MP Crime: वासना की भूख ने जूली को कातिल बना दिया

MP Crime: वह सैक्स की आग में कई सालों से झुलस रही थी. उस का पति पिछले 2 सालों से दोहरे हत्याकांड के आरोप में जेल में बंद था. पति की गैरहाजिरी में उसे जिस्मानी सुख नहीं मिल पा रहा था. आखिर में उस ने एक रास्ता निकाल ही लिया. वह दोहरी जिंदगी जीने लगी. दिन के उजाले में वह घर वालों के सामने घूंघट ओढ़े आदर्श बहू की तरह रहती और जैसे ही रात का अंधेरा घिरता, वह आदर्श बहू का चोला उतार कर ऐयाशी में रम जाती. यह सिलसिला पिछले एक साल से चल रहा था. बहू की इस दोहरी जिंदगी का राज एक दिन घर वालों के सामने उजागर हो गया. एक रात दादी सास सुशीला राजावत ने बहू को किसी पराए मर्द के साथ सैक्स संबंध बनाते देख लिया. इस के बाद से दादी सास उस पर कड़ी नजर रखने लगीं.

इस से खफा उस औरत ने रची एक खौफनाक साजिश, जो दिल दहला देने वाली थी. यह मामला मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के हजारी इलाके के बिरला मंदिर का है. जूली अपनी दादी सास सुशीला राजावत और अपने 6 साल के बेटे के साथ रहती थी. पुलिस अधीक्षक हरिनारायणचारी मिश्र के मुताबिक, पिछले 3 साल से जूली का पति शिवा राजावत दोहरे हत्याकांड के आरोप में अपने पिता और छोटे भाई के साथ जेल में बंद है. पति के जेल चले जाने के बाद से जूली अकेली हो गई. पति के बिना उस का मन नहीं लगता था. वह अकसर अपनी दादी सास के सामने रोती रहती थी.

शिवा राजावत के कुछ करीबी दोस्त थे, जो जेल से उस की खबर ले कर उस के घर पर आते रहते थे. इसी दौरान जूली उन में से एक दोस्त की ओर आकर्षित हो गई. जल्दी ही दोनों नजदीक आ गए और चोरीछिपे मिलने लगे. जूली काफी समय से सैक्स की भूखी थी. अपनी भूख मिटाने के लिए वह प्रेमी को रात के समय अपने कमरे पर बुलाने लगी. वह शख्स रात में उस के पास आता और सुबह होने से पहले ही वहां से निकल जाता. रात के अंधेरे में चलने वाले ऐयाशी के इस खेल के बारे में किसी को पता नहीं था.

एक रात दादी सास सुशीला राजावत ने जूली को पराए मर्द के साथ मस्ती करते देख लिया. उस रात जूली कुछ ज्यादा ही उतावली थी. इस चक्कर में कमरे का दरवाजा बंद करना भूल गई. रात के समय दादी सास सुशीला राजावत की नींद खुल गई. उन्हें बहू के कमरे से सिसकारियों की आवाज सुनाई दी. उन के कान खड़े हो गए. वे दबे कदमों से कमरे के पास पहुंचीं. अंदर का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. जूली अपने यार के साथ सैक्स में इतनी खोई हुई थी कि उसे कमरे में किसी के आने का एहसास तक न हुआ. दादी सास ने उसी वक्त दोनों को काफी खरीखोटी सुनाई.

वह शख्स बिना कुछ बोले सिर नीचे कर के वहां से भाग गया, लेकिन उस दिन से जूली घर में कैद हो कर रह गई. दादी सास उस पर कड़ी निगाह रखने लगीं. उसे बाहर के किसी शख्स से बात करने, घर के बाहर कहीं जाने, यहां तक कि मोबाइल फोन से बात करने पर भी रोक लगा दी. जूली अपने प्रेमी से मिलने के लिए तड़पने लगी. उस ने सास की नजरों से बच कर घर से बाहर निकलने की कोशिश की, पर कामयाबी नहीं मिली. नतीजा यह हुआ कि वह गुस्से से बौखला गई. उस ने सास को ही खत्म करने का खतरनाक प्लान बना लिया.

5 अगस्त की सुबह 8 बजे अपने बेटे को स्कूल भेजने के बाद जूली ने इस खौफनाक वारदात को अंजाम दिया. जूली ने चाय में ढेर सारी नींद की गोलियां मिला कर अपनी दादी सास सुशीला को पिला दी. चाय पीने के कुछ समय बाद ही सुशीला राजावत को नींद आने लगी. वे अपने कमरे में जा कर सो गईं. मौका पा कर जूली ने तौलिया से गला दबा कर उन की हत्या कर दी. सास की हत्या के बाद उस ने कमरे का सारा सामान इस तरह से बिखेर दिया, ताकि मामला लूटपाट का लगे. तकरीबन 12 बजे जूली ‘मैं लुट गई… बरबाद हो गई’ चिल्लाने लगी. आवाज सुन कर आसपास के लोग जमा हो गए. पुलिस भी वहां पहुंच गई.

जूली ने पुलिस को बताया, ‘‘3 लोग उस के पति शिवा के दोस्त बता कर घर में घुसे. तीनों अंदर कमरे में कुरसी पर बैठ कर सास से बातें करने लगे. मैं उन के लिए अंदर रसोई में चाय बनाने चली गई.

‘‘थोड़ी देर में 2 लोग रसोई में आ गए. उन्होंने मुझे पीछे से पकड़ लिया. एक ने मेरे सिर पर पिस्टल अड़ा दिया. दूसरे ने मेरा पेटीकोट उठा कर रेप करने की कोशिश की.

‘‘वह कुछ करने में कामयाब होता, उस बीच किसी ने दरवाजे पर आवाज दी. आवाज सुन कर तीनों भाग निकले. जाने से पहले वे अलमारी में रखा सोना लूट कर ले गए और उन्होंने सास की हत्या भी कर दी.’’

जूली ने पुलिस को जो कहानी सुनाई थी, पुलिस द्वारा अंदर तहकीकात करने पर झूठी निकली, जिस की वजह से जूली शक के घेरे में आ गई.

जूली ने तीनों लुटेरों को सामने कमरे में रखी कुरसियों पर बैठ कर सास से बातें करने की बात कही थी, जबकि कमरे में कुरसियां एक के ऊपर एक रखी थीं. दूसरी बात, जूली ने हत्यारे द्वारा उस का दुपट्टा ले जाने की बात कही थी, पर वह दुपट्टा अंदर कमरे में लाश के पास मिला. तीसरी बात, जो सोना लुटेरों द्वारा लूट कर ले जाने की बात की थी, जांच में पता चला कि वह सोना बैंक में गिरवी रखा हुआ है. उस पर लोन लिया गया था. इस के अलावा जूली अपना बयान बारबार बदल रही थी. पुलिस द्वारा कड़ाई से पूछताछ करने पर जूली ने दादी सास की हत्या करने की बात कबूल ली और सारी असलियत बयान कर दी.

जूली ने पुलिस को बताया कि वह पिछले 5 महीने से अपनी दादी सास की हत्या की साजिश रचने में लगी थी. उस ने टैलीविजन सीरियल देख कर हत्या करने व उस से बचने की प्लानिंग बनाई थी. उस ने सीरियल के द्वारा छोटेबड़े अपराध के बारे में जानकारी हासिल की थी. पहले उस ने बदमाशों द्वारा रेप किए जाने की कहानी पुलिस के सामने सुनाने की सोची थी, लेकिन रेप के मामले में मैडिकल एंगल को देखते हुए उस ने पिस्टल अड़ा कर रेप करने की कोशिश, लूट और हत्या की कहानी सुनाई.

जूली को यकीन था कि उस के द्वारा बताई गई सारी बातें पुलिस मान लेगी और वह साफतौर पर बच जाएगी, पर ऐसा हुआ नहीं. पुलिस ने तहकीकात कर उस की सारी पोल खोल कर रख दी. जूली ने बताया कि उसे अपनी दादी सास की हत्या करने का कोई मलाल नहीं है, क्योंकि वे उसे प्रेमी से मिलने नहीं दे रही थीं. सैक्स के माहिर डाक्टरों का कहना है कि इनसान के लिए सैक्स की भूख जिस्मानी जरूरत है. इस पर रोक लगाने पर औरत हो या मर्द, हत्या करने जैसा खौफनाक कदम उठा सकते हैं. MP Crime

Real Crime Story: हुस्न बना दुश्मन

Real Crime Story: शातिर तूबा को लगा कि उस के सारे दोस्त खूबसूरत अबीरा के होते जा रहे हैं तो वह उसे रास्ते से हटाने के बारे में सोचने लगी. उस ने इस के लिए तरीका तो बहुत बढि़या अख्तियार किया, लेकिन पुलिस की नजरों से बच नहीं सकी.

जनवरी की 13 तारीख थी, मौसम में काफी ठंडक थी. पूरा पंजाब लोहड़ी की तैयारी में लगा हुआ था. अगर आप यह सोचते हैं कि लोहड़ी सिर्फ भारत में ही मनाई जाती है तो आप गलत सोच रहे हैं, पाकिस्तान के पंजाब में भी लोहड़ी का त्यौहार अत्यंत उत्साह के साथ मनाया जाता है. लाहौर के लोगों में भी लोहड़ी का उत्साह था. सुबह का समय था, लाहौर के एक संभ्रांत इलाके जौहर टाउन के शेरकोट बसअड्डे पर अच्छीखासी भीड़ थी. बसअड्डे के लाउंज में एक लावारिस सूटकेस रखा था.

बहुत देर तक जब कोई उस सूटकेस को लेने नहीं आया तो बसअड्डे पर मौजूद लोगों में से किसी ने पुलिस को फोन कर दिया. इसके बाद थोड़ी देर में ही पुलिस आ गई. पुलिस ने सूटकेस को खोला तो उस में से एक लड़की की लाश निकली. लड़की की लाश बिलकुल ठंडी थी. पुलिस को लगा कि यह मौसमी ठंडक की वजह से ठंडी नहीं हुई है, बल्कि इसे बर्फ में रख कर ठंडा किया गया था. लड़की के जिस्म पर चोट के निशान थे, जिस से पता चलता था कि उसे मारापीटा गया था. पहली नजर में ही देखने से लग रहा था कि लड़की की मौत दम घुटने की वजह से हुई थी. क्योंकि उस के गले पर नीले रंग का निशान था.

पुलिस ने लाश की पहचान करवाने की कोशिश की, लेकिन वहां मौजूद लोगों में से कोई भी लाश को नहीं पहचान सका. जब कई दिनों तक लाश की पहचान नहीं हो सकी तो पुलिस ने लाश का पोस्टमार्टम और औटोप्सी कराई. पुलिस ने बसअड्डे के पास लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग निकलवाई तो उस से पता चला कि वह सूटकेस सुबहसुबह एक लड़की औटोरिक्शा में रख कर लाई थी और उसे बसस्टैंड पर रख कर फौरन वापस चली गई थी. लेकिन पुलिस उस लड़की की पहचान नहीं कर पाई थी.

औटोप्सी से पता चला कि मृतका को खाने में आर्सेनिक और नाइट्रेट जहर भी दिया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस के साथ बलात्कार होने की भी पुष्टि हुई थी. वैसे उस की मौत गला घोंटने के कारण हुई थी. लाश को पहचान के लिए अस्पताल में सुरक्षित रख दिया गया था. 10-12 दिनों तक न तो लाश की पहचान हो पाई और न ही उस लड़की की. अंतत: पुलिस ने लावारिस मान कर लाश को दफन करा दिया. 13 फरवरी 2015 को लाहौर की वहादत कालोनी के पुलिस स्टेशन में एक आदमी आया. उस का नाम जुहेब भट्टी था

उस ने अपना पूरा परिचय देते हुए बताया कि वह सियालकोट के छावनी इलाके के रहने वाले मोहम्मद भट्टी का बेटा है और सियालकोट में अपने बड़े भाई जावेद भट्टी के साथ प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता है. उस की 2 बहनें थीं, उज्मा और अबीरा. मां का कुछ साल पहले देहांत हो चुका है. उस ने आगे बताया कि उस की बहन अबीरा, जिस की उम्र 22 साल थी, कुछ साल पहले वह पढ़ने के लिए लाहौर आई थी. पहले  कुछ समय तक वह लाहौर में अपने मामू के यहां रही. चूंकि उस की हार्दिक इच्छा थी कि वह मौडल बने, इसलिए वह शोबिज (व्यावसायिक पार्टियां) की पार्टियों में शिरकत करने लगी.

ऐसी पार्टियों में शामिल होने के लिए वह नएनए दोस्त बनाती रहती थी. उस की इस आदत की वजह से मामू परेशान रहते थे और उसे डांटते भी थे. इसलिए उस ने मामू का घर छोड़ दिया था और वहादत कालोनी स्थित एक हौस्टल में रहने लगी थी. अब वह कई दिनों से हौस्टल से लापता है. उसे शक है कि हौस्टल की मालकिन सिदरा ने उस की बहन को गायब कर दिया है. पुलिस ने जुहेब भट्टी की शिकायत पर  वहादत रोड स्थित हौस्टल में छापा मार कर हौस्टल की मालकिन सिदरा अवान सहित 4 लोगों, नौमान कुरैशी, फरहान खान, सकीना और आयशा बट को हिरासत में ले लिया.

पुलिस सभी को थाने ले आई. पुलिस ने जब सिदरा से जुहेब भट्टी की बहन अबीरा के बारे में पूछताछ की तो उस ने अबीरा के बारे में अनभिज्ञता जाहिर की, लेकिन इतना जरूर बता दिया कि अबीरा आजकल तूबा से बहुत मिलती थी, जो एक मेकअप आर्टिस्ट है. वह खासकर मौडल्स का मेकअप करती है. इकबाल टाऊन के एसपी मोहम्मद इकबाल ने जब जुहेब से उस की बहन का हुलिया पूछा तो उस ने जो हुलिया बताया, उस से पुलिस को लगा कि संभवत: बसअड्डे पर मिली लाश उस की बहन की थी. लाश के फोटो देखने के बाद जुहेब ने उस की शिनाख्त अपनी बहन अबीरा के रूप में कर दी. चूंकि अब लाश की पहचान हो गई, इसलिए पुलिस जांच में तेजी आ गई.

पुलिस ने शेरकोट बसअड्डे की सीसीटीवी की फुटेज पहले ही अपने कब्जे में ले रखी थी. उस में साफ दिख रहा था कि एक लड़की औटोरिक्शा में सूटकेस ले कर आई थी और सूटकेस वहां रख कर वापस चली गई थी. पुलिस ने वह सीसीटीवी फुटेज सिदरा को दिखाई तो उस ने फुटेज में दिख रही लड़की की पहचान तूबा के रूप में कर के बताया कि अबीरा आजकल इसी के साथ कुछ ज्यादा दिखाई दी जा रही थी. साथ ही उस ने तूबा का पता भी बता दिया था. पुलिस ने तुरंत तूबा के घर छापा मारा तो वह घर पर ही मिल गई. पुलिस उसे पकड़ कर थाने ले आई. पुलिस पूछताछ में तूबा ने बताया कि अबीरा को उस ने नहीं, औटोरिक्शा वाले ने मारा है. पुलिस ने तूबा की निशानदेही पर औटोचालक असलम को भी गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस पूछताछ में असलम ने अबीरा की हत्या से साफ इनकार कर दिया. उस ने पुलिस को बताया कि वह तो अबीरा को जानता तक नहीं. वह तो तूबा के कहने पर उस सूटकेस को बसअड्डे तक ले आया था. इस के बाद पुलिस के सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि वह तूबा से सच कैसे उगलवाए. इस के लिए पुलिस ने तूबा का पौलिग्राफिक टेस्ट कराया. इस पौलिग्राफिक टेस्ट में जो हकीकत सामने आई, उस से सारे पुलिस अफसर हैरान रह गए. इस के बाद पूछताछ में तूबा ने बताया कि उस का असली नाम उज्मा राव है और वह मेकअप आर्टिस्ट है. 7 साल पहले उस की शादी बाबर बट के साथ हुई थी.

पति से उसे एक बेटी पैदा हुई. एक दिन उस की तबीयत खराब हुई तो बाबर ने अपने दोस्त यूसुफ खोखर के कहने पर उसे डाक्टर को इसलिए नहीं दिखाने दिया, क्योंकि वह लड़की थी. यूसुफ खोखर कैमरामैन था. दरअसल बाबर और युसुफ, दोनों ही मौडलिंग की दुनिया से जुड़े थे. डाक्टर को न दिखाने की वजह से तूबा की बेटी मर गई. तूबा ने इस का सारा इल्जाम बाबर और यूसुफ पर डाला. इस के बाद उस की बाबर से अनबन रहने लगी. आखिरकार 2 साल बाद बाबर ने उसे तलाक दे दिया. इस के बाद तूबा उर्फ उज्मा ने बाबर और यूसुफ को मारने का फैसला कर लिया.

बाबर से तलाक लेने के बाद तूबा जौहर टाऊन के एक अपार्टमेंट में अलग रहने लगी थी. यहीं रहते हुए उस की कई पुरुषों से दोस्ती हो गई, जिन में से एक का नाम जीशान था. एक दिन उस ने जीशान से कोई जहर ला कर देने को कहा तो उस ने उसे आर्सेनिक जहर ला कर दे दिया. तूबा ने बाबर से तलाक लेने के बाद भी उस के दोस्त यूसुफ खोखर से दोस्ती कायम कर रखी थी. उस ने इसी दोस्ती का फायदा उठा कर एक दिन खाने में यूसुफ को जीशान द्वारा लाया आर्सेनिक जहर दे दिया. आर्सेनिक जहर की विशेषता यह है कि यह कुछ समय बाद असर करता है. यूसुफ ने खाना तो खाया तूबा के साथ, लेकिन मरा अपने घर जा कर. इस से पुलिस को पता नहीं लग सका कि उसे जहर किस ने दिया था.

इस के बाद तूबा इस फिक्र में रहने लगी कि बाबर को किस तरह मौत के घाट उतारा जाए. इसी बीच उस की जिंदगी में एक और आदमी आया, जिस का नाम फारुख रहमान था. वह एक प्राइवेट बैंक में अधिकारी था. तूबा उस के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगी. फारुख रंगीनमिजाज आदमी था. वह जब भी कोई सुंदर लड़की देखता, उस की लार टपकने लगती थी. तूबा का प्रोफेशन चूंकि मौडल्स का मेकअप करना था, इसलिए वह भी शोबिज की पार्टियों में शामिल हुआ करती थी. 24 दिसंबर, 2014 को एक ऐसी ही पार्टी में उस के परिचित तरनजीत सिंह ने उस की मुलाकात एक नई उभरती मौडल से कराई. इस मौडल का नाम था अबीरा. वह बेपनाह हुस्न व कशिश की मलिका थी. ऊंचा कद, गोरा रंग, एकदम हूर लगती थी.

अबीरा एक उभरती हुई मौडल थी. उसे किसी अच्छे कौंट्रेक्ट की चाहत थी. तरनजीत ने जब उसे बताया कि तूबा की मौडलिंग इंडस्ट्री में काफी जानपहचान है तो अबीरा उस से मिली. इस पहली मुलाकात में ही वह उस से काफी प्रभावित हुई. वह जल्द ही उस से घुलमिल गई. इस के 3-4 दिनों बाद तूबा ने अबीरा को अपने घर बुलाया. उस वक्त वहां फारुख भी मौजूद था. फारुख ने अबीरा को देखा तो देखते ही उस के हुस्न का दीवाना हो गया. उस ने तूबा के सामने अपनी ख्वाहिश रखते हुए कहा कि वह हर हाल में उसे पाना चाहता है. पता नहीं क्या सोच कर तूबा ने उस की मदद करने की हामी भर दी. उस समय तूबा अपने दिमाग में शायद किसी साजिश का तानाबाना तैयार कर रही थी.

उस ने सोचा कि अबीरा की मदद से वह अपने पूर्व पति बाबर बट की हत्या करवा सकती है. वह जानती थी कि बाबर भी अय्याश किस्म का आदमी है और आसानी से अबीरा के हुस्न के जाल में फंस जाएगा. फिर जिस तरह उस ने यूसुफ खोखर को जिंदगी से छुटकारा दिलाया था, उसी तरह अबीरा भी बाबर को उस की जिंदगी से छुटकारा दिला देगी. तूबा को पता था कि अबीरा के पास अभी कोई बड़ा प्रोजैक्ट नहीं है, इसलिए वह आर्थिक तंगी से गुजर रही है. घर वालों से रिश्ते ठीक न होने की वजह से वह उन से भी मदद नहीं मांग सकती.

सोचविचार कर तूबा ने अबीरा से एक समझौता कर लिया. फिर उसी समझौते के तहत अबीरा को बाबर की हत्या में तूबा की मदद करनी थी. इस के बदले में तूबा को उसे कुछ नकद और मौडलिंग के कुछ अच्छे अनुबंध दिलाने थे. अबीरा जानती थी कि तूबा के शोबिज के सर्किल में काफी अच्छे ताल्लुकात हैं. निस्संदेह उस की मदद से वह कामयाबी की सीढि़या चढ़ सकती है. इसलिए उस ने तूबा का साथ देने की हामी भर ली. दूसरी ओर तूबा ने सोचा था कि एक बार अगर अबीरा उस के साथ जुर्म में शामिल हो गई तो फिर वह बड़े आराम से अपने दोस्त फारुख की इच्छा पूरी करवा देगी, क्योंकि इस के बाद अबीरा इस स्थिति में नहीं रह जाएगी कि उस की किसी बात से इनकार कर सके.

फारुख ने जिस दिन तूबा से यह कहा था कि वह अबीरा को पाना चाहता है, वह जलभुन उठी थी. लेकिन वह चाह कर भी फारुख का कुछ नहीं कर सकती थी. उस ने फारुख के जाने के बाद अबीरा के फोटो निकाले और गुस्से में उस के फोटो पर ही खुरचखुरच कर उस का चेहरा बिगाड़ दिया था. उस वक्त वह इतने गुस्से में थी कि अगर अबीरा वहां होती तो शायद उस का चेहरा सचमुच बिगाड़ देती. खैर, अपनी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए जनवरी के पहले सप्ताह में उस ने अबीरा को अपने घर बुलाया और बाबर को मारने की अपनी योजना में साथ देने को कहा. लेकिन इस बार अबीरा ने मना कर दिया. तूबा ने उसी वक्त सोच लिया कि अब वह अबीरा को इस दुनिया में जीवित नहीं रहने देगी.

तूबा ने उस वक्त तो अबीरा से कुछ नहीं कहा. अलबत्ता उस ने अपने दोस्त जीशान से जरूर कहा कि उसे डर है कि अबीरा कहीं उस से उस के दोस्तों को न छीन ले. अगर ऐसा हुआ तो उस का धंधा चौपट हो जाएगा. जीशान ने उसे फिर से आर्सेनिक जहर ला कर दे दिया. 12 जनवरी, 2015 को तूबा ने मौडलिंग का एक अच्छा और बड़ा अनुबंध दिलाने के बहाने अबीरा को खाने पर बुलाया. अबीरा वहां आई तो फारुख को यह पता नहीं था कि तूबा उसे मारने की योजना बना चुकी है. तूबा ने अबीरा के लिए स्पैशल खीर बनाई. उस ने अबीरा की खीर में जीशान का लाया जहर मिला दिया. जब अबीरा खाना खा चुकी तो फारुख उसे बहाने से अपने कमरे में ले गया और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. इस के बाद उस ने अबीरा को अपनी हवस का शिकार बनाने की कोशिश की.

अबीरा पर चूंकि जहर का असर होने लगा था, इसलिए वह ज्यादा विरोध नहीं कर सकी और फारुख ने आसानी से अपनी अच्छा पूरी कर ली. तब तक अबीरा बेहोश हो चुकी थी. थोड़ी देर बाद उस ने तूबा को बुलाया और अबीरा को वहां से ले जाने को कहा. तूबा जानती थी कि जो जहर अबीरा को दिया गया है, उसे पूरे तौर पर असर करने में अभी कई घंटे का समय लगेगा. उसे डर था कि अगर उसे बेहोशी की हालत में कहीं छोड़ा गया और वह बच गई तो उस का पुलिस से बच पाना नामुमकिन हो जाएगा. यही सोच कर तूबा ने पास पड़े अपने दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया. जिस से अबीरा उसी वक्त मर गई.

अबीरा तो मर गई. अब समस्या यह थी कि अबीरा की लाश का क्या किया जाए? इस के लिए तूबा ने फारुख से कहा कि लाश को एक बड़े सूटकेस में डाल कर बंद कर दो. फारुख ने ऐसा ही किया. लाश को सूटकेस में रख कर दोनों ने उसे फ्रीजर में रख दिया. रात भर सूटकेस तूबा के अपार्टमेंट में ही फ्रीजर में रखा रहा. तूबा ने वह रात फारुख के साथ दूसरे कमरे में गुजारी. सुबह सूरज निकलने से पहले तूबा ने अपने जानने वाले एक औटोरिक्शा वाले असलम को फोन कर के बुलाया. फिर उस के औटोरिक्शा में सूटकेस रखकर शेरकोट बसअड्डे पहुंची.

चूंकि सुबह का समय था, इसलिए बसअड्डे पर ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी. तूबा सूटकेस उतार कर बसअड्डे के लाउंज में ले गई और वहीं रख कर वापस आ गई. लेकिन सीसीटीवी कैमरे से उस की सारी हरकतें रिकौर्ड हो गईं. जब पुलिस ने तूबा के अपार्टमेंट पर छापा मारा था तो पुलिस को उस के घर से वह जहर भी मिल गया था, जो पोस्टमार्टम में अबीरा के शरीर में पाया गया था. इस के अलावा अबीरा की फोन काल डिटेल्स में अबीरा की आखिरी लोकेशन तूबा के घर की पाई गई थी. तूबा के बयान के आधार पर पुलिस ने फारुख और जीशान को भी गिरफ्तार कर लिया.

आगे की जांच में पता चला कि तूबा का असली नाम उज्मा राव था. उस ने अपना पहचान पत्र तूबा के फरजी नाम से बनवा रखा था. पुलिस को यूसुफ की हत्या के सबूत भी तूबा के घर से मिल गए हैं. पुलिस के अनुसार बाबर बट ने तूबा के साथ बलात्कार किया था, जिस की उस ने पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. लेकिन बाद में जब बाबर ने केस के डर से तूबा से शादी कर ली थी तो तूबा ने अपनी शिकायत वापस ले ली थी. तूबा अपने दूसरे दुश्मन बाबर बट का कत्ल करती, इस से पहले ही उस की एक और अबीरा दुश्मन पैदा हो गई. अपनी इसी दुश्मन अबीरा को रास्ते से हटाने के चक्कर में वह पुलिस की गिरफ्त में आ गई.

पुलिस ने तूबा, फारुख, जीशान और असलम को लाहौर की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. तीनों जेल की सलाखों के पीछे हैं और अपने किए की सजा भुगत रहे हैं. असलम को जमानत मिल गई है. Real Crime Story

लेखक – एम.जेड. बेग      

Chandigarh Crime: हमशक्ल की अक्ल का कारनामा

Chandigarh Crime: एक हत्याकांड में फरार गुरविंदर सिंह गैरी की प्रौपर्टी पर जिस गुरप्रीत सिंह की नजर थी, इत्तफाक से वह गैरी का हमशक्ल था. इसी का फायदा उठाते हुए उस ने नकली दस्तावेज तैयार करा कर गैरी की प्रौपर्टी को बेचने के नाम पर तमाम लोगों से लाखों रुपए ठग लिए थे.

मोहाली के फेज-7 के रहने वाले गुरविंदर सिंह उर्फ गैरी को चंडीगढ़ के सेक्टर-9 स्थित जापान लाइफ कंपनी ने जादू का एक शो करने को कहा था.  उसे यह शो दिल्ली में करना था. शो की तैयारी के लिए उसे कुछ सामान की जरूरत थी. इस के लिए उस ने अपने एक परिचित जादूगर प्रदीप से बात की. 28 वर्षीय प्रदीप ने 4-5 साल पहले ही जादूगरी के क्षेत्र में कदम रखा था. उन दिनों वह चंडीगढ़ के प्रतिष्ठित फाइवस्टार होटल शिवालिक व्यू में शो करता था. प्रदीप और गैरी की जानपहचान करीब 2 साल पहले तब हुई थी, जब प्रदीप सेक्टर-35 के होटल खायबर में जादू के शो किया करता था. गैरी वहां बीयर पीने जाता था. किसी दिन दोनों की जानपहचान हुई तो हमपेशा होने की वजह से उन में दोस्ती हो गई थी.

गैरी सुबह साढ़े 9 बजे प्रदीप के पास पहुंच गया था. जापान लाइफ कंपनी के निमंत्रण की बात बताने के बाद उस ने कहा, ‘‘आज सेक्टर-39 में ‘गो बनानाज किड्स क्लब’ में मेरा कार्यक्रम है. इस के लिए भी मुझे जादू का कुछ सामान चाहिए, चाहो तो तुम भी अपना कोई आइटम वहां पेश कर सकते हो. 11 बजे शो शुरू होगा, मन हो तो चलो.’’

प्रदीप तैयार हो गया. दोनों 11 बजे से पहले ही सेक्टर-39 पहुंच गए. संयोग से गैरी का एक परिचित कुलविंदर सिंह वहां मिल गया. वह गैरी का शो देखने आया था. वह पैट्रोलपंप पर काम करता था और पैट्रोलपंप पर पहनी जाने वाली ड्रैस में ही चला आया था. शो खत्म होने के बाद कुलविंदर ने कहा कि उस के पास जादू के खेलों की 1 कैसेट है. गैरी ने उस से कैसेट को मांगा तो कुलविंदर दोनों को अपने घर ले गया. उस ने पहले अपने कपड़े बदले, उस के बाद दोनों के साथ खाना खाया.

खाना खाते समय गैरी ने प्रदीप से जादू के सामान की बात की तो उस ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें दिल्ली के चांदनी चौक की 1 दुकान का पता देता हूं, वहां तुम्हें एकदम बढि़या सामान मिल जाएगा.’’

प्रदीप की बात खत्म होते ही कुलविंदर ने कहा, ‘‘इतने चक्कर में पड़ने के बजाय तुम जादूगर अशोक से क्यों नहीं मिल लेते. जितना अच्छा सामान उस के पास मिल जाएगा,  उतना अच्छा शायद कहीं और न मिल पाए.’’

‘‘ठीक है, हमें तो सामान चाहिए, अशोक से ही ले लेता हूं.’’ गैरी ने कहा.

इस के बाद तीनों इधरउधर की बातें करते हुए गैरी के घर पहुंचे. पहले तो तीनों ने जादू की वीडियो कैसेट देखी, जिस में 1 विदेशी जादूगर के जादू के खेलों का बहुत अच्छा प्रदर्शन था. कैसेट देखने के बाद गैरी ने कुलविंदर से जादूगर अशोक को फोन करने को कहा. कुलविंदर ने पंचकूला स्थित अशोक की दुकान पर फोन किया तो वह दुकान पर ही मिल गया. कुलविंदर ने गैरी के शो के बारे में बता कर जादू के कुछ सामान के लिए कहा तो वह बोला, ‘‘रात 9 बजे सेक्टर 30 के अहाते में आ जाना, 2-2 पैग भी लगाएंगे और वहीं इस बारे में बात भी कर लेंगे.’’

चंडीगढ़ के सेक्टर-46सी में रहने वाले मोहनलाल अरोड़ा के परिवार में पत्नी आशा रानी के अलावा 4 बेटे और 2 बेटियां थीं. 6 संतानों में सब से बड़ा बेटा अशोक था. उसे बचपन से ही जादूगर बनने का शौक था. शायद इसी वजह से उस ने जादू के तमाम खेल सीख लिए थे. इस में अविश्वसनीय बात यह थी कि उस ने जादू किसी से सीखा नहीं था. उस का दिमाग इतना तेज था कि वह एक बार जो देख लेता था, जरा सी देर में उसे हूबहू दोहरा देता था. दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद वह पिता के साथ सेक्टर-18 स्थित उन की स्वर्णकारी की दुकान पर बैठने लगा था. सन 1985 में उस की नमिता से शादी हो गई तो जल्दी ही वह एक बेटे वरुण का बाप बन गया. 1996 में उस ने पंचकूला के सेक्टर-15 में महारानी ज्वैलर्स नाम से अपनी अलग दुकान खोल ली.

आशोक की दुकान बढि़या चल रही थी, लेकिन उस का जादू का शौक गया नहीं था. अब तक जादू के खेल में उस ने न केवल महारत हासिल कर ली थी, बल्कि उसे काफी लोकप्रियता भी मिल गई थी. चंडीगढ़ के बड़ेबड़े स्कूलों में उस ने जादू के तमाम शो किए थे. सेक्टर-17 के परेड ग्राऊंड में भी उस ने हजारों लोगों की उपस्थिति में जादू के कई कार्यक्रम किए थे. विदेशों में भी उस ने कुछ शो किए थे, जिस से उसे काफी प्रसिद्धि मिल गई थी. जादू के खेलों में इस्तेमाल किए जाने वाले बेशकीमती सामानों की उस के पास भरमार थी.

इस के बावजूद स्वर्णकारी की अपनी दुकान की वजह से अशोक को जादू के खेल के आयोजनों के लिए समय निकालना मुश्किल हो गया. फिर भी उस के जादूगर दोस्त कभीकभी उस से मिलने आते रहते थे. वे अशोक से जादूगरी का करतब तो सीखते ही थे, जरूरत पड़ने पर सामान भी किराए पर ले जाते थे. अशोक खुले दिल का इंसान था, इसलिए उस ने कभी अपने किसी जादूगर दोस्त को निराश नहीं किया. ऐसे में ही 21 मई, 2000 को कुलविंदर का फोन आया तो अशोक ने रात 9 बजे सेक्टर-30 के अहाते में मिलने के लिए कह दिया था.

उसी रात खाना खाने के बाद अशोक अपने छोटे भाई मुकेश अरोड़ा के साथ घर के पीछे के कंपाउंड में बैठा बातें कर रहा था. तभी एक मारुति कार वहां आ कर रुकी. उस समय साढ़े 11 बज रहे थे. उस वक्त उस के पिता और उस के पड़ोसी निर्मल सिंह भी वहीं बैठे थे. कार से 4 युवक निकल कर अशोक के पास आए और चारों ने एक साथ कहा, ‘‘अशोक, तुम हमारे साथ चलो.’’

चारों ने अशोक से जिस तरह साथ चलने को कहा था, वहां बैठे सभी लोगों को बड़ा अजीब लगा था. लिहाजा मुकेश ने भाई से उन के बारे पूछा. अशोक ने कहा कि ये उस के दोस्त हैं और इन के नाम गुरविंदर सिंह गैरी, लखबीर सिंह, रणबीर सिंह और कुलविंदर सिंह हैं. साथ ही यह भी बताया कि मोहाली के रहने वाले ये लड़के उस से जादू सीखा करते हैं. इस के बाद चारों अशोक को एक किनारे ले जा कर बातें करने लगे. कुछ देर बाद अशोक ने मुकेश के पास आ कर कहा, ‘‘अभी मैं जादू का एक आइटम सिखाने इन के साथ जा रहा हूं. तुम लोग आराम से सो जाना. मुझे आने में शायद थोड़ी देर हो जाए.’’

‘‘लेकिन तुम जा कहां रहे हो?’’ मुकेश ने पूछा.

‘‘मैं मोहाली के फेज-7ए जा रहा हूं. घबराने की कोई बात नहीं है, ये सभी मेरे खास दोस्त हैं.’’

इतना कह कर अशोक उन लोगों के साथ उन की कार में बैठ कर चला गया.

कुछ देर बाद मुकेश भी पिता के साथ कंपाउंड से उठा और अंदर चला गया. निर्मल सिंह भी अपने घर चले गए. अब तक अशोक के घर के सभी लोग सो चुके थे. अपनेअपने बिस्तर पर पहुंच कर थोड़ी देर में मुकेश और उस के पिता भी सो गए. सुबह मुकेश की आंख खुली तो पता चला कि आशोक अभी तक लौट कर नहीं आया. जाते समय अशोक ने जिस तरह बात की थी, उस से उन लोगों को चिंता हो रही थी. फिर भी उन लोगों ने सोचा कि कुछ देर और इंतजार कर लेते हैं, उस के बाद देखते हैं. लेकिन जब 10 बजे तक भी अशोक नहीं लौटा तो मुकेश से रहा नहीं गया और वह अपने एक पड़ोसी को साथ ले कर अशोक की तलाश में मोहाली के फेज-7 की ओर चल पड़ा.

मुकेश पड़ोसी के साथ सेक्टर 45-46 के चौक पर पहुंचा तो उसे कुलविंदर सिंह मिल गया. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. ऐसा लग रहा था, वह डर के मारे कांप रहा है. मुकेश ने उसे रोक कर उस की इस हालत के बारे में पूछा तो उस ने डरते हुए कहा, ‘‘रात 12 बजे गैरी की कोठी पर अशोक का गैरी, लखबीर और रणबीर से झगड़ा हो गया. उस समय सभी शराब पी रहे थे. शराब पीते हुए तीनों अशोक से जादू के आइटम सीखने की जिद करने लगे. अशोक ने कहा कि इतने कम समय में और इस हालात में वे आइटम नहीं सिखाए जा सकते.

जब वे नहीं माने तो एक आइटम दिखाते हुए अशोक ने गैरी की सोने की अंगूठी गायब कर दी. तीनों ने गैरी की उस अंगूठी के बारे में पूछा तो अशोक ने कहा कि अब वह नहीं मिल सकती. शराब के नशे में होने की वजह से वे अशोक की पिटाई करने लगे. उन लोगों ने अशोक को इतना मारा कि …’’

कुलविंदर कुछ और कहता, परेशानी की उस हालात में मुकेश ने उस की बात बीच में ही काट कर पूछा, ‘‘फिलहाल अशोक कहां है, उसे बहुत ज्यादा चोटें आई हैं क्या? हमें जल्दी से उस के पास ले चलो.’’

कुलविंदर ने रोते हुए कहा,‘‘अब मैं आप को किस अशोक के पास ले चलूं? डंडों से पिटाई के बाद वे रसोई से चाकू ले आए और उसी चाकू से उसे मार डाला. अशोक को मार कर उन्होंने कस्सी और कुल्हाड़ी से उस की दोनों बांहें, टांगें और गर्दन काट कर धड़ सहित कार में डाल लिया. मैं उन लोगों के साथ जाना तो नहीं चाहता था, पर उन्होंने मुझे भी जबरदस्ती कार में बैठाया और गांव मौली के बगल से बहने वाले गंदे नाले पर ले गए. वहां उन्होंने अशोक के शरीर के टुकड़ो को अलगअलग जगहों पर फेंक दिया. जबकि सिर कार में ही पड़ा रहने दिया. इतना सब करते करते सुबह के 4 बज गए. फेज-11 के पास उन्होंने कार रोक कर मुझे उतार दिया और खुद अशोक के सिर को ठिकाने लगाने के लिए कहीं चले गए.’’

‘‘हे भगवान.’’ दोनों हाथों से अपना सिर थाम कर मुकेश ने कहा और जमीन पर बैठ कर रोने लगा. इस के बाद कुलविंदर ने उसे चुप कराते हुए कहा, ‘‘गैरी, लखबीर और रणबीर ने अशोक की हत्या करने के बाद उस की अंगूठियां, ब्रेसलेट और सोने की चेन उतार ली थी. लड़ाईझगड़े में अशोक का रिवाल्वर गिर गया था, जिसे गैरी ने ले लिया था.’’

मुकेश ने किसी तरह खुद को संभाल कर पूछा, ‘‘तुम ने इस घटना के बारे में पुलिस को इन्फौर्म किया?’’

‘‘अभी नहीं, दरअसल मैं इतना डर गया था कि पुलिस के पास जाने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई. इस के अलावा मुझे यह भी डर लग रहा था कि कहीं वे मुझे भी न मार दें. क्योंकि वे मुझे धमकी दे रहे थे कि अगर इस हत्या के बारे में मैं ने किसी को कुछ बताया तो वे मेरा भी वही हाल करेगें, जो अशोक का किया है. यही वजह थी कि जहां उन लोगों ने मुझे कार से उतारा था, कई घंटे तक मैं वहीं छिपा बैठा रहा. अभी कुछ देर पहले ही वहां से निकल कर मैं सीधे आप लोगों के पास ही जा रहा था कि आप मिल गए.’’

‘‘चलो, पहले थाने चलते हैं.’’ मुकेश ने कहा.

इस के बाद मुकेश कुलविंदर को भी अपने साथ ले कर मोहाली की ओर चल पड़ा. वे अंबवाले चौक के पास पहुंचे थे कि मोहाली के थाना सेंट्रल के थानाप्रभारी इंसपेक्टर प्रीतम सिंह सहयोगियों के साथ मिल गए. मुकेश ने उन्हें सारी बात बताई तो उन्होंने मामला फ्लैश करवा कर मुकेश की शिकायत दर्ज करने के लिए उस की तहरीर थाने भिजवा दी और खुद टीम को साथ घटनास्थल की ओर चल पड़े. गैरी के मकान पर ताला लटक रहा था. खिड़की का कांच तोड़ कर एक पुलिस वाले को अंदर भेजा गया, जिस ने अंदर से दरवाजा खोला. इस के बाद मकान की तलाशी ली गई तो खून सनी चादर, कस्सी, शराब की बोतल और जगहजगह खून के धब्बे देख कर पुलिस को विश्वास हो गया कि कुलविंदर ने जादूगर अशोक के भाई मुकेश को जो बताया है, वह एकदम सही हैं. इसी के साथ पुलिस को यह भी शक हुआ कि अशोक के कत्ल में कुलविंदर भी शामिल था.

अब यह खुद को बचाने के लिए नाटक कर रहा है. फिलहाल इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह कुलविंदर और मुकेश को साथ ले कर अशोक की लाश के टुकड़े बरामद करने चल पड़े. मोहाली के नजदीक मौली गांव के गंदे नाले से अशोक का धड़ बरामद हो गया. थाना सेंट्रल में जादूगर अशोक की हत्या का मुकदमा गैरी, लखबीर, रणबीर और कुलविंदर के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. पुलिस ने कुलविंदर को हिरासत में ले कर अदालत में पेश किया, जहां से पूछताछ के लिए उसे 3 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले लिया गया. थाने में की गई पूछताछ में कुलविंदर बताया कि वह मोहाली के फेज-11 के मकान नंबर-1353 में रहता था. उस के पिता का नाम जोगेंद्र सिंह था.

दसवीं पास करने के बाद वह इन दिनों सेक्टर-10 के एक पैट्रोलपंप पर नौकरी कर रहा  था. उसे जादू सीखने का शौक था, जिस की वजह से मरने तथा मारने वालों से उस की दोस्ती हो गई थी. इस पूछताछ में कुलविंदर सिंह ने वही सब बताया, जो वह मुकेश को पहले बता चुका था. लेकिन पुलिस वालों को उस की इन बातों पर यकीन नहीं हो रहा था. इसलिए पुलिस ने उस की रिमांड अवधि बढ़वा ली. पुलिस ने उस पर काफी दबाव डाला, पर वह लगातार यही कहता रहा कि जादूगर अशोक की हत्या में वह शामिल नहीं था.

इसी पूछताछ में जादूगर प्रदीप का नाम सामने आया. पुलिस ने प्रदीप से भी पूछताछ की. उस ने पुलिस को दिए अपने बयान में प्रदीप ने बताया था कि गुजरात का प्रसिद्ध जादूगर स्वामी राव पिछले दिनों चंडीगढ़ आया था. वह और अशोक उस से मिलने सेक्टर-17 गए थे. इस के बाद उन्होंने गैरी को भी उस से मिलवाया था. स्वामी राव के जादू के करतबों से गैरी इतना प्रभावित हुआ कि वह उस से कुछ नए आइटम्स सिखाने की जिद करने लगा. आखिर तय हुआ कि 22 मई को वे सभी एक साथ स्वामी राव के पास जा कर जादू के नए आइटम्स सीखेंगे.

21 मई को कुलविंदर ने अशोक को पंचकूला स्थित उस की दुकान पर फोन किया तो अशोक ने अहाते में मिलने को कहा था. इस के बाद गैरी और कुलविंदर ने उसे उस के घर छोड़ दिया. इस के बाद वे कहां गए, उसे मालूम नहीं. प्रदीप के बताए अनुसार, उस शाम सुखना लेक पर उस का शो था. वह उस की तैयारी में जुट गया. शाम 6 बजे से 8 बजे तक वह अपने शो में व्यस्त रहा. वहां से वह सीधे शिवालिक व्यू होटल चला गया, जहां वह रात के साढ़े 10 बजे तक व्यस्त रहा. इस के बाद वह घर जा कर सो गया.

अगले दिन वह तय समय पर जादूगर स्वामी राव के पास पहुंच गया, लेकिन अशोक गैरी, लखबीर, रणबीर और कुलविंदर नहीं आए. घंटों इंतजार के बाद भी जब वे नहीं आए तो वह लौट कर अपने कामों में लग गया. रात 11 बजे घर आ कर वह इत्मीनान से सो गया. अगले दिन अखबारों से उसे पता चला कि अशोक के साथियों ने ही उस का कत्ल कर दिया है. डर की वजह से वह अशोक के यहां भी नहीं जा सका. मोहाली उन दिनों जिला न हो कर रोपड़ का एक सब डिवीजन था. जिला रोपड़ के एसएसपी गुरप्रीत सिंह भुल्लर थे. उन्होंने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए एक विशेष टास्क फोर्स गठित कर दिया था, जिस से मामले की गहराई में पहुंच कर अभियुक्तों को जल्दी से जल्दी गिरफ्तार किया जा सके.

टास्क फोर्स मामले को हल करने के लिएजीजान से जुट गई. 23 मई को इस टीम ने गांव पापड़ी के पास एक वीरानी जगह से अशोक की टांगें बरामद कर लीं. इस के अगले दिन फेज-9 के इंडस्ट्रियल एरिया के पास बहने वाले नाले से अशोक के हाथ भी बरामद हो गए. लेकिन न शरीर के बाकी हिस्से मिले और न ही हत्यारों का पता चल सका. 2 जून को अशोक के शरीर के बरामद अंग पुलिस ने अंतिम संस्कार के लिए उस के घर वालों को सौंप दिए. 3 जून को घर वालों ने उस का दाहसंस्कार कर दिया. इसी के साथ शरीर के वे अंग अशोक के ही हैं, इस का पता लगाने के लिए पुलिस ने नमूना ले कर डीएनए टेस्ट के लिए हैदराबाद की फोरैंसिक लैबोरेटरी भिजवा दिया था.

बाद में रिपोर्ट आने पर साबित हो गया कि शरीर के वे टुकड़े जादूगर अशोक के शरीर के ही थे. पुलिस जांच में जो निष्कर्ष निकल कर सामने आया, उस के हिसाब से अशोक की हत्या की कहानी कुछ प्रकार थी. गैरी, रणबीर, लखबीर और कुलविंदर 21 मई, 2000 की रात 9 बजे जादूगर अशोक से मिलने चंडीगढ़ के सेक्टर-30 के अहाते में पहुंचे, जहां इन लोगों ने शराब पी. इस के बाद जादू का कोई आइटम दिखाने की बात चली तो अशोक ने गैरी की सोने की अंगूठी गायब कर दी. उस समय बात आईगई हो गई. लेकिन घर पहुंच कर खाना खाते समय गैरी का ध्यान अपने हाथ की अंगुली पर गया तो उसे अपनी अंगूठी की याद आई. इस के बाद वह अपने तीनों दोस्तों को साथ ले कर अशोक को उस के घर से बुला लाया.

वह उसे अपने घर न ले जा कर मोहाली के फेज-7 स्थित अपने पिता के घर ले गया, जहां गैरी ने अशोक को शराब पिला कर अपनी अंगूठी के बारे में पूछा. तब अशोक ने हंसते हुए कहा कि अंगूठी तो अब कल ही मिल सकती है. उस के इस जवाब पर गैरी को गुस्सा आ गया तो वह उसे  गालियां देने लगा. यही नहीं, वह उसे मारने के लिए भी दौड़ा. तब अशोक ने अपने बचाव के लिए लाइसेंसी रिवाल्वर निकाल ली. फिर क्या था, गैरी और उस के साथी उस पर पिल पड़े. इस के बाद उन्होंने अशोक की हत्या कर दी और उस के शव के टुकड़े यहांवहां फेंक कर गैरी, लखबीर और रणबीर फरार हो गए.

पुलिस को अपने सूत्रों से पता चला कि अशोक के हत्यारे दिल्ली में कहीं छिपे हैं. मोहाली पुलिस की एक विशेष टीम दिल्ली गई. पुलिस टीम को पता चला था कि गैरी का दिल्ली में मकान है, जहां हत्या के बाद कई दिनों तक 3 लोग ठहरे थे. उन के पास काले रंग की मारुति 1000 कार भी थी, लेकिन वे उस कार का उपयोग बिलकुल नहीं कर रहे थे. 4 जून को ओल्ड राजेंद्रनगर स्थित उस मकान पर मोहाली पुलिस ने छापा मारा. लेकिन वहां कोई नहीं मिला. कार जरूर वहां खड़ी थी. कार के निरीक्षण में पुलिस ने पाया कि उस पर काफी धूल जमी थी. कार के अंदर जगहजगह खून के धब्बे भी थे.

पुलिस को संदेह था कि तीनों हत्यारे विदेश भाग गए हैं, लेकिन इस सफलता के बाद पुलिस को लगा कि हत्यारे भारत में ही कहीं छिपे हैं. अब तक की भागदौड़ से पुलिस ने वांछित हत्यारों के बारे में कुछ व्यक्तिगत जानकारियां जुटा ली थीं. लखबीर और रणबीर सगे भाई थे. लखबीर बीए पास था और फेज-7 की मोटर मार्केट में औफिस खोल कर विदेशी गाडि़यों की खरीदफरोख्त का काम करता था. बीए करने के बाद रणबीर भी भाई के काम में हाथ बंटाने के साथ जादूगरी आदि करने लगा था. उन दिनों वह एक जापानी कंपनी से जुड़ा था. इस के बावजूद दोनों भाई जादू के और आइटम सीखने के चक्कर में लगे रहते थे.

लेकिन गुरविंदर सिंह उर्फ गैरी का आचरण एकदम अलग था. जिस कोठी में जादूगर अशोक का कत्ल हुआ था, वह उस के पिता हरभजन सिंह की थी. कोठी के आसपास रहने वालों के अनुसार, वह अलग किस्म के आदमी थे. 70 बरस की उम्र में भी वह अखबारों में अपनी शादी के विज्ञापन दिया करते थे, जबकि उन की पत्नी करतार कौर विदेश में रह रही थीं. गैरी की पत्नी भी इंग्लैंड में रहती थी. मोहाली के फेज-3बी में गैरी की अपनी कोठी थी, लेकिन अशोक की हत्या उस ने अपने पिता की कोठी में की थी पुलिस को मिली जानकारी के अनुसार, गैरी खूंखार प्रवृत्ति का आदमी था. अपने घर में उस ने सांप, बंदर, मछलियां, कुत्ते, कबूतर और तीतर आदि तो पाल ही रखे थे, एयरगन से इन का शिकार करने में उसे विशेष आनंद आता था. जानवरों को आपस में लड़वाना भी उस का खास शौक था.

गैरी को दूसरों को यातनाएं देने में भी बड़ा मजा आता था. उस की स्थिति मानसिक तौर पर बीमार बिगड़े नवाबों जैसी थी. पहले वह भी इंग्लैंड में रहता था. गैरी के पूर्व नौकर रमेश के अनुसार, वह गैरी की क्रूरता का शिकार हो चुका था. रमेश के बताए अनुसार, गैरी की फितरत समझ पाना बहुत मुश्किल था. सीधेसरल अंदाज में बैठा यह आदमी कब क्या कर बैठे, इस की कल्पना नहीं की जा सकती थी. रमेश के बताए अनुसार, वह 1995 तक मोहाली के फेज-7 स्थित रैडीमेड कपड़ों की एक दुकान पर अच्छीभली नौकरी कर रहा था. बदकिस्मती से एक दिन उस की मुलाकात गैरी से हुई तो उस ने उस से कपड़े का कारोबार करने की बात कह कर उसे मोटी तनख्वाह देने का लालच दिया.

रमेश लालच में आ गया और अपनी अच्छीभली नौकरी छोड़ कर गैरी के पास आ पहुंचा. कुछ दिन तो ठीकठाक गुजरे. उस के बाद एक दिन अपना कैमरा चोरी होने का आरोप लगा कर वह उस की पिटाई करने लगा. यही नहीं, चंडीगढ़ पुलिस के अपने एक परिचित सबइंसपेक्टर को बुला कर उस ने उसे बुरी तरह टार्चर करवाया. टांगों के नीचे डंडे रख कर उस के कंधों पर बैठ कर उसे ऐसी पीड़ा दी गई कि उस के बारे में बताते हुए उस की आंखों में आंसू छलक आए. रमेश ने आगे बताया कि जब उस की इतनी पिटाई के बाद भी कुछ हासिल नही हुआ तो गैरी ने उसी तरह अपने नेपाली नौकर बहादुर को प्रताडि़त किया. यातना की वजह से मौत को सिर पर मंडराते देख बहादुर ने कैमरा चोरी का आरोप स्वीकार कर लिया.

इस के बाद गैरी ने उस से कैमरे के बारे में पूछा तो उस ने झूठमूठ सेक्टर-45 का एक पता बता दिया. गैरी और सबइंसपेक्टर उस पते पर पहुंचे तो वहां एक बैंक अधिकारी रहता था. उस ने हंगामा मचाया तो दोनों वहां से भाग खड़े हुए. उस अधिकारी की शिकायत पर मामला दर्ज हुआ, जिस की जांच के बाद सबइंस्पेक्टर निलंबित हो गया. पुलिस ने रमेश से भी मुकदमा दर्ज कराने को कहा, लेकिन उस ने यह कह कर मना कर दिया कि उस की  जान बच गई यही क्या कम है. वह शिकायत कर के बड़े लोगों से दुश्मनी नहीं निभा सकता.

इंसपेक्टर प्रीतम सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम ने फेज-3बी स्थित गैरी की कोठी का ताला तोड़वा कर तलाशी ली तो वहां हैरान कर देने वाले अविश्वसनीय तथ्य सामने आए. मोहाली के ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट संजय अग्निहोत्री की अनुमति पर मारे गए इस छापे में पुलिस ने गैरी की कोठी से न केवल आधा किलो चरस, महंगी विदेशी शराब की बोतलें और हथियार बरामद किए, बल्कि छिपा कर रखी एक हथकड़ी भी बरामद की. एक एनआरआई के घर से इस तरह हथकड़ी का मिलना पुलिस के लिए पहेली जैसा बन गया था. इस का खुलासा गैरी की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में ही हो सकता था.

खैर, गैरी की कोठी में हुई तलाशी में इस सब के अलावा पौन किलोग्राम सोना और सोने का एक बिस्कुट भी पुलिस के हाथ लगा. घर के एक हिस्से में बना एक आलीशान स्विमिंग पूल गैरी की शानोशौकत की जीतीजागती मिसाल था. वहां एक ऐसा शाही बिस्तर बिछा था, जिस की कीमत लाखों में आंकी गई. यह बिस्तर एक्युप्रेशर पद्धति पर आधारित था. ड्राइंगरूम में बाघ की असली खाल के अलावा हिरण और बारहसिंगे के सिर और पैर तरतीब से सजाए हुए थे. यहीं एक बार भी बना था, जिस में विदेशी शराब की बोतलें भरी पड़ी थीं. इलैक्ट्रौनिक्स सामान तो इस कद्र भरा पड़ा था कि पुलिस के लिए उस की सूची बना पाना कठिन हो रहा था.

तलाशी में मिले सामान को कब्जे में ले कर पुलिस ने गैरी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 20/61/88, आबकारी अधिनियम की धारा 6/1/14 एवं आर्म्स एक्ट की धाराओं 25/54/59 के अंतर्गत मामले दर्ज कर लिए. अलबत्ता एनिमल्स एक्ट एवं वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन के तहत सबूतों के अभाव में कोई मामला दर्ज नहीं किया गया. मोहाली का यह एक ऐसा सनसनीखेज मामला था, जो उन दिनों लगातार अखबारों की सुर्खियां बना रहा. इस में सब से निराशाजनक पहलू यह रहा कि तमाम कोशिशों के बावजूद मोहाली पुलिस गैरी, लखबीर और रणबीर को गिरफ्तार नही कर सकी. कुलविंदर को चश्मदीद गवाह बना लिया गया था. आखिर 12 सितंबर, 2000 को गैरी, लखबीर और रणबीर को फरार अपराधी घोषित कर दिया गया.

देखतेदेखते इस मामले को घटित हुए 15 साल लंबा अरसा गुजर गया. अपराधी जाने किस गुफा में घुस कर बैठ गए थे. इतना समय बीत जाने के बाद भी उन के बारे मे कहीं कुछ पता नहीं चला था. गुरप्रीत सिंह भुल्लर अन्य कई जगहों से तबादला होते हुए एक बार फिर यहां के एसएसपी बने. एसएसपी मोहाली के रूप में उन्होंने यहां के कई अनसुलझे मामलों को खंगाला. जादूगर अशोक हत्याकांड की फाइल सामने आते ही उन्हें इस मामले की एकएक बात याद आ गई. पुलिस के लिए यह शरम की बात थी कि 15 साल पहले इस जघन्य अपराध की जांच जहां थी, आज भी वहीं थी. एसएसपी भुल्लर ने एक बार फिर इस मामले की जांच की जिम्मेदारी जिले के सीआईए इंस्पेक्टर गुरचरण सिंह को सौंप दी.

गुरचरण सिंह ने एसआई हरभजन सिंह के नेतृत्व में एक विशेष टीम का गठन कर जादूगर अशोक हत्याकांड की फाइल फिर से खोल दी. अन्य प्रयासों के साथ हरभजन सिंह ने अपने मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया. इसी 23 अप्रैल, 2015 की शाम करीब साढ़े 4 बजे एसआई हरभरज सिंह, एएसआई पवन कुमार, हवलदार सतीश कुमार, दर्शन सिंह और रसजीत के साथ रूटीन गश्त में गांव दाऊं के मोड़ पर मौजूद थे कि उन के एक विश्वस्त मुखबिर ने आ कर उन्हें एक ऐसी सूचना दी, जो हैरान करने वाली थी.

सूचना के अनुसार, जादूगर अशोक हत्याकांड का वांछित अभियुक्त गुरविंदर सिंह उर्फ गैरी अपनी जायदाद बेचने के लिए अपने कुछ साथियों के साथ मोहाली आया हुआ था. 15 साल के अंतराल में उस की सूरत थोड़ी बदल गई थी. खुली दाढ़ी, सामान्य कपड़ों में उस ने अपना हुलिया काफी बदल रखा था. मुखबिर ने उन्हें बताया था कि उस ने उस आदमी के बारे में काफी गहराई से पता किया है.  चौंकाने वाली बात यह है कि वह आदमी असली गैरी नहीं है. वह सारे दस्तावेज तैयार करा कर खुद को गुरविंदर सिंह गैरी साबित कर के उस की जमीन जायदाद बेचने की कोशिश कर रहा है. इस के लिए उस ने कई लोगों से लाखों रुपए एडवांस भी ले लिए हैं.

मुखबिर का कहना था कि ठगी का यह काम करने वाले उस आदमी का अपना एक गिरोह है. एसआई हरभजन सिंह ने तुरंत यह जानकारी इंसपेक्टर गुरचरण सिंह को दी. उन्होंने एसएसपी हरप्रीत सिंह भुल्लर से संपर्क किया तो उन्हें दिशानिर्देश के साथ काररवाई करने का आदेश मिल गया. अधिकारियों का निर्देश और आदेश मिलते ही हरभजन सिंह ने मुखबिर से मिली जानकारियों के आधार पर एक तहरीर तैयार कर थाना बलौंगी भिजवा दी, जहां अपराध भादंवि की धाराओं 410, 420, 465, 467 478, 471 एवं 120 बी के तहत कुल 9 लोगों गुरविंदर सिंह, बूटा सिंह, जगतार सिंह, उत्तम सिंह, हरभजन सिंह, लाला पटवारी, सुक्खी पत्नी अमरजीत सिंह, बंटी और हरबंस डीलर के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो गया.

हरभजन सिंह ने अपने साथियों के साथ मुखबिर द्वारा बताई जगह पर छापा मार कर 4 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. बाकी लोग उन के वहां पहुंचने से पहले ही चले गए थे. जो 4 लोग पकड़े गए, उन के नाम थे गुरविंदर सिंह, जगतार सिंह, उत्तम सिंह और हरभजन सिंह, इन्हें अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 4 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले लिया गया. हरभजन सिंह और इंसपेक्टर गुरचरण सिंह के अलावा एसएसपी भुल्लर ने भी इन से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की. इस पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह थोड़ा हैरान करने वाली थी.

गुरप्रीत सिंह मूलरूप से डूगरी, लुधियाना का रहने वाला था. गुजारे लायक पढ़ाई करने के बाद वह छिटपुट काम करते हुए दुबई चला गया. वहां से कुछ समय पहले वह लौटा तो उस की मुलाकात पंचकूला निवासी अमरजीत सिंह से हुई, जिस ने खुद को पंजाब पुलिस का कर्मचारी बताया. उस ने यह भी बताया कि उस की नियुक्ति खेल कोटे से हुई थी. गुरप्रीत सिंह को उस ने एक फायदे की बात यह बताई कि आपराधिक मामलो में फंस कर कई बार लोग पुलिस की मार से बचने के लिए अपनी जमीनजायदाद छोड़ कर भूमिगत हो जाते हैं. ऐसे में नकली दस्तावेज तैयार करा कर इस तरह की संपत्ति को बेच कर मोटा पैसा कमाया जा सकता है.

बात जंच गई तो गुरप्रीत और अमरजीत ने अपना एक गिरोह बना लिया. उन का यह धंधा चल निकला. मगर अचानक अमरजीत की मौत हो गई तो उस की पत्नी सुक्खी को इस गिरोह में शामिल कर लिया गया, जिसे जादूगर अशोक हत्याकांड वाले मामले की काफी जानकारी थी. उस का कहना था कि इस मामले का मुख्य आरोपी गैरी बहुत अमीर आदमी था. चंड़ीगढ़ और मोहाली में उस की काफी प्रौपर्टी थी, जिसे छोड़ कर वह विदेश भाग गया था और अब वह कभी वापस आने वाला नहीं था. जैसेतैसे इन लोगों ने गैरी की फोटो जुटा ली तो यह बात सामने आई कि उस की शक्ल गिरोह के सदस्य गुरप्रीत से एकदम मेल खा रही है. दोनों को हमशक्ल कहा जा सकता था.

इस के बाद योजना बना कर गुरप्रीत की फोटो के साथ गुरविंदर सिंह गैरी के नाम से वोटर कार्ड के अलावा अन्य जाली दस्तावेज तैयार करा लिए गए. इस तरह गुरप्रीत को गैरी बना कर उस की प्रौपर्टी बेचने की कोशिश में एडवांस के रूप में इन्होंने 60 लाख रुपए इकट्ठा कर लिए. दरअसल ये लोग प्रौपर्टी की कीमत मार्केट रेट से इतनी कम बताते थे कि लोग इन के झांसे में आसानी से आ जाते थे. गिरफ्त में आए 4 लोगों से हुई पूछताछ के बाद इन की निशानदेही पर पुलिस ने वह पैसा बरामद कर लिया था. अभियुक्त उत्तम सिंह निवासी गांव आलमपुर जिला पटियाला, हरभजन सिंह निवासी गांव तलबड़ी, जिला मोहाली और जगतार सिंह निवासी हरपालपुर, जिला पटियाला साधारण परिवारों से थे. सभी शादीशुदा और बालबच्चेदार हैं.

पढ़ाई भी इन्होंने गुजारे लायक कर रखी है. छिटपुट काम करते हुए अपने गुजारे लायक कमाई भी कर रहे थे. बिना मेहनत के रातोरात अमीर बनने के लालच ने इन की मति मारी गई थी. पुलिस ने पकड़े गए चारों अभियुक्तों से पूछताछ कर के इन्हें पुन: अदालत में पेश किया, जहां से सभी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. पुलिस को अब अन्य अभियुक्तों बूटा सिंह, लाला पटवारी, बंटी, हरबंस डीलर और सुक्खी की तलाश है. ठगी करने वाले भले ही पकड़े गए, मगर अफसोस की बात यह है कि जादूगर अशोक हत्याकांड का एक भी अभियुक्त अभी तक पकड़ा नहीं जा सका. Chandigarh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Hindi Crime Stories: आशिकी में पति दफन

Hindi Crime Stories: जिस सुख और आनंद के लिए सुदेवी ने प्रेमी के साथ साजिश रच कर पति को ठिकाने लगवा दिया, क्या वह सुख उसे मिल सका…

एसपी (रूरल) सुरेंद्रनाथ तिवारी थाना महराजगंज निरीक्षण के लिए आए थे, तभी एक लड़का और एक औरत थाने पहुंची. दोनों काफी घबराए हुए थे. उन्हें देख कर ही लग रहा था कि वे किसी बड़ी मुसीबत में हैं. सुरेंद्रनाथ की नजर उन पर पड़ी तो उन्होंने दोनों को अपने पास बुला कर पूछा, ‘‘कहो, क्या बात है? जो भी परेशानी हो, सचसच बताओ?’’

लड़का हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘हुजूर, मेरा नाम दिनेश है.’’ इस के बाद औरत की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘यह मेरी भाभी सुदेवी है. हम लोग थाना बिठूर के गांव हिंगूपुर से आए हैं. 21 अप्रैल को मेरा बड़ा भाई हरिश्चंद्र थाना महराजगंज के गांव जाना के रहने वाले अपने साढू मंगू के यहां गया था, तब से उस का कुछ पता नहीं है. हम ने उसे हर जगह खोज लिया है. मंगू ने ही भैया को गांव में लगने वाला मेला देखने को बुलाया था.’’

सुरेंद्रनाथ तिवारी को लगा कि सुदेवी भी कुछ कहना चाहती है, इसलिए उन्होंने उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘तुम भी कुछ कहना चाहती हो क्या? लेकिन एक बात का ध्यान रखना, जो भी कहना, सचसच कहना.’’

‘‘जी हुजूर,’’ सुदेवी बोली, ‘‘21 अप्रैल को जब मैं कन्नौज में अपनी बुआ की बेटी के यहां थी तो उन्होंने फोन कर के बताया था कि वह जाना में साढू के यहां मेला देखने आए हैं. आज घर लौटने को कहा था. लेकिन जब वह घर नहीं लौटे और फोन पर भी बात नहीं हुई तो मैं 23 अप्रैल को जाना गई और जीजा और उन के घर वालों से उन के बारे में पता किया. उन लोगों ने बताया कि उन्हें उस दिन शाम को सर्वेश के साथ देखा गया था.’’

‘‘यह सर्वेश कौन है?’’ एसपी साहब ने पूछा.

‘‘हुजूर, सर्वेश मेरे बहनोई का भतीजा है. मेरे ऊपर उस की नीयत खराब थी, जिस की वजह से एक बार मेरे पति ने उसे डांटा भी था. मुझे लगता है कि सर्वेश ने ही उन का अपहरण कर लिया है या फिर मार डाला है.’’

मामला गंभीर था, इसलिए सुरेंद्रनाथ तिवारी ने थानाप्रभारी जीवाराम को आदेश दिया कि तुरंत जाना जा कर सर्वेश को पकड़ कर सख्ती से पूछताछ करें, जिस से हरिश्चंद्र के बारे में पता लग सके. जीवाराम ने एसआई आर.के. सिंह, सरिता मिश्रा, सिपाही बृजेशचंद्र शर्मा, आशित कुमार तथा राजेंद्र कुमार सिंह को साथ लिया और जाना जा कर सर्वेश के घर छापा मारा. सर्वेश उस समय घर पर ही था, इसलिए जीवाराम उसे पकड़ कर थाने ले आए. थाने में जब उस से हरिश्चंद्र के बारे में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया. लेकिन वह परेशान जरूर हो उठा. उस के चेहरे पर आई घबराहट से थानाप्रभारी ने भांप लिया कि यह झूठ बोल रहा है.

उन्होंने उस पर दबाव बनाने के लिए कहा, ‘‘तुम्हारे झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है, सुदेवी ने हमें सब बता दिया है. इसलिए तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम भी सब कुछ सचसच बता दो.’’

इस पर सर्वेश ने कहा, ‘‘साहब, हरिश्चंद्र को तो मैं ने मार दिया है. लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जिस सुदेवी ने वादा किया था कि हत्या के इस राज को वह किसी को नहीं बताएगी. उसी ने आप से सब बता दिया. साहब,  हरिश्चंद्र की हत्या मैं ने सुदेवी के कहने पर ही की थी. हम दोनों के बीच नाजायज संबंध थे. हत्या की साजिश हम दोनों ने मिल कर रची थी. हत्या करने के बाद मैं ने सुदेवी को बताया भी था कि हरिश्चंद्र को ठिकाने लगा दिया है.’’

सुदेवी उस समय थाने में ही थी. जीवाराम ने उसे बुला कर जब बताया कि सर्वेश ने हरिश्चंद्र का कत्ल कर दिया है तो वह दहाडे़ मार कर रोने लगी. तब जीवाराम ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘त्रियाचरित्र करने की जरूरत नहीं है. सर्वेश ने हमें यह भी बता दिया है कि तू ने ही साजिश रच कर हरिश्चंद्र की हत्या कराई है.’’

इस के बाद सुदेवी ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो सर्वेश की निशानदेही पर पुलिस ने जाना गांव के बगल से बहने वाले नाले के पास से हरिश्चंद्र का शव बरामद कर लिया. लाश सड़ चुकी थी. वहीं झाडि़यों से वह खून सनी ईंट भी बरामद कर ली गई, जिस से हत्या की गई थी. घटनास्थल की सारी औपचारिक काररवाई निपटा कर थाना महराजगंज पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. सर्वेश और सुदेवी ने हरिश्चंद्र की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया था, इसलिए थाना महराजगंज पुलिस ने मृतक के छोटे भाई दिनेश की ओर से सर्वेश और सुदेवी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस पूछताछ में हरिश्चंद्र की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह एक औरत द्वारा आशिकी में अपना ही सिंदूर उजाड़ने की वाली थी.

कानपुर शहर से 40 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर बसा है कस्बा शिवराजपुर. इसी कस्बे में रामबाबू अपने परिवार के साथ रहता था. इसी रामबाबू की बेटी है सुदेवी. सुदेवी शादी लायक हुई थी तो उस ने उस की शादी कानपुर के थाना बिठूर के गांव हिंगूपुर के रहने वाले छोटेलाल के बड़े बेटे हरिश्चंद्र से कर दी थी. छोटेलाल का खातापीता परिवार था. यह 10-12 साल पहले की बात है. सुदेवी ने जो चाहा था, उसे ससुराल में वह सब कुछ मिल गया था, इसलिए वह खुश थी. सब से बड़ी बात यह थी कि हरिश्चंद्र उसे हद से ज्यादा प्यार करता था. यही हर लड़की का सपना होता है. सुदेवी सचमुच भाग्यशाली थी. पति ही नहीं, ससुराल का हर आदमी उसे बहुत प्यार करता था.

हंसीखुशी से 5 साल बीत गए. इस बीच सुदेवी 2 बेटों, गोल्डी और निखिल की मां बन गई. 2 बच्चों की जिम्मेदारियां बढ़ीं तो हरिश्चंद्र को आय बढ़ाने के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत पड़ने लगी. वह अधिक कमाई के चक्कर में ज्यादा से ज्यादा घर से बाहर रहने लगा. बस, पति का साथ न मिलने की वजह से सुदेवी के कदम बहक गए. हुआ यह कि बरसात में हरिश्चंद्र का घर गिर गया. घर बनवाने के लिए उस ने जाना के रहने वाले अपने साढू गंगू से कोई राजमिस्त्री बताने को कहा तो उस ने कहा, ‘‘साढूभाई राजमिस्त्री तो घर में ही है. हमारा भतीजा सर्वेश बहुत अच्छा राजमिस्त्री है. आजकल वह बड़ेबड़े ठेके ले रहा है. वैसे तो वह खाली नहीं है, लेकिन घर का काम है, इसलिए उसे समय तो निकालना ही पड़ेगा. तुम जब कहो, मैं उसे भेज दूं.’’

‘‘ठीक है भाई, आप ने हमारी एक बहुत बड़ी समस्या हल कर दी. बरसात खत्म होते ही मकान बनवाना शुरू कर दूंगा.’’

28 वर्षीय सर्वेश हृष्टपुष्ट युवक था. वह काम भले राजमिस्त्री का करता था, लेकिन रहता ठाठ से था. सर्वेश रिश्तेदार था. इसलिए हरिश्चंद्र के यहां काम करने आया तो घर में ही रहताखाता और सोता था. सुदेवी उस की मौसी लगती थी, इसलिए वह उस से खूब बातें करता था. मौकेबेमौके हंसीठिठोली भी कर लेता था. सुदेवी भी उस की लच्छेदार बातों में खूब रस लेती थी. बातों ही बातों में दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित होने लगे. धीरेधीरे सर्वेश और सुदेवी के बीच की दूरियां सिमटती चली गईं. दोनों रिश्ते को भूल कर खुल कर हंसीमजाक और छेड़छाड़ करने लगे. कुंवारा सर्वेश जहां मौसी से स्त्री सुख पाने को लालायित रहने लगा था, वहीं पति की उपेक्षा का शिकार सुदेवी सर्वेश की जवानी पर मर मिटी थी.

आग दोनों तरफ लगी थी. बस उन्हें मौके की तलाश थी. एक दिन सुबह से बरसात हो रही थी, जिस की वजह से काम बंद था. हरिश्चंद्र किसी काम से ठिबूर चला गया था और बच्चे भी स्कूल चले गए थे. दोपहर को सर्वेश आंगन में आया तो सुदेवी पेटीकोट और ब्लाउज पहने नहा रही थी. भीगे कपड़े उस के बदन से चिपके हुए थे. उन कपड़ों में सुदेवी का अंगअंग साफ झलक रहा था. सुदेवी इस बात से अनजान थी कि उसे कोई देख रहा है. अचानक सर्वेश उस के सामने आ कर खड़ा हो गया तो उसे फटकारने या शरमाने के बजाय सुदेवी उसे अजीब नजरों से ताकने लगी.

सर्वेश के लिए यह एक तरह का इशारा था. इशारा समझते ही सर्वेश ने बाहर का दरवाजा बंद किया और सुदेवी को उठा कर कमरे में ले आया. इस के बाद मर्यादा की सारी सीमाएं टूट गईं और रिश्ते तारतार हो गए. सर्वेश के साथ यौवन का आनंद मिलने के बाद सुदेवी ने पति हरिश्चंद्र की ओर से मुंह मोड़ लिया. वह हरिश्चंद्र की उपेक्षा करने लगी. बातबात में उस से लड़नेझगड़ने लगी. इस की वजह यह थी कि उसे सर्वेश से जो शारीरिक सुख मिल रहा था, वैसा सुख हरिश्चंद्र काफी दिनों से नहीं दे सका था. सर्वेश हट्टाकट्टा जवान था, जबकि हरिश्चंद की जवानी ढल चुकी थी.

धीरेधीरे सर्वेश सुदेवी की जिंदगी में पूरी तरह से आ गया. घर के लोग इस सब से बेखबर थे. कोई सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा भी हो सकता है. लेकिन जो सोचा नहीं जा सकता था, वैसा हो रहा था. जब भी दोनों को मौका मिलता वे एक हो जाते. यह भी सच है कि एक न एक दिन पाप का घड़ा ऐसा ही अवश्य भरता है. सुदेवी और सर्वेश के साथ भी हुआ. एक दिन रात में हरिश्चंद्र की नींद खुली तो सुदेवी बिस्तर से गायब थी. उतनी रात को पत्नी कहां गई, हरिश्चंद्र सोच में पड़ गया, क्योंकि दरवाजा भी अंदर से बंद था. वह सर्वेश के कमरे में गया तो वह भी नहीं था. इस के बाद हरिश्चंद्र को शक हुआ. कुछ सोच कर वह छत पर गया तो वहां का नजारा देख कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. सुदेवी और सर्वेश आपत्तिजनक स्थिति में थे.

हरिश्चंद्र को देखते ही सर्वेश तो भाग खड़ा हुआ, लेकिन सुदेवी कहां भाग कर जाती. हरिश्चंद्र ने उस की जम कर पिटाई की. शोर सुन कर घर वाले आ गए. जब उन्हें सच्चाई का पता चला तो सब ने सिर पीट लिया. इस के बाद हरिश्चंद सुदेवी पर नजर रखने लगा और सर्वेश के घर आने पर सख्त पाबंदी लगा दी. अब दोनों का मिलना असंभव हो गया, लेकिन फोन पर उन की बातें हो जाती थीं. जब कभी हरिश्चंद्र गांव से बाहर जाता, सुदेवी फोन कर के सर्वेश को बुला लेती. लेकिन हरिश्चंद्र को बच्चों से सर्वेश के आने की खबर मिल ही जाती. तब वह सुदेवी की जम कर पिटाई करता. उस समय सुदेवी रोते हुए यही कहती, ‘‘तुम्हारी जितनी इच्छा हो मार लो, लेकिन याद रखना, एक दिन इस का खामियाजा तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा.’’

पत्नी की इस धमकी पर हरिश्चंद्र को और भी गुस्सा आ जाता. उस हालत में वह उस की और पिटाई करता. लेकिन सुदेवी के सिर से सर्वेश के प्यार का भूत नहीं उतरा तो नहीं उतरा. वह सर्वेश की इस कदर दीवानी हो गई थी कि उस के लिए पति को मिटाने का फैसला कर लिया. इस के बाद उस ने सर्वेश के साथ मिल कर एक ऐसी योजना बनाई, जिस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी. उसी योजना के तहत सुदेवी खुद तो बुआ की बेटी की शादी में शामिल होने कन्नौज चली गई. जाने से पहले उस ने बड़ी बहन श्यामदुलारी को फोन कर के कह दिया था कि वह मेला देखने के बहाने उस के पति हरिश्चंद्र को अपने गांव जाना बुला ले. क्योंकि उन का मूड आजकल ठीक नहीं है.

छोटी बहन के कहने पर श्यामदुलारी ने मोबाइल पर हरिश्चंद्र से बात की तो वह मेला देखने के लिए जाने को राजी हो गया. 21 अप्रैल, 2015 को हरिश्चंद्र साढू गंगू के घर पहुंच गया. साढू के घर हरिश्चंद्र का सामना सर्वेश से हुआ तो उस ने लपक कर उस के पैर छू लिए और कुशलक्षेम पूछी. हर साल की तरह उस दिन जाना में मेला लगा था और रात में नौटंकी का कार्यक्रम था. सर्वेश और सुदेवी में मोबाइल पर लगातार बातें हो रही थीं. उस ने सुदेवी को बता दिया था कि बकरा (हरिश्चंद्र) हलाल होने के लिए आ गया है.

योजना के अनुसार, सर्वेश हरिश्चंद्र को मेला दिखाने ले गया. शाम तक दोनों मेला देखते रहे. उस के बाद वह उसे शराब के ठेके पर ले गया. सर्वेश ने खुद तो कम शराब पी, जबकि हरिश्चंद्र को ज्यादा पिलाई. इस के बाद टहलने के बहाने वह हरिश्चंद्र को गांव के बाहर बहने वाले नाले के पास ले गया और वहां धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया. हरिश्चंद्र जैसे ही जमीन पर गिरा, उस की गरदन पर पैर रख कर तब तक दबाए रहा, जब तक उस की मौत नहीं हो गई. मरने के बाद सर्वेश ने हरिश्चंद्र के चेहरे को ईंट से कुचल कर विकृत कर दिया और लाश को वहीं गड्ढे में दफना दिया. रात 11 बजे सर्वेश ने फोन कर के सुदेवी को बता दिया कि उस ने कांटे को निकाल दिया है.

इसी के साथ उस ने सुदेवी से अनुरोध किया कि वह गांव आ जाए, क्योंकि वह उस से मिलने के लिए तड़प रहा है. 23 अप्रैल को सुदेवी पति की खोज के बहाने जाना पहुंची. बहनबहनोई को उस ने पति के लापता होने की जानकारी दे कर पति को खोजने के बहाने सर्वेश के साथ मौजमस्ती करती रही. कुछ दिनों बाद वह घडि़याली आंसू बहाते हुए हिंगूपुर आ गई और जब ससुराल में हरिश्चंद्र के लापता होने की बात बताई तो सभी सन्न रह गए. हरिश्चंद्र के छोटे भाई दिनेश को शक हुआ कि भाई के लापता होने में भाभी सुदेवी का हाथ हो सकता है, इसलिए उस ने पहले तो भाभी को खूब खरीखोटी सुनाई, उस के बाद रिपोर्ट दर्ज करवाने को कहा. देवर के दबाव में सुदेवी डर गई और रिपोर्ट दर्ज कराने को राजी हो गई.

27 अप्रैल, 2015 को सुदेवी दिनेश के साथ थाना महराजगंज पहुंची और सर्वेश पर पति के अपहरण या मार डालने का आरोप लगा कर रिपोर्ट दर्ज करने का अनुरोध किया. इस के बाद सर्वेश पकड़ा गया तो सारा राज सामने आ गया. पूछताछ के बाद 28 अप्रैल, 2015 को पुलिस ने सर्वेश और सुदेवी को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें स्वीकृत नहीं हुई थीं. Hindi Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi True Crime: कंटीली राह का राही

Hindi True Crime: शादीशुदा होते हुए भी धर्मवीर बाजारू औरतों के पास जाता था. इस से खफा हो कर उस की बीवी भी मायके चली गई. फिर एक दिन उस का यही शौक उस के लिए जानलेवा साबित हुआ.

गोरखपुर राजकीय रेलवे पुलिस के थानाप्रभारी गिरिजाशंकर त्रिपाठी को उन के एक खास मुखबिर ने सूचना दी कि पुराना पार्सल गेट नंबर-6 पर स्थित आरपीएफ मालखाने के पास एक युवक लहूलुहान पड़ा तड़प रहा है. थानाप्रभारी ने टाइम देखा तो उस समय रात के करीब 10 बज रहे थे. यह सूचना मिलते ही वह उसी समय पुलिस टीम के साथ मुखबिर द्वारा बताई जगह पर पहुंच गए. स्ट्रीट लाइट की रोशनी में वहां सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था. एक युवक पेट के बल खून से लथपथ पड़ा था. पास जा कर देखा तो पता चला कि उस की दाहिनी कनपटी पर किसी वजनदार चीज से वार किया गया था.

पास ही एक बड़ा पत्थर पड़ा था जिस पर ताजा खून लगा था. लग रहा था कि हत्यारों ने इसी पत्थर से उस के ऊपर वार किया था. मौके पर शराब की 2 खाली शीशियां भी पड़ी थीं. पुलिस ने युवक की जामातलाशी ली तो उस की पैंट की जेब से एक कागज की परची मिली. उस परची पर एक मोबाइल नंबर और एक बैंक का खाता नंबर लिखा था. पुलिस ने उन सबूतों को अपने कब्जे में ले लिया. युवक का जिस्म अभी भी गरम था. उस की सांसें भी चल रही थीं. रेलवे के नियम के अनुसार रेलवे परिक्षेत्र में हुई घटना, दुर्घटना के घायलों को आरपीएफ के जवान ही अस्पताल ले जाते हैं, इसलिए थानाप्रभारी ने आरपीएफ को घटना की सूचना दे दी.

सूचना पा कर आरपीएफ के 2 जवान मौके पर पहुंचे और गंभीर रूप से घायल युवक को टैंपो से नेताजी सुभाषचंद्र बोस जिला अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने युवक को मृत घोषित कर दिया. इस के बाद थानाप्रभारी गिरिजा शंकर त्रिपाठी ने जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भेज दिया. यह बात 31 अक्तूबर, 2014 की है. मृतक कौन था और कहां का रहने वाला था, पुलिस के पास इस की कोई जानकारी नहीं थी. मृतक के पास से जो परची मिली थी, उस पर लिखे फोन नंबर को थानाप्रभारी ने अपने फोन से रात में ही मिलाया. दूसरी ओर से काल किसी पुरुष ने रिसीव की. उस ने पूछा, ‘‘हैलो, कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘मैं गोरखपुर जीआरपी थाने से इंसपेक्टर गिरिजाशंकर त्रिपाठी बोल रहा हूं.’’ थानाप्रभारी ने अपना परिचय देने के बाद उस से पूछा, ‘‘क्या मैं जान सकता हूं कि तुम कौन बोल रहे हो और कहां रहते हो?’’

‘‘सर, मैं गोरखपुर से धर्मेश उपाध्याय बोल रहा हूं.’’ पुलिस का नाम सुनते ही धर्मेश की आंखों से नींद गायब हो गई, ‘‘क्या बात है सर, इतनी रात गए…’’

‘‘यह नंबर तुम्हारा ही है?’’ उस की बात बीच में काट कर इंसपेक्टर त्रिपाठी ने सवाल किया.

‘‘जी हां, यह मेरा ही नंबर है.’’ धर्मेश ने जवाब दिया.

‘‘हमें मालखाने के पास एक युवक घायलावस्था में मिला था. उसी की जेब से मिली परची पर यह नंबर लिखा था. तुम अस्पताल आ कर उस युवक को देख लो कि कहीं वह तुम्हारा कोई परिचित तो नहीं है?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

धर्मेश का बड़ा भाई धर्मवीर कई दिनों से घर से निकला हुआ था. यह बात थानाप्रभारी को बताते हुए उस ने उन से घायल मिले युवक की कदकाठी और कपड़ों के बारे में पूछा तो थानाप्रभारी ने घायल युवक का जो हुलिया बताया, वह उस के भाई धर्मवीर से मेल खा रहा था. उसे चिंता होने लगी. यह बात उस ने दूसरे कमरे में सो रहे पिता प्रेमनारायण उपाध्याय को बताई तो उन की नींद भी हराम हो गई. थानाप्रभारी ने धर्मेश को उस युवक की मौत की खबर नहीं दी थी, ताकि घर वाले रात में परेशान न हों. लेकिन घर वालों की नींद तो गायब हो चुकी थी. बेटे की फिक्र में प्रेमनारायण का बदन कांपने लगा. धर्मेश का गांव डिगुलपुर जिला मुख्यालय से दूर था.

वहां से जिला अस्पताल जाने के लिए कोई साधन नहीं था, इसलिए भोर होते ही वह पिता के साथ गोरखपुर के लिए निकल पड़ा. रास्ते भर दोनों धर्मवीर की सलामती के लिए प्रार्थना करते रहे. सुबह 8 बजे तक दोनों गोरखपुर के थाना जीआरपी पहुंचे. थानाप्रभारी ने मृतक युवक के कपड़े उन्हें दिखाए तो कपड़े देखते ही दोनों रोने लगे. कपड़े धर्मवीर उपाध्याय के ही थे. मैडिकल कालेज ले जा कर जब उन्हें लाश दिखाई गई तो उन्होंने उस की पुष्टि धर्मवीर उपाध्याय के रूप में कर दी. शिनाख्त हो जाने के बाद पुलिस ने राहत की सांस ली. थानाप्रभारी गिरिजाशंकर त्रिपाठी ने प्रेमनारायण और उन के बेटे धर्मेश से बात की तो उन्होंने बताया कि धर्मवीर की हत्या महराजगंज के सुभाष पांडेय और कुशीनगर के संत यादव ने की होगी.

धर्मेश ने इन दोनों के खिलाफ थाने में रिपोर्ट भी दर्ज करा दी. नामजद मुकदमा दर्ज होते ही पुलिस ने दोनों की तलाश में उसी शाम उन के घरों पर दबिश डाली तो दोनों आरोपी अपनेअपने घरों से दबोच लिए गए. दोनों को पुलिस गोरखपुर ले आई. दोनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो वे खुद को निर्दोष बताते हुए धर्मवीर की हत्या से साफ इनकार करते रहे. पूछताछ के बाद पता चला कि संत यादव कुशीनगर जिले के कसया कस्बे का बड़ा व्यवसाई था. उस के पास कई ट्रक थे. सुभाष पांडेय उस का बिजनैस पार्टनर था. घटना से करीब 15-20 दिनों पहले ही धर्मवीर उपाध्याय किसी परिचित के माध्यम से संत यादव के संपर्क में आया था.

धर्मवीर उपाध्याय गोरखपुर के सिकरीगंज इलाके डिगुलपुर गांव के रहने वाले प्रेमनारायण उपाध्याय का बड़ा बेटा था. प्रेमनारायण सीआरपीएफ के जवान थे, जो 2 साल पहले रिटायर हुए थे. धर्मवीर के अलावा उन का एक और बेटा धर्मेश था. संत यादव को ड्राइवर की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने उसे अपने यहां नौकरी पर रख लिया था. अक्तूबर 2014 में संत यादव ने उसे सामान से भरा ट्रक ले कर असम भेजा था. धर्मवीर सामान ले कर असम पहुंचा. लौटते समय उसे वहां से 67 हजार रुपए भाड़ा मिला. असम से वापस लौटते समय धर्मवीर की संत यादव से बातचीत भी हुई थी, तब उस ने भाड़े के 67 हजार रुपए मिलने की बात बता दी थी. लेकिन हफ्ते भर बाद भी वह गोरखपुर नहीं पहुंचा तो संत यादव को चिंता हुई.

उस ने धर्मवीर को फोन किया, पर उस का फोन लगातार स्विच्ड औफ मिला. कई दिनों बाद भी जब उस का धर्मवीर से संपर्क नहीं हुआ तो उस के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. इस के बाद संत यादव को विश्वास हो गया कि धर्मवीर ने उस के साथ बड़ा धोखा किया है. वह ट्रक और रुपए दोनों ले कर चंपत हो गया है. उस ने अपने स्तर पर उस का पता लगाना शुरू किया. कई दिनों बाद उसे ट्रक के बारे में पता चल गया. ट्रक बिहार के आरा जिले में लावारिस हालत में खड़ा था. आरा पहुंच कर संत यादव ट्रक ले कर वापस आ गया. उसे इस बात का शक होने लगा कि कहीं किसी ने धर्मवीर की हत्या तो नहीं कर दी.

इसी बीच धर्मवीर के घर वालों को उस की हत्या की जानकारी मिल गई. धर्मवीर के घर वालों को संत यादव और उस के साथी सुभाष पर ही शक हुआ. इसी शक के आधार पर धर्मेश ने दोनों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज करवाया था. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस को भी लगने लगा कि पैसों के विवाद में ही इन दोनों ने मिल कर धर्मवीर की हत्या कर दी होगी. सच उगलवाने के लिए पुलिस कई दिनों तक उन से सख्ती से पूछताछ करती रही, लेकिन पुलिस उन दोनों से कोई ठोस जानकारी नहीं उगलवा पाई. तब पुलिस ने हिदायत दे कर उन्हें छोड़ दिया.

इस केस की मौनिटरिंग कार्यवाहक रेलवे पुलिस उपाधीक्षक नम्रता श्रीवास्तव कर रही थीं. उन्होंने इस केस को खोलने में लगी टीम की बैठक बुलाई. बैठक में हत्या के विभिन्न कोणों पर रोशनी डाली गई. बैठक में धर्मवीर के पारिवारिक पहलुओं पर जांच केंद्रित करने का फैसला किया गया. पुलिस ने जांच की गई तो पता चला कि धर्मवीर और उस की पत्नी मनीषा के रिश्तों के बीच काफी गहरी खाई है. मनीषा अपनी तीनों बेटियों को ले कर महराजगंज के फरेंदा गांव स्थित अपने मायके में रह रही थी. पुलिस को एक और चौंका देने वाली सूचना मुखबिर से मिली कि मनीषा की बुआ का बेटा पूना में रहता था.

वह क्रिमिनल था. पुलिस का ध्यान इसी बात पर गया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मनीषा ने उसी की मदद से पति को ठिकाने लगवा दिया हो? यानी कुल मिला कर पुलिस के शक की सूई मनीषा की तरफ घूम गई. शक के आधार पर पुलिस ने मनीषा से कई चक्र में पूछताछ की, लेकिन इस पूछताछ से भी कोई हल नहीं निकला. पुलिस की जांच में वह भी बेकसूर दिखी. पुलिस की जांच जहां से चली थी, वहीं फिर आ कर रुक गई. पुलिस को उस की कालडिटेल्स से काफी उम्मीद बंधी थी. धर्मवीर की कालडिटेल्स पुलिस चेक कर चुकी थी, उस से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली.

पुलिस को सारी उम्मीदों पर पानी फिरता दिखाई दे रहा था. थानाप्रभारी की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि धर्मवीर की हत्या किस ने और क्यों की? एक दिन थानाप्रभारी अपने कक्ष में बैठे इसी घटना पर मंथन कर रहे थे. उसी समय उन के दिमाग में एक आइडिया आया. उसी आइडिया को ध्यान में रखते हुए उन्होंने जिस जगह पर धर्मवीर की हत्या हुई थी, उस इलाके में उस दिन सक्रिय रहे मोबाइल नंबरों की जानकारी निकलवाई. पता चला कि उस दिन उस इलाके के फोन टावर के संपर्क में 35 हजार फोन नंबर आए थे. अब इतने नंबरों में से कातिल का नंबर ढूंढना आसान नहीं था. फिर भी उन्होंने अपनी टीम से उन सभी नंबरों का विश्लेषण कराया.

कई महीने की कड़ी मशक्कत के बाद उन नंबरों में से 4 नंबर संदिग्ध निकले. उन नंबरों की जांच की गई तो वे चारों नंबर स्विच्ड औफ मिले. उन नंबरों को पुलिस ने जांच के दायरे में ले लिया. इस बीच थानाप्रभारी एक बार फिर धर्मवीर के गांव डिगुलपुर पहुंचे. लोगों से बात करने पर उन्हें पता चला कि धर्मवीर शराबी तो था ही, अय्याश प्रवृत्ति का भी था. यह जानकारी उन के लिए अहम साबित हुई. छानबीन कर के वह गोरखपुर वापस लौट आए. इसी बीच मुखबिर ने उन्हें एक चौंका देने वाली सूचना दी. मुखबिर ने उन चारों संदिग्ध नंबरों को देख कर बताया कि उन में से एक नंबर कुशमिला उर्फ मुसकान नामक युवती का है. मुसकान कालगर्ल थी. उस का धंधा स्टेशन के इर्दगिर्द चलता था और घटना के बाद से वह गायब थी.

पुलिस ने मुसकान के फोन नंबर की जांच की तो पता चला कि उस ने अपना सिम फरजी आईडी पर लिया था, इसलिए पुलिस उस के ठिकाने तक नहीं पहुंच सकी. घटना को हुए 10 महीने बीत चुके थे, लेकिन पुलिस हत्यारों का पता तक नहीं लगा पाई थी. शक की सूई मुसकान पर थी, लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ था. पुलिस ने उस के नंबर को सर्विलांस पर लगा रखा था. अगस्त, 2015 में जैसे ही उस ने अपना फोन नंबर औन किया, तभी सर्विलांस से उस की लोकेशन बिहार के बेतिया जिले की आई. पुलिस ने कई दिनों तक उस के फोन पर होने वाली बातें सुनीं.

बातचीत के दौरान एक बार मुसकान के मुंह से गोरखपुर में मालखाने के पास एक युवक की हत्या करने की बात निकल गई. इस के बाद पुलिस को विश्वास हो गया कि धर्मवीर की हत्या में उस का हाथ है. उस के बाद पुलिस ने मुसकान की गिरफ्तारी की योजना बनाई. गुपचुप तरीके से गोरखपुर पुलिस बिहार के पश्चिमी चंपारण के बेतिया जिला पहुंची. स्थानीय पुलिस के सहयोग से गोरखपुर पुलिस ने पता लगा लिया कि मुसकान बेतिया में एक आर्केस्ट्रा कंपनी में काम करती है. पुलिस ने उस आर्केस्ट्रा कंपनी में दबिश दी. वहां जा कर पता चला कि वह तो 2 दिन पहले ही गोरखपुर चली गई. लिहाजा पुलिस खाली हाथ वापस लौट आई.

13 अगस्त, 2015 को सुबहसुबह एक मुखबिर ने इंसपेक्टर गिरिजा शंकर त्रिपाठी को फोन कर के सूचना दी कि पुराने पार्सल गेट पर मुसकान अपने एक साथी के साथ खड़ी है. वह कहीं भागने की फिराक में है. सूचना पक्की और बेहद महत्त्वपूर्ण थी, इंसपेक्टर त्रिपाठी बगैर देर किए घर से निकल लिए. जिस समय खबरी का फोन उन के पास आया था, उस समय वह घर से कार्यालय आने के लिए तैयार हो रहे थे. सूचना मिलने के 10 मिनट बाद वह थाने पहुंच गए. घर से निकलने से पहले उन्होंने टीम के सदस्यों को थाने में पहुंचने के लिए कह दिया था. थाने पहुंचते ही उन्हें एसएसआई सुधीर कुमार, एसआई राघवेंद्र मिश्र, हरीश तिवारी, हेडकांस्टेबल किसलय मिश्र, कांस्टेबल रणजीत पांडेय, अनिल कुमार, विजय सिंह, अभय पांडेय, संजय सिंह, संदीप यादव और महिला कांस्टेबल शीला गौड़ तैयार मिलीं.

टीम को ले कर वह पुराना पार्सल गेट नंबर 6 पर पहुंच गए. पुलिस ने गेट को चारों ओर से घेर लिया. पुलिस को देख कर मुसकान डर गई. उस ने वहां से खिसकने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे दबोच लिया. उसे और उस के साथी को गिरफ्तार कर के पुलिस थाने ले आई. पूछताछ में पता चला कि उस के साथ वाले युवक का नाम विजय पांडेय है. पुलिस ने उन से धर्मवीर उपाध्याय की हत्या किए जाने की वजह पूछी तो बिना किसी हीलाहवाली के दोनों ने अपना इकबालिया जुर्म कबूल करते हुए कहा कि उन्होंने ही धर्मवीर की हत्या की थी. घटना को अंजाम देने में उन के 2 और साथी विकास कुमार उर्फ मुकेश और सुमेर कुमार उर्फ समीर भी शामिल थे.

फिर मुसकान और विकास ने पुलिस के सामने रोंगटे खड़े कर देने वाली जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के गांव डिगुलपुर के रहने वाले प्रेमनारायण उपाध्याय सीआरपीएफ में नौकरी करते थे. वह 2 साल पहले ही नौकरी से रिटायर हुए थे. उन के 2 बेटे थे धर्मवीर और धर्मेश. धर्मवीर गांव के आवारा लड़कों के साथ रह कर बिगड़ गया था. तब उन्होंने यह सोच कर महराजगंज के फरेंदा की मनीषा के साथ उस की शादी कर दी कि गृहस्थी में फंस कर वह सुधर जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह बात 15 साल पहले की है.

शादी के बाद भी उस के चालचलन में कोई तब्दीली नहीं आई. आवारा दोस्तों के साथ घूमनेफिरने, शराब पीने की उस की आदत नहीं गई. मनीषा ने उसे समझाया भी, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा. ऐसे में मनीषा के सामने आंसू बहाने के अलावा कोई उपाय नहीं बचा था. ऐसे शख्स से शादी कर के उस के सारे सपने रेत के ढेर की तरह ढह गए थे. इसी दौरान धर्मवीर ने ड्राइविंग सीख ली. वह ट्रक चलाने लगा. ट्रक ले कर वह जब भी बाहर जाता, 2-3 महीने बाद ही घर लौटता. इतने दिनों बाद घर लौटने पर भी वह परिवार के साथ कम यारदोस्तों के संग ज्यादा समय बिताता था. दोस्तों में ही कमा कर लाए हुए अधिकांश पैसे खर्च कर देता था. उस की इस आदत से उस के मांबाप ही नहीं, सासससुर भी चिंतित रहते थे.

इसी तरह शादी के 5-6 साल बीत गए. मनीषा भी 3 बेटियों की मां बन गई. मनीषा पति से नाखुश रहती थी. बच्चों के भविष्य की चिंता मनीषा को रहती थी. एक दिन वह तीनों बेटियों को ले कर ससुराल से मायके आ गई. धर्मवीर को जब यह पता चला तो वह गुस्से से पागल हो उठा. वह ससुराल पहुंच गया और पत्नी से लड़नेझगड़ने लगा. उस ने पत्नी को लाने के लिए काफी मिन्नतें कीं. लेकिन मनीषा ने ससुराल लौटने से साफ मना कर दिया. धर्मवीर ने ऐसा कई बार किया, पर मनीषा नहीं आई. 23-24 अक्तूबर, 2014 को धर्मवीर सामान से लदा ट्रक ले कर असम पहुंच गया था. सामान डिलीवरी करने के बाद उसे वहां से भाड़े के 67 हजार रुपए मिले.

एक साथ इतनी बड़ी रकम देखते ही धर्मवीर की नीयत डोल गई. ट्रक मालिक संत यादव ने जब भाड़े के बारे में उस से पूछा तो उस ने भाड़ा मिलने की बात बता दी. उस के बाद धर्मवीर ने अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर के रख दिया और ट्रक बिहार के आरा जिले में छोड़ कर ट्रेन से गोरखपुर आ गया. जब हफ्ते भर बाद भी धर्मवीर संत यादव के पास नहीं पहुंचा तो वह समझ गया कि धर्मवीर ने उस के साथ धोखा किया है. उधर रुपए ले कर धर्मवीर गोरखपुर के रास्ते अपनी ससुराल पहुंच गया. वह 1-2 दिन ससुराल में रुका. बच्चों और पत्नी को खुश करने के लिए खूब पैसे खर्च किए.

उस के बाद वहां से अपने साढ़ू के यहां महराजगंज चला गया. 2 दिन साढ़ू के यहां रुक कर 31 अक्तूबर, 2014 को शाम 6 बजे के करीब वह गोरखपुर पहुंच गया. उस समय उस के पास 40 हजार रुपए बचे थे. बाकी के 27 हजार रुपए वह खर्च कर चुका था. इधरउधर समय बिताने के बाद धर्मवीर साढ़े 9 बजे स्टेशन पहुंचा. वह अय्याश तो था ही, इसलिए वह यह भी जानता था कि उसे जिस चीज की तलाश है, वह यहीं मिलेगी. पैदल टहलते हुए वह पुराना पार्सल गेट नंबर-6 पहुंचा. वहां उसे 22 वर्षीय मुसकान मिली. बात करने पर मामला 500 रुपए में तय हो गया.

धर्मवीर मुसकान के साथ जाने से पहले शराब पीना चाहता था. उस ने मुसकान को यह बात बताई तो उस ने भी उस के साथ 2 पैग लेने को कह दिया. धर्मवीर उस की इच्छा जान कर खुश हो गया. वह उसे रिक्शे पर बैठा कर धर्मशाला बाजार ले गया. उस के पीछेपीछे मुसकान के साथी विकास पांडेय, विकास उर्फ मुकेश और सुमेर उर्फ समीर भी लग गए. वहीं से धर्मवीर ने शराब के साथ खाने के लिए मछली भी खरीदी. धर्मशाला बाजार के रेलवे लाइन के किनारे एक जगह बैठ कर दोनों ने मछली खाई और शराब पी. वहां से वे पुराना पार्सल गेट नंबर 6 पहुंचे. अब तक वहां गहरा सन्नाटा फैल गया था. वहीं पर धर्मवीर मुसकान के साथ हसरतें पूरी करना चाहता था. इस से पहले कि वह कुछ करता, तभी मुसकान के तीनों साथी वहां आ धमके.

अचानक सामने लड़कों को देख कर धर्मवीर सकपका गया. वे तीनों धर्मवीर से पैसों की मांग करने लगे तो दिखावे के लिए मुसकान ने उन लड़कों से विरोध जताया. धर्मवीर उन से उलझ गया. कुछ ही देर में धर्मवीर और उन तीनों लड़कों के बीच गुत्थमगुत्था हो गई. उसी दौरान सुमेर ने पीछे से धर्मवीर के दोनों हाथ पकड़ लिए और मुकेश ने धक्का दे कर पेट के बल गिरा दिया. सुमेर ने धर्मवीर की पीठ पर घुटना रख कर मुंह दबा दिया. विकास पांडेय के कहने पर मुसकान ने धर्मवीर के पैर दबोच लिए. तब धर्मवीर को लगा कि मुसकान भी इन लड़कों के साथ मिली है. वे लड़के नशेड़ी थे, इसलिए धर्मवीर उन के काबू में नहीं आ रहा था. फिर विकास पांडेय ने पास में पड़ा पत्थर उठा कर उस के सिर पर दे मारा.

पत्थर के वार से धर्मवीर का सिर फट गया और वह तड़पने लगा. विकास ने धर्मवीर की जेब टटोली. उस की जेब से 40 हजार रुपए निकले. इतने रुपए पा कर वे बहुत खुश हुए. चारों ने 10-10 हजार रुपए आपस में बांट लिए और तुरंत मौके से फरार हो गए. मुसकान और उस के साथियों ने पुलिस से बचने के लिए अपनेअपने मोबाइल औफ कर दिए. उन्होंने तय कर लिया कि कोई भी एकदूसरे को तब तक फोन नहीं करेगा जब तक मामला ठंडा नहीं हो जाता. मुसकान गोरखपुर छोड़ कर बेतिया, बिहार चली गई. कई साल पहले वह बेतिया में रह चुकी थी. वहां रह कर वह आर्केस्ट्रा कंपनी में नाचती थी. मुसकान गोरखपुर से बेतिया कैसे पहुंची, उस की रोमांचित कर देने वाली अपनी अलग कहानी है.

दरअसल, मुसकान गोरखपुर जिले के खोराबार के महेवा मंडी स्थित खिरवनिया गांव के रहने वाले रघुनाथ मल्लाह की बेटी थी. उसे बचपन से ही नाचनेगाने का शौक था. वह घर में टेलीविजन के कार्यक्रम देख कर नाचती थी. घर वालों को उस का यह काम पसंद नहीं था. 15 साल की उम्र में वह घर से बेतिया भाग गई और वहां अपने एक रिश्तेदार की मदद से आर्केस्ट्रा कंपनी में नाचने लगी. आर्केस्ट्रा कंपनी का मालिक उस का दैहिक शोषण करने लगा तो वह उस कंपनी को छोड़ कर दूसरी कंपनी में चली गई. वहां भी वह नहीं बच पाई. इस बार आर्केस्ट्रा के मालिक ने उस से प्रेमविवाह किया. 2-3 सालों तक मौजमस्ती करने के बाद उस ने मुसकान को छोड़ दिया.

ठोकरें खा कर मुसकान अपने घर लौट आई. घर वालों ने उसे घर में पनाह नहीं दी. दरदर की ठोकरें खाती मुसकान पेट की आग बुझाने के लिए अपने तन को बेचने पर मजबूर हो गई. उस से मिलने वाले पैसों से फुटपाथ पर खानाबदोश की जिंदगी शुरू की. फिर समय ने ऐसी करवट ली कि उस के हाथ खून से सन गए और वह हत्यारिन बन गई. कुशमिला उर्फ मुसकान को अपने किए पर बहुत पछतावा है. काश, उस ने घर वालों की बात मान ली होती तो शायद उसे यह दिन नहीं देखना पड़ता. कथा लिखे जाने तक चारों आरोपियों में से सुमेर उर्फ समीर को छोड़ कर बाकी 3 जेल की सलाखों के पीछे थे. समीर पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ पाया था. पुलिस तीनों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है. कथा लिखने तक किसी की जमानत नहीं हुई थी. Hindi True Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: ढोंगी गुरू का अपराधिक अतीत

True Crime Story: कविता रानी को पूरा विश्वास था कि स्वामी सच्चिदानंद उस का परलोक सुधार देगा. परलोक सुधारने की कौन कहे, उस ने उस का सारा धन तो हड़प ही लिया, जान भी ले ली. पंजाब के जनपद नवांशहर में थाना काठगढ़ के तहत एक गांव है मत्तो. यहां के किराना दुकानदार सोमनाथ के 7 भाईबहनों में सब से छोटी थी कविता रानी, जिस की शादी मोहल्ला शिवनगर निवासी सुरेंद्र कुमार से हुई थी. कालांतर में इस दंपति के 2 बेटे हुए, जिन्हें ले कर सुरेंद्र स्पेन चला गया था. पति और बेटों के जाने के बाद कवितारानी नवांशहर के अपने मकान में अकेली रह गई थी.

सोमनाथ बहन का हालचाल लेने के लिए अकसर उस के घर जाया करते थे. पहली दिसंबर, 2009 को शाम 6 बजे उन्हें स्पेन से कविता के बड़े बेटे अजय का फोन आया, ‘‘मामाजी, पिछले 2-3 दिनों से मम्मी को फोन कर रहा हूं, उन से बात नहीं हो पा रही है. आप जा कर जरा मां को देख आएं.’’

अजय की बात ने सोमनाथ को भी चिंता में डाल दिया. वह तुरंत नवांशहर के लिए रवाना हो गए. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा, घर के बाहरी गेट पर ताला लटक रहा है. 2 लड़कों ने उन के पास आ कर बताया कि वे कालेज स्टूडैंट हैं और सामने वाले घर में किराए पर रहते हैं. उन में से एक ने उन्हें चाबी सौंपते हुए कहा, ‘‘2-3 दिनों पहले यह चाबी हमें यहां पड़ी मिली थी. शायद आंटीजी के कहीं जाते वक्त उन के हाथ से छूट कर गिर गई है. हम आप को पहचानते हैं, आप आंटीजी के भाई हैं न?’’

दोनों लड़कों ने अपने नाम अजीत चौहान और ऋषि चौहान बताते हुए कविता के घर की ओर इशारा कर के एक साथ कहा, ‘‘यह चाबी हमें इसी गेट के ताले की लग रही है. हम ने इसे उठा कर अपने पास रख लिया था कि आंटीजी के आने पर उन्हें दे देंगे.’’

सोमनाथ ने लड़कों को साथ ले कर गेट का ताला खोला. वे भीतर गए तो सामने के कमरे में भी ताला लगा था, साथ ही अंदर से तेज बदबू आ रही थी. सोमनाथ समझदार आदमी थे. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि बदबू लाश की है. उन के मन में आया, ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि भीतर उन की बहन मरी पड़ी हो और यह बदबू उसी की लाश से आ रही हो?’

यह बात मन में आते ही सोमनाथ दोनों लड़कों को साथ ले कर थाने जा पहुंचे. थानाप्रभारी राजकुमार ने उन से तहरीर ले कर मामला दर्ज करवाया और पुलिसपार्टी के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. पुलिस ने ताला तोड़ा और मुंह पर कपड़ा लपेट कर भीतर गई. घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था और उस के बीच चादर में लिपटी कविता की लाश पड़ी थी. लग रहा था कि मामला लूटपाट के लिए कत्ल का है. कविता के गले में उसी का दुपट्टा कस कर मारा गया था. अपनी काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया. रात काफी हो जाने की वजह से काररवाई रोक कर पुलिस ने घर को सील कर दिया.

अगली सुबह पुलिस ने घर को फिर से खोल कर वहां की तलाशी ली तो एक ड्राइविंग लाइसेंस हाथ लगा, जो स्वामी सच्चिदानंद के नाम से था. पासपड़ोस के लोगों ने लाइसेंस देख कर बताया कि यह बहुत मशहूर आदमी है, टीवी के साधना चैनल पर इस के नियमित प्रवचन आते हैं. पता चला कि यह बक्करखाना क्षेत्र में किराए का घर ले कर रहता था. वहीं अपना डेरा बना कर वह प्रवचन दिया करता था, जिसे सुनने के लिए काफी लोग आया करते थे, जिन में कविता रानी भी थी. स्वामी को संदेह के दायरे में रख कर पुलिस ने उस के यहां छापा मारा. पता चला कि स्वामीजी उस रात एक स्थानीय जागरण में व्यस्त थे, जहां से फारिग होने के बाद सुबह ही अपने कुछ शिष्यों के साथ कुरुक्षेत्र चले गए थे.

जागरण आयोजकों ने पुलिस को बताया कि उस रात स्वामीजी थोड़ीथोड़ी देर के लिए 2 बार जागरण में आए थे. मतलब यह रात भर वह जागरण में नहीं रहे थे. पुलिस ने अपना सारा ध्यान स्वामी सच्चिदानंद पर जमा दिया, साथ ही उन के बारे में पता करने के लिए मुखबिरों का भी सहारा लिया गया. मुखबिरी के आधार पर 7 दिसंबर, 2009 को स्वामी को उस वक्त बंगा रेलवे फाटक के पास से गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह अपनी इंडिका कार से अपनी एक शिष्या के साथ कहीं जा रहा था.

विधिवत गिरफ्तारी के बाद सच्चिदानंद को अदालत पर पेश कर के 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ से स्वामी सच्चिदानंद की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी: जिला गुरदासपुर का बड़ा कस्बा है कादियां. यहां के मोहल्ला धर्मपुरा के रहने वाले तिलकराज भारद्वाज छिटपुट काम कर के अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. उन की 7 औलादें थीं, जिन में दूसरे नंबर का था सत्येंद्र कुमार. बचपन ही से उसे एक्टिंग का शौक था.

जैसेजैसे वह बड़ा होता गया, उस के मन में एक्टर बनने की इच्छा प्रबल होती गई. सत्येंद्र की यह इच्छा तो पूरी नहीं हुई, लेकिन दसवीं पास करने के बाद उसे पंजाब सरकार के रेवेन्यू विभाग में पटवारी की नौकरी जरूर मिल गई. यह अलग बात है कि अपनी इस नौकरी से वह संतुष्ट नहीं था. उसे जहां कहीं किसी फिल्म की शूटिंग होने की बात पता चलती, वह छुट्टी ले कर वहां पहुंच जाता. अपनी इसी सनक के चलते एक बार वह छुट्टी ले कर मुंबई गया तो काफी दिनों बाद लौटा. परिणामस्वरूप उसे नौकरी से बरखास्त कर दिया गया. इस के बाद वह किसी अन्य काम की तलाश में दिल्ली चला गया. यहांवहां भटकते हुए एक दिन वह पानी पीने के लिए एक ऐसे डेरे में चला गया, जहां एक संत का प्रवचन चल रहा था.

वहां बहुत भीड़ थी. पानी की तो छोडि़ए, वहां तरहतरह के पकवान मुफ्त में बांटे जा रहे थे. पेट भर खाने के बाद सत्येंद्र वहीं पसर गया. जितना बढि़या खाना उसे वहां खाने को मिला था, उस से भी कहीं ज्यादा मजा आया उसे प्रवचन सुनने में उस ने देखा कि श्रद्धालु न केवल संतजी के पैरों में माथा टेक रहे थे, बल्कि अच्छीभली रकम भी चढ़ा रहे थे. बस, यहीं से सत्येंद्र का दिमाग दूसरी दिशा में सोचने लगा. उसे लगा कि इस अंधविश्वासी देश में नाम और दाम कमाने का इस से बेहतर जरिया कोई दूसरा नहीं हो सकता.

पूछताछ में सत्येंद्र ने पुलिस को बताया, ‘‘वाकजाल फैलाने में मैं कुशल था ही, मेरी वाणी में भी ओज था. ऊपर वाले ने चेहरामोहरा भी आकर्षक दिया था. अपनी बात कहने का तरीका भी मुझे काफी हद तक आ गया था. बस थोड़ी जरूरत थी धर्म शास्त्रों की जानकारी की. बिना देरी किए मैं धर्मकर्म का ज्ञान जुटाने लगा. बाबाओं के प्रवचन पूरे ध्यान से सुनने लगा. टीवी चैनलों पर खरीदे गए वक्त में बाबा प्रवचन देने आते तो मैं ध्यान से उन का तौरतरीका देखता और पूरे मनोयोग से उन के प्रवचनों को सुनता.

‘‘आखिर मैं ने तय कर लिया कि मैं इसी धंधे को अपना कर नाम और दाम कमाऊंगा. इस के लिए मैं ने सब से पहले अपने लिए गेरुआ वस्त्र सिलवाए. फिर धार्मिक ग्रंथ खरीद कर उन का अध्ययन शुरू कर दिया. थोड़ीबहुत तैयारी कर के सन् 2004 में मैं छोटेमोटे धार्मिक समारोहों में प्रवचन देने लगा. आत्मविश्वास से भरे मेरे प्रवचन लोगों को पसंद आने लगे. अब मैं ने अपने आप को स्वामी सच्चिदानंद कहलवाना शुरू कर दिया था.’’

सत्येंद्र के बताए अनुसार, पता नहीं यह उस की आवाज का जादू था या उस के आकर्षक व्यक्तित्व का कमाल कि उस के प्रवचनों की धाक जमने लगी. धीरेधीरे उस का सर्कल बढ़ने लगा. जल्दी यह स्थिति आ गई कि उस के कार्यक्रमों में धर्मभीरु लोगों की अच्छीखासी भीड़ जुटने लगी. चढ़ावे के रूप में काफी पैसा भी आने लगा. लोगों की अंधश्रद्धा को देखते हुए उस ने अपना नाम स्वामी सतिंदरानंद की जगह स्वामी सच्चिदानंद रख लिया. क्योंकि इस नाम में कुछ ज्यादा आकर्षण था. उस के दिन तेजी से बदलने लगे. उन्हीं दिनों उस का संपर्क दिल्ली के गणेशनगर निवासी चमनलाल मोंगा से हुआ. उस का अपना कारोबार था. जल्दी ही वह उस का शिष्य बन कर दिनरात उस की सेवा करने लगा. मोंगा को किसी बात की कोई चिंता नहीं थी. लेकिन वह इस लोक में रहतेरहते अपना परलोक सुधारना चाहता था.

मोंगा ने इस बारे में जब स्वामी सच्चिदानंद से बात की तो उस ने उसे यह कह कर डरा दिया कि वह परलोक की चिंता छोड़े, अभी तो उस का यह लोक भी नहीं संवरा. इस पर उस ने सच्चिदानंद के पैर पकड़ लिए. तब उस ने उसे झांसे में लेने का प्रयास करते हुए कहा कि उस के एकलौते बेटे की उम्र केवल 3 महीने रह गई है. यही नहीं, उस की एकलौती बेटी भी उस की इस तरह दुश्मन बन जाएगी कि वह कहीं का नहीं रहेगा. इस पर मोंगा बच्चों की तरह फूटफूट कर रोते हुए सच्चिदानंद के पैरों पर नोटों की गड्डियां रख कर बर्बाद होने से बचाने की प्रार्थना करने लगा.

स्वामी सच्चिदानंद ने मोंगा को जो बातें बताईं थीं, उन्हें सच साबित करने के लिए उस ने जाल बिछाना शुरू कर दिया. उस ने मोंगा की जवान बेटी को बुला कर उसे अपने जाल में फंसा लिया. जब लड़की वश में हो गई तो उस ने उसे कुछ इस तरह से उकसाया कि उस ने अपने पिता समेत 11 लोगों पर गैंगरेप का केस दर्ज करवा दिया और खुद उस के साथ उस के डेरे में रहने लगी. साधना चैनल पर सच्चिदानंद का जो कार्यक्रम आता था, उस का सारा खर्च चमनलाल मोंगा उठाता था, लेकिन उस ने उस का चमन उजाड़ कर उस की बेटी को अपनी शिष्या बना लिया था.

फिर 2008 के अंत में वह उसे साथ ले कर नवांशहर चला गया. यहां आ कर उस ने प्रचार किया कि उस का एक भाई जज है. अपना प्रभाव जमाने के लिए उस ने यह भी प्रचारित किया कि पहले वह भी जज था, लेकिन मोहमाया त्याग कर उस ने साधु का चोला पहन लिया है. नवांशहर में वह खूब मशहूर हो गया. बक्करखाना रोड पर किराए का मकान ले कर सच्चिदानंद ने अपना डेरा बना लिया और रोज प्रवचन करने लगा. उस के यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी. इन्हीं में कविता रानी भी थी, जो उस से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गई थी. उस का पति और बेटे विदेश में थे. करने को उस के पास कुछ था नहीं. वह भी परलोक सुधारने की गरज से उस के यहां जाने लगी थी और उस की शिष्या बन गई थी. बहाने बना कर उस ने उस से करीब 6 लाख रुपए ऐंठ लिए थे.

एक दिन कविता को विश्वास में ले कर सच्चिदानंद ने उस से कहा कि उस से खार खाने वाले लोंगों ने उस पर झूठे मुकदमे कर दिए हैं, जिन्हें खत्म करवाने के लिए उसे 20 लाख रुपए चाहिए. इस से कविता को उस पर शक हो गया. परिणाम यह हुआ कि उस ने उस से अपना पिछला पैसा मांग लिया. तब सच्चिदानंद को लगा कि उस का पांसा उल्टा पड़ गया है. कुछ दिन तो वह उसे टालता रहा, लेकिन जब वह उस के पीछे ही पड़ गई तो उसे लगा कि कविता अपना पैसा वापस ले कर ही रहेगी. इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए सच्चिदानंद ने एक योजना बनाई. 28 नवंबर, 2009 को उस ने फोन कर के कविता से कहा कि पैसों का इंतजाम हो गया है, आज वह उसे उस के पूरे 6 लाख रुपए दे देगा.

साथ ही यह भी कहा कि जागरण की वजह से वह थोड़ा व्यस्त है, इसलिए रात में 10, साढ़े 10 बजे पैसा देने आएगा, क्योंकि सुबह उसे कुरुक्षेत्र जाना है. इस तरह जागरण के बीच से उठ कर वह कविता के यहां जा पहुंचा. कविता बेसब्री से उस का इंतजार कर रही थी. जैसे ही वह भीतर पहुंचा, उस ने सीधेसीधे अपने 6 लाख रुपए मांगे. उस ने रोनी सी सूरत बनाते हुए कहा, ‘‘क्या बताऊं, मैं ने तो पूरे 6 लाख रुपए का इंतजाम कर लिया था. लेकिन जगराता में झगड़ा हो जाने से किसी ने मेरी जेब से पैसे निकाल लिए.’’

‘‘देखो, तुम्हारा यह झूठफरेब मेरे आगे चलने वाला नहीं है. तुम सीधेसीधे मेरे 6 लाख रुपए निकालो वरना मैं तुम्हारी शिकायत पुलिस से करूंगी.’’

कविता के मुंह से इतना निकला था कि स्वामी सच्चिदानंद उर्फ सत्येंद्र ने पूरे जोर से उस की नाक पर घूंसा मारा. वह बेहोश सी हो कर नीचे गिरने को हुई, तभी उस ने उस के गले में पड़ा दुपट्टा उस की गरदन पर कस दिया. जरा सी देर में वह मौत की नींद सो गई. सच्चिदानंद ने उस की लाश चादर में लपेट कर एक तरफ रख दी. उस के बाद कमरे का सामान इस तरह बिखेर दिया, जैसे वहां किसी ने लूटपाट की हो. यह उस का दुर्भाग्य ही था कि यह सब करते समय उस का ड्राइविंग लाइसेंस वहां गिर गया. उस ने कविता के दोनों सैलफोन भी उठा लिए थे, जिन्हें बाद में उस ने तोड़ दिए थे.

कविता को ठिकाने लगाने के बाद कथित स्वामी सच्चिदानंद इत्मीनान से जा कर जागरण में बैठ गया, ताकि उस पर किसी को शक न हो. सुबह 6 बजे अपने चेलों को ले कर वह कुरुक्षेत्र चला गया. बाद में दिल्ली वाली अपनी शिष्या को भी उस ने वहीं बुला लिया. इस के बाद वह जालंधर और अमृतसर में घूमता रहा. आखिर बंगा फाटक से गुजरते हुए वह पकड़ा गया. कथित स्वामी सच्चिदानंद के साथ पकड़ी गई उस की शिष्या से भी पुलिस ने पूछताछ की. लेकिन वह कविता की हत्या के षडयंत्र में शामिल नहीं थी. वह तो खुद ढोंगी स्वामी के जाल में फंसी हुई थी, जिस ने उस के दबाव में अपने पिता तथा अन्य लोगों पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा दिया था.

इस मामले में उस की कोई भूमिका न पाए जाने पर पुलिस ने उसे उस के अभिभावकों के हवाले कर दिया. 10 दिसंबर, 2009 को अभियुक्त सत्येंद्र उर्फ स्वामी सच्चिदानंद को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया गया. इस के ठीक एक महीने बाद कथित स्वामी सच्चिदानंद को जब पेशी पर अदालत ले जाया जा रहा था तो रास्ते में पुलिस वालों को गच्चा दे कर वह फरार हो गया. पंजाब पुलिस ने पूरा जोर लगा दिया, लेकिन वह आदमी दोबारा उन के हत्थे नहीं चढ़ा. देखतेदेखते साढ़े 5 साल का लंबा अरसा गुजर गया.

मगर जैसी कि कहावत है, 100 दिन चोर के 1 दिन साधु का. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सैल ने 6 जुलाई, 2015 को कथित स्वामी सच्चिदानंद को बेगमपुर इलाके के एक मकान से गिरफ्तार कर लिया. स्पैशल सैल के डीसीपी राजीव रंजन, एसीपी संदीप ब्याला और इंसपेक्टर संजय नागपाल ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो अपनी उक्त कहानी बताने के बाद उस के आगे की दास्तान इस तरह से सुनाई: दरअसल ढोंगी सत्येंद्र उर्फ सच्चिदानंद नवांशहर में बहुत बुरी तरह फंस गया था. उस के खिलाफ कत्ल का मुकदमा दर्ज हो गया था. पुलिस ने उसे पकड़ कर जेल भी भिजवा दिया था. चूंकि उस के सारे सपने चकनाचूर हो गए थे, इसलिए वह भाग निकला. वहां से भागने के बाद सच्चिदानंद उत्तराखंड पहुंच कर साधुओं की एक टोली में शामिल हो कर उन की सेवा करने लगा. अपना रंगरूप भी उस ने साधुओं जैसा ही बना लिया था.

कुछ दिनों बाद वह उत्तरकाशी चला गया, जहां किस्मत से विश्वनाथ मंदिर में उसे पुजारी की नौकरी मिल गई. दिल्ली में उस की शिष्या यानी प्रेमिका थी कल्पना. एक दिन साधु वेश में ही वह दिल्ली जा कर उस से मिला. कल्पना उस की प्रेम दीवानी थी. नवांशहर में भी वह उस के साथ पकड़ी गई थी, मगर पुलिस ने उसे शुरू ही में निर्दोष मान कर उस के कुछ रिश्तेदारों के हवाले कर दिया था. सच्चिदानंद को कत्ल केस में गिरफ्तार कर के हवालात में डाल दिया गया. वहां से उस के फरार हो जाने के बारे में कल्पना को कुछ पता नहीं था. पता चलने पर भी न उस ने इस बात का बुरा माना और न जरा भी घबराई, बल्कि उस के साथ उत्तरकाशी में रहने को तैयार हो गई.

जबकि सच्चिदानंद के लिए फिलहाल यह संभव नहीं था. विश्वनाथ मंदिर से उसे इतना पैसा नहीं मिलता था कि वह अपने साथसाथ कल्पना का भी खर्च उठा पाता. दूसरी ओर वह कल्पना को छोड़ना भी नहीं चाहता था. इसलिए अतिरिक्त धन कमाने के लिए उस ने अलग से कोई धंधा करने की सोची. नए धंधे के रूप में उस ने पंजाब में स्मैक सप्लाई करना शुरू कर दिया. इस से उसे मोटी कमाई होने लगी तो वह विश्वनाथ मंदिर को छोड़ कर दिल्ली में ही रहने लगा. अब वह एक तरफ मादक पदार्थों की तस्करी कर रहा था तो दूसरी तरफ दिल्ली के कई इलाकों में प्रवचन कर के अपने आडंबर को भी जारी रखे हुए था. बीचबीच में वह धर्मांध लोगों को चूना लगाने से भी बाज नहीं आ रहा था. इन ठगियों से उस ने कई लोगों की संपत्तियां भी हथिया ली थीं.

कथित स्वामी सच्चिदानंद अपने सभी काम पूरी होशियारी से कर रहा था. फिर भी मादक पदार्थों की तस्करी करते 14 अक्तूबर, 2014 को वह पंजाब में पठानकोट पुलिस के हत्थे चढ़ गया. चूंकि वह साधु लिबास में था और मादक पदार्थों की मात्रा भी कुल 250 ग्राम थी, इसलिए उस ने पुलिस को यही बताया कि यह नशा वह अपने निजी इस्तेमाल के लिए रखे हुए था. जो भी हो, पुलिस ने उस की बातों में आ कर उस से सख्त पूछताछ नहीं की, वरना उस के द्वारा किए गए कत्ल जैसे संगीन अपराध का तभी खुलासा हो जाता और वह जालंधर की उसी जेल में सलाखों के पीछे होता, जहां से अदालत ले जाते वक्त फरार हुआ था.

खैर, पठानकोट पुलिस ने सच्चिदानंद से नरमी का व्यवहार करते हुए उस का कस्टडी रिमांड न ले कर उसे अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. इस का फायदा उठा कर एक दिन उस ने वहां से भी फरार होने की सोची. एक दिन जेल के अपने सैल में लेटे हुए उस ने यह कह कर जोरों से चिल्लाना शुरू कर दिया कि उस के पेट में जोरों का दर्द हो रहा है. जेल अधिकारियों ने तत्काल उसे अस्पताल में भरती करवाने की व्यवस्था कर दी. अस्पताल में उस की निगरानी के लिए 2 सिपाही भी तैनात किए गए. आखिर वह उन्हें चकमा दे कर पहली ही रात अस्पताल से फरार हो गया.

वहां से वापस दिल्ली पहुंच कर वह कल्पना के साथ लिव इन रिलेशन में रहने लगा, साथ ही स्वामी सच्चिदानंद के रूप में प्रवचनों के कार्यक्रम भी करता रहा. लेकिन पता नहीं कैसे पुलिस ने उस के आपराधिक अतीत का पता लगा कर उसे गिरफ्तार कर लिया. दिल्ली पुलिस ने अपनी पूछताछ पूरी कर सत्येंद्र उर्फ स्वामी सच्चिदानंद को न्यायिक हिरासत में भेजने की व्यवस्था करने के अलावा पंजाब पुलिस को उस की गिरफ्तारी की सूचना दे दी. पठानकोट पुलिस की एक टीम दिल्ली जा कर उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले आई. इस बार उन्होंने स्वामी सच्चिदानंद उर्फ सत्येंद्र से गहन एवं व्यापक पूछताछ की. इस पूछताछ में भी उस ने वही सब बताया था, जो वह पहले ही दिल्ली पुलिस को बता चुका था.

पूछताछ के बाद उसे न्यायिक हिरासत में गुरदासपुर की सैंट्रल जेल भेज दिया गया, जहां से नवांशहर पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले गई. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Hindi Crime Story: बदल जाए जब प्यार

Hindi Crime Story: बिरमा को अनुज यादव से प्यार हुआ तो वह पुराने प्रेमी राजकुमार से पीछा छुड़ाने के बारे में सोचने लगी. प्रेमी से पीछा छुड़ाने के लिए बिरमा ने जो रास्ता अपनाया, क्या वह उचित था?

फिरोजाबाद से मैनपुरी की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित थानाकस्बा घिरोर के नजदीकी गांव नंगला केहरी के शिव मंदिर के पास जब गांव वालों ने 2-2 लाशें पड़ी देखीं तो परेशान हो उठे. उन्होंने तुरंत इस की सूचना थाना घिरोर पुलिस को दी. गांव नंगला केहरी थाना घिरोर के अंतर्गत ही आता था. वह थाने के नजदीक ही था, इसलिए थानाप्रभारी देवेश कुमार जल्दी ही घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतकों की उम्र 35-40 साल रही होगी. शक्लसूरत और पहनावे से दोनों ही ठीकठाक घरों के लग रहे थे. लाशों के आसपास खून नहीं था, इस से पुलिस समझ गई कि इन्हें कहीं दूसरी जगह मार कर लाशें यहां फेंकी गई हैं.

गांव वाले भी उन्हें नहीं पहचान पाए थे. इस का मतलब वे इस इलाके के रहने वाले नहीं थे. पुलिस को लाशों की तलाशी में भी कुछ नहीं मिला था, जिस से उन की पहचान हो पाती. पुलिस को लगा कि इन की शिनाख्त में परेशानी होगी. लेकिन जब उन्हें एक लाश की कमीज पर सिलने वाले दरजी का स्टिकर दिखाई दिया तो मन को थोड़ा संतोष हुआ कि शायद इस से कुछ मदद मिल जाए. पुलिस ने कोशिश की तो उस स्टिकर से मदद ही नहीं मिली, बल्कि मृतकों के घर तक पहुंच गई. कमीज पर जो स्टिकर लगा था, वह आगरा के फतेहाबाद के एक दरजी का था. थाना घिरोर पुलिस दरजी के यहां पहुंची तो उस ने तुरंत मृतक की शिनाख्त कर दी. उस ने बताया कि यह कमीज गांव छहबिस्वा के रहने वाले राजकुमार की है.

थाना घिरोर पुलिस ने राजकुमार के घर पहुंच कर उस के बारे में पूछा तो घर वालों ने कहा कि वे खुद ही राजकुमार और लक्ष्मीकांत को ढूंढ रहे हैं. दोनों एक दिन पहले फिरोजाबाद में रहने वाली अपनी बहन के यहां जाने की बात कह कर घर से निकले थे, लेकिन वे बहन के यहां पहुंचे ही नहीं. चिंता की बात यह है कि उन का फोन भी बंद है. जब पुलिस ने घर वालों को बताया कि राजकुमार और लक्ष्मीकांत की हत्या हो गई है तो घर वाले हैरान होने के साथसाथ रोनेबिलखने लगे. घर वालों की समझ में नहीं आ रहा था कि उन की हत्या क्यों की गई?

क्योंकि उन की ऐसी किसी से दुश्मनी भी नहीं थी. लेकिन जब पुलिस ने पूछा कि दोनों का किसी महिला से कोई चक्कर वगैरह तो नहीं था तो घर वालों ने बताया कि राजकुमार का फिरोजाबाद में रह रही बिरमा से संबंध था. उस का यह संबंध तब से था, जब वह इसी गांव में रहती थी. 2 भाइयों की हत्या को ले कर पुलिस गंभीर थी. बिरमा की ससुराल आगरा के थाना फतेहाबाद के गांव खिसवा में थी. राजकुमार का तभी से उस के यहां आनाजाना था. लेकिन इधर उस का पति प्रहलाद सिंह उसे और बच्चों को ले कर फिरोजाबाद में रहने लगा था. पुलिस ने सबूत जुटाने के लिए राजकुमार के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स के अनुसार राजकुमार की घटना वाले दिन एक नंबर पर कई बार बात हुई थी. उस नंबर के बारे में पुलिस ने पता किया तो वह नंबर फिरोजाबाद में झील की पुलिया की रहने वाली ऊषा का निकला.  पुलिस ऊषा के घर पहुंची तो वह घर से गायब थी. उस के घर से गायब होने पर पुलिस को उस पर शक हुआ. पुलिस ने उस के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि ऊषा देहधंधा करने के अलावा लड़कियां भी सप्लाई करती थी. ऊषा के मिलने पर ही स्थिति साफ हो सकती थी. पुलिस ऊषा के पीछे लग गई. वह जहांजहां मिल सकती थी, पुलिस ने छापा मारा. उस के पति बलबीर पर भी शिकंजा कसा गया, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला. इस के बाद मुखबिरों की मदद ली गई. तब जा कर मैनपुरी बसअड्डे से उसे गिरफ्तार किया गया.

उस के साथ एक औरत और थी. दोनों दिल्ली जाने की फिराक में थीं. पूछताछ में पता चला कि ऊषा के साथ जो औरत थी, वह बिरमा थी. पुलिस उस से भी पूछताछ करना चाहती थी. थाने ला कर उन से पूछताछ की गई तो उन के बताए अनुसार, राजकुमार और उस के चचेरे भाई लक्ष्मीकांत की हत्या की जो कहानी सामने आई, सुन कर पुलिस भी सन्न रह गई. हत्या की यह कहानी कुछ इस प्रकार थी: आगरा के थाना फतेहाबाद के गांव छहबिस्वा के रहने वाले राजेंद्र सिंह का बेटा था राजकुमार. उस के 2 भाई और थे, भोले और पूरन. राजेंद्र सिंह गांव का खातापीता किसान था.

राजकुमार की शादी मुरैना के जनकपुर की रहने वाली गुड्डी के साथ हुई थी, जिस से उसे एक बेटी और 2 बेटे थे. राजकुमार के पड़ोस के गांव में रहता था प्रहलाद सिंह, जो ब्याज पर पैसे देने का काम करता था. राजकुमार अकसर प्रहलाद सिंह के घर जाया करता था. वह उस की पत्नी बिरमा को भाभी कहता था. न जाने क्यों बिरमा उस की खूब आवभगत करती थी. राजकुमार को भी वह अच्छी लगती थी. एक तो बिरमा का अच्छा लगना, दूसरे उस के द्वारा आवभगत करना, राजकुमार उस की ओर आकर्षित हो गया. फिर वह उसे अपनी बनाने के चक्कर में रहने लगा. दूसरी ओर बिरमा ब्याही भले प्रहलाद सिंह के साथ थी, लेकिन कभी उस ने उसे पसंद नहीं किया, इस की वजह यह थी कि प्रहलाद सिंह कमजोर दिमाग का था.

बिरमा उस के साथ बिलकुल खुश नहीं थी. इसीलिए राजकुमार के आने पर वह उस की खूब आवभगत करती थी. क्योंकि वह उसे पसंद करती थी. दोनों ओर से आकर्षण की डोर बढ़ी तो उसे जुड़ने में ज्यादा देर नहीं लगी. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला चल निकला. लेकिन यह सब चोरीछिपे हो रहा था. बिरमा भी 1 बेटी और 2 बेटों की मां थी. वह रहती भले प्रहलाद सिंह के साथ थी, लेकिन वह पति राजकुमार को ही मानती थी. कोई बात आखिर कितने दिनों तक छिपी रह सकती है. धीरेधीरे गांव वालों को बिरमा और राजकुमार के संबंधों का पता चल गया.

कुछ लोगों ने प्रहलाद सिंह को आगाह भी किया, लेकिन उस में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह बिरमा को रोक सकता. दूसरी ओर राजकुमार भी दबंग किस्म का युवक था. इसलिए सब कुछ जानते हुए भी उसे कोई रोक नहीं सका. इस तरह राजकुमार और बिरमा बिना किसी रुकावट के एकदूसरे से मिलते रहे. लेकिन जब पति के इन संबंधों की जानकारी गुड्डी को हुई तो वह तनाव में रहने लगी. बिरमा की वजह से पतिपत्नी के बीच दूरियां पैदा होने लगीं. उस ने कई बार सास से शिकायत भी की, लेकिन मां भी बेटे को नहीं रोक पाई. लिहाजा इसी गम और चिंता में एक दिन गुड्डी चल बसी.

गुड्डी जब मरी थी, बच्चे छोटेछोटे थे. लेकिन राजकुमार ने दूसरी शादी नहीं की, क्योंकि उस का काम तो बिरमा से चल ही रहा था. अब वह पूरी तरह से आजाद था. प्रहलाद सिंह की गांव में ज्यादा बदनामी होने लगी तो उस ने अपना गांव छोड़ दिया और फिरोजाबाद के थाना लाइन पार के रामनगर गांव में अपना मकान बनवा कर परिवार के साथ रहने लगा. जिस बदनामी की वजह से प्रहलाद सिंह ने गांव छोड़ा था, उस ने यहां आने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ा. बिरमा और राजकुमार के संबंध उसी तरह बने रहे. वह यहां भी लगातार आता रहा. फिरोजाबाद में बिरमा की दोस्ती ऊषा से हो गई तो वह उस के घर भी आनेजाने लगी.

यहीं ऊषा की मुलाकात राजकुमार से हुई. राजकुमार को पता चला कि ऊषा देहधंधा तो करती ही है, लड़कियां भी सप्लाई करती है तो उसे खुशी हुई. इस के बाद वह ऊषा के घर जा कर अपने लिए लड़कियां मंगवाने लगा. इस तरह शारीरिक सुख की चाह में वह ऊषा के घर भी जाने लगा. बिरमा को इस की जानकारी थी, लेकिन उसे इस से कोई मतलब नहीं था, क्योंकि राजकुमार अब भी उस पर दिल खोल कर पैसे खर्च करता था. लेकिन जब बिरमा की मुलाकात चिलवा गेट के रहने वाले अनुज यादव से हुई तो राजकुमार उसे खटकने लगा. अनुज भी सूदखोरी का काम करता था. वह भी बिरमा पर दिल खोल कर रुपए खर्च करने लगा था. था तो वह भी शादीशुदा और बालबच्चेदार, लेकिन जैसा कहा जाता है कि आदमी को घर की मुर्गी दाल बराबर लगती है, वैसा ही कुछ अनुज के साथ भी था.

इस नए प्रेमी के जिंदगी में आने के बाद बिरमा राजकुमार से दूरियां बनाने लगी. उस ने राजकुमार का फोन रिसीव करना भी बंद कर दिया. बिरमा के इस व्यवहार से राजकुमार को परेशानी होने लगी, क्योंकि उसी से मिल कर उस के दिल को तसल्ली मिलती थी. जब उसे बिरमा से कुछ ज्यादा ही उपेक्षा मिलने लगी तो एक दिन उस ने कहा, ‘‘बिरमा, इधर तुम बदल नहीं गई हो, लगता है मैं तुम्हें भारू लगने लगा हूं?’’

‘‘नहीं तो, यह तुम्हारा वहम है. मैं तुम्हें अभी भी उसी तरह चाहती हूं. लेकिन अब परेशानी की बात यह है कि बच्चे बड़े हो गए हैं. उन के सामने यह सब अच्छा नहीं लगता.’’

बिरमा राजकुमार से ये बातें कह ही रही थी कि तभी उस की बेटी आ गई. उसे देख कर राजकुमार मुसकराते हुए बोला, ‘‘तुम सही कह रही हो, बच्चे बड़े हो गए हैं. मैं ने तो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया.’’

राजकुमार ने बिरमा की बेटी को जिस तरह  देखा था, उस की नजरों में खोट था, जिसे बिरमा ने ताड़ लिया था. उस ने तुरंत बेटी को अंदर जाने का इशारा करते हुए राजकुमार से धीरे से कहा, ‘‘अब हम घर के बाहर मिले तो ज्यादा ठीक रहेगा.’’

बिरमा की बेवफाई राजकुमार की समझ में नहीं आ रही थी. उस की उपेक्षा से वह चिंतित था. उसे लगा, इस के पीछे जरूर कोई बात है. उस ने कोशिश की तो सच्चाई सामने आ गई. बिरमा और अनुज यादव के संबंधों की उसे जानकारी हो गई. बिरमा ने उसे शारीरिक सुख दिया था तो उस ने भी उस के बदले उस के लिए कम नहीं किया था. अब उसे चिंता थी कि अगर बिरमा हाथ से निकल गई तो उसे शारीरिक सुख कैसे मिलेगा? वह किसी भी कीमत पर उसे छोड़ना नहीं चाहता था. इसलिए उस ने बिरमा से पूछा, ‘‘अनुज यादव तुम्हारा कौन लगता है?’’

‘‘अनुज यादव से मेरा क्या संबंध? बस मोहल्ले में रहता है?’’ बिरमा ने कहा.

‘‘बिरमा, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. इसलिए कान खोल कर सुन लो, अगर हमारे बीच कोई आया तो मैं न तुम्हें जिंदा छोड़ूंगा और न उसे.’’ राजकुमार ने धमकी दी.

राजकुमार की इस धमकी से बिरमा परेशान जरूर हो गई, लेकिन अब वह अनुज को कतई नहीं छोड़ सकती थी. वह उसी की बदौलत राजकुमार से पीछा छुड़ाना चाहती थी. जबकि यह इतना आसान नहीं था. इसी वजह से दोनों के बीच तनाव बढ़ने लगा. जब राजकुमार को लगा कि बिरमा उस के बजाय अनुज को ज्यादा महत्त्व दे रही है तो उस ने अपनी लायसेंसी पिस्तौल से बिरमा के घर फायरिंग करते हुए धमकी दी कि अगर उस ने अनुज से संबंध खत्म नहीं किए तो अच्छा नहीं होगा. राजकुमार के तेवर देख कर बिरमा डर गई. बिरमा को लगने लगा कि राजकुमार कभी भी उस की बेटी पर हाथ डाल सकता है. यह बात उस ने अनुज से बता कर कहा, ‘‘अगर तुम मुझ से संबंध बनाए रखना चाहते हो तो राजकुमार नाम के इस कांटे को तुम्हें निकालना होगा.’’

अनुज को पता चल गया था कि राजकुमार दबंग किस्म का आदमी है. बिरमा के लिए वह उस की भी जान ले सकता है. इसलिए उस ने सोचा कि राजकुमार उस के साथ कुछ गड़बड़ करे, उस के पहले ही वह उसे ठिकाने लगा दे. इस के बाद उस ने ऊषा और बिरमा के साथ बैठ कर राजकुमार को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. योजना बनने के बाद ऊषा ने राजकुमार को फोन किया, ‘‘एक अच्छी लड़की आ गई है. अगर चाहो तो आ जाओ. लेकिन पैसा थोड़ा ज्यादा लगेगा.’’

राजकुमार ने कहा, ‘‘पैसे की कोई चिंता नहीं है. बस लड़की अच्छी होनी चाहिए.’’

‘‘लड़की अच्छी है, तभी तो फोन किया है.’’

‘‘फिर रात में मैं पहुंच रहा हूं.’’ कह कर राजकुमार ने फोन काट दिया.

शाम को राजकुमार ने घर वालों से कहा कि वह बहन के यहां जा रहा है. वह घर से निकला तो चचेरा भाई लक्ष्मीकांत दिखाई दे गया. लड़की के बारे में बता कर उस ने उसे भी साथ ले लिया. लक्ष्मीकांत भी विधुर था. शारीरिक सुख की लालसा से वह भी राजकुमार के साथ चल पड़ा. दोनों ऊषा के घर पहुंचे तो वहां बिरमा भी मौजूद थी. बिरमा और लड़की को देख कर राजकुमार ने कहा कि वह बिरमा के साथ मौजमस्ती करेगा और लक्ष्मीकांत लड़की के साथ. ऊषा ने लड़की के साथ लक्ष्मीकांत को संतनगर भेज दिया तो राजकुमार को बिरमा के साथ तिलकनगर के अन्य मकान में. राजकुमार अपनी पिस्तौल लिए था.

लेकिन जब वह बिरमा के साथ उस घर में पहुंचा तो वहां पहले से घात लगाए बैठे अनुज यादव, लाला पंडित और विजय सिंह उस पर टूट पड़े. अनुज यादव ने राजकुमार की हत्या के लिए उन दोनों को 2 लाख रुपए दिए थे. राजकुमार को पिस्तौल निकालने का मौका ही नहीं मिला. उन लोगों ने ईंटपत्थर से राजकुमार की हत्या कर दी. लक्ष्मीकांत लड़की के साथ संतनगर स्थित जिस मकान में आया था, थोड़ी देर बाद टाटा मैजिक से राजकुमार की लाश ले कर तीनों वहां पहुंचे. उन्हें देख कर वह हक्काबक्का रह गया. वह कुछ समझ पाता, गोली मार कर उस की भी हत्या कर दी गई.

इस के बाद उस की लाश को भी उसी टाटा मैजिक में डाल कर वे मैनपुरी को जाने वाली सड़क पर चल पड़े. रोड पर ही स्थित थानाकस्बा घिरोर के पास गांव नंगला केहरी के शिवमंदिर के पास दोनों लाशें फेंक कर अपनेअपने घर चले गए. थाना घिरोर पुलिस ने ऊषा और बिरमा को गिरफ्तार कर हत्या का खुलासा तो कर दिया, लेकिन अभी मुख्य अभियुक्त उन के हाथ नहीं लगे थे. देवेश कुमार मुख्य अभियुक्तों तक पहुंचते, उस के पहले ही उन का तबादला हो गया. उस के बाद आए नए थानाप्रभारी दिवाकर सिंह यादव. उन्होंने काफी कोशिश कर के अनुज यादव को गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में अनुज यादव ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया, लेकिन वह राजकुमार की मोटरसाइकिल, पिस्तौल और मोबाइल नहीं बरामद कर सके. उस का कहना था कि इन चीजों के बारे में लाला पंडित और गुन्नू यादव उर्फ विजय सिंह ही कुछ बता सकते हैं. अनुज यादव की गिरफ्तारी के बाद लाला पंडित और विजय सिंह को लगा कि वे कभी भी पकड़े जा सकते हैं. पकड़े जाने के डर से दोनों ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस पूछताछ तथा सामान की बरामदगी के लिए उन्हें रिमांड पर लेने की कोशिश कर रही थी. लेकिन कथा लिखे जाने तक उन्हें रिमांड पर नहीं लिया जा सका था. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: वासना की आग – परिवार हुआ बरबाद

Hindi Crime Story:‘‘तुम्हारी बात तो कोई नहीं है, क्योंकि तुम तो कभी मेरा कहना मानती ही नहीं हो. पर कम से कम बेटियों का तो खयाल रखो. तुम्हारी आदतों का उन पर गलत प्रभाव पड़ सकता है. उन के बारे में तो सोचो.’’ राम सजीवन ने अपनी पत्नी फूलमती को समझाते हुए कहा.

‘‘हमें पता है कि हमें अपनी बेटियों को कैसे रखना है. हम कोई नासमझ नहीं हैं, जो अच्छीबुरी बात न समझें. लेकिन तुम्हें तो केवल दूसरों की बातें सुन कर हमारे ऊपर आरोप लगाने में ही मजा आता है.’’ पत्नी फूलमती ने झल्लाते हुए पति की बातों का जबाव दिया.

‘‘दूसरे की बातों में क्यों आऊंगा मैं? क्या मुझे दिखाई नहीं दे रहा कि तुम क्या करती हो. तुम्हारी बातें पूरे मोहल्ले में किसी से भी छिपी हुई नहीं हैं.’’ कहते हुए राम सजीवन घर से बाहर जाने लगा.

‘‘दरअसल, अब तुम शक्कीमिजाज के हो गए हो. हमारे पास जो भी खड़ा हो जाए. जो भी हमारे काम आ जाए. हमारे दुखदर्द में शामिल हो जाए, उसे देख कर तुम केवल यही सोचते हो कि उस के हमारे साथ संबंध बन गए हैं.’’ फूलमती बोली.

‘‘हम शक नहीं कर रहे बल्कि हकीकत है. हमें अब तुम्हारी चिंता नहीं है क्योंकि तुम मनमानी करोगी. हम तो बस बेटियों को ले कर परेशान हो रहे हैं. एक बार वे अपने घर चली जाएं. बस, उस के बाद तो हम तुम्हें कभी देखेंगे भी नहीं.’’ राम सजीवन ने कहा.

पत्नी की गलत आदतों की वजह से राम सजीवन मानसिक रूप से परेशान रहने लगा था. उस के एक बेटा और 3 बेटियां थीं. वह अपने तीनों जवान बच्चों को भी अच्छी सीख देता रहता था. जब उसे लगा कि पत्नी पर उस के कहने का कोई असर नहीं हो रहा है तो उस ने खुद को परिवार से दूर करना शुरू किया. वह स्वभाव से एकाकी रहने लगा. 38 साल की फूलमती ने 20-22 साल के कई लड़कों के साथ दोस्ती कर ली थी. वह उन लड़कों को अपने घर पर बुलाती रहती थी. यह बात मोहल्ले वालों से भला कैसे छिपी रह सकती थी. जिस से पूरे मोहल्ले में फूलमती के ही चर्चे होते रहते थे.

राम सजीवन को लगता था कि पत्नी की बुरी हरकतों का प्रभाव उस की जवान हो रही बेटियों पर पड़ेगा. इस कारण वह पत्नी को लड़कों की संगत से दूर रहने को कहता था. पति की बात को मानने के बजाय फूलमती उस से झगड़ने लगती थी. इस कारण पति और पत्नी अलगअलग रहने लगे.

राम सजीवन अपने घर से दूर अपने प्लौट पर बने मकान में रहने लगा था. जबकि फूलमती लखनऊ के ही थाना गोसाईंगंज स्थित बखारी गांव के मजरा रानीखेड़ा में एक बेटे रवि कुमार और तीनों बेटियों के साथ रह रही थी. पति के अलग रहने से फूलमती को और भी आजादी मिल गई थी. क्योंकि अब उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. अलग मकान पर रहने के बाद भी राम सजीवन पत्नी को अकसर समझाता रहता था, जिस की वजह से दोनों में झगड़ा भी हो जाता था.

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11 मई, 2021 की बात है. लखनऊ शहर के थाना गोसाईंगंज स्थित बखारी गांव के मजरा रानी खेड़ा के रहने वाले रवि कुमार ने पुलिस को सूचना दी कि उस के पिता 40 साल के राम सजीवन की हत्या किसी ने गांव के बाहर कर दी गई है. उस के पिता अपने घर से दूर प्लौट पर रहते थे. सूचना पा कर थानाप्रभारी अमरनाथवर्मा पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया तो उस का चेहरा ईंट से कुचला हुआ था. खून सनी ईंट भी वहीं पड़ी थी. मृतक के घर के लोग वहां मौजूद थे. उन से प्रारंभिक पूछताछ के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी.

राम सजीवन दलित था. गांव में उस की किसी से ऐसी कोई दुश्मनी नहीं थी जिस की वजह से हत्या की जा सके. ऐसे में पुलिस को हत्या की वजह समझ नहीं आ रही थी. लखनऊ के पुलिस कमिश्नर डी.के. ठाकुर के निर्देश पर डीसीपी (दक्षिण) डा. ख्याती गर्ग, अपर पुलिस उपायुक्त (दक्षिण) पूर्णेंदु सिंह और एसीपी स्वाति चौधरी के निर्देशन में गोसाईंगंज के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अमरनाथ वर्मा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई.

टीम में इंसपेक्टर डा. रामफल प्रजापति, एसआई फिरोज आलम सिद्दीकी, दीपक कुमार पांडेय, महिला एसआई नीरू यादव, कांस्टेबल गिरजेश यादव, रमापति पांडेय, अकबर, कुलदीप, सगीर अहमद, किशन जायसवाल, जितेंद्र भाटी को शामिल किया गया. थाना पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच की टीम को भी केस की जांच में लगा दिया गया. इस टीम में इंसपेक्टर तेज बहादुर सिंह, एसआई संतोष कुमार सिंह, दिलीप मिश्रा, प्रमोद कुमार सिंह कांस्टेबल विनय यादव, वीर सिंह, अजय तेवतिया, राजीव कुमार और अभिषेक कुमार शामिल थे.

राम सजीवन की हत्या की वजह जानने के लिए जब पुलिस ने उस की पत्नी फूलमती से पूछा तो वह बोली, ‘‘उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. हमारे साथ भी कोई लड़ाईझगड़ा नहीं था. बस वह नाराज हो कर गांव के बाहर वाले मकान में रहते थे.’’

फूलमती के पति की हत्या हुई थी. इस कारण वह परेशान थी. इस वजह से पुलिस बहुत दबाव डाल कर उस से पूछताछ नहीं कर पा रही थी. फूलमती हर बार बयान बदल रही थी. एक बार उस ने कहा, ‘‘वह खराब संगत में रहता था. इस कारण कुछ नशेड़ी लोगों से उस की दोस्ती हो गई थी. हो सकता है कि उन लोगों में से किसी ने नशे में हत्या की हो.’’

पुलिस को भी राम सजीवन का शव जिस हालत में मिला था, उसे देख कर ऐसा ही लग रहा था जैसे किसी ने मारने के बाद भी अपना गुस्सा निकालने के लिए ईंट से हमला कर के मुंह को कुचल दिया हो. जिस से उस की पहचान न हो सके. पर यह मसला पहचान छिपाने का नहीं दुश्मनी का लग रहा था. पुलिस ने गांव के लोगों से भी पूछताछ शुरू की तो पता चला कि राम सजीवन और उस की पत्नी के झगड़े की वजह पत्नी का कुछ अलग लोगों से संबंध था. 4 बच्चों की मां होने के बाद भी फूलमती दूसरे लोगों से हंसीमजाक करने में आगे रहती थी.

इस जानकारी के बाद पुलिस ने फूलमती से फिर से पूछताछ शुरू की. बारबार बयान बदलने से पुलिस को भी यह विश्वास होने लगा कि हत्या की जानकारी फूलमती को जरूर होगी. पुलिस के साथ पूछताछ और सवालों में वह फंस गई. थानाप्रभारी ने पूछा, ‘‘तुम्हें यह तो पता है कि किस ने मारा है. भले ही तुम उस में शामिल न रही हो. अगर तुम सच बता दोगी तो तुम्हें कुछ नहीं होगा. जिस ने यह हत्या की है, उसी को सजा मिलेगी.’’

पुलिस से यह भरोसा पा कर फूलमती ने कहा, ‘‘गांव बखारी के ही रहने वाले कल्याण ने यह किया है. राम सजीवन उसे हमारे घर आता देख कर गुस्सा होता था. यह बात उस से सहन नहीं हुई तो उस ने राम सजीवन की हत्या कर दी.’’

अब पुलिस टीम ने बिना समय गंवाए कल्याण को पकड़ लिया. कल्याण ने खुद को फंसता देख पूरी कहानी बता दी. कल्याण ने बताया, ‘‘राम सजीवन को मेरा फूलमती से मिलनाजुलना अच्छा नहीं लगता था. इस बात से वह फूलमती से नाराज रहता था. फूलमती भी पति की रोजरोज की कलह से परेशान हो गई थी. उसी के कहने पर राम सजीवन को रास्ते से हटाया.

‘‘फूलमती के दबाव डालने के बाद मैं ने उसे रास्ते से हटाने की योजना बनाई. मैं अकेले यह काम करने की हालत में नहीं था. इसलिए मैं ने अपने साथी सतीश से बात की. सतीश आपराधिक प्रवृत्ति का था. वह सुरियामऊ गांव का रहने वाला था.

‘‘हम लोगों ने अपने 2 और साथी सूरज और नीरज को भी शामिल किया. इस के बाद 11 मई की रात को राम सजीवन के घर में घुस कर हम चारों ने उस की हत्या कर दी.’’

कल्याण ने बताया, ‘‘राम सजीवन की हत्या करने के बाद उस के शव को घर से 100 मीटर दूर गांव से बाहर वाली सड़क पर डाल दिया. इस की जानकारी फृलमती को दी तो उस ने अपने मन की भड़ास और गुस्सा निकालने के लिए ईंट से मृत पति के चेहरे पर कई वार किए. मुंह को बुरी तरह से कुचल दिया.’’

कल्याण से मिली जानकारी के आधार पर गोसाईंगंज पुलिस ने सब से पहले फूलमती को पकड़ा उस के बाद रानीखेड़ा के रहने वाले 20 साल के सूरज, सुरियामऊ के रहने वाले 22 साल के सतीश, इसी गांव के 19 साल के नीरज को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने आरोपियों के पास से खून लगे कपड़े भी बरामद किए.

पुलिस ने राम सजीवन हत्याकांड में 5 अभियुक्तों राम सजीवन की पत्नी फूलमती, कल्याण, सतीश, सूरज और नीरज के खिलाफ धारा 302, 147, 149 और 201 आईपीसी के साथ 3 (2) (5) एससीएसटी ऐक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया. गोसाईंगंज थाना पुलिस और क्राइम टीम ने राम सजीवन की निर्मम हत्या करने वाले सभी आरोपियों को गिरफ्तारकर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया. Hindi Crime Story

Hindi Crime Story: तांत्रिक की तीसरी शादी

Hindi Crime Story: समझदार होते ही सोनू की समझ में आ गया था कि यह दुनिया मूर्खों से अटी पड़ी है, बस मूर्ख बनाने का तरीका मालूम होना चाहिए. इस के बाद उस ने तंत्रमंत्र सीखा और अंधविश्वास में डूबे लोगों को मूर्ख बनाने लगा. उस की पोल तो तब खुली, जब वह तीसरी शादी के चक्कर में पड़ा.

निशा उन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान थी. उस की परेशानी का आलम यह था कि उसे खानेपीने तक की सुध नहीं रहती थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? पिछले 2-3 महीने से कुछ ऐसा उलटा चक्कर चल रहा था कि उस का अच्छाखासा चल रहा घर डूबते जहाज की तरह हिचकोले लेने लगा था. पहले मां बीमार हुई, उस के बाद छोटे भाई का हाथ टूट गया. उन दोनों को संभालने के चक्कर में उस की अपनी नौकरी चली गई. मां कुछ ठीक हुई तो उस ने दौड़भाग कर छोटामोटा काम ढूंढा, लेकिन मां एक बार फिर बीमार पड़ गई.

रोज कुआं खोद कर पानी पीने वालों के घर पैसा होता ही कहां है? निशा ने जो थोड़ाबहुत जमा कर रखा था, वह सब मां और भाई के इलाज पर खर्च हो गया. अब मां का इलाज कराने की कौन कहे, खाने के भी लाले पड़ गए. वह मां का इलाज कराए या खाने का इंतजाम करे. मकान मालिक का किराया भी वह 3 महीने से नहीं दे पाई थी. निशा परेशान थी कि ऐसे में कैसे क्या होगा? वह मां के इलाज और खानेपीने का जुगाड़ करने में जूझ ही रही थी कि एक अन्य खबर ने उसे झकझोर कर रख दिया. मकान मालिक ने उसे बुला कर कहा कि वह उस का पिछला सारा किराया अदा कर के मकान खाली कर दे.

निशा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘अंकलजी, आप का किराया मैं धीरेधीरे अदा कर दूंगी. रही बात मकान खाली करने की तो इस हालत में हम कहां जाएंगे? अचानक मकान खाली करना हमारे लिए आसान नहीं है अंकलजी. पहले आप अपना पिछला किराया तो अदा हो जाने दीजिए. उस के बाद हम कोई इंतजाम कर के आप का मकान खाली करेंगे. आप हमें थोड़ी मोहल्लत दीजिए.’’

‘‘भई, मोहल्लत देने का सवाल ही नहीं उठता. तुम लोगों का हर महीने का यही तमाशा है. वैसे भी अगले महीने मेरे घर बेटी की शादी है. नातेरिश्तेदार आएंगे तो उन के उठनेबैठने के लिए जगह तो चाहिए. जब अपने पास जगह है तो बाहर इंतजाम करने की क्या जरूरत है. इसलिए तुम मेरा मकान खाली कर दो.’’ मकान मालिक ने साफसाफ कह दिया. निशा के लिए मकान खाली करना इतना आसान नहीं था. क्योंकि मकान का बकाया किराया, राशन और दूध वाले को मिला कर लगभग 15 हजार रुपए होते थे. अगर वह मकान खाली करती तो नए मकान का एडवांस किराया, सामान वगैरह की ढुलाई आदि को ले कर इतने ही रुपए और चाहिए थे.

इतनी बड़ी रकम का इंतजाम वह कहां से कर सकती थी? जबकि उस के पास उस समय 20 रुपए भी नहीं थे. अपनी यह परेशानी निशा ने अपनी सहेली सुधा से बताई तो सहेली की परेशानी सुन कर वह भी सोच में पड़ गई. अगर उस के पास पैसे होते तो इस हालत में वह अवश्य ही सहेली की मदद कर देती. अचानक उसे जैसे कुछ याद आया हो तो वह बोली, ‘‘निशा, मुझे लगता है तुझे सोनू तांत्रिक से मिलना चाहिए. वह तेरी समस्या का कोई न कोई समाधान जरूर कर देगा.’’

‘‘यह सोनू तांत्रिक कौन है और वह हमारी समस्या का समाधान कैसे कर सकता है?’’

‘‘यह तो वहां चलने पर ही पता चलेगा. लेकिन जहां तक मुझे उस के बारे में जानकारी मिली है, वह हर छोटीबड़ी समस्या का समाधान चुटकी बजा कर कर देता है. बस तू तैयार हो जा, कौन हमें दूर जाना है. यहीं न्यू कंपनी बाग की गली नंबर 3 में उस की कोठी है.’’

‘‘लेकिन सुधा, मैं तंत्रमंत्र के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती. मुझे अपने कर्म पर भरोसा है. आज नहीं तो कल हालात बदल ही जाएंगे.’’ निशा ने कहा.

निशा तांत्रिक सोनू के पास जाना नहीं चाहती थी, लेकिन सुधा की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा. निशा सुधा के साथ जिस समय तांत्रिक सोनू की कोठी पर पहुंची, वह कमरे में पूजा कर रहा था, इसलिए उन्हें बाहर बैठ कर पूजा खत्म होने का इंतजार करना पड़ा. पूजा खत्म होते ही सोनू ने दोनों को अपने कमरे में बुलाया. तांत्रिक को देख कर निशा हैरान रह गई, क्योंकि वह तांत्रिक जैसा लग ही नहीं रहा था. सोनू तांत्रिक 32-35 साल का राजकुमार जैसा युवक था. आसमानी रंग के सफारी सूट में वह किसी प्रतिष्ठित परिवार का लड़का लग रहा था. निशा के मन में तांत्रिक की जो छवि थी, वह उस के एकदम विपरीत था. उस ने तो सोचा था कि काले से कू्रर चेहरे पर बड़ीबड़ी दाढ़ीमूंछें और गले में ढेरों रुद्राक्ष की मालाएं पहने कोई आदमी बैठा होगा. लेकिन यहां तो मामला एकदम उलटा था.

बहरहाल, तांत्रिक सोनू को प्रणाम कर के दोनों बैठ गईं. सुधा ने निशा का परिचय करा कर उस की समस्या बतानी चाही तो तांत्रिक सोनू ने अपना दायां हाथ उठा कर उसे रोकते हुए कहा, ‘‘देवी, अगर आप ही सब कुछ बता देंगी तो मेरी साधना किस काम आएगी? मुझे पता नहीं है क्या कि आजकल देवी किन हालात से गुजर रही हैं? मां की दवा के लिए भी अभी तक इंतजाम नहीं कर पाई हैं. रात के खाने की भी व्यवस्था करनी है. लेकिन अब चिंता की कोई बात नहीं है. आप मेरे यहां आ गई हैं, अब आप की सारी समस्याएं दूर हो जाएंगीं.’’

सोनू द्वारा अपने घर की स्थिति बताने से जहां निशा शरम से पानीपानी हो गई थी, वहीं वह उस की इस बात से काफी प्रभावित भी हुई. क्योंकि बिना कुछ बताए ही उस ने उस के बारे में सब कुछ जान लिया था. इस तरह पहली ही मुलाकात में वह उस की अंधभक्त बन गई. सोनू ने अंगुलियों पर कुछ गणना कर के कहा, ‘‘मैं नाम तो नहीं बताऊंगा, लेकिन तुम्हारे किसी अपने बहुत खास ने ही तुम्हारे परिवार पर ऐसा इल्म चलवाया है कि तुम दानेदाने को मोहताज हो जाओ. आज रात को मैं उस इल्म को कील दूंगा और फिर किसी दिन श्मशान पूजा कर के उस डाकिनी को भस्म कर दूंगा.’’

निशा मंत्रमुग्ध भाव से सोनू को देखती रही. उस ने होंठों ही होंठों में कुछ मंत्र पढ़े और निशा पर फूंक मारे. इस के बाद सुधा को बाहर भेज कर अपनी गद्दी के नीचे से 5 सौ रुपए का एक नोट निकाल कर निशा की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लो मांजी के लिए दवाओं और आज के खानेपीने की व्यवस्था कर लेना. कल की कल देखी जाएगी.’’

‘‘नहीं, मैं आप के रुपए कैसे ले सकती हूं.’’

‘‘यह मेरा नहीं, मां का आदेश है. मां काली ने मुझे अभीअभी आदेश दिया है कि मैं तुरंत तुम्हारी मदद करूं. मैं मां का सेवक हूं, इसलिए मुझे उन की आज्ञा का पालन करना ही होगा. तुम नि:संकोच ये रुपए रख लो.’’ इस तरह मां के नाम पर सोनू ने निशा को 5 सौ रुपए का नोट लेने पर मजबूर कर दिया.

निशा रुपए ले कर घर आ गई. वह यह सोचसोच परेशान थी कि उस के घर की एकएक बात की जानकारी तांत्रिक सोनू को कैसे हो गई? मकान मालिक ने मकान खाली करने के लिए कहा था, यह बात भी उसे मालूम थी. अगले दिन स्वयं सोनू तांत्रिक निशा के घर आ पहुंचा. वह मां की दवाएं और कुछ सामान भी साथ लाया था. स्वयं को संस्कारी दिखाने के लिए आते ही उस ने निशा की मां के पांव छुए. न चाहते हुए भी निशा को सोनू तांत्रिक की मदद लेनी पड़ी. क्योंकि इस के अलावा उस के पास कोई उपाय भी नहीं था. इस के बाद सोनू निशा और उस के घर वालों की हर तरह से मदद करने लगा.

तंत्रमंत्र और पूजापाठ के नाम पर वह निशा को अपनी कोठी पर बुलाता. थोड़ी देर पूजापाठ कर के निशा से इधरउधर की बातें करने लगता. इस बातचीत में वह उस के घरपरिवार के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए हमदर्दी दिखाने की कोशिश करता. निशा के मकान खाली करने की बात आई तो सोनू तांत्रिक ने मकान मालिक का बकाया अदा कर के निशा को रहने के लिए गली नंबर शून्य वाला अपना मकान दे दिया. सोनू से मिलने के बाद निशा और उस के घर वालों की मुसीबतें लगभग खत्म हो गईं. इस तरह उन की सभी समस्याओं का समाधान हो गया.

धीरेधीरे सोनू तांत्रिक ने निशा और उस के घर के हर सदस्य पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया. घर में था ही कौन, मांबेटी और एक लड़का. निशा के उस घर में अब वही होता था, जो सोनू चाहता था. निशा के घर वालों को भी सोनू का उन के घर में दखल देना अच्छा लगता था. इस में वे अपनी शान भी समझते थे, क्योंकि सोनू तांत्रिक से उन के संबंध थे. सोनू तांत्रिक धनी तो था ही, इलाके में उस का काफी दबदबा भी था. तांत्रिक होने की वजह से लोग उस की इज्जत तो करते ही थे, डरते भी थे. लोग उस के आशीर्वाद के लिए उस के घर के चक्कर लगाते थे.

यही वजह थी कि निशा और उस के घर वाले सोनू तांत्रिक की कृपा पा कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे. बड़ी होशियारी से सोनू तांत्रिक ने निशा के दिल में अपनी जगह बना ली थी. इस के बाद एक रात उस ने डाकिनी पूजा के नाम पर निशा को अपने घर बुलाया. निशा सोनू की कोठी पर जा पहुंची. थोड़ी देर बाद उस ने पूजा शुरू की. पूजा खत्म होने के बाद उस ने कहा कि उस ने उस डाकिनी को भस्म कर दिया है, जो उस के घर वालों को तकलीफ पहुंचाती थी. अब चिंता की कोई बात नहीं है. तथाकथित डाकिनी के खत्म हो जाने की बात पर निशा बहुत खुश हुई. पूजा खत्म होने के बाद सोनू ने निशा का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा,

‘‘निशा, आज मैं तुम से अपने मन की एक ऐसी बात कहने जा रहा हूं, जिस का जवाब तुम्हें काफी सोचसमझ कर देना होगा.’’

हैरानी से निशा ने पूछा, ‘‘ऐसी कौन सी बात है महाराज? खैर, कोई भी बात हो, आप मुझे बताएं क्या, आदेश करें.’’

‘‘निशा, ऐसे मामलों में जोरजबरदस्ती या आदेश नहीं दिया जाता. यह सब प्रेम की भावना के अंतर्गत होता है. प्रेम में वह ताकत होती है, जो 1-2 क्या, हजारों डाकिनीशाकिनी के मुंह मोड़ सकती है. बहरहाल तुम इतना जान लो कि मैं तुम से प्रेम करता हूं और तुम से विवाह करना चाहता हूं.’’ सोनू ने निशा को फंसाने के लिए जाल फेंका.

सोनू की बात सुन कर निशा सन्न रह गई. उस के मुंह से सिर्फ इतना ही निकला, ‘‘महाराज, आप यह क्या कह रहे हैं. कहां आप और कहां मैं? आप में और मुझ में जमीन आसमान का अंतर है.’’

तंत्रमंत्र की दुकान चलाने वाले सोनू ने निशा को अपनी बाहों में ले कर कहा, ‘‘जब मेरा और तुम्हारा मिलन हो जाएगा तो सारे अंतर स्वयं ही खत्म हो जाएंगे. यह मिलन सभी भेदभाव खत्म कर देगा.’’

सम्मोहित सी निशा सोनू तांत्रिक की बातें सुनती रही. इतने बड़े तांत्रिक ने उसे इस योग्य समझा, यह जान कर वह खुद को बड़ी भाग्यशाली समझ रही थी. निशा की कमर में हाथ डाल कर सोनू उसे बैडरूम में ले गया, जहां उस ने वह सब पा लिया, जिस के लिए उस ने इतने बड़े चक्रव्यूह की रचना की थी. दरअसल, सोनू तांत्रिक न हो कर एक ऐसा धूर्त था, जो लोगों की अंधी आस्था की बदौलत उन का आर्थिक एवं शारीरिक शोषण करता था. लोगों को बेवकूफ बना कर वह दोनों हाथों से धन बटोर रहा था. इस के पीछे उस का कोई दोष नहीं था, लोग खुद ही उस के पास अपना शोषण कराने आते थे. अपनी खूनपसीने की कमाई उसे अय्याशी के लिए सौंप रहे थे. समस्या समाधान के नाम पर अपनी बहनबेटियों की इज्जत से खिलवाड़ करा रहे थे.

दुनिया कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, मंगल ग्रह पर पहुंच जाए या किसी नए ब्रह्मांड की खोज कर ले, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोगों के मन में जो अंधविश्वास बैठा है, उसे निकालना आसान नहीं है. जब तक दुनिया में अंधविश्वास है, तब तक सोनू जैसे तथाकथित ढोंगी आम लोगों की बहूबेटियों की इज्जत से खेलते रहेंगे और तंत्रमंत्र का भय दिखा कर लूटते रहेंगे.’

सोनू तांत्रिक यानी सोनू शर्मा मूलरूप से हरियाणा के जिला जींद के रहने वाले चंद्रभान शर्मा का मंझला बेटा था. चंद्रभान धार्मिक प्रवृत्ति के शरीफ इंसान थे. वह कर्म को पूजा मानते थे. लेकिन उन के बेटे सोनू शर्मा की नीति उन के एकदम विपरीत थी. सोनू शुरू से ही अतिमहत्त्वाकांक्षी और आपराधिक प्रवृत्ति का युवक था. जल्दी ही उस की समझ में आ गया था कि दुनिया मूर्ख है. बस उसे मूर्ख बनाने वाला होना चाहिए. जो मजा लोगों को बेवकूफ बना कर कमाने में है, वह हाड़तोड़ मेहनत करने में नहीं है. उसे पता चल ही गया था कि अंधी आस्था को ले कर लोग अपना सर्वस्व तक लुटाने को तैयार रहते हैं.

और मजे की बात यह कि लुटने के बाद किसी को बताते भी नहीं. यह एक ऐसा कारोबार था, जिस में कुछ खास लगाना भी नहीं था, जबकि कमाई इतनी मोटी थी कि इस का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. इस के अलावा लोग उसे पूजते भी भगवान की तरह हैं. यही सब देखसुन कर सोनू को इस कारोबार से अच्छा और कोई दूसरा कारोबार नहीं लगा. इस के बाद कुछ तंत्रमंत्र और टोटके सीख कर वह तांत्रिक बन गया. हरियाणा के कई शहरों में तंत्रमंत्र की छोटीमोटी ठगी करते हुए वह हिमाचल के जिला कांगड़ा जा पहुंचा. वहां उस का यह ठगी का धंधा तो चल ही निकला, वहीं उस की मुलाकात सोनिया से हुई.

सोनिया राजेश शर्मा की बेटी थी. उन का अच्छाखासा कारोबार था, लेकिन किन्हीं वजहों से उन के कारोबार में घाटा होने लगा तो उन की आर्थिक स्थिति कुछ खराब हो गई. सोनिया अपनी ऐसी ही किसी समस्या के समाधान के लिए सोनू तांत्रिक के पास गई तो पहली ही मुलाकात में वह सोनू की नजरों में ऐसी चढ़ी कि वह उसे किसी भी कीमत पर हासिल करने को तैयार हो गया. लेकिन राजेश शर्मा का परिवार एक संस्कारी परिवार था. वही संस्कार सोनिया में भी थे. इसलिए सोनू ने सोनिया को जो सब्जबाग दिखाए, उन का सोनिया पर कोई असर नहीं हुआ. तब उसे पाने के लिए सोनू ने उस से शादी का फैसला कर लिया और इस के बाद सोनिया के मातापिता की सहमति से दिसंबर, 2003 में उस ने सोनिया के साथ विवाह कर लिया.

समय के साथ दोनों 2 बच्चों के मातापिता बने, जिन में 8 साल का आदित्य और 6 साल की एलियन है. इस बीच सोनू हिमाचल के अलावा पंजाब के भी कई शहरों में अपने पांव जमाने की कोशिश करता रहा. कई शहरों के चक्कर लगाने के बाद उसे लुधियाना कुछ इस तरह पसंद आया कि वहां टिब्बा रोड पर उस ने तंत्रमंत्र की अपनी स्थाई दुकान खोल ली. यह सन् 2010 की बात है. लुधियाना का टिब्बा रोड इलाका हिंदूमुस्लिम और अमीरगरीब सभी तरह के लोगों से भरा है. जल्दी यहां सोनू का प्रभाव इस तरह बढ़ा कि लोग उस की पूजा करने लगे. यहां से कमाई दौलत से उस ने 2 मकान और एक आलीशान कोठी अपने लिए बनवा डाली.

यहां आने के बाद वह धीरेधीरे कांगड़ा में रह रही अपनी पत्नी सोनिया और बच्चों को लगभग भूल सा गया. अब वह कईकई महीनों बाद उन से मिलने कांगड़ा जाता था. लुधियाना में रहते हुए सोनू ने अपने लिए नई लड़की की तलाश शुरू कर दी, क्योंकि सोनिया अब उसे पुरानी लगने लगी थी. उसी बीच किसी शादी समारोह में उस की नजर स्टेज पर थिरकती निशा पर पड़ी तो वह उस पर मर मिटा. निशा एक आर्केस्ट्रा ग्रुप में डांस करती थी. निशा की एक ही झलक में सोनू उस का दीवाना बन गया था और हर कीमत पर उसे पा लेना चाहता था. सोनू तांत्रिक की एक आदत यह भी थी कि जो चीज उसे पसंद आ जाती थी, उसे वह हर हाल में पा लेना चाहता था.

पसंद आने के बाद उस ने निशा को हासिल करने के प्रयास शुरू किए तो सब से पहले उस ने उस के और उस के घर वालों के बारे में पता किया. सोनू को पता चला कि निशा के पिता प्रेमशाही ठाकुर की कई सालों पहले उस समय मृत्यु हो गई थी, जब बच्चे छोटेछोटे थे. निशा की मां ने मेहनतमजदूरी कर के किसी तरह बच्चों को पालपोस कर बड़ा किया था. युवा होने पर निशा ने छोटीमोटी नौकरी कर के परिवार का खर्च चलाने की कोशिश की. वह खूबसूरत थी, उस की अदाएं इतनी कातिल थीं कि कोई भी उसे देख कर पागल हो सकता था. इसीलिए जब आर्केस्ट्रा ग्रुप ने उसे अपने डांस ग्रुप में शामिल होने को कहा तो वह उस में मिलने वाली मोटी रकम के लालच में उस में शामिल होने के लिए खुशीखुशी तैयार हो गई थी.

अपनी खूबसूरती, मेहनत और अच्छे डांस की वजह से वह जल्दी ही प्रसिद्ध हो गई. आर्केस्ट्रा में डांस कर के निशा की इतनी कमाई हो जाती थी कि पूरा परिवार मजे से रह रहा था. सोनू को जब पता चला कि निशा ही अपने परिवार का एकमात्र सहारा है तो सब से पहले उस ने अपने प्रभाव से निशा को उस आर्केस्ट्रा से निकलवा दिया, जिस में वह डांस करती थी. काम छूटा तो निशा के घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई. अचानक राह चलते निशा के भाई को किसी मोटरसाइकिल वाले ने टक्कर मार दी, जिस से उस का एक हाथ टूट गया. मां पहले से ही बीमार रहती थी.

इस तरह निशा चारों ओर से टूट गई तो सोनू के इशारे पर ही मकान मालिक ने उस से मकान खाली करने के लिए कह दिया. इस के बाद अचानक सोनू तांत्रिक ने हीरो की भांति उस के जीवन में एंट्री मारी और अपने तंत्रमंत्र का नाटक कर के निशा और उस के घर की समस्याओं का समाधान कर दिया. इस से वह उन की नजरों में भगवान बन बैठा. बहरहाल, सोनू ने जैसा चाहा था, ठीक वैसा ही हुआ था. लगभग हर रात निशा सोनू के पहलू में होती थी. क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि सोनू उस से शादी करेगा. लेकिन यह उस की गलतफहमी थी. उस का यह भ्रम 13 मार्च, 2015 को बैसाखी वाले दिन तब टूटा, जब उसे पता चला कि सोनू किसी खूबसूरत लड़की के साथ चंडीगढ़ रोड स्थित मोहिनी रिसौर्ट में शादी कर रहा है.

यह जानकारी मिलने के बाद निशा के पैरों तले से जमीन खिसक गई. इस का सीधा मतलब यह था कि शादी का झांसा दे कर सोनू तांत्रिक ने 2 सालों तक उस की इज्जत से खेला था और अब मन भर जाने के बाद दूसरी लड़की से शादी कर रहा था. यह बात भला निशा कैसे बरदाश्त कर सकती थी. वह सीधे मोहिनी रिसौर्ट पहुंची, ताकि सोनू तांत्रिक की शादी रुकवा सके. लेकिन सोनू के गुर्गों ने उसे अंदर जाने नहीं दिया और बाहर से ही भगा दिया. सोनू और गीता चड्ढा का विवाह आराम से हो गया. जबकि अपने भाग्य पर आंसू बहाते हुए निशा घर लौट आई. वह घर तो लौट आई, लेकिन उसे चैन नहीं मिल रहा था. चैन मिलता भी कैसे, सोनू ने उस के साथ जो बेवफाई की थी, उसे वह भुला नहीं पा रही थी.

अगले दिन शाम को निशा को पता चला कि सोनू तांत्रिक अपनी नईनवेली दुलहन गीता के साथ गली नंबर 3 वाली कोठी में मौजूद है तो एक बार फिर हिम्मत कर के निशा उस से बात करने के लिए उस की कोठी पर जा पहुंची. इस बार सोनू से उस का सामना हो गया. उस ने हंगामा खड़ा करते हुए सोनू से पूछा, ‘‘तुम शादी का वादा कर के 2 सालों तक मेरे शरीर से खेलते रहे. जबकि अब शादी किसी और से कर ली. तुम ने यह ठीक नहीं किया. मैं ऐसा कतई नहीं होने दूंगी.’’

‘‘अब तो जो होना था, वह हो गया. मुझे जिस से शादी करनी थी, कर ली. अब तुम कर ही क्या सकती हो? मैं ने तुम से शादी का जो वादा किया था, वह वादा ही रहा. अगर मैं वादा करने वाली हर लड़की से शादी करने लगूं तो पता चला कि मैं हर साल शादी कर रहा हूं.’’ इस के बाद निशा को घूरते हुए बोला, ‘‘अच्छा यही होगा कि तुम चुपचाप यहां से चली जाओ. फिर कभी दिखाई भी मत देना, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

सोनू से अपमानित हो कर निशा घर तो आ गई, लेकिन उस के साथ जो छल हुआ था वह उसे पचा नहीं पा रही थी. काफी देर तक वह रोती रही. और जब मन का गुबार निकल गया तो उस ने तय किया कि वह सोनू जैसे ढोंगी और धोखेबाज को अवश्य सबक सिखाएगी. अगर उस ने उसे सबक न सिखाया तो वह उस जैसी न जाने कितनी लड़कियों की इसी तरह जिंदगी बरबाद करता रहेगा. दृढ़ निश्चय कर के निशा थाना बस्ती जोधेवाल पहुंची और थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह से मिल कर उन्हें अपनी आपबीती सुनाई.

हरपाल सिंह ने निशा की पूरी बात सुनने के बाद टिब्बा रोड पुलिस चौकी के इंचार्ज एएसआई हरभजन सिंह को आदेश दिया कि वह निशा के बयान के आधार पर सोनू तांत्रिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के तुरंत काररवाई करें. इस के बाद एएसआई हरभजन सिंह ने निशा के बयान के आधार पर 16 मार्च, 2015 को सोनू तांत्रिक के खिलाफ शादी का झांसा दे कर यौन शोषण करने और धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर के पूछताछ के लिए उसे पुलिस चौकी बुलवाया. लेकिन सफाई देने के लिए चौकी आने के बजाय सोनू गायब हो गया.

तब हरभजन सिंह ने हेडकांस्टेबल जगजीत सिंह जीता, कांस्टेबल लखविंदर सिंह, दविंदर सिंह और जसबीर सिंह की एक टीम बना कर सोनू की तलाश के लिए उस के पीछे लगा दिया. सोनू की तलाश चल ही रही थी कि अखबारों में छपी खबर पढ़ कर कांगड़ा में रह रही उस की पहली पत्नी सोनिया शर्मा भी लुधियाना आ पहुंची. उस ने पुलिस चौकी जा कर बयान ही नहीं दर्ज कराया, बल्कि सोनू से अपनी शादी और 2 बच्चे होने के प्रमाण भी दिए. सोनिया के बयान के आधार पर उस की ओर से भी सोनू के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया गया. फिर उसी दिन शाम को हेडकांस्टेबल जगजीत सिंह की टीम ने जालंधर बाईपास से सोनू तांत्रिक को उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह बस से शहर छोड़ कर भागने के चक्कर में वहां पहुंचा था.

चौकी ला कर सोनू से पूछताछ की गई तो उस ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को स्वीकार कर लिया. उसे अदालत में पेश कर के साक्ष्य जुटाने के लिए एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि समाप्त होने पर 18 मार्च, 2015 को उसे पुन: मैडम प्रीतमा अरोड़ा की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. 20 मार्च, 2015 को निशा का मैडिकल कराया गया. मैडिकल रिपोर्ट के अनुसार वह सहवास की आदी पाई गई. मैडम प्रीतमा अरोड़ा की अदालत में धारा 164 के तहत उस के बयान भी दर्ज किए गए.

निशा ने यहां भी वही बयान दिए, जो उस ने आपबीती में बताया था. उस का कहना था कि ऐसे ढोंगी अपराधियों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए. ऐसे लोग लोगों की धार्मिक व कोमल भावनाओं को भड़का कर उन का शारीरिक और आर्थिक शोषण करते हैं. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है, कथा में कुछ पात्रों के नाम बदले गए हैं.

Hindi Story: अपराधिक सोच

Hindi Story: साधारण परिवार में पलाबढ़ा काजी कयूम किसी भी तरह रुपए जमा कर बड़ा आदमी बनना चाहता था. उस ने 2 पैसे वाली बेवा औरतों से शादी कर उन्हें  ठिकाने लगा दिया,   लेकिन जब  तीसरी का कत्ल किया तो…

मैं ने फाइल पर हाथ मारते हुए कहा, ‘‘वकील साहब मेरे मुवक्किल को मुजरिम कह रहे हैं, यह गलत बात है. जब तक जुर्म साबित नहीं हो जाता, मेरे मुवक्किल को मुजरिम नहीं कहा जा सकता.’’

‘‘ऐतराज दुरुस्त है.’’ जज ने कहा, ‘‘वकील साहब अपने बयान से खतरनाक मुजरिम हटा दीजिए.’’

वादी वकील मुझे घूर कर रह गया. मैं ने अपने मुवक्किल की जमानत के लिए जोर देते हुए कहा, ‘‘योरऔनर, इस मुकदमे को चलते 4 महीने हो गए हैं. मेरे मुवक्किल पर कत्ल का आरोप है. लेकिन वादी अब तक कोई भी ठोस सबूत उस के खिलाफ पेश नहीं कर सका, न ही कोई खास काररवाही हो सकी है. मैं ने केस आज ही हाथ में लिया है.’’

‘‘बेग साहब, काररवाही धीमी होने की वजह वादी और बचाव, दोनों की जिम्मेदारी है. इस स्थिति में जमानत मंजूर नहीं हो सकती.’’ जज ने कहा. बचाव वकील की लापरवाही की ही वजह से यह मुकदम्मा मेरे पास आया है. मुझे पता है कि कत्ल के केस में जमानत वैसे भी मुश्किल से मिलती है. पहले वाले वकील ने केस में जरा भी मेहनत नहीं की थी. मेरा मुवक्किल खलील एक बेवा मां का बेटा था. मध्यमवर्गीय लोग थे. खलील अपनी बेवकूफी और बदकिस्मती से एक कत्ल के केस में फंस गया था. काजी कयूम एक बेहद शातिर और चालाक आदमी था. एक फ्लैट में उस ने अपना औफिस खोल रखा था.

उस की काजी ट्रेडिंग नाम से एक छोटी सी कंपनी थी. उस की यह कंपनी कई काम करती थी. एक्सपोर्ट, इंपोर्ट, मैनुफैक्चरिंग, सप्लाई आदि. वह किसी आदमी को मायूस नहीं लौटाता था. असल में वह कुछ नहीं था, महज एक फ्रौड था, जो सिर्फ जुबान से सभी को उल्लू बना रहा था. औफ द रिकौर्ड उस का असली काम था लोगों से बड़ीबड़ी रकमें इनवेस्ट करवाना, जिस पर वह बहुत ज्यादा ब्याज देता था. वह देखभाल कर, सीधेसादे, उम्र वाले रिटायर लोगों या जरूरतमंदों को शिकार बनाता था. काजी जो ब्याज देता था, वह बैंक से बहुत ज्यादा यानी 10 फीसदी होता था, इसलिए लोग लालच में उस के जाल में फंस जाते थे.

खलील के वालिद के मरने के बाद उन के डिपार्टमेंट से अच्छीखासी रकम मिली थी. उस की मां ने समझदारी से काम लेते हुए मकान की बाकी किस्तें एक साथ भर कर मकान अपने नाम करा लिया था. बाकी के छोटेमोटे कर्जे अदा करने के बाद उस के पास करीब 10 लाख रुपए बच गए थे. उसे 9 हजार रुपए पेंशन मिल रही थी. खलील एक प्रिंटिंग प्रेस में नौकरी करता था, जहां से उसे 10 हजार रुपए मिलते थे. इतने में मांबेटे का अच्छी तरह से गुजरबसर हो रहा था. लेकिन खलील इस नौकरी से संतुष्ट नहीं था. वह कोई दुकान किराए पर ले कर अपना कारोबार शुरू करना चाहता था. उस ने कारोबार करने के लिए मां से 1 लाख रुपए मांगे. तब मां ने कहा, ‘‘खलील, तुम अभी छोटे और नासमझ हो. मैं इतनी बड़ी रकम तुम्हारे हाथ में नहीं दे सकती.’’

लेकिन जब खलील ने बहुत जोर दिया तो उस ने कहा, ‘‘अच्छा मैं सोच कर बताऊंगी. तुम्हारी नौकरी अच्छी है, इसलिए मेरे खयाल से कारोबार के झंझट में मत पड़ो.’’

खलील रोज बस से अपनी नौकरी पर जाता था. एक दिन बस में उस की असद से मुलाकात हो गई. वह 28-29 साल का नवजवान था. वह टीवी की दुकान पर सेल्समैन था. एक दिन उस ने खलील से कहा, ‘‘अगर मैं 2 लाख रुपए जमा कर लूं या कहीं से जुगाड़ कर लूं तो मैं अपनी दुकान खोल सकता हूं.’’

खलील भी अपनी दुकान खोलने के चक्कर में था. अगर उसे कहीं से 1 लाख रुपए मिल जाते तो वह भी अपनी दुकान खोल सकता था. इसीलिए उस ने पूछा, ‘‘भाई, यह बताओ तुम इतने रुपए का जुगाड़ कहां से करोगे?’’

‘‘यार, काजी कयूम की एक इनवेस्टमेंट कंपनी है. उस में मैं ने अब्बा के 5 लाख रुपए लगवा दिए हैं. यह कंपनी बहुत ज्यादा ब्याज देती है. 5 लाख रुपए पर हमें 50 हजार रुपए महीने मिल रहे हैं.’’

‘‘क्या, महीने में या एक साल में?’’ खलील ने हैरानी से पूछा.

‘‘भाई, महीने में 50 हजार रुपए मिल रहे हैं. 5 महीने में मुझे ढाई लाख रुपए मिल जाएंगे. वे रुपए अब्बा से ले कर मैं अपनी दुकान खोल लूंगा. मैं ने अब्बा को बताया है कि 5 प्रतिशत ब्याज मिलेगा. इस तरह मुझे एक लाख रुपए वैसे ही मिल जाएंगे. बाकी मांग लूंगा. मेरा काम हो जाएगा.’’ असद ने कहा.

‘‘भई, यह तो बहुत बढि़या स्कीम है. इतना ब्याज तो कोई भी बैंक नहीं देता. मुझे लगता है, मैं भी इस कंपनी में पैसा लगा दूं.’’ खलील ने कहा.

अगले 10 मिनट तक असद उसे काजी कयूम की इनवेस्टमेंट कंपनी के बारे में बताता रहा. उस कंपनी के बारे में जान कर खलील बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो गया. ब्याज के बारे में जानकर वह लालच में आ गया. अगर वह अम्मा को राजी कर के 10 लाख रुपए 2 महीने के लिए इनवेस्ट करा दे तो उसे 2 लाख रुपए मिल जाएंगे. उस में से एक लाख रुपए ले कर बाकी रुपए वह अम्मा को वापस कर देगा. मूल रकम के साथ एक लाख रुपए उन्हें ब्याज भी मिल जाएगा. वह खुश हो जाएंगी. इस के बाद उस ने असद से पूछा, ‘‘जब तुम्हारे अब्बा के पास 5 लाख रुपए थे तो तुम ने उन से रुपए क्यों नहीं ले लिए?’’

‘‘वह मुझ पर इतना भरोसा नहीं करते थे कि मुझे अपनी रकम दे देते. लंबे फायदे की बात है, शायद इसीलिए रुपए दिए हैं.’’ असद ने कहा.

‘‘मेरी भी यही मुश्किल है. अम्मा मुझे भी नादान समझती हैं, इसलिए बड़ी रकम देना नहीं चाहतीं. मैं भी ज्यादा ब्याज बता कर ही रुपए मांगूंगा.’’

उस दिन खलील का मन काम में नहीं लगा. बारबार वह रकम इनवेस्ट करने के बारे में ही सोचता रहा. काफी सोचने के बाद एक आइडिया उस के दिमाग में आ गया. अगले दिन उस ने मां को शहर में होने वाली ठगी के बारे में खूब विस्तार से बताया. यह सब सुन कर अम्मा थोड़ी परेशान हो गईं. इस के अगले दिन भी उस ने अम्मा को ठगी के 2-4 किस्से सुना दिए. 4-5 दिनों तक वह इसी तरह करता रहा. इस के बाद इनवेस्टमेंट स्कीम के बारे में इस तरह समझाया कि ठगी से डरी हुई अम्मा 10 लाख रुपए इनवेस्ट करने को राजी हो गईं, क्योंकि फायदा खासा था. रकम जस की तस रहती, 2 महीने में खलील की दुकान भी खुल जाती.

असद खलील को ले कर काजी कयूम के औफिस गया. बड़ी सी मेज के पीछे काजी बैठा था. वह दुबलापतला छोटे कद का शातिर आदमी था. आने की वजह पूछने पर खलील ने कहा, ‘‘मैं 10 लाख रुपए आप की कंपनी में इनवेस्ट करना चाहता हूं.’’

‘‘कितने दिनों के लिए इनवेस्ट करना चाहते हो?’’ काजी ने पूछा.

‘‘मैं सिर्फ 2 महीने के लिए इनवेस्ट करना चाहता हूं.’’

‘‘भई, फिर तो मुश्किल है. बात यह है कि मैं 6 महीने से कम के लिए रकम इनवेस्ट नहीं कराता, क्योंकि कारोबार में रकम लगाना तो आसान है, लेकिन निकालना बहुत मुश्किल. फंसी रकम को निकालना बहुत दुश्वार है.’’

असद और खलील उस का मुंह देखने लगे. उन्हें शीशे में उतारने  और अपनी बात उन के दिमाग में बैठाने के लिए उस ने 10 दलीलें दीं. अंत में उस ने कहा, ‘‘देखो भाई, नुकसान से बचने के लिए मैं ने कुछ अलग नियम बना रखे हैं, जैसे एक महीने के लिए इनवेस्ट करोगे तो 2 प्रतिशत ब्याज मिलेगा, 2 महीने पर 5 प्रतिशत और 6 महीने पर 10 प्रतिशत. इस तरह मैं कारोबार में नुकसन से बच सकता हूं.’’

‘‘यह हमारे लिए घाटे का सौदा होगा.’’ खलील ने कहा.

‘‘इसीलिए तो कह रहा हूं कि 6 महीने के लिए पैसे जमा कराओ.’’ काजी ने कहा.

काफी बातचीत के बाद खलील इस नतीजे पर पहुंचा कि काजी की बात मान कर रकम 6 महीने के लिए इनवेस्ट कराने के लिए मां को राजी करे. महीने के अंत में एक बड़ी रकम उन के हाथ पर रखेगा तो वह खुद ही खुश हो कर 6 महीने के लिए इनवेस्ट करने को राजी हो जाएंगी. इस तरह 2 महीने में खलील को दुकान खोलने के लिए रुपए मिल जाएंगे. मां को भरोसे में ले कर वह उन्हें सारी बात समझा देगा. यह सब सोच कर वह 6 महीने के लिए रुपए जमा कराने के लिए राजी हो गया. इस तरह खलील ने 10 लाख रुपए 6 महीने के लिए इनवेस्ट कर दिए.

महीन भर बाद वह असद के साथ अपने ब्याज के रुपए लेने काजी के औफिस पहुंचा तो काजी ने उसे 10 प्रतिशत के हिसाब से एक लाख रुपए दे दिए. असद को दूसरे महीने का ब्याज भी मिल गया. खुशीखुशी खलील मां के पास पहुंचा और उसे एक लाख रुपए दे कर बोला, ‘‘ये रुपए मैं रख लेता हूं. अगले महीने के रुपए ले कर बाकी के रुपए आप को दे दूंगा.’’

एक लाख रुपए देख कर मां खुश हो गई. ब्याज से खलील की दुकान खुल जाने की बात जान कर उसे बड़ी तसल्ली मिली. इसलिए खुशी से उस ने पैसे दे दिए, ताकि कुछ सामान खरीद कर वह काम शुरू कर सके. मां को खुश देख कर खलील ने कहा, ‘‘अम्मा, हमें ब्याज में एक मोटी रकम मिल रही है, इसलिए हम अपनी रकम 2 महीने में वापस लेने के बजाय 6 महीने में लें, जिस से हमें काफी फायदा हो जाए.’’

मां भी लालच में आ गई और राजी हो गई. अगले महीने भी सही समय पर ब्याज की रकम मिल गई. खलील ने नौकरी छोड़ कर अपनी दुकान शुरू कर दी. उस की दुकान भी चलने लगी. तीसरे महीने का ब्याज मिलने में अभी एक हफ्ता बाकी था कि असद परेशान सा उस के पास आ कर कहने लगा, ‘‘यार, काजी कयूम 3-4 दिनों से अपने औफिस में नहीं मिल रहा है. अपने पैसों के लिए मैं कई चक्कर काट चुका हूं. वह मिल ही नहीं रहा है.’’

‘‘वह रहता कहां है? उस के घर के बारे में पता करो.’’

‘‘काजी की सेक्रैट्री कंवल से कई बार पूछा, वह कहती है कि उसे नहीं मालूम. मुझे मालूम है, वह झूठ बोल रही है.’’

खलील का पैसा मिलने में अभी एक हफ्ता बाकी था. वह भी परेशान हो गया. दोनों ही मिडल क्लास परिवारों से थे. उन के लिए यह रकम बहुत बड़ी थी. अगले दिन दोनों काजी कयूम के औफिस पहुंचे. वहां सेक्रैट्री कंवल बैठी थी. काजी के बारे में पूछने पर उस ने कहा, ‘‘उन्हें तेज बुखार है, वह आराम कर रहे हैं. एकदो दिनों में ठीक हो जाएंगे तो औफिस आएंगे.’’

खलील और असद नीचे खड़ी काजी की फिएट देख चुके थे. दोनों बिना कुछ कहे काजी के कमरे की ओर बढ़े तो कंवल उन्हें रोकने लगी. लेकिन वे जबरदस्ती काजी की केबिन में घुस गए. काजी अपनी केबिन में भलाचंगा बैठा था. साफ था, उसी के कहने पर कंवल बहाने बना रही थी. खलील और असद को देख कर काजी घबरा गया. उस ने हैरानी से पूछा, ‘‘तुम… तुम दोनों… अंदर कैसे आ गए?’’

‘‘हम आप की खैरियत पता करने आए हैं. सुना है, आप को तेज बुखार है.’’

‘‘बैठो…बैठो.’’ काजी ने बौखला कर कहा, ‘‘दरअसल, मेरी तबीयत ठीक नहीं थी.’’

‘‘आप 4 दिनों से कहां थे? मैं ने कई चक्कर लगाए.’’ असद ने कहा.

‘‘भई कारोबार में उतारचढ़ाव आते ही रहते हैं. मैं ने 10 लाख रुपए का माल मिडल ईस्ट भेजा था. उस की रिकवरी में देर हो रही थी, उसी के उलझन में फंसा था.’’ काजी ने कहा.

असद ने चिढ़ कर कहा, ‘‘आप की उलझन ने मेरा तो सत्यानाश मार दिया. अभी तक इस महीने के मेरे पैसे नहीं मिले.’’

‘‘6 दिनों बाद मेरे पैसों की भी तारीख है.’’ खलील ने याद दिलाया.

‘‘बिलकुल भई. तुम लोग चिंता क्यों करते हो. आज ही चेक कैश हो जाएगा. उस के बाद तुम्हारी रकम दे दूंगा.’’

इस के बाद उस ने इतनी विनम्रता से उन्हें समझाया कि वे संतुष्ट हो कर चले आए. काजी बहुत चालाक और शातिर आदमी था, दोनों को तसल्ली और दिलासा दे कर उस ने विदा कर दिया था. लेकिन उन के दिल में एक डर बैठ गया था कि कहीं काजी उन्हें लंबी चपत न लगा दे.

3 दिनों बाद खलील की असद से मुलाकात हुई तो उस का चेहरा उतरा हुआ था. उस ने उदासी से कहा, ‘‘यार, काजी कयूम एक बार फिर गायब हो गया है. मुझे तो वह आदमी फ्राडिया लगता है. मुझे लगता है वह मेरे पैसे नहीं देना चाहता, लेकिन मैं उस से एकएक पाई वसूल लूंगा. मैं ही जानता हूं कि मैं ने अब्बा को किस मुश्किल से समझाया था.’’

असद की बातों से खलील भी परेशान हो उठा. उस ने पूछा, ‘‘उस की सेक्रैट्री कंवल क्या कहती है?’’

‘‘वह कह रही है कि शहर से बाहर गया है, पर उस के औफिस में जब भी जाओ, 3-4 लोग बैठे उस का इंतजार करते रहते हैं. अगर काजी बाहर गया है तो वे किस से मिलने आते हैं?’’ असद ने कहा.

‘‘यार, काजी मुझे पक्का फ्राडिया लगता है. उस दिन भी उस ने कंवल से झूठ कहलाया था, जबकि वह अंदर ही बैठा था. अब वह हम से बच रहा है. यार मुझे तो अभी 2 महीने का ही ब्याज मिला है. तुम्हारे सुझाने पर ही मैं ने पैसे इनवेस्ट किए थे. अगर काजी ने मेरे साथ भी यही किया तो मैं बरबाद हो जाऊंगा.’’ खलील लगभग रुआंसा हो गया.

‘‘यार घबराओ मत, मैं भी तो फंसा हुआ हूं. आज फिर उस के औफिस चलते हैं, कुछ न कुछ तो होगा ही.’’ असद ने दिलासा दिया.

दोनों काजी के औफिस पहुंचे और कंवल से काजी के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘अभी 20 मिनट पहले ही वह घर गए हैं.’’

बात बढ़ी तो वहां बैठे लोगों ने वजह पूछी. वजह जानने के बाद उन्होंने कहा कि वे भी काजी के इंतजार में बैठे हैं. उन्होंने भी मोटीमोटी रकमें इनवेस्ट कर रखी है. 3 महीने तक तो उन्हें ब्याज के पैसे मिले, अब वे भी रोज चक्कर लगा रहे हैं. काजी मिलता ही नहीं है. यह सेक्रैट्री बहाने बना कर टाल देती है.

‘‘यह तो सरासर जालसाजी है. हम ने भी उस के पास मोटी रकम इनवेस्ट कर रखी है. वह हमें भी टाल रहा है.’’ असद ने कहा.

सभी अपनाअपना रोना रोने लगे, उन लोगों ने भी लाखों रुपए इनवेस्ट कर रखे थे. सभी को 2 या 3 महीने ब्याज के रुपए मिले थे, उस के बाद सभी चक्कर लगा रहे थे. खलील और असद नाकाम हो कर लौट आए. खलील के पास अभी कुछ करने के लिए 3 दिन बाकी थे, पर असद, फैजान, सरवर और नूरखां बहुत परेशान और गुस्से में थे. उन की तारीखें निकल चुकी थीं. चारों ने काजी के औफिस में खूब हंगामा किया. काजी को घेर लिया और तोड़फोड़ भी की. इस के बाद काजी ने पुलिस बुला ली.

पुलिस चारों को गिरफ्तार कर के ले गई. बाद में चारों बड़ी मुश्किल से दे दिला कर पुलिस के चंगुल से छूटे. यह सुन कर खलील के पांवों तले से जमीन निकल गई. उस ने किसी तरह काजी के घर का पता लगा लिया. अगले दिन खलील काजी के घर पहुंच गया. उस का नरसरी के इलाके में खूबसूरत बंगला था, जहां वह अपनी खूबसूरत बीवी नौशीन के साथ रहता था. खलील को देख कर काजी हैरानपरेशान रह गया. खलील ने कहा, ‘‘आज मेरे पैसों की तारीख है. आप मेरे पैसे दे दें. मुझे तो डर लग रहा था कि कहीं आप उन चारों की तरह मुझे भी पुलिस के हवाले न कर दें.’’

काजी कयूम ने बड़े दोस्ताना लहजे में कहा, ‘‘अरे भाई, ऐसी बात नहीं है. वे तोड़फोड़ कर रहे थे, इसलिए पुलिस बुलानी पड़ी. मैं एक कारोबारी आदमी हूं, मुझे सब की तारीखें याद रहती हैं. मैं सब के रुपए दूंगा. थोड़ा धैर्य से काम लें. तुम्हारा दोस्त असद तो मारपीट और तोड़फोड़ कर रहा था. वह उन के साथ मिल कर गुंडागर्दी कर रहा था. उन्हें भी भड़का रहा था. इसलिए मजबूरन मुझे यह सब करना पड़ा. बिजनैस में जल्दबाजी नहीं होती. मैं तुम्हारे रुपए जरूर दूंगा. अभी तो शाम हो गई है, तुम कल सुबह 11 बजे यहीं आ जाना. मैं तुम्हें बैंक ले चलूंगा और तुम्हारे रुपए वहीं दे दूंगा.’’

काजी ने इतने दोस्ताना अंदाज में बात की थी कि खलील को तसल्ली हो गई. वह जाने के लिए खड़ा हुआ तो काजी ने कहा, ‘‘गुस्से और गुंडागर्दी से काम नहीं बनेगा. अपने दोस्त असद को भी समझाओ. उस के पैसे मिल जाएंगे.’’

दूसरे दिन ठीक साढ़े 10 बजे खलील काजी कयूम के बंगले पर पहुंच गया. घंटी बजाने पर गेट नौशीन ने खोला. वह 28-29 साल की खूबसूरत औरत थी. खलील ने कहा, ‘‘मैं खलील हूं, मुझे काजी कयूम ने बुलाया था.’’

‘‘आप वक्त से पहले आ गए.’’ उस ने सपाट लहजे में कहा.

‘‘मैं आधा घंटा इंतजार कर लूंगा.’’ खलील ने जल्दी से कहा.

‘‘आप इंतजार में अपना वक्त बेकार न करें. वह किसी जरूरी काम से बाहर गए हैं. शाम से पहले नहीं आएंगे.’’

‘‘मुझे बुला कर वह कहां चले गए?’’ खलील ने परेशान हो कर पूछा.

‘‘यह तो मुझे नहीं मालूम कि वह कहां गए हैं. इतना जानती हूं कि औफिस नहीं गए हैं. आप के लिए एक मैसेज छोड़ गए हैं कि आप रात 8 बजे आ कर अपने रुपए ले जाइए.’’ नौशीन ने कहा.

नौशीन गेट के अंदर बंगले के लौन में थी, जबकि खलील गेट के बाहर खड़ा था. काजी का मैसेज सुन कर उसे थोड़ा सुकून मिला. सामने हसीन औरत वादा कर रही हो तो कुछ कहा भी नहीं जा सकता था. उस ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं रात 8 बजे आ जाऊंगा. आप काजी साहब को बता दीजिएगा.’’

‘‘जरूर बता दूंगी.’’ नौशीन ने मुसकरा कर कहा.

खलील के सिर पर तब आसमान टूट पड़ा, जब उसी दिन एक बजे पुलिस ने उसे उस की दुकान से नौशीन के कत्ल के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया. यह थी मेरे मुवक्किल खलील की दुखभरी कहानी. खलील ने कत्ल के इल्जाम से साफ इनकार कर दिया था. पिछली पेशी में मैं ने उस की जमानत की कोशिश की थी, पर नाकाम रहा था. अब तक मैं ने मुकदमें की फाइल ठीक से देख ली थी और जरूरी जानकारियां भी जुटा ली थीं. असद ने जानकारियां जुटाने में मेरी बहुत मदद की थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, नौशीन को गला दबा कर मारा गया था. पिछले 4 महीने में मुकदमे में कुछ खास नहीं हुआ था. इस पेशी पर जज ने नए सिरे से मुल्जिम का बयान रिकौर्ड कराया. वादी वकील ने पूछना शुरू किया, ‘‘मकतूल नौशीन से तुम्हारी क्या दुश्मनी थी?’’

‘‘मेरी उस से कोई दुश्मनी नहीं थी. मेरी उस से एक बार मुलाकात हुई थी, वह भी मैं गेट के बाहर था और वह अंदर लौन में. यह बात मैं अपने बयान में पहले भी बता चुका हूं.’’ खलील ने कहा.

‘‘तुम्हारा झगड़ा तो काजी कयूम से था.’’

‘‘जी नहीं, मेरा उन से भी कोई झगड़ा नहीं था. मुझे उन से अपने पैसे लेने थे.’’

‘‘तब तुम ने उन की बीवी नौशीन का कत्ल क्यों किया?’’

‘‘मुझ पर झूठा इल्जाम क्यों लगा रहे हैं. मैं ने कहा न कि मैं ने कत्ल नहीं किया. घटना वाले दिन मैं काजी से मिलने गया था. वह नहीं था तो मैं गेट के बाहर से बात कर के लौट आया था.’’

‘‘तुम्हें काजी के घर में किसी चीज की तलाश थी, जब नौशीन ने तुम्हें रोका तो तुम ने उस का गला दबा दिया?’’

 

‘‘यह झूठ है, मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया. मैं घर के अंदर गया ही नहीं. मैं गेट के बाहर से ही लौट आया था.’’

वादी वकील ने 4-5 सवाल और किए, पर कोई नतीजा नहीं निकला. इस के बाद उस ने पैंतरा बदला, ‘‘योरऔनर, 3 दिनों पहले मुल्जिम के खास दोस्त असद ने 2-4 बेकार लोगों के साथ काजी कयूम के औफिस में मारपीट और तोड़फोड़ की थी. काजी ने सब को गिरफ्तार करा दिया था. उसी का बदला लेने के लिए इस ने काजी की बीवी नौशीन का कत्ल किया है.’’

मैं ने इस का जोरदार विरोध किया, ‘‘आई औब्जेक्ट योरऔनर, वादी वकील बारबार पैंतरा बदल रहे हैं. पहले इन्होंने कहा कि मुल्जिम कोई चीज तलाश रहा था, जब मकतूला ने रोका तो उस का गला दबा दिया. अब कह रहे हैं कि अपने दोस्त असद की गिरफ्तारी का बदला लेने के लिए नौशीन का कत्ल कर दिया. ये इन की बचकानी वहजे हैं.’’

‘‘कैसी बचकानी दलील है?’’ वादी वकील ने कहा.

‘‘जनाब, असद और खलील की कोई बहुत गहरी दोस्ती नहीं थी. बस में मुलाकात हुई थी. इस के बाद वे कभीकभी मिलने लगे थे. ऐसी कोई दोस्ती नहीं थी कि वह उस के लिए कत्ल जैसा जुर्म करता.’’

जज ने मेरी बात में वजन महसूस किया. उस ने कुछ नोट किया. इस के बाद जिरह की बारी मेरी थी.

मैं ने कहा, ‘‘मि. खलील, आप मकतूला को कब से जानते हैं, आप का उस से क्या ताल्लुक था?’’

‘‘मेरी मकतूला से सिर्फ एक मुलाकात हुई थी, वह भी गेट पर खड़ेखड़े. मकतूला के शौहर काजी कयूम से मेरे कारोबारी संबंध थे, करीब 3 महीने से.’’

‘‘किस किस्म के संबंध थे. आप के काजी कयूम से?’’

इस बार उस ने 10 लाख रुपए के इनवेस्ट की पूरी कहानी सुना दी. आखिर में कहा, ‘‘मैं तीसरे महीने का ब्याज लेने काजी कयूम के घर गया था, क्योंकि वह औफिस में मिल नहीं रहा था. मैं औफिस जाना भी नहीं चाहता था, क्योंकि वहां पहले ही हंगामा हो चुका था. काजी ने मुझे 11 बजे पैसे लेने के लिए बुलाया था.’’

‘‘तुम्हें असद, सरवर, नूर खां के पैसों की कोई फिक्र नहीं थी. तुम अकेले ही अपना पैसा लेने चले गए थे?’’

‘‘साहब, ऐसे मौके पर सब को अपनीअपनी पड़ी होती है.’’

मैं ने अपने सवालों के जरिए काजी का दूसरा रूप अदालत के सामने रख दिया, जो एक फ्राडी इनवेस्टर का था. खलील ने एकएक बात खोल कर रख दी थी. अन्य लोगों के पैसे डूबने की बात भी बता दी थी. वादी वकील ने 2 बार ऐतराज किया, पर जज ने रद्द कर दिया. खलील के जवाबों का खुलासा करते हुए मैं ने कहा, ‘‘योरऔनर काजी टे्रडिंग कंपनी के अलावा इनवेस्टमेंट का भी काम करता था, जो सरासर फ्राड पर आधारित था. इस ने जिन लोगों के पैसे इनवेस्ट कराए. अब वे चक्कर काट रहे हैं. 5 हमारे सामने ही मौजूद हैं. फैजान के 5 लाख, सरवर ने 8 लाख, नूरखां ने 3 लाख, असद के 5 लाख, खलील ने 10 लाख रुपए इनवेस्ट किए थे. सारे लोग तो झूठ नहीं बोल रहे हैं. मुल्जिम अपने पैसे लेने काजी के घर गया तो उसे कत्ल के इल्जाम में फंसा दिया गया. बाकी लोगों के पैसे नहीं मिले हैं.’

जज ने मेरी बातें ध्यान से सुनी और वादी वकील से पूछा, ‘‘क्या काजी कयूम अदालत में मौजूद है?’’

उस के ‘हां’ कहने पर काजी कयूम को विटनेस बौक्स में बुलाया गया. हलफ लेने के बाद जज ने उस से काजी इनवेिस्टंग के बारे में पूछा. काजी ने अदब से जवाब दिया, ‘‘हुजूर, मेरी सिर्फ काजी ट्रेडिंग कंपनी है, जो एक्सपोर्टइंपोर्ट का काम करती है. काजी इनवेस्टिंग जैसी झूठी व फ्राडी कंपनी से मेरा कोई ताल्लुक नहीं है, न ही मेरी ऐसी कोई कंपनी है.’’

वादी वकील फौरन बोला, ‘‘जज साहब, बेग साहब मेरे मुवक्किल पर झूठे इल्जाम लगा रहे हैं.’’

जज ने मुझ से पूछा, ‘‘मि. बेग, काजी साहब तो किसी इनवेस्टिंग कंपनी की बात नहीं मान रहे हैं, आप के पास कोई दस्तावेजी सबूत है?’’

‘‘दस्तावेजी सुबूत तो नहीं है, क्योंकि फ्राड का काम करने वाले बड़ी चालाकी से काम करते हैं, ताकि पकड़ में न आएं. काजी ने भी सादे कागजों पर 10 लाख रुपए की रसीद दी थी, उस में भी उस के साइन फर्जी हैं. ब्याज इतना ज्यादा था कि लोग लालच में अंधे हो कर बिना सोचेसमझे पैसे लगा रहे थे. मैं सिर्फ लुटने वाले लोगों को बुलवा कर गवाही दिला सकता हूं.’’

इसी के साथ अदालत का वक्त खत्म हो गया. वैसे भी मुझे मेरे मुवक्किल को कत्ल के इल्जाम से बचाना था. इनवेस्टमेंट की बात बाद में देखी जाएगी. नौशीन के कत्ल से उसे किस तरह छुड़ाना है, इस की पूरी प्लानिंग मेरे दिमाग में चल रही थी. बाहर मुझे खलील की मां मिली, जो लपक कर मेरे पास आई. जमानत न होने से वह बहुत दुखी थी. मैं ने उसे समझाया कि कत्ल के केस में जमानत बड़ी मुश्किल से मिलती है. आगे बेहतर होगा, इस का दिलासा दिया.

अगली पेशी पर मैं ने जज साहब से केस के इन्क्वायरी अफसर से चंद सवाल करने की इजाजत मांगी, जो इंसपेक्टर वहीद खां थे. मैं ने उन से पूछा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, इस्तगासा के अनुसार, वारदात की खबर आप को 22 मार्च को साढ़े 11 बजे मिली थी. 12 बजे आप वहां पहुंच गए थे. आप को किस ने और क्या खबर दी थी?’’

‘‘वारदात की जानकारी मुझे काजी कयूम ने दी थी. फोन पर कहा था कि उन की बीवी नौशीन कत्ल कर दी गई है. खलील नामी किसी शख्स ने उस का कत्ल किया है.’’

‘‘आप ने घटनास्थल पर जा कर क्या देखा था?’’

‘‘पूरा घर इस तरह उलटापलटा पड़ा था, जैसे डकैती पड़ी हो, पर काजी कयूम के मुताबिक कुछ चोरी नहीं हुआ था. काजी की बीवी नौशीन की लाश ड्राइंगरूम में फर्श पर पड़ी थी.’’

‘‘इंसपेक्टर साहब, यह कत्ल 10 से साढ़े 11 के बीच हुआ था. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के मुताबिक मौत की वजह गला घोंटना है. क्या आप ने गले पर से फिंगरप्रिंट्स उठाए थे?’’

‘‘हम ने फिंगरप्रिंट्स लेने की कोशिश की थी, पर हमें कामयाबी नहीं मिली. शायद मुल्जिम ने दस्ताने पहन रखे थे.’’ उस ने हड़बड़ाते हुए जवाब दिया.

‘‘पर आप की तैयार की गई रिपोर्ट में इस बात का कहीं कोई जिक्र नहीं है.’’

‘‘शायद यह बात रिपोर्ट में आने से रह गई है.’’

‘‘शायद नहीं, यकीनन. लेकिन यह बहुत बड़ी गलती है. अभी आप ने कहा कि बंगले की हालत से लगता था कि वहां डाका पड़ा था. आप ने बाकी जगहों के फिंगरप्रिंट्स उठाए थे?’’

‘‘मैं ने सभी जगहों से फिंगरप्रिंट्स उठाने की कोशिश की थी, पर कोई अजनबी फिंगरप्रिंट्स नहीं मिले थे. शायद इस की वजह दस्ताने थे.’’

‘‘घटनास्थल का काम निपटाने के बाद आप ने क्या किया था?’’

‘‘मैं ने मुल्जिम खलील को उस की दुकान से गिरफ्तार कर लिया था.’’ इंसपेक्टर वहीद खां ने कहा.

‘‘आप को यह बात किस ने बताई थी कि खलील दुकान पर होगा? दुकान का पता किस ने बताया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘दोनों बातें मुझे काजी कयूम ने बताई थीं.’’

मेरी जिरह खत्म होने के बाद गवाह अनवर की बारी आई. वह 60-65 साल का मजबूत काठी का आदमी था. उस की काजी कयूम के बंगले के पास कोल्डड्रिंक, पान, सिगरेट वगैरह की दुकान थी. वादी वकील ने उस से मामूली सवाल किए, जिस का खुलासा यह था कि वह दिन भर दुकान पर बैठता था. उस ने मुल्जिम को काजी कयूम के बंगले के पास मंडराते देखा था, उस के चेहरे पर घबराहट थी. इस के बाद मैं जिरह करने के लिए खड़ा हुआ. मैं ने पूछा, ‘‘अनवर, तुम कितने सालों से दुकान चला रहे हो और तुम्हारी दुकान कैसी चलती है?’’

‘‘मैं करीब 10 सालों से यह दुकान चला रहा हूं. बहुत अच्छी चलती है. मुझे सिर उठाने की फुरसत नहीं मिलती.’’

‘‘तुम काजी कयूम को जानते हो? उस के इनवेस्टिंग के कारोबार के बारे में भी जानते होंगे?’’

‘‘मैं काजी साहब को जानता हूं. मुझे इतना पता है कि वह कोई कंपनी चलाते हैं. इनवेस्टिंग का पता नहीं.’’

‘‘आप ने वारदात के दिन मुल्जिम को पहली बार देखा था? अब आप ने अच्छे से देख लिया कि मुल्जिम वही आदमी है, जिसे आप ने काजी के घर के पास देखा था?’’

‘‘जी हां, यह वही आदमी है.’’

‘‘आप की दूर की नजर कैसी है?’’

‘‘बहुत अच्छी, एकदम ठीकठाक.’’

मैं ने अदालत के खुले दरवाजे की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘दरवाजे में जो आदमी खड़ा वकील साहब से बातें कर रहा है, उस की टाई का रंग बताइए तो कैसा है?’’

वह बेहद परेशान नजर आने लगा, फिर उलझन से बोला, ‘‘वह टाई गे्र नहीं, डार्क ग्रीन…’’

अचानक वह खामोश हो गया. मैं ने व्यंग से कहा, ‘‘अनवर खां, आप का और दरवाजे का फासला करीब डेढ़ सौ गज है, जबकि आप की दुकान और काजी कयूम के बंगले की दूरी करीब 2 सौ गज से ज्यादा है. आप को सामने खड़े आदमी की टाई का रंग समझ में नहीं आ रहा है. वहां इतनी दूर से आप ने मुल्जिम के चेहरे के भाव देख लिए. क्या कमाल है. आप को इस गवाही के कितने पैसे मिले थे?’’

‘‘जी नहीं, दरअसल बात यह है कि कलर… मैं रुपए ले कर नहीं आया.’’ वह हड़बड़ा कर बोला.

‘‘अनवर साहब, आप ने इसे पहले नहीं देखा था, न वह आप की दुकान पर आया था. फिर आप अपनी दुकान पर इतने मसरूफ रहते हैं, उइस के बावजूद आप ने इतना देख लिया. अभी मैं ने अदालत के सामने साबित कर दिया कि यह डेढ़ सौ गज दूर की चीज नहीं देख सकते. सरासर फर्जी गवाही है जनाबेआली, एक मसरूफ आदमी इतनी दूर से इतनी बारीकी से हरगिज नहीं देख सकता, इस का दावा निराधार है.’’

जज ने कुछ नोट किया, इसी के साथ अदालत का वक्त खत्म हो गया.

विटनेस बौक्स में काजी कयूम की सेक्रैट्री कंवल खड़ी थी. वादी वकील की जिरह में सारे पौइंट्स काजी कयूम के पक्ष में जा रहे थे. उस ने इनवेस्टिंग कंपनी से साफ इनकार कर दिया था. खलील, असद को पहचानने से भी उस ने इनकार कर दिया था. उस ने सिर्फ यह बात मानी थी कि कुछ गुंडे जैसे लोगों ने दफ्तर में तोड़फोड़ की थी. वादी वकील ने पूछा, ‘‘22 मार्च को क्या हुआ था?’’

‘‘22 मार्च को काजी साहब 10 बजे औफिस आए तो उस के 5 मिनट बाद उन के घर से फोन आया कि घर में डाकू घुस आए हैं, उन्हें जल्द से जल्द घर पहुंचने को कहा गया था.’’

इस के बाद मैं ने जिरह शुरू की. मैं ने कठघरे में खड़े खलील की तरफ इशारा कर के पूछा, ‘‘क्या आप इसे जानती हैं?’’

‘‘सिर्फ इस हद तक कि यह आदमी मुकदमे का मुल्जिम है, इस पर कत्ल का इल्जाम है.’’

कंवल बड़ी सफाई और ढिठाई से झूठ बोल रही थी.

मैं ने कहा, ‘‘याद करिए, यह आदमी 3 महीने से काजी कयूम के पास आ रहा था, कभी अकेले, कभी असद के साथ. इस ने काजी के पास 10 लाख रुपए इनवेस्ट किए थे.’’

‘‘इस तरह के किसी मामले की मुझे कोई जानकारी नहीं है.’’

मैं समझ गया कि यह फ्राडी इनवेस्टमेंट के बारे में एक भी शब्द नहीं बोलेगी. मैं ने फिर पूछा, ‘‘वारदात के 4 दिन पहले औफिस में किस बात पर हंगामा हुआ था, उस की वजह क्या थी?’’

‘‘उस दिन 4-5 नवजवान औफिस में घुस आए और तोड़फोड़ तथा मारपीट करने लगे. वे किसी फायदे की बात कह रहे थे. जब काजी साहब ने इनकार कर दिया तो वे मारपीट पर उतारू हो गए. मजबूर हो कर काजी साहब को पुलिस बुला कर उन्हें गिरफ्तार      कराना पड़ा, क्योंकि उन का किसी इनवेस्टमेंट से कोई ताल्लुक नहीं था.’’

बाकी उस ने हर बात से इनकार कर दिया. यहां तक कि जब असद और खलील जबरदस्ती काजी से मिलने पहुंचे थे, उस ने साफ कह दिया था कि ऐसी कोई बात वह नहीं जानती. अगली पेशी पर काजी कयूम ने अपना बयान दर्ज कराया. मैं ने जिरह शुरू की, ‘‘काजी साहब, मकतूल नौशीन से आप की शादी कब हुई थी?’’

‘‘मेरी शादी को 2 साल हो रहे हैं.’’

‘‘आप नरसरी वाले बंगले में कब शिफ्ट हुए? इस से पहले आप गुलशन इकबाल में ब्लाक, 13 में रहते थे न?’’

‘‘इस बंगले में आए मुझे 3 साल हुए हैं, पहले मैं गुलशन इकबाल में ही रहता था.’’

‘‘आप यह ट्रेडिंग कंपनी कब से चला रहे हैं?’’

‘‘करीब 8 सालों से.’’

‘‘यानी आप की पहली बीवी सूफिया के जमाने से?’’ मैं ने चुभते हुए लहजे में पूछा.

ये सारी जानकारी बड़ी मेहनत से असद ने जुटा कर मुझे दी थी. पहली बीवी का नाम सुनते ही काजी कयूम घबरा गया. उस ने उखड़े लहजे में कहा, ‘‘आप ठीक कह रहे हैं.’’

‘‘सूफिया से जब आप की शादी हुई थी, वह एक बेसहारा, पर काफी मालदार औरत थी. उस वक्त आप की जेब खाली थी. सूफिया की दौलत ने आप को मजबूत सहारा दिया. कुछ समय बाद उसी के माल से आप ने टे्रडिंग कंपनी खोल ली. फिर आप दिनरात तरक्की करते गए. 4 सालों बाद आप की बीवी सूफिया छत से गिर कर काफी जख्मी हो गई. जब आप उसे कार से अस्पताल ले जाने लगे तो उस ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया. मैं ठीक कह रहा हूं न?’’

विटनेस बौक्स में खड़ा काजी बदहवास नजर आने लगा, उस ने बौखला कर कहा, ‘‘एकदम ठीक.’’

वादी वकील ने काजी की हालत देख कर बोलना जरूरी समझा, ‘‘योरऔनर, बेग साहब नौशीन के कत्ल को भूल कर गवाह के अतीत को उखाड़ने में लग गए हैं.’’

मैं ने फौरन कहा, ‘‘योरऔनर, कत्ल काजी साहब की मौजूदा बीवी का हुआ है. उस का राज खोलने को पहली बीवी का जिक्र जरूरी है, क्योंकि काजी साहब की पहली 2 बीवियों की हादसे में मौत हो चुकी है. उस बात पर परदा डालना इंसाफ के उसूलों के विरुद्ध होगा.’’

मेरी बात खत्म होते ही जज ने जोर से कहा, ‘‘2 बीवियां और दोनों की हादसे में मौत?’’

‘‘यह बड़ी कड़वी सच्चाई है योरऔनर.’’ मैं ने मजबूती से कहा.

जज ने दिलचस्पी लेते हुए कहा, ‘‘आप इसी लाइन पर जिरह जारी रखें.’’

काजी का चेहरा फीका पड़ रहा था. मैं ने आगे पूछा, ‘‘काजी साहब, सूफिया की मौत पर आप को एक भारी रकम इंश्योरेंस से भी मिली थी. उस के बाद आप गुलशन इकबाल छोड़ कर मुस्लिमाबाद में आ बसे और वहां आप ने जमीला नाम की काफी मालदार बेवा औरत से शादी कर ली.’’

थोड़ा रुक कर मैं ने जज की ओर देखा. वह हैरान थे और कुछ लिख रहे थे. मैं ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘काजी साहब, आप को जमीला से शादी रास नहीं आई, पर उस की दौलत तो आप के हाथ लग गई. जबकि वह बेचारी एक रोड ऐक्सीडेंट में चल बसी. कश्मीरी रोड पर उस की गाड़ी को एक वाटर टैंकर ने इतने जोर से टक्कर मारी कि वह उसी वक्त चल बसी. यह बात भी ताज्जुब की है कि वाटर टैंकर वालों का अड्डा आप के घर से दूर नहीं था. जमीला की हादसे में मौत का क्लेम आप ने 50 लाख रुपए वसूल किए. अगर मेरे बयान में कुछ गलत है तो मुझे टोक दें.’’

काजी कयूम की हालत देखने लायक थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहे. जज भी उस की घबराहट और हालत देख रहा था. मैं ने जिरह शुरू रखी, ‘‘काजी साहब, आप ने नौशीन की लाइफ पौलिसी एक करोड़ रुपए की करा रखी है. बेचारी की मौत को 8 महीने हो गए, क्या आप ने इंश्योरेंस क्लेम वसूल कर लिया है?’’

वह मुझे घूर कर रह गया. वादी वकील ने जल्दी से कहा, ‘‘जज साहब, गवाह की प्राइवेट लाइफ को उजागर करना सरासर गलत है.’’

मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘मकतूल के क्लेम के बारे में पूछा कानूनन सही है, जवाब दें काजी साहब.’’

उस ने कमजोर लहजे में कहा, ‘‘क्लेम में कुछ कानूनी अड़चनें आ गई हैं.’’

‘‘वे कानूनी अड़चनें भी आप की लाई हुई हैं काजी साहब.’’ मैं ने कहा.

जज फौरन बोल उठे, ‘‘कैसी लाई गईं कानूनी अड़चनें? खुलासा करें बेग साहब?’’

‘‘काजी कयूम ने नौशीन से तीसरी शादी की थी, जो एक तलाकशुदा, पैसे वाली औरत थी. इस बार भी अगर काजी साहब बीवी की मौत को हादसे का रंग देते तो कुछ न बिगड़ता. कहानी एकदम सिंपल होती कि कोई नामालूम आदमी या डाकू घर में घुसा और नौशीन के विरोध करने पर उस का गला घोंट कर चला गया. अगर खलील को बीच में न फंसाते तो मामला अदालत तक नहीं पहुंचता और न ही इंश्योरेंस क्लेम मिलने में अड़चन खड़ी होती.’’

मेरे खामोश होते ही अदालत में बातें शुरू हो गईं.

मैं ने काजी से पूछा, ‘‘काजी साहब, आप इस आदमी को कब से जानते हैं?’’

मेरा इशारा खलील की ओर था.

‘‘अपनी बीवी की कत्ल की वारदात के बाद से.’’

‘‘मतलब, आप मुल्जिम के आप की इनवेस्टिंग कंपनी में 10 लाख रुपए जमा करने की बात से इनकार करते हैं?’’

‘‘इनवेस्टिंग कंपनी व भारी ब्याज की कहानी झूठी है.’’

‘‘क्या आप को मालूम था कि मुल्जिम की बिजनेस रोड पर दुकान है?’’ मैं ने तीखे लहजे में पूछा.

‘‘मुल्जिम के बारे में सारी जानकारी इस कत्ल के बाद मुझे हुई है.’’

‘‘क्या आप की या आप की बीवी की मुलिजम से कोई दुश्मनी थी?’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं थी.’’

‘‘फिर आप के खयाल में कत्ल का मकसद क्या हो सकता है? यूं ही तो कोई किसी को मार नहीं देता, कोई तो वजह होगी?’’

काजी घबरा कर बोला, ‘‘वह…वह… शायद चोरी की नीयत से मेरे घर में घुसा था. नौशीन के विरोध करने पर उसे मौत के घाट उतार कर फरार हो गया.’’

‘‘अब एक और नई कहानी कि चोरी करने आया था, जबकि चोरी हुई नहीं. पहले कहा था कि असद का बदला लेने घुसा और कत्ल कर दिया. ये कैसी बातें हैं कयूम साहब?’’

‘‘वह भी हो सकता है.’’ वह एकदम बौखला कर बोला.

‘‘यह भी हो सकता है, वह भी हो सकता है, अदालत में यह नहीं चलता. आप का दावा है काजी साहब कि आप मुल्जिम को बिलकुल नहीं जानते थे कत्ल होने तक. आप के बयान के अनुसार, जब आप मकतूल के खबर देने पर घर पहुंचे तो पूरा घर उलटापलटा पड़ा था और नौशीन की लाश ड्राइंगरूम में पड़ी थी. आप ने यह देख कर पुलिस को फोन किया. मेरा सवाल यह है कि घर पहुंचने के कितनी देर बाद आप ने पुलिस को हादसे की खबर दी थी?’’

‘‘लगभग 15 मिनट बाद.’’ उस ने घबराते हुए कहा.

मैं ने कहा, ‘‘पुलिस रोजनामचे के अनुसार, 22 मार्च को दिन के साढ़े 11 बजे आप ने फोन किया, जिस का जिक्र चालान में भी है. इस हिसाब से आप सवा ग्यारह बजे घर पहुंचे थे, जबकि आप की सेक्रैट्री कंवल ने कहा है कि आप सवा 10 बजे औफिस से निकले थे. आप के औफिस से आप के घर तक पहुंचने के लिए ज्यादा से ज्यादा 30 मिनट लगते हैं, फिर आप मौकाएवारदात पर एक घंटे बाद क्यों पहुंचे. आप तो अपनी कार में थे. मुश्किल से 20 मिनट लगने चाहिए थे?’’

वह कांपती आवाज में बोला, ‘‘दरअसल, रास्ते में मेरी गाड़ी खराब हो गई थी. इसलिए देर हो गई.’’

‘‘काजी साहब, इतना भी कमाल न करें, गाड़ी खराब हो गई थी तो आप टैक्सी ले सकते थे. नौशीन ने बड़ी इमरजैंसी में आप को फोन किया था. आप को तो उड़ कर वहां पहुंचना चाहिए था.’’

वह खामोश मुझे देखता रहा. हाथ मलता रहा. मैं ने एक वार और किया, ‘‘पुलिस रिकौर्ड के मुताबिक आप ने थाने फोन कर के कहा था कि खलील नाम के एक आदमी ने आप की बीवी नौशीन का कत्ल कर दिया है. जब आप हादसे से पहले मुल्जिम को जानते ही नहीं थे तो फिर आप ने उस का नाम कैसे लिया? क्या जादू से नाम पता चल गया था?’’

वह खामोश कठघरे का सहारा लिए खड़ा रहा, जो उस के मुजरिम होने का सुबूत था. मैं ने गिरती दीवार को एक धक्का और दिया, ‘‘काजी साहब, आप ने पैसे इनवेस्ट नहीं किए, आप खलील को नहीं जानते, फिर आप ने इन्क्वायरी अफसर को उस की दुकान का पता कैसे बताया. इन्क्वायरी अफसर यह बात बता चुका है कि मुल्जिम का नामपता आप ने उसे बताया था. इस सब का क्या मतलब निकलता है?’’

अब अपना रुख जज की तरफ फेरते हुए मैं ने कहा, ‘‘जनाबेआली, वादी की खामोशी यह बताती है कि वह कत्ल के पहले से ही मुल्जिम को अच्छी तरह जानता था और यह भी जानता था कि बिजनैस रोड पर उस की दुकान है. उस की गवाही कानून के उसूलों के विरुद्ध है. इस ने सरासर झूठ बोला है, नोट किया जाए.’’

मेरी बात पूरी होतेहोते अदालत का वक्त खत्म हो गया.

आगे वादी वकील ने मुल्जिम के खिलाफ तमाम दलीलें दीं, पर किसी दलील में दम नहीं था. अपनी बारी आने पर सारे झूठे बयानों का मैं ने खुलासा कर दिया. मुकदमा तो पिछली पेशी पर ही मेरी तरफ पलट चुका था. मैं ने फिंगरप्रिंट्स की रिपोर्ट गायब होने पर पुलिस पर सवाल उठाए, फिर अनवर की झूठी गवाही पर ऐतराज किया. काजी की सेक्रैट्री कंवल की झूठ बयानी और हठधर्मी पर अंगुली उठाई. रहीसही कसर काजी की 2 बीवियों की हादसे में मौत ने पूरी कर दी. अब जज पूरी तरह मेरे मुवक्किल के पक्ष में हो चुका था. फैसले की तारीख दे कर जज ने अदालत बरखास्त कर दी.

अगली पेशी पर अदालत ने मेरे मुवक्किल को बाइज्जत बरी कर दिया. इस के साथ पुलिस को आदेश दिया कि वह नौशीन के असली कातिल को गिरफ्तार कर जल्द से जल्द चालान पेश करे. पुलिस के लिए जज का हुक्म पकेपकाए हलवे से कम नहीं था. अगले ही दिन पुलिस पंजे झाड़ कर काजी कयूम के पीछे पड़ गई. काजी कयूम पुलिस की सख्ती ज्यादा देर नहीं सहन कर सका और उस ने नौशीन के साथसाथ अपनी पहली 2 बीवियों के कत्ल का भी इकरार कर लिया. मगर आखिर तक इनवेस्टिंग कंपनी के फ्राड से इनकार करता रहा.

मैं ने खलील को कत्ल से तो बाइज्जत बरी करवा लिया, पर पैसे नहीं दिला सका. शायद सब मिल कर पैसों के लिए फिर केस करें. काजी ने कत्ल का इकरार कर लिया, पर फ्राड का नहीं किया. पता नहीं यह उस के मुजरिम जेहन की कौन सी अदा थी? Hindi Story