Uttar Pradesh Crime: राजनीतिक अवतार में डाकू ददुआ

Uttar Pradesh Crime: अनिमेष की पत्नी की मौत बेटे के पैदा होते समय हुई थी, इसलिए वह बेटे को अपशकुनी मानता था. यही वजह थी कि उस ने बेटे को तो गला दबा कर मार दिया, उस के साथ ढाई साल की बेटी को भी खत्म कर दिया.

3 मार्च, 2016 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के थाना नाका में रोज की ही तरह काम हो रहा था कि दोपहर के 2 बज कर 40 मिनट पर खड़ी लाइन की चेकदार शर्ट पहने सामान्य घर का दिखने वाला 32 साल का एक युवक इंसपेक्टर अनिल कुमार सिंह के कमरे में जा कर उन के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. उस के बाल छोटेछोटे थे, चेहरा गोल और उस पर बेतरतीब दाढ़ी उगी हुई थी. वहां बैठे लोगों को लगा कि यह कोई शिकायत करने आया होगा. लेकिन जब उस से थाने आने का सबब पूछा गया तो उस ने जो जवाब दिया, उसे सुन कर सब सन्न रह गए.

युवक ने चेहरे पर बिना किसी तरह का भाव लाए सीधा और सपाट सा जवाब दिया था, ‘‘साहब, मैं ने अपने 2 बच्चों, 10 महीने के बेटे और ढाई साल की बेटी की गला दबा कर हत्या कर दी है.’’

युवक की बात सुन कर वहां बैठे लोगों में कोई भी सवाल करने की हालत में नहीं रह गया था. इस की वजह यह थी कि यह विश्वास करने लायक बात नहीं थी. इसीलिए तो युवक के पीछे खड़े सिपाही ने उसे डांट कर कहा था, ‘‘क्या बक रहा है, पागल हो गया है क्या?’’

लेकिन इंसपेक्टर अनिल कुमार को लगा कि युवक जो भी कह रहा है, सही कह रहा है. अब तक वह पूरी बात समझ चुके थे. युवक कोई गलत कदम न उठा ले, वह अपनी कुरसी से उठे और युवक के पास पहुंच गए. उस के कंधे पर हाथ रख कर उन्होंने कहा, ‘‘तुम आराम से पूरी बात बताओ, हम से जो हो सकेगा, तुम्हारी मदद करेंगे.’’

‘‘साहब, मेरा नाम अनिमेष वाजपेयी है. मैं स्वास्थ्य विभाग में काम करता हूं और यहीं पास में तिलकनगर कालोनी में किराए के मकान में रहता हूं. करीब 10 महीने पहले मेरी पत्नी सुषमा की मौत उस समय हो गई थी, जब वह अपने दूसरे बच्चे को जन्म दे रही थी. इस समय मेरी बेटी दिवांशी ढाई साल की थी और बेटा 10 महीने का था. मुझे लगता था कि मेरी पत्नी की मौत की वजह मेरा बेटा था. अगर वह न पैदा होता तो मेरी पत्नी की मौत न होती. इसीलिए मैं ने दोनों बच्चों को मार दिया.’’

अनिमेष की पूरी बात सुन कर अनिल कुमार सिंह ने उसे हिरासत में ले लिया. 2 बच्चों की हत्या की बात थी, इसलिए उन्होंने इस बात की जानकारी एसपी (पश्चिमी) सर्वेश मिश्रा और सीओ (बाजारखाला) अभयनाथ त्रिपाठी को दे दी. अनिमेष जिस मोहल्ले में रहता था, वह कोतवाली बाजारखाला के अंतर्गत आता था, इसलिए इस घटना की सूचना थाना बाजारखाला पुलिस को दे दी गई. पुलिस अनिमेष को साथ ले कर उस के घर पहुंची तो देखा दोनों बच्चों की लाशें पहली मंजिल के एक ही कमरे में बैड पर पड़ी थीं.

बच्चों की लाशें देख कर किसी का भी कलेजा फट सकता था. वहां खड़े सभी लोगों का लगभग यही हाल था. मोहल्ले वाले भी दिल दहलाने वाले इस दृश्य को देखने के लिए जुट गए थे. अनिमेष मूलरूप से लखनऊ के ही थाना इटौंजा के गांव कुम्हरावां का रहने वाला था. उस की ससुराल इटौंजा के ही पांडेय टोला में थी. 5 साल पहले उस की शादी सुषमा से हुई थी. अनिमेष लखनऊ के सिल्वर जुबली अस्पताल में औपरेशन थिएटर सहायक के रूप में काम करता था. वह पत्नीबच्चों, पिता अनूप कुमार वाजपेयी, भाई अभिषेक और भाभी श्वेता के साथ रहता था. तिलकनगर के जिस मकान में यह परिवार किराए पर रहता था, वह रिटायर अफसर सरोज तिवारी का था.

ग्राउंड फ्लोर पर सत्यनारायण चौरसिया रहते थे, जबकि पहली मंजिल पर अनिमेष अपने घर वालों के साथ रहता था. मकान मालिक सरोज तिवारी मुंबई में रहते थे. अनिमेष का बड़ा भाई अभिषेक इलाहाबाद में रह कर पीएचडी की तैयारी कर रहा था. समयसमय पर वह घर आता रहता था. अभिषेक और श्वेता को अभी कोई बच्चा नहीं था. वे अनिमेष के ही बच्चों को अपने बच्चों की तरह मानते थे. सुषमा की मौत के बाद अनिमेष के बच्चों की देखभाल उस की भाभी श्वेता ही कर रही थीं. दुधमुंहे बेटे को पालपोस कर 10 महीने का करने में श्वेता की अहम भूमिका थी, क्योंकि अनिमेष शुरू से ही बेटे को पत्नी की मौत का कारण मानता था, इसलिए वह उसे फूटी आंखों नहीं देखना चाहता था.

वह घर में रहता और बच्चे रोने लगते तो पत्नी की मौत का जिम्मेदार मानते हुए वह उन की पिटाई करने लगता था. पत्नी की मौत के बाद बच्चों का खयाल रखने या देखभाल करने के बजाय वह उन की पिटाई करता था. अगर घर का कोई आदमी बच्चों की पिटाई करने से उसे रोकता तो वह उस से झगड़ा करता. इस मामले में वह पिता की भी नहीं सुनता था.

गुरुवार की सुबह बच्चे रोने लगे तो अनिमेष बेरहमी से उन की पिटाई करने लगा. श्वेता ने उसे मना किया तो उस ने गुस्से में कहा, ‘‘तुम्हें क्या पता, इन बच्चों की वजह से मैं कितने तनाव में रहता हूं. इन्होंने अपनी मां को तो मार ही डाला, इसी तरह रोरो कर मुझे भी मार डालेंगे. ये मेरे बच्चे हैं, इसलिए तुम लोगों को इन की चिंता करने की जरूरत नहीं है. इन्हें कैसे रखना है, इन का क्या करना है, यह मेरी जिम्मेदारी है, मैं इन से निपट लूंगा.’’

‘‘मुझे भी पता है कि ये बच्चे तुम्हारे हैं, लेकिन जब तुम इन मासूमों को इस तरह बेरहमी से पीटते हो तो मुझे बड़ी तकलीफ होती है. तुम्हारे बच्चे हैं, तुम इन के साथ कुछ भी कर सकते हो, पर मैं इन्हें इस तरह पिटते नहीं देख सकती.’’ कह कर श्वेता चली गई.

इस के बाद बच्चों को ले कर अनिमेष और श्वेता का आपस में काफी झगड़ा हुआ. श्वेता से जब सहन नहीं हुआ तो वह मायके चली गई. बेटी और बेटा रोधो कर सो गए. अनिमेष उन्हीं के पास बैठा सोचता रहा. उसे लगता था कि इन्हीं बच्चों की वजह से पत्नी मर गई, घर वाले भी अकसर उसे उलटासीधा कहते रहते हैं. इन की वजह से न दिन में चैन मिलता है, न रात में. उस का सुखचैन इन्होंने छीन लिया है. जब तक ये रहेंगे, वह कभी सुखचैन से नहीं रह पाएगा. अगर इन्हें खत्म कर दिया जाए तो सारा झंझट ही खत्म हो जाएगा.

अनिमेष ने वहीं रखा तकिया उठाया और सोते हुए बच्चों के मुंह पर रख कर दबा दिया. मुंह पर तकिया रखा होने की वजह से बच्चे चीख भी नहीं पाए और मर गए. इस तरह 2-2 हत्याएं हो गईं और किसी को पता नहीं चला. इस के बाद उसे लगा, उस ने जो किया है, वह ठीक नहीं है. वह उठा और सीधा थाने चला गया. पुलिस अनिमेष को ले कर घर आई तो मोहल्ले वालों को दोनों बच्चों की हत्या का पता चला. बैड पर दोनों बच्चों की लाशें पड़ी थीं. जिस तकिया से मुंह दबा कर बच्चों की हत्या की गई थी, वह भी वहीं पड़ा था. पुलिस ने अपनी काररवाई कर के दोनों बच्चों की लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और अनिमेष को ला कर थाने में बंद कर दिया.

पोस्टमार्टम के बाद बच्चों की लाशों को लेने के लिए ननिहाल और ददिहाल पक्ष में तनाव हो गया. अंतत लाशों को बच्चों के मामा भानु मिश्रा, अनुराग और शिवम ने अपने कब्जे में ले लिया. वे उन्हें अपने गांव ले गए, जहां उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने अनिमेष को बच्चों की हत्या के आरोप में जेल भेज दिया था. पुलिस का मानना है कि पत्नी की मौत के बाद अनिमेष डिप्रैशन में था. इसी वजह से उस ने बच्चों की हत्या कर दी थी. जबकि अनिमेष की ससुराल वालों का कहना है कि अनिमेष दूसरी करना चाहता था. दोनों बच्चे उसे इस में बाधा लग रहे थे, इसलिए उन की हत्या कर के उस ने इस बाधा को दूर कर दिया है.

जबकि अनिमेष का कहना था कि उस के ये बच्चे अपशकुनी थे, इसलिए उस ने उन्हें मार दिया. लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि अगर बेटा अपशकुनी था तो बेटी को मारने की क्या जरूरत थी. जांच में अनिमेष के खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है कि उसे पागल मान लिया जाए. इस से साफ लगता है कि पत्नी की मौत के बाद अनिमेष अपने बच्चों की परवरिश नहीं करना चाहता था, इसलिए उस ने उन की हत्या कर दी.

शायद वे उसे ऐशोआराम में बाधक लग रहे थे. इसलिए अनिमेष ने उन्हें मार दिया. अब अदालत उसे क्या सजा देगी, यह तो बाद की बात है, लेकिन उस ने अपने जीवन में कांटे तो बो ही लिए हैं. इस की सजा अब उसे इस जीवन में भुगतनी ही होगी. Uttar Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Moradabad Crime: इश्क की नब्ज पकड़तेपकड़ते बना कातिल

Moradabad Crime: झोलाछाप डाक्टर मुबारक अंसारी उर्फ अजय बोस ने फरजी डिग्री की बदौलत लाखों रुपए कमाए. लेकिन औरतों का रसिया होने की वजह से उस ने अपना घर ही नहीं, जिंदगी भी बरबाद कर ली.

मुरादाबाद शहर के थाना मझोला का एक गांव है विशनपुर. इसी गांव का रहने वाला तौफीक रोज की तरह 3 फरवरी, 2016 को भी सुबह अपने खेतों पर गया तो वहां उसे गेहूं के खेत में एक युवती की अधजली लाश दिखाई दी. लाश देख कर वह घबरा गया. उस ने यह बात खेतों में काम कर रहे अन्य लोगों को बताई तो वे भी उस के खेत पर आ गए. वहीं से किसी ने इस बात की जानकारी थाना मझोला पुलिस को दी तो थानाप्रभारी राजेश द्विवेदी तुरंत पुलिस टीम के साथ विशनपुर गांव के लिए रवाना हो गए.

तौफीक के खेत पर पहुंच कर वहां पड़ी लाश का उन्होंने बारीकी से मुआयना किया तो देखा कि युवती का निचला हिस्सा झुलसा हुआ था. देखने से ही लग रहा था, उस पर पैट्रोल डाल कर जलाया गया था. गले में लाल रंग का नाड़ा बंधा था. शायद उसी नाड़े से उस का गला घोंटा गया था. उस के कानों में टौप्स और पैरों में पायल तथा बिछुए थे. उस की उम्र 22-23 साल रही होगी.

लाश के पास बच्चों का एक अधजला कंबल भी पड़ा था. राजेश द्विवेदी ने इस की सूचना उच्चाधिकारियों के अलावा विधि विज्ञान प्रयोगशाला की टीम को भी दे दी थी. कुछ ही देर में विधि विज्ञान प्रयोगशाला की टीम आ गई और सबूत जुटाने लगी. यह सब चल रहा था कि एएसपी अंकित मित्तल और अमानत मान भी वहां पहुंच गए. अधिकारियों ने भी मौकामुआयना कर के वहां मौजूद लोगों से लाश के बारे में पूछताछ की. लेकिन वहां मौजूद कोई भी आदमी उस लाश की शिनाख्त नहीं कर सका. इस के बाद पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

इस ब्लाइंड मर्डर के खुलासे के लिए एसएसपी नितिन तिवारी ने एसपी (सिटी) डा. रामसुरेश यादव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में एएसपी सुजाता सिंह, थानाप्रभारी (मझोला) राजेश द्विवेदी, एसआई सतेंद्र भड़ाना, सुभाष मावी, कांस्टेबल जितेंद्र सिंह तोमर, मुस्तकीम को शामिल किया. हत्यारों का पता लगाने से पहले पुलिस टीम के सामने सब से बड़ी चुनौती यह पता लगाने की थी कि मरने वाली युवती कौन थी और कहां की रहने वाली थी? इस के लिए राजेश द्विवेदी ने उच्चाधिकारियों के निर्देश पर रिक्शे पर लाउडस्पीकर लगवा कर थानाक्षेत्र के सभी गांवों में अज्ञात युवती की लाश मिलने की सूचना प्रसारित कराई. उन्होंने लाश की पहचान करने वाले व्यक्ति को 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा भी की.

लाउडस्पीकर से घोषणा होने से इलाके के ज्यादातर लोगों को उस लाश के बारे में जानकारी मिल चुकी थी. इस का नतीजा यह निकला कि एक आदमी राजेश द्विवेदी के पास आया और बताया कि खुशहालपुर की पुलिस चौकी से थोड़ा आगे अपना क्लिनिक चलाने वाले बंगाली डाक्टर अजय बोस की पत्नी डा. बेबी बोस दिखाई नहीं दे रही है. उन दोनों का अकसर आपस में झगड़ा होता रहता था. राजेश द्विवेदी ने इस सूचना की पुष्टि के लिए एसआई सतेंद्र भड़ाना, कांस्टेबल जितेंद्र सिंह तोमर, मुश्तकीम आदि को लगा दिया. एसआई सतेंद्र भड़ाना ने सब से पहले बंगाली डाक्टर अजय बोस के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि उस का क्लिनिक बहुत अच्छा चलता है. सुबह से ही उस के क्लिनिक पर मरीजों की भीड़ लग जाती थी. इलाके में उस की अच्छी प्रतिष्ठा थी.

इन बातों को देखते हुए बिना सबूत के बंगाली डाक्टर पर हाथ डालना सतेंद्र भड़ाना को उचित नहीं लगा. उन्हें यह भी पता चला था कि उस की पत्नी भी क्लिनिक पर महिला मरीजों को देखती थी, लेकिन इधर वह दिखाई नहीं दे रही थी. वह अचानक कहां चली गई, यह पता नहीं चला. इस बात का पता लगाने के लिए उन्होंने कांस्टेबल जितेंद्र सिंह तोमर को उस के क्लिनिक पर भेजा. कांस्टेबल जितेंद्र सिंह तोमर सादे कपड़ों में बंगाली डाक्टर की क्लिनिक पर पहुंचे तो उस समय तक वह क्लिनिक पर आया नहीं था. क्लिनिक पर जो मरीज आए थे, वे कंपाउंडर से अपना नंबर ले रहे थे.

जितेंद्र सिंह तोमर भी अपना नंबर ले कर डाक्टर के आने का इंतजार करने लगे. कुछ देर बाद डा. अजय बोस आया तो नंबर से मरीजों को देखने लगा. कांस्टेबल जितेंद्र सिंह तोमर का दोपहर 12 बजे के करीब नंबर आया तो डा. अजय बोस ने पूछा, ‘‘आप को क्या परेशानी है?’’

‘‘डाक्टर साहब, परेशानी मुझे नहीं, मेरी बीवी को है. उसे बहुत तेज दर्द हो रहा है. दरअसल वह प्रैग्नेंट है और उस की डिलिवरी का समय नजदीक है. मैं यहीं पास के डिडोरी गांव में रहता हूं. आप की पत्नी डाक्टर हैं. आप उन्हें मेरी पत्नी को देखने भेज देते तो बड़ी मेहरबानी होती. या फिर आप कहें तो मैं पत्नी को यहीं ले आऊं?’’

‘‘भई, अभी मैं आप की कोई मदद नहीं कर सकता, क्योंकि मेरी पत्नी अपने मायके कुशीनगर गई हैं. वह 15-20 दिनों बाद आएंगी. इसलिए आप अपनी पत्नी को कहीं और दिखा दें.’’ डाक्टर ने कहा.

जितेंद्र सिंह तोमर की नजरें डाक्टर बंगाली के चेहरे पर ही टिकी थीं. उस ने देखा कि अपनी बात कहते हुए डाक्टर घबरा रहा था. इस का मतलब कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर थी. उस ने यह बात एसआई सतेंद्र भड़ाना को बताई. इस के बाद उन्होंने अपने अधिकारियों से सलाहमशविरा कर के डा. अजय बोस को हिरासत में ले लिया.

थाने ला कर जब उस से उस की पत्नी बेबी के बारे में पूछा गया तो उस ने बड़ी सहजता से कहा कि वह अपने मायके गई है. वहां उस के किसी रिश्तेदार की शादी है.

‘‘जब शादी उस की रिश्तेदारी में है तो तुम क्यों नहीं गए?’’ राजेश द्विवेदी ने पूछा.

‘‘जाना तो था, पर मेरे जाने से क्लिनिक बंद हो जाता, जिस से मरीजों को परेशानी होती, इसीलिए मैं नहीं गया.’’

‘‘मेरी अपनी पत्नी से बात करा दो, मैं उस से कुछ बात करना चाहता हूं.’’ राजेश द्विवेदी ने कहा तो डाक्टर बंगाली के चेहरे का रंग उड़ गया. वह घबरा कर बोला, ‘‘सर, जल्दबाजी में वह अपना फोन यहीं भूल गई है.’’

इस से राजेश द्विवेदी को लगा कि यह झूठ बोल रहा है. उन्होंने जैसे ही उसे डांटा, वह डर के मारे कांपने लगा. उस ने कहा, ‘‘सर, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई, मैं ने पत्नी को मार कर उस की लाश एक खेत में फेंक दी है.’’

इस के बाद थानाप्रभारी उसे मोर्चरी ले गए, जहां उन्होंने उसे विशनपुर गांव से बरामद महिला की लाश दिखाई तो उस ने कहा कि यह लाश उस की पत्नी बेबी की है, जिसे उस ने पैट्रोल डाल कर जलाने की कोशिश की थी. अजय बोस से पूछताछ में बेबी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी. डा. अजय बोस का असली नाम मुबारक अंसारी था. वह  मूलरूप से उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के कस्बा गौरीशंकर के रहने वाले समीर अंसारी का बेटा था. समीर अंसारी उत्तर प्रदेश जल निगम में सुपरवाइजर हैं. उन की पोस्टिंग कुशीनगर में ही है. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटियां और 2 बेटे थे.

बच्चों में मुबारक अंसारी उर्फ अजय बोस सब से बड़ा था. बारहवीं पास कर के वह कस्बे में ही एक डाक्टर के यहां कंपाउंडरी करने लगा. उसी बीच सबीना मान से उस का विवाह हो गया, जिस से उसे 2 बेटियां हुईं. कुछ दिनों बाद मुबारक अंसारी कस्बे में ही क्लिनिक खोल कर मरीजों को देखने लगा. इस तरह वह झोलाछाप डाक्टर बन गया.

छोटीमोटी बीमारियों की दवाइयां वह जानता था, इसलिए जब लोगों को खांसी, बुखार आदि में फायदा होने लगा तो लोग उस के पास दवा लेने आने लगे. उसी बीच कई महिलाओं से उस के नाजायज संबंध बन गए. उन्हीं में एक थी रुखसाना (बदला हुआ नाम). रुखसाना का पति सऊदी अरब में काम करता था. वह हर महीने वहां से रुखसाना को मोटी रकम भेजता था. मुबारक अंसारी ने इसी का फायदा उठाते हुए बिजनैस के बहाने रुखसाना से साढ़े 3 लाख रुपए ले लिए.

रुखसाना से पहले मुबारक अंसारी के कस्बे की ही रहने वाली बेबी पटेल से नाजायज संबंध थे. बेबी शादीशुदा ही नहीं थी, उस की 7 साल की बेटी भी थी. लेकिन बेबी से उस के संबंध शादी से पहले के थे. बेबी के पिता फेंकू पटेल ने उस की शादी कमउम्र में ही प्रदीप से कर दी थी. शादी के बाद भी बेबी और मुबारक के संबंध चल रहे थे. बेबी के पति प्रदीप को जब उन के संबंधों का पता चला तो उस ने पत्नी को छोड़ दिया. इस के बाद बेबी अपनी बेटी के साथ मायके में रहने लगी. मुबारक रुखसाना से ज्यादा बेबी को चाहता था. यही वजह थी कि 10 जनवरी, 2012 को उस ने बेबी से प्रेम विवाह कर लिया.

चूंकि बेबी ने अपना धर्म बदलने से मना कर दिया था, इसलिए उस के प्यार में अंधा मुबारक अंसारी अपना धर्म बदल कर ईसाई बन गया. इस के बाद वह मुबारक अंसारी से अजय बोस बन गया. बेबी से शादी करने के बाद भी अजय बोस उर्फ मुबारक अंसारी उस से चोरीछिपे ही मिलता था. शादी के बाद भी इस तरह चोरीछिपे मिलना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था, इसलिए वे अपनी अलग गृहस्थी बसाने के लिए 13 मार्च, 2013 को दोनों अपनेअपने घरों से मुरादाबाद भाग आए और खुशहालपुर में किराए का कमरा ले कर रहने लगे. बेबी अपनी बेटी को मांबाप के पास छोड़ आई थी. उस के गायब होने पर उस के पिता फेंकू पटेल ने मुबारक के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी.

अजय बोस उर्फ मुबारक अंसारी के पास रुखसाना से लिए गए साढ़े 3 लाख रुपए थे. वह उन पैसों को भी अपने साथ लाया था, जिन से वह मुरादाबाद में अपनी डाक्टरी की दुकान खोलना चाहता था. इस के लिए उस ने किसी की मार्फत जम्मू से अपने नाम से बीएएमएस की फरजी डिग्री बनवा ली. अजय बोस उर्फ मुबारक अंसारी ने खुशहालपुर रोड, शाहपुर तिगड़ी गांव में महेंद्र प्रताप सिंह का मकान किराए पर ले लिया. यह मकान रोड के किनारे था. इसी में उस ने बंगाली क्लिनिक खोल ली. क्लिनिक पर उस ने अपने नाम और डिग्री के साथ बड़ा सा बोर्ड लगवाया. यही नहीं, उस ने अपनी हाईस्कूल फेल पत्नी बेबी पटेल का नाम भी डा. बेबी बोस स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ के रूप में लिखवा दिया. पत्नी को उस ने कुछ दवाइयों के नाम बता दिए थे, जिन्हें वह महिलाओं को देती थी.

पतिपत्नी दोनों ही डाक्टर के रूप में क्लिनिक पर बैठ कर लोगों की जान से खिलवाड़ करने लगे. मरीजों के देखने की फीस वे ढाई सौ रुपए लेते थे. मरीज को दवाइयां आदि भी वे अपने पास से ही देते थे. धीरेधीरे उन के यहां आने वाले मरीजों की संख्या बढ़ने लगी. अच्छे डाक्टर के रूप में दोनों की इलाके में पहचान हो गई. वे रोजाना 10 से 15 हजार रुपए कमाने लगे. पैसा आया तो अजय कुमार बोस ने विशनपुर गांव के पास 200 गज का एक प्लौट खरीद लिया. यह प्लौट डा. अजय बोस ने अपने असली नाम मुबारक अंसारी और पत्नी बेबी के नाम से खरीदा था.

तथाकथित डा. अजय बोस की पत्नी बेबी बोस की तबीयत अकसर खराब रहने लगी. इस बीच अजय के कुछ अन्य महिलाओं से नाजायज संबंध बन गए. बेबी को जब इस बात की जानकारी हुई तो वह पति से झगड़ा करने लगी. अजय संबंध तोड़ने के बजाय उन महिलाओं पर पानी की तरह पैसा बहाने लगा. पत्नी इस का विरोध करती तो वह उसे डांटता और झगड़ा करने लगता. इस तरह घर में रोजरोज किचकिच होने लगी.

एक महिला से अजय की नजदीकियां इतनी बढ़ गई थीं कि वह उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर घुमाताफिरता था. बेबी जब उस महिला को पति के साथ देखती तो उस का खून खौल उठता. जाहिर है, कोई भी महिला यह सब कतई नहीं बरदाश्त कर सकती. अजय को जब लगने लगा कि उस की पत्नी उस के प्यार में रोड़ा बन रही है तो वह उसे ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. काफी सोचविचार कर उस ने अकेले ही पत्नी बेबी को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली.

योजना के अनुसार, 15 दिसंबर, 2015 को वह पत्नी को मोटरसाइकिल से ले कर कुशीनगर के लिए चल पड़ा. चलने से पहले उस ने कंपाउंडर से कहा था कि कुशीनगर में उस के यहां एक पारिवारिक समारोह है, जिस से वह हफ्ता बाद लौटेगा, तब तक वह उस के क्लिनिक का खयाल रखेगा. अजय ने सोचा था कि रास्ते में कहीं मौका मिलने पर वह पत्नी को ठिकाने लगा देगा, लेकिन उसे कहीं मौका नहीं मिला. 10 दिनों तक वह अपने घर में रुक कर 26 दिसंबर को पत्नी के साथ मुरादाबाद लौट आया.

इस के बाद पहली फरवरी, 2016 की शाम अजय बोस देर रात घर लौटा तो पत्नी बेबी बोस ने उस से देर से आने की वजह पूछी. वह कुछ नहीं बोला तो उस ने कहा, ‘‘तुम जरूर उसी औरत के साथ मौजमस्ती कर के आ रहे हो.’’

इसी बात पर दोनों के बीच झगड़ा शुरू हुआ तो बढ़ता ही गया. बात मारपीट तक पहुंच गई. मारपीट के दौरान अजय ने अपने लोअर का नाड़ा निकाल कर बेबी के गले में डाल कर कस दिया, जिस से दम घुटने से उस की मौत हो गई. उस ने लाश को पलंग पर लेटा कर चादर ओढ़ा दी. इस के बाद वह पूरी रात लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनाता रहा. यही सोचतेसोचते दिन निकल आया. 2 फरवरी, 2016 को रोजाना की तरह तैयार हो कर वह अपने क्लिनिक पर गया. पूरे दिन उस ने मरीज देखे. शाम को क्लिनिक बंद कर के वह अपने कमरे पर आ गया. रात करीब 10 बजे उस ने लाश को कंबल व चादर में लपेट कर गठरी बना ली. उसे मोटरसाइकिल पर साइकिल के ट्यूब से बांध कर एक केन में पैट्रोल ले कर चल पडा़.

करीब 4 किलोमीटर दूर विशनपुर गांव के नजदीक एक गेहूं के खेत में लाश ले कर पहुंचा. वह खेत तौफीक का था. घासफूस इकट्ठा कर के लाश के ऊपर रखा और साथ लाया पैट्रोल डाल कर आग लगा दी. लाश को ठिकाने लगा कर वह घर लौट आया. उस ने सोचा था कि लाश जल कर नष्ट हो जाएगी और पुलिस उस के पास तक नहीं पहुंच सकेगी. लेकिन कुछ ही देर में पैट्रोल जल गया. लाश अधजली रह गई और उसी के सहारे पुलिस उस के पास तक पहुंच गई.

तथाकथित डा. अजय बोस उर्फ मुबारक अंसारी से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर पल्सर मोटरसाइकिल बरामद कर ली. इस के बाद उसे न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे मुरादाबाद की जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था.

मुबारक अंसारी बेहद शातिर दिमाग था, तभी तो गलत कामों में अपना दिमाग खपाता रहा, अगर वह गलत काम के बजाय अपना दिमाग किसी अच्छे काम में लगाता तो हत्या जैसा अपराध करने की नौबत न आती और उस की जिंदगी शादीशुदा पत्नी सबीना मान के साथ हंसीखुशी से गुजर रही होती. यह सत्य है कि बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है. Moradabad Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Story: सरिता नायर – अजबगजब का अफसाना

True Crime Story: एक साधारण परिवार की सरिता नायर ने अपनी महत्वाकांक्षाओं की खातिर बड़ेबड़े लोगों तक पहुंच बनाई. यहां तक कि केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी भी उस की पहुंच से परे नहीं थे. लेकिन इस सब से सरिता नायर को जिल्लत की जिंदगी के अलावा क्या मिला?

कहानी शुरू होती है 1994 से. केरल प्रांत के चेनगन्नूर के शिक्षा विभाग कार्यालय परिसर में एक आयोजन किया जा रहा था, जिस में इस जिले के एक छोटे से गांव की एक लड़की को सम्मानित किया जाना था. उस लड़की की खूबी यह थी कि वह 10वीं क्लास में गांव के स्कूल में अव्वल आई थी और उस का नाम जिले के टौप 10 बच्चों की सूची में था. उस लड़की के साथ एक बड़ी त्रासदी यह हुई थी कि परीक्षा शुरू होने से 2 दिन पहले अचानक उस के पिता का देहांत हो गया था, हालांकि उस दिन सुबह तक वह पूरी तरह स्वस्थ थे.

पिता की मौत उस लड़की के लिए किसी बड़े हादसे से कम नहीं थी. फिर भी उस ने हौसला बरकरार रखते हुए परीक्षाएं दे कर एक मिसाल कायम की थी. इस परीक्षा में उस ने 600 में से 538 (करीब 90 प्रतिशत) अंक हासिल किए थे. उस क्षेत्र  में यह एक कीर्तिमान था. उन दिनों बोर्ड की परीक्षा में इतने अंक हासिल करना किसी आश्चर्य से कम नहीं था. वैसे भी उस लड़की ने विपरीत परिस्थिति में परीक्षा दी थी. शिक्षा विभाग के इस आयोजन में कांग्रेस विधायक सोभना जौर्ज मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे. उन्होंने अपने अभिभाषण में उस लड़की की प्रशंसा करते हुए अन्य विद्यार्थियों को उस से प्रेरणा लेने को कहा था.

वह बच्ची को अपनी जेब से नकद पुरस्कार देने को भी बेताब थे, लेकिन लड़की ने पैसा लेने से इनकार करते हुए कहा था कि उसे केवल बड़ों का आशीर्वाद चाहिए, यही उस के लिए सब से बड़ा पुरस्कार होगा. इस बात पर उस की बहुत सराहना हुई थी. इस की वजह यह थी कि उस का संबंध एक गरीब परिवार से था. वह नायर सर्विस सोसायटी के एक छोटे से फ्लैट में रहती थी. उस के पिता सोमाशेखरन नायर इस सोसायटी के औफिस में क्लर्क थे. यहां से मिलने वाली साधारण सी तनख्वाह से वह जैसेतैसे घर का खर्च चलाते थे. लड़की के परिवार में एक छोटी बहन और मां इंदिरा नायर थीं.

पति की मौत के कुछ दिनों बाद इंदिरा ने परिवार की गुजरबसर करने के लिए स्कूली बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के अलावा एक प्राइवेट  फाइनैंस कंपनी में एकाउंटैंट की नौकरी कर ली थी. दुनिया में 2 बेटियों के अलावा उन का अपना कोई नहीं था. उन्हें खुशी केवल इस बात की थी कि उन की दोनों बेटियां पढ़ाई में होशियार थीं. उन की बड़ी बेटी ने तो दसवीं में एक कीर्तिमान स्थापित किया था.

शिक्षा विभाग के आयोजन के अलावा नायर सर्विस सोसाइटी के पदाधिकारियों और उस सेंट एन्जींस स्कूल वालों ने भी लड़की को सम्मानित किया था, जहां वह पढ़ती थी. स्कूल में संपन्न आयोजन में प्रिंसिपल से ले कर अध्यापिकाओं तक ने उस लडकी को अपनी प्रिय विद्यार्थी कहते हुए घोषणा की थी कि वह जिंदगी में बहुत ऊंचाई पर जा कर अपने परिवार के अलावा इस स्कूल का भी नाम रोशन करेगी. अधिकांश अध्यापिकाओं ने उसे बांहों में भर कर इस तरह अपनत्व जताने की कोशिश की थी कि जैसे वह उन की स्टूडैंट न हो कर बेटी या बहन हो.

अब 22 साल बाद सरिता नायर नाम की वह लड़की 38 वर्ष की प्रौढ़ महिला बन चुकी है. इस बीच उस की जिंदगी में सब कुछ बदल  गया है. कह सकते हैं कि सब उथलपुथल हो चुका है. आज उसी के इलाके के लोग उस के बारे में बात करने से कतराते हैं. उस पर अपनत्व की बौछार करने वाली अध्यापिकाएं उसे पहचानने से इनकार करती हैं. 90 प्रतिशत  अंक लाने वाली इलाके की उस पहली लड़की के बारे में याद दिलाने पर भी कुछ याद न आने का अभिनय करती हैं.

दरअसल, ये लोग अब यह सोच कर भयभीत हो जाते हैं कि कहीं जांच एजेंसियां उन के बारे में यह धारणा न बना लें कि वे आज भी सरिता नायर के संपर्क में हैं. उन्हें डर है कि सरिता नायर के बारे में कुछ बोलने से वे बैठेबिठाए नाहक झमेले में उलझ सकती हैं. इस की वजह यह है कि सरिता नायर ने पिछले कुछ सालों से न केवल केरल के कई मंत्रियों और राजनेताओं, यहां तक कि कई पुलिस अधिकारियों को भी अपने निशाने पर ले रखा था, केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी के लिए भी वह खतरा बनी हुई थी. इन लोगों के खिलाफ मीडिया में रोजाना ही उस के बयान आ रहे थे. फिर वह खुद भी जेल की हवा खा चुकी थी. अपने बच्चों को भी उस ने  जेल में ही जन्म दिया था.

सरिता नायर की इस बदली जिंदगी के बारे में जानने के लिए हमें फिर से उसी मुकाम पर लौटना पड़ेगा, जब उस के पिता सोमाशेखरन का अचानक देहांत हुआ था और सरिता ने करीब 90 प्रतिशत अंकों के साथ दसवीं पास  कर के वाहवाही बटोरी थी. सरिता को बताया गया था कि उस के पिता की मौत हार्टअटैक से हुई थी. बाद में यह बात भी उड़ी कि नौकरी के दौरान उन पर पैसों की हेराफेरी का आरोप लगा था, जिस से परेशान हो कर उन्होंने आत्महत्या कर ली थी. सरिता ने इस सब की गहराई में जाने की कोशिश की थी, लेकिन वह किसी भी पुख्ता नतीजे पर नहीं पहुंच पाई थी.

मां इंदिरा तो अपनी दोनों बेटियों की परवरिश के लिए मेहनत करने में ही इतनी व्यस्त हो गई थीं कि उन के पास कुछ सोचने या करने का वक्त ही नहीं था. वह किसी भी तरह अपनी बेटियों को पढ़ालिखा कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती थीं. सरिता ने यप 1996 में चेनगन्नूर के क्रिश्चियन कौलेज से अपनी प्री-डिग्री (12वीं कक्षा) की पढ़ाई खत्म की. इस के बाद कोई प्रोफैशनल कोर्स कर के उस ने नौकरी हासिल करने की सोची. लेकिन प्रोफैशनल कोर्स महंगे थे. इंदिरा की इतनी हैसियत नहीं थी कि ऐसे किसी कोर्स में बेटी को दाखिला दिलवा देती.

इस पर सरिता ने थिरूवानानाथापुरम के पास अपने ननिहाल नैय्याटिंकारा के पौलिटेक्निक कौलेज में इंजीनियरिंग करने के लिए दाखिला ले लिया. बाद में उस ने यहां से पढ़ाई छोड़ दी और धानुवाथारापुरम के वीटीएमएनएसएस कालेज में पढ़ने लगी. यहां के लड़के उस से दोस्ती करने को लालायित रहते थे, लेकिन उस ने किसी को अपने नजदीक नहीं आने दिया. जवान होतेहोते सरिता खूब स्मार्ट हो गई थी. उस की कदकाठी भी बढि़या थी. अब वह फर्राटेदार अंग्रेजी भी बोलने लगी थी. पढ़ाई में वह अब भी तेज थी. कौलेज के किसी लड़के में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह उस का रास्ता रोक ले या उस से किसी तरह की बदतमीजी करने की हिमाकत करे.

उन दिनों कालेज कैंपस में राजनीति जोरों पर थी. विद्यार्थी अलगअलग खेमों में बंटे हुए थे. सरिता की किसी खेमे में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह आजाद घूमती थी. बस से कालेज आतीजाती थी. आखिर में उस के बारे में यही सोच लिया गया कि वह अलग किस्म की घमंडी लड़की है, जिसे किसी के साथ दोस्ती में कोई रुचि नहीं है, खासकर लड़कों से. शायद मौजमस्ती की लाइफ से उसे परहेज था. तभी एक दिन एक लड़का सरिता को मोटरसाइकिल पर कालेज छोड़ने आया. उन दिनों उस इलाके में किसी के पास मोटरसाइकिल होना धनाढ्य होने की निशानी थी. इस से कालेज के लड़कों को सरिता के चरित्र पर संदेह हुआ. उन्हें लगा कि वह एकदम छिपी रुस्तम है, जो कालेज में किसी को नजदीक नहीं फटकने देती, लेकिन बाहर किसी अमीरजादे से रिश्ता बनाए हुए थी.

विद्यार्थियों को हैरान करने और जलती पर घी का काम करने वाली बात तब सामने आई, जब सरिता ने अचानक वहां से पढ़ाई बीच में छोड़ कर एक सर्टिफिकेट प्रोग्रामिंग कोर्स करना शुरू कर दिया. यह एक महंगा प्रोफैशनल कोर्स था. इस कोर्स के बाद उसे ढाई लाख रुपए सलाना पैकेज की सैलरी पर कतर एयरलाइंस में एयर होस्टेस की नौकरी मिल गई.

सरिता के पिता की मौत के बाद उस के दूर के रिश्ते के एक अंकल इस परिवार के सुखदुख का ध्यान रखने लगे थे. घर की हर बात के लिए इंदिरा उन से हर तरह की सलाह लिया करती थी. सरिता की एयर होस्टेस की नौकरी की बात बताते हुए इंदिरा ने जब उन से सलाह मांगी तो उन्होंने इस नौकरी पर सख्त ऐतराज जताया. उन का कहना था कि एयर होस्टेस को शर्मनाक कपड़े पहनने पड़ते हैं, जो शरीफ घरों की लड़कियों को शोभा नहीं देते. इस पर सरिता ने गुस्से में आ कर अपौइंटमैंट लैटर फाड़ कर फेंक दिया.

उन अंकल ने प्रयास कर के सरिता की शादी खाड़ी देश में रहने वाले एक शख्स से करवा दी. उन दिनों वह भारत आया हुआ था. कुछ वक्त सरिता के साथ बिताने के बाद वह जल्दी ही उसे अपने पास बुलाने का वादा कर के वापस चला गया. लेकिन बाद में वह सरिता पर कई तरह के आरोप लगा कर उसे तलाक देने की बात कहने लगा.

सरिता फिर से अकेली हो गई थी. अब उस पर एक तरह से बेचारी का ठप्पा लग गया था. लेकिन सरिता ने किसी बात की परवाह न कर के एरनाकुलम की एक प्रसिद्ध शेयर ट्रैडिंग कंपनी में नौकरी कर ली. सरिता बनसंवर कर सलीके से रहती थी. उस के व्यक्तित्व में पहले से कहीं अधिक निखार आ गया था. उस का बातचीत का अंदाज भी बहुत अच्छा था. फर्राटेदार अंग्रेजी उस के व्यक्तित्व पर खूब फबती थी. अपनी नौकरी से जुड़ी हर जिम्मेदारी को वह अच्छी तरह समझती थी और बखूबी निभाती थी.

उस का पति उस से रिश्ता खत्म करने पर तुला था. अब सरिता के बारे में यह कहना शुरू कर दिया कि उस के कई लोगों से अनैतिक संबंध थे. आखिर सरिता ने भी उस पति से रिश्ता खत्म करने का मन बना लिया. दोनों के बीच तलाक की काररवाई शुरू हो गई. जिस फर्म में सरिता नौकरी करती थी, उस के एक मुलाजिम पोरिंजू वेलियाथ ने अपनी एक अलग कंपनी खोल ली थी. वह सरिता को बहुत पसंद करता था और उस की खूबियों से प्रभावित था. वह चाहता था कि वह उस की कंपनी में नौकरी कर ले. सरिता ने पिछली नौकरी छोड़ कर पोरिंजू की फर्म में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी कर ली.

जल्दी ही उस का इस नौकरी से मन भर गया और उस ने यहां से रिजाइन कर के पाथानामथिट्टा के नजदीक कोजैनचैरी स्थित केरल फाइनैंस कार्पोरेशन लिमिटेड कंपनी में सहायक ब्रांच मैनेजर की नौकरी कर ली. यहां वह पहले से भी अधिक कुशल कर्मचारी साबित हुई. उस ने कंपनी के लिए बेतहाशा निवेशक जुटाने में अहम भूमिका निभाई. लेकिन उन्हीं दिनों शराब की एक दुकान के मालिक के साथ उस का नाम जुड़ने की अफवाहें उड़ने लगीं.

वह आदमी था बीजू राधाकृष्णन, जो पहले से शादीशुदा था. वह शराब का अपना छोटामोटा कारोबार करने के अलावा उसी फर्म में नौकरी भी करता था, जहां सरिता नौकरी करती थी. सरिता और राधाकृष्णन दोनों एकदूसरे को पसंद करते थे. धीरेधीरे दोनों की नजदीकियां बढ़ती गईं. तब तक सरिता को बीजू के शादीशुदा होने की बात मालूम नहीं थी.

सन 2003 में सरिता और बीजू ने नौकरी छोड़ कर कम ब्याज पर ऋण देने के औफर के साथ क्रेडिट फाइनैंस शौप नाम से अपनी फर्म खोल ली. अभी यह धंधा जम भी न पाया था कि केरल फाइनैंस कार्पोरेशन लिमिटेड कंपनी ने सरिता के खिलाफ उन के यहां नौकरी करने के दौरान घपला करने का केस दर्ज करा दिया. बाद में पता चला कि उसे फंसाने के पीछे बीजू का हाथ था. इस से बीजू व सरिता के संबंधों में दरार आने लगी.

सन 2005 में एक दैनिक अखबार में सरिता नायर से संबंधित एक सनसनीखेज खबर छपी. खबर के अनुसार, सरिता के एक पुलिस अधिकारी से नजदीकी संबंध थे, जिन का वह भरपूर लाभ उठा रही थी. उसी अधिकारी के प्रभाव की वजह से वह लोगों को बेवकूफ बना कर उन की खूनपसीने की कमाई ऐंठ लेती थी. जबकि सरिता के अनुसार ऐसा कुछ नहीं था, बल्कि यह उसे फंसाने और बदनाम करने की साजिश थी. सरिता को इस के पीछे भी बीजू का ही दिमाग काम करता नजर आया.

सरिता ने गहराई में जाने की कोशिश की तो उसे पता चला कि बीजू ने उस से शादी करने के चक्कर में अपनी पत्नी की हत्या कर के उसे आत्महत्या का रूप दे दिया था. इस बीच वह सरिता के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहता रहा था. अब जब उस के एक फिल्म एक्ट्रैस से संबंध बन गए थे तो वह सरिता को अपने रास्ते से हटाने की कोशिश करने लगा था. अंतत: सरिता ने बीजू के खिलाफ पुलिस में लिखित शिकायत कर दी. इस पर विधिवत छानबीन शुरू हो गई.

उन्हीं दिनों सरिता ने आत्महत्या करने की भी कोशिश की. दरअसल वह अपने बारे में स्थानीय अखबारों में छपने वाली झूठी खबरों से परेशान हो गई थी. तब तक उस का अपने पति से तलाक भी हो चुका था. दूसरी ओर बीजू ने यह बात उड़ानी शुरू कर दी थी कि उस की पत्नी रेशमी ने सरिता नायर से परेशान हो कर आत्महत्या की थी. आखिर एक दिन सरिता ने कोजैनचैरी को अलविदा कहते हुए एरनाकुलम के एक काल सेंटर में नौकरी कर ली. यहां उसे एचएसबीसी बैंक के क्रैडिट कार्ड बनवाने के संबंध में लोगों से फोन पर संपर्क करने का काम मिला था. एरनाकुलम में उस का मन नहीं लगा तो उस ने निवेदन कर के अपना तबादला तिरुवनंतपुरम करवा लिया. यह सन 2006 की बात है.

दरअसल, अब वह एक तरह से बीजू से डरने लगी थी. लेकिन वह यहां भी एक दिन अपने गुंडों को ले कर आ धमका और सरिता से बोला, ‘‘तू अगर चाहती है कि तेरी जिंदगी सलामत रहे तो सीधेसीधे मेरा वह 5 लाख रुपया वापस कर दे, जो तूने मुझ से उधार ले रखा है. मेरे खिलाफ तू कितनी भी शिकायतें करती रह, मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला.’’

बकौल सरिता उस ने बीजू से कभी कोई पैसा नहीं लिया था. दरअसल वह उस पर इस तरह का आरोप लगा कर उसे भयभीत करना चाहता था, ताकि वह उस के खिलाफ पुलिस में की गई अपनी शिकायत वापस ले ले. बहरहाल, जो भी हुआ हो, उन दोनों का आपस में समझौता हो गया. उन्हीं दिनों सोलर एनर्जी प्रोजैक्ट को ले कर व्यापारियों के बीच काफी खुसरफुसर चल रही थी. सरकारी मदद से बड़े स्तर पर जो प्रोजैक्ट शुरू किए जाते हैं, उन में शुरू में लोगों को बहुत फायदा पहुंचने की गुंजाइश होती है. बीजू राधाकृष्णन और सरिता नायर ने भी इस सुनहरे अवसर का फायदा उठाने की सोची.

सन 2007 में बीजू राधाकृष्णन और सरिता नायर ने आईसीएमएस नाम से अपनी सोलर इक्विपमैंट कंपनी रजिस्टर करवा ली, साथ ही इन लोगों ने तिरुवनंतपुरम में कंपनी का औफिस भी खोल लिया. बीजू के अनुसार उस की सब से बड़ी ताकत उस के वे दोस्त थे, जिन की सीधी पहुंच सरकार तक थी. इन में कुछेक  मंत्रियों के बेटे वगैरह भी थे. सोलर प्रोजैक्ट के नाम पर फूलप्रूफ व्यवस्था का मुलम्मा चढ़ा कर इन लोगों ने आम लोगों से बहुत पैसा खींचा. आखिर इन लोगों के खिलाफ लोगों की शिकायत पर पुलिस ने धोखाधड़ी का केस दर्ज कर बीजू राधाकृष्णन व सरिता को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. गिरफ्तारी के वक्त सरिता 8 महीने की गर्भवती थी.

पूछताछ के वक्त उस ने पुलिस को बताया था कि उस के एक राजनेता से संबंध थे, जिस से वह गर्भवती हो गई थी. बाद में उस ने अपनी न्यायिक हिरासत के दौरान जेल में ही एक बेटे को जन्म दिया था. यहां जब उस से उस बच्चे के पिता का नाम पूछा गया था तो उस ने यह कहते हुए नाम बताने से इनकार कर दिया था कि यह उस की राइट टू प्राइवेसी का मामला है, इसलिए उसे बच्चे के पिता का नाम बताने के लिए मजबूर न किया जाए. खैर, जल्दी ही बीजू की जमानत हो गई और वह जेल से बाहर आ गया. जबकि सरिता को इस के बाद 6 महीनों तक जेल में ही रहना पड़ा था. बाद में उस की जमानत बीजू के प्रयासों से ही हो सकी थी.

केस चलता रहा, धीरेधीरे मामला ठंडा पड़ता गया. वक्त अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता गया. बीजू और सरिता के बीच संबंध बनतेबिगड़ते रहे. सन 2011 में केंद्र सरकार की ओर से जवाहर लाल नेहरू नैशनल सोलर मिशन योजना के तहत इच्छुक लोगों को इस मिशन का हिस्सा बनने के एवज में भारी ग्रांट देने की घोषणा हुई. इस मुद्दे पर बीजू और सरिता एक बार फिर साथसाथ हो गए. इस बार उन्होंने पुराना नाम रद्द कर के कंपनी का नया नाम रखा ‘टीम सोलर’.

सरिता नायर फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करने में माहिर थी. हालांकि वह किसी से कोई ठगी करना नहीं चाहती थी. लेकिन उस की इस कला और प्रभावशाली व्यक्तित्व से सामने वाला उस की बात मानने को मजबूर हो जाता था. बकौल सरिता अकेला बीजू ही ऐसा था, जिस के सामने न जाने क्यों उसे घुटने टेकने पड़े थे और वह हर तरह से उस का शोषण करता रहा था.

सरिता के बताए अनुसार, अपनी इस खूबी के सहारे उस ने तमाम बडे़बड़े लोगों से संपर्क बना लिए थे, जिन में कई पुलिस अधिकारियों, मंत्रियों और यहां तक कि मुख्यमंत्री ओमन चांडी तक शामिल थे. इन लोगों के यहां उसे बिना किसी औपचारिकता के आनेजाने की आजादी थी. वहां उसे सब पहचानते थे. न कोई उसे मुख्यमंत्री के औफिस में जाने से रोकता था न ही उस के लिए उन के निवास में प्रवेश करने पर कोई पाबंदी थी.

बकौल सरिता, इस के बावजूद सोलर मिशन से संबंधित ग्रांट देने के लिए मुख्यमंत्री ने 7 करोड़ की रिश्वत मांगी थी, जबकि पावर मिनिस्टर आर्यादन मोहम्मद ने अलग से 2 करोड़ रुपए की मांग की थी. सरिता के मुताबिक, तब उस ने 1.9 करोड़ रुपए  मुख्यमंत्री चांडी के सहायक थौमस कुरुविला को दिए थे और 40 लाख रुपए ले जा कर मोहम्मद के सैके्रट्री केसावान के हाथ पर रखे थे. लेकिन इन लोगों का साफ कहना है कि उन्होंने सरिता से कभी कोई रुपया नहीं लिया. वह झूठ बोल रही है. पता नहीं किस के इशारे पर वह उन्हें बदनाम करने के लिए इस तरह की मक्कारी भरा खेल खेल रही है.

सरिता के बताए अनुसार, रिश्वत में इतनी बड़ी रकम देने के बाद उसे पूरा विश्वास था कि उस का यह काम हो जाएगा. लेकिन उस का टैंडर ही गायब कर दिया गया. सरकारी ग्रांट मिलने का तो अब सवाल ही नहीं रह गया था. सरिता का ताश का महल भरभरा कर गिर चुका था. जिन लोगों ने इन के प्रोजैक्ट में पैसे लगाए थे, वे इन के विरुद्ध आ खड़े हुए. आखिर उन लोगों की शिकायत पर आपराधिक मामला दर्ज हुआ और जून, 2013 में सरिता नायर व बीजू राधाकृष्णन फिर से गिरफ्तार हो कर सलाखों के पीछे पहुंच गए.

सरिता के मुताबिक थिरुवानानाथापुरम के नजदीक जो जेल है, उसी में बैठ कर उस ने एक चिट्ठी लिखी. उस में उस ने उन तमाम अतिमहत्त्वपूर्ण लोगों के नाम दिए, जिन्होंने सोलर बिजनैस कौंट्रेक्ट दिलवाने के प्रौमिस के एवज में उस से शारीरिक संबंध बनाए थे. उपरोक्त 42 पृष्ठों की चिट्ठी में 13 वीआईपी लोगों के अलावा एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का भी जिक्र था. हर व्यक्ति के बारे में सरिता ने विस्तारपूर्वक खुलासा किया था कि किस वादे के एवज में किस तारीख को और कहां उस का जिस्म नोचा गया था.

बकौल सरिता, वह अपने इस पत्र को मूल आकार में रिलीज करना चाहती थी, लेकिन एक जेल अधिकारी ने उसे समझाया और कांटछांट कर के इसे 4 पन्नों का बनवा दिया था. बीजू के अनुसार, इस से संबंधित एक सीडी उस के पास है. बीजू राधाकृष्णन द्वारा अपनी पत्नी की हत्या करने के सबूत भी पुलिस के हाथ लग गए थे. इस अपराध में उस की मां का शामिल होना भी पाया गया था. रेशमी हत्याकांड में उन पर केस चलाया गया. सन 2006 में हुए इस मर्डर का फैसला जनवरी, 2014 में आया, जिस के तहत बीजू व उस की मां को उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

टीम सोलर के घपलों और सरिता नायर के गंभीर आरोपों के सिलसिले में सोलर कमीशन बना कर इस की व्यापक न्यायिक जांच पहले ही शुरू हो चुकी थी. इस जांच में एक से एक सनसनीखेज तथ्य सामने आ रहे हैं. इस सिलसिले में मुख्यमंत्री ओमन चांडी के गनमैन सलीमराज को गिरफ्तार करने के अलावा कई सरकारी उच्च अधिकारियों को नौकरी से निलंबित भी किया गया है. चांडी के खिलाफ सबूतों में सरिता ने उन नेताओं की रिकौर्डिंग भी कमीशन के हवाले की है, जिस में वे उसे चांडी के हक में बयान देने की बात समझा रहे हैं. मुख्यमंत्री ओमन चांडी इस सिलसिले में खुद को और अपनी सरकार को बचाने की जीतोड़ कोशिश कर रहे थे, जबकि सरिता नायर को आधार बना कर उन पर विपक्ष  के ताबड़तोड़ हमले जारी थे.

पहले सरिता, फिर नंदनी, फिर लक्ष्मी और अंत में फिर से सरिता नायर के रूप में आ कर इस अलग सी महिला ने जिंदगी से हर तरह की जंग लड़ने की ठान ली है. लड़के के बाद एक लड़की को भी उस ने जेल में ही जन्म दिया था. उस के ये दोनों बच्चे उस की मां की देखरेख में पल रहे हैं. जेल से जमानत पर छूटने के बाद सरिता नायर ने अपने खिलाफ लगे आरोपों को दरकिनार कर, अपनी जिंदगी का एक नया अध्याय लिखना शुरू कर दिया है. अपने को संगीत की दुनिया से जोड़ते हुए उस ने क्रिश्चियनैटी व हिंदुत्व के धार्मिक गीतों की 4 म्यूजिक एलबम निकाली हैं. 4 फिल्मों में काम करने का अनुबंध भी उस ने किया है. इन में एक फिल्म में वह महिला पुलिस अधिकारी का किरदार निभा रही है.

उस का कहना है, ‘‘मैं एक ऐसा डूबता जहाज हूं, जो कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे से टकराने की भूल कर के अपने आस्तित्व को डांवाडोल करता रहा. मैं हरेक पर भरोसा कर के गलती पर गलती करती गई. मैं नहीं चाहती कि कोई मुझे मेरी गलती के लिए माफी दे. जहां भी मैं गलत साबित हो जाऊं, मुझे मेरे कुसूर की बराबर सजा दी जाए.

‘‘मैं हंसतेहंसते यह सजा कबूल करूंगी और इस सजा के खिलाफ अपील करने की सोचूंगी भी नहीं. लेकिन मुझे चिंता है अपने दोनों बच्चों के भविष्य की. आगे मुझे जो भी वक्त मिलेगा, मैं उस का सदुपयोग कर के अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने की कोशिश करूंगी. फिल्में करूं या एलबम रिलीज करूं, करूंगी सब पैसा कमाने के लिए ही.’’

सराह जोसेफ मलयालम लेखक और एक्टिविस्ट हैं. सरिता नायर पर की गई उन की टिप्पणी के अनुसार, वह एक ऐसी महिला है, जो सिस्टम की पहचान अपने तरीके से करने की कोशिश कर के भ्रष्ट राजनीतिज्ञों का इस्तेमाल करने की सोच बैठी थी. लेकिन उन्होंने न केवल उस से मोटी रिश्वत खाई, उस का जिस्मानी शोषण भी किया. इस लिहाज से वे सरिता नायर से भी बड़े अपराधी हैं. सरिता ने इन्हें एक्सपोज करने का साहस दिखाया है. True Crime Story

 

Social Media Crime: सोशल मीडिया से मोहब्बत, फिर मर्डर

Social Media Crime: सोशल मीडिया की साइट फेसबुक द्वारा हुई दोस्ती में सच्चाई कम झूठ ज्यादा होता है. फिर भी यह लोगों को इतना आकर्षित करती है कि वे अपनी दोस्ती को रिश्ते में बदलने को तैयार हो जाते हैं. ऐसे में जब सच्चाई सामने आती है तो निश्चित है अपराध होगा ही.

बंगलुरु के काडुगोडी पौश एरिया स्थित महावीर किंग्ज अपार्टमेंट के गेट पर जिस समय सुखवीर पहुंचा, दोपहर के सवा 12 बज रहे थे. सिक्योरिटी वालों ने जब उस से पूछा कि वह किस से मिलने आया है तो उस ने कहा, ‘‘मैं अपार्टमैंट में चौथी मंजिल पर रहने वाली कुसुम सिंगला से मिलने आया हूं. मैं उन का नजदीकी रिश्तेदार हूं और हरियाणा से आया हूं.’’

सिक्योरिटी गार्डों ने यह सूचना इंटरकौम द्वारा चौथी मंजिल पर स्थित फ्लैट में रहने वाली कुसुम सिंगला को दी तो उन्होंने कहा, ‘‘उन्हें बिठाओ, मैं खुद उन्हें लेने नीचे आ रही हूं.’’

कुछ देर बाद आकर्षक व्यक्तित्व वाली कुसुम अपौर्टमैंट के गेट पर बने सिक्योरिटी कक्ष में पहुंची तो उस के हावभाव से ही लगा कि उस से मिलने आने वाले इस आदमी से वह पहली बार मिल रही हैं, क्योंकि उस ने उसे पहचानने की कोशिश करते हुए पूछा था, ‘‘मिस्टर सुखवीर सिंह?’’

आगंतुक, जिसे कुसुम ने सुखवीर कहा था, उठ कर अपना हाथ उस की ओर बढ़ाते हुए कहा था, ‘‘जी आप मिस कुसुम सिंगला?’’

कुसुम सिंगला ने उस का हाथ अपने हाथ में ले कर जिस तरह गर्मजोशी से दबाया था, उसे देख कर सिक्योरिटी वालों को लगा था कि आगंतुक मैडम का कोई खास ही है. इस के बाद उन्होंने सुखवीर से उस के बारे में पूछ कर सिक्योरिटी कक्ष में रखे विजिटर रजिस्टर में लिखा और अपने चौथी मंजिल स्थित फ्लैट में जाने के लिए उस के साथ लिफ्ट की ओर बढ़ गई. दरअसल, पंजाब की रहने वाली कुसुम सिंगला को फेसबुक द्वारा दोस्त बनाने का शौक था. इस की वजह यह थी कि वह अकेली थीं. इन्हीं दोस्तों से चैटिंग कर के वह अपना खाली समय बिताती थीं. यही वजह थी कि जिस किसी ने भी उन्हें फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी, उन्होंने बेझिझक स्वीकार कर ली.

शायद यही कारण था कि जब 31 दिसंबर, 2015 की रात उन्होंने अपना फेसबुक चैक किया तो उस में हरियाणा के सुखवीर सिंह की ओर से भेजी फ्रैंड रिक्वैस्ट देखी तो स्वीकार कर ली थी. उस ने सिर्फ फ्रैंड रिक्वैस्ट ही नहीं भेजी थी, नए साल का शुभकामना संदेश भी भेजा था. अपने स्टेटस में 30 वर्षीय सुखवीर ने खुद को याहू इंडिया कंपनी का अधिकारी और अविवाहित लिखा था. कुसुम ने सुखवीर की फ्रैंड रिक्वैस्ट तो स्वीकार कर ही ली थी, शुभकामना संदेश के लिए धन्यवाद देते हुए अपनी ओर से भी उसे नववर्ष की मुबारकबाद दी थी.

इस के बाद दोनों की फेसबुक पर चैटिंग होने लगी. 9 जनवरी, 2016 को दोनों अपने मोबाइल नंबर एकदूसरे को दिए तो फेसबुक पर चैटिंग बंद कर के मोबाइल पर इन की घंटों बातें होने लगीं. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों एकदूसरे से प्यार ही नहीं करने लगे, बल्कि आपस में शादी करने के बारे में सोचने लगे. बातचीत में सुखवीर ने खुद को अमीर घर का होने के साथसाथ यह भी बताया था कि वह याहू इंडिया कंपनी में अधिकारी है. दूसरी ओर से कुसुम भी अपने बारे में तमाम बातें करते हुए सुखवीर को अक्सर यह अहसास दिलाती रहती थी कि वह उस का पहला प्यार है. इतनी उम्र होने के बावजूद उसे किसी का प्यार नसीब नहीं हुआ.

दोनों के ही फोटो फेसबुक पर थे. सुखवीर के मुकाबले कुसुम कहीं ज्यादा खूबसूरत और प्रभावशाली व्यक्तित्व की मालकिन थी. उस की नौकरी भी अच्छी थी, जहां से उसे बढि़या तनख्वाह मिल रही थी. सुखवीर ने उस से मिलने की इच्छा जाहिर की तो कुसुम ने उसे अपने घर का पता दे कर बंगलुरु आने का निमंत्रण दे दिया. इस तरह 19 जनवरी, 2016 को सुखवीर हवाई जहाज से बंगलुरु पहुंच गया और हवाई अड्डे से सीधे दोपहर को कुसुम सिंगला के फ्लैट पर जा पहुंचा. कुसुम उसे सम्मान और अपनत्व के साथ अकेली होने के बावजूद हर तरह से विश्वास कर के उसे अपने साथ फ्लैट में ले गई थी.

कुसुम उस फ्लैट में अकेली नहीं, निधि शर्मा के साथ रहती थी. वह डैल कंपनी में नौकरी करती थी और शाम 8 बजे तक अपनी नौकरी से वापस आती थी. 19 जनवरी की शाम वह अपनी नौकरी से ठीक 8 बजे फ्लैट पर पहुंची. कुसुम रोजाना उस से पहले आ जाती थी. लेकिन उस दिन अपने किसी रिश्तेदार के आने की वजह से उस ने छुट्टी ले रखी थी. निधि को उस ने यह बात सुबह ही बता दी थी. इसलिए निधि रात 8 बजे फ्लैट पर पहुंची तो कुसुम फ्लैट पर ही होगी, यह सोच कर उस ने फ्लैट की डोरबैल बजाई. एक बार बजाने पर जब उसे लगा कि अंदर किसी तरह की हलचल नहीं हुई है तो उस ने दोबारा बजाई. इस बार भी अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो तीसरी बार, चौथी, फिर कई बार बजाई.

दरवाजे पर लैचलौक होने की वजह से उसे भीतरबाहर दोनों ओर से खोला और बंद किया जा सकता था. दरवाजे की एक चाबी कुसुम के पास होती थी और एक निधि के पास.  लगातार कई बार बैल बजाने पर भी जब अंदर कोई रिस्पौंस नहीं मिला तो निधि को लगा शायद कुसुम अपने रिश्तेदार के साथ कहीं घूमने चली गई है. उस ने पर्स से चाबी निकाली और दरवाजा खोल कर भीतर आ गई. अंदर अंधेरा था, स्विचबोर्ड का अनुमान उसे था ही, इसलिए हाथ बढ़ा कर लाइट औन कर दी. लाइट जलते ही निधि ने जो देखा, उस की आंखें खुली की खुली रह गईं. उस का शरीर कांपने लगा, आवाज मुंह में जैसे घुट कर रह गई. हाथ में पकड़ा मोबाइल छूट कर फर्श पर गिर गया.

थोड़ी देर बाद जब उस की चेतना लौटी तो हिम्मत कर के उस ने फ्लैट का दरवाजा खोला और बाहर आ कर ‘खून…खून…’ चिल्लाने लगी. उस की चीख सुन कर पल भर में तमाम पड़ोसी इकट्ठा हो गए. सिक्योरिटी वाले भी भाग कर ऊपर आ गए. घबराई निधि निढाल हो कर दीवार के सहारे जमीन पर बैठ गई थी. उस से कोई कुछ पूछता था तो जवाब देने के बजाय वह फ्लैट के अंदर की ओर अंगुली से इशारा कर दे रही थी.

फ्लैट का औटोमैटिक दरवाजा फिर से बंद हो गया था, लेकिन चाबी की होल में ही लटक रही थी. आने वालों ने दरवाजा खोल कर अंदर जा कर देखा तो आगे वाले कमरे में कुसुम सिंगला की लाश पड़ी थी. उस की आंखें खुली थीं, गरदन पर लैपटौप के चार्जर का तार लिपटा था. बाईं आंख की भौंहों के पास गहरा जख्म था, जिस से बहा खून फर्श तक आ गया था. पहली ही नजर में लग रहा था कि वह मर चुकी है. लाश के आसपास तमाम कागज बिखरे पड़े थे.

इस घटना की सूचना तुरंत पुलिस को दी गई. थाना काडुगोडी पुलिस की एक टीम वहां पहुंची और घटनास्थल की जांच कर के जरूरी काररवाई निपटाई, उस के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. निधि शर्मा से तहरीर ले कर हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया और फिर अपार्टमैंट में रहने वालों तथा सिक्योरिटी वालों से पूछताछ शुरू हुई. इस पूछताछ में सिक्योरिटी गार्ड ने बताया था कि कुसुम सिंगला का एक रिश्तेदार सुखवीर सिंह आया था. लेकिन वह 3 बजे के करीब लिफ्ट से नीचे उतरा और अपार्टमैंट के मुख्य गेट से जाने के बजाय छोटे गेट से बाहर निकल गया था. उस ने कुसुम मैडम का लैपटौप वाला बैग अपने कंधे से लटका रखा था.

पुलिस ने जब सिक्योरिटी गार्ड से कहा कि तुम ने उसे रोका क्यों नहीं तो उस ने कहा, ‘‘हम रोकते कैसे, हमें उस पर किसी तरह का शक ही नहीं हुआ. चूंकि कुसुम मैडम जिस तरह से हाथ मिला कर उसे अपने साथ ले गईं थीं और विजिटर रजिस्टर में उस के बजाय खुद अपने हाथों से इंट्री भरी थी, उसे देख कर यही लगा था कि वह उन का कोई बहुत खास है. इसी वजह से वह बाहर जाने लगा तो हम ने रोका नहीं था. लेकिन अब लगता है कि हम से बहुत बड़ी गलती हुई है. अगर उसे रोक कर कुसुम मैडम को फोन कर लिया होता तो वह उसी समय पकड़ा जाता.’’

पुलिस वालों के कहने पर सिक्योरिटी गार्ड ने विजिटर रजिस्टर का वह पेज दिखाया, जहां कुसुम की हैंडराइटिंग में उस के कथित रिश्तेदार का विवरण लिखा था. वह विवरण कुछ इस तरह था : सुखबीर सिंह, निवासी हथीन, पलवल, हरियाणा. इसी के साथ उस का मोबाइल नंबर लिखा था. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो वह बंद था. विजिटर रजिस्टर ले कर पुलिस थाने लौट आई. मामला गंभीर था. संदिग्ध अपराधी के हुलिए की जानकारी देते हुए सभी थाना पुलिस को सूचना दे दी गई थी.

बंगलुरु पुलिस के उच्चाधिकारियों ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए एसीपी (ईस्ट) पी. हरिशेखरन के नेतृत्व में एक विशेष टीम का गठन कर इस केस को सुलझाने की जिम्मेदारी सौंपते हुए अभियुक्त की तलाश में लगा दिया. हरिशेखरन ने अपनी जांच तेजी से शुरू कर दी. अब तक कुसुम के साथ रहने वाली निधि भी काफी हद तक संभल गई थी. पुलिस की मौजूदगी में उस ने कुसुम का सामान चैक कर के बताया कि लैपटौप के अलावा उस के मोबाइल फोन, कै्रडिट और डेबिट कार्ड, बैंक के खाते की चैकबुक के साथ एक ट्राउजर गायब है. इस के अलावा अन्य सामान भी गायब हो सकता है, क्योंकि उस की अलमारी में पड़े तमाम कागजात और दस्तावेज वगैरह बिखरे पड़े थे.

हरिशेखरन ने निधि शर्मा से पूरी जानकारी ले कर कुसुम का मोबाइल नंबर भी ले लिया था. उन्होंने कुसुम के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाने के साथ उस की उस समय की लोकेशन का पता लगाने का प्रयास किया. काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर उन्होंने कई बार फोन किए थे. यही नहीं, उस नंबर से भी कुसुम के नंबर पर कई बार फोन आए थे. वह वही नंबर था, जो पुलिस को अपौर्टमैंट के विजिटर रजिस्टर से मिला था. इस का मतलब वह संदिग्ध सुखवीर सिंह का नंबर था.

सुखवीर और कुसुम के फोन की मौजूदा लोकेशन बंगलुरु से बाहर की साथसाथ होने की आ रही थी. बंगलुरु पुलिस हरियाणा पुलिस को सुखवीर सिंह का पता दे कर उस के बारे में पता लगाने में सहयोग करने का अनुरोध कर चुकी थी. लेकिन हरियाणा पुलिस ने कहा था कि दिया गया पता अधूरा है, फिर भी उस के बारे में पता करने की कोशिश की जा रही है.

हरिशेखरन की टीम ने अब तक कुसुम के बारे में जो जानकारी जुटाई थी, उस के अनुसार वह मूलरूप से पंजाब की रहने वाली थी. पेशे से वह सौफ्टवेयर इंजीनियर थी और इस से पहले आईबीएम कंपनी की नोएडा शाखा में काम करती थी. यहीं काम करते हुए उस की शादी हुई थी, लेकिन जल्दी ही उस का तलाक हो गया था. करीब 6 महीने पहले उस का तबादला बंगलुरु के लिए हो गया था. कुसुम काफी खूबसूरत ही नहीं, समझदार और व्यवहारकुशल भी थी. बढि़या नौकरी कर रही थी. इस तरह की सर्वगुणसंपन्न लड़की का तलाक क्यों हुआ, यह किसी भी समझ में नहीं आ रहा था.

कुसुम दूसरी शादी के लिए काफी गंभीर थी, लेकिन सचेत भी बहुत थी. एक बार धोखा खाने के बाद इस बारे में वह अगला कदम बहुत फूंकफूंक कर रख रही थी. उस ने तय कर लिया था कि दूसरी शादी करने से पहले वह लड़के के बारे में अच्छी तरह जांचपरख कर ही शादी का निर्णय करेगी. पूछताछ में निधि शर्मा ने पुलिस को बताया था कि कुसुम अपनी शादी के बारे में तो उस से बातें करती थी, लेकिन इस संबंध में उस की किसी से बात चल रही है, यह कभी नहीं बताया था.

उस दिन उस ने निधि को सिर्फ यही बताया था कि उस का कोई रिश्तेदार उस से मिलने आ रहा है. वह रिश्तेदार कौन है, कहां से और क्यों आ रहा है? यह सब उस ने कुछ नहीं बताया था. जो भी था, अब कुसुम का वही कथित रिश्तेदार उस के कत्ल के संदेह के दायरे में आ रहा था. अपार्टमैंट में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी पुलिस ने देखी थी. उन में कुसुम के साथ एक लड़का उस के फ्लैट की ओर जाता दिखाई दिया था. सिक्योरिटी वालों ने उसे पहचान कर कन्फर्म कर दिया था कि वही वह सुखवीर सिंह है, जिस के बारे में विजिटर रजिस्टर में एंट्री कर के कुसुम अपने साथ ले गई थी.

सुखवीर सिंह तक पहुंचने का अब पुलिस के पास एक ही रास्ता रह गया था कि उस के मोबाइल की औनरशिप के बारे में पता किया जाए. पुलिस ने ऐसा ही किया. इसे बंगलुरु पुलिस का सौभाग्य ही कहा जाएगा कि वह फोन नंबर सुखवीर सिंह पुत्र राजपाल सिंह के नाम ही था, जिस में उस का पूरा पता लिखा॒था॒: गांव रीबड़, थाना हथीन, पलवल, हरियाणा. बंगलुरु पुलिस ने तुरंत उक्त पता हरियाणा पुलिस को दे कर सुखवीर सिंह को गिरफ्तार करने का आग्रह किया.

थाना हथीन पुलिस ने बंगलुरु पुलिस द्वारा दिए पते पर छापा मारा तो सुखवीर सिंह वहीं का रहने वाला था. लेकिन वह घर पर नहीं था. जब घर वालों से उस के बारे में पूछा गया तो पता चला कि वह उस समय गुड़गांव में था. गुड़गांव में वह कहां है, घर वालों से पता चल गया था. इस के बाद गुड़गांव पुलिस की मदद से उसे थोड़ी ही देर में पकड़ लिया गया था. सुखवीर सिंह के पकड़े जाने की सूचना पा कर बंगलुरु पुलिस गुड़गांव पहुंची और विधिवत उसे हिरासत में ले कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे 5 दिनों के ट्रांजिट रिमांड पर ले कर बंगलुरु आ गई.

बंगलुरु पुलिस ने सुखवीर सिंह को पूछताछ सैल में ले जा कर व्यापक पूछताछ की तो उस ने पुलिस को जो कुछ बताया, उस से कुसुम सिंगला की हत्या की जो वजह सामने आई, वह इस तरह थी : सुखवीर सिंह गांव में पैदा हुआ था, इसलिए ग्रामीण परिवेश में ही पलाबढ़ा. लेकिन वह शुरू से ही पढ़ाई में होशियार था, इसलिए पढ़लिख कर इंजीनियर बन गया. इस के बाद उसे याहू इंडिया कंपनी की नोएडा शाखा में नौकरी मिल गई. कुछ दिनों बाद बंगलुरु की किसी फर्म में उसे यहां से ज्यादा वेतन की नौकरी मिल गई. यह सन 2011 की बात है.

वहां उस ने कुछ महीने ही नौकरी की थी कि याहू इंडिया कंपनी ने उसे और ज्यादा पैसे दे कर अपने यहां बुला लिया. इस के बाद उसे एक्सेंचर कंपनी में नौकरी मिल गई तो उस ने याहू कंपनी छोड़ कर वहां की नौकरी जौइन कर ली. लेकिन सन 2013 में उस की यह नौकरी छूट गई तो उसे अभी तक कहीं नौकरी नहीं मिली थी. नौकरी छूटने के बाद उस के पास 2 ही काम रह गए थे, एक नौकरी की तलाश करना, दूसरा सोशल मीडिया से जुड़ कर टाइम पास करना. लाखों युवाओं की तरह वह भी फेसबुक द्वारा अनेक लोगों से चैटिंग किया करता था. फेसबुक में वह अपने बारे में खूब बढ़चढ़ कर बताता था.

इसी तरह कुसुम सिंगला से जब उस की फेसबुक द्वारा फ्रैंडशिप हुई तो उस ने उन्हें भी अपने बारे में खूब बढ़चढ़ कर बताया. बाद में जब दोनों ने अपनेअपने मोबाइल नंबर एकदूसरे को दे दिए तो उन की फोन पर लंबीलंबी बातें होने लगीं. एक तो उस के पास बात करने का प्रभावशाली अंदाज था, दूसरे उस ने अपने झूठ के सहारे बहुत जल्दी कुसुम को शीशे में उतार लिया था.

दरअसल, कुसुम की नौकरी और वेतन के बारे में जब सुखवीर को पता चला तो उसे लगा कि अगर कुसुम से उस की शादी हो जाती है तो उस के सारे कष्ट तुरंत कट जाएंगे. कुछ दिनों बाद वह उसे अपने बेरोजगार होने की बात बता देगा. शादी होने के बाद कुसुम कुछ कर तो सकेगी नहीं, फिर खुद ही नौकरी दिलवाने में उस की मदद करेगी. अपनी इस गलत सोच के साथ तिकड़म भिड़ा कर फोन पर बात करते हुए वह कुसुम के इतने नजदीक आ गया कि उस के एक बार कहने पर कुसुम ने उसे मिलने के लिए बंगलुरु बुला लिया.

अपनी धाक जमाने के लिए सुखवीर हवाई जहाज से वहां गया. जिस समय वह सिक्योरिटी कक्ष में बैठा कुसुम का इंतजार कर रहा था, वहां बैठे लोगों की बातचीत से उसे पता चला कि कुसुम कुंवारी नहीं, बल्कि तलाकशुदा है. इस बात से उसे एकबारगी धक्का लगा, क्योंकि कुसुम ने उस से कहा था कि वह उस का पहला प्यार है. लेकिन उस ने भी तो कुसुम से तमाम झूठ बोले थे, इसलिए खुद को सहज बनाए रखा.

कुसुम आ कर उसे अपने फ्लैट में ले गई और उस की खूब आवभगत की. दोनों बैठ कर इधरउधर की बातें करने लगे तो सुखवीर ने कुसुम से तलाकशुदा होने और उस से इस बात को छिपाने की शिकायत की. इस के जवाब में कुसुम ने कहा कि वह विवाह नहीं, एक धोखा था. उसे उस के उस कथित पति से कभी प्यार नहीं मिला, इसलिए उस ने उसे प्यार या शादी माना ही नहीं. सुखबीर ने उसे उस की इस गलती पर इस तरह माफ करने वाली बात कही, जैसे ऐसा कर के वह उस पर बहुत बड़ा एहसान कर रहा हो.

कुसुम को शायद उस का माफ करने वाला यह अंदाज पसंद नहीं आया, इसलिए उस ने थोड़ा गंभीर लहजे में कहा, ‘‘मेरी जिंदगी में सिर्फ यही एक झूठ था, जिसे माफ कर के तुम ने मुझे अपराधबोध से बचा लिया. अगर तुम्हारी जिंदगी में भी कोई झूठ हो तो अभी बता दो. मैं भी तुम्हें इसी तरह माफ कर के अपना मन साफ कर लूंगी.’’

उस समय वहां ऐसा माहौल बन गया था कि सुखबीर को लगा कि उसे भी अपने बारे में सचसच बता देना चाहिए. उस ने निश्चिंत हो कर अपने बेरोजगार होने की बात कुसुम को बता कर अनुरोध किया कि हो सके तो वह उस की नौकरी लगवाने में मदद करे. सुखवीर का झूठ बेवकूफ बनाने वाला था, इसलिए उस के झूठ को सुन कर कुसुम को इतना गुस्सा आया कि उस ने उसे डांटते हुए तुरंत वहां से चले जाने को कहा.

‘‘ठीक है, मैं अभी चला जाता हूं, लेकिन तुम मुझे मेरे आनेजाने का खर्च 50 हजार रुपए दे दो.’’ सुखबीर ने कहा.

कुसुम ने उसे एक भी पैसा देने से साफ मना कर दिया. उस का कहना था कि उसे देने के लिए उस के पास एक भी पैसा नहीं है. मना करने की एक वजह यह भी थी कि इस के पहले वह इसी तरह धोखे में 5 लाख रुपए गंवा चुकी थी. इसलिए अब वह किसी के धोखे में नहीं आना चाहती थी.

‘‘ठीक है, तुम 50 हजार नहीं देना चाहती तो मुझे वापस जाने के लिए 5 हजार रुपए ही दे दो. इस के बाद मैं तुम से कभी किसी तरह का संपर्क नहीं रखूंगा.’’ सुखबीर ने अनुनय करते हुए कहा.

कुसुम ने 5 हजार रुपए देने से भी मना कर दिया. इस पर सुखवीर को गुस्सा आ गया और वहां पड़ा पैन उठा कर उस के चेहरे पर वार कर दिया. कुसुम जख्मी हो गई. कुसुम अपने बचाव के लिए शोर मचा पाती, सुखबीर ने फुर्ती से लैपटौप के चार्जर का तार उस के गले में लपेट कर कस दिया. पल भर में कुसुम की सांसों ने उस का साथ छोड़ दिया. सुखवीर निश्चिंत हो गया कि कुसुम मर गई है तो उस का लैपटौप बैग मे डाल कर उस के कमरे की तलाशी लेने लगा. तलाशी में उसे कुसुम का क्रैडिट कार्ड, डैबिट कार्ड और बैंक की चैकबुक मिली तो उसे भी बैग में डाल लिया. उस का सैलफोन भी उस ने जेब में डाल लिया.

सुखवीर ने जब पैन से कुसुम पर वार किया था तो उस के चेहरे से निकला खून उस की पैंट पर लग गया था. पकड़े जाने के डर से उस ने अपना पैंट उतार कर बैग में डाल लिया और कुसुम का ट्राउजर निकाल कर पहन लिया. वहां से वह इस तरह इत्मीनान से निकला, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था. थोड़ी दूर जा कर उस ने कुसुम के फोन से संबंधित बैंक के कस्टमर केयर पर रिक्वैस्ट भेजी कि वह पिन भूल गया है, इसलिए उसे नया पिन दिया जाए. इस से सुखबीर को नया पिन मिल गया.

नया पिन मिलने के बाद सुखबीर ने एटीएम से 10 हजार रुपए निकाले. दिल्ली पहुंच कर उस ने 30 हजार रुपए और निकाले. इस के बाद वह गुड़गांव के एक होटल में कमरा ले कर आराम करने की गरज से ठहर गया. लेकिन वह आराम कर पाता, उस के पहले ही पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया. दरअसल, उस ने होटल में पहुंचते ही इस की सूचना होटल के फोन से अपने घर वालों को दे दी थी. इस तरह कुसुम की हत्या कर के भागने के 24 घंटे के अंदर ही सुखवीर पकड़ लिया गया.

पुलिस ने उस के पास से कुसुम के दोनों मोबाइल फोन, उस की बैंक की चैकबुक, क्रैडिट और डैबिट कार्ड, लैपटौप बरामद करने के साथ उस की निशानदेही पर बंगलुरु में फेंकी गई उस की वह पैंट भी बरामद कर ली थी, जिस पर कुसुम का खून लगा था. रिमांड अवधि समाप्त होने पर सुखबीर को एक बार फिर अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में ही था. Social Media Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: जिसे अपनाना चाहा उसी ने मरवाया

Hindi Crime Story: अबरार अपने चचेरे भाई उम्मीद खां की हत्या कर के एक तीर से दो निशाने साधना चाहता था. उस ने भाई को तो मार दिया, लेकिन क्या उस की इच्छा पूरी हुई?

उत्तर प्रदेश का एक जिला है संभल. इस जिले के थाना नखासा के अंतर्गत आने वाले चंदावली गैलुआ रोड पर स्थित चंदावली इंटर कालेज के पास कच्ची सड़क पर नीले रंग की एक टेरेनो कार खड़ी थी. जब काफी देर तक वह कार वहीं खड़ी रही तो कुछ लोग उस के पास पहुंचे. उन्होंने शीशे से अंदर झांका तो उन्हें कार की पिछली सीट पर एक आदमी पड़ा दिखाई दिया, जिस के सीने पर एक तकिया रखा था. उस आदमी में कोई हलचल दिखाई नहीं दी तो लोगों को शक हुआ. इस के बाद तो एकदूसरे से होते हुए यह खबर चंदावली और गैलुआ गांव के अधिकांश लोगों तक पहुंच गई. धीरेधीरे वहां भीड़ लगने लगी. उन्हीं लोगों में से किसी ने यह सूचना थाना नखासा पुलिस को दे दी. यह 22 अक्तूबर, 2015 की बात है.

सूचना मिलने पर शाम साढ़े 7 बजे के करीब थानाप्रभारी के.के. तिवारी पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. उन्होंने लोगों की मदद से कार को काफी हिलायाडुलाया, लेकिन सीट पर पड़े आदमी में कोई हरकत नहीं हुई. इस से लगा कि या तो वह बेहोश हैं या फिर किसी ने उस की हत्या कर दी है. के.के. तिवारी ने इस बात की जानकारी जिले के सभी पुलिस अधिकारियों को दे दी. मामला हत्या का लग रहा था, इसलिए एसपी अतुल कुमार, एएसपी कमलेश दीक्षित भी वहां पहुंच गए. चूंकि कार के दरवाजे लौक थे, इसलिए लौक खुलवाने से पहले पुलिस ने फोन कर के नजदीकी जिला मुरादाबाद से फौरेंसिक एक्सपर्ट्स की टीम को बुलवा लिया.

रात साढ़े 10 बजे फोरैंसिक एक्सपर्ट्स की टीम मौके पर पहुंची तो कार का शीश तोड़ कर उस के दरवाजे खोले गए. पुलिस ने कार के अंदर पड़े आदमी की जांच की तो पता चला कि वह मर चुका था. फोरैंसिक टीम ने कार की स्टीयरिंग, विंडो और हैंडिल लीवर से फिंगरप्रिंट उठाए. कार की जांच में पिछली सीट पर 2 मोबाइल, मिर्च पाउडर और एक लेटरहेड रखा मिला. लेटरहैड पर एक मोबाइल नंबर लिखा था. जब फोरैंसिक टीम जांच कर रही थी, तभी के.के. तिवारी ने अपने मोबाइल से वह नंबर मिलाया तो दूसरी ओर से फोन किसी महिला ने उठाया. उन्होंने उस महिला से पूछा कि क्या वह किसी ऐसे आदमी को जानती है, जिस के पास नीले रंग की टेरेनो कार है?

उस महिला ने कहा, ‘‘यह कार तो मेरे पति की है. कहां हैं वह?’’ महिला ने पूछा. महिला ने अपना नाम गुलिस्तां बताया था. के.के. तिवारी ने कहा, ‘‘उन का ऐक्सीडेंट हो गया है. उन्हें गंभीर चोटें आई हैं. आप जल्दी संभल के थाना नखासा आ जाइए.’’

पति के ऐक्सीडेंट की बात सुन कर महिला रोने लगी. उस ने यह बात अपने ससुर शमीउल्ला खां को बताई तो वह भी परेशान हो गए. उन्हें लगा था कि ऐक्सीडेंट में घायल होने की वजह से वह किसी अस्पताल में भरती होगा.

फोरैंसिक टीम का काम निपट गया तो पुलिस ने जांच शुरू की. लाश के गले पर मिर्च पाउडर पड़ा था, जिस से अंदाजा लगाया गया कि उस की आंखों में मिर्च पाउडर डाला गया था. जरूरी काररवाई करने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. देर रात शमीउल्ला खां गुलिस्तां और अन्य घर वालों के साथ थाना नखासा पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उन का बेटा अब इस दुनिया में नहीं है. थानाप्रभारी ने उन्हें अपने मोबाइल में उस की लाश के फोटो दिखाए तो फोटो देखते ही शमीउल्ला खां की आंखें भर आईं, क्योंकि वह फोटो उन के बेटे उम्मीद खां के थे. के.के. तिवारी ने सांत्वना दे कर उन्हें बताया कि उन के बेटे का एक्सीडेंट नहीं हुआ बल्कि किसी ने उस की हत्या की है.

इस के बाद पुलिस उन्हें मोर्चरी ले गई. शमीउल्ला को लाश दिखाई गई तो उन्होंने उस की शिनाख्त अपने बेटे उम्मीद खां के रूप में कर दी. पोस्टमार्टम कराने के बाद अगले दिन पुलिस ने उम्मीद खां की लाश उस के घर वालों को सौंप दी. 30 वर्षीय उम्मीद खां की हत्या के मामले को सुलझाने के लिए एसपी अतुल कुमार सक्सेना ने एएसपी कमलेश दीक्षित के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में थानाप्रभारी के.के. तिवारी, स्पैशल औपरेशन ग्रुप (एसओजी) के प्रभारी संतोष त्यागी जैसे कई तेजतर्रार पुलिस वालों को शामिल किया गया. मृतक जिला अमरोहा के कस्बा गजरौला के निकटवर्ती गांव लिसड़ई बुजुर्ग का रहने वाला था. इस से पुलिस यह सोचने पर मजबूर हो गई कि उस की हत्या संभल के इलाके में क्यों की गई?

अगर किसी को उस की हत्या करनी ही थी तो वह गजरौला से हसनपुर के बीच कहीं भी कर सकता था. आखिर उसे वहां क्यों लाया गया? इस का मतलब हत्यारों या मृतक में से किसी न किसी का संबंध संभल से जरूर रहा होगा. इस बारे में पुलिस ने शमीउल्ला खां से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि संभल के कस्बा हसनपुर के पास गांव बावनखेड़ी में उन की ससुराल है. उम्मीद खां अकसर अपनी ननिहाल आताजाता रहता था.

के.के. तिवारी ने उम्मीद खां की ननिहाल जा कर पूछताछ की तो पता चला कि 22 अक्तूबर को उम्मीद खां वहां नहीं पहुंचा था. उसी बीच उम्मीद के एक दोस्त शाहनवाज ने पुलिस को बताया कि 22 अक्तूबर को वह उम्मीद के साथ था. वह अपनी टेरेनो कार से उसे मुरादाबाद ले गया था. वहां उन दोनों ने कुछ खरीदारी की थी. दोपहर 2 बजे वे लोग गजरौला पहुंचे तो उम्मीद के फोन पर किसी का फोन आया. फोन पर उम्मीद जिस तरह बात कर रहा था, उस से साफ पता चल रहा था कि वह किसी महिला से बात कर रहा है. महिला ने शायद उसे बुलाया था इसीलिए उस ने महिला से कहा कि मैं अभी आ रहा हूं. फोन पर बात होने के बाद उम्मीद ने शाहनवाज से कहा कि वह किसी जरूरी काम से कहीं जा रहा है.

शाहनवाज ने उस से मालूम भी करना चाहा पर उस ने यह नहीं बताया कि वह कहां जा रहा है. उस ने सिर्फ इतना ही बताया कि वह बिजनेस के सिलसिले में किसी से बात करने जा रहा है. उसे गजरौला में उतार कर वह चला गया था. अब पुलिस को यह पता लगाना था कि 22 अक्तूबर की दोपहर को उम्मीद की किस से बात हुई थी, जिस के बाद वह गजरौला से चला गया था. वह फोन नंबर किस का था, यह जानने के लिए पुलिस ने उम्मीद के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि वह फोन नंबर बावनखेड़ी के रहने वाले मोहम्मद अमीर की बेटी नगमा का था.

पुलिस टीम बावनखेड़ी स्थित मोहम्मद अमीर के घर पहुंची तो घर पर पुलिस को देख कर नगमा घबरा गई. पुलिस ने जब उस से पूछा कि क्या वह गजरौला के गांव लिसड़ई बुजुर्ग के रहने वाले उम्मीद खां को जानती है तो उस ने साफ मना कर दिया. जिस समय पुलिस नगमा से बात कर रही थी, उस की बड़ी बहन सायमा भी वहां मौजूद थी. पुलिस पूछताछ के समय दोनों बहनें बारबार एकदूसरे की ओर देख रही थीं. काल डिटेल्स में नगमा का फोन नंबर आया था. इस के बावजूद वह पुलिस से झूठ बोल रही थी. दूसरे दोनों बहनों के घबरा कर एकदूसरे की ओर देखने से भी पुलिस को शक हो गया. उन के व्यवहार से पुलिस को लगा कि दोनों बहनें उम्मीद की हत्या के बारे में कुछ न कुछ जरूर जानती हैं.

एएसपी कमलेश दीक्षित ने टीम में शामिल महिला सिपाहियों से कहा कि दोनों लड़कियों को गाड़ी में बैठा कर थाने ले चलो, इन से कुछ जरूरी बातें करनी हैं. नगमा और सायमा को ले कर पुलिस टीम थाने लौट आई. थाने में दोनों बहनों से उम्मीद खां की हत्या के बारे में पूछताछ की जाने लगी. पहले तो दोनों बहनें झूठ बोलती रहीं, लेकिन जब उन से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई तो वे अपने ही जाल में उलझती चली गईं. आखिर उन्होंने स्वीकार कर लिया कि उम्मीद की हत्या उन्होंने ही कराई थी. इस के बाद उन्होंने उम्मीद की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी.

उम्मीद खां उत्तर प्रदेश के जिला अमरोहा के थाना गजरौला के गांव लिसड़ई बुजुर्ग का निवासी था. उस के पिता किसान थे. उम्मीद खां 6 भाइयों में दूसरे नंबर पर था. गजरौला और हसनपुर के बीच एक गांव है सिंघली जागीर. वैसे तो यहां तमाम नर्सरियां हैं, जिन में अनेक किस्म के फूलों के पौधे मिलते हैं. लेकिन यहां की 2 नर्सरियां काफी बड़ी हैं, जिन का सालाना करोड़ों का टर्नओवर है.

उम्मीद खां जब बड़ा हुआ तो उस ने अपनी खेती का काम करने के बजाय नर्सरी का काम सीखना चाहा. घर वालों से पूछ कर वह गांव की एक बड़ी नर्सरी में काम करने लगा. 2-3 साल वहां काम करने के बाद जब उसे नर्सरी के सारे कामों की जानकारी हो गई और यह भी पता चल गया कि इस काम में कितनी आमदनी है तो उस ने नर्सरी की नौकरी छोड़ दी.

उम्मीद खां अपनी नर्सरी खोलना चाहता था, लेकिन उस के पास जमीन नहीं थी. उस ने अपने गांव के पास ही जमीन किराए पर ले कर नर्सरी का काम शुरू कर दिया. फूल आदि के पौधे कहां से मंगाए जाते हैं, कौनकौन से पौधे नर्सरी में ही तैयार किए जाते हैं, इस की उसे अच्छी जानकारी थी. अपनी मेहनत से कम पूंजी में ही उस का काम अच्छा चल निकला.

गजरौला औद्योगिक क्षेत्र है, जहां पर बिरला समूह की वाम आर्गेनिक जैसी कई बड़ी फैक्ट्रियां हैं. इस के अलावा यहां तमाम औद्योगिक प्रतिष्ठान, होटल और कोठियां हैं. उम्मीद खां इन सभी जगहों पर जा कर पौधे सप्लाई करने लगा, जिस से उसे मोटी कमाई होने लगी. पैसा आने के बाद उस के रहनसहन का अंदाज बदल गया. उस ने नर्सरी की आमदनी से आलीशान घर बनवाया और सन 2013 में निशान कंपनी की नीले रंग की टेरेनो कार खरीद ली.

आदमी के पास पैसा आता है तो साथ में कई बुराइयां भी साथ ले कर आता है. उम्मीद खां के साथ भी यही हुआ. नई कार लेते ही उस के जैसे पर लग गए. वह अपनी व्यावसायिक पार्टियों के पास कार से जाने लगा. इस से उस का धंधा और बढ़ गया. अब उसे सारा काम अकेले संभालना मुश्किल लगने लगा था. उम्मीद को अपने साथ काम करने के लिए एक ईमानदार लड़के की जरूरत महसूस होने लगी थी. उम्मीद खां के एक चाचा थे सरदार खां, जो गांव में ही रहते थे. उन का एक बेटा अबरार खां खाली था. वह दिन भर गांव में आवारागर्दी करता रहता था. उम्मीद ने उस से कहा, ‘‘अबरार, तुम दिन भर खाली घूमते रहते हो. गांव के जिन लड़कों के साथ तुम रहते हो, वे अच्छे नहीं हैं. अगर तुम मेरे साथ काम करो तो कुछ बन सकते हो.’’

अबरार जानता था कि उम्मीद ने जब से नर्सरी का काम शुरू किया है, उस की किस्मत बदल गई है. इसलिए उस ने उम्मीद की बात मान ली. अगले दिन से ही वह उम्मीद के साथ काम करने लगा. धीरेधीरे उम्मीद काम की जिम्मेदारी अबरार पर डालने लगा. जबकि वह खुद गजरौला से बाहर जा कर ठेके लेने लगा था. अबरार जितनी मेहनत से काम कर रहा था, उम्मीद उसी के हिसाब से उसे तनख्वाह भी दे रहा था. उम्मीद खां ने अबरार को कार चलाना भी सिखा दिया था. उम्मीद की गैरमौजूदगी में अबरार ही पार्टियों के पास जाता था और नर्सरी में नौकरों से काम भी कराता था. अबरार मालिक की तरह वहां रह रहा था. अब वह भी अच्छे और महंगे कपड़े पहनने लगा था.

हसनपुर तहसील के गांव बावनखेड़ी में उम्मीद की ननिहाल थी. वह बच्चों के साथ अकसर अपनी ननिहाल आताजाता रहता था. कभीकभी वह अबरार को भी साथ ले जाता था. उस की ननिहाल के पास ही मोहम्मद अमीर का घर था. उस के 2 बेटे और 5 बेटियां थीं. करीब 10 साल पहले उस की पत्नी का इंतकाल हो गया था. वह एक बेटे और 3 बेटियों की शादी कर चुका था. अब उसे एक बेटे और 2 बेटियां सायमा व नगमा की शादी करनी थी. दोनों ही बेटियां शादी योग्य थीं. वह उन के लिए लड़के देख रहा था.

अबरार एक बार उम्मीद के साथ बावनखेड़ी गया तो उस की नजरें सायमा से चार हो गईं. एकदूसरे को देख कर दोनों ही मुसकरा पड़े. अबरार उस का मतलब समझ गया. मौका मिलते ही उस ने सायमा का मोबाइल नंबर ले लिया. एकदूसरे से अपनी बात कहने और उस की सुनने का मोबाइल फोन बढि़या जरिया है. सायमा और अबरार को नजदीक लाने में मोबाइल ने अपनी अहम भूमिका निभाई.

अबरार ने सायमा से फोन पर बात की तो उसे भी उस से बात करना अच्छा लगा. इस के बाद उन की मोबाइल पर लंबीलंबी बातें होने लगीं, जिस से वे एकदूसरे के नजदीक आते गए. कभीकभी अबरार अकेला ही उम्मीद की कार ले कर बावनखेड़ी चला जाता था, जिस से सायमा पर उस का अच्छाखासा प्रभाव जम गया. बाद में सायमा के पिता से भी उस की जानपहचान हो गई, जिस से वह उस के घर भी जाने लगा.

अबरार और सायमा की प्रेमकहानी के बारे में उम्मीद को पता चला तो उसे ताज्जुब हुआ कि अबरार ने उस के ननिहाल की लड़की सायमा को कैसे पटा लिया? सायमा की एक छोटी बहन नगमा थी. उम्मीद ने सोचा कि वह नगमा पर अपना प्रभाव डाल कर उसे पटाने की कोशिश करेगा. लेकिन काफी कोशिश के बाद भी वह सफल नहीं हुआ.

एक दिन उस ने अबरार से कहा, ‘‘तुम्हारा और सायमा का यह खेल इस तरह कब तक चलता रहेगा. क्यों न तुम किसी दिन सायमा को मुरादाबाद ले आओ. उसे यहां घुमा देंगे.’’

उम्मीद की इस बात पर अबरार पहले तो चौंका कि उस की प्रेम वाली बात उम्मीदभाई को कैसे पता चल गई. अब चूंकि वह उस से झूठ भी नहीं बोल सकता था, इसलिए उस ने उम्मीद की बात मान ली. इस के बाद उस ने सायमा के सामने मुरादाबाद घूमने का प्रस्ताव रखा.

सायमा ने कहा कि उस के अब्बू उसे अकेली बाहर जाने की इजाजत नहीं देंगे. शायद छोटी बहन को साथ ले जाने को कहूं तो वह इजाजत दे दें. अबरार ने कहा कि वह अपने अब्बू से बात करे. जो भी बात हो, वह उसे बता दे. वह कार ले कर बावनखेड़ी आ जाएगा. इस के बाद सायमा ने अपने अब्बू से कहा, ‘‘अब्बू हमें गजरौला से कुछ खरीदारी करनी है. अबरार अपनी कार ले कर आया है. हम उस के साथ चले जाएं तो जल्दी लौट आएंगे.’’

अमीर ने दोनों बेटियों को गजरौला जाने की इजाजत दे दी. सायमा ने अबरार को यह खबर दी तो वह उम्मीद के साथ बावनखेड़ी पहुंच गया और सायमा व नगमा को गाड़ी में बैठा कर गजरौला लौट आया. उम्मीद भी वहीं मिल गया. पहले चारों ने एक रेस्टोरैंट में नाश्ता वगैरह किया. इस के बाद उम्मीद ने दोनों बहनों को बाजार से खरीदारी कराई. दोनों बहनें उम्मीद खां से बहुत खुश थीं. इस के बाद उम्मीद खां उन्हें ले कर गजरौला के एक होटल में पहुंचा. वह होटल उस के परिचित का था. वहां उस ने किराए पर 2 कमरे लिए. एक कमरे में अबरार और सायमा चले गए. दूसरे कमरे में उम्मीद खां नगमा को साथ ले कर चला गया.

अबरार और सायमा ने तो हंसीखुशी से संबंध बनाए जबकि उम्मीद खां ने नगमा के साथ जबरन संबंध बनाए. बाद में उस ने नगमा को कुछ पैसे दे कर खुश करने की कोशिश की. इस के बाद यह सिलसिला सा चल निकला. उम्मीद खां नगमा पर पानी की तरह पैसा बहाने लगा. यही नहीं, वह उस पर शादी करने का दबाव भी डालने लगा. नगमा को जब पता चला कि उम्मीद खां शादीशुदा ही नहीं, 3 बच्चों का बाप है तो उसे अपनी गलती का अहसास हुआ. उस ने उम्मीद खां से दूरी बनानी शुरू कर दी. जबकि उम्मीद खां उस पर निकाह करने का दबाव बना रहा था. नगमा ने निकाह करने से साफ मना कर दिया तो उम्मीद खां बौखला उठा.

उस ने नगमा को धमकी दी कि अगर उस ने उस के साथ निकाह नहीं किया तो वह उस के होने वाले जीजा अबरार को नौकरी से हटा देगा. यही नहीं, वह उसे गांव में भी बदनाम कर देगा. उस की इस धमकी से नगमा डर गई. उस ने यह बात अपने होने वाले जीजा अबरार को बताई तो वह भी परेशान हो उठा. क्योंकि अबरार भी नहीं चाहता था कि उस की होने वाली साली नगमा 3 बच्चों के पिता उम्मीद खां से शादी करे. दरअसल उसे लगा कि अगर किसी तरह उम्मीद खां और नगमा की शादी हो गई तो सायमा के घर वालों के सामने उस की इज्जत कम हो जाएगी.

इस के बाद नगमा और अबरार उम्मीद खां से छुटकारा पाने का उपाय सोचने लगे. एक दिन इन दोनों ने मिल कर एक भयानक योजना बना डाली. अपनी उस योजना में अबरार ने अपने एक दोस्त गौरव को भी शामिल कर लिया. गौरव अमरोहा के ही जोया कस्बे का रहने वाला था. योजना के मुताबिक 22 अक्तूबर, 2015 की दोपहर को नगमा ने उम्मीद खां को फोन कर के कुछ देर इधरउधर की बातें करने के बाद कहा, ‘‘उम्मीद, आज तुम से मिलने का मन कर रहा है. तुम हसनपुर आ जाओ. मैं वहीं पर तुम्हारा इंतजार कर रही हूं. और हां, आज तुम्हारे मन की मुराद भी पूरी हो जाएगी. मैं तुम से आज ही निकाह कर लूंगी. इस का सारा इंतजाम मैं ने कर लिया है.’’

नगमा की इन बातों से उम्मीद खां बहुत खुश हुआ. उस समय वह अपने दोस्त शाहनवाज के साथ था. वह उसे उस के घर छोड़ कर अपनी निशान टेरेनो कार से हसनपुर के लिए रवाना हो गया. हसनपुर में तय जगह पर उसे नगमा अपनी बहन सायमा और अबरार के साथ खड़ी मिल गई. तीनों कार में बैठ कर संभल की ओर चल पड़े. नगमा ने उम्मीद खां को बताया कि उन दोनों का निकाह संभल के डेरा सराय में मौलवी द्वारा पढ़ाया जाएगा. कार हसनपुर से आगे रहरा मार्ग पर चितावली गांव के नजदीक पहुंची तो अबरार ने गाड़ी रुकवा ली. दरअसल योजना के अनुसार वहां अबरार का दोस्त गौरव खड़ा था. वहीं पर उस की मोटरसाइकिल भी खड़ी थी.

मोटरसाइकिल किसी जानकार के यहां खड़ी कर के गौरव भी उन की कार में बैठ गया. कार थोड़ी ही दूर चली थी कि दोनों बहनें लघुशंका के बहाने कार से उतर कर खेत में चली गईं. उम्मीद, अबरार और गौरव इधरउधर की बातें करने लगे. तब तक अंधेरा हो चुका था. वापस आ कर नगमा और सायमा फिर से गाड़ी में बैठ गईं. नगमा और सायमा अपने साथ मिर्ची का पाउडर लाई थीं. कार में बैठने के बाद उन्होंने वह पाउडर उम्मीद की आंखों में डाल दिया. उम्मीद खां अपनी आंखें मसलने लगा तो उन लोगों ने दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया.

उम्मीद खां की मौत हो गई. इस के बाद अबरार ने लाश को पिछली सीट पर लिटा कर उस के मुंह पर तकिया रख दिया. उम्मीद की हत्या के बाद अबरार ने नगमा और सायमा को कार से हसनपुर छोड़ा. फिर वह गौरव को वहां ले गया, जहां उस ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी की थी. गौरव वहां से मोटरसाइकिल से कार के पीछेपीछे चलने लगा. अबरार कार ले कर संभल जिले के थाना नखासा के पास गैलुआ गांव पहुंचा. खेत के रास्ते पर कार खड़ी कर के उस ने कार में रखे लेटरहेड पर उम्मीद खां के घर का मोबाइल नंबर लिखा और कार को लौक कर के वहीं छोड़ दिया. इस के बाद वह गौरव की मोटरसाइकिल से गजरौला लौट आया.

पूरी बात पता चलने पर पुलिस ने अबरार और गौरव को भी गिरफ्तार कर लिया. उम्मीद को मार कर अबरार ने एक तीर से दो निशाने साधने चाहे थे. एक तो उस की होने वाली साली का पीछा छूट जाता, दूसरे उस की नर्सरी पर उस का कब्जा हो जाता. इस के बाद वह दोनों बहनों को अपने घर में रखना चाहता था, जो उस के काम में हाथ बंटातीं. पूछताछ के बाद पुलिस ने चारों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी की जमानत नहीं हो सकी थी. Hindi Crime Story

Mumbai Crime: दिल लगा कर मिटाया सुहाग

Mumbai Crime: पत्नी के प्रेमसंबंधों के बारे में पता चलने पर बाबू उसे रोकने ही नहीं लगा, बल्कि उस से मारपीट भी करने लगा. पति नाम के इस कांटे को निकालने के लिए रीवा ने मोनू को शरीर का चारा डाल कर जो दांव चला, वह उसे जेल तक ले गया.

दिन के लगभग 2 बजे महानगर मुंबई के उपनगर अंधेरी के थाना साकीनाका पुलिस को घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल से एक महत्त्वपूर्ण सूचना मिली. ड्यूटी पर मौजूद इंसपेक्टर आबूराव सोनवणे ने चार्जरूम में ड्यूटी पर तैनात सबइंसपेक्टर बड़रे को बुला कर तुरंत सूचना दर्ज कराई. साथ ही उन्होंने इस सूचना की जानकारी कंट्रोल रूम और वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी. सूचना दर्ज कराने के बाद आबूराव सोनवणे, इंसपेक्टर बाबूलाल शिंदे, चंद्रशेखर नलावणे, असिस्टैंट इंसपेक्टर दत्तात्रेय देशमुख, अनिल जयकर, सबइंसपेक्टर बाबूराव शिंदे, बड़रे, कांस्टेबल रतन गायकवाड़, कोलेकर और पाटिल को साथ ले कर घाटकोपर स्थित राजावाड़ी अस्पताल जा पहुंचे.

जिस समय वे अपनी टीम के साथ वहां पहुंचे, डाक्टरों की टीम एक लाश का निरीक्षण कर रही थी. उस लाश के साथ आए लोग भी वहां मौजूद थे. पूछताछ में मृतक का नाम बाबू राजरत्नम बताया गया. डाक्टरों के अनुसार, उस की मौत लगभग 10-11 घंटे पहले हुई थी. उसे गला घोंट कर मारा गया था. क्योंकि उस के गले पर गहरा निशान स्पष्ट नजर आ रहा था, जबकि घर वालों का कुछ और ही कहना था.  मृतक की पत्नी रीवा और बेटे जीतू का कहना था कि उन्हें पता ही नहीं चला कि बाबू की मौत कब और कैसे हुई, पत्नी रीवा के बताए अनुसार, वह रात को काफी देर से घर आए थे और आते ही अपनी चारपाई पर सो गए थे. सुबह 4 बजे पानी आया तो उन्होंने हमेशा की तरह उठ कर पानी भरा, उस के बाद फिर अपनी चारपाई पर जा कर सो गए थे.

सुबह 6 बजे के करीब बेटा जीतू रात की ड्यूटी कर के आया तो वह भी उन्हीं की चारपाई पर उन के पास लेट कर सो गया. वह चूंकि एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थी, इसलिए सुबह उठ कर घर का सारा काम निपटाया और नाश्ता बना कर साढ़े 6 बजे स्कूल चली गई. इस बीच क्या हुआ, उसे कुछ पता नहीं. सवा 1 बजे जीतू ने उसे फोन कर के बताया कि एक बजे जब वह सो कर उठा तो देखा उस के पापा अभी भी सो रहे थे. उस ने पापा को उठाना चाहा तो उन में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. इस के बाद जीतू ने घबरा कर उसे फोन किया.

रीवा ने स्कूल से ही इस बात की जानकारी पति के बड़े भाई यशु को दे दी.  इस के बाद उस के पड़ोस में रहने वाले अपने पिता रतन तथा मां शांती को बताया. जल्दी से भाग कर वह घर आई और घर वालों तथा पड़ोसियों की मदद से पति को अस्पताल ले गई. रीवा ने पुलिस को जो बताया, वह काफी संदिग्ध था. बहरहाल, पुलिस ने प्राथमिक काररवाई निपटाई और लाश को पोस्मार्टम के लिए भिजवा दिया.

अस्पताल से यह पुलिस टीम सीधे अंधेरीकुर्ला रोड स्थित जरीमरी बस्ती की राधाकृष्ण चाल पहुंची, जहां रीवा पति और बच्चों के साथ रहती थी. चाल के जिस मकान में मृतक बाबू रहता था, वह 2 कमरों का छोटा सा मकान था. पीछे वाले कमरे में ही छोटा सा किचन, टौयलेट और बाथरूम भी था, जबकि दूसरे कमरे में एक चारपाई पड़ी थी, उसी पर बाबू सोता था. वहीं उस की हत्या हुई थी. निरीक्षण में पुलिस ने कमरे का सारा समान अपनीअपनी जगह व्यवस्थित पाया. आनेजाने का एक ही दरवाजा था, जो अंदर से बंद था. इसलिए कोई बाहरी आदमी अंदर नहीं आ सकता था.

इंसपेक्टर आबूराव सोनवणे अपनी टीम के साथ कमरे का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सीनियर इंसपेक्टर अभिनाश धर्माधिकारी और एसीपी समद शेख भी आ गए. दोनों अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया और आपस में सलाह कर के इस मामले की जांच इंसपेक्टर आबूराव सोनवणे और चंद्रशेखर नलावणे को सौंप दी. समद शेख और अभिनाश धर्माधिकारी काफी दिनों तक क्राइम ब्रांच में रह चुके थे, जहां उन्होंने चंदन तस्करी से ले कर अपहरण जैसे कई बड़े पेचीदा मामले सुलझाए थे. उस हिसाब से यह मामला उन के लिए कुछ भी नहीं था.

इस के बावजूद इस मामले को ले कर उन के ऊपर काफी दबाव था. इस की वजह यह थी कि मृतक राजनीतिक पार्टी आरपीआई (रिपब्लिकन पार्टी औफ इंडिया) से जुड़ा था. इस के अलावा बौद्ध विहार मंदिर का अध्यक्ष भी था. घटनास्थल की जांच और अब तक की पूछताछ से यह साफ हो गया था कि हत्यारा कोई बाहरी नहीं था. इस से साफ था कि हत्या का राज घर में ही छिपा था. इसलिए पुलिस ने इस मामले की जांच मृतक बाबू के घर से ही शुरू की. यही वजह थी कि घर वालों के सामान्य होते ही पुलिस ने उन्हें थाने बुला लिया.

थाने में की गई पूछताछ में परिवार के किसी सदस्य से कोई खास जानकारी नहीं मिली, लेकिन मृतक के 5 साल के बेटे फैंडली ने पुलिस को जो बताया, उस से मृतक की पत्नी रीवा संदेह के दायरे में आ गई. उस ने पुलिस को बताया कि जिस रात उस के पापा की हत्या हुई थी, उस रात उस के घर मोनू अंकल आए थे और वह कई बार मम्मी के साथ पापा की चारपाई के पास गए थे. इस के अलावा पूछताछ में पुलिस ने एक चीज यह भी देखी थी कि पति की मौत पर पत्नी को जिस तरह दुखी होना चाहिए, रीवा उस तरह दुखी नहीं लग रही थी. इन बातों से पुलिस को लगा कि बाबू की हत्या में किसी न किसी रूप से रीवा का हाथ अवश्य है.

पुलिस ने रीवा से मोनू के बारे में पूछा तो उस ने जिस मोनू के बारे में बताया, वह उस के बड़े बेटे जीतू का दोस्त था. वह उसी के साथ नौकरी करता था. वह अकसर उस के घर आयाजाया करता था. जब फैंडली से उस की शिनाख्त कराई गई तो उस ने कहा, ‘‘यह वह मोनू नहीं है, जो उस रात आया था.’’

रीवा से दोबारा मोनू के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा कि वह इस के अलावा किसी और मोनू को नहीं जानती. पुलिस जानती थी कि रीवा झूठ बोल रही है. इसलिए सच्चाई का पता लगाने के लिए पुलिस ने उस के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला उस की एक नंबर पर बहुत ज्यादा बातें होती थीं.

संदेह होने पर पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो जो जानकारी मिली, वह चौंकाने वाली थी. वह नंबर भी उसी के नाम था, लेकिन उस का उपयोग कोई और कर रहा था. पुलिस ने तुरंत उस नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन पता करवाई तो पता चला कि जिस रात बाबू की हत्या हुई थी, उस नंबर की भी लोकेशन रीवा के घर की थी. जबकि वह रहता मुंबई के उपनगर जोगेश्वरी के प्रेमनगर में हनुमान मंदिर के पीछे था.

पुलिस ने रीवा के मोबाइल का इनबौक्स, काल लौग और उस से खींचें गए फोटो देखे तो इनबौक्स और काल लौग में तो कुछ नहीं मिला, लेकिन गलती से उस के मोबाइल में मोनू के साथ एक सेल्फी रह गई थी. उस फोटो को मृतक के बेटे फैंडली को दिखाया गया तो उस ने बताया कि यही वह मोनू है, जो उस रात उस के घर आया था.

पुलिस को अब मोनू को पकड़ना था. पुलिस को उस की लोकेशन मिल गई थी, इसलिए छापा मार कर तुरंत उसे गिरफ्तार कर लिया गया. वही असली मोनू था. रीवा के बेटे फैंडली ने उस की शिनाख्त भी कर दी. पूछताछ में उस ने अपना अपराध भी स्वीकार कर लिया. उस का नाम अजय उर्फ अभिमन्यु उर्फ मोनू चौधरी था.

बाबू की हत्या अवैध संबंधों की वजह से हुई थी. मोनू के अपराध स्वीकार कर लेने के बाद पुलिस ने रीवा को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने जब उस से बाबू की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने खुद को निर्दोष बताया. लेकिन जब उस का सामना मोनू से कराया गया तो उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद दोनों ने बाबू की हत्या की जो कहानी बताई, वह अवैध संबंधों की घिनौनी कहानी थी.

रीवा के पिता रतन बहुत पहले तमिलनाडु से मुंबई आ गए थे. मुंबई के उपनगर अंधेरी कुर्ला रोड पर स्थित जरीमरी बस्ती में उन के गांव के तमाम लोग रहते थे, इसलिए वह भी वहीं रहने लगे. उन्हें यहां कोई ढंग का काम नहीं मिला तो उन्होंने बस्ती के नाके पर पानबीड़ी का स्टाल लगा लिया. इसी की कमाई से उन के परिवार की गुजरबसर हो रही थी. उन के परिवार में पत्नी शांति के अलावा 2 बेटे और एक बेटी रीवा थी.

रीवा जब कालेज में पढ़ रही थी, तभी उसे प्राइमरी स्कूल से कालेज तक साथ पढ़ने वाले रमन से प्यार हो गया था. रीवा ने जहां ग्रेजुएशन कर के बीटीसी की, वहीं रमन की नौकरी दूसरे शहर में लग गई. इस के बावजूद वह रीवा से मिलता रहता था. रीवा रमन से शादी करना चाहती थी, लेकिन जब उस ने पिता से बात की तो उन्होंने रमन से उस की शादी करने से मना ही नहीं किया, बल्कि आननफानन में पड़ोस में रहने वाले अपनी ही जाति के बाबू से उस की शादी कर दी. मजबूरन रीवा को यह रिश्ता स्वीकार करना पड़ा.

बाबू कपड़ों की सिलाई का काम करता था और अपने बड़े भाई यशु के साथ रहता था. वह समाजसेवा के कामों में भी रुचि लेता था, इसलिए समाजसेवा करतेकरते एक समय ऐसा भी आया, जब वह रामदास अठावले की भारतीय रिपब्लिकन पार्टी से जुड़ गया. सामाजिक कार्यकर्ता होने की वजह से उसे जरीमरी बौद्ध विहार मंदिर का अध्यक्ष बना दिया गया था. शादी के कुछ दिनों तक तो बाबू अपने भाई के साथ रहा, लेकिन जल्दी ही उस ने उसी चाल में अपना खुद का मकान खरीद लिया और पत्नी के साथ रहने लगा. आगे चल कर संतान के रूप में उस के यहां 2 बेटे हुए, जिन में जीतू अब 17 साल का है और फैंडली 5 साल का.

बाबू की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए रीवा भी साकीनाका सफेद पुल के पास एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगी. इस से भी घर की हालत में सुधार नहीं आया तो बेटा जीतू भी किसी कंपनी में रात की ड्यूटी पर जाने लगा. वह शाम को जाता था तो सुबह ही आता था. रीवा की शादी भले ही बाबू से हो गई थी, लेकिन वह अपने पहले प्रेम को भुला नहीं पाई थी. शादी के बाद भी वह अपने प्रेमी रमन से मिलती रही, जबकि रमन की भी शादी हो गई थी. उस के भी बच्चे हो गए थे. शादी के कुछ दिनों बाद बाबू को इस की जानकारी हुई तो इस बात को ले कर अकसर दोनों में लड़ाईझगड़ा होने लगा.

किसी भी चीज की एक हद होती है. हद खत्म होते ही आदमी बगावत पर उतर आता है. रीवा की भी सहनशक्ति की हद खत्म हो चुकी थी. वह रोजरोज के लड़ाईझगड़े और मारपीट से तंग आ चुकी थी, इसलिए वह पति से छुटकारा पाना चाहती थी. लेकिन सवाल यह था कि यह काम करवाया किस से जाए. जिस से वह सुकून की जिंदगी जी सके. इसी चक्कर में रीवा की जिंदगी में मोनू आया. 22 वर्षीय मोनू उर्फ अजय उर्फ अभिमन्यू चौधरी उत्तर प्रदेश के जिला महाराजगंज का रहने वाला था. काम की तलाश में वह मुंबई आया तो यहां गांव वालों के साथ कारपेंटर का काम करने लगा. मोनू की रीवा से मुलाकात उसी के स्कूल में हुई थी. मोनू स्कूल में फर्नीचर का काम करने आया था.

काम के दौरान ही रीवा उस से मिली तो न जाने क्यों उसे लगा कि यह आदमी उस का काम कर सकता है. फिर वह उस के आगेपीछे घूमने लगी. मोनू भी बच्चा नहीं था. उस के हावभाव से समझ गया कि वह क्या चाहती है. फिर दोनों जल्दी ही करीब आ गए. रीवा को मोनू से अपना काम निकलवाना था, इसीलिए वह उस के करीब आई थी. यही नहीं, अपने मकसद के लिए उस ने मोनू को अपना तन भी सौंप दिया. इस के बाद तो मोनू पूरी तरह उस के वश में हो गया. मोनू से बातचीत के लिए उस ने अपने नाम से एक सिमकार्ड भी ला कर उसे दे दिया था.

उस ने ऐसा इसलिए किया था कि एक तो कोई उस के इस रिश्ते पर शक न कर सके, दूसरे वह आसानी से उस के पति की हत्या के आरोप में फंस जाए. उस ने सोचा था कि पुलिस उसे गिरफ्तार कर के जेल भेज देगी, उस के बाद वह आसानी से अपने प्रेमी रमन से मिल सकेगी. इधर एक महीने से उस ने मोनू से मिलनाजुलना कम कर दिया था. जबकि मोनू उस से मिले बगैर रह नहीं सकता था. जब उस ने यह बात रीवा से कही तो उस ने कहा कि उस के संबंधों की जानकारी पति को हो गई है, जिस की वजह से वह उसे मारतापीटता है. अगर उसे उस से मिलनाजुलना है तो उस के पति नाम के इस कांटे को निकाल फेंके.

रीवा के प्रेम में मोनू कुछ इस तरह पागल था कि वह उस के लिए कुछ भी करने को तैयार था. भले ही वह उस के पति की हत्या ही क्यों न हो. रीवा यही तो चाहती थी. मोनू ने हामी भर दी तो उस ने उस के साथ मिल कर बाबू की हत्या की योजना बना डाली. 16 जुलाई की रात का समय भी तय हो गया. उस रात रीवा ने मकान का दरवाजा खुला छोड़ दिया. बड़ा बेटा अपनी ड्यूटी पर था. रीवा घर में छोटे बेटे के साथ थी. रात एक बजे के करीब मोनू दबे पांव उस के यहां पहुंचा. रीवा धीरे से फैंडली के पास से उठी और उस के साथ बाबू की चारपाई के पास आ गई. गहरी नींद में सो रहे बाबू के गले में उस ने अपना दुपट्टा डाल दिया तो दोनों ने उसे पूरी ताकत से कस दिया. पलभर छटपटा कर बाबू ने दम तोड़ दिया.

बाबू को मौत के घाट उतार कर दोनों कई बार उस के पास आएगए. जब उन्हें विश्वास हो गया कि वह मर चुका है तो मोनू जोगेश्वरी स्थित अपने घर चला गया. रीवा सुबह उठी और स्कूल चली गई. सभी सामान्य रूप से अपनेअपने काम में लग गए. उन्हें पता नहीं था कि रात में फैंडली जाग गया था और उस ने मां और मोनू की हरकतों को देख लिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने मोनू उर्फ अजय उर्फ अभिमन्यु और रीवा के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर अंधेरी की अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को न्यायिक हिरासत में आर्थर रोड जेल भेज दिया गया. Mumbai Crime

Hindi Crime Story: दोहरा खेल

Hindi Crime Story: जवेरिया, मैं समझ गया कि तुम मेरे साथ दोहरा खेल खेल रही हो. लेकिन मैं ने तुम्हें अहसास नहीं होने दिया कि मुझे सब पता है. कुछ भी हो, तुम मेरी मोहब्बत हो ना, चाहे तुम इस बात को समझो या न समझो.

दरवाजा खोलते ही वह मुझे देख कर पीछे हट गई. मेरे होंठों पर एक व्यंग्य भरी मुसकान थी. शायद मेरी इस मुसकराहट ने उस के होश गुम कर दिए थे. मैं ने विनम्रता से पूछा, ‘‘क्या बात है, मुझे पहचाना नहीं?’’

‘‘जव्वाद घर पर नहीं हैं.’’ उस ने एकदम से कहा.

‘‘कोई बात नहीं, मैं उस का इंतजार कर लूंगा.’’ मैं ने उसी तरह मुसकराते हुए कहा, ‘‘मेरा खयाल है कि मैं तुम्हारे लिए कोई अजनबी नहीं हूं, बल्कि तुम्हें भले ही याद न हो, लेकिन मुझे याद है कि कभी हम दोनों ने बहुत अच्छे दिन गुजारे हैं.’’

‘‘फैसल प्लीज, मैं बहुत अच्छी और शांति की जिंदगी जी रही हूं. मुझे परेशान मत करो.’’ उस ने कहा.

‘‘यह तो कोई बात नहीं हुई, मैं इतने दिनों के बाद तुम से मिलने आया हूं और तुम इस तरह रुखाई से बात कर रही हो. और कुछ नहीं तो कम से कम कुछ देर अपने घर में बैठा कर एक प्याली चाय ही पिला दो?’’ मैं ने कहा.

वह कुछ सोचती रही. शायद उसे लगा कि मेरी बात माने बगैर कोई रास्ता नहीं है तो वह एक तरफ हटते हुए बोली, ‘‘आओ, अंदर आ जाओ.’’

अंदर आ कर मैं ने इधरउधर देखते हुए कहा, ‘‘बहुत खूब, बहुत खूबसूरत घर है, साजसज्जा भी बड़ी अच्छी कर रखी है.’’

‘‘यह सब जव्वाद की मेहनत का नतीजा है.’’ उस ने कहा.

‘‘हां, लेकिन मुझे पता है कि यह मेहनत किस तरह की है.’’ मैं ने सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘‘तुम भी बैठो.’’

लेकिन वह मेरे सामने उसी तरह खड़ी रही.

‘‘अरे हां, याद आया,’’ मैं ने कहा, ‘‘पहले भी तुम मेरे सामने इसी तरह खड़ी रहती थीं और मैं तुम्हारा हाथ थाम कर तुम्हें अपने पास बैठा लेता था. सही कहा न?’’

‘‘नहीं… नहीं, अच्छा मैं बैठ जाती हूं.’’ उस ने कहा और जल्दी से सामने वाले सोफे पर बैठ गई. इस के बाद उस ने सिर झुका कर कहा, ‘‘फैसल, अब मैं शादीशुदा हूं. यह घर मेरी जन्नत है. मैं जव्वाद के साथ एक बढि़या जिंदगी जी रही हूं.’’

‘‘मैं कहां तुम्हारी बढि़या जिंदगी को खराब कर रहा हूं,’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं तो तुम दोनों से मिलने आया हूं. इधर से जा रहा था, सोचा तुम दोनों से मिलता चलूं.’’

‘‘कहीं जा रहे थे क्या?’’

‘‘हां, मैं यह शहर ही नहीं, देश ही छोड़ कर जा रहा हूं,’’ मैं ने कहा, ‘‘अब यहां मेरा है ही क्या, सिवाय यादों के, जो इस शहर में बिखरी हैं. वे यादें मुझे कदमकदम पर गुजरे दिनों की याद दिलाती हैं. इसलिए मेरा यहां से चाले जाना ही ठीक है.’’

मेरे सामने जो औरत बैठी थी, वह आज भी उतनी ही सुंदर थी, जितनी 5 साल पहले थी. लगता ही नहीं था कि वह शादीशुदा है और उस की शादी को 5 साल बीत गए हैं. 5 साल यानी 5 सदियां… जवेरिया और उस के पति जव्वाद के लिए भले ही 5 साल हों, लेकिन मेरे लिए तो यह समय 5 सदियों के बराबर था. दुख, दर्द और अपमान से भरा. नासूर की तरह तकलीफ देती ये 5 सदियां, जिन्हें मैं ने जेल में इन्हीं दोनों की वजह से गुजारी थीं. इस के लिए पूरी तरह जव्वाद जिम्मेदार था.

‘‘जव्वाद बहुत ज्यादा मोहब्बत करने वाला शौहर साबित हुआ है,’’ जवेरिया की आवाज ने मुझे चौंका दिया, ‘‘वह मुझ से और अपनी बेटी से बहुत ज्यादा प्यार करता है.’’

‘‘हां, मैं ने सुना है कि तुम एक बच्ची की मां बन गई हो,’’ मैं ने कहा, ‘‘कहां है तुम्हारी बच्ची?’’

‘‘कमरे में है,’’ जवेरिया ने कहा, ‘‘उस की तबीयत कुछ ठीक नहीं है, इसलिए उसे सुला दिया है.’’

‘‘यह तुम ने अच्छा किया. नाम क्या है उस का?’’ मैं ने पूछा.

‘‘आलिया,’’ जवेरिया ने कहा, ‘‘वह देखो, उस की तसवीर.’’ उस ने कार्निस की तरफ इशारा किया.

कार्निस पर एक बच्ची की तसवीर एक बड़े फ्रेम में मढ़ी रखी थी. बहुत प्यारी बच्ची थी, बिलकुल अपनी मां की तरह, जो आज भी पहले की ही तरह सुंदर थी.

कुछ ही सालों में जैसे दुनिया बदल गई थी. पहले जवेरिया मेरे साथ हुआ करती थी, मेरा प्यार थी. मैं ने उस से मोहब्बत की थी. उस की इच्छाओं का सम्मान किया था. मेरा अपना कारोबार था. उस में जव्वाद हिस्सेदार था. जिंदगी हंसीखुशी से गुजर रही थी. सब कुछ एक निश्चित दायरे में बढि़या चल रहा था. जवेरिया मेरी मोहब्बत थी. हम दोनों बहुत जल्दी एक होने जा रहे थे.

पार्टनर होने के साथसाथ जव्वाद मेरा दोस्त भी था. जवेरिया कभीकभी मेरे औफिस भी आ जाती थी, जहां जव्वाद से भी उस की मुलाकात हो जाती थी. हम तीनों हंसतेमुसकराते किसी अच्छे से होटल में लंच के लिए जाते. लंच के बाद मैं जव्वाद की तरफ देखता, ‘‘यार जव्वाद.’’

‘‘मैं समझ गया.’’ वह नकली गुस्से से कहता, ‘‘तुम दोनों अब कहीं झक मारने जा रहे हो. ठीक है, मैं औफिस जा रहा हूं.’’

इसी तरह गुजर रही थी जिंदगी. तब मैं ने सोचा भी नहीं था कि इस खूबसूरत जिंदगी में अचानक एक भयानक मोड़ आ जाएगा. अचानक उस दिन मुझे अंदाजा हुआ कि मैं कितना बेवकूफ आदमी था, जो मैं ने आंखें बंद कर के अपने दोस्त जव्वाद पर भरोसा कर लिया था. उस ने अंदर ही अंदर मेरी जड़ें खोखली कर दी थीं. उस ने अपने हथकंडों से न सिर्फ कारोबार पर बल्कि जवेरिया पर भी कब्जा कर लिया था. जब मुझे होश आया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. जब मुझे यह सब पता चला तो मैं गुस्से से पागल हो गया. मैं जव्वाद को जान से मार देता, लेकिन उस ने मेरे खिलाफ पहले ही पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दी थी, जिस की वजह से मेरे ऊपर झूठा मुकदमा दायर हो गया और मुझे 5 साल की सजा हो गई.

जेल में मुझे पता चला कि किस तरह जव्वाद और जवेरिया ने मेरी पीठ में खंजर घोंपा था. मेरे जेल जाने के बाद जव्वाद और जवेरिया ने शादी कर ली थी. उस वक्त मेरे दिल पर क्या गुजरी होगी, इस का अंदाजा कोई दूसरा नहीं लगा सकता. 5 साल बाद मैं जेल से बाहर आया तो अपने संबंधों की बदौलत मैं ने जल्द ही काफी दौलत और ताकत हासिल कर ली. जब जवेरिया और जव्वाद के बारे में पता किया तो लोगों ने बताया कि अपना सारा कारोबार बेच कर वे लाहौर चले गए हैं. शायद उन का सोचना था कि मेरी नजरों से बच जाएंगे. लेकिन मैं ने उन्हें खोज ही लिया. मेरे परिचित लाहौर में भी थे. उन्होंने ही मुझे उन का पता बता दिया था. और अब मैं जवेरिया के घर उस के सामने बैठा था.

जवेरिया, जिस की जुल्फें कभी मेरे कंधों पर बिखरी रहती थीं, मेरे साथ जिंदगी गुजारने की बातें करती थी, वही जवेरिया मुझे तबाह कर के मेरे सामने सहमी बैठी थी.

‘‘तुम लोग क्या समझते थे कि मैं तुम लोगों को ढूंढ़ नहीं पाऊंगा.’’ मैं ने उस की ओर देखते हुए कहा.

‘‘फैसल, जो हुआ, अब उसे भूल जाओ.’’

‘‘भूल जाऊं?’’ मैं ने तड़प कर कहा, ‘‘कितने आराम से तुम ने यह बात कह दी. मैं भूल जाऊं कि तुम ने प्यार के झूठे वादे किए, जव्वाद के साथ मिल कर तुम ने मुझे धोखा दिया. धोखे से मेरे कारोबार पर कब्जा कर लिया. झूठे इल्जाम लगा कर मुझे जेल भिजवा दिया. चलो, मैं यह सब भूल भी जाता हूं, लेकिन मेरे उन 5 सालों का क्या होगा, जो तुम्हारी और जव्वाद की मक्कारी और बेरहमी की वजह से मैं ने जेल में काटे हैं. कहां से आएंगे 5 साल? मुझे उन 5 सालों का हिसाब दे सकती हो?’’

मुझे गुस्से में देख कर जवेरिया परेशान हो गई. वह जानती थी कि मैं जो कुछ कह रहा हूं, वह झूठ नहीं है. वाकई वही सब हुआ था, जो मैं उस से कह रहा था. वह रोने लगी, लेकिन मुझे उस पर तरस नहीं आया, क्योंकि ये उस की मक्कारी के आंसू थे. मैं गुस्से से बोला, ‘‘बंद करो अपना यह रोनाधोना. तुम्हारे आंसू अब मुझ पर असर नहीं करेंगे.’’

‘‘तो तुम्हीं बताओ, हम लोग तुम्हारे लिए क्या करें?’’ उस ने कहा, ‘‘हमारे पास जो कुछ भी है, वह तुम ले लो.’’

‘‘तुम्हारे पास अपना क्या है? तुम्हारे पास जो कुछ भी है, वह सब मेरा ही है.’’

‘‘तो फिर तुम यहां क्यों आए हो, क्या चाहते हो हम लोगों से?’’

‘‘मैं… मैं तुम्हारी सब से कीमती चीज लेने आया हूं.’’ मैं ने कहा, ‘‘और वह चीज जब तुम्हारे पास से चली जाएगी, तब तुम्हें पता चलेगा कि तुम ने मेरे साथ कैसी बेवफाई की है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ वह बुरी तरह से घबरा कर बोली.

‘‘तुम्हारी बच्ची,’’ मैं ने ठहरे हुए अंदाज में कहा, ‘‘मैं उसे अपने साथ ले जा रहा हूं.’’

‘‘नहीं, तुम यह नहीं कर सकते.’’ जवेरिया रोने लगी.

‘‘मुझे कौन रोकेगा?’’ मैं हंस पड़ा, ‘‘तुम्हारा शौहर जव्वाद. तुम्हें शायद पता नहीं कि इस वक्त वह मेरे आदमियों के कब्जे में है. इसीलिए वह अभी तक घर नहीं आया.’’

‘‘नहीं, खुदा के लिए ऐसा मत करो.’’ उस ने मेरे सामने हाथ जोड़ कर रोते हुए कहा, ‘‘तुम ऐसा जुल्म नहीं कर सकते.’’

‘‘यह तुम कह रही हो?’’ मैं उठ कर खड़ा हो गया, ‘‘बताओ, किस कमरे में है तुम्हारी बच्ची?’’

‘‘मैं अपनी जान दे दूंगी, लेकिन बच्ची तक नहीं जाने दूंगी.’’ जवेरिया दीवार बन कर मेरे सामने खड़ी हो गई. उस वक्त उस की हालत पागलों जैसी हो गई थी, ‘‘अगर तुम ने मेरी बच्ची को हाथ भी लगाया तो मैं तुम्हें जान से मार दूंगी.’’

मैं ने उस का हाथ पकड़ा और घसीट कर एक किनारे खड़ी कर दिया. मैं भी उस वक्त पागल हो रहा था. मैं उन दोनों का माफ करने को बिलकुल तैयार नहीं था. वे दोनों नरमी बरतने लायक थे भी नहीं. मैं जवेरिया को नजरअंदाज कर के उस कमरे में दाखिल हो गया, जहां सामने एक सुंदर बैड पर एक बच्ची चादर ओढ़े सो रही थी. मैं ने झटके से चादर खींच ली, लेकिन मेरे कदम पीछे हट गए. उस चादर के नीचे कोई बच्ची नहीं, बल्कि एक बड़ी सी गुडि़या लेटी थी.

जवेरिया भी मेरे पीछे कमरे में आ गई थी. उस ने मेरा हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘नहीं, तुम मेरी बच्ची को कुछ नहीं करोगे, उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाओगे.’’

मैं ने झल्ला कर पूछा, ‘‘कहां है तुम्हारी बच्ची?’’

‘‘यही तो है,’’ उस ने मेरा हाथ छोड़ कर उस गुडि़या को उठा लिया और सीने से लगाती हुई बोली, ‘‘तुम्हें क्या मालूम, यही तो है हमारी बेटी. हम ने इसे सीने से लग रखा है और तुम इसे नुकसान पहुंचाने चले आए. मैं तुम्हें जान से मार दूंगी. तुम इस का कुछ नहीं बिगाड़ सकते.’’

‘‘तुम शायद पागल हो गई हो,’’ मैं ने कहा, ‘‘रबर की इस बेजान गुडि़या को अपनी बच्ची कह रही हो?’’

‘‘खबरदार, जो इसे बेजान गुडि़या कहा,’’ उस ने गुडि़या को आराम से बिस्तर पर लिटाते हुए कहा, ‘‘हम दोनों इसी को देखदेख कर जिंदा हैं और तुम इसे बेजान कह रहे हो. किसी मां की ममता का मजाक उड़ाते तुम्हें शर्म नहीं आती.’’

मैं चुप रहा. कुछ देर बाद रोते हुए उस ने कहा, ‘‘फैसल, वाकई हम लोगों ने तुम्हें धोखा दिया था, जुल्म किया था तुम्हारे साथ. इस का अहसास हम दोनों को परेशान करता था.’’

‘‘जब तुम्हें इस बात का अहसास हो गया था तो मुझे छुड़ाने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया?’’ मैं ने पूछा.

इस के बाद मैं ड्राइंगरूम में आ कर बैठ गया. जवेरिया भी गोद में गुडि़या ले कर मेरे सामने बैठ गई. उस ने कहा, ‘‘शर्मिंदगी की वजह से. हमें तुम से डर भी था. दूसरी बात यह कि तब तक बहुत देर हो चुकी थी. तुम सजा पा कर जेल जा चुके थे. इसलिए हम चाह कर भी तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सके. हमें एक डर यह भी था कि अगर हम लोगों ने पुलिस के पास जा कर सच्ची बात बता दी तो हमें भी लपेट लिया जाएगा.’’

‘‘इसीलिए तुम दोनों खामोश रहे?’’

‘‘हां,’’ जवेरिया ने कहा, ‘‘हम ने सारा कारोबार बेच दिया और सारा कुछ समेट कर लाहौर आ गए. हम ने सोचा था कि हम यहां किसी तरह तुम से छिप कर रह लेंगे.’’ इतना कह कर वह खामोश हो गई. उस समय वह मुझे पुरानी जवेरिया लग रही थी, वही पुरानी मासूमियत उस के चेहरे पर झलक रही थी.

‘‘और इस बच्ची का क्या किस्सा है?’’ मैं ने गुडि़या की तरफ इशारा कर के पूछा.

‘‘शायद हमारे लिए यही वह सजा है, जो हमें मिलनी चाहिए. शादी के पहले साल ही बेटी पैदा हुई. हम दोनों बस उसी के हो कर रह गए. इस तरह 2 साल बीत गए. लेकिन उस के बाद एक रात वह सोतेसोते उठ कर शोर करने लगी कि पुलिस वाले उसे पकड़ कर ले जा रहे हैं. यह बात सुन कर हम परेशान हो गए. हम ने उस का बहुत इलाज कराया, लेकिन वह हमें छोड़ कर इस दुनिया से चली गई. शायद पुलिस उसे ले जाने में कामयाब हो गई.’’ कह कर जवेरिया रोने लगी.

‘‘और यह गुडि़या…?’’ मैं ने पूछा.

‘‘यह उसी की गुडि़या थी.’’ जवेरिया ने कहा, ‘‘वह इसी को ले कर सोया करती थी. उस की मौत के बाद हम लोग तो पागल हो गए थे. हमारा सब कुछ लुट चुका था. शायद यह कुदरत का इंतकाम था. हम ने तुम्हें पुलिस के हवाले किया था और कुदरत ने हमारी बेटी को अपनी पुलिस के हवाले कर दिया, ताकि हम जिंदगी भर रोतेतड़पते रहें.’’

‘‘मेरे साथ विश्वासघात करने से पहले तुम दोनों ने यह बात जान ली होती?’’ मैं ने कहा.

‘‘हां, हम ने ऐसा सोचा भी नहीं था.’’ जवेरिया धीरे से बोली, ‘‘उस के बाद हमारी बेटी कई बार ख्वाबों में आई. वह यही कहती थी, ‘अम्मी, मैं हूं ना, मैं गुडि़या की शक्ल में हूं. आप उस से प्यार करें.’ बस, वह दिन और आज का दिन. हम इसी गुडि़या को अपने सीने से लगा कर रखते हैं. जव्वाद की भी यही हालत है, जो मेरी है.’’

‘‘हूं,’’ मैं ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘मैं तुम दोनों को सजा देने के लिए आया था, लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि तुम्हें क्या सजा दूं, क्योंकि सजा तो तुम्हें मिल ही रही है.’’

‘‘अब हम तुम्हारे सामने हैं फैसल,’’ जवेरिया ने कहा, ‘‘तुम जो मुनासिब समझो, वह कर सकते हो.’’

‘‘तुम्हारी सजा यही है कि मैं तुम्हारी यह गुडि़या तुम से छीन लूं.’’

‘‘नहीं, ऐसा बिलकुल मत करना,’’ वह रोती हुई बोली, ‘‘हम इस के बिना नहीं रह सकते, हम मर जाएंगे.’’

मैं ने कहा, ‘‘यह सजा तो मैं दूंगा ही. तुम दोनों को मैं माफ नहीं कर सकता.’’

‘‘तुम मेरी बेटी को कहां ले जाओगे, क्या करोगे इस का?’’

‘‘मैं इसे अपने साथ कहीं और ले जाऊंगा. किसी और शहर नहीं, किसे दूसरे देश,’’ मैं ने कहा, ‘‘इस के बाद तुम दोनों इस के लिए तड़पते रहोगे, बेचैन और परेशान होते रहोगे.’’

वह गिड़गिड़ाती हुई बोली, ‘‘मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं, तुम हमें माफ कर दो.’’

‘‘बकवास मत करो,’’ मैं ने आगे बढ़ कर गुडि़या छीनते हुए कहा, ‘‘अब तुम इस के बगैर जिंदा रहने की कोशिश करो. और हां, अब तुम जव्वाद की चिंता बिलकुल मत करना, वह आ जाएगा. मेरे आदमी उसे छोड़ देंगे.’’

जवेरिया रोती रही और मैं गुडि़या ले कर बाहर आ गया. इस के कई महीने बाद मैं इस कहानी का अंतिम भाग लिख रहा हूं. शायद जवेरिया इस कहानी को पढ़ सके और उसे यह अहसास हो सके कि उस की बेवफाइयों और दगाबाजियों के बावजूद मैं ने उस के साथ कितनी और कैसी वफा की है? कितना प्यार किया है उस से? मैं उस की गुडि़या ले कर चला आया था. मगर मैं जानता था कि यह सब झूठ है, बकवास है. वह मुझे फिर धोखा दे रही है. एक बड़ा धोखा, क्या जबरदस्त प्लानिंग की थी उन दोनों ने.

शादी के एक साल बाद वाकई उन दोनों के यहां एक बच्ची पैदा हुई थी. बहुत प्यारी सी… लेकिन उस की मौत नहीं हुई थी. वह बिलकुल ठीक थी. जव्वाद ने उसे अपनी एक मौसी के यहां फैसलाबाद भेज दिया था, जहां वह बड़े आराम से रह रही थी. जव्वाद और जवेरिया हर समय इस बात को ले कर चिंतित रहते थे कि बाहर आते ही मैं उन से बदला लूंगा. मुझे बच्चों से बहुत प्यार है, खासतौर पर लड़कियों से. मैं किसी बच्ची को तकलीफ में नहीं देख सकता था. इसीलिए मुझे भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने का जवेरिया ने नाटक किया. उस ने यह गुडि़या पहले से ही खरीद रखी थी.

जवेरिया, तुम ने मुझे बेवकूफ नहीं बनाया, बल्कि मैं तो मोहब्बत के हाथों वैसे ही बिक चुका था, मैं तो वैसे ही तुम्हारी दुनिया से निकल जाता, फिर मेरे साथ यह दोहरा खेल खेलने की क्या जरूरत थी? एक बात और बता दूं, तुम दोनों को शायद इस बात पर हैरानी होगी कि मुझे इस गुडि़या वाली योजना के बारे में कैसे पता चला? जव्वाद का अपनी एक मौसी के घर, जो फैसलाबाद में रहती है, ज्यादा आनाजाना था. जव्वाद तुम्हारे घर आने से पहले मैं फैसलाबाद गया था. तुम्हारी मौसी ने बताया कि तुम दोनों कुछ दिनों के लिए अपनी बच्ची इन के यहां छोड़ गए हो.

जवेरिया, मैं ने वहीं तुम्हारी बेटी को देखा था और उसे देर तक खिलाया भी था.  कुछ भी हो, तुम मेरी मोहब्बत हो ना, चाहे तुम इस बात को समझो या न समझो. बहरहाल, मैं तुम्हारी दुनिया से जा रहा हूं. तुम खुश रहो, मुझे और क्या चाहिए. और हां, अपनी बेटी को वापस ले आना. अब मैं कभी तुम्हारे घर नहीं आऊंगा. तुम्हें अब मुझ से कोई खतरा नहीं है. मैं ने तुम्हें और जव्वाद को माफ कर दिया है. Hindi Crime Story

Gujarat Fraud Case: ऐसा कोई सगा नहीं जिसे इन्होने ठगा नहीं

Gujarat Fraud Case: संजय शर्मा ने अपने भाई और अन्य लोगों के साथ मिल कर ठगी की एक कंपनी बना रखी थी. जिस के माध्यम से उन्होंने न जाने कितने लोगों को तो ठगा ही, अपने रिश्तेदार नरेश शर्मा से भी 400 करोड़ लोन दिलाने के नाम पर साढ़े 12 करोड़ रुपए ठग लिए. लेकिन इस बार ऐसे फंसे कि…

गुजरात के कच्छ जिले के रहने वाले नरेश कुमार शर्मा का कोयले का बहुत बड़ा व्यापार है. कच्छ के ही गांधीधाम में उन की बालाजी कोक इंडस्ट्री प्रा.लि., श्री कोक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी प्रा.लि. और तिरुपति फ्यूल्स प्रा.लि. नाम की कंपनियां हैं. इन कंपनियों को वह अपने भाई रमेश शर्मा के साथ देखते हैं. 200-250 करोड़ रुपए के टर्नओवर वाली तीनों कंपनियों में करीब 80-90 लोग काम करते हैं. नरेश शर्मा का कारोबार पहले तो अच्छा चल रहा था, लेकिन पिछले कई सालों से उन के कारोबार में अचानक गिरावट आने लगी थी, जिस की वजह से दोनों भाई परेशान रहने लगे थे.

कारोबार में उतारचढ़ाव आना स्वभाविक बात है, लेकिन ज्यादा दिनों तक गिरावट इंडस्ट्री के लिए ठीक नहीं रहती. इसलिए दोनों भाई परेशान रहने लगे थे. ऐसी हालत में उन्होंने स्थानीय बैंकों से लोन ले कर अपनी कंपनियों को पहले की स्थिति में लाने की कोशिश की. लेकिन काफी कोशिश के बावजूद भी उन की तीनों कंपनियों की दशा नहीं सुधर रही थी. उन की इंडस्ट्रीज में जो मशीनें लगी थीं, वे पुरानी हो चुकी थीं. वे उन का आधुनिकीकरण करना चाहते थे. इस के लिए भी पैसों की जरूरत थी, जो उन के पास नहीं था. वे चाह रहे थे कि अगर उन्हें कहीं से 400-500 करोड़ का लोन मिल जाए तो उन की कंपनियां फिर से लाइन पर आ जाएं. बैंकों से वह पहले ही लोन ले चुके थे, इसलिए वहां से लोन मिलने की उम्मीद उन्होंने छोड़ दी थी.

रमेश शर्मा संजय शर्मा भारद्वाज नाम के एक आदमी को जानता था. वह रमेश शर्मा के साले का बेटा था. वह पूर्वी मुंबई के कांदिवली इलाके में रहता था और कारपोरेट लोन दिलाने का काम करता था. रमेश शर्मा ने संजय शर्मा के बारे में अपने भाई नरेश शर्मा को बताया. चूंकि नरेश शर्मा को पैसों की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने अपने भाई से कह दिया कि वह संजय शर्मा से इस बारे में बात कर लें. इस के बाद रमेश शर्मा ने फोन पर संजय शर्मा से बात की तो उस ने कहा, ‘‘फूफाजी, हमारी डेल्टा फिनलीज नाम की एक कंपनी है, जिस का औफिस दहिसर (पूर्वी), मुंबई में है. इस कंपनी द्वारा हम बड़ीबड़ी कंपनियों को लोन दिलाते हैं. लोन की राशि कम से कम 100 करोड़ रुपए होनी चाहिए.’’

संजय की बात सुन कर रमेश शर्मा खुश हुए, क्योंकि उन्हें 100 करोड़ से ज्यादा की जरूरत थी. इसलिए उन्होंने संजय शर्मा से कहा, ‘‘हमें 400 करोड़ के लोन की जरूरत है. यह तुम हमें दिलवा दो.’’

इस बातचीत के कुछ दिनों बाद ही संजय शर्मा की बहन के बच्चे का मुंडन था. उस की बहन दक्षिणी दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाके में रहती थी. इस कार्यक्रम में संजय शर्मा के अलावा नरेश शर्मा के परिवार वालों को भी आमंत्रित किया गया था. नरेश शर्मा को चूंकि संजय शर्मा से लोन के बारे में बातचीत करनी थी, इसलिए वह भी अपने परिवार के साथ इस मुंडन में शामिल हुए.

वहीं पर नरेश शर्मा ने संजय शर्मा भारद्वाज से लोन के सिलसिले में डिटेल में बात की. उस समय संजय का भाई साकेत शर्मा भारद्वाज और उस के पिता ओमप्रकाश भारद्वाज भी मौजूद थे. संजय ने कहा, ‘‘फूफाजी, हमारी कंपनी का ग्लोबल फाइनैंशियल कारपोरेशन के नाम की कंपनी के साथ टाईअप है. यह कपंनी थाईलैंड के रहने वाले डेविड वेल्हम की है. भारत में इस कंपनी की फ्रेंचाइजी हमारे पास है. मैं आप की कंपनी के पदाधिकारियों के साथ मीटिंग करा दूंगा.’’

‘‘आप जल्द से जल्द हमारी उन से मीटिंग करा दें.’’ नरेश शर्मा ने कहा.

‘‘आप चिंता न करें. मैं डेविड वेल्हम से कहता हूं कि वह समय निकाल कर जल्द ही इंडिया आ कर मीटिंग कर लें.’’ संजय शर्मा भारद्वाज ने कहा.

संजय शर्मा ने डेविड से बात करने के बाद 3 मई, 2012 को मीटिंग का कार्यक्रम निश्चित कर लिया. मीटिंग के लिए दक्षिणी दिल्ली के ओखला स्थित पांच सितारा होटल क्राउन प्लाजा को चुना गया. निर्धारित समय पर नरेश शर्मा अपने भाई और कंपनी के महत्वपूर्ण कागजातों के साथ होटल क्राउन प्लाजा पहुंच गए. संजय शर्मा भारद्वाज और उस के भाई साकेत शर्मा भारद्वाज ने नरेश शर्मा और रमेश शर्मा की मुलाकात डेविड वेल्हम से कराई. डेविड वेल्हम के साथ और भी कई लोग थे. डेविड ने उन का परिचय राज मल्होत्रा, पूजा कक्कड़ और एडवोकेट नीरज गुप्ता के रूप में कराया.

डेविड ने बताया कि उन की कंपनी का कारोबार पूरे संसार में फैला है, जिसे कंपनी के 70 प्रबंधकीय सदस्य देख रहे हैं. दिल्ली में कंपनी का काम राज मल्होत्रा, पूजा कक्कड़ और एडवोकेट नीरज गुप्ता देख रहे हैं. डेविड की बात की पुष्टि संजय शर्मा भारद्वाज ने भी की. लोन के बारे में बात हुई तो एडवोकेट नीरज गुप्ता ने कहा कि आप जो 400 करोड़ का लोन लेना चाहते हैं, उस में 300 करोड़ रुपए पर साढ़े 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज और शेष 100 करोड़ रुपए पर 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगेगा. यह लोन उन्हें 9 साल के अंदर अदा करना होगा. लेकिन कंपनी के नियम के अनुसार, उन्हें 400 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की संपत्ति कंपनी के पास गिरवी रखनी होगी. लोन की साढ़े 3 प्रतिशत प्रौसेसिंग फीस उन्हें अलग से देनी होगी.

डील तय हो जाने के बाद डेविड वेल्हम ने कहा, ‘‘मिस्टर नरेश शर्मा, यह काररवाई आगे बढ़ने से पहले कुछ कागजी औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी. उस के लिए हमारे सीए वगैरह आप की कंपनी का दौरा कर के कुछ कागजों को देखेंगे. इसलिए हम चाहते हैं कि आप जल्द से जल्द यह काम करा दें, ताकि आप की फाइल आगे बढ़ सके.’’

नरेश शर्मा चाहते थे कि सारी औपचारिकताएं जल्दी पूरी हो जाएं, जिस से उन्हें जल्दी लोन मिल जाए. इसलिए उन्होंने कह दिया, ‘‘बेशक, आप को जो भी डाक्यूमेंट्स देखने हैं, देख लीजिए. हमारे सभी डाक्यूमेंट्स तैयार हैं.’’

इस के बाद जून में ग्लोबल फाइनैंशियल कारपोरेशन की एक टीम नरेश शर्मा की कंपनियों की जांच के लिए कच्छ पहुंच गई. टीम में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स और वकीलों के अलावा कुछ विशेषज्ञ भी शामिल थे. कंपनी ने उन की तीनों कंपनियों के स्टाक, इनकम टैक्स रिटर्न की फाइलों को देखा. टीम ने यह भी देखा कि मौजूदा समय में उन की तीनों कंपनियों की संपत्ति की वैल्यू क्या है. नरेश शर्मा लोन के एवज में जिस संपत्ति को गिरवी रख रहे थे, उस के कागजों की भी जांच की गई. इस के अलावा आसपास की बैंकों से भी यह जानने की कोशिश की गई कि उन कंपनियों पर कितना लोन बकाया है. सारी जांचें पूरी करने के बाद टीम ने अपनी रिपोर्ट कंपनी को दे दी.

टीम ने अपनी जो रिपोर्ट कंपनी को दी थी, उस में बताया गया था कि नरेश शर्मा की तीनों कंपनियों की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है. इस के अलावा उन कंपनियों पर पहले से ही बैंकों का करोड़ों रुपए बकाया है. गिरवी के जो पेपर हैं, वे भी पूरे नहीं हैं. इस स्थिति में इन कंपनियों को 400 करोड़ रुपए का लोन नहीं दिया जा सकता. संजय शर्मा भारद्वाज ने यह खबर अपने फूफा नरेश शर्मा को दी तो वह परेशान हो गए. परेशान होने की बात भी थी, क्योंकि उन्हें संजय के ऊपर भरोसा था कि वह उन का लोन मंजूर करा देगा. लोन का पैसा किसकिस मद में कितना खर्च करना है, वह इस की योजना भी बना चुके थे. इसलिए उन्होंने संजय से कहा कि लोन के कागजात पूरे करने के लिए जो भी पैसे खर्च होंगे, वह खर्च करने को तैयार हैं. किसी भी तरह वह उन्हें लोन दिला दे.

‘‘फूफाजी, टीम ने जो रिपोर्ट दी है, उस में सब से ज्यादा महत्वपूर्ण गिरवी के कागजात हैं. बस वे कागज पूरे हो जाएं तो आगे की काररवाई मैं करा दूंगा. आप जो लोन ले रहे हैं, उस की प्रौसेसिंग फीस साढ़े 3 प्रतिशत के हिसाब से 14 करोड़ रुपए होती है. ऐसा कीजिए, आप उस में से एक करोड़ रुपए जमा करा दीजिए. गिरवी के कागजों के लिए मैं किसी और से बात करता हूं.’’ संजय शर्मा भारद्वाज ने कहा.

नरेश को प्रौसेसिंग फीस देनी ही थी, इसलिए उन्होंने संजय शर्मा के कहने पर एक करोड़ का चैक परवेज के नाम से काट दिया. परवेज फरीदाबाद में रहता था और संजय का साथी था. कुछ दिनों बाद संजय शर्मा ने कहा कि उस की नोएडा के धर्मजीत नाम के एक आदमी से बात हुई है, वह अपनी प्रौपर्टी के कागज आप के लोन के लिए गिरवी रख देगा. लेकिन इस में करीब 10 करोड़ रुपए खर्च होंगे. नरेश शर्मा तैयार हो गए. उन्होंने ओखला के उसी क्राउन प्लाजा होटल में फिर से संजय शर्मा, डेविड वेल्हम, राज मल्होत्रा, पूजा कक्कड़, नीरज गुप्ता आदि के साथ मीटिंग की और 10 करोड़ रुपए गिरवी पेपरों के एवज में दे दिए.

लोन की सारी औपचारिकताएं लगभग पूरी हो चुकी थीं. नरेश शर्मा को उम्मीद थी कि अब उन्हें लोन मिल जाएगा. संजय शर्मा ने उन से 2 करोड़ रुपए और ले लिए. साथ ही यह भी कहा कि प्रौसेसिंग फीस के जो 11 करोड़ रुपए बचे हैं, वे लोन मिलने के बाद दे देना. संजय की यह बात सुन कर नरेश शर्मा खुश हुए, क्योंकि हर एक कंपनी अपनी प्रौसेसिंग फीस पहले लेती है, लेकिन ग्लोबल फाइनैंशियल कारपोरेशन कंपनी उन से प्रौसेसिंग फीस केवल संजय शर्मा की वजह से बाद में लेने की बात कह रही थी. नरेश शर्मा इस के लिए संजय शर्मा को धन्यवाद दे रहे थे.

नरेश शर्मा का कोई मामला आस्ट्रेलिया के न्यायालय में चल रहा था. चूंकि डेविड वेल्हम का अपनी कंपनी के काम की वजह से अलगअलग देशों में जाना लगा रहता था, इसलिए डेविड से अपने आस्ट्रेलिया वाले मामले पर बात की. डेविड ने भरोसा दिया कि वह इस मामले को निपटवा देगा, लेकिन दूसरे पक्ष को तैयार करने के लिए कुछ खर्चा करना होगा. नरेश शर्मा आस्ट्रेलिया वाले मामले को निपटवाना चाहते थे. उन्होंने डेविड से बात कर के उसे 50 लाख रुपए दे दिए. वह इन लोगों को कुल मिला कर साढ़े 12 करोड़ रुपए दे चुके थे. उन की संजय और अन्य लोगों से फोन पर बातचीत होती रहती थी. संजय बताता रहता था कि लोन की फाइल पर किसकिस के हस्ताक्षर होने बाकी हैं, उन का यह काम जल्द हो जाएगा.

एक दिन संजय ने उन्हें फोन कर के उन का लोन मंजूर होने की जानकारी दी, साथ ही यह भी बता दिया कि बड़ौदा की किसी कंपनी ने उन की कंपनी से लोन ले रखा था, वह उस लोन के 50 करोड़ रुपए कैश के रूप में दे रही है. जैसे ही वहां से पैसे मिलेंगे, आप के पास पहुंचा दिए जाएंगे, बाकी के पैसे आप की बालाजी कोल इंडस्ट्री के बैंक खाते में पहुंच जाएंगे. यह खबर सुन कर नरेश शर्मा और रमेश शर्मा बेहद खुश हुए. उन्होंने अपनी इंडस्ट्री के आधुनिकीकरण की जो योजना बना रखी थी, उस के साकार होने की शुरुआत होने वाली थी. अब केवल उन्हें पैसे आने का इंतजार था. पैसे मिलते ही वह यह काम कराने को आतुर थे.

लोन मंजूर होने के करीब 15 दिनों बाद भी नरेश शर्मा की कंपनी के खाते में पैसे नहीं पहुंचे, वह नकदी भी नहीं आई, जो बड़ौदा से आनी थी. तब उन्होंने संजय शर्मा से फोन पर बात की. संजय शर्मा उन्हें कोई न कोई बहाना बना कर टालता रहा. इसी तरह कई महीने बीते गए. नरेश शर्मा समझ नहीं पा रहे थे कि जब उन का लोन मंजूर हो गया है तो उसे देने में देर क्यों की जा रही है. चूंकि संजय शर्मा उन का रिश्तेदार था, इसलिए वे उस से अपनी नाराजगी भी नहीं जता पा रहे थे. किसी तरह वे उस की बातों पर विश्वास करते रहे.

शक तो उन्हें तब हुआ, जब दिसंबर, 2013 में एक दिन उस का मोबाइल स्विच्ड औफ हो गया. फोन के लगातार स्विच्ड औफ होने पर रमेश शर्मा भी परेशान हुए, क्योंकि संजय उन के साले ओमप्रकाश भारद्वाज का बेटा था. उन्होंने ओमप्रकाश और उन के दूसरे बेटे साकेत शर्मा को फोन मिलाया तो उन के फोन भी बंद पाए गए. नरेश शर्मा ने संजय के साथियों के फोन पर बात करनी चाही तो उन के नंबर भी स्विच्ड औफ या पहुंच से दूर बताए गए. इस से उन्हें अपने साथ धोखाधड़ी होने का अहसास हुआ.

नरेश शर्मा उन लोगों को साढ़े 12 करोड़ रुपए से अधिक दे चुके थे. यह रकम कोई मामूली रकम नहीं थी, लिहाजा उन्होंने उन लोगों की पहले तो अपने स्तर से खोजबीन की, लेकिन जब उन्हें कोई सफलता नहीं मिली तो उन्होंने सन 2014 में दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त सतीश गोलचा से मुलाकात कर अपने साथ की गई धोखाधड़ी की जानकारी विस्तार से दी.

संजय शर्मा भारद्वाज, सकेत शर्मा भारद्वाज, आदि के नाम सुन कर संयुक्त आयुक्त चौंके, क्योंकि इन्हीं लोगों के खिलाफ सन 2009 में विन पौवर मार्केटिंग प्रा.लि. और सिंधी केबल एंड कंडक्टर्स प्रा.लि. नाम की कंपनियों के निदेशक अशोक कुमार अग्रवाल ने आर्थिक अपराध शाखा में रिपोर्ट दर्ज कराई थी. अशोक कुमार अग्रवाल का कहना था कि उन की कंपनी को पौवर ग्रिड कारपोरेशन औफ इंडिया, आसाम स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड, डिपार्टमेंट औफ पौवर नागालैंड की विभिन्न परियोजनाओं का कौन्ट्रैक्ट मिलना था.

इस कौन्ट्रैक्ट के लिए इन कंपनियों ने 33 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी मांगी थी. यह गारंटी उन्हें 15 से 30 दिनों के अदंर देनी थी. इतनी जल्दी यह गारंटी उपलब्ध कराना उन के लिए आसान नहीं था. फिर भी वह किसी तरह से बैंक गारंटी उपलब्ध कराने की कोशिश करने लगे. उन्हीं दिनों 22 फरवरी, 2009 को उन्होंने अंगरेजी समाचार पत्र ‘द टाइम्स औफ इंडिया’ में एसएस कैपिटल एंड फाइनैंशियल सर्विस का एक विज्ञापन देखा, जिस में हर तरह के लोन, बैंक गारंटी आदि उपलब्ध कराने को कहा गया था. इस विज्ञापन में दिए गए पते पर अशोक कुमार अग्रवाल ने संपर्क किया तो उन की ओमप्रकाश भारद्वाज से बात हुई. उन्होंने ही अशोक कुमार अग्रवाल को कंपनी के औफिस में बात करने के लिए बुलाया.

इस कंपनी का औफिस दक्षिणपूर्व दिल्ली के खानपुर स्थित देवली रोड पर था. अशोक कुमार अग्रवाल औफिस पहुंचे तो वहां पर ओमप्रकाश भारद्वाज और उन के दोनों बेटे संजय शर्मा भारद्वाज और साकेत शर्मा भारद्वाज मिले. इन लोगों से उन्होंने बैंक गारंटी के संबंध में बात की तो उन लोगों ने बैंक गारंटी उपलब्ध कराने के नाम पर उन से 1,09,22,380 रुपए मांगे. रुपए मिलने के बाद उन्होंने विभिन्न 27 बैंकों की गारंटी के पेपर अशोक कुमार अग्रवाल को दे दिए.

जिन कंपनियों से अशोक कुमार अग्रवाल की कंपनी के लिए कौंट्रैक्ट की बात चल रही थी, वहां पर उन्होंने ओमप्रकाश भारद्वाज से मिले बैंक गांरटी के पेपर जमा करा दिए. बैंक गारंटी के पेपरों की जांच की गई तो वे फरजी पाए गए. उन्होंने शिकायत के लिए ओमप्रकाश भारद्वाज से संपर्क करना चाहा तो उन का और उन के बेटों का फोन बंद मिला, साथ ही खानपुर के औफिस पर भी ताला लग गया था. ठगी का अहसास होने पर अशोक कुमार अग्रवाल ने इस की शिकायत संयुक्त आयुक्त सतीश गोलचा से की. इस के बाद नामजद आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धारा 406/420/467/468/471/120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया और मामले की जांच सबइंसपेक्टर उमेश शर्मा को सौंप दी गई थी.

धोखाधड़ी का यह मामला भी संजय शर्मा भारद्वाज और उस के साथियों द्वारा अंजाम दिया गया था, इसलिए संयुक्त आयुक्त सतीश गोलचा ने नरेश शर्मा वाले मामले को भी आर्थिक अपराध शाखा को सौंप दिया. उन के आदेश पर 17 दिसंबर, 2014 को आर्थिक अपराध शाखा में संजय शर्मा भारद्वाज, साकेत शर्मा भारद्वाज, डेविड वेल्हम, नीरज गुप्ता, राज मल्होत्रा उर्फ अरुण शर्मा आदि के खिलाफ भादंवि की धारा 406/420/120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस मामले की भी जांच सबइंसपेक्टर उमेश शर्मा को सौंपी गई.

पुलिस आयुक्त ने इन की गिरफ्तारी पर 50 हजार का इनाम भी घोषित कर दिया था. आरोपियों ने बेहद शातिराना तरीके से करोड़ों रुपए की ठगी की थी, इसलिए जाहिर था कि वे शातिर दिमाग के थे. संयुक्त आयुक्त के निर्देश पर आर्थिक अपराध शाखा के डीसीपी मंगेश कश्यप ने इन धोखेबाजों की तलाश के लिए एसीपी एम.एस. शेखावत की देखरेख में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में सबइंसपेक्टर उमेश शर्मा, अवधेश कुमार, एएसआई हरजीत सिंह, हैडकांस्टेबल रविंद्र त्यागी, बिट्टू तोमर, अजीब कुमार, कांस्टेबल संजय, धर्मेंद्र आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने नामजद आरोपियों की तलाश शुरू की. उसी बीच पता चला कि संजय शर्मा भारद्वाज के खिलाफ मुंबई, मध्य प्रदेश, जयपुर में भी धोखाधड़ी के एक दर्जन से ज्यादा मामले दर्ज हैं. इन के बैंक खातों में जो पते दर्ज थे, पुलिस उन पतों पर गई तो वहां कोई नहीं मिला. इस के बाद पुलिस ने उन के फोन नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया. फोन के लोकेशन के आधार पर पुलिस ने 24 जून, 2015 को फरीदाबाद के सेक्टर-31 से राज मल्होत्रा उर्फ अरुण शर्मा और परवेज को गिरफ्तार कर लिया. अरुण शर्मा उर्फ राज मल्होत्रा वहां कोठी किराए पर ले कर रह रहा था.

पुलिस ने दोनों से संजय शर्मा भारद्वाज और अन्य लोगों के बारे में पता किया तो वे किसी के बारे में कुछ भी नहीं बता पाए. पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. बाकी अभियुक्तों को पुलिस तलाशती रही. इसी बीच 3 महीने बाद राज मल्होत्रा उर्फ अरुण शर्मा और परवेज जमानत पर छूट कर जेल से बाहर आ गए. पुलिस इन दोनों की गतिविधियों पर निगरानी रखने लगी. क्योंकि उसे उम्मीद थी कि गैंग के बाकी साथी इन लोगों से मिलने जरूर आएंगे. पुलिस सर्विलांस के जरिए संजय शर्मा भारद्वाज के फोन पर होने वाली बातों को सुन रही थी. उस का मोबाइल फोन उदयपुर के पास सुखेर कस्बे में ऐक्टिव था.

पुलिस टीम वहां पहुंची तो पता चला कि उस मोबाइल का उपयोग पवन नाम का एक ज्वैलर कर रहा था. पूछताछ में पवन ने बताया कि उस ने यह मोबाइल किसी से खरीदा था, जिस का नाम वह नहीं जानता, लेकिन वह 1-2 दिन बाद मार्केट में घूमता दिखाई दे जाता है. पुलिस के पास संजय का फोटो था ही, इसलिए टीम ने सुखेर कस्बे में डेरा डाल दिया. 10 सितंबर, 2015 को संजय अपनी एसेंट कार से बाजार आया तो कार में बैठे होने के बावजूद उसे पवन ज्वैलर ने पहचान लिया. पुलिस ने अपनी प्राइवेट गाड़ी उस की कार के पीछे लगा दी. कुछ देर बाद उस की कार सुखेर में ही कृष्णा अपार्टमेंट के आगे रुकी. जैसे ही वह कार से उतर कर अपने फ्लैट में घुसा, पुलिस ने उसे पकड़ लिया. वहां उस का कोई साथी नहीं मिला. पूछताछ में उस ने अपने किसी साथी का ठिकाना नहीं बताया.

पुलिस संजय शर्मा भारद्वाज को ले कर दिल्ली आ गई. अगले दिन उसे मुख्य महानगर दंडाधिकारी वीना रानी की अदालत में पेश कर के 4 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि के दौरान पुलिस उस से उस के अन्य साथियों के बारे में पता नहीं कर सकी. लिहाजा रिमांड खत्म होने पर उसे न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक पुलिस अन्य अभियुक्तों को गिरफ्तार नहीं कर सकी थी. Gujarat Fraud Case

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: दुष्कर्म में फंसे राजद विधायक राजवल्लभ यादव

True Crime Story: रूपम पाठक ने यौनशोषण करने वाले एक आरोपी विधायक राजकिशोर केसरी को खुद मौत के घाट उतार दिया था. जबकि दूसरे आरोपी विपिन राय को कोर्ट ने 10 साल की सजा सुना दी है.

10 मार्च, 2016 को बिहार के पूर्णिया जिले के अपर सत्र न्यायाधीश (तृतीय) मोहम्मद एजाउद्दीन की अदालत खचाखच भरी थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन बहुचर्चित रूपम पाठक यौनशोषण कांड का फैसला सुनाया जाना था. इस केस में भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी और उन का सहायक विपिन राय आरोपी थे. इसलिए वकीलों के अलावा अन्य तमाम लोग उस दिन अदालत में पहुंच कर माननीय न्यायाधीश द्वारा सुनाए जाने वाले फैसले का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे.

मामले में विधायक के फंसने के बाद दूसरी पार्टियों के नेताओं ने इसे बहुत तूल दिया था. इस केस के सहारे वे अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने की कोशिश कर रहे थे. बाद में इस केस में कई उतारचढ़ाव आए. यह पूरा मामला क्या था और विधायक राजकिशोर केसरी इस केस में कैसे फंसे, जानने के लिए हमें अतीत में जाना होगा. दरअसल, रूपम अपने पति और 2 बच्चों के साथ इंफाल में रहती थी. सन 2006 में वह अपने पति अशोक पाठक और बच्चों के साथ बिहार के पूर्णिया शहर आ गई और शहर के ओली टोला में राजहंस पब्लिक स्कूल खोल लिया.

सन 2007 में स्कूल के सालाना जलसे में उस ने चीफ गेस्ट के रूप में पूर्णिया के विधायक राजकिशोर केसरी को बुलाया. वहीं से रूपम और विधायक की जानपहचान बढ़ी. विधायक के साथ उन का सहायक विपिन राय भी जलसे में पहुंचा था. जलसे में विधायक ने स्कूल के विकास के लिए विधायक फंड से रकम देने का ऐलान किया था. रूपम राजकिशोर के उसी झांसे में फंस गई थी. उसे यह लालच हो गया कि विधायक की मदद से वह अपने स्कूल की काफी तरक्की कर सकती है, जिस से उस की आमदनी में काफी इजाफा हो जाएगा. जलसा खत्म होने के कुछ दिनों बाद जब रूपम विधायक से रुपए पाने के लालच में उन के मधुबनी वाले घर पहुंची तो वहां मौजूद उस के सहायक विपिन से उस ने बात की.

विपिन ने रूपम के सामने पेशकश रखी कि यदि उसे स्कूल के लिए आर्थिक मदद चाहिए तो उसे विधायक के साथ बिस्तर पर जाना होगा. रूपम ने मना किया तो विपिन ने उसे जबरन विधायक के कमरे में धकेल कर दरवाजा बंद कर दिया. कमरे में पहले से मौजूद विधायक ने रुपए देने के बहाने उस के साथ बलात्कार किया. इतना ही नहीं, जब वह विधायक के कमरे से निकली तो विपिन ने भी डराधमका कर उस के साथ मनमानी की. उस के बाद विपिन जबतब रूपम के घर पहुंचने लगा और उसे ब्लैकमेल करने लगा.

वह रूपम से कहता था कि जैसा वह कहता है, करती रहे नहीं तो सारे शहर में उस की बदनामी करा देगा. इसी डर से रूपम कई सालों तक उन दोनों के शोषण का शिकार होती रही. फिर हिम्मत जुटा कर रूपम ने 18 अप्रैल, 2009 को विधायक राजकिशोर केसरी और उन के सहयोगी विपिन राय पर पिछले 3 सालों से दुराचार करने का आरोप लगाया. रूपम ने इस की शिकायत तत्कालीन एसपी से की थी. शिकायत के आधार पर पूर्णिया के केहाट थाने में दोनों आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. पुलिस ने सीजेएम कोर्ट में धारा-164 के तहत 18 जून, 2010 को रूपम का बयान रिकौर्ड कराया तो रूपम एफआईआर में लगाए गए आरोपों से पलट गई. इस का लाभ विधायक को मिला.

फिर एसपी ने इस मामले की जांच कराई और विधायक पर लगाए गए आरोप को बेबुनियाद करार देते हुए 7 सितंबर, 2010 को सीजेएम कोर्ट में अपनी ओर से आखिरी रिपोर्ट फाइल करते हुए जांच को बंद कर दिया. इस के 10 दिनों बाद 16 सितंबर, 2010 को रूपम ने उसी कोर्ट में प्रोटेस्ट पिटीशन दायर किया, जिस में उस ने 18 जून, 2010 को धारा-164 के तहत दिए बयान को दबाव में दिया गया बयान बताया. कोर्ट ने उस की पिटीशन मंजूर कर के सुनवाई के लिए 25 मार्च, 2011 की तारीख निश्चित कर दी.

इस के बाद इस केस में नया मोड़ तब आया, जब रूपम ने दिनदहाड़े विधायक राजकिशोर केसरी की चाकू मार कर हत्या कर दी. बात 4 जनवरी, 2011 की सुबह करीब सवा 9 बजे के आसपास की है. विधायक राजकिशोर केसरी अपने समर्थकों से अपने ही घर में बातचीत कर रहे थे. उसी दौरान शाल लपेटे रूपम वहां पहुंची. वह विधायक से बोली कि उसे उन से कुछ खास बात करनी है. विधायक ने सोचा कि शायद केस के बारे में कुछ बात करने आई होगी. इसलिए वह अपने समर्थकों के बीच से उठ कर उस के साथ किनारे की ओर बढ़ने लगे.

कुछ आगे बढ़ने के बाद रूपम ने अपना शाल हटाया और दनादन चाकू से विधायक के पेट पर वार करने लगी. खून से लथपथ विधायक घायल हो कर जमीन पर गिर पड़े. आननफानन में उन के समर्थक उन्हें उठा कर सदर अस्पताल ले गए, लेकिन इलाज के दौरान सवा 10 बजे के करीब उन की मौत हो गई. विधायक के घर में घुस कर सुरक्षागार्डों और उन के समर्थकों के बीच रूपम ने उन की हत्या कर दी. रूपम जैसी पढ़ीलिखी महिला ने विधायक की हत्या कर जीवन भर जेल की सलाखों के पीछे रहने का फैसला आखिर क्यों किया? इस राज का खुलासा पुलिस और अदालत की काररवाई के दौरान हुआ.

पुलिस ने विधायक की हत्या के आरोप में रूपम पाठक को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. रूपम ने पुलिस को दिए अपने बयान में कहा था कि वह विधायक के खिलाफ ठीक से कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकती थी. उसे इस बात की आशंका थी कि विधायक की दबंगई की वजह से उसे न्याय नहीं मिल पाएगा, इसलिए उस ने खुद ही सजा देने का फैसला किया. जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई, उस में बताया गया था कि हृदय से जुड़ी एब्डोमिनल एरोटा नस (महाधमनी) के कट जाने की वजह से विधायक की मौत हुई थी. राजकिशोर केसरी सन 2000 में पहली बार विधायक बने थे.

उस के बाद वह 4 बार पूर्णिया विधानसभा सीट से जीते थे. इस हत्याकांड से बिहार की सियासत में हलचल मच गई थी. उस समय राज्य में जदयू और भाजपा की सरकार थी. सरकार दोनों के बेहतर तालमेल के साथ चल रही थी. भाजपा विधायक पर जब रूपम ने दुराचार और 3 सालों तक यौनशोषण का आरोप लगाया था तो भाजपा की काफी फजीहत हुई थी. इस मामले की जांच के लिए भाजपा के वरिष्ठ नेता और उस समय के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी खुद 30 मई, 2010 को पूर्णिया गए थे. हर भाजपा नेता यही रट लगा रहा था कि रूपम ने विधायक केसरी पर मनगढं़त आरोप लगा कर उन की छवि को खराब करने की कोशिश की थी.

विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या के बाद अदालत ने रूपम के प्रोटेस्ट पिटीशन से विधायक का नाम हटा दिया. करीब एक साल तक चले गवाहों के बयान के बाद चीफ जुडीशियल मजिस्ट्रेट ने आरोपी विपिन राय के खिलाफ मामला संज्ञान में लिया. तब 19 मार्च, 2012 को विपिन राय ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया. तब से ले कर इस केस की सुनवाई अदालत में होती रही. अपर सत्र न्यायाधीश (तृतीय) मोहम्मद एजाउद्दीन ने इस केस का फैसला 10 मार्च 2016 को सुनाने का दिन मुकर्रर किया. इसलिए फैसले को जानने के लिए तमाम लोग अदालत में पहुंच गए थे.

विपिन के वकील जनार्दन प्रसाद ने कोर्ट में यह दलील दी कि आरोपी की आयु का खयाल रखते हुए उस के अपराध पर सहानुभूति बरती जाए और कम से कम सजा दी जाए. वहीं पीडि़ता रूपम पाठक के वकील ने आरोपी विपिन को कठोरतम सजा देने की मांग की थी. दोनों पक्षों को सुनने के बाद माननीय न्यायाधीश मोहम्मद एजाउद्दीन ने विपिन राय को 10 साल के सश्रम कारावास की सजा के साथ 50 हजार रुपए का जुरमाना भी भरने का आदेश दिया. अदालत ने कहा कि जुरमाने की 80 फीसदी रकम पीडि़ता को दी जाए. उधर विधायक की हत्या के मामले में निचली अदालत ने रूपम को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. वह भी जेल की रोटियां तोड़ रही है. फिलहाल रूपम भागलपुर जेल में कैद है.

विधायक ने सैक्स के चक्कर में फंस कर अपनी जान गंवाई. अब विपिन की जवानी भी अंधेरी कालकोठरी में कटेगी. वहीं रुपयों के लालच में फंस कर रूपम ने इज्जत और आगे की जिंदगी दोनों बरबाद कर ली. राजकिशोर की हत्या के बाद उन का परिवार, विपिन के जेल जाने के बाद उस का परिवार और रूपम को उम्रकैद मिलने के बाद उस का परिवार भी घर पर सजा भुगतने को मजबूर है. यानी अविवेक में उठाए गए कदम का खामियाजा तीनों के परिवार भुगत रहे हैं. True Crime Story