Love Story: खूनी इश्क

Love Story: फूलजहां की जिद के आगे झुकते हुए फौजदार उस की शादी अच्छन से करने को राजी हो गए थे. लेकिन उस के भाइयों को न जाने उस की शादी पर क्यों ऐतराज था कि उन्होंने फूलजहां के न मानने पर उसे मार दिया. दिन भर की यात्रा पूरी कर के जिस तरह सूरज अपने घर लौटने को बेताब था, उसी तरह घर लौटने को बेताब पक्षी भी कोलाहल मचाते हुए अपने ठिकाने की ओर लौट रहे थे. उन का यह शोर वातावरण को बेहद खुशनुमा बना रहा था. लेकिन इस सब से बेखबर अच्छन चहलकदमी करते हुए गांव की ओर से आने वाली पगडंडी पर नजरें जमाए था.

उस के चेहरे के भावों से ही लग रहा था कि उसे किसी का बड़ी बेसब्री से इंतजार है. शायद उसी के इंतजार में कभी उस की नजर घड़ी पर जाती थी तो कभी गांव की ओर जाने वाली पगडंडी पर. आखिर इंतजार की घडि़यां खत्म हुईं और फूलजहां आती हुई दिखाई दे गई. उसे आता देख कर अच्छन के चेहरे पर सुकून के भाव आ गए और होंठ मुसकरा उठे. उस ने फूलजहां के पास जा कर कहा, ‘‘फूल, आज आने में तुम ने बड़ी देर कर दी, तुम्हारा इंतजार करतेकरते मेरी आंखें पथरा गईं. मुझे तो लगने लगा था कि तुम आओगी ही नहीं.’’

‘‘अच्छू, मुझे आने में थोड़ी देर क्या हो जाती है, तुम बेचैन हो उठते हो. अब मैं तुम्हारी तरह लड़का तो हूं नहीं कि जहां मरजी हो, चल दूं. लड़की हूं न, 10 बहाने बनाने पड़ते हैं, तब कहीं जा कर घर से निकल पाती हूं.’’

‘‘मैं तुम्हारी परेशानी समझता हूं, लेकिन मैं अपने इस दिल को कैसे समझाऊं, जो जब तक तुम्हें देख नहीं लेता, उसे चैन नहीं मिलता. इन आंखों को तुम्हारी मजबूरी कैसे बताऊं, जो हर वक्त तुम्हें देखने के लिए बेचैन रहती हैं.’’ अच्छन ने कहा.

उस के प्यार भरे ये बोल सुन कर फूलजहां के गाल लाल हो उठे और पलकें झुक गईं. उस ने शरमाते हुए पूछा, ‘‘अच्छू, एक बात पूछूं, तुम मुझे हमेशा इसी तरह प्यार करते रहोगे न? कभीकभी मुझे डर लगता है कि कहीं तुम मुझे बीच मंझधार में छोड़ कर किसी और के न हो जाओ?’’

‘‘फिर कभी ऐसी बातें मत करना फूल,’’ फूलजहां की इस बात पर अच्छन तड़प कर बोला, ‘‘मैं पूरी दुनिया को छोड़ सकता हूं, पर तुम से अलग नहीं हो सकता. अगर कभी तुम्हें लगे कि मैं तुम से दूर हो रहा हूं तो बेझिझक तुम मुझे अपने हाथों से जहर दे देना. मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं होगी, क्योंकि जिंदगी में मैं ने केवल तुम्हें चाहा है.’’

अच्छन आगे कुछ और कहता, फूलजहां ने आगे बढ़ कर उस के होंठों पर उंगली रख दी, ‘‘बसबस, बहुत हो गया. मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था. मुझे तुम पर पूरा भरोसा है.’’

उत्तर प्रदेश के जनपद शाहजहांपुर का एक कस्बाथाना है परौर. इसी थाने के बम्हनी चौकी गांव में फौजदार अपने परिवार के साथ रहते थे. उन का काफी बड़ा परिवार था. पत्नी शकीना बेगम के अलावा 8 बेटे और 4 बेटियां थीं. बेटों में जगनूर, गुल हसन, मसनूर हसन, शब्बन, जाहिद, गुल मोहम्मद उर्फ नन्हे, नूर हसन, नबी हसन और बेटियां आसीन, रियासीन, मरजीना तथा फूलजहां थीं. फौजदार के बेटे जैसेजैसे बड़े होते गए, काम पर लगते गए. इस समय उन के सभी बेटे दिल्ली में अलगअलग फैक्ट्रियों में नौकरी कर रहे हैं. बेटियां जैसेजैसे सयानी हुईं, उन्होंने उन की शादियां कर दीं. इस तरह उन की दोनों बड़ी बेटियों का निकाह हो चुका है. बेटों में केवल गुल हसन का निकाह हुआ है. वह अपनी पत्नी और बच्चों को ले कर दिल्ली में रहता है.

फौजदार की दोनों छोटी बेटियां मरजीना और फूलजहां भी विवाह लायक हो गईं थीं. फूलजहां सब से छोटी थी, इसलिए उस पर सभी का प्यार कुछ ज्यादा ही उमड़ता था. बड़े भाइयों ने तो उसे गोद में खिलाया था, इसलिए वह शुरू से ही उन की आंखों का तारा थी. यही वजह थी कि वह बोलने लायक हुई तो जैसे ही उस के मुंह से कुछ निकलता, उस के भाई झट उसे पूरी कर देते थे. इसी वजह से वह जिद्दी हो गई थी और अपनी हर बात मनवाने की कोशिश करती थी.

उस के घर से थोड़ी दूरी पर उस की फूफी का मकान था. उस के फूफा अकरम गांव में ही रह कर खेतीकिसानी करते थे. उन के एक बेटा अच्छन के अलावा 2 बेटियां थीं. धीरेधीरे अच्छन जवान हो चुका था. उसी दौरान ममेरी बहन फूलजहां से उसे प्यार हो गया था. रिश्ते में दोनों भाईबहन थे, बचपन से दोनों एकदूसरे के साथ खेलकूद कर बड़े हुए थे. लेकिन जवान होते ही उन की आंखों को एकदूसरे की सूरत भाने लगी थी, क्योंकि दिल ने दिल से प्यार की डोर जो बांध दी थी. वह प्यार की डोर जवान होने पर एकदूसरे को इतना करीब ले आई कि वे एकदूसरे से अलग होने की बात सपने में भी नहीं सोच सकते थे.

उम्र के 17वें बसंत में पहुंची छरहरी देहयष्टि वाली फूलजहां अब लड़कों से बातें करने में हिचकिचाने लगी थी. कोई लड़का उस की ओर देख लेता तो वह शरमा जाती. ये सारे बदलाव शायद जवान होने की वजह से आए थे. लेकिन अगर उस में कुछ नहीं बदला था तो वह था उस का जिद्दीपन और अच्छन के प्रति प्यार. जब भी अच्छन उस की आंखों के सामने होता, वह उसी को देखा करती. उस पल चेहरे पर जो खुशी होती थी, कोई भी देख कर भांप सकता था कि दोनों के बीच कुछ जरूर चल रहा है.

अच्छन को भी उस का इस तरह से देखना भाता था, क्योंकि उस का दिल भी तो फूलजहां के प्यार का मरीज था. दोनों की आंखों में एकदूसरे के लिए प्यार साफ झलकता था. वे इस बात को महसूस भी करते थे, लेकिन दिल की बात एकदूसरे से कह नहीं पा रहे थे. एक दिन फूलजहां अच्छन के घर पहुंची तो उस समय घर में वह अकेला ही था. फूलजहां को देखते ही उस का दिल तेजी से धड़क उठा. उसे लगा कि दिल की बात कहने का उस के लिए यह सब से अच्छा मौका है. अच्छन उसे कमरे में बैठा कर फटाफट 2 कप चाय बना लाया. चाय का घूंट भर कर फूलजहां ने दिल्लगी करते हुए कहा, ‘‘चाय तो बहुत अच्छी बनी है, तुम कहीं चाय की दुकान क्यों नहीं खोल लेते.’’

‘‘अगर तुम रोजना मेरी दुकान पर आ कर चाय पीने का वादा करो तो मैं आज ही दुकान खोले लेता हूं.’’ अच्छन ने फूलजहां की आंखों में झांकते उस की बात का जवाब उसी की अंदाज में दिया तो फूलजहां लाजवाब हो गई. दोनों इसी बात पर काफी देर तक हंसते रहे. अचानक अच्छन गंभीर हो कर बोला, ‘‘फूल, मुझे तुम से एक बात कहनी है.’’

‘‘कहो.’’

‘‘तुम बुरा तो नहीं मानोगी?’’

‘‘जब तक कहोगे नहीं कि बात क्या है, मुझे कैसे पता चलेगा कि अच्छा मानना है या बुरा.’’

‘‘फूल, मैं तुम से प्यार करता हूं. यह प्यार आज का नहीं, वर्षों का है, जो आज किसी तरह हिम्मत जुटा कर कह पाया हूं. ये आंखें सिर्फ तुम्हें देखना पसंद करती हैं और दिल को करार तुम्हारे पास रहने पर आता है. तुम्हारे प्यार में मैं इतना दीवाना हो चुका हूं कि अगर तुम ने मेरा प्यार स्वीकार नहीं किया तो मैं पागल हो जाऊंगा.’’

आखिर अच्छन ने दिल की बात कह ही दी, जिसे सुन कर फूलजहां का चेहरा शरम से लाल हो गया, पलकें झुक गईं. होंठों ने कुछ कहना चाहा, लेकिन जुबां ने साथ नहीं दिया. फूलजहां की हालत देख कर अच्छन बोला, ‘‘कुछ तो कहो फूल, क्या मैं तुम से प्यार करने लायक नहीं?’’

‘‘क्या कहना जरूरी है. तुम खुद को दीवाना कहते हो और मेरी आंखों में बसी चाहत को नहीं देख सकते. सच पूछो तो जो हाल तुम्हारा है, वही हाल मेरा भी है. मैं ने भी तुम्हें बहुत पहले से दिल में बसा लिया है. डरती थी कि कहीं यह मेरा एकतरफा प्यार न हो.’’

फूलजहां ने भी चाहत का इजहार कर दिया तो अच्छन खुशी से झूम उठा. उसे लगा कि सारी दुनिया की दौलत फूलजहां के रूप में उस की झोली में आ कर समा गई है. इस तरह दोनों के बीच प्यार का इजहार हो गया तो फिर एकांत में भी उन के मिलनेजुलने का सिलसिला शुरू हो गया. दोनों घंटों गांव के बाहर सुनसान में मिलने लगे. वे एकदूसरे पर जम कर प्यार बरसाते और हमेशा एकदूसरे का साथ निभाने की कसमें खाते. जैसेजैसे समय बीतता गया, दोनों की चाहत बढ़ती और प्रगाढ़ होती गई.

दोनों ने अपने प्यार को जमाने की नजरों से बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन जल्द ही उन की चाहत के चर्चे गांव की गलियों में तैरते हुए फूलजहां के पिता फौजदार के कानों तक पहुंच गए. उस ने फूलजहां को इस बात के लिए डांटाफटकारा, लेकिन फूलजहां पर उन के डांटने का कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि उस ने साफसाफ कह दिया कि वह अच्छन से प्यार करती है और निकाह भी उसी से करेगी. इस के बाद उन के घर में काफी वादविवाद हुआ, लेकिन फूलजहां अच्छन से निकाह करने की अपनी जिद पर अड़ी रही.

उधर अच्छन को पता चला तो उस ने भी अपने घर वालों से अपने दिल की बात बता दी. ऐतराज करने के बजाय अच्छन की मां ने अपने भाई फौजदार से उस की बेटी फूलजहां का निकाह अपने बेटे अच्छन से कराने की बात कही. वह उस समय तो कुछ नहीं बोले, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पत्नी शकीना से बात की तो फूलजहां की जिद और अच्छन के घर वालों की सहमति देख कर वह भी मन मार कर फूलजहां का निकाह अच्छन से करने को तैयार हो गए.

फूलजहां से पहले मरजीना का निकाह होना था, क्योंकि वह उस से बड़ी थी. लेकिन फूलजहां ने जिद पकड़ ली कि पहले उस का निकाह किया जाए, मरजीना का बाद में. मांबाप हमेशा अपनी औलादों के सामने असहाय हो जाते हैं. फौजदार भी फूलजहां की जिद के आगे मजबूर हो गए. फिर क्या था, फूलजहां और अच्छन के निकाह की तैयारियां शुरू हो गईं. लेकिन जब फूलजहां अच्छन के निकाह की बात फूलजहां के भाइयों गुल मोहम्मद उर्फ नन्हे और गुल हसन को पता चली तो न जाने क्यों उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगी. 12 अगस्त को वे दिल्ली से शाहजहांपुर पहुंचे और फूलजहां को अच्छन से निकाह न करने के लिए समझाने लगे, लेकिन फूलजहां नहीं मानी. अब इस बात को ले कर घर में रोज कलह होने लगी.

16 अगस्त की रात 10 बजे फूलजहां तंग आ कर अपने प्रेमी अच्छन के घर चली गई, जिस के बाद उस के दोनों भाइयों का अपने पिता फौजदार से काफी झगड़ा हुआ. बेटों के डर से फौजदार अगले दिन यानी 17 अगस्त की सुबह पत्नी शकीना और बेटी मरजीना को साथ ले कर अपने रिश्तेदारी में चले गए. सुबह होने पर अच्छन के मामा मुख्तयार ने नन्हे और गुल हसन के पास खबर भिजवाई कि वे आ कर अपनी बहन फूलजहां को ले जाएं. दूसरी ओर गांव में फूलजहां और अच्छन के निकाह को ले कर पंचायत बैठ गई. 5 घंटे तक पंचायत चली, लेकिन पंच किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे.

गांव में हो रही बदनामी से नन्हे और गुल हसन काफी नाराज थे. दोनों शराब खरीद कर ले आए और घर में बैठ कर पीने लगे. नशा चढ़ा तो गांव में हो रही बदनामी को ले कर दोनों में बात हुई कि बदनामी की जड़ फूलजहां है, इसे खत्म कर देना ही ठीक है. नन्हे ने छुरी उठाई और गुल हसन के साथ अच्छन के घर पहुंच गया. वहां फूलजहां अच्छन के साथ बैठी मिली. नन्हे फूलजहां के बालों को पकड़ कर घसीटते हुए बाहर निकालने लगा तो वह भाइयों से कहने लगी, ‘‘मुझे क्यों मार रहे हो, मैं ने आप लोगों का क्या बिगाड़ा है?’’

फूलजहां भाइयों से भिड़ गई. इस छीनाझपटी में नन्हे के हाथ से चाकू छूट गया, जिसे फूलजहां ने उठा लिया. उस ने अपने बचाव में चाकू चलाया तो वह नन्हे के हाथ में लग गया. गुल हसन ने किसी तरह उस के हाथ से चाकू छीन लिया और उसे घसीट कर अच्छन के घर से बाहर ले आया. दोनों भाई अच्छन को गालियां दे रहे थे. मौका देख कर अच्छन जान बचा कर भाग गया. गांव वालों ने दोनों भाइयों के सिर पर खून सवार देखा तो दुबक गए. उन्हें रोकने की किसी की हिम्मत नहीं हुई. दोनों भाई फूलजहां को घसीट कर अपने घर के पास ले आए और उसे जमीन पर पटक दिया. नन्हे ने उसे दबोच लिया तो गुल हसन छुरी से उस का गला इस तरह काटने लगा, जैसे किसी जानवर का काटा जाता है.

फूलजहां तड़पी, चिल्लाई, लेकिन बेदर्द भाइयों को उस पर बिलकुल रहम नहीं आया. गांव वाले भी अपनी आंखों के सामने सब कुछ होता देखते रहे, लेकिन आगे नहीं आए. कुछ ही पलों में फूलजहां की मौत हो गई. गुल हसन ने फूलजहां का सिर काट कर धड़ से अलग कर दिया. इस के बाद उसे एक कपड़े में बांध कर पूरे गांव में घूमे. लोग डर से अपने घरों में दुबक गए. इसी बीच किसी ने पुलिस के आने की बात कही तो दोनों भाई गांव छोड़ कर भाग गए.

दरअसल, दिनदहाड़े नृशंस हत्या होते देख गांव के चौकीदार महेश ने परौर थाने जा कर घटना की सूचना दे दी थी. घटना काफी संगीन थी, इसलिए थानाप्रभारी राजेश सिंह ने घटना की सूचना तुरंत उच्चाधिकारियों को दी और खुद पुलिस बल के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंच कर लाश का जायजा लेने के बाद उन्होंने गांव वालों से पूछताछ शुरू कर दी. इसी बीच सीओ जलालाबाद आदेश कुमार त्यागी भी पहुंच गए. पूछताछ के बाद थानाप्रभारी राजेश सिंह ने घटनास्थल की काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय भिजवा दिया.

थाने लौट कर राजेश सिंह ने चौकीदार महेश को वादी बना कर गुल मोहम्मद उर्फ नन्हे और गुल हसन के खिलाफ फूलजहां की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के बाद अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए छापे मारे जाने लगे. परिणामस्वरूप अगले दिन शाम 5 बजे नन्हे उन की पकड़ में आ गया. उस के  पास से हत्या में प्रयुक्त छुरी बरामद हो गई. 19 अगस्त को पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. इसी दिन फूलजहां की बिना सिर की लाश का पोस्टमार्टम हुआ. पोस्टमार्टम के बाद लाश गांव वालों के सुपुर्द कर दी गई. गांव वालों ने ही गांव से कुछ दूरी पर बने कब्रिस्तान में बिना सिर वाली फूलजहां की लाश को दफना दिया.

20 अगस्त को राजेश सिंह ने दोपहर को जुआ मोड़ से गुल हसन को गिरफ्तार कर लिया. उसे थाने ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि हत्या करने के बाद उस ने कपड़े में बंधे सिर को मोहनपुर गांव के पास रामगंगा के घाट पर जा कर पानी के तेज बहाव में फेंक दिया था. इस के बाद नाव से उस पार कटरी में जा कर छिप गया था. 19 अगस्त की रात वह ससुराल पहुंचा तो ससुराल वालों ने कहा कि इस तरह भागते रहने से अच्छा है कि वह थाने जा कर हाजिर हो जाए. इस के बाद 20 अगस्त की सुबह वह थाने जा रहा था, तभी जुआ मोड़ पर पुलिस ने उसे पकड़ लिया.

राजेश सिंह ने फूलजहां के कटे सिर को बरामद करने के लिए रामगंगा में एक दरजन गोताखोरों को उतारा, लेकिन फूलजहां का कटा सिर बरामद नहीं हो सका. अगले दिन गुल हसन को भी सीजेएम की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi crime story: इज्जत लुटा कर इलाज

Hindi crime story: तंत्रमंत्र की दुकानदारी   करने वाले ठग तांत्रिकों को पता होता है कि इज्जत लुटा कर भी जल्दी कोई औरत विरोध में खड़ी नहीं होगी, क्योंकि उसे बदनामी का डर होता है. इसी का वे फायदा भी उठाते हैं.

परिवार में किसी एक पर मुसीबत आ जाए तो इसे सहज रूप में लिया जा सकता है, लेकिन अगर पूरा परिवार ही किसी न किसी परेशानी से ग्रस्त हो तो दिमाग बहुत दूर तक की सोचने लगता है. इंसानी फितरत है कि परेशानी में आदमी जो भी सोचता है, उलटा ही सोचता है.

वीना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. परेशानी आने पर उस के दिमाग में भी उलटेसीधे विचार आने लगे थे. उसे लगने लगा था कि हो न हो, किसी ने ‘कुछ करा दिया है’. उस के दिमाग में यह बात गहरे तक बस गई थी. इस के बाद आसपड़ोस के लोगों से वह कहने लगी थी कि ‘किसी ऐसे तांत्रिक के बारे में बताओ, जो अपनी अलौकिक शक्तियों से उस के परिवार को परेशानियों से निजात दिला सके.’

कोई 7-8 साल पहले वीना की शादी महेश से हुई थी. 6 और 4 साल के उस के 2 बेटे थे. चंडीगढ़ के सब से बड़े कस्बे मनीमाजरा में किराए का मकान ले कर वह परिवार के साथ रहती थी. महेश का चावलों का कारोबार था. कुछ दिनों पहले तक इस परिवार में सब ठीकठाक था. वीना खुद भी सेहतमंद थी और उस के दोनों बच्चे तथा पति भी स्वस्थ थे. महेश का स्वास्थ्य ठीक था तो वह काम भी डट कर करता था. लिहाजा मेहनत के हिसाब से कमाई भी होती थी. परिवार में सब खुश थे.

लेकिन हालात ने करवट बदली तो सब बिगड़ता चला गया. वीना और उस के परिवार की खुशियों को जैसे किसी की नजर लग गई. बिना किसी बीमारी के ही महेश के स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी. इस का सीधा असर उस के काम पर पड़ा, आमदनी घट गई. इसी के साथ दोनों बच्चे भी अकसर बीमार रहने लगे. वीना और महेश को तीसरे बच्चे की चाहत नहीं थी. उसी परिस्थिति में लाख एहतियात बरतने के बावजूद वीना गर्भवती हो गई. पांव भारी हुए तो उस का भी स्वास्थ्य गिरने लगा. गर्भपात कराने के लिए वह डाक्टर के पास गई तो उस के स्वास्थ्य को देख कर डाक्टर ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया. फलस्वरूप गर्भ 7 महीने का था.

इस सब से वीना के दिमाग में एक बात बैठ गई कि उन से जलने वाले किसी आदमी ने उस के परिवार पर ‘कुछ’ करवा दिया है. ऐसे में उठतेबैठते हर किसी से एक ही बात कहती थी कि अगर पहचान का कोई तांत्रिक हो तो बताओ. एक दिन वीना की पड़ोसन राधा ने उसे बताया, ‘‘हां, एक तांत्रिक है, जिसे सब बंगाली बाबा कहते हैं. वह मनीमाजरा के मढ़ीवाला टाउन में रहता है. भला और होशियार आदमी है. तुम एक बार उस के पास चली जाओ, समझो सारी मुसीबतों से छुटकारा मिल गया. उस का इलाज थोड़ा अजीबोगरीब जरूर है, मगर है पक्का. रूहानी ताकतों का मालिक है वह बंगाली बाबा.’’

वीना हैरानी से आंखें फाड़े राधा की बातें सुनती रही. दूसरी ओर राधा तांत्रिक का बखान करती जा रही थी, ‘‘यह हम लोगों के लिए संयोग की ही बात है कि उस जैसा पहुंचा हुआ तांत्रिक मनीमाजरा में रह रहा है. पैसे का भी उसे कोई लालच नहीं है. जो चाहो दे दो. न मन हो तो कोई बात नहीं. कुछ भी नहीं कहता.’’

राधा की बातों से वीना काफी प्रभावित हुई. उस समय वीना मात्र 26 साल की थी. अभी तो पूरी जिंदगी उस के सामने पड़ी थी. परेशानियों में घिरी जिंदगी वैसे ही बेमजा हो जाती है. यह सोच कर उस ने राहत महसूस की कि अब तांत्रिक बंगाली बाबा की बदौलत उस की सारी मुसीबतें दूर हो जाएंगी. शाम को महेश घर आया तो वीना ने उसे तांत्रिक के बारे में बता कर उस के डेरे पर चलने को कहा. लेकिन महेश ने मना करते हुए कहा, ‘‘ऐसे लोगों के पीछे समय और पैसा मत बरबाद करना. ये लोग ठग होते हैं. बिना मतलब तुम्हें किसी चक्कर में डाल देंगे.’’

वीना को पहले से ही पता था कि उस का पति नास्तिक है. तंत्रमंत्र, पूजापाठ, साधुसंतों पर उसे जरा भी विश्वास नहीं है. वह था भी अडि़यल स्वभाव का. दूसरे की बात जल्दी नहीं मानता था. इसलिए वीना ने इस बारे में उस से और ज्यादा बात करना ठीक नहीं समझा. अगले दिन शाम को वह राधा के घर पहुंची और उस से अपने साथ तांत्रिक के पास चलने को कहा. राधा उस समय घरेलू कामों में व्यस्त थी. इसलिए उस ने वीना को समझाते हुए कहा, ‘‘तुम अकेली ही चली जाओ. तांत्रिक बुजुर्ग आदमी है, फालतू बातें नहीं करता. तुम जरा भी मत घबराओ, कहीं कोई परेशानी नहीं होगी. फिर ऐसी पाक जगहों पर कोई सिफारिश थोड़े ही चलती है. आज तुम अकेली ही चली जाओ, अगली बार मैं तुम्हारे साथ चलूंगी.’’

उस समय शाम के 5 बज रहे थे. राधा के मना करने पर निराश हो कर वीना पहले अपने घर गई. वहां से दोनों बच्चों को साथ ले कर 6 बजे तांत्रिक बंगाली बाबा के यहां जा पहुंची. तांत्रिक बुजुर्ग आदमी था. शक्लसूरत से भी शरीफ लग रहा था. दाढ़ी के पीछे उस का गंभीर चेहरा उस के रूहानियत से जुड़ा होने का आभास दिला रहा था.

तांत्रिक का व्यक्तित्व देख कर वीना को लगा कि निश्चित उस के परिवार पर आई मुसीबतें दूर हो जाएंगी. तांत्रिक के दरबार में उस समय 5-6 लोग बैठे थे. उन के सामने वह तांत्रिक आसन पर बैठा था. वह आए लोगों को बारीबारी से बुलाता, उन की समस्याएं सुनता और झाड़फूंक करने के बाद इलायची का प्रसाद दे कर कहता, ‘‘फिर कोई परेशानी आए तो सीधे मेरे पास आ जाना. वैसे तुम्हें आने की जरूरत नहीं पड़ेगी, इतने में ही ठीक हो जाएगा.’’

इस के बाद वह उसे विदा कर देता. वीना दोनों बच्चों के साथ बैठ कर अपनी बारी का इंतजार करने लगी. उस ने बच्चों को पहले ही सहेज दिया था, इसलिए वे खामोश बैठे थे. एक बार भी नजर उठा कर तांत्रिक ने उस की ओर नहीं देखा था. जो आदमी नंबर आने पर उस के पास पहुंचता था, वह उस से भी नजरें मिला कर बात नहीं करता था. कुछ बोलता भी तो बस नीचे देखते हुए बुदबुदाने के स्वर में बोलता था.

नंबर आने पर वीना तांत्रिक के सामने जा कर बैठ गई. दोनों बच्चे उस के अगलबगल बैठ गए. तांत्रिक ने नजरें झुकाए हुए ही वीना के पैरों की ओर देखा, फिर धीरेधीरे नजरें ऊपर करते हुए उस के चेहरे पर गड़ा दीं. वीना काफी खूबसूरत थी, लेकिन उसे एक बार भी यह नहीं लगा कि तांत्रिक उस की खूबसूरती को निहार रहा है. उस ने इस सब को एकदम सहज रूप से लिया. वीना ने अपनी समस्या बताने के लिए जैसे ही मुंह खोला, तांत्रिक ने हाथ के इशारे से उसे कुछ कहने से रोक दिया. उस के चेहरे पर अपनी नजरें जमाए हुए ही उस ने कहा, ‘‘मेरी बच्ची, तुम्हें कुछ बताने की जरूरत नहीं है.

मैं तुम्हारी आंखों में ही सब कुछ देख रहा हूं. अभी यह जान लेना थोड़ा मुश्किल है कि इसे किस ने भेजा है, मगर हकीकत पूरी तरह मेरे सामने है. उस ने भीतर से तुम्हें पूरी तरह से अपने काबू में कर लिया है. यह शैतानी ताकत तुम्हारे जरिए तुम्हारे परिवार को बरबाद करना चाहती है.’’

वीना ने तो पहले ही से यह बात अपने मन में बैठा रखी थी. इसलिए हैरान होते हुए वह बोली, ‘‘यह बात एकदम सही है. मेरे परिवार में एकएक कर के सभी धीरेधीरे परेशानियों में घिरते जा रहे हैं. आप के पास मैं आई ही अपनी इसी परेशानी के लिए हूं.’’

‘‘मुझे तुम्हारी इस बरबादी का जिम्मेदार तुम्हारे भीतर बैठा दिखाई दे रहा है.’’

‘‘लेकिन बंगाली बाबा, किस ने यह सब किया या करवाया है? वह कौन सी ताकत है, जिस ने मुझे अपने काबू में कर रखा है?’’ वीना ने भयभीत होते हुए पूछा.

‘‘मैं पहले ही तुम से कह चुका हूं, मेरी बच्ची कि करने या करवाने वाले की बाबत अभी नहीं बताया जा सकता. वक्त आने पर इस बात का खुलासा भी कर दूंगा.’’ तांत्रिक ने कहा.

इस के बाद अपनी दोनों आंखें बंद कर के दोनों हाथ ऊपर उठा कर मंत्र पढ़ने के अंदाज में बुदबुदाने लगा. कुछ देर यही क्रम चलता रहा. उस के बाद आंखें खोल कर बोला, ‘‘जिस ने तुम्हें काबू में कर रखा है, वह एक बदजात जिन्न है. उस के बारे में तुम्हें बाद में खुल कर बताऊंगा. बहरहाल इस सब की तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं तुम्हारे शरीर के अंदर ही इस जिन्न को मसलमसल कर मार दूंगा. उस का वजूद मिटते ही तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो जाएंगी. यह सब करने से पहले तुम्हें एक बात बता देना चाहता हूं.’’

‘‘जी बंगाली बाबा, बताइए. मैं आप की हर बात मानूंगी. बस आप मेरे परिवार पर आई. मुसीबतों को हमेशा के लिए खत्म कर दीजिए.’’

‘‘उन्हें तो खत्म समझो. देखो, अब मैं जो तुम्हें बताने जा रहा हूं, उसे गौर से सुनना.’’ तांत्रिक ने कहा.

‘‘जी बाबा.’’

‘‘मैं अपने काम की किसी से कोई फीस तो लेता नहीं. रोटी कमाने के मेरे पास दूसरे तमाम काम हैं. हां, तुम्हारा यह जो काम मैं करने जा रहा हूं, इस की फीस जरूर लेता हूं.’’

‘‘जी बाबा.’’

‘‘दरअसल, यह जो काम मैं करने जा रहा हूं, इस के लिए मुझे कई बार वह सब भी करना पड़ता है, जो करने को मेरा मन गवाही नहीं देता. लेकिन न करूं तो मेरी पनाह में आया आदमी ठीक नहीं होगा. इसलिए करने से पहले मैं अपने किए की खुदा से माफी मांग लेता हूं और अपनी पनाह में आए आदमी से उम्मीद करता हूं कि पूरी तरह ठीक हो जाने पर वह अपनी हैसियत के मुताबिक 11, 21 या फिर 31 गरीबों को भरपेट खाना खिलाए. इस काम की मैं तुम से भी यही फीस चाहता हूं मेरी बच्ची.’’

‘‘बिलकुल बंगाली बाबा. बस एक बार सब ठीक काम हो जाए. मैं वैसा ही करूंगी, जैसा आप कहेंगे.’’ वीना ने कहा.

अपनी लंबी दाढ़ी पर हाथ फेर कर तांत्रिक ने कहा, ‘‘दूसरी बात यह कि तांत्रिक क्रियाएं बहुत नाजुक होती हैं. जैसा मैं कहूं, तुम्हें वैसा ही करना होगा. अगर तुम इस क्रिया को आज ही शुरू करवाना चाहती हो तो अपने बच्चों को घर छोड़ कर अकेली आ जाओ. बच्चों की मौजूदगी में वे तांत्रिक क्रियाएं नहीं की जा सकतीं, जिन्हें इस मामले में अमल में लाना है.’’

तांत्रिक की हर बात पर वीना हां में हां करती जा रही थी. इस के बाद उस के कहे अनुसार वह बच्चों को अपनी एक परिचिता के यहां छोड़ आई. उस के लौट कर आने के बाद तांत्रिक ने बेझिझक कहा, ‘‘अंदर वाले कमरे में पलंग बिछा है, जा कर उस पर एकदम सीधी लेट जाओ.’’

वीना पूरी तरह तांत्रिक के कहे में आ चुकी थी. शक की कोई गुंजाइश उसे नजर नहीं आ रही थी. इसलिए बिना किसी झिझक के वह अंदर जा कर पलंग पर लेट गई. तांत्रिक बाहर बैठा क्या कर रहा है, उसे पता नहीं था. करीब आधे घंटे तक वह उसी तरह लेटी रही.

इस के बाद तांत्रिक आया तो वह कुछ बुदबुदा रहा था. उस के हाथ में नीले रंग के धागों में बंधी ताबीजें थीं. उस में से एक ताबीज उस ने वीना के गले में डाल दी. बाकी ताबीजें उस के हवाले करते हुए बोला, ‘‘इन्हें अपने पति और बच्चों को पहना देना.’’

‘‘जी बंगाली बाबा.’’ कह कर वीना ने ताबीज ले कर माथे से लगा लिए.

इस के बाद, ‘‘ये प्रसाद खा लो.’’ कह कर तांत्रिक ने एक छोटी इलायची वीना के मुंह में डाल दी और बाहर चला गया.

इलायची चबाते ही वीना पर नशा सा छाने लगा. उसे लगने लगा, वह मदहोश होती जा रही है. तभी तांत्रिक अंदर आया और गौर से वीना को देखने लगा. इस बार भी वह पहले की ही तरह कुछ बुदबुदा रहा था. फिर वह उस की बगल में लेट गया. नशे जैसी स्थिति में होने की वजह से चाह कर भी वीना उस की किसी हरकत का विरोध नहीं कर सकी. वीना को सब दिखाई दे रहा था, उस के साथ क्या किया जा रहा है, इस का भी उसे आभास हो रहा था, लेकिन वह किसी भी तरह का विरोध करने की स्थिति में नहीं थी. इलायची में कोई नशीली चीज खिला कर तांत्रिक ने उसे बेबस कर दिया था. अंत में उस ने अपनी मनमरजी कर डाली.

मुंह काला करने के बाद तांत्रिक ने कहा, ‘‘इसी तरह तुम्हें लगातार 3 दिनों तक अकेली आना होगा. 4 दिनों की क्रिया के बाद जिन्न खुदबखुद खत्म हो जाएगा. जिन्न मर गया तो समझो तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो गईं.’’

वीना ने उठ कर कपड़े पहने और धीमेधीमे कदमों से अपनी परिचिता के यहां से बच्चों को ले कर घर आ गई. जो कुछ उस के साथ हुआ था, उसे सब याद था. इस सब से अब उसे आत्मग्लानि होने लगी थी, साथ ही तांत्रिक पर गुस्सा आ रहा था. सोचने लगी, ‘यह इंसान है या पिशाच, जिस ने 7 महीने की गर्भवती का भी लिहाज नहीं किया.’

तांत्रिक के बारे में सोचसोच कर वीना की कनपटियां सुलगने लगीं. पति काम से लौटा तो तबीयत खराब होने का बहाना कर के चुपचाप लेटी रही. पति से इस बारे में बात करना उसे ठीक नहीं लगा. मर्दों का क्या भरोसा, बात का बतंगड़ बना दें. गलती खुद उसी की थी, जो कथित रूहानी ताकतों से इलाज कराने अपनी मरजी से तांत्रिक के पास चली गई. पति ने उसे इस सब के लिए पहले ही मना किया था. जैसेतैसे वीना ने वह रात गुजारी. रात भर में वह जितना अपनेआप को कोस सकती थी, कोसती रही. इस के साथ मन ही मन वह निर्णय भी लेती रही कि ढोंगी तांत्रिक बंगाली बाबा को उस के किए की सजा जरूर दिलाएगी.

अगले दिन जब महेश काम पर चला गया तो वीना फिर तांत्रिक के बारे में सोचने लगी. उस ने सोचा कि अगर वह चुप रहती है तो तांत्रिक आगे भी इसी तरह अन्य औरतों को खराब करता रहेगा. मैला तन ले कर वीना अपने पति को धोखा नहीं देना चाहती थी. काफी कशमकश के बाद उस ने सोच लिया कि अंतत: जो होगा, देखा जाएगा. पहली जरूरत तांत्रिक को सजा दिलाने की है. उस ने तांत्रिक के खिलाफ पुलिस में शिकायत करने के लिए सोचा, मगर अकेली थाने जाने की हिम्मत नहीं हुई. लिहाजा इस बारे में रायमशविरा करने वह अपनी जेठानी के घर चली गई.

जेठानी चंडीगढ़ के सेक्टर 20 में रहती थी. देवरानी के मुंह से तांत्रिक की घिनौनी करतूत सुन कर वह हैरान रह गई. वह उसे तत्काल समाजसेवी परमजीत कौर और भजन कौर के पास ले गई. दोनों ने सारी बातें सुन कर सुझाव दिया कि आज शाम वीना फिर तांत्रिक के पास जाएगी. वे तांत्रिक को रंगेहाथों पकड़ कर पुलिस के हवाले करना चाहती थीं. वे तांत्रिक बंगाली बाबा की घिनौनी करतूत की चश्मदीद गवाह भी बनना चाहती थीं. फिर ऐसा ही किया गया. उसी रात 8 बजे वीना को बंगाली बाबा के ‘दरबार’ में भेजा गया. परमजीत कौर और भजन कौर कुछ अन्य लोगों के साथ बाहर चौकन्नी हो कर खड़ी थीं.

पहले दिन वाली प्रक्रियाएं करने के बाद बंगाली बाबा ने वीना के मुंह में इलायची डाली. वीना ने उस की आंख बचा कर झट से इलायची उगल दी. इस के बाद बंगाली बाबा तंत्रमंत्र की नौटंकी करते हुए जैसे ही उस की बगल में लेटा, उस ने शोर मचा दिया. बस फिर क्या था, महिलाओं ने तेजी से भीतर घुस कर तांत्रिक को रंगेहाथों पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया. वीना के बयान के आधार पर भादंवि की धाराओं 356 व 341 के तहत थाना मनीमाजरा में तांत्रिक के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर लिया गया.

जब इस बात की जानकारी डीएसपी (ईस्ट) विजयपाल सिंह को मिली तो वह भी थाने पहुंच गए. उन्होंने इस मामले की जांच इंसपेक्टर धनराज शर्मा को सौंपी गई. तांत्रिक को रात भर हवालात में रखा गया. अगले दिन उसे अदालत में पेश कर के उसे पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. अभी तक पूछताछ में तांत्रिक यही कह रहा था कि वह काले इल्म का जबरदस्त जानकार है. इस इल्म के तहत जिन्नों को इसी तरह भगाया जाता है. चूंकि प्रक्रिया में विघ्न पड़ गया है, इसलिए वीना के अलावा वे लोग भी बरबाद हो जाएंगे, जिन्होंने उस का अमल तोड़ने की जुर्रत की है. काले इल्म से उस ने कुछ पुलिसकर्मियोंको भी बरबाद करने की धमकी दी. लेकिन जब पुलिस ने उस पर सख्ती की तो वह सारी हेकड़ी भूल कर असलियत बताने को तैयार हो गया.

उस की उम्र 50 साल के आसपास थी. उस का नाम था शाहिद तौफीक. वह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ के कस्बा मलिहाबाद का रहने वाला था. उस के परिवार में बीवी मल्लिका खातून के अलावा 4 बेटे थे. कामधंधे की तलाश में वह 20 साल पहले अकेला ही चंडीगढ़ आया था. काम जम जाने के बाद वह अपने परिवार को भी साथ ले आया था. धीरेधीरे उस ने अपनी बीवी और चारों लड़कों को भी काम से लगा दिया था. इस से उस की अच्छीखासी कमाई होने लगी थी. सब कुछ बहुत बढि़या चल रहा था कि अचानक शाहिद तौफीक तांत्रिक बन गया. इस के बाद वह अकेला ही रहने लगा. पहले वह मियांजी के नाम से, फिर बंगाली बाबा के नाम से मशहूर हो गया.

शाहिद को पहले तंत्रमंत्र की कोई जानकारी नहीं थी. करीब 5 साल पहले वह कुछ दिनों के लिए एक धार्मिक डेरे पर पहुंच गया, जहां तंत्रक्रियाएं की जाती थीं. वहीं वह थोड़ा तंत्रमंत्र सीख गया. वहां से लौट कर उस ने खुद को तांत्रिक घोषित कर तंत्र विद्या से समस्याओं के समाधान की अपनी ढोंग की दुकान खोल ली. शाहिद खर्च भर का कमा लेता था. ज्यादा पैसे कमाने की उसे कोई जरूरत भी नहीं थी. इसीलिए उस ने इस विद्या को लोकसेवा घोषित कर के बिना फीस के कथित रूहानी इलाज करना शुरू कर दिया. इस से उस का अच्छाखासा प्रचार हुआ और दूरदूर से लोग उस के पास आने लगे.

कथित तंत्रक्रियाओं के दौरान शाहिद ने 2 बातें देखीं, एक तो इस में तीरतुक्के ज्यादा चलते थे. अपनी परेशानियों के कारण उस के पास आने वाले लोग दरअसल मानसिक तनाव से ग्रस्त होते थे. तंत्रक्रियाओं के नाटक के चलते पीडि़त व्यक्ति स्वयं को हलका महसूस करने लगता था. मानसिक तनाव में कमी आती थी तो वह अपने काम में तवज्जो देने लगता, इस से उस का काम संवरने लगता. दूसरी बात उस ने यह देखी कि तंत्र के नाम पर किसी भी औरत को भैरवी बना कर उस से आराम से मनमानी की जा सकती थी. यही सब वह करता भी था. तंत्रमंत्र की आड़ में उस ने न जाने कितनी औरतों को खराब किया, इस का हिसाब खुद उस के पास नहीं था.

इज्जत लुटा कर भी कभी कोई औरत उस के विरोध में खड़ी नहीं होती थी. उस के पकड़े जाने पर भी कोई पीडि़ता उस के खिलाफ बयान देने थाने नहीं आई. भला हो वीना का, जिस ने उस पाखंडी तांत्रिक के चेहरे से शराफत का मुखौटा नोच फेंका था, वरना तंत्रमंत्र में आस्था रखने वाली न जाने कितनी औरतें अपनी इज्जत लुटवाती रहतीं. Fपुलिस ने तांत्रिक के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे 7 साल की बामशक्कत कैद की सजा हुई. ऊपरी अदालतों में अपील करने से भी उसे कोई लाभ नहीं मिला. अपनी सजा भुगत कर कुछ साल पहले वह जेल से बाहर आया. इस बीच उस का परिवार मनीमाजरा छोड़ कर उत्तर प्रदेश चला गया था. शाहिद भी शायद वहीं चला गया है.

वीना और उस के घर वालों के बारे में यही सुखद समाचार है कि अपनी मेहनत से महेश ने जहां अपना अच्छाखासा धंधा जमा लिया है, वहीं वीना खुद भी बेकरी का कारोबार करती है. महेश ने उस की महाभूल को गलती की संज्ञा दी, जो उस के लिए सबक बन कर काम आई. आज उन के 2 नहीं, 3 बेटे हैं और तीनों शहर के बेहतरीन एवं नामचीन स्कूलों में पढ़ रहे हैं. तीनों की गिनती मेधावी छात्रों में होती है. Hindi crime story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कुछ पात्रों के नाम बदले हुए हैं.

 

True Crime Story: अधेड़ उम्र का इश्क – पति की कातिल दुलारी

True Crime Story: बांदा जिले के बुधेड़ा गांव के रहने वाले शिवनारायण निषाद 18 जून, 2021 की रात को गांव में रामसेवक के घर एक शादी के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे. जब वह देर रात तक वापस नहीं लौटे तो घर पर मौजूद पत्नी दुलारी की चिंता बढ़ने लगी. उस समय दुलारी घर पर अकेली थी. उस का 20 वर्षीय बेटा और 17 वर्षीय बेटी राधा गांव अलमोर में स्थित एक रिश्तेदारी में गए हुए थे. दुलारी ने पति की चिंता में जैसेतैसे कर के रात काटी.

सुबह होने पर दुलारी ने अपने बेटे को फोन कर के रोते हुए कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारे पिताजी गांव में ही रामसेवक चाचा के घर मंडप पूजन के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे, लेकिन अभी तक वह घर वापस नहीं लौटे हैं.’’

बेटे दीपक ने जब अपने पिता के गायब होने ही बात सुनी तो वह भी घबरा गया. फिर वह मां को समझाते हुए बोला, ‘‘घबराओ मत मां, मैं घर आ रहा हूं. हो सकता है पिताजी रात होने पर वहीं रुक गए हों. फिर भी आप उन के घर जा कर पूछ आओ.’’

‘‘ठीक है बेटा, मैं रामसेवक चाचा के घर पता करने जा रही हूं.’’ दुलारी ने दीपक से कहा.

दुलारी जब रामसेवक के घर पहुंची तो रामसेवक ने बताया कि शिवनारायण गांव के ही 2 लोगों सूबेदार और चौथैया के साथ रात 10 बजे ही वहां से लौट गए थे.

यह बात दुलारी ने दीपक को फोन कर के बताई तो दीपक के मन में तमाम तरह की आशंकाओं ने जन्म लेना शुरू कर दिया. उसी दिन दीपक अपनी बहन के साथ गांव अलमोर से घर वापस  लौट आया. दुलारी और घर के लोग सोचने लगे कि जब रामसेवक चाचा के यहां से वह लौट आए तो कहां चले गए. अभी तक वह घर क्यों नहीं आए? उस दिन दीपक अपने ताऊ पिता रामआसरे, मां दुलारी और परिजनों के साथ पिता को आसपास खोजने में लगा रहा.

इस के बाद परिजनों ने सूबेदार और चौथैया से शिवनारायण के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि हम लोग रात में 10 बजे साथ ही लौटे थे और गांव के शिवलाखन की पान परचून की दुकान पर गए, लेकिन उस समय उस की दुकान बंद थी. तब हम लोग अलगअलग हो कर अपनेअपने घरों को वापस लौट गए थे. इस के बाद शिवनारायण कहां गया, हमें नहीं पता. शिवनारायण की 2 बेटियां, जो अपनी ससुराल में थीं, वह भी पिता के लापता होने की सूचना मिलने पर मायके आ चुकी थीं.

अब शिवनारायण के घर वालों के मन में तमाम तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगी थीं. बेटे दीपक और बेटियों का रोरो कर बुरा हाल था. इस दौरान बेटे ने अपने सभी रिश्तेदारियों में फोन कर उन के बारे में जानना चाहा. लेकिन सभी जगह निराशा ही हाथ लग रही थी.

शिवनारायण को गायब हुए 2 दिन होने वाले थे, फिर भी घर वाले पुलिस के पास न जा कर इधरउधर खोजने में ही लगे हुए थे. इसी दौरान 20 जून, 2021 की सुबह गांव के सूबेदार और अन्य लोग जब यमुना नदी किनारे से जा रहे थे. तो उन्होंने हाथपैर बंधे घुटनों के बीच डंडा फंसे एक लाश पड़ी देखी. यह बात उन्होंने गांव के अन्य लोगों को बताई. इस के बाद वह लाश देखने के लिए यमुना किनारे गए. वहां ग्रामीणों की भीड़ इकट्ठा होने लगी थी.

गांव वालों ने वह लाश पहचान ली. मृतक और कोई नहीं 2 दिन से गायब हुआ शिवनारायण ही था. इधर ग्रामीणों ने नदी के किनारे लाश मिलने की सूचना स्थानीय थाने जसपुरा के थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह को भी दे दी. थानाप्रभारी सुनील इस घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को देने के बाद अपने मातहतों के साथ घटनास्थल पर रवाना हो गए. नदी के किनारे लाश मिलने की सूचना पा कर शिवनारायण निषाद के परिजन भी रोतेबिलखते वहां पहुंच चुके थे. पति की लाश देख कर दुलारी दहाड़ें मार कर रोने लगी.

सूचना पा कर बांदा के एसपी अभिनंदन के अलावा एएसपी महेंद्र प्रताप सिंह चौहान, सीओ (सदर) सत्यप्रकाश शर्मा के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस नें अपनी जांच में पाया कि लाश पानी में फूल कर उतरा कर नदी के किनारे आई है. ऐसे में अनुमान लगाया कि शिवनारायण की हत्या 18 जून की रात में कर दी गई थी. क्योंकि पानी में पड़ा शव करीब 24 घंटे बाद ही उतरा कर ऊपर आता है. थानाप्रभारी ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. फोरैंसिक टीम ने वहां से कुछ सबूत भी जुटाए.

पुलिस ने लाश को देख कर यह कयास लगाया कि हत्या में एक से ज्यादा लोग शामिल रहे होंगे. क्योंकि पुलिस को घटनास्थल पर ऐसा कोई निशान और न ही दोपहिया व चार पहिया वाहनों के टायरों के निशान मिले, जिस से यह कहा जा सके कि हत्या इसी जगह पर की गई थी. इसी को आधार बना कर पुलिस यह मान रही थी कि हत्या कहीं और की गई है. लाश को नदी में ठिकाने लगाने के उद्देश्य से यहां ला कर फेंका गया था.

जिस समय बुधेड़ा गांव में पुलिस अधिकारी व थाने की पुलिस घटनास्थल का मौकामुआयना कर रही थी, पुलिस को वहां जमीन पर खून पड़ा भी दिखा. साथ ही कुछ दूरी पर चूडि़यों के टुकड़े भी बरामद हुए थे. जिन्हें फोरैंसिक टीम ने अपने कब्जे में ले लिया. मौके पर मौजूद गांव वालों ने बताया कि टूटी चूडि़यां मृतक की पत्नी दुलारी की हैं. उन का कहना था कि मामले की जानकारी होने पर दुलारी वहां बैठ कर रो रही थी. हो सकता है उस दौरान चूडि़यां टूट कर बिखर गई हों.

लेकिन पुलिस किसी भी साक्ष्य को हलके में नहीं ले रही थी, इसलिए वहां मौजूद हर संदिग्ध वस्तु को अपने कब्जे में ले रही थी. इस दौरान हत्या से जुड़े साक्ष्यों को इकट्ठा करने के लिए पुलिस ने शव मिलने वाले स्थान से पैदल ही नदी किनारे करीब डेढ़ किलोमीटर तक छानबीन की, लेकिन वहां से पुलिस को कोई अन्य और खास सबूत नहीं मिला.

पुलिस ने जरूरी साक्ष्यों को इकट्ठा करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. इस दौरान पुलिस ने परिजनों से शिवनारायण के घर वालों से किसी से रंजिश होने की बात पूछी तो उन्होंने बताया कि उन की किसी से कोई रंजिश नहीं थी. दोपहर तक पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मिल गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंट कर हत्या करने और फेफड़ों में पानी न होने की पुष्टि हुई. इस के बाद पुलिस ने शिवनारायण के बेटे दीपक की तहरीर पर हत्या का मुकदमा भादंवि की धारा 302 व 201 के तहत दर्ज कर लिया.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने एसपी के निर्देश पर जांच के लिए एक टीम गठित की, जिस में कांस्टेबल शुभम सिंह, सौरभ यादव, अमित त्रिपाठी, महिला कांस्टेबल अमरावती व संगीता वर्मा को शामिल कर जांच शुरू की. थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह को शुरुआती पूछताछ में मृतक शिवनारायण के बड़े भाई रामआसरे और बेटे दीपक ने बताया कि 6 महीने पहले गांव के ही एक दुकानदार ने शिवनारायण से विवाद किया था और धमकी दी थी.

इस के बाद पुलिस दुकानदार और रात में दावत में साथ रहे व लाश मिलने की सूचना देने वाले सूबेदार सहित 4 लोगों को पूछताछ के लिए थाने ले गई. लेकिन पुलिस को उन लोगों से पूछताछ में ऐसी कोई बात नहीं मिली, जिस से उन पर हत्या का शक किया जा सके. जसपुरा थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह शिवनारायण निषाद के हत्या की हर एंगल से जांच कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने मृतक के घर के हर सदस्य का बयान दर्ज किया था.

उन्हें जांच में पता चला कि शिवनारायण रात के 9 बजे ही दावत से अपने घर के लिए वापस लौट लिए थे. चूंकि उस समय हलकी बारिश हो रही थी, ऐसे में 45 साल की उम्र में उन के कहीं जाने का सवाल ही नहीं उठता था. ऐसे में पुलिस यह मान कर चल रही थी कि शिवनारायण घर लौटे थे और उन के साथ घर पर ही कोई घटना हुई थी. उस दिन घर पर मृतक शिवनारायण की पत्नी ही मौजूद थी. क्योंकि उस के बच्चे रिश्तेदारी में पैलानी थानांतर्गत अमलोर गांव गए हुए थे. मौके पर मिली चूडि़यों के टुकड़ों के आधार पर पुलिस का शक पत्नी दुलारी पर और भी पुख्ता होता जा रहा था.

उधर पुलिस को मृतक के हाथपांव के बांधने और घुटनों के बीच डंडा बांधने की बात समझ आ चुकी थी. यह हत्या के बाद लाश को उठा कर ले जाने में उपयोग किया गया होगा. इसी दौरान पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि उसी गांव के रहने वाले जगभान सिंह उर्फ पुतुवा का अकसर शिवनारायण निषाद के घर आनाजाना था. चूंकि शिवनारायण जगभान के खेतों में बंटाई पर खेती करता था. इसी दौरान जगभान का  शिवनारायण की पत्नी दुलारी से अवैध संबंध हो गए थे. जिस की जानकारी होने पर शिवनारायण और जगभान के बीच खटास पैदा हो गई थी.

अब पुलिस शिवनारायण की पत्नी दुलारी और जगभान पर अपनी जांच केंद्रित कर आगे बढ़ रही थी. इसी सिलसिले में थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने जगभान के घर जा कर पता करना चाहा तो वह घर पर नहीं मिला. लेकिन उस की पत्नी दुलारी ने पुलिस को बताया कि वह शाम को 6 बजे पास के एक गांव में शादी में गए थे. वहां से वह साढ़े 11 बजे रात में लौट कर आए थे. दुलारी ने यह भी बताया कि उन के साथ ही गांव के भोला निषाद की 4 बेटियां भी शादी में गई थीं. जहां भोला की 3 लड़कियां वहीं रुक गई थीं, जबकि एक उन के साथ वापस आई थी.

इस के बाद थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने जहां शादी थी, वहां पता किया तो लोगों ने बताया कि जगभान वहां से साढ़े 8 बजे ही निकल  गया था. फिर पुलिस ने भोला निषाद के घर जा कर पूछताछ की तो  लड़कियों ने बताया कि जगभान उन के घर 9 बजे आए थे, उस के बाद तुरंत वह वापस चले गए. अब पुलिस के सामने सवाल यह था कि जगभान जब भोला के घर से साढ़े 8 बजे चला आया तो वह अपने घर साढ़े 11 बजे रात में पहुंचा था. तो इन ढाई घंटों के दौरान वह कहां रहा.

इस आशंका के आधार पर पुलिस ने जगभान सिंह से ढाई घंटे गायब रहने का कारण पूछा तो वह उस का सही जबाब नहीं दे पाया. पुलिस ने जब कड़ाई से मृतक की पत्नी दुलारी और जगभान सिंह से पूछताछ की गई तो उन दोनों ने शिवनारायण की हत्या किए जाने की बात स्वीकारते हुए हत्या का राज उगल दिया. उन दोनों ने शिवनारायण की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के जसपुरा थाना क्षेत्र के बुधेड़ा गांव के निवासी शिवनारायण गांव में रह कर खेती करता था. वह दूसरों के खेत बंटाई पर ले कर भी खेती करता था.

शिवनारायण ने गांव के ही जगभान सिंह का खेत भी बंटाई पर ले रखा था. खेत बंटाई में लेने के कारण खेत मालिक जगभान शिवनारायण के घर आनेजाने लगा था. इस बीच जगभान और शिवनारायण की पत्नी दुलारी के बीच नजदीकियां बढ़ाने लगी थीं. दोनों की ये नजदीकियां कब शारीरिक संबंधों में बदल गईं, उन्हें पता ही नहीं चला. लेकिन एक दिन शिवनारायण ने जगभान और दुलारी को साथ में देख लिया तो वह आगबबूला हो गया और जगभान सिंह को घर न आने कि कड़ी हिदायत दे डाली. इस के बावजूद भी जगभान सिंह शिवनारायण के घर आता रहा.

लेकिन बारबार शिवनारायण द्वारा जगभान को घर आने से मना करने की वजह से बीते साल जगभान ने शिवनाराण को अपना खेत बंटाई पर नहीं दिया, तभी से दोनों के बीच मनमुटाव हो गया था. इसी बात से जगभान और दुलारी शिवनारायण से खार खाए बैठे थे. वह इसी उधेड़बुन में थे कि किसी तरह शिवनारायण को ठिकाने लगाया जाए. हत्यारोपी दुलारी ने बताया कि घटना वाले दिन उन के अविवाहित बेटाबेटी गांव अलमोर में अपने एक दिश्तेदार के घर गए हुए थे. उस दिन घर में कोई नहीं था. उसी दिन दोनों ने शिवनरायण को ठिकाने लगाने के लिए तानाबाना बुन लिया था.

जगभान दावत से लौटने के बाद  रात के 9 बजे दुलारी के घर पहुंच गया. इधर मंडप कार्यक्रम से घर लौटे शिवनरायण ने दुलारी को जगभान के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देखा तो गुस्से में उस का खून खौल गया और वह पत्नी को मारनेपीटने लगा और जगभान से गालीगलौज करने लगा. तभी दुलारी ने प्रेमी जगभान के साथ मिल कर अपने पति को चारपाई पर पटक दिया और गला दबा कर उस की हत्या कर दी. उसी दौरान उन लोगों नें लाश को ठिकाने लगाने का प्रयास किया, लेकिन गांव के लोग उस समय जाग रहे थे. ऐसे में उन्होंने शिवनारायण की लाश चारपाई के नीचे छिपा दी. इस के बाद जगभान रात के 11 बजे अपने घर चला आया.

जगभान ने बताया कि रात करीब 2 बजे जब मोहल्ले के लोग गहरी नींद में सो रहे थे, तब वह रात के सन्नाटे में फिर से शिवनारायण के घर पहुंचा. जहां उस ने और दुलारी ने शिवनारायण की लाश के हाथपांव बांध कर दोनों पैरों के बीच डंडा डाल कर लाश को यमुना नदी में फेंक आए. इतना सब करने के बाद दुलारी और जगभान अपनेअपने घर चले गए. घर आने के बाद दुलारी ने पति के गायब होने की खबर पूरे गांव में फैला दी और जानबूझ कर पति को खोजने का नाटक करती रही. लेकिन पुलिसिया जांच में उन का जुर्म छिप नहीं सका.

पुलिस ने शिवनारायण की पत्नी दुलारी और उस के आशिक जगभान से पूछताछ करने के बाद दोनों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया. वहीं एसपी अभिनंदन ने इस सनसनीखेज हत्याकांड का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को ईनाम देने की घोषणा की है. True Crime Story

 

Crime Stories: मौज के बाद मौत

Crime Stories: शिवानी मनोज से प्यार ही नहीं करती थी, बल्कि उसे अपना सब कुछ सौंप भी चुकी थी. फिर ऐसा क्या हुआ कि उसे मनोज की हत्या करनी पड़ी मनोज कैनवास पर अपनी कल्पना के रंग भरने में मशगूल था. बीचबीच में वह गहरे चिंतन में खो जाता था, जैसे ही कोई बिंब उस के मस्तिष्क में उभरता, उस का ब्रुश हरकत में आ जाता. अपने कमरे के शांत वातावरण में वह पूरी तरह पेंटिंग बनाने में लीन था. तभी किसी महिला की हंसी की आवाज ने उस का ध्यान भंग कर दिया. उस ने पलट कर देखा तो शिवानी खड़ी थी, जो रिश्ते में उस की भाभी लगती थी.

मनोज ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘ओह तो आप हैं.’’

‘‘क्यों… मैं यहां नहीं आ सकती क्या?’’ शिवानी ने शरारती लहजे में पूछा.

‘‘क्यों नहीं आ सकतीं भाभी. आप जब चाहें तब आ सकती हैं. बात यह थी कि मेरा पूरा ध्यान पेंटिंग में था, इसलिए मुझे पता ही नहीं चला कि आप कब आ गईं. आप की हंसी की आवाज मेरे कानों में पड़ी, तब आप के आने का पता चला.’’

‘‘इस का मतलब कि मेरे आने से तुम डिस्टर्ब हो गए. इस वक्त मेरा यहां आना तुम्हें अच्छा नहीं लगा होगा?’’ शिवानी ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा.

‘‘नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है. आप के आने से तो मुझे बहुत खुशी होती है. एक तरह से प्रेरणा मिलती है. अरे आप खड़ी क्यों हैं, बैठिए न.’’ मनोज ने कुरसी की ओर इशारा करते हुए कहा.

शिवानी कुरसी पर बैठ गई और पेंटिंग को गौर से देखने लगी. पलभर बाद उस ने कहा, ‘‘मनोज, मैं तुम से एक बात कहूं?’’

‘‘हां, बोलो.’’

‘‘सचमुच तुम बहुत सुंदर पेंटिंग बनाते हो, तुम्हारे हाथों में कमाल का जादू है. इतनी अच्छी पेंटिंग मैं पहली बार देख रही हूं.’’

‘‘आप लोगों का आशीर्वाद है भाभी.’’

इस पर शिवानी उस के नजदीक आ कर चुलबुलेपन से बोली, ‘‘अच्छा पक्की बात है यह.’’

‘‘हां, इस में कोई शक नहीं है. दुनिया में जो कुछ भी है, उस में बड़ों का आशीर्वाद है.’’ मनोज ने कहा.

‘‘लेकिन मुझे तो नहीं लगता कि मुझे कुछ मिला है.’’ शिवानी की बात में शरारत छिपी थी.

मनोज ने गहरी नजरों से शिवानी को नीचे से ऊपर तक देखा. उस के बाद उस की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘‘कभी आईने के सामने खड़ी हो कर खुद को निहार लेना, पता चल जाएगा कि आप को क्या मिला है.’’

इस के जवाब में शिवानी खिलखिला कर हंस पड़ी. इस के बाद अपनी आवाज में शरारत का रंग घोलते हुए बोली, ‘‘लेकिन मेरे पति तो मुझे साधारण कहते हैं. पता नहीं तुम्हारी नजर में मैं इतनी अच्छी क्यों हूं?’’

‘‘सौंदर्य का पुजारी ही सुंदरता की परिभाषा जानता है. मेरी नजर में तो आप सुंदरता की मूर्ति हो.’’

‘‘सच.’’ शिवानी ने चहक कर पूछा तो मनोज ने मुसकरा कर सहमति में सिर हिला दिया. इस से शिवानी खुशी से गदगद हो गई. दोनों के बीच बातचीत चल रही थी कि शिवानी का पति पवन आ गया.

मनोज और पवन गहरे दोस्त थे. उस के आने से दोनों दोस्तों में बातें होने लगीं. कुछ देर बैठ कर शिवानी पति के साथ घर चली गई. लेकिन जाते समय शिवानी ने मनोज की आंखों में जिस तरह झांक कर मुसकराई थी, मनोज के दिल में हलचल मच गई थी. इस के बाद मनोज का मन पेंटिंग बनाने में नहीं लगा. मध्य प्रदेश के सतना जिले के थाना सिविल लाइन के अंतर्गत गांधीग्राम में 32 वर्षीय पवन चौधरी उर्फ नंदू रहता था. पवन आजीविका के लिए पेंटिंग का काम करता था. उस के पिता रामसजीवन चौधरी मजदूरी करते थे. वह अपने बड़े बेटे रामाश्रय चौधरी के साथ रहते थे. रामाश्रय औटो चलाता था.

पवन का विवाह करीब 10 साल पहले शिवानी से हुआ था. विवाह के बाद दोनों गृहस्थ जीवन में रम गए थे. वैसे तो इन के घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन उन्हें एक चीज खटकती थी. जिस के लिए वे हर समय चिंतित रहते थे. उन की शादी को कई साल हो गए थे, लेकिन उन की बगिया सूनी की सूनी थी. दोनों अपनी तरफ से पूरा प्रयास कर रहे थे, लेकिन शिवानी मां नहीं बन सकी थी. मनोज चौधरी पवन का रिश्ते का भाई था. उस की उम्र भी यही कोई 22 साल थी. वह अविवाहित था. वह भी पवन की तरह ही पेंटिंग करता था. उस के हाथों में गजब का हुनर था. उस की शुरू से ही कला में रुचि थी. वह किशोर उम्र में आर्ट पेपर पर ही किसी न किसी की तसवीर बनाता रहता था. समय के साथ वह बड़ा हुआ तो उस का ब्रुश कैनवास पर चलने लगा.

लेकिन उस का यह शौक उस का पेट नहीं भर सकता था. ऐसे में उसे मजबूरी में गाडि़यों की नंबर प्लेट, दीवारों और बैनरों पर लिखने का काम करना पड़ा. लेकिन समय मिलने पर वह तसवीर बनाने का अपना शौक पूरा कर लेता था. मनोज और पवन रिश्तेदार थे और एक जैसा काम करते थे, इसलिए उन के बीच अच्छी दोस्ती थी. दोनों ही शराब के जबरदस्त शौकीन थे. मनोज के घर तो मांबाप के कारण शराब की महफिल जम नहीं सकती थी, इसलिए पवन अपने घर शराब की महफिल जमाता था.

मनोज रोजाना शाम को पवन के घर पहुंच जाता. पवन के अलावा घर में उस की पत्नी शिवानी होती थी. शिवानी के तीखे नयननक्श और छरहरा बदन उस की खूबसूरती में चार चांद लगाते थे. ऐसे में मनोज की आंखें हर समय उसी पर टिकी रहती थीं. बच्चे पैदा न होने की वजह से शिवानी के सौंदर्य में कोई कमी नहीं आई थी. वह शिवानी के घर आता था तो शिवानी भी उस के घर जाती थी. लेकिन उस के साथ पवन होता था. फिर भी मनोज और उस की बातें हो जाती थीं. शिवानी भी मनोज को चाहने लगी थी. शादीशुदा होते हुए भी उस ने मनोज को अपने दिल में बसा लिया था. मनोज की हर बात उसे भाती थी.

उस के बात करने का अंदाज और उस की बनाई हुई पेंटिंग, सब उस की आंखों को सुहाती थीं. बस दिल में तमन्ना थी कि मनोज का सान्निध्य उसे मिल जाए और उसे वह जी भर कर प्यार करे. जबकि पवन उसे प्यार देने में कोई कसर नहीं छोड़ता था. वह उस का भरपूर खयाल रखता था. शिवानी भी पवन के प्यार में कोई कमी महसूस नहीं करती थी, लेकिन उसे न जाने मनोज में ऐसा क्या दिखा था कि वह अपने आप को उस की तरफ खिंचने से नहीं रोक पा रही थी.

वह सारी मर्यादाएं तोड़ कर उस के आगोश में समाने को आतुर थी. वह जब भी मनोज से मिलती, उस की और उस की पेंटिंग की खूब तारीफ करती. उस की बातें सुन कर मनोज को भी यकीन हो गया था कि शिवानी के भी दिल में उस के लिए कुछ है. एक दिन जब शिवानी उस के घर आई तो दोनों में खूब बातें हुईं. अगले दिन दोपहर में वह शिवानी के घर पहुंच गया. अपने साथ वह पेंटिंग का सामान भी ले गया था. अपने घर अचानक मनोज के आया देख कर शिवानी बहुत खुश हुई. उस के हाथ में पेंटिंग का सामान देख कर वह बोली, ‘‘आज कौन सी पेंटिंग बनाई है पेंटर बाबू? वैसे तुम्हारे अंदर यह खूबी है कि तुम किसी का भी चित्र बनाते हो तो लगता है वह अभी साकार हो उठेगा.’’

‘‘मैं तो सिर्फ अच्छा बनाने की कोशिश करता हूं. यह देखने वालों का नजरिया होता है. तुम जैसी कला की कद्रदानों के कारण ही कला जिंदा है.’’ मनोज ने एक कलाकार की हैसियत से बहुत कुछ कह दिया.

मनोज ने शिवानी की खूबसूरत आंखों में झांका. शिवानी उस की हर बात को बड़ी संजीदगी से अपने जेहन में उतारने की कोशिश कर रही थी. एकएक बात उस के अंदर खलबली मचा रही थी. मनोज द्वारा साथ में लाई गई अधूरी पेंटिंग को देखते हुए बोली, ‘‘इस पेंटिंग में प्रेम की कौन सी भाषा उकेर रहे हो?’’

‘‘बनाने से पहले बता दूंगा तो तुम्हारे लिए इस पेंटिंग का महत्त्व कम हो जाएगा. अभी यह अधूरी है, जब पूरी हो जाएगी, तब देखना. बस शर्त यह है कि इसे आंखों से नहीं दिल से देखना. कभीकभी जो चीज आंखों से नहीं दिखाई देती, वह आंखें बंद करने पर दिखाई देती है.’’ कह कर मनोज ने अपनी आंखें बंद कर लीं.

पहले तो शिवानी उस की बात पर हंसी, इस के बाद उस के कान के पास मुंह ले जा कर धीरे से बोली, ‘‘पेंटर बाबू, क्या मुझे नहीं बताओगे कि आंखें बंद कर के तुम क्या देख रहे हो?’’

मनोज ने हड़बड़ा कर आंखें खोल लीं. कला के पारखी मनोज ने शिवानी की आंखों की भाषा पढ़ ली. उस में प्रेम की गहरी कशिश और आमंत्रण था. शिवानी के शब्द ‘पेंटर बाबू’ और ‘मुझे नहीं बताओगे’ अपनेआप का अधिकार जता रहे थे.

तभी शिवानी ने कहा, ‘‘मैं भी पेंटिंग सीखना चाहती हूं, क्या मुझे सिखाओगे?’’

‘‘इस के लिए कीमत चुकानी पड़ेगी.’’ मनोज मजाकिया अंदाज में बोला.

शिवानी के होंठों पर कटीली मुसकान उभर आई. वह शरारती लहजे में बोली, ‘‘बड़े लोभी कलाकार हो, एक कला के कद्रदान से भी कीमत वसूलना चाहते हो. बताओ, क्या कीमत लोगे?’’

‘‘पहले वादा करो कि तुम मुझ से नाराज तो नहीं होगी.’’ मनोज ने गंभीर हो कर कहा.

‘‘चलो, मैं वादा करती हूं कि नाराज नहीं  होऊंगी. जो भी कहना है, खुल कर कह डालो.’’ शिवानी बोली.

‘‘शिवानी, मैं जानता हूं कि तुम शादीशुदा हो, फिर भी पता नहीं तुम ने मेरे ऊपर कैसा जादू कर दिया है कि मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं. दिनरात उठतेबैठते तुम ही तुम मेरे खयालों में छाई रहती हो. यहां तक कि पेंटिंग बनाने का जुनून भी तुम्हारे प्यार के आगे फीका पड़ गया है. यदि तुम ने मेरे प्यार को ठुकरा दिया तो मैं मर जाना पसंद करूंगा.’’

‘‘ऐसी अशुभ बात मत बोलो मनोज. मैं तो कब से तुम्हें अपना मान बैठी हूं. बस यही बात तुम्हारे मुंह से सुनने के लिए तरस रही थी.’’

शिवानी ने मनोज के प्यार को कबूल किया तो उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया. फिर क्या था, दोनों के तन में वासना की आग भड़क उठी, जो हसरतें पूरी होने के बाद ही शांत हुई. उस दिन से दोनों के जीवन में एक नई बहार आ गई. उन के मिलन का सिलसिला अनवरत चलने लगा. 30 मई, 2015 की सुबह नकटी मोड़ पर राहगीरों ने एक प्लास्टिक की बोरी देखी, जिस में से सड़ांध आ रही थी. लोगों को शक हुआ तो इस की सूचना थाना सिविल लाइंस को दे दी. सूचना मिलते ही टीआई अशोक सिंह पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने बोरी खुलवाई तो उस में एक युवक की लाश निकली.

मरने वाले की उम्र 22-23 साल थी. देखने से ही लग रहा था कि लाश कई दिनों पुरानी है, इसलिए सड़ गई है. पुलिस ने वहां मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन कोई भी लाश को पहचान नहीं पाया. अचानक टीआई अशोक सिंह को याद आया कि एक दिन पहले थाने में एक युवक की गुमशुदगी दर्ज हुई थी. उन्होंने थाने में फोन कर के इस की जानकारी की तो पता चला कि कोठी थाने के सोनोर निवासी हरिदीन चौधरी ने अपने बेटे मनोज चौधरी की गुमशुदगी दर्ज कराई थी.

मनोज की उम्र भी 22-23 साल थी. इसलिए उन्होंने मनोज के घर वालों को घटना की सूचना भिजवा दी. सूचना मिलते ही घर वाले मौके पर पहुंच गए. उन्होंने लाश देखते ही उस की शिनाख्त मनोज के रूप में कर दी. लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद टीआई अशोक सिंह ने जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. थाने आ कर उन्होंने मृतक मनोज के घर वालों से पूछताछ की तो पता चला कि मनोज 27 मई को अपनी बुआ के घर हाटी गया था. वहां से वह रात 11 बजे यह कह कर निकला था कि वह अपनी बहन के घर कुसियारा जा रहा है, लेकिन वह वहां नहीं पहुंचा.

जब वह अपनी बहन के यहां नहीं पहुंचा तो उस की काफी तलाश की गई, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. तब पिता हरिदीन चौधरी ने 29 मई को थाने में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. अगले दिन उस की लाश मिल गई. पिता ने बताया कि उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. टीआई ने सोचा कि ऐसी कोई न कोई वजह तो जरूर रही होगी, जिस की वजह से मनोज की हत्या की गई. उन्होंने हरिदीन चौधरी से मनोज के दोस्तों व परिचितों के नाम पूछे तो उन्होंने बताया कि उस का खास दोस्त एक ही था, वह था गांधीग्राम में रहने वाला पवन चौधरी. वह बस उसी के घर ज्यादा आताजाता था. दोनों में गहरी दोस्ती थी. इस पूछताछ के बाद टीआई अशोक सिंह ने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर के जांच शुरू कर दी.

अशोक सिंह को मुखबिरों से पता चला कि पवन की पत्नी शिवानी काफी रंगीनमिजाज थी. पवन की गैरमौजूदगी में मनोज उस से मिलने भी जाता था. इस से पुलिस को शक हुआ कि कहीं शिवानी और मनोज के बीच कोई चक्कर तो नहीं था? अशोक सिंह ने पवन व शिवानी के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि शिवानी के नंबर से हर रोज पवन के नंबर पर कईकई बार लंबीलंबी बातें होती थीं. 27 मई की रात 11 बजे के करीब मनोज ने शिवानी को फोन किया था. उस के बाद से ही मनोज लापता था. इस का मतलब यह था कि मनोज की हत्या के तार शिवानी से जुड़े थे.

अशोक सिंह ने शिवानी को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. उस से पूछताछ शुरू की गई तो शातिरदिमाग शिवानी ने उन्हें काफी देर तक गुमराह किया. लेकिन जब महिला कांस्टेबल ने उसे सवालों में उलझाया तो वह टूट गई. उस ने अपना गुनाह कबूल करते हुए अपने पति पवन उर्फ नंदू और देवर देवानंद उर्फ देवा का नाम उगल दिया. इस के बाद पुलिस ने तत्काल काररवाई करते हुए पवन और देवानंद को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उन्होंने मनोज की हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

मनोज और शिवानी के बीच एक बार संबंध बने तो बारबार दोहराए जाने लगे. लेकिन ऐसे संबंधों की गुप्त जिंदगी अधिक लंबी नहीं होती, एक दिन सामने आ ही जाती है. मनोज रोजाना दोपहर को अपने काम से गायब हो जाता था. इस से पवन के मन में शंका हुई कि यह आखिर जाता कहां है? एक दिन पवन भी दोपहर में अचानक अपने घर आ गया. घर का दरवाजा बंद था, लेकिन अंदर से उस की पत्नी और किसी युवक के हंसने की तेजतेज आवाजें आ रही थीं. पवन का मन शंका से घिर गया.

उस ने दरवाजा खटखटाया और शिवानी को आवाज दी. लेकिन दरवाजा काफी देर बाद खुला. वह अंदर घुसा तो कमरे में मनोज खड़ा मिला. पवन को माजरा समझते देर नहीं लगी. उस ने दोनों को काफी फटकारा. मनोज से कहा कि वह आइंदा उस के घर में कदम न रखे, नहीं तो उस के लिए अच्छा नहीं होगा. मनोज वहां से चला गया और शिवानी ने भी पति से गलती के लिए माफी मांग ली. अब मनोज का शिवानी के यहां आनाजाना बंद हो गया. एकदूसरे से अलग रहने की वजह से वे बेचैन रहने लगे. वे फोन पर तो बातें कर लेते थे, लेकिन मिलन के लिए जुगत लगाते रहते.

27 मई, 2015 को मनोज अपनी बुआ से मिलने उस के घर हाटी गया. वहां से रात 11 बजे वह अपनी बहन के घर कुसियारा जाने की बात कह कर निकला. वहां से निकलते ही उस ने मोबाइल से शिवानी से बात की तो उस ने उसे अपने घर बुला लिया, क्योंकि उस समय वह घर पर अकेली थी. मनोज जैसे ही शिवानी के घर पहुंचा उसे अकेली पा कर उस ने उसे बांहों में भर लिया और प्यार करने लगा. इत्तफाक से उसी समय पवन आ गया. उसे देख कर मनोज की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. उस ने बात बनाते हुए कहा कि उसे बहन के यहां कुसियारा जाना था, पर रात ज्यादा हो गई, इसलिए वह रात बिताने के लिए यहां आ गया.

लेकिन पवन ने उसे अपनी आंखों से दूसरी हालत में देखा था, इसलिए उसे उस पर गुस्सा आ रहा था. लिहाजा पवन उस पर टूट पड़ा. उस ने उस की लानतमलामत शुरू कर दी. दोनों के बीच हाथापाई होने लगी, इस में मनोज पवन पर भारी पड़ने लगा. उस ने पवन को उठा कर पटक दिया और उस के सीने पर सवार हो गया. जब शिवानी ने देखा कि मनोज उस के पति की जान ले सकता है तो वह हरकत में आ गई. पति की जान बचाने के लिए वह कमरे में रखा टीवी का तार उठा लाई और प्रेमी मनोज के गले में डाल कर खींचने लगी. इस से मनोज की पकड़ ढीली पड़ गई.

इस का फायदा उठा कर पवन ने मनोज को गिरा दिया. इस के बाद दोनों ने मिल कर मनोज के गले में फंसे तार को कस कर खींचा. दम घुटने से मनोज की कुछ ही देर में मौत हो गई. हत्या करने के बाद शिवानी और पवन के सामने मनोज की लाश को ठिकाने लगाने की समस्या आई. दोनों ने रायमशविरा कर के तय किया कि बाथरूम में गड्ढा खोद कर लाश को दबा दिया जाए. सुबह 4 बजे तक दोनों ने बाथरूम में गड्ढा खोदा और उस में मनोज की लाश डाल कर उस में मिट्टी डाल दी. इस के बाद निश्चिंत हो कर दोनों अपनी दिनचर्या में लग गए. अभी 2 दिन ही बीते थे कि लाश सड़ने की वजह से तेज बदबू उठने लगी. इस से दोनों को अपने पकड़े जाने की चिंता हुई तो उन्होंने लाश को कहीं बाहर ठिकाने लगाने का फैसला किया.

इस के लिए पवन ने गांधीग्राम में ही रह रहे अपने छोटे भाई देवानंद चौधरी उर्फ देवा को सारी बात बता कर लाश ठिकाने लगाने में मदद मांगी. भाई को मुसीबत में पड़ा देख कर देवानंद उस की मदद करने को तैयार हो गया. शिवानी, पवन और देवानंद ने लाश को ठिकाने लगाने की योजना बना ली. 29 मई, 2015 की रात तकरीबन 11 बजे देवानंद अपने भाई रामाश्रय चौधरी का औटो नंबर एमपी 19 आर 1438 ले कर पवन के घर पहुंचा. तीनों ने बाथरूम के गड्ढे से मनोज की लाश को निकाला और एक प्लास्टिक की बोरी में भर कर औटो से नकटी मोड़ पर फेंक आए.

लेकिन उन का गुनाह कानून की नजर से बच नहीं सका और वे कानून के शिकंजे में फंस गए. अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त तार, फावड़ा और औटो बरामद कर लिया. इस के बाद तीनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Crime Story: सपनों से सस्ता सिंदूर – पति को बनाया शिकार

Hindi Crime Story: 31 वर्षीय कल्पना बसु कर्नाटक के जिला बीवी का धोखा में आने वाले तालुका माहेर की रहने वाली थी. उस का जन्म एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ था. उस के जन्म के कुछ दिनों पहले ही पिता का निधन हो गया था. मां ने मेहनतमजदूरी कर उसे पालापोसा. पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण वह ज्यादा पढ़ाईलिखाई भी नहीं कर पाई थी.

कल्पना खूबसूरत होने के साथसाथ महत्त्वाकांक्षी भी थी. वह चाहती थी कि उसे ऐसा जीवनसाथी मिले जो उस की तरह हैंडसम हो और उस की भावनाओं की कद्र करते हुए सभी इच्छाओं को पूरा करे. लेकिन उस के इन सपनों पर पानी तब फिर गया जब उस की शादी एक ऐसे मामूली टैक्सी ड्राइवर बसवराज बसु के साथ हो गई, जो उस के सपनों के पटल पर कहीं भी फिट नहीं बैठता था.

38 वर्षीय बसवराज बसु उसी तालुका का रहने वाला था, जिस तालुका में कल्पना रहती थी. प्यार तो उसे बचपन से ही नहीं मिला था. उस के पैदा होने के बाद ही मांबाप दोनों की मौत हो गई थी. उसे नानानानी ने पालपोस कर बड़ा किया था. नानानानी की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वह भी पढ़लिख नहीं सका. जिंदगी का बोझ उठाने के लिए जैसेतैसे वह टैक्सी ड्राइवर बन गया था. ड्राइविंग का लाइसैंस मिलने पर वह माहेर शहर आ कर कैब चलाने लगा. जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो गया तो नातेरिश्तेदारों ने उस की शादी कराने की सोची. आखिरकार उस की शादी कल्पना से हो गई.

खुले विचारों वाली कल्पना से शादी कर के वह खुश था. लेकिन कल्पना उस से खुश नहीं थी. ड्राइवर के साथ शादी हो जाने से उस की सारी ख्वाहिशों और सपनों पर जैसे पानी फिर गया था. पति के रूप में एक मामूली टैक्सी ड्राइवर को पा कर उस के सारे सपने कांच की तरह टूट कर बिखर गए थे.

कुल मिला कर बसवराज बसु और कल्पना का कोई मेल नहीं था, लेकिन मजबूरी यह थी कि वह करती भी तो क्या. बसवराज बसु अपनी आमदनी के अनुसार पत्नी की जरूरतों को पूरी करने की कोशिश करता था, पर पत्नी की ख्वाहिशें कम नहीं थीं. उस की आकांक्षाएं ऐसी थीं, जिन्हें पूरा करना बसवराज के वश की बात नहीं थी. लिहाजा वह अपनी किस्मत को ही कोसती रहती.

समय अपनी गति से चलता रहा. कल्पना 2 बच्चों की मां बन गई. इस के बाद कल्पना की जरूरतें और ज्यादा बढ़ गई थीं, जिन्हें बसवराज बसु पूरा नहीं कर पा रहा था. ऐसी स्थिति में कल्पना की समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे. उस का पति जब घर से टैक्सी ले कर निकलता था तो तीसरेचौथे दिन ही घर लौट कर आता था. घर आने के बाद भी वह कल्पना का साथ नहीं दे पाता था. ऐसे में कल्पना जल बिन मछली की तरह तड़प कर रह जाया करती थी.

उड़ान के लिए कल्पना को लगे पंख

कल्पना खूबसूरत और जवान थी. बस्ती में ऐसे कई युवक थे, जो उस को चाहत भरी नजरों से देखते थे. एक दिन कल्पना के मन में विचार आया कि क्यों न ऐसे युवकों से लाभ उठाया जाए. इस से उस के सपने तो पूरे हो ही सकते हैं, साथ ही शरीर की जरूरत भी पूरी हो जाएगी.

यही सोच कर कल्पना ने उन युवकों को हरी झंडी दे दी. कई युवक उस के जाल में फंस गए. बच्चों के स्कूल और पति के काम पर जाने के बाद वह मौका देख कर उन्हें घर बुला कर मौजमस्ती करने लगी, साथ ही उन से मनमुताबिक पैसे भी लेने लगी.

कल्पना का रहनसहन और घर के बदलते माहौल को पहले तो बसवराज समझ नहीं सका, लेकिन जब सच्चाई उस के सामने आई तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि जिस पत्नी को वह अपनी जान से भी ज्यादा चाहता है, जिस के लिए वह रातदिन मेहनत करता है, उस के पीठ पीछे वह इस तरह का काम करेगी. उस ने यह भी नहीं सोचा कि दोनों बच्चों पर इस का क्या असर पड़ेगा.

मामला काफी नाजुक था. मौका देख कर बसवराज बसु ने जब कल्पना को समझाना चाहा तो वह उस पर ही बरस पड़ी. उस ने पति को घुड़कते हुए कहा कि तुम्हारे और बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद अगर मैं अकेली रहती हूं. ऐसे में अगर मैं किसी से दोचार बातें कर लेती हूं तो इस में बुरा क्या है. तुम्हें यह अच्छा नहीं लगता तो मैं आत्महत्या कर लेती हूं.

कल्पना का बदला व्यवहार और माहौल देख कर बसवराज बसु यह बात अच्छी तरह से समझ गया कि कल्पना को समझानेबुझाने से कोई फायदा नहीं होगा. इसलिए उस ने उस जगह को छोड़ देना ही सही समझा. वह पत्नी और बच्चों को ले कर बेलगांव शहर चला गया.

वहां बसवराज कुड़चड़े थाने के अंतर्गत आने वाले अनु अपार्टमेंट में किराए का फ्लैट ले कर रहने लगा. उस ने टैक्सी चलानी बंद कर दी और किसी की निजी कार चलाने लगा. उसे विश्वास था कि बेलगांव में रह कर पत्नी के आशिक छूट जाएंगे और वह सुधर जाएगी.

लेकिन बसवराज की यह सोच गलत साबित हुई. कल्पना चतुर और स्मार्ट महिला थी. बेलगांव आ कर वह और भी आजाद हो गई. यहां उसे न समाज का डर था और न गांव का. उस ने उसी अपार्टमेंट में रहने वाले पंकज पवार नाम के युवक को फांस लिया. पंकज एक निजी कंपनी में डाटा एंट्री औपरेटर था. वह मडगांव का रहने वाला था.

बसवराज की सोच हुई गलत साबित

31 वर्षीय पंकज पवार की शादी हो चुकी थी. उस के 2 बच्चे भी थे. लेकिन वह कल्पना के लटकोंझटकों से बच नहीं सका. कल्पना से संबंध बन जाने के बाद पंकज पवार उस के फ्लैट पर आनेजाने लगा. एक दिन पंकज कल्पना से मुलाकात कराने के लिए अपने 3 दोस्तों सुरेश सोलंकी, अब्दुल शेख और आदित्य को भी साथ ले आया. पहली ही मुलाकात में ही कल्पना ने उस के तीनों दोस्तों पर ऐसा जादू किया कि वे भी उस के मुरीद हो गए. उन तीनों से भी कल्पना के संबंध बन गए.

कुछ ही दिनों में कल्पना के यहां आने वाले युवकों की संख्या बढ़ने लगी. धीरेधीरे कल्पना के कारनामों की जानकारी इलाके भर में फैल गई. उस की वजह से बसवराज बसु की ही नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले की बदनामी होने लगी. ऐसे में बसवराज का वहां रहना मुश्किल हो गया. दोनों बच्चे अब काफी बड़े हो गए थे. बसवराज बसु ने अपने बच्चों के भविष्य के मद्देनजर कल्पना को काफी समझाया, लेकिन अपनी मौजमस्ती के आगे उस ने बच्चों को कोई अहमियत नहीं दी.

कल्पना पर जब पति के समझाने का कोई असर नहीं हुआ तो वह उसे छोड़ कर वहीं पर जा कर रहने लगा, जहां वह नौकरी करता था. इस के बावजूद वह अपनी पूरी पगार ला कर कल्पना को दे जाता था.
हालांकि कल्पना के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. बसवराज बसु के जाने के बाद वह और भी आजाद हो गई थी. वह अपने चारों दोस्तों के साथ बारीबारी से घूमतीफिरती और मौजमजा करती. इस के अलावा वह उन से अच्छीखासी रकम भी ऐंठती थी. वह पूरे समय अपने रूपयौवन को सजानेसंवारने में लगी रहती थी. यहां तक कि अब वह घर पर खाना तक नहीं बनाती थी. खाना पकाने के लिए उस ने अपने प्रेमी अब्दुल शेख की पत्नी सिमरन शेख को सेवा में रख लिया था.

2 अप्रैल, 2018 को बसवराज बसु की जिंदगी का आखिरी दिन था. एक दिन पहले उसे जो पगार मिली थी, उसे पत्नी को देने के लिए वह 2 अप्रैल को दोपहर में फ्लैट पर पत्नी के पास पहुंचा. घर का जो माहौल था, उसे देख कर उस का खून खौल उठा. कल्पना ने बेशरमी की हद कर दी थी. वहां पर सुरेश सोलंकी, आदित्य और अब्दुल शेख जिस अवस्था में थे, उसे देख कर साफ लग रहा था कि कल्पना उन के साथ क्या कर रही थी. यह देख कर बसवराज का खून खौल गया.

वह पत्नी को खरीखोटी सुनाते हुए बोला, ‘‘मैं तुम्हें खर्चे के लिए पैसे देने के लिए आता हूं. लेकिन तुम्हारा यह घिनौना रूप देख कर तुम्हें पैसा देने और यहां आने का मन नहीं होता. लेकिन बच्चों के लिए यह सब करना पड़ता है.’’

बसवराज की मौत आई रस्सी में लिपट कर

पति की बात सुन कर कल्पना डरी नहीं बल्कि वह भी उस पर हावी होते हुए बोली, ‘‘तो मत आओ. मैं ने तुम्हें कब बुलाया और पैसे मांगे. तुम क्या समझते हो, मेरे पास पैसे नहीं हैं? तुम कान खोल कर सुन लो, मैं जिस ऐशोआराम से रह रही हूं, वह तुम्हारे पैसों से नहीं मिल सकता. तुम्हारी पूरी पगार से तो मेरा शैंपू ही आएगा. रहा सवाल बच्चों का तो उन की चिंता तुम छोड़ दो.’’

कल्पना की यह बात सुन कर बसवराज बसु को जबरदस्त धक्का लगा. इस के बाद पतिपत्नी के बीच झगड़ा बढ़ गया. तभी गुस्से में आगबबूला कल्पना ने अपने तीनों प्रेमियों को इशारा कर दिया. कल्पना का इशारा पाते ही उस के तीनों प्रेमियों ने मिल कर बसवराज बसु को पीटपीट कर बेदम कर दिया.
शारीरिक रूप से कमजोर बसवराज बसु बेहोश हो कर जमीन पर गिर गया. उसी समय अब्दुल शेख की बीवी सिमरन भी वहां आ गई. तभी कल्पना के घर के अंदर बंधी नायलौन की रस्सी खोल कर बसवराज के गले में डाल कर पूरी ताकत से उस का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई. यह देख कर सिमरन सहम गई.

टुकड़ों में बंट गया पति

अब्दुल शेख और कल्पना ने सिमरन को धमकी दी कि अपना मुंह बंद रखे. अगर मुंह खोला तो उस का भी यही हाल होगा. डर की वजह से सिमरन चुप रही. कल्पना और उस के प्रेमियों का गुस्सा शांत हुआ तो वे बुरी तरह घबरा गए. हत्या के समय पंकज वहां नहीं था.

थोड़ी देर सोचने के बाद कल्पना और उस के प्रेमियों ने बसवराज बसु की लाश ठिकाने लगाने का फैसला ले लिया. कल्पना ने शव ठिकाने लगवाने के मकसद से पंकज को फोन कर के बुला लिया. लेकिन पंकज को जब हत्या का पता चला तो वह घबरा गया. पहले तो पंकज ने इस मामले से अपना हाथ खींच लिया, लेकिन अपनी प्रेमिका कल्पना को मुसीबत में घिरी देख कर वह उस का साथ देने के लिए तैयार हो गया.
चारों ने मिल कर बसवराज बसु के शव को बाथरूम में ले जा कर उस के 3 टुकड़े किए और उन टुकड़ों को कपड़ों में लपेट कर प्लास्टिक की 3 बोरियों में भर दिया. मौका देख कर उसी रात 12 बजे इन लोगों ने तीनों बोरियों को अब्दुल शेख की कार की डिक्की में रख दिया. इस के बाद ये लोग कुड़चड़े महामार्ग के अनमोड़ घाट गए और उन बोरियों को एकएक किलोमीटर की दूरी पर घाट की घाटियों में दफन कर के लौट आए.

जैसेजैसे समय बीत रहा था, वैसेवैसे इस हत्याकांड के सभी अभियुक्त बेखबर होते गए. उन का मानना था कि इस हत्याकांड से कभी परदा नहीं उठेगा और उन का राज राज ही रह जाएगा. लेकिन वे यह भूल गए थे कि उन के इस राज की साक्षी अब्दुल शेख की बीवी सिमरन शेख थी, जिस की आंखों के सामने बसवराज बसु की हत्या का सारा खेल खेला गया था. वह इस राज को अपने सीने में छिपाए हुए थी.
पता नहीं क्यों सिमरन को हत्या में शामिल लोगों से डर लगने लगा था. यहां तक कि अपने पति से भी उस का विश्वास नहीं रहा. उसे ऐसा लगने लगा जैसे उस की जान को खतरा है. वे लोग अपना पाप छिपाने के लिए कभी भी उस की हत्या कर सकते हैं. इस डर की वजह से सिमरन शेख बेलगांव की जानीमानी पत्रकार ऊषा नाईक देईकर से मिली और उस ने बसवराज बसु हत्याकांड की सारी सच्चाई बता दी.

आखिर राज खुल ही गया

बसवराज बसु की हत्या की सच्चाई जान कर ऊषा नाईक के होश उड़ गए. उन्होंने सिमरन शेख को साहस और सुरक्षा का भरोसा दे कर मामले की सारी जानकारी बेलगांव कुड़चड़े पुलिस थाने के थानाप्रभारी रवींद्र देसाई और उन के वरिष्ठ अधिकारियों को दी. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में थानाप्रभारी रवींद्र देसाई ने अपनी जांच तेजी से शुरू कर दी.

उन्होंने 24 घंटे के अंदर बसवराज बसु हत्याकांड में शामिल कल्पना बसु के साथ पंकज पवार, अब्दुल शेख और सुरेश सोलंकी को गिरफ्त में ले कर वरिष्ठ अधिकारियों के सामने पेश किया, जहां सीपी अरविंद गवस ने उन से पूछताछ की. पुलिस गिरफ्त में आए चारों आरोपी कोई पेशेवर अपराधी नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था.

9 मई, 2018 को उन्हें गिरफ्तार कर पुलिस अनमोड़ घाट की उस जगह पर ले कर गई, जहां उन्होंने बसवराज बसु के शव के टुकड़े दफन किए थे. उन की निशानदेही पर पुलिस ने शव के तीनों टुकड़ों को बरामद कर लिया. घटना के समय बसवराज जींस पैंट पहने हुए था. उस की पैंट की जेब में उस का ड्राइविंग लाइसेंस मिला, जिस से यह बात सिद्ध हो गई कि शव बसवराज का ही था. शव को कब्जे में लेने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए मडगांव के बांबोली अस्पताल भेज दिया.

पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए कल्पना बसु, पंकज पवार, सुरेश सोलंकी और अब्दुल शेख से विस्तृत पूछताछ कर के उन के विरुद्ध भांदंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. फिर चारों को मडगांव मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक इस हत्याकांड का एक आरोपी आदित्य गुंजर फरार था, जिस की पुलिस बड़ी सरगरमी से तलाश कर रही थी. Hindi Crime Story

Social Story: विचित्र संयोग

Social Story: आनंदी धनंजय और आनंद रोहिणी की मुलाकात एक अजीब संयोग था. लेकिन इस का परिणाम इतना भयंकर होगा, इस की किसी ने कल्पना नहीं की थी.  रविवार के सुबह सात बजे के लगभग धनवानों का इलाका सेक्टर-15ए अभी सोया पड़ा था. चारों ओर शांति फैली थी. वीआईपी इलाका होने के कारण यहां सवेरा यों भी जरा देर से उतरता है, क्योंकि यहां रात का आलम ही कुछ और होता है. चहलपहल थी तो सिर्फ सेक्टर-2 के पीछे के इलाके में. सवेरे 4 बजे से ही यहां मछलियों का बाजार लग जाता है. ट्रौली रिक्शे और टैंपो रुक रहे थे और उन के साथ ही मछलियों के ढेर लग रहे थे. मछलियां लाने के लिए यहां टैंपो और ट्रौली रिक्शों की लाइन लगी थी.

इसी बाजार के पास फाइन चिकन एंड मीट शौप है, जहां सवेरे 4 बजे से ही बकरों को काटने और उन्हें टांगने का काम शुरू हो जाता है. इस इलाके के लोग इसी दुकान से गोश्त खरीदना पसंद करते थे. सामने स्थित डीटीसी बस डिपो से बसें बाहर निकलने लगी थीं. डिपो के एक ओर नया बास गांव है, जिस में स्थानीय लोगों के मकान हैं. डिपो के सामने पुलिस चौकी है, जिस के बाहर 2-3 सिपाही बेंच पर बैठ कर गप्पें मार रहे थे और चौकी के अंदर बैठे सबइंसपेक्टर आशीष शर्मा झपकियां ले रहे थे.

गांव के पीछे के मयूरकुंज की अलकनंदा इमारत की पांचवी मंजिल के एक फ्लैट में एक सुखी जोड़ा रहता था. यह फ्लैट सेक्टर-62 की एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाले धनंजय विश्वास का था. फ्लैट में धनंजय अपनी पत्नी रोहिणी के साथ रहते थे. रोहिणी दिल्ली में पंजाब नेशनल बैंक में प्रोबेशनरी औफिसर थी. वह आगरा की रहने वाली थी. 2 वर्ष पूर्व धनंजय से उस का विवाह हुआ था. इस से पहले धनंजय दिल्ली में अपने मातापिता के साथ रहता था. विवाह के बाद उस के सासससुर ने यह फ्लैट खरीदवा दिया था. रोहिणी वाकई रोहिणी नक्षत्र के समान सुंदर थी. धनंजय और उस की जोड़ी खूब फबती थी.

धनंजय के औफिस का समय सवेरे 9 बजे से शाम 6 बजे तक था. वह औफिस अपनी कार से जाता था. लेकिन लौटने का उस का कोई समय निश्चित नहीं था. रोहिणी शाम साढ़े छह बजे तक घर लौट आती थी. इन हालात में पतिपत्नी शाम का खाना साथ ही खाया करते थे. हां, छुट्टी के दिनों दोनों मिल कर हसंतेखेलते खाना बनाते थे. धनंजय हर रविवार को सेक्टर-2 में लगने वाली मछली बाजार से मछलियां और फाइन चिकन एंड मीट शौप की दुकान से मीट लाता था. पहली जून की सुबह 6 बजे फ्लैट की घंटी बजने पर दूध देने वाले गनपत से दूध ले कर धनंजय फटाफट तैयार हो कर मीट लेने के लिए निकल गया. रोहिणी को वह सोती छोड़ गया था.

वह कार ले कर निकलने लगा तो  चौकीदार ने हंसते हुए पूछा, ‘‘साहब, आज रविवार है न, मीट लेने जा रहे हो?’’

धनंजय ने हंस कर कार आगे बढ़ा दी थी. फाइन चिकन एंड मीट शौप पर आ कर उस ने 2 किलोग्राम मीट और एक किलोग्राम कीमा लिया. इस के बाद उस ने रास्ते में मछली और नाश्ते के लिए अंडे, ब्रेड, मक्खन और 4 पैकेट सिगरेट लिए. लगभग साढ़े 7 बजे वह फ्लैट पर लौट आया. वाचमैन नीचे ही था, साफसफाई करने वाले अपने काम में लगे थे. ऊपर पहुंच कर उस ने ‘लैच की’ से दरवाजा खोला. दरवाजे के अंदर अखबार पड़ा था, जिसे नरेश पेपर वाला दरवाजे के नीचे से अंदर सरका गया था. अखबार उठाते हुए उस ने रोहिणी को आवाज लगाई, ‘‘उठो भई, मैं तो बाजार से लौट भी आया.’’

धनंजय के फ्लैट में सुखसुविधा के सभी आधुनिक सामान मौजूद थे. उस ने डाइनिंग टेबल पर सारा सामान रख कर 2 बड़ी प्लेटें उठाईं. एक में उस ने गोश्त और दूसरे में मछली निकाली. फ्लैट के हौल में शानदार दरी बिछी थी और कीमती सोफे सजे थे. एक कोने में टीवी और डीवीडी प्लेयर रखा था. दूसरे कोने में शो केस के नीचे टेलीफोन रखा था, वहीं मेज पर लैपटौप था. पीछे की ओर गैलरी थी, जहां से दिल्ली की ओर जाने वाली सड़क के साथसाथ दूर तक फैली हरियाली और नोएडा गेट दिखाई देता था. इस हौल के बाईं ओर बैडरूम का दरवाजा था. बैडरूम में डबल बैड, गोदरेज की 2 अलमारियां और एक ड्रेसिंग टेबल था. बैडरूम से लग कर ही एक छोटा गलियारा था. गलियारे में ही टौयलेट और बाथरूम था.

सारा सामान डाइनिंग टेबल पर रखने के बाद बैडरूम में घुसते ही धनंजय की चीख निकल गई, ‘‘रोहिणी?’’

उस की सुंदर पत्नी, उसे जीजान से चाहने वाली जीवनसंगिनी, जो अभी रात में उस के सीने पर सिर रख कर सोई थी, जिसे वह सुबह की मीठी नींद में छोड़ कर गया था, रक्त से सराबोर बैड पर मरी पड़ी थी. रोहिणी के गले, सीने और पेट से उस वक्त भी खून रिस रहा था, जिस से सफेद बैडशीट लाल हो गई थी. कुछ क्षणों बाद धनंजय रोहिणी का नाम ले कर चीखता हुआ बाहर की ओर भागा. उस के अड़ोसपड़ोस में 3 फ्लैट थे. दाईं ओर के 2 फ्लैटों में सक्सेना और मिश्रा तथा बाईं ओर के फ्लैट में रावत रहते थे. पागलों की सी अवस्था में धनंजय ने सक्सेना के फ्लैट की घंटी पर हाथ रखा तो हटाया ही नहीं. वह पड़ोसियों के नाम लेले कर चिल्ला रहा था.

कुछ क्षणों बाद तीनों पड़ोसी बाहर निकले. वे धनंजय की हालत देख कर दंग रह गए. धनंजय कांप रहा था. वह कुछ कहना चाहता था, पर उस के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे. उस के कंधे पर हाथ रख कर सक्सेना ने पूछा, ‘‘क्या हुआ विश्वास?’’

सक्सेना रिटायर्ड कर्नल थे. उन्होंने ही नहीं, मिश्रा और रावत ने भी किसी अनहोनी का अंदाजा लगा लिया था. धनंजय ने हकलाते हुए कहा, ‘‘रो…हि…णी.’’

सक्सेना, उन का बेटा एवं बहू, मिश्रा और रावत उस के फ्लैट के अंदर पहुंचे. बैडरूम का हृदयविदारक दृश्य देख कर सक्सेना की बहू डर के मारे चीख पड़ी और उलटे पांव भागी. अपने आप को संभालते हुए सक्सेना ने कोतवाली पुलिस को फोन लगा कर घटना की सूचना दी. कोतवाली में उस समय ड्यूटी पर सबइंसपेक्टर दयाशंकर थे. दयाशंकर ने मामला दर्ज कर के मामले की सूचना अधिकारियों को दी और खुद 2 सिपाही ले कर अलकनंदा के लिए निकल पड़े. उन के पहुंचते ही वहां के चौकीदार ने उन्हें सलाम किया. लोगों के बीच से जगह बनाते हुए दयाशंकर सीधे पांचवीं मंजिल पर पहुंचे. लोग सक्सेना के घर में जमा थे. धनंजय सोफे पर अपना सिर थामे बैठा था.

दयाशंकर के पहुंचते ही धनंजय उठ कर खड़ा हो गया. आगे बढ़ कर सक्सेना ने अपना परिचय दिया और धनंजय के फ्लैट की ओर इशारा किया. थोड़ी ही देर में फोरैंसिक टीम के सदस्य भी आ पहुंचे. इंसपेक्टर प्रकाश राय भी आ पहुंचे थे. उन के वहां पहुंचते ही एक व्यक्ति सामने आया, ‘‘गुडमौर्निंग सर? आप ने मुझे पहचाना? मैं रिटायर्ड इंसपेक्टर खन्ना. इन फ्लैटों की सुरक्षा व्यवस्था मेरे जिम्मे है. सोसाइटी के सेक्रैटरी ने फोन पर मुझे सूचना दी. दयाशंकर साहब से मुझे पता चला कि आप आ रहे हैं.’’

प्रकाश राय को खन्ना का चेहरा जानापहचाना लगा. मगर उन्हें याद नहीं आया कि वह उस से कहां मिले थे. सीधे ऊपर न जा कर उन्होंने इमारत को गौर से देखना शुरू किया. इमारत में ‘ए’ और ‘बी’ 2 विंग थे. दोनों विंग के लिए अलगअलग सीढि़यां थीं. धनंजय ‘ए’ विंग में रहता था. इमारत के गेट पर ही वाचमैन के लिए एक छोटी सी केबिन थी, जिस में से आनेजाने वाला हर व्यक्ति उसे दिखाई देता था.

इमारत के चारों और घूमते हुए पीछे एक जगह रुक कर प्रकाश राय ने खन्ना से पूछा, ‘‘ये कमरे किस के है?’’

‘‘सफाई कर्मचारियों और वाचमैन के .’’

‘‘कितने वाचमैन हैं?’’

‘‘2 हैं. इन की ड्यूटी 2 शिफ्टों में है. सुबह 8 बजे से रात 8 बजे और रात 8 बजे से सवेरे 8 बजे तक.’’

‘‘इन के खाने की छुट्टी?’’

‘‘वो तो सर, ये अपनी सुविधा के अनुसार खाने जाते हैं. वैसे भी यह समस्या पहली शिफ्ट में आती है. ज्यादातर ये अपना खाना साथ लाते हैं. इसी कमरे में वे खाना खाते हैं. तब तक हम यहां के स्वीपर को गेट पर बैठा देते हैं.’’

‘‘दोनों के नाम क्या हैं और इन के घर कहां है?’’

‘‘कल नाइट शिफ्ट पर नारायण था. वह सेक्टर-10 में रहता है. मौर्निंग शिफ्ट में जो अभी पौने 8 बजे आया है, उस का नाम भास्कर है, वह खोड़ा में रहता है.’’

‘‘अच्छा, यहां स्वीपर कितने हैं?’’

‘‘एक ही है साहब, रणधीर और उस की पत्नी देविका. ये दोनों अपने दोनों बच्चों के साथ यहीं रहते हैं. बाहर का काम रणधीर और टायलेट वगैरह साफ करने का काम देविका करती है.’’

खन्ना से बात करतेकरते प्रकाश राय इमारत के गेट पर आ गए. तभी एसएसपी, एसपी और सीओ भी आ गए. इन्हीं अधिकारियों के साथ डौग स्क्वायड की टीम भी आई थी.

ऊपर जांच चल रही थी. प्रकाश राय एक सिपाही के साथ नीचे रुक गए, बाकी सभी अधिकारी ऊपर चले गए. प्रकाश राय देविका के बारे में सोच रहे थे. वह सभी के घर में आजा सकती थी. वाचमैन जरूरी काम के बिना किसी फ्लैट में जा नहीं सकते थे. नारायण जो रात की ड्यूटी पर था, उसी के रहते हत्या हुई थी. लेकिन उस से पूछताछ करने पर प्रकाश राय के हाथ कोई सूत्र नहीं लगा. उस ने धनंजय को मीट ले आने जाते और लौटते देखा था बस.

‘‘अच्छा नारायण, धनंजय साहब के जाने के बाद तुम यहीं थे क्या? यहां से कहीं नहीं गए?’’

‘‘साहब, मैं यहां से वहां राउंड मार रहा था और नीचे की लाइन बंद कर रहा था. रणधीर ने पंप चालू किया या नहीं, यह देखने भी गया था.’’

‘‘यानी इस दौरान कोई ऊपर जा सकता था?’’

‘‘साहब, आप जो कह रहे हैं, वह संभव है.’’

‘‘अच्छा नारायण, सुबह तुम ने किसी अनजान आदमी को बाहर जाते तो नहीं देखा?’’

‘‘साहब, मेरे रहते कोई अंदर गया ही नहीं तो बाहर कैसे…?’’

‘‘सुनो नारायण, रात को ही कोई अंदर आ गया होगा या किसी के यहां मेहमान के रूप में आया होगा तो…?’’

नारायण चुप हो गया. उसे अपनी बुद्धि पर तरस आने लगा. कुछ सोच कर बोला, ‘‘साहब, दूध वाला और पेपर वाला, ये दोनों आए थे. गनपत दूध वाला जब आया था, धनंजय साहब घर में ही थे. उन्होंने ही दूध लिया होगा. उस के जाने के बाद ही वह मीट लेने चले गए थे. वह ‘ए’ विंग के 7 फ्लैटों में दूध सप्लाई करता है, बाकी के सभी लोग 9 बजे डेयरी की गाड़ी से दूध लेते हैं.’’

‘‘पेपरवाला नरेश धनंजय साहब के जाने के बाद आया था. 2-3 मिनट में ही वह लौट गया था. सिर्फ एक व्यक्ति मुझे याद है रणधीर. धनंजय साहब के जाने के बाद रणधीर सफाईवाला झाडू और प्लास्टिक की बाल्टी ले कर सीढि़यां साफ करने गया था. धनंजय साहब के लौटने से पहले नीचे आ कर वह ‘बी’ इमारत मे चला गया था.’’

‘‘ठीक है नारायण.’’ कह कर प्रकाश राय ने इशारे से सिपाही को पास बुला कर कहा, ‘‘तुम किसी बहाने से बाहर जाओ और थोड़ी देर बाद लौट कर नारायण से गप्पें मारते हुए रणधीर के बारे में कुछ पता लगाने की कोशिश करो.’’

प्रकाश राय के ऊपर पहुंचते ही दयाशंकर ने धनंजय से उन का परिचय कराया. धनंजय के कंधे पर हाथ रखते हुए और सहानुभूति जताते हुए प्रकाश राय ने कहा, ‘‘धनंजय, तुम्हारे साथ जो हुआ, उस का मुझे बेहद अफसोस है. मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि अगर तुम्हारा सहयोग मिलेगा तो मैं खूनी को कानून के शिकंजे में जकड़ कर ही रहूंगा. आओ, अंदर चलते हैं.’’

अंदर फिंगरप्रिंट्स वाले प्रिंट्स की तलाश में लगे थे और फोटोग्राफर फोटो खींच रहा था. प्रकाश राय ने खून से लथपथ रोहिणी की लाश देखी. फिर वह कमरे का निरीक्षण करने लगे. वह सिर्फ एक ही बात सोच रहे थे कि हत्यारा मुख्य द्वार से आया था या दरवाजे से लग क र जो पैसेज है उस में से किचन पार कर के आया था? पैसेज की जांच के लिए वह किचन के दरवाजे पर आए तो किचन टेबल पर ढेर सारा मीट और मछलियां देख कर चौंके. खाने वाले सिर्फ 2 और सामान इतना. प्रकाश राय बैडरूम में लौट आए. सबइंसपेक्टर दयाशंकर और एएसआई राजेंद्र सिंह अलमारी को सील कर रहे थे. आश्चर्य की बात यह थी कि अलमारी का लौकर खुला था. उस में चाबियां लटक रही थीं. अलमारी का सारा सामान ज्यों का त्यों था, जो इस बात का प्रमाण था कि हत्यारे ने सिर्फ लौकर का माल साफ किया था.

बैडरूम में दूसरी अलमारी भी थी. उसे हाथ नहीं लगाया गया था. दयाशंकर ने प्रकाश राय की ओर प्रश्नभरी नजरों से देखा और फिर धनंजय से कहा, ‘‘मिस्टर विश्वास, आप जरा यह अलमारी खोलने की मेहरबानी करेंगे?’’

धनंजय ने एक बार प्रकाश राय को और फिर दयाशंकर की ओर देखते हुए पूछा, ‘‘मैं इन चाबियों को हाथ लगा सकता हूं?’’

प्रकाश राय ने फिंगरप्रिंट्स एक्सपर्ट को प्रश्नभरी नजरों से देखा. एक्सपर्ट ने गर्दन हिलाते हुए अनुमति दे दी. धनंजय ने पहली अलमारी से चाबी निकाल कर दूसरी अलमारी खोली. प्रकाश राय ने गौर से देखा, अलमारी का सारा सामान ज्यों का त्यों था. कहीं कोई उलटपुलट नहीं की गई थी. पहली अलमारी के लौकर से चोरी गए सामान के बारे में धनंजय से पूछा, ‘‘धनंजय, तुम्हारे अंदाज से कितना सामान चोरी गया होगा?’’

‘‘रोहिणी के जेवरात ही लगभग 30-40 लाख रुपए के थे. 40-42 हजार नकदी भी थी.’’

‘‘इतनी नकदी तुम घर में रखते हो?’’

‘‘नहीं साहब, कल शनिवार  था, रोहिणी ने 40 हजार रुपए बैंक से निकाले थे. बैंक में हम दोनों का जौइंट एकाउंट है. कल सवेरे यह रकम मैं एक टूरिस्ट कंपनी में जमा कराने वाला था.’’

‘‘कारण?’’

‘‘अगले महीने मैं और रोहिणी घूमने के लिए जाने वाले थे.’’ कहते हुए उस ने प्रकाश राय को चेकबुक थमा दी. उन्होंने चेकबुक देखा. धनंजय सही कह रहा था. राजेंद्र सिंह को चेकबुक देते हुए उन्होंने कहा, ‘‘राजेंद्र सिंह, इस चेकबुक को भी कब्जे में ले लो और ‘एवन ट्रैवेल्स’ के एजेंट का स्टेटमेंट भी ले लो. रकम बरामद होने पर प्रमाण के रूप में यह सब काम आएगा.’’

इस के बाद गैलरी में आ कर प्रकाश राय ने इशारे से एक सिपाही को बुला कर दबी आवाज में कहा, ‘‘तुम नीचे जा कर रणधीर से बातें करो और किसी बहाने से उस के घर में जा कर देखो, कहीं कुछ सामान दिखाई देता है क्या? रणधीर संदिग्ध है. बात करतेकरते उस से कहो कि साहब को नारायण पर शक है. वह जरूर कुछ न कुछ बताएगा.’’

सिपाही के रवाना होते ही प्रकाश राय किचन में आए. एसआई दयाशंकर और एएसआई राजेंद्र सिंह किचन का निरीक्षण कर रहे थे. प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, ‘‘धनंजय साहब, बुरा मत मानिएगा. मैं एक बात जानना चाहता हूं. तुम और रोहिणी, सिर्फ 2 लोग हो, इस के बावजूद इतना सारा गोश्त और मछली?’’

‘‘साहब, आज मेरे घर पार्टी थी. मेरे औफिस के 2 अधिकारी आशीष तनेजा और देवेश तिवारी अपनीअपनी बीवियों के साथ खाना खाने आने वाले थे. बारीबारी से हम तीनों एकदूसरे के घर अपनी पत्नियों सहित जमा होते हैं और खातेपीते हैं. इस रविवार को मेरे यहां इकट्ठा होना था.’’

‘‘तुम हमेशा फाइन चिकन एंड मीट शौप से ही मीट लाते हो?’’

‘‘जी सर.’’

इतने में सचमुच आशीष तनेजा और देवेश तिवारी अपनीअपनी पत्नियों के साथ धनंजय के घर आ पहुंचे. रोहिणी की हत्या के बारे में सुन कर वे कांप उठे. सक्सेना उन्हें अपने फ्लैट में ले गए. सवेरे 9 बजे धनंजय के मातापिता भी अलकनंदा आ पहुंचे थे. सक्सेना ने फोन कर के उन से कहा था कि रोहिणी सीरियस है. सक्सेना ने दिल्ली में रह रहे रोहिणी के मातापिता को भी खबर कर दी थी. निरीक्षण का काम लगभग पूरा हो गया था. प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, ‘‘धनंजय, हमारे एक्सपर्ट को अंगुलियों के कुछ निशान मिले हैं.

वे निशान तुम्हारे और तुम्हारी पत्नी के भी हो सकते हैं. तुम दोनों के निशान छोड़ कर अन्य निशानों की जांच एक्सपर्ट को करनी पड़ेगी. तुम्हारी अंगुलियों के निशान हमें अभी नहीं चाहिए. हमारे सिपाही के आने पर तुम अपनी अंगुलियों के निशान दे देना. रोहिणी के निशान हम पोस्टमार्टम के समय ले लेंगे.’’

अधिकारियों ने आपस में सलाहमशविरा किया और अन्य सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद एसएसपी और एसपी तो चले गए, लेकिन सीओ और इंसपेक्टर प्रकाश राय सहयोगियों के साथ कोतवाली आ गए. सभी चाय पीतेपीते रोहिणी मर्डर केस के बारे में विचारविमर्श करने लगे.

प्रकाश राय अपने ही विचारों में खोए थे. ठीक से वह कुछ कह नहीं सकते थे, इसलिए वह चुपचाप सभी की बातें सुन रहे थे. बातचीत के दौरान सहज ही सबइंसपेक्टर दयाशंकर बोले, ‘‘एक साल पहले ऐसी ही एक घटना दिल्ली में घटी थी. पर अपराधी को उसी समय पकड़ लिया गया था.’’

‘‘जी,’’ एएसआई राजेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘उस घटना में एक इमारत में अपराधी घुसा था. डुप्लीकेट चाबी से वह फ्लैट का दरवाजा खोलने की कोशिश कर रहा था कि पड़ोसी ने उसे देख लिया और वह पकड़ा गया. वह बंगलादेश का रहने वाला था. रफीक नाम था उस का.’’

‘‘घर में कौनकौन था?’’

‘‘घर की मालकिन और उस के 2 बच्चे.’’

‘‘और उस का पति कहां गया था?’’

‘‘वह सुबह सब्जी लाने मंडी गया था.’’

‘‘सब्जी लाने?’’ प्रकाश राय आश्चर्य से थोड़ा तेज आवाज में बोले, ‘‘और वह रविवार का दिन था क्या?’’

‘‘जी सर, रविवार ही था.’’

‘‘दयाशंकर, वह आदमी अंदर है या बाहर, पता करो.’’

दिल्ली पुलिस से पता चला कि वह बाहर है. उसे 4 महीने की सजा हुई थी. इस समय वह नोएडा में ही रह रहा है और सेक्टर-62 की किसी फैक्ट्री में नौकरी करता है.  प्रकाश राय उत्साहित हो कर बोले, ‘‘अरे उसे पकड़ कर लाओ यहां, इस केस में उस का हाथ हो सकता है.’’ फिर दयाशंकर की ओर देख कर बोले, ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि इस केस में किसी न किसी ने अपराधी को इनफौर्मेशन दी होगी. रविवार को धनंजय सेक्टर-2 की मार्केट मीटमछली लाने जाता है और रोहिणी घर में अकेली होती है, यह बात जरूर किसी न किसी ने उसे बताई होगी. इन में उस इमारत का नारायण, भास्कर रणधीर, उस की औरत देविका, पेपरवाला, दूधवाला, कोई भी हो सकता है. कोई न कोई उस जैसे लोगों को खबर देता होगा, उस के बारे में पता करो.’’

‘‘ठीक है सर, हम पता करते हैं.’’

‘‘दयाशंकर, तुम अभी उस की तलाश में लग जाओ. इस केस में अगर उस का हाथ हुआ तो उस के पास बहुत माल है. तुम अपना स्टाफ ले कर निकल पड़ो. उस के हाथ लगते ही मुझे सूचित करो.’’

दयाशंकर उसी वक्त सहयोगियों के साथ निकल पड़े. सीओ साहब भी चले गए. इस के बाद प्रकाश राय ने राजेंद्र सिंह से कहा, ‘‘अगर वह आदमी इस मामले में शामिल हुआ तो कोई बात नहीं. पर वह इस मामले में शायद ही शामिल हो.’’

‘‘सर,’’ राजेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘आप यह किस उम्मीद पर कह रहे हैं?’’

‘‘मान लो, वह सस्पेक्ट है और उस ने ही यह जुर्म किया है तो सवाल यह उठता है कि वह अंदर घुसा कैसे? गेट पर नारायण था. मान लो, नारायण थोड़ी देर को इधरउधर हो गया और वह अंदर हो गया तो भी पांचवें माले पर जा कर लौक खोल कर हत्या करने, अलमारी खोल कर सारा सामान समेटने और नीचे आने में उसे कम से कम आधा घंटा तो लगा ही होगा. इतनी देर उस का वहां ठहरना संभव ही नहीं था. दूसरी दृष्टि से विचार करो तो धनंजय जब नीचे आया, तब नारायण मौजूद था. धनंजय सवा 6 बजे नीचे आया था. उस के जाने के तुरंत बाद वह अंदर घुस नहीं सकता था, क्योंकि नारायण वहीं था.

मान लो, वह 5-10 मिनट बाद अंदर घुसा और अपना काम किया तो धनंजय और उस का आमनासामना अवश्य होता, क्योंकि धनंजय 7 बजे के लगभग वापस आ गया था. उस वक्त भी नारायण नीचे ही मौजूद था. मगर न उस ने और न सीढ़ी साफ करने गए रणधीर ने उसे देखा. हत्यारा नया है, शातिर होता तो डीवीडी प्लेयर और रोहिणी का कीमती मोबाइल और लैपटौप न छोड़ता.’’ इतने में फोन की घंटी बज उठी. प्रकाश राय ने फोन रिसीव किया, ‘‘हैलो, हां मैं प्रकाश राय. बोलो, शाबाश. किधर टकरा गया वह तुम से? कुछ मिला? ठीक है, तुम उसे सस्पेक्ट मान कर बंद कर दो. मैं तुम्हें फोन करता हूं बाद में.’’ प्रकाश राय ने फोन काट दिया. राजेंद्र सिंह ने अंदाजा लगाते हुए कहा, ‘‘रफीक को पकड़ लिया शायद?’’

‘‘हां,’’ प्रकाश राय ने शांत स्वर में कहा, ‘‘पुलिस ने उसे उस की फैक्ट्री के बाहर से पकड़ लिया है. सोचने वाली बात यह है कि जिस के पास इतने रुपए होंगे, वह नौकरी पर क्यों जाएगा?’’

‘‘लेकिन सर,’’ राजेंद्र सिंह ने अक्ल लगाई, ‘‘हत्यारा जो भी हो, वह नारायण के रहते अंदर गया कैसे?’’

‘‘2 ही बातें हो सकती हैं. अपराधी पाइप के सहारे छत पर चढ़ कर छिपा रहा हो या फिर अंदर का ही कोई व्यक्ति हो.’’ प्रकाश राय ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘कुछ भी हो, हमें नारायण और रणधीर पर नजर रखनी है. ये मुजरिम हो सकते हैं या खबर देने वाले. यह भी एक संभावना है कि हत्या का उद्देश्य चोरी न रहा हो, यानी जेवरात और नकदी उड़ा कर एक बहाना बनाया गया हो. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि रोहिणी के गले में सोने का मंगलसूत्र, हाथ में 4 सोने की चूडि़यां, कानों में झुमके और डे्रसिंग टेबल पर उस की कीमती कलाई घड़ी, कीमती मोबाइल फोन और लैपटौप अपराधी ज्यों का त्यों छोड़ गया था. नारायण या रणधीर ने किसी की मदद से यह कृत्य किया होता तो रोहिणी के शरीर के गहने और घर का सारा सामान चला गया होता. इतनी बड़ी इमारत में रहने वाला भी तो कोई हत्या कर सकता है.’’

प्रकाश राय के मुंह से यह सुन कर राजेंद्र सिंह गंभीर हो गए, क्योंकि ऐसी स्थिति में हत्यारे को अंदरबाहर आनेजाने की जरूरत ही नहीं थी. अभी यह बातचीत चल ही रही थी कि सिपाही नरेश शर्मा प्रकाश राय के कमरे में घुसा. उसे देख कर प्रकाश राय ने पूछा, ‘‘क्यों नरेश, कोई खास खबर?’’

नरेश को प्रकाश राय ने धनंजय के घर में ही रणधीर पर नजर रखने की हिदायत दे दी थी. उसी क्षण से नरेश उस के पीछे लग गया था. दूसरे सिपाही देवनाथ को नारायण के पीछे प्रकाश राय पहले ही लगा चुके थे.

‘‘साहब, खास कुछ भी नहीं है. आप के चले आने के बाद हाथ में एक बर्तन लिए वह बाहर निकला. मैकडोनाल्ड की गली से पीछे जा कर देशी दारू के ठेके पर उस ने एक गिलास चढ़ाई और फिर अपने घर आ कर सोया पड़ा है.’’

‘‘तुम खुद ठेके में गए थे?’’

‘‘नहीं साहब, मेरी जानपहचान का एक फेरीवाला अंदर गया था. अब भी वह रणधीर के घर पर नजर रखे हुए है. मैं आप को यही खबर देने आया था.’’

‘‘नरेश, तुम रणधीर पर कड़ी नजर रखो. मुझे उस पर पूरा शक है. मेरा अनुमान है कि रणधीर और नारायण आज शाम को किसी स्थान पर जरूर मिलेंगे.’’

‘‘ठीक है साहब.’’ कह कर नरेश चला गया. राजेंद्र सिंह को संबोधित करते हुए प्रकाश राय बोले, ‘‘आज रात उस बिल्डिंग पर कड़ी नजर रखनी है. अपने 4-5 सिपाही तैयार रखना. नारायण और रणधीर, दोनों साथी हुए तो रणधीर आज रात को सामान ठिकाने लगाने की कोशिश…’’

प्रकाश राय अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे कि फोन की घंटी बज उठी. उन्होंने रिसीवर उठाया. दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘सर, मैं मिश्रा बोल रहा हूं.’’

‘‘हां, बोलो मिश्रा, क्या खबर है?’’

‘‘साहब, वह व्यापारी अभी तक घर में ही है और उस का औफिस नीचे ही है. उसे जो बिल्डिंग बेचनी है, उस के ग्राउंड फ्लोर पर ही उस का औफिस है.’’

मिश्रा ने जिन सांकेतिक शब्दों का प्रयोग किया था, उन्हें प्रकाश राय समझ गए. व्यापारी का मतलब था नारायण, औफिस यानी घर और ग्राउंड फ्लोर औफिस का मतलब था नारायण ग्राउंड फ्लोर पर ही रहता था. मिश्रा की भाषा से ही प्रकाश राय समझ गए कि मिश्रा कई लोगों के सामने से बोल रहा था. उन्होंने मिश्रा से कहा, ‘‘तुम वहीं ठहरो और अपने आदमियों के वहां पहुंचने तक रोके रहो. संभव हुआ तो मैं भी आऊंगा. कोई विशेष बात होने पर मुझे फोन करना.’’ इस के बाद वह राजेंद्र सिंह से बोले, ‘‘तुम पोस्टमार्टम के बाद रोहिणी का शव विश्वास को जल्दी से जल्दी दिलाने की कोशिश करो.’’

‘‘यस सर.’’ कह कर राजेंद्र सिंह अपने स्टाफ के साथ निकल पड़े. अब प्रकाश राय अकेले थे और नए सिरे से रोहिणी मर्डर केस के बारे में सोचने लगे. एक सूत्र से दूसरा सूत्र जोड़ कर वह अपना जाल बिछाना चाहते थे. उन्होंने अपनी डायरी निकाली. उन्हें अपने कुछ महत्त्वपूर्ण आदमियों को फोन करने थे. वे समाज के जिम्मेदार लोग थे और इन से प्रकाश राय की अच्छी जानपहचान थी. इन्हें प्रकाश राय ने विशेष मतलब से बुलाया था और एक जरूरी काम सौप दिया था. इन्हें रोहिणी के दाहसंस्कार के समय शोकसंतप्त चेहरा बना क र लोगों की बातों को चुपचाप सुन कर उस की रिपोर्ट प्रकाश राय को देनी थी. मजे की बात यह थी कि ये लोग एकदूसरे को नहीं जानते थे.

अंतिम निवास विद्युत शवदाहगृह में 2 व्यक्तियों की बातचीत सुन कर आशीष तनेजा के कान खड़े हो गए, ‘‘कमाल की बात है. आनंदी दिखाई नहीं दी?’’

‘‘सचमुच हैरानी की बात है भई, वह तो रोहिणी की बहुत पक्की सहेली थी. लगता है, उसे किसी ने खबर नहीं दी. रोहिणी के पास तो उस का फोन नंबर भी था.’’

‘‘आनंदी दिखाई देती तो मिस्टर आनंद के भी दर्शन हो जाते.’’

‘‘शनिवार को तो बैंक में आनंदी का फोन भी आया था?’’

आनंदी को ले कर कुछ ऐसी ही बातें देवेश तिवारी से भी सुनीं. उधर मेहता ने जो कुछ सुना, वह इस प्रकार था.

‘‘विवाह आगरा में था, इसीलिए दोनों आगरा गए थे.’’

‘‘आगरा तो वे हमेशा आतेजाते रहते थे.’’‘‘वैसे विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ.’’

ऐसा ही कुछ नागर ने भी सुना था. इन लोगों ने अपने कानों सुनी बातें फोन पर प्रकाश राय को बता दीं.

यह पता नहीं चल रहा था कि आगरा में किस का विवाह था. प्रकाश राय के लिए यह जानना जरूरी भी नहीं था. एक विचार जो जरूर उन्हें सता रहा था, वह यह कि रोहिणी की पक्की सहेली होने के बावजूद आनंदी उस के अंतिम दर्शन करने भी नहीं आई थी. और तो और आनंदी का पति भी दाहसंस्कार में शामिल नहीं हुआ था. इन दोनों का न होना लोगों को हैरान क्यों कर रहा था? अब इस आनंदी को कहां ढूंढ़ा जाए?

प्रकाश राय स्वयं राजेंद्र सिंह को ले कर चल पड़े. रास्ते में प्रकाश राय ने राजेंद्र सिंह को आनंदी के बारे में जो कुछ सुना था, बता दिया. रोहिणी के बैंक के मैनेजर रोहित बिष्ट से मिल कर प्रकाश राय ने अपना परिचय दिया और वहां आने का कारण बताते हुए कहा, ‘‘जो कुछ हुआ, बहुत बुरा हुआ. हमें तो दुख इस बात का है कि हत्यारे का हमें कोई सुराग तक नहीं मिल रहा है.’’

‘‘हम तो आसमान से गिर पड़े. सवेरे 10 बजे आते ही फोन पर रोहिणी की हत्या की खबर मिली.’’

‘‘तुम्हें फोन किस ने किया था?’’

‘‘सक्सेना नाम के किसी व्यक्ति ने. पर एकाएक हमें विश्वास ही नहीं हुआ. हम ने मिसेज विश्वास के घर फोन किया. तब पता चला कि रोहिणी वाकई अब इस दुनिया में नहीं रही. हम कुछ लोग अलकनंदा गए थे. मैं दाह संस्कार में जा नहीं पाया. हां, मेरे कुछ साथी जरूर गए थे.’’

‘‘आप जरा बुलाएंगे उन्हें?’’

कुछ क्षणों बाद ही 5-6 बैंक कर्मचारी मैनेजर के कमरे में आ गए. उन्होंने प्रकाश राय से उन का परिचय कराया. बातचीत के दौरान प्रकाश राय ने वहां उपस्थित हेड कैशियर सोलंकी से पूछा, ‘‘शनिवार को मिसेज विश्वास ने कुछ रुपए निकाले थे क्या?’’

‘‘हां, 40 हजार…’’

‘‘खाता किस के नाम था?’’

‘‘मिस्टर और मिमेज विश्वास का जौइंट एकाउंट है.’’

‘‘आप ने मिसेज विश्वास को जो रकम दी थी, वह किस रूप में थी?’’

‘‘5 सौ के नए कोरे नोटों के रूप में दिया था. उन नोटों के नंबर भी हैं मेरे पास.’’

प्रकाश राय ने राजेंद्र सिंह से नोटों के नंबर लेने और उस चेक को कब्जे में लेने को कहा.

कुछ क्षण रुक कर उन्होंने अपना अंदाज बदलते हुए कहा, ‘‘अरे क्या खूब याद आया बिष्ट साहब, विश्वास के यहां हमें बारबार ‘बैंक, आनंदी, कल फोन किया था’- ऐसा सुनाई पड़ रहा था. आप के यहां कोई आनंदी काम..?’’

‘‘नहीं,’’ वहां मौजूद एक अधिकारी ने कहा, ‘‘वह आनंदी गौड़ है. रोहिणी की फास्टफ्रैंड. वह यहां काम नहीं करती.’’

‘‘अच्छा, यह बात है. बारबार आनंदी का नाम सुनने पर मुझे लगा कि वह यहीं काम करती होगी. आप को मालूम है, यह आनंदी कहां रहती है?’’

‘‘निश्चित रूप से तो मालूम नहीं, पर वह दिल्ली में कहीं रहती है. 2-3 बार वह बैंक में भी आई थी. शनिवार को उस का फोन भी आया था. शायद एक, डेढ़ महीना पहले ही उन की जानपहचान हुई थी. मिसेज विश्वास ने ही मुझे बताया था?’’

‘‘एक विवाह में शामिल होने के लिए अप्रैल महीने के अंत में गई थीं और 3 मई को ड्यूटी पर आ गई थीं.’’

‘‘यहां किसी ने मिसेज आनंदी को रोहिणी की हत्या के बारे में बताया तो नहीं है. अगर नहीं तो अब कोई नहीं बताएगा. क्या किसी के पास उस का नंबर है. अगर नहीं है तो रोहिणी के काल डिटेल्स से तलाशना पड़ेगा.’’

मैनेजर ने बैंक की औपरेटर से इंटरकौम पर बात की तो प्रकाश राय को आनंदी का फोन नंबर मिल गया. इस के बाद उन्होंने उस नंबर से आनंदी के घर का पता मालूम कर लिया.

‘‘पता कहां का है?’’ मैनेजर से पूछे बिना नहीं रहा गया.

‘‘साउथ एक्स का. अच्छा मिसेज गौड़ ने किसलिए फोन किया था?’’

‘‘औपरेटर ने बताया है कि किसी वजह से मोबाइल पर फोन नहीं मिला तो मिसेज गौड़ ने लैंडलाइन पर फोन किया था. वह रविवार को मिसेज विश्वास को शौपिंग के लिए साथ ले जाना चाहती थीं. पर रोहिणी ने कहा था कि उस के यहां कुछ मेहमान खाना खाने आ रहे हैं, इसलिए वह नहीं आ सकेगी.’’

इतने में ही राजेंद्र सिंह और मिश्रा वहां आ पहुंचे. राजेंद्र सिंह अपना काम पूरा कर चुके थे. प्रकाश राय ने रोहिणी का बियरर चेक ले कर उसे देखा और बडे़ ही सहज ढंग से पूछा, ‘‘मिस्टर बिष्ट, आप के बैंक में सेफ डिपौजिट वाल्ट की सुविधा है?’’

‘‘हां, है. आप को कुछ…?’’

‘‘नहीं, नहीं, मैं ने यों ही पूछा. अब हम चलते हैं.’’

प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह बैंक से निकल कर साउथ एक्स में जहां आनंदी रहती थी, वहां पहुंचे. प्रकाश राय ने ऊपर पहुंच कर एक फ्लैट के दरवाजे की घंटी बजाई. फ्लैट के दरवाजे पर लिखा ‘आनंद गौड़’ नाम वह पहले ही पढ़ चुके थे. कुछ क्षणों बाद दरवाजा खुला. प्रकाश राय को समझते देर नहीं लगी कि उन के सामने आनंदी और उस के पति आनंद गौड़ खड़े हैं और दोनों बाहर जाने की तैयारी में हैं. मिस्टर गौड़ ने आश्चर्य से प्रकाश राय को देखा. प्रकाश राय ने शांत भाव से कहा, ‘‘मुझे आनंद गौड़ से मिलना है.’’

आनंद ने आनंदी को और आनंदी ने आनंद को देखा. 2 अपरिचितों को देख कर वे हड़बड़ा गए थे.

‘‘मैं ही आनंद गौड़ हूं, आप…?’’

‘‘हम दोनों नोएडा पुलिस से हैं. एक जरूरी काम से आप के पास आए हैं. घबराने की कोई बात नहीं है. मुझे आप से थोड़ी जानकारी चाहिए.’’

‘‘आइए, अंदर आइए.’’

प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह ने घर में प्रवेश किया. ड्राइंगरूम में बैठते हुए प्रकाश राय बोले, ‘‘मिस्टर आनंद, जिन लोगों का पुलिस से कभी सामना नहीं होता, उन का आप की तरह घबरा जाना स्वाभाविक है. मैं आप से एक बार फिर कहता हूं, आप घबराइए मत. बस, आप मेरी मदद कीजिए.’’

बातचीत के दौरान आनंद से प्रकाश राय को मालूम हुआ कि आनंद के परिवार में मातापिता, भाईबहन और पत्नी, सभी थे. 2 साल पहले आनंद और आनंदी का विवाह हुआ था. करोलबाग में आनंद के पिता की करोलबाग शौपिंग सेंटर नामक एक शानदार दुकान थी . टीवी, डीवीडी प्लेयर, फ्रिज, पंखा आदि कीमती सामानों की यह दुकान काफी प्रसिद्ध थी. मंगलवार को दुकान बंद रहती थी. इसलिए मिस्टर आनंद घर पर मिल गए थे. पतिपत्नी अपने किसी रिश्तेदार के यहां पूजा में जा रहे थे कि वे वहां पहुंच गए थे.

आनंद ने अपने निजी जीवन के बारे में सब कुछ बता दिया तो आनंदी ने प्रकाश राय से कहा, ‘‘अब तो बताइए कि आप हमारे घर कौन सी जानकारी हासिल करने आए हैं?’’

‘‘मिसेज आनंदी, आप यह बताइए कि आप मिसेज रोहिणी विश्वास को जानती हैं?’’

प्रकाश राय के मुंह से रोहिणी का नाम सुन कर आनंद और आनंदी भौचक्के रह गए.

‘‘हां, वह मेरी सहेली है. क्यों, क्या हुआ उसे?’’

‘‘आप की और रोहिणी की मुलाकात कब और कहां हुई थी?’’

‘‘हमारी जानपहचान हुए लगभग एक महीना हुआ होगा. अप्रैल के अंतिम सप्ताह में हम दोनों घूमने आगरा गए थे. 3 मई को आगरा से दिल्ली आते समय शताब्दी एक्सप्रेस में हमारी मुलाकात हुई थी.’’

‘‘लेकिन जानपहचान कैसे हुई?’’

‘‘हम आगरा स्टेशन से गाड़ी में बैठे थे. रोहिणी और उस के पति भी वहीं से गाड़ी में बैठे थे. उन की सीट हमारे सामने थी. बांतचीत के दौरान हमारी जानपहचान हुई. हम दोनों के पति गाड़ी चलते ही सो गए थे. हम एकदूसरे से बातें करने लगी थीं. फिर हम बचपन की सहेलियों की तरह घुलमिल गईं.’’

‘‘सारे रास्ते तुम दोनों के पति सोते ही रहे?’’

‘‘अरे नहीं, दोनों जाग गए थे. फिर हम ने एकदूसरे का परिचय कराया. रोहिणी को हजरत निजामुद्दीन उतरना था, हमें नई दिल्ली. उतरने से पहले हम दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने घर का पता और फोन तथा मोबाइल नंबर दे दिया था.’’

‘‘तुम अपने पति के साथ रोहिणी के घर जाती थी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘रोहिणी के पति तुम्हारे घर आया करते थे?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘इस का कारण?’’ प्रकाश राय ने आनंद की ओर देखते हुए पूछा.

‘‘कारण…?’’ आनंद गड़बड़ा गया, ‘‘एक तो दुकान के कारण मुझे समय नहीं मिलता था, दूसरे न जाने क्यों मुझे मिस्टर विश्वास से मिलने की इच्छा नहीं होती थी.’’

‘‘रोहिणी से आखिरी बार तुम कब मिली थीं?’’ प्रकाश राय ने आनंदी से पूछा.

‘‘पिछले हफ्ते मैं रोहिणी के बैंक गई थी.’’

‘‘अच्छा रोहिणी को तुम ने आखिरी बार फोन कब किया था और क्यों?’’

‘‘पिछले शनिवार को. लाजपतनगर में शौपिंग के लिए मैं ने उसे बुलाया था. पर उस ने मुझे बताया कि रविवार को उस के यहां कुछ लोग खाने पर आने वाले थे.’’

अब तक आनंद दंपति ने जो कुछ बताया था, वह सब सही था. प्रकाश राय थोड़ा सा घबराए हुए थे. एक प्रश्न का उत्तर उन्हें नहीं मिल रहा था. इतनी पूछताछ के बाद बेचैन हुए आनंद ने प्रकाश राय से पूछा, ‘‘आप रोहिणी के बारे में इतनी पूछताछ क्यों कर रहे है?’’

गंभीर स्वर में प्रकाश राय ने कहा, ‘‘लोग हम से सत्य को छिपाते हैं, लेकिन हमारा काम ही है लोगों को सच बताना. परसों सवेरे 6 से 7 बजे के बीच किसी ने छुरा घोंप कर रोहिणी की हत्या कर दी है.’’

‘‘नहीं..,’’ आनंदी चीख पड़ी. लगभग 10 मिनट तक आनंदी हिचकियां लेले कर रोती रही. उस के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. आनंदी के शांत होने पर प्रकाश राय ने पूरी घटना सुनाई और अफसोस जाहिर करते हुए कहा, ‘‘अभी तक हमें कोई भी सूत्र नहीं मिला है. हमारी जांच जारी है, इसलिए रोहिणी के सभी परिचितों से मिल कर हम पूछताछ कर रहे हैं. कल उस का अंतिम संस्कार भी हो गया है.’’

‘‘लेकिन सर, किसी ने भी हमें इस घटना की सूचना क्यों नहीं दी?’’ आनंद ने पूछा.

‘‘मैं भी यही सोच रहा हूं मिस्टर आनंद, तुम्हारी पत्नी और रोहिणी में बहुत अच्छी मित्रता थी. फिर भी धनंजय ने तुम्हें खबर क्यों नहीं दी, जबकि उस ने कर्नल सक्सेना को तमाम लोगों के फोन नंबर दे कर इस घटना की खबर देने को कहा था. है न आश्चर्य की बात?’’

‘‘मैं क्या कह सकता हूं?’’

‘‘मैं भी कुछ नहीं कह सकता मिस्टर आनंद. कारण मैं धनंजय से पूछ नहीं सकता. पूछने से लाभ भी नहीं, क्योंकि धनंजय कह देगा, मैं तो गम का मारा था, मुझे यह होश ही कहां था? अच्छा आनंदी, मैं तुम से एक सवाल का उत्तर चाहता हूं. रोहिणी ने कभी अपने पति के बारे में कोई ऐसीवैसी बात या शिकायत की थी तुम से?’’

‘‘नहीं, कभी नहीं. वह तो अपने वैवाहिक जीवन में बहुत खुश थी.’’

प्रकाश राय का प्रश्न और आनंदी का उत्तर सुन कर आनंद ने जरा घबराते हुए पूछा,  ‘‘आप धनंजय पर ही तो शक नहीं कर रहे हैं?’’

‘‘नहीं, उस पर मैं शक कैसे कर सकता हूं, अच्छा, अब हम चलते हैं. जरूरत पड़ने पर मैं फिर मिलूंगा.’’

प्रकाश राय सोच रहे थे कि पूरे सफर के दौरान आनंद और धनंजय ने एकदूसरे से ज्यादा बात क्यों नहीं की? यहां भी वे एकदूसरे से क्यों नहीं मिलते थे?

मंगलवार, 5 मई. रोहिणी कांड की गुत्थी ज्यों की त्यों बरकरार थी. प्रकाश राय को कई लोगों पर शक था, पर प्रमाण नही थे. सिर्फ शक के आधार पर किसी को पकड़ कर बंद करना प्रकाश राय का तरीका नहीं था. दोपहर बाद प्रकाश राय के औफिस पहुंचने से पहले ही उन की मेज पर फिंगरप्रिंट्स ब्यूरो की रिपोर्ट रखी थी. रिपोर्ट देखतेदेखते उन के मुंह से निकला, ‘‘अरे यह…तो.’’ घंटी बजा कर इन्होंने राजेंद्र सिंह को बुलाया.

‘‘राजेंद्र सिंह, रोहिणी मर्डर केस का अपराधी नजर आ गया है.’’ कह कर प्रकाश राय ने उन्हें एक नहीं, अनेक हिदायतें दीं. राजेंद्र सिंह और उन के स्टाफ को महत्पूर्ण जिम्मेदारी सौंप कर योजनाबद्ध तरीके से समझा कर बोले,  ‘‘जांच को अब नया मोड़ मिल गया है. भाग्य ने साथ दिया तो 2-3 दिनों में ही अपराधी पूरे सबूत सहित अपने शिकंजे में होगा. समझ लो, इस केस की गुत्थी सुलझ गई है. बाकी काम तुम देखो. मैं अब जरा अपने दूसरे केस देखता हूं.’’

उत्साहित हो कर राजेंद्र सिंह निकल पड़े उन के आदेशों का पालन करने. 7 मई की सुबह 9 बजे दयाशंकर अपने स्टाफ के साथ औफिस पहुंचे. पिछली रात प्रकाश राय के निर्देश के अनुसार राजेंद्र सिंह पूरी तरह मुस्तैद थे. थोड़ी देर बाद प्रकाश राय के गाड़ी में बैठते ही गाड़ी सेक्टर-15 की ओर चल पड़ी. करीब साढ़े 9 बजे प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह अलकनंदा स्थित धनंजय के घर पहुंचे. प्रकाश राय को देख कर धनंजय जरा अचरज में पड़ गया. उस के पिता भी हौल में ही बैठे थे. उस की मां और बहन अंदर कुछ काम में व्यस्त थीं. ज्यादा समय गंवाए बगैर प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, ‘‘विश्वास, तुम जरा मेरे साथ बाहर चलो. रोहिणी के केस में हमें कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं.

हम तुम्हें दूर से ही एक व्यक्ति को दिखाएंगे. तुम ने अगर उसे पहचान लिया तो समझो इस हत्या में उस का जरूर हाथ है. उस के पास से तुम्हारी संपत्ति भी मिल जाएगी. अब उसे पहचानने के लिए हमे तुम्हारी मदद की जरूरत है.’’

‘‘ठीक है, आप बैठिए. मैं 10 मिनट में तैयार हो कर आता हूं.’’ कह कर धनंजय अंदर चला गया और प्रकाश राय उस के पिता के साथ गप्पें मारने लगे. गप्पें मारतेमारते उन्होंने बड़े ही सहज ढंग से पास रखी टेलिफोन डायरी उठाई, उस के कुछ पन्ने पलटे और यथास्थान रख दिया. फिर वह टहलते हुए शो केस के पास गए. उस में रखा चाबी का गुच्छा उन्हें दिखाई दिया. शो केस  में रखी कुछ चीजों को देख कर वह फिर सोफे पर आ बैठे.

15-20 मिनट में धनंजय तैयार हो गया. प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह के साथ निकलने से पहले उस ने शो केस में से सिगरेट का पैकेट, लाइटर, पर्स, चाबी और रूमाल लिया. अब प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह धनंजय को साथ ले कर निरुला होटल की ओर चल पड़े. लगभग 10 मिनट बाद उन की गाड़ी होटल के निकट स्थित बैंक के सामने जा कर रुकी. गाड़ी रुकते ही प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, ‘‘विश्वास, हम ने तुम्हारी सोसायटी के वाचमैन नारायण को गिरफ्तार कर लिया है. इस समय वह हमारे कब्जे में है. इस बैंक के सेफ डिपौजिट लौकर डिपार्टमेंट में 2 चौकीदार काम करते हैं. इन में से हमें एक पर शक है. मुझे विश्वास है कि उस ने नारायण के साथ मिल कर चोरी और हत्या की है. हम उसे दरवाजे पर ला कर तुम्हें दिखाएंगे. देखना है कि तुम उसे पहचानते हो या नहीं?’’

धनंजय को ले कर प्रकाश राय बैंक में दखिल हुए और बैंक के लौकर डिपार्टमेंट में पहुंचे. वहां मौजूद 2-4 लोगों में से प्रकाश राय ने एक व्यक्ति से पूछा, ‘‘आप…?’’

‘‘मैं बैंक मैनेजर हूं.’’

‘‘आप इन्हें जानते हैं?’’

‘‘हां, यह धनंजय विश्वास हैं.’’

‘‘इन का खाता है आप के बैंक में?’’

‘‘खाता तो नहीं है, लेकिन कल दोपहर 3 बजे इन्होंने लौकर नंबर 106 किराए पर लिया है.’’

‘‘आप जरा वह लौकर खोलने का कष्ट करेंगे?’’

बैंक मैनेजर सुरेशचंद्र वर्मा ने लौकर के छेद में चाबी डाल कर 2 बार घुमाई, पर लौकर एक चाबी से खुलने वाला नहीं था, क्योंकि दूसरी चाबी धनंजय के पास थी. प्रकाश राय धनंजय से बोले, ‘‘मिस्टर विश्वास, तुम्हारी जेब में चाबी का जो गुच्छा है, उस में लौकर नंबर 106 की दूसरी चाबी है. उस से इस लौकर को खोलो.’’

धनंजय घबरा गया. उस ने चाबी निकाल कर कांपते हाथों से लौकर खोल दिया. प्रकाश राय ने लौकर में झांक कर देखा और फिर धनंजय से पूछा, ‘‘यह क्या है मिस्टर विश्वास?’’

धनंजय ने गरदन झुका ली. प्रकाश राय ने लौकर से कपड़े की एक थैली बाहर निकाली. उस थैली में धनंजय के फ्लैट से चोरी हुए सारे जेवरात और 5 सौ रुपए के नोटों का एक बंडल भी था, जिस पर रोहिणी के पंजाब नेशनल बैंक की मोहर लगी थी. इस के अलावा एक और चीज थी उस में, एक रामपुरी छुरा.

‘‘मिस्टर विश्वास, यह सब क्या है?’’ प्रकाश राय ने दांत भींच कर पूछा.

एक शब्द कहे बिना धनंजय ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक कर रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मैं अपना गुनाह कबूल करता हूं. रोहिणी का खून मैं ने ही किया था.’’

दरअसल, हुआ यह था कि मंगलवार को औफिस में आते ही प्रकाश राय को जो फिंगरप्रिंट्स रिपोर्ट मिली थी, उस के अनुसार फ्लैट में केवल रोहिणी और धनंजय के ही प्रिंट्स मिले थे. किसी तीसरे व्यक्ति की अंगुलियों के निशान थे ही नहीं. इसलिए प्रकाश राय की नजरें धनंजय पर जम गई थीं. प्रकाश राय ने फिंगरप्रिंट्स रिपोर्ट अलग रख कर पोस्टमार्टम रिपोर्ट गौर से देखना शुरू किया था. रिपोर्ट के अनुसार, रोहिणी की मृत्यु लगभग 12 से 14 घंटे पहले हुई थी. रोहिणी का पोस्टमार्टम शाम 4 बजे हुआ था यानी राहिणी की मृत्यु आधी रात के बाद 2 बजे से सुबह 4 बजे के बीच हुई थी.

फिर धनंजय सवा 6 बजे से 7 बजे के बीच हत्या होने की बात कैसे कह रहा था? पूरा माजरा प्रकाश राय की समझ में धीरेधीरे आता जा रहा था. धनंजय को अपने ही घर में चोरी करने की क्या जरूरत थी? इस सवाल का जवाब भी प्रकाश राय की समझ में आ गया था. उन्होंने राजेंद्र सिंह को समझाते हुए कहा, ‘‘राजेंद्र सिंह, धनंजय बहुत ही चालाक है. तुम एक काम करो,पिछले 2 दिनों से धनंजय बाहर नहीं गया है. आज भी वह घर पर ही होगा. कुछ दिनों बाद वह चोरी का सामान किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर जरूर रखेगा. उस का सारा घर हम लोगों ने छान मारा है. हो सकता है, उस ने बिल्डिंग में ही कहीं सामान छिपा कर रखा हो या फिर…

‘‘धनंजय जिस वक्त गोश्त लाने निकला था, उस समय उस ने सामान कहीं बाहर रख दिया होगा. पर उस ने कहां रखा होगा. राजेंद्र सिंह कहीं ऐसा तो नहीं कि वह थैली ले कर नीचे उतरा हो और स्कूटर की डिक्की में रख दी हो? हो सकता है राजेंद्र सिंह,’’ प्रकाश राय चुटकी बजाते हुए बोले, ‘‘वह थैली अभी उसी डिक्की में ही हो? राजेंद्र सिंह तुम फौरन अपने स्टाफ सहित निकल पड़ो और धनंजय पर नजर रखो.’’

इस के बाद राजेंद्र सिंह ने अलकनंदा के आसपास अपने सिपाहियों को धनंजय पर निगरानी रखने के लिए तैनात कर दिया था. धनंजय अपने स्कूटर पर ही निकलेगा, यह राजेंद्र सिंह जानते थे. इसलिए राजेंद्र सिंह ने स्कूटर वाले और टैक्सी वाले अपने 2 मित्रों को सहायता के लिए तैयार किया. सारी तैयारियां कर के राजेंद्र सिंह अलकनंदा के पास ही एक इमारत में रह रहे अपने एक गढ़वाली मित्र के घर में जम गए.

5 तारीख का दिन बेकार चला गया. धनंजय और उस के परिवार को सांत्वना देने के लिए लोगों का आनाजाना लगातार बना हुआ था. शायद इसीलिए धनंजय बाहर नहीं निकल पाया था. लेकिन 6 तारीख को दोपहर के समय धनंजय के नीचे उतरते ही राजेंद्र सिंह सावधान हो गए. धनंजय अपनी स्कूटर स्टार्ट कर के जैसे ही बाहर निकला, वैसे ही अपने सिपाहियों के साथ टैक्सी में बैठ कर राजेंद्र सिंह उस के पीछे हो लिये. गोल चक्कर होते हुए धनंजय निरुला होटल के पास स्थित बैंक के सामने आ कर रुक गया. राजेंद्र सिंह ने थोड़ी दूरी पर ही टैक्सी रुकवा दी.

स्कूटर खड़ी कर के धनंजय ने डिक्की खोली और कपड़े की एक थैली निकाली. धनंजय के हाथ में थैली देख कर ही राजेंद्र सिंह ने मन ही मन प्रकाश राय के अनुमान की प्रशंसा की.थैली ले कर धनंजय के बैंक में घुसते ही राजेंद्र सिंह ने अपने मित्र को बैंक में भेजा, क्योंकि यह जानना जरूरी था कि धनंजय का बैंक में खाता है या किसी परिचित से मिलने गया था. थैली किसी को देने गया था या लौकर में रखने? उन के मित्र ने लौट कर उन्हें बताया कि धनंजय मैनेजर के साथ लौकर वाले कमरे में गया है. इस से पहले सीधे मैनेजर की केबिन में जा कर उस ने एक फार्म भरा था.

धनंजय को खाली हाथ बाहर आते देख कर अपने 2 सिपाहियों को उस का पीछा करने के लिए कह कर राजेंद्र सिंह वहीं ओट में खड़े हो गए. धनंजय के वहां से जाते ही राजेंद्र सिंह सीधे बैंक मैनेजर की केबिन में पहुंचे. अपना परिचय दे कर उन्होंने कहा, ‘‘अभी 5 मिनट पहले जिस व्यक्ति ने आप के यहां लौकर लिया है, वह वांटेड है. हमारे आदमी उस का पीछा कर रहे हैं. आप हमें सिर्फ यह बताइए कि आप से उस की क्या बातचीत हुई. ’’

‘‘धनंजय को एक महीने के लिए लौकर चाहिए  था. यहां उपलब्ध लौकर्स में से उस ने 106 नंबर लौकर पसंद किया. नियमानुसार फार्म भर कर एडवांस जमा किया और लौकर में एक थैली रख कर चला गया.’’

लौकर खोलने के लिए 2 चाबियां लगती थीं. पहले बैंक की चाबी, फिर जिस व्यक्ति ने लौकर लिया हो, उस की चाबी से लौकर खुल सकता था. बैंक अधिकारी तहखाने में बने सेफ डिपौजिट वाल्ट में आ कर एक चाबी से लौकर खोल कर चले जाते थे. बाद में ग्राहक बैंक से प्राप्त चाबी से लौकर को खोल कर जो भी सामान रखना चाहे, रख सकता था. इसलिए ग्राहक ने लौकर में क्या रखा या निकाला, बैंक को इस की जानकारी नहीं रहती है.

राजेंद्र सिंह ने बैंक से ही प्रकाश राय को फोन किया. इस के बाद राजेंद्र सिंह ने बैंक मैनेजर से कहा, ‘‘यह व्यक्ति शायद कल फिर आए, तब इसे लौकर खोलने की इजाजत मत दीजिएगा. मैं कुछ सिपाही कल सवेरे बैंक खुलने से पहले ही यहां भेज दूंगा. वह यहां आया तो इसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा. अगर यह खुद नहीं आया तो हम इसे ले कर आएंगे.’’

धनंजय को बैंक ले जाने के लिए जब प्रकाश राय अलकनंदा पहुंचे थे तो वहां शो केस की वस्तुओं को देखने के बहाने उन्होंने चाबी के गुच्छों में लौकर नंबर 106 की चाबी देख ली थी. टेलीफोन के पास रखी धनंजय की टेलीफोन डायरी को उन्होंने केवल आनंदी का नंबर जानने के लिए यों ही उल्टापलटा था. ‘ए’ पर आनंदी का नंबर न पा कर उन्होंने ‘जी’ पर नजर दौड़ाने के लिए पन्ने पलटे, क्योंकि आनंदी का पूरा नाम आनंदी गौड़ था. मगर ‘एफ’ और ‘एच’ के बीच का ‘जी’ पेज गायब था. वह पेज फाड़े जाने के निशान मौजूद थे.

पकड़े जाने के थोड़ी देर बाद ही धनंजय ने अपने आप पर काबू पा लिया था. गहरी सांस ले कर उस ने कहा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, मैं ने ही अपनी बीवी की हत्या की है. उस के चरित्र पर मुझे लगातार शक रहता था. आगे चल कर मेरा शक विश्वास में बदल गया. लेकिन कुछ बातें अपनी आंखों से देखने पर मैं बेचैन हो उठा. मेरे मन की शांति समाप्त हो गई. मैं परेशान रहने लगा. मैं अपनी पत्नी को बेहद चाहता था, पर मुझे धोखा दे कर उस ने सब कुछ नष्ट कर दिया था. उस की चरित्रहीनता का कोई सबूत मैं नहीं दे सकता था. मेरे पास एक ही रास्ता था, उसे हमेशा के लिए मिटा देने का. वही मैं ने किया भी.’’

प्रकाश राय धनंजय को कोतवाली ले आए. धनंजय ने बड़े योजनाबद्ध तरीके से रोहिणी का खून किया था. रोहिणी को यह दिखाने के लिए कि वह उस से बेहद प्रेम करता है, उस ने बाहर जाने का प्लान बनाया और 40 हजार रुपए भी निकलवाए थे, लेकिन वह कहीं जाने वाला नहीं था. रविवार पहली तारीख को उस ने जानबूझ कर आशीष तनेजा और देवेश तिवारी को अपने घर बुलाया. रात 3 से 4 बजे के बीच रोहिणी की हत्या करने के बाद सवेरे उठ कर वह बड़े ही सहज ढंग से मटनमछली लाने गया था, सिर्फ इसलिए कि कोई उस पर शक न करे. इतना ही नहीं, पुलिस को चकमा देने के लिए उस ने खुद चोरी भी की थी. चोरी का सारा सामान उस ने मटन लेने जाते समय स्कूटर की डिक्की में रख दिया था.

इस के बाद वह कुछ बताने को तैयार नहीं था. जब प्रकाश राय ने टेलीफोन डायरी का ‘जी’ पेज कैसे फटा, इस बारे में पूछा तो जवाब में उस ने सिर्फ 2 शब्द कहे, ‘‘मालूम नहीं.’’

धनंजय को अगले दिन कोर्ट में पेश करना था. उस रात प्रकाश राय देर तक औफिस में ठहरे थे. एक सिपाही से उन्होंने धनंजय को अपने पास बुलवाया और उसे कुर्सी पर बैठा कर बोले,‘‘धनंजय, मेरा काम पूरा हो गया है. कल तुम्हें जेल भेजने के बाद हमारी मुलाकात कोर्ट में होगी. मुझे मालूम है कि तुम कुछ न कुछ छिपा रहे हो. मैं सत्य जानने के लिए उत्सुक हूं. अब तुम मुझे कुछ भी बतोओगे, उस का कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि तुम्हारे सारे कागजात तैयार हो गए हैं. उस में परिवर्तन नहीं हो सकता है. तुम जो कुछ भी बताओगे, वह मेरे तक ही सीमित रहेगा. अब मुझे बताओ कि तुम ने आनंद और आनंदी को रोहिणी की हत्या की खबर क्यों नहीं दी और आनंदी के फोन नंबर का ‘जी’ तुम ने क्यों फाड़ डाला?’’

धनंजय गंभीर हो गया. उस की आंखों में आंसू भर आए. कुछ क्षणों बाद खुद को संभालते हुए बोला, ‘‘जो सच है, मैं सिर्फ आप को बता रहा हूं. एक सुखी परिवार को नष्ट करना या बचाना, आप के हाथ में है. पर मुझे विश्वास है कि आप यह बात किसी और को नहीं बताएंगे.

‘‘आगरा में रोहिणी की मौसेरी बहन का विवाह था. उसी विवाह में हम आगरा गए थे. विवाह के बाद शताब्दी एक्सप्रेस से हम लौट रहे थे तो हमारी मुलाकात आनंद और आनंदी से हो गई. वे सामने की सीट पर बैठे थे. मैं 2-3 पैग पिए हुए था, फिर भी मुझे नींद नहीं आ रही थी. उस समय मेरी नींद उड़ गई थी.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘मेरे सामने बैठी आनंदी और कोई नहीं, मेरी प्रेमिका थी. हम दोनों एकदूसरे को जीजान से चाहते थे.’’

‘‘क्या?’’ प्रकाश राय की आंखें हैरानी से फैल गईं, ‘‘अच्छा, फिर क्या हुआ?’’

‘‘मेरी क्या हालत हुई होगी, आप अंदाजा लगा सकते हैं. पास में पत्नी बैठी थी और सामने प्रेमिका, वह भी अपने पति के साथ. मुझे देखते ही आनंदी भी परेशान हो गई थी. मैं असहज मानसिक अवस्था और बेचैनी के दौर से गुजर रहा था, वह भी उसी दौर से गुजर रही थी. सचसच कहूं तो हम दोनों ही अपने ऊपर काबू नहीं रख पा रहे थे.

‘‘इस मुलाकात के असर से उबरने में मुझे 4 दिन लगे. तब मुझे नहीं मालूम था कि एक चक्रव्यूह से निकल कर मैं दूसरे चक्रव्यूह में फंस गया हूं. तब मैं यह भी नहीं जानता था कि इस दूसरे चक्रव्यूह से निकलने के लिए मुझे रोहिणी की हत्या करनी पड़ेगी. खैर…

‘‘ट्रेन में आनंदी और रोहिणी की गप्पें जो शुरू हुईं तो थोड़ी देर बाद वे एकदूसरे की पक्की सहेली बन गईं. आनंदी 2-3 बार मेरे घर भी आई थी. खुदा का लाख शुक्र था कि हर बार मैं घर पर नहीं रहा. मैं आनंदी से मिलना भी नहीं चाहता था. मैं उस से संबंध बढ़ा कर रोहिणी को धोखा देना नहीं चाहता था. इसलिए रोहिणी और आनंदी की बढ़ती दोस्ती से मैं चिंतित था.’’धनंजय सांस लेने के लिए रुका. प्रकाश राय को लगा, कुछ कहने के लिए वह अपने आप को तैयार कर रहा है. उन का अंदाजा गलत नहीं था. धनंजय भारी स्वर में बोला,

‘‘एक दिन ऐसी घटना घटी कि मैं पागल सा हो गया. मुझे लगा, मेरे दिमाग की नसें फट जाएंगी. अपने सिर को दोनों हाथों से थाम कर मैं जहां का तहां बैठ गया. अपने आप पर काबू पाना मुश्किल हो गया. मैं कंपनी के काम से सेक्टर-18 गया था. वहां एक होटल में मैं ने रोहिणी को एक युवक के साथ सटी हुई बैठी देखा, हकीकत जाहिर करने के लिए यह काफी था. मैं यह जानता था कि उस होटल में रूम किराए पर मिलते थे. मैं उस होटल से थोड़ी दूरी पर ही बैठ कर कल्पना से सब देखता रहा. खून कैसे खौलता है, मैं ने उसी वक्त महसूस किया. 12 बजे उस होटल में गई रोहिणी 4 बजे बाहर निकली थी.

‘‘इसके बाद कुछ दिनों की छुट्टी ले कर मैं ने रोहिणी का पीछा किया. अनेक बार रोहिणी मुझे उसी युवक के साथ दिखाई दी. वह युवक और कोई नहीं, आनंद था…आनंदी का पति.’’

धनंजय ने आंखों में भर आए आंसुओं को पोंछा. प्रकाश राय स्तब्ध बैठे थे, पत्थर की मूर्ति बने. थोड़ी देर बाद शांत होने पर धनंजय बोला, ‘‘कैसा अजीब इत्तफाक था. विवाह से पहले मेरी प्रेमिका के साथ मेरे शारीरिक संबंध थे और विवाह के बाद मेरी प्रेमिका के पति के साथ मेरी पत्नी के शारीरिक संबंध. आनंदी को तो मैं पहले से जानता था, लेकिन रोहिणी और आनंद की पहचान तो शताब्दी एक्सप्रेस में हुई थी. यात्रा के दौरान जिस चक्रव्यूह में मैं फंसा था, उस से निकलने के लिए मैं ने रोहिणी को हमेशा के लिए मिटा दिया और आनंदी मेरी नजरों के सामने न आए, इसीलिए मैं ने टेलीफोन डायरी से ‘जी’ पेज फाड़ दिया था. मुझे जो भी सजा होगी, इस का मुझे जरा भी रंज नहीं होगा. मैं खुशीखुशी सजा भोग लूंगा. बस यही है मेरी दास्तान.’’

इस केस की बदौलत आनंद और आनंदी से प्रकाश राय की जानपहचान हो गई थी. कुछ दिनों बाद आनंद से उन्हें एक ऐसी बात पता चली कि उन का सिर चकरा कर रह गया था. जबजब आनंद और आनंदी उन के सामने आते थे, वह बेचैन हो जाते थे और सोचने पर मजबूर हो जाते थे कि काश, धनंजय और आनंदी एवं रोहिणी और आनंद का विवाह हो गया होता.

एक दिन बातचीत में आनंद ने कहा, ‘‘मुझे धनंजय की सजा का दुख नहीं है. अच्छा ही हुआ, उसे सजा होनी भी चाहिए. मुझे दुख है तो रोहिणी का. मैं ने आप से कहा था कि रोहिणी की और मेरी मुलाकात शताब्दी एक्सप्रेस में हुई थी. रोहिणी को देख कर मैं अभेद्य चक्रव्यूह में फंस गया था. आगरा से दिल्ली तक की यात्रा के घंटे मैं ने कैसे बिताए, मैं ही जानता हूं, क्योंकि मेरे सामने बैठी रोहिणी कोई और नहीं, मेरी पूर्व प्रेमिका थी.’’

यह सुनते ही प्रकाश राय के होश फाख्ता होतेहोते बचे. विचित्र था संयोग और भयानक थी भाग्य की विडंबना. क्या सचमुच नियति के खेल में मनुष्य मात्र खिलौना होता है?  (कथा सत्य घटना पर आधारित है, किसी का जीवन बरबाद न हो, कथा में स्थानों एवं सभी पात्रों के नाम बदले हुए हैं) Social Story

 

Hindi Crime Story: रजनी को भाया प्रेमी का धमाल

Hindi Crime Story: रजनी उर्फ कुंजावती अपने भाईबहनों में सब से बड़ी ही नहीं बल्कि कदकाठी से भी ठीक ठाक थी. इसलिए अपनी उम्र से काफी बड़ी लगती थी. उस का परिवार उत्तर प्रदेश के शहर इटावा में रहता था. उस के पिता किसान थे. जैसे ही वह जवान हुई तो उस के मातापिता उस के लिए योग्य वर की तलाश में लग गए.

उन्हें इस बात का डर था कि कहीं रजनी के कदम बहक गए तो उन की इज्जत पर दाग लग जाएगा. उन्होंने रजनी की शादी के लिए ग्वालियर जिले के महाराजपुरा कस्बे के गांव गुठीना में रहने वाले सुलतान माहौर को पसंद कर लिया. फिर जल्द ही उन्होंने उस की शादी सुलतान के साथ कर दी.

रजनी सुंदर तो थी ही, दुलहन बनने के बाद उस की सुंदरता में पहले से ज्यादा निखार आ गया. रजनी जैसी सुंदर पत्नी पा कर सुलतान बेहद खुश था. दोनों के दांपत्य की गाड़ी खुशहाली के साथ चलने लगी. समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा और रजनी 3 बच्चों की मां बन गई. लेकिन कुछ दिनों बाद आर्थिक परेशानियों ने परिवार की खुशी पर ग्रहण लगाना शुरू कर दिया. शादी से पहले सुलतान छोटामोटा काम कर के गुजरबसर कर लेता था, लेकिन 3 बच्चों का बाप बन जाने से घर के खर्चे भी बढ़ गए थे. वहीं रजनी की बढ़ती ख्वाहिशों ने उस के खर्चों में काफी इजाफा कर दिया था.

आर्थिक परेशानी से उबरने के लिए  वह एक शोरूम में रात के समय चौकीदारी भी करने लग गया था. इस दौरान उसे शराब पीने की भी लत लग गई, जिस की वजह से वह पैसे शराबखोरी में उड़ा देता था. इस के चलते घर की माली हालत डांवाडोल होने लगी थी. यहां तक कि उस ने कई लोगों से कर्ज ले लिया था. उधर जब से कोविड के कारण लौकडाउन लगा, तब से सुलतान की मजदूरी और चौकीदारी का काम भी छूट गया था. इस के बावजूद वह लोगों से पैसा उधार ले कर शराब पी लेता था और हद तो तब हो गई जब अपनी पत्नी रजनी उर्फ कुंजावती को शराब के नशे में जराजरा सी बात पर पीटना शुरू कर देता था.

पति की ये आदतें रजनी को काफी सालती थीं. सुलतान के पड़ोस में अजीत उर्फ छोटू कोरी रहता था. वह रजनी को भाभी कहता था, इसलिए दोनों में हंसीमजाक होता रहता था. रजनी को अजीत से मजाक करने में किसी तरह का संकोच नहीं होता था. एक दिन दोनों हंसीमजाक कर रहे थे तो रजनी ने कहा, ‘‘देवरजी, कब तक इस तरह हंसीमजाक कर के दिन काटोगे? कहीं से घरवाली ले आओ.’’

‘‘भाभी, घरवाली मिलती तो जरूर ले आता. जब तक कोई नहीं मिल रही आप से हंसीमजाक कर संतोष करना पड़ रहा है.’’ अजीत ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘जब तक घरवाली नहीं मिल रही तो इधरउधर से जुगाड़ कर लो.’’ रजनी ने बिना किसी हिचकिचाहट के अजीत की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

‘‘कौन फिक्र करता है भाभी भूखे आदमी की. जिस का पेट भरा रहता है, उसे ही हर कोई पूछता है,’’ अजीत ने शरमाते हुए कहा.

‘‘क्या तुम ने कभी किसी से अपनी परेशानी का जिक्र कर के देखा है?’’

‘‘कोई फायदा नहीं भाभी, लोग मेरी हंसी ही उड़ाएंगे.’’ वह बोला.

‘‘अजीत, जब तक तुम किसी से कहोगे नहीं, कोई तुम्हारी मदद कैसे करेगा?’’ रजनी ने कहा.

‘‘भाभी, अगर आप से कहूं तो क्या आप मेरी मदद करना पसंद करेंगी? भलाबुरा कहते हुए गालियां जरूर देंगी,’’ अजीत ने रजनी के चेहरे पर नजरें गड़ा कर कहा.

रजनी ने चेहरे पर मुसकान लाते हुए कहा, ‘‘एक बार कह कर तो देखो. अरे, मैं तुम्हारी मुंहबोली भाभी हूं अजीत, भला पड़ोसी पड़ोसी की मदद नहीं करेगा तो क्या बाहर वाला मदद करने आएगा.’’

अब इस से भी ज्यादा रजनी क्या कहती. अजीत इतना भी नासमझ नहीं था कि वह रजनी की बात का मतलब न समझ पाता.

‘‘जरूर भाभी, मौका मिलने पर कह दूंगा.’’ वह मुसकराते हुए बोला.

संयोग से अगले दिन अजीत को पता चला कि सुलतान किसी काम से बाहर गया है. उस दिन अजीत का मन अपने काम में नहीं लगा रहा था. दिन भर उसे रजनी की याद सताती रही. शाम होने पर घर आने पर वह रजनी की एक झलक देखने को बेचैन हो उठा.

रजनी भी पति की गैरमौजूदगी में अजीत को रिझाने के लिए जैसे ही सजसंवर कर दरवाजे पर आई  तो उस की नजर अजीत पर पड़ी. अजीत भी रजनी को देख कर बिना वक्त जाया किए उस के घर पर जा पहुंचा.

अजीत को अचानक इस तरह आया देख कर रजनी ने हंसते हुए कहा, ‘‘देवरजी, आज आप अपने काम से जल्दी लौट आए?’’

‘‘क्या बताऊं भाभी, आज मेरा मन काम में जरा भी नहीं लगा.’’

‘‘क्यों?’’ रजनी ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘सच बताऊं?’’

‘‘हां, मुझे तो सचसच बताओ.’’

‘‘भाभी, जब से तुम्हें और तुम्हारी सुंदरता  को देखा है, मेरा मन किसी काम में लगता ही नहीं है. आप सच में बेहद खूबसूरत है.’’

‘‘ऐसी सुंदरता किस काम की, जिस की कोई कदर ही न हो,’’ रजनी ने लंबी सांस लेते हुए कहा.

‘‘क्या भैया तुम्हारी कोई कदर नहीं करते भाभी?’’

‘‘सब कुछ जानते हुए भी अनजान मत बनो, तुम तो जानते हो कि मेरे वो रात में चौकीदारी करते हैं, सो रात को घर से बाहर रहते हैं. ऐसे में मेरी रातें कैसे गुजरती हैं, वो तो मुझे ही पता है.’’

‘‘भाभीजी, जिस स्थिति से आप गुजर रही हैं, ठीक वही स्थिति मेरी है. मैं भी रात भर करवटें बदलता रहता हूं. अगर आप मेरा साथ दें तो हम दोनों की समस्या खत्म हो सकती है,’’ यह कहते हुए अजीत ने रजनी को अपनी बांहों में भर लिया.

पुरुष सुख से वंचित रजनी चाहती तो यही थी, मगर उस ने हावभाव बदलते हुए बनावटी गुस्से में कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हो, छोड़ो मुझे. बच्चे देख लेंगे.’’

‘‘बच्चे तो अपनी मौसी के बच्चों के साथ बाहर खेल रहे हैं. भाभी, आप ने तो मेरा सुखचैन सब छीन रखा है,’’ अजीत ने कहा.

‘‘नहीं अजीत, छोड़ो मुझे. मैं बदनाम हो जाऊंगी, कहीं की नहीं रहूंगी मैं.’’ वह बनावटी बोली.

‘‘नहीं भाभी, अब यह संभव नहीं है. कोई बेवकूफ ही होगा जो रूपयौवन के इस प्याले के इतने नजदीक पहुंच कर पीछे हटेगा,’’ इतना कह कर अजीत ने बांहों का कसाव बढ़ा दिया.

दिखाने के लिए रजनी न…न…न करती रही, जबकि वह स्वयं अजीत के जिस्म से बेल की तरह लिपटी जा रही थी. इस के बाद वह पल भी आ गया, जब दोनों ने मर्यादा भंग कर दी. एक बार मर्यादा मिटी तो यह सिलसिला चल निकला. जब भी उन्हें मौका मिलता, इच्छाएं पूरी कर लेते. दोनों पड़ोस में रहते थे, इसलिए उन्हें मिलने में कोई परेशानी भी नहीं होती थी. रजनी अब कुछ ज्यादा ही खुश रहने लगी थी, क्योंकि उस का प्रेमी मौका मिलने पर बिस्तर पर धमाल मचाने आ जाता था.

अब उस की आर्थिक परेशानी भी दूर हो गई थी. रजनी खर्चे के लिए अजीत से जब भी रुपए मांगती, वह बिना नानुकुर के चुपचाप निकाल कर रजनी के हाथ पर रख देता था. रजनी और अजीत के बीच अवैध संबंध बने तो उन की बातचीत और हंसीमजाक का लहजा बदल गया. अब दोनों एकदूसरे का खयाल भी कुछ ज्यादा ही रखने लगे थे, इसलिए आसपड़ोस वालों को शक होने लगा.

लोग इस बात को ले कर चर्चा करने लगे. नतीजा यह निकला कि इस बात की जानकारी सुलतान को भी हो गई. सुलतान ने लोगों की बातों पर विश्वास न कर के खुद सच्चाई का पता लगाने का निश्चय किया. वह जानता था कि यदि इस बारे में पत्नी से पूछताछ करेगा तो वह सच बात बताएगी नहीं, बल्कि होशियार हो जाएगी. सच पता लगाने के लिए वह एक दिन बाहर जाने के बहाने घर से निकला और छिप कर रजनी और अजीत पर नजर रखने लगा.

एक दिन दोपहर के समय उस ने रजनी और अजीत को रंगेहाथों पकड़ लिया. गुस्से में  उस ने रजनी की जम कर पिटाई कर दी. रजनी के पास सफाई देने को कुछ नहीं था, इसलिए वह भविष्य में कभी ऐसा न करने की कसम खाते हुए माफी मांगने लगी. गुस्से में सुलतान ने अजीत को भी कई थप्पड़ जड़ दिए. साथ ही चेतावनी दी कि आज के बाद वह उस के घर के आसपास भी दिखाई दिया तो ठीक नहीं होगा.

रजनी सुलतान की सिर्फ पत्नी ही नहीं, उस के 3 बच्चों की मां भी थी, इसलिए बच्चों के भविष्य की फिक्र करते हुए उस ने दोबारा ऐसी गलती न करने की चेतावनी दे कर उसे माफ कर दिया. यह बात सच है कि जिस महिला का पैर एक बार बहक चुका हो, उसे संभालना मुश्किल होता है. यही हाल रजनी का भी था. कुछ दिनों तक अपनी कामोत्तेजना पर जैसेतैसे काबू रखने के बाद वह फिर चोरीछिपे अजीत से मिलने लगी.

इस का पता सुलतान को चला तो उस ने रजनी को काफी बुराभला कहा. इस के बाद रजनी का अजीत से मेलजोल कुछ कम हो गया, लेकिन बंद नहीं हुआ. जब मिलने में परेशानी होने लगी तो एक दिन रजनी ने अजीत से कहा, ‘‘मुझ से तुम्हारी दूरी बरदाश्त नहीं होती. अब मैं सुलतान के साथ नहीं रहना चाहती.’’

‘‘अगर ऐसा है तो उसे ठिकाने लगा देते हैं. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. वह शराब पीता ही है, खाना खा कर बेसुध हो जाता है, इसलिए उस की हत्या करना भी आसान है.’’

इसी के साथ दोनों ने सुलतान की हत्या की योजना बना ली.

5 जून, 2021 की रात सुलतान शराब पी कर बेसुध सो गया. सोने से कुछ समय पहले ही उस ने रजनी के साथ मारपीट की थी. पति के सोने के बाद रजनी ने प्रेमी अजीत को फोन कर के बुला लिया. मगर जैसे ही अजीत आया सुलतान की नींद खुल गई. रजनी और अजीत ने सुलतान को पकड़ा और उस के गले में रस्सी का फंदा बना कर उस का गला घोंट दिया. इस के बाद अजीत काफी डर गया तो वह अपने घर भाग गया, मगर रजनी कशमकश में फंस गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे?

आखिर उस का मन नहीं माना तो वह घर के पास में रहने वाली अपनी बहन के घर चली गई. यहां पर रजनी की मां भी आई हुई थी. उस ने हिचकियां लेले कर रोते हुए बहन और मां को बताया कि उस के पति ने आत्महत्या कर ली है. इन लोगों को रजनी की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. शायद इसी वजह से एक बार तो लगा कि वह फूटफूट कर रो पड़ेगी, लेकिन किसी तरह खुद को संभालते हुए आखिर उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या आप लोगों को मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा है?’’  बाद में यह बात पूरे मोहल्ले में फैल गई.

सुबह होते ही गंधर्व सिंह ने महाराजपुरा थानाप्रभारी प्रशांत यादव को फोन कर इस घटना की सूचना दे दी. थानाप्रभारी प्रशांत यादव ने इस घटना को काफी गंभीरता से लिया. बात सिर्फ आत्महत्या कर लेने भर तक सीमित नहीं थी, बल्कि इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि गुठीना जैसे छोटे से गांव में इस तरह की घटना घट गई और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं हुई.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी प्रशांत यादव  एसआई जितेंद्र मवाई के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. चलने से पहले उन्होंने इस की सूचना सीएसपी रवि भदौरिया को भी दे दी थी. प्रशांत यादव घटनास्थल का निरीक्षण शुरू करने वाले थे कि सीएसपी भदौरिया भी आ पहुंचे. उन के साथ फोरैंसिक टीम भी आई थी. फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो सीएसपी लौट गए. उन के जाने के बाद  थानाप्रभारी प्रशांत यादव ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर सुलतान की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

रजनी और उस के प्रेमी ने जिस रस्सी से फंदा बना कर सुलतान का गला घोंटा था, वह भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले ली. उस के बाद थानाप्रभारी ने गंधर्व सिंह की तरफ से अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली. थानाप्रभारी इस केस की जांच में जुट गए. उन्होंने इस बारे में मृतक की पत्नी रजनी से पूछताछ की. थाने पहुंचते ही रजनी डर गई और उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपने प्रेमी अजीत के साथ मिल कर पति को ठिकाने लगाया था.

पुलिस ने 6 जून, 2021 को ही रजनी के प्रेमी अजीत को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों ने ही सुलतान की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. इस के बाद दोनों ने सुलतान की हत्या की जो सनसनीखेज कहानी सुनाई, वह परपुरुष की बांहों में सुख तलाशने वाली औरत के अविवेक का नतीजा थी. पूछताछ  और सारे साक्ष्य जुटाने के बाद  पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. रजनी के साथ उस का 3 वर्षीय सब से छोटा बेटा भी जेल गया है.

रजनी ने जो सोचा था, वह पूरा नहीं हुआ. वह एक हत्या की अपराधिन बन गई. उस के साथ उस का पे्रमी भी. जो सोच कर उन दोनों ने सुलतान की हत्या की, वह अब शायद ही पूरा हो, क्योंकि यह तय है कि दोनों को सुलतान की हत्या के अपराध में सजा होगी. Hindi Crime Story

True Crime Story: धोखे की नाव पर सवार – अपनों ने ही ली जान

—श्वेता पांडेय

True Crime Story: गंगाराम अपनी मां दुलारीबाई से किसी भटियारिन की तरह हाथ नचाता हुआ गुस्से से बोला, ‘‘मैं ने तुम्हें कितनी बार बोला है कि मुझे निकासी के लिए रास्ता दो. मुझे लंबा चक्कर काट कर घर तक पहुंचना पड़ता है. उस समय तो और परेशानी बढ़ जाती है जब खेतों से फसल बैलगाड़ी में लाद कर लाते हैं.

‘‘आखिर मेरी बात तुम कब समझोगी. हर साल इसी बात का रोना होता है. सवा महीने बाकी हैं, फसल तैयार हो चुकी है. मुझे निकासी के लिए रास्ता चाहिए. और उस 2 एकड़ खेत में से हिस्सा भी चाहिए. मैं भी परिवार वाला हूं.’’

‘‘अच्छा. अभी तो मांबाप को पूछता नहीं है और जिस दिन जमीन से हिस्सा मिल गया, मांबाप मानने से भी इनकार कर देगा. गंगाराम, मैं ने दुनिया देखी है. बंटवारा हुआ नहीं कि मांबाप के हाथ में कटोरा थमा दोगे. बुढ़ौती में भीख मांगनी पड़ जाएगी.

दोनों मांबेटे में इसी तरह काफी देर तक झगड़ा चलता रहा. उसी समय गंगाराम के पिता बालाराम खेत से घर लौटे. दुलारी ने बेटे की शिकायत अपने पति से की, ‘‘लो, संभालो अपने बेटे को, जो जी में आता है बोलता ही चला जाता है.’’

गंगाराम अपने पिता से बोला, ‘‘बाबूजी, मां को समझाओ और संभालो नहीं तो किसी दिन मेरा मूड खराब हो गया तो इसे गंडासे से काट कर नदी में.’’

बालाराम ने बीच में हस्तक्षेप किया, ‘‘बहुत बोल चुका,’’ उन्होंने अपनी पत्नी दुलारी का पक्ष लिया, ‘‘अब अगर तू अपनी मां को एक भी शब्द बोला तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

इस झगड़े के बीच गंगाराम की पत्नी निर्मला पति का हाथ पकड़ कर बाहर लाने लगी. गंगाराम ने निर्मला का हाथ झटक दिया, ‘‘आज मैं बुड्ढे बुढि़या को छोड़ूंगा नहीं.’’

कहता हुआ गंगाराम अपने पिता बालाराम से जा भिड़ा. बापबेटे को एकदूसरे से हाथपाई करते देख गांव के लोग जमा हो गए.

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गांव वालों ने बापबेटे को बड़ी मुश्किल से एकदूसरे से अलग किया. गंगाराम लोगों की बांहों में जकड़ा हुआ कसमसा रहा था. साथ ही गुस्से से चीखता रहा.

दोनों एकदूसरे के कट्टर विरोधी हो गए. कोढ़ में खाज यह हुआ कि इसी बीच निर्मला बीमार रहने लगी. इस के लिए निर्मला अपनी सास दुलारीबाई को जिम्मेदार ठहराने लगी. वह सास पर यह आरोप लगाती कि उस ने उस के ऊपर कोई टोनाटोटका करा दिया है. गंगाराम ने कई ओझागुनिया को पत्नी को दिखाया. मर्ज यह था कि निर्मला के सिर में दर्द बना रहता था और शाम को बुखार चढ़ने लगता था.

झाड़फूंक से कोई सुधार न हुआ तो वह डाक्टर के पास गया. टेस्ट करवाने पर पता चला कि निर्मला को टायफायड है. एलोपैथी दवा भी चली और झाड़फूंक भी. पता नहीं किस ने असर दिखाया, निर्मला धीरेधीरे ठीक होने लगी. गंगाराम और उस की पत्नी निर्मला के दिमाग में यह बात घर कर गई थी कि उस की सास दुलारीबाई किसी तांत्रिक ओझा से मिल कर उन्हें बरबाद करने पर तुली है.

इस बात पर गंगाराम की सोच भी निर्मला की सोच से अलग नहीं थी. निर्मला जब पूरी तरह से ठीक हो गई और उस के शरीर में जान आ गई तब वह अपनी सास पर इलजाम लगाने लगी. एक बार फिर दोनों पक्षों में तकरार और झिकझिक होने लगी. वह एकदूसरे के लिए गलत भावनाएं रखने लगे. फिर वही समय आया, नवंबर दिसंबर का. फसल तैयार हो कर खेत से कोठरी में जाने को तैयार थी.

मुद्दा फिर वही उठा कि बैलगाड़ी में रखे अनाज को दूसरे रास्ते से लाना होगा. बालाराम और दुलारी किसी भी तरह से इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि निकासी के लिए बाड़ी से जगह दी जाए. हर साल फसल तैयार होने के बाद यही सवाल खड़ा हो जाया करता था. कई सालों से यह निकासी का मसला न तो सुलझ रहा था और न ही दूरदूर तक कोई समाधान ही दिखाई दे रहा था. आज भी इसी विवाद को ले कर गंगाराम और निर्मला दोनों का मन खिन्न था. खाना खाने के बाद दोनों पतिपत्नी टीवी देखने लगे.

टीवी पर वह क्राइम स्टोरी पर आधारित सीरियल देख रहे थे. उस सीरियल की कहानी उन की जिंदगी से जुड़ी जैसी थी. दोनों ने बड़े ध्यान से खामोशी के साथ वह सीरियल देखा. सीरियल खत्म होने के बाद दोनों ने उस पर चर्चा की. गंगाराम और उस की पत्नी को इस बात की चिंता हो रही थी कि कहीं ऐसा न हो कि मांबाप पूरी जमीन छोटे भाई रोहित के नाम कर जाएं. वैसे भी छोटा होने के नाते वह मांबाप का चहेता था.

इस सोच ने निर्मला और गंगाराम को परेशान कर डाला. जब इंसान को कोई चीज मिलने की संभावना दिखाई न देती है, तब वह उसे किसी दूसरे ही तरीके से हासिल करने की कोशिश में लग जाता है. इन दोनों ने भी एक योजना बना ली. गंगाराम और निर्मला ने एक योजना के तहत अपने व्यवहार में थोड़ाबहुत बदलाव किया. अपने पिता बालाराम और मां दुलारीबाई से सहजता से पेश आने लगे. बालाराम और दुलारी को आश्चर्य हुआ कि हमेशा कड़वे बोल बोलने वालों की जुबान में शहद कैसे घुल गया.

इस के बाद उन दोनों ने विचारविमर्श किया कि अपनी योजना में किसे शामिल किया जाए, जिस से उन की योजना सफल हो जाए. नजर और दिमाग के घोड़े दौड़ाने के बाद गंगाराम ने धुधवा गांव के ही नरेश सोनकर, योगेश सोनकर और कोपेडीह निवासी रोहित सोनकर से जिक्र किया.

पैसों के लालच में तीनों ही उन की योजना में शामिल हो गए. तीनों ने योजना बना कर वारदात को अंजाम देने के लिए 21 दिसंबर, 2020 का दिन तय किया. योजना के अनुसार, चारों लोग खेत पर पहुंच गए. वहां बालाराम और उस का छोटा बेटा रोहित तड़के में खेतों पर पानी लगा रहे थे. उन्होंने उन दोनों को दबोच लिया और सीमेंट की बनी पानी की हौदी में डुबो कर दोनों को मार दिया.

अगला निशाना अब दुलारीबाई और उस की बहू कीर्तिनबाई रही. चारों दबेपांव वहां पहुंचे, जहां वे सब्जियों का गट्ठर तैयार करने में व्यस्त थीं. शिकारी की तरह दबेपांव वे उन के करीब पहुंचे और कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ वार कर उन दोनों की जिंदगी भी खत्म कर दी. इतना सब कुछ करने के बाद उन लोगों ने चैन की सांस ली. यहां यह बताते चलें कि निर्मला उन चारों को ऐसा करते हुए दरवाजे की ओट से देख रही थी. काम को अंजाम देने के बाद गंगाराम ने तीनों साथियों को वहां से रवाना कर दिया.

निर्मला और गंगाराम दोनों ने मिल कर कुल्हाड़ी को बाड़ी में ही दबा दिया. सुबह के 5 बजतेबजते पूरे खुरमुड़ा गांव में इस दहला देने वाली हत्या की चर्चा होने लगी. अम्लेश्वर थाने में संजू सोनकर निवासी खुरमुड़ा की रिपोर्ट पर अमलेश्वर थानाप्रभारी वीरेंद्र श्रीवास्तव ने इस नृशंस हत्याकांड की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी.

जांचपड़ताल के लिए फोरैंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंच गई. आईजी विवेकानंद सिन्हा के सुपरविजन में जांच होती रही. पुलिस को किसी तरह का कोई सूत्र नहीं मिल रहा था जिस से जांच आगे बढ़ती. डौग स्क्वायड टीम घटनास्थल पर पहुंच चुकी थी. मृतकों के शव के समीप ले जा कर कुत्ते को छोड़ दिया गया. खोजी कुत्ता गोलगोल चक्कर लगाता हुआ मृतकों को सूंघ कर खेत की ओर कुछ दूर तक गया.

मौके की जांच से इतना तो स्पष्ट था कि हत्यारे 2-3 से कम नहीं थे. खेत में रासायनिक छिड़काव कर दिया गया था, जिस के कारण खोजी कुत्ते को सही दिशा नहीं मिल पा रही थी. बहरहाल, पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. जब पुलिस को किसी तरह का सूत्र नहीं मिला तो पुलिस ने गंगाराम के साढ़ू नरेश सोनकर को विश्वास में ले कर मुखबिरी का जिम्मा सौंपा.

नरेश मंझा हुआ खिलाड़ी था. उस ने पुलिस को मुखबिरी करने के बहाने उलझाए रखा. जांच के लिए आईजी विवेकानंद सिन्हा ने कुछ बिंदु तय किए. उन बिंदुओं को आधार बना कर पुलिस जांच में जुटी रही. इस सामूहिक हत्याकांड को हुए 3 महीने बीत चुके थे. लेकिन अपराधियों का कोई अतापता नहीं था. थानाप्रभारी वीरेंद्र श्रीवास्तव ने अपने एक मुखबिर को नरेश के पीछे लगा दिया. नरेश की एक्टिविटी पुलिस को शुरू से ही संदेहास्पद लगी थी.

फोरैंसिक विशेषज्ञों की टीम के सहयोग से भौतिक साक्ष्य जुटाया गया. टीम ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी साक्ष्य को आधार बना कर बारीकी से पूछताछ कर जानकारी इकट्ठी की. पुलिस ने संदेहियों को हिरासत में ले कर सघन पूछताछ की. इस घटना का मास्टरमाइंड बालाराम का अपना सगा बड़ा बेटा गंगाराम निकला. गंगाराम की स्वीकारोक्ति के बाद योगेश सोनकर, नरेश सोनकर, रोहित सोनकर उर्फ रोहित मौसा को गिरफ्तार कर लिया गया. सभी को घटनास्थल पर ले जा सीन रीक्रिएशन कराया गया.

आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त कुल्हाड़ी पुलिस ने बालाराम की बाड़ी से बरामद कर ली. घटना के वक्त पहने गए कपड़ों को इन चारों ने ठिकाने लगा दिया था. 18 मार्च, 2021 को आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिस में निर्मला भी शामिल थी. इन चारों आरोपियों का नारको टेस्ट भी कराया गया.

आईजी विवेकानंद सिन्हा ने अमलेश्वर थाना स्टाफ की पीठ थपथपाई. पुलिस ने सभी आरोपियों गंगाराम, उस की पत्नी निर्मला, योगेश सोनकर, नरेश सोनकर और रोहित सोनकर को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. True Crime Story

Crime Story: पुलिस इंसपेक्टर की पत्नी की हत्या

Crime Story: इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना ने अपने भांजे राजीव सक्सेना की पढ़ाईलिखाई से ले कर हर तरह से मदद की थी. एक दिन इसी भांजे ने आस्तीन का सांप बन कर उन्हें ऐसा डंसा कि उन की दुनिया ही उजड़ गई…

मुरादाबाद के एसएसपी कार्यालय में तैनात इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना 11 अगस्त को अपनी ड्यूटी खत्म कर के शाम करीब साढ़े 4 बजे घर पहुंचे तो उन्हें मेन गेट खुला मिला. इस तरह गेट खुला देख कर वह थोड़े चौंके, क्योंकि उन की पत्नी सरोज अकसर ही गेट बंद रखती थी. उन का घर सिविल लाइंस क्षेत्र के चंद्रनगर कालोनी में था. जैसे ही वह घर में घुसे, उन्हें रूम का दरवाजा भी खुला दिखा. अंदर से टीवी चलने की तेज आवाज भी आ रही थी.

उन्होंने पत्नी को आवाज लगाई. 4 साल पहले उन्हें पैरालाइसिस हुआ था, जिस की वजह से वह ठीक से चल नहीं पाते थे. इसलिए घर के अंदर से जब कोई जवाब नहीं आया तो वह ड्राइंगरूम में जा कर कुरसी पर बैठ गए और अपने जूते उतारे. उन्होंने सोचा कि सरोज शायद पास की दुकान से कोई सामान वगैरह लेने गई होगी, तभी तो टीवी भी चालू छोड़ गई है. वह कुरसी पर बैठे हुए पत्नी के लौटने का इंतजार करने लगे. कुछ देर इंतजार करने के बावजूद भी जब पत्नी नहीं आई तो वह धीरेधीरे बेड की तरफ बढ़े तो उन्हें पत्नी फर्श पर अस्तव्यस्त हालात में औंधे मुंह पड़ी दिखी.

वह इस हालत में क्यों पड़ी है, सोचते हुए उन्होंने आवाज देते हुए उसे हिलायाडुलाया. उस का बेजान शरीर देख कर उन की चीख निकल गई. वह मृत अवस्था में थीं. रामबाबू सक्सेना रोतेचीखते हएु बाहर सड़क पर आ गए और लोगों को पत्नी की हत्या हो जाने की खबर दी. उन के चिल्लाने की आवाज सुन कर आसपास के लोग उन के घर में आ गए. उन की पत्नी की हत्या की बात सुन कर लोग चौंके. उन्हें इस बात का ताज्जुब हो रहा था कि एक पुलिस अधिकारी के यहां यह वारदात करने की हिम्मत किस ने की? उन में से किसी ने पुलिस को फोन कर के इंसपेक्टर रामबाबू की पत्नी की हत्या की खबर दे दी. थाना सिविल लाइंस वहां से कुछ ही दूरी पर था, इसलिए कुछ ही देर में थानाप्रभारी ब्रह्मपाल व चौकीइंचार्ज धीरज सिंह मौके पर पहुंच गए.

मामला एक पुलिस अधिकारी की पत्नी की हत्या का था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. मामला विभाग के ही एक पुलिस इंसपेक्टर की पत्नी की हत्या का था और वह इंसपेक्टर भी एसएसपी कार्यालय में तैनात थे, इसलिए 15-20 मिनट के अंदर ही डीआईजी ओमकार सिंह, एसएसपी लव कुमार, एसपी सिटी डा. रामसुरेश यादव, सीओ सिविल लाइंस महेश कुमार भी मौके पर पहुंच गए. मौके पर खोजी कुत्ता और विधि विज्ञान प्रयोगशाला के डा. अरुण कुमार को भी घटनास्थल पर बुला लिया गया, ताकि वहां से कुछ सबूत जुटाए जा सकें.

खोजी कुत्ता सरोज के शव को सूंघने के बाद घर के बाहर सड़क पर पहुंच कर भौंकने लगा. इस से पुलिस को कोई खास मदद नहीं मिली. डा. अरुण कुमार ने भी मौके का बारीकी से निरीक्षण किया. उन का काम निपट जाने के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतका सरोज के बाएं हाथ की मुट्ठी में बालों का गुच्छा मिला. लाश के पास बैंगनी रंग का एक बटन भी पड़ा था. इस से साफ पता चल रहा था कि मृतका की हत्यारे से हाथापाई हुई थी. सरोज ने अपना बचाव करते हुए हत्यारे के बाल पकड़ लिए होंगे. उसी दौरान उस की शर्ट का भी बटन टूट गया होगा.

डबल बैड के गद्दे भी इस तरह से उलटेपलटे पड़े थे, जैसे किसी ने उन के नीचे कुछ ढूंढने की कोशिश की थी. बेडरूम में जो सेफ रखी थी, उस के हैंडल भी मुड़े हुए थे. उन्हें देख कर साफ लग रहा था कि उन्हें तोड़ने के लिए उन पर किसी भारी चीज से वार किया गया था, लेकिन हैंडल टूटे नहीं थे. हैंडल न टूटने की वजह से अलमारी में रखा कीमती सामान सुरक्षित था. इस से लग रहा था कि हत्या केवल लूटपाट के लिए ही की गई थी. ड्राइंगरूम में जो मेज रखी थी, उस पर 2 गिलास रखे थे. उन से एक गिलास में कुछ पानी भी था. किचन में गैस चूल्हे पर सौस पैन में 2 कप पानी चढ़ा हुआ था. वहीं स्लैब पर 2 खाली कप, अदरक, चायपत्ती भी रखी थी. लेकिन गैस बंद थी. वह शायद 2 कप चाय बनाने की तैयारी कर रही थी.

चाय के पानी की मात्रा और ड्राइंगरूम में रखे पानी के गिलासों से यही अनुमान लगाया गया कि हत्यारों की संख्या एक या 2 रही होगी और वह इन के परिचित होंगे, क्योंकि मृतका ने उन्हें पानी पिलाया था और उन्हीं के लिए चाय बनाने के लिए किचन में गई थी. मृतका के गले पर मिले निशानों से लग रहा था कि उस की हत्या गला घोंट कर की गई थी.

मौके की छानबीन करने के बाद एसएसपी ने इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना से ही पूछा कि उन की किसी से कोई रंजिश वगैरह तो नहीं है.

‘‘सर मेरी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. मैं सुबह पत्नी को घर पर ठीकठाक छोड़ कर गया था. चूंकि पैरालाइसिस की वजह से मैं अपने काम ठीक से नहीं कर पाता, इसलिए उन्होंने ही मुझे खाना खिलाया, अपने हाथ से कपड़े और जूते पहनाए. फिर मुझे सहारा दे कर औफिस के लिए एक रिक्शे पर बैठाया. मेन गेट को वह हमेशा बंद रखती थीं, जब कोई कालबेल बजाता था तो गेट खोलने से पहले वह देख लेती थीं. अपरिचित के लिए वह गेट नहीं खोलती थीं.’’ कहतेकते इंसपेक्टर रामबाबू सुबकने लगे. एसएसपी ने उन्हें ढांढस बंधाया और भरोसा दिया कि वह केस का खुलासा करने में दिनरात एक कर देंगे. जल्द ही हत्यारे भी गिरफ्तार कर लिए जाएंगे. मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने सरोज सक्सेना की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

एसएसपी लव कुमार ने तुरंत शहर के तेजतर्रार अधिकारियों की एक मीटिंग बुलाई. मामला उन के ही औफिस के इंसपेक्टर की पत्नी की हत्या का था, इसलिए केस का जल्द से जल्द खुलासा करने के लिए उन्होंने 4 पुलिस टीमों का गठन किया. कई बिंदुओं को ध्यान में रख कर पुलिस टीमें जांच में लग गईं. मौके की जांच करने के बाद यही लग रहा था कि सरोज सक्सेना की हत्या या तो चोरी के इरादे से की गई होगी या फिर किसी दुश्मनी से. लूट की वजह इसलिए लग रही थी कि हत्यारे ने सेफ को खोलने की कोशिश की थी. किंतु इसी बात पर यहीं एक सवाल यह भी उठ रहा था कि मृतका के शरीर पर सोने की ज्वैलरी थी तो हत्यारे वह ज्वैलरी क्यों नहीं ले गए.

चंद्रनगर से सटी हुई भांतू कालोनी है. इस जाति के अनेक लोग लूट की वारदातें करते हैं. यह वारदात कहीं इन्हीं लोगों ने तो नहीं की. यह पता लगाने के लिए इंसपेक्टर ब्रह्मपाल अपनी टीम को ले कर भांतू कालोनी गए और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को उठा कर थाने ले आए. उन से सख्ती से पूछताछ की, लेकिन सरोज सक्सेना की हत्या के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. आसपास रहने वाले लोगों से मृतका के बारे में पता किया तो पता चला कि वह अकसर अपना गेट बंद कर के रखती थी. किसी से वह फालतू बात तक नहीं करती थी. पड़ोसियों ने बताया कि घटना वाले दिन उन्हें दोपहर के समय उस समय देखा गया था, जब वह दूधिए से दूध लेने आई थी.

उन के यहां जो दूधिया आता था, वह छजलैट के पास बदावली गांव का रहने वाला था. पुलिस ने उस से भी पूछताछ की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. मुखबिरों से खबर के बाद पुलिस चंद्रनगर के ही 2 लोगों को पूछताछ के लिए थाने ले आई. पुलिस की इस काररवाई का मोहल्ले के लोगों ने विरोध किया और सैकड़ों लोग उन दोनों युवकों को छोड़ने की मांग करने लगे. लोगों के विरोध को देखते हुए पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. इस के अलावा पुलिस ने इलाके के अनेक आपराधिक लोगों से भी पूछताछ की, परंतु नतीजा वही ढाक के तीन पात. नतीजा निकलता न देख नगर पुलिस अधीक्षक डा. रामसुरेश यादव ने सीओ महेश कुमार के साथ विचारविमर्श किया. उन्होंने कहा कि मुझे पूरा शक है कि इस हत्या का कारण पारिवारिक विवाद ही हो सकता है.

एक पुलिस इंसपेक्टर की बीवी का कत्ल बाहरी व्यक्ति भला क्यों करेगा. कोई भी बदमाश यह काम करने से पहले 10 बार सोचेगा. उन्होंने कहा कि हो न हो, इस मामले में इन का कोई न कोई परिचित ही शामिल रहा होगा. पुलिस ने मृतका के फोन की काल डिटेल्स निकाल कर जांच की. लेकिन उस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. फिर पुलिस ने 11 अगस्त के उन फोन नंबरों को जांच के दायरे में लिया, जो उस दिन दोपहर ढाई बजे से शाम 4 बजे तक चंद्रनगर इलाके में सक्रिय रहे थे. पता चला कि ढाई सौ फोन उस दौरान उस इलाके में सक्रिय रहे. उन सभी नंबरों की जांच की. लेकिन कोई फायदा नहीं निकला.

पुलिस जिस बिंदु पर जांच कर रही थी, निराशा ही हाथ लग रही थी. इस तरह यह केस पुलिस टीम के लिए एक चुनौती से कम नहीं था. हालांकि यह भी मर्डर का केस था, लेकिन यह केस और केसों की तरह सामान्य नहीं था. क्योंकि यह विभाग के ही एक पुलिस अधिकारी की पत्नी का मामला था. अगले दिन पोस्टमार्टम कराने के बाद लाश रामबाबू को सौंप दी गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि सरोज के गले, कोहनी, होंठ, बाएं हाथ की अंगुली, सीने और गाल पर जख्मों के निशान थे. मौत की वजह सांस नली का दबाव के कारण अवरुद्ध होना बताया गया. नाखूनों में स्किन के टुकड़े भी मिले, जिन्हें डीएनए जांच के लिए भेज दिया.

सरोज सक्सेना की हत्या के बाद से अंतिम संस्कार तक उन के यहां आनेजाने वाले नजदीकियों पर सीओ महेश कुमार नजर रखे हुए थे. उन का अंतिम संस्कार होने के बाद सीओ महेश कुमार ने इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना से बात कर के यह पता लगाने की कोशिश की कि ऐसा उन का कौन सा रिश्तेदार या नजदीकी है, जो इस दुखद घटना की जानकारी मिलने के बावजूद उन के यहां नहीं आया. तब उन्होंने बताया कि शाहबाद (रामपुर) में रहने वाली उन की बहन का बेटा राजीव सक्सेना उन के पास नहीं आया. वह केवल पोस्टमार्टम हाउस पर कुछ देर के लिए आया था. यहां तक कि वह अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हुआ. जबकि वह शहर के ही मोहल्ला कटघर (मेहबुल्लागंज) में रहता है.

मोहल्ले वालों से भी पुलिस को पता चला कि राजीव सक्सेना अकसर अपने मामा रामबाबू सक्सेना के घर पर ही रहता था. यह जानकारी पुलिस के लिए खास थी कि जब राजीव सक्सेना अपने मामा के यहां रहता था तो मामी की हत्या की खबर मिलने के बाद भी वह और रिश्तेदारों की तरह उन के यहां क्यों नहीं आया. तीजे की रस्म खत्म होने के बाद पुलिस टीम 14 अगस्त, 2015 की शाम को शहर के मोहल्ला कटघर (मेहबुल्लागंज) पहुंच गई. वह वहां पर मिल गया. अपने घर पर पुलिस को देखते ही वह घबरा गया. पुलिस उसे थाने ले आई. थाने में वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष उस से सरोज सक्सेना की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने आसानी से अपना अपराध स्वीकार कर लिया. फिर उस ने अपनी मामी सरोज की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

रामबाबू सक्सेना मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के सहसवान थाने के अंतर्गत आने वाले छोटे से गांव अकौराबाद के रहने वाले थे. गांव में रहने के बाद भी उन का परिवार सुशिक्षित था. उन के 2 भाई और थे. उन में से एक दिनेश सक्सेना उत्तर प्रदेश पुलिस में इंसपेक्टर हैं, जो आजकल बरेली जिले में तैनात हैं, जबकि दूसरे भाई श्यामबाबू सक्सेना बदायूं के एक ला कालेज में प्रोफेसर हैं. रामबाबू शर्मा भी उत्तर प्रदेश पुलिस में भरती हो गए थे. बाद में प्रमोशन से वह इंसपेक्टर हो गए. इन के परिवार में पत्नी सरोज सक्सेना के अलावा 2 बेटे थे. दोनों बेटों की वह शादी कर चुके हैं. बड़ा बेटा राजीव सक्सेना छत्तीसगढ़ पावर कार्पोरेशन में इंजीनियर है.

वह पत्नी और 2 बच्चों के साथ वहीं रहता है. जबकि छोटा बेटा संदीप सक्सेना बरेली के पास मीरगंज स्थित एक शुगर मिल में इंजीनियर है. वह भी पत्नी व 2 बच्चों के साथ बरेली में रहता है.  पैरालाइसिस हो जाने के बाद से इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना के हाथपैर ठीक से काम नहीं करते थे, इसलिए उन की पत्नी सरोज उन्हें खाना खिलाने, कपड़े पहनाने, नहाने आदि में उन का सहयोग करती थीं. उन्होंने घर के काम करने के लिए नौकरानी रखने की बात कई बार पत्नी से कही, लेकिन सरोज ने मना कर दिया. रामबाबू सक्सेना ने मुरादाबाद के चंद्रनगर कालोनी में एक आलीशान मकान बना रखा था, जहां वह पत्नी के साथ रहते थे. शारीरिक रूप से अस्वस्थ होने की वजह से उन की तैनाती एसएसपी कार्यालय में कर दी गई थी.

वैसे वह शहर की ही कांशीराम कालोनी में स्थित एक डाक्टर के पास फिजियोथेरैपी के लिए जाते थे, जिस से उन्हें कुछ फायदा भी हो रहा था. राजीव सक्सेना इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना का सगा भांजा था. वैसे वह शाहबाद (रामपुर) का रहने वाला था, लेकिन बचपन से ही वह मुरादाबाद में ही रहा है. यहीं से उस ने अपनी पढ़ाई की थी. उस का रामबाबू सक्सेना से ज्यादा लगाव था. इस की वजह यह थी कि उन्होंने उस की पढ़ाईलिखाई में काफी सहयोग किया था. वह अकसर उन के यहां आताजाता था. सक्षम होने की वजह से रामबाबू कभीकभी राजीव की पैसों से मदद कर दिया करते थे.

पढ़ाई पूरी करने के बाद राजीव सक्सेना एक दवा कंपनी में मैडिकल रिप्रिजेंटेटिव बन गया था. लेकिन करीब 4 साल पहले उस की यह नौकरी छूट गई. जिस से वह परेशान रहने लगा. बेरोजगार होने के बाद राजीव सक्सेना पर करीब 80 हजार रुपए कर्ज हो गया था. कहते हैं कि खाली समय में परेशान इंसान के दिमाग में ऊलजुलूल विचार आते हैं. कुछ लोग उन विचारों को अनुसरण कर लेते हैं, जिस से वही विचार उन के लिए दुखदाई बन जाते हैं. घटना के कुछ दिनों पहले राजीव ने इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना को अपनी परेशानी और कर्ज से लदे होने की पीड़ा बताई थी. उस ने कहा था कि जिन लोगों का कर्ज है, वह उसे परेशान और बेइज्जत करते हैं. उस ने मामा से 50 हजार रुपए मांगे और कहा कि जब नौकरी लग जाएगी तो वह उन के पैसे लौटा देगा.

तब रामबाबू सक्सेना ने उस से कहा, ‘‘राजीव मैं इस बारे में तुम्हारी मामी से बात करूंगा. अगर उस के पास पैसे होंगे तो मैं तुम्हारी मदद कर दूंगा.’’

10 अगस्त, 2015 को राजीव सक्सेना पैसे के लिए अपने मामा के घर पहुंचा. उस समय घर पर मामी सरोज ही थी. राजीव ने उन से कहा, ‘‘मामी मेरी मामा से बात हो गई है, आप मुझे 50 हजार रुपए दे दोगी तो बड़ी मेहरबानी होगी.’’

‘‘तेरे मामा ने मुझ से इस बारे में कोई बात नहीं बताई है. मैं उन से पूछ लूं, वह कह देंगे तो मैं पैसे दे दूंगी.’’ सरोज ने कहा.

मामी का जवाब सुन कर राजीव निराश हो कर घर लौट गया. अगले दिन 11 अगस्त, 2015 को राजीव सक्सेना फिर से अपनी मामी के घर यह सोच कर चला गया कि रात को मामी ने मामा से इस बारे में बात कर ली होगी. इस बार भी घर पर सरोज ही मिली. उस ने फिर से अपनी समस्या बताते हुए मामी से 50 हजार रुपए की डिमांड की तो सरोज ने साफ मना करते हुए कहा, ‘‘देखो राजीव, इस समय घर में पैसे नहीं हैं. तेरे मामा के इलाज पर काफी पैसे खर्च हो रहे हैं. सारी तनख्वाह ऐसे ही खर्च हो जाती है. अब उन्हें इलाज के लिए दिल्ली भी ले जाना है. वहां भी पता नहीं कितना खर्च आएगा. अब हमें अपना खर्च चलाना ही मुश्किल हो रहा है.

तुझे मालूम ही है कि तेरे मामा ने बच्चों की पढ़ाईलिखाई और उन की शादी में कितना पैसा खर्च किया था. अपाहिज हो कर भी वह अपनी ड्यूटी कर रहे हैं. जब वह ड्यूटी से वापस आएंगे तो मैं उन से बात करूंगी. जैसा वे कहेंगे कर दूंगी.’’

इस पर राजीव ने कहा कि देखो मामी तुम अलमारी खोल कर मुझे 50 हजार रुपए दे दो. मेरी मामा से बात हो गई है.

बात करतेकरते ही सरोज ने फ्रिज से बोतल निकाल कर राजीव को एक गिलास पानी पीने को दे दिया.

बाद में वह चाय बनाने के लिए किचन में चली गई. उन्होंने सौस पैन में 2 कप पानी भी रख दिया तभी राजीव पीछेपीछे किचन में पहुंच गया. उस ने बिना किसी संकोच के मामी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मामी, अगर तुम ने आज मुझे पैसे नहीं दिए तो अनर्थ हो जाएगा.’’

राजीव की इस हरकत पर सरोज गुस्से में बोलीं, ‘‘यह क्या बदतमीजी है? क्या अनर्थ हो जाएगा, तू हट्टाकट्टा है. कोई काम क्यों नहीं करता. और तेरी मजाल मेरा हाथ पकड़ने की कैसे हुई? चल पीछे हट. बड़ा आया पैसे लेने वाला.’’

उस समय राजीव के सिर पर खून सवार था. सरोज चाय छोड़ कर ड्राइंगरूम में आ गई. राजीव सरोज पर भूखे भेडि़ए की तरह टूट पड़ा. वह लातघूसों से मामी पर प्रहार करने लगा. अपना बचाव करते हुए वह राजीव को धक्का दे कर अपनी जान बचाने के लिए बैडरूम की तरफ भागी कि वहां जा कर वह बैडरूम बंद कर लेगी. राजीव नीचे गिर चुका था. वह खुद को संभालते हुए उठ खड़ा हुआ. तब सरोज ने घर में रखी टौर्च से उस पर किया था. इस के बाद सरोज तुरंत बैडरूम का दरवाजा बंद करने लगी, लेकिन बैडरूम के दरवाजे में रस्सी बंधी हुई थी, जिस से दरवाजा बंद नहीं हो सका.

इतनी देर में राजीव भी बैडरूम में पहुंच गया. वह फिर से मामी से गुत्थमगुत्था हो गया. सरोज ने अपना बचाव करते हुए राजीव के बाल पकड़ लिए और नाखूनों से उस का मुंह नोच लिया, जिस से उस के नाखूनों में स्किन के टुकड़े फंस गए थे. 53 साल की सरोज भला एक जवान युवक का सामना कैसे कर सकती थीं. अंत में राजीव उन्हें बैड पर लिटा कर उन के सीने पर बैठ गया. तब सरोज ने उस के सामने हाथ जोड़ते हुए जीवन की भीख मांगी और कहा, ‘‘राजीव मुझे छोड़ दो, मैं तुम्हें पैसे दिलवा दूंगी.’’

मगर राजीव पर खून सवार था. बोला कि मामी अब बहुत देर हो चुकी है. तुझे छोड़ने का मतलब है खुद को फांसी के फंदे तक पहुंचाना. इस के बाद उस ने उन का गला दबोच लिया. वह सरोज का गला तब तक दबाए रखा जब तक उन के प्राण निकल नहीं गए. जब राजीव ने देख लिया कि वह मर चुकी है तो वह पलंग के गद्दों को उलटपलट कर सेफ की चाबियां ढूंढने लगा. जब उसे सेफ की चाबियां नहीं मिलीं तो उस ने घर में रखा टीवी चालू कर के उस की आवाज बढ़ा दी और सेफ के कुंडों को तोड़ने लगा, ताकि उस में रखी नगदी, ज्वैलरी आदि को वह ले जा सके. ऐसा करने से कुंडे मुड़ जरूर गए, लेकिन खुले नहीं.

सेफ नहीं खुली तो वह दबे पांव वहां से बाहर आ गया. फिर औटो पकड़ कर वह कटघर में अपने कमरे पर आ गया. राजीव सक्सेना से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. लोगों को जब पता चला कि राजीव ही मामी का हत्यारा है तो लोग दांतों तले अंगुली दबा गए. Crime Story

 

Hindi Crime Story: पति की मौत का फरमान

Hindi Crime Story: कामिनी गांव के ही रहने वाले मार्तंड यादव से शादी करना चाहती थी. लेकिन घर वालों ने उस की शादी पवन से कर दी. इस का परिणाम यह निकला कि निर्दोष पवन मारा गया.

गांव में भागवत कथा होने की वजह से काफी चहलपहल थी. कथा में जाने के लिए हर कोई उत्साहित था, क्योंकि वहां बहुत ही सुंदर कथा होती थी. उस के बाद हवन होता था. कामिनी भी वहां रोजाना अपनी सहेली मीना के साथ कथा सुनने जाती थी. उस दिन वह मीना के साथ कथा सुनने पहुंची तो वहां का नजारा ही कुछ और था. गांव के कई लोग पंडितों द्वारा किए जाने वाले मंत्रोच्चारण के साथ हवन कर रहे थे. उस से जो धुआं उठ रहा था, वातावरण सुगंधित हो रहा था. कामिनी और मीना ने हाथ जोड़ कर सिर झुकाया और वहां बिछी दरी पर बैठ गईं. अचानक कामिनी की नजर दूसरी ओर बैठे एक युवक पर पड़ी, जो एकटक उसी को ताक रहा था. वह कोई और नहीं, उसी के गांव का मार्तंड यादव उर्फ पिंकू था.

कामिनी उम्र के उस दौर में पहुंच गई थी, जब लड़कों का इस तरह ताकना लड़कियों को अच्छा लगता है. यही वजह थी कि कामिनी ने भी उस की ओर उसी तरह ताका. नजरें मिलीं तो मार्तंड मुसकराया, लेकिन कामिनी ने नजरें झुका लीं. लेकिन यह भी सच है कि इस स्थिति में लड़की पहली बार भले ही नजरें झुका ले, लेकिन पलट कर जरूर देखती है. और कहते हैं कि अगर पलट कर देख लिया तो समझो मामला फिट है यानी वह भी चाहती है. कामिनी से रहा नहीं गया, उस ने नजरें उठाईं तो मार्तंड को अपनी ओर ताकते पाया. उसे उस तरह ताकते देख कामिनी को हंसी आ गई.

बस, फिर क्या था, कामिनी की इस हंसी पर मार्तंड मर मिटा. एक तो कामिनी ने पलट कर देखा था, दूसरे हंसी थी, इसलिए मार्तंड को लगा, अब मामला फिट है. अब वह सबकुछ भूल कर सिर्फ कामिनी को ही देख रहा था. कामिनी का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उसे इस तरह बारबार उधर देखते देख कर मीना ने पूछा, ‘‘क्या बात है, जो तू बारबार उधर लड़कों की ओर देख रही है?’’

कामिनी इस तरह सिटपिटा गई, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. उसे जवाब तो देना ही था, इसलिए उस ने मीना को प्यार से झिड़कते हुए कहा, ‘‘यार, तुम भी न जाने क्याक्या सोचती रहती हो? इस तरह की जगहों पर कोई क्या देखेगा? तुम्हारे दिमाग में हमेशा खुराफात ही चलता रहता है.’’

अब तक हवन खत्म हो गया था. प्रसाद ले कर कामिनी मंडप से बाहर आई तो मार्तंड भी उस के पीछेपीछे बाहर आ गया. वह उस से थोड़ी दूरी बना कर चल रहा था. उसे अपने पीछे आते देख कामिनी का दिल तेजी से धड़कने लगा कि मीना के सामने ही वह उसे कुछ कह न दे. अब वह उसे अपना सा लग रहा था. कुछ ऐसा ही मार्तंड को भी महसूस हो रहा था. वह उस से अपने दिल की बेचैनी कहना तो चाहता था, लेकिन मीना की उपस्थिति उसे ऐसा करने से रोक रही थी. कुछ भी रहा हो, मार्तंड की नजरें उसी पर टिकी थीं. कामिनी भी बारबार पलट कर उसे देख रही थी. आखिर मीना ने उस की चोरी पकड़ ही ली. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अच्छा तो यह बात है, अब समझ में आया, यह महाशय हमारे पीछेपीछे क्यों चले आ रहे हैं?’’

‘‘क्या बकवास कर रही है? कोई पीछेपीछे आ रहा है तो इस का मतलब यह तो नहीं हुआ कि मैं उस पर मर मिटी हूं. चलो, घर चलो, नहीं तो तुम इसी तरह बकवास करती रहोगी.’’ कामिनी ने कहा.

‘‘मैं कहां कह रही हूं कि तुम यहीं रुको. चलो न घर.’’ मीना ने कामिनी का हाथ पकड़ कर कहा और तेजी से घर की ओर चल पड़ी.

मार्तंड कामिनी को तब तक देखता रहा, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई. घर पहुंच कर कामिनी मार्तंड के खयालों में डूब गई. पता नहीं क्यों वह उस के दिल में बस गया था, जबकि वह बहुत खूबसूरत भी नहीं था. गांव में उस से भी खूबसूरत लड़के थे, जो उस पर मरते थे. लेकिन उस ने कभी किसी को भाव नहीं दिया था. दूसरी ओर मार्तंड भी कामिनी के खयालों में डूबा था. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कामिनी जैसी खूबसूरत लड़की का दिल उस के लिए धड़क सकता है. इसलिए अगले दिन के इंतजार में उसे नींद नहीं आई. वह जानता था कि कामिनी रोज कथा सुनने आती है. इसलिए उस ने तय कर लिया था कि अगर अगले दिन कामिनी मिल गई तो कैसे भी वह उस से अपने दिल की बात जरूर कह देगा.

संयोग से अगले दिन कामिनी अकेली ही वहां आई. शायद उसे विश्वास था कि उस के सपनों का राजकुमार मार्तंड अवश्य वहां आएगा और उस से बात करने की कोशिश भी करेगा. उसे बात करने में कोई संकोच न हो, यही सोच कर वह मीना को साथ नहीं लाई थी. जब वह वहां पहुंची तो उसे यह देख कर हैरानी हुई कि मार्तंड वहीं बैठा था, जहां कामिनी एक दिन पहले बैठी थी. शायद वह उसी का इंतजार कर रहा था. मार्तंड की नजरें उस से मिलीं तो दोनों के होठों पर मुसकान तैर उठी. कामिनी आ कर उस से थोड़ी दूरी पर महिलाओं के झुंड में बैठ गई. दोनों बैठे तो भागवत कथा सुनने थे, लेकिन दोनों के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

आखिर  नहीं रहा गया तो मार्तंड ने कुछ इशरा किया. उस के बाद कामिनी उठ कर चल पड़ी. लोगों की नजरें बचा कर मार्तंड भी उस के पीछेपीछे चल पड़ा. सुरक्षित स्थान पर आ कर जरा भी संकोच किए मार्तंड ने कामिनी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘कामिनी, अब मुझे यह कहने की जरूरत नहीं है कि मैं तुम से प्यार करता हूं. तुम्हारे हावभाव से ही मुझे पता चल गया है कि तुम भी मुझे प्यार करती हो, इसलिए चलो एकांत में कहीं बैठ कर बातें करते हैं.’’

गांवों में एकांत कहां होता है, बागों या खेतों के बीच. दोनों गेहूं के खेतों के बीच बैठ कर बातें करने लगे. मार्तंड ने उस एकांत में कामिनी के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘कामिनी, यह जिंदगी हमारी है, इसलिए इस के बारे में सिर्फ हमें ही निर्णय लेने का हक है. तुम मुझ से मिलने के लिए रोज यहीं आना. यहां लोगों की नजर हम पर नहीं पड़ेगी. बोलो, आओगी न?’’

‘‘मैं जरूर आऊंगी मार्तंड. तुम मेरा इंतजार करना.’’ कामिनी ने कहा और अपने घर चली गई.

मनचाहा प्रेमी मिल जाने से कामिनी खुश थी. वह मार्तंड की यादों में खोई रहने लगी. अब उसे हमेशा उस समय का बेसब्री से इंतजार रहता, जब उसे मार्तंड से मिलने जाना होता. मार्तंड उस से जब भी रोमांटिक बातें करता, वह शरमा जाती. वह उस की सुंदरता की तारीफें करते हुए कहता, ‘‘तुम्हारी इसी सुंदरता ने मेरा दिल चुरा लिया है. अब मेरे इस दिल को तुम संभाल कर रखना, इसे कभी तोड़ना मत.’’

कामिनी कहती, ‘‘तुम भी कैसी बातें करते हो, मैं भला तुमरे दिल को क्यों तोड़ूंगी, अब तो वह हमारा हो चुका है.’’

‘‘मैं कितना भाग्यशाली हूं, जो तुम जैसी प्यार करने वाली मिल गई. शायद तुम मेरे भाग्य में लिखी थी.’’

ऐसी ही बातें कर के मार्तंड ने कामिनी को लुभा कर उस से शारीरिक संबंध भी बना लिए. दोनों मन से तो एक थे ही, तन से भी एक हो गए. उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के थाना शिवगढ़ के निमडवल गांव में रहते थे रामेश्वर प्रसाद. वह खेती कर के अपना गुजरबसर करते थे. उन के परिवार में पत्नी रमा और 2 बेटियां तथा 2 बेटे थे. कामिनी उन के बच्चों में सब से छोटी थी. उन के बाकी बच्चों का विवाह हो चुका था. कामिनी ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही था कि उसे मार्तंड से प्यार हो गया.

कामिनी ने गांव के ही सरकारी स्कूल से आठवीं तक पढ़ाई की थी. वह खूबसूरत थी, इसलिए जवान होते ही गांव के मनचले लड़के उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करने लगे थे. उन्हीं में मार्तंड भी था. आखिर में उसी ने बाजी मार ली थी. वह प्रभाकर यादव का बेटा था. वह नल वगैरह ठीक करने का काम करता था. गांवों में इस तरह की बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह पातीं, इसलिए मार्तंड और कामिनी के संबंध भी उजागर हो गए. जब बेटी की करतूत का पता रामेश्वर प्रसाद को चला तो उन्होंने कामिनी की खूब पिटाई की और सख्त हिदायत दी कि अब वह मार्तंड से बिलकुल नहीं मिलेगी. उस के घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगा दी गई.

इस हालत में रामेश्वर जल्द से जल्द कामिनी की शादी के बारे में सोचने लगा. क्योंकि उस की वजह से उन की गांव में बदनामी हो रही थी. रामेश्वर का एक रिश्तेदार हरभजन लखनऊ के थाना नगराम के गांव सेंधूमऊ में रहता था. सेंधूमऊ के बगल में ही एक गांव है बघौली. उसी गांव में ललई प्रसाद अपने परिवार के साथ रहता था. वह भी खेती करता था. उस के परिवार में पत्नी रामकली के अलावा 2 बेटियां और एकलौता बेटा पवन था. उस ने दोनों बेटियों की शादी कर दी थी. बेटे की अभी शादी नहीं हुई थी. वह गोसाईगंज के दयाल इंस्टीट्यूट से बीबीए कर रहा था.

हरभजन पवन से परिचित था. वह जानता था कि पवन बहुत ही नेक और पढ़ालिखा लड़का है. इसलिए उस ने उस से कामिनी से रिश्ते की बात चलाई तो वह बात आगे बढ़ाने को राजी हो गया. उस ने अपने पिता से बात की तो उन की सहमति मिलने के बाद सभी कामिनी को देखने गए. कामिनी के घर वालों को भी पवन और उस का घरपरिवार पसंद था, इसलिए बातचीत के बाद शादी तय हो गई. कामिनी ने पवन के सामने ही विवाह से मना कर दिया था, लेकिन रामेश्वर प्रसाद ने किसी तरह बात संभाल ली थी. 20 मई, 2015 को कामिनी और पवन का विवाह धूमधाम से हो गया. कामिनी को न चाहते हुए भी पवन से विवाह करना पड़ा. जबकि वह मार्तंड से शादी करना चाहती थी.

शादी के बाद भी वह उसे एक पल के लिए नहीं भूल पा रही थी. क्योंकि उस ने उसी के साथ जिंदगी गुजारने का सपना जो देखा था. लेकिन घर वालों ने उस के सपनों को तोड़ दिया था. पग फेरा में कामिनी मायके आई तो मार्तंड से मिली. तब वह उस से गले मिल कर बिलखबिलख कर रोई. मार्तंड की भी आंखें नम हो गईं. कामिनी की हालत देख कर वह बेचैन हो उठा. उस ने कामिनी को ढांढ़स बंधा कर कहा, ‘‘कामिनी हम कभी अलग नहीं होंगे, कोई भी हमें जुदा नहीं कर सकता. हम हमेशा इसी तरह मिलते रहेंगे.’’

इस के बाद मार्तंड ने एक सस्ता सा मोबाइल फोन खरीद कर कामिनी को दे दिया, जिस से उन में बराबर बातें हो सकें. कामिनी जब तक मायके में रही, मार्तंड से बराबर मिलती रही. ससुराल आने पर मिलना तो बंद हो गया, लेकिन मोबाइल से सब की चोरी वह उस से बातें कर लेती थी. 12 अगस्त, 2015 की शाम साढ़े 6 बजे पवन घर लौटा और कपड़े बदल कर आराम करने लगा. रात 8 बजे कामिनी ने उसे सौ रुपए का नोट देते हुए कहा कि उसे कोल्ड ड्रिंक पीनी है, जा कर ला दे. पवन उन्हीं कपड़ों में दहेज में मिली हीरो पैशन प्रो बाइक से कोल्ड ड्रिंक लेने चला गया.

कोल्ड ड्रिंक की दुकान उस के घर से लगभग 3 सौ मीटर की दूरी पर थी. थोड़ी देर बाद पवन का फोन आया कि गांव के बाहर उस की बाइक खड़ी है, किसी से मंगवा लें. वह किसी जरूरी काम से जा रहा है. इस के बाद पवन के पिता वहां गए और गांव के एक लड़के से कह कर बाइक ले आए. सुबह गांव के कुछ बच्चे गांव के बाहर तालाब पर शौच के लिए गए तो उन्होंने वहां झाडि़यों में पवन की लाश पड़ी देखी. बच्चों ने यह बात तुरंत पवन के घर वालों को बताई तो घर वाले रोतेबिलखते वहां पहुंचे. पवन के पिता ललई प्रसाद ने इस घटना की सूचना थाना नगराम पुलिस को दे दी.

सूचना मिलने के थोड़ी देर बाद थाना नगराम के थानाप्रभारी सुधीर कुमार सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक पवन ने नीले रंग पर सफेद धारी वाली कैपरी और सफेद शर्ट पहन रखी थी. उस के गले और मुंह पर किसी तेज धारदार हथियरा के घाव थे. सुधीर कुमार सिंह घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि सीओ राकेश नायक भी आ गए. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ मैडिकल कालेज भिजवा कर पूछताछ शुरू की. इस के बाद थाने आ कर सुधीर कुमार सिंह ने मृतक के पिता ललई प्रसाद की ओर से अज्ञात के खिलाफ पवन की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. थानाप्रभारी मामले की जांच के लिए बघौली गांव जाने की तैयारी कर रहे थे कि किसी ने फोन कर के उन्हें बताया कि मृतक पवन की पत्नी कामिनी अपना सामान बांध कर कहीं जाने की तैयारी कर रही है.

यह सुन कर सुधीर कुमार सिंह को हैरानी हुई. जिस औरत के पति की हत्या हुई हो, अभी उस की लाश भी न दफनाई गई हो, इस दुख की घड़ी में ससुराल वालों का साथ देने के बजाय वह घर से जाने की तैयारी कर रही है. उन्हें लगा, कहीं ऐसा तो नहीं कि इस घटना के पीछे उसी का हाथ हो. सीओ राकेश नायक भी थाने में मौजूद थे. कामिनी के बारे में सीओ साहब को बताया तो उन्होंने भी कामिनी पर शक जाहिर किया. फिर क्या था, थानाप्रभारी ललई प्रसाद के घर जा पहुंचे. उन्हें जो सूचना मिली थी, वह सही थी. कामिनी अपना बैग तैयार कर के बैठी थी. शक के आधार पर सुधीर कुमार सिंह ने बैग की तलाशी ली तो उस में से कपड़ों और व्यक्तिगत सामान के अलावा 1 हजार रुपए, एक सिम और एक युवक की फोटो बरामद हुई. उन्होंने बैग में नीचे लगे पैड के अंदर हाथ डाला तो उस में से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ.

घर वालों से उस मोबाइल के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. इस के पास जो मोबाइल था, उसे तो पवन ने पहले ही ले लिया था.

सुधीर कुमार सिंह ने जब कामिनी से उस के पास मिले फोटो के बारे में पूछा तो वह काफी देर तक उस फोटो को देखती रही, उस के बाद बोली, ‘‘यह युवक उस के गांव का रहने वाला है.’’

पुलिस कामिनी को हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में महिला कांस्टेबल के जरिए उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने कई नाम बताए. उन सभी को पुलिस ने थाने ला कर पूछताछ की तो पता चला कि वे निर्दोष थे. कामिनी ने जो नाम बताए थे, वे उस के पुराने आशिक थे, जिन्हें वह फंसाना चाहती थी. सुधीर कुमार सिंह ने कामिनी का मोबाइल खंगाला तो उस में सिर्फ एक ही नंबर मिला, जिस से उस में लगभग रोज ही फोन आए थे. घटना वाले दिन भी उस नंबर से अंतिम बार रात 11 बजे फोन आया था. जब उस नंबर के बारे में कामिनी से सख्ती से पूछा गया तो उस ने बताया कि उस नंबर से फोन करने वाला और फोटो वाला युवक एक ही है. उस का नाम मार्तंड यादव उर्फ पिंकू है, जो उस के मायके निमडवल में रहता है.

सुधीर कुमार सिंह ने उसी मोबाइल से उस नंबर पर स्पीकर औन कर  के कामिनी से बात करने को कहा. कामिनी ने उस नंबर पर फोन किया तो दूसरी ओर से फोन रिसीव करने वाले ने कहा, ‘‘सब ठीक कर दिया मैं ने, किसी को शक भी नहीं हुआ.’’

‘‘क्या कह…’’ कामिनी इतना ही कह पाई थी कि सुधीर कुमार सिंह ने उसे कुछ भी बताने से मना कर दिया.

‘‘मैं ने अपने दोस्तों के साथ सब कुछ बहुत सही ढंग से कर दिया है. अब हम एक साथ रह सकेंगे.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

‘‘लेकिन यह सब कर के तुम ने मुझे फंसा दिया. पुलिस मुझ पर शक कर रही है. तुम आ कर मुझे बचाओ. तुम कहां हो?’’ कामिनी इतना ही कह पाई थी कि मार्तंड को शायद शक हो गया. उस ने तुरंत फोन काट दिया. दोबारा फोन किया गया तो फोन बंद हो चुका था. इस के बाद मार्तंड के घर छापा मारा गया, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. तब उस के पिता को हिरासत में ले कर थाने लाया गया. लेकिन वह भी मार्तंड के बारे में कुछ नहीं बता सका. उसी दिन यानी 14 अगस्त को एक मुखबिर की सूचना पर दोपहर साढे़ 12 बजे सुधीर कुमार सिंह ने मार्तंड यादव और उस के दोस्त विक्रम यादव को समेसी के पास एक नहर के किनारे से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद 15 अगस्त को पुलिस ने मार्तंड के एक अन्य दोस्त सूरजलाल को छतौनी से गिरफ्तार कर लिया. मार्तंड से की गई पूछताछ में पवन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

मार्तंड द्वारा दिए गए मोबाइल से कामिनी चोरीछिपे उस से बात कर लिया करती थी, लेकिन किसी दिन पवन ने कामिनी को मोबाइल पर बात करते देख लिया. फिर तो उसे समझते देर नहीं लगी कि कामिनी का किसी के साथ चक्कर चल रहा है. उसी ने यह मोबाइल कामिनी को दिया है. पवन ने कामिनी को मारापीटा ही नहीं, उस का मोबाइल भी छीन लिया. कामिनी वैसे ही मार्तंड से दूर हो कर तड़प रही थी. ऐसे में बात करने का जरिया मोबाइल भी छिन गया तो वह गुस्से से भर उठी. आग में घी का काम किया पवन की पिटाई ने. कामिनी ने किसी तरह मार्तंड तक मोबाइल छिन जाने की बात पहुंचा दी.

इसी के साथ यह भी कहा कि अगर वह किसी तरह पवन को ठिकाने लगा दे तो वह हमेशाहमेशा के लिए उस की हो जाएगी. उस के बाद उन्हें मिलने से कोई नहीं रोक पाएगा. मार्तंड तो हर हाल में कामिनी को अपनी बनाना चाहता था. उस ने कामिनी से कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, मैं जल्द ही उसे ठिकाने लगा दूंगा.’’

मार्तंड ने अपने 2 दोस्तों, विक्रम और सूरजलाल को दोस्ती का वास्ता दे कर पवन की हत्या में साथ देने को कहा तो वे तैयार हो गए. इस के बाद योजना भी बन गई. अपनी उसी योजना के अनुसार, मार्तंड अपने दोस्तों के साथ 2 मोटरसाइकिलों से कामिनी की ससुराल उस समय पहुंचा, जब पवन घर पर नहीं था. यह बात कामिनी ने मार्तंड को पहले ही बता दी थी. जब तीनों वहां पहुंचे तो कामिनी ने अपनी सास रामकली को बताया कि तीनों उस की सगी मौसी के बेटे हैं. रामकली के हटते ही मार्तंड ने एक मोबाइल फोन कामिनी को दे दिया और पूरी योजना बता दी. इस के बाद वह दोस्तों के साथ चला आया.

13 अगस्त की शाम मार्तंड ने कामिनी को फोन किया कि वह रात 8 बजे तक दोस्तों के साथ उस के गांव के बाहर पहुंच जाएगा. शाम साढ़े 6 बजे तक पवन घर आ जाता था. रात 8 बजे जब मार्तंड गांव के बाहर आ गया तो उस ने कामिनी को फोन कर के पवन को भेजने को कहा. इस के बाद कामिनी ने पवन को कोल्डड्रिंक लाने के बहाने बाहर भेज दिया. पवन मोटरसाइकिल से कोल्डड्रिंक ले कर लौट रहा था तो रास्ते मे दोस्तों के साथ मार्तंड ने उसे हाथ दे कर रोक कर कहा, ‘‘भाई मेरी मोटरसाइकिल खराब हो गई है. जरा देख लीजिए.’’

पवन ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर के जेब में पड़ी टौर्च निकाली. उस ने टौर्च जलाई तो मार्तंड के चेहरे पर पड़ी. उस का चेहरा देख कर पवन ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें पहचानता हूं, तुम तो मेरी ससुराल के हो, यहां कैसे, कामिनी से मिलने आए थे क्या?’’

‘‘नहीं, यहीं पास में मेरी एक रिश्तेदारी है, वहीं आया था. लेकिन यहां पहुंचते ही मेरी मोटरसाइकिल खराब हो गई.’’

इस के बाद उन में बातें होने लगीं. उसी बीच मार्तंड ने शौच जाने की बात कही तो पवन उसे तालाब की तरफ टौर्च की रोशनी में ले जाने लगा. इस के पहले उस ने फोन कर के अपनी मोटरसाइकिल मंगवा लेने के लिए घर वालों को कह दिया था. मार्तंड पवन से बातें करते हुए तालाब की ओर जा रहा था, तभी पीछेपीछे चल रहे विक्रम ने कपड़ों में छिपा हंसिया निकाल कर पवन की गरदन पर पूरी ताकत से प्रहार कर दिया. अचानक हुए इस हमले से पवन लड़खड़ा कर गिर पड़ा. वह संभल पाता, उस के पहले ही मार्तंड ने विक्रम से हंसिया ले कर पवन पर ताबड़तोड़ कई वार कर दिए.

पवन तड़पने लगा. और फिर बिना चीखेचिल्लाए मौत के मुंह में समा गया. इस के बाद तीनों उसे घसीट कर झाडि़यों में ले गए. वहां उस की जेब से दोनों मोबाइल निकाल कर तालाब में फेंक दिए. हत्या में प्रयुक्त हंसिया भी वहीं झाडि़यों में फेंक दिया. इस के बाद वे मोटरसाइकिल से चले गए. उन्होंने सोचा था कि वे पकड़े नहीं जाएंगे, लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड़ ही लिया. सुधीर कुमार सिंह ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हंसिया, तीनों मोबाइल, दोनों मोटरसाइकिलें बरामद कर ली थीं. इस के बाद पुलिस ने मुकदमे में धारा 120बी तथा 34 के अलावा एससी/एसटी की धारा 3(2)5 भी बढ़ा दी थी.

पुलिस ने पूछताछ के बाद सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित