड़े भी नाममात्र के थे. यही वजह थी कि शरम की वजह से वह बाहर आने को तैयार नहीं थी. संस्था के सदस्यों ने उसे कपड़े ला कर दिए तो वह उन्हें पहन कर कोठरी से बाहर आई.

पिछले 20 सालों से एक कमरे में कैद सुनीता वेर्लेकर ने बाहर आ कर उजाला देखा तो वह अपने आप को संभाल नहीं पाई. खुशी से उस की आंखों से आंसू टपकने लगे. वह बेहोश जैसी हो गई. संस्था के सदस्यों ने उसे संभाला और पीने का पानी दिया.

घटनास्थल पर मौजूद डाक्टरों ने सुनीता का सरसरी तौर पर निरीक्षण किया और उसे एंबुलैंस में लिटा दिया. डाक्टर उसे पहले गोवा के आयुर्वेदिक मैडिकल अस्पताल ले गए.

प्राथमिक उपचार के बाद वहां के डाक्टरों ने उसे बांदोली के मानसरोवर अस्पताल भेज दिया. सुनीता का परीक्षण किया गया तो वह मानसिक रूप से ठीक पाई गई. उपचार के बाद अस्पताल से उसे छुट्टी दे दी गई.

सुनीता को अस्पताल भेज कर पुलिस और संस्था के सदस्यों ने कमरे का निरीक्षण किया, जिस में सुनीता रहती थी तो पाया कि उस कमरे में सुनीता की जिंदगी बद से बदतर बनी हुई थी. वह उसी कमरे में नित्यक्रिया करती थी, जिस के कारण कोठरी में कीड़ों मकोड़ों और मच्छरों की भरमार थी.

पता चला कि पिछले 20 सालों से सुनीता वेर्लेकर नहाई नहीं थी. उस के खाने के लिए एक टूटी प्लेट और सोने के लिए एक चारपाई थी. उसे खाना दरवाजा खोल कर देने के बजाय दरवाजे की निकली हुई एक पट्टी के बीच से ऐसे डाला जाता था, जैसे किसी कुत्ते बिल्ली को दिया जाता है.

घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण करने और आसपास के लोगों से पूछताछ करने के बाद पुलिस टीम ने सुनीता के भाई रविंद्र वेर्लेकर, मोहनदास वेर्लेकर, भाभी अनीता वेर्लेकर और अमिता वेर्लेकर को हिरासत में ले लिया. थाने में जब इन सभी से पूछताछ की गई तो सभी ने अपना अपराध स्वीकार कर सुनीता पर किए गए अत्याचारों की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

45 साल की सुनीता शिरोडकर उर्फ वेर्लेकर जितनी ही सुंदर थी, उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी. पिता का नाम रामदेव वेर्लेकर था. सुनीता वेर्लेकर उन की एकलौती बेटी थी, जिसे वह बहुत ही प्यार करते थे. रामदेव वेर्लेकर के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे रविंद्र वेर्लेकर और मोहनदास वेर्लेकर थे. दोनों की शादियां हो चुकी थीं. घर में सब से छोटी होने की वजह से सुनीता दोनों भाभियों अनीता और अमिता की भी लाडली थी.

सुनीता वेर्लेकर ने भी भाइयों की ही तरह पणजी के कालेज से पढ़ाई की. अच्छे नंबरों से बारहवीं पास करने के बाद वह उच्च शिक्षा हासिल कर अपना भविष्य तय करना चाहती थी. लेकिन मातापिता इस पक्ष में नहीं थे. पुरानी सोच वाले मातापिता का मानना था कि बेटियों को अधिक पढ़ाना ठीक नहीं है. उन्होंने उस की पढ़ाई बंद करा दी.

20 साल की उम्र में मातापिता उस के लिए योग्य वर की तलाश में जुट गए. अपनी जानपहचान वालों के माध्यम से शीघ्र ही उन्हें सुनीता के लिए लड़का भी मिल गया. लड़के का नाम था रमेशचंद्र शिरोडकर. मुंबई की एक निजी कंपनी में वह नौकरी करता था. उस के घर की आर्थिक स्थिति भी ठीकठाक थी.

सुनीता के पिता रामदेव वेर्लेकर को यह रिश्ता पसंद आ गया. इस के बाद सामाजिक रीतिरिवाज से दोनों की शादी कर दी गई. यह 25 साल पहले की बात है. शादी के बाद रमेशचंद्र शिरोडकर और सुनीता मुंबई में हंसीखुशी से रहने लगे.

2-3 साल कैसे गुजर गए, उन्हें पता ही नहीं चला. इस के बाद समय जैसे ठहर सा गया था, क्योंकि सुनीता इतने सालों बाद भी मां नहीं बन सकी थी. जिस की वजह से रमेशचंद्र उदास रहने लगा और धीरेधीरे सुनीता से दूर जाने लगा. सुनीता भी इस बात को ले कर काफी दुखी थी. एक दिन ऐसा आया कि रमेशचंद्र की जिंदगी में दूसरी लड़की आ गई.

उस लड़की के आने के बाद रमेशचंद्र काफी बदल गया. अब वह आए दिन सुनीता को प्रताडि़त करने लगा. उस ने सुनीता से साथ मारपीट भी शुरू कर दी. उस के चरित्र पर भी कीचड़ उछालने लगा. उसी लड़की की वजह से एक दिन वह सुनीता को उस के मायके यह कह कर छोड़ आया कि सुनीता का किसी लड़के से चक्कर चल रहा है.

सुनीता को मायके पहुंचा कर रमेशचंद्र ने उस लड़की से विवाह कर नई गृहस्थी बसा ली. इस के बाद वह सुनीता को भूल गया. रमेशचंद्र जिस तरह सुनीता पर घिनौना लांछन लगा कर मायके छोड़ आया था, उस से वेर्लेकर परिवार काफी दुखी था. सुनीता भी पति के इस आरोप और व्यवहार से इस प्रकार आहत थी कि उस का हंसना मुसकराना सब बंद हो गया था.

वह उदास और खोईखोई सी रहने लगी थी. उस की आंखों से अकसर आंसू बहते रहते थे. शादी के कुछ दिनों पहले ही उसे छोड़ कर चली गई थी. एक पिता ही था, जो बेटी के मन की स्थिति को समझता था.

रामदेव बेटी का पूरा खयाल रखते थे. वह उसे समझाते बुझाते रहते थे. पिता भी अपनी लाडली बेटी का दुख अधिक दिनों तक सहन नहीं कर सके और एक दिन बेटी के दर्द को सीने से लगा कर हमेशा हमेशा के लिए यह संसार छोड़ गए. उन्हें हार्टअटैक हुआ था.

पिता की मौत के बाद सुनीता अकेली रह गई. एक तरफ पति की बेवफाई और दूसरी तरफ पिता की मौत ने सुनीता को तोड़ कर रख दिया. अब सुनीता की देखभाल करने वाला कोई नहीं था. दोनों भाई और भाभियां उस की उपेक्षा करने लगीं. इस से सुनीता का स्वभाव चिड़चिड़ा सा हो गया. वह अपने प्रति लापरवाह हो गई. वह अकसर अकेली बैठी बड़बड़ाती रहती. जहां बैठती, वहां घंटोंघंटों बैठी रह जाती. जहां जाती, वहां से जल्दी लौट कर नहीं आती. रातदिन का उस के लिए कोई मायने नहीं रह गया था.

सुनीता के इस व्यवहार से उस के भाइयों और भाभियों ने उस का ध्यान रखने के बजाय उसे पागल करार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. फिर एक दिन बिना किसी कसूर के उस के भाइयों और भाभियों ने उसे एक कमरे में बंद कर दिया. 10×10 फुट के उस कमरे में हमेशा अंधेरा रहता था. इस के बाद भाईभाभियों ने यह अफवाह फैला दी कि सुनीता पागल हो कर पता नहीं कहां चली गई.

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा. सुनीता उस अंधेरी कोठरी में रह कर अपने भाइयों और भाभियों द्वारा दी गई सजा काट रही थी. भाभियां तो दूसरे घरों से आई थीं, लेकिन भाई तो अपने थे. ताज्जुब की बात यह थी कि उन सगे भाइयों का दिल भी इतना कठोर हो गया था कि उन्हें भी उस पर दया नहीं आई. वे बड़े बेदर्द हो गए थे.

अंधेरी कोठरी में कैद सुनीता पर उस के भाई भाभी जिस प्रकार का जुल्म ढा रहे थे, उस प्रकार का तो अंगरेजी हुकूमत ने भी शायद अपने कैदियों पर नहीं ढाया होगा.

घर का जूठा और बचाखुचा खाना ही उसे कोठरी के अंदर पहुंचाया जाता था. नित्यक्रिया के लिए भी उसे उसी कोठरी के कोने का इस्तेमाल करना पड़ता था. न तो नहाने के लिए पानी मिलता था, न पहनने के लिए कपड़े और न सोने के लिए बिस्तर था. उस कोठरी में इंसान तो क्या, जानवर भी नहीं रह सकता था.

यदि उसे वहां से मुक्त नहीं कराया जाता तो एक दिन उस की लाश ही बाहर आती. अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद पुलिस ने सुनीता को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे गोवा के पर्वभरी प्रायदोरिया आश्रम गृह भेज दिया गया.

पुलिस ने पूछताछ के बाद सुनीता वेर्लेकर के बड़े भाई रविंद्र वेर्लेकर, छोटे भाई मोहनदास वेर्लेकर, भाभी अमिता वेर्लेकर, अनीता वेर्लेकर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक चारों की जमानत हो चुकी थी और वे जेल से बाहर आ चुके थे. सुनीता वेर्लेकर गोवा के आश्रम में थी, जहां उस की अच्छी देखरेख हो रही थी.

—कथा में रामदेव और रमेशचंद्र काल्पनिक नाम हैं

15 टुकड़ों में बंटी गीता

राजधानी पटना के थाना परसा बाजार के थानाप्रभारी नंदजी अपने औफिस में बैठे थे. तभी 60-65 साल का एक व्यक्ति अंदर आया. उन्होंने उस पर सरसरी निगाह डालने के बाद सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठने का इशारा किया. वह कुरसी पर बैठ गया. उस के माथे पर उभरी चिंता की लकीरों से साफ लग रहा था कि वह परेशान और चिंतित है.

नंदजी ने उस के आने का कारण पूछा तो वह बोला, ‘‘साहब, मेरा नाम राकेश चौधरी है, मैं तरेगना डीह गांव का रहने वाला हूं. मैं बहुत परेशान हूं, मेरी मदद कीजिए.’’

परेशानी पूछने पर वह बोला, ‘‘साहब, मेरी विवाहित बेटी गीता एक हफ्ते से घर से लापता है. उस का मोबाइल फोन भी बंद है. स्थानीय अखबारों में कई दिनों से टुकड़ों में मिली महिला की लाश की खबरें छप रही हैं. उस खबर को पढ़ कर ही मैं यहां आया हूं.’’

इस के बाद वह व्यक्ति अपने थैले से गीता की तसवीर निकाल कर नंदजी की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘यह गीता की तसवीर है, मुझे डर है कि कहीं उस के साथ कोई अनहोनी घटना तो नहीं घट गई.’’

‘‘आप फिक्र न करें.’’ नंदजी ने तसवीर पकड़ते हुए कहा, ‘‘वैसे आप कैसे इतने यकीन से कह सकते हैं कि गीता इसी थानाक्षेत्र से लापता हुई है?’’

‘‘साहब, मैं यह बताना भूल गया कि मेरी नातिन यानी गीता की बेटी जिस का नाम पूनम है, अपने पति रंजन के साथ कुसुमपुरम कालोनी में किराए के मकान में रहती है. जब मैं उस के घर गया तो ताला लगा मिला. पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि पूनम 18 तारीख से ही घर पर नहीं है. उस का फोन भी बंद है, इसलिए मैं यहां आ गया.’’

नंदजी के कहने पर राजेश चौधरी ने अपनी बेटी गीता की गुमशुदगी की तहरीर लिख कर दे दी.

दरअसल, 18 अप्रैल को पटना-गया पैसेंजर ट्रेन के गया रेलवे स्टेशन पर पैसेंजर ट्रेन की एक बोगी में ऊपर की सीट पर कोने में बादामी रंग के लेदर के 2 बड़े बैगों में किसी महिला के हाथपैरों के कटे हुए 3-3 टुकड़े मिले थे.

इस के 3 दिन बाद 20 अप्रैल को जक्कनपुर के पटना-गया रेलखंड पर गुमटी के पास रेलवे ट्रैक पर किसी महिला का कटा हुआ सिर और फ्लैक्स में बंधे हुए धारदार हथियार मिले थे. उसी दिन उन्हीं के थानाक्षेत्र परसा बाजार की कुसुमपुरम कालोनी में किसी महिला का धड़ से कमर तक का हिस्सा एक नाले से बरामद किया गया था.

दरअसल, 2 जिलों पटना और गया के 3 थानाक्षेत्रों गया जंक्शन, पटना के जक्कनपुर और परसा बाजार में 15 टुकड़ों में बंटा एक महिला का शव मिला था. शव एक अधेड़ महिला का था, जिस की उम्र करीब 40-50 साल के बीच रही होगी. 1-1 दिन के अंतराल में मिले शव के टुकड़ों से पटना और गया में सनसनी फैल गई थी.

गया, जक्कनपुर और परसा बाजार से मिले अंगों को एसएसपी मनु महाराज एक ही महिला के होने की आशंका जता रहे थे. उन का तर्क था कि हत्यारों ने लाश के टुकड़े 3 जगहों पर इसलिए फेंके होंगे, ताकि पुलिस आसानी से न तो महिला की शिनाख्त करा सके और न ही कातिलों तक पहुंच सके. इस से साबित हो रहा था कि कातिल जो भी था, बहुत चालाक था. स्थानीय अखबारों ने शव के टुकड़ों की सनसनीखेज खबर बना कर पुलिस की बखिया उधेड़ रखी थी.

राजेश चौधरी की बेटी गीता 17 अप्रैल से लापता थी. उस ने उस का जो हुलिया बताया था, शव के कटे अंगों को जोड़ कर देखने पर काफी मिलताजुलता लग रहा था. नंदजी ने सोचा कि कहीं शव के टुकड़े गीता के ही तो नहीं हैं.

नंदजी ने जक्कनपुर के इंसपेक्टर ए.के. झा को अपने थाने में बुला लिया. वह जब परसा बाजार थाना पहुंचे तो उन्होंने उन का परिचय राजेश चौधरी से करवाया और सारी बात उन्हें बता दी. इस के बाद वह राजेश चौधरी और इंसपेक्टर झा को साथ ले कर एसएसपी मनु महाराज के औफिस गए और उन्हें पूरी जानकारी दी.

एसएसपी मनु महाराज ने जक्कनपुर के थानाप्रभारी ए.के. झा से उस फ्लैक्स के बारे में जानकारी ली, जिसे जक्कनपुर के रेलवे ट्रैक से बरामद किया गया था और उस में खून से सने 3 धारदार हथियार मिले थे. उस फ्लैक्स पर फ्रैंड्स क्लब औफ कुसुमपुरम, नत्थूरपुर रोड, परसा बाजार लिखा था. फ्लैक्स पर लिखे पते के आधार पर पुलिस ने अनुमान लगाया कि हो न हो, महिला का कुसुमपुरम से कोई संबंध रहा होगा.

पुलिस की मेहनत तब रंग लाई. जब लापता बेटी की तलाश के लिए राजेश चौधरी थाने पहुंच गए. पुलिस को यकीन हो चला था कि टुकड़ों में मिला शव गीता का ही रहा होगा.

क्योंकि जिस दिन से गीता लापता हुई थी, उसी के अगले दिन से उस की बेटी और दामाद भी मकान पर ताला लगा कर फरार थे. पुलिस के शक की सूई मृतका की बेटी पूनम और दामाद रंजन की ओर घूम गई थी, लेकिन वह जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहती थी.

चूंकि यह सनसनीखेज मामला परसा बाजार थाने से जुड़ा था, इसलिए इस केस को गया राजकीय रेलवे थाने और जक्कनपुर थाने से स्थानांतरित कर के जांच के लिए परसा बाजार थाने को सौंप दिया गया.

एसएसपी मनु महाराज के आदेश पर इस मामले की जांच की जिम्मेदारी परसा बाजार थानाप्रभारी नंदजी को सौंपी गई. जक्कनपुर थाने के इंसपेक्टर ए.के. झा को कहा गया कि केस के खुलासे में वह नंदजी को सहयोग करें.

थानेदार नंदजी और ए.के. झा ने फ्लैक्स पर लिखे पते को ध्यान में रखते हुए जांच आगे बढ़ाई. फ्लैक्स पर फ्रैंड्स क्लब औफ कुसुमपुरम, नत्थूरपुर रोड, परसा बाजार लिखा था. पुलिस ने शक के आधार पर कुसुमपुरम के 6 युवकों को हिरासत में ले लिया. पूछताछ में उन युवकों ने बताया कि इस तरह के फ्लैक्स उन्होंने सरस्वती पूजा में लगाए थे. बाद में डेकोरेशन वाले फ्लैक्स में सामान लपेट कर ले गए थे.

उन युवकों से पूछताछ के आधार पर पुलिस उस डेकोरेटर तक पहुंच गई, जिस ने सरस्वती पूजा में सजावट की थी. डेकोरेटर ने पुलिस को बताया कि जेनरेटर देने वाला राजेश चौधरी फ्लैक्स को अपने साथ ले गया था. डेकोरेटर से पुलिस ने राजेश का पता लिया और शाहपुर थानाक्षेत्र स्थित उस के गांव खाजेकलां पहुंच गई. राजेश घर पर ही मिल गया. अचानक पुलिस को देख कर वह घबरा गया.

उस के चेहरे के उड़े रंग और पसीने को देख कर पुलिस का शक और पुख्ता हो गया. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के थाना परसा बाजार ले आई. वहां जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो उस ने सारा राज उगल दिया. पूछताछ में उस ने बताया कि मरने वाली गीता उस के दोस्त रंजन की सास थी. रंजन ने उसे 20 हजार रुपए देने का लालच दिया था. उस के कहने पर ही उस ने उस का साथ दिया था. हत्या के बाद उन दोनों ने मिल कर गीता के शरीर के 15 टुकडे़ किए थे. यह बात 22 अप्रैल की है.

राजेश के बयान के आधार पर पुलिस ने उसी रात खाजेकलां से मृतका के पति उमेशकांत चौधरी, उस की बेटी पूनम और प्रेमी अरमान मियां को गिरफ्तार कर लिया. रंजन पुलिस के आने से पहले ही फरार हो गया था.

पुलिस ने पूनम और उमेशकांत से गीता की हत्या और अरमान से उस के प्रेम के रिश्ते के बारे में पूछताछ की तो दोनों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. उमेशकांत ने पत्नी की हत्या का षडयंत्र कैसे रचा था, उस से परदा उठ गया.

गीता देवी हत्याकांड के आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उमेशकांत चौधरी, पूनम, रंजन चौधरी और राजेश को नामजद आरोपी बना कर भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर के अदालत पर पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस पूछताछ में गीता हत्याकांड की कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

48 वर्षीय उमेशकांत चौधरी मूलरूप से पटना के शाहपुर थाना के गांव जमसौर का रहने वाला था. वह शारीरिक रूप से विकलांग था. विकलांगता के आधार पर उसे पटना सचिवालय स्थित भवन निर्माण विभाग में ड्राफ्ट्समैन की नौकरी मिल गई थी. करीब 25 साल पहले उस का विवाह इसी जिले के मसौढ़ी, तरेगना डीह के रहने वाले राकेश चौधरी की बेटी गीता से हुआ था.

औसत कदकाठी की गीता को शादी के बाद जब पति के विकलांग होने की बात पता चली तो उस के अरमान आंसुओं में बह गए. उस के साथ अपनों ने ही धोखा किया था.

शादी से पहले मांबाप ने बेटी को उस के पति की विकलांगता के बारे में कुछ नहीं बताया था. अलबत्ता, उन्होंने इतना जरूर कहा था कि लड़का सरकारी नौकरी में है. अच्छा कमाता है, उस में कोई दुर्गुण नहीं है और वह परिवार व पैसे से भी मजबूत है.

बेटी के भावी जीवन के प्रति एक पिता की यह सोच गलत भी नहीं थी. खैर, पति जैसा भी था, उस का जीवनसाथी था. गीता से वह बहुत प्यार करता था. दोनों की जीवन नैया आहिस्ताआहिस्ता चलने लगी. धीरेधीरे गीता 3 बच्चों की मां बन गई. 3 बच्चों की मां बनने के बाद भी उस की शारीरिक बनावट को देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह 3 बच्चों की जन्म दे चुकी है.

उमेशकांत के बचपन का एक दोस्त उसी गांव में रहता था, जिस का नाम अरमान मियां था. वह गबरू जवान था. उस का आनाजाना घर के भीतर तक था. दोस्त की बीवी को वह भाभी कह कर बुलाता था और कभीकभी उस से मजाक भी कर लेता था. गीता इसे गंभीरता से नहीं लेती थी.

अरमान ने जब से दोस्त की पत्नी को देखा था, उस पर उस का दिल आ गया था. गीता भी अरमान के कसरती और सुडौल बदन को देख कर उस पर मर मिटी थी. जल्दी ही दोनों के संबंध बन गए. उमेशकांत भले ही शरीर से विकलांग था, लेकिन आंख से अंधा या कान से बहरा नहीं था.

उसे पत्नी और दगाबाज दोस्त की घिनौनी करतूतों का पता चला तो वह गुस्से से लाल हो उठा. उस ने पत्नी को समझाया कि वह अपनी हरकतों से बाज आए. लेकिन अरमान के प्यार में अंधी गीता को न तो पति की बात सुनाई दी और न ही उस की नसीहत का कोई असर हुआ. इसी बात को ले कर उमेश पत्नी से नाराज रहता था.

गीता और अरमान के अवैध संबंधों से परेशान हो कर उमेशकांत पत्नी गीता और बच्चों को ले कर ससुराल तरेगना डीह आ गया और वहीं पर परिवार के साथ रहने लगा. धीरेधीरे बच्चे बड़े होते गए. इस बीच उस के बडे़ बेटे को बैंक में नौकरी मिल गई और वह चुनार चला गया. बेटी पूनम की खाजेकलां के रंजन कुमार से शादी हो गई थी. छोटी बेटी को उस ने पढ़ाई के लिए परिवार से दूर भेज दिया था.

इस के बावजूद गीता में बदलाव नहीं आया था. वह अरमान से मिलने जमसौर चली जाती थी. इस बात को ले कर पतिपत्नी में विवाद काफी बढ़ गया था. फिर भी गीता ने अरमान को नहीं छोड़ा. अरमान की वजह से उमेशकांत की बसी बसाई गृहस्थी उजड़ गई थी. दोनों सिर्फ रिश्तों के पतिपत्नी रह गए थे.

गीता के मायके में रहने के दौरान अरमान का वहां भी आनाजाना लगा रहा. इस से परेशान हो कर उमेशकांत बेटी पूनम को ले कर कुसुमपुरम कालोनी में किराए का कमरा ले कर रहने लगा. पूनम पिता की तकलीफ को समझती थी. वह मां के चालचलन को भी अच्छी तरह जानती थी. दामाद रंजन भी ससुर के साथ ही खड़ा रहता था.

गीता हर महीने के आखिरी दिन कुसुमपुरम कालोनी वाले घर आती और जबरन पति की सारी तनख्वाह ले कर चली जाती. उस में से आधी रकम वह खुद रखती और आधी अपने आशिक को दे देती.

वह मायके में ही मांबाप के साथ रह रही थी. इस बात से उमेशकांत और पूनम उस से काफी नाराज थे. पत्नी की हरकतों से आजिज आया उमेशकांत समझ नहीं पा रहा था कि इस मुसीबत से हमेशा के लिए कैसे पीछा छुड़ाए. इस बारे में उस ने बेटी पूनम और दामाद रंजन से बात की. बेटी और दामाद भी गीता की हरकतों से आजिज आ चुके थे. वे भी उस से पीछा छुड़ाना चाहते थे.

दामाद रंजन ने ससुर को भरोसा दिलाया कि वह परेशान न हों. इस मुसीबत से छुटकारा पाने का वह कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेगा. रंजन आपराधिक सीरियल बड़े चाव से देखा करता था.

सीरियल देख कर ही उस ने सास को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. उस की योजना यह थी कि सास की हत्या कर के उस के शरीर के छोटेछोटे टुकड़े किए जाएं और बैग में भर कर उसे ट्रेन में डाल दिया जाए. उस के बाद सारा खेल ही खत्म हो जाएगा.

रंजन ने सास की हत्या की फूलप्रूफ योजना बना डाली. उस ने इस योजना के बारे में अपने ससुर उमेशकांत को भी बता दिया. उमेशकांत पत्नी से खुद इतना आजिज आ चुका था कि अब उसे उस के नाम से भी घृणा हो गई थी. वह चाहता था कि जितनी जल्दी हो सके, गीता नाम की बला से मुक्ति मिल जाए. उस ने हां कर दी.

रंजन चौधरी इस योजना को अकेला अंजाम नहीं दे सकता था. उसे एक ऐसे सहयोगी की जरूरत थी, जो उस का साथ भी दे और इस राज को अपने सीने में दफन भी रखे.

ऐसे में उसे अपने ही गांव का बचपन का साथी और कारोबारी पार्टनर राजेश याद आया. वह उस का हमराज था. उस ने 20 हजार रुपए का लालच दे कर उसे अपनी योजना में शामिल कर लिया. राजेश शादीविवाह में किराए पर जनरेटर चलाता था. रंजन उस के धंधे में बराबर का सहयोगी था.

योजना के मुताबिक, 17 अप्रैल 2017 को पूनम ने मां को फोन किया और विश्वास में ले कर उसे चिकन की दावत पर कुसुमपुरम वाले किराए के मकान पर बुलाया. दोपहर बाद गीता मायके से कुसुमपुरम पहुंच गई. घर से निकलते समय उस ने किसी को कुछ नहीं बताया था कि वह कहां जा रही है. जब वह बेटी के घर पहुंची तो वहां पूनम के अलावा उमेशकांत और दामाद रंजन भी मौजूद थे. थोड़ी देर चारों हंसीठिठोली करते रहे, ताकि गीता को शक न हो.

पूनम मां को रंजन से बातचीत करने को कह कर किचन में चली गई. उमेशकांत भी बेटी के पीछेपीछे हो लिया. उमेशकांत ने पहले ही नींद की दवा मंगा कर रख ली थी.

पूनम कटोरी में मीट और थाली में चावल परोस कर ले आई. नींद की 10 गोलियां पीस कर उस ने अच्छी तरह मीट की कटोरी में मिला दी थीं. पूनम ने मां को खाना खिलाया. खाना खाने के थोड़ी देर बाद गीता का सिर भारी होने लगा और उसे नींद आ गई. गोलियों ने अपना असर दिखा दिया था.

गीता के बेहोश होते ही पूनम, रंजन और उमेशकांत सक्रिय हो गए. योजना के अनुसार, रंजन ने उमेशकांत और पूनम को वहां से खाजेकलां भेज दिया, जहां उस का पुश्तैनी मकान था. इस के बाद रंजन ने खाजेकलां से अपने दोस्त राजेश को कुसुमपुरम बुला लिया. वह रात 9 बजे के करीब कुसुमपुरम आ गया.

बेहोश गीता को जब होश आया तो वह उल्टियां करने लगी. रंजन और उस का दोस्त राजेश आगे के कमरे में बैठे टीवी देख रहे थे. गीता समझ गई कि बेटी, पति और दामाद ने मिल कर उस के साथ धोखा किया है. बात समझ में आते ही वह अपने फोन से अरमान को फोन कर के सारी बातें बताने लगी.

रंजन ने सास को फोन करते सुन लिया. वह घबरा गया कि कहीं उन की योजना पर पानी न फिर जाए. वह दौड़ कर सास के पास पहुंचा और उस के हाथों से फोन छीन लिया. फोन छीनते समय दोनों के बीच गुत्थमगुत्था भी हुई, तब तक राजेश भी आ गया था.

रंजन ने सास को उठा कर बैड पर पटक दिया. राजेश ने उस के दोनों पैर पकड़ लिए और रंजन ने उस का गला घोंट कर हत्या कर दी. रंजन ने सास का मोबाइल फोन ले कर उसे स्विच्ड औफ कर दिया, ताकि कोई उस से संपर्क करने की कोशिश न कर सके. बाद में उस ने हथौड़ी से फोन का चूरा कर के नाले में फेंक दिया.

जब रंजन और राजेश दोनों को यकीन हो गया कि गीता मर चुकी है तो उन्होंने लाश को बैडरूम से निकाल कर बरामदे में रखी चौकी पर रख दिया. रंजन पहले ही लोहा काटने वाले 2 ब्लेड और 1 गड़ासा खरीद लाया था, वह कमरे से गड़ासा ले आया और उसी से उस ने गीता का गला काट दिया. उस ने एक बड़ा टब चौकी के नीचे रख दिया था, ताकि घर में खून न फैले. टब में खून जमा हो गया तो वह उसे बाथरूम में फेंक आया. बाथरूम में कई बाल्टी पानी गिरा कर उस ने खून नाली में बहा दिया.

धड़ को सिर से अलग करने के बाद रंजन और राजेश ने मिल कर गीता के दोनों पैरों के 6, दोनों हाथों के 6 और धड़ के कमर के बीच से 3 टुकड़े यानी कुल मिला कर 15 टुकड़े किए. योजना के अनुसार, पहले से खरीद कर लाए गए 2 बड़े लैदर के बैगों में हाथ और पैरों के टुकड़े भर दिए.

कटे सिर और धारदार हथियारों को रंजन ने फ्लैक्स के टुकड़े में लपेट दिया और उसे काले रंग की बड़ी सी पौलीथिन में रख दिया. यह सब करने में उन्हें ढाई घंटे का समय लगा. लाश के टुकड़ों को बैग में भरने के बाद दोनों बाथरूम में गए और शरीर पर लगे खून को अच्छी तरह साफ किया. इस के बाद दोनों ने बड़ी सफाई से सारे सबूत मिटा दिए. तब तक सुबह हो गई थी.

योजना के अनुसार, रंजन और राकेश को 18 अप्रैल को दोपहर के डेढ़ बजे एकएक बैग ले कर पटना-गया पैसेंजर ट्रेन में चढ़ना था. उन्होंने ऐसा ही किया और इत्मीनान से सीट पर बैठ गए. दोनों बैगों को उन्होंने ऊपर वाली सीट पर कोने में रख दिया. फिर पुनपुन स्टेशन पर उतर कर दोनों घर लौट आए. उन बैगों को उसी दिन रात में गया जंक्शन पर जीआरपी ने बरामद किया था.

अगले दिन 19 अप्रैल को रंजन और राजेश ने जक्कनपुर स्टेशन के बीच गुमटी के पास गीता का कटा हुआ सिर और रेलवे ट्रैक पर फ्लैक्स में लिपटे धारदार हथियार फेंक दिए.  फिर रात में ही धड़ और कमर के बीच से किए गए टुकड़ों को उन्होंने बोरे में भर कर कालोनी से दूर नाले में फेंक दिया. 20 अप्रैल को जक्कनपुर और परसा बाजार पुलिस ने सिर और धड़ बरामद कर लिए.

बहरहाल, रंजन चौधरी ने फूलप्रूफ योजना बनाई थी. हर चालाक कातिल की तरह उस से भी एक चूक यह हो गई थी कि उस ने धारदार हथियारों को फ्लैक्स में लपेट कर फेंका था. फ्लैक्स के ऊपर पता लिखा था. उस पते के आधार पर ही पुलिस टुकड़ों में बंटी गीता के कातिलों तक पहुंच गई और सनसनीखेज हत्या से परदा उठा दिया. इस मामले में अरमान मियां से भी पूछताछ की गई, लेकिन निर्दोष पाए जाने पर उसे छोड़ दिया गया.

कथा लिखे जाने तक गिरफ्तार किए गए चारों आरोपियों उमेशकांत, पूनम, राजेश जमानत पर जेल से बाहर आ गए थे. फरार चल रहा रंजन चौधरी गिरफ्तार कर लिया गया था. पुलिस ने चारों आरोपियों के खिलाफ न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल कर दिया था. राजेश और रंजन अभी भी जेल में हैं. पति, बेटी और दामाद को अपने किए पर जरा भी अफसोस नहीं है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सुहागरात का थप्पड़ : शादी के 25 दिन बाद ही मारा गया मनीष

सुहागरात जिंदगी की ऐसी रात है कि शादी के पहले जहां युवा इस के खयालों में खोए रहते हैं, वहीं शादी के बाद इस की यादों में. यही वजह है कि हर दंपति इसे यादगार  बनाना चाहता है. प्रथम परिचय, पहले अभिसार और दांपत्य की बुनियाद सुहागरात, नीरस और उबाऊ लोगों को भी गुदगुदा जाती है. फिर मनीष तो 22 साल का नौजवान था. वह इस रात का तब से इंतजार कर रहा था, जिस दिन उस की शादी तय हुई थी.

शाम से ही उस के जीजा और भाभियां सुहागरात का कमरा सजाते हुए उस से हंसीमजाक भी कर रहे थे. घर में सब से छोटा होने की वजह से उसे तमाम नसीहतें भी मिल रही थीं, जिस से उसे चिढ़ सी हो रही थी. एक तो वह शादी के उबाऊ रीतिरिवाजों से वैसे ही तंग था, दूसरे पंडित की वजह से 2 दिन गुजर जाने के बाद भी वह पत्नी पूजा के पास नहीं जा सका था. सिर्फ उस के पायलों की छनछनाहट और चूडि़यों की खनखनाहट ही उस तक पहुंच सकी थी.

उतरती मई की भीषण गर्मी से बेखबर मनीष बेचैनी से रात होने का इंतजार कर रहा था. जनवरी में उस की और पूजा की सगाई हुई थी. तभी से उस का चेहरा उस की आंखों के सामने नाच रहा था. अब जब मिलन की घड़ी नजदीक आई तो ये जीजा और भाभियां बेवजह समय बरबाद कर रहे थे.

जैसेतैसे वह घड़ी आ ही गई. भाभियों ने उसे बुला कर सुहागकक्ष में धकेल दिया. कमरे के अंदर जाते ही मनीष ने पहला काम लाइट बुझाने का किया तो बाहर से भाभियों के हंसने के साथ आवाज आई, ‘‘लाला, अंधेरे में दुलहन का चेहरा कैसे दिखेगा?’’

कहीं ऐसा न हो कि भाभियां दरवाजे से कान सटाए मजे लेने की सोच रही हों, इसलिए मनीष कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा. जब उसे लगा कि बाहर कोई नहीं है तो वह उस पलंग की ओर बढ़ा, जिस पर दुलहन पूजा सिमटी गठरी सी बनी बैठी थी.

पूजा का क्या हाल है, यह उसे पता नहीं था. लेकिन उस का दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था. किसी तरह उसे काबू में कर के वह पलंग पर जा कर बैठ गया और पूजा की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगा.

पूजा उसी तरह सिर झुकाए चुपचाप बैठी रही. लड़कियां कितनी भी पढ़ीलिखी और आधुनिक क्यों न हो जाएं, वे इस रात को शरमाती ही हैं. यह मनीष को पता था, इसलिए उस ने पहल करते हुए पूजा की ओर हाथ बढ़ाया तो वह इस तरह चौंक कर पीछे हट गई, मानो करंट लगा हो. मनीष ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

जवाब में पूजा कुछ नहीं बोली तो मनीष ने अगला सवाल किया, ‘‘कोई परेशानी है क्या?’’

‘‘नहीं.’’ पूजा ने धीमे से संक्षिप्त सा जवाब दिया.

मनीष की जान में जान आई कि चलो जवाब तो मिला. उस ने पूछा, ‘‘तो फिर क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं, मैं इस सब के लिए अभी तैयार नहीं हूं.’’ पूजा ने कहा.

पूजा की बात का मतलब समझ कर मनीष ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मैं कहां तुम्हें खाए जा रहा हूं. वैसे भी यह रात बातों के लिए बनी है. वह तो जिंदगी भर होता रहेगा.’’

इतना कह कर मनीष ने पूजा का हाथ पकड़ा तो उस ने उस का हाथ झटक दिया. पत्नी की इस हरकत से उस का माथा ठनका. उस ने थोड़ा गुस्से से पूछा, ‘‘आखिर बात क्या है?’’

‘‘आप मुझे छू भी नहीं सकते.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बस यूं ही.’’

‘‘कोई तो बात होगी. मेरी तुम से शादी हुई है, इसलिए तुम्हें छूने का मेरा हक बनता है. अगर कोई बात है तो बताओ?’’ मनीष ने व्यग्रता से कहा.

जवाब में पूजा कुछ नहीं बोली तो मनीष झल्ला उठा. पूजा की बेरुखी से उस के सुहागरात के सारे अरमान झुलस गए थे. वह यह सोच सोच कर हलकान होने लगा कि पूजा उसे छूने क्यों नहीं दे रही है. यह बात उस की मर्दानगी और वजूद को ललकार रही थी. इसलिए उस ने एक बार फिर थोड़ा गुस्से से पूजा का हाथ पकड़ने की कोशिश की तो इस बार पूजा ने भी थोड़ा गुस्से से उस का हाथ और जोर से झटक दिया.

चटाक की आवाज के साथ एक जोरदार तमाचा पूजा के गाल पर पड़ा. जहां चुंबन जड़ा जाना चाहिए था, वहां तमाचा जड़ दिया गया था. थप्पड़ की वह आवाज कूलर के शोर में दब गई थी. लेकिन इस से इस बात का खुलासा हो गया था कि पूजा पति को शरीर सौंपने की कौन कहे, छूने तक नहीं देना चाहती.

निराश मनीष पलंग पर दूसरी ओर मुंह कर के लेट गया. उस के सारे अरमान मिट्टी में मिल गए थे. लेकिन मन के किसी कोने में अभी भी एक आस थी कि पूजा शायद हंसते हुए कहेगी कि ‘क्या हुआ यार? मैं तो मजाक कर रही थी. जबकि तुम सीरियस हो गए.’

लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. उस का दिल टूट चुका था, पर दिमाग दुरुस्त था. उस समय उस की समझ और धैर्य दाद देने लायक थी. वह एकदम से किसी नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहता था. लेकिन दाल में कुछ काला है, यह वह जरूर समझ गया था. कुछ ही देर में वह बेचैन और बेबस नए पति की जगह एक गंभीर युवक बन गया था.

मनीष के पिता सीताराम मीणा का अपने सीहोर रोड स्थित गांव भैंसाखेड़ा में ही नहीं, पूरे मीणा समाज में खासा रसूख था. उन की गिनती इलाके के संपन्न किसानों में होती थी. इस के अलावा उन की अच्छीखासी चलती दूध की डेयरी भी थी. डेयरी की जिम्मेदारी मनीष ही संभालता था. उस के चाचा परशुराम मीणा का नाम कौन नहीं जानता. वह राज्य के गृहमंत्री बाबूलाल गौर के बहैसियत विधायक ग्रामीण प्रतिनिधि हैं और भाजपा से पार्षद भी रह चुके हैं.

4 भाईबहनों में सबसे छोटे मनीष ने पढ़ाई लिखाई में कोई कसर नहीं रखी. लेकिन कमउम्र में ही उसे खेतीकिसानी, खास कर डेयरी में रुचि जाग उठी थी, इसलिए नौकरी के बारे में उस ने सोचा ही नहीं.

मीणाओं में लड़के लड़कियों की शादी कमउम्र में ही कर दी जाती थी. लेकिन अब समय थोड़ा बदल गया है. मनीष जब खेती किसानी में रम गया और उम्र भी शादी लायक हो गई तो उस के पिता ने उस की शादी अपने दोस्त की बेटी पूजा से तय कर दी.

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ससुराल के बारे में मनीष सिर्फ इतना जानता था कि वे लोग भी उसी की तरह संपन्न किसान हैं. इस के अलावा उस के ससुर एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे. उस ने रिश्तेदारों से यह भी सुन रखा था कि उस की होने वाली पत्नी बहुत खूबसूरत है.

जनवरी में पूजा से उस की सगाई हुई और 29 मई को शादी. 30 मई को मनीष पूजा को दुलहन बना कर अपने घर ले आया.

पूजा के बारे में ही सोचते सोचते मनीष की आंख लग गई थी. आंख खुली तो उसे लगा शायद सुबह होने वाली है. उस ने पलट कर पूजा की ओर देखा. वह अब भी जाग रही थी.

सुहागरात को पत्नी को थप्पड़ का तोहफा दे कर मनीष बिलकुल खुश नहीं था. लेकिन उस ने बरताव ही ऐसा किया कि वह खुद को रोक नहीं पाया. उसे उठता देख पूजा भी उठ बैठी. बाहर जाते हुए उस ने पूजा से कहा, ‘‘आज तुम्हारी विदाई है. लेकिन अब जब भी आना, खुल कर बात करना, वरना मेरे घर वालों को तुम्हारे घर वालों से बात करनी पड़ेगी.’’

‘‘ठीक है.’’ पूजा ने कहा, ‘‘लेकिन इस के लिए मुझे थोड़ा समय चाहिए.’’

‘‘तुम्हारे आने तक मैं खामोश रहूंगा.’’ कह कर मनीष चला गया.

पूजा विदा हो कर मायके आ गई. पत्नी के व्यवहार से मनीष गुमसुम और उदास रहने लगा था, जिसे घर वालों ने पूजा की याद समझा. कोई भी उस के दिल की व्यथा नहीं समझ सका. बात भी ऐसी थी, जिसे वह किसी से कह भी नहीं सकता था. 2-4 दिनों बाद घर वालों की बातचीत से पता चला कि 25 जून को वे पूजा को विदा कराने जाएंगे. पूजा की विदाई के बारे में जान कर उस का दिल धड़का जरूर, लेकिन पत्नी के आने की जो खुशी किसी के मन में होती है, वह कहीं भी नही ंथी.

घर वाले 25 जून को पूजा को विदा करा ले आए. उस दिन रिवाज के अनुसार घर में पूजापाठ का आयोजन था. उस आयोजन में काफी लोगों को बुलाया गया था. इसलिए घर में काफी चहलपहल थी.

उस दिन मनीष सुबह ही अपनी भैंसों को ले कर जंगल की ओर चला गया था. क्योंकि घर में पूजा होने की वजह से दोपहर को उसे जल्दी वापस आना था.

दोपहर बाद होने वाली पूजा में उस की मौजूदगी जरूरी थी. वह भैंसों को ले कर कुछ ही दूर गया था कि उस के मोबाइल फोन की घंटी बजी. स्क्रीन पर उभरा नंबर पूजा के फुफेरे भाई संदीप का था, इस से उसे लगा कि पूजा ने ही कोई संदेश भिजवाया होगा. उस ने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से संदीप ने कहा, ‘‘जीजाजी, आप बैरागढ़ आ जाइए, कुछ जरूरी बात करनी है.’’

मनीष ने यह भी नहीं पूछा कि क्या बात करनी है. उस ने अपनी भैंसें चचेरे भाई के हवाले कीं और खुद बैरागढ़ की ओर चल पड़ा. वह कुछ ही दूर गया था कि रास्ते में बीनापुर निवासी वीरेंद्र अपनी एसयूवी कार लिए मिल गया.

वीरेंद्र को वह जानता था. वह संदीप का दोस्त भी था और  रिश्तेदार भी. पूजा के यहां भी उस की रिश्तेदारी थी. वीरेंद्र ने कहा कि संदीप यहीं आ रहा है तो वह वहीं रुक गया. इस के बाद वीरेंद्र ने उसे अपनी कार में रखी माजा की बोतल निकाल कर थमा दी. दूसरी एक बोतल निकाल कर उस ने खुद खोल ली. दोनों माजा पीते हुए बातचीत करने लगे.

दूसरी ओर सुबह का गया मनीष दोपहर तक घर नहीं लौटा तो घर वाले नाराज होने लगे कि कम से कम आज तो उसे जल्दी आ जाना चाहिए था. परेशानी की बात यह थी कि एक तो उस का फोन बंद था, दूसरे वह किसी को कुछ बता कर नहीं गया था.

इंतजार करतेकरते शाम और फिर रात हो गई और मनीष लौट कर नहीं आया तो घर वालों की नाराजगी चिंता में बदल गई. उस की तलाश शुरू हुई. जब उस के बारे में कहीं से कोई खबर नहीं मिली तो देर रात उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट थाना खजूरी सड़क में दर्ज करा दी गई.

पूजा में आए ज्यादातर लोग वापस चले गए थे. सभी की नजरें पूजा पर टिकी थीं कि वह पति के लिए परेशान है. जबकि सही बात यह थी कि सिर्फ वही जानती थी कि इस समय मनीष कहां है और अब वह कभी वापस नहीं आएगा. दोपहर को ही उस के मोबाइल पर मैसेज आ गया था कि काम हो गया है. यानी मनीष की हत्या हो चुकी है.

मनीष के घर वालों ने वह रात आंखों में काटी. सुबह घर वाले उस की तलाश में निकलते, उस के पहले ही थाने से खबर आ गई कि मनीष की लाश बरामद हो गई है. यह खबर मिलते ही घर में कोहराम मच गया. रोनापीटना सुन कर पूरा गांव सीताराम के घर इकट्ठा हो गया.

थाना खजूरी सड़क के थानाप्रभारी एन.एस. रघुवंशी ने गांव वालों की सूचना पर कोल्हूखेड़ी के जंगल से मनीष की लाश बरामद की थी. लाश की शिनाख्त तुरंत हो गई थी. उस की गुमशुदगी दर्ज ही थी, इसलिए तुरंत उन्होंने लाश बरामद होने की जानकारी उस के घर वालों को दे दी थी.

एक कद्दावर भाजपाई नेता के भतीजे की हत्या की सूचना पा कर पुलिस अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. लाश देख कर ही लगता था कि उस की हत्या गला दबा कर कहीं दूसरी जगह की गई थी. सुबूत मिटाने और पुलिस को चकमा देने के लिए लाश यहां ला कर फेंकी गई थी.

शुरुआती पूछताछ में यह उजागर हो गया था कि मनीष में न कोई ऐब था, न किसी से उस की रंजिश थी. तब किसी ने उस की हत्या क्यों की, पुलिस की यह समझ में नहीं आ रहा था.

लेकिन पुलिस को जब पता चला कि मनीष की अभी जल्दी ही शादी हुई है तो पुलिस का ध्यान तुरंत उस की नवविवाहिता पत्नी पूजा पर गया. पुलिस अधीक्षक अरविंद सक्सेना ने मनीष और पूजा के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा ली. इस काल डिटेल्स से पता चला कि शादी के बाद पूजा 25 दिन मायके में रही और इस बीच मनीष से उस की एक भी बार बात नहीं हुई. जबकि एक अन्य नंबर पर पूजा ने इन्हीं 25 दिनों में 470 बार बात की थी. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर पूजा के बीनापुर निवासी एक रिश्तेदार वीरेंद्र मीणा का था.

इस के बाद मनीष की हत्या का राज खुलने में देर नहीं लगी. पुलिस ने वीरेद्र को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर वीरेंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने तुरंत मनीष की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया, ‘‘मांजा की बोतल में मैं ने नींद की गोलियां घोल कर मनीष को पिला दी थीं. जब वह बेहोश होने लगा तो मैं ने अंगौछे से उस का गला घोंट दिया. उस के बाद संदीप की मदद से उस की लाश को ले जा कर कोल्हूखेड़ी के जंगल के रास्ते पर फेंक दिया था.’’

वीरेंद्र मीणा ने पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में मनीष की हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई थी, वह इस प्रकार थी.

वीरेंद्र और पूजा एकदूसरे को प्यार करते थे. यह सिलसिला तकरीबन 4 सालों से चला आ रहा था. भोपाल के करौंद में समाज के एक धार्मिक समारोह में दोनों की मुलाकात हुई तो उसी पहली मुलाकात में दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

इन के प्यार की मध्यस्था कर रहा था पूजा का फुफेरा भाई संदीप. वही दोनों के मिलनेजुलने की व्यवस्था करता था. वीरेंद्र और संदीप आपस में रिश्तेदार थे. संदीप पूजा का भाई था, इसलिए उस पर कोई शक नहीं करता था कि वह बहन को ले जा कर उस के प्रेमी वीरेंद्र को सौंपता होगा.

वीरेंद्र होनहार भी था और स्मार्ट भी. वह आईएएस की तैयारी कर रहा था. इस के लिए उस ने दिल्ली जा कर कोचिंग भी की थी. स्नातक भी उस ने जालंधर विश्वविद्यालय से किया था. बड़े शहरों में रहने की वजह से वह रहता भी ठाठ से था. खानदानी रईस था ही.

पूजा और वीरेंद्र का प्यार परवान चढ़ा तो शादी की भी बात चली. लेकिन पूजा के पिता ने इस शादी के लिए साफ मना कर दिया. क्योंकि वीरेंद्र उन का दूर का रिश्तेदार था. इस के बावजूद पूजा और वीरेद्र ने हिम्मत नहीं हारी. उन्हें उम्मीद थी कि आज नहीं तो कल, घर वाले जरूर मान जाएंगे.

लेकिन जब पूजा के पिता ने उस की शादी अपने दोस्त के बेटे मनीष से तय कर दी तो उन की उम्मीद पर पानी फिर गया. पूजा शादी के लिए मना नहीं कर पाई, लेकिन उस ने वीरेंद्र को भरोसा दिलाया कि वह जब तक जिंदा रहेगी, तनमन से उसी की रहेगी. चाहे वह पति ही क्यों न हो, कोई उसे छू नहीं पाएगा.

ऐसा हुआ भी. पूजा ने सचमुच मनीष को हाथ नहीं लगाने दिया था. सुहागरात को थप्पड़ वाली बात उस ने वीरेंद्र को बताई तो उस का खून खौल उठा. उस ने उसी समय कसम खाई कि मनीष दोबारा पूजा को हाथ लगाए, उस के पहले ही वह उस की हत्या कर देगा.

वीरेंद्र, पूजा और संदीप, तीनों ही हमउम्र थे. वीरेंद्र संपन्न परिवार का था और उस के पास एक्सयूवी कार भी थी. उस का बहुत बड़ा मकान था और फिल्मी हीरो जैसे लटकेझटके भी. इसलिए पूजा को मनीष रास नहीं आया था. उसे वह डेयरी वाला नहीं, बल्कि भैंसों के तबेले वाला नौकर लगता था.

तीनों का सोचना था कि मनीष की हत्या के बाद पूजा विधवा हो जाएगी. उस के कुछ दिनों बाद वीरेंद्र उस से शादी कर लेगा. क्योंकि मीणा समाज में आज भी विधवा से जल्दी कोई शादी नहीं करता. पूजा के सपने बड़े थे, इसीलिए उस के इरादे खतरनाक हो गए थे. मनीष के हाथों थप्पड़ खा कर वह नागिन सी फुफकार उठी थी.

वीरेंद्र के बयान के आधार पर पुलिस ने पूजा और संदीप को भी गिरफ्तार कर लिया था. पूछताछ में उन दोनों ने अपनाअपना अपराध स्वीकार कर लिया था. पूजा का तो कहना था कि वह भले ही जेल में रहेगी, लेकिन अपने प्रेमी के साथ एक छत के नीचे तो रहेगी. पूछताछ के बाद पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया था.

वीरेंद्र और पूजा के प्यार और साजिश की बलि चढ़ा बेचारा मनीष, जिस का गुनाह सिर्फ यह था कि वह दुनियादारी से ज्यादा वाकिफ नहीं था. वह शादी के पहले ही पत्नी को प्यार करने लगा था.

दरअसल, मीणा समाज में लड़कियों को जो आजादी मिली है, वह फैशनेबल कपड़े पहनने और कौस्मेटिक सामान खरीदने तक ही सीमित है. वे निजी फैसले नहीं ले सकतीं. अगर पूजा अपने पिता के फैसले का डट कर विरोध करती तो शायद खुद भी गुनाह से बच जाती और वीरेंद्र को भी बचा लेती. उस की बेवकूफी 3 परिवारों को ले डूबी.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

17 महीने से छिपी लाश का रहस्य

नाले के पास बिना सिर वाला एक धड़ पड़ा हुआ है, जिस के बदन पर नीले कलर की टीशर्ट पर लाल सफेद लाइनिंग साफ नजर आ रही थी. मरने वाले के हाथ में लोहे का कड़ा और पीले लाल कलर का धागा बंधा हुआ था. उस के शरीर के निचले हिस्से में लाल रंग की अंडरवियर और बनियान थी. सिर के बाल  तथा दाढ़ी व मूंछ में मेहंदी कलर लगा हुआ था. जिस जगह यह सिर कटा धड़ पड़ा हुआ था, उस के कुछ ही दूरी पर एक प्लास्टिक की बोरी भी पड़ी हुई थी.

पुलिस टीम ने जब उस बोरी को खोला तो उस में मृतक का सिर मिला. पहली नजर में हत्या का मामला दिख रहा था. लिहाजा उन्होंने सीन औफ क्राइम मोबाइल यूनिट के प्रभारी डा. आर.पी. शुक्ला को मौके पर बुला लिया.

फोरैंसिक एक्सपर्ट डा. आर.पी. शुक्ला ने मौका मुआयना कर शव को देख कर बताया कि मरने वाले की उम्र 35 साल से अधिक लग रही है. लाश को देखने से प्रतीत हो रहा है कि लाश महीनों पुरानी है और उस की गरदन काट कर हत्या की गई होगी.

एफएसएल टीम ने मौकामुआयना कर वैज्ञानिक साक्ष्य एकत्र कर धड़ को संजय गांधी मैडिकल कालेज की फोरैंसिक शाखा भेज दिया. यह बात 26 अक्तूबर, 2022 की है.

सोशल मीडिया पर यह खबर जंगल की आग की तरह फैलते ही कुछ ही घंटों में पुलिस को पता चल गया कि बिना सिर वाली लाश पास के गांव ऊमरी में रहने वाले 42 साल के रामसुशील पाल की है.

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           एसपी नवनीत भसीन

रीवा जिले के एसपी नवनीत भसीन ने मऊगंज थाने की टीआई श्वेता मौर्य, एसआई लालबहुर सिंह, एएसआई आदि के नेतृत्व में एक टीम का गठन कर जल्द ही रामसुशील की हत्या का खुलासा करने का निर्देश दिया.

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         टीआई श्वेता मौर्य

पुलिस टीम जांच करने जब ऊमरी गांव पहुंची तो पूछताछ में पता चला कि रामसुशील ऊमरी गांव में रहने वाले साधारण किसान मोहन पाल का सब से बड़ा बेटा था. वह पेशे से ड्राइवर था. अपने पेशे की वजह से वह कईकई महीने तक घर से बाहर रहता था.

रामसुशील की पहली पत्नी की मौत के बाद करीब 4 साल पहले उस ने मिर्जापुर निवासी रंजना पाल से विवाह किया था. शादी के शुरुआती समय तो सब ठीकठाक चलता रहा, मगर कुछ समय बाद ही दोनों के बीच मनमुटाव हो गया था.

पुलिस टीम ने जब घर के आसपास रहने वाले लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि रामसुशील तो पिछले डेढ़ साल से गांव में किसी को दिखा ही नहीं. जब गांव के लोग पूछताछ करते तो पत्नी रंजना बताती कि उस का पति काम के सिलसिले में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर गया है.

पुलिस को रामसुशील के घर जा कर यह भी मालूम हुआ कि रंजना भी कुछ दिनों पहले अपने बच्चों को ले कर मायके मिर्जापुर गई हुई है. इस वजह से पुलिस के शक की सूई रंजना की तरफ ही घूम रही थी. लिहाजा पुलिस की एक टीम रंजना की तलाश के लिए मिर्जापुर भेजी गई.

पुलिस ने सख्ती दिखाते हुए रंजना से पूछताछ की तो उस ने पति की मौत की पूरी कहानी बयां कर दी.

मध्य प्रदेश के रीवा जिले के मऊगंज जनपद पंचायत के छोटे से गांव ऊमरी श्रीपथ में रहने वाले किसान मोहन पाल के 3 बेटों में 42 साल का रामसुशील सब से बड़ा था. उस के बाद अंजनी पाल और सब से छोटा 30 साल का गुलाब था.

रामसुशील पेशे से ट्रक ड्राइवर था. उस की पहली शादी 22 साल की उम्र में हो गई थी. एक बेटे और बेटी के जन्म के बाद वह अपनी पत्नी के साथ बुरा व्यवहार करने लगा था. नशे की लत और उस की प्रताडऩा से तंग आ कर पत्नी ने आग लगा कर आत्महत्या कर थी.

उस समय उस के बच्चों की उम्र कम थी, इसलिए समाज के लोगों ने रामसुशील के मातापिता को बच्चों की परवरिश के लिए उस की दूसरी शादी करने की सलाह दी.

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में रहने वाली रंजना पाल भी पति की मारपीट से तंग आ कर मायके में रह रही थी. उस के 2 बेटे थे. समाज के लोगों ने यही सोच कर दोनों की शादी करा दी कि दोनों के बच्चों की परवरिश होने लगेगी.

इस तरह ढह गई मर्यादा की दीवार

रामसुशील नशे का आदी होने की वजह से घरपरिवार की जिम्मेदारियों से बेखबर रहता था. लिहाजा दोनों के बीच तकरार बढऩे लगी.

रामसुशील का परिवार गांव में घर के 3 हिस्सों में अलगअलग रहता था. एक हिस्से में रामसुशील का परिवार, दूसरे हिस्से में उस का भाई अंजनी पाल अपनी पत्नी और बच्चों के साथ, जबकि सब से छोटा भाई गुलाब  मातापिता के साथ रहता था. उस समय गुलाब की शादी नहीं हुई थी.

रामसुशील काम के सिलसिले में अकसर 15-15 दिन घर से बाहर रहता था. इस का फायदा उठाते हुए रंजना का झुकाव अपने देवर गुलाब की तरफ हो गया. उस समय गुलाब 30 साल का गोराचिट्टा जवान व कुंवारा था.

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   आरोपी गुलाब पाल

गुलाब भाभी का लाडला देवर था, परंतु रामसुशील की बुरी आदतों की वजह से अपने भाइयों से नहीं पटती थी. रामसुशील पैतृक संपत्ति का ज्यादा भाग खुद उपयोग कर रहा था. इस वजह से उस के भाई भी उस से नफरत करते थे.

ऐसे में रंजना ने गुलाब पर डोरे डालने शुरू कर दिए. गुलाब उम्र की जिस दहलीज पर खड़ा था, वहां पर शादीशुदा नाजनखरों वाली भाभी रंजना के बिछाए प्रेम जाल में वह फंस ही गया. लिहाजा जल्द ही दोनों के बीच अवैध संबंध हो गए.

इस के बाद तो गुलाब और रंजना का इश्क परवान चढऩे लगा था. जब भी उन्हें मौका मिलता, वे अपनी हसरतों को पूरा कर लेते. लेकिन कहते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. यही हाल हुआ भौजाई रंजना और देवर गुलाब के इश्क का. आखिर पति रामसुशील को देवर भौजाई के चोरीछिपे चल रहे इश्क का पता चल ही गया.

एक दिन शराब के नशे में चूर रामसुशील जब घर पहुंचा तो रंजना पर बरस पड़ा, ”छिनाल, तूने आखिर अपनी औकात दिखा ही दी. गुलाब के साथ रंगरलियां मना रही है.’’

रामसुशील ने भद्दी गालियां देते हुए रंजना की पिटाई कर दी. अब तो आए दिन दोनों के बीच झगड़ा आम बात हो गई थी. जब रामसुशील गुस्से में रंजना की पिटाई करता तो प्रेमी गुलाब के सीने पर सांप लोट जाता.

छोटा भाई क्यों बना जान का दुश्मन

रोजरोज अपनी प्रेमिका की पिटाई से उसे दुख पहुंचता. एक दिन मौका पा कर गुलाब ने रंजना से साफसाफ कह दिया, ”भौजी, हम से तुम्हारा दर्द देखा नहीं जाता. आखिर कब तक जुल्म सहती रहोगी.’’

”कुछ समझ भी नहीं आता, आखिर ऐसे मर्द के साथ मैं निभाऊं कैसे.’’ रंजना बोली.

”मेरी तो इच्छा है कि ऐसे मर्द को तुम्हारी जिंदगी से हमेशा के लिए दूर कर दूं, फिर हमारे प्यार में कोई अड़चन ही नहीं होगी.’’ गुलाब रंजना से बोला.

”लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है. यदि यह राज किसी को पता चल गया तो जेल में चक्की पीसेंगे हम दोनों.’’ रंजना ने आशंका व्यक्त करते हुए कहा.

”मेरे पास एक प्लान है, तुम अगर मानो तो किसी को कानोकान खबर नहीं होगी.’’ गुलाब चहकते हुए बोला.

”बताओ, ऐसा कौन सा प्लान है तुम्हारे पास?’’ रंजना बोली.

”भौजी, मैं बाजार से चूहे मारने वाली दवा ला कर दूंगा, तुम चुपचाप खाने में मिला कर रामसुशील भैया को खिला देना.’’ गुलाब बोला.

”फिर… घर के लोगों को क्या बताएंगे कि कैसे मर गए?’’ रंजना आगे की मुश्किल देखते हुए बोली.

”तुम इस की चिंता मत करो. रातोंरात मैं लाश को ठिकाने लगा दूंगा और लोगों से कह देंगे कि भैया काम के सिलसिले में बाहर गए हुए हैं.’’ गुलाब रंजना को आश्वस्त करते हुए बोला.

गुलाब और रंजना का प्यार अब घर वालों को भी पता चल चुका था. गुलाब के रंजना से संबंधों की भनक पिता मोहन पाल को लगी तो उन्होंने माथा पीट लिया. समाज में ऊंचनीच न होने के भय से उन्होंने यह सोच कर गुलाब की शादी कर दी कि शादी होते ही वह अपनी भाभी से दूर रहने लगेगा.

मगर शादी होने के बाद भी गुलाब की रंजना से नजदीकियां कम नहीं हुईं. गुलाब की पत्नी भी गुलाब की इन हरकतों से परेशान थी. गुलाब अपनी नवविवाहिता पत्नी पर फिदा होने के बजाय रंजना भाभी की जवानी के गुलशन का भंवरा बना हुआ था. गुलाब की नईनवेली पत्नी जब गुलाब को रंजना से दूर रहने को कहती तो वह उलटा उस के साथ ही मारपीट करने लगता.

रामसुशील जब भी घर आता तो वह देखता कि गुलाब रंजना के इर्दगिर्द घूमता रहता है. इस बात को ले कर वह गुलाब को भलाबुरा भी कह चुका था. गुलाब अपने भाई से जब जमीन के बंटवारे की बात कहता तो रामसुशील उसे डराधमका कर चुप करा देता.

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         आरोपी अंजनी पाल

जमीनजायदाद के बंटवारे को ले कर जब भी उन का आपसी विवाद होता तो उस के चाचा रामपति और उस के लड़के सूरज और गुड्डू भी गुलाब और अंजनी का पक्ष लेते. इस से रामसुशील अपने चाचा और उन के बेटों के साथ गालीगलौज करता.

समोसे की चटनी में मिलाया जहर

रामसुशील से तंग आ कर 2021 के मई महीने में रंजना और गुलाब ने रामसुशील को रास्ते से हटाने का प्लान बनाया और एक रात रंजना ने घर पर स्वादिष्ट समोसे बनाए.

समोसे खाने का रामसुशील शौकीन था, उसे टमाटर की चटनी के साथ समोसे खाना बहुत अच्छा लगता था. रंजना ने समोसे के साथ परोसी गई चटनी में चूहे मारने की दवा मिला दी थी.

रामसुशील चटखारे मार कर समोसे खा गया, मगर उसे इस बात का पता नहीं था कि उस की पत्नी ने जो प्यार जता कर समोसे परोसे हैं, उस में उस की मौत छिपी हुई थी.

पेट भर समोसे खा लेने के बाद रामसुशील सोने चला  गया. बच्चों के सोने के बाद जब रंजना रात के करीब 12 बजे पति के बिस्तर पर पहुंची तो उस ने हिलाडुला कर पति की नब्ज टटोली.

कोई हलचल न पा कर रंजना ने गुलाब को फोन कर खबर कर दी. गुलाब भी इसी पल का इंतजार कर रहा था. उस ने जमीन के बंटवारे में हिस्सा दिलाने का लालच दे कर अपने भाई अंजनी पाल को भी साथ ले लिया.

जैसे ही गुलाब और अंजनी भाभी के बुलावे पर रामसुशील के पास कमरे में पहुंचे तो रामसुशील को बेहोश देख कर बहुत खुश हुए. उन्हें लगा कि भाई जिंदा न बचे, इसलिए अपने साथ लाए धारदार हथियार से गुलाब ने रामसुशील का गला काट कर भाई अंजनी की मदद से धड़ और सिर प्लास्टिक की बोरी में भर दिया.

दूसरे दिन सुबह जल्दी उठ कर अंधेरे में ही गुलाब लाश वाली बोरी को साइकिल पर लाद कर अपने चाचा रामपति पाल के खेत पर पहुंच गया. वहां चाचा के लड़के सूरज और गुड्डू की मदद से भूसा रखने वाले कमरे में उस ने लाश की बोरी दबा दी.

इस काम में चाचा के बेटों गुड्डू पाल और सूरज पाल ने इसलिए मदद की क्योंकि एक बार जमीनी विवाद में इन का झगड़ा रामसुशील से हो गया था, तब रामसुशील ने पूरे गांव के सामने उन का अपमान किया था. अपने अपमान का बदला लेने के लिए वे गुलाब के इस प्लान में शामिल हो गए.

सुबह जब बच्चे सो कर उठे तो उन्हें रंजना ने बताया कि उस के पापा काम के सिलसिले में बाहर गए हैं. रामसुशील को रास्ते से हटाने के बाद गुलाब और रंजना के प्रेम की राह आसान हो गई थी. अब वे अपनी मरजी के मुताबिक जिंदगी जी रहे थे. गुलाब अपनी बीवी की उपेक्षा कर भाभी रंजना पर अपनी कमाई लुटा रहा था. रंजना भी गुलाब की दीवानगी का खूब फायदा उठा रही थी.

17 महीने बाद कैसे खुला राज

लाश को छिपाए करीब 17 महीने बीतने को थे, परंतु हर समय गुलाब के मन में पकड़े जाने का भय बना रहता था. गुलाब के चाचा रामपति को जब इस बात का पता चला तो वह गुलाब पर लाश को वहां से हटाने का दबाव बनाने लगे थे.

उन्होंने साफतौर पर कह दिया था, ”भूसा भरने वाले कमरे से वह जल्द ही लाश को हटा दे, नहीं तो वह पुलिस को सब कुछ बता देंगे.’’

पशुओं के लिए रखा भूसा भी खत्म होने को था. 25 अक्तूबर, 2022 की रात को गुलाब ने लाश वाली बोरी ला कर पास के गांव निबिहा के नाले के पास फेंक दी और घर जा कर चैन की नींद सो गया.

अगली सुबह रामसुशील की लाश मिलते ही गुलाब राज खुलने के डर से भयभीत हो गया और उस ने फोन लगा कर रंजना को बताते हुए सचेत कर दिया था.

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                                                    हिरासत में आरोपी

सूचना मिलने पर मऊगंज थाने की टीआई श्वेता मौर्य पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंची और सिर व धड़ बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिए. पुलिस जांच में रंजना से पूछताछ की गई तो थोड़ी सख्ती से रंजना जल्दी ही टूट गई और पुलिस को उस ने सच्चाई बता दी.

देवरभाभी के प्रेम और वासना की आग में अंधे हो कर रामसुशील को ठिकाने लगा कर यही समझ बैठे थे कि वे पुलिस की आंखों में धूल झोंक कर कानून की नजरों से बच जाएंगे, परंतु उन का यह भ्रम जल्दी ही टूट गया.

17 महीने तक भूसे के ढेर में दबी लाश जब बाहर निकली तो रामसुशील की हत्या का पूरा सच सामने आ गया.

पुलिस ने गुलाब, रंजना के साथ उस के भाई अंजनी व चाचा रामपति को भादंवि की धारा 302 और 201 के तहत मामला कायम कोर्ट में पेश किया, जहां से रंजना को महिला जेल रीवा और गुलाब, अंजनी और रामपति को उपजेल मऊगंज भेज दिया.

कथा लिखे जाने तक 2 आरोपी जेल में बंद थे और उन के खिलाफ आरोपपत्र कोर्ट में पेश किया जा चुका था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पति को दी जल समाधि

दूसरी लड़कियों की तरह बिंदिया की भी इच्छा थी कि उस की सुहागरात फिल्मों जैसी हो. शादी का धूमधड़ाका थम चुका था, अधिकांश मेहमान भी विदा हो गए थे. अपने कमरे में बैठी बिंदिया सुहागरात के खयालों में डूबी पति छोटेलाल का इंतजार कर रही थी. बिंदिया ने काफी दिन पहले से सुहागरात के बारे में न केवल काफी कुछ सोच रखा था, बल्कि मन ही मन उसे अमल में लाने की भी तैयारियां कर चुकी थी.

हालांकि बिंदिया बहुत ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी और न ही किसी मालदार घराने की थी. फिर भी सुहागरात और शादीशुदा जिंदगी को ले कर उस के सपने वैसे ही थे, जैसे उस ने फिल्मों और टीवी सीरियलों में देखे थे.

मसलन पति कमरे में दाखिल होगा, फिर आहिस्ता से दरवाजे की कुंडी बंद कर पलंग तक आएगा, प्यार भरी रोमांटिक बातें करेगा, धीरेधीरे उस के अंगअंग को सहलाएगा चूमेगा. फिर दोनों जिंदगी के सब से हसीन सुख के समंदर में गोते लगाते हुए कब सो जाएंगे, उन्हें पता नहीं चलेगा.

इन्हीं खयालों में डूबी बिंदिया ने जैसे ही किसी के आने की आहट सुनी, उस के शरीर का रोआंरोआं खड़ा हो गया. उस का हलक सूखने लगा और मारे शरम व डर के वह दोहरी हो गई. जिस रात का ख्वाब वह सालों से देख रही थी, वह आ पहुंची थी. छोटेलाल कमरे में दाखिल हो चुका था.

पर यह क्या, छोटेलाल ने उसे कुछ सोचनेसमझने का मौका ही नहीं दिया. कमरे में आते ही वह उस पर जानवरों की तरह टूट पड़ा. उस के शरीर से इत्र या परफ्यूम नहीं महक रहा था, बल्कि मुंह से शराब की गंध आ रही थी. छोटेलाल ने उस से कोई बातचीत नहीं की और उस के कपड़े जिस्म से उतारे नहीं बल्कि खींच कर अलग कर दिए. उसे लाइट बुझाने का भी होश नहीं था.

सुहागरात बनी बलातरात

जैसे ही बिंदिया का सांवला बदन छोटेलाल की आंखों में नुमाया हुआ, वह बजाय रोमांटिक होने के पूरी तरह वहशी हो गया. उस की हालत वैसी ही थी जैसे लाश के पास बैठे गिद्ध की होती है.

देखते ही देखते वह बिंदिया पर छा गया और कुछ देर बाद यानी अपनी प्यास बुझाने के बाद करवट बदल कर खर्राटे भरने लगा. बिंदिया के सपने चूरचूर हो चुके थे, उसे लग रहा था कि उस ने सुहागरात नहीं बल्कि बलातरात मनाई है, जिस में उस का रोल हवस मिटाने वाली गुडि़या जैसा था.

कुछ देर बाद वह सामान्य हुई तो गहरी नींद में सोऐ छोटेलाल को देख कर उस का मन गुस्से से भर उठा. शराब से तो उसे बचपन से ही नफरत थी. उसे क्या पता था कि उसे एक शराबी के पल्लू से बांध दिया जाएगा.

न घूंघट उठा, न छेड़छाड़ हुई और न ही प्यारभरी बातें हुईं. जो हुआ उसे याद कर बिंदिया का रोमरोम सुलग रहा था. उसे लग रहा था कि इस गंवार और जाहिल आदमी की पीठ पर लात मार कर उसे उठा कर बताए कि एक पत्नी सुहागरात की रात क्या चाहती है और कैसे चाहती है.

पर बेबसी ने उस के होंठ बांध दिए, क्योंकि उसे पहले ही बता दिया गया था कि अब पति ही तुम्हारा सब कुछ है. उस की मरजी को हुक्म मानना और जैसे भी हो, उसे खुश रखना क्योंकि अब वही तुम्हारा सब कुछ है.

अकसर सुहागरात को ही तय हो जाता है कि आने वाली जिंदगी कैसी होगी. यह बात बिंदिया को अब समझ आ गई थी कि अब जैसे भी हो बाकी की जिंदगी उसे इसी छोटेलाल के साथ काटनी है. जिस में रत्ती भर भी शऊर नहीं है और न ही वह पत्नी और शादीशुदा जिंदगी के मायने समझता है. इतना सब कुछ समझ आ जाने के बाद दुखी और सुबकती बिंदिया ने कपड़े पहने और सोने की कोशिश करने लगी.

राजस्थान का धौलपुर जिला मध्य प्रदेश के मुरैना और उत्तर प्रदेश के जिले आगरा को मिलाता हुआ है. आगरा के आमदोह गांव की बिंदिया की शादी धौलपुर के गांव छातीपुरा के छोटेलाल निषाद से हुई थी.

दोनों ही गरीब घर के थे, लिहाजा शादी से पहले ही बिंदिया ने मन ही मन तय कर लिया था कि पति जो भी रूखासूखा खिलाएगा, खा लेगी. जो भी पहनाएगा, पहन लेगी और जैसे भी रखेगा, रह लेगी. लेकिन जिएगी प्यार से, यही जज्बा जिंदगी को खुशहाल बनाता है, जिस के लिए पैसों की रत्ती भर भी जरूरत नहीं पड़ती.

पहली ही रात बिंदिया को समझ आ गया था कि उस के सपने अब कभी पूरे नहीं होने वाले, क्योंकि छोटेलाल दिन भर मेहनत मजदूरी करता था और रात को अकसर शराब पी कर उस के बदन को नोचने खसोटने लगता था. बेमन से बिंदिया उस का साथ देती थी, जिस के चलते पूरी तरह न तो उस के तन की प्यास बुझती थी और न छोटेलाल को उस के मन से कोई वास्ता ही था.

घरजमाई बन कर रहने लगा छोटेलाल

छीतापुरा में छोटेलाल को रोजाना काम नहीं मिलता था, इसलिए शादी के कुछ दिनों बाद वह आमदोह आ कर बस गया. यानी घरजमाई बन गया. मायके आ कर बिंदिया को भी थोड़ा सकून मिला. यहां कम से कम सब लोग जानेपहचाने तो थे, जिन से वह अपना दुखदर्द बांट सकती थी, हंसबोल सकती थी.

ससुराल आ कर भी छोटेलाल की आदतों में कोई बदलाव नहीं हुआ. उलटे उस की शराब की लत और बढ़ गई. जल्द ही उस की दोस्ती एक आटो ड्राइवर राजकुमार से हो गई, जो यारबाज आदमी था. वह छोटेलाल को कभीकभी दारूमुर्गे की पार्टी देता रहता था. देखते देखते दोनों में गहरी छनने लगी. राजकुमार कभीकभी छोटेलाल के घर यानी ससुराल में ही बैठ कर दावत देने लगा.

शराब से नफरत करने वाली बिंदिया को राजकुमार का आनाजाना खटका नहीं, क्योंकि उसे वह बचपन से ही जानती थी और यह भी जानती थी कि यह वही राजकुमार है, जिस ने जवानी के शुरुआती दिनों में उस के पीछे खूब चक्कर लगाए थे. उसे पटाने की कोशिश की थी, लेकिन बिंदिया ने ही उसे घास नहीं डाली थी.

बिंदिया जब पति के साथ आमदोह वापस आई तो उस की खिली और गदराई जवानी देख कर राजकुमार के मन में पुरानी हसरतें जोर मारने लगी थीं. बिंदिया के हावभाव और बातचीत से वह जल्द ही भांप गया था कि वह पति से खुश नहीं है.

एक सधे खिलाड़ी की तरह उस ने बिंदिया की तरफ प्यार या वासना कुछ भी कह लें, का दाना डाला तो यह जान कर उस का दिल बल्लियों उछलने लगा कि दाना चुगने में बिंदिया ने तनिक भी आनाकानी नहीं की थी. यानी आग दोनों तरफ बराबरी से लगी थी, इंतजार था मौके का. इस आग को धधकने में देर नहीं लगी और एक दिन जरा सी कोशिश करने पर बिंदिया पके आम की तरह राजकुमार की झोली में आ गिरी.

यह पका आम चोरी का था, जिसे राजकुमार मनमुआफिक अपनी मरजी से खा या चूस नहीं सकता था. दोनों को अपने तन और मन की आग बुझाने कस्बे से बाहर जंगलों में जाना पड़ता था. राजकुमार ठीक वैसी ही बातें करता था, जैसी कि बिंदिया चाहती थी. प्यार मोहब्बत और रोमांस की ये वे बातें थीं, जिन्हें वह पति छोटेलाल के मुंह से सुनने को तरसती रही थी.

छोटेलाल ने कभी उस की खूबसूरती की तारीफ नहीं की थी, पर राजकुमार तारीफों के पुल बांध देता था. बिंदिया इस पर और निहाल हो जाती थी. अब हालत यह थी कि छोटेलाल का हक उस के शरीर पर तो था, लेकिन मन पर नहीं. उस के मन पर तो राजकुमार ने कब्जा जमा लिया था.

गांव वालों ने आंखों में ही बना ली वीडियो

गांव में भले ही सीसीटीवी नहीं थे, लेकिन गांव वालों की नजर किसी कैमरे की मोहताज नहीं थी. जल्द ही लोगों को बिंदिया और राजकुमार के नाजायज संबंधों की भनक लग गई. किसी ने दोनों को जंगल में गुत्थमगुत्था होते देख लिया तो बिना स्मार्टफोन का इस्तेमाल किए दिमाग में बना उन के संबंधों का वीडियो औडियो गांव भर में वायरल हो गया.

हालांकि बिंदिया के पास मोबाइल फोन आ गया था, जिस के जरिए वह राजकुमार के संपर्क में रहती थी. दोनों घंटों प्यार और अभिसार की बातों में डूबे रहते थे. खासतौर से उस वक्त जब उस का पति घर पर नहीं होता था और जब होता था तब राजकुमार शराब की बोतल ले कर पहुंच जाता था. लेकिन इस बात की वह पूरी अहतियात बरतता था कि छोटेलाल के सामने कोई ऐसी बात या हरकत न हो, जिस से उस के मन में शक पैदा हो. क्योंकि इस से बनीबनाई बात बिगड़ने का पूरा अंदेशा था.

तमाम सावधानियों के बाद भी बात बिगड़ ही गई. गांव की चर्चा जब छोटेलाल के कानों में पहुंची तो पहले तो उसे यकीन नहीं हुआ, लेकिन इस धुएं की आग कहां है, यह देखने से वह खुद को रोक नहीं पाया. गलत नहीं कहा जाता कि शक का बीज एक बार दिमाग में घर कर ले तो बिना पेड़ बने सूखता या मरता नहीं.

यही छोटेलाल के साथ हुआ. लिहाजा उस ने मन का शक मिटाने या सच जान लेने की गरज से राजकुमार और बिंदिया की निगरानी शुरू कर दी. नतीजा भी जल्द सामने आ गया, जब उस ने एक दिन दोनों को आदिम हालत में रंगेहाथों पकड़ लिया.

रंगेहाथों पकड़ी गई बिंदिया

पत्नी को गैरमर्द की बाहों में बेशरमी से मचलता और लिपटता देख छोटेलाल का खून खौल उठा. उस ने राजकुमार को पकड़ने की कोशिश की तो वह अपने कपडे़ हाथ में ले कर नंगधडं़ग हालत में भाग निकला. लेकिन बेचारी बिंदिया इस हालत में कहां जाती. उस दिन छोटेलाल ने उस की तबीयत से धुनाई कर डाली. मार से बेहाल बिंदिया तरहतरह की कसमें खाते पति से माफी मांगती रही कि अब दोबारा ऐसा नहीं होगा.

छोटेलाल नाम का ही छोटा था, लेकिन दिल का बड़ा निकला. उस ने पत्नी को माफ कर दिया. इस पर बिंदिया ने चैन की सांस ली लेकिन अब राजकुमार का घर आनाजाना बंद हो गया था. दोनों में बातचीत भी नहीं होती थी. यह हालत ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाई. छोटेलाल को पैसों की तंगी और शराब की तलब परेशान करने लगी थी.

पति को नर्म पड़ते देख बिंदिया ने राजकुमार को इशारा किया तो वह एक दिन छोटेलाल से माफी मांगने उस के घर जा पहुंचा. शराब की तलब की मजबूरी कह लें या फिर वाकई फिर बड़े दिल वाला कह लें, छोटेलाल ने उसे भी इस शर्त पर माफ कर दिया कि आइंदा वह कभी भी बिंदिया की तरफ आंख उठा कर नहीं देखेगा.

बात अंधा क्या चाहे दो आंखों वाली जैसी थी. दुश्मनी रफादफा हो गई तो फिर महफिल जमने लगी और दोनों दारूमुर्गे की दावत उड़ाने लगे. बिंदिया भी पति और यार की नजदीकियों से खुश थी. उसे राजकुमार से फिर आंख और इश्क लड़ाने का मौका मिल रहा था.

लेकिन अब छोटेलाल चौकन्ना था और पहले के मुकाबले सख्त भी हो चला था, इसलिए दोनों को परेशानी होने लगी. इतने नजदीक होने पर जिस्मों की दूरियां राजकुमार और बिंदिया की प्यास और भड़का रही थीं.

गांव में पहले ही इतनी बदनामी हो चुकी थी कि दोनों के दिलोदिमाग से शरमोहया नाम की चीज खत्म हो चुकी थी. तंग आ कर इन हैरान परेशान प्रेमियों ने वासना की आग में जलते एक सख्त फैसला ले लिया, जिस की 2 महीने तक किसी को हवा नहीं लगी.

पुलिस पहुंची बिंदिया के पास

वह बीते 5 जून की तारीख थी, जब कुछ पुलिस वाले आमदोह गांव पहुंचे और बिंदिया का पता पूछने लगे. बिंदिया जब पुलिस के सामने आई तो उस के चेहरे की रंगत उड़ी हुई थी. पुलिस वालों ने छोटेलाल के बारे में पूछताछ की तो उस ने टरकाने की गरज से जवाब दिया कि वह तो कुछ दिनों से कहीं गए हुए हैं.

बिंदिया को अहसास नहीं था कि पुलिस वाले अपना पूरा होमवर्क कर के आए हैं. उन्होंने शुरुआती पूछताछ में ढील दी और फिर बिंदिया की निगरानी और पूछताछ शुरू की तो पता चला कि छोटेलाल के जाने के बाद राजकुमार का बिंदिया के घर आनाजाना बढ़ गया था. कुछ लोगों ने दोनों के नाजायज ताल्लुकात होने की बात भी दबी जुबान से कही.

असल में हुआ यूं था कि 5 मार्च को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के गांव गुलेंदा निवासी मुन्ना सिंह ने नूराबाद थाने में खबर दी थी कि सुनरेखा नदी के किनारे एक लाश तैर रही है. खबर मिलते ही थानाप्रभारी विनय यादव हरकत में आ गए. घटनास्थल पर पहुंच कर उन्होंने गांव वालों की मदद से लाश को बाहर निकाला.

लाश का मुआयना करने पर चोट के निशान नहीं पाए गए तो पुलिस वाले इसे हादसे से हुई मौत मानते रहे. लाश के पास से ऐसा कोई सबूत नहीं मिला था, जिस से उस की शिनाख्त हो पाती. लेकिन जब पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आई तो उस में मौत की वजह जहर बताया गया.

पुलिस की दिक्कत यह थी कि लाख कोशिशों के बाद भी मृतक की पहचान का कोई सुराग नहीं मिल रहा था. इस के बाद भी पुलिस वालों ने हिम्मत नहीं हारी.

एसपी मुरैना असित यादव ने इस ब्लाइंड मर्डर की गुत्थी सुलझाने के लिए एसडीपीओ ओ.पी. रघुवंशी के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी, जिस में विनय यादव के अलावा एएसआई जयपाल सिंह, अजय बेशांदर, रामदास सिंह, हैडकांस्टेबल केशवचंद, धर्मवीर, मुन्ना सिंह, सुनील, सुरेंद्र सिंह, अजय और दीनदयाल को शामिल किया गया.

एक महीने तक पुलिस टीम मृतक की शिनाख्त की कोशिश में जुटी रही, तब कहीं जा कर पता चला कि मृतक छोटेलाल निषाद पुत्र पूरन निषाद निवासी छीतापुरा है. यहीं से पुलिस टीम को पता चला कि छोटेलाल कुछ महीनों पहले अपनी ससुराल आमदोह जा कर रहने लगा था.

जब पुलिस वालों को बिंदिया और राजकुमार के संबंधों के बारे में पता चला तो उन्होंने गुपचुप तरीके से बिंदिया के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस से पता चला कि न केवल उस की और राजकुमार की लंबीलंबी बातें होती थीं, बल्कि हादसे के दिन दोनों के ही फोन की लोकेशन भी घटनास्थल की आ रही थी. अब कहने सुनने को कुछ खास नहीं बचा था.

पुलिस वालों ने जब बिंदिया से राजकुमार के बारे में पूछा तो वह यह कह कर साफ मुकर गई कि वह तो किसी राजकुमार को नहीं जानती. लेकिन पुलिस टीम जानती थी कि बिंदिया राजकुमार को कितने गहरे तक जानती है.

दोनों ने कबूला अपना गुनाह

राजकुमार और बिंदिया से अलगअलग पूछताछ की गई तो दोनों के बयानों में काफी विरोधाभास पाया गया. फिर जल्द ही दोनों ने अपना जुर्म कबूल लिया कि उन्होंने ही योजना बना कर छोटेलाल नाम का कांटा अपने रास्ते से हटाया था.

योजना के मुताबिक बिंदिया ने छोटेलाल के खाने में जहर मिला दिया था, जो राजकुमार ने उसे ला कर दिया था. जब जहर का असर हुआ तो छोटेलाल लुढ़क गया. उस के बेहोश होते ही दोनों एकदूसरे से लिपट गए और सब से पहले अपनी कई दिनों की हवस की प्यास बुझाई.

इस के बाद लाश ठिकाने लगाने के लिए राजकुमार ने फोन कर के अपने दोस्तों सुलतान कुशवाह व जंगबहादुर उर्फ गुड्डू जाटव को बुला लिया. चारों ने बेहोश छोटेलाल को आटोरिक्शा में बीच में इस तरह बैठाया कि कोई देखे तो लगे कि सवारियां बैठी हैं.

यह आटोरिक्शा आमदोह नगला थाना चौकी आगरा से होता हुआ गुलेंदा के पास पहुंचा, जहां सुनसान जगह देख इन्होंने छोटेलाल को नदी में फेंक दिया. जब 2 महीने तक कुछ नहीं हुआ तो दोनों बेफिक्र हो गए कि उन के गुनाह पर परदा पड़ा रहेगा.

पुलिस ने चारों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. नाजायज संबंधों के चलते प्रेमी के साथ मिल कर पति की हत्या की एक और कहानी खत्म हुई, जो अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गई. मसलन मौजमस्ती के लिए लोग क्या कुछ नहीं कर गुजरते.

बिंदिया बजाए राजकुमार को यार बनाने के छोटेलाल को ही रास्ते पर लाने की कोशिश करती तो इस से बात बन सकती थी, लेकिन उसे अपने सपनों का राजकुमार, राजकुमार कुशवाह में दिखा और सपनों की जिंदगी जीने के लिए पति को ही निपटा दिया, जिस की सजा वह भोग रही है.

छोटेलाल जैसे पति भी अगर पत्नियों की भावनाओं को समझें, उन की कद्र करें तो न केवल हादसों से बच सकते हैं, बल्कि एक खुशहाल जिंदगी भी जी सकते हैं.