22 नवंबर, 2013 की शाम को राजकुमार अपने घर की पहली मंजिल पर साफसफाई करने गया तो उसे वहां कुछ बदबू महसूस हुई. वह इधरउधर देखने लगा. जिस तरफ से बदबू आ रही थी, वह उसी तरफ बढ़ गया. बालकनी से होते हुए राजकुमार एक कमरे के पास पहुंचा तो वहां बदबू और बढ़ गई. वह समझ गया कि बदबू शायद उसी कमरे से आ रही है. उस कमरे में बाहर से ताला बंद था, क्योंकि उस में रहने वाला किराएदार राहुल 3 दिनों पहले अपनी पत्नी खुशबू को ले कर कहीं चला गया था.
कमरे से आने वाली बदबू किसी चूहे वगैरह के मरने की नहीं लग रही थी. किसी गड़बड़ी की आशंका से राजकुमार डर गया. वह सीधासादा आदमी था, इसलिए उस ने तुरंत 100 नंबर पर फोन कर दिया. पुलिस को जो काल मिली थी. उस में पता— मकान नंबर बी-13/1 बी, गली नंबर-3, अंबिका विहार, करावलनगर बताया गया था. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना थाना करावलनगर को दे दी, साथ ही पीसीआर वैन भी बताए गए पते पर पहुंच गई. यह शाम करीब साढ़े 6 बजे की बात है. राजकुमार पुलिस वालों को पहली मंजिल पर स्थित उस कमरे पर ले गया, जिस में से बदबू आ रही थी.
चूंकि कमरे में बाहर से ताला बंद था, इसलिए पुलिस भी नहीं समझ पाई कि बदबू किस चीज की है. पीसीआर की काल मिलने पर थाना करावलनगर से एएसआई कविराज शर्मा और कांस्टेबल कृष्ण पाल को बताए गए पते पर भेजा गया. थाना पुलिस के पहुंचने तक राजकुमार के घर के पास काफी लोग जमा हो चुके थे. सभी तरहतरह के कयास लगा रहे थे. कविराज शर्मा ने भी उस कमरे के पास जा कर देखा, जिस में से दुर्गंध आ रही थी. कमरे पर लगे ताले को उन्होंने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के आने से पहले छेड़ना उचित नहीं समझा.
उस कमरे में दरवाजे के ऊपर एक रोशनदान था. उस रोशनदान से कमरे में झांका जा सकता था. कविराज ने एक सीढ़ी मंगाई और उस पर चढ़ कर कमरे में झांक कर देखा. कमरे में घुप्प अंधेरा होने की वजह से कुछ दिखाई नहीं दिया. उन्होंने रोशनदान से टौर्च की रोशनी डाल कर अंदर देखा तो फर्श पर पड़े खून के साथसाथ एक बड़ा सा बैग भी दिखाई दिया. कविराज शर्मा माजरा समझ गए. उन्होंने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को मौके पर बुला लिया.
क्राइम टीम द्वारा बंद दरवाजे के फोटो वगैरह लेने के बाद कविराज शर्मा ने कमरे का ताला तोड़ा. जब दरवाजा खोला गया तो बदबू के भभके ने सभी को नाक बंद करने के लिए मजबूर कर दिया. अंदर कमरे में फर्श पर एक बड़ा सा लालकाले रंग का बैग रखा था. फर्श पर खून फैला था, जो सूख कर काला पड़ चुका था. बेड पर बिछी चादर और वहां रखी रजाई पर भी खून के धब्बे दिखाई दे रहे थे. बेड पर चूडि़यों के टुकड़े पड़े थे. यह सब देख कर यही लगा कि इस बैग में किसी की लाश ही होगी.
बैग की चेन खुली थी. अंदर प्लास्टिक का एक बोरा रखा था. बोरा बैग से बाहर निकाला गया तो उस में से खून रिस रहा था. बोरा को खोला गया तो उस में से एक युवती की लाश निकली, जिस की गरदन कटी हुई थी. लाश सड़ चुकी थी. लाश देख कर राजकुमार ने बताया कि यह राहुल की बीवी खुशबू है. चूंकि राहुल वहां से गायब था, इसलिए यह बात साफ हो गई कि पत्नी की हत्या राहुल ने ही की है.
एएसआई कविराज ने इस मामले की सूचना थानाप्रभारी लेखराज सिंह को दी तो वह इंसपेक्टर अरविंद प्रताप सिंह और सबइंसपेक्टर जफर खान को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने घटनास्थल का मुआयना कर के मकान मालिक राजकुमार गिरि से पूछताछ की. राजकुमार ने बताया कि राहुल शर्मा अपनी पत्नी खुशबू के साथ 15 अप्रैल, 2013 से वहां रह रहा था. 19 नवंबर को जब वह नीचे गैलरी में खड़ा था, तभी उस ने राहुल को जीने से उतरते देखा था.
पूछने पर राहुल ने बताया था कि खुशबू की बहन की डिलीवरी होनी है, इसलिए वह अपनी बहन के यहां जा रही है. वह आगे चली गई है. 19 तारीख के बाद राहुल वापस नहीं लौटा था. आज जब वह ऊपर की साफसफाई करने गया तो बदबू महसूस हुई. तब उस ने इस की सूचना पुलिस को दे दी थी. घनास्थल की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए गुरु तेग बहादुर अस्पताल भेज दी और हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली.
इस केस को सुलझाने के लिए थानाप्रभारी लेखराज सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में इंस्पेक्टर अरविंद प्रताप सिंह, सबइंसपेक्टर जफर खान, सहायक सबइंसपेक्टर कविराज शर्मा, कांस्टेबल कृष्णपाल और दयानंद आदि को शामिल किया गया.
पुलिस को राजकुमार से पता चला कि राहुल को अंबिका विहार के रहने वाले उस के एक परिचित उमेश ने किराए पर रखवाया था. इस से पहले राहुल के यहां किराए पर रहता था. पुलिस ने उमेश से संपर्क किया तो उस के पास से राहुल का फोन नंबर और पता मिल गया. वह लोनी क्षेत्र के गांव हाजीपुर वेहटा का रहने वाला था.
पुलिस ने राहुल का फोन मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. हत्या करने के बाद कोई व्यक्ति घर पर मिले, ऐसा कम ही संभव होता है. फिर भी राहुल के बारे में पता लगाने के लिए पुलिस उस के गांव हाजीपुर वेहटा गई. पुलिस ने गोपनीय रूप से राहुल के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि वह घर पर नहीं है. इसी पूछताछ में पुलिस को एक चौंकाने वाली बात पता चली. चौंकाने वाली बात यह थी कि राहुल शर्मा ने 20 नवंबर को बुलंदशहर की एक लड़की से शादी की थी और यह शादी घर वालों की मरजी से सामाजिक रीतिरिवाज से हुई थी. सवाल यह था कि राजकुमार दिल्ली में खुशबू नाम की जिस लड़की के साथ रहता था, वह कौन थी?
बहरहाल पुलिस टीम दिल्ली लौट आई. पुलिस राहुल के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगा कर बराबर वाच कर ही रही थी. 23 नवंबर की शाम को पता चला कि राहुल के फोन की लोकेशन करावलनगर चौक के आसपास है. राजकुमार गिरि राहुल को पहचानता था, इसलिए पुलिस टीम उसे अपने साथ ले कर करावलनगर चौक पहुंच गई.
पुलिस टीम सादा कपड़ों में थी. वह काफी देर तक राजकुमार को इधरउधर टहलाती रही. इसी बीच राजकुमार की नजर चाय की एक दुकान पर गई. राहुल शर्मा वहां एक बैंच पर बैठा चाय पी रहा था. राजकुमार के इशारे पर पुलिस टीम ने उसे दबोच लिया. थाने ला कर जब उस से खुशबू की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बड़ी ही आसानी से हत्या की बात कुबूल ली. उस से पूछताछ के बाद एक दिलचस्प कहानी पता चली.
राहुल शर्मा के पिता आदेश कुमार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 ही बच्चे थे. बेटा राहुल और एक बेटी. हालांकि उन का छोटा सा परिवार था, लेकिन वह परिवार को हर तरह से खुश देखना चाहते थे. इसी चाह में वह गढ़मुक्तेश्वर से लोनी चले आए. लोनी में वह इसलिए आए, क्योंकि यह दिल्ली की सीमा से सटा हुआ था. उन्होंने सोचा था कि वहां रह कर अपने लिए दिल्ली में कोई कामधंधा खोज लेंगे.
थोड़ी कोशिश के बाद उन की दिल्ली होमगार्ड में नौकरी लग गई. शुरू में तो उन्हें होमगार्ड का काम करते हुए अच्छा लगा, लेकिन 5-6 सालों बाद ही इस काम से ऊबने लगे. वजह यह थी कि इस से उन्हें अच्छी आमदनी नहीं हो पाती थी. अब तक उन्होंने लोनी के पास के गांव वेहटा हाजीपुर वेहटा में मकान भी बना लिया था. उन्होंने वेहटा रेलवे स्टेशन के नजदीक प्रौपर्टी डीलिंग की दुकान खोल ली. ड्यूटी से लौटने के बाद वह दुकान पर बैठते थे. उन का बेटा राहुल बड़ा हो चुका था, इसलिए पिता की गैरमौजूदगी में वह दुकान संभालता था.
आदेश कुमार का प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा जम गया तो उन्होंने होमगार्ड की नौकरी छोड़ दी और पूरे समय दुकान पर बैठने लगे. उन की मेहनत रंग लाने लगी. आमदनी बढ़ने लगी तो उन्होंने अपने प्रौपर्टी के बिजनैस को नए आयाम देने शुरू कर दिए. लोनी के नजदीक ही उन्होंने कई एकड़ जमीन खरीद ली. उस जमीन पर उन्होंने अपने बेटे के नाम पर ‘राहुल विहार’ नाम की कालोनी बसानी शुरू कर दी.
7 मई, 2017 की शाम 5 बजे गुड़गांव में नौकरी करने वाले देवेंद्र के फोन पर उस के भाई संदीप का मैसेज आया कि उस के मोबाइल फोन का स्पीकर खराब हो गया है, इसलिए वह बात नहीं कर सकता. वह रात को बस से निकलेगा, जिस से सुबह तक गुड़गांव पहुंच जाएगा. देवेंद्र खाना खा कर लेटा था कि संदीप का जो मैसेज रात 11 बजे उस के फोन पर आया, उस ने उस के होश उड़ा दिए.
मैसेज में संदीप ने लिखा था कि वह कोसी के एक रेस्टोरेंट में खाना खा रहा था, तभी उस की तबीयत खराब हो गई. वह कुछ कर पाता, तभी कुछ लोगों ने उस का अपहरण कर लिया. इस समय वह एक वैन में कैद है. वैन में एक लाश भी रखी है. किसी तरह वह उसे छुड़ाने की कोशिश करे.
मैसेज पढ़ कर देवेंद्र के हाथपैर फूल गए थे. उस ने तुरंत गुड़गांव में ही रह रहे अपने करीबी धर्मेंद्र प्रताप सिंह को फोन कर के सारी बात बताई और किसी भी तरह भाई को मुक्त कराने के लिए कहा. देवेंद्र से बात होने के बाद धर्मेंद्र प्रताप सिंह उसे बाद में आने को कह कर खुद कोसी के लिए चल पड़े. रात में ही वह कोसी पहुंचे और थानाकोतवाली कोसी पुलिस को संदीप के अपहरण की सूचना दी.
कोतवाली प्रभारी ने तुरंत नाकाबंदी करा दी. सुबह 5 बजे देवेंद्र भी कोसी पहुंच गया. उस ने अपराध संख्या 129/2017 पर धारा 364 के तहत संदीप के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी. कोसी कोतवाली ने रिपोर्ट तो दर्ज कर ली, लेकिन जब देवेंद्र ने बताया कि संदीप आगरा आया था और वहीं से वह कोसी जा रहा था, तभी उस का अपहरण हुआ है.
इस पर कोतवाली प्रभारी ने कहा कि उन्हें आगरा जा कर भी पता करना चाहिए, जहां वह ठहरा था. शायद वहीं से कोई सुराग मिल जाए. देवेंद्र धर्मेंद्र प्रताप सिंह के साथ आगरा के लिए चल पड़ा. संदीप आगरा के थाना सिकंदरा के अंतर्गत आने वाले मोहल्ला नीरव निकुंज में ठहरा था. देवेंद्र और धर्मेंद्र ने थाना सिकंदरा जा कर थानाप्रभारी राजेश कुमार को सारी बात बताई तो उन्होंने कहा, ‘‘आज सुबह ही बोदला रेलवे ट्रैक के पास तालाब में एक सिरकटी लाश मिली है. आप लोग जा कर उसे देख लें, कहीं वह आप के भाई की तो नहीं है?’’
लेकिन देवेंद्र ने कहा, ‘‘रात में 11 बजे तो भाई ने मुझे मैसेज किया था. उन के साथ ऐसी अनहोनी कैसे हो सकती है? फिर उन की हत्या कोई क्यों करेगा?’’
इस बीच देवेंद्र की सूचना पर घर के अन्य लोग भी रिश्तेदारों के साथ आगरा पहुंच गए थे. सभी लोग इस बात को ले कर परेशान थे कि कहीं संदीप के साथ कोई अनहोनी तो नहीं घट गई? सभी को शिवम ने अपने कमरे पर ठहराया था. शिवम संदीप और देवेंद्र का भांजा था. पूछताछ में संदीप के घर वालों ने थाना सिकंदरा पुलिस को बताया था कि संदीप जिस लड़की उमा (बदला हुआ नाम) से प्यार करता था, वह आगरा में ही रहती है. दोनों विवाह करना चाहते थे, लेकिन लड़की के घर वाले इस संबंध से खुश नहीं थे.
घर वालों की इस बात से पुलिस को उमा के घर वालों पर शक हुआ. लेकिन जब उमा को बुला कर पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि उस दिन दोपहर दोनों ने एक रेस्टोरेंट में साथसाथ खाना खाया था. उस समय संदीप की तबीयत काफी खराब थी.
उमा जिस तरह बातें कर रही थी, उस से किसी को भी नहीं लगा कि संदीप के साथ किसी भी तरह के हादसे में वह शामिल हो सकती थी. सभी शिवम के कमरे पर बैठे बातें कर रहे थे, तभी शिवम संदीप के बड़े भाई प्रदीप के साले कैलाश का फोन ले कर बाहर चला गया. वह काफी देर तक न जाने किस से बातें करता रहा. अंदर आ कर उस ने कैलाश का फोन वापस कर दिया. सुबह कैलाश ने अपना फोन देखा तो संयोग से उस में शिवम की बातें रिकौर्ड हो गई थीं. जब वह रिकौर्डिंग सुनी गई तो सभी अपनाअपना सिर थाम कर बैठ गए.
रिकौर्डिंग में शिवम अपने दोस्त आशीष से कह रहा था, ‘‘तुम अभी जा कर अपने मोबाइल फोन के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज करा दो. उस के बाद किसी दूसरे सिम से संदीप मामा के भाई देवेंद्र को फोन कर के कहो कि संदीप मामा लड़की के चक्कर में मारे गए हैं. अब वे उन्हें ढूंढना बंद कर दें.’’
फिर क्या था, अब संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. सभी शिवम को ले कर कोसी के लिए चल पड़े. रास्ते भर शिवम यही कहता रहा कि उस ने कुछ नहीं किया है. क्योंकि उसे पता नहीं था कि उस ने कैलाश के फोन से जो बातें की थीं, वे रिकौर्ड हो गई थीं और उन्हें सब ने सुन लिया था.
शिवम को थाना कोसी पुलिस के हवाले करने के साथ वह रिकौर्डिंग भी सुना दी गई, जो उस ने आशीष से कहा था. शिवम ने भी वह रिकौर्डिंग सुन ली तो फिर मना करने का सवाल ही नहीं रहा. उस ने अपने सगे मामा संदीप की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद की गई पूछताछ में उस ने संदीप की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.
उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज के थाना सहावर से कोई 7 किलोमीटर दूर बसा है गांव म्यासुर. इसी गांव में विजय अपने 3 भाइयों प्रदीप, संदीप और देवेंद्र के साथ रहता था. उस की 2 बहनें थीं, मंजू और शशिप्रभा. मंजू की शादी फिरोजाबाद में संजय के साथ हुई थी. वह सरस्वती विद्या मंदिर में अध्यापक था. उस ने अपनी एक न्यू एवन बैंड पार्टी भी बना रखी थी. मंजू से छोटी शशिप्रभा की शादी एटा में हुई थी.
कानपुर से घाटमपुर जाने वाले मार्ग पर एक कस्बा है-पतारा. इसी कस्बे के जगदीशपुर में राम औतार पांडेय का परिवार रहता था. उन के परिवार में पत्नी सुधा के अलावा एक बेटा गौरव तथा बेटी सपना थी.
प्राइवेट नौकरी कर गुजरबसर करने वाले राम औतार एक स्वाभिमानी व्यक्ति थे. उन की आर्थिक स्थिति भले ही सामान्य थी, लेकिन वह अपने उसूलों से समझौता कभी नहीं करते थे. इसी कारण वह जिद्दी पांडेय के नाम से भी जाने जाते थे.
राम औतार की बेटी सपना बेहद खूबसूरत थी. उस की इस खूबसूरती में चार चांद लगाता था उस का स्वभाव. वह अत्यंत चंचल व चपल स्वभाव की थी. जवानी की दहलीज पर उस ने कदम रखा तो उस की खूबसूरती और बढ़ गई. देखने वालों की निगाहें जब उस पर पड़तीं तो ठहर कर रह जातीं. लेकिन वह किसी को भाव नहीं देती थी.
वह पतारा के शक्तिपीठ कालेज से बीए की पढ़ाई कर रही थी. राम औतार पांडेय सपना को उच्च शिक्षा दिलाना चाहते थे, ताकि उसे अच्छी नौकरी मिल सके.
सपना जिस कालेज में पढ़ती थी, उसी में रायपुर (नर्वल) का रहने वाला राजकपूर भी बीए कर रहा था. कालेज में अकसर मुलाकात होने से सपना की राजकपूर से दोस्ती हो गई.
सपना और राजकपूर जब भी मिलते, देर तक बातचीत करते थे. राजकपूर अपना करिअर बनाने के लिए संघर्ष कर रहा था, लेकिन लगातार मिलने से उन के बीच प्यार की कोपलें फूटने लगीं. उन्हें महसूस होने लगा कि वे एकदूसरे को चाहने लगे हैं. वे एकदूसरे के लिए ही बने हैं.
लेकिन राजकपूर के दिल में एक बात खटकती थी कि वह दूसरी जाति का है. जब सपना को हकीकत पता चलेगी तो कहीं वह मुंह न मोड़ ले.
आगे कुछ गड़बड़ न हो, यह जानने के लिए एक दिन राजकपूर ने सपना से कहा, ‘‘सपना, हम दोनों एकदूसरे को कितना प्यार करते हैं, यह हम ही जानते हैं, पर मैं आज तुम्हें अपनी हकीकत बताना चाहता हूं. सपना, मेरी जाति तुम से अलग है. मैं गुप्ता हूं और तुम ब्राह्मण. इस जाति भेद के कारण कहीं तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगी? कहीं तुम्हारे घर वाले मुझे तुम से दूर तो नहीं कर देंगे?’’
राजकपूर की बात सुन कर सपना ने हंसते हुए कहा, ‘‘राज, तुम्हें पता होना चाहिए कि मैं ने तुम से प्यार किया है, न कि तुम्हारी जाति से. तुम किस जाति के हो, किस धर्म के हो, मुझे कोई मतलब नहीं है. मैं सिर्फ तुम से प्यार करती हूं.’’
सपना की बात सुन कर राजकपूर ने उसे सीने से लगाते हुए कहा, ‘‘सपना, अब हमारे प्यार में कितनी बाधाएं आएं, मैं तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूंगा. हमेशा मैं तुम्हारा साथ दूंगा.’’
‘‘देखो राज, हमारे प्यार की राह में समाज, परिवार या कोई भी आए, मैं इस प्यार की खातिर सब को छोड़ दूंगी. पर तुम्हें नहीं छोड़ूंगी.’’ सपना बोली.
सहपाठी राजकपूर से हो गया प्यार
उस समय सपना की उम्र 19-20 साल रही होगी. राजकपूर की उम्र भी लगभग उतनी ही थी. राजकपूर गबरू जवान तो था ही, खातेपीते घर का होने के साथसाथ खूबसूरत भी था. शायद उस की खूबसूरती पर ही सपना मर मिटी थी. प्यार हुआ तो दोनोें के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए.
कालेज के साथियों को राजकपूर के प्यार की भनक लगी तो किसी ने यह खबर सपना के पिता को दे दी. राम औतार पांडेय को बेटी के प्यार का पता चला तो वह परेशान हो उठे. क्योंकि बेटी से उन्हें इस तरह की कतई उम्मीद नहीं थी. उन्होंने यह बात पत्नी को बताई तो उन्होंने चिंता में कहा, ‘‘लड़की कुछ ऐसावैसा कर बैठी तो हम समाज, बिरादरी में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.’’
पतिपत्नी काफी परेशान थे, जबकि सपना अपनी ही दुनिया में खोई थी. उसे इस बात की भनक तक नहीं लग पाई कि मांबाप को उस के प्यार की खबर लग गई है. उसे पता तब लगा, जब राम औतार पांडेय ने अचानक उस के कालेज जाने पर रोक लगा दी. इस से सपना को समझते देर नहीं लगी कि पापा को उस के प्यार वाली बात का पता चल गया है.
सपना ने पिता के इस निर्णय के बारे में मां से बात की तो उन्होंने कहा, ‘‘सपना, तुम ने जो किया है, उस की हम लोगों को जरा भी उम्मीद नहीं थी.’’
‘‘मां, मैं ने ऐसा क्या कर डाला कि मेरी पढ़ाई बंद करा दी गई?’’
‘‘तुम ने जो किया है बेटी, उस का तुम्हारे पापा को सब पता चल गया है. तुम्हें घर से पढ़ने के लिए भेजा जाता था, न कि किसी लड़के से प्यार करने के लिए. तुम ने क्या सोचा था कि तुम बताओगी नहीं, तो हमें पता ही नहीं चलेगा.’’
‘‘तो यह बात है, आप लोगों को मेरे और राजकपूर के बारे में पता चल गया है,’’ सपना ने बेशरमी से कहा, ‘‘मां, राज बहुत अच्छा लड़का है. हम दोनों ही एकदूसरे को बहुत प्यार करते हैं.’’
‘‘मां के सामने यह कहते तुझे शर्म नहीं आई. क्या हम ने तुझे यही संस्कार दिए थे? आज भी हमारे यहां बेटियों के भाग्य का फैसला मांबाप करते हैं. इतनी बेशरमी ठीक नहीं. अगर तेरी इन बातों को तेरे पापा ने सुन लिया तो तुझे जिंदा गाड़ देंगे.’’
मां की बात सुन कर सपना की बोलती बंद हो गई. मां सुधा ने सपना को काफी देर तक समझाया, लेकिन प्यार में अंधे प्रेमियों पर किसी के समझाने का असर कहां होता है. सपना पर भी नहीं हुआ. मौका मिलते ही उस ने राज को फोन कर के बता दिया कि उस के मांबाप को उन के प्यार का पता चल गया है. सपना की बात सुन कर राजकपूर को जैसे सांप सूंघ गया. वह बुरी तरह घबरा गया.
मातापिता ने सपना का कालेज जाना व घर से बाहर निकलना तो बंद करा दिया था, लेकिन वह उस के भविष्य के बारे में चिंतित रहते थे. जबकि सपना पिंजरे में कैद चिडि़या की तरह उड़ने के लिए व्याकुल थी.
वह चोरीछिपे राजकपूर से फोन पर बातें कर लेती थी.
राम औतार पांडेय सपना के लिए बेहद चिंतित रहने लगे थे. क्योंकि उन्हें पता था कि सपना ने यदि घर से भाग कर शादी रचा ली तो उन की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी और वह कहीं मुंह दिखाने लायक नही बचेंगे. इसलिए उन्होंने तय कर लिया कि कुछ भी हो, वह जल्दी ही कहीं सपना की शादी तय कर देंगे.
इस के बाद उन्होंने सपना के लिए लड़का ढूंढना शुरू कर दिया. काफी प्रयास के बाद एक खास रिश्तेदार के माध्यम से उन्होंने ऋषभ नाम के युवक को पसंद कर लिया.
युवा इंजीनियर अनुज शर्मा 11 दिसंबर, 2022 की शाम को जयपुर (नार्थ) में विद्याधर नगर के सेक्टर 2 स्थित लालपुरिया अपार्टमेंट के बाहर आया. इधरउधर नजर दौड़ाई. अपार्टमेंट की पार्किंग में गाड़ी पार्क कर उस की डिक्की खोली और उस में से मिट्टी सनी बाल्टी और एक बड़ा सूटकेस निकाला.
उन्हें ले कर वह अपार्टमेंट की लिफ्ट में घुस गया. सेकेंड फ्लोर पर पहुंच कर उस ने जेब से चाबी निकाली और फ्लैट में दाखिल हो गया. उस फ्लैट से कुछ समय बाद वह फिर नीचे आया और पड़ोस की बिल्डिंग के बाहर एक वृद्ध महिला से बोला, ‘‘आंटी, ताई आप के पास आई हैं क्या?’’
‘‘नहीं बेटा, नहीं तो. उन्हें तो मैं ने सुबह से ही नहीं देखा.’’ वृद्धा आश्चर्य से बोली.
‘‘सुबह से नहीं देखा? तो फिर कहां गई होंगी?’’ अनुज चिंता जताते हुए बोला.
‘‘तुम उन को फोन कर लो. कालोनी के अपने रिश्तेदारों से फोन कर पूछ लो.’’ वृद्धा बोली और अपने मकान की तरफ जाने लगी.
‘‘आंटी, फोन तो घर पर ही चार्जिंग में लगा है. वह दिन में 2-3 बजे मंदिर जाने को बोली थीं. मैं तो सुबह का निकला हूं अभी लौटा हूं..’’ अनुज बोला.
‘‘बेटा, एक बार मंदिर के पुजारी से पूछ लो.’’ वह वृद्धा जातेजाते बोल गई.
उस के कहे अनुसार अनुज भी पहले पास के मंदिर में जाने की सोच कर मंदिर की ओर बढ़ गया. रास्ते में जो कोई जानपहचान का मिला, उन से अपनी ताई के बारे में पूछ बैठता. उस की ताई सरोज शर्मा करीब 65 साल की थी. बीमार चल रही थीं. करीब डेढ़ साल पहले ही अपने घर अजमेर से आ कर देवर यानी अनुज के पिता बद्रीप्रसाद के यहां रहने लगी थीं. वह दिन में अकसर मंदिर चली जाती थीं, लेकिन घंटा 2 घंटा गुजार कर वापस लौट आती थीं.
अनुज को ताई सरोज शर्मा की तलाश करतेकरते शाम के 7 बजे से रात के 9 बज गए थे. घर में वह उस समय अकेला ही था. उस के पिता बद्रीप्रसाद शर्मा और 30 वर्षीया अविविहित छोटी बहन शिवी भी घर पर नहीं थे. वे एक दिन पहले ही रिश्तेदारी के सिलसिले में जोधपुर गए थे. मां अनुराधा देवी की डेढ़ साल पहले कोरोना से मौत हो गई थी.
ताई अजमेर में रहती थीं. उन के पति राधेश्याम 3 बच्चों को छोड़ कर 1995 में ही गुजर गए थे. उन में 2 बेटियां और एक बेटा है, लेकिन उन की जिंदगी एकदम से तन्हा हो गई थी.
दोनों बेटियां मोनिका (40) और पूजा (38) अपनीअपनी ससुराल में ही खुश थीं, जबकि बेटा अमित शर्मा कनाडा में एक सौफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर था. वह वहीं रह रहा था.
सरोज अपने घर में अकेली ही रहती थीं. हां, मोनिका की ससुराल अजमेर में ही थी, सो बीचबीच में हफ्ते-2 हफ्ते में वह उस से मिलनेजुलने और हालसमाचार लेने आ जाया करती थी.
बद्रीप्रसाद पंजाब नैशनल बैंक से रिटायर हुए थे. उन का बड़ा बेटा अनुज (32) और बेटी शिवी है. पत्नी की मृत्यु हो जाने के बाद वह अपनी अकेली रह रही विधवा भाभी सरोज शर्मा को अपने घर ले आए थे. इस तरह से परिवार में सभी की जिंदगी मजे में गुजर रही थी.
सरोज बच्चों को अपने बच्चों की तरह ही लाड़प्यार देती थीं. कुछ घरेलू कामकाज में हाथ भी बंटा देती थीं और ऊंचनीच होने की स्थिति में बच्चों को डांटती रहती थीं. उन की छोटीबड़ी समस्या को सुलझाने में सहयोग करती थीं.
देवर और उन के बच्चे भी उन्हें काफी प्यार करते थे और उन्हें अपनी मां की तरह ही मानसम्मान देते थे. बद्रीप्रसाद बेटे और बेटी की शादी को ले कर चिंतित रहते थे. उन की शादी की उम्र निकली जा रही थी.
वह पहले बेटी की शादी करना चाहते थे. इस सिलसिले में अकसर बाहर जाया करते थे. बेटी शिवी के लिए इंदौर से एक रिश्ता आया था. लड़के वालों ने इंदौर में लड़की दिखाने के लिए बुलाया था. इस कारण वह शिवी को ले कर 10 दिसंबर, 2022 को इंदौर चले गए थे.
घर में अनुज और ताई थे. अनुज थोड़ा अलग मिजाज का था. कहने को तो इंजीनियर था, लेकिन अच्छी जौब नहीं मिलने के कारण तनाव में रहता था. कभी वह एकदम गुमसुम बना रहता था या फिर जब किसी बात की जिद पकड़ लेता था, तब उसे पूरा करने पर ही दम लेता था.
ऐसे में कई बार उस के तेवर आक्रामक भी हो जाते थे. तब वह पागलों जैसी हरकतें करने लगता था. उस की इस आदत से घर में सभी परिचित थे.
लेकिन ताई की उसे काफी परवाह थी और धार्मिक विचारों का भी था. 11 दिसंबर, 2022 को ताई घर से कहां चली गई होंगी, इस का अंदाजा पासपड़ोस में किसी को नहीं था. अनुज भी कोई ठोस जानकारी नहीं दे रहा था कि वह घर से कब निकलीं? क्यों निकलीं? कहां जाने वाली थीं? किस से मिलने जाना था? आदिआदि.
पड़ोसियों को सिर्फ यही बता रहा था कि वह खुद घर से दिन में निकल गया था. ताई के घर पर नहीं होने पर अनुज व्याकुल हो गया था.
आखिर पड़ोसियों के बीच यही निर्णय लिया गया कि पुलिस में सरोज शर्मा के गुमशुदा होने की शिकायत दर्ज करवा दी जाए. रात के 10 बजे के करीब विद्याधर नगर थाने में सरोज देवी की गुमशुदगी की सूचना लिखवा दी गई.
उसी वक्त उन की बेटियां पूजा और मोनिका को भी इस की सूचना दे दी गई. मां के लापता होने की सूचना पाते ही दोनों बेटियां 12 दिसंबर को जयपुर आ गईं. तब तक अनुज के पिता और बहन भी इंदौर से वापस लौट आए थे.
घर का माहौल उदासी और चिंता का बन गया था. जबतब पासपड़ोस के लोग आ कर सरोज शर्मा के मिलने के किसी सुराग के बारे में पूछ जाते थे. लेकिन पुलिस की तरफ से उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल रही थी. इस तरह 2 दिन निकल गए. सभी काफी चिंतित हो गए. घर के लोग किसी अनहोनी की आशंका से भी घिर गए.
बात 26 मार्च, 2021 की सुबह 7 बजे की है. राजस्थान के बारां जिले के गांव आखाखेड़ी के रहने वाले मास्टर प्रेमनारायण मीणा के यहां उन का भतीजा राजू दूध लेने पहुंचा तो उन के घर का मुख्य गेट भिड़ा हुआ था. दरवाजा धक्का देने पर खुला तो भतीजा घर में चला गया. उस की नजर जैसे ही आंगन में चारपाई पर पड़ी तो वहां का मंजर देख कर वह कांप गया. बिस्तर पर चाचा प्रेमनारायण की खून सनी लाश पड़ी थी.
यह देख कर भतीजा चीखनेचिल्लाने लगा. आवाज सुन कर प्रेमनारायण की पत्नी रुक्मिणी (40 वर्ष) अपने कमरे से बाहर आई. बाहर आते समय वह बोली, ‘‘क्यों रो रहे हो राजू, क्या हुआ?’’
मगर जैसे ही रुक्मिणी की नजर चारपाई पर खून से लथपथ पड़े पति पर पड़ी तो वह जोरजोर से रोनेचिल्लाने लगी. रोने की आवाज मृतक के बच्चों वैभव मीणा और ऋचा मीणा ने भी कमरे में सुनी. वह दरवाजा पीटने लगे कि क्या हुआ. क्यों रो रही हो. दरवाजा खोलो. उन भाईबहनों के दरवाजे के बाहर कुंडी लगी थी. कुंडी खोली तो भाईबहन बाहर आ कर पिता की लाश देख कर रोने लगे.
मास्टर प्रेमनारायण के घर से सुबहसवेरे रोने की आवाज सुन कर आसपास के लोग भी वहां आ गए. थोड़ी देर में पूरे आखाखेड़ी गांव में मास्टर की हत्या की खबर फैल गई. थाना छीपा बड़ौद में किसी ने हत्या के इस मामले की खबर दे दी.
थानाप्रभारी रामस्वरूप मीणा खबर मिलते ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. थानाप्रभारी मीणा ने घटनास्थल का मुआयना किया. रात में अज्ञात लोगों ने घर में सो रहे सरकारी टीचर प्रेमनारायण की धारदार हथियार से गला, मुंह और सिर पर वार कर के हत्या कर दी थी, जिस से काफी मात्रा में खून निकल चुका था.
पूछताछ में मृतक की पत्नी रुक्मिणी ने बताया कि वह कमरे में सो रही थी. उस के दोनों बच्चे वैभव और ऋचा अलग कमरे में सो रहे थे. बड़ी बेटी ससुराल में थी. वह (प्रेमनारायण) आंगन में अकेले सो रहे थे, तभी नामालूम किस ने उन्हें मार डाला.
थानाप्रभारी रामस्वरूप मीणा ने घटना की खबर उच्चाधिकारियों को दे दी. एसपी (बारां) विनीत कुमार बंसल ने सीओ (छबड़ा) ओमेंद्र सिंह शेखावत व जयप्रकाश अटल आरपीएस (प्रोबेशनरी) को निर्देश दिए कि वे घटनास्थल पर जा कर मौकामुआयना कर जल्द से हत्याकांड का खुलासा करें.
एसपी के निर्देश पर दोनों सीओ ओमेंद्र सिंह और जयप्रकाश अटल घटनास्थल पर पहुंचे और घटना से संबंधित जानकारी ली. पुलिस अधिकारियों ने एफएसएल एवं डौग स्क्वायड टीम को भी बुला कर साक्ष्य जुटाने के निर्देश दिए.
पुलिस अधिकारियों को पता चला कि मृतक प्रेमनारायण मीणा सरकारी स्कूल में टीचर थे. उन की पोस्टिंग इस समय मध्य प्रदेश के गुना जिले के फतेहगढ़ के सरकारी स्कूल में थी. वह छुट्टी पर घर आए हुए थे. वह 15-20 दिन बाद छुट्टी पर गांव आते थे.
पुलिस को पता चला कि मृतक प्रेमनारायण घर के आंगन में सोए थे. उन की बीवी कमरे में अलग सोई थी. उन के 3 बच्चे हैं, जिन में से बड़ी बेटी की शादी हो चुकी थी. वह अपनी ससुराल में थी. जबकि छोटे दोनों बच्चे वैभव व ऋचा अलग कमरे में सो रहे थे.
घर के आंगन में हत्यारों ने आ कर हत्या की थी, मगर बीवी व बच्चों ने कुछ नहीं सुना था. बीवी सुबह 7 बजे तब जागी, जब भतीजा राजू दूध लेने आया. यह बात पुलिस को पच नहीं रही थी. मृतक के मुंह, सिर और गरदन पर लगे गहरे घावों से रिसा खून सूख चुका था. इस का मतलब था कि मृतक की हत्या हुए 6-7 घंटे का समय हो चुका था.
एफएसएल टीम ने साक्ष्य एकत्रित किए. तब पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया. पुलिस अधिकारियों ने अपने मुखबिरों को सुरागसी के लिए लगा दिया. वहीं मृतक के बच्चों वैभव व ऋचा से एकांत में पूछताछ की.
बच्चों ने बताया कि कल रात मम्मी ने हमें धमका कर अलग कमरे में सुला दिया था. मम्मी ने हमें कमरे में बंद कर के बाहर से कुंडी लगा दी थी. मम्मी अलग कमरे में सोई थी. बच्चों ने यह भी बताया कि वह हमेशा मम्मी के कमरे में सोते थे, लेकिन उन्होंने कल हमें दूसरे कमरे में सुला दिया था.
जालौन जिले के उरई निवासी सूरज प्रसाद गुप्ता अपनी पत्नी, बेटे व बेटी के साथ 2015 में मथुरा जिले के वृंदावन आए थे. वे यहां गोशाला नगर, अटल्ला चुंगी स्थित श्रीकृष्ण धर्मशाला में किराए के मकान में रहने लगे. बात यह थी कि उन की 26 वर्षीय बेटी आरती की मानसिक स्थिति सही नहीं थी. वे उसे इलाज के लिए मेहंदीपुर बालाजी ले जा रहे थे.
राजस्थान के दौसा जिले में 2 अतिसुंदर पहाडि़यों के बीच स्थित है मेहंदीपुर बालाजी (हनुमान) का प्रसिद्ध मंदिर. यहां देश के कोनेकोने से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं. यह बालाजी का मंदिर दुनिया भर में विख्यात है. बालाजी कस्बे में समाधि गली में स्थित मुंबई धर्मशाला के पास ही एक दुकान पर 25 वर्षीय सोनू सैनी काम करता था. जन्माष्टमी के दूसरे दिन आरती नाम की अपने घर वालों के साथ बालाजी के दर्शन करने आई थी.
आरती के पिता सूरज प्रसाद गुप्ता ने अपना सामान दुकान पर रखा और बालाजी के दर्शन के बाद ले जाने की बात कही. सोनू ने उन का सामान अन्य ग्राहकों की तरह दुकान में रख लिया. प्रसाद खरीद कर वे मंदिर दर्शन करने चले गए. यहां सोनू और आरती की मुलाकात हुई. इस दौरान आरती और सोनू की आंखें चार हो गईं.
दर्शन के बाद सूरज प्रसाद अपना सामान लेने आए, इस समय भी आरती और सोनू दोनों एकदूसरे को चाहत भरी नजरों से देखते रहे.
इसे मौन प्रेम ही कहेंगे, क्योंकि दोनों चाहते हुए भी एकदूसरे से अपने मन की भावनाएं व्यक्त नहीं कर सके थे. हां, इतना जरूर हुआ कि जानपहचान हो जाने के चलते दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने मोबाइल नंबर जरूर दे दिए.
अब दोनों मोबाइल पर एकदूसरे से मन की बातें करने लगे. दोनों के बीच प्यार की पींगें बढ़ने लगीं. करीब 20 दिन बाद आरती अकेले ही बालाजी आई और सोनू के पास पहुंच गई. उस ने सोनू से प्यार का इजहार किया और उस के साथ शादी की इच्छा जताई.
सोनू को तो पहले दिन ही आरती पसंद आ गई थी. इस तरह दोनों ने आपसी सहमति से 8 सितंबर, 2015 को बांदीकुई कोर्ट जा कर शादी कर ली. शादी के बाद सोनू आरती को ले कर अपने गांव रसीदपुर चला गया.
उधर आरती के पिता सूरज प्रसाद बालाजी के दर्शन के बाद वापस वृंदावन आ गए. 5 सितंबर, 2015 को वृंदावन से आरती अचानक लापता हो गई. परिजनों ने उसे तलाशा, लेकिन उस का कोई सुराग नहीं लगा. तब सूरज प्रसाद ने मथुरा के थाना वृंदावन में 25 सितंबर को आरती की गुमशुदगी दर्ज करा दी.
गुमशुदगी दर्ज कराने के 4 दिन बाद यानी 29 सितंबर, 2015 को थाना वृंदावन के मगोर्रा क्षेत्र स्थित झींगा नहर में अज्ञात महिला का शव मिला. पुलिस ने शव की शिनाख्त कराने का प्रयास किया, लेकिन उस की शिनाख्त नहीं हो सकी. इस पर पुलिस ने पोस्टमार्टम करा कर उस का अज्ञात में अंतिम संस्कार कर दिया.
कुछ दिन बाद आरती के पिता सूरज प्रसाद को एक महिला का शव नहर में मिलने की जानकारी हुई. तब सूरज प्रसाद वृंदावन थाने पहुंचे और नहर में मिले शव के फोटो व कपड़ों को देख कर अपनी बेटी आरती के रूप में उस की शिनाख्त की.
आरती के पिता सूरज प्रसाद को गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद इस बात की जानकारी हो चुकी थी कि उन की बेटी आरती ने घर से भाग कर अपनी मरजी से रसीदपुर निवासी सोनू सैनी से कोर्ट मैरिज कर ली थी. इस घटना के 6 महीने बाद 13 मार्च, 2016 को सूरज प्रसाद ने सोनू सैनी, उदयपुरा निवासी उस के दोस्त भगवान उर्फ गोपाल सैनी और अलवर निवासी अरविंद पाठक के खिलाफ बेटी आरती की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.
पिता ने आरोप लगाया कि कुछ महीने पहले उन की बेटी आरती सोनू के साथ भाग गई थी और उस से शादी कर ली थी. सोनू ने अपने साथियों के साथ मिल कर उन की बेटी आरती की हत्या कर शव छिपाने की नीयत से नहर में फेंक दी थी.
इस के बाद वृंदावन पुलिस ने मेहंदीपुर बालाजी से सोनू व गोपाल दोनों को आरती की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. मथुरा के न्यायालय में दोनों हत्यारोपियों को पेश किया, जहां से दोनों को आरती की हत्या के आरोप में जेल भेज दिया गया.
दोनों को हत्या का आरोपी मानते हुए पुलिस ने उन के खिलाफ चार्जशीट न्यायालय में पेश कर दी. हत्यारोपियों को गिरफ्तार करने वाले पुलिसकर्मियों को तत्कालीन एसएसपी द्वारा 15 हजार रुपए का ईनाम भी दिया गया था.
सोनू और गोपाल 18 महीने आरती की हत्या के आरोप में जेल में रहे थे. ये दोनों दोस्त जहां काम करते थे, वहां के मालिक और घर वालों की काफी कोशिशों के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट से दोनों जमानत पर जेल से बाहर आ गए. निचली से ऊंची अदालतों के चक्कर काटतेकाटते दोनों का पूरा परिवार कर्ज के तले दब गया.
इसी दौरान गोपाल के पिता की मौत भी हो गई. इस के साथ ही एक महिला की हत्या का ठप्पा लगने के बाद दोनों का सामाजिक बहिष्कार भी हो गया. जबकि दोनों का कहना था कि वे बेकुसूर हैं, उन्होंने आरती की हत्या नहीं की है.
बताते चलें कि सोनू सैनी से कोर्ट मैरिज करते समय आरती ने गुप्ता की जगह अपनी जाति माली (सैनी) लिखवाई थी. ताकि शादी में कोई अड़चन न आए. शादी के कुछ दिनों बाद आरती ने सोनू से 50 हजार रुपए, 4 पहिया गाड़ी और जायदाद उस के नाम करने की मांग की थी.
इस पर सोनू ने उस की शर्तें मानने से साफ इंकार कर दिया. आरती ने सोनू के सामने जो शर्तें रखी थीं, उन्हें सोनू के लिए इस जन्म में पूरा कर पाना मुश्किल था. मना करने के करीब 8 दिन बाद आरती बिना किसी को बताए कहीं चली गई. सोनू ने उसे दौसा, भरतपुर, जयपुर, अलवर व महुआ क्षेत्र में तलाशा, लेकिन उस का कोई पता नहीं चला.
21 मार्च, 2020 की रात. 11 बजे उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के थाना हुसैनगंज को सूचना मिली कि चांदपुर गांव में एक युवक की हत्या कर दी गई है. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी राकेश कुमार सिंह ने वारदात की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी और पुलिस टीम के साथ चांदपुर पहुंच गए.
पता चला किसानी करने वाले बाबू सिंह के बेटे यशवंत सिंह की हत्या हुई है. जब पुलिस पहुंची तब बाबू सिंह के घर के बाहर भीड़ जमा थी.
राकेश कुमार भीड़ को हटा कर उस जगह पहुंचे, जहां यशवंत सिंह की लाश पड़ी थी. घर के अंदर मृतक की पत्नी प्रतीक्षा सिंह मौजूद थी और किचन में बरतन साफ कर रही थी. पुलिस को देख कर वह रोनेपीटने लगी.
थानाप्रभारी राकेश कुमार सिंह ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो दहल उठे. यशवंत सिंह की हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस के गले को किसी धारदार हथियार से काटा गया था. शरीर के अन्य हिस्सों पर भी घाव थे. मृतक के मुंह से झाग भी निकला था, जिस से लग रहा था कि हत्या से पहले उसे कोई जहरीला पदार्थ दिया गया होगा. मृतक की उम्र 40 साल के आसपास थी और वह शरीर से हृष्टपुष्ट था.
राकेश कुमार सिंह अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी प्रशांत वर्मा, एएसपी राजेश कुमार तथा सीओ (सिटी) कपिलदेव मिश्रा भी आ गए.
पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को बुलवा लिया और खुद घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. फोरैंसिक टीम भी साक्ष्य जुटाने में लग गई.
घटना के समय मृतक की पत्नी प्रतीक्षा सिंह घर में मौजूद थी. एसपी प्रशांत वर्मा ने उस से पूछताछ की. प्रतीक्षा ने बताया कि रात 9 बजे के आसपास 2 बदमाश लूटपाट के इरादे से घर में दाखिल हुए. एक बदमाश के हाथ में कुल्हाड़ी थी, दोनों मुंह ढके थे. पति ने लूटपाट का विरोध किया तो बदमाशों ने कुल्हाड़ी से वार कर पति को मौत के घाट उतार दिया.
हत्या करने के बाद दोनों भाग गए. उन के भाग जाने के बाद उस ने शोर मचाया तो घर के बाहर भीड़ जुट गई. इस के बाद उस ने मोबाइल से 112 नंबर पर फोन कर के पुलिस को सूचना दे दी थी.
घटनास्थल पर मृतक यशवंत सिंह का बड़ा भाई रवींद्र सिंह मौजूद था. पुलिस अधिकारियों ने उस से घटना के संबंध में जानकारी चाही तो वह फूटफूट कर रोते हुए बोला, ‘‘सर, मेरा छोटा भाई यशवंत सीधासादा किसान था. करीब 5 साल पहले उस ने प्रतीक्षा से शादी की थी.
‘‘प्रतीक्षा चरित्रहीन औरत है. उस के नाजायज संबंध संग्राम सिंह से हैं. संग्राम सिंह नसीरपुर बेलवारा गांव का रहने वाला है, लेकिन यहां चांदपुर में उस का ननिहाल है, इसलिए वह इसी गांव में रहता है और खेती करता है. यशवंत सिंह प्रतीक्षा और संग्राम सिंह के नाजायज रिश्तों का विरोध करता था. शक है, प्रतीक्षा सिंह ने अपने प्रेमी संग्राम के साथ मिल कर यशवंत की हत्या कराई है.’’
बेटे के शव के पास मां कमला गुमसुम बैठी थीं. पुलिस अधिकारियों ने जब उसे कुरेदा तो दर्द आंसुओं के रूप में बह निकला, ‘‘साहब, बहू बदचलन है. मेरे बेटे को खा गई. यशवंत ने कई बार प्रतीक्षा की बदचलनी की शिकायत की थी, तब मैं ने उसे समझाया भी था. लेकिन वह नहीं मानी.’’
इन जानकारियों के बाद प्रतीक्षा सिंह संदेह के दायरे में आ गई. यशवंत सिंह की हत्या लूट के लिए नहीं हुई थी. क्योंकि घर का सारा सामान व्यवस्थित था. बक्सों के ताले भी नहीं टूटे थे. अगर हत्या लूट के इरादे से होती तो घर का सारा सामान बिखरा मिला होता, बक्सों के ताले टूटे पड़े होते, नकदी जेवर गायब होते.
पुलिस अधिकारी समझ गए कि हत्या अवैध संबंधों के चलते हुई है. अत: उन्होंने संग्राम सिंह को पकड़ने के लिए उस के घर छापा मारा, लेकिन वह घर पर नहीं मिला.
उस की सुरागसी के लिए पुलिस अधिकारियों ने अपने मुखबिर लगा दिए. आला कत्ल (कुल्हाड़ी) बरामद करने के लिए सीओ कपिलदेव मिश्रा ने प्रतीक्षा सिंह के घर की तलाशी कराई.
तलाशी के दौरान पुलिस को रबड़ के दस्ताने मिले, जिन पर खून लगा था. ये दस्ताने वैसे ही थे, जिन्हें पहन कर डाक्टर औपरेशन करते हैं. उन्हें पुलिस ने सबूत के तौर पर सुरक्षित रख लिया.
सबूत हाथ लगते ही पुलिस अधिकारियों ने प्रतीक्षा सिंह को हिरासत में ले लिया. उस का मोबाइल फोन भी पुलिस ने ले लिया. इस के बाद यशवंत की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल फतेहपुर भिजवा दी गई.
प्रतीक्षा सिंह को पुलिस कस्टडी में थाना हुसैनगंज लाया गया. एसपी प्रशांत वर्मा ने उस के मोबाइल फोन को खंगाला तो उस में प्रतीक्षा और संग्राम सिंह के कई अश्लील फोटो मिले. फोन में संग्राम सिंह का मोबाइल नंबर भी सेव था. उस ने घटना के पहले संग्राम सिंह से बात भी की थी. इन सबूतों से स्पष्ट हो गया कि संग्राम सिंह से प्रतीक्षा सिंह के नाजायज संबंध थे. दोनों ने मिल कर यशवंत की हत्या की थी.
एसपी ने प्रतीक्षा सिंह से यशवंत सिंह की हत्या के संबंध में पूछा तो वह साफ मुकर गई. लेकिन जब सख्ती की गई तो वह टूट गई और पति की हत्या कर जुर्म कबूल कर लिया. इस के बाद पुलिस ने प्रतीक्षा के माध्यम से संग्राम सिंह को गिरफ्तार करने के लिए जाल बिछाया.
प्रतीक्षा सिंह के मोबाइल में संग्राम सिंह का नंबर सेव था. प्रशांत वर्मा ने प्रतीक्षा की बात संग्राम सिंह से कराई, जिस से पता चला कि वह चांदपुर गांव के बाहर पंडितजी के ट्यूबवेल की कोठरी में छिपा है और सवेरा होते ही कहीं सुरक्षित जगह पर चला जाएगा.
यह पता चलते ही एसपी प्रशांत वर्मा के आदेश पर थानाप्रभारी राकेश कुमार सिंह ने सुबह 4 बजे छापा मारा और संग्राम सिंह को चांदपुर गांव के बाहर पंडितजी की ट्यूबवेल की कोठरी से मय आलाकत्ल गिरफ्तार कर लिया और उसे ले कर थाने लौट आए.
थाने पर एसपी प्रशांत वर्मा ने संग्राम सिंह से यशवंत सिंह की हत्या के संबंध में पूछा तो उस ने सहज ही हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.
संग्राम सिंह ने बताया कि यशवंत सिंह की पत्नी प्रतीक्षा के साथ उसके नाजायज संबंध थे. उसका पति इस रिश्ते का विरोध करता था. प्रतीक्षा के उकसाने पर उसने यशवंत सिंह की हत्या की थी.
चूंकि प्रतीक्षा सिंह और उस के प्रेमी संग्राम सिंह ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था और आलाकत्ल कुल्हाड़ी भी बरामद हो गई थी. अत: थानाप्रभारी राकेश कुमार सिंह ने मृतक के भाई रवींद्र सिंह को वादी बना कर भादंसं की धारा 302, 120बी के तहत प्रतीक्षा सिंह और संग्राम सिंह के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर दोनों को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में वासना में अंधी एक ऐसी औरत की कहानी सामने आई, जिस ने खुद अपने हाथों से अपना सुहाग मिटा दिया.
फतेहपुर शहर के थाना सदर कोतवाली के क्षेत्र में एक मोहल्ला है हरिहरगंज. चंद्रभान सिंह इसी मोहल्ले में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी सोमवती के अलावा 2 बेटियां थीं प्रतीक्षा, अंजू और एक बेटा रूपेश. चंद्रभान सिंह बिजली विभाग में काम करता था. उस के मासिक वेतन से परिवार का भरणपोषण होता था. वह सीधासादा मेहनतकश इंसान था. चंद्रभान की बड़ी बेटी प्रतीक्षा 20 साल की हो चुकी थी. वैसे तो प्रतीक्षा के चाहने वाले कई थे, पर जिस पर उस की नजर थी वह पड़ोस में रहने वाला युवक था.
एक रोज जब पड़ोसी युवक ने प्रतीक्षा से प्यार का इजहार किया तो प्रतीक्षा ने उस की चाहत स्वीकार कर ली. फलस्वरूप प्रतीक्षा और वह युवक प्यार की कश्ती में सवार हो गए. चंद्रभान को जब बेटी की करतूत पता चली तो उस ने उस के बहकते कदमों को रोकने के लिए उस की शादी कर देने का फैसला कर लिया.
चंद्रभान सिंह ने प्रतीक्षा के लिए घरवर की तलाश शुरू कर दी. उस की तलाश यशवंत सिंह पर जा कर खत्म हुई. यशवंत सिंह के पिता बाबू सिंह फतेहपुर जिले के हुसैनगंज थानाक्षेत्र के गांव चांदपुर के रहने वाले थे.
बाबू सिंह के परिवार में पत्नी कमला के अलावा 2 बेटे रवींद्र सिंह और यशवंत सिंह थे. उन के दोनों बेटों की शादियां हो चुकी थीं और दोनों भाई अलगअलग मकान में रहते थे.
दोनों के बीच जमीनजायदाद का बंटवारा भी हो चुका था. लेकिन शादी के 3 साल बाद यशवंत सिंह की पत्नी का निधन हो गया था. बाबू सिंह किसी तरह बेटे का घर बसाना चाहते थे. चंद्रभान जब अपनी बेटी का रिश्ता ले कर आए तो उन्होंने खुशीखुशी रिश्ता स्वीकार कर लिया.
एक तो यशवंत सिंह दुहेजवा था, दूसरे वह प्रतीक्षा से 8 साल बड़ा भी था, लेकिन शरीर से गठीला और दिखने में स्मार्ट था. चंद्रभान ने यशवंत सिंह को अपनी बेटी प्रतीक्षा के लिए पसंद कर लिया. रिश्ता तय होने के बाद सन 2015 के जनवरी माह की 5 तारीख को प्रतीक्षा का विवाह यशवंत सिंह के साथ हो गया.
मेज पर रखे मोबाइल फोन की घंटी बजी तो हेमा की नींद खुल गई. भरी दोपहरी में घर का कामधंधा निपटा कर वह आराम करने के लिए लेट गई थी. पंखे की हवा में कब उसे झपकी आ गई, उसे पता ही नहीं चला. अब फोन की घंटी ने उस के आराम में खलल डाल दिया था.
हेमा ने पलंग पर लेटेलेटे ही हाथ बढ़ा कर फोन उठा लिया. मोबाइल के डिसप्ले पर किसी अपने का नाम नहीं था. एक अनजान नंबर से यह काल आ रही थी. कौन है, यह जानने के लिए हेमा ने काल रिसीव करते हुए अलसाई आवाज में पूछा, ‘‘हैलो कौन?’’
‘‘मैं सचिन बोल रहा हूं…दिनेश है क्या?’’ किसी पुरुष की आवाज आई.
‘‘कौन दिनेश? यहां कोई दिनेश नहीं रहता. रौंग नंबर है आप का.’’ हेमा ने कहा और दूसरी ओर के व्यक्ति की प्रतिक्रिया जाने बिना फोन काट दिया.
‘कैसे बेवकूफ लोग भरे पड़े हैं दुनिया में, नंबर जांचपरख कर भी नहीं लगाते. अच्छीभली नींद आ रही थी, जगा दिया.’ हेमा बड़बड़ाई. उस ने मोबाइल को मेज पर रखा और आंखें बंद कर लीं.
कुछ ही देर हुई थी कि मोबाइल की घंटी फिर से बजने लगी. हेमा मेज की ओर हाथ बढ़ाते हुए झुंझला कर बोली, ‘‘अब कौन है?’’
हेमा ने मोबाइल उठाया. उस की स्क्रीन पर पहले वाला नंबर ही था, जिसे देख कर वह चौंकी, ‘‘अब क्या चाहिए इसे?’’ वह बड़बड़ाई और रिसीविंग का बटन दबा दिया.
वह कुछ कहती, उस से पहले ही दूसरी ओर का व्यक्ति बहुत जल्दीजल्दी बोला, ‘‘देखिए, प्लीज फोन मत काटना, आप मेरी बात सुन लीजिए.’’
‘‘ठीक है,’’ हेमा ने गंभीर स्वर में कहा, ‘‘कहिए, क्या कहना है आप को?’’
‘‘देखिए, मेरा दिनेश से बात करना बहुत जरूरी है. आप उस से एक बार मेरी बात करा दीजिए.’’
‘‘मिस्टर…’’ हेमा हत्थे से उखड़ गई, ‘‘आप को कहा न, यहां कोई दिनेश नहीं रहता. आप का रौंग नंबर लग रहा है.’’
‘‘सौरी मैडम,’’ दूसरी ओर से कहा गया और उस ओर से ही संबंध काट दिया गया.
हेमा ने मुंह बिगाड़ा, ‘एक बार में लोगों को समझ में नहीं आता है, मेरी नींद उड़ा कर ही रख दी.’ हेमा होंठों में बुदबुदाई और उस ने मोबाइल को मेज पर रखने के लिए हाथ बढ़ाया तो वह फिर घनघनाने लगा. हेमा ने मोबाइल को करीब कर के नंबर देखा, फिर से उसी नंबर को स्क्रीन पर देख कर उस की त्यौरियां चढ़ गईं.
वह पलंग पर उठ कर बैठ गई और बटन पुश करते हुए चिल्ला पड़ी, ‘‘तुम बारबार क्यों परेशान कर रहे हो?’’
‘‘मैडम, क्योंकि मुझे तुम्हारी आवाज बहुत सुरीली और कोयल सी मधुर लगी है. मैं बारबार उसे सुनने के लिए तुम्हें फोन लगा रहा हूं.’’ दूसरी ओर से गंभीर स्वर में कहा गया.
हेमा को रोमांच हो आया. कोई उस की आवाज की तारीफ में कसीदे पढ़ रहा था और वह थी कि उस पर झल्ला रही थी. वह एकदम नरम पड़ गई. उस ने बड़ी कोमल आवाज में पूछा, ‘‘मैं तुम्हारा नाम जान सकती हूं?’’
‘‘सचिन,’’ दूसरी ओर से बताया गया.
‘‘कहां से बोल रहे हो?’’
‘‘मथुरा के वृंदावन से,’’ सचिन नाम के युवक ने बताते हुए पूछा, ‘‘अपना नाम नहीं बताओगी क्या?’’
न चाहते हुए भी हेमा के मुंह से निकल गया, ‘‘मेरा नाम हेमा है, मैं दिल्ली में मंडावली इलाके में रहती हूं.’’
‘‘मेरा नंबर तुम्हारे फोन में आ गया है हेमा, इसे सेव कर लेना. कभी इस गरीब की याद आए तो बात कर लेना.’’ कहने के बाद उस ने काल डिसकनेक्ट कर दी.
तारीफ सुन कर इतरा पड़ी हेमा
हेमा के होंठ मुसकरा पड़े. बैठेबिठाए उसे कोई चाहने वाला मिल गया था. जिसे उस ने न देखा था, न पहचानती थी. मन के कोने से आवाज आई, ‘‘देख लो हेमा, तुम्हारी आवाज का भी कोई दीवाना है. कोई तुम्हें बगैर देखे, बगैर जाने तुम्हारी ओर आकर्षित हो गया है.’’
हेमा अपनी किस्मत पर इतरा उठी. उस के दिल ने कहा, ‘हेमा तेरे इस कद्रदान को दिल के किसी कोने में जगह दे दे. खाली समय में इस से बातें कर के दिल का हाल कहा भी जाएगा और उस के दिल का हाल सुना भी जाएगा.’
रोमांच से भरी हेमा ने मोबाइल को होंठों से चूम लिया. क्यों न चूमती, इसी की बदौलत तो उसे आज एक दीवाना मिला था.
पूर्वी दिल्ली का मंडावली थाना क्षेत्र. इसी मंडावली में किराए का कमरा ले कर सुरेश अपनी पत्नी हेमा और 2 बच्चों के साथ रहता था.
सुरेश गाजीपुर की एक फैक्ट्री में काम करता था. हेमा घर का काम संभालती थी और बच्चों की देखभाल करती थी. सुरेश की उम्र 45 साल थी, हेमा उस से 8 साल छोटी थी. उस की उम्र 37 साल थी. उस का एक बेटा 15 साल का और दूसरा 13 साल का था.
2 बेटों की मां हेमा का शरीर भरा हुआ था. वह खूबसूरत और तीखे नैननक्श वाली महिला थी. उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह 2 बच्चों की मां है.
सुरेश की कमाई से घर ठीकठाक चल जाता था लेकिन हेमा की तमन्ना ऐशोआराम भरी जिंदगी जीने की थी. वह बाजार हाट में जब किसी अच्छे घरों की महिलाओं के बदन पर कीमती कपड़े और उन का बनावशृंगार देखती तो उस का भी मन वैसे ही कपड़े पहनने और हर रोज ब्यूटीपार्लर में जा कर सजनेसंवरने का होता था.
दिल्ली के पौश इलाकों में वह आलीशान बंगले देखती तो उस की इच्छा होती कि वह भी ऐसे ही किसी आलीशान बंगले में रहे. बड़ीबड़ी कीमती कारों को देख कर भी उस की इच्छा उन में बैठ कर सैरसपाटा करने की होती थी. लेकिन हर इच्छा पूरी होना आसान नहीं था.
लेकिन वह मजबूरी में किराए के कमरे में रहती थी. पति और बच्चों के लिए 2 वक्त की रोटियां बनाना और घर की साफसफाई करना. इसी में उसे संतुष्ट रहना पड़ता था. चाह कर भी और न चाह कर भी.
सुरेश मेहनत करने में कोई कसर नहीं छोड़ता था. लेकिन उस में एक ऐब था, वह शराब पीता था. उस का काफी रुपया शराब की भेंट चढ़ जाता था. हेमा उसे समझासमझा कर थक चुकी थी.
मध्य प्रदेश के रतलाम शहर में कनेरी रोड पर एक नई आवासीय कालोनी है, जिसे विंध्यवासिनी ड्रीम सिटी के नाम से जाना जाता है. नई कालोनी होने की वजह से दूरदूर मकान बने हुए हैं. कालोनी में एक ऐसा ही एकांत में मकान सोनू तलवाड़ी का भी था.
33 साल की उम्र का सोनू रेलवे में ट्रैकमैन था. सोनू के पिता राजेश कुमार भी रेलवे में नौकरी करते थे. कुछ साल पहले पिता की मौत हो जाने से सोनू को रेलवे में अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति मिल गई थी.
सोनू अपनी पत्नी निशा, 7 साल के बेटे अमन और 4 साल की बेटी खुशी के साथ यहां रह रहा था. कालोनी में वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अकसर चहलकदमी करते लोगों को मिलता था और आसपास रहने वाले लोगों से भी उस की बातचीत होती रहती थी.
पिछले एकडेढ़ महीने से कालोनी के लोगों को सोनू की पत्नी निशा और बच्चे दिखाई नहीं दे रहे थे. एक दिन कालोनी में रहने वाले उस के पड़ोसी ने आखिर सोनू से पूछ ही लिया, ‘‘सोनू भाई, आजकल घर पर निशा भाभी और बच्चे दिखाई नहीं दे रहे.’’
तो सोनू ने जबाब दिया, ‘‘अरे भाई, क्या बताऊं आप को, बीवी नाराज हो कर बच्चों के साथ अपने मायके चली गई है.’’
‘‘भाभी से बातचीत करो और उन्हें किसी तरह मना कर घर बुला लो, बिना बच्चों के घर सूना लगता है.’’ पड़ोसी ने समझाइश देते हुए कहा.
‘‘हां भैया, जल्द ही मैं उसे और बच्चों को घर वापस ले कर आऊंगा.’’ सोनू ने पड़ोसी को आश्वस्त करते हुए कहा.
हफ्ता भर गुजर जाने के बाद भी कालोनी के लोगों को सोनू के बीवीबच्चे तो उस के घर नहीं दिखे. हां, सोनू एक अनजान युवती के साथ घर आताजाता दिखाई देता था. पहले तो कालोनी के लोग खुसरफुसर करते, लेकिन जब सोनू खुलेआम उस युवती को अपने घर में रखने लगा तो कालोनी के लोगों ने इस बात का विरोध किया.
जब लोग उसे सीख समझाइश देते तो सोनू लोगों को ही भलाबुरा कह देता. सोनू की हरकतों से परेशान लोगों ने पुलिस से इस की शिकायत कर दी.
कालोनी के कुछ जागरूक लोगों ने 21 जनवरी, 2023 को रतलाम के एसपी अभिषेक तिवारी से मिल कर सोनू की संदेहास्पद गतिविधियों की जानकारी दी तो एसपी ने रतलाम के थाना दीनदयाल नगर के टीआई दीपक कुमार मंडलोई को मामले की जांच करने के निर्देश दिए.
कालोनी के सभी लोग सोनू की हरकतों से परेशान जरूर थे, मगर उस के डर से पुलिस को ज्यादा सहयोग नहीं कर रहे थे. एसआई शांतिलाल चौहान, मुकेश सस्तियां, निशा चौबे, हैडकांस्टेबल मनोज पांडेय, जितेंद्र गौर और नवीन पटेल की टीम ने कालोनी के लोगों के साथ सोनू से भी उस की पत्नीबच्चों के संबंध में पूछताछ की. उस ने बताया कि वह रुपएपैसे ले कर घर से कहीं चली गई है.
पुलिस को यह बात हजम नहीं हो रही थी. पुलिस टीम ने जब निशा के मायके में जा कर पूछताछ की तो पता चला कि निशा अपने पिता की 4 बेटियों में दूसरे नंबर की थी. निशा ने जब से सोनू के साथ रहना शुरू किया था, तभी से उस के मायके वालों ने उस से दूरियां बना ली थीं.
टीआई मंडलोई ने अपने थाने के हैडकांस्टेबल मनोज पांडेय को सोनू के संबंध में गोपनीय तरीके से जानकारी जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी तो पता चला कि सोनू और उस की पत्नी निशा के बीच अकसर विवाद होता रहता था.
उस के घर से जोरजोर से रोनेपीटने की आवाजें पड़ोसियों के कानों तक आ ही जाती थीं, जिस के चलते आशंका जताई जा रही थी कि कहीं सोनू ने बीवीबच्चों का कत्ल न कर दिया हो.
जब पुलिस टीम को पूरा यकीन हो गया तो एसपी अभिषेक तिवारी के मार्गदर्शन में कार्यपालिक मजिस्ट्रैट और एफएसएल अधिकारी डा. अतुल मित्तल और सीएसपी हेमंत चौहान की मौजूदगी में 22 जनवरी, 2023 को पुलिस ने विंध्यवासिनी कालोनी पहुंच कर जब सोनू से पूछताछ की तो पहले तो वह पुलिस को गोलमोल जवाब दे कर घुमाता रहा.
पुलिस ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपनी पत्नी निशा, बेटे अमन और बेटी खुशी की हत्या करने की बात कुबूल कर ली. जब पुलिस ने उस से पत्नी और बच्चों के शव के संबंध में बात की तो सोनू ने जो जवाब दिया, उसे सुन कर पुलिस टीम के होश उड़ गए.
घर के आंगन में दफनाए तीनों के शव
घटना की गंभीरता को देखते हुए टीआई ने वरिष्ठ अधिकारियों को पूरे मामले से अवगत कराया. शाम होतेहोते फोरैंसिक टीम और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में सोनू की निशानदेही पर उस के घर के आंगन में जब खुदाई की गई तो बुरी तरह क्षतविक्षत हुई लाशों के 3 कंकाल वहां से बरामद हुए.
फोरैंसिक एक्सपर्ट ने बताया कि खुदाई में निकले तीनों कंकाल करीब डेढ़ से 2 माह पुराने हैं. पुलिस ने तीनों को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भिजवा दिया. पुलिस पूछताछ में यह बात भी सामने आई कि तीनों शव जमीन में दफन करने में सोनू की मदद उस के दोस्त बंटी कैथवास ने की थी.
सोनू ने अमन, खुशी और निशा की हत्या करने के बाद मजदूरों को बुलाया और उन से कहा कि घर में पानी की टंकी बनानी है. 2 मजदूरों ने 3 घंटे में लगभग साढ़े 3 फीट
चौड़ा, 5 फीट लंबा और 3-4 फीट गहरा गड्ढा खोद दिया और अपनी मजदूरी ले कर चले गए.