Latest Crime Story in Hindi : रिलेशनशिप में रह रही प्रेमिका की चाकू मारकर की हत्या

Latest Crime Story in Hindi : नोएडा के खोड़ा कालोनी के वंदना एनक्लेव स्थित 4 मंजिला मकान में कुल 33 कमरे थे. सभी कमरों में नोएडा, गाजियाबाद और दिल्ली में काम करने वाले किराएदार रह रहे थे. इन में से कुछ लोग अपने परिवार के साथ रहते थे. लेकिन ज्यादातर लोग ऐसे थे जो अकेले ही रहते थे. चूंकि सभी लोग नौकरीपेशा थे, इसलिए वे सुबह ही अपनी ड्यूटी पर चले जाते और देर शाम या रात को वापस अपने कमरों पर लौटते थे.

12 जून, 2018 की रात करीब 11 बजे की बात है. उस समय अधिकांश लोग अपने कमरों में सोने की तैयारी में थे. तभी कुछ लोगों को भयंकर बदबू आई. बदबू कहां से आ रही है, यह जानने के लिए कुछ किराएदार अपने कमरों से बाहर निकल आए. उसी समय एक युवक चौथी मंजिल से एक बड़े आकार का भूरे रंग का ट्रौली बैग अपने साथ ले कर सीढि़यों से उतरता दिखा.

वहां रहने वाले उस युवक के बारे में केवल इतना जानते थे कि वह ऊपर की मंजिल पर रहता है. उस का नाम किसी को मालूम नहीं था. ट्रौली बैग ले कर वह जिधर जा रहा था, उधर ही बदबू बढ़ती जा रही थी.

लोगों को शक हुआ कि उस के बैग में ऐसा क्या है जो इतनी बदबू आ रही है. एकदो लोगों ने उस से इस बारे में पूछा भी, लेकिन उस ने ठीक से कोई जवाब देने के बजाए उन्हें झिड़क दिया. इस के बाद उन लोगों को उस पर और भी ज्यादा शक बढ़ गया और वे उत्सुकतावश नीचे ग्राउंड फ्लोर पर आ गए.

दरअसल, पिछले 2 दिनों से उस मकान में एक अजीब तरह की सड़ांध आ रही थी. कई किराएदारों ने सड़ांध का पता लगाने की कोशिश की थी लेकिन कुछ भी पता नहीं चल पाया था. लेकिन ट्रौली बैग देख कर वे लोग समझ गए कि सड़ांध उसी बैग से आ रही है.

ग्राउंड फ्लोर पर उतरने के बाद वह युवक लाल रंग की कार की तरफ बढ़ रहा था, तभी लोगों ने इस की सूचना उस मकान के केयरटेकर राधेमोहन त्रिपाठी को दे दी. राधेमोहन त्रिपाठी उस ट्रौली बैग वाले युवक के पास पहुंचे. वह उस युवक को पहचान गए. वह युवक चौथी मंजिल पर रहने वाला किराएदार शिवम विरदी था.

राधेमोहन ने शिवम से बैग के बारे में पूछा तो वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका. इस पर राधेमोहन ने उसे कार में बैठने से रोक लिया और नोएडा पुलिस के कंट्रोलरूम को फोन कर दिया. जो किराएदार नीचे उतर आए थे, वे उस लाल रंग की कार के आगे खड़े हो गए ताकि वह कार ले कर वहां से न भाग सके. तब तक शिवम वह ट्रौली बैग ले कर कार में बैठ चुका था. उस ने कार का हौर्न बजा कर सामने खडे़ लोगों से हट जाने का संकेत किया. लेकिन वे नहीं हटे तो शिवम के चेहरे पर घबराहट दिखाई देने लगी.

शिवम ने जब देखा इतने सारे लोग उस के पीछे पड़ गए हैं तो वह कार से उतरा और उसे लौक कर के वहां से पैदल ही भाग खड़ा हुआ. लोग उस के पीछे भागे भी पर वह किसी की पकड़ में नहीं आया.

थोड़ी देर में खोड़ा थाने के थानाप्रभारी धर्मेंद्र कुमार वहां आ गए. लोगों ने उन्हें पूरी बात बताई. कार के सामने पहुंच कर वह उस का मुआयना करने लगे. कार के दरवाजे लौक थे, इस के बावजूद कार से कुछ बदबू बाहर आ रही थी. उन्होंने साथ में आए स्टाफ से कार का शीशा तोड़ कर कार में रखा ट्रौली बैग बाहर निकालने को कहा.

पुलिसकर्मियों ने कार का शीशा तोड़ कर ट्रौली बैग बाहर निकाला तो उस में से बहुत तेज बदबू आ रही थी. इस से थानाप्रभारी ने बैग खुलवाया तो उन की शंका सच साबित हुई. उस में एक लड़की की लाश थी.

लाश काफी खराब अवस्था में थी. लाश देख कर लोगों ने बताया कि लाश शिवम की पत्नी ज्योति की है. ज्योति कई दिनों से दिखाई भी नहीं दे रही थी. लाश का मुआयना करने पर थानाप्रभारी ने देखा उस पर घाव के निशान थे. थानाप्रभारी धर्मेंद्र कुमार ने वरिष्ठ अधिकारियों को फोन कर के मामले की सूचना दे दी और जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. उन्होंने लाल रंग की स्विफ्ट कार अपने कब्जे में ले ली.

मकान के केयरटेकर राधेमोहन त्रिपाठी से पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने बताया कि कार छोड़ कर फरार हुआ शिवम लुधियाना, पंजाब का रहने वाला है और पिछले 8 महीने से वह अपनी पत्नी ज्योति के साथ यहां रह रहा था. केयरटेकर को साथ ले कर थानाप्रभारी चौथी मंजिल स्थित शिवम के कमरे पर पहुंचे.

कमरे पर ताला लगा हुआ था. ताला तोड़ कर पुलिस टीम अंदर पहुंची तो देखा फर्श की अच्छी तरह सफाई कर दी गई थी. कमरे की तलाशी में पुलिस को कुछ कागजात मिले, उन में से एक में ज्योति के भाई का पता और फोन नंबर मिल गया.

थानाप्रभारी ने उस के भाई को फोन कर के बताया कि उस की बहन के साथ अनहोनी हो गई है, इसलिए वह जितनी जल्दी हो सके, नोएडा के खोड़ा थाने पहुंच जाए. उस कमरे को सील कर के पुलिस टीम थाने लौट गई.

अगले दिन सुबह फरार शिवम का हुलिया पता कर के नोएडा के बसस्टैंड तथा मैट्रो स्टेशन पर उस की तलाश की गई, मगर वह कहीं नहीं मिला. उधर थानाप्रभारी को बेसब्री से ज्योति के भाई के आने का इंतजार था. उस के आने के बाद ही आगे की काररवाई की जानी थी.

12 जून, 2018 की शाम को ज्योति का भाई लोधी सिंह वर्मा खोड़ा थाने पहुंच गया. थानाप्रभारी ने सब से पहले उसे अस्पताल में रखी लाश दिखाई. लाश देखते ही वह रोने लगा. उस ने उस की शिनाख्त अपनी छोटी बहन ज्योति के रूप में कर दी. लोधी सिंह की शिकायत पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर लिया.

पुलिस ने लोधी सिंह से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की बहन पिछले साल अक्तूबर में दिल्ली के एक सैलून में जौब मिलने की बात बता कर लुधियाना से नोएडा चली आई थी.

चूंकि उस ने परिवार को अच्छी सैलरी मिलने की बात बताई थी, वैसे भी ज्योति तेजतर्रार थी, इसलिए उस के दिल्ली आने पर किसी ने ऐतराज नहीं किया था.

नौकरी लग जाने पर उस ने बताया था कि वह दिल्ली में अपनी एक सहेली के साथ किराए पर कमरा ले कर रहती है. यहां आने के बाद भी वह प्रतिदिन अपने घर फोन कर के अपने बारे में जानकारी देती रहती थी. जब तक वह यहां रही, परिवार का कोई सदस्य उसे देखने के लिए नहीं आया.

इस वारदात के बाद लोधी सिंह को पता लगा कि वह किसी सहेली के साथ नहीं बल्कि शिवम के साथ रह रही थी. लोधी सिंह से बात करने के बाद थानाप्रभारी ने फरार शिवम को तलाशने के लिए मुखबिर लगा दिए.

13 जून, 2018 की शाम को खोड़ा के कुछ लोगों ने नोएडा के लेबर चौक के पास शिवम को खड़े देखा. वह शायद किसी गाड़ी के इंतजार में वहां खड़ा था. पुलिस को सूचना देने से पहले ही लोगों ने उसे पकड़ लिया और इस की सूचना खोड़ा पुलिस को दे दी.

शिवम के पकड़े जाने की बात सुन कर थानाप्रभारी धर्मेंद्र कुमार फौरन पुलिस टीम के साथ लेबर चौक पहुंच गए. वहां कुछ लोग शिवम को दबोचे खड़े थे. पुलिस ने उसे अपनी हिरासत में ले लिया. थाने ला कर जब उस से उस की पत्नी ज्योति की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि ज्योति की हत्या उस ने नहीं की है, बल्कि उस ने आत्महत्या की थी.

शिवम ने बताया कि 9 जून की रात को वह शराब पी कर घर लौटा तो ज्योति उस से नाराज हो गई. दोनों के बीच कहासुनी हुई तो ज्योति गुस्से में बाथरूम में गई और फंदा बना कर लटक गई.

आधी रात होने पर जब उस का नशा उतरा तो उस ने ज्योति को ढूंढना शुरू किया. वह उसे ढूंढते हुए बाथरूम में पहुंचा तो उस की लाश फंदे में झूल रही थी. यह देख कर वह घबरा गया और पुलिस से बचने के डर से उस ने 2 दिनों तक उस की लाश कमरे में ही छिपाए रखी. कल जब वह उसे ठिकाने लगाने के लिए जा रहा था, तभी लोगों ने उसे घेर लिया और लाश ठिकाने नहीं लगा सका.

यह सब बतातेबताते शिवम थानाप्रभारी से बारबार नजरें चुरा रहा था. यह देख कर थानाप्रभारी को उस की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. इस के बाद उन्होंने शिवम से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि ज्योति की हत्या उस ने ही की थी. उस ने ज्योति की हत्या के पीछे की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

26 वर्षीय शिवम लुधियाना के फतेहपुर अवाना राजगुरू नगर में अपने पिता जगदीश विरदी और मां के साथ रहता था. उस के पिता एक फैक्ट्री में काम करते थे. 2 साल पहले वह लुधियाना के एक मौडर्न सैलून के सामने से गुजर रहा था, तो उस की मुलाकात ज्योति से हुई. ज्योति उसी सैलून में नौकरी करती थी.

पहली ही नजर में ज्योति की खूबसूरती उस के दिल को भा गई. उस ने उत्सुकतावश पूछ लिया कि इस सैलून में लेडीज और जेंट्स दोनों की हेयर सेटिंग होती है? इस पर ज्योति ने उसे बताया कि यहां दोनों के लिए अलगअलग सैलून हैं और वह भी इसी सैलून में काम करती है. अगर उसे कभी जरूरत हो तो उसे फोन कर के आ जाए.

इस के बाद उस ने अपना फोन नंबर बताया तो शिवम ने जल्दी से उस का नाम पूछ कर उस का नंबर अपने मोबाइल में सेव कर लिया. इस के बाद उस ने अपना नाम और नंबर भी ज्योति को बता दिया. यह उन दोनों की पहली मुलाकात थी. इस के बाद तो आए दिन किसी न किसी बहाने से दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया जो जल्दी ही प्यार में बदल गया.

दोनों का जब भी दिल करता, आपस में प्यार की मीठीमीठी बातें कर अपनी चाहतों का इजहार करने से नहीं चूकते थे. धीरेधीरे 2 साल गुजर गए. इस बीच शिवम ने लुधियाना के नामी इंस्टीट्यूट से बीसीए का कोर्स भी पूरा कर लिया. अब उसे भी नौकरी की तलाश थी. वह जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा हो कर ज्योति को अपनी दुलहन बनाना चाहता था.

ज्योति के परिवार में उस के पिता की कुछ साल पहले ही मौत हो चुकी थी. इस समय घर में 2 बडे़ भाई धर्मेंद्र सिंह वर्मा और लोधी सिंह वर्मा तथा 5 बहनें थीं. बहनों में वह सब से छोटी थी.

दोनों को ऐसा लगता था कि उन की शादी में परिवार वाले बाधक नहीं बनेंगे. फिर भी दोनों फूंकफूंक कर कदम रख रहे थे. मजे की बात यह थी कि काफी समय गुजर जाने के बाद भी उन के परिवार वालों को उन के अफेयर की जानकारी नहीं थी.

इस बीच एक दिन जब दोनों मिले तो शिवम ने उसे बताया कि वह नौकरी की तलाश में दिल्ली जा रहा है और नौकरी मिलते ही उसे भी वहां बुला लेगा. ज्योति इस के लिए पहले से ही राजी थी, इसलिए उस ने शिवम के प्रस्ताव पर फौरन हामी भर दी.

ज्योति के साथ नया जीवन गुजारने की उमंग में वह मन में नएनए सपने बुनता हुआ नोएडा आ गया. यहां उसे वीवो कंपनी में नौकरी मिल गई. वह कंपनी के कस्टमर केयर डिपार्टमेंट में काम करने लगा.

6 महीने बाद उस ने ज्योति को भी फोन कर के अपने पास बुला लिया. अक्तूबर में ज्योति नोएडा आ गई. साथ रहने के लिए दोनों ने खोड़ा कालोनी के वंदना एनक्लेव में वन रूम सेट किराए पर ले लिया और लिवइन में रहने लगे. वहां शिवम ने ज्योति को अपनी पत्नी बताया था. कुछ दिन बाद ज्योति वर्मा को भी गाजियाबाद के वसुंधरा एनक्लेव के एक ब्यूटीपार्लर में ब्यूटीशियन की नौकरी मिल गई. चूंकि दोनों ही नौकरी कर रहे थे, इसलिए उन्हें अब किसी तरह की टेंशन नहीं थी. दोनों खुश थे.

ज्योति और शिवम के शुरुआत के 3-4 महीने बेहद खुशनुमा थे, लेकिन परेशानी तब शुरू हुई, जब ज्योति शिवम के जल्दी शादी करने के प्रस्ताव को किसी न किसी बहाने टालने लगी. यह देख कर शिवम मन ही मन बहुत परेशान रहने लगा. इस के अलावा उन दोनों की सैलरी में भी भारी अंतर था. शिवम को जहां 14 हजार रुपए मिलते थे, वहीं ज्योति की सैलरी 22 हजार रुपए महीने थी.

इस के अलावा ज्योति ने अप्रैल महीने से घर लेट पहुंचना शुरू कर दिया था. इस से शिवम ने मन में सोचा कि ज्योति को कोई अमीर आशिक मिल गया है, इसलिए वह उस से किनारा करना चाह रही है. अपना शक दूर करने के लिए वह रोज ज्योति के घर लौटने पर उस का मोबाइल चैक करने लगा.

शिवम को अपना मोबाइल चैक करते देख कर ज्योति लपक कर उस से मोबाइल छीन लेती थी, साथ ही ऐसा करने से मना भी करती थी. इस के बाद शिवम का शक और बढ़ गया. नतीजतन आए दिन दोनों के बीच रोज लड़ाई होने लगी. शिवम को अब पक्का यकीन हो गया कि ज्योति जरूर किसी के साथ डेट पर जाने लगी है.

9 जून, 2018 की शाम शिवम विरदी ने शराब पी. उस ने सोचा कि आज वह ज्योति का मोबाइल छीन कर उस के वाट्सऐप और फेसबुक की फ्रैंडलिस्ट चैक करेगा. देर शाम जब ज्योति घर लौटी तो पहले से गुस्से में भरे बैठे शिवम ने उस से मोबाइल छीन लिया. जब ज्योति ने इस का पुरजोर विरोध किया तो दोनों के बीच जम कर लड़ाई हो गई.

गुस्से में शिवम रसोई से चाकू उठा लाया और उस के पेट पर कई वार कर दिए. थोड़ी देर तड़प कर ज्योति ने दम तोड़ दिया. ज्योति के मरने के बाद शिवम को लगा, उस से बहुत बड़ी गलती हो गई. लेकिन अब क्या हो सकता था. वह 72 घंटों तक लाश को एक ट्रौली बैग में बंद कर के रखे रहा और उसे ठिकाने लगाने के बारे में सोचता रहा.

12 जून को उस ने दिल्ली के लक्ष्मीनगर से एक सेल्फ ड्राइव स्विफ्ट कार किराए पर ली और उसे वंदना एनक्लेव स्थित मकान के सामने ले आया. जब वह ट्रौली बैग को उस में रखने जा रहा था, उसी समय ज्योति की लाश से निकलने वाली बदबू के कारण उस का भांडा फूट गया और वह खोड़ा के थानाप्रभारी के हत्थे चढ़ गया.

14 जून, 2018 को नोएडा के एसएसपी वैभव कृष्ण, एसपी आकाश तोमर ने नोएडा स्थित अपने औफिस में प्रैस कौन्फ्रैंस कर मीडिया को ज्योति वर्मा मर्डर केस का खुलासा होने की जानकारी दी.

उसी दिन आरोपी शिवम विरदी को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

तमाम युवक और युवतियां लिवइन में रहते हैं और अपनीअपनी नौकरी करते हैं, लेकिन सभी के अनुभव अच्छे नहीं होते. इस की वजह होती है दोनों की अंडरस्टैंडिंग ठीक न बन पाना. ज्योति और शिवम के मामले में भी यही हुआ. Latest Crime Story in Hindi

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

योगेश सक्सेना मर्डर : प्यार में किये कई अपराध

उमा ने अपने भाई के दोस्त योगेश सक्सेना से अवैध संबंध बना लिए थे. योगेश के चक्कर में वह अपने पति को भी छोड़ आई थी. कुछ दिनों बाद उमा के संबंध सुनील शर्मा से हो गए. फिर उमा ने सुनील के साथ मिल कर पहले प्रेमी योगेश को ठिकाने लगाने की ऐसी साजिश रची कि… बरेली के प्रेमनगर थाना क्षेत्र के भूड़ पड़रिया मोहल्ले में रहने वाला योगेश सक्सेना उर्फ मुन्नू नाथ

मंदिर के पास रेडीमेड कपड़ों की एक दुकान में सेल्समैन की नौकरी करता था. पहली मार्च, 2020 की रात वह दुकान से घर नहीं लौटा तो परिजनों को चिंता हुई. योगेश का बड़ा भाई अंशू भी घर के बाहर था. उसे फोन कर के बताया गया तो उस ने योगेश जिस दुकान पर काम करता था, उस के मालिक जितेंद्र से पता किया तो उस ने बताया कि योगेश तबीयत खराब होने की बात कह कर जल्दी दुकान से घर जाने के लिए निकल गया था. जब वह दुकान से जल्दी निकल गया तो गया कहां, यह प्रश्न योगेश के परिजनों के सामने मुंह बाए खड़ा था. उस की काफी तलाश की लेकिन कोई पता नहीं चला.

2 मार्च की सुबह बरेली थाना कोतवाली और कुमार टाकीज के बीच में खाली पड़े मैदान में एक पेड़ के नीचे एक अज्ञात युवक की अधजली लाश पड़ी मिली. किसी ने लाश की सूचना थाना कोतवाली को दे दी.

सूचना पा कर सीओ (प्रथम) अशोक कुमार और कोतवाली इंसपेक्टर गीतेश कपिल पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने लाश व घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र यही कोई 30 से 35 वर्ष रही होगी.

मृतक के गले व चेहरे पर धारदार हथियार के 4 गहरे घाव दिखाई दे रहे थे. मारने के बाद उस की पहचान छिपाने के लिए उस की लाश को जलाया गया था, जो कि पूरी तरह से नहीं जल पाई  थी. पास में ही मृतक का मोबाइल भी जला हुआ बरामद हुआ.

लाश की शिनाख्त के लिए आसपास के दुकानदारों को बुलाया गया. उन में जितेंद्र नाम का एक दुकानदार भी था. उस ने लाश देखी तो वह लाश पहचान गया. क्योंकि वह लाश उस के शोरूम के सेल्समैन योगेश सक्सेना की थी. उस ने तुरंत योगेश के भाई अंशू सक्सेना को योगेश की लाश मिलने की सूचना दे दी.

सूचना पर योगेश की मां मुन्नी देवी व भाई अंशू मौके पर पहुंच गए और लाश की शिनाख्त कर दी. शिनाख्त होने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी गई. इंसपेक्टर गीतेश कपिल ने अंशू से पूछताछ की तो उस ने बताया कि योगेश अपने दोस्त की बहन उमा से फोन पर बात करता रहता था. अपनी कमाई भी उसी पर लुटाता था. कई बार उसे समझाया लेकिन वह मानता ही नहीं था.

कोतवाली आ कर इंसपेक्टर गीतेश की तरफ से अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302/201 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

इंसपेक्टर गीतेश ने जांच शुरू की. पुलिस ने योगेश के फोन नंबर की काल डिटेल्स की जांच की. योगेश के नंबर पर अंतिम काल जिस नंबर से की गई थी, उस नंबर से रोज योगेश की बात होने का प्रमाण मिला. घटना की रात उस नंबर से काल आने के बाद ही योगेश दुकान से निकला था. वह नंबर उस की प्रेमिका उमा शुक्ला का था जोकि योगेश के मकान से कुछ दूर भूड़ पट्टी में रहती थी.

इस के बाद 3 मार्च को इंसपेक्टर गीतेश कपिल ने उमा शुक्ला को घर से हिरासत में ले कर कोतवाली में महिला कांस्टेबल की मौजूदगी में कड़ाई से पूछताछ की तो उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

पूछताछ में उमा ने बताया कि योगेश की हत्या उस ने अपने दूसरे प्रेमी सुनील शर्मा से कराई थी. उस के बाद सुनील शर्मा को भी गिरफ्तार कर लिया गया. इन दोनों से पूछताछ के बाद जो कहानी निकल कर सामने आई, कुछ इस तरह थी—

उत्तर प्रदेश के महानगर बरेली के प्रेमनगर थाना क्षेत्र के भूड़ पड़रिया मोहल्ले में अशोक सक्सेना सपरिवार रहते थे. वह एक प्राइवेट बस औपरेटर के यहां कंडक्टर थे.

परिवार में पत्नी मुन्नी देवी के अलावा 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. अशोक सक्सेना ने अपनी बड़ी बेटी शालिनी का विवाह कर दिया. इस से पहले कि वह अन्य बच्चों की शादी की जिम्मेदारी से मुक्त होते, 3 साल पहले उन की मृत्यु हो गई.

बड़ा बेटा अंशू शादीबारातों में बैंड बाजा बजाने का काम करने लगा. हाईस्कूल पास योगेश नाथ मंदिर के पास स्थित रेडीमेड कपड़ों की एक दुकान में सेल्समैन की नौकरी कर रहा था. वह इस दुकान पिछले 5 सालों से काम कर रहा था.

योगेश के मकान से कुछ दूरी पर भूड़ पट्टी में महेशचंद्र शुक्ला रहते थे. वह प्राइवेट जौब करते थे. परिवार में उन की पत्नी जानकी और एक बेटी उमा और बेटा अमर उर्फ गुरु था.

20 जुलाई 1990 को जन्मी उमा काफी खुबसूरत और महत्त्वाकांक्षी युवती थी. उस ने बरेली यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएशन की थी. बरेली जैसे महानगर में पलीबढ़ी होने के कारण उस के वातावरण का असर भी उस पर पड़ा था.

उमा का भाई अमर और योगेश एक ही मार्केट में अलगअलग रेडीमेड कपड़ों की दुकान पर काम करते थे. इसी वजह से योगेश और अमर में दोस्ती हो गई. दोनों एकदूसरे के घर भी आते जाते थे. इसी आने जाने में योगेश और उमा एकदूसरे को जानने लगे. दोनों का दिन में कईकई बार आमनासामना हो जाता था.

दोनों की निगाहें आपस में टकराती थीं तो उमा लजा कर अपनी निगाहें नीची कर लेती थी. योगेश की आंखों की गहराई वह ज्यादा देर बरदाश्त नहीं कर पाती थी. शर्म से पलकें झुक जातीं और होंठों पर हल्की मुसकान भी अपना घर बना लेती थी. उमा की इस अदा पर योगेश का दिल बेचैन हो उठता था.

उमा को योगेश अच्छा लगता था. वह उसे दिल ही दिल में चाहने लगी थी. उस की चाहत की तपिश योगेश तक पहुंचने लगी थी. योगेश को तो उमा पहले से ही पसंद थी. इस वजह से योगेश भी अपने कदम बढ़ने से रोक न सका. वह भी उमा को अपनी बांहों में भर कर उस की आंखों की गहराइयों में उतर जाने को आतुर हो उठा.

एक दिन योगेश उमा के कमरे से निकल कर बाहर की ओर जाने लगा कि अचानक वह फिसल गया. इस से उस के दाएं हाथ के अंगूठे में काफी चोट लग गई और अंगूठे से खून निकलने लगा. वहीं आंगन में खड़ी उमा ने देखा तो दौड़ीदौड़ी आई. खून निकलता देख कर वह तुरंत अपने रुमाल को पानी में भिगो कर उस के अंगूठे में बांधने लगी. उसके द्वारा ऐसा करते समय योगेश उस की तरफ प्यार भरी नजरों से देखता रहा.

उमा रुमाल बांधने के बाद बोली, ‘‘जरा संभल कर चला करो. अगर आप इस तरह गिरोगे तो जिंदगी की राह पर कैसे संभल कर चलोगे?’’

‘‘जिंदगी की डगर पर अगर मैं गिरा भी तो जिंदगी भर साथ देने वाले हाथ मुझे संभालने के लिए हमेशा तैयार रहेंगे. ये हाथ किस के होंगे और कौन जिंदगी भर साथ निभाने के लिए मेरे साथ होगा, यह तो अभी मुझे भी नहीं पता.’’ योगेश ने उमा की निगाहों में निगाहें डालते हुए कहा.

योगेश की इस रारत से उस की नजरें शर्म से थोड़ी देर के लिए झुक गईं. फिर वह बोली, ‘‘छोड़ो इस बात को. आप रुमाल को थोड़ीथोड़ी देर बाद पानी से गीला जरूर कर लेना. इस से आप के अंगूठे का जख्म जल्दी ठीक हो जाएगा.’’

‘‘अंगूठे का जख्म तो ठीक हो जाएगा लेकिन दिल का जख्म…’’ इतना कह कर योगेश तेजी से दरवाजे से बाहर निकल गया.

रूहानी तौर पर एकदूसरे से बंधे होने के बावजूद खुल कर अभी तक न तो योगेश ने प्यार का इजहार किया था और न ही उमा ने. लगन की आग दोनों ओर लगी थी, बस देर थी तो आग को शब्दों की जुबां दे कर बयां करने की.

योगेश जब घर में आता तो उमा का मन अधिक से अधिक उस के पास रहने को करता था. जब भी दोनों मिलते, इधरउधर की बातें करते रहते थे. इस से धीरेधीरे दोनों एकदूसरे से काफी खुल गए और उन में काफी निकटता आ गई. उमा मिलने व बात करने के उद्देश्य से योगेश के पास पहले से अधिक जाने जाने लगी. एक दिन योगेश घर में अपने कमरे में बैठा कुछ पढ़ रहा था. उमा भी उस से मिलने वहां पहुंच गई.

उमा को देख कर योगेश खुश होते हुए बोला, ‘‘आओ उमा, बहुत देर लगा दी. मैं काफी देर से तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था.’’

‘‘घर का काम निपटाने में मम्मी की मदद करने लगी थी, इसीलिए देर हो गई.’’ वह बोली.

‘‘ठीक है, तुम थोड़ी देर बैठो. मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाता हूं.’’ कह कर योगेश चाय बनाने चला गया.

उमा वहीं मेज पर रखी पत्रिका उठा कर उस के पन्ने पलटने लगी. थोड़ी ही देर में योगेश चाय बना कर ले आया. मेज पर चाय रखते हुए योगेश बोला, ‘‘उमा, क्या पढ़ रही हो?’’

योगेश की बात सुन कर उमा ने सिर उठाया और योगेश की तरफ देखते हुए बोली, ‘‘ इस पत्रिका में एक बहुत ही अच्छी कहानी छपी है, वही पढ़ने लगी थी.’’

यह सुन कर योगेश भी उमा के पास बैठ कर चाय पीते हुए उसी पत्रिका को पढ़ने में तल्लीन हो गया. पूरी कहानी पढ़ने के बाद ही योगेश ने पत्रिका के सामने से सिर हटाया और उमा की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘सही कहा था तुम ने. काफी दिल को छू लेने वाली प्रेम कहानी है. दोनों में कितना प्यार था? अच्छा उमा यह बताओ कि आज के समय में भी इतना पवित्र प्यार करने वाले लोग मिलते हैं?’’

योगेश की बात सुन कर उमा भावुक होते हुए बोली, ‘‘वे बड़ी किस्मत वाले होते हैं, जिन्हें किसी का प्यार मिलता है.’’

उमा की बात बीच में ही काटते हुए योगेश बोला, ‘‘कुछ मेरी तरह बदनसीब होते हैं. जिन्हें प्यार के नाम पर सिर्फ जमाने की ठोकरें मिलती हैं.’’ यह कह कर योगेश के आंसू छलक आए. योगेश की आंखों में आंसू देख उमा तड़प उठी.

योगेश का हाथ अपने हाथों में ले कर वह बोली, ‘‘तुम ऐसा क्यों सोचते हो? तुम तो इतने अच्छे हो कि तुम्हें हर कोई प्यार करना चाहेगा. मैं तुम से कई दिनों से एक बात करना चाहती थी लेकिन इस डर से चुप रही कि कहीं तुम बुरा न मान जाओ. तुम कहो तो कह दूं.’’

योगेश ने जब उस की ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा तो वह बोली, ‘‘मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं. लेकिन तुम से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. दिल की बात आज जुबां पर आ ही गई.’’

उमा की बात पर योगेश को विश्वास नहीं हो रहा था. वह उमा की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘क्यों तुम मेरा मजाक उड़ा रही हो. अगर मैं मान भी लूं कि तुम मुझ से प्यार करती हो तो क्या समाज के ठेकेदार हम दोनों को एक होने देंगे क्योंकि हम एक जाति के नहीं हैं.’’

‘‘जब हम प्यार करते हैं, तो इस जमाने से भी टक्कर ले लेंगे. प्यार तो प्यार होता है. इसे धर्म और जाति के तराजुओं में नही तोला जा सकता है. प्यार तो दो दिलों के मिलन का नाम है.’’

उमा की बात सुन कर योगेश की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े. फिर उस ने उमा को बांहों में भर कर सीने से लगा लिया. उमा भी उस के शरीर से लिपट गई. दोनों एकदूसरे का साथ पा कर काफी खुश थे. दोनों का प्यार दिनोंदिन परवान चढ़ने लगा.

दोनों के परिवारों को भी इस बात का पता चल गया. योगेश की बहनों और भाई ने योगेश को काफी समझाया कि वह उमा के चक्कर में न पड़े, लेकिन योगेश नहीं माना. दूसरी ओर उमा के पिता ने भी उस के लिए रिश्ता तलाशना शुरू कर दिया. जल्द ही बुलंदशहर के रमेश (परिवर्तित नाम) से उमा का रिश्ता पक्का कर दिया. उमा और योगेश कुछ न कर सके, सिर्फ हाथ मलते रह गए. प्रेमिका की शादी किसी और से तय होने पर योगेश पर तो जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. वह दिन रात उमा की यादों में खोया रहता और उस की कही गई बातें याद करता.

27 नवंबर, 2014 को उमा का विवाह रमेश से हो गया. उमा बेमन से अपनी ससुराल चली गई. लेकिन विवाह के बाद उस का पति से मनमुटाव होने लगा. फिर एक वर्ष बीततेबीतते उमा पति का घर हमेशा के लिए छोड़ कर अपने मायके आ गई. इसी बीच उमा ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने सौम्या रखा.

उमा अब पति रमेश से हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहती थी, लिहाजा उस ने अपने तलाक का मुकदमा भी दायर कर दिया.

एक बार फिर से उमा व योगेश एकदूसरे से मिलने लगे. अब योगेश उमा को अपने से दूर जाने नहीं देना चाहता था, किस्मत ने उसे फिर से उमा का साथ पाने के लिए उसे उमा से मिला दिया था. योगेश उस पर अब अपने से विवाह करने का दबाव बनाने लगा.

उमा मायके आई तो वह अपना खर्च उठाने के लिए गंगाचरण अस्पताल के पास पास स्थित एक कैफे में काम करने लगी. इसी बीच उमा की दोस्ती भूड़ पट्टी में रहने वाले सुनील शर्मा से हो गई.

32 वर्षीय सुनील शर्मा अविवाहित था और बरेली के इज्जतनगर में स्थित इंडियन वेटिनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईवीआरआई) में संविदा पर स्टोर कीपर के पद पर तैनात था. दोनों की दोस्ती जल्द ही प्यार में बदल गई. उमा और सुनील एक ही जाति के थे और सुनील अच्छी नौकरी करता था. इसलिए उमा उस से शादी करना चाहती थी. योगेश उस की जाति का भी नहीं था और सेल्समैन की छोटी सी नौकरी करता था.

उमा ने योगेश को समझाया कि वह उस से शादी नहीं कर सकती लेकिन योगेश मान ही नहीं रहा था. उमा भले ही बदल गई हो और योगेश के प्यार को भुला बैठी हो, लेकिन वह तो उमा को दिलोजान से अभी भी चाहता था. वह उमा को हर हाल में पाना चाहता था.

जब योगेश किसी तरह से मानने को तैयार नहीं हुआ तो योगेश से पीछा छुड़ाने के लिए उमा ने सुनील से बात की तो वह योगेश को ठिकाने लगाने के लिए तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने उस की हत्या की योजना बना ली.

योजनानुसार पहली मार्च को उमा अपने औफिस में थी. योजना के अनुसार, रात साढे़ 8 बजे उमा ने योगेश को मिलने के लिए कुमार टाकीज के पीछे खाली पड़े मैदान में बुलाया. योगेश उस समय दुकान पर था. वह अपने मालिक जितेंद्र से तबीयत खराब होने का बहाना बना कर दुकान से निकल आया और कुमार टाकीज के पीछे मैदान में पहुंच गया.

वहां सुनील शर्मा पहले से मौजूद था. योगेश नजदीक आया तो सुनील ने उस की आंखों में लाल मिर्च का पाउडर फेंक दिया, जिस से योगेश बिलबिला उठा. इस के बाद सुनील ने साथ लाए चाकू से योगेश के गले, चेहरे व शरीर पर 4 प्रहार किए, जिस से योगेश जमीन पर गिर कर तड़पने लगा.

कुछ ही पलों में उस की मौत हो गई. सुनील ने पास ही पड़े पत्थर से उस के चेहरे को कुचला. उस के बाद वह साथ लाई टीवीएस अपाचे बाइक से उमा के पास गया. उसे पूरी बात बता दी. इस के बाद उमा रात 9 बजे उस के साथ बाइक पर बैठ कर घटनास्थल पर आई.

उमा ने सुनील से कहा कि वह बाइक से पैट्रोल निकाल कर योगेश की लाश जला दे, जिस से उस की पहचान न हो सके. इस पर सुनील ने बाइक से पैट्रोल निकाल कर योगेश की लाश पर डाल दिया और आग लगा दी. इस के बाद दोनों वहां से चले गए. लेकिन पुलिस आसानी से उन दोनों तक पहुंच ही गई.

सुनील की निशानदेही पर इंसपेक्टर गीतेश कपिल ने हत्या में प्रयुक्त चाकू, लाश जलाने में प्रयुक्त माचिस की डब्बी, रक्तरंजित कपड़े और सुनील की अपाचे बाइक नंबर यूपी25सी एम3263 बरामद कर ली.

फिर कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद दोनों को सीजेएम की कोर्ट में पेश किया गया, वहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

फर्जी पत्रकार की दीवानगी – भाग 3

अनिभा ने बादल से सदा इसी तरह साथ निभाने का वादा भी किया था. फरजी पत्रकारों के गैंग के सदस्यों के साथ बादल जब जेल चला गया तो अनिभा का झुकाव आईटी पार्क स्थित पेटीएम कंपनी के मैनेजर अंबुज शर्मा की तरफ हो गया. अंबुज भी स्मार्ट था और साथ में काम करता था, लिहाजा दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई.

बादल की मां घर में पापड़ बनाने का काम करती थी और उस के पिता इस काम में उस की मदद करते थे. बादल की मां को कैंसर की बीमारी थी, जिस का इलाज भी चल रहा था. बादल के जेल जाने से उस की मां को बहुत सदमा पहुंचा और वह धीरेधीरे गंभीर रूप से बीमार हो गई.

6 महीने के बाद जेल से बादल बाहर आया, तब तक उस की मां बिस्तर पकड़ चुकी थी. बादल को यह देख कर बहुत दुख हुआ, वह मां के इलाज के लिए पैसे जुटाने के लिए फिर से फरजी पत्रकारों के गैंग में शामिल हो गया, मगर 2 महीने बाद ही उस की मां की मौत हो गई.

इस के बाद बादल काफी टूट चुका था. परिवार की माली हालत भी मां के इलाज में पतली हो चुकी थी. मां की मौत के बाद पापड़ बनाने का काम बंद हो गया.

अनिभा को भी जब मालूम हुआ कि बादल फरजी पत्रकारों के गिरोह में शामिल है, जिन का काम आए दिन लोगों के साथ धोखाधड़ी और ब्लैकमेलिंग के जरिए पैसा कमाना है तो उस ने बादल से दूरियां बनानी शुरू कर दीं.

अनिभा का प्यार अब अंबुज के साथ परवान चढ़ रहा था. जब बादल को इस बात का पता चला तो वह भड़क गया.

एक दिन बादल ने कंपनी के औफिस में जा कर मैनेजर अंबुज को धमकाते हुए मारपीट भी कर दी. इस वारदात की शिकायत तिलवारा घाट थाने में दर्ज हुई. इस घटना के कुछ दिन बाद पेटीएम कंपनी ने मैनेजर अंबुज शर्मा का ट्रांसफर भोपाल कर दिया.

अंबुज का ट्रांसफर भोपाल हो जरूर गया था, लेकिन अनिभा मैनेजर के संपर्क में बनी रही.

फरजी पत्रकार बना बादल भले ही शादीशुदा था, मगर उस के कोई औलाद नहीं हुई थी. अपनी बीवी की अनदेखी कर वह अनिभा का दीवाना बना हुआ था.

अंबुज शर्मा के ट्रांसफर के बाद भी उसे यह शक बना रहता था कि कहीं अनिभा फोन के जरिए उस के संपर्क में तो नहीं रहती. जब कभी वह अनिभा को फोन मिलाता और उस का फोन व्यस्त रहता तो बादल का यह शक और गहरा जाता.

पुलिस जांचपड़ताल में यह जानकारी भी सामने आई है कि वारदात से 13-14 दिन पहले अनिभा ने मोबाइल पर बादल की पत्नी से बात की थी. कौन्फ्रैंस में अनिभा का प्रेमी अंबुज था. अनिभा व अंबुज ने फोन पर उस की पत्नी को जानकारी दी कि बादल अनिभा को परेशान करता है.

अनिभा ने कहा कि वह बादल से किसी तरह का संबंध नहीं रखना चाहती है, मगर बादल उस का पीछा नहीं छोड़ रहा. अनिभा व अंबुज से हुई बातचीत की जानकारी पत्नी ने जब बादल को दी, बादल गुस्से से पागल हो गया.

23 जुलाई, 2022 को वह सुबह 6 बजे घर से कंपनी की ड्यूटी के लिए गई थी. वह अपने काम में बिजी थी. दोपहर के लगभग 3 बजे होंगे. इंद्रानगर रांझी निवासी बादल पटेल अपने साथी त्रिपुरी चौक गड़ा निवासी केतन रजक के साथ आईटी पार्क पहुंचा था. बादल व केतन की दोस्ती जेल में हुई थी.

पेटीएम कंपनी औफिस के सामने कार खड़ी कर के बादल गार्ड से बोला, ‘‘मैं अनिभा मैडम के घर से आया हूं. अनिभा को बाहर बुला दो, अर्जेंट मिलना है.’’

गार्ड ने तुरंत ही जा कर अनिभा के केबिन का दरवाजा खटखटाया और बोला, ‘‘मैडम, आप के घर से कोई मिलने आया है.’’

अनिभा ने सोचा शायद उस का भाई अंकित उस से मिलने आया होगा, इसलिए वह अपने काम को अधूरा छोड़ कर तुरंत ही केबिन से बाहर निकल औफिस के गेट पर आ गई.

जैसे ही अनिभा गेट पर पहुंची, वहां से बादल और केतन ने उसे जरूरी काम के लिए जाने को कह कर अपनी कार में बिठा लिया. अनिभा कार की पिछली सीट पर बैठी थी. वहीं बादल कार चला रहा था, उस के बगल की सीट पर उस का दोस्त केतन बैठा था.

आईटी पार्क से कुछ दूर चलने पर ही बरगी हिल्स में पान गुटखा के एक टपरे के पास बादल ने केतन को कार से उतार दिया था. बादल ने उस से कहा कि अनिभा से अकेले में बात करना चाहता है. 5 मिनट बाद लौट आएगा, जिस के बाद बादल अनिभा को ले कर कार से इधरउधर घूमता रहा. अनिभा बादल की हरकतों से अंजान नहीं थी.

एक साल पहले भी बादल अपने 3 साथियों के साथ जबरन उसे साथ ले गया था. उस समय भी बादल ने उस के साथ एक होटल में जबरदस्ती संबंध बनाए थे और बाद  में उसे छोड़ दिया था. अनिभा उस दिन भी यही समझ कर खामोश कार में बैठ गई कि बादल उस के साथ जोरजबरदस्ती कर के ही मानेगा.

अपने दोस्त विजय कुमार की स्विफ्ट कार में अनिभा को बिठा कर बादल उसे शहर घुमाता रहा. इस दौरान वह बारबार अनिभा से यही कहता रहा, ‘‘तुम अंबुज से दूर रहो, उस से फोन पर भी बात मत करो.’’

बादल अनिभा को ले कर शाम करीब 4 बजे मंगेली गांव में बाईपास पर बने नर्मदा पुल पर  पहुंचा. किसी बात को ले कर दोनों में तकरार इस कदर बढ़ी कि बादल ने कार की डिक्की में रखी पिस्तौल से उस पर 2 गोलियां चला दीं.

एक गोली अनिभा के सीने में लगी और उस के सीने से खून की धार फूट पड़ी. इस के बाद बादल ने पिस्तौल कार की सीट पर फेंक कार का दरवाजा खोला और हड़बड़ी में चप्पल वहीं छोड़ कर पुल की रेलिंग पर खड़े हो कर नर्मदा नदी में छलांग लगा दी.

परिवार का सहारा बनी अनिभा जहां 2 नावों की सवारी कर अपनी जान से हाथ धो बैठी, वहीं पत्रकारिता के पेशे को कलंकित करने वाला बादल शादीशुदा होने के बाद भी प्रेमिका के संबंध को किसी दूसरे मर्द के साथ न देख सका और उस की हत्या कर नर्मदा नदी में छलांग लगा कर उस ने खुदकुशी कर ली.  द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दूध की धुली : आखिर क्यों पृथ्वी और संगीता घर से भागे?

पृथ्वी सड़क के किनारे चुपचाप चल रहा है.  संगीता हरे रंग का सूट पहने हुए है, उस का चेहरा पीला पड़ गया है. हाथों में जेवर की पोटली और किताबों का बैग है. संगीता चलतचलते सरसरी निगाह से पृथ्वी को देख रही है. जब बाजार समाप्त हो गया, तो दोनों पासपास आ गए और एक रिकशे में बैठ कर स्टेशन की ओर चल दिए.

संगीता बोली, ‘‘मुझे बहुत डर लग रहा है.’’

पृथ्वी बोला, ‘‘जब मैं हूं तब किस बात का डर. एक बात बताओ, रास्ते में तुम्हें कोई जानने वाला तो नहीं मिला?’’

संगीता ने कहा, ‘‘नहीं, एक लड़की मिली थी. परंतु तब तुम मेरे से दूर थे. मातापिता परेशान होंगे, मैं उन से कह कर आई थी कि कालेज जा रही हूं. न जाने दिल क्यों इतना घबरा रहा है?’’

पृथ्वी ने आश्वासन दिया, ‘‘डरने की क्या बात है, ट्रेन में बैठ कर सीधे मुंबई पहुंच जाएंगे. एक दिन का तो सफर है. वहां बिलकुल अपरिचित लोग होंगे. बस, मैं और तुम. वहां जा कर एक होटल में ठहर जाएंगे. वैसे भी हमारे घर वालों को, हम पर किसी तरह का शक थोड़े ही हुआ होगा.

संगीता घबराती हुई बोली, ‘‘मुझे घर पर न पा कर मम्मीपापा कितने परेशान होंगे, बहुत डर लग रहा है. पता नहीं क्यों?’’

पृथ्वी हंसते हुए बोला, ‘‘सब से पहले तो तुम्हारे कालेज में पूछताछ होगी. बहरहाल, यह गहने कैसे ले कर आ पाई?’’

‘‘मुझे जगह पता थी. रात को ही अलमारी खोल कर निकाल लिए थे. अलमारी का ताला बंद कर दिया है,’’ संगीता ने बताया.

रिकशा वाला सब सुन रहा था. उन्होंने

स्टेशन के लिए 50 रुपए में रिकशा तय किया था. जब स्टेशन आया तो रिकशा वाला हेकड़ी से बोला, ‘‘मैं तो 500 रुपए लूंगा.’’

‘‘500 रुपए,’’ दोनों एकसाथ बोले, ‘‘500 रुपए किस बात के?’’

‘‘चुपचाप 500 रुपए दे दो वरना अभी पुलिस को बुलाता हूं,’’ रिकशे वाले ने कहा.

पृथ्वी ने चुपचाप जेब से 500 रुपए निकाल कर दे दिए. संगीता घबरा रही थी. जल्दीजल्दी पृथ्वी ने मुंबई के फर्स्टक्लास के 2 टिकट ले लिए. टिकट ले कर तेजी से दोनों ट्रेन के फर्स्टक्लास के डब्बे में जा कर बैठ गए और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. संगीता ने रोते हुए कहा, ‘‘अब तो मुझे और भी ज्यादा डर लग रहा है.’’

पृथ्वी ने समझाया,  ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. फियर इंस्टिंक्ट एक चीज है. लिखने वाले ने तो यह भी लिखा है कि… मगर… खैर छोड़ो… हां, तुम्हारी जरा सी घबराहट ने रिकशा वाले को 500 रुपए का फायदा करा दिया. यदि तुम रिकशे में यह बात न बोलती तो ऐसा कुछ भी न होता. मुझे कुछ नहीं कहना. मगर दुख है तो सिर्फ इस बात का कि मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी और रिकशे वाला मुझे लूट कर चला गया.’’

बाहर दरवाजे पर खटखट हुई, दोनों ने  एकदूसरे को डरते हुए देखा. पृथ्वी बोला, ‘‘साले ने 500 रुपए ले कर भी पुलिस को खबर कर दी.’’

संगीता घबराहट के मारे कांप रही थी, वह बोली, ‘‘अब क्या होगा?’’

‘‘चुपचाप देखती रहो, मुझ पर विश्वास रखो. पीछे के दरवाजे से उतर कर किसी दूसरे डब्बे में बैठ जाते हैं,’’ कह कर पृथ्वी ने पिछला दरवाजा खोला और दोनों उतर कर चल दिए. परंतु दूसरे किसी डब्बे में नहीं बैठ पाए, क्योंकि किसी भी डब्बे का दरवाजा खुला हुआ नहीं था. दोनों चुपचाप प्लेटफौर्म पर चलने लगे.

‘‘अपना किताबों का यह बैग तो छोड़ दो,’’ पृथ्वी ने संगीता से कहा.

एक सिपाही घूमता हुआ उधर ही आ रहा था. संगीता ने जल्दी से अपना बैग एक मालगाड़ी के डब्बे में रख दिया. सिपाही इतने में पास आ कर पृथ्वी से बोला, ‘‘आप लोग कहां जाएंगे?’’

पृथ्वी बोला, ‘‘हम तो ऐसे ही घूमने चले आए हैं. अब जा रहे हैं.’’

‘‘मगर आप की गाड़ी तो छूटने वाली है. आप ने फर्स्टक्लास का टिकट बुक कराया था,’’ सिपाही अपनी बात पर जोर देते हुए बोला.

‘‘ऐ मिस्टर, मैं ने कहीं का भी टिकट बुक कराया हो आप को इस से क्या लेनादेना. बोलो, क्या कर लोगे तुम? कौन होते हो यह सब पूछने वाले?’’

‘‘अरे भाई, गुस्सा क्यों होते हो? मैं तो सेवक हूं आप का. जब 50 रुपए की जगह 500 रुपए रिकशे वाले को दे सकते हो, तो हुजूर, थोड़ा सा ईनाम हमें भी मिल जाए.’’

पृथ्वी पूरी बात समझ गया. उसे 500 रुपए का नोट देते हुए बोला, ‘‘हांहां, तुम भी लो.’’ सिपाही रुपए ले कर चला गया. संगीता बोली,  ‘‘हमारे मन में चोर है न, इसलिए हम हर बात से डरते हैं. चलो, फिर वापस चलते हैं.’’

‘‘बेकार में डरडर कर इधरउधर भटकते रहें, क्या फायदा,’’ पृथ्वी ने खीझते हुए कहा, ‘‘बेकार ही कंपार्टमैंट से आए. चलो, वापस वहीं चलते हैं.’’

दोनों तेजी से दौड़े परंतु कंपार्टमैंट में घुसने से पहले ही एक और पुलिस वाला आया और बोला,  ‘‘अरे, झगड़ा बढ़ाने से क्या फायदा, हम सब को 1000-1000 रुपए दो और मौज करो,’’ और हाहा कर हंसने लगा.

संगीता तो डर के मारे बुरी तरह से कांप रही थी. पृथ्वी बोला, ‘‘मैं कोई ईनाम वगैरा नहीं दूंगा. मैं ने कोई दानखाता खोल रखा है क्या? मैं आप लोगों की फितरत समझ रहा हूं.’’

‘‘देखिए साहब, आप पढ़ेलिखे मालूम पड़ते हैं. आओ, पहले डब्बे में बैठ जाएं. यहां भीड़ इकट्ठी हो जाएगी और आप की बदनामी होगी. जब दोनों कंपार्टमैंट में चढ़ गए तो पुलिस वाला भी पीछेपीछे पहुंच गया और बोला, ‘‘थोड़ी देर के लिए आप थाने चलिए.’’

‘‘मैं किसी थानेवाने नहीं जाऊंगा. मेरी गाड़ी छूट जाएगी,’’ गुस्से से पृथ्वी ने कहा.

‘‘देखिए भाईसाहब, अब आप इस गाड़ी से तो नहीं जा सकते. मैं ने तो पहले ही आप से कहा था कि आप हमारे साहब की सेवा में 1000 रुपए दे दीजिए.’’ अब की बार साहब भी उसी कंपार्टमैंट में आ गए, बोले,  ‘‘क्यों बे शकीरा के बच्चे, जाओ, हथकड़ी ले कर आओ. यह लड़का इस लड़की को भगा कर लिए जा रहा है. इस को गिरफ्तार कर के हवालात में बंद कर दो.’’

पृथ्वी ने 2-2 हजार रुपए के 5 नोट निकाल कर उन के हाथ में थमा दिए. बड़े साहब उन नोटों को जेब में रखते हुए बोले, ‘‘अच्छा सर, चलिए, बिना हथकड़ी लगाए ही आप को ले कर चलते हैं.’’

अब पृथ्वी बोला, ‘‘अब मैं थाने क्यों जाऊं. मैं ने 10,000 रुपए किस बात के दिए हैं?’’

‘‘देखो लड़के, यह 10,000 रुपए मैं ने सिर्फ इस बात के लिए हैं कि तुम्हें थाने हथकड़ी डाल कर न ले कर जाऊं.’’

संगीता बहुत देर से साहस जुटा रही थी, बोली, ‘‘देखिए, मैं अपनी मरजी से जा रही हूं. आप बेकार में हमें परेशान मत कीजिए.’’

‘‘हांहां मुन्नी, मैं भी तो यही कह रहा हूं, थाने चल कर थोड़ी देर बैठिएगा. वहीं आप के मम्मीपापा को बुलाया जाएगा. तब जैसा होगा, कर दिया जाएगा और उस सूरत में आप इसी ट्रेन से शाम को जा सकते.’’ तभी पहला सिपाही भी आ गया और बैग देते हुए बोला, ‘‘संगीताजी, आप का बैग. आप ने मालगाड़ी में छोड़ दिया था.’’

संगीता ने बैग हाथ में ले लिया. उस के बाद दोनों चुपचाप नीचे प्लेटफौर्म पर उतर गए. पृथ्वी ने पुलिस अफसर से इजाजत मांगी कि वह संगीता से एकांत में कुछ बात कर ले. उस पर पुलिस वाले ने कहा, ‘‘हांहां, जरूर कर लीजिए.’’ और थोड़ी दूर जा कर खड़ा हो गया. आसपास काफी भीड़ इकट्ठी हो गई थी. पृथ्वी काफी परेशान था, बोला, ‘‘अब

क्या होगा?’’

‘‘मुझे मेरे घर या कालेज भेज दीजिए,’’ संगीता ने रोते हुए कहा.

‘‘घर मैं भी जाना चाहता हूं, लेकिन ये कमीने आसानी से पीछा नहीं छोड़ रहे.’’

‘‘कोई ऐसी तरकीब निकालें, जिस से पिताजी को पता न चले,’’ संगीता ने पृथ्वी से घबराते हुए कहा.

‘‘कोशिश तो ऐसी ही करूंगा. मेरा विचार है कि जितना भी रुपया है, इन्हें दे दिया जाए और यहां से वापस चलते हैं. यहां अगर हमें किसी ने पहचान लिया तो मुसीबत हो जाएगी.’’ इस बीच, सिपाही बोला, ‘‘चलिए साहब, थाने.’’

‘‘इंस्पैक्टर साहब, हम से गलती हुई है. अब हम वापस जा रहे हैं,’’ संगीता ने इंस्पैक्टर साहब को अपनी पोटली दे दी.

पृथ्वी का साथ दम तोड़ चुका था. संगीता निर्जीव सी सब कार्य कर रही थी. इसी झगड़े में 11 बज गए. संगीता एक रिकशे पर बैठ कर कालेज चली गई. पृथ्वी दूसरे रिकशे पर बैठ कर अपने घर चला गया. शकीरा ने इंस्पैक्टर से पूछा, ‘‘अगर इन लोगों ने अपने मांबाप को बता दिया तो क्या होगा?’’

‘‘तू गधा है. क्या वे अपने मांबाप को यह बताएंगे कि हम भाग रहे थे. फिर मैं तो उन को जानता भी नहीं. हमें कोई कुछ क्यों बताएगा या देगा?’’

शाम को 4 बजे जब संगीता घर पहुंची तो उस का चेहरा उतरा हुआ था. फिर भी वह हंस रही थी. कहने लगी, ‘‘मम्मी, आज तो कालेज में यह हुआ वह हुआ.’’ उस के बाद कमरे में अकेली जा कर लेट गई और सोचने लगी, ‘अब क्या होगा, कैसे होगा?’

संगीता को कड़वा लग रहा था. उस ने अधिक नहीं खाया. बस, एक ही सवाल उस के जेहन में घूम रहा था, ‘कैसे होगा?’

अलमारी की तरफ अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया था.  कैसे होगा? शाम को उस की सहेली आ गई थी. उस ने बताया, ‘‘आज उस के कालेज में फिजिक्स के पीरियड में सब लड़कियां खिड़कियों पर चढ़ गईं और जब फिजिक्स की टीचर आईं, तो उन के कहने पर नीचे उतरीं.’’ संगीता ने कुछ नहीं सुना. बस, उस का दिल घबरा रहा था, ‘अब क्या होगा, कैसे होगा?’

रात को उसे नींद भी नहीं आई. पुलिस, भीड़, रेलवे स्टेशन, बैग, गहने, पोटली बराबर दिमाग में घूम रहे थे और एक ही सवाल बारबार दिमाग में हथियार के जैसे प्रहार कर रहा था, अब कैसे होगा?’

2 बजे रात चुपके से संगीता उठी. उस ने छिपाई हुई चाबी को हाथ में ले कर अलमारी का दरवाजा खोल दिया. बचे हुए गहनों को तितरबितर कर दिया. एक हार पोटली में से जमीन पर डाल दिया. कपड़े आंगन में फैला दिए. दरवाजे की चटकनी खोल दी और फिर जा कर अपने बैड पर लेट गई. दिमाग में एक ही बात हथौड़े जैसे प्रहार कर रही थी कि अब क्या होगा?

सुबह होते ही अड़ोसपड़ोस में शोर मचा हुआ था कि रामप्रकाश के घर में चोरी हो गई. चोर अलमारी खोल कर कुछ लाख रुपए और गहने ले गए हैं. शायद किसी आवाज से डर गए थे. इसलिए सारे गहने ले कर नहीं गए. रामप्रकाश ने लोगों को बताया कि बड़े कमाल की बात है. उन चोरों ने बाहर का दरवाजा कैसे खोला? समझ में नहीं आ रहा है. मैं तो रात को सबकुछ देख कर सोता हूं और सब से बड़ी बात, वे सारे गहने ले कर नहीं गए. यों समझो कि भारी नुकसान होने से बच गए.

चोरी की सूचना पुलिस को दी गई. वहां से एक इंस्पैक्टर और 2 सिपाही जांचपड़ताल के लिए आए. उन्होंने दरवाजे को गौर से देखा. वह अलमारी भी देखी. अलमारी की चाबी भी देखी. लेकिन संगीता को देखते ही पहचान गए. संगीता भी उस पुलिस औफिसर और सिपाही को पहचान गई. तब पुलिस वाले ने संगीता की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘यह काम तो किसी घर वाले का ही लगता है.’’

इस पर संगीता की आंखें, पुलिस वाले की आंखों से जा मिलीं. उन में याचना थी. पुलिस वाले ने घर के चारों और देखा और बोला, ‘‘कोई किराएदार ऊपर रहता है क्या?’’

‘‘नहीं साहब,’’ राम प्रकाश ने कहा.

‘‘यह घर के आदमी का काम नहीं हो सकता. मेरा एक लड़का 8 साल का है. एक लड़की है, जो दूध की जैसी धुली हुई है. मैं हूं. मेरी पत्नी है. यह सच्ची बात है कि दरवाजा बाहर से ही खुला है. मगर कमाल है, साहब,’’ राम प्रकाश बोला.

पुलिस वाले ने कहा, ‘‘चोरी का पता लगाने की पूरी कोशिश की जाएगी. मगर मेरी सलाह मानिए, आप अपना जेवरपैसा. अब अलमारी में न रख कर, बैंक में रखें. हो सकता है चोर दोबारा चोट करे.’’

पुलिस वाले ने वहीं बैठ कर रिपोर्ट तैयार की. वहां उपस्थित लोगों के हस्ताक्षर लिए. पुलिस वाले के साथ आए सिपाही ने जाते हुए सरसरी निगाह से संगीता की तरफ देखा और बोला, ‘दूध की धुली’ और लंबी सी डकार लेता हुआ दरवाजे से बाहर निकल गया.