Crime Story: बिना ईमान की औरत – शादाब के घर में रचा हत्या का खेल

Crime Story: फोन पर उस की बुआ के बेटे रिजवान कुरैशी ने बताया कि 3-4 दिन पहले 4-5 लोगों ने उस के बहन बहनोई के घर में घुस कर उन के साथ मारपीट की और उस के बहनोई की हत्या कर के उस की बहन गुलशबा को अगवा कर ले गए. मैं मौके पर मौजूद था. मैं ने जब उन का विरोध किया तो उन्होंने मारपीट कर मुझे भी घायल कर दिया. गुलशबा अपने पति मनोज सोनी उर्फ कैफ के साथ नायगांव परिसर स्थित बिट्ठलनगर के फ्लैट में रहती थी.

इस के पहले कि शादाब कुरैशी रिजवान से इस बारे में कोई बात पूछता, फोन कट गया. कई बार कोशिश के बाद भी जब रिजवान से संपर्क नहीं हो पाया तो सच्चाई जानने के लिए शादाब बहन के फ्लैट पर पहुंच गया. फ्लैट के बाहर लोगों की भीड़ जमा थी, अंदर से थोड़ी बदबू भी आ रही थी. पड़ोसियों ने बताया कि यह फ्लैट 3-4 दिनों से बंद पड़ा है. उन्होंने फोन कर के उस फ्लैट के मालिक को बुला लिया था. मामला संदिग्ध था, इसलिए मकान मालिक ने मामले की जानकारी स्थानीय पुलिस थाने को दे दी थी.

रात करीब एक बजे थाना शांतिनगर के थानाप्रभारी किशोर जाधव अपने सहायक पीआई मनजीत सिंह बग्गा, एसआई जी.के. वाघ, दिनेश लोखंडे, एएसआई डी.के. सोनवणे, सिपाही सुनील इंथापे, टी.बी. वड़ को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने देखा कि गुलशबा के फ्लैट पर ताला लटका हुआ था. चूंकि उस ताले की चाबी किसी के पास नहीं थी, इसलिए पुलिस ने ताले को तोड़ दिया. दरवाजा खुलते ही अंदर से तेज बदबू का झोंका आया, जिस से वहां खड़े लोगों का सांस लेना मुश्किल हो गया.

नाक पर रूमाल रख कर पुलिस टीम जब कमरे में गई तो वहां का नजारा देख कर स्तब्ध रह गई. फर्श पर खून के जमे हुए धब्बे नजर आ रहे थे, जो सूख कर काले पड़ गए थे. दरवाजे के पीछे कपड़ों का एक पुलिंदा रखा हुआ था, जिस से ढेर सारा खून निकल कर बाहर आ गया था. उस पुलिंदे को खोला गया तो उस में एक आदमी की लाश थी. लाश का धड़ और सिर दोनों अलगअलग थे. शादाब कुरैशी ने उस लाश की शिनाख्त अपने बहनोई मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ के रूप में की.

लाश देख कर लग रहा था कि उस की हत्या 3-4 दिन पहले की गई होगी,जिस से शव में सड़न पैदा हो गई थी. थानाप्रभारी किशोर जाधव ने इस की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. खबर पाते ही ठाणे जिले के डीसीपी मनोज पाटिल, एसीपी मुजावर तत्काल मौकाएवारदात पर आ गए. उन्होंने भी मृतक के साले शादाब और अन्य लोगों से पूछताछ की.

घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भिवंडी के आईजीएस अस्पताल भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने शादाब कुरैशी की तरफ से हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर के मामले की जांच सहायक पीआई मंजीत सिंह बग्गा को सौंप दी. शादाब ने शक अपनी बुआ के बेटे रिजवान पर ही जताया था. फुफेरे भाई के अलावा रिजवान रिश्ते में शादाब का साला भी था.

संदेह के दायरे में रिजवान कुरैशी

शुरुआती जांच में रिजवान कुरैशी पुलिस के रडार पर आ गया था. उस ने जिस प्रकार से मामले की जानकारी शादाब कुरैशी को दी थी, वह आधीअधूरी थी. इस के अलावा मृतक के तीनों बच्चे अपने नानी के घर सहीसलामत थे. बच्चों की मां गुलशबा खुद उन्हें बच्चों को मायके छोड़ कर आई थी. ऐसे में गुलशबा के अपहरण का तो सवाल नहीं उठता था. एपीआई मंजीत सिंह बग्गा के निर्देशन में पुलिस टीम उस के घर गई तो वह घर से गायब मिला.

पुलिस ने जब रिजवान कुरैशी के बारे में गहराई से जांचपड़ताल की तो पता चला कि रिजवान कुरैशी का चरित्र ठीक नहीं है. मृतक की पत्नी के साथ उस के अवैध संबंध थे. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने गुलशबा को भी जांच के घेरे में शामिल कर लिया. इस के बाद पुलिस ने रिजवान के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स में यह जानकारी मिल गई कि रिजवान की किनकिन लोगों से बात होती थी. पुलिस ने उन लोगों से पूछताछ शुरू कर दी. इस पूछताछ के बाद पुलिस को रिजवान के बारे में महत्त्वपूर्ण सूचना मिल गई.

इस के बाद एपीआई मंजीत सिंह बग्गा ने एसआई दिनेश लोखंडे, कांस्टेबल सुनील इंथापे, टी.बी. वड़, के.टी. मोहिते की एक टीम बना कर उन्हें रिजवान कुरैशी और गुलशबा की गिरफ्तारी के लिए रवाना कर दिया. 10 जनवरी, 2018 को यह टीम उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली पहुंच गई. वहां दबिश दे कर पुलिस ने रिजवान और गुलशबा को गिरफ्तार कर लिया. वे दोनों अपने एक जानकार के यहां छिपे हुए थे. पुलिस उन्हें ट्रांजिट रिमांड पर ले कर थाना शांतिनगर ले आई.

थानाप्रभारी किशोर जाधव ने उन दोनों से मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने थोड़ी सख्ती के बाद कैफ की हत्या करने की बात स्वीकारते हुए जो कहानी बताई वह एहसान फरामोशी की सारी हदें पार कर देने वाली थी—

इंसानियत का तकाजा

करीब 10 साल पहले 28 वर्षीय गुलशबा कुरैशी मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ को उत्तर प्रदेश के आगरा दिल्ली हाईवे पर काफी दयनीय हालत में भटकती हुई मिली थी. मनोज उस हाइवे पर कटलरी की दुकान लगाता था. उस समय गुलशबा की स्थिति बहुत खराब थी, उस के मुंह से आवाज तक नहीं निकल पा रही थी. लग रहा था जैसे वह कई दिनों से भूखी है.

वह मनोज कुमार सोनी के पास आ कर ऐसे गिर गई, जैसे बेहोश हो गई हो. उस की हालत देख मनोज कुमार घबरा गया. उस ने उसे अपनी दुकान के पास ही लिटाया और उस के मुंह पर पानी के छींटे मारे. कुछ देर बाद गुलशबा को होश आया तो उस ने उसे पानी पिलाया. पानी पीते ही उस की चेतना धीरेधीरे लौट आई.

इस के बाद गुलशबा ने मनोज को अपनी आपबीती बताई. गुलशबा ने उसे बताया कि वह मुंबई की रहने वाली है और वहीं के एक युवक से प्यार करती थी. वह युवक उसे घुमाने के लिए दिल्ली लाया था. दिल्ली के एक होटल में वे दोनों कई दिनों तक साथ रहे. फिर वह युवक उसे होटल में छोड़ कर कहीं चला गया. होटल वालों ने उसे धक्के मार कर निकाल दिया. किसी तरह वह भटकती हुई यहां तक पहुंची है. अब वह अपने घर वापस नहीं लौट सकती क्योंकि घर वाले उस से बहुत नाराज हैं.

गुलशबा की आपबीती सुनने के बाद मनोज कुमार को उस से सहानुभूति हो गई. उस ने उसे धीरज बंधाया और अपनी दुकान बंद कर के खाना खिलाने के लिए एक होटल पर ले गया. बाद में वह उसे ले कर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन आया और कहा, ‘‘देखो, अब तुम जहां जाना चाहती हो, चली जाओ. मैं तुम्हारी टिकट का बंदोबस्त कर दूंगा. अच्छा यही होगा कि तुम अपने मांबाप के पास लौट जाओ. उन से माफी मांग लेना. मुझे यकीन है कि वे तुम्हें माफ कर देंगे.’’

लेकिन गुलशबा ने मनोज कुमार सोनी की बात नहीं मानी. वह बोली, ‘‘मैं अब क्या मुंह ले कर उन के पास जाऊंगी. शायद वे मुझे माफ कर भी दें लेकिन समाज में हमारी क्या इज्जत रहेगी. ऐसी स्थिति में मैं वहां नहीं जाऊंगी.’’

गुलशबा की यह बात सुन कर मनोज कुमार थोड़ा गंभीर हो गया. उस ने कहा, ‘‘ठीक है, अगर तुम वहां नहीं जाना चाहती हो तो यह बताओ कि तुम्हारा और कोई रिश्तेदार है, जिस के यहां तुम जाना चाहोगी. मैं वहां जाने का बंदोबस्त कर दूंगा.’’

‘‘अब मेरा कोई नहीं है. मैं कहीं नहीं जाना चाहती. मेरे नसीब में जो लिखा है, वह होगा.’’ कहते हुए गुलशबा ने अपना सिर झुका लिया.

गुलशबा के इस उत्तर से मनोज कुमार सोनी एक अजीब स्थिति में फंस गया था. अगर वह कहीं जाना नहीं चाहती तो उस का क्या होगा. एक अकेली अंजान औरत के लिए शहर सुरक्षित नहीं था. उस के साथ कुछ भी हो सकता था. काफी समझाने के बाद भी जब गुलशबा कहीं जाने के लिए राजी नहीं हुई तो मजबूरन मनोज कुमार यह सोच कर उसे अपने घर ले आया कि मौका देख कर उसे उस के मातापिता के पास भेज देगा. लेकिन ऐसा हो नहीं सका.

मनोज कुमार के घर आने के बाद गुलशबा कुछ दिनों तक तो उदास रही फिर धीरेधीरे उस के चेहरे की उदासी घटने लगी. वक्त के साथ मनोज कुमार के साथ घुलमिल गई. मनोज कुमार अपने घर में अकेला रहता था. गुलशबा ने मनोज के घर के सारे कामकाज संभाल लिए थे. 30 वर्षीय मनोज कुमार सोनी राजस्थान के रहने वाले जगदीश प्रसाद सोनी का बेटा था. रोजीरोटी के लिए वह दिल्लीआगरा हाइवे पर कटलरी की दुकान चलाता था. वह दुकान का सारा सामान मुंबई से लाता था और आगरा घूमने आने वाले सैलानियों को बेचता था, जिस से उसे अच्छीखासी कमाई हो जाया करती थी.

गुलशबा को अपने प्रति समर्पित देख कर अविवाहित मनोज कुमार सोनी का भी झुकाव उस की तरफ हो गया. वे दोनों अब एकदूसरे की जरूरतें महसूस करने लगे थे, जिस के चलते उन के दिलों में एकदूसरे के प्रति चाहत पैदा हो गई. मन के साथसाथ तन का भी मिलन हो जाने के बाद दोनों अब सोतेजागते अपने जीवन के सतरंगी सपने सजाने लगे. मनोज गुलशबा से शादी करना चाहता था. लेकिन उन के बीच समाज और धर्म की दीवार खड़ी थी.

गुलशबा की तरफ से तो रास्ता साफ था लेकिन मनोज कुमार सोनी के घर वालों को यह रिश्ता पसंद नहीं था. उन की भी समाज में इज्जत थी. मनोज ने घर वालों की बातों को दरकिनार करते हुए खुद मुसलिम धर्म अपना कर गुलशबा से निकाह कर लिया. उस ने अपना नाम बदल कर कैफ रख लिया था. गुलशबा से शादी कर के मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ खुश था. गुलशबा को भी अचानक में ही सही, पर एक ऐसा पति मिल गया था जो उस का हर तरह से पूरा ध्यान रख रहा था. मनोज रातदिन मेहनत कर के पत्नी को अपनी क्षमता के अनुसार सुखसुविधाएं दे रहा था.

पति के प्यार में गुलशबा भी अपनी बीती जिंदगी के पलों को भुला कर अपनी गृहस्थी में रम गई थी. दोनों के जीवन के 8 साल कैसे निकल गए, पता ही नहीं चला. इस बीच गुलशबा 2 बच्चों की मां बन गई. कुल मिला कर उस की गृहस्थी की गाड़ी हंसीखुशी से चल रही थी.

समय अपनी गति से चल रहा था. मनोज के कहने पर गुलशबा ने अपने मायके वालों से भी बातचीत करनी शुरू कर दी थी, जिस से उस के उन से भी संबंध सामान्य हो गए थे. बेटी खुश थी, उस का जीवन सुखी था, इस से ज्यादा एक मातापिता को और क्या चाहिए. मायके वालों का उस के पास आनाजाना शुरू हो गया. 8 सालों तक एक ही जगह पर रह कर जब गुलशबा का मन भर गया तो वह कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली गई. गुलशबा चाहती थी कि उस का पति मुंबई में ही अपना धंधा शुरू कर के वहीं रहे तो वह मायके वालों के करीब आ जाएगी.

यही सोच कर उस ने एक दिन कैफ को समझाते हुए कहा, ‘‘जो काम तुम आगरा में करते हो, वही काम मुंबई में भी कर सकते हो. और फिर तुम सामान तो मुंबई से ही लाते हो. सामान लाने में खर्च भी होता है. मुंबई में काम करने से यह खर्चा भी बचेगा.’’

मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ को पत्नी का सुझाव अच्छा लगा. फिर वह सन 2016 में आगरा वाली दुकान किराए पर दे कर अपने परिवार के साथ मुंबई चला गया और अपनी ससुराल के नजदीक नायगांव में किराए का घर ले कर रहने लगा.

बेटी के नजदीक आने पर मायके वाले भी खुश हुए क्योंकि उन का जब भी मन होता गुलशबा से मिलने के लिए आते रहते थे. मुंबई में गुलशबा ने एक बच्ची को जन्म दिया, जिस का नामकरण काफी धूमधाम से हुआ. जहां गुलशबा अपने मायके वालों के करीब रह कर खुश थी, वहीं मनोज उर्फ कैफ थोड़ा चिंतित और परेशान था. इस की वजह यह थी कि मुंबई में उस का कारोबार ठीक नहीं चल पा रहा था. आगरा की दुकान भी बंद हो चुकी थी.

मनोज चाहता था लौटना पर गुलशबा नहीं मानी

यह सब सोच कर मनोज ने आगरा वापस लौटने का फैसला कर लिया पर गुलशबा मुंबई छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी. उस ने पति को कह दिया कि वह अपने तीनों बच्चों के साथ अकेली ही मुंबई में रह लेगी, क्योंकि उस के मायके वाले पास में हैं. मनोज ने भी उस की बात मान ली. पत्नी और बच्चों की तरफ से चिंतामुक्त हो कर मनोज आगरा लौट आया. वापस लौट कर उस ने अपना व्यवसाय फिर से जमा लिया.

कुछ दिनों बाद उस का धंधा पहले की तरह चलने लगा. वह अपने धंधे में व्यस्त हो गया तो गुलशबा अपनी गृहस्थी में. लेकिन वक्त का पहिया कुछ इस प्रकार से घूमा कि उन का सुखमय परिवार तिनके की तरह बिखर गया. अपने कारोबार में मनोज कुमार उर्फ कैफ कुछ इस तरह उलझा कि अपनी पत्नी गुलशबा के लिए वक्त ही नहीं निकाल पाता था. वह साल में 2-4 बार ही गुलशबा को वक्त दे पाता था, जिस के कारण उस के और पत्नी के बीच की दूरियां बढ़ गई थीं.

मनोज कुमार का समय तो उस के कामों में निकल जाता था, लेकिन गुलशबा को उस की याद आती थी. वह अधिक दिनों तक पति की इन दूरियों को बरदाश्त नहीं कर पाई, लिहाजा 27 वर्षीय रिजवान कुरैशी से उस के नाजायज संबंध बन गए. रिजवान गुलशबा के भाई शादाब कुरैशी का साला था, जिस का गुलशबा के यहां आनाजाना लगा रहता था.

रिजवान से अवैध संबंध बन जाने के बाद गुलशबा ने पति की चिंता करनी बंद कर दी. बल्कि जब कभी पति से फोन पर बात होती तो वह उस से कह देती कि यहां की कोई चिंता मत करो और अपने काम पर ध्यान दो. पत्नी की चहकती बातों से मनोज को लगता कि गुलशबा खुश है. इस तरह गुलशबा पति के भरोसे का खून करती रही.

पत्नी के अवैध संबंधों की खबर किसी तरह मनोज के पास पहुंची तो उस के होश उड़ गए. उस ने सोचा भी न था कि जिस गुलशबा को वह रोड से उठा कर अपने घर लाया, जिस की खातिर उस ने अपना धर्म बदला, अपने घर वालों तक से बगावत की, जिसे उस ने जीने का सहारा दिया, उसे सारे ऐशोआराम दिए, वह उस के एहसानों का बदला इस प्रकार से चुकाएगी.

इस बात की सच्चाई की तह में जाने के लिए मनोज कुमार जब मुंबई गया तो उसे पत्नी का व्यवहार कुछ अजीब सा लगा. उस के पहुंचने पर पत्नी जिस तरह खुश हो जाती थी, उसे उस के चेहरे पर वह खुशी देखने को नहीं मिली. पत्नी के हावभाव से वह इतना तो समझ ही गया था कि उस के पास पत्नी और रिजवान कुरैशी के बारे में जो खबर पहुंची थी, वह कोई कोरी अफवाह नहीं थी.

इस के बाद वह खबर की पुष्टि में लग गया. इस के लिए वह सूत्र तलाशने लगा. उस ने पड़ोसियों और अपने बच्चों से बात की तो इस बात की पुष्टि हो गई कि रिजवान गुलशबा से मिलने अकसर आता रहता है. कभीकभी तो वह उस के फ्लैट पर भी रुक जाता था. इस बारे में उस ने गुलशबा से बात की तो वह सरासर झूठ बोल गई. उस ने कहा कि उस की पड़ोसियों से बनती नहीं है, इसलिए वे सब उसे बदनाम कर रहे हैं. रिजवान तो उस का भाई जैसा है.

अपनी नौटंकी से कुछ समय के लिए तो गुलशबा ने पति को अपने झांसे में ले लिया. लेकिन 2-4 दिन में ही उस की हकीकत मनोज के सामने आ गई. मनोज ने पत्नी को रिजवान के साथ रंगेहाथों पकड़ लिया. तब मनोज ने गुलशबा की जम कर पिटाई की. पोल खुल जाने के बाद गुलशबा को बेइज्जती महसूस हुई. यह बात उस के मायके वालों को भी पता लग गई. इस सच्चाई का पता लग जाने के बाद मनोज पत्नी को मुंबई में अकेले नहीं छोड़ना चाहता था. उस ने गुलशबा और बच्चों को आगरा ले जाने का फैसला कर लिया.

उस ने पत्नी से कहा कि अब हम आगरा में रहेंगे. पर गुलशबा ने मुंबई छोड़ कर जाने से मना कर दिया. इस बात पर दोनों में झगड़ा भी हुआ. मनोज उसे ले जाने की जिद पर अड़ा था. गुलशबा ने रिजवान को फोन कर बता दिया कि मनोज उसे आगरा ले जाने की जिद कर रहा है और वह यहां से जाना नहीं चाहती. इस बारे में वह कुछ करे. रिजवान भी नहीं चाहता था कि गुलशबा वहां से जाए, इसलिए गुलशबा को ले कर वह परेशान हो उठा.

लिखी गई हत्या की पटकथा

किसी तरह से उस ने गुलशबा से मुलाकात की और मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ को अपने बीच से हटाने की योजना तैयार कर ली. फिर अपनी योजना के अनुसार 2 जनवरी, 2018 की दोपहर में वह मनोज कुमार सोनी के फ्लैट पर पहुंच गया. जिस समय वह फ्लैट में आया, उस समय मनोज खाना खा कर सो रहा था. बच्चे घर के बाहर खेलने के लिए गए हुए थे.

मौका अच्छा था. वह गुलशबा के साथ उस के कमरे में गया और उस पर हमला कर दिया. लेकिन वह कामयाब नहीं हो सका. अपनी जान बचाने के लिए मनोज रिजवान से भिड़ गया, जिस में रिजवान कुरैशी जख्मी हो गया.

अपने पति को रिजवान कुरैशी पर भारी होते देख गुलशबा ने रिजवान कुरैशी की मदद की. उस ने पति के दोनों हाथ पकड़ लिए, तभी झट से रिजवान ने मनोज का गला रेत दिया. मनोज नीचे गिर गया तो रिजवान ने उस का सिर काट कर धड़ से अलग कर दिया. इस के बाद दोनों ने उस के धड़ और सिर को कपड़ों के पुलिंदे में बांध कर दरवाजे के पीछे छिपा दिया. फिर उन्होंने कमरे की सफाई की.

शाम होतेहोते गुलशबा अपने तीनों बच्चों को अपने मायके में छोड़ कर फ्लैट पर आ गई. फिर घर के दरवाजे पर ताला लगा कर वह रिजवान कुरैशी के साथ उत्तर प्रदेश निकल गई, जहां पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. लेकिन इस के पहले रिजवान कुरैशी ने पुलिस और घर वालों का ध्यान भटकाने के लिए शादाब कुरैशी और अपने सारे रिश्तेदारों को एक मनगढ़ंत कहानी सुना दी थी.

थानाप्रभारी किशोर जाधव और एपीआई मंजीत सिंह बग्गा ने गिरफ्तार रिजवान कुरैशी और गुलशबा से विस्तृत पूछताछ के बाद उन के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें तलोजा जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक दोनों अभियुक्त न्यायिक हिरासतऌ में थे. आगे की जांच एपीआई मंजीत सिंह बग्गा कर रहे थे. Crime Story

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: नीली साड़ी का राज – प्रेमी ही बना कातिल

Hindi Crime Story: राजस्थान के टोंक जिले की देवली तहसील के थाना घाड़ के अंतर्गत एक गांव बड़ोली आता है. इसी गांव के रहने वाले गोकुल के खेत पर सरसों की फसल की कटाई का काम मजदूरों द्वारा किया जा रहा था. यह बात 10 फरवरी, 2021 की है.

सरसों काटते हुए मजदूरों की निगाह एक मानव कंकाल पर पड़ी. इस कंकाल के पास महिला की शृंगार सामग्री यानी चूडि़यां, बिछिया, नीली साड़ी वगैरह पड़ी थी. कंकाल साड़ी में लिपटा था. देखने पर लग रहा था कि कंकाल किसी महिला का है. यह बात मजदूरों ने खेत के मालिक गोकुल को बताई. गोकुल ने भी मौके पर आ कर देखा. बात सही थी. गोकुल ने फोन कर के गांव के सरपंच धनपत माली को खेत में कंकाल मिलने की बात बताई. कुछ ही देर में सरपंच भी खेत पर पहुंच गए. फिर उन्होंने फोन कर के धाड़ थाने में इस की सूचना दी.

सूचना पा कर धाड़ थानाप्रभारी इंसपेक्टर रामेश्वर प्रसाद पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. घटनास्थल का मुआयना किया. वहां पर नीले रंग की साड़ी में लिपटा कंकाल मिला. थानाप्रभारी रामेश्वर प्रसाद ने इस घटना की सूचना सीओ (देवली) दीपक कुमार, एएसपी राकेश कुमार और एसपी ओमप्रकाश को दे दी. सूचना मिलने पर सीओ दीपक कुमार एवं एफएसएल टीम मौके पर पहुंच गई. एफएसएल टीम द्वारा साक्ष्य उठाए गए, साथ ही 11 फरवरी को महिला के कंकाल को पोस्टमार्टम एवं डीएनए जांच के लिए अजमेर मैडिकल कालेज भेजा गया.

मामले की गंभीरता को देखते हुए एसपी (टोंक) ने अपने निर्देशन में एक टीम का गठन किया. इस टीम को जल्द से जल्द अज्ञात महिला कंकाल के बारे में पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई. इस टीम में एएसपी (मालपुरा) राकेश कुमार, सीओ दीपक कुमार, थानाप्रभारी (धाड़) रामेश्वर प्रसाद, हैडकांस्टेबल हरफूल, भैरूलाल, कांस्टेबल भागचंद, बजरंग, मेघराज, रामराज, कन्हैयालाल, महिला कांस्टेबल ज्योति और साइबर सेल के हैडकांस्टेबल सुरेशचंद शामिल थे.

पुलिस टीम ने सब से पहले महिला कंकाल से लिपटी हुई नीली साड़ी के पल्लू से बंधी मिली एक परची पर लिखे मोबाइल नंबर  की काल डिटेल्स निकाली. यह मोबाइल नंबर हरिराम मीणा पुत्र रामलाल मीणा, निवासी गांव भरनी का था. इस नंबर से सब से आखिर में महावीर मीणा से बात हुई थी.

महावीर और हरिराम मीणा काल डिटेल्स में संदिग्ध लगे तो पुलिस टीम ने 13 फरवरी को हरिराम को उठा लिया और उस से पूछताछ की. थोड़ी देर तक तो वह आनाकानी करता रहा. मगर फिर जब पुलिसिया तेवर दिखाए तो वह तोते की तरह बोलने लगा. उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. पता चला कि वह लाश टोंक जिले के गांव जगनतन ढिकला निवासी कमला मोग्या की थी. वह राजू मोग्या की बेटी थी. इस के बाद दूसरे आरोपी महावीर मीणा को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया. उस से पूछताछ की गई तो उस ने भी अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

तब पुलिस ने महिला कंकाल के पास मिले सामान को देखने के लिए राजू मोग्या, उस की पत्नी रतनीबाई और मृतका कमला मोग्या की छोटी बहन को धाड़ थाने पर बुलाया. इन्होंने महिला कंकाल के पास मिले सामान को देख कर अपनी बेटी कमला मोग्या पत्नी कालूलाल मोग्या के रूप में शिनाख्त कर ली. लाश की शिनाख्त हो जाने और आरोपियों के गिरफ्तार होने पर पुलिस ने चैन की सांस ली. कमला की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

मैडिकल कालेज में कंकाल की जांच हो जाने के बाद वह मृतका के पिता राजू मोग्या को सौंप दिया. उन्होंने कंकाल का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस ने मृतका के मातापिता राजू एवं रतनीबाई का डीएनए टेस्ट भी कराया ताकि सच सामने आ सके. पुलिस अधिकारियों ने कमला के खून से हाथ रंगने वाले आरोपी महावीर मीणा और हरिराम मीणा से कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में जो कहानी प्रकाश में आई, वह कुछ इस प्रकार से है—

कमला मोग्या की शादी आज से करीब 10 साल पहले कालूलाल मोग्या से हुई थी. कमला के मातापिता ने गरीबी में जीवन गुजारा था. मगर अपनी बेटी कमला की हर ख्वाहिश पूरी की थी. कमला सांवले रंग की आकर्षक नैननक्श की नवयौवना थी. शादी के बाद उसे कालूलाल जैसा मेहनतकश इंसान पति के रूप में मिला था. वक्त के साथ कमला 3 बच्चों की मां बनी. ये तीनों बेटे हैं. इस समय इन की उम्र 7 साल, 5 और 3 साल है.

कालूलाल मेहनतमजदूरी में दिनरात खटता था. इस कारण वह थकामांदा रात को घर लौट कर खाना खा कर बिस्तर पर पड़ता और सो जाता था. कालू की पत्नी कमला की हसरतें अभी जवान थीं. वह चाहती थी कि उस का पति उसे बांहों में ले कर आनंदलोक की सैर कराए. मगर कालू की हाड़तोड़ मेहनत ने उसे थका दिया था. अगर इंसान के तन की ज्वाला ठंडी नहीं हो तो वह बहकने लगता है. अपने सुख के लिए उस के कदम बहकने लगते हैं. कालू तो अपनी बीवी और बच्चों के भरणपोषण के लिए रातदिन मेहनतमजदूरी कर रहा था. वहीं कमला अपने देहसुख के लिए अपने जुगाड़ में लगी थी.

आज से करीब 10 महीने पहले कालू ने ढिकला निवासी दिव्यांग युवक महावीर मीणा का खेत बटाई (हिस्सेदारी) पर ले लिया. इस के बाद कालू अपनी पत्नी कमला एवं तीनों बेटों के साथ जंगलतन से ढिकला स्थित महावीर के खेत में झोपड़ी बना कर रहने लगा. खेत में रहते हुए कुछ दिन ही हुए थे कि एक रोज महावीर खेत देखने आया. उस समय कालू खेत में काम कर रहा था. कालू की बीवी कमला झोपड़ी में बैठी खाना बना रही थी.

महावीर सीधे झोपड़ी में चला गया. उस समय कमला घुटनों तक साड़ी उठा कर बैठी थी. महावीर की नजर कमला की गोरी पिंडलियों पर पड़ी. उस की कामवासना जाग उठी. महावीर ने कहा, ‘‘क्या पका रही है कालू भाई के लिए?’’

सुन कर कमला चौंकी.

उस ने आगंतुक पर नजर डाली. वह उस की गोरी पिंडलियों की तरफ ताक रहा था. कमला ने झट से साड़ी नीचे की. इसी हड़बड़ाहट में उस के उभारों पर से साड़ी हट गई. उन्नत उभार देख कर तो महावीर बावला ही हो गया.

कमला ने साड़ी को ठीक किया और बोली, ‘‘आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘मैं महावीर हूं. यह खेत मेरा ही है.’’ सुन कर कमला बोली, ‘‘अच्छा, तो आप महावीरजी हैं. आइए, बैठिए. मैं चाय बनाती हूं.’’

महावीर खटिया पर बैठ गया. कमला चाय बनाने लगी. तभी कालू भी आ गया. महावीर और कालू बातें करने लगे. कमला चाय बना लाई. सभी ने चाय पी. इस के बाद महावीर ने कहा कि कोई चीज चाहिए तो बोल देना. परेशान मत होना. मुझे अपना ही समझना. इस के बाद महावीर खेत में फसल देख कर गांव चला गया.

महावीर की आंखों में 3 बच्चों की मां कमला का मादक बदन बस गया. वह सारी रात उसे पाने का षडयंत्र मन ही मन करता रहा. महावीर 2 दिन बाद फिर खेत जा पहुंचा. खेत तो बहाना था. उसे तो कमला को रिझाना था. इस कारण वह दुकान से बच्चों के लिए खानेपीने की चीजें भी लाया था. कमला से महावीर हंसीठिठोली करने लगा. वह उस की सुंदरता की तारीफ भी करता था. कमला द्वारा बनी चाय का बखान भी करता था. महावीर इस के बाद अकसर 2-4 दिन बाद खेत जाने लगा. वह कमला को ललचाई नजर से देखता.

उस रोज कालू काम से कहीं गया हुआ था. महावीर आ गया खेत पर. कमला से पता चला कि कालू शाम तक घर लौटेगा. बस उस रोज महावीर ने बिसकुट, भुजिया दे कर बच्चों को झोपड़ी से बाहर खेलने भेज दिया. उस के बाद महावीर ने कमला से पूछा, ‘‘लगता है, मेरा आना तुम्हें अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘नहींनहीं, ऐसी कोई बात नहीं. मुझे तो तुम बहुत अच्छे लगते हो.’’ कमला ने कहा.

सुन कर महावीर ने आव देखा न ताव, कमला को बांहों में भर लिया. थोड़ी सी नानुकुर के बाद कमला ने अपना तन महावीर के हवाले कर दिया.

महावीर और कमला वासना के दरिया में गोते लगाने लगे. कमला को महावीर ने ऐसा शारीरिक सुख दिया कि वह उस की दीवानी हो गई. कमला भूल गई कि वह शादीशुदा और 3 बेटों की मां है. उस के ये बहके कदम उसे कहीं का नहीं छोड़ेगे. अवैध संबंधों का परिणाम बहुत खतरनाक होता है. कमला को जो शारीरिक सुख महावीर ने कई बरसों बाद दिया था, उस सुख की खातिर वह अपने पति और बच्चों तक को ताक पर रख कर महावीर के साथ भाग जाने को तैयार हो गई थी.

कालू शरीफ था. उसे पता नहीं था कि उस की गैरमौजूदगी में उस की बीवी गैरमर्द के साथ रंगरलियां मनाती है. वह तो सोचता था कि महावीर अपनी खेती देखने आता है. जबकि महावीर तो कमला से मिलने आता था. कालू वहीं खेत पर रहता था. इस कारण कमला और महावीर का मिलन नहीं हो पाता था. ऐसे में वासना की आग में जल रहे महावीर और कमला ने योजना बनाई कि वे दोनों चुपके से भाग जाएंगे.

महावीर ने कमला से कहा, ‘‘मैं ने देवली में कमरा किराए पर ले लिया है. तुम वहीं रहना. मैं भी आताजाता रहूंगा. बाद में जब सब कुछ ठीक हो जाएगा, तब मैं तुम से शादी कर लूंगा और बच्चों को भी अपना लूंगा.’’ सुन कर कमला बहुत खुश हुई. करीब 7 महीने पहले एक रोज कमला बिना कुछ बताए कहीं चली गई. महावीर योजनानुसार कमला को ले कर देवली कस्बे पहुंचा और किराए के कमरे में कमला को छोड़ कर वापस गांव ढिकला आ गया ताकि उस पर कोई शक न करे.

उधर पत्नी के अचानक गायब हो जाने पर कालू को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि उस की पत्नी गई तो गई कहां. कालू ने उस की बहुत खोजबीन की. रिश्तेदारी में ढूंढा. मगर कमला का कोई पता नहीं चल सका.

उसे जमीन खा गई थी या आसमान निगल गया था. थकहार कर कालू ने थाना दूनी में कमला की गुमशुदगी दर्ज करा दी. पुलिस ने उस की कोई खोजबीन नहीं की. पुलिस वालों ने कहा कि कहीं गई होगी. अपने आप आ जाएगी. गरीब की भला कौन सुनता है. कालू बीवी की खोजबीन कर के थक गया. वह अपने तीनों बच्चों की परवरिश करने लगा. कालूलाल अब बच्चों की देखभाल करने लगा.

उस का कामधंधा छूट गया था. कालू काम पर जाए तो बच्चों की देखरेख कौन करे. इस कारण कालू अपनी बीवी के वियोग में मासूम बच्चों को जैसेतैसे पालने लगा. उधर महावीर का जब मन होता तो वह देवली जाता और कमला के साथ रंगरलियां मनाता. वह कभी गांव तो कभी देवली में प्रेमिका कमला के साथ रातें रंगीन कर रहा था. कुछ समय बाद महावीर ने कमला को देवली से निवाई कस्बे में किराए के कमरे में शिफ्ट कर दिया.

महावीर अब निवाई में कमला के साथ मौजमस्ती करने लगा. कमरे का किराया और कमला के खानेपीने का सारा खर्च महावीर मीणा उठाता था. महावीर निवाई में 2 दिन रहता. फिर गांव ढिकलाआ जाता. गांव में 2-3 दिन रहता फिर निवाई कमला के पास चला जाता. महावीर के निवाई से वापस गांव जाने के बाद कमला अकेली रह जाती थी. वह बमुश्किल समय अकेले काटती थी. ऐसे में कमला ने तय कर लिया कि वह अब महावीर के साथ ढिकला जा कर रहेगी. उसे अपने बच्चों की भी याद सता रही थी.

महावीर जब जनवरी के दूसरे हफ्ते में निवाई कमला से मिलने आया तब कमला ने उस से कहा कि अब वह यहां अकेली नहीं रहेगी. कमला ने दबाव बनाया कि वह अपने साथ उसे गांव ढिकला में रखे और बच्चों को भी अपनाए.

सुन कर महावीर मीणा के हाथों के तोते उड़ गए. महावीर और कमला के अवैध संबंधों की खबर उस के गांव ढिकला में भी पता चल चुकी थी. महावीर के अकसर देवली और बाद में निवाई जा कर रहने का राज गांव में उजागर हो गया था. अब कमला उस के साथ ढिकला चलने की जिद करने लगी थी. ऐसे में अब तक महावीर गांव के लोगों से कहता रहा था कि कमला के बारे में जो बातें कही जा रही हैं, वह गलत हैं. उसे तो पता तक नहीं कि कमला है कहां.

ऐसे में जब उस के साथ कमला को लोग देखेंगे तो उस की समाज और गांव में बदनामी होगी. तब महावीर ने बदनामी के डर से कमला को ही रास्ते से हटाने का निर्णय ले लिया. महावीर ने कमला को झूठा विश्वास दिलाया कि वह एकदो दिन में उसे गांव ढिकला ले जाएगा. उस की बात सुन कर कमला खुश हो गई. महावीर ने भरनी निवासी अपने ममेरे भाई हरिराम मीणा से इस बारे में बात की और अपने पास बुलाया. इस के बाद योजनानुसार 11 जनवरी, 2021 को महावीर और हरिराम मीणा बाइक द्वारा निवाई कमला के पास पहुंचे. रात वहीं कमला के पास रुके.

अगले दिन कमरे का हिसाब वगैरह कर के कमला के साथ मोटरसाइकिल पर टोंक पहुंचे. टोंक घूमने के बाद 12 जनवरी, 2021 को चौथ का बरवाड़ा घुमाते रहे. फिर शाम हो जाने के बाद केरली कुंड आए. वहां महावीर और हरिराम ने शराब पी. इस के बाद बड़ोली के जंगल में पहुंचे और वहां एक नीम के पेड़ के नीचे बैठ गए.

वहीं पर उन्होंने मौका पा कर कमला को गला दबा कर मार डाला और उस के शव को सरसों के खेत में डाल कर ढिकला में अपने घर आधी रात को आ कर सो गए. कमला ने हरिराम के मोबाइल नंबर की परची अपनी साड़ी के पल्लू में बांध रखी थी ताकि कभी उस से बात करेगी. इसी परची ने पुलिस को हत्यारों तक पहुंचा दिया. सरसों के खेत में कमला की लाश पड़ी रही. 12 जनवरी, 2021 की रात 11 बजे कमला की हत्या कर शव गोकुल जाट के खेत में सरसों की फसल के बीच फेंका गया था. लाश सरसों के बीच खेत में पड़ी रही. करीब एक महीने तक पड़ी यह लाश सड़गल कर कंकाल बन गई.

जब 10 फरवरी, 2021 को हत्याकांड से करीब महीने भर बाद सरसों की कटाई मजदूरों द्वारा की जा रही थी, तब उन की नजर कंकाल पर पड़ी. इस के बाद खेत मालिक गोकुल जाट ने सरपंच धनपत माली को कंकाल मिलने की खबर दी. सरपंच ने धाड़ थाने के थानाप्रभारी रामेश्वर प्रसाद को सूचना दी.

पुलिस ने पूछताछ पूरी होने पर दोनों आरोपियों महावीर मीणा और हरिराम मीणा को कोर्ट में पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Domestic Dispute: नादानी में उजड़ गया परिवार – विस्फोटक बन गए अनैतिक संबंध

Domestic Dispute: रेखा ने वीरेंद्र को प्यार से समझाते हुए कहा था, ‘‘देखो वीरेंद्र, बात को समझने की कोशिश करो. जो तुम कह रहे हो वह संभव नहीं है. मेरा अपना एक घरसंसार है, पति है, 2 बच्चे हैं, अच्छीखासी गृहस्थी है हमारी. और तुम कहते हो मैं सब कुछ छोड़छाड़ कर तुम्हारे साथ भाग चलूं. नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. हम दोनों अच्छे दोस्त हैं और हमेशा दोस्त ही रहेंगे. हमारे बीच जो रिश्ता है, जो संबंध है, वह हमेशा बना रहेगा. हां, एक बात का मैं वादा करती हूं कि जो रिश्ता हम दोनों के बीच है, उसे तोड़ने में मैं पहल नहीं करूंगी.’’

‘‘तुम मेरी बात समझने की कोशिश नहीं कर रही हो.’’ वीरेंद्र हताश सा बोला.

‘‘मैं सब समझ रही हूं वीरेंद्र, मैं कोई दूधपीती बच्ची नहीं हूं. तुम चाहते हो मैं अपने पति को, अपने बच्चों को हमेशा के लिए छोड़ कर तुम्हारे साथ चली आऊं. यह मुझे मंजूर नहीं है.’’

‘‘तुम मेरी बात सुनोगी भी या नहीं. तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं, तुम्हारे बिना एक पल रहने की कल्पना भी नहीं कर सकता. इसीलिए कह रहा हूं कि पति और बच्चों का मोह त्याग कर मेरे साथ चली चलो, हम अपनी एक नई दुनिया बसाएंगे, जहां सिर्फ मैं रहूंगा और तुम होगी. रहा सवाल बच्चों का तो हम दोनों के और बच्चे पैदा हो जाएंगे. तुम नहीं जानती, तुम मेरी कल्पना हो, तुम्हें पाना ही मेरा एकमात्र सपना है.’’

‘‘वाह वीरेंद्र बाबू, वाह.’’ रेखा ने वीरेंद्र का मजाक उड़ाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे सपने और कल्पनाओं को पूरा करने के लिए मैं अपने परिवार की बलि चढ़ा दूं? ऐसा हरगिज नहीं होगा.’’

‘‘अच्छी तरह सोच लो रेखा रानी. मैं तुम्हें बदनाम और बरबाद कर दूंगा.’’ अपनी बात मानते न देख वीरेंद्र ने रेखा को धमकी दी.

‘‘बदनाम करने की धमकी किसे दे रहे हो?’’ रेखा भी गुस्से में आ गई, ‘‘बरबाद तो मैं उसी दिन हो गई थी, जिस दिन मैं ने अपने सीधेसादे पति को धोखा दे कर तुम्हारे साथ संबंध बनाए थे. रहा बदनामी का सवाल तो तुम्हारे साथ संबंधों को ले कर पूरा मोहल्ला मुझ पर थूकता है, यहां तक कि मेरे पति को भी मेरे और तुम्हारे संबंधों के बारे में पता है.

‘‘उन की जगह कोई और होता तो मुझे अपने घर से कब का निकाल कर बाहर कर दिया होता. यह उन की शराफत है कि उन्होंने कभी मुझे तुम्हारे नाम का ताना दे कर जलील तक नहीं किया. अरे ऐसे पति के तो पैर धो कर पीने चाहिए और तुम कहते हो कि मैं पति को छोड़ कर तुम्हारे साथ भाग जाऊं.’’

‘‘वाह क्या कहने, नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली है. पतिव्रता और सती सावित्री होने का ढोंग कर के दिखा रही है मुझे. वह दिन भूल गई, जब अपने उसी पति की आंखों में धूल झोंक कर मुझ से मिलने आया करती थी.’’

‘‘अपनी जिंदगी की इस भयानक भूल को मैं कैसे भूल सकती हूं, जब तुम्हारे सपनों के झूठे मायाजाल में फंस कर मैं ने अपना सब कुछ तुम्हें सौंप दिया था. आज मैं अपनी उसी गलती की सजा भुगत रही हूं.’’ कहते हुए एकाएक रेखा क्रोध से भड़क उठी और उस ने गुस्से में वीरेंद्र से कहा, ‘‘जाओ, निकल जाओ मेरे घर से. अपनी मनहूस शक्ल दोबारा मत दिखाना. तुम्हें जो करना है कर लेना, अब दफा हो जाओ.’’

लोकेश की बैकग्राउंड

रेखा का पति लोकेश मूलत: जिला सहारनपुर, उत्तर प्रदेश के गांव कंबोह माजरा का रहने वाला था. साल 2006 में उस की शादी देहरादून, उत्तराखंड के गांव दंदोली निवासी ठेपादास की मंझली बेटी रेखा के साथ हुई थी. लोकेश साधारण शक्लसूरत का सीधासादा युवक था, जबकि रेखा खूबसूरत थी.

रेखा जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर लोकेश अपने आप को बड़ा भाग्यशाली समझता था. वह रेखा से बहुत प्यार करता था और रेखा भी उसे प्यार करने लगी थी. कुल मिला कर पतिपत्नी दोनों एकदूसरे से संतुष्ट थे. वक्त के साथ लोकेश और रेखा अब तक 2 बच्चों 10 वर्षीय कार्तिक और 7 वर्षीय कृष के मातापिता बन गए थे.

लोकेश के मातापिता के पास थोड़ी सी खेती थी, जिस से घर खर्च भी बड़ी मुश्किल से चल पाता था, इसलिए 7 साल पहले लोकेश काम की तलाश में लुधियाना चला आया था. अपने पैर जमाने के लिए शुरू में वह छोटीमोटी नौकरियां करता रहा. साथ ही किसी अच्छे काम की तलाश में भी जुटा रहा. आखिर उसे सन 2014 में भारत की प्रसिद्ध साइकिल कंपनी हीरो में नौकरी मिल गई थी. वेतन भी अच्छा था और अन्य सुखसुविधाएं भी थीं.

हीरो साइकिल में नौकरी लगने के बाद लोकेश ने रहने के लिए सुरजीतनगर, 33 फुटा रोड, गली नंबर-1 ग्यासपुरा स्थित एक वेहड़े में किराए पर कमरा ले लिया और गांव से अपनी पत्नी रेखा और बच्चों को भी लुधियाना ले आया.

लुधियाना आने के बाद लोकेश ने अपने दोनों बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिल करवा दिया था. पतिपत्नी दोनों मजे में रहने लगे थे कि अचानक एक दिन वीरेंद्र सिंह उर्फ चाचा की नजर रेखा पर पड़ी. वीरेंद्र भी उसी गली नंबर-1 में लोकेश के घर के सामने ही रहता था.

वीरेंद्र की कामयाब चाल

शातिर वीरेंद्र की नजर जब खूबसूरत रेखा पर पड़ी तो वह उसे पाने के लिए छटपटाने लगा. उस ने रेखा को भी देखा था और उस के पति लोकेश को भी. साधारण शक्लसूरत वाले लोकेश की इतनी खूबसूरत बीवी देख वीरेंद्र के कलेजे पर सांप लोटने लगा था. वह हर हाल में रेखा से संबंध बनाना चाहता था.

इस के लिए 2-4 बार उस ने रेखा को छेड़ने की कोशिश भी की थी, पर रेखा ने उसे घास नहीं डाली तो शातिर दिमाग वीरेंद्र ने रेखा के निकट आने का एक दूसरा रास्ता अपनाया. उस ने रेखा के पति लोकेश के साथ दोस्ती कर ली और दोस्ती की आड़ ले कर वह लोकेश के घर आनेजाने लगा. जबकि दूसरी ओर वीरेंद्र के नापाक इरादों से अनजान भोलाभाला लोकेश उसे अपना हितैषी समझ रहा था. रेखा को अपने जाल में फंसाने के लिए उस ने लोकेश और उस के बीच ऐसी दरार पैदा की कि घर में अकसर झगड़ा रहने लगा.

लोकेश की अधिकांश नाइट ड्यूटी होती थी, जिस का वीरेंद्र ने जम कर फायदा उठाया. शातिर वीरेंद्र ने रेखा को अपने प्रेम जाल में फंसा कर उस के साथ अवैध संबंध बना लिए. दोनों के बीच बने अवैध संबंधों ने उस समय गंभीर मोड़ ले लिया, जब वीरेंद्र ने रेखा पर पति व बच्चों को छोड़ कर साथ भागने का दबाव बनाना शुरू किया. उस की बात सुन कर रेखा को अपनी गलती का अहसास हुआ कि उस ने अपने पति और बच्चों को धोखा दे कर अच्छा नहीं किया. लेकिन अब क्या हो सकता था, अब तो वह शैतान के जाल में फंस चुकी थी.

पहले तो रेखा उसे टालती रही, परंतु जब वह उसे अधिक परेशान करने लगा तो रेखा ने पति व बच्चों को छोड़ कर उस के साथ भागने से साफ इनकार कर दिया था. रेखा के स्पष्ट इनकार करने से वीरेंद्र तड़प कर रह गया. हर तरह के हथकंडे अपनाने के बाद भी जब वह नाकाम रहा तो उस ने रेखा को सबक सिखाने की ठान ली.

रेखा द्वारा किए इनकार से गुस्साया वीरेंद्र 2 अप्रैल की सुबह मौका पा कर तब रेखा के घर पहुंचा, जब वह घर में अकेली थी. उस का पति लोकेश ड्यूटी पर व बच्चे स्कूल गए हुए थे. वीरेंद्र ने रेखा से साफ शब्दों में पूछा कि वह उस के साथ भागेगी या नहीं? रेखा के इनकार करने पर वीरेंद्र भाग कर रसोई से चाकू उठा लाया और रेखा के पेट में वार कर दिया.

वीरेंद्र ने खुद भी कोशिश की मरने की

अचानक हुए वार से रेखा घबरा गई. उसे वीरेंद्र से ऐसी उम्मीद नहीं थी. उस ने वीरेंद्र के वार से बचने की कोशिश की, लेकिन बचाव करते समय रेखा की एक अंगुली कट गई. इस के बाद वीरेंद्र ने उसे धक्का दे कर बैड पर गिरा दिया और उस के गले में चुनरी डाल गला घोंट कर उस की हत्या कर दी. वारदात को अंजाम देने के बाद वह अपने घर चला गया. अपने घर पर रखी चूहे मारने की दवा निगल कर उस ने आत्महत्या करने की कोशिश की.

इसी दौरान संदेह होने पर मोहल्ले के लोगों ने तुरंत पुलिस को फोन किया. सूचना मिलते ही एसीपी अमन बराड़ व डाबा थाने के प्रभारी इंसपेक्टर गुरविंदर सिंह घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने वीरेंद्र को काबू कर के जब लोकेश के घर जा कर देखा तो बिस्तर पर रेखा का शव पड़ा हुआ था. पुलिस ने शव कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया.

लोकेश की तहरीर पर इंसपेक्टर गुरविंदर सिंह ने रेखा की हत्या के अपराध में वीरेंद्र के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे अदालत में पेश किया, जहां अदालत के आदेश पर उसे जिला जेल भेज दिया गया था. रेखा ने जो किया, उस का नतीजा उसे भोगना पड़ा. अपने पति से बेवफाई की सजा रेखा को अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी, पर इस सारे प्रकरण में लोकेश और उस के बच्चों का क्या दोष था, जिस की सजा वे आजीवन भोगते रहेंगे.

यह सच है कि लोकेश के मुकाबले उस की पत्नी रेखा कहीं अधिक खूबसूरत थी. पतिपत्नी के मजबूत रिश्ते में दरार डालने के लिए शातिर वीरेंद्र ने इसी फर्क को मुख्य वजह बनाते हुए हंसतेखेलते परिवार में जहर घोल दिया.

पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Stories: लड़की, लुटेरा और बस

Hindi Stories: अपनी बेटी और नवासी को बचाने के लिए डिप्टी कमिश्नर ने पूरे पुलिस विभाग की इज्जत दांव पर लगाते हुए एक मासूम को गुंडे के हवाले करने की तैयारी कर ली थी. लेकिन इंसपेक्टर नवाज खान ने होशियारी से मासूम को तो बचाया ही, पुलिस विभाग की भी लाज रख ली.

यह एक शहरी थाने का मामला है. शाम को मैं औफिस में बैठा एक पुराने मामले की फाइल पलट रहा था, तभी 2-3 लोग काफी घबराए हुए मेरे पाए आए. शक्लसूरत से वे लोग ठीकठाक लग रहे थे. उन में एक दुबलापतला और अधेड़ उम्र का आदमी था, उस का नाम इनायत खां था, वह शहर का चमड़े का सब से बड़ा व्यापारी था. उस ने बताया कि उस की बेटी गायब है. उसे शारिक नाम के युवक ने अगवा किया है. वह उन का दूर का रिश्तेदार है, जिस की अभी जल्दी ही किसी औफिस में नौकरी लगी है. इस के पहले वह आवारागर्दी किया करता था. उस की मां उस के पास उन की बेटी का रिश्ता मांगने आई थी, पर उन्होंने उसे कोई जवाब नहीं दिया था.

इनायत खां ने आगे बताया कि उस की बेटी नजमा मुकामी कालेज में पढ़ रही थी. उस की उम्र 17 साल थी. शरीफ उसे बहलाफुसला कर भगा ले गया था. मैं ने उस की शिकायत दर्ज कर ली और एक एसआई तथा 2 सिपाहियों को शारिक के बारे में पता करने उस के घर भेज दिया. आधे घंटे में वे शारिक के पिता और बड़े भाई को साथ ले कर थाने आ गए. दोनों के चेहरों पर परेशानी झलक रही थी. शारिक के बाप ने कहा, ‘‘थानेदार साहब, मेरा बेटा शारिक ऐसा गलत काम नहीं कर सकता. फिर उसे ऐसा करने की जरूरत ही क्या थी? 2-3 महीने में वैसे भी नजमा से उस की शादी होने वाली थी.’’

इस पर नजमा का बाप भड़क उठा, ‘‘याकूब अली, तुम ने बेटे के लिए नजमा का रिश्ता मांगा जरूर था, पर अभी शादी तय कहां हुई थी? शायद इसी वजह से उस ने मेरी बेटी को गायब कर दिया है. तुम लोगों की बदनीयती सामने आ गई है.’’

दोनों के बीच तकरार होने लगी. मैं ने उन्हें चुप कराया. याकूब अली इस बात पर अड़ा था कि शारिक और नजमा की शादी तय हो चुकी थी, जबकि इनायत खां मना कर रहा था. मैं ने उन्हें समझाबुझा कर घर भेज दिया. मैं ने सोचा, थोड़े काम निपटा कर इनायत खां के घर जाता हूं कि तभी डिप्टी कमिश्नर साहब का फोन आ गया. मैं चौंका, अंग्रेज हाकिम के मिजाज को वही लोग समझ सकते हैं, जिन्होंने उन के अंडर में काम किया हो. उन्होंने लड़की के अगवा के मामले का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘तुम फौरन लड़की के बारे में पता करो. किसी भी कीमत पर कुछ ही घंटों में मुझे लड़की चाहिए.’’

मैं ने उन्हें यकीन दिला कर फोन बंद कर दिया. इस के तुरंत बाद डीएसपी साहब को फोन लगाया. उन्होंने भी कहा, ‘‘डीसी साहब का फोन आया था. तुम फौरन लड़की की तलाश में लग जाओ, शारिक को पकड़ने के लिए छापा मारो, मैं ने शहर से निकलने वाले सारे रास्तों पर नाकाबंदी करा दी है. रेलवे स्टेशन और बसस्टैंड पर भी आदमी भेज दिए हैं.’’

डीएसपी साहब से सलाह कर के मैं सहयोगियों के साथ याकूब अली के घर जा पहुंचा. उस समय रात के 8 बज रहे थे. शारिक के भाई अकबर ने दरवाजा खोला. याकूब अली घर पर नहीं था. मैं ने थोड़ा तेज लहजे में कहा कि शारिक को छिपाने की गलती न करें, वरना परेशानी में पड़ जाएंगे. शारिक की मां अपने बेटे की सफाई में दुहाई देने लगी. उस ने बताया कि नजमा इनायत खां की सगी बेटी नहीं थी. उस ने बीवी की मौत के बाद दूसरी शादी की थी. यह लड़की उसी दूसरी बीवी की है और उस के साथ इनायत खां के यहां आई थी. नजमा की मां रईसा उन की रिश्तेदार थी, इसलिए उन का एकदूसरे के यहां आनाजाना था.

नजमा शारिक को पसंद करने लगी थी. वह अकसर उन के घर आ कर छोटेमोटे काम वगैरह भी कर देती थी. शारिक की मां को वह अम्मीजान कहती थी. शारिक भी उसे पसंद करने लगा था. उस के छोटे भाई भी उसे खूब चाहते थे. इसी वजह से उस ने शारिक के रिश्ते की बात चलाई थी, जो उन्होंने मंजूर कर ली थी. 3-4 महीने में शादी होने वाली थी. वह उलझन में थी कि अब वे लोग ऐसा क्यों कह रहे थे कि शादी तय नहीं थी, जबकि सब कुछ तय हो चुका था.

रईसा शारिक की मां की चचेरी बहन थी. वह खुशीखुशी बेटी देने को तैयार थी. अब क्यों इनकार कर रही हैं, यह बात समझ के बाहर थी. मुझे लगा रईसा से मिल कर सच्चाई मालूम करनी पड़ेगी. मैं इसी बात पर विचार कर रहा था कि फोन की घंटी बजी. अकबर ने फोन उठाया, आवाज सुन कर उस का रंग उड़ गया. 2 शब्द बोल कर उस ने रिसीवर रख दिया.

‘‘कौन था?’’ उस की मां ने पूछा.

‘‘रौंग नंबर था.’’ उस ने जल्दी से कहा.

मैं समझ गया कि वह कुछ छिपा रहा है. मैं ने कहा, ‘‘तुम कह रहे थे कि शारिक 8 बजे तक घर आ जाता है, अब तो 9 बज रहे हैं, वह आया नहीं, बताओ कहां है? और हां, अब फोन आएगा तो तुम नहीं, मैं उठाऊंगा.’’

इस के बाद मैं एक सिपाही को चौधरी इनायत खां के यहां भेज कर खुद शारिक की मां और उस के भाई से पूछताछ करने लगा. उन्होंने बताया कि शारिक औफिस से 3 बजे आता है, खाना खा कर थोड़ा आराम करता है, इस के बाद जाता है तो 7-8 बजे आता है, पर आज वह एक बार भी घर नहीं आया. मां अपने बेटे की तारीफें करती रही. सिपाही इनायत खां के यहां से पूछताछ कर के आ गया. उस ने बताया, ‘‘साहब, उन की पौश इलाके में शानदार कोठी है. नजमा की मां रईसा से बात हुई. उन का कहना है कि शारिक का रिश्ता आया था, लेकिन बात बनी नहीं. जहां तक नजमा के अपहरण की बात है, उस में पक्के तौर पर शारिक का हाथ है.’’

जिस सबइंसपेक्टर को जांच के लिए भेजा था, उस ने बताया, ‘‘नजमा शाम से पहले लौन में बैठी थी. इस के बाद अपने कमरे में चली गई. थोड़ी देर बाद मां उस के कमरे में गई तो वह कमरे से गायब थी. कमरे की पिछली खिड़की खुली थी. जनाब मैं ने खुद कमरा बारीकी से देखा है, शीशे का एक गिलास टूटा पड़ा था, तिपाई गिरी पड़ी थी, लड़की की एक जूती कमरे में पड़ी थी, हालात बताते हैं कि लड़की को खिड़की के रास्ते से जबरदस्ती ले जाया गया था.’’

सबइंसपेक्टर की बातें सुन कर मैं उलझन में पड़ गया. नजमा के घर वाले शारिक पर इल्जाम लगा रहे थे. जबकि शारिक की मां का कहना था कि जब शारिक की उस से शादी होने वाली थी तो वह ऐसा क्यों करेगा? उस का कहना था कि यह सब लड़की के सौतेले बाप की साजिश है. फोन की घंटी बजी, मैं ने लपक कर फोन उठाया. दूसरी ओर मेरा एक सबइंसपेक्टर था, जिसे मैं ने शारिक के बारे में पता करने के लिए उस के दोस्तों के यहां और औफिस भेजा था. उस ने बताया, ‘‘दोस्तों से तो कुछ पता नहीं चला, लेकिन औफिस वालों से पता चला है कि 2 बजे शारिक के लिए किसी का फोन आया था. इस के बाद वह हड़बड़ा कर औफिस से निकल गया था. तब से वह किसी को दिखाई नहीं दिया.’’

मोहल्ले वालों से पता चला था कि 8 दिन पहले नजमा के भाइयों ने किसी लड़के की घर के पास जम कर पिटाई की थी. वजह मालूम नहीं हो सकी, पर वह लड़का शारिक नहीं था. फोन एक बार फिर बजा. मैं ने रिसीवर उठा कर कान से लगाया तो दूसरी ओर से किसी लड़की की घबराई हुई आवाज आई, ‘‘अकबर भाई बोल रहे हैं न?’’

मैं ने कहा, ‘‘हां.’’

लड़की घबराहट में आवाज नहीं पहचान पाई और जल्दीजल्दी कहने लगी, ‘‘अकबर भाई, एक आदमी मुझे पकड़ कर यहां ले आया है. मुझे एक कमरे में बंद कर के खुद न जाने कहां चला गया है? यह फोन दूसरे कमरे में था, खिड़की का शीशा तोड़ कर किसी तरह मेरा हाथ वहां पहुंचा है. सारे दरवाजे बंद हैं. प्लीज, मेरे अब्बा तक खबर पहुंचा दें.’’

इतना कह कर वह रोने लगी. मैं ने कहा, ‘‘मैं अकबर का दोस्त बोल रहा हूं. वह अभी घर पर नहीं है. आप यह बताएं कि आप बोल कहां से रही हैं?’’

‘‘यह मुझे नहीं मालूम. मुझे बेहोश कर के यहां लाया गया है. मुझे पता नहीं है.’’

‘‘तुम उसे पहचानती हो, जो तुम्हें वहां ले आया है?’’

‘‘नहीं, पर वह लंबातगड़ा आदमी है. पतलूनकमीज पहने है, हाथ में कड़ा भी है. वह मेरे कमरे की खिड़की से अंदर आया था. उस ने मेरे मुंह पर कोई चीज रखी और मैं बेहोश हो गई. प्लीज, कुछ कीजिए. शारिक या उस के अब्बा से बात करवा दीजिए.’’

मैं ने कहा, ‘‘मिस नजमा, हम सब आप की तलाश में लगे हैं. लेकिन जब तक आप पता या जगह नहीं बताएंगी, हम कुछ नहीं कर सकते. खिड़की से देख कर कुछ अंदाजा नहीं लगता क्या?’’

अब तक सभी फोन के पास आ कर खड़े हो गए थे और बात समझने की कोशिश कर रहे थे. मैं ने पूछा, ‘‘मिस नजमा, वह आदमी घर में है या कहीं बाहर गया है?’’

‘‘मुझे होश आया तो मैं ने गाड़ी स्टार्ट होने की आवाज सुनी. शायद वह कहीं बाहर गया है.’’

मैं ने कहा, ‘‘मिस नजमा, फोन काट कर तुम टेलीफोन एक्सचैंज फोन करो. वे लोग पता लगा लेंगे कि तुम कहां से बोल रही हो. और इस के बाद एक्सचैंज का नंबर बता कर मैं ने फोन रख दिया. सभी जानने को बेचैन थे कि क्या हुआ. मैं ने उन्हें चुप रहने को कहा और एक्सचैंज फोन किया. सब की निगाहें फोन पर जमी थीं. एक्सचैंज वालों ने कहा, ‘‘जैसे ही नंबर ट्रेस होगा, पता बता देंगे.’’

एकएक मिनट भारी पड़ रहा था. 15 मिनट बीत गए. घंटी नहीं बजी. मुझे चिंता हो रही थी. इस के बाद एक्सचैंज से फोन आया कि उन्हें कहीं से कोई फोन नहीं किया गया. बात हो ही रही थी कि फोन आने का संकेत मिला. मैं ने फोन काट कर दोबारा फोन उठाया तो दूसरी ओर नजमा थी. उस ने कहा कि वह एक्सचैंज फोन करने की कोशिश कर रही थी, पर कामयाब नहीं हुई, क्योंकि टेलीफोन करने के चक्कर में रिसीवर नीचे गिर गया. डायल में कोई खराबी आ गई है. वहां फोन नहीं लगा. बड़ी मुश्किल से न जाने कैसे आप को लग गया. वह रो रही थी और मिन्नतें कर रही थी कि उसे किसी तरह बचा लें, कहीं अगवा करने वाला आ न जाए.

हम कितने बेबस थे. एक मजबूर लड़की की फरियाद सुन रहे थे, पर उस के लिए कुछ कर नहीं पा रहे थे. वह बारबार कह रही थी, ‘‘अब फोन काटना मत, वरना दोबारा फोन नहीं मिल पाएगा.’’

उसी बीच डीएसपी और एसपी साहब भी आ गए थे. याकूब अली का ड्राइंगरूम थाने का औफिस बन गया था. पूरी स्थिति जानने के बाद एसपी साहब ने कहा, ‘‘डीसी साहब का सख्त आदेश है कि किसी भी तरह जल्दी से जल्दी लड़की की तलाश की जाए.’’

उसी समय नजमा के मांबाप भी दाखिल हुए. नजमा फोन पर थी. उस की आवाज सुन कर उस की मां जोरजोर से रोने लगी. तभी नजमा ने चीखते हुए कहा, ‘‘वह आ गया है, गाड़ी की आवाज आ रही है, वह किसी कमरे का दरवाजा खोल रहा है, उस के कदमों की आवाज साफ सुनाई दे रही है.’’

मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘मिस नजमा, हौसले से काम लो. मैं तुम से वादा करता हूं कि मैं तुम्हें जरूर बचाऊंगा.’’

इसी के साथ मुझे दूर से गाडि़यों और हौर्न की आवाजें आती सुनाई दीं. इस का मतलब वह घर किसी बड़ी सड़क के किनारे था, जिस से बड़ी गाडि़यां और ट्रक गुजरते थे. तभी उस की धीमी आवाज आई, ‘‘कोई दरवाजा खोल रहा है.’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘रिसीवर क्रेडिल के बजाय नीचे रख दो और खिड़की के टूटे शीशे के सामने खड़ी हो जाओ.’’

उसी वक्त रिसीवर के नीचे गिरने की आवाज आई. शायद नजमा ने घबराहट में रिसीवर छोड़ दिया था. इस के बाद दरवाजा खुलने और किसी मर्द के कुछ कहने की आवाज आई. वह क्या कह रहा था, यह समझ में नहीं आ रहा था. इस के बाद दरवाजा बंद हुआ और बातें खत्म हो गईं. अब बस ट्रैफिक का शोर सुनाई दे रहा था. एक तरकीब मेरे दिमाग में आई. मैं ने एसपी साहब से पूछा, ‘‘सर, आप की जीप में वायरलैस और रिसीवर है?’’

उन्होंने कहा, ‘‘हां है.’’

मैं ने भाग कर उन के ड्राइवर के पास जा कर कहा, ‘‘जल्दी से जीप का साइलैंसर निकाल दो.’’

इस के बाद साहब से कहा, ‘‘मैं ने साइलैंसर निकलवा दिया है. मैं इस जीप से शहर की सड़कों पर गुजरूंगा. आप अपना कान इस टेलीफोन से लगाए रखें. जब और जहां आप को हमारी जीप की आवाज सुनाई दे, आप वायरलैस से हमें खबर कर दें.’’

बात डीएसपी साहब की समझ में आ गई. उन्होंने हैरत से मुझे देखा. एसपी साहब भी खुश और जोश में नजर आए. मैं कुछ बंदों के साथ फौरन जीप से रवाना हो गया. रात के साढ़े 10 बज रहे थे, पर सड़कें जाग रही थीं. मैं ने वायरलैस चालू कर के एक सबइंसपेक्टर को पकड़ा कर बैठा दिया. मैं ने वे सड़कें चुनी, जहां से भारी वाहन गुजरते थे. जीप तेजी से सड़कों पर दौड़ रही थी. उस के शोर से लोग मुड़ कर देख रहे थे. आधा घंटे तक कुछ हासिल नहीं हुआ. मायूसी बढ़ रही थी कि अचानक वायरलैस जाग उठा. दूसरी ओर मेरा सबइंसपेक्टर बोला, ‘‘हैलो साहब थोड़ी देर पहले जीप के इंजन की आवाज सुनाई दी थी. पर अब नहीं सुनाई दे रही है.’’

मैं ने कहा, ‘‘हसन, हम जीप पीछे करते हैं, तुम फिर बताओ.’’

हम धीरेधीरे जीप पीछे करने लगे. हम थोड़ा पीछे लौटे थे कि उस की आवाज आई, ‘‘जी साहब, अब आवाज आ रही है.’’

हम थोड़ा और पीछे चले तो उस ने कहा, ‘‘अब ज्यादा तेज आवाज आ रही है.’’

हम ने जीप वहीं रोक दी.

सामने एक बड़ी सी कोठी थी. अपने 2 सिपाहियों और एक सबइंसपेक्टर को बाहर होशियारी से ड्यूटी देने के लिए कह कर कहा कि अगर फायर की आवाज आए तो तुरंत अंदर आ जाना. इस के बाद मैं ने गेट से अंदर झांका. चौकीदार वगैरह नहीं दिखाई दिया. गैराज में एक कार खड़ी थी, चारदीवारी ज्यादा ऊंची नहीं थी.

मैं आसानी से अंदर कूद गया. गहरा सन्नाटा और अंधेरा था. धीरेधीरे मैं कोठी की ओर बढ़ा. अचानक मेरे ऊपर हमला हुआ तो मैं फर्श पर गिर पड़ा. उस के हाथ में कोई लंबी वजनी चीज थी. जैसे ही उस ने मारने के लिए उठाया, मैं ने जोर से उस के पेट पर एक लात मारी. चोट करारी थी, वह पीछे दीवार से जा टकराया. जल्दी से खड़े हो कर मैं ने देखा, उस के हाथ में बैट था. जैसे ही उस ने मारने को बैट उठाया, मैं ने तेजी से एक बार फिर उस के पेट पर लात मारी. वह गिर पड़ा तो एक लात और उस के मुंह पर जमा दिया.

वह चकरा कर पलटा. एक और वार में वह बेसुध हो गया. तभी किसी ने पीछे से जोरदार धक्का दिया. इस के बाद वह मेरी कमर से लिपट गया. मैं ने फुरती से रिवौल्वर निकाली और हवाई फायर कर दिया. हमलावर ठिठका तो मैं ने पलट कर एक जोरदार घूंसा उस के मुंह पर मारा तो वह घुटनों के बल बैठ गया.  जैसा मैं ने साथियों से कहा था, फायर की आवाज सुनते ही वे अंदर आ गए. उन्होंने उसे पकड़ लिया और अंदर ले गए. अंदर सारी लाइटें जला दी गईं. वह काफी बड़ी कोठी थी. सामान ज्यादा नहीं था, लेकिन जो था, उस से लगा कि कोई स्टूडैंट वहां रहता है.

मैं ने सबइंसपेक्टर से तलाशरी लेने को कहा. पल भर बाद वह एक खूबसूरत 17-18 साल की लड़की को ले कर मेरे सामने आ खड़ा हुआ. वह सलवारकमीज पहने थी, पैरों में जूती नहीं थी. वह काफी घबराई हुई थी.

वह कुछ कहना चाहती थी कि तभी एसपी, डीएसपी कुछ सिपाहियों के साथ आ पहुंचे. उन के साथ लड़की के घर वाले भी थे. लड़की मां से लिपट गई. वह नौजवान, जिस ने मुझ पर बाद में हमला किया था, उस की ठोड़ी से खून बह रहा था. उसे देख कर इनायत खां चीखा, ‘‘यही है वह कमीना शारिक, इसी ने मेरी बेटी को अगवा किया था.’’

रात करीब 1 बजे हम थाने लौटे. उसी समय डीसी साहब का फोन आ गया. उन्हें खबर दे दी गई थी कि लड़की मिल गई है, मुलजिम पकड़े गए हैं. याकूब अली के बेटे शारिक ने अपने दोस्त गुरविंदर के साथ इस वारदात को अंजाम दिया था. यह किस्सा कुछ यूं था. गुरविंदर सिंह कालेज में आखिरी साल में था. वह स्टूडैंट यूनियन का अध्यक्ष था. उस के साथ मिल कर शारिक ने यह काम किया था. डीसी साहब ने सब को बधाई और शाबासी दी.

मेरा सिर दर्द खत्म हो गया था. लड़की मिल गई थी, पर मुझे लग रहा था कि अभी कोई बात मुझ से छिपी हुई है. बात कुछ और भी है. डीसी का इस मामले में इतना ज्यादा इंट्रैस्ट लेना मेरी समझ में नहीं आ रहा था. शारिक और गुरविंदर सिंह से पूछताछ की तो बात खुल कर सामने आई कि अपहरण वाले दिन दोपहर को शारिक के औफिस नजमा ने फोन किया था कि बहुत बड़ी मुश्किल आ गई है, वह जल्दी से जल्दी उस से मिले. शारिक औफिस से छुट्टी ले कर नजमा से मिलने पहुंच गया. दोनों एक नजदीक के पार्क में मिले तो नजमा ने रोते हुए बताया कि उस का सौतेला बाप उस की शादी चंद घंटों के अंदर कहीं और कर रहा है. यह सुन कर शारिक हैरान रह गया.

2 महीने में उन दोनों की शादी होने वाली थी, जिस की तैयारियां भी चल रही थीं. नजमा ने आगे बताया कि उस के अब्बा बहुत परेशान थे. 2-3 बार उन्हें एक कार ले जाने और छोड़ने आई थी. बारबार फोन आ रहे थे. थोड़ी देर पहले उस ने अम्मीअब्बू की बातें छिप कर सुनी थीं. अब्बू अम्मी को समझाने की कोशिश कर रहे थे, ‘‘रईसा, हमें नजमा की शादी वहां करनी ही पड़ेगी, वरना हम कौड़ीकौड़ी को मोहताज हो जाएंगे. लड़की के बारे में मत सोचो, अपने और अन्य बच्चों के बारे में सोचो. शादी करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है.’’

इस के बाद अम्मी रोते हुए बोलीं, ‘‘मेरी बिटिया का क्या होगा, दुनिया क्या कहेगी?’’

अब्बू ने कहा, ‘‘उस की तुम फिकर मत करो, सब हो जाएगा. शादी कर के हम 2 महीनों के लिए कश्मीर चले जाएंगे. इतने दिनों में लोग सब भूल जाएंगे.’’

काफी बहस के बाद अम्मी मजबूरी में उस की इस शादी के लिए राजी हो गईं. कुछ ही घंटे में नजमा को किसी अजनबी आदमी के हवाले करने की बात तय हो गई. शारिक नजमा की बातें सुन कर दंग रह गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी महबूबा को क्या और कैसे तसल्ली दे? बेहद परेशानी की इस हालत में वह एक होटल में जा बैठा. वहां उस के पक्के दोस्त गुरविंदर सिंह से उस की मुलाकात हो गई. उस ने उस की परेशानी की वजह पूछी तो उस ने दुखी मन से सारी बात बता दी.

गुरविंदर सिंह ने उस का दुख सुना और चुपचाप वहां से उठ कर चला गया. वह सीधे नजमा के घर पहुंचा और अपनी 2 सीटर गाड़ी कोठी के पीछे खड़ी कर के थोड़ी देर हालात जांचता रहा. इस के बाद मौका देख कर खिड़की से नजमा के कमरे में दाखिल हो गया और बड़ी होशियारी से उसे बेहोश कर के अपनी कोठी में ले कर आ गया. उसे एक कमरे में बंद कर के खुद शारिक की तलाश में निकल गया. इस बीच नजमा को होश आ गया तो उस ने शारिक के घर फोन कर दिया. इस के बाद वह शारिक को ले कर वापस आया तो उसे देख कर नजमा हैरान रह गई. गुरविंदर सिंह ने दोनों को सलाह दी कि वे उस के गांव चले जाएं, वहां वे पूरी तरह से सुरक्षित रहेंगे. उस का बाप एक बड़ा जमींदार और रसूखदार आदमी था.

क्या किया जाए, अभी वे लोग सोच ही रहे थे कि मैं वहां पहुंच गया. लेकिन अभी भी कुछ बातें मुझे उलझन में डाल रही थीं. नजमा का बाप चुपचाप फौरन उस की शादी क्यों कर रहा था? उन लोगों ने शारिक से शादी का इरादा क्यों बदल दिया था? अंग्रेज डीसी इस मामले में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा था? अब तक उस के करीब 10-12 फोन आ चुके थे. शायद एसपी साहब जानते हों, पर उन्होंने कुछ बताया नहीं था.  इसी उधेड़बुन में मैं टहलता हुआ मुंशी के कमरे की तरफ निकल गया. वहां 2 लोग अपनी लड़कियों के गायब होने की रिपोर्ट लिखा रहे थे. वे लड़कियां रोजाना कालेज की बस से घर आती थीं, पर आज बस ही नहीं आई थी.

उन लोगों ने कालेज जा कर पता किया तो जानकारी मिली कि बस लड़कियों को ले कर कालेज से चली गई थी. पूरी बात बताने में कालेज का स्टाफ टालमटोल कर रहा था. वे दोनों झिकझिक कर रहे थे कि कुछ और पैरेंट्स वहां आ गए. उन की भी लड़कियां घर नहीं पहुंची थीं. वे सब भी परेशान थे. 4 बजे के करीब उन्हें बताया गया कि बस मिल गई है और लड़कियां एक घंटे में घर पहुंच जाएंगी. कुछ देर में कालेज की अंग्रेज प्रिंसिपल आ गई. उस ने बताया कि गर्ल्स कालेज की बस में 2 गुंडे सवार हो गए थे. वे ड्राइवर को पिस्तौल दिखा कर बस को वीराने में ले गए हैं, पर खतरे की कोई बात नहीं है. उन्होंने किसी लड़की को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है. वे रुपए की मांग कर रहे हैं. कमिश्नर साहब ने उन की बात मान ली है. थोड़ी देर में बस वापस कालेज पहुंच जाएगी.

कुछ पैरेंट्स वापस जाने लगे तो उन्हें यह कह कर रोक लिया गया कि एसपी साहब के आदेश के अनुसार किसी को जाने की इजाजत नहीं है, लड़कियों के आने तक सभी को यहां रुकना पड़ेगा. इस के बाद जो भी अपनी लड़कियों के बारे में पूछने आया, उसे वहीं रोक लिया गया. रात 8 बजे बाहर से आने वाले एक आदमी से पता चला कि एक लेक्चरार और एक लड़की को जख्मी हालत में अस्पताल में भरती कराया गया है. उन की हालत हर किसी से छिपाई जा रही है.

रिपोर्ट लिखाने वाले दोनों आदमी सगे भाई थे और वकील थे. बड़े भाई की 2 लड़कियां बस में बंधक थीं. दोनों बड़ी होशियारी से कालेज से निकल कर थाने पहुंच गए थे. मैं ने जब उन की बातें सुनीं तो लगा कि मामला बड़ा गंभीर है. लड़कियों से भरी बस 2 गुंडों के रहमोकरम पर थी. किसी वजह से पुलिस सख्त काररवाई करने से बच रही थी और पूरे मामले को छिपाने की कोशिश कर रही थी. परेशान पैरेंट्स को कालेज में ही रोक लिया गया था, ताकि बात खुले न.

उसी वक्त एक सबइंसपेक्टर ने आ कर बताया कि डीएसपी साहब बुला रहे हैं. मैं अंदर पहुंचा तो वे काफी परेशान थे. एक चिट देते हुए वह मुझ से बोले, ‘‘नवाज खान इस आदमी को अभी गिरफ्तार करो.’’

मैं ने चिट देखी, उस पर अरुण अग्रवाल एडवोकेट लिखा था, साथ ही उस का पता भी लिखा था. यह अरुण अग्रवाल वही आदमी था, जो मुंशी के पास लड़कियों की गुमशुदगी लिखवा रहे थे. मैं ने पूछा, ‘‘सर, आखिर यह मामला क्या है?’’

डीएसपी ने रूखे स्वर में कहा, ‘‘मामले के चक्कर में मत पड़ो. बस समझो टौप सीके्रट है.’’

अब मुझे इस पूरे मामले से दहशत होने लगी थी. मैं ने आगे झुक कर दृढ़ता से कहा, ‘‘सर, कुछ टौप सीक्रेट नहीं है. आप क्यों एक बिगड़े हुए मामले को और बिगाड़ रहे हैं?’’

डीएसपी साहब नाराज हो कर बोले, ‘‘तुम्हें क्या मालूम, क्या मामला है?’’

मैं ने कहा, ‘‘जनाब, मुझे पता है. 2 गुंडों ने कालेज की बस अगवा कर ली है. 2 लोगों को जख्मी भी कर दिया है और बाकी लड़कियों की जिंदगी खतरे में है. जब मुझे पता है तो और लोगों को भी पता होगा. आप को मालूम नहीं कि अभी थोड़ी देर पहले अरुण अग्रवाल इस मामले की रिपोर्ट लिखवा रहा था. आप ने और्डर देने में थोड़ी देर कर दी.’’

एसपी और ज्यादा परेशान हो गए. मुझ से बैठने को कह कर बोले, ‘‘मुझे लगता है नवाज खान, तुम्हें सारी बात बता देनी चाहिए. जैसा कि तुम जानते हो, बस अगवा हो चुकी है और उस में गोली भी चल गई है, जिस से एक लेक्चरार और एक स्टूडैंट घायल हो गई हैं. स्थिति यह है कि बस में सिर्फ एक बदमाश है. उस का नाम बदरु है. वह सनकी और खतरनाक आदमी है.

‘‘बस अगवा करने के बाद उस ने एक बड़ी अजीब सी मांग रखी है. उस का कहना है कि एक लड़की, जो उस की महबूबा है, उसे उस के हवाले कर दिया जाए. वह उस के बिना जिंदा नहीं रह सकता. और वह लड़की कोई और नहीं, इनायत खां की बेटी नजमा है.

‘‘बदरू काफी दिनों से उस के पीछे पड़ा था. कुछ दिनों पहले उस ने नजमा को रास्ते में परेशान भी किया था. उस पर उस के भाइयों ने बदरू की जम कर पिटाई की थी. पर वह बहुत ढीठ और जिद्दी है. वह सिर्फ नजमा को अगवा करने के लिए बस में घुसा था. लेकिन नजमा बस में नहीं थी, क्योंकि कल वह कालेज नहीं गई थी.

‘‘नजमा को न पा कर वह गुस्से से पागल हो गया और ड्राइवर के सिर पर पिस्तौल रख कर उसे वीराने में चलने को मजबूर किया. अब वह बस सड़क से हट कर वीराने में झाडि़यों के बीच खड़ी है. बस का कंडक्टर किसी तरह से भागने में कामयाब हो गया. उसी ने कालेज जा कर इस घटना की सूचना दी.

‘‘मैं ने खुद मौके पर जा कर बदरू से बात की. वह आधा पागल है. उस के पास एक हथगोला और भरी पिस्तौल है. उस ने मुझे खिड़की से बम दिखाया था. वह एक ही बात कह रहा है कि उसे उस की महबूबा नजमा और 5 लाख रुपए चाहिए. वह अन्य किसी लड़की को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा. उस की मांग पूरी कर दो.’’

‘‘जनाब, क्या आप ने उस की मांग पूरी करने का फैसला कर लिया है?’’

‘‘हां, शायद उस की मांग पूरी करनी ही पड़ेगी.’’ उन्होंने कहा.

मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ. इस का मतलब नजमा के मांबाप को मजबूर किया जा रहा था कि वे अपनी बेटी एक गुंडे के हवाले कर दें. क्या हमारी पुलिस इतनी नकारा हो चुकी थी कि जिन लोगों का काम रक्षा करना है, वही उन्हें मौत की तरफ धकेल रहे थे. मैं ने कहा, ‘‘सर, इस तरह के हादसे तो होते ही रहते हैं. क्या एक गुंडे की खातिर कानून की धज्जियां उड़ाई जाएंगी.’’

‘‘नवाज खान, तुम सही कह रहे हो, पर हम लोग ऐसा करने को मजबूर हैं, क्योंकि डिप्टी कमिश्नर साहब की बेटी और नवासी भी उसी बस में हैं. उन की बेटी गर्ल्स कालेज में लेक्चरार है. उस के साथ उस की 3 साल की बच्ची भी है. डीसी साहब के लिए उन दोनों की जिंदगी हर चीज से ज्यादा प्यारी है.

‘‘अभी 3-4 महीने पहले उन की बीवी एक बम धमाके में मारी गई थी. अभी वह इस सदमे से उबरे भी नहीं हैं कि यह हादसा हो गया. वह बेहद डरे हुए हैं. उन का आदेश है कि कुछ भी हो, उन की बेटी और नवासी को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए. उन की बेटी और नवासी आगे की सीट पर हैं. अगर हम बदरू पर काररवाई करते हैं और वह हथगोला फेंकता है तो अगली 3-4 सीटों पर एक भी सवारी जिंदा नहीं बचेगी.

‘‘डिप्टी कमिश्नर साहब और कमिश्नर साहब ने और्डर दिया है कि मामले को बिलकुल खुफिया रखा जाए. जैसे भी हो, बदरू की मांग पूरी की जाए. इसलिए कल दोपहर डिप्टी कमिश्नर साहब ने खुद नजमा के अब्बू इनायत खां से बता की थी.

‘‘फिर उसे कमिश्नर साहब के पास ले गए थे. दोनों इस मामले को शांति से हल करना चाहते हैं. चाहे इस के लिए कोई भी कीमत अदा करनी पड़े. भले वह नजमा ही क्यों न हो. यह मामला करीबकरीब हल भी हो चुका था, लेकिन शाम को नजमा गायब हो गई. हम सब उस की तलाश में लग गए. देर रात वह हमें मिल भी गई.’’

मैं अंग्रेज अफसर की सोच पर हैरान था. अपने खून को बचाने के लिए कानून को बेबस कर के मासूम की कुरबानी को राजी था. मैं ने एसपी साहब से पूछा, ‘‘अब क्या प्रोग्राम है?’’

एसपी साहब ने कहा, ‘‘अभी डेढ़ बज रहे हैं. ठीक 5 मिनट बाद कमिश्नर साहब की कार हमें लेने आ रही है. उन से मीटिंग के बाद ही कुछ तय हो सकेगा?’’

मैं ने कहा, ‘‘जनाब, यह बात काफी लोगों को मालूम हो चुकी है. अगर इस मामले को इस तरह से हल किया गया तो पुलिस की बड़ी बदनामी होगी. मेरा खयाल है कि इस शर्मनाक समझौते के बजाय हमें हालात का मुकाबला बहादुरी से करना चाहिए. इस के लिए मैं सब से पहले खुद को पेश करता हूं.’’

थोड़ी देर इस बात पर बहस होती रही. एसपी साहब किसी भी काररवाई के सख्त खिलाफ थे. उन का कहना था कि एक तो इस तरह हम अपनी जान भी खतरे में डालेंगे, दूसरे यह कमिश्नर साहब और डिप्टी कमिश्नर साहब के और्डर के खिलाफ होगा. उन्होंने मुझे एक फाइल पढ़ने को दी है.’’

उसी वक्त गाड़ी आ गई. दोनों अफसर कमिश्नर साहब के पास चले गए. मैं फाइल देखने लगा. इस में बदरू के बारे में जानकारी थी. वह मैट्रिक फेल नौजवान था. मांबाप मर चुके थे, मोहल्ले में वह आवारा और चरसी के रूप में मशहूर था. फिल्मों का बेहद शौकीन था. अभी मैं फाइल पढ़ ही रहा था कि बाहर से चीखपुकार की आवाजें आने लगीं. मैं बाहर आया तो शोर लौकअप की ओर से आ रहा था. गुरविंदर सिंह ने शारिक को जकड़ रखा था. वह सलाखों से अपना सिर टकरा रहा था. उस की पेशानी से खून बह रहा था, ‘‘मुझे छोड़ दे गुरविंदर, मुझे मर जाने दे. मैं जी कर क्या करूंगा?’’

लौकअप खोल कर 3-4 सिपाही अंदर घुसे. उन लोगों ने शारिक को पकड़ा तो अचानक गुरविंदर छलांग लगा कर लौकअप से बाहर निकल गया. मैं दरवाजे पर ही था. अगर मैं जरा भी चूकता तो वह निकल भागता. उसे दबोच कर लौकअप के अंदर किया. वह बहुत गुस्से में था. उस ने कहा, ‘‘मुझे जाने दो, मुझे नजमा को बचाना है, नहीं तो मेरा यार मर जाएगा.’’

उस की आंखों में आंसू चमक रहे थे. फिर वह शारिक से लिपट कर बोला, ‘‘मुझे माफ कर यार, देख ले मैं कितना मजबूर हूं.’’

अजीब परेशान करने वाले हालात थे. एक बेगुनाह लड़की और उस की मां पर जुल्म हो रहा था. उस का आशिक अलग मरने को तैयार था. दोस्त हर खतरा उठाने को राजी था. और जुल्म करने वाले वे थे, जिन्हें बचाना चाहिए था यानी कानून के रखवाले. मैं ने फैसला कर लिया कि मैं इन लोगों के लिए जरूर कुछ करूंगा, भले ही मुझे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़े. इस के लिए मुझे उन 2 जख्मी औरतों से मिलना था. रात ढाई बज रहे थे, पर जाना जरूरी था. आज का दिन और रात इन्हीं हंगामों में गुजरी. मैं अस्पताल पहुंचा.

ड्यूटी पर तैनात डाक्टर ने पहले तो मुझे मिलने से रोका, पर मैं ने कहा कि बहुत जरूरी है तो वह मुझे लड़की के पास ले गया. लड़की बिस्तर पर लेटी थी. थोड़ी देर पहले उस का एक छोटा सा औपरेशन हुआ था. पर वह होश में थी. थरसिया नाम की वह एंग्लोइंडियन लड़की सेकैंड ईयर की स्टूडैंट थी. पहले मैं ने उस का हाल पूछा, इस के बाद बड़े प्यार से उस से बातें करने लगा. उस ने मुझे बताया कि वह बड़ा गुस्सैल आदमी है. लगातार सिगरेट पीता है. पूरी बस में चरस की बदबू फैली हुई थी, जिस में सांस लेना मुश्किल था.

लड़की ने डिटेल में बस के अंदर की स्थिति बताई. बदरू ने बड़ी होशियारी से बस को कब्जे में किया हुआ था. उस ने आगे की 2-3 सीटें खाली करा ली थीं. ड्राइवर को सब से पिछली वाली सीट पर भेज दिया था. बस के दरवाजे की सिटकनी अंदर से लगा दी थी. बस में एक ही दरवाजा था. उस के एक हाथ में पिस्तौल और दूसरे में हथगोला था. लड़कियों को धमकाता रहता था. न खुद कुछ खाया, न किसी को कुछ खाने दिया.

मैं ने लड़की से उस के जख्म के बारे में पूछा तो वह बोली, ‘‘इंसपेक्टर साहब, वह चरस के नशे में लड़कियों से बेहूदा हरकतें कर रहा था. मुझ से बरदाश्त नहीं हुआ तो मैं ने मना किया. वह मेरे पीछे पड़ गया. मुझे बाजुओं से पकड़ कर अगली सीट पर ले जाने लगा. लेक्चरार जो वहीं थी, उन्होंने उस पर अपना पर्स दे मारा. लेकिन पिस्तौल नहीं गिरा. उस ने उन पर गोली चला दी, जो बाजू में लगी. वह सीटों के बीच गिर पड़ीं. मैं ने उस बास्टर्ड के लंबे बाल पकड़ लिए. अगर उस वक्त कोई अन्य लड़की मदद को आ जाती तो हम उस का तियापांचा कर देते. लेकिन सभी इतनी डरी हुई थीं कि कोई भी आगे नहीं बढ़ी. उस ने फिर गोली चला दी, जो मेरी जांघ में लगी. उस के बाद अस्पताल पहुंच कर मुझे होश आया.’’

मैं लड़की से बातें कर रहा था कि डाक्टर ने आ कर मुझ से कहा, ‘‘पुलिस स्टेशन से आप का फोन आ गया है.’’

मैं ने जा कर फोन रिसीव किया. एसपी साहब ने मुझे फौरन बुलाया था. मैं समझ गया कि मीटिंग में कोई खास फैसला हुआ है. जब मैं वहां पहुंचा तो एसपी साहब ने कहा, ‘‘नवाज खान, कमिश्नर साहब ने हमें एक कोशिश करने की इजाजत दी है, लेकिन बहुत मुश्किल से. उन का आदेश है कि सवारियों में से किसी का भी कोई नुकसान नहीं होना चाहिए. मैं ने उन्हें यकीन दिलया है और वादा किया है कि ऐसा ही होगा. हम ने एक प्लान बनाया है. क्या तुम इस के लिए अपनी मरजी से खुद को पेश कर सकते हो?’’

‘‘जनाब, मैं तो पहले ही खुद को पेश कर चुका हूं, आदेश दीजिए कि मुझे करना क्या है?’’ मैं ने बड़े ही आत्मविश्वास से कहा.

एसपी साहब ने सारा प्लान मुझे समझाया. उस वक्त 3 बज रहे थे. प्लान बहुत ज्यादा महत्त्व का तो नहीं था, पर नजमा, शारिक और गुरविंदर के लिए कुछ करने का मौका था. सुबह के साढे़ 4 बज रहे थे. सख्त सर्दी थी. चारों ओर गहरा अंधेरा था. कुत्तों के भौंकने की आवाज कभीकभी सुनाई दे रही थी. हम झाडि़यों के बीच खड़े थे. 30 गज के फासले पर बस हलकी सी दिखाई दे रही थी, जिस में कालेज की लड़कियां लेक्चरार और एक 3 साल की बच्ची पिछले 14 घंटे से जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी.

मेरे साथ पुलिस के 6 जवान 2 इंसपेक्टर और कई सबइंसपेक्टर थे. मैं अभीअभी वहां पहुंचा था. लेकिन बाकी के लोग शाम से ही वहां जमे थे. मैं ने उन से अब तक की प्रगति के बारे में पूछा. उस के बाद मैं बस तक जाने को तैयार हो गया. मैं आम सिपाही की ड्रैस में था. हाथों में एक बड़ा टिफिन था, जिस में 2-3 आदमियों का खाना था. दरअसल, बदरू ने करीब डेढ़ घंटे पहले भूख से बेहाल हो कर खाने की फरमाइश की थी. उस की यही फरमाइश मीटिंग में इस काररवाई का सबब बनी थी. 14 घंटों में पहली बार कोई आदमी बस के करीब जा रहा था.

इस से पहले शाम को 2 सिपाही जख्मी औरतों को बस के बाहर से उठा कर लाने के लिए गए थे, लेकिन उस वक्त उजाला था. किसी काररवाई का मौका नहीं था. चांद की रोशनी में बस का साया किसी भूत की तरह लग रहा था. एक इंसपेक्टर ने थोड़ा आगे बढ़ कर जोर से चिल्ला कर कहा, ‘‘बदरू, सिपाही खाना ला रहा है, ले लो.’’

कोई जवाब नहीं आया, केवल खिड़की का शीशा खोलने की आवाज आई. मैं धड़कते दिल के साथ झाडि़यों में से निकला और टिफिन ले कर बस की ओर बढ़ा. हमारे मंसूबों की कामयाबी इस बात पर निर्भर करती थी कि बदरू खुद खाना लेने के लिए हाथ बाहर निकाले या कम से कम खिड़की में नजर आए. मैं नपेतुले कदमों से बस के करीब पहुंचा. अपने रिवाल्वर को हाथ लगा कर देखा. बस के करीब पहुंच कर मैं ने टिफिन ऊपर उठाया. उस वक्त मेरी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया, जब खिड़की में एक लड़की का डरासहमा चेहरा दिखाई दिया. उस ने हाथ बढ़ा कर मुझ से टिफिन थाम लिया.

बस के अंदर अंधेरा था. किसी के रोने की आवाज आ रही थी. उसी वक्त मुझे लड़की के सिर के ऊपर 2 लाल चमकती आंखें और मुलजिम का सिर दिखाई दिया. वह झाडि़यों में छिपे किसी दरिंदे की तरह लग रहा था. मैं ने जरा पीछे हट कर बस के दरवाजे पर दबाव डाला, वह बंद था. अब लौट आने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. देरी मुलजिम को शक में डाल सकती थी. मुरदा कदमों के साथ मैं लौट आया. एसपी साहब वायरलैस पर रिपोर्ट का इंतजार कर रहे थे. मैं ने उन्हें नाकामी की खबर दी. उन्होंने फैसला सुना दिया, ‘‘नवाज खान, अब तुम लौट आओ. कमिश्नर साहब ने सख्त हिदायत दी है कि इस के आगे कोई काररवाई नहीं होगी. उन का आदेश है कि तुम तुरंत थाने पहुंचो. इनायत खां से बात हो चुकी है, वह राजी है. उन का आदेश है कि बस की लड़कियों को जल्द से जल्द रिहा कराया जाए.’’

मैं एसपी साहब की बात का मतलब अच्छी तरह समझ रहा था. एक मासूम लड़की को एक दरिंदे के हवाले किया जा रहा था. मेरा दिमाग भन्ना गया. लानत है ऐसी नौकरी और ऐसी जिंदगी पर. यह समझौता नहीं, कत्ल था. मैं ऐसा नहीं होने दूंगा, ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, मेरी नौकरी और जान चली जाएगी या डिप्टी कमिश्नर की बेटी और नवासी को नुकसान पहुंचेगा. पर मैं यह जुल्म नहीं होने दूंगा.

मैं ने एक फैसला किया और अपनी जगह पर खड़ा हो गया. एक सबइंसपेक्टर ने पूछा, ‘‘क्या हुआ जनाब?’’

‘‘कुछ नहीं, मैं वापस थाने जा रहा हूं. एसपी साहब ने बुलाया है.’’

साथियों से अलग हो कर मैं सड़क की ओर आया और बाएं घूम कर झाडि़यों में दाखिल हो गया. करीब एक फर्लांग का चक्कर काट कर मैं बस की दूसरी तरफ निकला. अब मैं अपनी काररवाई के लिए आजाद था. इस काररवई का इरादा ही मेरी कामयाबी थी. मैं सुकून में था. जब इंसान खतरे में कूदने की ठान ले तो रास्ता आसान लगता है. मेरा खौफ, डर सब खत्म हो चुका था. डीसी साहब चूंकि अभी एक दुख उठा चुके थे, इसलिए वह जरूरत से ज्यादा डरे हुए थे. यह डर वक्त गुजरने के साथसाथ बढ़ता जा रहा था. अब नौबत यहां तक आ पहुंची थी कि इस मसले पर एसपी और डीएसपी साहब बहुत गंभीर नजर आने लगे थे. कोई भी जरा सा रिस्क लेने को तैयार नहीं था.

मैं ने वरदी उतारी और लपेट कर झाडि़यों में छिपा दी. इस के बाद धीरेधीरे आगे बढ़ने लगा. मैं कोहनियों और घुटनों के बल रेंगता रहा. बस के करीब पहुंच कर बस के पहियों के बीच से निकल कर ड्राइविंग सीट की तरफ से बाहर निकल आया. बस के बगल में छिप कर मैं ने अंगुली से लोहे की चादर को बजाया. ठकठक की आवाज पैदा की. थोड़ा रुक कर फिर ठकठक की. इस बार चलने और बड़बड़ाने की आवाज आई. मैं एकदम अलर्ट था. मैं बैठा हुआ था. सिर ऊंचा था, नजर खिड़की पर जमी थी. मुझे खिड़की से किसी की ठोढ़ी और नाक की चोंच नजर आई. बदरू आवाज की वजह जानने को नीचे झांक रहा था.

लेकिन उस ने गरदन खिड़की से बाहर निकालने की गलती नहीं की. फिर भी मैं उस की जगह जान चुका था. बहुत तेजी से अपनी जगह पर उछल कर खड़ा हो गया और उस के बाल मुट्ठी में पकड़ लिए. इस के पहले कि वह कुछ समझ पाता, मैं ने एक जोरदार झटका दिया, जिस से उस का आधा धड़ खिड़की से बाहर आ गया. उस के दाएं हाथ में हथगोला बम मुझे दिखाई दिया. उसी समय बस में लड़की की चीखें गूंजी. उन में भगदड़ मच गई. मैं ने बहुत नफरत और गुस्से से दूसरा झटका मारा तो झनाके की आवाज से खिड़की का शीशा टूट गया और बदरू कांटे में फंसी मछली की तरह तड़प कर नीचे आ गिरा. वह अपना दायां हाथ मुंह की तरफ बढ़ा रहा था.

अगर वह कामयाब हो जाता तो तबाही मच जाती. मैं ने उस की दाहिनी कलाई थाम कर बालों को जोर से झटका दिया. वह सैफ्टी पिन खींचने के लिए बम को अपने मुंह के करीब ला रहा था. मैं पूरी ताकत से उस का हाथ मुंह से दूर रखने की कोशिश कर रहा था. मैं ने बस की खिड़कियों में कुछ लड़कियों के खौफजदा चेहरे देखे, मैं ने चिल्ला कर कहा, ‘‘भाग जाओ तुम लोग.’’

मेरी आवाज सुन कर वे सब जैसे होश में आईं. अब तक कुछ लड़कियां दरवाजे की सिटकनी खोल चुकी थीं. फिर मैं ने लड़कियों के भागने की और चीखने की आवाजें सुनीं. मैं ने पूरी ताकत से बदरू का हाथ मरोड़ दिया. बम उस के हाथ से छूट कर नीचे गिर गया. बम जैसे ही नीचे गिरा, मैं ने खड़े हाथ का एक जोरदार वार उस की गरदन पर किया तो उस की पकड़ ढीली पड़ गई. मैं ने उस का सिर जमीन से टकराया तो कराह के साथ उस ने हाथपैर फेंक दिए. मुझे यकीन था कि वह एक घंटे से पहले होश में नहीं आएगा. उसी वक्त मैं ने बस के अंदर जूतों की ठकठक सुनी. मेरे साथी बस में दाखिल हो चुके थे. मैं तेजी से भागता हुआ वहां आया, जहां अपने कपड़े रखे थे. उन्हें उठा कर झाडि़यों की आड़ लेता हुआ सड़क पर आ गया.

कुछ अरसे बाद मैं इनायत खां की बेटी नजमा और शारिक की शादी में शामिल हुआ. दोनों खानदानों में सुलह हो चुकी थी. शादी खूब धूमधाम से हुई. शादी में पुलिस के बड़े अफसर और दूसरे विभाग के भी बड़े अफसर शामिल थे. दूल्हा अपने दोस्तों में खुश बैठा था. सब से ज्यादा गुरविंदर सिंह खुश था. निकाह हो चुका था. खाने का इंतजार हो रहा था. मेरे साथ ही बैठे एसपी साहब एक डाक्टर और जज साहब से बस वाले हादसे की डिटेल बता रहे थे. एसपी साहब कह रहे थे, ‘‘4 बजे सुबह हम बस पर छापा मारने ही वाले थे (वैसे छापे का कोई प्रोग्राम नहीं था) कि हालात एकदम बदल गए. उसी वक्त मुलजिम का एक साथी वहां पहुंचा. न जाने क्यों बदरू और उस का झगड़ा हो गया. लड़कियों ने उन दोनों को गुत्थमगुत्था देखा तो बस से भाग निकलीं.’’

बात खत्म होने पर एसपी साहब ने मुसकरा कर मेरी ओर देख कर कहा, ‘‘हमारे डिपार्टमेंट में कुछ ऐसे लोग हैं, जिन पर मुझे फख्र है.’’

इस के पहले जब भी इस हादसे का जिक्र हुआ था, उन्होंने मुझे मुसकरा कर तारीफी नजरों से देखा था. एक बार तो उन्होंने कह भी दिया था, ‘‘नवाज खां, कभी उस पतलून वाले का पता तो लगाओ, पुलिस में उस जवान को भरती कर लेंगे.’’

चुप रहने में ही मेरी भलाई थी. दरअसल एसपी जानते थे कि उस रात बदरू को मार कर बेहोश करने वाला मैं ही था. Hindi Stories

 

Social Stories Hindi: झूठी कहानी का अंजाम

Social Stories Hindi: षडयंत्रकारियों ने सोचा था कि सामूहिक दुष्कर्म जैसे मामले में पुलिस बिना जांच किए ही अभियुक्तों को पकड़ कर अंदर कर देगी. लेकिन पुलिस ने जांच की तो सामूहिक दुष्कर्म के इस मामले में जो झूठी कहानी सामने आई, जान कर दंग रह गई.

सुबह का आगाज होते ही लेगों की दिनचर्या शुरू हो गई थी. रात में शांत रहने वाली सड़कों पर लोगों और वाहनों की रफ्तार बढ़ने लगी थी. इसी के साथ एक घटना ने माहौल में अचानक गरमाहट पैदा कर दी थी. घटना भी ऐसी कि पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया था. जिले के एसएसपी से ले कर थानाप्रभारी तक सड़कों पर आ गए थे. दरअसल, 26 अगस्त, 2015 की सुबह उत्तर प्रदेश के संवेदनशील शहरों की सूची में शुमार मेरठ में खबर फैली कि एक हिंदू युवती के साथ मुसलिम युवकों ने सामूहिक दुष्कर्म किया है, जिसे बेहोशी की हालत में प्यारेलाल शर्मा जिला अस्पताल में भरती कराया गया है.

शहर चूंकि संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि वहां 2 समुदायों के बीच मामूली मारपीट से ले कर हत्या तक की वारदातों में सांप्रदायिक माहौल गरमा जाता है या यूं कहें कि इंसानियत और अमन के दुश्मन ऐसे मौकों का बेसब्री से इंतजार कर के तूल देने का काम किया करते हैं. इस मामले में भी अफवाहें जंगल की आग की तरह इतनी तेजी से फैलीं कि थोड़ी ही देर में अस्पताल में भीड़ लग गई. उस भीड़ में राजनैतिक दलों के पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं से ले कर सामाजिक संगठनों के लोग भी थे. उन में घटना को ले कर काफी गुस्सा था. वे आरोपियों के खिलाफ सख्त से सख्त काररवाई की मांग कर रहे थे.

मामला मेरठ के थाना देहली गेट का था. सूचना मिलने पर जिला अस्पताल पहुंचे थानाप्रभारी इंसपेक्टर दीपक त्यागी ने मामले की गंभीरता से पुलिस के आला अधिकारियों को अवगत करा दिया था. इसी सूचना पर एसएसपी डी.सी. दुबे, एसपी (सिटी) ओ.पी. सिंह और सीओ विनीत भटनागर भी अस्पताल पहुंच गए थे. भीड़ ने उन्हें बिगड़ती कानूनव्यवस्था को मुद्दा बना कर घेर लिया. घटना से माहौल तनावपूर्ण हो गया था. इस हालात में किसी भी अनहोनी से बचने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स और पीएसी बुला ली गई थी. पुलिस अधिकारियों ने सख्त काररवाई का वादा कर के किसी तरह हंगामा कर रहे लोगों को शांत किया.

मामला दुष्कर्म और 2 समुदायों से जुड़ा था, इसलिए माहौल गंभीर हो गया था. मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा और डीआईजी रमित शर्मा ने स्थिति की जानकारी ले कर अविलंब सख्त काररवाई करने के निर्देश दिए. पुलिस जानती थी कि अफवाहें चिंगारी बन कर आग लगाने का काम करती हैं और उन्हें रोकना कठिन होता है. वे काफी तेजी से फैलती हैं, जिन की वजह से काफी नुकसान हो जाता है. इसलिए पुलिस ने सख्त कदम उठाने का फैसला किया. सुरक्षा के मद्देनजर महिला पुलिसकर्मियों को भी अस्पताल बुलवा लिया गया था.

सामूहिक दुष्कर्म का शिकार युवती अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में लेटी अपनी बेबसी पर सिसक रही थी. बदनामी से खुद को बचाने के लिए उस ने आंखों को छोड़ कर अपने चेहरे को नीले रंग के दुपट्टे से ढका हुआ था. उस की आंखों में दहशत, बेचारगी और लाचारी के भाव साफ झलक रहे थे. उस के गले पर एक ऐसा लाल निशान भी उभरा था, जिसे देख कर लग रहा था कि यह दबाए जाने का निशान है. शायद उस का गला भी दबाया गया था. डाक्टर उसे ड्रिप लगा चुके थे. पुलिस अधिकारी उस के नजदीक पहुंचे तो वह हाथ जोड़ कर रोते हुए गिड़गिड़ाई, ‘‘सर, मुझे इंसाफ चाहिए. उन 3 हैवानों ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा, शुक्र था कि उन्होंने मुझे जिंदा छोड़ दिया, उन्हें सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए.’’

युवती के एकएक शब्द में दर्द झलक रहा था. सारे जहां की उदासी जैसे उस की बातों में सिमट आई थी. अधिकारियों ने उसे सांतवना दी. ‘‘निश्चिंत रहो, किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा.’’

वहां मौजूद हर आदमी की सहानुभूति युवती के साथ थी. उसे प्राथमिक मैडिकल ट्रीटमेंट देने वाले डा. यशवीर सिंह ने पुलिस को बताया था कि युवती को वहां अर्धबेहोशी हालत में ला कर भरती कराया गया था. पुलिस ने युवती से पूछताछ की तो उस ने अपने बयान में जो बताया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था. युवती के बताए अनुसार, उस का नाम पूजा था. वह दिल्ली के भजनपुरा की रहने वाली थी. नौकरी की तलाश में वह कुछ दिनों पहले मेरठ की कांशीराम आवासीय योजना के मकान नंबर केजी-25 में रहने वाले अपने चचेरे भाई चंदर के यहां आ गई थी.

करीब दस दिनों पहले उस के मोबाइल पर एक नंबर से मिसकाल आई. उस ने पलट कर उस नंबर पर फोन किया तो फोन करने वाले ने अपना नाम सलमान बताया. पूजा के लिए वह आदमी अंजान था, लेकिन बातों का ऐसा सिलसिला जुड़ा कि उस दिन के बाद दोनों अकसर फोन पर बातें करने लगे. उसी बातचीत में एक दिन पूजा ने कहा, ‘‘तुम्हें पता है, मैं दिल्ली से मेरठ क्यों आ गई?’’

‘‘तुम बताओगी, तब तो पता चलेगा.’’

‘‘मुझे नौकरी की जरूरत है. महंगाई के इस दौर में खर्चे पूरे करना मुश्किल हो गया है.’’

उस की इस बात पर सलमान ने हंसते हुए कहा, ‘‘बस, इतनी सी बात है.’’

‘‘मैं नौकरी के लिए कितना परेशान हूं और तुम्हें यह मामूली बात लग रही है?’’

‘‘हां, मेरे लिए यह मामूली ही बात है.’’ सलमान ने लापरवाही से कहा तो उस की बात पूजा की समझ में नहीं आई. उस ने पूछा, ‘‘तुम्हारे लिए यह मामूली बात क्यों है?’’

‘‘क्योंकि मैं तुम्हारी नौकरी लगवा सकता हूं.’’

यह सुन कर पूजा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. सलमान उसे फरिश्ते जैसा लगा. उस ने पूछा, ‘‘क्या तुम सच कह रहे हो?’’

‘‘हां बिलकुल सच, क्योंकि यह सलमान कभी झूठ नहीं बोलता. अब तुम से दोस्ती हो ही गई है तो फर्ज तो निभाना ही पड़ेगा, तुम बेफिक्र रहो, मैं तुम्हारी नौकरी का जल्द ही कोई बंदोबस्त करता हूं. कुछ ऐसा इंतजाम करूंगा कि तनख्वाह ठीकठाक मिलेगी.’’

पूजा सलमान के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानती थी. बस इतना पता था कि वह मेरठ में ही कहीं रहता है. उस दिन पूजा को लगा कि सलमान से दोस्ती कर के उस ने कोई गलती नहीं की है. बातों से वह उसे ठीकठाक इंसान लगा था. इसी तरह दोनों के बीच बातों का सिलसिला चलता रहा. मुलाकात की बेसब्री न सलमान ने दिखाई, न ही पूजा ने. 25 अगस्त की सुबह सलमान का फोन आया, ‘‘मुबारक हो पूजा, मैं ने तुम्हारी नौकरी का बंदोबस्त कर दिया है.’’

उस की इस बात ने पूजा के कान में मिठास घोल दी. उस ने झट पूछा, ‘‘कहां?’’

‘‘एक अखबार के औफिस में तुम्हें नौकरी दिला दूंगा.’’

‘‘तुम सच कह रहे हो?’’

सलमान ने शिकायती अंदाज में कहा, ‘‘क्या तुम्हें मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं है?’’

‘‘ऐसी बात नहीं है सलमान, भरोसा है तभी तो तुम से बातें करती हूं. तुम्हें अपना सब से अच्छा दोस्त भी मानती हूं.’’

‘‘इस के लिए शुक्रिया. और हां, तुम करीब 11 बजे घंटाघर आ कर मुझे फोन कर लेना.’’

‘‘ठीक है, मैं समय पर पहुंच जाऊंगी.’’ मोबाइल रखने के बाद पूजा ने घड़ी पर नजर डाली. उस समय साढ़े 10 बज रहे थे. वह जाने के लिए जल्दी से तैयार हुई. वह मन ही मन खुश थी कि सलमान ने उस के लिए वाकई एक बड़े काम की बुनियाद रख दी है.

नौकरी के बाद उस की जिंदगी आराम से गुजर जाएगी. उस ने एक खूबसूरत प्रिंटेड सूट पहना और उस की मैचिंग का नीला दुपट्टा भी गले में डाल लिया. अपना मोबाइल और पर्स ले कर वह सलमान के बताए पते पर पहुंच गई. शहर के बीच स्थित घंटाघर मुख्य बाजार और भीड़भाड़ वाला इलाका था. उस ने सलमान को फोन कर के अपनी पहचान बता दी. कुछ ही देर में वह मोटरसाइकिल से आ गया. एकदूसरे को देख कर दोनों ही खुश हुए.

सलमान उसे कुछ दूरी पर स्थित एक लस्सी की दुकान पर ले गया. वहां पहुंच कर दोनों बैठे ही थे कि एक अन्य मोटरसाइकिल से 2 लड़के और आ गए. सलमान ने पूजा से उन का परिचय कराते हुए कहा, ‘‘पूजा, ये मेरे करीबी दोस्त भूरा और आबिद हैं. इन्हीं के जरिए मैं ने तुम्हारे लिए नौकरी की बात की है. अभी कुछ देर में हम इन के साथ चलेंगे.’’

पूजा ने सवालिया निगाहों से सलमान की तरफ देखा. उस के मूक सवाल को भांप कर सलमान बोला, ‘‘अरे घबराने की कोई बात नहीं है. ये मेरे खास दोस्त हैं. वैसे भी मैं तुम्हारा भरोसे का दोस्त हूं.’’

उसी बीच सलमान ने दुकानदार को लस्सी के गिलास और्डर कर दिए थे. चारों लस्सी पीते हुए बातें करने लगे. लस्सी खत्म कर के वे पूजा को नौकरी दिलाने के लिए चल पड़े. पूजा सलमान की मोटरसाइकिल पर सवार थी, जबकि भूरा और आबिद दूसरी मोटरसाइकिल पर थे. कुछ देर तो ठीक रहा, लेकिन थोड़ी देर बाद पूजा को अपना सिर चकराता महसूस हुआ. उस के होश कब गुम हो गए, उसे पता ही नहीं चला. इस के बाद अर्धबेहोशी की हालत में उस ने खुद को एक कमरे में पाया. वहां हैवान बन कर बारीबारी तीनों ने उस की अस्मत लूटी.

उस हालत में उस के हाथोंपैरों की जैसे जान निकल चुकी थी. वह विरोध के काबिल भी नहीं थी. इस के बाद वह बेहोश हो गई. आंख खुली तो उस ने खुद को अस्पताल के बिस्तर पर पाया. वह अस्पताल कैसे पहुंची, उसे पता नहीं. उस ने अपने भाई चंदर को सूचना दी तो वह सुबह अस्पताल आया. पूजा ने जो बताया था, वह किसी युवती को विश्वास में ले कर उस की अस्मत को लूटने की गंभीर घटना थी. इस खबर के फैलते ही अस्पताल में हजारों लोग एकत्र हो गए थे. वे काररवाई के लिए हंगामा कर रहे थे. सवेरा होते ही इतने लोगों को घटना के बारे कैसे पता चल गया, इस बात को ले कर पुलिस अधिकारियों के दिमाग में सवाल कौंध रहे थे.

पुलिस ने पूजा के भाई चंदर की तहरीर पर तत्काल अपराध संख्या-210/15 पर बताए गए तीनों आरोपियों के खिलाफ धारा-376, 328 व अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा-3 (2) (5) के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया. घटना एक दलित युवती के साथ घटी थी. वह कई घंटे दरिंदों के चंगुल में रही थी. मामला ज्यादा तूल न पकड़े, इस के लिए पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू कर दी. डाक्टरों ने युवती का मैडिकल किया. युवती अस्पताल तक कैसे पहुंची, यह एक अहम सवाल था, क्योंकि वह बेहोश थी. पुलिस का अनुमान था कि आरोपी ही उसे अस्पताल के बाहर फेंक कर चले गए होंगे. अस्पताल में सीसीटीवी कैमरे लगे थे. सुराग की तलाश में पुलिस ने रिकौर्डिंग खंगाली तो हैरान रह गए.

हैरानी वाली बात यह थी कि आरोप लगाने वाली वह पीडि़त युवती एक युवक के साथ खुद ही बातें करते हुए पैदल चल कर अस्पताल तक आई थी. कैमरा युवती के बयानों से विपरीत बयान कर रहा था. पुलिस को मामला संदिग्ध लगा, लेकिन नजाकत को भांपते हुए पुलिस खामोश रही. पुलिस ने वह रजिस्टर चैक किया, जिस में मरीज को भरती करते समय नामपता दर्ज किया जाता था. उस में युवती को भरती कराने वाले ने अपना नाम राजेंद्र, निवासी न्यूमोहनपुरी कालोनी लिखा था. पुलिस उस पते पर पहुंची तो पता चला कि वह पता फर्जी था. इन बातों से शक गहराया तो पुलिस ने पूजा के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई.

पुलिस चौंकी, क्योंकि युवती का यह नंबर करीब 2 महीने से सक्रिय था. नंबर वेस्ट यूपी से खरीदा गया था. हैरान करने वाली बात यह थी कि युवती दिल्ली की रहने वाली थी तो यूपी का नंबर क्यों इस्तेमाल कर रही थी? काल डिटेल्स में आरोपी सलमान का भी नंबर मिला था. इंसपेक्टर दीपक त्यागी ने पुलिस टीम के साथ उस के घर छापा मार कर उसे उठा लिया. पूछताछ में सलमान ने बताया कि वह युवती को जानता तक नहीं. कुछ दिनों से वह उस से मोबाइल पर बातें जरूर कर लिया करता था.

पुलिस ने उस की लोकेशन की जांच की तो पता चला कि वह सच बोल रहा था. युवती की काल डिटेल्स में एक और नंबर मिला था. वह नंबर उस के भाई चंदर के पास था. दोनों मोबाइल नंबर आगेपीछे थे. पुलिस ने पूजा और चंदर के मोबाइल की लोकेशन की जांच की. जिस समय की उस ने घटना बताई थी, उस समय की उस की लोकेशन घंटाघर इलाके से दूर की थी. मोबाइल के लोकेशन के अनुसार, चंदर उस के साथ था. जबकि युवती के बयान के अनुसार, सूचना मिलने पर वह सुबह अस्पताल आया था. इस बीच युवती की मैडिकल रिपोर्ट आ गई थी, जिस के अनुसार उस के साथ दुष्कर्म नहीं हुआ था. अब साफ हो गया था कि युवती झूठ बोल रही थी.

पुलिस को विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस मामले से इतनी सनसनी फैल गई थी, वह इस तरह फरजी निकलेगा. पुलिस ने युवती के साथ चंदर को भी हिरासत में ले लिया. सीओ विनीत भटनागर और इंसपेक्टर दीपक त्यागी ने दोनों से सख्ती से पूछताछ की तो युवती अपने बयान पर अडिग रही. इस के बाद पुलिस ने उसे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज दिखाई तो उस ने झूठे गैंगरेप की ऐसी खतरनाक साजिश का सच बयां किया, जिसे सुन कर पुलिस अधिकारियों के पैरों तले से जमीन खिसक गई. युवती के बयान के आधार पर उस के सहयोगी हाजी मरगूब अली पुत्र अनवार निवासी जाकिर कालोनी, अब्दुल हमीद पुत्र अख्तर अली निवासी शास्त्रीनगर को हिरासत में ले लिया गया.

पूजा और उस के साथियों ने जो बताया था, उस हकीकत को जान कर पुलिस अधिकारी भी दंग रह गए थे, क्योंकि उन के कैरियर का यह एकदम अनोखा मामला था. यह सनसनीखेज कहानी हत्या के एक मामले में गवाह बने शख्स को फंसाने के लिए रची गई थी. कहानी की पटकथा एक हत्यारोपी, जो जेल में बंद था, उस ने एक अधिवक्ता और एक कथित पत्रकार की सलाह पर लिखी थी. फिल्मी अंदाज में घटनाक्रम का डायरेक्टर भी बनाया गया और किरदार भी. दुष्कर्म के घटनाक्रम से ले कर प्रदर्शन तक की पटकथा के अंश थे.

हर किरदार की उस की अदाकारी की फीस तय थी, जिस में 2 लाख रुपए का बंटवारा भी हो चुका था. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद पूजा ने खुद को अविवाहित युवती के रूप में पेश कर के खुद को हैवानियत की शिकार ऐसी दुखियारी बन कर सफल अभिनय किया था कि न सिर्फ पुलिस चकरा गई, बल्कि शहर भी आग में झुलसतेझुलसते बचा. झूठे रेप की पटकथा के पीछे भी एक कहानी थी. दरअसल, 28 नवंबर, 2013 की शाम मेरठ के ब्रह्मपुरी थानाक्षेत्र के खत्ता रोड पर प्रौपर्टी का कारोबार करने वाले 25 वर्षीय बिलाल पुत्र फजलू की स्कौर्पियो सवार बदमाशों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसा कर हत्या कर दी थी.

बिलाल की अपने ही पड़ोसी हनीफ और उस के भाई अनीस उर्फ नेता से रंजिश चली आ रही थी. ये दोनों ही हिस्ट्रीशीटर अपराधी थे. हनीफ के खिलाफ विभिन्न थानों में लूट, हत्या व अपहरण जैसे 35 से ज्यादा मामले दर्ज थे. बिलाल उन के कारनामों का विरोध करता था. इस मुद्दे पर दोनों के बीच कई बार हिंसक मारपीट भी हो चुकी थी. अनीस जेल में बंद था. रंजिश के चलते बिलाल ने सन 2012 में अपने पिता, मां वकीला और 2 बहनों गुलनाज एवं बेबी को मुजफ्फरनगर जिले के मोहल्ला खालापार में अपने मामा मेहराजुद्दीन के यहां शिफ्ट कर दिया था.

बिलाल काम के सिलसिले में मेरठ आता रहता था. उस दिन भी जब वह मेरठ आया था तो उस की हत्या कर दी गई. हत्या के इस मामले मे हनीफ, उस के बेटे आजाद, रिश्तेदार नजाकत उर्फ पप्पू, जोकि पूर्वपार्षद भी रह चुका था व अन्य के खिलाफ बिलाल की परिचित महिला शाहिस्ता पत्नी आस मोहम्मद की ओर से रिपोर्ट दर्ज करा दी गई थी.

पुलिस ने इस मामले में आरोपियों को जेल भेज दिया था. मामला अदालत में सुनवाई होते हुए एक साल बाद सजा के मुकाम तक पहुंच चुका था. इस मामले में 5 आरोपियों को तो जमानत मिल गई थी, जबकि हत्यारोपी नजाकत जेल में बंद था. उस के खिलाफ मृतक बिलाल के करीबी सलमान उर्फ जावेद ने गवाही दी थी. उस के अभी और भी बयान होने थे. उस की गवाही नजाकत को सजा के मुकाम तक पहुंचा सकती थी.

इसी बात ने नजाकत को परेशान कर रखा था. गवाह के टूटने पर ही वह बच सकता था. इस मुद्दे पर उस के लोगों ने सलमान को कई बार समझाने का प्रयास भी किया कि वह गवाही से पलट जाए, लेकिन उस ने इनकार कर दिया था. मुकदमे की वादी शाहिस्ता को भी मोटी रकम का लालच दिया गया था. इस बात से परेशान नजाकत ने अपने एक साथी हाजी मरगूब अली से बात की. नजाकत चंदर को भी जानता था. चंदर एक मामले में जेल में बंद था, तभी उस की दोस्ती उस से हो गई थी. मरगूब चूंकि अक्सर नजाकत से मिलने जेल जाया करता था. उसी दौरान मरगूब से भी चंदर की जानपहचान हो गई थी.

नजाकत और मरगूब की जानपहचान अधिवक्ता पासा खान और एक दैनिक अखबार में कथित तौर पर इन्फौरमर के रूप में संपर्क रखने वाले कथित पत्रकार हसन जैदी से भी थी. एक बार नजाकत कचहरी में पेशी पर आया तो उस की मुलाकात सभी से हुई. उस ने सभी को पहले से सूचना दे कर बुला रखा था.

इस मुलाकात में नजाकत ने कहा, ‘‘किसी भी तरह सलमान से पीछा छुड़ाओ. अगर उस ने गवाही दे दी तो मुझे सजा हो जाएगी. उसे बहुत समझा दिया, लेकिन वह मानने को तैयार नहीं है.’’

‘‘तुम्हीं बताओ क्या किया जाए?’’ मरगूब ने कहा.

‘‘कुछ तो करना पड़ेगा.’’ नजाकत ने कहा, ‘‘उसे किसी मामले में फंसवा दो, अपने आप टूट जाएगा.’’

नजाकत का यह आइडिया सभी को काम का लगा. इस के बाद नजाकत ने कहा, ‘‘इस काम में जितना भी पैसा खर्च होगा, मैं कर दूंगा.’’

इस के बाद सभी ने सलाहमशविरा कर के गवाह सलमान और उस की मदद करने वाले उस के 2 साथियों आबिद और भूरा को फंसाने की योजना बना डाली. उन की योजना में एक औरत की जरूरत थी. उस के लिए मरगूब ने कहा कि वह एक युवती पूजा को जानता है, जो पैसे के लिए कुछ भी कर सकती है. इसलिए अच्छा यही होगा कि पूजा के माध्यम से सलमान को दुष्कर्म में फंसाया जाए, इस में आसानी से उस की जमानत भी नहीं होगी.

पूजा मूलरूप से बिहार के छपरा की रहने वाली थी. सालों पहले उस का परिवार सहारनपुर के इस्लामिक संस्था दारुल उलूम के लिए चर्चित कस्बा देवबंद में आ कर बस गया था. कई सालों पहले घर वालों ने उस का विवाह जिला मुजफ्फरनगर के रहने वाले प्रह्लाद से कर दिया था. वह उस के 2 बच्चों की मां बनी. इस के बाद किसी वजह से पति से अलगाव हो गया तो वह मायके आ कर रहने लगी. पूजा आजाद खयाल युवती थी. उसे ऊंची उड़ान पसंद थी. ऐसी ही ख्वाहिशों में उस ने कुछ दुकानों और फाइनैंस कंपनियों में नौकरी की. 2 साल पहले उस का संपर्क मरगूब से हुआ तो जल्दी ही दोनों के बीच इतने गहरे संबंध बन गए कि मरगूब ने उसे मोहल्ला हुमायूंनगर में किराए का कमरा दिला कर अपने संरक्षण में रख लिया. उस के सारे खर्चे भी वही उठाने लगा.

पूजा इस जिंदगी से खुश तो थी, लेकिन हमेशा आगे बढ़ने और खूब पैसा कमाने के बारे में सोचती रहती थी. उस के लालची स्वभाव से मरगूब वाकिफ था. सलमान को फंसाने के मुद्दे पर अक्सर सभी की मुलाकातें नजाकत से होने लगीं. सभी चाहते थे कि योजना इतनी फूलपू्रफ हो कि बाद में कोई परेशानी न हो. नजाकत ने 2 लाख रुपए भी बतौर एडवांस मरगूब को दिला दिए. मरगूब ने अपनी इस योजना में अब्दुल अली को भी शामिल कर लिया था. अब्दुल से उस के दोस्ताना संबंध थे. इस तरह सलमान और उस के साथियों को सामूहिक दुष्कर्म के मामले में फंसाने की योजना बन गई.

उस के साथियों ने मरगूब को राय दी कि वह पूजा से बात करे. मरगूब ने पूजा से कुछ लोगों पर दुष्कर्म का झूठा आरोप लगाने की बात की तो वह राजी हो गई. इस के बाद मरगूब ने न सिर्फ उसे 50 हजार रुपए दिए, बल्कि यह भी कहा कि उसे बिना कुछ किए हर महीने 10 हजार रुपए मिलते रहेंगे. उस ने रिपोर्ट दर्ज होने के बाद 50 हजार रुपए और देने का वादा किया. पूजा को आंखों के सामने नोट लहराते नजर आए तो वह ऐसा करने के लिए पलक झपकते राजी हो गई. इस के बाद मरगूब, अब्दुल, चंदर, हसन जैदी और पाशा खान ने मिलबैठ कर अपनेअपने किरदार तय किए. हसन जैदी और पाशा खान सलाहकार की भूमिका में थे.

सभी के बीच यह भी तय हुआ कि वे अपनीअपनी भूमिका पर कायम रहते हुए अपना किरदार पूरी जिम्मेदारी से निभाएंगे. पूजा को बयान से कतई नहीं पलटना था. इस के लिए उसे अजय देवगन की चर्चित फिल्म ‘दृश्यम’ दिखा कर रिहर्सल कराया गया. फिल्म की कहानी में जिस तरह अजय देवगन और उस का परिवार पुलिस जांच के दौरान बिना डरे अपने बयानों पर अड़ा रहता है, उसी तरह पूजा को भी अपने बयान पर अड़े रहना था. पूरी योजना बना कर मरगूब ने फर्जी पते पर 2 सिमकार्ड खरीद कर पूजा और चंदर को दे दिए. एक सिम का इस्तेमाल पूजा अकेली करती थी, जबकि दूसरा सिम चंदर और मरगूब, दोनों इस्तेमाल कर रहे थे.

इस के बाद अगस्त के दूसरे सप्ताह में बिलाल हत्याकांड के गवाह सलमान उर्फ जावेद का मोबाइल नंबर पूजा को दे दिया गया. एक दिन पूजा ने सलमान को मिसकाल की. उस ने पलट कर फोन किया तो पूजा ने उस से बातों का सिलसिला बढ़ा दिया. 21 अगस्त से 25 अगस्त तक बातों का यह सिलसिला उन के बीच 42 बार चला. सलमान नहीं जानता था कि उसे साजिश का शिकार बनाया जा रहा है. तय हो गया कि 25 अगस्त की रात पूजा को अस्पताल में भरती करा दिया जाएगा और वह सलमान तथा उस के साथियों पर सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगा देगी. दिन में वह चंदर और मरगूब के साथ शहर के एक डोमीनोज सेंटर पर भी गई, जहां बैठ कर पिज्जा खाया.

योजना के अनुसार, रात में वह मरगूब के साथ मोटरसाइकिल से घंटाघर पहुंची. वहां से मरगूब ने उसे अपने साथी अब्दुल के साथ अस्पताल भेज दिया. वह आराम से चल कर अस्पताल पहुंची. अस्पताल के अंदर पहुंचते ही उस ने बेहोशी का नाटक कर दिया. अब्दुल ने रजिस्टर में गलत नामपता दर्ज कराया और खुद वहां से चला गया. पाशा खान और हसन जैदी को जिला अस्पताल आनाजाना था. उन्हें डाक्टर से मिल कर पूजा को बेहोशी की हालत में बताने के अलावा मैडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म साबित कराना था. दोनों सुबह अस्पताल पहुंचे.

उन्होंने डाक्टर से बात कर के उन्हें पूजा को बेहोश दिखाने के लिए तैयार कर लिया. इस बीच पूजा के गले पर चोट का निशान भी बना दिया गया. योजना के अनुसार, हसन जैदी के जरिए हिंदू लड़की से मुसलिम युवकों द्वारा सामूहिक दुष्कर्म की सनसनीखेज सूचना राजनैतिकदलों से जुडे़ लोगों तक पहुंचाई गई. इस से शहर में सनसनी फैल गई. मौके पर पहुंची पुलिस को पूजा ने पहले से रटाई गई दुष्कर्म की फरजी कहानी सुना दी. न चंदर उस का भाई था और न ही वह दिल्ली के पते पर रहती थी. सभी को पूरी उम्मीद थी कि पुलिस दुष्कर्म जैसे मामले में बिना जांच के ही सलमान को पकड़ कर अंदर कर देगी.

राजनैतिक लोगों को इसलिए सूचना दी गई कि वे एकत्र हो कर हंगामा करेंगे तो पुलिस दबाव में आ जाएगी. आरोपी मुसलिम समुदाय के होने से शहर में सनसनी और अफवाहें फैलेंगी, जिस से आरोपियों को बख्शा नहीं जाएगा. योजना फूलपू्रफ थी. किसी अभिनय में कोई कमी नहीं थीं, लेकिन पुलिस जांच में परतें खुल गईं. एसएसपी डी.सी. दुबे, एसपी (सिटी) ओमप्रकाश सिंह ने भी आरोपियों से पूछताछ की. पुलिस पूजा, उस के फरजी भाई चंदर, मरगूब अली और उस के साथी अब्दुल को गिरफ्तार कर चुकी थी.

पुलिस ने इस मामले में जेल में बंद मुख्य षडयंत्रकारी नजाकत, अधिवक्ता पाशा खान और हसन जैदी को भी आरोपी बनाया है. पुलिस ने पूजा के मजिस्ट्रेटी बयान कराए तो उस ने वहां भी पूरी सच्चाई बयां कर दी. पुलिस ने डोमीनोज सेंटर की वीडियो फुटेज भी बतौर सबूत हासिल कर ली है. वह उस समय वहां थी, जिस समय उस ने खुद को सलमान के साथ घंटाघर पर होने के बारे में बताया था. विधिवत गिरफ्तारी कर पुलिस ने सभी को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

इस के बाद पुलिस शेष आरोपियों की तलाश में जुट गई. पुलिस के बढ़ते दबाव के चलते आरोपी हसन जैदी ने 8 सितंबर को अदालत में समर्पण  कर दिया, जिस के बाद उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी और पुलिस पाशा खान की सरगरमी से तलाश कर रही थी. पुलिस अब डाक्टर की भूमिका की जांच कर रही है. अगर वह दोषी पाए गए तो उन के खिलाफ भी काररवाई हो सकती है. Social Stories Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Hindi Crime Story: खूनी चाहत

Hindi Crime Story: गीता को पाने के बाद वारिस की नजर दयारानी की करोड़ों की संपत्ति पर थी, जो उस की मौत के बाद गीता को मिलने वाली थी. इस के लिए उस ने जो चाल चली, क्या वह ठीक थी?

उस दिन सुबह के तकरीबन 7 बजे गीता की आंखें खुलीं तो घर में सन्नाटा पसरा था. जबकि रोजाना उस के उठने से पहले ही दयारानी उठ चुकी होती थीं. वह जल्दी उठती थीं और उन के उठते ही लोगों का आनाजाना शुरू हो जाता था, जिस से घर में चहलपहल शुरू हो जाती थी. लेकिन उस सुबह घर में निहायत खामोशी छाई थी. दयारानी अभी तक सो रही हैं, यह उस के लिए हैरानी की बात थी. मन में सवाल आए तो उस के कदम दयारानी के बैडरूम की ओर बढ़ गए. कमरे का दरवाजा खुला था. वह अंदर पहुंची और जैसे ही उस की नजरें बिस्तर पर पड़ीं, वह चीख पड़ी. दयारानी का शरीर खून में डूबा बिस्तर पर पड़ा था.

गीता की चीख सुन कर घर में मौजूद दयारानी की शिष्या शमा भाग कर उस के पास आ गई. कमरे के अंदर का नजारा देख कर उस का भी हाल गीता जैसा ही हुआ. उन की चीखें सुन कर आसपास के लोग भी भाग कर आ गए थे. कुछ लोगों ने दयारानी को हिलाडुला कर देखा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उन की मौत हो चुकी थी. अब लोगों की जुबान पर एक ही सवाल था कि आखिर घर के अंदर घुस कर दयारानी को किस ने इस तरह बेरहमी से मार डाला? गीता दहाडे़ मार कर रो रही थी, ‘‘पता नहीं किस ने ऐसा कर डाला? ऊपर वाला उसे कभी माफ नहीं करेगा.’’

वहां एकत्र लोगों में से किसी ने इस की सूचना पुलिस को दे दी थी. उसी के आधार पर कोतवाली प्रभारी धर्मेंद्र यादव पुलिस बल के साथ दयारानी के घर आ पहुंचे. पता चला कि किसी ने 55 वर्षीया दयारानी की गोली मार कर हत्या कर दी थी. गोली उन के सिर में मारी गई थी. मामला गंभीर था. कोतवाली प्रभारी ने घटना की सूचना एसएसपी धर्मेंद्र सिंह को भी दे दी थी. उन के निर्देश पर कुछ ही देर में एसपी (सिटी) डा. अजयपाल शर्मा और सीओ (सिटी) अनिल यादव भी आ गए थे. दयारानी किन्नर थीं. वह गाजियाबाद में गऊशाला फाटक के पास कैला रोड पर अपने मकान में रहती थीं. उस मकान में कुल 4 लोग रहते थे. एक किन्नर दयारानी, दूसरी उन की भतीजी गीता, तीसरी उन की शिष्या शमा और चौथा गीता का 6 वर्षीय बेटा सन्नी.

दयारानी शहर के लिए एक चर्चित नाम थीं. वह सामाजिक कार्य करती रहती थीं. इस के अलावा वह लोकसभा, विधानसभा और मेयर पद के लिए चुनाव भी लड़ चुकी थीं. उन की हत्या की खबर फैलने से उन के घर के बाहर अच्छाखासा जमावड़ा लग गया था. पुलिस ने गीता और शमा को सांत्वना दे कर पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि रात करीब साढ़े 8 बजे खाना खाने के बाद वे दोनों अपनेअपने कमरों में सोने चली गई थीं. इस के बाद क्या हुआ, उन्हें मालूम नहीं. जांच में पुलिस ने घर का सारा कीमती सामान सुरक्षित पाया था. इस से साफ जाहिर हो रहा था कि हत्या लूटपाट के लिए कतई नहीं की गई थी.

दयारानी का बैडरूम घर के मुख्य दरवाजे के बराबर में था. कमरे में 2 दरवाजे और एक खिड़की थी. खिड़की पर लोहे की ग्रिल और जाली लगी थी, जबकि उस के लकड़ी के पल्ले खुले थे. कमरे का एक दरवाजा सड़क की ओर खुलता था, जबकि दूसरा घर के अंदर की ओर. सड़क की ओर खुलने वाला दरवाजा और मुख्य दरवाजा बंद था. सड़क से सटी ऊंची दीवार थी और दूसरी ओर से रेलवे लाइन गुजरती थी. ऐसे में सवाल यह उठता था कि जब बाहर से कोई आया नहीं तो दयारानी को गोली किस ने मारी.

एक्सपर्ट ने दयारानी के सिर के गोली के घाव को देख कर बताया कि गोली न ज्यादा नजदीक से मारी गई थी और न ज्यादा दूर से. गोली सिर के बीच में लगी थी. पुलिस ने जब कमरे का बारीकी से निरीक्षण किया तो पाया कि दयारानी को गोली सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की से निशाना साध कर मारी गई थी, जिस से जाली में करीब एक इंच का छेद हो गया था. अब साफ हो गया कि हत्यारों ने उन्हें सड़क की ओर से निशाना बनाया था. गरमी की वजह से दयरानी खिड़की के पल्ले खोल कर सोती थीं. यह बात गीता ने पुलिस को बताई थी. गीता ने यह भी बताया था कि शाम को 3 लड़के दयारानी से मिलने आए थे. वे कौन थे, यह वह नहीं जानती थी.

चूंकि दयारानी के पास इस तरह लोगों का आनाजाना लगा रहता था, इसलिए उस ने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. हैरानी की बात यह थी कि गोली चलने की आवाज किसी ने नहीं सुनी थी. न घर वालों ने, न बाहर वालों ने. घर में मौजूद गीता और शमा को भी हत्या का पता सुबह लगा था. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई कर के दयारानी के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और गीता की ओर से अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. इस हत्या से किन्नर समुदाय में हड़कंप मच गया था. उन्होंने रोष जताते हुए पुलिस से हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की मांग की.

यह 3 जुलाई, 2015 की रात की वारदात थी, जिस का पता 4 जुलाई की सुबह चला था. शाम तक दयारानी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. उन्हें गोली 315 बोर के तमंचे से मारी गई थी. रिपोर्ट के अनुसार हत्या 11 से 12 बजे के बीच की गई थी. सब से बड़ी बात यह थी कि किसी ने गोली चलने की आवाज नहीं सुनी थी. गोली की आवाज न सुनाई पड़ने के पीछे पुलिस को एक वजह यह लग रही थी कि दयारानी जिस मकान में रहती थीं, उस के पास से रेलवे लाइन गुजरती थी.

आशंका थी कि गोली उस समय चलाई गई होगी, जब वहां से ट्रेन हार्न बजा कर गुजर रही होगी. पुलिस ने उस समय गुजरने वाली ट्रेन के बारे में पता किया तो पता चला कि उस बीच वहां से करीब 15 ट्रेनें गुजरी थीं. इस का मतलब दयारानी की हत्या फूलपू्रफ प्लानिंग के तहत की गई थी. उन का कातिल कौन था, अब यह पता करना पुलिस को मुश्किल लग रहा था. दयारानी आर्थिक रूप से काफी संपन्न थीं. उन के नाम करोड़ों की संपत्ति थी. पुलिस को हत्या की कोई वजह समझ में नहीं आ रही थी. दयारानी के घर के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगा था. पुलिस ने उस की रिकौर्डिंग और दयारानी के मोबाइल फोन को अपने कब्जे में ले लिया.

पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज की जांच की तो उस में रात साढ़े 11 बजे 3 लोगों की परछाईयां नजर आईं. कैमरे की जद से बचने के लिए उन्होंने दीवार के किनारे का सहारा लिया था. कुछ देर बाद एक मोटरसाइकिल जाती हुई नजर आई थी, जिस में सिर्फ बैक लाईट नजर आ रही थी. पुलिस को उस में कोई चेहरा व मोटरसाइकिल का नंबर नजर नहीं आया. अगले दिन दयारानी हत्याकांड सुर्खियां बन गया. एसपी (सिटी) डा. अजयपाल शर्मा के निर्देशन में हत्याकांड के खुलासे के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया गया, जिस में कोतवाली प्रभारी धर्मेंद्र यादव, एसआई शिवराज सिंह, हेडकांस्टेबल वीर सिंह, कांस्टेबल प्रवीण कुमार, संजय सिंह, पंकज सिंह, उदयवीर सिंह, इरफान खान, विपिन कुमार व विवेक भारद्वाज को शामिल किया गया.

इस पुलिस टीम ने आसपास के लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि दयारानी का स्वभाव बहुत अच्छा था. वह हमेशा हर किसी की मदद के लिए तैयार रहती थीं. उन की किसी से रंजिश भी नहीं थी. इसी पूछताछ में पुलिस को एक अहम जानकारी यह मिली कि उन की भतीजी गीता का किसी लड़के से प्रेम संबंध चल रहा था. कुछ महीने पहले वह उस के साथ घर से भाग भी गई थी, लेकिन थोड़ी कोशिश के बाद दयारानी उसे खोज लाई थीं.

पुलिस ने गीता के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि उस के मातापिता गाजियाबाद के ही डासना गेट इलाके में रहते थे. दयारानी चूंकि वर्षों पहले किन्नर समाज का हिस्सा बन गई थीं, इसलिए अलग रहने लगी थीं. उन्हें गीता से लगाव था. गीता का विवाह दिल्ली के भजनपुरा में रहने वाले भीम सिंह से हुआ था. वह उस के 3 बच्चों की मां बनी, लेकिन एक साल पहले गीता का अपने पति से विवाद रहने लगा था. विवाद ज्यादा बढ़ा तो गीता पति का घर छोड़ कर दयारानी के पास आ कर रहने लगी. दयारानी को चूंकि अपनों की कमी हमेशा खलती थी, इसलिए उन्होंने गीता को अपने पास रख लिया.

6 महीने पहले गीता का भीम सिंह से तलाक हो गया. दोनों के बीच जो समझौता हुआ, उस के अनुसार गीता के 2 बच्चों को भीम सिंह ने अपने पास रख लिया और एक बेटे सन्नी को उस ने गीता को सौंप दिया. सन्नी दयारानी की आंखों का तारा बन गया था. दयारानी के यहां आने के बाद गीता का किसी युवक से प्रेम हो गया था. गीता उस के साथ घर छोड़ कर चली गई थी, जिस से दयारानी बेहद खफा थीं. पुलिस को लगा कि कहीं दयारानी की हत्या प्रेमप्रसंग में बाधा बनने की वजह से तो नहीं हुई? अगर ऐसा हुआ तो गीता भी षडयंत्र में शामिल हो सकती थी.

पुलिस ने शक के आधार पर गीता से गहराई से पूछताछ की. इस पूछताछ में उस ने प्रेमप्रसंग से ले कर उस युवक के साथ कोर्टमैरिज करने की बात तो बेहिचक स्वीकार कर ली, लेकिन हत्या में किसी तरह से हाथ होने से इनकार कर दिया. पुलिस ने दयारानी के साथसाथ गीता के मोबाइल नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई. दयारानी के नंबर की काल डिटेल्स से तो कुछ खास हासिल नहीं हुआ, लेकिन गीता के नंबर की काल डिटेल्स से एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर वह घंटों बातें किया करती थी. घटना वाली रात 11 बजे तक उस नंबर पर उस की बातें हुई थीं. इस के बाद पुलिस ने गीता से उस नंबर के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह नंबर उस के प्रेमी वारिस का है.

इस बीच पुलिस को अपने मुखबिर से पता चल गया था कि घटना वाली रात उसी इलाके के रहने वाले नदीम को दयारानी के घर के आसपास 2 लड़कों के साथ घूमते देखा गया था. पुलिस ने सीसीटीवी में भी 3 युवकों को देखा था. पुलिस ने शक के आधार पर नदीम को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू की. नदीम कोई पेशेवर अपराधी तो था नहीं. वह पुलिस के सवालों में उलझ गया और दयारानी की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. नदीम के बताए अनुसार दयारानी की हत्या की पूरी योजना गीता के प्रेमी वारिस ने तैयार की थी. इस के बाद वारिस ने नदीम के अलावा दयारानी के पूर्व कार ड्राइवर समीर के साथ मिल कर हत्या की थी.

पुलिस ने तुरंत नया बसअड्डा से वारिस को भी गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन समीर पुलिस को चकमा देने में कामयाब हो गया था. पुलिस ने दोनों से विस्तृत पूछताछ की तो दयारानी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह उन के प्रेम में बाधक बनने, गीता को हासिल करने का जुनून और करोड़ों की संपत्ति के लालच की कहानी थी. दयारानी किन्नर थीं. इसे वह कुदरत की मरजी समझती थीं. लेकिन उन का स्वभाव अच्छा था. यही वजह थी कि किन्नर समाज के लोग ही नहीं, स्थानीय लोग भी उन्हें पसंद करते थे. दयारानी की प्रबल इच्छा थी कि वह समाज के लिए कुछ करें. शायद इसीलिए सामाजिक कामों में हिस्सा लेने के साथसाथ वह राजनीति में भी आने की कोशिश कर रही थीं.

राजनीति में आ कर वह जनता की सेवा करना चाहती थीं. इसीलिए सन 2009 में उन्होंने बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के सामने गाजियाबाद सीट से लोकसभा चुनाव निर्दलीय प्रत्याक्षी के रूप में भी लड़ा था. हालांकि वह चुनाव हार गई थीं. दयारानी के कुछ काम ऐसे थे, जो उन की अलग पहचान बनाए हुए थे. गरीबों की मदद के अलावा वह स्थानीय लोगों के बिजलीपानी जैसे मुद्दे भी उठाती रहती थीं. इन कामों को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने एक सामाजिक संस्था भी बना रखी थी. उन्हें ले कर सन 2011 में 7 मिनट 27 सेकंड की एक ‘मैं हिजड़ा हूं’ नामक डाक्यूमेंट्री फिल्म भी बनी थी. इस फिल्म में उन के अच्छे कामों को दिखाया गया था.

इस फिल्म को मीडिया फेस्ट मंथन में बेस्ट डाक्यूमेंट्री अवार्ड भी मिला था. दयारानी राजनीति के जरिए लोगों की सेवा करना चाहती थीं, इसलिए सन 2012 में उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ना चाहा था, लेकिन उन का नामांकन रद्द हो गया था. अब वह 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती थीं. एक साल पहले गीता का अपने पति से विवाद हुआ तो वह रहने के लिए दयारानी के पास आ गई. दयारानी ने अपनी कार चलाने के लिए समीर को बतौर ड्राइवर नौकरी पर रखा हुआ था. समीर का एक दोस्त था वारिस. वह भी कैलाभट्टा इलाके में रहता था और कबाड़ी का काम करता था.

समीर की ही वजह से वारिस भी दयारानी के घर आने लगा था. इसी आनेजाने में उस की मुलाकात गीता से हुई तो दोनों एकदूसरे के दिल में उतर गए. इस के बाद गीता और वारिस की मोबाइल पर बातें होने लगीं. वारिस शातिर किस्म का युवक था. उस की नजर दयारानी की प्रौपर्टी पर थी. दयारानी गीता को अपने वारिस के तौर पर मानती थीं. यह बात वारिस को पता चल गई थी. वक्त के साथ गीता की मुलाकातों का दौर शुरू हो गया. समीर को गीता और वारिस के संबंधों का पता था, लेकिन दयारानी इस सब से अंजान थीं.

कुछ महीने बाद गीता का पहले पति से तलाक हो गया तो वारिस को खुशी हुई. उस ने गीता से वादा किया कि वह विवाह कर के उसे हमेशाहमेशा के लिए अपनी बना लेगा. गीता भी यही चाहती थी, लेकिन यह बात वह दयारानी से बताने से डर रही थी. आखिर एक दिन वह चुपचाप घर से निकल गई. यह 4 महीने पहले की बात है. गीता अपने साथ करीब 25 लाख रुपए के आभूषण ले गई थी. दयारानी को जब इस की जानकारी हुई तो उन्होंने वारिस के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी. घर से भागने के बाद गीता ने वारिस से कोर्ट में विवाह कर लिया था. आखिर 2 महीने बाद दयारानी ने गीता को खोज निकाला.

दयारानी उस की इस हरकत से काफी नाराज थीं. उस के बेटे सन्नी को चूंकि वह काफी चाहती थीं, इसलिए उन्होंने गीता को माफ कर के अपने पास रख लिया था. गीता ने कोर्टमैरिज वाली बात दयारानी से छिपा ली थी. गीता को उन्होंने अपने पास इस हिदायत के साथ रखा था कि अब वह वारिस से बिलकुल नहीं मिलेगी और वह उन के घर भी नहीं आएगा. गीता के बाहर घूमनेफिरने पर भी दयारानी ने रोक लगा दी थी. दयारानी को जब पता चला कि उन के ड्राइवर समीर को गीता और वारिस के प्रेम संबंधों से ले कर भागने तक की जानकारी थी और वह कार से गीता और वारिस को घुमाने भी ले जाता था तो उन्होंने इस पर न सिर्फ उसे फटकार लगाई, बल्कि नौकरी से भी हटा दिया.

दूसरी ओर गीता पर बंदिशें लग जाने की वजह से वारिस उस से मिल नहीं पाता था, इस बात से वह दयारानी से काफी नाराज था. दोनों मिल भले नहीं पाते थे, लेकिन मोबाइल से उन की बातें होती रहती थीं. वारिस की समझ में आ गया था कि दयारानी के जीतेजी वह गीता के साथ नहीं रह सकेगा. उसे डर लग रहा था कि कहीं गीता दोबारा न अपने पति से संबंध जोड़ ले. उस की नजर गीता और दयारानी की दौलत पर थी. इस बात को ले कर वह अकसर परेशान रहता था. जब उसे कोई राह नहीं सूझी तो उस ने मन ही मन दयारानी को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. उस ने इस के बाद समीर से कहा, ‘‘भाई समीर, मैं गीता को किसी भी हालत में नहीं छोड़ सकता, क्योंकि मैं उस के बिना जिंदा नहीं रह सकता.’’

वारिस की बात सुन कर समीर अफसोस जाहिर करते हुए बोला, ‘‘दयारानी अब तुम्हें उस से बिलकुल नहीं मिलने देगी, इसलिए तुम उसे भूल जाओ.’’

‘‘ऐसा बिलकुल नहीं हो सकता. मैं ने एक ऐसा रास्ता खोल निकाला है, जिस से मैं गीता को ही नहीं, दयारानी की सारी दौलत भी पा सकता हूं.’’

‘‘कौन सा रास्ता है, जरा मैं भी तो जानूं.’’ समीर ने उस की तरफ देख कर पूछा तो वारिस ने कहा, ‘‘मैं दयारानी को ही रास्ते से हटाने के बारे में सोच रहा हूं.’’

‘‘लेकिन ऐसा कर के तुम भी तो नहीं बचोगे.’’

‘‘मुझे तुम्हारा साथ चाहिए. हम अपना काम इतनी सफाई से करेंगे कि हमारा कोई कुछ नहीं कर पाएगा.’’

समीर कुछ पलों के लिए सोच में डूब गया. नौकरी से निकाले जाने के कारण वह भी दयारानी से मन ही मन खार खाए बैठा था. इसलिए वह वारिस का साथ देने को तैयार हो गया. उस ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘ठीक है, लेकिन एक शर्त है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘दयारानी के मरने के बाद उस की सारी दौलत गीता को मिलेगी. तुम उस के पति हो, इसलिए तुम ऐश करोगे. मुझे क्या मिलेगा? उस में मुझे भी हिस्सा चाहिए.’’

वारिस तो पहले से ही इस बारे में सोचे बैठा था. उस ने वादा कर लिया. रुपयों का लालच दे कर उन्होंने इस काम में अपने एक अन्य परिचित नदीम को भी शामिल कर लिया. नदीम राजनगर में मुर्गामीट की दुकान चलाता था और कैलाभट्टा में ही रहता था. बातचीत तय होने के बाद वारिस ने 315 बोर के एक तमंचे का इंतजाम किया. उस की गीता से रोजाना बातें होती थीं, लेकिन उस ने अपने इस खतरनाक इरादे को कभी उस पर जाहिर नहीं होने दिया. 3 जुलाई की रात तकरीबन 10 बजे तीनों मोटरसाइकिल से दयारानी के घर के पास पहुंच गए.

समीर ने चूंकि दयारानी के यहां कई सालों तक नौकरी की थी, इसलिए उसे पता था कि वह जिस कमरे में सोती हैं, उस की एक खिड़की सड़क की ओर खुलती है. उन्होंने वहीं से उन्हें निशाना बनाने का फैसला किया. जब वे पहुंचे थे तो दयारानी के घर के पास की परचून की दुकान खुली थी. वे दुकान बंद होने का इंतजार करने लगे. उसी बीच वारिस ने गीता से मोबाइल पर रोज की तरह बात की. 11 बजे दुकान बंद होने के बाद सीसीटीवी कैमरे की जद से बचने के लिए दीवार के सहारे वे खिड़की तक पहुंचे. उन्होंने जाली से अंदर झांक कर देखा तो दयारानी सो रही थीं.

गोली की आवाज से आसपास के लोग इकट्ठा हो सकते थे. इसलिए वे ट्रेन के आने का इंतजार करने लगे. ट्रेन के हौर्न के शोर में गोली चलाने से किसी को कुछ पता नहीं चल सकता था. वारिस खिड़की पर तमंचा रख कर दयारानी के सिर को निशाना बना कर ट्रेन के आने का इंतजार करने लगा. जैसे ही ट्रेन का हौर्न बजा, उस ने गोली चला दी. गोली मार कर तीनों भाग खड़े हुए. अगले दिन हत्या का पता चलने पर समीर और वारिस पूरी तरह से अंजान बन कर अफसोस जाहिर करते रहे. पुलिस ने सबूत के तौर पर तीनों के मोबाइल की लोकेशन भी निकलवा ली है. वारिस के कब्जे से 315 बोर का वह तमंचा भी बरामद कर लिया है, जिस से हत्या की गई थी.

इस के अलावा उस के पास से एक चाकू भी बरामद किया गया है. इस के बाद पुलिस ने समीर को गिरफ्तार कर लिया था. पूछताछ के बाद सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया गया. जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हुई थी. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Moradabad Crime News: मां पर भारी, बेटी का प्यार

Moradabad Crime News: शिवानी को यह बात पसंद नहीं थी कि उस की मां कुसुम उस के प्यार पर अंकुश लगाए. कुसुम ने बेटी पर जब सख्ती की तो शिवानी ने भी ऐसा कदम उठाया कि वह कोख का कलंक बन बैठी मुरादाबाद महानगर के मोहल्ला बंगला गांव की रहने वाली कुसुम ने बृहस्पतिवार को व्रत रखा था. जिस दिन उस का व्रत होता था उस दिन वह मोहल्ले के मंदिर में जरूर जाती थी. लिहाजा उस दिन भी वह मंदिर गई. मंदिर से लौटतेलौटते रात के 8 बजे गए.

उसी समय मोहल्ले की बिजली गुल हो गई. वह अंधेरे में अपने दरवाजे पर पहुंची. इस से पहले कि वह दरवाजा खुलवा कर घर में जाती, उसी समय किसी ने उस के पीछे से सिर पर किसी चीज से वार किया. वार इतनी जोर से किया गया था कि उस का सिर फट गया और वह चीख कर नीचे गिर गई. यह बात 7 मई, 2015 की है. चीखने की आवाज सुन कर उस की बेटी शिवानी दरवाजा खोल कर बाहर आई. उस ने दरवाजे के बाहर की सीढि़यों पर मां को पड़ी देखा तो घबरा गई.

वह मां को उठाने लगी, तभी उस के हाथ खून से सन गए. इस के बाद तो उस की चीख निकल गई. वह जोरजोर से रोने लगी. रोने की आवाज सुन कर उस की भाभी रीना और आसपड़ोस के लोग आ गए. लहूलुहान हालत में कुसुम को देख कर लोग हैरान रह गए. लोग तुरंत ही उसे नजदीक में ही स्थित डी.एल. अस्पताल ले गए. वहां के डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. कुसुम राजकुमार की पत्नी थी. राजकुमार और उस के दोनों बेटे सचिन व अमन शहर के ही चौमुखापुल पर स्थित गारमेंट की अलगअलग दुकानों में नौकरी करते थे. जैसे ही उन्हें घटना की जानकारी मिली, वे घर पहुंच गए.

उसी समय किसी ने फोन द्वारा इस वारदात की खबर पुलिस को भी दे दी थी. पुलिस चौकी घटनास्थल से थोड़ी ही दूर पर थी, इसलिए पुलिस चौकी पर मौजूद पुलिसकर्मी तुरंत तारों वाली गली में उस जगह पर पहुंच गए, जहां कुसुम पर हमला किया गया था. पुलिस वालों को जब पता चला कि घायल महिला कुसुम को लोग डी.एल. अस्पताल ले गए हैं तो पुलिस वाले भी वहीं पहुंच गए. वहां उन्हें जानकारी मिली कि कुसुम मर चुकी है तो उन्होंने इस की सूचना थाना नागफनी को दे दी.

हत्या की बात सुनते ही थानाप्रभारी अस्पताल पहुंच गए. तब तक मोहल्ले के सैकड़ों लोग डी.एल. अस्पताल के सामने जमा हो चुके थे. घटना को ले कर उन के मन में आक्रोश था. खबर मिलते ही एसएसपी लव कुमार, एसपी सिटी डा. रामसुरेश यादव, महेश सिंह राणा भी भारी पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए. अस्पताल में ही मृतका कुसुम की बेटी शिवानी चीखचीख कर आरोप लगा रही थी कि उस की मां की हत्या पड़ोस में रहने वाले अनिल ने की है. पुलिस ने सब से पहले घटनास्थल की जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

इस के बाद शिवानी से बात की तो उस ने बताया कि अनिल ने ही लोहे की रौड मार कर मां की हत्या की है. हाथ में रौड थामे भागते हुए अनिल को उस ने अपनी आंखों से देखा था. पुलिस ने जब उस से इस की वजह पूछी तो उस ने बताया कि अनिल काफी दिनों से उस की मां के पीछे पड़ा था. मां ने उस के खिलाफ कई बार थाने में लिखित शिकायत भी की थी, लेकिन पुलिस ने उन की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया था. शिवानी ही नहीं, उस के घर के सभी लोग हत्या का आरोप अनिल पर ही लगा रहे थे. मृतका के बेटे सचिन ने अनिल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए एक तहरीर भी दी.

उस की तहरीर के आधार पर अनिल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. एसएसपी ने हत्या के इस केस को खोलने के लिए सीओ महेश सिंह राणा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित कर दी. अनिल चूंकि मृतका के पड़ोस की नेता वाली गली में रहता था, इसलिए पुलिस टीम उस के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. घर वालों ने बताया कि वह दिल्ली गया हुआ है. घर पर अनिल के न मिलने पर पुलिस को भी उस पर शक हुआ कि वह वारदात कर के कहीं भाग गया है. पुलिस ने उस के घर वालों से अनिल का दिल्ली का ठिकाना मालूम किया तो उन्होंने अनभिज्ञता जता दी. पुलिस ने उस के घर वालों को हिदायत दी कि वे किसी भी तरह अनिल के पास खबर कर दें कि वह जल्द से जल्द थाने में आ कर मिले.

अनिल का मोबाइल नंबर ले कर सीओ अपने कार्यालय लौट आए. उस के फोन नंबर को उन्होंने सर्विलांस पर लगवाया तो उस की मौजूदा लोकेशन दिल्ली की ही आ रही थी. सीओ महेश राणा ने अनिल से फोन पर बात की और उसे विश्वास में ले कर कहा कि तुम से बहुत जरूरी बात करनी है. इसलिए जल्द से जल्द मुरादाबाद आ जाओ. अगर नहीं आए तो समझ लो कि तुम्हारे घर वाले इस का खमियाजा भुगतेंगे. अनिल समझ नहीं पा रहा था कि सीओ साहब ने उस से इस तरह क्यों बात की? ऐसी क्या बात हो गई, जो वह उसे थाने में बुला रहे हैं. इस के तुरंत बाद अनिल ने अपने घर वालों को फोन किया तो उसे पता चला कि किसी ने तारों वाली गली में कुसुम की हत्या कर दी है. अब उस की बेटी शिवानी कह रही है कि हत्या अनिल ने की है.

अनिल को जब पता चला कि कुसुम की हत्या में उस का नाम आ रहा है तो वह परेशान हो गया. अब वह समझ गया कि यदि वह मुरादाबाद नहीं पहुंचा तो पुलिस उस के घर वालों को जरूर परेशान करेगी. इसलिए वह अगले दिन यानी 8 मई को ही बस से मुरादाबाद के लिए चल पड़ा. अनिल जानता था कि कुसुम की हत्या उस ने नहीं की है, इसलिए उसे कोई डर नहीं है. मुरादाबाद पहुंचने के बाद वह अपने घर जाने के बजाय सीधे थाना नागफनी पहुंच गया. थानाप्रभारी ने सीओ महेश राणा को अनिल के थाने में पहुंचने की जानकारी दी तो वह भी थाने पहुंच गए. उधर मोहल्ले के लोगों ने पोस्टमार्टम के बाद कुसुम की लाश को बंगला गांव चौराहे पर रख कर जाम लगा दिया.

लोगों का कहना था कि जब रिपोर्ट अनिल के खिलाफ लिखी जा चुकी है तो पुलिस उसे गिरफ्तार क्यों नहीं कर रही है. अनिल पुलिस का मुखबिर भी था, इसलिए लोगों को शक था कि पुलिस उसे बचा रही है. शहर के व्यस्त चौराहे पर जाम लगने से उधर से गुजरने वाले वाहनों की गति थम गई. कचहरी तक वाहनों की कतार लग गई. पुलिस प्रशासन तुरंत हरकत में आ गया. पुलिस अधिकारी आंदोलनकारियों को समझाने में लग गए, लेकिन लोग उन की बात सुनने को तैयार नहीं थे. मृतका की बेटी शिवानी अनिल के गिरफ्तार न करने पर पुलिस पर बरस रही थी. जब एसएसपी लव कुमार ने लोगों को अनिल को हिरासत में ले लिए जाने की जानकारी दी, तब लोगों ने जाम हटाया.

अनिल पुलिस के कब्जे में था, इसलिए पुलिस को उम्मीद थी कि अब केस खुल जाएगा. पुलिस ने अनिल से कुसुम की हत्या की बावत पूछताछ की तो उस ने बताया कि कुसुम की हत्या में उस का कोई हाथ नहीं है. जिस समय उस की हत्या हुई थी, उस समय वह दिल्ली में था. मगर पुलिस को उस की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. लिहाजा उस से सख्ती से पूछताछ की गई. वह बारबार एक ही बात दोहराता रहा. उस ने कहा कि जिस समय कुसुम की हत्या होने की बात कही जा रही है, उस समय वह दिल्ली के शाहदरा इलाके में मैट्रो स्टेशन के पास स्थित दुकान से शराब खरीदने गया था.

लेकिन वह दुकान बंद मिली तो थोड़ी दूर स्थित एक होटल में खाना खाने चला गया. पुष्टि के लिए पुलिस टीम अनिल को दिल्ली ले गई. साथ में वह मृतका के पति राजकुमार और बेटे सचिन को भी साथ ले गई. जिस दुकान से अनिल शराब खरीदने गया था, उस दुकान के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज की जांच की गई. उस फुटेज में अनिल दिख गया. इस के बाद पुलिस उस होटल पर भी गई, जहां अनिल ने खाना खाया था.उस होटल के सीसीटीवी फुटेज से पता चला कि उस दिन शाम 7:55 से 8:05 बजे के बीच अनिल की मौजूदगी उस होटल में थी. इस से एक बात साफ हो गई कि कुसुम की हत्या के समय अनिल की मौजूदगी मुरादाबाद में नहीं थी यानी कुसुम का हत्यारा कोई और ही था.

पुलिस टीम दिल्ली से मुरादाबाद लौट आई. मुरादाबाद पहुंचने पर अनिल ने पुलिस को एक महत्त्वपूर्ण जानकारी दी. उस ने बताया कि कुसुम की बेटी शिवानी और पड़ोस में ही रहने वाले विक्की के बीच कई सालों से चक्कर चल रहा है. यह जानकारी मिलते ही सीओ महेश राणा का माथा ठनका कि कहीं यह मामला लव ऐंगल का तो नहीं है. अनिल के बेकसूर साबित होने पर उन्होंने उसे घर भेज दिया और उसी दिन शिवानी व पड़ोसी युवक विक्की के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स देख कर पुलिस हैरान रह गई.

उस से पता चला कि उन दोनों की एकदूसरे से अकसर बातें होती रहती थीं और काफी देर तक. घटना से कुछ देर पहले और बाद में भी दोनों की बातें हुई थीं. इस से पुलिस को शिवानी और विक्की पर शक हो गया. पूछताछ के लिए पुलिस दोनों को थाने ले आई. दोनों से कुसुम की हत्या के बारे में पूछा गया तो शिवानी पुलिस पर हावी होते हुए बोली, ‘‘सर, मेरी ही मां की हत्या हुई है और आप मुझ से ही इस तरह पूछ रहे हैं, जैसे मैं ने ही उन्हें मारा है. जिस ने मारा था, उसे तो आप ने छोड़ दिया. आप ही बताइए, भला मैं अपनी मां को क्यों मारूंगी? आप मुझे ज्यादा तंग करेंगे तो एसएसपी साहब से आप की शिकायत कर दूंगी.’’

‘‘देखो, तुम जिस से चाहो शिकायत कर देना, हमें तो केस की जांच करनी है,’’ सीओ महेश सिंह राणा ने कहा. ‘‘अब तुम यह बताओ कि तुम्हारी विक्की से फोन पर इतनी बातें क्यों होती हैं. यह तुम्हारा कोई रिश्तेदार है क्या?’’

‘‘सर, फोन पर क्या रिश्तेदारों से ही बातें हो सकती हैं. हम किसी से भी बात कर सकते हैं. विक्की हमारे मोहल्ले में रहता है. अगर इस से बात कर लेती हूं तो कोई आपत्ति या गुनाह है क्या.’’ शिवानी बोली.

‘‘हमें भला क्यों आपत्ति होगी, लेकिन यह तो बताना ही होगा कि तुम्हारी मां की हत्या से पहले और बाद में उस से क्या बातें हुईं थीं?’’ सीओ ने पूछा तो शिवानी के चेहरे का रंग उड़ गया. वह खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘नहीं, मेरी इस से कोई बात नहीं हुई. किसी ने गलत बताया होगा.’’

‘‘गलत नहीं बताया. यह देखो, तुम ने कबकब इस से बात की है, इस में पूरी डिटेल्स है.’’ सीओ ने काल डिटेल्स उस के सामने रखते हुए कहा.

शिवानी अब झूठ नहीं बोल सकती थी, क्योंकि उन्होंने सच्चाई उस के सामने रख दी थी. उस की चुप्पी से सीओ राणा समझ गए कि उन की जांच सही दिशा में जा रही है. इस के बाद उन्होंने उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की तो शिवानी ने कबूल कर लिया कि मां की हत्या उस ने ही कराई थी. उस ने इस हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

शिवानी मुरादाबाद के मोहल्ला बंगला गांव के रहने वाले राजकुमार की बेटी थी. शिवानी के अलावा राजकुमार के 2 बेटे थे, सचिन और अमन. राजकुमार शहर में ही चौमुखापुल बाजार में एक कपड़े की दुकान पर नौकरी करता था. उस के दोनों बेटे जब इंटरमीडिएट से ज्यादा नहीं पढ़ सके तो उस ने उन्हें भी उसी मार्केट में गारमेंट्स की अलगअलग दुकानों पर नौकरी पर लगवा दिया. तीनों जनों के कमाने से घर में अच्छी रकम आने लगी तो राजकुमार वे पैसे शराब पीने में उड़ाने शुरू कर दिए. बंगला गांव की ही नेता वाली गली में अनिल रहता था. उस की और राजकुमार की अच्छी दोस्ती थी. दोस्ती के नाते दोनों शाम को अकसर साथ बैठ कर शराब पीते थे.

शराब की महफिल राजकुमार के घर पर ही जमती थी. बताया जाता है कि उसी दौरान अनिल और राजकुमार की बीवी कुसुम के बीच नाजायज ताल्लुकात हो गए. उन के ये संबंध कई सालों तक जारी रहे. उसी दौरान शिवानी को घर पर ट्यूशन पढ़ाने के लिए नरेंद्र उर्फ विक्की नाम का युवक आता था. वह वकालत की पढ़ाई कर चुका था और नौकरी की तैयारी कर रहा था. ट्यूशन पढ़ातेपढ़ाते विक्की शिवानी को प्यार करने लगा. एक दिन उस ने अपने दिल की बात शिवानी को बताई तो वह उस के प्रस्ताव को नहीं ठुकरा सकी. इस तरह दोनों प्यार की पींगें बढ़ाने लगे.

उधर मां अनिल के साथ गुलछर्रे उड़ा रही थी तो इधर शिवानी विक्की के प्यार की नदी में तैरना सीख रही थी. लेकिन इस से पहले कि वह अच्छी तैराक बन पाती, कुसुम को उस की सच्चाई किसी तरह पता चल गई. फिर क्या था, कुसुम ने उस का ट्यूशन बंद करा दिया और उस के लिए लड़का देखने लगी, ताकि जल्दी से उस के हाथ पीले कर के चिंतामुक्त हो सके. शिवानी ने शादी के लिए मना भी किया, लेकिन कुसुम और उस के पति ने एक न सुनी. उन्हें शहर के ही लाइन पार इलाके में एक लड़का मिल गया. फिर नवंबर, 2014 में उस के साथ उस की शादी कर दी गई.

शिवानी बेमन से ससुराल चली जरूर गई, लेकिन उस का ससुराल में मन नहीं लगता था. किसी न किसी बहाने से वह मायके आ जाती. शादी करने के बाद कुसुम को लग रहा था कि शिवानी विक्की को भूल गई होगी, लेकिन यह उस की भूल थी. शिवानी के दिल में विक्की पूरी तरह से बसा था. मायके आने के बाद वह चोरीछिपे उस से मिल लेती थी. उधर अनिल और कुसुम के बीच मतभेद हो गए. दरअसल अनिल ने शिवानी की शादी में कुसुम को कुछ रुपए दिए थे. अब उसे पैसों की जरूरत थी तो उस ने कुसुम से अपने पैसे मांगे, लेकिन वह पैसे देने में आनाकानी कर रही थी. इसी बात को ले कर उन दोनों की आपस में कई बार कहासुनी भी हुई थी, जिस की शिकायत कुसुम ने पुलिस से भी की थी.

उधर शिवानी की विक्की के साथ फिर से नजदीकियां बढ़ती जा रही थीं. वह पति के बजाय विक्की के साथ ही अपना जीवन बिताना चाहती थी. कुसुम को जब पता चला कि शिवानी का विक्की के साथ चक्कर अब भी चल रहा है तो उस ने शिवानी को समझाया, पर वह विक्की को छोड़ने को कतई तैयार नहीं थी. तब उस ने बेटी से कह दिया कि वह अपनी ससुराल में ही रहे. बारबार यहां न आया करे. शिवानी को मां की यह बात बहुत बुरी लगी. वह महसूस करने लगी कि मां ही उस के प्यार में रोड़ा बनी हुई है. इस के बाद उस ने विक्की के साथ मिल कर मां को ही ठिकाने लगाने की योजना बना डाली.

योजना के अनुसार, 5 मई, 2015 को नरेंद्र उर्फ विक्की ने बाजार से लोहे की एक रौड खरीद ली. शिवानी को मालूम था कि उस की मां शाम के समय बाजार से सामान खरीदने जरूर निकलती है. विक्की का घर उस के घर के पास ही था. इसलिए योजना आसानी से सफल होने की उम्मीद थी. 7 मई, 2015 को कुसुम का व्रत था. वह शाम को मोहल्ले में ही स्थित मंदिर गई. उसी दौरान इलाके की बिजली गुल हो गई. 8 बजे के करीब शिवानी को पता था कि मां मंदिर गई हुई है और बिजली भी गुल है, इसलिए उस ने मौके का फायदा उठाने के लिए प्रेमी विक्की को फोन कर दिया. विक्की लोहे की रौड ले कर शिवानी के घर के पास ही एक जगह छिप कर कुसुम के मंदिर से लौटने का इंतजार करने लगा.

गली में उस समय सन्नाटा था. उसे कुसुम आती दिखाई दी तो वह सतर्क हो गया और जैसे ही वह अपने दरवाजे की सीढि़यां चढ़ने को हुई, विक्की ने रौड से एक जोरदार वार उस के सिर पर कर दिया, जिस से कुसुम वहीं गिर गई. विक्की तुरंत वहां से भाग गया. मां के चीखने की आवाज सुन कर शिवानी समझ गई कि विक्की ने काम कर दिया है. वह तुरंत घर से बाहर आई और रोने का नाटक करने लगी. रोते समय वह बारबार अनिल का नाम ले रही थी कि उसी ने मां को मारा है. शिवानी ने इस केस में अनिल को फंसाने की साजिश इसलिए रची थी कि उस की मां और अनिल का कई बार झगड़ा भी हुआ था. इस वजह से पुलिस समझ जाएगी अनिल ने ही यह हत्या की होगी.

शिवानी ने प्रेमी को बचाने की योजना तो फूलप्रूफ बनाई थी, लेकिन पुलिस की जांच के आगे उस की सारी चालाकी धरी की धरी रह गई. उस से पूछताछ करने के बाद उस के प्रेमी नरेंद्र उर्फ विक्की ने भी अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को कुसुम की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया. शिवानी ने अपने स्वार्थ के लिए अपनी मां की हत्या तो करा दी, लेकिन अब उसे इस का अफसोस हो रहा है. Moradabad Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Crime Story: गलतफहमी – बेकसूर परिवार को मिली सजा

Crime Story: भीकाजी बोर्डे का घर औरंगाबाद के चिखनठाना की चौधरी कालोनी में था.बोर्डे परिवार में कुल जमा 3 सदस्य थे. भीकाजी बोर्डे, पत्नी कमलाबाई और बेटा भगवान दिनकर बोर्डे. भीकाजी की एक बेटी भी थी विमल, जिस की वह शादी कर चुके थे. विमल 2 बच्चों की मां थी और पति से चल रहे किसी विवाद की वजह से मायके में रह रही थी. उस के दोनों बच्चे पति के पास रह रहे थे.

23 वर्षीय अमोल बोर्डे भगवान दिनकर बोर्डे का दोस्त था. उस का घर बोर्डे परिवार के घर से कुछ दूरी पर था. दोनों हमउम्र थे. दोस्ती के नाते दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना था.

जब से भीकाजी की बेटी विमल मायके आई थी, तब से अमोल भीकाजी के घर कुछ ज्यादा ही आने लगा था. उसे इस बात की जानकारी थी कि विमल और उस के पति के बीच तनातनी चल रही है और वह हालफिलहाल पति के पास जाने वाली नहीं है. दरअसल, अमोल अभी अविवाहित था, इसलिए दोस्त की बहन को दूसरी नजरों से देखने लगा था.

भाई का दोस्त होने के नाते विमल उसे भी भाई समझती थी. वह बात भी उसी अंदाज में करती थी. वैसे भी विमल बातूनी लड़की थी. जब विमल और अमोल के बीच बातों का सिलसिला जुड़ा तो अमोल ने बातों के कुछ शब्दों को ऐसा रंग देना शुरू कर दिया कि उस की चाहत नजर आए. उस के ऐसे शब्दों पर या तो विमल ने ध्यान नहीं दिया या दिया भी तो उस की बातों को गंभीरता से नहीं लिया. अमोल ने मीठीमीठी बातों से विमल को शीशे में उतारने की काफी कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. बहुत कुछ समझ कर भी विमल अमोल को ऐसा कुछ नहीं कहना चाहती थी जिस से भाई भगवान दिनकर और अमोल की दोस्ती में दरार पड़े. लेकिन वह कब तक यह सब सहन करती.

आखिर एक दिन सब्र का प्याला छलक ही गया. हुआ यह कि उस दिन विमल घर पर अकेली थी. अमोल को पता चला तो वह मौके का फायदा उठाने की सोच कर उस के घर पहुंच गया. विमल ने उसे बैठने के लिए कुरसी दी और उस के लिए चाय बनाने चली गई. उस समय वह घर में अकेली थी. अमोल ने अपनी मनमरजी करने के लिए इस मौके को उचित समझा. वापस लौट कर विमल ने चाय का प्याला अमोल को दिया तो उसी समय अमोल ने उस का हाथ पकड़ लिया. उस की इस हरकत पर विमल चौंक गई. उस की नीयत में खोट देख कर उसे गुस्सा आ गया. उस ने अपना हाथ छुड़ाने के बाद चाय का प्याला मेज पर रखा, फिर उसे जम कर लताड़ा और उसी समय घर से भगा दिया.

अमोल को इस बात की उम्मीद भी नहीं थी कि विमल उस की इतनी बेइज्जती करेगी. विमल के हंसहंस कर बात करने से वह तो यही सोचता था कि विमल भी उसे चाहती है. इसी का फायदा उठाने के लिए वह आया भी था. लेकिन उसे उलटे विमल के गुस्से का सामना करना पड़ा. बेइज्जती सह कर वह उस समय वहां से चला गया. घर पहुंचने के बाद भी विमल द्वारा की गई बेइज्जती अमोल के दिमाग में घूमती रही. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि इस स्थिति में वह क्या करे.

उधर शाम के समय विमल के मातापिता और भाई घर लौटे तो विमल ने अमोल की हरकत मां कमलाबाई को बता दी. कमलाबाई को बहुत गुस्सा आया. अमोल उस के बेटे का दोस्त था इसलिए वह उसे भी अपने घर का सदस्य समझती थी, लेकिन उस की सोच इतनी घटिया थी, वह नहीं समझ पाई थी. घर की बदनामी को देखते हुए कमलाबाई ने इस बात का शोरशराबा तो नहीं किया लेकिन बेटी को उस से सतर्क रहने की सलाह जरूर दे दी.

अगले दिन अमोल को अपने दोस्त यानी विमल के भाई भगवान दिनकर बोर्डे की याद आई. वह उस के साथ घूमता और गप्पें मारता था, इसलिए उस का मन दोस्त से मिलने के लिए कर रहा था. विमल ने जिस तरह उसे लताड़ा था, वह बात भी उस के दिमाग में घूम रही थी. अमोल यह समझ रहा था कि उस ने विमल के साथ जो हरकत की थी, उस के बारे में विमल अपने घर वालों से चर्चा तक नहीं करेगी, क्योंकि ज्यादातर लड़कियां इस तरह की बातें शुरुआत में अपने तक ही छिपा कर रखती हैं. मातापिता को ये बातें बताने में उन्हें शर्म महसूस होती है.

यही सोच कर अमोल बिना किसी डर के अपने दोस्त भगवान दिनकर बोर्डे से मिलने उस के घर पहुंच गया. विमल अमोल की हरकत मां को पहले ही बता चुकी थी. लिहाजा विमल की मां कमलाबाई ने अमोल को आड़े हाथों लिया. उस ने भी अमोल को जम कर खरीखोटी सुनाई. इतना ही नहीं, उसे बेइज्जत करते हुए धमकी दी कि वह इसी समय वहां से चला जाए और आइंदा उस के घर में कदम न रखे.

बेइज्जती सह कर अमोल वहां से उलटे पांव लौट आया. इस अपमान की ज्वाला उस के सीने में दहकने लगी थी. उस ने तय कर लिया कि विमल और उस की मां ने उस की जो बेइज्जती की है, वह उस का बदला जरूर लेगा. बदले की भावना उस के मन में घर कर गई. बात 25 सितंबर, 2019 की है. अमोल अपने घर पर ही था. उस के दिमाग में बेइज्जती वाली बातें ही घूम रही थीं. वह सोच रहा था कि इस अपमान का बदला कैसे ले. रात के 8 बजे थे. उस समय अमोल को भूख लगी थी. उस ने अपनी मां से खाना परोसने को कहा. मां खाना परोस कर ले आई.

निवाला तोड़ कर वह खाने को हुआ, तभी उस के दिमाग में बदला लेने वाली बात फिर आ गई. अमोल ने खाना छोड़ दिया और किचन की तरफ चल दिया. उस की मां ने बिना खाना खाए उठने की वजह पूछी, लेकिन वह कुछ नहीं बोला. अमोल ने किचन से चाकू उठा कर अपनी जेब में रख लिया. उस की मां पूछती रही, लेकिन उस ने कोई जवाब नहीं दिया. वह घर के बाहर निकल गया. मां पूछने के लिए उस के पीछेपीछे आ रही थी, लेकिन अमोल ने घर का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया ताकि मां घर से बाहर न आए. उस की मां, पिता और भांजी घर में ही बंद रह गए. वे समझ नहीं पा रहे थे कि अमोल ने ऐसा क्यों किया.

अपने घर से करीब 70 मीटर दूर वह सीधे विमल के घर में घुस गया. घर में घुसते ही उस ने मुख्य दरवाजा बंद कर दिया. उस समय वह बहुत गुस्से में था. विमल के मांबाप ने जब अमोल को अपने घर में देखा तो उन्होंने उस से वहां आने की वजह पूछी. तभी अमोल ने जेब में रखा चाकू निकाल लिया और अपने दोस्त दिनकर बोर्डे की तरफ बढ़ा. अमोल को गुस्से में देख कर भगवान बोर्डे अपनी जान बचाने के लिए भागा. अमोल ने दौड़ कर भगवान को पकड़ लिया और उस की गरदन पर चाकू से वार कर दिया. तभी भगवान के मातापिता भी वहां आ गए. बेटे के खून के छींटें उन के ऊपर भी गए. दिनकर भगवान बोर्डे वहीं गिर गया और कुछ ही देर में उस की मृत्यु हो गई.

इस के बाद अमोल बोर्डे ने दिनकर की मां कमलाबाई पर हमला किया. फिर उस ने उस के पिता को भी निशाने पर ले लिया. इस तरह उस ने परिवार के 3 लोगों की हत्या कर दी. इस दौरान विमल दरवाजा खोल कर बाहर भाग गई थी. विमल ने यह बात पड़ोसियों को बताई तो वे घरों से बाहर निकल आए. 3 हत्याएं करने के बाद अमोल खून सना चाकू ले कर घर से बाहर निकला तो कई लोग वहां खड़े थे. लेकिन अमोल की आंखों में तैर रहे गुस्से और खून सने चाकू को देख कर कोई भी कुछ कह नहीं सका और वह वहां से चला गया.

किसी ने इस तिहरे हत्याकांड की खबर पुलिस को दे दी थी. सूचना मिलने पर एमआईडीसी सिडको थाने के प्रभारी सुरेंद्र मोलाले थोड़ी देर में दिनकर बोर्डे के घर पहुंच गए. तभी लोगों ने पुलिस को अमोल बोर्डे के बारे में जानकारी दी कि वह चौराहे पर खड़ा है. यह सूचना मिलने के बाद पुलिस ने चौराहे पर खड़े अमोल बोर्डे को हिरासत में ले लिया. थानाप्रभारी सुरेंद्र मोलाले ने अभियुक्त अमोल से ट्रिपल मर्डर के बारे में पूछताछ की तो उस ने सारी कहानी बता दी.

उस ने कहा कि उस ने अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए इस वारदात को अंजाम दिया. अमोल बोर्डे से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. Crime Story

True Crime Story: लीना मारिया जालसाजी की नायिका

True Crime Story: बात 25 मई, 2013 की है. चेन्नई सेंट्रल क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर विजय कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम दिल्ली पुलिस॒ आयुक्त नीरज कुमार से मिली. टीम ने पुलिस आयुक्त को 2 फोटोग्राफ्स दिखाते हुए कहा कि ये दोनों बहुत बड़े जालसाज हैं और चेन्नई के कई लोगों से करोड़ों रुपए ठग कर फरार हो चुके हैं. इन के मोबाइल की लोकेशन बता रही है कि ये दोनों ठग दिल्ली में ही कहीं छिपे हुए हैं. इंसपेक्टर विजय कुमार ने यह भी बताया कि फोटो में जो युवती है, वह एक फिल्म अभिनेत्री है.

पुलिस आयुक्त ने इंसपेक्टर विजय कुमार से दोनों ठगों की काल डिटेल्स ले कर उस पर नजर डाली, तो पता चला कि उन के फोन की लोकेशन दक्षिणी दिल्ली के फतेहपुर बेरी इलाके की आ रही थी. इसलिए उन्होंने चेन्नई सेंट्रल क्राइम ब्रांच की टीम को दक्षिणी दिल्ली जिले के पुलिस उपायुक्त बी.एस. जायसवाल के पास भेज दिया. चेन्नई पुलिस टीम दक्षिणी दिल्ली के डीसीपी बी.एस. जायसवाल के पास पहुंच गई. टीम से बात करने के बाद पुलिस उपायुक्त ने वाहन चोर निरोधी दस्ते के इंचार्ज एसआई बलिहार सिंह को बुलाया और चेन्नई पुलिस के साथ मिल कर इस मामले में जौइंट औपरेशन चलाने को कहा.

चूंकि बलिहार सिंह अंतरराज्यीय अपराध के कई बड़े मामलों का खुलासा कर चुके थे इसलिए सब से पहले उन्होंने पूरे मामले को समझने के बाद चेन्नई क्राइम ब्रांच टीम से आरोपियों के रहनसहन, शौक आदि के बारे में जानकारी हासिल की.  इंसपेक्टर विजय कुमार ने उन्हें बताया कि जिन आरोपियों की उन्हें तलाश है, उन के नाम लीना मारिया पौल और बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेश चंद्रशेखर हैं. लीना मारिया पौल एक अभिनेत्री है. खास बात यह है कि ये दोनों ही शाही अंदाज में रहते हैं, महंगी गाडि़यां इस्तेमाल करते हैं और गाड़ी पर नीली या लालबत्ती लगा कर चलते हैं. बलिहार सिंह ने जब दोनों ठगों के फोन की करेंट लोकेशन चेक की तो वह फतेहपुर बेरी क्षेत्र की ही आ रही थी.

फतेहपुर बेरी इलाके में कई बड़े फार्महाउस भी हैं. इस से उन्होंने यही अनुमान लगाया कि वे लोग शायद किसी फार्महाउस में ही रह रहे होंगे. बलिहार सिंह ने एएसआई सुखविंदर सिंह, कांस्टेबल अमित कुमार, नरेश कुमार, मुनिंदर, अनिल कुमार आदि की टीम बना कर तुरंत फतेहपुर बेरी इलाके में भेज दिया और जिस मोबाइल टावर के क्षेत्र में आरोपियों के फोन थे, उस के आसपास के फार्महाउसों पर निगरानी करने को कहा. इस के अलावा उन्होंने फतेहपुर बेरी इलाके के कई प्रौपर्टी डीलरों से भी यह पता लगाने की कोशिश की कि उन की मार्फत किसी आदमी या औरत ने कोई फार्महाउस तो किराए पर नहीं लिया है. लेकिन प्रौपर्टी डीलरों से उन्हें कोई खास जानकारी नहीं मिली.

दिल्ली पुलिस की जो टीम फतेहपुर बेरी इलाके में फार्महाउसों के बाहर वाच कर रही थी, उस ने देखा कि वहां स्थित असोला गांव के खारी फार्महाउस में महंगीमहंगी गाडि़यां आजा रही हैं. एएसआई सुखविंदर ने यह बात बलिहार सिंह को बता दी. बलिहार सिंह ने सुखविंदर से कह दिया कि वह अपना काम इस तरह करें कि उस फार्महाउस में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को भनक न लगे. पुलिस टीम गोपनीय रूप से अपने काम को अंजाम देती रही. अगले दिन पुलिस टीम से बलिहार सिंह को जो रिपोर्ट मिली, वह चौंकाने वाली थी.

उन्हें बताया गया कि फार्महाउस से जो लग्जरी कार निकलती है, उस के शीशों पर काली फिल्म चढ़ी होती है तथा उस के आगे हूटर बजाती हुई एक पायलट कार चलती है और पीछे सुरक्षाकर्मियों की कार. वह सुरक्षाकर्मी काले रंग के सफारीसूट पहने हुए होते हैं. जिस फार्महाउस से वे गाडि़यां निकलती थीं, उस पर एक राजनीतिक पार्टी का झंडा भी लगा हुआ था इसलिए उन्होंने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वहां कोई वीवीआईपी रहता हो. इस बारे में बलिहार सिंह ने डीसीपी से बात की तो डीसीपी ने सतर्कता के साथ औपरेशन जारी रखने को कहा.

डीसीपी के आदेश पर बलिहार सिंह भी उस फार्महाउस से कुछ दूर खडे़ हो कर निगरानी करने लगे. शाम के समय उन्होंने फार्महाउस से एक गाड़ी को निकलते हुए देखा. उस गाड़ी के शीशों पर काली फिल्म चढ़ी हुई थी. उस गाड़ी के आगे हूटर बजाती हुई एक पायलट गाड़ी चल रही थी जबकि पीछे सुरक्षाकर्मियों की गाड़ी थी. इस से ऐसा लगा कि फार्महाउस से निकलने वाला कोई महत्त्वपूर्ण व्यक्ति ही होगा.

दिल्ली पुलिस की टीम प्राइवेट गाड़ी में थी. फार्महाउस से निकलने वाला व्यक्ति कौन है और कहां जा रहा है, पता लगाने के लिए दिल्ली पुलिस की टीम भी कुछ फासला बना कर उन कारों के पीछे लग गई. कुछ देर बाद कारों का काफिला वसंतकुंज के एंबियंस मौल के सामने जा कर रुका. बीच वाली कार के रुकते ही पीछे वाली कार में चल रहे 4 बौडीगार्ड फुरती से उतर कर उस कार के पास जा कर खड़े हो गए. 1 बौडीगार्ड ने कार का पिछला दरवाजा खोला तो उस में से एक युवती उतरी. उतरने वाली युवती बेहद खूबसूरत थी.

उस ने जो कपड़े पहन रखे थे, उन से उस की खूबसूरती में और भी चार चांद लग गए थे. बलिहार सिंह ने जेब से फोटो निकाल कर उस युवती से चेहरा मिलाने की कोशिश की. वह मन ही मन खुश हुए क्योंकि वह युवती वही लीना मारिया पौल ही थी. जिस की तलाश में चेन्नई पुलिस दिल्ली आई हुई थी.  लीना मारिया पौल कार से अकेली ही उतरी थी. उस का साथी बालाजी उस के साथ नहीं दिखा. दिल्ली पुलिस दोनों को एक साथ गिरफ्तार करना चाहती थी इसलिए उस ने अकेली लीना मारिया को गिरफ्तार करना उचित नहीं समझा, बल्कि उस के वापस लौटने का इंतजार करने लगी.

थोड़ी खरीदारी कर के लीना मौल से बाहर आई और हूटर बजाती हुई पायलट गाड़ी के साथ असोला गांव के खारी फार्महाउस की तरफ रवाना हो गई. पुलिस उस के पीछेपीछे थी. दिल्ली पुलिस ने लीना मारिया को पहचान लिया था. वह खारी फार्महाउस में रह रही थी. इस का मतलब था कि बालाजी भी वहीं रह रहा होगा. उस वक्त शायद वह फार्महाउस में नहीं था. उम्मीद थी कि रात को वह जरूर आएगा. इसलिए दोनों को गिरफ्तार करने के लिए रात में ही दबिश देना ठीक था. बलिहार सिंह ने टीम के सदस्यों को फार्महाउस की निगरानी पर लगा दिया और अगली काररवाई पर रणनीति बनाने के लिए अपने औफिस लौट आए.

चेन्नई क्राइम ब्रांच की टीम दिल्ली के ही एक होटल में ठहरी हुई थी. डीसीपी बी.एस. जायसवाल ने चेन्नई क्राइम ब्रांच और दिल्ली पुलिस टीम के साथ मीटिंग की और इस संयुक्त टीम को कुछ जरूरी दिशानिर्देश दे कर फार्महाउस में दबिश डालने की इजाजत दे दी. दबिश के लिए उन्होंने जिले के अन्य थानों के कुछ पुलिसकर्मियों को भी उन के साथ भेज दिया. रात होने पर दिल्ली पुलिस ने खारी फार्महाउस को चारों ओर से घेर लिया. हालांकि फार्महाउस की दीवारें 10-12 फुट ऊंची थीं फिर भी फार्महाउस के बाहर सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त थे.

पुलिस ने फार्महाउस का गेट खुलवाया तो पहरे पर कई सिक्योरिटी गार्ड तैनात मिले. पुलिस सिक्योरिटी गार्डों से बात ही कर रही थी कि 4 बौडीगार्ड वहां आ गए. उन के हाथों में रिवाल्वर थे. इतनी ज्यादा पुलिस फोर्स देख कर बौडीगार्ड भी सकपका गए. पुलिस ने चारों बौडीगार्डों को काबू में कर के लीना मारिया को भी हिरासत में ले लिया. पुलिस ने पूरा फार्महाउस छान मारा लेकिन लीना मारिया का साथी बालाजी नहीं मिला. पूछताछ करने पर लीना ने बताया कि बालाजी फरार हो चुका है. तलाशी के दौरान वहां से 81 महंगी घडि़यां बरामद हुईं.

ये सभी घडि़यां विदेशी थीं. फार्महाउस में रोल्स रायस फैंटम, निसान जीटीआर, एस्टन मार्टिन, हमर-2, औडी-4, रेंज रोवर, मित्सुबिशी इवो, बीएमडब्ल्यू-5300, लैंड क्रूजर जैसी महंगी गाडि़यां खड़ी हुई थीं. जिन्हें देख कर लीना मारिया की शानोशौकत का अंदाजा लगाया जा सकता था. ये सभी गाडि़यां ऐसी थीं जिन्हें सिर्फ अरबपति ही खरीद सकते हैं. एक साथ इतनी गाडि़यां देख कर पुलिस भी सोच में पड़ गई कि इन लोगों का ऐसा कौन सा काम है जिस की बदौलत इन्होंने इतनी महंगी गाडि़यों का जखीरा खड़ा कर दिया.

पुलिस ने 25 वर्षीया लीना मारिया पौल से जब पूछताछ की, तो ठगी के धंधे से जुड़ने की उस की एक दिलचस्प कहानी सामने आई. लीना मारिया पौल के पिता सी.एस. पौल मूलरूप से केरल के त्रिशूर जिले के रहने वाले थे. शादी से पहले वह एक भारतीय कंपनी में इंजीनियर थे. उन की शादी के कुछ दिनों बाद ही उन की दुबई की मेस्को कंपनी में इंजीनियर के पद पर नौकरी लग गई. कुछ दिनों तक वह दुबई में अकेले रहे, बाद में वह पत्नी को भी साथ ले गए. सी.एस. पौल को अच्छीखासी तनख्वाह मिलती थी इसलिए उन्हें किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी. उन की जिंदगी मौजमजे से बीत रही थी.

इसी दौरान सी.एस. पौल एक बेटी के बाप बने. जिस का नाम लीना मारिया पौल रखा गया. लीना बेहद खूबसूरत थी. पौल दंपति उसे बहुत प्यार करते थे. उस की परवरिश बहुत ही नाजों में हुई. वह मांबाप की लाडली बेटी थी. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. पौल साहब बेटी की हर फरमाइश पूरी करते थे. पौल दंपति ने लाड़प्यार के साथसाथ लीना की पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान दिया. जिस की वजह से वह शुरू से ही पढ़ाई में होशियार रही. पिता ने लीना की दिलचस्पी को देखते हुए उसे बीडीएस (बैचलर औफ डेंटल सर्जरी) कराया. 20 साल की उम्र में वह दांतों की डाक्टर बन गई. लेकिन बीडीएस करने के बाद लीना का विचार ऐसा बदला कि घर वाले देखते ही रह गए.

पौल दंपति का केरल से पैदाइशी जुड़ाव था. अपने नातेरिश्तेदारों से मिलने के लिए वे दुबई से केरल आते रहते थे. बाद में लीना को भी भारत आना अच्छा लगने लगा, तो वह कभीकभार अकेली ही केरल आने लगी. लीना को बौलीवुड और दक्षिण भारतीय फिल्में पसंद थीं. लीना की खूबसूरती और फिगर बहुत ही प्रभावशाली थी. जब भी वह कोई भारतीय फिल्म देखती तो खुद की तुलना फिल्म की हीरोइन से करने लगती थी. वह सोचती थी कि यदि वह भी किसी तरह फिल्मी दुनिया में चली जाए, तो किस्मत खुल जाएगी. दौलत और शोहरत उस के कदमों में होगी. यही सोच कर उस ने डाक्टरी पेशा शुरू करने का विचार छोड़ दिया.

सी.एस. पौल को इस बात का पता नहीं था कि लीना ने दिमाग में कोई दूसरा प्लान बना रखा है. वह तो यही सोच रहे थे कि लीना या तो दुबई के ही किसी अस्पताल में नौकरी करेगी या फिर दांतों का अपना क्लिनिक खोलेगी. मगर एक दिन लीना ने जब पिता को अपने मन की बात बताई तो वह चौंके. उन्होंने उसे समझाया, ‘‘बेटा, फिल्मी दुनिया में जाना इतना आसान नहीं है. इस के लिए बाकायदा ट्रेनिंग की जरूरत होती है. जबकि तुम्हारे पास इस तरह का कोई अनुभव नहीं है. इसलिए तुम ये फालतू की बातें छोड़ कर अपनी प्रैक्टिस करो या कहीं नौकरी कर लो.’’

‘‘डैडी, पता नहीं क्यों मेरा मन डाक्टरी करने को नहीं कर रहा. मैं फिल्म लाइन में अपनी किस्मत आजमाना चाहती हूं. मुझे उम्मीद है कि कोशिश करने पर मुझे सफलता जरूर मिलेगी.’’ लीना ने अपने मन की बात कह दी.

‘‘ठीक है, जैसी तुम्हारी मरजी. मगर ध्यान रखना कि इस लाइन में धोखेबाज बहुत हैं, उन से होशियार रहना.’’

पिता से अनुमति ले कर लीना दुबई से केरल आ गई. लीना खूबसूरत और आकर्षक फिगर की मल्लिका जरूर थी लेकिन उसे एक्टिंग का कोई अनुभव नहीं था. वह जानती थी कि दक्षिण भारतीय फिल्मों और बौलीवुड की फिल्मों में कई हीरोइनों ने मौडलिंग के रास्ते एंट्री की थी और अब वे सफल हैं. लीना ने कुछ ऐसी मौडलिंग एजेंसियों से संपर्क किया जहां मौडलिंग कर के कई लड़कियां फिल्मी दुनिया में गई थीं. लीना के आकर्षक लुक की वजह से एक मौडलिंग कंपनी ने उस के अलगअलग ऐंगल से कुछ फोटो खींचे और छपने के लिए उन्हें एक फेमस मैगजीन में भेज दिया.

मैगजीन में फोटो छपने से लीना मारिया को अच्छी पब्लिसिटी मिली. इस के बाद उस के फोटो कई मैगजीनों में छपे. इस की एवज में लीना को नाममात्र के ही पैसे मिले थे. लीना को इस रास्ते से आगे बढ़ना था इसलिए उस ने पैसों की तरफ ध्यान न दे कर और ज्यादा मेहनत की. कुछ दिनों बाद उस की खुशी तब और बढ़ी जब उसे कुछ विज्ञापन फिल्मों में काम करने का मौका मिला. इस के बाद लीना ने अलगअलग कंपनियों के कई उत्पादों की मौडलिंग की. इस से उसे नाम और दाम दोनों मिले. विज्ञापन फिल्मों में काम करने से लीना मारिया को जो पैसे मिलते, उन से वह अपना लिविंग स्टैंडर्ड मेंटेन करने लगी.

वह फाइवस्टार होटलों में विज्ञापन कंपनियों की तरफ से आयोजित होने वाली पार्टियों में शिरकत करती रहती थी. ऐसी ही एक पार्टी में उस की मुलाकात दक्षिण भारतीय फिल्मों के एक डाइरैक्टर से हुई. वह डाइरैक्टर सुप्रसिद्ध अभिनेता मोहनलाल के साथ ‘रेड चिलीज’ नाम से एक फिल्म बना रहे थे. उन्हें हीरोइन के लिए एक नए चेहरे की तलाश थी. लीना मारिया उन्हें अपनी फिल्म के लिए पसंद आ गई. लीना से उन्होंने अपनी फिल्म में काम करने के बारे में बात की, तो उस ने तुरंत हामी भर दी. क्योंकि यही उस का सपना था. उस के लिए खुशी की बात यह थी कि उसे पहली ही फिल्म में मोहनलाल जैसे सुप्रसिद्ध अभिनेता के साथ काम करने का मौका मिल रहा था. इसलिए उस ने डाइरैक्टर से पैसों के बारे में भी कोई बात नहीं की.

फिल्म बन जाने के बाद रिलीज हुई और दर्शकों को पसंद भी आई. पहली ही फिल्म सफल हो जाने पर लीना का आत्मविश्वास और बढ़ा. लीना की हिंदी और अंगरेजी के अलावा तमिल, तेलुगू और मलयालम भाषाओं पर भी अच्छी पकड़ थी. इसलिए उस ने तय कर लिया था कि उसे जिस भाषा की भी फिल्म मिलेगी, वह साइन कर लेगी. इस के बाद लीना मारिया को मलयालम फिल्म ‘कोबरा’ में काम करने का मौका मिला. इस फिल्म में हीरो ममूटी थे. यह फिल्म भी हिट हुई. फिर उस ने तमिल फिल्म ‘हसबैंड इन गोवा’ में काम किया. कई हिट फिल्में करने के बाद लीना ने बौलीवुड की तरफ कदम बढ़ाने शुरू कर दिए. अपनी अदाकारी के बूते वह बौलीवुड में जाना चाहती थी. इसलिए बौलीवुड में एंट्री के लिए उस ने अपने संपर्क बढ़ाने शुरू कर दिए.

लीना की मेहनत रंग लाई और सुजीत सरकार ने उसे अपनी फिल्म ‘मद्रास कैफे’ के लिए साइन कर लिया. लीना मारिया को इस फिल्म में लिट्टे के एक सदस्य का किरदार निभाना था. फिल्म में मशहूर अभिनेता जौन अब्राहम को लिया गया था. इस फिल्म की शूटिंग भी शुरू हो गई थी. लीना को हर जगह सफलता मिल रही थी इसलिए वह बहुत खुश थी. चूंकि यह सारी सफलताएं उसे फाइवस्टार होटलों की पार्टियों में शरीक होने के बाद ही मिली थीं, इसलिए शूटिंग से निपटने के बाद वह ऐसी पार्टियों में जरूर जाती थी.

ऐसी ही एक पार्टी में लीना मारिया की मुलाकात बालाजी नाम के व्यक्ति से हुई. बालाजी आकर्षक व्यक्तित्व का आदमी था. परिचय में उस ने खुद को पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि का पोता और बड़ा बिल्डर बताया. उस ने लीना की फिल्में देखी थीं, साक्षात मुलाकात होने पर वह मन ही मन उसे चाहने लगा. बालाजी लीना को हर हाल में अपने जाल में फांसना चाहता था इसलिए उस ने उस से कहा, ‘‘आप रामू को तो जानती ही होंगी?’’

‘‘रामू यानी रामगोपाल वर्मा…’’ लीना ने चौंक कर पूछा, तो बालाजी ने हां कहा.

‘‘सर, उन्हें कौन नहीं जानता. वह तो बौलीवुड के जानेमाने डाइरैक्टर हैं. उन्होंने न जाने कितनी हीरोइनों को फर्श से अर्श तक पहुंचा दिया.’’

‘‘वह मेरा दोस्त है. अभी 2 दिन पहले ही उस से मेरी मुलाकात हुई थी.’’ बालाजी ने कहा तो लीना की आंखों में चमक आ गई. वह मन ही मन सोचने लगी कि जब रामगोपाल वर्मा उस का दोस्त है तो उस की मार्फत उसे रामू की फिल्म में काम मिल सकता है. इसलिए वह चहकते हुए बोली, ‘‘सर, मैं खुशनसीब हूं जो आप से मुलाकात हुई. वैसे भी मैं इस वक्त बौलीवुड की तरफ ही ध्यान लगाए हुए हूं. एक फिल्म तो मिल भी चुकी है जिस की शूटिंग कुछ दिनों में खत्म होने वाली है.’’

‘‘लीना, पहली बात तो यह कि मुझे सर..सर कह कर बात मत करो. और दूसरी बात यह है कि रामू से जब मेरी बात हुई थी तो उस ने बताया था कि वह एक फिल्म बना रहा है जिस का अभी नाम नहीं रखा गया है. हीरोइन के लिए उसे किसी नई लड़की की तलाश है. यदि आप इच्छुक हों, तो उस से बात करूं?’’

रामगोपाल वर्मा की फिल्मों में काम करने के लिए तमाम लड़कियां लालायित रहती हैं. जबकि लीना मारिया को यह मौका बड़ी आसानी से मिल रहा था. इसलिए उस ने तुरंत हां कर दी. वह सोचने लगी कि रामगोपाल वर्मा की फिल्मों में काम मिलने से उस की किस्मत चमक जाएगी. इस मुलाकात के बाद लीना की बालाजी के साथ अकसर मुलाकातें होने लगीं. जल्दी ही दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई. बालाजी ने लीना को बौलीवुड के और भी कई डाइरैक्टरों के साथ मुलाकात कराने का आश्वासन दिया. लीना बालाजी के रहनसहन और ठाठबाट से बहुत प्रभावित थी. दोनों की दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदल गई. बाद में लीना ने उसे अपना तन तक सौंप दिया.

बालाजी ने लीना को शाही जिंदगी जीने का ऐसा चस्का लगा दिया कि वह उस की हकीकत जानने के बाद भी उस से दूर नहीं जा सकी. प्यार हो जाने के बाद लीना को पता लगा कि न तो वह पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि का पोता है और न ही कोई बड़ा बिल्डर बल्कि एक बड़ा जालसाज है. उस ने जालसाजी से करोड़ों रुपए कमाए थे. रातदिन मेहनत करने के बावजूद भी लीना इतने रुपए नहीं कमा पाई थी, जितने बालाजी ने उस के सामने ला कर रख दिए थे. बड़ेबड़े बिजनैसमैनों को ठगना बालाजी के बाएं हाथ का खेल था. लीना को बालाजी के साथ रह कर ऐश और कैश दोनों मिल रहे थे इसीलिए वह उस के साथ खुशीखुशी लिवइन रिलेशन में रह रही थी.

लीना ने जौन अब्राहम के साथ जो ‘मद्रास कैफे’ फिल्म की थी, वह अगस्त 2013 में रिलीज होगी. अगर वह चाहती तो उसे बौलीवुड की और भी फिल्मों में काम मिल सकता था लेकिन बालाजी के चंगुल में फंसने के बाद उस ने और फिल्मों में काम करने की कोशिश करनी बंद कर दी थी. मूलरूप से बंगलुरु का रहने वाला बालाजी खुद को कर्नाटक कैडर का आईएएस बताता था. वह कभी अपना नाम शेखर रेड्डी, तो कभी सुरेश चंद्रशेखर रख लेता था. कोच्चि के रहने वाले बैजू की इमैनुवल सिल्क के नाम से एक टेक्सटाइल कंपनी थी.

अपने बिजनैस के प्रमोशन के लिए कुछ बिजनैसमैनों ने प्रसिद्ध हीरो और हीरोइनों का सहारा लेना शुरू कर दिया है. बैजू ने भी कोट्टायम में अपने एक शोरूम का उद्घाटन कराने के लिए तेलुगू फिल्मस्टार अल्लु अर्जुन को बुलाया था, जिस की वजह से शहर में उन की खासी चर्चा हुई थी. वर्ष 2012 में वह चेन्नई में अपना नया शोरूम खोल रहे थे. इस के लिए वह बौलीवुड की किसी अभिनेत्री को बुलाना चाहते थे. बैजू बालाजी को जानते थे. उन्होंने बालाजी से किसी फिल्मस्टार को बुलाने के बारे में बात की. इस पर बालाजी ने बैजू को आश्वासन दिया कि वह उन के शोरूम के उद्घाटन के लिए बौलीवुड अभिनेत्री कैटरीना कैफ को बुला सकता है मगर वह 20 लाख रुपए लेगी.

बैजू खुश हो गए. उन्होंने बालाजी को 20 लाख रुपए दे दिए और अपने शोरूम का उद्घाटन अभिनेत्री कैटरीना कैफ से कराने के निमंत्रणपत्र छपवा कर बंटवा दिए. इस की पूरे इलाके में चर्चा फैल गई. बौलीवुड की फेमस हीरोइन के आने पर उसे देखने वालों की संख्या बढ़ना लाजिमी था. पुलिस को जब कैटरीना कैफ के आने की बात पता चली तो वह भी सक्रिय हो गई. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने भी पूरी योजना बना ली.

जिस दिन बैजू के शोरूम का उद्घाटन होना था, उस दिन सुबह से ही लोग उन के शोरूम के आसपास जुटने शुरू हो गए थे. भारी तादाद में पुलिस भी वहां पहुंच गई. भीड़ अनियंत्रित होती जा रही थी. सभी लोग कैटरीना कैफ के आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. भीड़ को देख कर बैजू खुश हो रहे थे. निर्धारित समय के बाद भी जब कैटरीना कैफ वहां नहीं पहुंची तो दर्शक निराश होने लगे.

बैजू बारबार बालाजी का नंबर मिला रहे थे लेकिन उस का फोन उस समय स्विच्ड औफ आ रहा था. भीड़ काबू करने में पुलिस को मशक्कत करनी पड़ रही थी इसलिए पुलिस वाले बैजू से बारबार कैटरीना के बारे में मालूमात कर रहे थे. परेशान बैजू की समझ में नहीं आ रहा था कि वह लोगों को क्या जवाब दे. निर्धारित कार्यक्रम के कई घंटों बाद भी जब कैटरीना कैफ वहां नहीं आईं, तो थकहार कर लोग गालियां देते हुए अपनेअपने घर चले गए. बैजू ने किसी और व्यक्ति से शोरूम का उद्घाटन कराया.

बालाजी का नंबर स्विच्ड औफ आने के बाद बैजू को शक हो गया. उन्होंने किसी तरह कैटरीना कैफ के मुंबई स्थित औफिस का फोन नंबर ले कर फोन किया तो पता चला कि कैटरीना कैफ तो इस समय लंदन में एक फिल्म की शूटिंग में व्यस्त हैं. उन्होंने किसी को शोरूम वगैरह के उद्घाटन के लिए कोई डेट नहीं दी थी. यह सुन कर बैजू समझ गए कि वह ठगे जा चुके हैं. उन्होंने बालाजी के खिलाफ थाना कलसमरी में धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस की जांच सबइंसपेक्टर अब्दुल लतीफ को सौंपी गई.

उधर शातिरदिमाग बालाजी ने चेन्नई के अन्नानगर (वेस्ट) एक्सटेंशन में फ्यूचर टेक्निक प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक कंपनी खोली. इस कंपनी की मार्फत इस बार उस का इरादा मोटा हाथ मारने का था. उस ने अपने एक परिचित एम.बालासुब्रह्मण्यम और उन की पत्नी चित्रा को कंपनी का मैनेजिंग डाइरैक्टर बनाया. इस के बाद उस ने केनरा बैंक की एक शाखा से कंपनी के नाम 19 करोड़ का लोन ले लिया और लीना मारिया के साथ वहां से रफूचक्कर हो कर अंडरग्राउंड हो गया.

बाद में जब बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों ने कागजों की जांच की, तो पता चला कि बालाजी ने 19 करोड़ रुपए के लोन के लिए जो कागजात जमा किए थे, वे फरजी थे. इस पर बैंक के डिप्टी जनरल मैनेजर टी.एस. नालाशिवम ने बालाजी के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 419, 406, 170, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी. मामला करोड़ों रुपए की जालसाजी का था, इसलिए पुलिस भी हरकत में आ गई और उस ने तुरंत काररवाई करते हुए उस कंपनी के मैनेजिंग डाइरैक्टर एम. बालासुब्रह्मण्यम और उन की पत्नी चित्रा को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने बालाजी की बहुत तलाश की लेकिन वह नहीं मिल सका.

दूसरी ओर बालाजी अंडरग्राउंड रह कर ठगी की दूसरी योजना को अंजाम देने की फिराक में लगा हुआ था. ठगी के कारनामों में अब लीना मारिया भी उस का साथ देने लगी थी. इस बार उस ने ठगी की अलग तरह की वारदात को अंजाम दिया. चेन्नई स्थित स्काइलार्क टेक्सटाइल ऐंड आउटफिटर नाम की फर्म के प्रोपराइटर श्री चक्रवर्ती राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के कर्मचारियों की वर्दियां बनाने का टेंडर लेते थे. टेंडर लेने के लिए वह सरकारी अधिकारियों से भी सांठगांठ रखते थे.

लीना और बालाजी ने चक्रवर्ती को कर्नाटक राज्य के मैडिकल तथा ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के कर्मचारियों की वर्दियां सिलवाने का टेंडर दिलाने के नाम पर उन से करीब 63 लाख रुपए ठग लिए. चक्रवर्ती से बालाजी ने खुद को तमिलनाडु अरबन डेवलपमेंट प्रोजेक्ट का डाइरैक्टर जयकुमार (आईएएस) और लीना मारिया को अपनी सेक्रेटरी बताया था. करोड़ों का फायदा होता देख चक्रवर्ती ने यह रकम खुशीखुशी बालाजी को सौंपी थी. कुछ दिनों तक तो चक्रवर्ती की जयकुमार उर्फ बालाजी से फोन पर बात होती रही, लेकिन बाद में उस का फोन बंद हो गया.

कई दिनों बाद भी बालाजी का फोन चालू नहीं हुआ, तो उन्होंने तमिलनाडु अरबन डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के औफिस में संपर्क किया. उस औफिस में पता चला कि वहां जयकुमार नाम का कोई डाइरैक्टर है ही नहीं. ठगी का अहसास होने पर चक्रवर्ती ने 6 मई, 2013 को थाने में भादंवि की धारा 406, 419, 420, 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस तरह की ठगी के कई मामले हो चुके थे. पुलिस को यह पता चल ही चुका था कि इन मामलों को बालाजी और उस की प्रेमिका अभिनेत्री लीना मारिया ही अंजाम दे रहे हैं इसलिए पुलिस दोनों के फोटो हासिल कर के उन की तलाश में जुट गई. जब थाना पुलिस को सफलता नहीं मिली, तो इस मामले की जांच चेन्नई सेंट्रल क्राइम ब्रांच के हवाले कर दी.

सेंट्रल क्राइम ब्रांच ने अपने सोर्स के आधार पर लीना मारिया पौल और बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेश चंद्रशेखर की तलाश शुरू कर दी. टीम ने कई संभावित जगहों पर दबिशें दीं लेकिन वे दोनों नहीं मिले. उधर लीना मारिया और बालाजी को इस बात की भनक लग चुकी थी कि क्राइम ब्रांच उन के पीछे पड़ी हुई है इसलिए दोनों करीब 2 महीने पहले दिल्ली भाग आए. दिल्ली में उन्हें एक ऐसी जगह की तलाश थी, जो उन के लिए सुरक्षित हो. इस के लिए उन्होंने दक्षिणी दिल्ली के फतेहपुर बेरी के पास असोला गांव में स्थित मोहिंदर सिंह के खारी फार्महाउस को 4 लाख रुपए प्रति महीने किराए पर ले लिया. बातचीत करने के बाद वे दोनों दिल्ली से कहीं चले गए और 15 दिन पहले ही उस फार्महाउस में रहने के लिए आए थे.

चूंकि वे दोनों इस बार कोई बड़ा हाथ मारना चाहते थे इसलिए उन्होंने अपने पास कई लग्जरी और कीमती गाडि़यां रख रखी थीं. साथ ही लीना ने अपने लिए एक एजेंसी से 4 बौडीगार्ड भी ले रखे थे जो काले रंग के सफारी सूट पहनते थे तथा अपने पास रिवाल्वर रखते थे. फार्महाउस के गेट पर बैठने के लिए उन्होंने एक सिक्योरिटी एजेंसी से करीब आधा दरजन सिक्योरिटी गार्ड भी ले रखे थे. लीना मारिया और बालाजी जब भी बाहर निकलते, 3 गाडि़यों के साथ वीवीआईपी अंदाज में निकलते थे. चेन्नई की सेंट्रल क्राइम ब्रांच ने दोनों के मोबाइल नंबरों को इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस पर लगा रखा था.

उन्हें पता चला कि उन्होंने अपने मोबाइल सेटों में वोडाफोन कंपनी के सिमकार्ड डाल रखे हैं. उन की लोकेशन दिल्ली आ रही थी. इसलिए चेन्नई क्राइम ब्रांच टीम ने दिल्ली पुलिस से संपर्क किया और आरोपियों को गिरफ्तार करने में सहयोग मांगा. इस तरह दिल्ली पुलिस ने अभिनेत्री लीना मारिया पौल को गिरफ्तार करने के बाद उसे 28 मई, 2013 को साकेत कोर्ट में चीफ मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से चेन्नई सेंट्रल क्राइम ब्रांच उसे ट्रांजिट रिमांड पर अपने साथ चेन्नई ले गई. इस के अलावा दिल्ली पुलिस ने फार्महाउस से जो 4 बौडीगार्ड हिरासत में लिए थे, उन्हें फतेहपुर बेरी थाना पुलिस के हवाले कर दिया.

फतेहपुर बेरी थाना पुलिस ने जब उन बाउंसरों से पूछताछ की, तो उन्होंने अपने नाम नरेंद्र, राजकुमार निवासी झज्जर, राहुल निवासी फतेहपुर बेरी और प्रदीप निवासी पानीपत बताया. जांच में पता चला कि उन के हथियारों के लाइसेंस हरियाणा और जम्मूकश्मीर से बने थे जो समस्त भारत के लिए वैध थे. लेकिन दिल्ली में कई महीने से रहने के बावजूद उन्होंने इस की सूचना दिल्ली की लाइसेंसिंग अथारिटी को नहीं दी थी. जबकि 1 महीने से ज्यादा रहने पर नियमानुसार सूचना अथारिटी को दी जानी चाहिए थी. इसलिए फतेहपुर बेरी पुलिस ने चारों बाउंसरों के खिलाफ 30 आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा पंजीकृत कर के उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

फार्महाउस में जो महंगी और लग्जरी गाडि़यां पाई गईं, उन के बारे में पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कहीं वे गाडि़यां चोरी की तो नहीं हैं. क्योंकि बालाजी और लीना मारिया ने भले ही करोड़ों रुपए ठगे थे, लेकिन यह रकम इतनी बड़ी नहीं थी कि इतनी महंगी गाडि़यां खरीदी जा सकें. पुलिस उन गाडि़यों के मालिकों का पता लगाने की कोशिश कर रही है. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True crime Story: भंग हुए सपनों के कंकाल

True crime Story: सुरजीत सिंह ने अपनी एकलौटी बेटी बरखा की शादी ब्रिटेन में रहने वाले एनआरआई जसबीर से इसलिए की थी ताकि उस की जिंदगी हंसीखुशी से कट सके. लेकिन ब्रिटेन पहुंचने पर उसे पति की सच्चाई पता चली तो…

रात का दूसरा पहर अपने अंतिम पड़ाव पर था. बावजूद इस के बिस्तर पर लेटी बरखा की आंखों से नींद कोसों दूर थी. नींद आती भी तो कैसे? एक एनआरआई लड़के के साथ अगले दिन उस की सगाई जो होने वाली थी. इसलिए उस की आंखों में नींद की जगह हसीन ख्वाबों ने डेरा जमा रखा था. वह पलकें बंद किए रहरह कर मुस्कराए जा रही थी. वह खुद भी नहीं चाहती थी कि वे ख्वाब उस की आंखों से दूर हों. आखिर उसे एक अजीब से आनंद की अनुभूति जो हो रही थी. समय कब रुकता है. वह तो अपनी गति से सरकता जा रहा था. रात का तीसरा और फिर चौथा पहर भी यूं ही गुजर गया. सुबह के उजाले ने दस्तक दे दी थी. अन्य दिनों की अपेक्षा उस दिन उस ने कुछ पहले ही बिस्तर छोड़ दिया.

उस के चेहरे पर ताजगी देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह रात भर सोई नहीं थी. चेहरे पर मुस्कराहट अब भी कायम थी. दिल उमंगों से भरा था और रोमरोम रोमांचित हो रहा था. बरखा रानी पंजाब के होशियारपुर जिले के रहने वाले सुरजीत सिंह की इकलौती बेटी थी. यही कारण था कि वह सब की लाडली थी. वह सुंदर तो थी ही साथ ही पढ़ने में तेज थी. उस का हंसमुख व चंचल स्वभाव सभी को पसंद था. उस ने संस्कारों का दामन सदा थामे रखा था, तभी तो कभी कोई ऐसा कदम उठाने की गलती नहीं की, जिस से किसी को उस के चरित्र पर अंगुली उठाने का मौका मिले.

यही कारण था कि मांबाप भी उस पर पूरा भरोसा करते थे. एमए करने के बाद बरखा टीचर बनना चाहती थी, पर उस के पिता सुरजीत सिंह नहीं चाहते थे कि बेटी शादी से पहले नौकरी करे. वह चाहते थे कि पढ़ालिखा कर उस की शादी अपनी ही बिरादरी के किसी ऐसे संस्कारी युवक से करें, जो विदेश में रह कर खूब कमाता हो ताकि बेटी सुखी रह सके. उन के कई रिश्तेदार और परिचित विदेश में रहते थे. उन से भी उन्होंने बरखा के लिए कोई एनआरआई लड़का देखने के लिए कह दिया था. कुछ दिनों बाद उन के एक रिश्तेदार ने उन्हें बरखा के लिए एक लड़का बताया. वह अच्छा पढ़ालिखा होने के साथ संस्कारी भी था और ब्रिटेन में रह कर अच्छा कमा रहा था.

उस युवक का नाम था जसबीर राम गिंडे. वैसे जसबीर भी पंजाब का ही रहने वाला था. वहीं से उस ने बीटेक की पढ़ाई की थी. फिर आईटी क्षेत्र में महारत हासिल कर के वह ब्रिटेन चला गया था. वहां आईटी औफिसर के पद पर उस की नौकरी स्काटलैंड के रायल बैंक में लग गई थी. 2 साल बाद जब वह वहां ठीक से स्थापित हो गया तो अपने परिवार को भी वहीं ले गया. उस के परिवार में मांबाप के अलावा एक छोटी बहन थी. उस ने विक्टरी लेन, रीड्सवुड में एक बंगला भी खरीद लिया था. बंगला खरीदने में उस के पिता ने भी अपनी जमीन बेच कर उस की आर्थिक मदद की थी.

जसबीर गिंडे 28 साल का हो गया था. सो उस के मातापिता चाहते थे कि जल्दी से उस के सिर पर सेहरा बांध दें. बेटे का घर बसाने के बाद वह बेटी के भी हाथ पीले करना चाहते थे. क्यों कि वह भी 26 साल की हो चली थी. वैसे वह बेटी की शादी पहले करनी चाहते थे. लेकिन उस ने शर्त रखी थी कि वह भाभी के आने बाद ही घर से विदा होगी. जसबीर शादी नहीं करना चाहता था, पर मांबाप की इच्छा के आगे उसे झुकना पड़ा. यह अक्टूबर, 2012 की बात है. पिता के कहने पर जसबीर शादी के उद्देश्य से परिवार सहित भारत आया था. पहली नजर में ही उसे बरखा की खूबसूरती भा गई.

उस के मातापिता व बहन को भी बरखा पसंद आ गई थी. वहीं बरखा व उस के मातापिता को भी जसबीर और उस का परिवार पसंद आ गया था. इसलिए उन का रिश्ता तय हो गया. उसी समय यह बात भी तय हो गई कि शादी यानी आनंदकारज की रस्म मार्च, 2013 में होगी. रिश्ता पक्का होने के बाद जसबीर और बरखा करीब एक सप्ताह साथ घूमेफिरे, ताकि एकदूसरे को और अच्छे से जान सकें. इस दौरान दोनों ही खुश और संतुष्ट थे. जसबीर को लगा कि बरखा उस के लिए एक सफल जीवनसाथी सिद्ध होगी. वहीं बरखा को भी लगा कि उस ने जिस तरह के युवक के साथ जिंदगी जीने का ख्वाब देखा था, जसबीर वैसा ही है.

करीब 15 दिन भारत में रह कर जसबीर परिवार के साथ ब्रिटेन लौट गया. जाते समय बरखा ने उस से मुस्करा कर कहा था, ‘‘मैं तुम्हारा सेहरा बांध कर आने का इंतजार करूंगी.’’

बरखा और जसबीर की फोन पर अकसर बातें होती रहती थीं. इसी तरह वक्त गुजरता गया. मार्च, 2013 का महीना भी आ गया. शादी की तारीख से एक सप्ताह पहले ही जसबीर का परिवार भारत आ गया. आते ही वह बरखा से मिला. दोनों ने घंटों साथ बिताए. इस के बाद बरखा की नींद गायब हो गई. नींद की जगह जसबीर की यादों ने ले ली थी. सगाई तय होने के अगले दिन दोनों गुरुग्रंथ साहिब के समक्ष गुरुद्वारे में सात फेरों के बंधन में बंध गए. एक सादा समारोह में शादी करने के बाद दोनों परिवारों की तरफ से एक बैंक्वेट हाल में रिसैप्शन दिया गया, जिस में करीब 700 लोगों ने शिरकत की.

घर से विदा होने के बाद वह जसबीर के पुश्तैनी मकान में पहुंची. वहां वह 2 दिन ठहरने के बाद मायके लौट आई. जसबीर के परिवार को ब्रिटेन लौटना था. इसलिए उन्होंने हनीमून भी नहीं मनाया था. उन्होंने तय किया था कि वे ब्रिटेन पहुंच कर ही हनीमून मनाएंगे. बरखा का पासपोर्ट तो बन चुका था, पर वीजा नहीं मिला था. इस कारण दोनों के बीच फिर से सात समुद्र की दूरी बन गई. पर उन के साथ कुछ हसीन यादें थीं. जिनके सहारे और मोबाइल पर बात कर के उन का वक्त कटता रहा.

इस दौरान जसबीर की बहन के लिए भी अच्छा लड़का मिल गया तो उस की सगाई भी तय कर दी गई. बहन की शादी से पहले ही जसबीर पत्नि का वीजा लगवाने की कोशिश करने लगा. आखिर 6 महीने बाद अगस्त में बरखा को वीजा मिल गया. वीजा मिलने के बाद जसबीर और उस का परिवार तो खुश था, बरखा की खुशी का भी ठिकाना नहीं था. वह भारत से ही दुलहन की तरह सजधज कर ब्रिटेन पहुंची. वहां एयरपोर्ट पर जसबीर उसे लेने आया. पति को देख कर उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह उस के गले लग गई. खुशी के कारण उस की आंखों से आंसू छलक आए.

बरखा जब जसबीर के विक्टरी लेन स्थित घर पर पहुंची तो उस के स्वागत में परिवार के सभी लोग खड़े मिले. मेन दरवाजे पर एक फीता बंधा था और पूरे घर को दुलहन की तरह सजाया गया था. बरखा ने जैसे ही फीता काटने की रस्म अदा की तो सभी ने ताली बजा कर, नाचगा कर खुशी का इजहार किया. पूरे परिवार ने दिल खोल कर बरखा का इस तरह स्वागत किया, जिस की कल्पना तक बरखा ने नहीं की थी. जसबीर ने उसे तोहफे की टोकरी देते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा नए घर में स्वागत है.’’ इस पर बरखा मंदमंद मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी. उन के इस अपनेपन में वह अपने वतन, अपने घरवालों की याद को भी बिसरा बैठी थी. वह अपने भाग्य पर इतरा रही थी.

बरखा के आने से घर का माहौल ही बदल गया था. उस के आने के चौथे दिन ही उस की ननद यानी जसबीर की छोटी बहन की शादी होनी थी. इस खुशी में बरखा के आने से चार चांद लग गए थे. बरखा ने इस तरह सारा घर संभाल लिया था, जैसे वह वहां बरसों से रह रही हो. ननद की शादी की तैयारी उस ने अपने हाथों से की. यहां तक कि ननद को सजाया भी उस ने ही. बहन की शादी के बाद तीसरे दिन जसबीर और बरखा हनीमून के लिए लंदन चले गए. दोनों ने एक सप्ताह खूब सैर की, खूब आनंद उठाया. इस दौरान जसबीर ने बरखा को ऊपरी तौर पर तो प्यार किया. उस की हर खुशी का खयाल भी रखा, पर उस ने पतिपत्नी के बीच बनने वाले सुख का अहसास उसे नहीं करवाया. बरखा ने भी इस बात पर ज्यादा गौर नहीं किया.

हनीमून से लौट कर दोनों खुश थे. फिर जसबीर अपनी नौकरी पर जाने लगा. अपनी नई जिंदगी की शुरुआत के साथ जसबीर अपने और बेहतर भविष्य की तलाश में भी लग गया. वह बैंक की नौकरी छोड़ कर लंदन स्थित फाइनेंशियल ओंबड्समैन सर्विस में नौकरी पाने की कोशिश करने लगा. बरखा का दिन घर के काम और सासससुर की देखभाल में बीत जाता, तो रात को उसे उम्मीद होती कि पति उसे औरतपन के सुख से अवगत कराएगा, पर ऐसा नहीं होता तो उसे थोड़ा दुख होता. पर उस ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया.

बरखा की कई बार रात को आखें खुलीं तो उस ने पति को किसी से मोबाइल पर बात करते हुए पाया. एक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘‘आखिर इतनी रात को किस से बात करते हो? क्या कोई और लड़की है तुम्हारी जिंदगी में? अगर ऐसा है, तो मुझे साफसाफ बता दो.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. दरअसल, मैं दोस्तों से बात करता हूं. दिन में तो काम की वजह से समय मिल नहीं पाता. इस कारण रात को तसल्ली से बात कर लेता हूं.’’ जसबीर ने सफाई दी.

‘‘लाओ, जरा अपना फोन दिखाओ.’’ बरखा ने सच्चाई जानने की कोशिश की.

जसबीर ने एक पल भी नहीं गंवाया, न ही किसी प्रकार की नानुकुर की. उस ने अपना मोबाइल पत्नी के हाथ में थमा दिया. बरखा ने काल डिटेल्स की जांच की. उस ने देखा कि जिस नंबर पर जसबीर ने रात को बात की थी, वह किसी अंगरेज युवक का था. उस के मोबाइल में किसी भी लड़की के नाम से कोई नंबर सेव नहीं था. इस से वह संतुष्ट तो हो गई, पर उसे यह बात खलती रही कि उसे जसबीर पर शक नहीं करना चाहिए था.

‘‘देख लिया.’’ जसबीर ने कहा, ‘‘मेरा भरोसा करो. मेरा किसी लड़की से किसी तरह का संबंध नहीं है. यकीन करो कि आज तक मैं ने कभी किसी लड़की को नजर भर कर देखा तक नहीं है. मेरी जिंदगी में आने वाली तुम पहली और आखिरी लड़की हो. मैं भरोसा दिलाता हूं कि कभी तुम्हारा भरोसा नहीं टूटने दूंगा.’’

जसबीर की बात से बरखा संतुष्ट थी. उसे पूरा यकीन हो गया था कि जसबीर सही बोल रहा है. एक शाम औफिस से आने के बाद जसबीर कहीं जाने के लिए तैयार होने लगा तो बरखा ने पूछ ही लिया, ‘‘कहां जा रहे हो?’’

‘‘अरे हां, मैं तो तुम्हें बताना ही भूल गया. दरअसल, मैं एक क्लब का मेंबर हूं. वहां आज रात हम दोस्तों ने पार्टी रखी है. वहीं जाना है. मैं रात को घर नहीं आऊंगा. तुम चिंता मत करना.’’ जसबीर ने कहा. बरखा को जसबीर की बात पर कोई शक नहीं था. इस कारण उस ने ज्यादा पूंछताछ नहीं की. जसबीर तैयार हो कर चला गया.

रात में सासससुर को खाना खिलाने के बाद रसोई साफ करके बरखा भी सोने चली गई. सुबह उस के उठने से पहले ही कालबेल बजी तो उसी ने दरवाजा खोला, उस का पति लौटा था. बरखा ने महसूस किया कि जसबीर के चेहरे पर खुशी और संतुष्टी के भाव थे. वह बेहद उत्साहित दिख रहा था. उसने प्यार से बरखा को चूमते हूए कहा, ‘‘खूब मजा आया रात दोस्तों के साथ मस्ती कर के.’’

इस पर बरखा मुस्करा दी और उस के लिए रसोई में चाय बनाने चली गई. जसबीर के बंगले में 4 कमरे थे. एक ड्राईंगरूम और 3 बेडरूम. एक बेडरूम जसबीर के मातापिता के लिए था. दूसरा जसबीर और बरखा के लिए. तीसरा बेडरूम जसबीर की बहन का था. जो उस की शादी के बाद खाली रहता था. यह बेडरूम जसबीर व बरखा के बेडरूम के बराबर में ही था. 11 सितंबर, 2013 की रात करीब 2 बजे की बात है. प्यास महसूस होने पर बरखा की नींद टूटी तो उस ने पाया कि जसबीर बेड पर नहीं था. जबकि वह उस के साथ ही सोया था. उस ने सोचा कि शायद बाथरूम गया होगा. पानी पीने के बाद उस की आंख तुरंत नहीं लगी. वह करवटें बदलती रही. इसी बीच उसे तरहतरह की अवाजें सुनाई देने लगीं. वह चौंकी. उठ कर इधरउधर देखा. कहीं कोई नहीं था.

वह सोच में पड़ गई. फिर उस ने सोचा कि पति ही बाथरूम में स्पीकर औन कर के अपने किसी दोस्त से बतिया रहा होगा. क्योंकि वह दोस्तों से रात में ही बातें करता था. तभी उस की नजर मेज पर रखे मोबाइल पर गई. मोबाइल पति का ही था. वह चौंकी कि जब मोबाइल यहां है तो वो बाथरूम में किस से बातें कर रहा है. वह बिस्तर से उठी और बाथरूम का दरवाजा खटखटाने लगी. अंदर से जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उस ने दरवाजे का हैंडल घुमाया. दरवाजा खुल गया. दरवाजे के खुलते ही वह चौंक गई क्योंकि पति बाथरूम में था ही नहीं. उसे अब चिंता हुई कि आधी रात को वह चला कहां गया.

उस ने सासससुर के बेडरूम के नजदीक जा कर देखा. वहां भी दरवाजा बंद था और अंदर खामोशी छाई थी. अब वह खाली पड़े बेडरूम की तरफ गई. उस ने दरवाजे पर कान लगाए तो महसूस किया कि आवाजें उसी बेडरूम से आ रही थीं. अंदर से आने वाली आवाजें पुरुषों की ही थीं. एक आवाज को तो वह पहचान गई, वह उस के पति की थी. लेकिन दूसरी आवाज उसे अनजानी लगी. दोनों आवाजों का लहजा उसे अजीब लगा. उस ने दरवाजे के हैंडल को घुमाया. अंदर से लौक न होने की वजह से वह खुल गया. दरवाजा खोलते ही बरखा की नजर अंदर बेड पर पड़ी तो वह हैरान रह गई. उसे अपनी आंखों पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था.

बेड पर जसबीर के साथ उस की ही उम्र का एक भारतीय मूल का युवक और था. उस समय दोनों के शरीर पर कपड़े का नामोनिशान नहीं था. दोनों एकदूसरे से लिपटे हुए पतिपत्नी की तरह प्यार कर रहे थे. यह देख कर बरखा समझ गई कि उस का पति ‘गे’ है, इसीलिए वह उस से शारीरिक संबंध नहीं बनाता था. बरखा की हैरत का ठिकाना नहीं था. दिल तो किया कि उसी समय पति को जलील करे, पर इतनी रात में किसी तरह का बवाल खड़ा करना उस ने उचित नहीं समझा. उस ने सोचा कि एकांत के समय वह जसबीर से बात करेगी. बहरहाल वह आहत थी. उस के सारे ख्वाब पलभर में टूट कर बिखर गए.

हौले से दरवाजा बंद कर के वह अपने बेडरूम में आ कर लेट गई. उस की नींद तो उड़ चुकी थी. अब तो वीरान आंखों में ख्वाबों की जगह आंसुओं ने ले ली. वह रोती रही और अपनी किस्मत को कोसती रही. सुबह करीब 5 बजे बरखा ने बेडरूम का दरवाजा खुलने की आवाज सुनी तो हल्की सी आंख खोल कर देखा. जसबीर लौट आया था. वह आंख बंद कर सोने का नाटक कर ऐसे ही लेटी रही. जसबीर भी उस के बराबर में आ कर लेट गया. फिर जल्दी ही उसे नींद आ गई. बरखा ने 6 बजे के करीब बिस्तर छोड़ दिया. क्योंकि इसी समय उस के सासससुर भी उठ जाते थे. वह उन्हें बेड टी बना कर देती थी. उस ने बाथरूम में जा कर चेहरा देखा तो उस की आंखें रोरो कर लाल हो चुकी थीं. चेहरा भी भावशून्य दिख रहा था. उस ने अच्छे से चेहरा धोया और रसोई में चाय बनाने चली गई.

चाय बना कर जब वह सासससुर के बेडरूम में गई तो उस का चेहरा देख सास ने टोका, ‘‘क्या बात है बरखा, तुम्हारी आंखें क्यों लाल हैं?’’

‘‘पता नहीं, सारी रात जलन सी होती रही.’’ वह सच्चाई छिपा गई.

‘‘लापरवाही ठीक नहीं है. जसबीर को जगने दे. डाक्टर के पास चली जाना.’’ सास ने कहा.

‘‘ठीक है.’’ बरखा बोली. फिर वह अपने कामों में लग गई. करीब 9 बजे जसबीर सो कर उठा और तैयार हुआ. बरखा ने अन्य दिनों की तरह उस का नाश्ता लगा दिया. वह नाश्ता करने लगा. उसे यह अहसास नहीं हुआ कि बरखा ने उस का नंगापन देख लिया है. जबकि बरखा के अंदर एक तूफान उमड़ रहा था.

जसबीर बैंक चला गया. उस के जाने के बाद वह सारे दिन तरहतरह के खयालों में खोई रही.

रात में जब बरखा बेडरूम में पहुंची तो जसबीर ने टोका, ‘‘तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही. मां कह रही हैं कि तुम्हारी आंखें भी लाल थीं. सब खैरियत तो है?’’

बरखा ने लंबी सांस ली, ‘‘खैरियत ही तो नहीं है.’’

‘‘क्या हुआ?’’ जसबीर ने पूछा.

‘‘मैं ने तुम्हें नंगा ही नहीं देखा, तुम्हारा नंगापन भी देख लिया है.’’ उस ने गुस्से में कहा.

‘‘क्या कह रही हो, समझ नहीं आया. साफसाफ कहो.’’ जसबीर नहीं जानता था कि पत्नी किस तूफान को थामे है.

‘‘मुझे पता चल गया कि तुम मुझ से दूर क्यों रहते हो? मुझे यहां आए एक महीना हो गया, पर तुम ने मुझे पत्नी का सुख नहीं दिया.’’ बरखा का ज्वालामुखी धीरेधीरे फटने लगा था.

‘‘क्या पता चल गया?’’ जसबीर नासमझ बनते हुए बोला.

‘‘यही कि तुम ‘गे’ हो.’’ बरखा शेरनी की तरह दहाड़ी.

‘‘क्या, क्या कह रही हो?’’ अपनी सच्चाई सुन कर जसबीर हड़बड़ा गया.

‘‘अगर तुम में किसी औरत को रखने की काबिलियत नहीं है तो क्यों की मुझ से शादी?’’ वह गुर्राई.

‘‘बरखा, तुम समझने की कोशिश करो. मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं.’’ जसबीर मामला शांत करने की गरज से बोला.

‘‘अगर तुम ‘गे’ थे, तो पहले ही बता देना चाहिए था. मुझे गलतफहमी में रख कर शादी क्यों की?’’

‘‘मैं शादी नहीं करना चाहता था, मांबाप की जिद के कारण करनी पड़ी. डरता था कि मेरे गे होने का राज खुल गया तो उन पर क्या गुजरेगी. पर सच मानो बरखा, मैं तुम से प्यार करता हूं. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’’ जसबीर ने उसे सफाई दी.

‘‘तुम्हारे इस तरह के प्यार के साथ जिंदगी नहीं गुजरेगी. तुम ने मेरी जिंदगी बरबाद कर के रख दी.’’ वह शांत होने का नाम नहीं ले रही थी.

‘‘मैं खुद को बदल दूंगा बरखा, मुझे कुछ समय दो.’’ जसबीर गुनहगार की तरह गिड़गिड़ा रहा था.

‘‘तुम जिस आदत के आदी हो, वह कभी नहीं बदलती. तुम नपुंसक हो नपुंसक. अब मैं सब को बता दूंगी कि तुम गे हो.’’ वह चीखी.

नपुंसक की गाली सुन कर जसबीर भी खुद पर काबू नहीं रख पाया. वह भी चीखा, ‘‘अपनी हद मेें रहो वरना…’’

‘‘वरना क्या. हां, बताओ वरना क्या.’’ कहते हुए बरखा ने उसे बेड से धक्का दे कर नीचे गिरा दिया.

इस के बाद तो जसबीर जैसे होश ही खो बैठा, ‘‘अभी बताता हूं.’’ कहते हुए उस ने बेड के पास रखे वैक्यूम क्लीनर का पाइप खींचा और उस के गले में लपेट कर कसने लगा. साथ ही बड़बड़ाता रहा, ‘‘देखो, मैं क्या कर सकता हूं.’’

जसबीर ने उस का गला तब तक दबाए रखा, जब तक कि उस की सांस नहीं थम गई. कुछ ही देर में उस की गरदन एक ओर लुढ़क गई, तो जसबीर की आंखें फटी की फटी रह गईं. उस का गुस्सा उड़नछू हो गया. अब उसे अफसोस हुआ कि वह क्या कर बैठा. मगर अब हो भी क्या सकता था. वह घबराया. उस के मातापिता अपने बेडरूम में सो रहे थे. उस ने हलके से मेन गेट खोला और बाहर का जायजा लिया. उसे दूर तक कहीं कोई नजर नहीं आया. वह फटाफट बेडरूम में लौटा और पत्नी की लाश को घसीट कर लान में ले आया और वहां रखे इनसिनेटर (कूड़ेदान) में डाल कर ऊपर से कुछ सूखे पत्ते उस में डाल दिए.

इस के बाद वह थोड़ी दूर स्थित पेट्रोल पंप पर जा कर वहां से एक कैन में पेट्रोल भरवा लाया. वह पेट्रोल इनसिनेटर के अंदर उड़ेल कर आग लगा दी. उसी समय उस के बंगले के सामने वाले बंगले की खिड़की से एक महिला ने उसे यह सब करते हुए देख लिया था. उस ने सोचा कि वह कूड़े को आग लगा रहा है. जसबीर आग लगा कर बेडरूम में लौट आया और आगे के बारे में सोचने लगा. उधर सुबह उस के मातापिता सो कर उठे और उन्हें बेड टी नहीं मिली तो वह बरखा को आवाज लगाने लगे. जसबीर को इस का अहसास ही नहीं था. वह तो अपनी उलझन में उलझा था. उस की मां बरखा को खोजते हुए बेडरूम में आ गईं. उन्होंने जसबीर से पूछा, ‘‘बेटा, बरखा कहां है? आज चाय नहीं दी.’’

मां की आवाज सुन कर जसबीर हड़बड़ाहट में बोला, ‘‘वह तो रात को मुझ से झगड़ने के बाद घर छोड़ कर चली गई.’’

‘‘कहां गई? तू ने उसे जाने क्यों दिया? कहां होगी वह. इस परदेश में उस का हमारे अलावा कोई है भी नहीं.’’ जसबीर की मां घबरा गईं.

जसबीर खामोश रहा, तो वह फिर बोलीं, ‘‘यहां बैठा क्या कर रहा है? जा कर उसे खोज. पुलिस में रिपोर्ट लिखवा.’’

जसबीर होश में आया. उसे बचाव का कोई रास्ता नहीं सूझा तो वह तैयार हो कर वाल्सेल पुलिस स्टेशन जा पहुंचा और बरखा की गुमशुदगी दर्ज करवा दी. गुमशुदगी दर्ज करने के बाद इंसपेक्टर सर्बजीत जोहल कुछ सहकर्मियों के साथ जसबीर के बंगले पर पहुंचे. वहां पड़ोसियों से पूछताछ करने पर सामने वाले बंगले में रहने वाली महिला ने बता दिया कि रात को उस ने जसबीर के बंगले में स्थित बगीचे में रखे इनसिनेटर से धुआं उठते देखा था. वहां से कुछ अजीब सी गंध भी आ रही थी.

इंसपेक्टर सर्बजीत ने बगीचे में रखे इनसिनेटर का ढक्कन उठाया, तो चौंक पड़े. उस में राख के बीच एक मानव कंकाल पड़ा था. संभवतया वह किसी महिला का था क्योंकि वहां पर कुछ गहने भी थे. सोने की चूडि़यां, ब्रेसलेट और अंगूठी. इस बारे में जब जसबीर की मां से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि ये वही जेवर हैं, जो बरखा ने शादी के रोज से अब तक पहने रखे थे. इस से यही पता लगा कि वह कंकाल बरखा का ही था.

लाश की शिनाख्त हो गई, तो सवाल उठा कि घर में ही हत्या कर बरखा की लाश को जला दिया गया और घर में किसी को पता भी नहीं चला. जबकि सभी साक्ष्य बता रहे थे कि हत्या पूरी योजना के साथ की गई होगी. इस बारे में जसबीर से पूछा गया, तो वह बारबार झूठ बोलता रहा. इंसपेक्टर सर्बजीत को शक था कि जसबीर ने ही बरखा को जलाया होगा. उसे उसी समय हिरासत में ले लिया गया और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस स्टेशन में जब जसबीर से सख्ती से पूछताछ की गई, तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपनी नवविवाहिता बरखा की हत्या की थी. उस ने कहा कि यह सब गुस्से में हुआ. उस का इरादा उस की हत्या करने का नहीं था.

दूसरे दिन यानी 13 सितंबर, 2013 को जसबीर को वाल्वर हैमाट कोर्ट में पेश किया गया. साथ ही बरखा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी पेश की गई. रिपोर्ट में बताया गया कि बरखा की मौत दम घुटने के कारण हुई. जसबीर को कोर्ट से जेल भेज दिया गया. वहीं भारत में रहने वाले बरखा के मातापिता को घटना की सूचना दे दी गई. उस के पिता सुरजीत सिंह ब्रिटेन पहुंच गए और अंतिम संस्कार के लिए बेटी का कंकाल अपने साथ भारत ले आए.

कोर्ट में जसबीर के खिलाफ मुकदमा चला. कई पेशियां हुईं. डिफेंस केस के वकील डेविड नाथन ने कोर्ट में बताया कि सारी जांच के बाद यह नतीजा निकलता है कि जसबीर ने अपनी पत्नी की हत्या पूरी योजना के साथ की थी. उस ने जिस अमानवीयता से घटना को अंजाम दिया, उस के हिसाब से आरोपी को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए. जांच के दौरान यह भी सामने आया कि जसबीर लंबे समय से डिप्रेशन में रहता था. 2010-11 में उस ने अपने डिप्रेशन का इलाज करवाया था. इलाज करने वाले डा. श्रीनिवास ने कोर्ट में बताया कि जसबीर राम गिंडे ने उन से करीब 2 साल इलाज करवाया था. वह काम से संबंधित तनाव में रहता था.

डिप्रेशन के चलते उस ने कई बार आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी. एक बार तो उस ने अपनी कलाई भी काट ली थी और एक बार फांसी लगाने की भी कोशिश की थी. कोर्ट में वह वीडियो भी दिखाई गई, जब बरखा शादी के बाद पहली बार जसबीर के बंगले में दाखिल हुई थी. वहीं जसबीर की बहन की शादी की वीडियो भी दिखाई गई. इस के विपरीत पुलिस ने उस पेट्रोल पंप की सीसीटीवी फुटेज भी पेश की, जिस में साफ दिख रहा था कि घटना वाली रात जसबीर ने वहां से पेट्रोल खरीदा था.

कोर्ट में दरजन भर गवाह पेश किए गए. इन में एक सरकारी वकील डेबी गोल्ड ने कोर्ट में बयान दिया कि जब जसबीर भारत में रहता था, तो वहां पंजाब में भी उस के कई गे दोस्त थे. ब्रिटेन में भी उस के कई एशियन और ब्रिटिश गे युवकों से शारीरिक संबंध थे. उस ने गे मेल फ्रेंड्स क्लब भी बना रखा था. गे क्लब में मेलमुलाकात के साथ आपस में देह संबंध भी बनाए जाते थे. उन्होंने बताया कि वह चाह कर भी अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध नहीं बना सकता था. इसलिए वह पत्नी से तलाक लेने की भी सोच रहा था. पर डर था कि इस के लिए उसे कारण बताना होगा. अगर वह गे होना कारण बताता तो उस के परिवार की भी बदनामी होती. कुल मिला कर वह एक झूठी मैरिज लाइफ बिता रहा था.

वहीं आरोपी जसबीर राम गिंडे ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कोर्ट में बयान दिया कि जब वह 12 साल का था, तब उसे पता चला कि वह समलैंगी प्रवृत्ति का है. विपरीत लिंगी की तरफ उस का कोई आकर्षण नहीं था. उस ने कभी अपने मातापिता को अपनी सच्चाई नहीं बताई थी. क्योंकि वे इसे सहन नहीं कर पाते. इसी कारण वह शादी नहीं करना चाहता था, पर मातापिता की इच्छा के कारण उसे मजबूर होना पड़ा था.

जसबीर ने आगे बताया कि लाख छिपाने के बाद भी आखिर पत्नी को उस की सच्चाई पता चल गई थी. इस पर 12 सितंबर, 2013 की रात बरखा ने उसे बहुत जलील किया. बात बढ़ गई तो गुस्से में अपना आपा खो दिया और हत्या का गुनाह कर बैठा. सारे गवाह और सुबूत जसबीर के खिलाफ थे. वहीं वह खुद अपना अपराध स्वीकार कर चुका था. इसलिए जज जान वार्नर ने उसे दोषी करार देते हुए कहा कि अभियुक्त ने बरखा के साथ क्रूरतापूर्वक व्यवहार किया था. उस की निर्दयता से हत्या कर दी. हद तो यह हो गई कि मानवीयता की हद पार करते हुए उस ने उस के शरीर को पेट्रोल डाल कर जला दिया. फिर झूठी रिपोर्ट लिखवाने पुलिस स्टेशन चला गया.

यानी उस ने योजना अनुसार घटना को अंजाम दिया. इसलिए अभियुक्त जसबीर राम गिंडे का यह अपराध क्षमा की श्रेणी में नहीं आता. 25 अप्रैल, 2015 को जज जान वार्नर ने अपना फैसला सुनाते हुए जसबीर राम गिंडे को 21 साल की सजा सुनाई. साथ ही यह भी कहा कि उस की जमानत की किसी अरजी पर कभी सुनवाई नहीं की जाएगी. वह समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. कोर्ट से पुलिस वैन में जेल जाते वक्त जसबीर राम गिंडे की आंखों के आंसू थम नहीं रहे थे. उसे अपने किए पर पछतावा था. True crime Story