नफरत की इंतहा : प्रेमी बना गृहस्थी में ग्रहण – भाग 2

बुद्धि प्रकाश घर के बाहर बरामदे में तख्त पर मृत पड़ा था. थानाप्रभारी बदन सिंह शव का निरीक्षण करने लगे. वह कुछ अनुमान लगा पाते तब तक सीओ विजय शंकर शर्मा वहां पहुंच गए. उन्होंने शव का निरीक्षण किया तो उन के चेहरे पर हैरानी के भाव आए बिना नहीं रहे.

गले पर पड़े निशानों ने कौतूहल जगा दिया था. सीओ शर्मा ने झुक कर गौर किया तो वह चौंक पड़े. चेहरे पर ऐंठन और गले के निशान बहुत कुछ कह रहे थे. चेहरे पर ऐसी ऐंठन तो बेरहमी से गला दबाए जाने पर ही होती है.  स्वाभाविक प्रश्न था कि क्या किसी ने बुद्धि प्रकाश का गला दबाने की कोशिश की थी?

मामला पूरी तरह संदिग्ध लग रहा था. काले निशान भी रस्सी से गला दबाए जाने पर होते हैं. उन्होंने आसपास नजर दौड़ाई. ऐसी कोई रस्सी नजर नहीं आई. फोरैंसिक टीम को बुलाना अब जरूरी हो गया था.

छानबीन और मौके से सबूत जुटाने के लिए क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के साथ फोरैंसिक टीम भी पहुंच गई थी. फोरैंसिक टीम की जांच में चौंकाने वाले रहस्य उजागर हुए. बुद्धि प्रकाश के गले के दोनों ओर तथा पीछे की तरफ काले निशान बने हुए थे. लगता था कि रस्सी से गले को पूरी ताकत से कसा गया था. इस के अलावा चोट का कोई और निशान शरीर पर कहीं नहीं पाया गया.

लेकिन स्थितियां पूरी तरह संदेहास्पद थीं. घटनास्थल पर सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे होने के कारण किसी के वहां आनेजाने का साक्ष्य मिलना भी संभव नहीं था. सीओ विजय शंकर शर्मा ने घटनास्थल का बड़ी बारीकी से निरीक्षण किया. उन्होंने प्रियंका से दरजनों सवाल किए. लेकिन अपने मतलब की कोई बात नहीं उगलवा सके.

बिना किसी सबूत के प्रियंका पर हाथ डालने का कोई मतलब भी नहीं था. हालांकि पूछताछ के दौरान प्रियंका पूरी तरह सामान्य लग रही थी. उस के चेहरे पर भय या घबराहट की कोई रेखा तक नहीं थी. लेकिन उस के जवाब अटपटे थे.

मृतक करवट की स्थिति में था, जबकि प्रियंका का कहना था कि उस ने दिशामैदान से लौट कर उसे हिलाया- डुलाया था. दिल की धड़कन टटोलने के लिए शरीर को पीठ के बल कर दिया था. लेकिन प्रियंका और पड़ोसियों के बयानों में कोई तालमेल नहीं था. उन का कहना था हम ने बुद्धि प्रकाश को करवट की ही स्थिति में देखा था.

पुलिस के सामने अच्छेअच्छे के हौंसले पस्त पड़ जाते हैं. लेकिन प्रियंका चाहे अटकअटक कर ही सही, पूरे हौसले से हर सवाल का जवाब दे रही थी. बेशक बुद्धि प्रकाश शराब में धुत रहा होगा. लेकिन आखिर था तो हट्टाकट्टा मर्द. उसे अकेली प्रियंका के द्वारा काबू करना आसान नहीं था.

सीओ हत्या के हर संभावित कोण को समझ रहे थे. इसलिए एक बात पर तो उन्हें यकीन हो चला था कि अगर हत्या में प्रियंका शामिल थी तो उस का कोई मजबूत साथी जरूर रहा होगा. हत्या सुनियोजित ढंग से की गई थी. लेकिन सवाल यह था कि योजना किस ने बनाई और उसे कैसे अंजाम दिया?

पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने शव परिजनों को सौंप दिया. पोस्टमार्टम में प्रथमदृष्टया मौत का कारण दम घुटना माना गया. थाने लौट कर थानाप्रभारी बदन सिंह ने अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

एसपी शरद चौधरी ने इस मामले का खुलासा करने के लिए एडिशनल एसपी पारस जैन की निगरानी में सीओ विजय शंकर शर्मा, थानाप्रभारी बदन सिंह, हैडकांस्टेबल भरत, कांस्टेबल सतपाल, रामराज और महिला कांस्टेबल भारती बाना को शामिल किया.

प्रियंका के थाने आने से पहले की गई पूछताछ में पुलिस को कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई थी. लेकिन थाने लाए जाने के बाद हुई पूछताछ में महावीर मीणा का जिक्र आने के साथ ही घटना की गिरह खुलने लगी.

पुलिस का हवा में पूछा गया सवाल ही घटना का तानाबाना खोलता चला गया कि बुद्धि प्रकाश की शराबनोशी में उस का साथी कौन था? प्रियंका जिस भेद को छिपाए थी, वह खुल गया. प्रियंका को बताना पड़ा कि बुद्धि प्रकाश शनिवार 13 मार्च को दिन भर पड़ोसी महावीर मीणा के साथ शराब पी रहा था.

लेकिन पुलिस के इस सवाल पर प्रियंका बिफर पड़ी कि महावीर मीणा के साथ उस के अवैध रिश्ते हैं. उस का कहना था, ‘‘आप सुनीसुनाई बातों को ले कर मेरे चरित्र पर लांछन क्यों लगा रहे हैं.’’

लेकिन प्रियंका की काल डिटेल्स खंगाल चुके पुलिस अधिकारी पूरी तरह आश्वस्त थे. उन का एक ही सवाल प्रियंका के होश फाख्ता कर गया, ‘‘क्या तुम्हारे और महावीर के बीच देर रात को 2-2 घंटे तक बातें नहीं होती थीं?’’

प्रियंका के पास अब कोई जवाब नहीं बचा था. उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस का कहना था कि बुद्धि प्रकाश उस के चालचलन पर शक करता था और रोज उस के साथ मारपीट करता था. इसलिए उस ने पति की हत्या कर दी.

यह आधा सच था. प्रियंका अपने आप को एक बेबस औरत के रूप में पेश कर रही थी. लेकिन पुलिस को उस की पूरी दास्तान सुनने का इंतजार था कि कैसे उस ने प्रेमी के साथ मिल कर पति को मौत के घाट उतारा?

फिसलन भरे रास्तों की नायिका – भाग 3

कांस्टेबल ने उस युवक को डराधमका कर कुछ रुपए ऐंठे और आगे कोई हरकत न करने की हिदायत दे कर छोड़ दिया. युवक से पैसे ऐंठने के बाद वह शशि से मिला और उस ने उन पैसों में से कुछ पैसे शशि को दे दिए.

शशि ने पुलिस में बना ली जानपहचान

पुलिस वाले से जानपहचान हो जाने से शशि बहुत खुश हुई. वह सिपाही भी उस की कुशलक्षेम पूछने के बहाने उस के घर के चक्कर लगाने लगा. इस के बाद शशि घर वालों के साथसाथ पड़ोसियों पर भी रौब जमाने लगी. उस के घर वाले उस के त्रियाचरित्र से तंग आ चुके थे.

उन्होंने उस की इस हरकत की शिकायत पप्पू से की, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ. शशि के सामने पप्पू की एक नहीं चलती थी. शशि ने उसी पुलिस वाले के सहारे घर वालों से भी कई बार पंगा ले लिया था, जिस के बाद घर वालों ने उस से संबंध ही खत्म कर दिए थे. एक पुलिस वाले के सहारे वह कई पुलिस वालों के दिलों पर राज करने लगी थी.

पुलिस वालों से दोस्ती हो जाने के बाद शशि अपनी मनमानी करने लगी. जब उसे पैसों की जरूरत होती तो वह किसी न किसी मर्द को अपने मोहपाश में फंसा लेती और फिर उसे धौंस दिखा कर मनचाहे पैसे ऐंठती. पुलिस वालों के बल पर उस का धंधा फलनेफूलने लगा था.

पति के घर से निकलते ही शशि बच्चों को तैयार कर स्कूल भेज देती और फिर सजसंवर कर अपने धंधे के लिए निकल जाती. जब उस की हरकतें हद पार करने लगीं तो घर वालों की शिकायत पर पप्पू ने उसे कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन वह उलटे उसी पर राशन पानी ले कर चढ़ने लगी.

इस के बाद दोनों मियांबीवी में मनमुटाव रहने लगा. अब वह पति से पूरी तरह से खार खाने लगी थी. अपनी बीवी की बेवफाई से तंग आ कर पप्पू ने फार्म से काम छोड़ दिया और दारू के नशे में धुत रहने लगा.
उसी दौरान उस की मुलाकात जसपुर थाना कोतवाली के गांव टांडा निवासी भूपेंद्र सिंह से हुई. भूपेंद्र के पास अपने 2 ट्रैक्टर थे. वह गांव वालों से सस्ते में गन्ना खरीद कर सीधे शुगर फैक्ट्री में बेचता था, जिस से उसे अच्छी आमदनी हो जाती थी. भूपेंद्र को अपना दूसरा ट्रैक्टर चलाने के लिए एक ड्राइवर की जरूरत थी.

उस ने पप्पू से बात की तो वह उस का ट्रैक्टर चलाने को राजी हो गया. पप्पू ने फिर से शराब का सेवन बंद कर दिया और वह भूपेंद्र का ट्रैक्टर चलाने लगा, जिस के सहारे उस का पप्पू के घर आनाजाना शुरू हो गया.

भूपेंद्र की शशि से मुलाकात उस वक्त हुई जब वह किसी काम से काशीपुर गया हुआ था. उस दिन शशि के दोनों बच्चे भी स्कूल गए थे. उस दिन भूपेंद्र पप्पू को बुलाने उस के घर आया था. शशि जानती थी उस का पति उसी का ट्रैक्टर चलाता है. शशि ने भूपेंद्र की खूब खातिरदारी की. भूपेंद्र उस की सुंदरता पर मर मिटा. एक तरह से वह उस का दीवाना बन बैठा. भूपेंद्र ने शशि का मोबाइल नंबर ले लिया. बाद में उस की शशि से फोन पर बातें होने लगीं.

भूपेंद्र बन गया शशि का आशिक

फलस्वरूप कुछ ही दिन बाद दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. भूपेंद्र को अच्छी कमाई थी. वह शशि पर भी पैसा खर्च करने लगा. इस से शशि पूरी तरह से उस की प्रेम दीवानी हो गई. भूपेंद्र अकसर पप्पू को ट्रैक्टर ले कर बाहर भेज देता और फिर सीधा उस के घर पर आ जाता.

कई बार तो भूपेंद्र पप्पू की गैरमौजूदगी में सारीसारी रात उसी के घर पर पड़ा रहता. उस वक्त शशि अपने बच्चों को जल्दी खाना खिला कर सुला देती और फिर सारी रात भूपेंद्र के साथ मौजमसती में डूब जाती.

भूपेंद्र जब भी आता, शशि और उस के बच्चों के लिए फल और मिठाई ले कर आता था, इस के चलते शशि के बच्चे भी भूपेंद्र से हिलमिल गए थे. जिस दिन वह घर आता, इस की सूचना किसी तरह पप्पू तक पहुंच ही जाती थी.

पप्पू की बेटी उस के घर आने पर ताने मारते हुए कहती, ‘‘आप से बढि़या तो भूपेंद्र अंकल हैं, वह जब भी आते हैं, अपने साथ बहुत सारी चीजें लाते हैं. बच्चों की बात सुनते ही पप्पू का पारा हाई हो जाता था. पप्पू को विश्वास हो गया था कि उस की गैरमौजूदगी में भूपेंद्र उस के घर आता है. इसी बात को ले कर उस की पत्नी से लड़ाई होती. लेकिन वह उलटे उस के ऊपर ही राशनपानी ले कर चढ़ जाती थी.’’

इसी दौरान एक दिन शशि ने भूपेंद्र के सामने बोझिल मन से कहा कि इस तरह कब तक चलेगा. पप्पू जब भी आता है तो उस का मुंह फूला होता है. वह तुम्हारे चक्कर में मुझ से ठीक से बात भी नहीं करता. जिस से मेरा सारा दिन खराब हो जाता है. अगर तुम मुझे इतना ही प्यार करते हो तो कुछ ऐसा करो कि उस की टेंशन ही खत्म हो जाए. भूपेंद्र शशि का इशारा समझ गया था.

इसी दौरान उस के दिमाग में एक आइडिया आया. उसी आइडिया के तहत उस ने एक दिन मौका पाते ही अपने गांव के एक किसान की हैरो चुरा ली. भूपेंद्र ने वह हैरो ला कर अपने खेत के एक कोने में डाल दी. जब उस किसान को पता चला कि उस की हैरो चोरी हो गई है तो उस ने पहले तो आसपास ही इधरउधर तलाशने की कोशिश की.

तभी उसे पता चला कि उस की हैरो भूपेंद्र के खेत में कोने में पड़ी हुई है. इस की जानकारी मिलते ही वह सीधे भूपेंद्र के पास गया और अपनी चोरी हुई हैरो की बात बताते हुए पूछा कि उस के खेत में वह हैरो कैसे पहुंची. भूपेंद्र ने उस से साफ शब्दों में कहा कि मेरा ट्रैक्टर पप्पू ही चलाता है. यह बात उसे ही पता होगी. मेरे पास तो पहले से ही मेरी अपनी हैरो है, फिर मैं तुम्हारी हैरो किसलिए चोरी करूंगा. तुम्हें जो भी पूछना है पप्पू से पूछो.

अपने ही घर में पप्पू हो गया बेगाना

यही बात उस किसान ने पप्पू से पूछी तो उस ने भी साफ शब्दों में कहा कि मुझे आप की हैरो से कोई लेनादेना नहीं. मैं भूपेंद्र के यहां केवल नौकरी करता हूं. मेरे पास तो अपना ट्रैक्टर तक नहीं है, मैं आप की हैरो चुरा कर क्या करूंगा.

दोनों के बीच विवाद बढ़ गया तो किसान ने पुलिस चौकी जा कर दोनों के नाम हैरो चोरी की एफआईआर दर्ज करा दी. पुलिस चौकी में पहले से ही शशि की अच्छी बात थी. उस ने वहां जा कर भूपेंद्र को बचाते हुए अपने पति पप्पू को ही हैरो चोरी के इलजाम में जेल भिजवा दिया.

पप्पू के जेल चले जाने के बाद भूपेंद्र और उस के बीच मिलने का रास्ता बिलकुल साफ हो गया. इस के बाद शशि पूरी तरह से निडर हो कर उस के साथ जिंदगी के मजे लेने लगी. उस ने पप्पू को जमानत पर छुड़वाने के लिए पैरवी भी नहीं की.

यह सब देख कर पप्पू के बड़े भाई राजपाल को बहुत दुख हुआ. उस ने पप्पू को छुड़ाने के लिए काफी हाथपांव मारे तो शशि ने उस के परिवार को भी जेल भिजवाने की धमकी दे डाली. इस के बाद भी राजपाल ने जैसेतैसे पप्पू के केस की पैरवी की. पप्पू पर कोई ज्यादा बड़ा केस तो था नहीं. एक महीना जेल में रह कर वह घर आ गया.

घातक निकली बीवी नंबर 2 – भाग 3

पुलिस टीम ने जितेंद्र की निशानदेही पर विधूना से निजाम अली तथा पसहा गांव से राघवेंद्र उर्फ मुन्ना को गिरफ्तार कर लिया. इन तीनों को थाना सजेती की हवालात में डाल दिया गया. इस के बाद पुलिस टीम सूर्यविहार, नवाबगंज पहुंची और यह कह कर किरन को साथ ले आई कि दरोगा पच्चालाल के हत्यारे पकड़े गए हैं.

किरन थाना सजेती पहुंची तो उस ने अपने प्रेमी जितेंद्र तथा उस के साथियों को हवालात में बंद देखा. उन्हें देखते ही वह सब कुछ समझ गई. अब उस के लिए पुलिस को गुमराह करना मुमकिन नहीं था. उस ने पति की हत्या में शामिल होने का जुर्म कबूल कर लिया. जितेंद्र ने दरोगा पच्चालाल का लूटा गया पर्स, घड़ी व मोबाइल भी बरामद करा दिए, जिन्हें उस ने घर में छिपा कर रखा था.

चूंकि दरोगा पच्चालाल के हत्यारों ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया था, इसलिए पुलिस ने मुंशी अजयपाल को वादी बना कर भादंवि की धारा 302, 201, 394 तथा 120बी के तहत जितेंद्र उर्फ महेंद्र, निजाम अली, राघवेंद्र उर्फ मुन्ना तथा किरन के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया.

7 जुलाई को एसएसपी अखिलेश कुमार ने प्रैस कौन्फ्रैंस की, जिस में उन्होंने हत्या का खुलासा करने वाली टीम को 25 हजार रुपए देने की घोषणा की. उन्होंने गिरफ्तार किए गए दरोगा के हत्यारों को पत्रकारों के सामने भी पेश किया, जहां हत्यारों ने अवैध रिश्तों में हुई हत्या का खुलासा किया.

पच्चालाल गौतम सीतापुर जिले के थाना मानपुरा क्षेत्र के गांव रामकुंड के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी कुंती देवी के अलावा 4 बेटे सत्येंद्र, महेंद्र, जितेंद्र व कमल थे. पच्चालाल पुलिस विभाग में दरोगा के पद पर तो तैनात थे ही, उन के पास खेती की जमीन भी थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. कुल मिला कर उन की आर्थिक स्थिति अच्छी थी. घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी.

पच्चालाल की पत्नी कुंती देवी घरेलू महिला थीं. वह ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थीं, लेकिन स्वभाव से मिलनसार थीं. कुंती पति के साथसाथ बच्चों का भी ठीक से खयाल रखती थीं. पच्चालाल भी कुंती को बेहद चाहते थे, उन की हर जरूरत को पूरा करते थे. लेकिन बीतते समय में इस खुशहाल परिवार पर ऐसी गाज गिरी कि सब कुछ बिखर गया.

सन 2001 में कुंती देवी बीमार पड़ गईं. पच्चालाल ने पत्नी का इलाज पहले सीतापुर, लखनऊ व कानपुर में अच्छे डाक्टरों से कराया. पत्नी के इलाज में दरोगा ने पानी की तरह पैसा बहाया, लेकिन काल के क्रूर हाथों से वह पत्नी को नहीं बचा सके. पत्नी की मौत से पच्चालाल खुद भी टूट गए और बीमार रहने लगे.

जैसेजैसे समय बीतता गया, वैसेवैसे पत्नी की मौत का गम कम होता गया. पच्चालाल ड्यूटी और बच्चों के पालनपोषण पर पूरा ध्यान देने लगे. पच्चालाल का दिन तो सरकारी कामकाज में कट जाता था, लेकिन रात में पत्नी की कमी खलने लगती थी. पत्नी के बिना वह तनहा जिंदगी जी रहे थे. अब उन्हें अहसास हो गया था कि पत्नी के बिना आदमी का जीवन कितना अधूरा होता है.

सन 2002 में दरोगा पच्चालाल को हरदोई जिले के थाना बेनीगंज की कल्याणमल चौकी में तैनाती मिली. इस चौकी का चार्ज संभाले अभी 2 महीने ही बीते थे कि पच्चालाल की मुलाकात एक खूबसूरत युवती किरन से हुई. किरन अपने पति नरेश की प्रताड़ना की शिकायत ले कर चौकी आई थी.

किरन के गोरे गालों पर बह रहे आंसू, दरोगा पच्चालाल के दिल में हलचल मचाने लगे. उन्होंने सांत्वना दे कर किरन को चुप कराया तो उस ने बताया कि उस का पति नरेश, शराबी व जुआरी है. नशे में वह उसे जानवरों की तरह पीटता है. वह पति की प्रताड़ना से निजात चाहती है.

खूबसूरत किरन पहली ही नजर में दरोगा पच्चालाल के दिलोदिमाग पर छा गई. उन्होंने किरन के पति नरेश को चौकी बुलवा लिया और किरन के सामने ही उस की पिटाई कर के हिदायत दी कि अब वह किरन को प्रताडि़त नहीं करेगा. दरोगा की पिटाई और जेल भेजने की धमकी से नरेश डर गया और किरन से माफी मांग ली.

इस के बाद दरोगा पच्चालाल हालचाल जानने के बहाने अकसर किरन के घर आनेजाने लगे. वह किरन से मीठीमीठी बातें करते थे. किरन भी उन की रसीली बातों में आनंद का अनुभव करने लगी थी. किरन का पति नरेश घर आने पर ऐतराज न करे, यह सोच कर पच्चालाल ने उस से दोस्ती गांठ ली. दोनों की नरेश के घर पर ही शराब की महफिल जमने लगी. पच्चालाल उस की आर्थिक मदद भी करने लगे.

शरीरों के खेल में मासूम कार्तिक बना निशाना – भाग 3

इस के पहले विशाल कभी किसी महिला के इतने नजदीक नहीं आया था, जितना पिछले कुछ दिनों के दौरान कविता के करीब आ गया था. आखिर एक दिन उस ने कविता के सामने अपना प्यार जता ही दिया. उम्मीद के मुताबिक कविता गुस्सा नहीं हुई तो नए जमाने और माहौल में बड़े हुए विशाल को समझ आ गया कि दांव खाली नहीं गया है.

कविता सब कुछ समझते हुए भी मुंहबोले देवर के साथ नाजायज संबंधों की ढलान पर फिसली तो इस की वजह एक नया अहसास था, जो उस के तन और मन दोनों को झिंझोड़ रहा था.

परसराम रोज सैकड़ों ग्राहकों को डील करता था, लिहाजा पत्नी के नए हावभाव उस से छिपे नहीं रहे. पहले तो उस ने खुद को समझाने की कोशिश की कि यह उस की गलतफहमी और फिजूल का शक है, पर कुछ था जो उस के शक को बारबार कुरेद रहा था.

विशाल कुछ और सोचता था, कविता कुछ और

इधर विशाल की हालत खस्ता थी, जिसे वाकई कविता से प्यार हो गया था. वह चाहता था कि कविता पति को छोड़ कर उस से शादी कर ले. इस बचकानी पेशकश से कविता वाकिफ हुई तो सकते में रह गई. विशाल संबंधों को इतनी गंभीरता से लेगा, इस का अंदाजा या अहसास उसे नहीं था.

उस ने अपने इस नासमझ आशिक को समझाने की कोशिश की, पर यह खुल कर नहीं कह पाई कि तुम्हारे मेरे संबंध सिर्फ मौजमस्ती के हैं. एक 2 बच्चों की मां और किसी की जिम्मेदार पत्नी सुख और संतुष्टि के लिए शारीरिक संबंध तो बना सकती है, पर उम्र में 11 साल छोटे प्रेमी से शादी नहीं कर सकती.

विशाल कविता पर पति की तरह हक जमाने लगा था. उसे दुनियादारी से ताल्लुक रखने वाली बातों से कोई मतलब नहीं था. उस ने कविता को एक तरह से चेतावनी दे दी थी कि या तो वह उस से शादी कर ले, नहीं तो ठीक नहीं होगा. जबकि कविता अपने आप को चक्रव्यूह से घिरा पा रही थी, जिस से बाहर निकलने का एकलौता रास्ता उसे अपने उस पति में दिखा, जिस के साथ वह बेवफाई कर चुकी थी.

परसराम को शक हुआ या खुद कविता ने उस से अपनी तरफ से विशाल के बारे में कुछ शिकायत की, यह तो अब राज ही रहेगा, लेकिन परसराम ने सख्ती से विशाल के अपने घर आने पर पाबंदी लगा दी. इस से विशाल तिलमिला उठा. परसराम उसे अब रिश्ते का पड़ोस वाला बड़ा भाई नहीं, बल्कि दुश्मन नजर आने लगा था.

कविता ने अपनी चाल तो चल दी, लेकिन विशाल की मजबूत गिरफ्त वह भूल नहीं पा रही थी. लिहाजा अब वह दूसरी गलती चोरीछिपे विशाल से मिलने और फोन पर लंबीलंबी बातें करने तथा उस से फिर से संबंध बनाने की कोशिश कर रही थी.

काश! कविता अपनी इच्छाओं पर अंकुश लगा लेती

एक पुरानी कहावत है कि चोरी के आम छांट कर नहीं खाए जाते, कविता की मंशा यह रहती थी कि विशाल उसे रौंदने के बाद चला जाए और विशाल था कि उस के साथ रोमांटिक बातें करता रहता था. मजबूरी में कविता को उस की रूमानी बातों की हां में हां मिलानी पड़ती थी.

इस से विशाल को लगा कि कविता उसे वाकई चाहती है, लिहाजा उस ने फिर अपनी शादी की पुरानी पेशकश दोहरा दी. दोनों कुछ तय कर पाते, इस के पहले ही परसराम ने दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया.

6 जनवरी को भी विशाल और कविता घर के पीछे के खेत में मिल रहे थे. तभी परसराम और उस का भाई दिलीप वहां आ गए और विशाल की पिटाई कर दी. दोनों उसे थाने भी ले गए, जहां विशाल की बेइज्जती हुई.

उस वक्त कविता का रोल और बयान अहम थे, जिस ने विशाल पर परेशान करने का आरोप लगा डाला तो प्यार की परिभाषा और भाषा न समझने वाला यह नौजवान आशिक तिलमिला उठा. उसे अब समझ आया कि कविता दरअसल उसे मोहरा बनाए हुए थी. वह उस का प्रेमी नहीं, बल्कि हवस पूरी करने वाली एक मशीन भर था.

अब उसे याद आ रहा था कि जबजब भी उस ने शादी की बात कही थी, तबतब कविता पतिबच्चों और गृहस्थी की दुहाई दे कर मुकर जाती थी. लेकिन आज तो उस ने अपनी असलियत ही दिखा दी थी.

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थाने में खुद को बेइंतहा बेइज्जत महसूस कर के ही विशाल ने ठान लिया था कि कविता को सबक सिखा कर रहेगा. इधर विशाल की मां ने परसराम को सालों के पारिवारिक संबंधों का वास्ता दिया तो उस ने उस के खिलाफ रिपोर्ट नहीं लिखाई और माफ कर दिया.

पर विशाल ने कविता को माफ नहीं किया था. वह बुरी तरह खीझा हुआ था और बदले की आग में जल रहा था. 8 जनवरी को दोपहर में वह कार्तिक के स्कूल गया और उसे साथ ले आया. कार्तिक के मना करने की कोई वजह नहीं थी, क्योंकि उस मासूम को तो मालूम ही नहीं था कि क्याक्या हो चुका है.

विशाल का निशाना बना मासूम कार्तिक

कार्तिक को स्कूल से वह 200 मीटर की दूरी पर कृष्णा कौंप्लेक्स में ले आया. उस वक्त दुकान के मालिक सचिन श्रीवास्तव किसी जरूरी काम से गए हुए थे. विशाल के सिर पर इस तरह वहशीपन सवार था कि उसे बच्चे की मासूमियत पर कोई तरस नहीं आया. उस के दिलोदिमाग में तो कविता की बेवफाई और 2 दिन पहले थाने में किया गया उस का दोगलापन घूम रहे थे. इसी जुनून में उस ने अपने जूते का फीता खोला और उस से ही कार्तिक का गला घोंट दिया.

नन्ही सी जान फड़फड़ा कर शांत हो गई. अब समस्या उस की लाश को को ठिकाने लगाने की थी. सचिन के आने के पहले जरूरी था कि यह काम कर दिया जाए. लिहाजा उस ने कार्तिक की लाश को औफिस में पड़ी पार्सल की पुरानी बोरी में ठूंसा और उसे घसीटता हुआ औफिस से बाहर ले आया. लाश भरी बोरी को उस ने सामान की तरह मोटरसाइकिल पर बांधा और मुबारकपुर टोल नाके से कुछ दूर फेंक आया. यह सारा नजारा कौंप्लेक्स में लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गया था.

पकडे़ जाने के बाद विशाल ने कुछ छिपाया नहीं. जब थाने में उस का सामना कविता से हुआ तो वह बड़े खूंखार और सर्द लहजे में बोला, ‘‘तूने मुझे अपने इश्क में फंसा कर बरबाद कर दिया.’’

इस पर कविता ने कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि सिर झुकाए रोती रही. शायद अपनी हरकत और जान से प्यारे बेटे की हत्या पर, जिस की जिम्मेदार वह भी थी.

शुरुआत में गुनाह से अंजान बनते रहे विशाल ने पुलिस को यह भी बताया कि कविता कई बार उस के साथ सीहोर घूमने गई थी और कई दफा खुद फोन कर उसे प्यार करने यानी शारीरिक संबंध बनाने के लिए बुलाती थी.

विशाल अब जेल में है और उसे सख्त सजा मिलना तय है, पर जुर्म की इस वारदात में कविता की भूमिका भी अहम है. ऐसे नाजायज संबंधों पर बारीकी से सोचने की जरूरत है कि औरत को भी अभियुक्त क्यों न माना और बनाया जाए. यह ठीक है कि उस का प्रत्यक्ष संबंध अपराध से नहीं, पर कहीं न कहीं अपराधी को उकसाने की वजह तो वह थी ही.

खतरनाक औरत : गांव की गलियों से निकली माया के सपने – भाग 2

बदनाम है खड़कपुर

माया की एक बहन की शादी काशीपुर के गांव खड़कपुर निवासी सत्यभान से हुई थी. माया जब भी बहन से मिलने आती तो उस के बच्चे साथ आते थे और मौसी के घर रहने की जिद करते थे. राकेश ने कई बार अपने बच्चों को समझाने की कोशिश की, लेकिन बच्चे जिद करते कि उन्हें भी मौसी की तरह शहर में ही रहना है.

आखिर बच्चों की जिद के आगे राकेश को झुकना पड़ा. करीब 6 साल पहले राकेश ने अपनी जुतासे की जमीन बेच दी. उस पैसे से उस ने खड़कपुर में 25 गज का प्लौट ले कर मकान बनवा लिया. इस के बाद राकेश अपने बीवीबच्चों के साथ खड़कपुर आ कर रहने लगा.

काशीपुर से लगे गांव खड़कपुर में शुरू से ही मजदूर और छोटामोटा काम करने वाले लोग रहते हैं. इसी वजह से यह इलाका हर मामले में चर्चित है. चाहे कच्ची शराब की बिक्री हो, जुआ हो या फिर देह व्यापार, खड़कपुर में सब मिलता है.

खड़कपुर आने के बाद माया की संगत कुछ ऐसी औरतों के साथ हो गई, जो देह व्यापार से जुड़ी थीं. नतीजतन उस के रहनसहन में काफी बदलाव आ गया. वह बनठन कर घर से निकलती थी. गलत औरतों के साथ माया की संगत देख कर राकेश का दिमाग घूमने लगा. उस ने माया को कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन उस ने पति की एक नहीं मानी. फलस्वरूप घर में कलह और विवाद रहने लगा, जिस के चलते पतिपत्नी के बीच दूरियां बढ़ने लगीं.

उधर माया ने खड़कपुर निवासी रेखा, जानकी और कई ऐसी ही औरतों की टोली बना ली, जो देह व्यापार से जुड़ी हुई थीं. उन का सहयोग मिलते ही माया पूरी तरह देह व्यापार में उतर गई.
यह बात राकेश की बरदाश्त के बाहर थी. उस ने इस की शिकायत माया के मायके वालों से की, लेकिन उन लोगों ने माया का साथ देते हुए कहा कि वह बिना वजह उन की बेटी को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है. माया ऐसी कतई नहीं है.

मायके वालों का साथ मिलने से माया के हौसले और बुलंद हो गए. राकेश के काम पर निकलते ही वह बच्चों को स्कूल भेज देती और फिर वह अपने धंधे में लग जाती. इस मामले में रेखा और जानकी उस का साथ दे रही थीं.

उन के सहयोग से उस का धंधा जोरों से चल निकला था. आसपास के लोग खड़कपुर में कच्ची शराब पीने आते तो वह अपने दलालों के माध्यम से उन्हें फंसाती और पैसा ले कर उन के साथ मौजमस्ती करती.

करीब 6 महीने पहले गांव तख्तपुर, कुंदरकी, जिला मुरादाबाद का रहने वाला राकेश का मौसेरा भाई इंद्रपाल भी काम की तलाश में खड़कपुर आया और राकेश के घर में रह कर एक फैक्ट्री में काम करने लगा.

राकेश के घर पर रह कर इंद्रपाल कुछ ही दिनों में अपनी भाभी के कर्मों से पूरी तरह से वाकिफ हो गया. जब इंद्रपाल को पता चला कि माया राकेश की गैरमौजूदगी में देह व्यापार करती है तो उस ने माया की दुखती रग पकड़ कर उस के साथ अवैध संबंध बना लिए.

हकीकत जान कर राकेश हुआ खफा

माया के साथ शारीरिक संबंध बनते ही इंद्रपाल ने नौकरी छोड़ दी और माया के लिए ग्राहक लाने लगा. इस के बदले माया उसे कमीशन देती थी, जो उस की मेहनत की कमाई से ज्यादा होता था. देवरभाभी के बीच यह सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा, लेकिन जब राकेश को इस की जानकारी मिली तो उस ने इंद्रपाल को खरीखोटी सुना कर घर से भगाने की कोशिश की.

लेकिन इस मामले में माया इंद्रपाल का पक्ष ले कर उस के सामने खड़ी हो गई. जब राकेश को लगा कि देवरभाभी के सामने उस की नहीं चलने वाली तो उस ने बीवी से किनारा कर लिया. साथ ही माया से साफसाफ कह दिया कि आज के बाद वह अपना घर का खर्च भी खुद ही चलाए.

उस दिन के बाद माया राकेश से नफरत करने लगी. वह देह व्यापार की आदी हो चुकी थी, जिसे वह किसी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं थी. जिस दिन माया और राकेश के बीच तकरार हुई थी, उसी दिन माया ने सोच लिया था कि वह उसे अपने रास्ते से हटा कर रहेगी.

माया ने इंद्रपाल को भी राकेश के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया था. उस ने इंद्रपाल से साफ कहा कि हमारे घर में जो भी फसाद हो रहा है, वह सब तुम्हारी वजह से है. राकेश को हम दोनों पर शक हो गया है. इसीलिए वह आए दिन मुझे मारतापीटता है. अगर तुम ने समय रहते उस का कोई इलाज नहीं किया तो तुम्हें यह घर छोड़ कर जाना पड़ेगा. माया की बात सुनते ही इंद्रपाल का पौरुष जाग उठा.

माया ने अपने धंधे में आड़े आ रहे पति को मौत की नींद सुलाने के लिए षडयंत्र रचना शुरू कर दिया था. वह राकेश की गैरमौजूदगी में अपनी पूरी मंडली को अपने घर बुला कर शराब पिलाती थी. जब सब शराब के नशे में हो जाते तो माया उन्हें अय्याशी की राह पर ले जाती. इस का नतीजा यह निकला कि माया का घर उस इलाके में चर्चित हो गया, जहां पर लोग शराब और शवाब दोनों का आनंद लेने के लिए आने लगे.
धीरेधीरे माया की करतूत राकेश के सामने आई तो उस ने फिर से माया को मारापीटा. इस के बाद माया ने राकेश से साफ कह दिया कि अगर उसे घर में मुंह बंद कर के रहना है तो रहे वरना रहने के लिए कहीं दूसरी जगह कमरा ले ले. माया ने यह भी कहा कि वह चाहे तो उसे तलाक दे सकता है.
माया ने बदल दिया पति

जब राकेश को लगने लगा कि माया किसी भी तरह सुधरने वाली नहीं है तो उस ने अपने बच्चों की खातिर अपने घर की तरफ से पूरी तरह से आंखें बंद कर लीं. इस के बाद भी माया के दिल को तसल्ली नहीं हुई. उस के बाद वह इंद्रपाल के साथ उस की बीवी बन कर रहने लगी. इंद्रपाल उस का घर खर्च चलाने के साथसाथ उस की दिली तमन्ना भी पूरी करने लगा था.

शरीरों के खेल में मासूम कार्तिक बना निशाना – भाग 2

लाश बन कर मिला मासूम बेटा कार्तिक

बैरागढ़ थाने के टीआई सुधीर अरजरिया गुमशुदगी की रिपोर्ट पर कोई काररवाई कर पाते, उस के पहले ही उन के पास एक फोन आया. थाने से करीब 17 किलोमीटर दूर मुबारकपुर इलाके के टोल नाके के कर्मचारियों ने उन्हें फोन कर के बताया कि वहां संदिग्ध हालत में एक बोरी पड़ी है. बोरी के बारे में जो बताया गया था, उस से लग रहा था कि उस में किसी बच्चे की लाश है. मुबारकपुर, परवलिया थाना इलाके में आता है.

चूंकि परसराम ने कार्तिक के स्कूल से लापता होने की रिपोर्ट लिखाई थी, इसलिए पुलिस वालों को शक हुआ कि कहीं कार्तिक के साथ कोई हादसा न हो गया हो. पुलिस ने परसराम को फोन कर के तुरंत थाने बुलाया और जीप में बैठा कर मुबारकपुर की तरफ रवाना हो गए.

13 किलोमीटर का यह सफर परसराम के लिए 13 साल जैसा गुजरा. मन में आशंकाएं आजा रही थीं कि कार्तिक के साथ कहीं कोई अनहोनी न हुई हो.

मुबारकपुर पहुंच कर जब उन के सामने बोरी खोली गई तो परसराम की सांसें रुक सी गईं. बोरे में उन के मासूम बेटे कार्तिक की ही लाश थी. लाश स्कूल यूनिफार्म में ही थी और गले में आईकार्ड भी लटक रहा था. आईकार्ड में दर्ज पता देख कर ही परवलिया पुलिस ने बैरागढ़ थाने को इत्तला दी थी.

कार्तिक का कत्ल हुआ है, यह जान कर पूरे बैरागढ़ में हाहाकार मच गया. धीरेधीरे लोग बैरागढ़ थाने पहुंचने लगे. हर किसी की जुबान पर स्कूल प्रबंधन की लापरवाही की बात थी. थाने में कविता और परसराम का रोरो कर बुरा हाल था. ऐसे में उन से ज्यादा सवाल पूछा जाना मुनासिब नहीं था, लेकिन बढ़ती भीड़ और उस के गुस्से को देख कर जरूरी हो चला था कि मासूम के कत्ल की गुत्थी जल्द से जल्द सुलझे.

जब पतिपत्नी थोडे़ सामान्य हुए तो पुलिस ने उन से पूछा कि क्या उन्हें किसी पर शक है? इस पर कविता एकदम फट पड़ी और सीधे अपने पड़ोस में रहने वाले विशाल रूपानी उर्फ बिट्टू पर शक जता दिया.

कविता के बताए अनुसार, विशाल उस के दोनों बच्चों को घर पर ट्यूशन पढ़ाने के लिए आता था. धीरेधीरे कविता पर उस की नीयत खराब हो गई और वह उस के साथ गलत हरकतें करने लगा. यह बात जब परसराम को पता चली तो उस ने विशाल का घर आना बंद कर दिया. हादसे के 2 दिन पहले ही परसराम और उस का भाई दिलीप विशाल को ले कर थाने आए थे, जहां सुलह हो जाने पर मामला रफादफा हो गया था.

वजह कुछ और ही थी कार्तिक की हत्या की

पुलिस के सामने अब सारी कहानी आइने की तरह साफ थी, लेकिन हालात ऐसे नहीं थे कि कविता से विस्तार से पूछताछ की जाती. दूसरे दिन सुबह को गुस्साए लोगों ने स्कूल का घेराव किया. लेकिन भीड़ को किसी तरह समझाबुझा कर शांत कर दिया गया. पुलिस वालों ने बेहतर यही समझा कि पहले कार्तिक का अंतिम संस्कार हो जाए, उस के बाद छानबीन की जाए. एक तरह से यह साबित हो गया था कि हत्यारा विशाल ही है. पुलिस ने उसे हादसे की रात ही गिरफ्तार कर लिया था.

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इधर सुबह व्हाट्सऐप पर एक मैसेज वायरल हुआ तो हकीकत से अंजान भीड़ का गुस्सा स्कूल पर उतरने लगा. 9 जनवरी की सुबह भीड़ ने क्राइस्ट मेमोरियल स्कूल को घेर कर प्रदर्शन किया. स्कूल के सामने प्रदर्शन कर रहे लोग इस बात का जवाब चाहते थे कि कार्तिक के मामले में लापरवाही क्यों बरती गई. इसी दौरान परसराम की कहासुनी प्रिंसिपल डाक्टर मैनिज मैथ्यूज से भी हुई.

परसराम का आरोप था कि स्कूल प्रबंधन की लापरवाही के चलते ही कार्तिक का अपहरण हुआ. आरोप गलत नहीं था, लेकिन तब तक सच का कुछ हिस्सा भी वायरल होने लगा था. कार्तिक के पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार के बाद पुलिस ने पूरी छानबीन के बाद जो बताया वह इस लिहाज से चौंका देने वाला था कि कविता और विशाल के नाजायज संबंध थे.

दरअसल, विशाल बच्चों को पढ़ातेपढ़ाते खुद कविता से किसी और विषय की ट्यूशन लेने लगा था. यह विषय था एक नवयुवक और गृहिणी के बीच का दैहिक आकर्षण जो अकसर ऐसे हादसों की वजह बनता है.

विशाल और परसराम के परिवारों के बीच काफी घनिष्ठ संबंध थे. साल 1997 के आसपास विशाल की मां अपने पति को छोड़ कर पिता के पास आ कर रहने लगी थी. तब विशाल पेट में था. परसराम का घर पड़ोस में था और दोनों परिवारों के बीच संबंध घर जैसे थे. विशाल की मां का अपने पति से इतना गहरा विवाद था कि वह दोबारा कभी पति के पास नहीं गई. वह पिता के पास ही रही और गुजारे के लिए ट्यूशन पढ़ाने लगी थी. तब परसराम खुद एक स्कूली छात्र हुआ करता था.

गहरे और पुराने रिश्ते थे परसराम और विशाल के परिवार के

विशाल बड़ा हुआ और स्कूल होते हुए बैरागढ़ के ही साधु वासवानी कालेज में पढ़ने लगा. नौकरी के नाम पर वह बैरागढ़ के ही कृष्णा कौंप्लेक्स की एक दुकान में नौकरी करने लगा था. इधर कनक और कार्तिक को पढ़ाने के लिए परसराम ने उसे बतौर ट्यूटर रख लिया, क्योंकि एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा था.

पहले तो परसराम के घर उस का कभीकभार ही आनाजाना होता था, लेकिन जब वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने आने लगा तो रोजरोज उस का सामना कविता से होने लगा. 2 बच्चों की मां बनने के बाद भी कविता का यौवन ढला नहीं था. विशाल रोजाना अपनी पड़ोसन भाभी को देखता तो उस के मन में कुछकुछ होने लगा.

यह प्यार था या शारीरिक आकर्षण, यह तय कर पाना मुश्किल है. 19 साल की उम्र आजकल के लिहाज से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं होती. विशाल की चाहत कविता के प्रति बढ़ने लगी. जब भी वह कनक और कार्तिक को पढ़ाने के दौरान भाभी को देखता था तो उस के नाजुक अंग देख कर रोमांचित और उत्तेजित हो जाता था.

कटवा दी जिंदगी की डोर : पत्नी और उस के प्रेमी ने ली जान – भाग 2

सरकारी नौकरी मिल जाने पर प्रवीण का बचपन का प्यार हिलोरें मारने लगा. उस ने अनीता के सामने अपने प्यार का इजहार करते हुए शादी का प्रस्ताव रखा, लेकिन परिस्थितियां ऐसी रहीं कि घर वालों की रजामंदी न मिलने से दोनों की शादी नहीं हो सकी. अनीता से शादी न हो पाने से प्रवीण की हसरत मन में ही रह गई. अपनी अधूरी हसरतों को मन में लिए प्रवीण पुलिस की नौकरी करता रहा और अनीता सरकारी स्कूल में शिक्षिका की.

बाद में जनवरी 2011 में अनीता की शादी चेतन प्रकाश गलाना से हो गई. अनीता सुंदर भी थी और पढ़ीलिखी भी. वह झालावाड़ के पास असनावर गांव के स्कूल में नियुक्त थी. परेशानी यह थी कि चेतन की नियुक्ति दिल्ली में थी और अनीता की घर के पास ही. इसलिए दोनों को अलगअलग रहना पड़ रहा था. उन के बीच झालावाड़ से दिल्ली की लंबी दूरी थी.

चेतन छुट्टी मिलने पर 15-20 दिन बाद 1-2 दिन के लिए घर आते थे, तभी वह अनीता से मिल पाते थे. नईनई शादी और इतने दिनों का अंतराल दोनों को बहुत खलता था. लेकिन दोनों की ही अपनीअपनी नौकरी की मजबूरियां थीं. उन का गृहस्थ जीवन ठीकठाक चल रहा था.

शादी के कुछ महीने बाद ही अनीता के पैर भारी हो गए. चेतन को पता चला तो वह बहुत खुश हुए. सन 2012 में अनीता ने बेटे को जन्म दिया. पहली संतान के रूप में बेटा पा कर चेतन का पूरा परिवार खुश था. बेटे का नाम क्षितिज रखा गया. क्षितिज समय के साथ बड़ा होने लगा.

इस बीच 2011 में ही प्रवीण राठौड़ की भी शादी हो गई. प्रवीण की पत्नी भी पढ़ीलिखी थी. दिसंबर 2014 में प्रवीण की पत्नी का भी सरकारी अध्यापिका के पद पर चयन हो गया. उस की नियुक्ति भी असनावर के उसी स्कूल में हुई, जहां अनीता नियुक्त थी.

प्रवीण कई बार पत्नी को स्कूल छोड़ने या स्कूल से वापस लाने चला जाता था. उसी स्कूल में अनीता भी नियुक्त थी. फलस्वरूप अनीता और प्रवीण की फिर से मुलाकातें होने लगीं. इन मुलाकातों का असर यह हुआ कि उन का बचपन और जवानी का प्यार फिर से अपने पंख फैलाने लगा. जल्दी ही दोनों एकदूसरे के निकट आ गए.

अनीता को डर था कि उसे प्रवीण के साथ देख कर कहीं उस की पत्नी और दूसरे लोग गलत न सोचने लगें, इसलिए अगस्त 2015 में रक्षाबंधन पर अनीता ने प्रवीण को राखी बांधी और पति चेतन प्रकाश से उस का परिचय धर्मभाई के रूप में कराया.

मिलने के लिए बनाया नया आशियाना

प्रवीण की पत्नी और अनीता के एक ही स्कूल में अध्यापिका के पद पर तैनात होने से चेतन को किसी तरह का कोई संदेह नहीं हुआ. वह पहले की तरह ही अनीता पर भरोसा करते रहे. अपनी नौकरी की वजह से चेतन झालावाड़ में नहीं रह सकते थे. प्रवीण ने चेतन की इस मजबूरी का फायदा उठाया.

अनीता और प्रवीण की मुलाकातें गुल खिलाने लगीं. उन दोनों के बीच शारीरिक संबंध बन गए. जनवरी, 2017 के बाद वे लगभग रोजाना ही एकदूसरे से मिलने लगे. उस समय अनीता गायत्री कालोनी, झालावाड़ स्थित अपने मातापिता के घर रह रही थी.

जून, 2017 में प्रवीण ने अनीता को झालावाड़ के हाउसिंग बोर्ड में 35 लाख रुपए का नया मकान दिलवा दिया. मकान के पैसे अनीता ने दिए. चर्चा है कि प्रवीण ने अनीता को मकान दिलवाने में दलाली के 10 लाख रुपए खुद रख लिए थे.

अनीता हाउसिंग बोर्ड के नए मकान में रहने लगी. प्रवीण इस मकान में बेरोकटोक आनेजाने लगा. वहां उसे रोकने वाला कोई नहीं था. बेटा 5-साढ़े 5 साल का था. चेतन प्रकाश महीने में एकदो बार ही आते थे.

कभीकभार चेतन के मातापिता भी बहू के पास आ जाते थे. वे भी एकदो दिन रुक कर चले जाते थे. प्रवीण ने अनीता से बातें करने के लिए उसे एक मोबाइल और सिम अलग से दिलवा रखी थी, प्रवीण से वह इसी फोन पर बात करती थी. इसी दौरान अनीता गर्भवती हो गई.

अकेली रह रही बहू के घर में प्रवीण का बेरोकटोक आनाजाना चेतन के मातापिता को अच्छा नहीं लगता था. उन्होंने प्रवीण को साफ कह दिया कि वह तभी आया करे, जब चेतन घर में हो. उन्होंने यह बात चेतन को भी बताई. चेतन ने भी अनीता को प्रवीण के घर आनेजाने और उस से रिश्ता रखने के लिए मना कर दिया. इस बात को ले कर चेतन और अनीता के बीच झगड़ा होने लगा.

अक्तूबर 2017 में अनीता ने एक निजी अस्पताल में बेटे को जन्म दिया. इस दौरान प्रवीण भी अस्पताल में मौजूद रहा. चेतन और उस के घर वालों को ज्यादा शक तब हुआ, जब प्रवीण ने नवजात के नैपकिन बदले. इस पर चेतन के घर वालों ने प्रवीण को फिर टोका, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ.

प्रसव के बाद अनीता अपने घर आ गई. लेकिन प्रवीण को ले कर उन के घर में आए दिन लड़ाईझगड़े होने लगे. रोजाना की कलह के कारण अनीता ने 7 नवंबर, 2017 को आत्महत्या करने का प्रयास किया, लेकिन उसे बचा लिया गया.

अनीता के घर में होने वाली कलह को ले कर चेतन प्रवीण की आंखों में खटकने लगे. फलस्वरूप उस ने चेतन को रास्ते से हटाने की योजना बना ली. प्रवीण की दोस्ती वाहनों की खरीदफरोख्त करने और आरटीओ एजेंट का काम करने वाले शाहरुख से थी. शाहरुख झालावाड़ के तोपखाना मोहल्ले का रहने वाला था.

प्रवीण ने दिसंबर 2017 में शाहरुख को बताया कि उस की रिश्ते की बहन को उस का पति मारतापीटता है. वह दिल्ली में कंप्यूटर पर काम करता है, उस की हत्या करनी है. इस के लिए प्रवीण ने शाहरुख को 3 लाख रुपए की सुपारी दी. प्रवीण ने शाहरुख को चेतन की शक्ल भी दिखा दी. शाहरुख ने चेतन की हत्या की जिम्मेदारी ले कर इस काम के लिए अपने कुछ साथियों को शामिल कर लिया.

4 बार हत्या के प्रयास रहे विफल

प्रवीण और शाहरुख ने चेतन की हत्या के प्रयास शुरू कर दिए. प्रवीण ने अनीता के जरिए पता कर लिया था कि 25 दिसंबर, 2017 को चेतन छुट्टी बिता कर ट्रेन से दिल्ली जाएंगे. यह जान कर हत्यारों ने ट्रेन में चेतन का पीछा किया, लेकिन सर्दी का मौसम होने के कारण चेतन ने मुंह पर मफलर लपेट रखा था, जिस से वे उन्हें पहचान नहीं पाए और दिल्ली जा कर वापस लौट आए.

इस के बाद 4 जनवरी, 2018 को चेतन छुट्टी ले कर झालावाड़ आए तो उन्हें ट्रक से कुचल कर मारने की योजना बनाई गई. इस के लिए बदमाशों ने झालावाड़ा के नला मोहल्ला निवासी ट्रक चालक शाकिर को 20 हजार रुपए दिए थे.

योजना के मुताबिक शाकिर को प्रवीण राठौड़ द्वारा उपलब्ध कराए गए ट्रक से चेतन की स्कूटी को रामगंज मंडी से झालावाड़ आते समय रास्ते में टक्कर मारनी थी, लेकिन उस दिन ट्रक पीछे ही रह गया जबकि स्कूटी आगे निकल गई. यह प्रयास विफल होने पर तय किया गया कि 5 जनवरी को चेतन जब झालावाड़ से स्कूटी से रामगंज मंडी जाएंगे, तब उन्हें ट्रक से टक्कर मार कर कुचल दिया जाएगा.

उस दिन शाकिर ने पीछा कर के झरनिया घाटी के पास ट्रक से स्कूटी को टक्कर मार कर चेतन को कुचलने का प्रयास किया, लेकिन इस हादसे में चेतन गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद बच गए, अलबत्ता उन की स्कूटी जरूर क्षतिग्रस्त हो गई थी.

3 प्रयास विफल होने पर चेतन को दिल्ली में उन के घर में मारने की योजना बनाई गई. इस योजना के तहत झालावाड़ से आए बदमाश दिल्ली की निरंकारी कालोनी गुरु तेगबहादुर नगर स्थित चेतन के मकान पर पहुंच गए, लेकिन वहां पर कैमरे लगे होने के कारण वे वारदात को अंजाम दिए बगैर झालावाड़ वापस लौट आए.

प्रवीण को अनीता से चेतन प्रकाश के आने और जाने की सारी जानकारियां मिलती रहती थीं. अंतिम बार भी प्रवीण को पता चल गया था कि चेतन 14 फरवरी की शाम को ट्रेन से रामगंज मंडी से झालावाड़ आएंगे. उस दिन पुलिस कांस्टेबल प्रवीण राठौड़ ने अपने साथियों शाहरुख, फरहान और एक नाबालिग किशोर के साथ मिल कर योजना बना ली. योजना के अनुसार चेतन का झालावाड़ रेलवे स्टेशन से अपहरण करना था, फिर उन्हें कैटामाइन इंजेक्शन की हैवी डोज दे कर मौत की नींद सुलानी थी.

प्यार का खौफनाक जुनून : रूपिंदर बनी अपनों की कातिल

उस दिन शाम को सुखविंदर सिंह कुलवंत सिंह के घर पहुंचा तो अजीब नजारा देखने को मिला. मकान का दरवाजा खुला था लेकिन अंदर किसी प्रकार की रोशनी नहीं थी. सुखविंदर हैरत में पड़ गया कि आखिर ऐसा क्यों है. वह दरवाजे से अंदर घुसा तो अंधेरे में  उसे रूपिंदर कौर चहलकदमी करती दिखाई दी, वह काफी बेचैन दिख रही थी. रूपिंदर कुलवंत सिंह की पत्नी थी.

रूपिंदर ने दरवाजे पर खड़े सुखविंदर को देख भी लिया था. इस के बावजूद उस ने चहलकदमी करनी बंद नहीं की. न जाने वह किस उधेड़बुन में लगी थी, जिस कारण टहलती रही.

सुखविंदर बराबर कुलवंत के घर आताजाता रहता था. कौन सी चीज कहां है, वह बखूबी जानता था. उस ने दरवाजे के पास लगे स्विच बोर्ड से स्विच औन कर दिया. तुरंत ही कमरा रोशनी से जगमगा उठा.

सुखविंदर रूपिंदर कौर के चेहरे पर नजरें जमा कर बोला, ‘‘भाभी, बडे़बुजुर्ग कहते हैं कि जब दिनरात मिल रहे हों, तब घर में अंधेरा नहीं रखना चाहिए, अपशकुन होता है.’’

रूपिंदर के मुंह से आह निकली, ‘‘जिस के जीवन में अंधेरा हो, उस के घर में अंधेरा क्या और शकुनअपशकुन क्या.’’

‘‘आज बड़ी दिलजली बातें कर रही हो. पूरा मोहल्ला जगमगा रहा है और तुम अंधेरा किए टहल रही हो. बात क्या है भाभी?’’ वह बोला.

‘‘कुछ नहीं बस यूं ही.’’ रूपिंदर कौर ने जवाब दिया.

‘‘टालो मत,’’ सुखविंदर ने रूपिंदर का हाथ पकड़ लिया, ‘‘बताओ न भाभी, क्या बात है?’’

प्रेम व अपनत्व से बोले गए शब्द बहुत गहरा असर करते हैं. रूपिंदर कौर पर भी असर हुआ. उस की आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई. सुखविंदर विवाहित था, इसलिए उसे औरतों का मन पढ़ना और समझना आता था.

वह जानता था कि कोई भी औरत पराए मर्द के सामने तभी आंसू बहाती है, जब वह अंदर से बहुत भरी होती है. उस की भड़ास का प्रमुख कारण पति सुख से वंचित होना भी होता है.

सुखविंदर ने हाथ में लिया हुआ रूपिंदर का हाथ आहिस्ता से दबाया, ‘‘बताओ न भाभी, तुम्हें कौन सा दुख है. संभव हुआ तो मैं तुम्हारे जीवन में खुशियां भरने की कोशिश करूंगा.’’

सुखविंदर के हाथों से हाथ छुड़ा कर रूपिंदर कौर ने दुपट्टे के पल्लू से अपने आंसू पोंछे, फिर धीरे से बोली, ‘‘मेरे नसीब में पति का प्यार नहीं है. यही एक दुख है, जो मुझे जलाता रहता है.’’

सुखविंदर चौंका, ‘‘यह क्या कह रही हो भाभी?’’

‘‘हां, सही कह रही हूं सुखविंदर.’’

‘‘अगर कुलवंत सिंह तुम को प्यार नहीं करता तो 2 बेटे कैसे हो गए.’’

‘‘वह तो मिलन का नतीजा है और एक बात बताऊं कि बच्चे तो जानवर भी पैदा करते हैं. औरत सिर्फ प्यार की भूखी होती है. उसे पति से प्यार न मिले तो उसे अपनी जिंदगी खराब लगने लगती है.’’

सुखविंदर आश्चर्य से रूपिंदर कौर का मुंह ताकता रह गया. उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि रूपिंदर मन की बात इस तरह खुल्लमखुल्ला कह सकती है.

सुखविंदर के मनोभावों से बेखबर रूपिंदर अपनी धुन में बोलती रही, ‘‘सैक्स और प्यार में अंतर होता है. खाना, कपड़ा देने और सैक्स करने से औरत के तकाजे पूरे नहीं होते. कोई दिल से चाहता है, खयाल रखता है, तब औरत पूरी तरह से खुश रहती है.’’

सुखविंदर सोचने लगा कि रूपिंदर की बात में दम है. मात्र खाना, कपड़ा, सुहाग की निशानियां और सैक्स ही औरत के लिए सब कुछ नहीं होता. दिल और रूह को छू लेने वाला प्यार भी उसे चाहिए होता है. दिल ठंडा होता है और रूह सुकून पाती है, तब कहीं औरत के प्यार की प्यास बुझती है.

सुखविंदर समझ नहीं पा रहा था कि वह इस सिलसिले में क्या कहे. रूपिंदर का मामला सुखविंदर के अधिकार क्षेत्र से बाहर था. इसलिए उस ने इस मामले में चुप रहना उचित समझा. लेकिन रूपिंदर चुप रहने वाली नहीं थी. जिस मुद्दे को उठा कर उस ने बात शुरू की थी, वह उसे अंजाम तक पहुंचाना चाहती थी.

कुछ देर तक रूपिंदर सुखविंदर का हैरानपरेशान चेहरा ताकती रही. फिर उसी अंदाज में उस का हाथ पकड़ लिया, जिस तरह सुखविंदर ने उस का हाथ पकड़ा था, ‘‘तुम मेरी परेशानियां दूर कर के जिंदगी खुशियों से भरने की बात कह रहे थे, मुझे तुम्हारा प्रस्ताव मंजूर है.’’

सुखविंदर ने रूपिंदर कौर के हाथों से अपना हाथ खींच लिया, ‘‘भाभी, वो तो मैं ने ऐसे ही बोल दिया था.’’

‘‘ऐसे ही नहीं बोले थे,’’ रूपिंदर ने फिर उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मैं जानती हूं तुम्हारे दिल में मेरे लिए प्यार है. उसी प्यार के नाते तुम ने मेरे जीवन को खुशियों से भरने की बात कही. जो कहा है उसे पूरा करो.’’

‘‘भाभी, जो तुम चाहती हो, मुझ से नहीं होगा.’’ वह बोला.

‘‘तुम्हारा यह सोचना गलत है कि मैं तुम से सैक्स संबंध चाहती हूं.’’ रूपिंदर सुखविंदर की आंखों में आंखें डाल कर बोली, ‘‘पति मुझे यह सब तो देता है, लेकिन मुझे प्यार नहीं करता.’’

सुखविंदर उलझने लगा, ‘‘तो मैं क्या करूं?’’

‘‘क्या तुम मुझे प्यार भी नहीं दे सकते,’’ रूपिंदर उस की आंखों में देखते हुए मुसकराई, ‘‘शब्दों से मेरे मर्म को स्पर्श करो. आमनेसामने बात करने में शर्म आए तो फोन पर बात कर लिया करो. अपनी भाभी से बातें करने में तुम्हें किसी किस्म का ऐतराज नहीं होना चाहिए.’’

सुखविंदर से कुछ कहते नहीं बना. रूपिंदर कौर के सामने खड़ा रहना उस ने मुनासिब नहीं समझा. उस से बिना कुछ बोले वह बाहर  निकला, बाहर खड़ी बाइक पर सवार हुआ और वहां से चला गया.

दरवाजे पर आ खड़ी रूपिंदर कौर के चेहरे पर कुटिल मुसकान थी. मर्द पर औरत का वार कभी खाली नहीं जाता. प्यार का जाल फेंकना रूपिंदर कौर का काम था, वह उस ने कर दिया. अब आगे का काम सुखविंदर को करना था.

पंजाब के गुरदासपुर जिले के काहनूवान थाना क्षेत्र के बलवंडा गांव में रहते थे कुलवंत सिंह. वह सेना में थे. सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने पुणे की एक निजी कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर ली थी.

उन के परिवार में पत्नी रूपिंदर कौर और 2 बेटे रणदीप उर्फ बौबी (26) और करणदीप (24) थे. रणदीप की शादी हो चुकी थी. उस की पत्नी कनाडा में रहती थी. रणदीप पास के ही एक पैट्रोल पंप पर काम करता था. करणदीप सेना में नौकरी करता था.

45 वर्ष की उम्र हो गई थी रूपिंदर की, 2-2 जवान बेटे थे. लेकिन उस के शरीर की आग इस उम्र में भी भभक रही थी. रूपिंदर स्वभाव की अच्छी नहीं थी. वह काफी स्वार्थी और महत्त्वाकांक्षी औरत थी. उसे सिर्फ अपना सुख प्यारा था, न उसे अपने पति की चिंता होती थी और न ही अपने बेटों की.

कुलवंत जब तक सेना में था तो वहीं रहता था, कभीकभी घर आता था. जब रिटायर हो कर घर आया तो उस का घर में रहना मुश्किल होने लगा. दिन भर रूपिंदर के तरहतरह के ताने, लड़ाईझगड़ा तक उसे झेलना पड़ता.

सैक्स की भूखी रूपिंदर को हर रोज ही बिस्तर पर पति का सुख चाहिए होता था. इस सब से आजिज आ कर ही कुलवंत पुणे चला गया था और वहां सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने लगा था.

घर पर अकेली ही रहती थी रूपिंदर कौर. बेटा रणदीप रात में ही घर आता था. ऐसे में रूपिंदर का समय काटे नहीं कटता था. पति के अपने से दूर चले जाने के बाद रूपिंदर कौर पति सुख से भी वंचित थी. ऐसे में रूपिंदर ने भी वही करने की ठान ली जो उस जैसी औरतें ऐसे हालात में करती हैं यानी अपने सुख के साथी की तलाश.

रूपिंदर की जानपहचान चक्कशरीफ में रहने वाले सुखविंदर सिंह उर्फ सुक्खा से थी. वह उस के पति का दोस्त था. सुखविंदर उस से मिलने उस के घर आयाजाया करता था.

एक दिन रूपिंदर कौर अपने सुख के साथी के बारे में सोच रही थी कि कौन हो कैसा हो तो अचानक ही उस के जेहन में सुखविंदर का चेहरा कौंध गया. बस, उस के बाद रूपिंदर कौर सुखविंदर को नजदीक जाने की योजना बनाने लगी.

उस शाम वह कमरे में चहलकदमी करते हुए सुखविंदर को अपने जाल में फांसने की सोच रही थी. यही सोचतेसोचते कब अंधेरा हो गया, उसे पता ही नहीं चला. संयोग से तभी सुखविंदर भी आ गया.

उसे देखते ही जिस आइडिया के लिए रूपिंदर कौर कई दिन से परेशान थी, वह एकदम से उस के दिमाग में आ गया. उस के बाद रूपिंदर कौर ने ऐसा प्रपंच रचा कि सुखविंदर उस में फंस गया.

सुखविंदर आपराधिक प्रवृत्ति का था. पठानकोट में उस के खिलाफ लूट के कई मामले दर्ज थे. एक मामले में वह कुछ दिन पहले ही जेल से छूट कर आया था. रूपिंदर कौर क्या चाहती है, क्यों उसे अपने जाल में फांस रही है, यह बात वह बखूबी जान रहा था.

शिकारी रूपिंदर को लग रहा था कि सुखविंदर को अपनी बातों के जाल में फंसा कर उसे अपना शिकार बना लेगी. मगर सुखविंदर खुद ही बड़ा शिकारी था.

उसे तो खुद रूपिंदर का शिकार होने में मजा आ रहा था. वह अपनी मरजी से रूपिंदर का शिकार बन रहा था. उस की बातों व हरकतों का मजा ले रहा था. आखिर इस में फायदा तो उसी का था. रूपिंदर को इस बात का आभास तक नहीं था.

सुखविंदर रूपिंदर की बातों को सोचसोच कर बारबार मुसकराता. उस की आंखों के सामने रूपिंदर कौर का रूप चलचित्र की भांति घूमने लगता. ऐसे में सुखविंदर भी रूपिंदर के रूप का प्यासा बन बैठा.

अब जब भी रूपिंदर के घर जाता तो उसे प्यासी नजरों से निहारता रहता. दिखाने के लिए रूपिंदर की चाहत का मान रखते हुए उस से प्रेम भरी बातें करता. उन प्रेम भरी बातों में पड़ कर रूपिंदर उस से सट कर बैठ जाती.

वह कभी उस के कंधे पर सिर रख कर उस से बातें करती तो कभी उस के सीने पर अपना सिर रख देती और कान से उस के दिल की धड़कनों को सुनती रहती. तेज धड़कनों का एहसास होते ही वह मंदमंद मुसकराने लगती.

एक दिन ऐसे ही सुखविंदर के सीने से अपना सिर लगा कर रूपिंदर बैठी थी. उस की चाहतें उसे कमजोर बनाने लगीं. काफी समय से वह अपनी चाहत को पूरा करने का इंतजार कर रही थी.

अब जब एक पल का इंतजार भी बरदाश्त नहीं हुआ तो उस ने सुखविंदर के होंठों को चूम लिया. सुखविंदर भी इसी मौके की तलाश में था. उस ने भी रूपिंदर को अपनी बांहों में भर लिया.

उस के बाद उन के बीच शारीरिक रिश्ता कायम हो गया. रूपिंदर ने अपनी चाहत को अंजाम तक पहुंचाया. इस के बाद उन के बीच यह रोज का सिलसिला बन गया.

23 मई, 2021 को गांव झंडा लुबाना के डे्रन के पास एक अधजली लाश पड़ी थी. वहीं पास में ही झंडा लुबाना गांव निवासी गुरुद्वारा साहिब कमेटी के प्रधान त्रिलोचन सिंह का खेत था. वह खेत में पानी लगाने के लिए आए, वहां उन्होंने एक युवक की अधजली लाश पड़ी देखी. उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम को इस की सूचना दे दी.

घटनास्थल काहनूवान थाना क्षेत्र में आता था, इसलिए घटना की सूचना काहनूवान थाने को दे दी गई.

सूचना मिलने पर थानाप्रभारी सुरिंदर पाल सिंह अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. एसएसपी डा. नानक सिंह व अन्य पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए.

लाश पूरी तरह नहीं जली थी. देखने में वह किसी 25 से 28 साल के युवक की लाश लग रही थी. जिस जगह लाश पड़ी थी, उसे देखने पर अनुमान लगाया गया कि हत्यारों ने लाश को वहीं जलाया था. उस जगह पर जलाए जाने के निशान मौजूद थे.

आसपास के लोगों को बुला कर लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की गई, लेकिन शिनाख्त न हो सकी. शिनाख्त न होने पर लाश के कई कोणों से फोटो खिंचवाने और जरूरी काररवाई करने के बाद थानाप्रभारी सुरिंदर पाल ने लाश सिविल अस्पताल में रखवा दी. उस के बाद थाने वापस आ गए.

इस बीच उन्हें पता चला कि बलवंडा गांव का युवक रणदीप सिंह लापता है. इस पर थानाप्रभारी रणदीप सिंह के घर गए. वहां उस की मां रूपिंदर कौर मिली.

उन्होंने रूपिंदर कौर को बताया कि डे्रन के पास एक अधजली लाश मिली है. उस की शिनाख्त होनी है, हो सकता है वह उन के बेटे की हो.

रूपिंदर कौर ने उन के साथ अस्पताल जा कर लाश को देखा. देखने के बाद रूपिंदर कौर ने लाश अपने बेटे की होने से साफ इनकार कर दिया.

फिलहाल लाश का पोस्टमार्टम कराया गया तो पता चला कि मृतक के एक पैर में रौड पड़ी हुई है. थानाप्रभारी सुरिंदर पाल ने पता किया तो पता चला कि रणदीप के पैर में भी रौड पड़ी हुई थी. इस का मतलब यह था कि लाश रणदीप की ही है.

रणदीप की लाश को उस की मां रूपिंदर कौर ने पहचानने से क्यों इनकार कर दिया. इस का जवाब रूपिंदर ही दे सकती थी. वैसे भी इस स्थिति में थानाप्रभारी सुरिंदर पाल का शक रूपिंदर कौर पर बढ़ गया कि हो न हो इस घटना में रूपिंदर कौर का ही हाथ हो सकता है.

इस के बाद रूपिंदर कौर को हिरासत में ले लिया गया. पहले तो वह पुलिस को गुमराह करती रही, पर जब सख्ती की गई तो उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

घटना में उस का प्रेमी सुखविंदर उर्फ सुक्खा और सुक्खा का दोस्त गुरजीत सिंह उर्फ महिकी भी शामिल था. तत्काल उन दोनों को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

जांच में पता चला कि रूपिंदर कौर और सुखविंदर सिंह के अवैध संबंधों के बारे में रणदीप को पता लग गया था. इसे ले कर रोज घर में कलह होने लगी. इस के बाद रूपिंदर को अपना ही बेटा दुश्मन लगने लगा. वह बेटे रणदीप से नफरत करने लगी.

रणदीप के बैंक खाते में 5 लाख रुपए थे. रणदीप अपनी पत्नी के पास कनाडा जाना चाहता था, उसी के लिए उस ने पैसे जमा कर रखे थे. शातिर रूपिंदर ने उसे बहलाफुसला कर वे रुपए अपने खाते में ट्रांसफर करा लिए.

रणदीप का विरोध बढ़ता गया. इतना ही नहीं, रूपिंदर का सुखविंदर से मिलना मुश्किल होने लगा तो उस ने रणदीप को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया.

रूपिंदर ने सुखविंदर से बेटे रणदीप की हत्या करने की बात कही. सुखविंदर तो वैसे ही अपराधों में लिप्त रहने वाला इंसान था, इसलिए वह तुरंत तैयार हो गया. रणदीप की हत्या करने के लिए उस ने अपने ही गांव चक्क शरीफ निवासी गुरजीत सिंह उर्फ महिकी को भी शामिल कर लिया. इस के बाद तीनों ने रणदीप की हत्या की योजना बनाई.

22 मई, 2021 की रात रूपिंदर कौर ने रणदीप के खाने में नींद की गोलियां मिला दीं. खाना खाने के बाद रणदीप सो गया. गोलियों के कारण नशे की हालत में वह बेसुध था. सुखविंदर तय समय के हिसाब से दोस्त गुरजीत के साथ रूपिंदर के घर पहुंच गया.

तीनों ने मिल कर चाकू और हथौड़ी से वार कर के रणदीप को मौत के घाट उतार दिया. फिर आधी रात को रणदीप की लाश गांव झंडा लुबाना के डे्रन के पास ले जा कर डाल दी और पैट्रोल डाल कर आग लगा दी. फिर वहां से वापस अपने घरों को लौट गए. लेकिन लाश पूरी तरह जल नहीं पाई.

तीनों का गुनाह छिप न सका और पकड़े गए. पुलिस ने उन के खिलाफ हत्या और सबूत मिटाने का मुकदमा दर्ज कर दिया. तीनों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

नफरत की इंतहा : प्रेमी बना गृहस्थी में ग्रहण – भाग 1

तकरीबन 26-27 साल की उस युवती ने अपना नाम प्रियंका बताया था. हलका सा घूंघट होने के बावजूद उस का आंसुओं से भीगा चेहरा साफ नजर आ रहा था. उस का रंग गेहुंआ था. बड़ीबड़ी आंखें और सुतवां नाक घूंघट की ओट से साफ नजर आ रही थी. थानाप्रभारी बदन सिंह के सामने आते ही वह फफक पड़ी, ‘‘साब मेरा तो सुहाग ही उजड़ गया. बच्चों को भी अनाथ कर गया.’’

फिर चेहरा हाथों में छिपा कर रोने लगी, ‘‘साहब, एक तो मेरा मरद खुदकुशी कर मुझे बेसहारा छोड़ गया. अब घरपरिवार वाले कह रहे हैं कि उस की हत्या हो गई. कोई क्यों करेगा उस की हत्या? हमारा तो किसी से बैर भी नहीं था.’’

इतना कहतेकहते उस ने हिचकियां लेनी शुरू कर दीं. थानाप्रभारी बदन सिंह  ने उसे शांत रहने का संकेत करते हुए कहा, ‘‘आप रोएं नहीं. हम हकीकत का खुलासा कर के रहेंगे. आप पूरी बात को सिलसिलेवार बताइए ताकि हमें अपराधी को गिरफ्तार करने में मदद मिल सके.’’

कुछ पलों के लिए गला भर आने के कारण प्रियंका चुप हो गई. फिर उस ने कहना शुरू किया, ‘‘सच्ची बात तो यह है साब कि हमारा मर्द कुछ दिनों से पैसों की देनदारी और तगादों से परेशान था. उधारी चुकाने की कोई सूरत कहीं से नजर नहीं आ रही थी. दिनरात शराब में डूबा रहता था. कल तो सुबह से ही शराब पी रहा था. शायद दारू के नशे की झोंक में ही जान दे बैठा…’’ प्रियंका की रुलाई फिर फूट पड़ी, ‘‘तगादों से परेशान हो कर जान देने की क्या जरूरत थी?’’

थानाप्रभारी बदन सिंह ने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा, ‘‘आप को किसी पर शक है? मेरा मतलब है, जिस के तगादे से परेशान हो कर आप के पति ने आत्महत्या की या उस की हत्या हो गई?’’

‘‘हत्या की बात कौन कह रहा है साब!’’ प्रियंका ने प्रतिवाद करते हुए कहा.

तभी वहां खड़े कुछ लोगों में से एक युवक बोल पड़ा, ‘‘हम कहते हैं साब.’’

इस के साथ ही वह शख्स बुरी तरह उबल पड़ा, ‘‘हमें तो इस कुलच्छिनी पर ही शक है. साहब, इस ने ही मरवाया है अपने पति को… यह आत्महत्या का नहीं बल्कि हत्या का मामला है.’’

इस से पहले कि थानाप्रभारी बदन सिंह उस युवक को तवज्जो देते, प्रियंका चिल्ला पड़ी, ‘‘नहीं… यह झूठ है, हम से दुश्मनी निकालने के लिए यह झूठे इलजाम लगा रहा है.’’

थानाप्रभारी बदन सिंह ने युवक की तरफ देखा, ‘‘कौन हो तुम? तुम कैसे कह सकते हो कि इस की हत्या हुई है और इस के पीछे प्रियंका का हाथ है?’’

‘‘मेरा नाम रामदीन है साहब, रिश्ते में मृतक बुद्धि प्रकाश मेरा चचेरा भाई था.’’ उस के चेहरे की तमतमाहट कम नहीं हुई थी. वह बुरी तरह फट पड़ा, ‘‘साहब बुद्धि प्रकाश का किसी से कोई लेनदेन था ही नहीं. फिर तगादे की बात कहां से आ गई? मेरा भाई मजबूत दिल गुर्दे वाला आदमी था, कायर नहीं था कि आत्महत्या कर लेता. जरूर उस की हत्या हुई है.’’

‘‘तो इस में प्रियंका कहां से आ गई?’’ थानाप्रभारी बदन सिंह ने सवाल दागा.

‘‘आप पूरी जांच कर लो साहब. दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.’’ वहीं मौजूद परिजनों और बस्ती के लोगों ने एक स्वर में कहा, ‘‘साहब, घर में प्रियंका के अलावा और कौन रहता है? बुद्धि प्रकाश ने जिंदगी में कभी शराब नहीं पी, लेकिन पिछले 2 सालों से तो जैसे दारू में डुबकी मार रहा था. अगर उस ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया है तो हमारी समझ से बाहर है.’’

इस बीच पड़ोस के कुछ लोग भी बोल पड़े, ‘‘पतिपत्नी के संबंध भी अच्छे नहीं थे. दिनरात झगड़े की आवाज सुनाई देती थी. पड़ोस के नाते हम ने प्रियंका से पूछा भी, लेकिन इस ने मुंह बिचका दिया. कहती थी, नशेड़ी को न घर की चिंता होती है और न ही घरवाली की. दारू पी कर खेतखलिहान में पड़ा रहेगा तो घर में झगड़े ही होंगे.’’

थानाप्रभारी बदन सिंह ने गहरी नजरों से मृतक के परिजनों और पड़ोसियों की तरफ देखा फिर कहा, ‘‘दिनरात दारू में डुबकी मारने की नौबत तो तब आती है जब कोई गहरे तनाव में हो? पतिपत्नी के बीच रोज की खटपट भी इस की वजह हो सकती है? लेकिन आत्महत्या तो बहुत बड़ा कदम होता है.’’

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लेकिन इस सवाल पर परिजनों की खामोशी ने रहस्य का कुहासा और गहरा कर दिया. थानाप्रभारी बदन सिंह के दिमाग में एक सवाल हथौड़े की तरह टकरा रहा था, आखिर मृतक की पत्नी प्रियंका क्यों इस बात पर अड़ी हुई है कि यह आत्महत्या का मामला है.

उन्होंने थोड़े सख्त स्वर मे प्रियंका से पूछा, ‘‘तुम्हें कब और कैसे पता चला कि तुम्हारे पति ने आत्महत्या कर ली है?’’

प्रियंका की रुलाई फिर फूट पड़ी, ‘‘साहब हम तो रोज की तरह तड़के दिशामैदान के लिए चले गए थे. तब भी हमारा मरद ऐसे ही सो रहा था. लौट कर आए तब भी ऐसे ही सोता मिला. हमें बड़ा अटपटा लगा. ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ. हम ने हिलायाडुलाया, कोई हरकत नहीं हुई. दिल की धड़कनें भी गायब थीं. हमारा दिल धक से रह गया. लगा जरूर कुछ गड़बड़ है… हम ने फौरन पड़ोसियों को पुकार लगाई.’’

चौधरी की भूलभुलैया : अपनी ही बनाई योजना में फंसा – भाग 2

मुझे मुखतारा की बात को सच मानना पड़ा. चौधरी बोला, ‘‘मलिक साहब, आप जानते नहीं, सुग्गी किस तरह की औरत थी. छलफरेब उस की नसनस में था. जो औरत अपने पति की नहीं हुई, वह किसी और की कैसे हो सकती है.’’

मैं ने कहा, ‘‘ठीक है चौधरी साहब, आप ने यह तो साबित कर दिया कि सुग्गी को आप ने हवेली पर नहीं बुलाया था, पर मैं ने सुना है कि वह आप की हवेली के अकसर चक्कर लगाती थी.’’

‘‘हां मलिक साहब, वह हफ्ते में 1-2 बार हवेली आती थी.’’ वह थोड़ा रुक कर बोला, ‘‘बात यह है मलिक साहब, मेरी पत्नी का नीचे का हिस्सा पैरलाइज है. सुग्गी को तेल मालिश करने के लिए बुलाया जाता था.’’

उस का बयान सुन कर मैं ने कहा, ‘‘ठीक है चौधरी साहब, अब मैं चलता हूं. लेकिन कल आप मुराद को थाने जरूर भेज दें, उस का बयान लेना है.’’

मैं जीप में बैठ कर गांव के अंदर की ओर जा रहा था, क्योंकि मुझे बशारत के घर के आगे से जाने पर पता लग जाता कि वह आया या नहीं. अभी तांगा चल ही रहा था कि एक औरत जीप के आगे आई. ड्राइवर बोला, ‘‘इस का खसम तो हराम की मौत मारा गया, अब पता नहीं यह क्या चाहती है?’’

मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या यह मुश्ताक की पत्नी बिलकीस है?’’

वह कहने लगा, ‘‘हां, वही है.’’

‘‘मुझे मौत चाहिए दारोगाजी, जब मेरा पति नहीं रहा तो मैं जी कर क्या करूंगी. डायन मेरे पति को खा गई.’’ बोलतेबोलते उस का गला रुंध गया. बिलकीस को देख कर मुझे हैरानी हुई, क्योंकि मुश्ताक बड़ा सुंदर था लेकिन वह छोटे कद की सांवली औरत थी.

मैं ने उस से पूछा, ‘‘बीबी, तुम बिलकीस हो, क्या तुम उस डायन के बारे में कुछ बताओगी?’’

वह बोली, ‘‘आइए थानेदार साहब, मेरे घर आओ, मैं सब कुछ बताऊंगी.’’

मैं ने उस की बात मान ली.

‘‘तुम ने सुग्गी को डायन कहा, वास्तव में वह डायन ही थी.’’ मैं ने उस से हमदर्दी जताते हुए कहा, ‘‘अब मुझे बताओ, उन दोनों के बीच यह चक्कर कब से चल रहा था?’’

‘‘थानेदारजी, मैं बहुत दुखी औरत हूं.’’ वह सिसकते हुए बोली, ‘‘मैं एक कालीकलूटी औरत हूं. मुश्ताक को गोरीचिट्टी औरत चाहिए थी. मैं ने उस से कई बार कहा कि किसी सुंदर सी औरत से निकाह कर ले. मैं नौकरानी बन कर रह लूंगी, लेकिन वह नहीं माना. मुझे क्या पता था कि वह इस तरह घर से बाहर क्या गुल खिलाता फिर रहा है.’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘बिलकीस, अगर तुम चाहती हो कि मैं तुम्हारे पति के हत्यारे को पकड़ूं तो मुझे बताओ कि उन दोनों के बीच यह चक्कर कब से चल रहा था?’’

‘‘यह तो पता नहीं. लेकिन मुझे कुछ दिनों पहले ही पता लगा था.’’

‘‘तुम्हें यह बात किस से पता लगी?’’

‘‘मुझे मुराद ने एक महीने पहले बताया था. उस ने कहा था कि अपने पति की देखभाल करो, वह सुग्गी से मिलता है और सुग्गी उस से मिलने डेरे पर जाती है.’’

‘‘तो तुम ने उस पर नजर रखी?’’

‘‘नहीं जी, मैं ने मुश्ताक पर भरोसा किया और समझा कि सुग्गी को ले कर तो किसी को भी बदनाम किया जा सकता है. लेकिन आज की घटना से मुझे पूरा यकीन हो गया कि मुराद की बात सच थी.’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम्हें मुश्ताक से इस बात की पुष्टि करनी चाहिए थी.’’

वह बोली, ‘‘दरअसल, मुराद ने मुझे कसम दे रखी थी.’’

मैं ने उस से पूछा, ‘‘अच्छा, यह बताओ तुम्हें किसी पर शक है?’’

वह बोली, ‘‘जब मैं ने देखा ही नहीं तो किस का नाम लूं. लेकिन इस सब का जिम्मेदार मैं सुग्गी को समझती हूं.’’

उठते हुए मैं ने कहा, ‘‘अच्छा बिलकीस, मैं तुम्हारे पति के हत्यारे को जरूर पकड़ूंगा. इस बीच अगर तुम्हें कुछ पता लगे तो मुझे जरूर बताना.’’

उस ने पूछा कि पति की लाश कब मिलेगी. इस पर मैं ने उसे बताया कि जैसे ही लाश अस्पताल से आएगी, मैं खबर कर दूंगा.

वहां से मैं सीधा बशारत के घर पहुंचा. वहां फरमान मिला, उस ने बताया कि वह अभी तक नहीं आया है. मैं ने उस से कहा कि जैसे ही वह आए, मुझे खबर कर देना.

मैं रात का खाना खा कर घर पर बैठा था कि कांस्टेबल आफताब ने आ कर बताया, ‘‘सर, बशारत आया है. उस के साथ उस का साढ़ू भी है. वे चारे से लदी बैलगाड़ी पर आए हैं.’’

मैं थाने पहुंचा और दोनों को अपने कमरे में बुलाया. मैं ने फरमान से पूछा, ‘‘तुम्हारी इस से कोई बात हुई?’’

वह बोला, ‘‘बातें तो बहुत हुई हैं जनाब, लेकिन वही बात जो मैं कह रहा था, उन की हत्या में इस का कोई हाथ नहीं है.’’

मैं ने बशारत की ओर देखते हुए कहा, ‘‘मुझे सचसच बताओ कि तुम ने ये हत्याएं क्यों कीं?’’

उस ने कहा कि इस में उस का कोई हाथ नहीं है.

मैं ने कहा, ‘‘अच्छा तो तुम शराफत की जबान नहीं समझते. तुम्हारे साथ कोई दूसरा तरीका आजमाना पड़ेगा.’’

मैं ने हवलदार को आवाज लगाई. बशारत यह सुन कर कांप गया और रोनी सूरत बना कर कहने लगा, ‘‘जनाब, एक तो मेरी पत्नी की हत्या हो गई और उल्टा आप मुझे ही दबा रहे हैं.’’

‘‘सारे कायदेकानून तुम्हें अभी पढ़ाए जाएंगे, तुम आसानी से छूटने वाले नहीं हो.’’

बशारत की उम्र 40 के लगभग होगी. छोटा कद, चेहरे पर चेचक के दाग, एक टांग से लंगड़ा, पतलादुबला, किसी भी तरह सुग्गी के मेल का नहीं था. ऐसा ही बिलकीस और मुश्ताक का जोड़ था.

हवलदार चमन कमरे में आया तो मैं ने फरमान से कहा कि वह कमरे से बाहर जा कर बैठे. जब जरूरत होगी, बुला लेंगे. वह चला गया तो मैं ने बशारत की ओर देख कर कहा, ‘‘हां भाई, आसानी से बताएगा या सच उगलवाने के लिए हमें मेहनत करनी पड़ेगी.’’

वह कांपते हुए बोला, ‘‘हुजूर, मैं बिलकुल निर्दोष हूं, मैं ने किसी की हत्या नहीं की है.’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘चौधरी के डेरे पर जो घटना घटी, वह तुम्हें पता है या मैं बताऊं?’’

‘‘मुझे पता है चौधरी के डेरे पर किसी ने मेरी पत्नी और मुश्ताक की हत्या कर दी है और उस का आरोप मेरे ऊपर लगाया जा रहा है.’’

‘‘स्थिति के हिसाब से शक तो तुम पर ही जाएगा.’’

‘‘हुजून, मुझे क्या पता. मेरे घर से तो दोपहर में वह ठीकठाक गई थी.’’ कहते हुए उस ने गरदन झुका ली.

उस की गरदन झुकी देख कर मैं समझ गया कि वह इस घटना से बहुत दुखी है, इसलिए मैं ने उसे धीरेधीरे कुरेदना शुरू किया. मैं ने उस से पूछा, ‘‘सुग्गी, खाना ले कर तुम्हारे पास कब पहुंची थी?’’

उस ने बताया, ‘‘उस वक्त दोपहर का एक बजने वाला था.’’

‘‘तुम्हारे पास वह कितनी देर रही?’’

उसे कुछ हिम्मत सी हुई, उस ने निर्भीक हो कर कहा, ‘‘यही कोई 20-25 मिनट यानी कोई डेढ़ बजे दोपहर तक.’’

मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘तुम रोज सूरज छिपने से पहले घर आ जाते हो, आज इतनी देर कैसे हो गई, कहां थे तुम?’’

‘‘मैं लंगरवाल चला गया था. शफी से अपने पैसे लेने. यह बात मैं ने सुग्गी को भी बता दी थी कि मैं रात तक घर पहुंचूंगा.’’

मैं ने हवलदार चमन को कमरे से बाहर जाने के लिए कहा, क्योंकि वह उस की मौजूदगी में डराडरा बोल रहा था. उस के जाते ही मैं ने उसे बैठने को कहा.

‘‘तुम लंगरवाल कितने बजे गए थे? यह समझ लेना कि मैं आंखें मूंद कर तुम्हारी बातों पर यकीन नहीं कर लूंगा. मैं एक आदमी भेज कर शफी से तुम्हारी बातों की पुष्टि करवाऊंगा.’’

‘‘आप कैसे भी पता कर लें, मैं वहां करीब 4 बजे गया था.’’

मैं ने धीरे से पूछा, ‘‘तुम्हें सुग्गी और मुश्ताक के संबंधों का पता था?’’

वह धीरे से बोला, ‘‘नहीं हुजूर, मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता था.’’

‘‘तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं तुम्हारी बात किसी से नहीं कहूंगा. सचसच बताओ, तुम्हें कुछ पता था?’’

‘‘थानेदारजी, मैं ने आप से कसम खाई है, मुझे कुछ भी पता नहीं था.’’

‘‘तुम्हारी शादी को कितने दिन हो गए?’’

‘‘कोई 7 साल.’’

‘‘फिर तो तुम अपनी पत्नी को अच्छी तरह समझते होगे?’’

वह कुछ उलझ सा गया और मेरी ओर देख कर बोला, ‘‘जी?’’

‘‘देखो, बुरा मत मानना. हम केस की तफ्तीश बड़ी गहराई से करते हैं और हर तरह के सवाल करते हैं. मैं ने तुम्हारी पत्नी के बारे में कुछ अच्छी बातें नहीं सुनीं.’’

वह पलक झपकते ही मेरी बात की गहराई तक पहुंच गया. वह बोला, ‘‘आप ने ठीक ही सुना है.’’

‘‘तुम तो उस के पति थे, तुम उसे समझाते.’’

उस ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया और टूटे हुए दिल से बोला, ‘‘मैं उसे क्या समझाता, उस पर मेरा जोर नहीं चलता था.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘हुजूर, दुनिया मुझे उस का पति कहती है, लेकिन यह बात नहीं है.’’ वह रोनी सूरत बना कर कहने लगा, ‘‘असल बात यह है कि आज तक सुग्गी ने मुझे अपने पास तक नहीं आने दिया.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं है बशारत, तुम 5 साल के बेटे नवेद के बाप हो.’’

उस ने बड़े दुख से कहा, जैसे उस की आवाज किसी कुएं से आ रही हो, ‘‘थानेदार साहब, भाग्य में अगर औलाद लिखी हो तो मिल ही जाती है, कभी बाप की कोशिश से और कभी मां के जरिए से.’’

बशारत हिचकियों से रोने लगा. वह रोता रहा और अपनी कहानी सुनाता रहा. ऐसी कहानी जो सुग्गी ने उस से जूते की नोक पर लिखवाई थी. जब से उस का विवाह सुग्गी के साथ हुआ था, वह उस की सुंदरता के आगे सिर झुकाए रहता था. जैसा वह कहती थी, वह वही करता था.

मैं ने उस के साढ़ू फरमान को बुलवा कर कहा, ‘‘आज की रात बशारत लौकअप में रहेगा, कल मैं एक सिपाही लंगरवाल भेज कर इस के जाने की पुष्टि कराऊंगा. इस की बात सच हुई तो मैं इसे छोड़ दूंगा.’’

अगले दिन सुबह मैं सरकारी काम से हैडक्वार्टर चला गया. जब दोपहर को वापस थाने आया तो हवलदार चमन ने बताया, ‘‘सरजी, आप के लिए अच्छी खबर है. जिस रिवौल्वर से हत्या की गई थी, वह मिल गया है.’’

मैं उछल पड़ा, ‘‘कहां है रिवौल्वर, कहां से मिला?’’

हवलदार ने बताया कि फरमान दे कर गया है, वह कह रहा था कि यह जानवरों के चारे के ढेर से मिला था. वह अभी कुछ देर में थाने आने के लिए कह कर गया है.

मैं ने जो सिपाही लंगरवाल भेजा था, वह आ गया और उस ने शफी से बशारत के वहां पहुंचने की पुष्टि करा ली थी. मैं ने बशारत को बुला कर कहा, ‘‘बशारत, हत्या में इस्तेमाल रिवौल्वर मिल गया है.’’

उस ने पूछा, ‘‘कहां से मिला?’’

‘‘तुम्हारी बैलगाड़ी पर लदे चारे के ढेर से.’’

वह हकला कर बोला, ‘‘गाड़ी में…किस ने रखा?’’

‘‘यह तो तुम ही बताओगे,’’ मैं ने कपड़े में लिपटे हुए रिवौल्वर की एक झलक उसे दिखाते हुए कहा, ‘‘इसे तुम्हारा साढ़ू चारे के ढेर से लाया है. इसे या तो तुम ने चारे में रखा होगा या फरमान ने.’’

‘‘मैं…मैं ने तो नहीं छिपाया, लेकिन…’’ वह बोलतेबोलते रुक गया, जैसे उसे कोई बात याद आ गई हो.

मैं ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘लेकिन के बाद तुम्हारी जबान को ब्रेक क्यों लग गया?’’

‘‘मुझे लगता है, यह मुराद का कारनामा है.’

मुराद के नाम से मैं चौंक पड़ा. मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या कहना चाहते हो?’’

वह माथे पर हाथ मार कर बोला, ‘‘यह बात मुझे कल रात क्यों याद नहीं आई?’’

‘‘अब याद आ गई है तो बताओ.’’

‘‘हुजूर, नहीं भूलूंगा, अब मुझे याद आया. जब मैं चारा बैलगाड़ी पर लाद रहा था तो मुराद मेरे पास आया था. उस ने कहा, ‘चाचा, लाओ घास बैलगाड़ी पर लादने में तुम्हारी मदद करता हूं.’ फिर वह चारा लादने लगा. मुझे 101 प्रतिशत यकीन है, मेरी नजर बचा कर उसी ने रिवौल्वर चारे में रख दिया होगा.’’

वह आगे बोला, ‘‘वह मेरे पास करीब साढ़े 3 बजे आया था. मैं ने उस से पूछा कि डेरे की ओर से गोलियां चलने की आवाजें आ रही थीं. सब ठीक तो है न. इस पर उस ने बताया कि उसे कुछ नहीं पता, क्योंकि वह नहर पार वाले खेतों से आ रहा है. फिर वह मेरे पास ज्यादा देर नहीं रुका. मैं भी लंगरवाल चला गया.’’

‘‘तुम ने गोलियों की आवाज मुराद के आने से पहले किस समय सुनी थी?’’

‘‘उस के आने से कोई एक घंटा पहले.’’

मैं ने फरमान और बशारत को जाने के लिए कहा, क्योंकि मुझे इस हत्या में उन का हाथ नहीं लग रहा था. उन के जाने के बाद मैं ने हवलदार से पूछा कि क्या मुराद आया था. उस ने इनकार कर दिया.

‘‘नहीं आया तो अब आएगा.’’ हवलदार मेरा इशारा समझ गया.

‘‘अभी आया सर, उसे लाता हूं.’’

‘‘देखो, 2 कांस्टेबलों को साथ ले कर सीधे चौधरी के डेरे पर जाओ. इस समय वह वहीं मिलेगा. उसे गिरफ्तार कर के ले आओ. और हां, मुराद को चौधरी से नहीं मिलने देना और न ही बात करने देना.’’

शाम से कुछ देर पहले हवलदार चमन मुराद को गिरफ्तार कर के ले आया. मैं ने पूछा, ‘‘इस सरकारी सांड को गिरफ्तार करने में कोई परेशानी तो नहीं हुई?’’

वह बोला, ‘‘परेशानी तो नहीं हुई, लेकिन अपने आप को बहुत तीसमारखां समझ रहा है. मुझे डीएसपी, एसपी की धमकियां दे रहा था.’’

‘‘तुम समझे नहीं चमन, राजा का कुत्ता भी प्रजा को बहुत नीच समझता है.’’

‘‘मेरे लिए क्या हुकुम है सर?’’

‘‘अभी तुम इसे मेरे पास छोड़ जाओ, मैं इसे शराफत का पाठ सिखाऊंगा.’’