Hindi crime story: नीली फिल्मों का बूढ़ा नायक

Hindi crime story: अय्याश कुंदन कुमार को कमउम्र की लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने का शौक तो लग ही गया था, दुर्भाग्य से उसे उन के साथ अपने संबंधों की फिल्म बना कर देखने का भी चस्का लग गया था. उस के इसी शौक ने उसे उस की असली जगह तक पहुंचा दिया. पहाड़ों की रानी कहलाने वाले पर्यटनस्थल शिमला के रहने वाले थे सेठ दसौंधामल. मूलरूप से जिला कांगड़ा के गांव काशनी के रहने वाले दसौंधामल ने बरसों पहले शिमला में हार्डवेयर का व्यापार शुरू किया था. उन का यह धंधा इतना बढि़या चला कि उन्होंने शिमला में अपार ख्याति और संपत्ति अर्जित की.

दसौंधामल के परिवार में पत्नी कंचनबाला के अलावा एक बेटा और 6 बेटियां थीं. बेटियों को पढ़ालिखा कर उच्च घरानों में उन की शादियां कर दी गईं, जिन में से 3 तो आज विदेशों में रह रही हैं. 6 बेटियों के बाद एकलौता बेटा था कुंदन कुमार. पढ़लिख कर वह इंडियन एयरफोर्स में पायलट औफिसर बन गया था. साल भर बाद ही मैडिकल ग्राउंड पर नौकरी छोड़ दी और अपने पुश्तैनी धंधे में पिता का हाथ बंटाने के साथसाथ शिमला स्थित पंजाब विश्वविद्यालय से बीए करने लगा. दौरान दिल्ली निवासी मधुपलाल की उच्चशिक्षित बेटी मालारानी से कुंदन कुमार की शादी हो गई, जिस से उसे 3 बेटियां और एक बेटा हुआ.

कहते हैं, जब तक दसौंधामल जिंदा थे, तब तक तो उस पर अंकुश रहा. पिता के मरते ही उस के पंख निकल आए. पैसों का लेनदेन और पूरा कारोबार अब उस के हाथों में था. उस के पास इतना पैसा था कि दोनों हाथों से लुटाता तो भी खत्म होने वाला नहीं था. जमेजमाए कारोबार के अलावा दसौंधामल इतनी प्रौपर्टी छोड़ गए थे कि उस का किराया ही हर महीने लाखों में आता था. इस सब के अलावा कुंदन कुमार की पत्नी मालारानी ऊंचे ओहदे पर सरकारी नौकरी में थीं. उन्हें भी वेतन में मोटी रकम मिलती थी. इसलिए पैसों के लिए उन्हें कभी पति की ओर देखने की जरूरत नहीं थी. 4 बच्चे होने के बाद वह उन का भविष्य संवारने में व्यस्त हो गई थीं.

पिता का अंकुश हटते ही कुंदन क्लबों की रंगीनियों में खोया रहने लगा था. इस के बाद उस की अय्याशी के तार देहधंधा करने वाली औरतों से जुड़ गए. इसी के साथा उस ने कमउम्र की लड़कियों से शारीरिक संबंध बनाने का शौक पाल लिया. बढ़ती उम्र में यौन क्षमता बढ़ाने के लिए वह दवाओं का सहारा ले रहा था. कामवासना से कभी उस का जी नहीं भरता था, इसलिए बिजनैस को नौकरों के सहारे छोड़ कर वह सिर्फ लड़कियां पटाने के तरीके सोचा करता था. धंधेबाज औरतों से मौजमस्ती से जी भर गया तो नौकरी का लालच दे कर कुंदन ने न जाने कितनी लड़कियों को बरबाद किया.

ऐसे में उसे न जाने क्या सूझी कि 4 लड़कियों के साथ के शारीरिक संबंध की उस ने फिल्में बना लीं. इन में एक लड़की अनु थी, जिस के साथ बनाई गई ब्लूफिल्म ने उसे सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. उस समय यह मामला अखबारों में खूब उछला था. शहर का हर अखबार इस मामले से जुड़ी खबरों से भरे होते थे. उन दिनों शिमला के एडीशनल एसपी थे कुंवर वीरेंद्र सिंह. कुंदन के इस मामले की विवेचना का जिम्मा उन्हें ही सौंपा गया था. यह मामला पुलिस से पहले मीडिया के पास पहुंच गया था. स्थानीय अखबारों में एक समाचार जोरोंशोरों से छप रहा था कि शिमला के बाजारों में एक अश्लील सीडी धड़ल्ले से बिक रही है, जिस में शहर के एक प्रतिष्ठित घराने के बूढ़े को एक नवयौवना से यौनाचार करते दिखाया गया है.

समाचारों में नीचे यह भी लिखा होता था कि वह बूढ़ा काफी प्रभावशाली है, इसलिए पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर रही है. पुलिस के लिए परेशानी की बात यह थी कि इस मामले में किसी ने कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई थी. बिना शिकायत के पुलिस किसी के खिलाफ क्या और कैसे काररवाई कर सकती थी. फिर भी सीआईडी के तत्कालीन आईजी आई.डी. भंडारी ने उन खबरों को गंभीरता से लेते हुए मामले की गहराई में जाने की जिम्मेदारी सीआईडी स्पैशल ब्रांच के इंसपेक्टर कुशल कुमार को सौंप दी. कुशल कुमार ने अखबार वालों से संपर्क कर खूब दौड़भाग की. मामले की गहराई में जाने के लिए उन्होंने दिनरात एक कर दिया. जांच के लिए वह सीडी जरूरी थी. बाजार में सीडी होने की चर्चा तो खूब थी, लेकिन वह सीडी कुशल कुमार के हाथ नहीं लगी. 3 दिन इसी तरह निकल गए.

चौथे दिन संयोग से किसी अनजान आदमी ने उन्हें फोन कर के बताया, ‘‘सर, आप जिस सीडी के लिए दिनरात परेशान हो रहे हैं, उस की एक कौपी रिज के पास टका बैंच पर रखी है. आप उसे देख कर छानबीन करें तो सारी असलियत सामने आ जाएगी. आप से आग्रह है कि मेरे बारे में पता लगाने की कोशिश मत कीजिएगा.’’

अंधा क्या चाहे, 2 आंखें. कुशल कुमार तुरंत रिज मैदान पहुंच गए. टका बैंच पर उन्हें दीवार के पास कागज का पुराना सा लिफाफा दिखाई दिया. उठा कर देखा तो उस में सीडी थी. अपने औफिस आ कर कंप्यूटर पर उन्होंने उस सीडी को चलाया. सीडी में 15 मिनट की अश्लील फिल्म थी, जिस में एक बूढ़ा एक लड़की के साथ शारीरिक संबंध बना रहा था. सीडी देखने के बाद कुशल कुमार उसे ले कर आईजी श्री भंडारी के पास गए. सीडी देख कर उन्होंने शिमला के पुलिस अधीक्षक जोगराज ठाकुर को एफआईआर दर्ज कर के तत्काल काररवाई करने के आदेश दे दिए.

जोगराज ठाकुर ने कुशल कुमार की ओर से एफआईआर दर्ज करने की संस्तुति कर के मामले की फाइल थाना सदर भेज दी. इसी के साथ एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह को इस मामले की विवेचना की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी. थाना सदर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर बृजेश सूद ने भादंसं की धारा 292 के तहत मुकदमा दर्ज कर के इस मामले की जांच अतिरिक्त थानाप्रभारी गोबिंदराम को सौंप दी थी. गोबिंदराम ने सब से पहले शहर के कुछ गणमान्य लोगों को बुला कर उन के सामने उस सीडी को चला कर दिखाया. इस का उद्देश्य ब्लूफिल्म के नायक की पहचान करना था. आखिर उस आदमी की पहचान हो गई. वह कोई और नहीं, कुंदन कुमार था.

उन लोगों ने बताया कि इस की गिनती शहर के प्रमुख कारोबारियों में होती है. इस की पत्नी सरकारी अधिकारी है और इस के बच्चे इंग्लैंड, अमेरिका में पढ़ रहे हैं. सीडी की अश्लील फिल्म के नायक की पहचान हो जाने के बाद पुलिस टीम ने कुंदन कुमार के भव्य निवास पर छापा मारा. उस समय घर पर नौकर मोतीलाल के अलावा और कोई नहीं था. पुलिस ने उसे थाने ला कर गहन पूछताछ की. इस पूछताछ में मोतीलाल ने बताया कि उस का मालिक शराब और शबाब का शौकीन है. पैसे की उसे कोई कमी नहीं है. शिमला में प्रौपर्टी से ही उसे लाखों रुपए महीने किराया आता है. उस की उम्र काफी हो गई है, लेकिन बिना मेहनत के आने वाले पैसों की वजह से इस उम्र में भी उस की आदतें खराब हैं.

मोतीलाल को जब सीडी की फिल्म दिखाई गई तो उस ने उस फिल्म के बूढ़े नायक की पहचान अपने मालिक कुंदन कुमार के रूप में कर दी. लड़की के बारे में उस ने कहा, ‘‘अरे यह तो अनु है. यह साहब के औफिस में नौकरी करती थी.’’

‘‘इस समय यह कहां है?’’ मोतीलाल से पूछा गया.

‘‘अब कहां है, यह मुझे पता नहीं. क्योंकि इस ने साहब के यहां से नौकरी छोड़ दी है.’’ मोतीलाल ने कहा.

इस के बाद मोतीलाल को यह संदेश दे कर छोड़ दिया गया कि वह अपने साहब से कह देगा कि वह खुद थाने आ कर पुलिस जांच में शामिल हो जाए तो ज्यादा ठीक रहेगा, वरना उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. इस का असर यह हुआ कि पुलिस का संदेश मिलते ही कुंदन कुमार अपने वकील के साथ थाना सदर आ पहुंचा. पुलिस ने उसे उस की ब्लूफिल्म दिखाते हुए उस के बारे में स्पष्टीकरण मांगा तो उस ने कहा, ‘‘अनु मेरे औफिस में नौकरी करती थी. अपनी खूबसूरती के जाल में फंसा कर वह मुझ से पैसे ऐंठती थी. उस के फरेब में आ कर मैं उस के हुस्न के जाल में फंस गया था. जब भी मौका मिलता था, हम संबंध बना लेते थे.

कभीकभी औफिस में भी यह सब हो जाता था. एक दिन मेरे मन में न जाने क्या आया कि मैं ने वैब कैमरे से यह फिल्म बना ली.’’

‘‘फिल्म की सीडी मार्केट में कैसे आई?’’ पुलिस ने पूछा तो जवाब में कुंदन ने कहा, ‘‘कुछ दिनों पहले मेरा कंप्यूटर खराब हो गया था. मिडिल बाजार में मुकेश की कंप्यूटर रिपेयर की दुकान है. अपना कंप्यूटर ठीक करवाने के लिए मैं ने उसे अपने घर बुलवाया. लेकिन घर में कंप्यूटर ठीक नहीं हुआ तो वह सीपीयू अपने साथ ले गया.’’

इतना कह कर कुंदन ने पानी मांगा. 2 गिलास पानी पीने के बाद उस ने आगे कहा, ‘‘अगले दिन मैं मुकेश की दुकान पर गया तो उस ने कहा कि हार्डडिस्क क्रैश हो गई है, इसलिए बदलनी पड़ेगी. मेरे कहने पर उस ने हार्डडिस्क बदल दी. पुरानी हार्डडिस्क उस के पास ही रह गई. मुझे लगता है कि पुरानी हार्डडिस्क को नई में लोड करते समय उस ने मेरी इस फिल्म को देख लिया. उस के बाद पैसा कमाने के लिए उस की सीडी बना कर बाजार में पहुंचा दिया.’’

बृजेश सूद ने कुंदन को अपनी बातों में उलझा लिया और गोबिंदराम 2 सिपाहियों को साथ ले कर कुंदन कुमार की पुरानी हार्डडिस्क बरामद करने मुकेश की दुकान पर जा पहुंचे. कुछ देर बाद आ कर उन्होंने बताया कि दुकान बंद है. लेकिन उन्होंने दुकान सील कर के अपने दोनों सिपाही वहां बैठा दिए हैं. इस के बाद एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह के आदेश पर पुलिस ने कुंदन कुमार के औफिस और घर को सील कर दिया. अगले दिन 2 पार्षदों की उपस्थिति में मुकेश की दुकान खुलवाई गई. कुंदन कुमार भी पुलिस के साथ वहां मौजूद था. उस से दुकान में मिली हार्डडिस्कों से अपनी हार्डडिस्क पहचानने को कहा गया. उस ने इधरउधर देख कर कहा, ‘‘मेरी हार्डडिस्क दुकान में नहीं है.’’

मुकेश भी वहां मौजूद था. जब उस से कहा गया तो उस ने दुकान से 3 हार्डडिस्कें निकाल कर पुलिस के हवाले करते हुए कहा कि ये तीनों हार्डडिस्कें कुंदन कुमार की हैं. साथ ही उस ने यह भी कहा कि उसे नहीं पता कि इन सब में क्या था. उस ने इन के अंदर ताकझांक करने की कोई कोशिश नहीं की थी. पुलिस ने तीनों हार्डडिस्कें कब्जे में ले कर मुकेश की दुकान की गहन तलाशी ली. दुकान में कोई भी आपत्तिजनक चीज नहीं मिली. इस के बाद पुलिस ने कुंदन कुमार के औफिस की तलाशी ली, जहां पुलिस को पुरानी हार्डडिस्कें तो मिली हीं, 87 सीडीज और 25 फ्लौपीज भी मिलीं. जब उन सब को देखा गया तो उन सभी में अश्लील फिल्में थीं. यही नहीं, 4 ब्लूफिल्मों का हीरो खुद कुंदन कुमार था.

अनु के अलावा 3 अन्य लड़कियों के साथ भी उस ने अश्लील फिल्में बना रखी थीं. जिन फिल्मों में कुंदन कुमार खुद हीरो था, उन्हें देख कर साफ लग रहा था कि उन्हें औफिस में ही बनाया गया था. इसलिए फिल्म में दिखाई देने वाला सामान यानी चादर, कुशन, गिलाफ, तकिए और गिलासों के अलावा लकड़ी का वह छोटा सा दीवान भी कब्जे में ले लिया गया, जिस पर शारीरिक संबंध बनाया गया था. इसी के साथ कुंदन कुमार की निशानदेही पर उस के घर से वे कपड़े भी बरामद कर लिए गए थे, जिन्हें उस ने शारीरिक संबंध बनाने से पहले पहन रखे थे. बाद में तो उस ने कपड़े उतार दिए थे. कुंदन चूंकि गंजा था, जवान लड़की को शायद यह बात खल जाती, इसलिए पूरे कपड़े उतारने के बाद भी उस ने सिर पर आकर्षक कैप पहन रखी थी. वह कैप भी पुलिस ने जब्त कर ली थी.

सारी चीजों को कब्जे में लेने के बाद पुलिस ने कुंदन कुमार को थाने ला कर पूछताछ शुरू की. इस पूछताछ में उस ने यह तो खुलासा कर दिया कि वह शराब और शबाब का शौकीन था, खासकर कमउम्र की लड़कियों के साथ उसे बहुत मजा आता था. इसी के साथ उस की एक कमजोरी भी सामने आई कि अकसर वह कमउम्र लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाते समय वैब कैमरे से उन की फिल्में बना लिया करता था. इस के लिए उस ने अपने औफिस के निजी कमरे में एक वैबकैम लगवा रखा था. बाद में वह अपनी उन फिल्मों को देख कर रोमांचित होता था.

कुंदन कुमार ने अपनी सारी कमजोरियों को बता कर अपना अपराध स्वीकार कर लिया था, लेकिन किसी भी लड़की के बारे में उस ने कुछ नहीं बताया था. शायद बताना नहीं चाहता था. उस ने पुलिस से कहा, ‘‘ये पेशेवर लड़कियां थीं, जो पैसे के लिए मेरे पास आती थीं. खायापिया, मुझे खुश करने का पैसा लिया और चलती बनीं.’’

‘‘लेकिन अनु तो तुम्हारे यहां नौकरी करती थी?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘जी, मैं ने उसे नौकरी पर रखा था, लेकिन वह भी अन्य लड़कियों की तरह पैसे ऐंठने के लिए खुशीखुशी मेरे साथ संबंध बनाने को राजी हो गई थी.’’ कुंदन कुमार ने कहा.

‘‘वह सब छोड़ो, फिलहाल यह बताओ कि अनु जब नौकरी करने आई थी तो उस का बायोडाटा तो तुम ने लिया ही होगा?’’ पुलिस ने थोड़ा सख्त लहजे में पूछा.

कुंदन कुमार ने घबरा कर कहा, ‘‘जी हां, लिया था.’’

इस के बाद पुलिस कुंदन कुमार को उस के औफिस ले गई और अनु का बायोडाटा बरामद कर लिया. उस पर उस का फोटो लगा था. फोटो में वह वाकई निहायत खूबसूरत लग रही थी. वह कस्बा रहेड़ू की रहने वाली थी. बायोडाटा से उस का पता ही नहीं, फोन नंबर भी मिल गया था. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो फोन अनु के पिता ने रिसीव किया. उन्होंने बताया कि अनु पिछले कई दिनों से कहीं गई हुई है. कहां गई है, इस बारे में वह कुछ नहीं बता पाए. पुलिस ने अनु की तलाश में अपना पूरा जाल बिछा दिया. इसी के साथ उस के घर वालों के अलावा कुंदन कुमार पर पुलिसिया शिकंजा कसा गया तो 2 दिनों में सोलन जिले के कनलख कस्बा के एक घर में अनु मिल गई. पिछले कुछ दिनों से वह वहां छिप कर रह रही थी.

शिमला ला कर पुलिस ने अनु से पूछताछ की तो अनु ने बताया कि एक भाई और 3 बहनों में वह सब से बड़ी थी. 12वीं पास करने के बाद वह पुलिस में भरती हो गई. लेकिन वहां दिल नहीं लगा तो जल्दी ही उस ने वह नौकरी छोड़ दी. इस के बाद वह किसी औफिस में नौकरी तलाश करने लगी. इस के लिए उस ने कंप्यूटर कोर्स भी कर लिया था. एक दिन उसे उस की एक सहेली ने कुंदन कुमार के बारे में बता कर कहा कि उसे औफिस में काम करने के लिए एक लड़की की जरूरत है. कुंदन कुमार के औफिस जा कर अनु उस से मिली तो उस ने उस का बायोडाटा और फोटो लेने के अलावा उस का इंटरव्यू भी लिया. इस के बाद उस से कहा कि वह एक हफ्ते बाद आ कर मिले. हफ्ते भर बाद अनु गई तो उसे अगले हफ्ते आने को कहा.

महीना भर इसी तरह टरकाने के बाद एक दिन कुंदन कुमार ने कहा, ‘‘ऐसा है बेटा, तुम्हारी परफौरमेंस तो अच्छी नहीं है, फिर भी मैं तुम्हें नौकरी पर रखने के बारे में सोच रहा हूं.’’

‘‘थैंक्यू सर,’’ अनु ने चहकते हुए कहा, ‘‘आप ने मुझे यह नौकरी दे दी न सर तो देखिएगा, आप को मेरी तरफ से शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा. मुझे नौकरी की जरूरत तो है ही, इस के अलावा मैं अपनी मेहनत से जिंदगी में कुछ बनना चाहती हूं.’’

कुंदन कुमार उठे और अनु की पीठ थपथपा कर बोले, ‘‘मैं तुम्हारी भावना से बहुत खुश हूं बेटी. लेकिन पहले मेरी एक बात ध्यान से सुन लो. अभी मैं तुम्हें रैग्युलर नौकरी पर न रख कर ट्रेनी के रूप में रखूंगा. 3 महीने तुम्हें औफिस के कामों की, कंप्यूटर की, सेल्स टैक्स व इनकम टैक्स संबंधी रिटर्न भरने और चुस्तदुरुस्त बनी रहने की ट्रेनिंग दी जाएगी. इस बीच तुम्हें 12 सौ रुपए महीने मिलेंगे. इस बीच तुम ने बढि़या काम किया तो तुम्हारी नौकरी रैग्युलर कर के तुम्हें 5 हजार रुपए महीने तनख्वाह दी जाएगी. हर साल 5 सौ रुपए का इन्क्रीमेंट के अलावा हर साल दीवाली पर 1 महीने की तनख्वाह बोनस में मिला करेगी.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा है सर.’’

‘‘नहीं, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई. पहले पूरी बात सुन लो.’’

‘‘देखो, तुम्हारा जो ट्रेनिंग पीरियड है, अगर यह संतोषजनक नहीं रहा तो तुम्हें नौकरी से हटा दिया जाएगा या फिर 3 महीने के लिए तुम्हारा ट्रेनिंग पीरियड और बढ़ा दिया जाएगा. अब फैसला तुम्हें करना है.’’

अनु कुछ देर सोचती रही, फिर बोली, ‘‘ठीक है सर, मुझे मंजूर है.’’

इस के बाद अनु मालरोड स्थित कुंदन कुमार के औफिस में नियमित ड्यूटी पर जाने लगी. औफिस में जहां कुंदन कुमार बैठता था, वहीं बगल में कंप्यूटर टेबल रखी थी. उसी पर अनु को बैठना था. वहीं बगल में दीवार से सटा कर छोटा सा दीवान रखा था, जिस पर लेट कर कुंदन कुमार आराम किया करता था. औफिस में कोई खास काम तो था नहीं, लिहाजा कुंदन कुमार बैठा अनु से गप्पें हांकता रहता था. कभीकभी उसे औफिस के कामों के बारे में समझाने बैठ जाता. वह जब भी बैंक में पैसा जमा करने अथवा निकलवाने के लिए जाता, अनु को भी साथ ले जाता. रुपए भी वह उसी से गिनवाता.

औफिस में छोटा सा किचन था. उस में रखे फ्रिज में कई तरह के जूस मौजूद रहते थे. चाय बनाने की भी व्यवस्था थी. कुंदन का जब भी मन होता, अनु से चाय बनवा कर अथवा फ्रिज से जूस मंगवा कर पीता. उस ने अनु से भी कह रखा था कि जब भी उस का मन हो, वह चाय या जूस पी लिया करे. इसी तरह 2 महीने बीत गए. एक दिन कुंदन कुमार बाहर से आया. उस समय अनु कंप्यूटर पर गेम खेल रही थी. कुंदन ने आते ही उस के गाल को गर्मजोशी से चूम कर कहा, ‘‘आज मैं बहुत खुश हूं अनु.’’

अनु ने उस की बात पर ध्यान न देते हुए कुंदन पर सख्त ऐतराज जताते हुए कहा, ‘‘मुझे आप से यह उम्मीद नहीं थी सर. आप ने मुझे किस कर के बहुत गलत किया. आप को ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए था.’’

कुंदन कुमार ने भी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारा गाल चूम लिया तो कौन सा गजब कर दिया. मुझे एक खुशखबरी मिली थी. इसी वजह से खुश हो कर मैं ने तुम्हें अपनी बेटी की तरह किस कर लिया. इस का तुम्हें बुरा लगा तो आगे से मैं ध्यान रखूंगा.’’

अनु के बताए अनुसार, यह बात आईगई हो गई. उसे भी लगा कि शायद कुंदन अपनी जगह ठीक था. वैसे भी उम्र में वह उस के पिता से भी कहीं ज्यादा का था. इसलिए अनु ने उस की ओर से अपना मन साफ कर लिया. मगर इस के लगभग 10 दिनों बाद कुंदन ने अचानक अनु को अपनी बांहों में कस कर भींच लिया. इस बार अनु ने पहले से भी कहीं ज्यादा सख्त लहजे में ऐतराज जताया. यहां तक कि नौकरी छोड़ देने की धमकी भी दी. कुंदन ने इस बार भी उसे यह कह कर मना लिया कि उस की शक्ल हूबहू उस की बेटी जैसी है. जिस तरह ज्यादा खुश होने पर वह अपनी बेटी को बांहों में ले कर प्यार करता था, उसी तरह उस से भी कर बैठा.

इसी के साथ कुंदन कुमार ने कान पकड़ कर अनु से माफी भी मांगी. हालांकि जिस तरह कुंदन कुमार ने अनु को अपनी बांहों में भर कर भींचा था, हर तरह से ऐतराज वाली बात थी. इस के बाद भी कुंदन की बात पर भरोसा कर के अनु ने इस बार भी उस की गलती माफ कर दी थी. कुछ दिनों बाद तो हद ही हो गई. कुंदन कुमार अनु को ले कर बैंक गया था. वहां से कोई फाइल लेने का बहाना कर के उसे अपने घर ले गया. उस समय घर में कोई नहीं था. ताला खोलने के बाद कुंदन कुमार ने उसे ले जा कर एक ऐसे कमरे में बैठा दिया, जहां कंप्यूटर लगा था. उस पर सीडी लगा कर वह बोला, ‘‘मैं अभी आया, तब तक तुम यह फिल्म देखो.’’

इस के बाद वह कमरे से चला गया. अनु ने कंप्यूटर स्क्रीन पर नजरें जमा दीं. कुछ देर में फिल्म चलने लगी. कंप्यूटर स्क्रीन पर जो दृश्य उभरे, उन्होंने अनु के होश उड़ा दिए. वह एक ब्लूफिल्म थी. फिल्म के अश्लील दृश्यों को देख कर अनु घबरा गई, उस का हलक सूख गया. उसे कुछ नहीं सूझा तो वह दरवाजा खोल कर भागी. इस के बाद अनु ने कुंदन कुमार के यहां नौकरी पर जाना बंद कर दिया. वह अपनी तनख्वाह भी लेने नहीं गई. कुंदन कुमार ने भी उस से संपर्क करने की कोशिश नहीं की. इसी तरह करीब 2, ढाई महीने बीत गए. इस बीच अनु कहीं और नौकरी तलाश करती रही, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली.

संयोग से एक दिन लोअर बाजार में कुंदन कुमार से अनु की मुलाकात हो गई. कुंदन कुमार उस की बांह पकड़ कर एक किनारे ले गया और वात्सल्य भरे लहजे में उस के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘मुझे गलत न समझ बेटी, उस दिन मैं ने तुम्हारे लिए अपनी ओर से वह हिंदी फिल्म लगाई थी, जो उस सुबह ही मैं ने देखी थी. मुझे इस बात की जरा भी जानकारी नहीं थी कि उस सीडी में ब्लूफिल्म है. मेरा यकीन करो बेटी, इस में मेरा जरा भी कुसूर नहीं है.’’

‘‘कुसूर नहीं है तो इस तरह की गंदी फिल्म घर पर ला कर रखी ही क्यों?’’ अनु ने तल्खी से कहा, ‘‘ऐसी फिल्में देखने के बाद, वह भी इस उम्र में, आप क्या समझते हैं कि आप अच्छे कैरेक्टर के मालिक होंगे, कतई नहीं.’’

‘‘अब तुम्हें कैसे समझाऊं बेटी. दरअसल हम जैसे हाईसोसायटी वालों के घरों में यह सब आम बात है. हमारे यहां बच्चे, औरतें सब इस तरह की फिल्में देख कर मनोरंजन करते हैं. तुम मिडिल क्लास की हो, इसलिए तुम्हें यह सब अजीब लग रहा है. उस दिन गलती से ब्लूफिल्म लग गई थी तो कंप्यूटर बंद कर देती या आवाज दे कर मुझे बुला लेती. तुम तो सिर पर पांव रख कर ऐसे भागी, जैसे कोई बम फट गया हो.’’

अनु कुंदन कुमार को बीचबीच में टोकने का प्रयास करती रही, लेकिन कुंदन उसे नजरअंदाज कर के अपनी बात कहता रहा. अंत में उस ने कहा, ‘‘अब मैं तुम्हें कभी बेटी भी नहीं कहूंगा. जब तुम्हें मेरे दिमाग में, मेरे काम में और मेरी हर हरकत में गंदगी ही दिखाई दे रही है तो फिर इस रिश्ते को बदनाम क्यों किया जाए. बस मेरी एक बात ध्यान से सुन लो अनु कि मैं आज भी तुम्हें अपनी बेटी की तरह ही मानता हूं.

‘‘मैं ने जानबूझ कर कोई गलती नहीं की. बेकसूर होते हुए भी मैं तुम्हारी नफरत का शिकार हो गया. अब इस की सजा मैं अपने आप को यह देना चाहता हूं कि तुम्हारे ट्रेनिंग पीरियड का वेतन 2 हजार रुपए महीने कर दूंगा. 3 महीने के बाद नौकरी रैग्युलर कर के तनख्वाह 8 हजार रुपए महीने और हर साल बोनस भी इतना ही दूंगा. ठीक लगे तो कल से औफिस आना शुरू कर दो. तुम्हारी सीट आज भी खाली है.’’

अपनी बात पूरी कर के कुंदन कुमार क्षण भर के लिए भी वहां नहीं रुका. तेज कदमों से चलता हुआ वह पलभर में अनु की नजरों से ओझल हो गया. अनु उस के झांसे में आ कर अगले दिन से उस के औफिस में काम करने लगी. कुछ दिन तो ठीकठाक बीते. एक दिन दोपहर को कुंदन कुमार ने फ्रिज से फ्रूटजूस के 2 टेट्रापैक निकाल कर एक उसे पीने को दिया और एक खुद पीने लगा. जूस पीते ही अनु पर नशा सा छाने लगा. जल्दी ही वह अर्धबेहोशी की हालत में पहुंच गई. कुंदन कुमार ने उसे उठा कर दीवान पर लिटा दिया. इस के बाद कपड़े उतार कर शारीरिक संबंध बनाने लगा.

अनु के साथ कुछ हो रहा है, इस बात की जानकारी तो उसे थी, लेकिन वह विरोध करने की स्थिति में नहीं थी. शाम 6 बजे वह होश में लौटी तो उसे उस सब का कुछकुछ याद आने लगा. उस ने इस बारे में कुंदन कुमार से पूछा तो उस ने उसे उस की ब्लूफिल्म दिखा दी. साथ ही धमकी दी कि इस सब के बारे में किसी को कुछ बताया तो वह उस की ब्लूफिल्म की सीडी बाजार में उतार देगा.  इस से अनु बुरी तरह डर गई. इस के बाद जब भी कुंदन कुमार का मन होता, उस से अपने मन की कर लेता. इस के एवज में वह उस की हर छोटीबड़ी जरूरत का ध्यान रखने लगा. वह सीडी बाजार में कैसे पहुंची, इस बारे में कुंदन कुमार और अनु ने कुछ भी मालूम होने से मना कर दिया. जैसे ही यह सब अखबारों में छपना शुरू हुआ, उस ने काफी पैसे दे कर अनु को छिपा दिया था.

अनु से पूछताछ के बाद कुंदन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उस हवालात में बंद कर दिया गया. इस के बाद वह पुलिस को धमकियां देने लगा कि वह सभी पुलिस वालों को देख लेगा. लेकिन पुलिस के पास पुख्ता सबूत थे. इस पर भी वह खुद को बेकसूर बता रहा था, साथ ही कह रहा था कि उसे किसी साजिश के तहत फंसाया जा रहा है. उस ने थाने की मैस का खाना खाने से इनकार कर दिया था. कह रहा था कि उस का खाना किसी बढि़या होटल से मंगवाया जाए. एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह ने कहा कि जब तक वह यहां है, उसे यहीं का खाना मिलेगा. जैसेतैसे उस ने थोड़ा सा खाना खा लिया तो आधी रात में दिल का दौरा पड़ने का शोर मचाने लगा. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां चैकअप के बाद डाक्टरों ने उसे पूरी तरह स्वस्थ बताया.

अगले दिन पुलिस ने उसे न्यायिक दंडाधिकारी के सम्मुख पेश कर के 5 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर विस्तारपूर्वक पूछताछ की. रिमांड अवधि में भी वह कभी सीने में दर्द का तो कभी किसी और तरह की परेशानी का ढोंग कर के पुलिस वालों को अस्पतालों के चक्कर लगवाता रहा. आखिर उस की सारी नौटंकियां फ्लौप साबित हुईं. जैसेतैसे पुलिस रिमांड की अवधि समाप्त हुई और पुलिस ने उसे फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भिजवा दिया, जहां से उसे सजा सुनाए जाने तक जमानत नहीं मिली.

चार्जशीट दाखिल होने के बाद इस केस की सुनवाई 2 सालों तक चली. इस मामले में उसे 10 सालों की कैद की सजा हुई. सजा सुनाए जाने के समय विद्वान जज महोदय ने टिप्पणी करते हुए उसे लताड़ा था कि जिस लड़की से दुष्कर्म के आरोप में उसे यह सजा दी जा रही है, वह उस की बेटी से भी कम उम्र की थी. ऐसे में उस के इस घिनौने अपराध के प्रति देश की कोई भी अदालत नरम रवैया अपनाने के बारे में शायद ही सोच सके. खैर, पुलिस ने तो कुंदन को उस के अपराध की सजा दिला दी, लेकिन वह अश्लील सीडी बाजार में कैसे पहुंची, इस रहस्य की तह तक अंत तक नहीं पहुंच सकी और न ही उन 3 अन्य लड़कियों का पता लगा सकी, जिन के साथ कुंदन कुमार की अश्लील फिल्मों की कई सीडी बरामद हुई थीं.

इस मामले से मिडिल क्लास की उन बेरोजगार लड़कियों को सावधान हो जाना चाहिए, जिन्हें नौकरी देने के नाम पर नोचने के लिए इस तरह के कामुक भेडि़ए घात लगाए बैठे रहते हैं. Hindi crime story

—कथा में पात्रों के नाम बदले हुए हैं.

 

Suspense Story: शराब के नशे में शबाब की चाहत

Suspense Story: जय सिंह की नीयत के बारे में जान कर अमरजीत और मीना का खून खौल उठा. इस के बाद जहां जय सिंह अपनी जिद पूरी करने पर अड़ गया वहीं दोनों बहनें भी पीछे नहीं हटीं और…  पि  छले 2 दिनों से हो रही बारिश के थमने के बाद अमेंद्र सिंह 2 मजदूरों को अपने ट्रैक्टर पर बैठा कर खेतों की ओर चल पड़े थे. उन के पास 20 बीघा जमीन थी, जिस में उन्हें गवार की बोआई करनी थी. जैसे ही वह खेतों पर पहुंचे, उन्हें किसी जीव के सड़ने की दुर्गंध महसूस हुई.

अमेंद्र ने इधरउधर नजरें घुमा कर यह जानने की कोशिश की कि यह बदबू आखिर आ कहां से रही है. तभी उन्हें खेतों के नीचे वाले हिस्से में 5-7 कुत्तों का झुंड दिखाई दिया. कुत्ते जमीन के अंदर से कुछ खींच रहे थे. उन्हें लगा कि कोई जानवर मरा पड़ा है, जिसे कुत्ते खा रहे हैं.

उन्होंने गांव के कोटवाल भजनलाल को बुलाने के लिए अपने एक मजदूर को भेज दिया. गांवों में आज भी मृत जानवरों को दफनाने का काम कोटवाल करते हैं. भजनलाल आया तो उस ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘भैयाजी, यह जानवर की नहीं, किसी आदमी की लाश है.’’

आदमी की लाश होने की बात सुन कर खेतों में बुआई कर रहे अमेंद्र चौंके. वह भाग कर लाश के पास पहुंचे. वहां गड्ढा खोद कर दफनाई गई आदमी की लाश को कुत्तों ने पंजों से खोदखोद कर बाहर निकाल लिया था. लाश बाहर आ गई थी, इसलिए बदबू फैल रही थी. मजदूरों को लाश के पास छोड़ कर अमेंद्र सिंह कोटवाल भजनलाल को साथ ले कर तुरंत हनुमानगढ़ जंक्शन के थाना सदर पहुंचे. थानाप्रभारी राजेश कुमार सिहाग से मिल कर उन्होंने खेत के पास लाश पड़ी होने की बात बताई तो थानाप्रभारी ने इस बात की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे कर खुद सहयोगियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

राजेश कुमार सिहाग ने घटनास्थल पर पहुंच कर देखा कि खेतों के नीचे वाले हिस्से में एक लाश पड़ी है. उस के शरीर की चमड़ी गायब थी. दोनों पैरों की हड्डियां दिखाई दे रही थीं. देखने से ही लग रहा था कि लाश 8-10 दिन पुरानी थी. थानाप्रभारी लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि सीओ अतर सिंह भी घटनास्थल पर आ पहुंचे. अब तक वहां काफी भीड़ लग गई थी. पूछने पर भीड़ ने बताया कि मृतक यहां का नहीं लगता. इस से पुलिस को लगा कि हत्या कहीं और कर के सबूत मिटाने के लिए लाश को यहां ला कर गाड़ दिया गया है.

अतर सिंह के निर्देश पर डौग स्क्वायड को लाया गया, लेकिन इस से भी पुलिस को कोई लाभ नहीं मिला. इस के बाद घटनास्थल की काररवाई निपटा कर पुलिस ने थाने आ कर अमेंद्र की तहरीर पर अज्ञात की हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया. सीओ ने इस मामले की जांच सबइंसपेक्टर राजेश कुमार सिहाग को सौंप दी. मृतक की पहचान के बिना हत्यारे तक पहुंचना बहुत मुश्किल था. लेकिन राजेश कुमार सिहाग का मानना था कि मृतक भले ही यहां का रहने वाला नहीं है, लेकिन हत्यारे यहीं कहीं आसपास के होंगे. मृतक या हत्यारे तक पहुंचना चुनौती था, लेकिन राजेश कुमार ने इस चुनौती को स्वीकार कर आगे की जांच शुरू कर दी.

घटनास्थल पर लाश के अलावा ऐसा कोई सबूत नहीं मिला था, जिस से कुछ मदद मिल सकती. अधिकतर हत्या जैसे मामलों में जरजोरू या जमीन का विवाद सामने आता है. इसी के साथ अधिकतर यह भी देखा गया है कि अपराधी कितना ही शातिर क्यों न रहा हो, वारदात की जगह पर अनजाने में ही सही, कोई न कोई सबूत अवश्य छोड़ जाता है. राजेश कुमार सिहाग इन्हीं दोनों तथ्यों के आधार पर मामले का खुलासा करने में लग गए. राजेश कुमार सिहाग ने जिले के ही नहीं, नजदीक के अन्य प्रदेशों के पुलिस थानों से भी पता किया कि कहीं कोई गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. लेकिन उन्हें कहीं से भी किसी की गुमशुदगी की कोई सूचना नहीं मिली. मृतक की पहचान न होने की वजह से मामले की जांच आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

थानाप्रभारी को उम्मीद थी कि घटनास्थल से कोई न कोई ऐसा सूत्र अवश्य मिल जाएगा, जिस से वह हत्यारे को ढूंढ निकालेंगे. इसी उम्मीद पर वह अपने रीडर बृजमोहन मीणा और किसान अमेंद्र सिंह को साथ ले कर एक बार फिर घटनास्थल पर पहुंचे. अमेंद्र के ही नहीं, आसपास के लगभग सभी खेत अभी खाली पडे़ थे. खेतों के चारों ओर एक निर्माणाधीन मकान के अलावा दूरदूर तक कोई मकान या झोपड़ी नहीं थी. राजेश कुमार सिहाग ने सूत्र की तलाश में पूरी ताकत झोंक दी. घटनास्थल के 20-25 मीटर के दायरे को उन्होंने जांच केंद्र बनाया. बरसात हो जाने की वजह से कोई सूत्र मिलने की उम्मीद कम ही थी, इस के बावजूद उन की कोशिश रंग लाई.

उन्होंने गौर से देखा तो लाश जिस गड्ढे में दफनाई गई थी, वहां खेत में गड्ढे से 7-8 फुट की दूरी पर पश्चिम की ओर लग रहा था कि लाश इधर से घसीट कर लाई गई थी. पानी बरस जाने से घसीटे जाने का वह निशान धूमिल तो पड़ गया था, लेकिन अगलबगल की मिट्टी का जो उभार था, वह किसी भारी चीज के घसीटने की चुगली कर रहा था. घसीटे जाने का वह निशान वहां से थोड़ी दूरी पर स्थित उस निर्माणाधीन मकान की ओर जा रहा था. राकेश कुमार को सूत्र मिल गया था. वह मन ही मन प्रफुल्लित हो उठे, क्योंकि जांच को दिशा मिल गई थी. उन्होंने अमेंद्र सिंह से पूछा, ‘‘यह सामने वाला घर किस का है, कौन रहता है यहां?’’

‘‘साहब, यह मकान शृंगारा सिंह बाजीगर का है. 7-8 साल पहले बीकानेर क्षेत्र से आ कर यहां 12 बीघा जमीन खरीद कर बस गया था. 2 साल पहले वह मर चुका है. अब उस की पत्नी और छोटा बेटा यहां रह रहे हैं. लेकिन इस समय उस की 2 बेटियां, जिन की शादी हो चुकी हैं और एक दोहती यहीं हैं.’’

राजेश कुमार सिहाग थाने लौट आए और सारी जानकारी सीओ अतर सिंह को दी. इस जानकारी से संतुष्ट हो कर उन्होंने थानाप्रभारी को अपने विवेक के अनुसार काररवाई करने का आदेश दिया. राजेश कुमार सिंह को शृंगारा सिंह के घर में रहने वालों पर संदेह था, इसलिए उन्होंने काररवाई करने का मन बना लिया. 2 महिला सिपाही साथ ले कर राजेश कुमार शृंगारा सिंह के घर पहुंचे. घर में 4 महिलाएं और एक बच्चा था. उन्होंने घर की मालकिन से पूछा, ‘‘मांजी, पुलिस ने अमेंद्र सिंह के खेत में एक लाश बरामद की थी. आप ने बीते 10-12 दिनों में उन के खेत की ओर किसी आदमी को आतेजाते देखा तो नहीं?’’

‘‘नहीं साहब, मैं ने तो इधर किसी को आतेजाते नहीं देखा.’’ शृंगारा की विधवा ने बताया.

उन्होंने शृंगारा की पत्नी से ही नहीं, बेटियों से भी पूछताछ की. सब ने लगभग एक जैसा जवाब दिया. वह पूछताछ कर रहे थे कि  तभी शृंगारा सिंह की दोहती (बेटी की बेटी) गुलबदन (बदला हुआ नाम) उन के लिए चाय ले कर आई. उन की नजर उस पर गई तो वह उन्हें सहमी हुई सी लगी. उन्होंने बाकी लोगों को बाहर भेज कर उसे रोक लिया. जवानी की दहलीज पर कदज रख रही गुलबदन शृंगारा की बड़ी बेटी की बेटी थी, जो मिडिल स्कूल में पढ़ रही थी और छुट्टियां होने की वजह से नानी के पास आई हुई थी. गेहुंआ रंग की आभा के साथ गुल की सुघड़ शारीरिक बनावट गजब का आकर्षण पैदा कर रही थी. धवल दंत पंक्ति और नितंबों तक लहराते काले बालों की चुटिया 14-15 साल की कमसिन गुल को और ज्यादा आकर्षक बनाती थी.

राजेश कुमार सिहाग के सामने आते ही गुल की रुलाई फूट पड़ी. सुबकते हुए उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं ने कुछ नहीं किया. मेरी दोनों मासियां ही कुछ बता सकती हैं.’’

गुल का यह जवाब और चेहरे पर उभरा अपराधबोध का भाव सब कुछ कह गया. राजेश कुमार ने दोनों महिला कांस्टेबलों को इशारा कर के गुल की दोनों मासियां यानी अमरजीत कौर और मीना कौर को पूछताछ के लिए एक बार फिर बुला लिया. सीओ अतर सिंह की मौजूदगी में राजेश कुमार सिहाग ने दोनों बहनों से कहा, ‘‘गुल तो बच्ची थी, लेकिन तुम दोनों समझदार हो. उस ने मुझे सब कुछ साफसाफ बता दिया है. अब अगर तुम झूठ बोलती हो तो वह तुमहारे लिए ही नुकसानदायक साबित होगा. अगर तुम सबकुछ सचसच बता देती हो तो पुलिस तुम्हारी मदद कर सकती है.’’

अंधेरे में फेंका गया उन का यह तीर सही निशाने पर लगा. दोनों बहनों ने बिना किसी हीलहवाली के 5 दिनों पहले कुल्हाड़ी और कस्सी से की गई जय सिंह की निर्मम हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उन का कहना था कि जय सिंह अव्वल दर्जे का शराबी और अय्याश था. उसे अपनी ओछी हरकतों की वजह से जान से हाथ धोना पड़ा. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में जय सिंह की हत्या की जो कथा उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी. राजस्थान के जिला बीकानेर की तहसील जामनगर का एक गांव है भरूपावा. इसी गांव में रहता था शृंगारा सिंह बाजीगर. परिवार में पत्नी, 4 बेटियां और एक बेटा था. बेटा सब से छोटा था. बड़ी 2 बेटियों की शादी हो चुकी थी.

मामूली खेतीबाड़ी होने की वजह से शृंगारा सब्जी की दुकान भी लगाता था. उस के कहीं चले जाने पर दुकान का जिम्मा दोनों छोटी बेटियां अमरजीत कौर और मीना कौर संभालती थीं. उस बीच जय सिंह उन का पक्का और नियमित ग्राहक बन गया था. वह ठीकठाक कपड़ों में किसी हीरो से कम नहीं लगता था. जय सिंह मूलरूप से जिला झुंझुनू के बजावा गांव का रहने वाला था और उन दिनों खनन विभाग की रायल्टी वसूलने वाली टीम में नौकरी कर रहा था. उस का पिता बालू सिंह बीकानेर के एक होटल में वाचमैनी करता था. जय सिंह को जो वेतन मिलता था, वह तो मिलता ही था, ऊपरी कमाई भी कर लेता था. उस का ज्यादातर समय दोनों बहनों की सब्जी की दुकान पर ही बीतता था.

उसी बीच उस ने छोटी बहन मीना का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया तो उसी से नहीं, अमरजीत से भी फोन से बातें करने लगा. वह दोनों बहनों को उपहार भी देता था. धीरेधीरे उस ने दोनों बहनों से दोस्ती गांठ ली थी. सन 2010 के आसपास शृंगारा सिंह भरूपावा के अपने खेत और मकान बेच कर डबली राठान गांव में 12 बीघा जमीन खरीद ली और वहीं पक्का मकान बना कर रहने लगा. यहीं से उस ने बाकी बची दोनों बेटियों, अमरजीत कौर और मीना कौर की शादियां कर दीं. इस के बाद सन 2014 की शुरुआत में उस की मौत हो गई.

शृंगारा के परिवार में बूढ़ी पत्नी और 8-10 साल का बेटा बचा था. चारों बेटियों ने स्वयं को बेटा समझते हुए मां को संभालने का जिम्मा सा ले लिया. हर बेटी 1-2 महीने के लिए मां के पास आ जाती. जय सिंह के पास मीना का मोबाइल नंबर था ही, इसलिए उस से उस की बातें होती रहती थी. ज्यादातर मीना और अमरजीत एक साथ मायके आती थीं. दोनों बहनों के मायके आने का पता चलते ही जय सिंह उन से मिलने आ जाता. अव्वल दर्जे का शराबी जय सिंह 1-2 दिन रुक कर अपने काम पर लौट जाता. 20 मई को जय सिंह शृंगारा सिंह के घर आ कर 2 दिनों बाद लौट गया था. उसे जब भी आना होता, वह मोबाइल पर बता देता था.

इस बार कुछ दिनों पहले जय सिंह के जाने के बाद गुलबदन गुमसुम सी आंगन में बैठी थी. उस के दाएं गाल पर बड़ा सा चकता उभरा था. उसे इस तरह उदास देख कर अमरजीत ने पूछा, ‘‘क्या बात है गुल, उदास क्यों है? तेरे गाल को क्या हुआ?’’

जवाब देने के बजाए गुल रोने लगी. अमरजीत ने गुल को सीने से लगा कर ढांढ़स बंधाया. आंसू पोंछ कर पूछा, ‘‘सचसच बता क्या बात है?’’

गुल ने सिसकते हुए कहा, ‘‘मौसी कल रात जय मामा रात में मेरी चारपाई पर आ कर बैठ गए. उन्होंने दांतों से यहां काट लिया,’’ चकत्ते पर अंगुली रख कर गुल ने कहा, ‘‘उस के बाद उस ने मेरी सलवार खोलने की कोशिश की. तभी मीना मौसी जाग गईं. अंधेरा होने की वजह से वह मामा को देख नहीं पाईं और वह चुपके से अपनी चारपाई पर चला गया. सुबह उन्होंने कहा कि अगर मैं ने यह बात किसी को बताई तो वह मेरा गला दबा कर मुझे मार देंगे.’’

जय सिंह की इस घिनौनी हरकत के बारे में सुन कर अमरजीत का खून खौल उठा. मीना भी आंगन में आ गई थी. वह तो गुस्से में कांपने लगी थी. अमरजीत ने तुरंत जय सिंह को फोन किया. उस के फोन रिसीव करते ही वह उसे धमकाते हुए बोली, ‘‘तेरी इतनी हिम्मत कि तू ने गुल को हाथ लगा दिया. आइंदा गुल को हाथ लगाना तो दूर, उस की तरफ गंदी नजरों से देखा भी तो तेरी आंखें फोड़ दूंगी. तेरी बोटीबोटी कर के चीलकौवों को खिला दूंगी. मेरी ढाणी की तरफ रुख भी किया तो मेरी जैसी कोई बुरी नहीं होगी.’’

जो मुंह में आया जय सिंह को कह कर अमरजीत ने फोन काट दिया. उस के मुंह बोले भाई जय सिंह ने सफाई देनी चाही, पर मीना और अमरजीत ने फोन रिसीव नहीं किया.  पिछले 4-5 दिनों से जय सिंह फोन कर रहा था, पर उस का फोन रिसीव नहीं किया गया. 2 जून, 2015 को अमरजीत मां के साथ खेतों की ओर गई थी. घर पर मीना और गुल थीं. तभी मोबाइल की घंटी बजी. मीना ने देखा कि जय सिंह का फोन है. उस ने फोन रिसीव कर लिया तो दूसरी ओर से जय सिंह ने कहा, ‘‘देख मीना, तुम दोनों बहनें बेकार ही मुझ पर नाराज हो. मैं ने कोई गलती नहीं की थी. आरोप लगाने और सच्चाई को आंखों से देखने में रातदिन का फर्क होता है. सच्चाई यह है कि उस रात मैं नहीं, गुल मेरी चारपाई पर आ कर लेट गई थी.

वह तो मैं था जो गुल को दुत्कार कर भगा दिया. मेरी जगह कोई और होता तो निश्चय ही अनर्थ हो जाता. और अब आगे सुन, आज रात मैं तेरे घर आ रहा हूं. गुल ने मेरे ऊपर जो झूठा आरोप लगाया था, आज रात मैं उस झूठे आरोप को सच कर दूंगा. तुम दोनों बहनों से जो बन पड़े कर लेना.’’

इस तरह की धमकी दे कर जय सिंह ने फोन काट दिया. लगभग 2 घंटे बाद अमरजीत मां के साथ घर लौटी तो मीना और गुल को डरी देख कर चौंकी. अमरजीत कुछ पूछती, उस के पहले ही मीना ने कहा, ‘‘दीदी, अभी जय सिंह का फोन आया था. वह आज रात आ रहा है. उस का कहना है कि गुल ने उस पर झूठा आरोप लगाया है.’’

‘‘मीना गुल ने झूठा आरोप नहीं लगाया, बल्कि सच्चाई वही है. गुल झूठा आरोप क्यों लगाएगी.’’ अमरजीत ने कहा.

‘‘दीदी, जय सिंह ने धमकी दी है कि वह आज रात गुल के साथ हमारी मौजूदगी में ही मनमानी करेगा.’’ मीना ने कहा.

‘‘अरे, तुम दोनों इस बात को ले कर इतना डरी हुई क्यों हो? मेरे जीतेजी वह मनमानी तो दूर, गुल को छू भी नहीं पाएगा.’’ अमरजीत ने दृढ़ता से कहा.

अमरजीत जय सिंह के जिद्दी स्वभाव को जानती थी. उसे यह भी पता था कि ट्रक चालकों से जानपहचान होने की वजह से वह फोकट में कहीं भी आजा सकता है. अमरजीत भी जय सिंह की इस धमकी से डर गई, इसलिए खलिहान में पड़ी कुल्हाड़ी और कस्सी को ला कर उस ने आंगन में छिपा कर रख दिया. दोनों बहनें अभी जाग रही थीं. रात 12-1 बजे के बीच जय सिंह उन के घर पहुंचा. शराब के नशे में वह लड़खड़ा रहा था. वह सीधे गुल की चारपाई के पास पहुंचा और उसे बांहों में भर कर उठाने की कोशिश करने लगा. लेकिन नशे में होने की वजह से वह खुद ही गिर गया. इस के बाद नींद में गाफिल गुल के बाल पकड़ कर घसीटा तो वह जाग गई. उस के इस रूप को देख कर मासूम गुल ‘बचाओबचाओ’ कह कर रोने लगी.

गुल की करुणामयी पुकार ने अमरजीत और मीना को चंडी बना दिया. अगले ही पल एक ने कुल्हाड़ी तो दूसरी ने कस्सी उठा ली और जय सिंह पर हमला बोल दिया. एक ही वार में वह लुढ़क गया. कुछ देर छटपटा कर उस ने दम तोड़ दिया. लाश ठिकाने लगाने के लिए दोनों बहनें उसे उठा कर खेतों की ओर ले गईं. अमेंद्र के खेत के पास पहुंचतेपहुंचते वे थक गईं. मीना कस्सी लेने घर लौट गईं तो अमरजीत अकेली ही लाश को कई फुट तक घसीट कर ले आई. इसी घसीटने के निशान के आधार पर राजेश कुमार सिहाग उन के घर तक पहुंच गए थे.  कस्सी से दोनों बहनों ने गड्ढा खोदना शुरू किया. मानसिकशारीरिक थकावट की वजह से वे एकडेढ़ फुट से ज्यादा गहरा गड्ढा नहीं खोद पाईं. उसी गड्ढे में लाश दफना कर दोनों बहनें घर आ कर सो गईं.

पुलिस ने दोनों बहनों को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से पूछताछ एवं साक्ष्य जुटाने के लिए पुलिस ने 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि के दौरान जांच अधिकारी ने वारदात में प्रयुक्त कस्सी और कुल्हाड़ी बरामद कर ली. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद दोनों बहनों को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

UP Crime: फोन से फिक्स मौत

 UP Crime: सुमित ने आरती को समझाया कि अब उस की शादी हो गई है, इसलिए वह किसी पराए मर्द से फोन पर बातें करना बंद कर दे. आरती नहीं मानी तो सुमित ने उसे सबक सिखाने के लिए ऐसा क्या किया कि….  उ त्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद से करीब 20 किलोमीटर दूर थाना छजलैट के अंतर्गत आता है एक गांव कुरीखाना. अंकित वर्मा इसी गांव में परिवार के साथ रहता था. गांव में ही उस की ज्वैलरी की दुकान थी. उसी पर वह अपने भाई के साथ बैठता था.

16 अपै्रल, 2015 की दोपहर वह भाई को दुकान पर छोड़ कर खाना खाने के लिए घर गया. उस के लिए खाना परोस कर आया, तभी उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया. पता नहीं वह फोन किस का था कि अंकित खाना खाए बगैर ही 15-20 मिनट में लौटने को कह कर चला गया. उस की भाभी बारबार कहती रहीं कि खाना खा ले, लेकिन वह नहीं माना और मोटरसाइकिल ले कर चला गया. अंकित 15-20 मिनट में ही लौटने को कह कर गया था, लेकिन डेढ़, दो घंटे बाद भी वह घर नहीं लौटा तो घर वालों को चिंता हुई. उसे फोन किया गया तो पता चला कि वह बंद है. घर वाले इधरउधर फोन कर के उस के बारे में पता लगाने लगे.

दोपहर करीब 3 बजे पड़ोस के गांव भीकनपुर निवासी जय सिंह टै्रक्टर ले कर अपने खेतों की तरफ गया तो उस ने खेत में एक आदमी की खून से लथपथ लाश देखी. खेत में लाश देख कर वह चौंका. उस ने आसपास के खेतों में काम कर रहे लोगों को आवाज दे कर बुला लिया. किसी ने इस बात की सूचना अंकित के घर वालों को दे दी तो वे रोतेबिलखते घटनास्थल पर पहुंच गए. अंकित की रक्तरंजित लाश देख घर वालों का बुरा हाल था. सूचना मिलने के बाद थाना छजलैट के थानाप्रभारी मुश्तकीम अली भी पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. लाश के पास ही एक मोटरसाइकिल और एक मोबाइल फोन पड़ा था. पता चला कि वह मोटरसाइकिल और फोन मृतक के ही थे.

थानाप्रभारी ने इस हत्या की सूचना जिले के पुलिस अधिकारियों को दी तो एसएसपी लव कुमार और एसपी (देहात) प्रबल प्रताप सिंह भी मौके पर पहुंच गए. लाश का मुआयना करने के बाद पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि अंकित की हत्या रंजिश की वजह से की गई है न कि लूट के इरादे से. लाश का पंचनामा कर के पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. एसएसपी ने 26 वर्षीय अंकित वर्मा की हत्या के मामले को सुलझाने के लिए थाना छजलैट के थानाप्रभारी मुश्तकीम अली के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसआई पी.के. चौहान, संध्या रावत, कांस्टेबल राजीव राठी, दिलशाद, तेजेंद्र, सौरभ आदि को शामिल किया गया. टीम ने जांच की शुरुआत मृतक के घर से की.

पुलिस पूछताछ में घर के सभी लोगों ने अंकित की किसी से कोई दुश्मनी होने से मना कर दिया तो पुलिस ने अंकित के दोस्तों के बारे में पूछा. थानाप्रभारी को यह मालूम ही था कि अंकित के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. उस के बाद ही वह मोटरसाइकिल ले कर गया था. वह फोन किस का था, यह जानने के लिए पुलिस ने अंकित के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि उस के मोबाइल पर अंतिम बार जिस फोन नंबर से फोन आया था. वह फोन नंबर बिजनौर जिले के चांदपुर के रहने वाले सुमित वर्मा का था.

जांच के लिए सुमित वर्मा से पूछताछ करनी जरूरी थी, इसलिए पुलिस टीम आननफानन में चांदपुर स्थित सुमित वर्मा के घर पहुंच गई. लेकिन सुमित वर्मा घर पर नहीं मिला. पुलिस ने उस की पत्नी आरती से उस के मायके के बारे में पूछ लिया. पुलिस का अंदाजा था कि कहीं वह ससुराल में तो नहीं छिपा बैठा. जानने के लिए पुलिस टीम आरती के मायके धामपुर की टीचर कालोनी जा पहुंची, लेकिन वह वहां नहीं मिला. पुलिस को आरती और उस के भाई राजीव की बातों से लगा कि इन्हें सुमित के बारे में पता है, लेकिन ये नहीं बता रहे हैं. दबाव बनाने के लिए पुलिस ने आरती और उस के भाई राजीव को हिरासत में ले लिया.

सुमित वर्मा अलीगढ़ में अपनी एक रिश्तेदारी में छिपा था. उसे जब पता चला कि पुलिस ने उस की पत्नी और साले को हिरासत में ले लिया है तो वह परेशान हो उठा. वह वहां से उत्तराखंड के रुद्रपुर शहर चला गया और वहीं से अपने परिचितों को फोन कर के पत्नी व साले को थाने से छुड़ाने की कोशिश करने लगा. इसी चक्कर में वह अपने दोस्त अंकित कर्णवाल के साथ रुद्रपुर से 21 अप्रैल, 2015 को मुरादाबाद आ गया. पुलिस ने उस के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा रखा था, वह उस की लोकेशन पर नजर रखे हुए थी. पुलिस टीम ने उस के मुरादाबाद आते ही धरदबोचा.

दोनों को हिरासत में ले कर पुलिस छजलैट आ गई. थाने में दोनों से अंकित वर्मा के बारे में पूछताछ की तो वे इधरउधर की बातें करने लगे. लेकिन जब सुमित के सामने उस की पत्नी और साले को लाया गया तो वह थोड़ा परेशान हो गया. थानाप्रभारी को लगा कि सुमित आसानी से सच्चाई बताने वाला नहीं है. तब उन्होंने एक चाल चली. उन्होंने सुमित से कहा, ‘‘तुम्हारी पत्नी और साले ने बताया है कि अंकित की हत्या में वे भी शामिल थे.’’

इतना सुनते ही सुमित लाइन पर आ गया. उस ने कहा, ‘‘नहीं सर, अंकित की हत्या में इन लोगों का कोई हाथ नहीं है. उस की हत्या तो मैं ने की थी. ये लोग तो बेकुसूर हैं.’’

थानाप्रभारी यही बात उस के मुंह से सुनना चाहते थे. उन्होंने बेवकूफ बना कर सुमित के मुंह से सच्चाई उगलवा ली थी. इस के बाद सुमित और अंकित कर्णवाल ने अंकित वर्मा की हत्या की जो कहानी बताई, वह प्रेमप्रसंग से लबरेज निकली. सुमित वर्मा बिजनौर जिले के चांदपुर कस्बे की श्रीराम कालोनी में रहता था. उस की बिजनौर के ही फीना कस्बे में सर्राफा की दुकान थी. फरवरी, 2014 में उस की शादी धामपुर के रहने वाले रामकिशन वर्मा की बेटी आरती के साथ हुई थी. दोनों की हंसीखुशी से जिंदगी कट रही थी.

सुमित कभीकभी देखता था कि उस की पत्नी फोन पर किसी से काफीकाफी देर तक बातें करती है. कोई भी आदमी इस तरह अपने किसी नजदीकी से ही बातें करेगा. सुमित को लगा था कि वह अपने घर वालों से बातें करती होगी. लेकिन जब उस ने एक दिन पत्नी को फोन पर रोमांटिक बातें करते सुना तो उस ने पत्नी से पूछा, ‘‘आरती, तुम अभी किस से बातें कर रही?’’

आरती ने कहा, ‘‘मेरा रिश्ते का एक भाई है. उसी से बातें कर रही थी.’’

‘‘कौन सा ऐसा भाई है, जो तुम से फोन पर घंटों तक बातें करता है, जबकि तुम्हारे घर वालों के इतने फोन नहीं आते. आरती अब तुम्हारी शादी हो चुकी है, इसलिए तुम्हें अपने घर की तरफ ध्यान देना चाहिए.’’ सुमित ने पत्नी को समझाया.

‘‘ठीक है, मैं उस से अब ज्यादा बातें नहीं करूंगी.’’ आरती ने कहा.

आरती ने पति से वादा तो कर लिया, लेकिन उस ने उस भाई से बातें करनी कम नहीं कीं. इस पर सुमित ने पत्नी से कहा तो कुछ नहीं, लेकिन उस के मोबाइल की काल डिटेल्ट जरूर देखी. इस से पता चला कि आरती एक ही फोन नंबर पर दिन में कईकई बार लंबीलंबी बातें करती थी. जिस नंबर पर उस की बातें होती थीं, एक दिन उस ने उसी नंबर पर अपने फोन से बात की तो दूसरी ओर से जो आदमी बोला, उस ने अपना नाम अंकित वर्मा बताया. पूछने पर अंकित ने बताया, ‘‘सुमितजी आप का साला राजीव है न वह मेरा दोस्त है. उस के यहां मेरा वर्षों से आनाजाना है. मैं आरती को बहन मानता हूं, इसलिए उस से बातें कर लेता हूं.’’

‘‘जितने फोन तुम उसे करते हो, उतने फोन तो उस का सगा भाई भी उसे नहीं करता. आरती का कोई बड़ा बिजनैस भी नहीं है, जिस से समझ सकूं कि तुम बिजनैस के सिलसिले में उस से बातें करते हो.’’ सुमित थोड़ा गुस्से में बोला.

‘‘लगता है, आप को यह सब बुरा लगा.’’ अंकित ने कहा.

‘‘बिलकुल बुरा लग रहा है. आरती मेरी पत्नी है, इसलिए बुरा तो लगेगा ही. अब मैं कह देता हूं कि तुम उसे फोन हरगिज नहीं करोगे.’’ सुमित ने उस से दो टूक कह दिया.

मगर इस चेतावनी के बाद भी आरती और अंकित वर्मा आए दिन फोन पर बातें करते रहे. इस से सुमित को शक हुआ कि इन दोनों के बीच कोई न कोई चक्कर जरूर है, जिस से ये बातें करना बंद नहीं कर रहे हैं.

एक दिन सुमित वर्मा ने आरती को विश्वास में ले कर और कसम दे कर पूछा, ‘‘आरती, तुम्हारा और तुम्हारे मुंह बोले भाई का क्या चक्कर है, जो एकदूसरे को नहीं भूल पा रहे?’’

तब आरती ने बताया, ‘‘अंकित वर्मा से मेरी कालेज के समय की दोस्ती है. उस का हमारे घर भी आनाजाना था.’’

दोस्ती की बात सुन कर सुमित का दिमाग घूम गया. अगले दिन वह अपनी ससुराल पहुंच गया. उस ने अपने साले राजीव से पूछा, ‘‘यह अंकित वर्मा कौन है और उस का तुम लोगों से क्या संबंध है?’’

इस पर राजीव ने हंस कर कहा कि अंकित ने यहीं रह कर अपनी पढ़ाई की थी. उस से थोड़ीबहुत जानपहचान थी. वैसे वह कुरीखाना गांव का रहने वाला है. अब उस ने वहीं पर सर्राफे की दुकान खोल ली है. पहले आरती की शादी अंकित से ही तय हुई थी. लेकिन उस से शादी के लिए हमारे पिता तैयार नहीं थे, जिस से शादी नहीं हो सकी. इतनी जानकारी मिलने पर सुमित समझ गया कि जब इन की बात शादी तक पहुंच गई थी तो जरूर इन के बीच कोई चक्कर रहा होगा. वह उसी समय घर लौट आया. घर आ कर उस ने आरती को डांटा कि उस ने उस से झूठ क्यों बोला. अंकित वर्मा से शादी की बात चलने वाली बात उसने क्यों छिपाए रखी? जब अंकित उस का भाई है तो उस से शादी की बात कैसे चली?

आरती समझ गई कि सुमित को शायद सच्चाई का पता चल गया है. इसलिए वह कुछ नहीं बोली. बहरहाल सुमित ने उसे एक बार और चेतावनी दी कि वह अंकित से हरगिज बात न करे, वरना उसे सख्त कदम उठाने पड़ेंगे. सच्चाई यह थी कि अंकित वर्मा और आरती के बीच शादी से पहले से ही गहरी दोस्ती थी. आरती के पिता की नाराजगी से जब आरती और अंकित वर्मा की शादी नहीं हो सकी तो दोनों कसमसा कर रह गए. तब आरती ने अंकित से वादा किया कि भले ही उस की शादी किसी और से हो जाए, उस के संबंधों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

यही वजह थी कि सुमित वर्मा से शादी हो जाने के बाद भी आरती और अंकित फोन पर बातें करते रहते थे और मौका मिलने पर मुलाकात भी कर लेते थे. अब पति को शक होने पर आरती परेशान हो उठी. उस ने इस बारे में अंकित से बात की. तब दोनों ने तय किया कि सुमित के अपनी दुकान पर जाने के बाद दोनों कहीं बाहर मिल लिया करेंगे. इस के बाद सुमित जैसे ही फीना की अपनी ज्वैलरी की दुकान के लिए निकलता, आरती अंकित को फोन कर देती. इस के बाद दोनों किसी रेस्टोरेंट में मुलाकात कर लेते. आरती अपने प्रेमी से मिलने में काफी एहतियात बरतती थी. इस के बावजूद भी उस के पति को किसी के द्वारा पता लग गया कि उस के निकलते ही उस की पत्नी घंटों के लिए घर से गायब हो जाती है.

सुमित वर्मा समझ गया कि वह अपने यार से ही मिलने जाती होगी. उस ने न तो आरती से कुछ कहा और न ही अंकित से, बल्कि इस समस्या से निदान पाने के लिए उस ने अंकित वर्मा को ठिकाने लगाने की ठान ली. उस ने सोचा कि ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी. अपनी योजना को आसानी से अंजाम तक पहुंचाने के लिए उस ने अंकित से दोस्ती करनी उचित समझी. करीब 5 महीने पहले वह एक दिन अंकित के घर पहुंचा. अचानक अपने घर सुमित को देख कर अंकित चौंका तो सुमित ने कहा, ‘‘मैं मुरादाबाद जा रहा था, तुम जब मेरे साले के दोस्त हो तो सोचा तुम से मिलता हुआ ही निकल जाऊं.’’

‘‘यह तो आप ने बहुत अच्छा किया, आप हमारे रिश्तेदार हैं. इसलिए जब कभी मन हो, आ जाया करें.’’ अंकित ने कहा.

अंकित ने उस वक्त सुमित की बहुत खातिरदारी की. अंकित की मेज पर उस का एक फोटो फ्रेम में लगा रखा था. किसी बहाने से सुमित ने वह फोटो उस से ले लिया और जाते समय बोला, ‘‘अंकित आज से हम दोस्त हैं. तुम भी हमारे यहां आते रहना.’’

यह सुन कर अंकित वर्मा फूला नहीं समाया कि अब आरती से मिलने का रास्ता साफ हो गया. एकदो बार अंकित वर्मा सुमित के सामने उस के घर आरती से मिलने गया. सुमित का एक दोस्त था, अंकित कर्णवाल उर्फ फौलादी, जो चांदपुर में रहता था. सुमित ने अंकित को ठिकाने लगाने वाली बात उसे बताई. अंकित कर्णवाल दोस्त का साथ देने को तैयार हो गया. योजना के अनुसार, 16 अप्रैल, 2015 को सुमित वर्मा और अंकित कर्णवाल सुबह के समय चांदपुर से मोटरसाइकिल द्वारा अंकित वर्मा के गांव कुरीखाना जा पहुंचे. मेन रोड पर एक होटल के नजदीक पहुंच कर सुमित ने अंकित को फोन किया. अंकित उस समय खाना खाने जा रहा था कि उस के फोन की घंटी बजी.

स्क्रीन पर सुमित का नंबर देख कर वह खुश हो गया. तभी सुमित ने कहा, ‘‘कुरीखाना के लिए जो सड़क जाती है, मैं वहीं होटल पर बैठा हूं, साथ में मेरा एक दोस्त भी है. उसे तुम से ज्वैलरी के विषय में कुछ बात करनी है. इस की बहन की शादी है.’’

‘‘जब यहां तक आ गए हो तो घर आ जाओ. एकएक कप चाय भी हो जाएगी. घर में बैठ कर इत्मीनान से बात करेंगे.’’ अंकित ने कहा.

‘‘नहीं, इस समय हम घर नहीं आ सकते क्योंकि हमें अभी मुरादाबाद जाना है. वहां से इसे शादी के लिए बरतन वगैरह भी खरीदने हैं, तुम 2 मिनट के लिए यहां आ जाओ.’’

अंकित अपनी भाभी से यह कह कर घर से निकल गया कि वह अभी 10-15 मिनट में लौट कर खाना खाएगा. अंकित के होटल पर पहुंचने से पहले ही सुमित ने योजना के तहत अंकित को भीकमपुर वाली रोड पर राजेंद्र एकैडमी के पास गन्ने के खेत में छिपने के लिए भेज दिया. अंकित उस होटल पर पहुंच गया, जहां सुमित उस का इंतजार कर रहा था. उस होटल पर दोनों ने चाय पी. तभी सुमित ने बताया कि मेरा दोस्त गन्ने के खेत में लघुशंका के लिए गया हुआ था. उसे गए बहुत देर हो गई है. चलो पहले उसे बुला लें, बाद में बातें करेंगे.

सुमित ने अपनी मोटरसाइकिल वहीं खड़ी कर दी और अंकित की मोटरसाइकिल पर बैठ कर उस गन्ने के खेत की तरफ चल पड़ा जहां अंकित कर्णवाल छिपा था. गन्ने के खेत के नजदीक पहुंच कर सुमित ने आवाज दी तो अंकित कर्णवाल खेत से निकल आया. मोटरसाइकिल अंकित चला रहा था. योजना के तहत अंकित कर्णवाल बाइक पर बीच में बैठ गया. कुछ दूर चलते ही सुनसान जगह देख कर अंकित कर्णवाल ने अंकित वर्मा के दाहिनी तरफ कमर में चाकू घोंप दिया. चाकू लगते ही अंकित वर्मा लड़खड़ा कर मोटरसाइकिल सहित गिर गया.

तभी फुरती से अंकित कर्णवाल ने उस के हाथ पकड़ लिए तो सुमित ने उस की गरदन, पेट आदि पर चाकू के 7-8 वार कर दिए. थोड़ी देर तड़पने के बाद ही उस की मौत हो गई. फिर दोनों ने उस की लाश पापुलर के बाग में खींच कर डाल दी. इस के बाद वे उसी होटल पर पहुंचे, जहां उन की मोटरसाइकिल खड़ी थी. वहां से उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल उठाई और चांदपुर के लिए चल दिए. रास्ते में नूरपुर चांदपुर के बीच पड़ने वाली नदी में उन्होंने खून से सने कपड़े धोए.

सुमित को पता था कि लाश मिलने पर पुलिस उस के पास पहुंच जाएगी, इसलिए वह अपने घर से फरार हो गया था. उस ने बचने की लाख कोशिश की, लेकिन आखिर वह पुलिस के शिकंजे में फंस ही गया. उन की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया. सुमित वर्मा और अंकित कर्णवाल से पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. UP Crime

कथा में मोनिका परिवर्तित नाम है कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Shocking Crime Story: 7 फेरों पर हावी मोहब्बत

Shocking Crime Story: विमला ने जिस प्रेमी को पाने के लिए पति का खून किया, क्या अब जेल जाने के बाद वह उसे मिल सकेगा? दुख की बात तो यह है कि अपने इस स्वार्थ में उस ने मासूम बेटे को भी कातिल बना दिया.

लंच में राजनलाल खाना खाने घर आया तो उस की नजर पलंग पर रखी घड़ी पर पड़ी तो वह चौंका.

उस ने कहा, ‘‘यह घड़ी तो सुमन की है, यहां कैसे आई है?’’

विमला हड़बड़ा उठी. उस ने झपट कर घड़ी उठाते हुए कहा, ‘‘लगता है, सोनी यहां रख गई है.’’

‘‘तो इस में इतना हड़बड़ाने की क्या जरूरत है?’’ राजनलाल ने कहा और खाने बैठ गया. लेकिन लंच कर के जब वह नौकरी पर वापस जाने लगा तो रास्ते में जब उस ने इस बात पर गहराई से विचार किया तो उसे पत्नी की हड़बड़ाहट पर संदेह हो गया. राजनलाल उत्तर प्रदेश के जिला हाथरस के थाना शादाबाद के गांव बिसावर का रहने वाला था. इंटर पास करने के बाद वह पिता भगवान सिंह के साथ खेती करने लगा था. लेकिन जल्दी ही उस का मन खेती के काम से ऊब गया तो वह कहीं बाहर जा कर नौकरी करने के बारे में सोचने लगा. उसने पिता से बात की तो उन्होंने इजाजत दे दी.

गांव के तमाम लड़के मथुरा, आगरा और दिल्ली में नौकरी करते थे. राजनलाल ने उन लड़कों से बात की तो मथुरा में रहने वाला उस का एक दोस्त अपने साथ लिवा ले गया. वहां उस ने साड़ी की छपाई के कारखाने में उस की नौकरी लगवा दी. राजनलाल की नौकरी लग गई तो उस के लिए रिश्ते आने लगे. घर वालों ने उस के लिए राजस्थान के हिंडोन के रहने वाले मथुराप्रसाद की बेटी विमला को पसंद कर लिया. उसे भी लड़की दिखाई गई. उसे भी लड़की पसंद आ गई तो दोनों का ब्याह हो गया.

विमला के रूप में भगवान सिंह के घर खुशियों ने कदम रख दिया. विमला के पायलों की रुनझुन से उस का आंगन गुलजार हो गया. राजनलाल को जब भी मौका मिलता, घर आ जाता, क्योंकि मथुरा और बिसावर के बीच ज्यादा दूरी नहीं है. समय के साथ राजनलाल 3 बेटों का बाप बन गया. बच्चों को पढ़ानेलिखाने की बात आई तो राजनलाल ने पत्नी और बच्चों को मथुरा में साथ रखने का विचार किया. उस ने परिवार के साथ रहने लायक किराए का मकान लिया और पत्नी तथा बेटों को ले आया.

घर में सब ठीकठाक था. विमला एक अच्छी पत्नी की तरह घर संभाल रही थी. धीरेधीरे बच्चे बड़े हो रहे थे. उसी बीच राजनलाल के पिता की मौत हो गई और घर में जमीन का बंटवारा हो गया तो राजनलाल ने बड़े बेटे विकास को गांव भेज दिया, जिस से वह उस के हिस्से की खेती करा सके. विकास दादी के साथ रह कर अपने हिस्से की खेती कराने लगा. राजनलाल पुष्पविहार कालोनी में किराए पर रहता था. इसी मकान में 2 किराएदार और रहते थे. उन में एक उस के साढ़ू की बेटी पूजा थी और दूसरा था ऋषिपाल, जो अलीगढ़ का रहने वाला था और यहां वह भी किसी साड़ी के छपाई के कारखाने में नौकरी करता था. उस की पत्नी सोनी और 2 बच्चे भी साथ ही रहते थे.

पूजा विधवा थी. उस के 3 बच्चे थे, जिन के पालनपोषण के लिए वह यहां मथुरा में रहती थी. वह सूरी सुपारी की फैक्ट्री में पैकिंग का काम करती थी. पूजा भले ही विमला की सगी बहन की बेटी थी, लेकिन उस की पूजा की अपेक्षा पड़ोसन किराएदार सोनी से ज्यादा पटती थी. इस की वजह यह थी कि एक तो दोनों घरेलू महिलाएं थीं, दूसरे विमला पूजा से कुछ जलती थी. इस के अलावा पूजा सुबह चली जाती थी तो शाम को ही लौटती थी. आने पर वह घर के कामों और बच्चों की देखभाल में लग जाती थी. उस के पास किसी से मिलनेजुलने का समय ही नहीं रहता था.

सोनी का भाई सुमन भी उस के साथ रहता था. वह फिरोजाबाद के थाना टुंडला के गांव मोरेला का रहने वाला था. अभी उस की शादी नहीं हुई थी. वह काफी खुशमिजाज था. बहन की वजह से उस की भी जानपहचान विमला से हो गई थी. वह कुछ करताधरता नहीं था, इसलिए विमला से घंटों बातें करता रहता था. कभीकभी विमला के साथ खरीदारी करने भी चला जाता था. विमला की बातचीत से सुमन को लगा कि विमला पति से खुश नहीं है. राजनलाल शाम को नौकरी से लौट कर आता तो पत्नी और बच्चों से चिढ़ा सा रहता. दरअसल उसे बगल में एक घाव हो गया था, जो ठीक नहीं हो रहा था. इस शारीरिक तकलीफ की वजह से वह चिड़चिड़ा हो गया था.

इसी वजह से पतिपत्नी के बीच कहासुनी होती रहती थी, जिस से उन की आपस में दूरी बढ़ती जा रही थी. राजनलाल अकसर पूजा से हालचाल पूछने उस के कमरे में चला जाता था. वहां वह घंटों बैठा रहता, उस के बच्चों को खिलातापिलाता भी था. पूजा विमला की सगी बहन कृष्णा की बेटी थी. पति की मौत के बाद वह मथुरा में नौकरी कर के किसी तरह बच्चों को पाल रही थी. राजनलाल का पूजा के यहां इस तरह उठनाबैठना विमला को जरा भी नहीं सुहाता था. उसे लगता था कि राजनलाल पूजा की रुपयोंपैसों से मदद करता है. इस से उसे पति पर संदेह होने लगा. इन बातों को ले कर घर में अकसर क्लेश होता रहता.

घर में रोजरोज के क्लेश से तंग आ कर राजनलाल शराब पीने लगा. पतिपत्नी के इस क्लेश के बारे में जान कर सुमन को लगा कि अगर वह चाहे तो इस मौके का फायदा उठा सकता है. इस के बाद उस ने कोशिश भी शुरू कर दी. एक दिन उस ने विमला से कहा, ‘‘भाभी, आप खूबसूरत भी हैं और घर का इतना काम भी करती हैं, इस के बावजूद भाई साहब न आप की इज्जत करते हैं और न आप से खुश रहते हैं.’’

विमला ने सुमन की आंखों में झांक कर हंसते हुए कहा, ‘‘इसी खूबसूरती की वजह से तो तुम्हारे भाई साहब ने मुझे पसंद किया था. लेकिन लगता है अब उन का मन मुझ से भर गया है.’’

‘‘लेकिन हैं तो आप अभी भी उतनी ही सुंदर. कोई भी देखे तो देखता ही रह जाए. उन्हीं में एक मैं भी हूं. मेरा तो मन करता है कि मैं बैठा सिर्फ आप को ही देखता रहूं.’’ सुमन ने विमला के चेहरे को एकटक ताकते हुए कहा.

‘‘देखने का मन होता है तो देखो न, कौन मना करता है.’’ विमला ने शरारती लहजे में कहा.

‘‘भाभी, देखने से मन खराब होता है. फिर और किसी चीज का मन होने लगा तो…?’’‘‘अच्छा,’’ विमला ने मुसकरा कर उस के गाल में चिकोटी काटते हुए कहा, ‘‘लगता है, जवानी उबाल मार रही है. चलो, अब मुझे खाना बनाना है.’’

सुमन उठ कर अपनी बहन के कमरे में चला आया. लेकिन उस की समझ में आ गया कि अगर उस ने विमला पर हाथ डाला तो वह मना नहीं करेगी. उस के स्पर्श ने उसे उत्तेजित कर दिया था. दूसरी ओर उस की बातों ने विमला के मन में भी हलचल मचा दी थी. सुमन विमला से एकांत में मिलने का मौका तलाश रहा था कि उसी बीच उस की नौकरी लग गई. इस के बाद उस के बहनोई ऋषिपाल ने उसे अलग कमरा दिला दिया. लेकिन विमला की वजह से वह बहन के कमरे में अड्डा जमाए रहता और जब देखो तब विमला के कमरे में घुसा रहता.

सुमन का जब विमला के कमरे में कुछ ज्यादा ही आनाजाना हो गया तो एक दिन राजनलाल ने विमला को टोका, ‘‘सोनी से कहो कि वह अपने भाई को संभाले, वरना ठीक नहीं होगा.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ, क्या किया है उस ने?’’ विमला ने हैरानी से पूछा.

‘‘देखो विमला, वह लड़का मुझे जरा भी पसंद नहीं, फिर उस से हमारा लेनादेना ही क्या है. जब देखो तब वह हमारे कमरे में पड़ा रहता है.’’

‘‘बस, इतनी सी बात को ले कर इतना गुस्सा, ठीक है मैं मना कर दूंगी.’’ विमला ने पति को शांत किया.

विमला ने पति से कह तो दिया कि वह सुमन को कमरे में आने से मना कर देगी, लेकिन उस ने कहा कुछ नहीं. वह खुद ही चाहती थी कि सुमन उस के आगेपीछे घूमता रहे. संयोग से उसी दिन सुमन दोपहर को बहन के घर आया तो वह बाजार गई थी. बच्चे स्कूल गए थे, इसलिए घर पर विमला अकेली थी. सुमन के लिए यह अच्छा मौका था. वह विमला के कमरे में पहुंचा तो विमला ने उसे बैठा कर कहा, ‘‘तुम बैठो, मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं.’’

सुमन ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘भाभी, मैं चाय पीने नहीं, दिल में लगी आग बुझाने आया हूं.’’

विमला का दिल धड़क उठा. मन में तो उस के भी लड्डू फूट रहे थे. जबकि वह कुछ कह नहीं पा रही थी. लेकिन उस की आंखों में जो भाव आए, उसे देख कर सुमन ने आगे बढ़ कर उसे बांहों में भर लिया. बाहर के दरवाजे में वह कुंडी लगा ही आया था, इसलिए उसे किसी तरह का डर नहीं था. इस के बाद तो उस दिन उस ने विमला के कपोलों पर ही नहीं, पूरे जिस्म पर अपने प्यार की मुहर लगा दी. उस दिन सुमन ने विमला को अनैतिकता के जिस दलदल में डाल दिया, दिनोंदिन वह उस में धंसती चली गई. जिस्म की भूख ने उसे अनैतिकता की राह पर चलने को मजबूर कर दिया. सुमन से संबंध बनने के बाद राजनलाल से उसे वितृष्णा होती गई. कभी राजनलाल उस के करीब आने की कोशिश करता तो वह उसे झटक देती.

राजनलाल की समझ में नहीं आ रहा था कि विमला हो क्या गया है? विमला का बेटा आकाश 13 साल का हो गया था. वह सुमन और मां के संबंधों को समझ रहा था. सुमन को उस से डर भी लगता था, इसलिए उसे खुश रखने के लिए वह उसे पैसे तो देता ही था, उस की अन्य जरूरतें भी पूरी करता था. इस से आकाश को लगने लगा कि राजनलाल बाप हो कर भी उस की जो जरूरतें नहीं पूरी करता, सुमन उस का कोई नहीं है, फिर भी उस की हर जरूरत का खयाल रखता है. इसलिए उसे भी पिता से नफरत हो गई. मां तो उसे झिड़क ही रही थी.

इस का नतीजा यह निकला कि आकाश भी बाप को हर बात में जवाब देने लगा. इस पर नाराज हो कर राजनलाल उस की पिटाई कर देता, जिस से बापबेटे के बीच खाई चौड़ी होती गई, जो सुमन के लिए फायदेमंद साबित हो रही थी. सुमन विमला के साथ खुल कर मजे ले रहा था. सोनी को सब पता था, लेकिन पति के डर की वजह से वह चुप थी, क्योंकि बात खुल जाती तो सालेबहनोई में खटक जाती. विमला भले ही पति की चोरी से सुमन के साथ मजे ले रही थी, लेकिन एक दिन राजनलाल को सच्चाई का पता चल ही गया. उस ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया था.

सुमन तो भाग गया था, लेकिन राजनलाल ने विमला की जम कर पिटाई कर दी थी. इस के बाद उस ने विमला को धमकाते हुए कहा, ‘‘अब अगर सुमन कमरे में दिखाई दे गया तो उस का खून कर दूंगा.’’

शाम को राजनलाल ने यह बात ऋषिपाल को बताई तो उस ने राजनलाल को आश्वासन दिया कि वह सुमन को समझाएगा. लेकिन इस के बाद भी विमला और सुमन का मिलना बंद नहीं हुआ. विमला अब राजनलाल के साथ रहना नहीं चाहती थी. दोनों की जाति अलग थी, लेकिन ऐसे संबंधों में जाति की चिंता कौन करता है. सुमन ने उसे विश्वास भी दिला रखा था कि कुछ भी हो, वह उसे अपनी बना कर रहेगा. विमला किसी भी तरह राजनलाल से छुटकारा पाना चाहती थी. पितापुत्र के बीच भी उस ने दरार पैदा कर दी थी. 25 मई, 2015 को किसी बात पर विमला और राजनलाल में झगड़ा हुआ तो राजनलाल ने उस की पिटाई कर दी.

एक तो राजनलाल की वजह से विमला प्रेमी से नहीं मिल पा रही थी, दूसरी ओर जब देखो तब वह उस की पिटाई कर देता था. इन बातों से तंग आ कर उस ने पति नाम के इस कांटे को निकालने का इरादा बना लिया.

राजनलाल के ड्यूटी पर जाने के बाद उस ने सुमन को फोन किया. सुमन मिलने आया तो उस ने कहा, ‘‘अब मैं राजनलाल की मार सहन नहीं कर सकती, चलो कहीं भाग चलते हैं.’’

‘‘तुम पागल हो गई हो क्या? गांव में तुम्हारी इतनी जमीन है. अगर हम भाग जाएंगे तो हमारे हाथ क्या लगेगा? ऊपर से पुलिस मेरी बहन और बहनोई को परेशान करेगी. फिर मेरे पास पैसे कहां हैं, जो मैं तुम्हें भगा ले चलूं. मेरा मन तो कहता है कि मैं राजनलाल को ठिकाने लगा दूं. उस के बाद तुम ही नहीं, उस का सब कुछ मेरा हो जाएगा.’’

विमला को भी लगता था कि राजनलाल के न रहने पर वह सुकून से रह सकेगी. इसलिए उस ने सुमन के साथ मिल कर राजनलाल को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. विमला यह काम जल्दी से जल्दी कर डालना चाहती थी. उस समय राजनलाल की रात की ड्यूटी चल रही थी, इसलिए उस ने उसे दिन में ही मार देने का मन बना लिया. 28 मई, 2015 को खाना खाने के बाद राजनलाल सो गया. सोनी अपने बच्चों के साथ कहीं गई हुई थी. ऋषिपाल और पूजा अपनीअपनी ड्यूटी पर थे. घर में विमला और उस के दोनों बेटे थे. मोहित को सुमन के कमरे पर भेज कर विमला ने सुमन को फोन किया.

राजनलाल ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पत्नी उस की जान भी ले सकती है. राजनलाल आराम से सो रहा था कि रात को ड्यूटी पर जाना है. सुमन के आते ही विमला ने उसे गंडासा थमा दिया. इस के बाद एक ही झटके में उस ने राजनलाल का सिर धड़ से अलग कर दिया. आकाश ने अपनी आंखों से अपने बाप का कत्ल होते देखा. राजनलाल मर गया. उस के खून के छीटों से दीवारें रंग गईं. अब सवाल यह उठा कि लाश का क्या किया जाए? तय हुआ कि लाश के टुकड़े कर के बोरे में डाल कर इसी समय कहीं बाहर फेंक दिया जाए. उस समय दिन के ढाई बज रहे थे. सुमन ने लाश के टुकड़ेटुकड़े कर दिए. वे लाश के टुकड़ों को बोरे में भर पाते, किसी ने दरवाजा खटखटा दिया. दरवाजा नहीं खुला तो वह बाहरी दरवाजे की कुंडी हाथ डाल कर खोल कर अंदर आ गया. वह कोई और नहीं, सुमन का बहनोई ऋषिपाल था.

अब तक खून बह कर दरवाजे से बाहर आ गया था. उस ने राजनलाल के दरवाजे पर खून देखा तो डर गया. खटखटाने पर भी विमला ने दरवाजा नहीं खोला तो ऋषिपाल को मामला गड़बड़ लगा. उस ने बाहर आ कर शोर मचा दिया. सारे पड़ोसी इकट्ठा होते, उस के पहले ही विमला प्रेमी सुमन और बेटे आकाश के साथ पीछे के दरवाजे से निकल गई. ऋषिपाल ने थाना गोविंदनगर पुलिस को सूचना दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी हरीशवर्धन एसएसआई सलीम अहमद, एसआई विनोद कुमार, एसआई विजय सिंह और कुछ सिपाहियों के साथ पुष्पविहार कालोनी पहुंच गए. थाना पुलिस ने घटनास्थल पर जो देखा, उस की सूचना पुलिस अधिकारियों को दे दी. इस के बाद एसपी सिटी शैलेश कुमार पांडेय, सीओ (सिटी) चक्रपाणि त्रिपाठी भी घटनास्थल पर आ गए.

कमरा खोला गया तो राजनलाल के शरीर का हर अंग कटा हुआ बिस्तर पर पड़ा था. पुलिस लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर रही थी कि सूचना पा कर राजनलाल का भाई मुकेश आ गया. भाई की लाश देख कर वह फूटफूट कर रोने लगा. शायद लाश के टुकड़ों को बोरी में भरने की कोशिश की गई थी. लेकिन बोरी छोटी थी, इसलिए कोशिश सफल नहीं हुई. राजनलाल के शरीर के टुकड़ों को समेट कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. इस के बाद मुकेश की ओर से थाना गोविंदनगर में विमला, उस के बेटे आकाश और प्रेमी सुमन के खिलाफ राजनलाल की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पुलिस तीनों आरोपियों की तलाश में जुट गई. तीनों मथुरा से भाग पाते, उस के पहले ही पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया. पूछताछ में विमला ने सहज ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया. अपना यह अपराध स्वीकार करते समय उस के चेहरे पर न जरा सी शिकन थी और न पति के कत्ल करने का जरा भी पछतावा. उस का कहना था कि वह सुमन से प्यार करती थी, इसलिए प्यार में आड़े आ रहे पति को उस ने मार दिया. सुमन ने भी अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि राजनलाल की हत्या उस ने विमला के साथ मिल कर की थी. आकाश ने बताया कि पिता उसे बहुत मारते थे और उन का अपनी एक विधवा रिश्तेदार औरत से संबंध था, जिसे उस ने कई बार अपनी आंखों से देखा था. इसलिए उसे पिता से नफरत हो गई थी. पिता के मरने का उसे कोई अफसोस नहीं है.

पूछताछ के बाद विमला और उस के प्रेमी सुमन को अदालत में मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के जेल भेज दिया गया. जबकि आकाश को बालसुधार गृह भेज दिया गया. आखिर विमला ने जिस प्रेमी को पाने के लिए पति को मार दिया, अब जेल जाने के बाद क्या वह मिलेगा? शायद अब दोनों की सारी उम्र जेल में ही कटेगी. Shocking Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: ऐसी बहन किसी की न हो

Hindi Crime Story: कोई बहन गलतियों का पिटारा बनने के बावजूद इतनी खुदगर्ज हो सकती है कि लालच में अपने ही एकलौते भाई की जान ले ले, सोचा भी नहीं जा सकता. लेकिन रचना तो ऐसी ही निकली. उसे क्या सजा मिलेगी, यह अलग बात है, लेकिन उस ने अपनी मां का आंचल तो सूना कर ही दिया. काले रंग की वह लेंसर कार बड़ी तेजी से लुधियानाअमृतसर मार्ग पर जालंधर बाईपास की ओर भागी चली जा रही थी. कार में करीब 60 साल की एक औरत और 26-27 साल का एक लड़का सवार थे. दोनों बहुत घबराए हुए लग रहे थे. लड़का कार चलाते हुए बारबार पीछे मुड़ कर देख रहा था. इस की वजह यह थी 3 मोटर साइकिलों पर सवार लोग कार का पीछा कर रहे थे और उसे लगातार ललकारते हुए रुकने को कह रहे थे.

जिस तरह कार भाग रही थी, उस से यही लग रहा था कि कार चलाने वाला लड़का काफी होशियार है, लेकिन जीटी रोड पर वाहनों की आवाजाही काफी थी, जिस की वजह से उसे कार भगाने में परेशानी हो रही थी. कई बार उस की कार दुर्घटनाग्रस्त होतेहोते बची थी. लेकिन उस कार चालक लड़के को संभवत: दुर्घटना की उतनी चिंता नहीं थी, जितनी पीछा करने वालों की थी. शायद इसीलिए वह किसी भी तरह उन की पकड़ से दूर निकल जाना चाहता था.

बगल वाली सीट पर बैठी औरत लड़के के कंधे पर अपना हाथ रख कर बारबार उसे सांत्वना दे रही थी. तभी कार अचानक झटका खा कर हिचकौले लेने लगी. इस से लड़के के चेहरे पर घबराहट झलकने लगी. उस ने फ्यूल गेज पर नजर डाली. सुई एकदम नीचे बैठ चुकी थी. उस ने बगल में बैठी औरत से कहा, ‘‘अब क्या होगा? कार का पैट्रोल खत्म हो गया है?’’

यह सुन कर महिला घबरा गई. अचानक चालक लड़के के दिमाग में न जाने क्या आया कि उस ने बड़ा खतरा उठाते हुए बगल में चल रहे ट्रक को एकदम से ओवरटेक किया और कार बाईं ओर वाले पेट्रौल पंप में घुसा दी. इस तरह वह मोटरसाइकिल सवारों को चकमा देने में सफल हो गया, क्योंकि ट्रक की वजह से मोटरसाइकिल सवार यह नहीं देख पाए कि कार किधर गई.

कारचालक लड़के ने जल्दीबाजी में पेट्रौल भरवाया. लेकिन जैसे ही वह पेट्रौल पंप से बाहर निकल कर कुछ दूर आगे सब्जी मंडी के पास पहुंचा, मोटरसाइकिल सवारों ने रास्ता रोक कर कार रुकवा ली. कार रुक गई तो मोटरसाइकिलों से आए लोग उसे घेर कर दरवाजा खोलने की कोशिश करने लगे. लेकिन लौक होने की वजह से दरवाजे नहीं खुले. तब उन्होंने बाहर से ही कार पर धावा बोल दिया. वे लोग इतने उत्तेजित थे कि राहगीरों की परवाह किए बगैर कार पर अंधाधुंध ईंटपत्थर बरसाने लगे. लड़के और महिला ने मदद के लिए शोर भी मचाया, लेकिन हमलावर जिस तरह उत्तेजित और गुस्से में थे, उसे देख कर किसी की भी बचाव के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं हुई.

कार के शीशे टूट गए तो हमलावरों द्वारा फेंके जाने वाली ईंटें चालक और महिला को लगने लगीं. हमलावरों में एक औरत भी थी, जो सब से ज्यादा पत्थर फेंक रही थी. उसे उस तरह पत्थर फेंकते देख कार में बैठी औरत हाथ जोड़ कर चीखचीख कर कहने लगी, ‘‘यह क्या कर रही है बेटी, यह तेरा भाई है.’’

लेकिन इस बात का न तो उस औरत पर कोई असर हुआ, न ही उस के साथी हमलावरों पर. तभी उस औरत द्वारा फेंकी एक ईंट ड्राइविंग सीट पर बैठे लड़के के माथे पर आ लगी. ईंट लगते ही खून का फव्वारा फूट पड़ा. चालक लड़का कार की सीट पर बैठेबैठे ही छटपटाने लगा. इस के बावजूद ईंटपत्थर फेंकने वालों के हाथ नहीं रुके. उन के हाथ तभी रुके, जब उस लड़के की गरदन सीट पर ही एक ओर लुढ़क गई. इस के बाद वे सब मोटरसाइकिलों पर बैठ कर भाग निकले.

इस बीच किसी ने फोन कर के इस घटना की सूचना थाना सलेम टाबरी को दे दी थी. खबर मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर मनिंदर सिंह बेदी, सबइंसपेक्टर दलबीर सिंह, एएसआई सुखपाल सिंह, कमलजीत सिंह, परमजीत सिंह, हेडकांस्टेबल अमरीक सिंह, बलविंदर राम और गुरजीत सिंह घटनास्थल पर पहुंच गए थे. हमलावर चूंकि भाग चुके थे, इसलिए उन के बारे में बाद में भी पता किया जा सकता था. पहले घायलों का इलाज कराना जरूरी था. इसलिए मनिंदर सिंह औरत और लड़के को अविलंब अस्पताल ले गए.

डाक्टरों ने लड़के को तो देखते ही मृत घोषित कर दिया, जबकि महिला को इलाज के लिए भरती कर लिया. यह घटना 9 मई, 2015 दोपहर 2 बजे की थी. मनिंदर सिंह बेदी के आदेश पर सबइंसपेक्टर दलबीर सिंह ने इलाज के दौरान औरत का बयान लिया तो पता चला कि उस का नाम रेनू अरोड़ा है और मृतक उस का एकलौता बेटा हरीश अरोड़ा था. हमलावरों में जो औरत शामिल थी, वह उस की बेटी रचना थी. उसी ने अपने प्रेमी मनोज कुमार और उस के घर वालों के साथ मिल कर मां और भाई पर हमला किया था.

रेनू अरोड़ा ने पुलिस को बताया कि वह विधवा है और अपने बेटे हरीश के साथ लुधियाना  के दुगेड़ी में धांधरा रोड पर मानकपाल गेट के पास जीएसवी में रहती है. उस के 3 बच्चों में 2 बेटियां थीं रचना और ज्योति तथा एक बेटा था हरीश. दोनों बेटियों की शादियां हो चुकी थीं. रेनू की बड़ी बेटी रचना प्रौपर्टी में हिस्सा मांग रही थी. इस के लिए रेनू ने कुछ शर्तें रख दी थीं, जिस की वजह से विवाद हो गया था. उस के बाद रचना ने अपने प्रेमी मनोज कुमार, उस की मां बलराज कौर, ह्यूमन राइट्स संस्था के प्रधान नवनीत सिंह, प्रवीन कुमार, दीपू, राकेश, करन और शमी के साथ उन पर हमल कर दिया था.

रेनू अरोड़ा के इस बयान के आधार पर सबइंसपेक्टर दलबीर सिंह ने उसी दिन यानी 9 मई, 2015 को भादंसं की धारा 302/323, 342, 327, 149, 120बी के तहत 9 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उसी दिन ह्यूमन राइट्स के प्रधान नवनीत सिंह, करन और शमी को गिरफ्तार कर लिया. प्राथमिक उपचार के बाद रेनू अरोड़ा को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी. हरीश की लाश का पोस्टमार्टम हो गया तो उसे रिश्तेदारों को सौंप दिया गया. इंसपेक्टर मनिंदर सिंह बेदी ने एसआई दलबीर सिंह, एएसआई सुखपाल सिंह, परमजीत सिंह और कमलजीत सिंह के नेतृत्व में पुलिस की टीमें बना कर नामजद लोगों की तलाश में लगा दिया था.

दिनदहाड़े शहर के बीचोबीच मुख्यमार्ग पर घटी इस घटना से स्थानीय लोगों में दहशत भी थी और पुलिस के प्रति आक्रोश भी. कोई अनहोनी न हो, इस के लिए पुलिस टीमें अभियुक्तों की तलाश में दिनरात एक किए हुए थीं. आखिर उन की मेहनत रंग लाई और 12 मई, 2015 को एसआई दलबीर सिंह ने 3 अभियुक्तों दीपू, राकेश कुमार उर्फ गोगी को गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद 24 मई को रचना और मनोज कुमार को भी बड़े नाटकीय ढंग से गिरफ्तार कर लिया गया. इस पूरे मामले में अहम भूमिका निभाने वाली मनोज कुमार की मां बलराज कौर को एसआई दलबीर सिंह ने बड़ी मुश्किल से काफी दिनों बाद 23 जुलाई को गिरफ्तार किया.

लगभग 2, ढाई महीने चली भागदौड़ और गिरफ्तारियों के बाद अभियुक्तों से सिलसिले वार की गई पूछताछ में जो कानी प्रकाश में आई, वह एक ऐसी खुदगर्ज औरत की कहानी थी, जिस ने अपनी मौजमस्ती के लिए अपने ही सगे भाई को मौत के घाट उतार दिया था. लुधियाना के दुगड़ी में रहते थे अशोक कुमार अरोड़ा. उन के परिवार में पत्नी रेनू अरोड़ा के अलावा 2 बेटियां रचना, ज्योति और एकलौता बेटा हरीश था. अशोक अरोड़ा टैक्सियां चलवाते थे. वह कोई बड़े आदमी तो नहीं थे, लेकिन घर में किसी चीज की कमी नहीं थी.

अशोक कुमार ने अपने तीनों बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई थी. बड़ी बेटी रचना पढ़लिख तो जरूर गई थी, लेकिन उस में वे संस्कार नहीं आ पाए थे, जिन से घरपरिवार की मानमर्यादा बनती है. वह बचपन से ही हठी और महत्त्वकांक्षी प्रवृत्ति की थी. उम्र के साथसाथ उस का हठ और महत्त्वाकांक्षा बढ़ती गई. समय रहते ही अशोक कुमार ने रचना की शादी हैबोवाल निवासी विनय कुमार से कर दी. शादी के बाद जल्दी ही वह एक बेटी की मां भी बन गई. इसी बीच अशोक कुमार की मौत हो गई. उन की मौत के बाद घरपरिवार की पूरी जिम्मेदारी रेनू और हरीश पर आ गई. पिता की मौत के बाद टैक्सियां चलवाने का काम हरीश करने लगा. उस ने छोटी बहन ज्योति की भी शादी कर दी. अब घर में सिर्फ मांबेटे रह गए. सब ठीकठाक चल रहा था.

हरीश ने ड्राइवर तो रख ही रखे थे, खुद भी टैक्सी चलाता था. उस का एक ड्राइवर था मनोज, जिस से उस की कुछ ज्यादा ही पटती थी. इसी वजह से वह उस के घर भी आताजाता था. हरीश की बड़ी बहन रचना की ससुराल ठीकठाक थी. वहां उसे किसी चीज की कमी नहीं थी. पति भी प्यार करने वाला था. इस के बावजूद उस का मन ससुराल में नहीं लगता था. वह अकसर मायके आ जाया करती थी. वह जब भी मायके आती, महीनों रहती.

मायके में रहते हुए ही उस की मुलाकात ड्राइवर मनोज कुमार से हुई. उस ने उस में न जाने ऐसा क्या देखा कि वह उस पर मर मिटी. एक तरह से वह मनोज की दीवानी सी हो गई. मनोज भी उसे अपनी ओर आकर्षित होते देख उस के गदराए शरीर पर फिदा हो गया. हालांकि वह शादीशुदा और एक बेटी का बाप था. उस की शादी सन 2012 में चंडीगढ़ के रहने वाले रामदेव की बेटी मोनिका से हुई थी. लेकिन वह उतनी सुंदर नहीं थी, जितनी सुंदर रचना थी.

इस बीच रचना की शादी को 12 साल हो गए थे और उस की बेटी भी 11 साल की हो गई थी. इतनी बड़ी बेटी की मां होने के बावजूद उस ने मनोज से नाजायज संबंध बना लिए. कुछ दिनों तक तो यह सब चोरीछिपे चला, लेकिन रचना को चोरीछिपे मिलना अच्छा नहीं लगा तो वह मां और पति का घर छोड़ कर मनोज के साथ रहने लगी. रेनू अरोड़ा को इस बात की भी जानकारी कई दिनों बाद मिली.

दरअसल, उस समय रचना मायके में थी. उस ने मां और भाई से कहा कि वह ससुराल जा रही है लेकिन वह ससुराल जाने के बजाय मनोज के घर चली गई. कई दिनों बाद जब विनय ने आ कर बताया कि रचना उस के घर पहुंची ही नहीं है तो उस की तलाश शुरू हुई. उस समय तो उस का पता नहीं चला, लेकिन इस बात की जानकारी जरूर हो गई है कि जाते समय रचना अपने साथ मां के करीब डेढ़ लाख रुपए, 5 तोला सोने के गहने और कुछ अन्य कीमती सामान ले गई है. यह जानकारी होने पर रेनू अरोड़ा ने थाना दुगड़ी में रचना के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.

इस के पहले भी हरीश और मनोज के बीच रचना को ले कर झगड़ा हुआ था. हरीश ने इस झगड़े की रिपोर्ट थाना डिवीजन नंबर 4 में दर्ज कराई थी. रचना मनोज के साथ छावनी क्षेत्र में किराए का मकान ले कर रह रही थी. इस बात का पता चलने पर हरीश और रेनू ने वहां जा कर उसे समझाया कि जो हुआ, वह उसे भूल जाए और अपनी ससुराल में जा कर शांति से रहे. लेकिन रचना ने उन की सलाह मानने से साफ मना करते हुए कहा कि अब वह मनोज को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. तब रेनू और हरीश ने उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.

इस बीच हरीश ने टैक्सियां चलवाने का काम बंद कर के जालंधर बाईपास पर मोटर गैराज खोल लिया. इस के बाद रेनू ने हरीश की सगाई कर दी थी और उस के विवाह की तैयारियां भी शुरू कर दी थीं. जब इस बात की जानकारी रचना को हुई तो वह तिलमिला उठी. वह मायके पहुंची और मां तथा भाई से अपना हिस्सा मांगने लगी. वैसे तो उस स्थिति में उस का कोई हिस्सा नहीं बनता था, इस के बावजूद रेनू और हरीश उसे हिस्सा देने को तैयार हो गए. लेकिन उन्होंने शर्त रख दी कि वे उसे हिस्सा तभी देंगे, जब वह मनोज को छोड़ कर ससुराल चली जाएगी.

रचना मनोज को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी. इस बात को ले कर उस का मां और भाई से आए दिन झगड़ा होने लगा. मनोज और उस के घर वाले भी रचना का साथ दे रहे थे. एक तरह से उस ने मां और भाई का जीना हराम कर दिया था. 8 मई को 2 लोग रेनू के घर आए और उन्होंने कहा कि रचना और मनोज से उन का जो विवाद चल रहा है, अगर वह उन के औफिस आ जाएं तो वे इस विवाद को खत्म करा देंगे. आने वालों ने अपना नाम करन और शमी बताया था. वे छावनी मोहल्ला स्थिति डेमोके्रटिव ह्यूमन राइट्स औफिस से आए थे.

अगले दिन यानी 9 मई की दोपहर को समझौते की गरज से रेनू बेटे हरीश को ले कर छावनी स्थित डेमोके्रटिव ह्यूमन राइट्स के औफिस पहुंची तो वहां करन और शमी के अलावा उन की मुलाकात डेमोके्रटिव ह्यूमन राइट्स के प्रधान नवनीत सिंह से हुई, उन्होंने जिन शर्तों के तहत रचना और मनोज से उन का समझौता कराना चाहा, वे रेनू और हरीश को मंजूर नहीं थीं. रेनू और हरीश ने समझौता करने से मना किया तो वे बहस कर के दबाव में समझौता कराने की कोशिश करने लगे. जब रेनू और हरीश ने समझौता करने से मना कर दिया तो वे लड़ाईझगड़े और मारपीट पर उतारू हो गए. किसी तरह वे दोनों बाहर आए तो वहां रचना अपने प्रेमी मनोज कुमार, मनोज की मां बलराज कौर के साथ खड़ी थी.

उन दोनों के साथ और भी कई लोग थे. सभी ने उन्हें घेर लिया और मारपीट करने लगे. रेनू और हरीश किसी तरह अपनी कार तक पहुंचे और जान बचाने के लिए कार में बैठ कर वहां से भाग निकले. बाद में रचना और उस के साथियों ने मोटरसाइकिलों से पीछा कर के उन्हें पकड़ लिया और ईंटपत्थरों से उन पर हमला कर दिया. इस हमले में रेनू जहां घायल हो गई, वहीं उस के बेटे हरीश की मौत हो गई. पुलिस ने जैसेजैसे जिस को पकड़ा था, पूछताछ कर के अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. कथा लिखे जाने तक किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: जब बोझिल लगने लगा सुहाग

Crime Story: 2 बच्चों की मां बनने के बाद दिव्या की सोच में बदलाव आया और वह पति की जगह चचेरे देवर को पसंद करने लगी. दोनों के बीच अनैतिक संबंध भी बन गए. जब यह बात उस के पति राजेश को पता चली तो घर में कलह रहने लगी. किसे पता था कि यह कलह एक मौत की आहट है.

सुबहसुबह बहू के रोने की आवाज सुन कर अजय वर्मा का माथा ठनका. वह मन ही मन सोचने लगे कि ऐसी कौन सी आफत आ गई कि बहू छाती पीटपीट कर रो रही है. वजह जानने के लिए वह तेज कदमों से उस के कमरे की तरफ बढ़े. कमरे का दरवाजा भिड़ा हुआ था, जो दस्तक देने पर खुल गया. ससुर को सामने देख कर दिव्या और जोरों से चीखने लगी, ‘‘मैं तो लुट गई, बरबाद हो गई. अब मैं कहां जाऊंगी, मेरा और मेरे बच्चों का क्या होगा?’’

‘‘बहू आखिर हुआ क्या, यह तो बताओ?’’ अजय वर्मा ने दिव्या से पूछा.

‘‘पिताजी, ये मेरा साथ छोड़ गए.’’ वह रोते हुए बोली.

बेटे के मरने की बात सुनते ही अजय वर्मा को धक्का सा लगा, वह बोले, ‘‘यह तू क्या कह रही है, ऐसा कैसे हो गया? कल रात भलाचंगा था, उसे कोई बीमारी भी नहीं थी.’’

‘‘पता नहीं, यह सब कैसे हुआ? रात में इन्होंने शराब पी, फिर खाना खा कर सो गए. सुबह देखा तो यह इस हालत में मिले. मुझे तो लग रहा है, ज्यादा शराब पीने से इन की मौत हो गई.’’ बहू रोते हुए बोली.

जवान बेटे की लाश देख कर अजय वर्मा भी रोने लगे. लेकिन उन की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक यह सब कैसे हो गया. जरा सी देर में पूरे मोहल्ले में राजेश की मौत की खबर फैल गई. तमाम लोग अजय वर्मा के घर पहुंच गए. वहां पर जितने मुंह, उतनी तरह की बातें हो रही थीं. इसी बीच किसी ने थाना उमरदा में फोन कर के खबर दे दी कि उमरदा में ही राजेश की रहस्यमय परिस्थिति में मौत हो गई है. यह बात 13 अगस्त, 2015 की थी. सुबह 8 बजे के करीब जब उमरदा थाने के थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव को यह खबर मिली, तब रिमझिम बारिश हो रही थी. फिर भी जल्दी से वह अपने अधीनस्थों के साथ राजेश के घर की तरफ रवाना हो गए.

जब वह उस के घर पहुंचे तो उस की पत्नी दिव्या पति की लाश से लिपट कर विलाप कर रही थी. पुलिस को देख कर वह और ज्यादा जोर से रोने लगी. थानाप्रभारी की आंखें ताड़ गईं कि यह जानबूझ कर लोगों को दिखाने के लिए जरूरत से ज्यादा रोनेधोने का नाटक कर रही है. थानाप्रभारी ने कमरे में तख्त पर पड़ी राजेश की लाश का मुआयना किया तो उस के शरीर पर कोई जख्म नहीं था. हां, गले को ध्यान से देखने पर गरदन के चारों तरफ रगड़ के निशान जरूर नजर आए. ऐसा लग रहा था, जैसे उस की हत्या गला घोंट कर की गई थी. मुंह से झाग भी निकला हुआ था. जिस से जहर देने की आशंका हो रही थी.

कमरे में शराब की 2 खाली बोतलें पड़ी थीं. थानाप्रभारी ने राजेश के पिता अजय वर्मा से बात की तो उन्होंने बताया कि कल रात राजेश ठीकठाक था, पता नहीं रात को उस के साथ यह क्या हो गया? इस के बाद उन्होंने दिव्या से बात की तो उस ने भी यही बात बताई. उस समय मामला गमगीन था, इसलिए उन्होंने उन लोगों से बहुत ज्यादा बात नहीं की और घटनास्थल की औपचारिकताएं पूरी कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. मृतक के पिता अजय वर्मा ने श्रीप्रकाश यादव को बताया कि अजय की मौत शराब पीने से नहीं हुई, बल्कि उस की किसी ने हत्या की है. मृतक के पिता अजय वर्मा की तहरीर पर उन्होंने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

इस मामले की जांच श्रीप्रकाश यादव ने खुद अपने हाथों में ली. उन्हें लगा कि जब हत्या उसी के कमरे में हुई है तो यह काम कोई बाहर वाला तब तक नहीं कर सकता, जब तक घर का कोई व्यक्ति इस में शामिल न रहा हो. राजेश और उस के घर वालों के बारे में और ज्यादा जानकारी लेने के लिए वह उस के पड़ोसियों से मिले. उन से उन्हें महत्त्वपूर्ण जानकारी यह मिली कि राजेश की पत्नी दिव्या के अवैधसंबंध उस के घर के सामने रहने वाले चचेरे देवर रवि वर्मा के साथ थे.

यह जानकारी मिलने के बाद श्रीप्रकाश अजय वर्मा के घर पहुंचे. वहां दिव्या का रोनाधोना अभी भी जारी था. पुलिस को देख कर उस ने और जोरजोर से रोना शुरू कर दिया. उन्होंने उसे सांत्वना दे कर चुप कराया. उस के शांत होने के बाद उन्होंने उस से पूछा, ‘‘अब बताओ कि रात में क्या हुआ था, क्या तुम अपने पति के हत्यारे के बारे में कुछ जानती हो?’’

‘‘साहब, रात को वह 10 बजे घर आए थे. उस समय नशे में चूर होने के बाद भी उन्होंने घर में बैठ कर शराब पी, फिर खाना खाया. उन्हें खाना खिलाने के बाद मैं दूसरे कमरे में जा कर बच्चों के साथ सो गई. सुबह जब मैं उन के कमरे में गई तो वह तख्त पर मृत पड़े थे. उन की मौत कैसे हुई, मैं नहीं जानती.’’

श्रीप्रकाश को दिव्या की बात पर जरा भी विश्वास नहीं हुआ. उन्हें लगा कि वह आसानी से सही बात नहीं बताएगी. इसलिए वह दिव्या को थाने ले आए. अब तक पुलिस के पास पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई थी. रिपोर्ट में बताया गया था कि राजेश की मौत गला कसने से हुई थी. जहर की आशंका को देखते हुए उस का बिसरा सुरक्षित कर लिया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ने के बाद श्रीप्रकाश यादव ने दिव्या से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गई. उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने पति की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली.

उत्तर प्रदेश के जनपद कन्नौज के इंदरगढ़ थाने के अंतर्गत एक गांव पड़ता है असैनी. रामस्वरूप वर्मा इसी गांव में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी रजनी के अलावा 3 बेटे व 2 बेटियां थीं. दिव्या उसी की छोटी बेटी थी. रामस्वरूप वर्मा अपनी बड़ी बेटी का विवाह करने के बाद दिव्या के लिए भी लड़का देखने लगे. इसी भागदौड़ में एक रिश्तेदार ने उन्हें राजेश वर्मा के बारे में बताया. राजेश कन्नौज जनपद मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित उमरदा कस्बे के अजय वर्मा का बेटा था.

अजय वर्मा के 2 ही बच्चे थे. एक बेटी और एक बेटा. बेटी का वह विवाह कर चुके थे. राजेश टैंपो चलाता था. वह उस की शादी कर के निश्चित होना चाहते थे. इसलिए जब दिव्या का रिश्ता राजेश के लिए आया तो अजय वर्मा ने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया. जल्दी ही दोनों की शादी हो गई. दिव्या से शादी कर के राजेश खुश था, पर दिव्या राजेश से खुश नहीं थी. चूंकि वह दिव्या की कल्पना के अनुरूप नहीं था, इसलिए उस के अरमान चकनाचूर हो गए थे. पर अब वह कर भी क्या सकती थी. आखिरकार वह इसे ही अपना नसीब समझ कर गृहस्थी में रम गई. विवाह के लगभग 2 सालों बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम पंकज रखा गया.

पंकज के जन्म के बाद दिव्या के यौवन का निखार और बढ़ गया. स्वभाव से चंचल दिव्या का मन अब गृहस्थी से उचटने लगा था. इस की वजह यह थी कि राजेश ने शराब पीनी शुरू कर दी थी. एक तरफ वह उदास रहती थी तो दूसरी तरफ उस का मन भटकता रहता था. इसी बीच दिव्या ने एक बच्ची को जन्म दिया. राजेश के घर के सामने उस का चचेरा भाई रवि वर्मा रहता था. रवि की परचून की दुकान थी. राजेश अपने घर का सामान रवि की दुकान से ही खरीदता था. कभीकभी रवि खुद सामान पहुंचाने उस के घर चला जाता तो उस की मुलाकात दिव्या से हो जाती. दिव्या मन ही मन रवि को चाहती थी. लेकिन वह पहल नहीं कर पा रही थी.

राजेश को शराब पीने की लत थी. रवि भी शराब पीता था, इसलिए वह राजेश के साथ शराब पीने के लिए अकसर उस के यहां आने लगा. रवि और दिव्या के बीच देवर भाभी का रिश्ता था. उस रिश्ते का फायदा उठाते हुए दिव्या उस के साथ हंसीमजाक करती. रवि भी जवान था. इसलिए भाभी के मजाक का वह उसी के अंदाज में जवाब देता. इस से दोनों का हौसला बढ़ता गया. इस का नतीजा यह हुआ कि एक दिन मौका मिलने पर दोनों ने हदें लांघ कर अपनी हसरतें पूरी कर लीं.

इस के बाद रवि मौका ढूंढ़ कर जबतब दिव्या के यहां जाने लगा. रवि का सान्निध्य पा कर दिव्या भी खुश रहने लगी. अब वह खिलीखिली सी रहती थी. उस ने पति की परवाह करनी छोड़ दी थी. उसे वह बातबात पर झिड़क देती थी. एक घर में रहने के बावजूद दोनों नदी के दो किनारों की तरह थे. राजेश पत्नी में आए इस बदलाव को महसूस तो कर रहा था, लेकिन समझ नहीं पा रहा था कि वह उस की इतनी उपेक्षा क्यों करने लगी है. माजरा उसे उस दिन समझ में आया, जब उस ने उसे अपने चचेरे भाई रवि के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. फिर तो घर में कोहराम मच गया. उस रोज राजेश ने दिव्या की जम कर पिटाई की. ससुर अजय वर्मा ने भी दिव्या को खूब खरीखोटी सुनाई.

रंगेहाथों पकड़े जाने के बाद दिव्या सतर्क हो गई. अब चूंकि पति और ससुर उस की निगरानी करने लगे थे, इसलिए उस का रवि से मिलना मुश्किल हो गया. लेकिन सख्त पाबंदी के बावजूद दोनों किसी न किसी तरह मिल ही लेते थे. धीरेधीरे देवरभाभी के नाजायज संबंधों की बात पूरे मोहल्ले में फैल गई थी. महिलाएं जहां भी बैठतीं, चटकारे ले कर उन के संबंधों की चर्चा करतीं. ज्योंज्यों समय बीतता गया, घर में कलह बढ़ती गई. दिव्या रवि के बिना रह नहीं पा रही थी. इसलिए शराब पीने के बाद राजेश उस की पिटाई करता था. दिव्या भले ही राजेश के 2 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन उसे पसंद नहीं करती थी. आखिर आजिज आ कर उस ने एक भयानक योजना बना डाली.

इस फैसले से उस ने अपने प्रेमी रवि को भी अवगत करा दिया. रवि उस का साथ देने को तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने राजेश को रास्ते से हटाने की उस योजना पर काम शुरू कर दिया. योजना के अनुसार रवि ने बाजार से एक कीटनाशक दवा ला कर दिव्या को दे दी. 12 अगस्त, 2015 को रात 10 बजे राजेश घर लौटा और रोज की तरह शराब की बोतल ले कर बैठ गया. शराब पीने के दौरान जब वह उठ कर लघुशंका के लिए गया तो दिव्या ने मौका देख कर कीटनाशक दवा जल्दी से उस के शराब के गिलास में मिला दी.

लौट कर राजेश ने दवा मिली शराब का गिलास एक ही बार में अपने गले से नीचे उतार लिया. दवा मिली शराब ने राजेश के ऊपर जल्दी ही असर करना शुरू कर दिया. थोड़ी ही देर में वह तख्त पर बेहोश हो कर लुढ़क गया. इसी बीच घर में रवि आ गया. दिव्या ने अपना दुपट्टा राजेश के गले में लपेटा. दुपट्टे का एक छोर खुद पकड़ा और दूसरा रवि ने. वे दुपट्टे को तब तक खींचते रहे, जब तक राजेश का दम नहीं घुट गया. पति की हत्या के बाद दिव्या ने शराब की बोतल तख्त के नीचे लुढ़का दी और गिलास साफ कर के रसोई में रख दिया. कीटनाशक दवा की शीशी उस ने कूड़ेदान में फेंक दी और दुपट्टा घर में छिपा दिया. राजेश की मौत के बाद रवि अपने घर चला गया.

खुद को बचाने के लिए दिव्या ने सुबह होते ही छाती पीटपीट कर रोना शुरू कर दिया. उस के रोने की आवाज सुन कर अजय वर्मा आ गए. उस के बाद घर में कोहराम मच गया. राजेश की हत्या में दिव्या का प्रेमी रवि वर्मा भी शामिल था. इसलिए पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने के लिए उस के घर दविश दी, लेकिन वह घर से फरार हो चुका था पुलिस ने उस के मिलने के संभावित ठिकानों पर छापे मारे. तब वह तिर्वा में अपनी बहन की ससुराल में मिल गया. उसे गिरफ्तार कर के पुलिस थाने ले आई. उस ने भी पूछताछ में राजेश वर्मा की हत्या करने की बात कबूल कर ली.

14 अगस्त, 2015 को पुलिस ने अभियुक्त रवि वर्मा और दिव्या वर्मा को कन्नौज कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक दोनों जेल में बंद थे. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Mumbai Crime: ममता की चोरी

Mumbai Crime: एक गलती कर के कल्पना अपनी गृहस्थी में आग लगा चुकी थी. बाद में उस ने आशुतोष दामले से दूसरी शादी कर ली. लेकिन यहां भी वह एक पेच में फंस गई. उस पेच से निकलने के लिए उस ने ममता की चोरी की, लेकिन…

मुंबई महानगर का सीएसटी एक ऐसा रेलवे स्टेशन है, जहां देश के हर कोने से आनेजाने वाले मुसाफिरों की भीड़भाड़ रहती है. मुसाफिरों की उसी भीड़ में एक परिवार अब्दुल करीम शेख का भी था, जो हैदराबाद जाने के लिए पिछले 3 दिनों से मुसाफिरखाने में ठहरा हुआ था. वह मुंबई महानगर से सटे जनपद ठाणे के उपनगर कल्याण का रहने वाला था और वहां लगने वाले पटरी बाजार में फड़ लगाता था. उस के परिवार में पत्नी रुखसाना के अलावा 2 बेटियां थीं. छोटी बेटी आरिजा 4 माह की थी. कुछ दिन पहले उस के साले को किसी आरोप में हैदराबाद पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, जिस की जमानत कराने के लिए यह परिवार हैदराबाद जाना चाहता था, लेकिन जाने के लिए उस के पास किराए तक के पैसे नहीं थे.

इस के लिए उस ने अपने एक परिचित सलीम से मदद मांगी थी तब सलीम ने उस से कहा था कि वह सीएसटी रेलवे स्टेशन पर आ कर पैसे दे देगा. लेकिन 2 दिन बीत जाने के बाद भी सलीम पैसे देने वहां नहीं आया था. उसी के इंतजार में वह मुसाफिरखाने में चादर बिछा कर लेटा हुआ था. वहां पर इंतजार करते हुए 2 दिन बीत गए. सलीम नहीं आया तो अब्दुल करीम की चिंता बढ़ती जा रही थी कि वह हैदराबाद कैसे जाए? उस ने तय कर लिया कि यदि सलीम कल तक पैसे ले कर नहीं आया तो वह हैदराबाद जाने वाली गाड़ी के जनरल डिब्बे में बिना टिकट बैठ कर चला जाएगा. यही सोच कर वह रात को सो गया. उसी चादर पर उस की पत्नी और बच्चे भी सो गए.

आधी रात के बाद अचानक उस की पत्नी रुखसाना की आंख खुली तो उस के होश उड़ गए. उस के बगल में सो रही उस की 4 महीने की बच्ची आरिजा गायब थी. उस ने उसी समय पति को उठाया. दोनों बेटी को इधरउधर देखने लगे. 4 महीने की बच्ची चल भी नहीं सकती थी जिस से समझा जाता कि कि वह इधरउधर चली गई होगी. आशंका यही थी कि कोई उसे उठा कर ले गया है. पतिपत्नी दोनों उसे स्टेशन पर ही इधरउधर ढूंढ रहे थे. रुखसाना रो रही थी, उस के रोने की आवाज सुन कर कुछ और लोगों की भी नींद टूट गई. छोटी बच्ची के गायब होने पर सभी हैरान थे. उस के साथ कुछ और लोग भी बच्ची को ढूंढने लगे. उन्हें ढूंढतेढूंढते सुबह हो चुकी थी. कुछ लोग रुखसाना को तसल्ली दे रहे थे.

स्टेशन पर रोने की आवाज और वहां की भीड़ को देख कर उधर से गुजर रहे राजकीय रेलवे पुलिस के 2 कांस्टेबल वहां आ गए. अब्दुल करीम शेख ने अपनी बेटी के गायब हो जाने की बात उन्हें बताई तो वह अब्दुल शेख को सीएसटी रेलवे स्टेशन से सटे लोहमार्ग जीआरपी थाने ले गए. यह घटना 24 अप्रैल, 2015 की थी. उन दोनों ने थानाप्रभारी शिवाजी शिंदे को पूरी जानकारी देने के बाद अब्दुल करीम की बेटी को तलाश करवाने की मांग की. थानाप्रभारी ने अब्दुल करीम की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद आश्वासन दिया कि वह उन की बेटी को जल्द से जल्द ढूंढने की कोशिश करेंगे. साथ ही उन्होंने इस मामले की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी.

ऐसी भीड़भाड़ वाली जगह से मांबाप के बीच से बच्ची का गायब होना वाकई एक गंभीर मामला था. इसलिए जीआरपी के कमिश्नर मधुकर पांडेय, एडिशनल पुलिस कमिश्नर रूपाली खैरमोडे़ अंवुरे भी अन्य पुलिस अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंच गईं. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण कर लोगों से घटना के बारे में पूछताछ की. लेकिन बच्ची किस ने चुराई, यह पता नहीं लग सका. तब पुलिस कमिश्नर से विचारविमर्श करने के बाद एडिशनल पुलिस कमिश्नर रूपाली खैरमोड़े ने यह केस अपने हाथ में ले लिया. अब्दुल करीम शेख गरीब था. इस से इस बात की आशंका नहीं थी कि किसी ने फिरौती के लिए बच्ची का अपहरण किया होगा. निस्संदेह यह किसी दुश्मन या फिर किसी बच्चा चोर गिरोह का काम हो सकता था.

अब्दुल करीम शेख से बात की गई तो उस ने किसी से कोई दुश्मनी और विवाद होने की बात से इनकार किया. इस से साफ हो गया कि यह काम किसी बच्चा चोर या फिर किसी निस्संतान महिला का है. इस के बाद पुलिस ने क्षेत्र के बच्चा चोर गिरोहों की तलाश शुरू कर दी. उन्होंने बच्ची की तलाश के लिए एक पुलिस टीम बनाई. जिस में पुलिस इंसपेक्टर माणिक साठे, योगेंद्र पांचे, असिस्टैंट इंसपेक्टर सुभाष रामण और उन के सहायक गांवकर, शोलके, निकम, पंवार, सालवी, महिला कांस्टेबल परकाले आदि को शामिल किया. उन्होंने सीएसटी रेलवे स्टेशन के सभी सीसीटीवी कैमरों को भी खंगालना शुरू कर दिया.

कैमरों की फुटेज से पुलिस को कुछ सुराग मिले. उस में एक महिला आरिजा को उस की मां रुखसाना के पास से उठा कर एक दूसरी महिला को देती हुई दिखी. दूसरी महिला उस बच्ची को अपनी गोदी में छिपा कर स्टेशन के मेन गेट से बाहर निकली और सामने से आती हुई टैक्सी पकड़ कर निकल गई. उस के जाने के बाद पहली महिला अपने एक साथी के साथ दूसरे गेट से निकल कर कोलकाता जाने वाली ट्रेन में बैठ गई. दोनों महिलाएं कहां से आई थीं और कहां चली गईं. यह पता लगाना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर थी.

अब पुलिस का निशाना वह टैक्सी थी जिस में बैठ कर महिला बच्चे को ले कर गई थी. लेकिन मुंबई शहर में चल रही हजारों टैक्सियों में से उसे तलाशना आसान नहीं था. क्योंकि फुटेज में टैक्सी का नंबर भी दिखाई नहीं दे रहा था. पुलिस टीम इसे ले कर परेशान जरूर थी लेकिन निराश नहीं हुई. उन्होंने उस सीसीटीवी फुटेज की कई कौपियां कर के मुंबई सेंट्रल, कुर्ला और सीएसटी रेलवे स्टेशनों पर भी भेज दीं. इस के बाद पुलिस की अलगअलग टीमें इन स्टेशनों पर जा कर ड्राइवरों आदि से बच्ची को ले जाने वाली महिला के बारे में पूछने लगे. आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई.

उसे जिस टैक्सी ड्राइवर की तलाश थी इत्तफाक से वह सीएसटी रेलवे स्टेशन पर ही मिल गया. दरअसल पुलिस ने उस ड्राइवर को जब बच्ची ले जाने वाली महिला की फोटो दिखाई तो वह उस महिला को पहचान गया. उस ने बताया कि उस ने उस औरत को मानखुर्द उपनगर की म्हाणा कालोनी में छोड़ा था. यह जानकारी पुलिस के लिए महत्त्वपूर्ण थी. पुलिस टीम मानखुर्द उपनगर की म्हाणा कालोनी पहुंच गई. उस समय रात के लगभग 2 बज रहे थे. पूरा इलाका सुनसान था और लोग अपने घरों में सो रहे थे. टैक्सी ड्राइवर ने जिस जगह पर उस महिला को छोड़ा था, वहां 8-10 इमारतें थीं, जिन में 1100 से 1200 फ्लैट थे. टैक्सी से उतर कर वह महिला किस इमारत में और किस फ्लैट में गई, पता लगाना कठिन था.

रात के समय टीम को उन इमारतों के काफी लोगों की बातें सुननी और उन की नाराजगी झेलनी पड़ सकती थी. लेकिन पुलिस को यह काम रात में ही करना था क्योंकि सुबह होने पर वह महिला शायद कहीं भी जा सकती थी इसलिए लोगों के विरोध की परवाह न करते हुए पुलिस ने अपना बच्चा चोर ढूंढने का औपरेशन शुरू कर दिया. पुलिसकर्मी एकएक इमारत के फ्लैटों की कालबेल बजा कर उस महिला और बच्चे के बारे में पूछताछ करने लगे. पुलिस का यह औपरेशन रात भर चला लेकिन उस महिला का पता नहीं लगा जो बच्ची के साथ टैक्सी से वहां उतरी थी. सुबह करीब 7 बजे पुलिस की मेहनत रंग लाई.

वहीं के एक फ्लैट में रहने वाले डाक्टर माने ने बताया कि इस बारे में अधिक जानकारी तो मुझे नहीं है लेकिन कल रात इस इमारत में रहने वाले दामले परिवार के यहां एक बच्चे का नामकरण और वारसा की पार्टी का आयोजन किया गया था. हालांकि वारसा बच्चे के पैदा होने के बारहवें दिन होता है लेकिन उन के यहां जो बच्चा था वह 3-4 महीने का दिखाई पड़ रहा था. वह बच्चा कुछ बीमार सा भी लग रहा था. जब मैं ने उस बच्चे को करीब से देखने की कोशिश की तो उस की मां ने यह कह कर मना कर दिया था कि छूने से बच्चे को संक्रमण हो सकता है.

डाक्टर माने से दामले का फ्लैट नंबर मालूम कर के पुलिस उस के यहां पहुंच गई. कालबेल बजाने पर एक महिला ने अपनी आंखें मलते हुए दरवाजा खोला तो वह महिला पुलिस को देख कर घबराते हुए बोली, ‘‘कहिए, क्या बात है?’’

‘‘माफ करना मैडम, हम ने सुबहसुबह आप को तकलीफ दी. दरअसल हम लोग एक बच्ची ढूंढ रहे हैं, जो कल सुबह सीएसटी रेलवे स्टेशन से चोरी हो गई थी. हमें खबर मिली कि उस बच्ची को इसी कालोनी में एक औरत ले कर आई है.’’ महिला कांस्टेबल ने उस से कहा.

इस से पहले कि वह महिला कुछ जवाब देती तब तक फ्लैट में से ही एक आदमी निकल कर वहां आ गया. वह बोला, ‘‘बच्ची के विषय में हम लोग कुछ नहीं जानते. हमारे घर में एक छोटा सा लड़का है. जो अभी 12 दिन का हुआ है.’’

वह आदमी उस महिला का पति था.

‘‘आप बच्चे को हमें दिखा सकते हैं?’’ इंसपेक्टर माणिक साठे ने कहा.

यह सुन कर महिला का चेहरा सफेद पड़ गया. लेकिन उस के पति ने कह दिया, ‘‘ठीक है आप उस बच्चे को शौक से देख सकते हैं.’’ कहते हुए वह व्यक्ति पुलिस को फ्लैट के अंदर ले गया. महिला कांस्टेबल ने जब बच्चे को देखा और उस का डायपर हटाया तो वह हैरान रह गई क्योंकि वह बच्चा नहीं बल्कि बच्ची थी और वह भी 12 दिन की नहीं बल्कि 3-4 महीने की थी. साथ में खड़े अब्दुल करीम शेख ने उस बच्ची को पहचानते हुए कहा, ‘‘यही मेरी बच्ची है साहब.’’

पुलिस का यह औपरेशन सफल रहा.  पुलिस टीम भी खुश हो गई. 24 घंटों के अंदर ही बच्ची मिल गई थी. अब उस महिला से कुछ बोलते नहीं बन रहा था. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उस ने अपना नाम कल्पना परमार आशुतोष दामले बताया. उसे गिरफ्तार कर के पुलिस थाने ले आई. औपरेशन सफल होने की जानकारी कमिश्नर मधुकर पांडेय को दी गई तो वह भी थाने आ गए. कल्पना परमार को मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के 7 दिन के रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान पता चला कि कल्पना परमार ने अपना दांपत्य जीवन बचाने और अपना सच छिपाने के लिए ही बच्ची चोरी करने जैसा जघन्य अपराध किया था. उस की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार से थी:

39 वर्षीय कल्पना परमार एक साधारण और सभ्य महिला थी. समाज में उस के परिवार की अच्छी प्रतिष्ठा थी. कल्पना के हाईस्कूल पास करते ही मातापिता ने अपने ही समाज के एक युवक के साथ उस का विवाह कर दिया था. अपने भविष्य के सारे सपनों को आंचल में समेट कर कल्पना अपनी ससुराल चली गई. ससुराल में वह काफी खुश थी क्योंकि वहां उसे किसी तरह की कोई चिंता नहीं थी. पति की अच्छी नौकरी थी, इसलिए उस का दांपत्य जीवन हंसीखुशी से चल रहा था. समय के साथ वह एक बेटे की मां भी बन गई. बेटे के जन्म के बाद परिवार में खुशी और बढ़ गई. लेकिन यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी. कुछ दिनों बाद ही उस के परिवार में विवाद शुरू हो गया.

इस की वजह यह थी कि कल्पना अब और बच्चा नहीं चाहती थी. इसलिए उस ने ससुराल वालों को बिना बताए अपनी नसबंदी करवा ली. पति और सासससुर को जब यह पता चला तो उन्हें कल्पना की यह बात अच्छी नहीं लगी. इसी बात पर घर में विवाद रहने लगा. आखिरकार परिवारिक झगड़ा इतना बढ़ गया कि पति ने कल्पना को तलाक दे दिया. तलाक के बाद कल्पना मायके आ गई. कुछ दिनों बाद उस की मुलाकात आशुतोष दामले से मुंबई के एक अस्पताल में हुई थी. कल्पना उस अस्पताल में अपनी दवा लेने जाती थी. आशुतोष दामले उस अस्पताल में पर्यवेक्षक था. आशुतोष दामले अपने मातापिता और भाईबहन के साथ मुंबई के सायन इलाके में रहता था. उस की कहानी भी कल्पना जैसी ही थी.

उस का भी पत्नी से तलाक हो चुका था. पत्नी उसे छोड़ कर अपने मायके में रह रही थी. कल्पना परमार जब भी दवा लेने अस्पताल जाती तो आशुतोष दामले उस की काफी मदद करता और उस से सहानुभूति दिखाता था. उस की इसी आदत से कल्पना प्रभावित हो गई और उन के बीच दोस्ती हो गई. इसलिए उन की मुलाकातें बढ़ती गईं. यह दोस्ती प्यार में बदल गई. फिर वे साथसाथ घूमतेफिरते और मौजमस्ती करते. बात यहां तक पहुंच गई कि एक दिन दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. जब दोनों ने शादी की बात अपने घरवालों को बताई तो कल्पना के घरवाले इस रिश्ते से सहमत हो गए लेकिन आशुतोष के घरवालों ने मना कर दिया. पर कल्पना के प्यार में पागल आशुतोष ने अपने घरवालों की बात नहीं मानी और उस ने कल्पना के साथ कोर्ट मैरिज कर ली.

घरवालों को शादी की पता न लगे इस के लिए आशुतोष मानखुर्द उपनगर की म्हाणा कालोनी में एक फ्लैट किराए पर ले कर रहने लगा. अपने घरवालों को आशुतोष ने यह बता दिया था कि वह अधिक पैसा कमाने के लिए दूसरी जगह पार्टटाइम नौकरी करता है. समय अपनी गति से बीतता रहा. कल्पना और आशुतोष दामले का दांपत्य जीवन बड़े आराम से बीत रहा था. मगर कल्पना के प्यार भरे दांपत्य जीवन में भूकंप उस समय आया जब आशुतोष दामले ने कल्पना से अपनी बढ़ती हुई उम्र की चिंता जताते हुए बच्चे की इच्छा जताई. इतना सुन कर कल्पना एकदम से घबरा गई. क्योंकि वह अपनी नसबंदी करवा चुकी थी, जिस से वह अब कोई बच्चा पैदा नहीं कर सकती थी.

नसबंदी करवा लेने की बात उस ने आशुतोष से छिपा रखी थी. नसबंदी के कारण ही उस का पहला दांपत्य जीवन टूट गया था. इसीलिए वह डर गई थी कि नसबंदी की बात जान कर कहीं आशुतोष भी उसे तलाक न दे दे. वह दूसरी बार अपना परिवार उजड़ने देना नहीं चाहती थी. औलाद के लिए आशुतोष दामले का बढ़ता दबाव देख कर कल्पना परेशान हो गई. उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि वह आशुतोष को यह बात कैसे बताए कि वह उस की यह इच्छा पूरी नहीं कर सकती. अब वह ऐसा उपाय तलाशने लगी कि घर में बच्चा भी आ जाए और उस का परिवार भी बचा रहे. काफी सोचनेसमझने के बाद उस ने इस समस्या के समाधान का जो रास्ता निकाला वही रास्ता उसे जुर्म तक ले गया.

एक दिन कल्पना ने पति को बता दिया कि अब उस की इच्छा पूरी होने वाली है. वह उस के बच्चे की मां बनने वाली है. पत्नी के गर्भवती होने की बात जान कर आशुतोष खुश हो गया. वह कल्पना का और ज्यादा ध्यान रखने लगा. कल्पना भी समय के अनुसार अपनेआप को ढालने लगी थी. पूरे 9 महीने वह इस प्रकार से रही कि पति के अलावा आसपास वालों को भी उस पर कोई संदेह न हो. जैसेजैसे समय गुजरता जा रहा था, कल्पना अपने शरीर की बनावट भी वैसी ही कर रही थी. पेट आगे आने के लिए वह कपड़ों का सहारा ले रही थी. यह बात राज ही रहे, इस के लिए उस ने पति को अपने से दूर ही रखा. आसपास वालों को भी खुद को गर्भवती बताती थी.

बच्चे की डिलीवरी में जब कुछ दिन शेष रह गए तो अपना नाटक सफल बनाने के लिए वह चेकअप करवाने के बहाने बच्चे की तलाश में निकल जाती थी और हाल ही में जन्मे बच्चे को तलाश करती. इस बारे में उस ने 1-2 नर्सों से भी बात की. जब वहां बात नहीं बनी तो वह मुंबई के उन अनाथालयों में गई, जहां से बच्चे गोद लिए जाते थे. वहां उसे नवजात शिशु मिल तो रहे थे लेकिन उन के गोद लेने की प्रक्रिया जटिल थी. प्रक्रिया देख कर उस की हिम्मत पस्त हो गई. इस के बाद कल्पना ने उन महिलाओं से संपर्क किया, जो रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक जगहों पर बैठ कर छोटे बच्चे को ले कर भीख मांगती थीं. उन महिलाओं से उस ने बात की तो उन्होंने भी उसे अपना बच्चा देने से मना कर दिया.

उस की तथाकथित डिलीवरी का समय पूरा हो चुका था लेकिन अभी तक बच्चे के बारे में उस की किसी से बात नहीं बन पाई. वह परेशान हो गई कि अब वह पति को बच्चा कहां से ला कर देगी. कहीं से कोई बच्चा मिलता न देख आखिरकार उस ने कोई नवजात शिशु चोरी करने की योजना बनाई. उस ने सोचा कि कहीं न कहीं से उसे कोई नवजात मिल जाएगा तो वह किसी तरह उसे चुरा कर ले जाएगी. एक दिन वह घर से अस्पताल जाने को कह कर घर से निकल गई. पति अपनी ड्यूटी पर निकल गया. कल्पना ने उस दिन पति को फोन कर के यह खुशखबरी दे दी कि उस ने एक लड़के को जन्म दिया है.

बेटा पैदा होने की खबर पा कर आशुतोष दामले बहुत खुश हुआ. लेकिन उस दिन आशुतोष दामले का यह दुर्भाग्य ही था कि एक इमरजेंसी केस में 24 घंटे की ड्यूटी लग जाने की वजह से अपने बच्चे को देखने के लिए नहीं जा सका. अगले दिन वह पत्नी द्वारा बताए अस्पताल पहुंचा तो कल्पना उसे उस अस्पताल के बाहर ही मिल गई. पति को उस ने बताया कि बच्चा किसी खतरनाक बीमारी से ग्रस्त है. इसलिए डाक्टरों ने उसे 10-12 दिनों के लिए किसी दूसरे अस्पताल में भेज दिया है. डिलीवरी नार्मल हुई थी. इसलिए डाक्टरों ने उसे डिस्चार्ज कर घर जाने के लिए कह दिया. सीधेसाधे आशुतोष ने कल्पना की बातों पर विश्वास कर लिया और पत्नी के साथ घर लौट आया. अपने कामों में व्यस्त होने के कारण आशुतोष ने बच्चे का सारा काम पत्नी पर ही छोड़ दिया था.

इसी बीच कल्पना को बच्चे की व्यवस्था करनी थी. यह उस के लिए बड़ी ही मुश्किल घड़ी थी. बच्चा कहां से लाए यह समस्या उस के सामने अब भी खड़ी थी. अगर इन 10-12 दिनों में बच्चे का बंदोबस्त नहीं हुआ तब वह क्या करेगी. आखिरकार धीरेधीरे वह समय भी नजदीक आ गया, जब उसे बच्चा घर लाना था. उस दिन वह सुबहसुबह पति के साथ ही घर से बाहर निकली. बच्चा चोरी करने के इरादे से पहले वह विरार के एक मंदिर गई. लेकिन वहां भीड़भाड़ को देख कर वह घबरा गई. वहां अपनी दाल गलते हुए न देख वह विरार से सीधे ट्रेन पकड़ कर मुंबई के चर्चगेट स्टेशन आ गई. वहां से टैक्सी की और सीएसटी रेलवे स्टेशन पहुंच गई. अब तक काफी रात हो गई थी. लेकिन यहां भी उस की हिम्मत फेल हो गई थी.

अपने वादे के मुताबिक कल्पना को सुबह बच्चा ले कर घर पहुंचना था. परेशान कल्पना थक कर मुसाफिरखाने में खाली पड़ी एक बेंच पर बैठ गई. उसी बेंच पर कुछ समय बाद एक महिला और एक पुरुष आ कर बैठ गए. उस महिला ने कल्पना का उदास चेहरा देखा तो उस से बातचीत शुरू कर दी. उस ने कल्पना को अपना नाम सुनंदा और साथ में आए युवक को अपना देवर बताया था. सुनंदा पर विश्वास हो जाने के बाद कल्पना ने उसे अपनी दुखभरी कहानी सुना दी. उस की कहानी सुन कर उस महिला ने इधरउधर देखा. और निडर भाव में कहा, ‘‘देख तेरे सामने ही एक सुंदर सी बच्ची सोई हुई है. उस की मां तो जैसे घोड़े बेच कर सो रही है.

जा, उसे उठा ले और ले कर निकल जा. अगर तेरी हिम्मत नहीं पड़ रही है तो मुझे बता. मैं तेरी मदद कर दूंगी. लेकिन इस के बदले में तू मुझे क्या देगी? मुझे कोलकाता जाना है.’’

वह 4 महीने की बच्ची अब्दुल करीम शेख की थी जो अपनी मां रुखसाना के बगल में सो रही थी. कोई नवजात न मिलने पर कल्पना उस बच्ची को ही ले जाने के लिए तैयार हो गई. सुनंदा की यह बात सुन कर कल्पना कुछ समय तक खामोश रही. फिर बताया कि उस के पास इस समय सिर्फ 15 हजार रुपए हैं. सुनंदा ने कल्पना से वह 15 हजार रुपए लिए और इधरउधर देख कर रुखसाना की 4 माह की बच्ची को उठा कर उस की गोदी में डाल कर कहा, ‘‘अब तू जल्दी निकल जा यहां से. मैं भी निकलती हूं. मेरी ट्रेन जाने वाली है.’’

कल्पना बच्ची को गोदी में छिपा कर सीएसटी स्टेशन के मैन गेट से निकल कर टैक्सी द्वारा अपने घर पहुंच गई. सुनंदा नामक औरत अपने देवर के साथ दूसरे गेट से चली गई थी. कल्पना जिस समय बच्चे को ले कर घर पहुंची उस समय उस का पति आशुतोष दामले घर पर ही था. वह कल्पना को देख कर काफी खुश हुआ था. बच्चे के घर आने की खुशी में आशुतोष ने उस दिन छुट्टी ले रखी थी और रात को बड़ी धूमधाम से बच्चे का वारसा और नामकरण की पार्टी का आयोजन किया. उस पार्टी में उस ने अपने जानपहचान वालों को भी बुलाया था. उस कार्यक्रम में उसी बिल्डिंग में रहने वाले डाक्टर माने का भी परिवार आया था.

कल्पना का सच तो सामने आ गया. लेकिन पुलिस को यह पता नहीं लग सका कि सुनंदा नाम की महिला जिस ने बच्ची चुरा कर दी थी वह कहां की रहने वाली है. कल्पना से पूछताछ के बाद पुलिस ने सुनंदा का एक स्कैच तैयार करवा कर मुंबई तथा कोलकाता में सार्वजनिक स्थानों पर चिपकवा दिए हैं ताकि उस के बारे में सुराग मिल सके. रिमांड अवधि पूरी होने से पहले ही पुलिस ने कल्पना परमार को न्यायालय में फिर से पेश किया जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस मामले में कल्पना के पति की कोई गलती नहीं थी इसलिए पुलिस ने उस के बयान ले कर उसे घर भेज दिया.

कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद पुलिस ने बच्ची उस के मांबाप को सुपुर्द कर दी. सुनंदा का अभी तक कोई पता नहीं चल सका. मामले की तफ्तीश सीनियर पुलिस इंसपेक्टर शिवाजी शिंदे कर रहे हैं. Mumbai Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Jaunpur Crime: मुसलिम गर्लफ्रेंड के लिए मांबाप को 6 टुकड़ों में काट डाला

Jaunpur Crime: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है जिस ने रिश्तों को तारतार कर रख दिया है. एक प्रेमी ने मुसलिम प्रेमिका के लिए अपने मांबाप को 6 टुकड़ों में काट डाला. आखिर ऐसा क्या था उस प्रेमिका में जिस से एक इंजीनियर बेटा ने मांबाप को इतनी बेरहमी से मार डाला?  क्या है इस मर्डर का पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं आगे जो आप को करेगा होने वाली घटना से सचेत और सावधान?

यह दर्दनाक घटना उत्तर प्रदेश के जौनपुर से सामने आई है. यहां एक इंजीनियर बेटे अम्बेश कुमार ने अपने मांबाप की हत्या कर दी. अम्बेश ने मांबाप का सिर लोहे के खलबट्टे से कूच दिया था. फिर आरी से उन के 6 टुकडे कर डाले. इस के बाद उन टुकड़ों को बोरियों में भर कर गोमती नदी में बारीबारी से फेंक आया.

पुलिस के अनुसार, अम्बेश बीटेक की डिग्री लेने के बाद कोलकाता में एक कंपनी में बतौर क्वालिटी इंजीनियर कार्यरत था. वहां उसे 25 हजार की सैलरी मिलती थी. इसी जौब के दौरान उस की मुलाकात एक मुसलिम युवती से हुई. दोनों की नजदीकियां बढ़ी और 2019 में दोनों ने लव मैरिज शादी कर ली. दोनों के 2 बेटे हैं, जिन की उम्र 5 साल और 11 महीने है.

अम्बेश की लव मैरिज से परिवार खुश नहीं था. इसी को ले कर उस के पापा श्याम बहादुर और मम्मी बबीता के बीच बहस हो जाया करती थी. इसी बात को ले कर दोनों के बीच 8 दिसंबर, 2025 को झगड़ा हुआ  तो गुस्से में उस ने अपने मम्मीपापा की खलबट्टे से कूच कर हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद अम्बेश ने अपनी बहन को फोन कर बताया कि मम्मी और पापा  कहीं चले गए हैं. वह इसी तरह नाटक करता रहा. 12 दिसंबर, 2025 को अचानक वह भी लापता हो गया. इस के बाद अम्बेश की बड़ी बहन वंदना ने उसे फोन मिलाया तो उस का कुछ पता नहीं चल सका. तब वंदना ने फिर अम्बेश की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी.

पुलिस को उस ने बताया कि  उस के मम्मीपापा पहले गायब हो गए, अब भाई भी लापता है. इस के बाद पुलिस ने इस मामले की गंभीरता से जांच की तो पुलिस को अम्बेश मिल गया. उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

एएसपी आयुष श्रीवास्तव ने बताया कि अम्बेश ने बताया कि मम्मीपापा मेरी शादी तुड़वाना चाहते थे. वे चाहते थे कि वह दूसरी शादी कर ले. अम्बेश मुसलिम पत्नी को तलाक देने के लिए तैयार भी था, लेकिन उसे गुजारा भत्ता देना पड़ता. मम्मीपापा गुजारा भत्ता देने के लिए तैयार नहीं थे. तो उस ने पत्नी को तलाक देने से इनकार कर दिया.

इस के बाद मम्मी ने अम्बेश से घर से निकल जाने को कहा. तब अम्बेश ने कहा कि यह तो मेरी नानी का घर है. मुझे नेवासा में दिया था. इसी बात को ले कर मम्मी ने अम्बेश को धक्का मार दिया और कहा कि इसी समय घर से निकल जा. इसी बात को ले कर अम्बेश गुस्सा आ गया. पास में रखा टेबल के लोहे का खलबट्टा था. उस का मूसल उठाया और मम्मी के सिर पर मार दिया. इस के बाद पापा भी वहां आ गए.  वह पुलिस को फोन करने की धमकी देने लगे. वह पुलिस को फोन कर ही रहे थे तभी अम्बेश ने उन को भी मूसल मार दिया.

पापा और मम्मी चिल्लाए. दोनों फर्श पर जा गिरे. इस के बाद उन की सांसें थम चुकी थीं. दोनों की हत्या करने के बाद अम्बेश की समझ में नहीं  आ रहा था कि वह क्या करे.

यह अपराध छिपाने के लिए उस के दिमाग में एक आईडिया आया. वह बेसमेंट से सरिया काटने वाली इलेक्ट्रिक आरी ले आया और दोनों की लाशों के 3-3 टुकड़े कर दिए. फिर 6 को प्लास्टिक की बोरी में भर कर गोमती नदी में फेंक आया.

पुलिस ने आरोपी अम्बेश को अरेस्ट कर लिया है. पुलिस उस के खिलाफ सबूत इकट्ठे कर काररवाई कर रही है. Jaunpur Crime

Love Crime: इश्क की आग में कुछ इस तरह बरबाद हुआ एक परिवार

Love Crime: 2 लोगों के साथ जगराओं के थाना सिटी पहुंची लक्ष्मी ने थानाप्रभारी इंसपेक्टर इंद्रजीत सिंह को बताया था कि उस के पति प्रवासराम 2 दिन पहले काम पर गए तो अब तक लौट कर नहीं आए हैं. थानाप्रभारी ने पूरी बात बताने को कहा तो लक्ष्मी ने बताया कि उस के पति प्रवासराम मूलरूप से बिहार के जिला बांका के थाना रजौली के गांव उपराम के रहने वाले थे.

कई सालों पहले वह काम की तलाश में जगराओं आ गया था और पीओपी का काम सीख कर बडे़बडे़ मकानों में पीओपी करने के ठेके लेने लगा था. उस का काम ठीकठाक चलने लगा तो वह गांव से पत्नी और बच्चों को भी ले आया. जगराओं में वह डा. हरिराम अस्पताल के पास रहता था. सन 2001 में प्रवासराम की लक्ष्मी से शादी हुई थी. उस के कुल 6 बच्चे थे, जिन में 4 बेटियां और 2 बेटे थे. वह सुबह काम पर जाता था तो शाम 7 बजे तक वापस आता था. लक्ष्मी की बात सुन कर इंद्रजीत सिंह ने पूछा, ‘‘जिस जगह तुम्हारा पति काम करता था, वहां जा कर तुम ने पता किया था?’’

‘‘जी साहब, यह लड़का उन्हीं के साथ काम करता था.’’ साथ आए 20-22 साल के एक लड़के की ओर इशारा कर के लक्ष्मी ने कहा.

थानाप्रभारी ने उस लड़के की ओर देखा तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम सोनू है, मैं उन्हीं के साथ काम करता था. वह 2 दिनों से काम पर नहीं आए हैं, जिस से हम सभी बहुत परेशान हैं. हम सभी खाली बैठे हैं.’’

इंद्रजीत सिंह ने एएसआई बलजिंदर सिंह को पूरी बात समझा कर प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज करा कर उस की पत्नी से उस का एक फोटो लेने को कहा. थानाप्रभारी के आदेश पर बलजिंदर सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कर लक्ष्मी से उस का एक फोटो ले लिया. इस के बाद उन्होंने उस की फोटो के साथ सभी थानों को उस की गुमशुदगी की सूचना दे दी. यह 4 अप्रैल, 2017 की बात है. इस का मतलब प्रवासराम 2 अप्रैल से गायब था.

6 अप्रैल, 2017 को पुलिस को जगराओं के बाहरी इलाके में सेम नानकसर रोड पर स्थित एक गंदे नाले में एक लाश मिली. उसे बिस्तर में लपेट कर फेंका गया था. मौके पर पहचान न होने की वजह से पुलिस ने लाश को मोर्चरी में रखवा कर उस के पोस्टर जारी कर दिए थे. पोस्टर देख कर अगवाड़ लोपो के रहने वाले मृतक के साढू समीर ने उस की शिनाख्त डा. हरिराम अस्पताल के पास रहने वाले प्रवासराम की लाश के रूप में कर दी थी.

इंद्रजीत सिंह ने तुरंत सिपाही भेज कर लक्ष्मी को बुलवा लिया था. लाश देखते ही लक्ष्मी रोने लगी. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. वह लाश उस के गुमशुदा पति प्रवासराम की ही थी. लाश की शिनाख्त होने के बाद इंद्रजीत सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी की जगह अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लाश लक्ष्मी और उस के रिश्तेदारों को सौंप दी. उसी दिन शाम को उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, प्रवासराम की हत्या 4 दिनों पहले गला घोंट कर की गई थी. उस की गरदन पर रस्सी के निशान थे. थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच बलजिंदर सिंह को ही सौंप दी थी. उन्होंने मृतक की पत्नी लक्ष्मी और उस के भाइयों को बुला कर विस्तार से पूछताछ की. मृतक के भाई अनूप का कहना था कि उस के भाई की न किसी से कोई दुश्मनी थी और न किसी तरह का कोई लेनादेना था. इस के बाद बलजिंदर सिंह ने लक्ष्मी से पूछा, ‘‘तुम सोच कर बताओ कि काम पर जाने से पहले तुम्हारी पति से कोई खास बात तो नहीं हुई थी?’’

‘‘कोई बात नहीं हुई थी साहब, रोज की तरह उस दिन भी वह अपना खाने का टिफिन ले कर सुबह साढ़े 7 बजे घर से गए तो लौट कर नहीं आए.’’

बलजिंदर सिंह ने वहां जा कर भी पूछताछ की, जहां प्रवासराम काम करा रहा था. उस के साथ काम करने वाले मजदूर ही नहीं, मकान के मालिक ने भी बताया कि प्रवासराम निहायत ही शरीफ और ईमानदार आदमी था. लड़ाईझगड़ा तो दूर, वह किसी से ऊंची आवाज में बात भी नहीं करता था. समय पर काम कर के मालिक से समय पर मजदूरी ले कर अपने मजदूरों को उन की मजदूरी दे कर उन्हें खुश रखता था. बलजिंदर सिंह को अब तक की पूछताछ में कोई ऐसा सुराग नहीं मिला था, जिस से वह हत्यारों तक पहुंच पाते. यह तय था कि हत्यारे 2 या 2 से अधिक थे. लेकिन उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे शरीफ आदमी की भला किसी की क्या दुश्मनी हो सकती थी, जो उसे मार दिया.

थानाप्रभारी इंद्रजीत सिंह से सलाह कर के बलजिंदर सिंह मुखबिरों की मदद से यह पता करने लगे कि मृतक की पत्नी का किसी से अवैध संबंध तो नहीं था. इस की एक वजह यह थी कि लक्ष्मी ने कई बार बयान बदले थे. यही नहीं, पूछताछ के दौरान वह डरीडरी सी रहती थी. कभी वह कहती थी कि 2 अप्रैल को काम से लौटने के बाद वह कुछ लेने के लिए बाजार गए थे तो लौट कर नहीं आए तो कभी कहती थी कि सुबह काम पर गए थे तो लौट कर नहीं आए थे.

उस की इन्हीं बातों पर उन्हें उस पर शक हो गया था. मुखबिरों से उन्हें पता चला था कि लक्ष्मी के घर सिर्फ 20-22 सल के सोनू का ही आनाजाना था. उसी सोनू के साथ लक्ष्मी प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कराने थाने आई थी. उस की उम्र लक्ष्मी से इतनी कम थी कि उस पर संदेह नहीं किया जा सकता था. लेकिन मुखबिर ने जो खबर दी थी, उस से सोनू ही संदेह के घेरे में आ गया था. पुलिस जब उसे गिरफ्तार करने पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला.

बलजिंदर सिंह महिला सिपाही की मदद से लक्ष्मी को थाने ले आए और जब उस से कहा कि उसी ने सोनू के साथ मिल कर अपने पति की हत्या की है तो वह अपने बच्चों की कसम खाने लगी. उस का कहना था कि पुलिस को शायद गलतफहमी हो गई है. वह भला अपने पति की हत्या क्यों करेगी. लेकिन पुलिस को मुखबिर पर पूरा भरोसा था. इसलिए जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने अपने पति प्रवासराम की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए बता दिया कि उसी ने अपने प्रेमी सोनू के साथ साजिश रच कर पति प्रवासराम की हत्या कराई थी.

इस हत्या में उस का प्रेमी सोनू और उस के 2 दोस्त मिल्टन और छोटू सोनू शामिल थे. सोनू के दोस्त का नाम भी सोनू था, इसलिए यहां उस का नाम छोटू सोनू लिख दिया गया है. लक्ष्मी ने ही प्रवासराम की हत्या करा कर उस की लाश गंदे नाले में फेंकवा दी थी. इस के बाद लक्ष्मी की निशानदेही पर उस के प्रेमी सोनू और उस के साथी अवधेश (बदला हुआ नाम) को हिरासत में ले लिया गया था. जबकि उस का साथी सोनू फरार होने में कामयाब हो गया था. शायद उसे लक्ष्मी, अवधेश और सोनू के गिरफ्तार होने की सूचना मिल गई थी.

बलजिंदर सिंह ने उसी दिन यानी 9 अप्रैल, 2017 को तीनों अभियुक्तों लक्ष्मी, अवधेश और सोनू को जिला मजिस्टै्रट की अदालत में पेश कर के लक्ष्मी और सोनू को 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया, जबकि नाबालिग होने की वजह से अवधेश को बाल सुधारगृह भेज दिया गया. रिमांड अवधि के दौरान प्रवासराम की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह  इस प्रकार थी- 6 बच्चों की मां बन जाने के बाद भी लक्ष्मी की देह की आग शांत होने के बजाय और भड़क उठी थी. इस की वजह यह थी कि प्रवासराम सीधासादा और शरीफ आदमी था. उस ने लक्ष्मी से कहा था कि अब उसे खुद पर संयम रखना चाहिए, क्योंकि उस के 6 बच्चे हो चुके हैं. अब उसे अपने इन बच्चों की फिक्र करनी चाहिए.

प्रवासराम दिनभर काम कर के थकामांदा घर लौटता और खाना खा कर अगले दिन काम पर जाने के लिए जल्दी सो जाता. लक्ष्मी को यह जरा भी नहीं सुहाता था. जब पति ने उस की ओर से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया तो उस की नजरें खुद से लगभग 22 साल छोटे सोनू पर जा टिकीं. काम से फारिग होने के बाद अकेला रहने वाला सोनू अक्सर प्रवासराम के साथ उस के घर आ जाता था. वह घंटों बैठा प्रवासराम और लक्ष्मी से बातें किया करता था. लक्ष्मी की नजरें उस पर टिकीं तो वह उस से हंसीमजाक के साथसाथ शारीरिक छेड़छाड़ भी करने लगी. युवा हो रहे सोनू को यह सब बहुत अच्छा लगता था.

एक दिन दोपहर को जब सोनू काम से छुट्टी ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा तो लक्ष्मी ने उसे पकड़ कर बैड पर पटक दिया और मनमानी कर डाली. सोनू के लिए यह एकदम नया सुख था. उसे ऐसा लगा, जैसे वह जन्नत की सैर कर रहा है. उस दिन के बाद यह रोज का नियम बन गया. सोनू काम के बीच कोई न कोई बहाना कर के लक्ष्मी के पास पहुंच जाता और मौजमस्ती कर के लौट जाता. यह सब लगभग एक साल तक चलता रहा. किसी तरह इस बात की जानकारी प्रवासराम को हुई तो उस ने लक्ष्मी को खरीखोटी ही नहीं सुनाई, बल्कि प्यार से समझाया भी, पर उस के कानों पर जूं नहीं रेंगी.

जब प्रवासराम ने लक्ष्मी पर रोक लगाने की कोशिश की तो सोनू के प्यार में पागल लक्ष्मी ने सोनू के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना डाली. एक दिन उस ने सोनू से कहा, ‘‘जब तक प्रवासराम जिंदा रहेगा तो हम दोनों इस तरह मिल नहीं पाएंगे. वैसे भी अब उस के वश का कुछ नहीं रहा. वह बूढा हो गया है, अब उस का मर जाना ही ठीक है.’’

लक्ष्मी के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना कर सोनू ने साथ काम करने वाले अवधेश और छोटू सोनू को कुछ रुपयों का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया. घटना वाले दिन यानी 2 अप्रैल, 2017 को सोनू पार्टी देने के बहाने शराब की बोतल और चिकन ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा. अवधेश और छोटू सोनू भी उस के साथ थे. उस ने प्रवासराम से कहा, ‘‘भइया चिकन और शराब लाया हूं, आज पार्टी करने का मन है.’’

योजनानुसार चारों शराब पीने बैठ गए. खुद कम पी कर सोनू और उस के साथियों ने प्रवासराम को अधिक शराब पिला दी. रात के 11 बजे तक प्रवासराम जरूरत से ज्यादा शराब पी कर लगभग बेहोश हो गया तो लक्ष्मी ने सोनू को इशारा किया. सोनू ने छोटू सोनू और अवधेश की तरफ देखा तो छोटू सोनू ने बेसुध पड़े प्रवासराम के दोनों पैर कस कर पकड़ लिए. अवधेश उस की छाती पर सवार हो गया तो लक्ष्मी और सोनू ने प्रवासराम के गले में रस्सी डाल कर कस दिया. प्रवासराम तड़प कर शांत हो गया तो चारों ने मिल कर लाश को बैड से उतार कर नीचे खिसका दिया.

अवधेश और छोटू सोनू तो अपनेअपने घर चले गए, जबकि सोनू लक्ष्मी के कमरे पर ही रुक गया. दोनों पूरी रात उसी बैड पर मौजमस्ती करते रहे, जिस बैड के नीचे प्रवासराम की लाश पड़ी थी. अगले दिन यानी 3 अप्रैल की रात को अवधेश और छोटू सोनू की मदद से सोनू प्रवासराम की लाश को बिस्तर में लपेट कर रेहड़े से ले जा कर सेम नानकसर रोड पर बहने वाले गंदे नाले में फेंक आया. रिमांड अवधि के दौरान लक्ष्मी की निशानदेही पर पुलिस ने उस के घर से वह रस्सी बरामद कर ली थी, जिस से प्रवासराम का गला घोंटा गया था. हत्या करते समय लक्ष्मी ने अपने सभी बच्चों को दूसरे कमरे में सुला कर बाहर से कुंडी लगा दी थी, जिस से बच्चों को कुछ पता नहीं चल सका था.

रिमांड अवधि समाप्त होने पर 11 अप्रैल, 2017 को लक्ष्मी और उस के प्रेमी सोनू को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. अवधेश को पहले ही बाल सुधार गृह भेज दिया गया था. इस हत्याकांड का एक आरोपी छोटू सोनू अभी फरर है. पुलिस उस की तलाश कर रही है. प्रवासराम की हत्या और लक्ष्मी के जेल जाने के बाद उन के सभी बच्चों को प्रवासराम का छोटा भाई अपने घर ले गया है. लक्ष्मी ने अपनी वासना में अपना परिवार तो बरबाद किया ही, 3 लड़कों की जिंदगी पर सवालिया निशान लगा दिए. Love Crime

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. अवधेश बदला हुआ नाम है.

Gorakhpur Crime: रिश्तों की मर्यादा टूटी, चाची की यारी में चाचा का खौफनाक कत्ल

Gorakhpur Crime: 17 अक्तूबर, 2016 की सुबह जिला गोरखपुर के चिलुआताल के महेसरा पुल के नजदीक जंगल में एक पेड़ के सहारे एक साइकिल खड़ी देखी गई, जिस के कैरियर पर एक बोरा बंधा था. बोरा खून से लथपथ था, इसलिए देखने वालों को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि बोरे में लाश हो सकती है. लाश  होने की संभावना पर ही इस बात की सूचना थाना चिलुआताल पुलिस को दे दी गई थी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर रामबेलास यादव पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. बोरे से उस समय भी खून टपक रहा था.

इस का मतलब था कि बोरा कुछ देर पहले ही साइकिल से वहां लाया गया था. उन्होंने बोरा खुलवाया तो उस में से एक आदमी की लाश निकली. मृतक की उम्र 35-36 साल रही होगी. उस के सिर पर किसी वजनदार चीज से वार किया गया था. वह रंगीन सैंडो बनियान और लुंगी पहने था. शायद रात को सोते समय उस की हत्या की गई थी. पुलिस को लाश की शिनाख्त कराने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई. वहां जमा भीड़ ने मृतक की शिनाख्त प्रौपर्टी डीलर सुरेश सिंह के रूप में कर दी थी. वह चिलुआताल गांव का ही रहने वाला था.

शिनाख्त होने के बाद रामबेलास यादव ने मृतक के घर वालों को सूचना देने के लिए 2 सिपाहियों को भेजा. दोनों सिपाही मृतक के घर पहुंचे तो घर पर कोई नहीं मिला. पड़ोसियों से पता चला कि सुरेश सिंह के बिस्तर पर भारी मात्रा में खून मिलने और उस के बिस्तर से गायब होने से घर के सभी लोग उसी की खोज में निकले हुए थे. घर पर पुलिस के आने की सूचना मिलने पर मृतक सुरेश सिंह के बड़े भाई दिनेश सिंह घर आए तो जंगल में एक लाश मिलने की बात बता कर दोनों सिपाही उन्हें अपने साथ ले आए. लाश देखते ही दिनेश सिंह फफक कर रो पड़े. इस से साफ हो गया कि मृतक उन का भाई सुरेश सिंह ही था.

इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया और उस साइकिल को जब्त कर लिया, जिस पर लाश बोरे में भर कर वहां लाई गई थी. थाने लौट कर रामबेलास यादव ने मृतक के बडे़ भाई दिनेश सिंह की तहरीर पर सुरेश सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया. मृतक सुरेश सिंह प्रौपटी डीलिंग का काम करता था. विवादित जमीनों को खरीदनाबेचना उस का मुख्य धंधा था. पुलिस ने इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई, लेकिन उस का ऐसा कोई दुश्मन नजर नहीं आया, जिस से लगे कि हत्या उस ने कराई है.

यह हत्याकांड अखबारों की सुर्खियां बना तो एसएसपी रामलाल वर्मा ने एसपी (सिटी) हेमराज मीणा को आदेश दिया कि वह जल्द से जल्द इस मामले का खुलासा कराएं. उन्होंने सीओ देवेंद्रनाथ शुक्ला और थानाप्रभारी रामबेलास यादव को सुरेश सिंह तथा उस के घरपरिवार के आसपास जांच का घेरा बढ़ाने को कहा. क्योंकि उन्हें लग रहा था कि यह हत्या दुश्मनी की वजह से नहीं, बल्कि अवैधसंबंधों की वजह से हुई है. क्योंकि मृतक को जिस तरह बेरहमी से मारा गया था, इस तरह लोग अवैध संबंधों में ही नफरत में मारे जाते हैं. इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई गई तो जल्दी ही नतीजा निकलता नजर आया.

किसी मुखबिर ने बताया कि पिछले कई सालों से सुरेश सिंह की अपनी पत्नी से पटती नहीं थी. दोनों में अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था और इस की वजह सुरेश सिंह का सगा भतीजा राहुल चौधरी था. क्योंकि उस के अपनी चाची राधिका से अवैध संबंध थे. घटना से सप्ताह भर पहले भी इसी बात को ले कर सुरेश और राधिका के बीच काफी झगड़ा हुआ था. तब सुरेश ने पत्नी की पिटाई कर दी थी, जिस से नाराज हो कर वह बच्चे को ले कर मायके चली गई थी. रामबेलास यादव को हत्या की वजह का पता चल गया था. राहुल से पूछताछ करने के लिए वह उस के घर पहुंचा तो उस के पिता दिनेश सिंह ने बताया कि वह तो लखनऊ में है.

लखनऊ में राहुल गोमतीनगर में किराए का कमरा ले कर रहता है और सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा है. पिता का कहना था कि हत्या वाले दिन के एक दिन पहले वह लखनऊ चला गया था. जबकि मुखबिर ने उन्हें बताया था कि घटना वाले दिन सुबह वह चिलुआताल में दिखाई दिया था. पिता का कहना था कि घटना से एक दिन पहले यानी 16 अक्तूबर, 2016 को राहुल लखनऊ चला गया था, जबकि मुखबिर का कहना था कि घटना वाले दिन वह चिलुआताल में दिखाई दिया था. मुखबिर की बात पर विश्वास कर के रामबेलास यादव ने राहुल को लखनऊ से लाने के लिए 2 सिपाहियों को भेज दिया.

लखनऊ पुलिस की मदद से गोरखपुर पुलिस 22 अक्तूबर, 2016 को लखनऊ के गोमतीनगर से राहुल चौधरी को गिरफ्तार कर गोरखपुर ले आई. थाने ला कर उस से सुरेश सिंह की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी हीलाहवाली के चाची से अवैध संबंधों की वजह से चाचा सुरेश सिंह की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. राहुल ने चाची के प्रेम में पड़ कर चाचा की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के थाना चिलुआताल में सुरेश सिंह पत्नी राधिका सिंह और 6 साल के बेटे के साथ रहता था. उस का बड़ा भाई था दिनेश सिंह. राहुल उसी का बेटा था. दोनों भाइयों के परिवार भले ही अलगअलग रहते थे, लेकिन रहते एक ही मकान में थे. सुखदुख में भी एकदूसरे की मदद भी करते थे. गांव वाले भाइयों के इस प्रेम को देख मन ही मन जलते थे. सुरेश सिंह चेन्नई में किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. लेकिन पत्नी राधिका बेटे के साथ गांव में रहती थी. वह साल में एक या 2 बार ही घर आता था. उस के न रहने पर जरूरत पड़ने पर घर के छोटेमोटे काम उस के बड़े भाई का बेटा राहुल कर दिया करता था.

राहुल और राधिका थे तो चाचीभतीजा, लेकिन हमउम्र होने की वजह से दोनों दोस्तों की तरह रहते थे, बातचीत भी वे दोस्तों की ही तरह करते थे. इस का नतीजा यह निकला कि धीरेधीरे उन के बीच मधुर संबंध बन गए. उन के मन में एकदूसरे के लिए चाहत के फूल खिले तो एकदूसरे के स्पर्श मात्र से उन का रोमरोम खिल उठने लगा. राहुल चाची राधिका से जुनून के हद तक प्यार करने लगा तो राधिका ने भी उस के प्यार पर अपने समर्पण की मोहर लगा दी. एक बार मर्यादा टूटी तो उन्हें जब भी मौका मिलता, जिस्म की भूख मिटाने लगे. दोनों ने अपने इस अनैतिक रिश्ते पर परदा डालने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन पाप के इस रिश्ते को वे छिपा नहीं सके.

लोग राधिका और राहुल को ले कर तरहतरह की चर्चाएं भी करने लगे, पर उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया. जब सुरेश सिंह के किसी शुभचिंतक ने उसे फोन कर के चाचीभतीजे के बीच पक रही खिचड़ी की जानकारी दी तो वह नौकरी छोड़ कर गांव आ गया. यह सन 2014 की बात है. सुरेश ने खूब पैसे कमाए थे. उन्हीं पैसों से उस ने गांव में रह कर प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया, जो थोड़ी मेहनत के बाद अच्छा चल निकला. कामधंधे की वजह से अकसर उसे दिन भर घर से बाहर रहना पड़ता था, इसलिए राहुल और राधिका को मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी. लेकिन एक दिन अचानक वह दोपहर में घर आ गया तो उस ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया.

फिर क्या था, सुरेश ने न पत्नी को छोड़ा और न भतीजे को. उस ने इस बात को ले कर भाई से बात की तो बेटे की हरकत से वह काफी शर्मिंदा हुए. समाज और रिश्तों की दुहाई दे कर उन्होंने बेटे को घर से निकाल दिया तो वह लखनऊ आ गया और गोमतीनगर में किराए पर कमरा ले कर रहने लगा. यहां वह सरकारी नौकरी की परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. सुरेश की वजह से गांव में राहुल और उस की चाची की काफी बदनामी हुई थी. यही नहीं, उसे घर से भी निकाल दिया गया था. राधिका की खूब थूथू हुई थी. गांव से ले कर नातेरिश्तेदारों तक ने उस की खूब फजीहत की थी.

धीरेधीरे बात थमती गई. मांबाप से मांफी मांग कर राहुल फिर घर लौट आया. मांबाप ने उसे माफ जरूर कर दिया था, लेकिन उस पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. राधिका से उसे मिलने की सख्त मनाही थी. जबकि वह चाची से मिलने के लिए तड़प रहा था. लेकिन सख्त पहरेदारी की वजह से दोनों का मिलन संभव नहीं हो पा रहा था. चाचा सुरेश की वजह से राहुल प्रेमिका चाची से मिल नहीं पा रहा था. उसे लग रहा था कि जब तक चाचा रहेगा, वह चाची से कभी मिल नहीं पाएगा. चाचा प्यार की राह का कांटा लगा तो वह उसे हटाने के बारे में सोचने लगा. आखिर उस ने उसे हटाने का निश्चय कर लिया.

अब वह ऐसी राह खोजने लगा, जिस पर चल कर उस का काम भी हो जाए और वह फंसे भी न. काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह अपना मोबाइल फोन औन कर के बाइब्रेशन पर लखनऊ वाले कमरे पर ही छोड़ देगा और रात में गोरखपुर पहुंच कर चाचा की हत्या कर के लखनऊ अपने कमरे पर आ जाएगा. पुलिस उस पर शक करेगी तो मोबाइल लोकेशन के सहारे वह बच जाएगा. तब वह शायद यह भूल गया था कि कातिल कितना भी चालाक क्यों न हो, कानून के लंबे हाथों से उस का बचना आसान नहीं है.

राहुल जब से घर आ कर रहने लगा था, सुरेश और उस की पत्नी राधिका के बीच उसे ले कर अकसर झगड़ा होता रहता था. जबकि इस बीच राहुल एक बार भी चाची से नहीं मिला था. रोजरोज के झगड़े से परेशान हो कर राधिका नाराज हो कर बेटे को ले कर मायके चली गई थी. राधिका के चली जाने से राहुल काफी दुखी था. उस का मन घर में नहीं लगा तो 16 अक्तूबर को मांबाप से कह कर वह लखनऊ चला गया. चाची से न मिल पाने की वजह से राहुल तड़प रहा था. तड़प की वेदना से आहत हो कर उस ने योजना को अमलीजामा पहना दिया. योजना के अनुसार 17 अक्तूबर की शाम 4 बजे इंटरसिटी ट्रेन से वह गोरखपुर के लिए चल पड़ा. रात 11 बजे के करीब वह गोरखुपर पहुंचा. स्टेशन से टैंपो ले कर वह चिलुआताल के बरगदवां चौराहे पर पहुंचा और वहां से पैदल ही घर पहुंच गया.

उसे घर तो जाना नहीं था, इसलिए सब से पहले उस ने पिता के कमरे के दरवाजे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी, ताकि शोर होने पर वह बाहर न निकल सकें. इस के बाद पीछे की दीवार के सहारे वह सुरेश सिंह के कमरे में पहुंचा, जहां वह गहरी नींद सो रहा था. उसे देखते ही नफरत से राहुल का खून खौल उठा. उसे पता था कि चाचा के घर में लोहे की रौड कहां रखी है. उस ने लोहे की रौड उठाई और पूरी ताकत से सुरेश के सिर पर 3 वार कर के उसे मौत के घाट उतर दिया.

राहुल को विश्वास हो गया कि सुरेश की मौत हो चुकी है तो उस ने घर में रखा बोरा उठाया और उसी में उस की लाश भर कर रात के 4 बजे के करीब बाहर झांक कर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा. जब उसे लगा कि कोई नहीं देख रहा है तो उस ने सुरेश की ही साइकिल घर उस की लाश वाले बोरे को कैरियर पर रख कर जंगल की ओर चल पड़ा. लेकिन जब वह झील की ओर जा रहा था, तभी एक ट्रैक्टर आता दिखाई दिया. उसे देख कर वह घबरा गया और साइकिल को एक पेड़ से टिका कर भागा. ट्रैक्टर पर बैठे एक मजदूर ने उसे भागते देख लिया तो उस ने उस का नाम ले कर पुकारा भी, लेकिन रुकने के बजाए राहुल बरगदवां चौराहे की ओर भाग गया.

वहां से उस ने टैंपो पकड़ी और गोरखपुर रेलवे स्टेशन पहुंचा, जहां से ट्रेन पकड़ कर लखनऊ स्थित अपने कमरे पर चला गया. उस ने चालाकी तो बहुत दिखाई, लेकिन वह काम न आई और पकड़ा गया. राहुल चौधरी की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड बरामद कर ली थी. पूछताछ के बाद राहुल को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. राधिका के पति की हत्या की खबर पा कर ससुराल आ गई थी. राहुल ने जो किया था, उस से उसे काफी दुख पहुंचा. क्योंकि उस ने राहुल से कभी नहीं कहा था कि वह उस के पति की हत्या कर उसे विधवा बना दे.

राहुल के मांबाप भी काफी दुखी हैं. उन्होंने राहुल से अपना नाता तोड़ कर उसे उस के हाल पर छोड़ दिया है. Gorakhpur Crime

कथा में राधिका सिंह बदला नाम है. कथा पुलिस सूत्रों एवं राहुल के बयानों पर आधारित