नरमुंड का रहस्य-भाग 3 : पत्नी का खतरनाक अवैध संबंध

इस तरह टिंकू की हत्या से 4 लोगों को फायदा हो रहा था. पहला फायदा बबलू को था, क्योंकि उस की पत्नी से उस के अवैध संबंध थे. दूसरा फायदा छंगा को था, जिस ने 3 लाख रुपए में टिंकू की हत्या की बात तय कर के 2 लाख रुपए में अपने भतीजे को कौन्ट्रैक्ट दे दिया था. तीसरा फायदा शबाबुल को था, जिसे टिंकू की हत्या पर 2 लाख रुपए छंगा से मिलने थे और 2 लाख नरमुंड देने पर फरीद से मिलने थे. चौथा और सब से बड़ा फायदा गुलाब नबी और सालिम को था, क्योंकि उन्हें दिल्ली के तांत्रिक महफूज आलम से नरमुंड पहुंचाने पर 20 लाख रुपए मिलने थे और उन्होंने 2 लाख में शबाबुल से बात कर ली थी. उन्हें 18 लाख रुपए बच रहे थे.

इस के बाद बबलू टिंकू की हर गतिविधि पर नजर रखने लगा. उसे कहीं से पता चल गया था कि 9 सितंबर की रात टिंकू अपने खेत में पानी लगाने जाएगा. यह बात उस ने छंगा को बता दी. छंगा ने शबाबुल को सूचित कर दिया. पूरी योजना बना कर छंगा, शबाबुल, फरीद, गुलाब नबी और बबलू टिंकू के खेत के पास पहुंच गए. रास्ते में उन्होंने ठेके से शराब खरीदी. बबलू के अलावा उन सब ने खेत के किनारे बैठ कर शराब पी. योजना के अनुसार उन्होंने बबलू के हाथ बांघ कर वहीं बैठा दिया.

9 सितंबर, 2017 की शाम को खाना खाने के बाद यादराम ने अपने दोनों बेटों लक्ष्मण और ओमकार को खेत में पानी लगाने को कहा. क्योंकि उस दिन उन का तीसरा बेटा टिंकू डीसीएम गाड़ी में तोरई भर कर दिल्ली की आजादपुर मंडी गया था. लक्ष्मण और ओमकार अपने चचेरे भाई शिवम को भी साथ ले गए थे. वे अपने साथ टौर्च भी ले गए थे.

जब वे खेत पर पहुंचे तो उन्हें वहां 4 बदमाश मिले और बबलू उन के पास बैठा था. उस के हाथ पीछे की ओर बंधे थे. बदमाशों ने धमकी दे कर उन तीनों को भी बांध दिया. बबलू ने देखा कि उन तीनों में टिंकू नहीं है तो वह चौंका, क्योंकि उसी की हत्या के लिए तो उस ने यह ड्रामा रचा था. बदमाशों ने बबलू के साथ मंत्रणा की. बबलू ने जब देखा कि खेल बिगड़ रहा है तो उस ने बदमाशों को बता दिया कि इन में से जो बीच में है, उसी का काम तमाम कर दिया जाए. बीच में लक्ष्मण था.

इस के बाद एक बदमाश ने लक्ष्मण के हाथ खोल दिए और 3 लोग शबाबुल, फरीद और गुलाम नबी लक्ष्मण को अंधेरे में अपने साथ ले गए. छंगा राइफल लिए बाकी के पास खड़ा रहा. करीब 5 मिनट बाद वे लक्ष्मण को ले कर वापस आ गए. उन्होंने बबलू से फिर बात की और कहा कि लड़का अच्छा है. बबलू ने उन से कहा कि कोई बात नहीं, इसी का काम कर दो. तब शबाबुल, फरीद व गुलाम नबी लक्ष्मण को फिर जंगल में ले गए.

तीनों ने लक्ष्मण को जमीन पर गिरा दिया. लक्ष्मण जान पर खेल कर उन से भिड़ गया. पर वह अकेला तीनों का मुकाबला नहीं कर सका. लिहाजा बदमाशों ने उसे फिर नीचे गिरा दिया. वह उठ न सके, इस के लिए फरीद ने उस के पैर पकड़े और गुलाम नबी ने सिर के बाल पकड़ लिए. तभी शबाबुल ने फरसे से एक ही वार में उस का सिर धड़ से अलग कर दिया. लक्ष्मण चिल्ला भी न सका. उस का सिर कलम कर के वे उन बंधकों के पास आ कर बोले, ‘‘काम हो गया.’’

यह काम करने में उन्हें केवल 20 मिनट लगे थे. इस के बाद वे बंधकों को उलटा लिटा कर उन के ऊपर चादर डाल कर चले गए. वह चादर ओमकार अपने साथ घर से लाया था. शबाबुल ने लक्ष्मण का सिर गुलाम नबी तांत्रिक के हवाले कर दिया. गुलाम नबी ने कैमिकल का लेप लगा कर उस के सिर को डींगरपुर के जंगल में एक बेर के पेड़ के नीचे दबा दिया था.

करीब आधे घंटे बाद ओमकार, बबलू और शिवम ने किसी तरह खुद को खोला और तेजी से गांव की तरफ भागे. उन के शोर मचाने पर गांव वाले जंगल की तरफ बदमाशों की तलाश में निकले. जंगल में लक्ष्मण की लाश मिलने पर बबलू ने ही कुंदरकी पुलिस को फोन कर के सूचना दी थी.

इतनी बड़ी घटना को अंजाम देने के बाद भी बबलू लक्ष्मण की अंतिम क्रिया तक में साथ रहा. सभी कर्मकांडों में उस ने अपना सहयोग दिया. लक्ष्मण की चिता के फूल चुनने के समय भी वह उस के घर वालों के साथ था.

गिरफ्तार किए गए अभियुक्तों से पूछताछ कर पुलिस ने उन की निशानदेही पर फरसा भी बरामद कर लिया. अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने 2 अन्य अभियुक्तों इमरतपुर ऊधौ के राशिद और सालिम को भी गिरफ्तार कर लिया था. सालिम पूर्व ग्रामप्रधान था. इन सभी से पूछताछ के बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया.

फरार अभियुक्तों की तलाश में पुलिस ने कई स्थानों पर दबिशें डालीं, पर पुलिस को सफलता नहीं मिल सकी. इसी बीच अभियुक्त छंगा उर्फ अकबर ने 12 अक्तूबर, 2017 को मुरादाबाद की कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस ने कोर्ट में दरख्वास्त दे कर छंगा को पुलिस रिमांड पर लिया और पूछताछ कर के जेल भेज दिया था.

इस के अलावा पुलिस सीलमपुर दिल्ली के तांत्रिक महफूज आलम को भी तलाश रही थी, जिस ने 20 लाख रुपए में नरमुंड लाने की बात डींगरपुर के तांत्रिक गुलाम नबी से तय की थी. महफूज की गिरफ्तारी के बाद ही यह पता चल सकेगा कि तांत्रिक 20 लाख रुपए में उस कटे हुए सिर को खरीद कर क्या करता? पुलिस जब तांत्रिक के दिल्ली ठिकाने पर पहुंची तो वह फरार मिला. लोगों ने बताया कि महफूज तांत्रिक के पास देश के अलगअलग राज्यों से ही नहीं, बल्कि अरब के शेख भी आते थे.

इस से पुलिस को शक है कि कहीं तांत्रिक ने इस से पहले तो नरमुंड के लिए किसी की हत्या तो नहीं कराई थी. बहरहाल, पुलिस फरार अभियुक्तों की तलाश कर रही है.

अपने ही परिवार की दुश्मन

17जून, 2019 की सुबह हरवंत सिंह लगभग हांफते हुए थाना झंजेर पहुंचा. उस ने थाना इंचार्ज एसआई जुगराज सिंह को बताया कि बीती रात उस की पत्नी, बेटी और दो बेटों सहित परिवार के 4 सदस्य लापता हो गए हैं. जल्द काररवाई कर उन्हें ढूंढा जाए.

हरवंत सिंह की गिनती गांव में बड़े किसानों में होती थी और उन का परिवार शिक्षित परिवार के रूप में जाना जाता था. इसलिए पुलिस ने हरवंत सिंह की शिकायत दर्ज कर तेजी से काररवाई शुरू कर दी.

हरवंत सिंह का परिवार अजनाला अमृतसर के देहाती इलाके के थाना झंजेर क्षेत्र में पड़ने वाले गांव तेडा खुर्द में रहता था. करीब 30 साल पहले हरवंत की शादी अजनाला के ही गांव पंधेर कंभोज निवासी मंगल की बेटी दविंदरपाल कौर से हुई थी. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 28 वर्षीय बेटी शरणजीत कौर, 26 वर्षीय ओंकार सिंह और 24 वर्षीय लवरूप सिंह उर्फ लवी नाम के 2 बेटे थे.

तीनों बच्चे उच्चशिक्षा प्राप्त थे और अविवाहित थे. वे अपने कैरियर को ले कर गंभीर थे. ओंकार सिंह इन दिनों जौब के लिए आस्ट्रेलिया जाने की तैयारी कर रहा था.

16 जून की रात पूरा परिवार खाना खाने के बाद जल्दी सो गया था. अगली सुबह जब हरवंत सिंह अपने पशुओं को चारा डालने के लिए उठा तो यह देख कर हैरान रह गया कि परिवार के सभी सदस्य घर से लापता हैं. उस ने काफी देर तक अपने बीवीबच्चों को ढूंढा और उन के न मिलने पर पुलिस में सूचना दर्ज करवा दी.

गांव वालों के साथ पुलिस की समझ में भी यह बात नहीं आ रही थी कि सोतेसोते पूरा परिवार अचानक कैसे गायब हो गया. वे कहां हैं, इस के बारे में न तो हरवंत के रिश्तेदारों को कोई जानकारी थी और न ही गांव के सरपंच को. पुलिस ने गांव तेडा खुर्द जा कर पूछताछ की तो उन्हें घर के मुखिया हरवंत सिंह के बारे में कई चौंका देने वाली बातें पता चलीं.

पुलिस इस मामले में अभी और जानकारी हासिल कर ही रही थी कि 19 जून को हरवंत सिंह के साले मेजर सिंह ने झंजेर थाने पहुंच कर अपने जीजा हरवंत सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाते हुए बताया कि उस की बहन और भांजेभांजी का अपहरण हरवंत सिंह ने ही किया है. मेजर सिंह ने उन के अपहरण की कई वजह भी पुलिस को बताईं.

थाना इंचार्ज को मेजर सिंह के बयान में सच्चाई नजर आई. पुलिस ने उसी समय मेजर सिंह की तहरीर के आधार पर हरवंत सिंह, उस के भांजे कुलदीप सिंह तथा 2 और अज्ञात व्यक्तियों को नामजद करते हुए हरवंत सिंह की पत्नी दविंदरपाल कौर, बेटी शरणजीत कौर, बेटे ओंकार सिंह और लवरूप सिंह उर्फ लवी के अपहरण का मुकदमा दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी.

पुलिस पूछताछ करने जब गांव पहुंची तो हरवंत घर से लापता मिला. थाना इंचार्ज जुगराज सिंह ने इस घटना की सूचना एसपी (देहात) विक्रमजीत सिंह, एसपी (तफ्तीश) हरपाल सिंह और डीएसपी (अजनाला) हरप्रीत सिंह को भी दे दी थी.

बड़े अधिकारियों के निर्देश पर 2 पुलिस टीमें बनाई गईं. एक टीम हरवंत की तलाश में जुट गई और दूसरी टीम ने परिवार के बाकी सदस्यों को ढूंढना शुरू कर दिया.

एक गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस ने 20 तारीख को हरवंत सिंह और उस के 2 साथियों सोनू सिंह और रछपाल सिंह को गिरफ्तार कर लिया. तीनों आरोपियों को उसी दिन अदालत में पेश कर 26 तारीख तक पुलिस रिमांड पर ले लिया गया.

रिमांड के दौरान हरवंत ने अपना अपराध कबूल करते हुए बताया कि उसी ने अपने भांजे कुलदीप और 2 साथियों सोनू व रछपाल के साथ मिल कर अपने परिवार के चारों सदस्यों की हत्या कर उन की लाशें नहर में बहा दी थीं.

हरवंत का चौंका देने वाला बयान सुन कर पुलिस अधिकारी सकते में आ गए. वे इस बात पर यकीन करने को तैयार ही नहीं थे कि गबरू जवान 2 बेटों, पत्नी और बेटी की हत्या करने के बाद कोई उन्हें वहां से ले जा कर नहर में फेंक सकता है.

बहरहाल पुलिस ने हरवंत की निशानदेही पर जगदेव कलां की लाहौर नहर से दविंदरपाल कौर की लाश बरामद कर ली, जिस की शिनाख्त उस के भाई मेजर सिंह ने कर दी.

दविंदर की लाश एक बोरी में बंद थी और बोरी में ईंटें भरी हुई थीं. उस की लाश बरामद होने के बाद पुलिस को पूरा विश्वास हो गया था कि हरवंत ने अपने बयान में जो कहा है, वह सच ही होगा. उस ने वास्तव में अपने पूरे परिवार की हत्या कर दी है.

एसडीएम हरफूल सिंह गिल की देखरेख में पुलिस ने बीएसएफ के गोताखोरों की सहायता से बाकी लाशों के लिए पूरी नहर को खंगालना शुरू कर दिया. 2 दिनों की तलाश के बाद 24 जून को अलगअलग जगहों से शरणजीत कौर, ओंकार सिंह और लवरूप सिंह उर्फ लवी की लाशें भी बरामद हो गईं. पुलिस ने चारों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया.

दरअसल, पुलिस को शुरू से ही हरवंत सिंह पर संदेह था. पुलिस ने जब मामले की गहनता से जांच की तो पाया कि हरवंत के घर में बनी पशुओं के चारा खाने वाली खुरली (हौदी) की काफी ईंटें उखाड़ी हुई थीं. यह देख पुलिस को शक हुआ कि यहां कुछ न कुछ तो जरूर हुआ था, पर पुलिस के पास कोई पुख्ता सबूत नहीं था और ईंटों का गायब होना महज एक इत्तफाक भी हो सकता था.

पुलिस रिमांड के दौरान हरवंत द्वारा अपनी पत्नी, बेटी और 2 बेटों की हत्या करने की जो कहानी प्रकाश में आई, वह अय्याशी में डूबे एक ऐसे बाप की कहानी थी, जिस ने अपनी अय्याशी में रोड़ा बन रहे पूरे परिवार को ही मौत के घाट उतार दिया था.

इस जघन्य और घिनौने अपराध को अंजाम देने के लिए हरवंत सिंह की प्रेमिका व उस के भांजे कुलदीप ने भी उस का साथ दिया था.

हरवंत सिंह जवानी से ही अय्याश किस्म का था. उस के अपने गांव के अलावा आसपास के गांवों की कई औरतों के साथ नाजायज संबंध थे. शराब और शबाब उस के पसंदीदा शौक थे. जब तक उस के बच्चे छोटे थे, तब तक उसे इस सब से कोई फर्क नहीं पड़ा था. रोकने वाली केवल उस की पत्नी दविंदरपाल थी, जिसे वह डराधमका कर चुप करा दिया करता था.

लेकिन जब उस के तीनों बच्चे बड़े हुए और उन्होंने लोगों से अपने पिता की करतूतें सुनीं तो उन्होंने हरवंत को टोकना शुरू कर दिया. अपने पिता की हरकतों पर लगाम कसने के लिए उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. पंचायत से ले कर रिश्तेदारों तक को बीच में डाला, पर कोई फायदा नहीं हुआ.

हरवंत सिंह को अपने भांजे कुलदीप सिंह से बड़ा लगाव था. कुलदीप अधिकांशत: अपने मामा हरवंत के पास ही रहता था. जब कुलदीप जवान हुआ तो वह भी अपने मामा के नक्शेकदम पर चलने लगा. हरवंत को इस की बड़ी खुशी हुई कि कोई तो उस का साथ देने वाला है.

अब मामाभांजे दोनों मिल कर अय्याशी करने लगे थे. हरवंत और कुलदीप की इन हरकतों ने उस के परिवार को कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा था. जगहजगह उन की बदनामी होती थी. इसी कारण बच्चों के कहीं से रिश्ते भी नहीं आ रहे थे. जिस घर में अय्याश बाप हो, वहां कौन अपनी बेटी ब्याहना चाहेगा.

पिता की हरकतों से तंग आ कर पूरे परिवार ने उस का जम कर विरोध करना शुरू कर दिया. रोजरोज की किचकिच से गुस्साए हरवंत ने अपने भांजे कुलदीप के साथ मिल कर पूरे परिवार को ही मिटाने की योजना बना डाली. उस ने अपने 2 दोस्तों सोनू और रछपाल को भी अपनी योजना में शामिल कर लिया.

हत्याकांड को अंजाम देने के लिए उन्होंने सफेदा (यूकेलिप्टस) के पेड़ की टहनियां तोड़ीं और उन के आगे वाले हिस्से को नुकीला कर के उसे हथियार के रूप में प्रयोग किया. हरवंत सहित सभी हत्यारों के पास लकड़ी का बनाया एकएक हथियार था. इस के अलावा उन्होंने अपने साथ .32 बोर और .315 बोर की पिस्तौलें भी ले ली थीं. अपनी योजना के अनुसार 16 जून, 2019 को हरवंत ने रात के खाने की दाल में नशे की गोलियां मिला दी थीं.

16 जून की रात खाना खाने के बाद जब पूरा परिवार बेहोशी की हालत में सोया हुआ था, तब हरवंत ने कुलदीप, सोनू और रछपाल को अपने घर बुला लिया. परिवार के सभी लोग सोए हुए थे. सभी सदस्यों के सिरहाने एकएक आरोपी मोर्चा संभाल कर खड़ा हो गया.

फिर चारों ने एक साथ सब पर हमला बोल दिया. सब से पहले हरवंत ने एक ही कमरे में सोए दोनों बेटों लवरूप सिंह और ओंकार सिंह के सिर पर लकड़ी के नुकीले हथियार से हमला किया. इसी दौरान कुलदीप सिंह और अन्य ने उस की पत्नी दविंदर कौर व बेटी सिमरनजीत पर प्रहार किया.

जब चारों की मौत हो गई तो हरवंत ने कुलदीप और अपने 2 साथियों की मदद से सब से पहले खून के दागों को धोया. फिर पशुओं के चारे की खुरली से ईंटें उखाड़ कर उन की लाशों से ईंटें बांध दीं. फिर लाशों को बोरी में डाल कर जिप्सी में लादा और ले जा कर नहर में फेंक आए. लाशों के साथ ईंटें इसलिए बांधी गईं कि वे कभी ऊपर न आ सकें.

हरवंत सिंह, कुलदीप सिंह, सोनू सिंह और रछपाल सिंह की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल किए गए लकड़ी के 4 नुकीले डंडे, 2 पिस्तौल और 8 कारतूस बरामद किए गए.

हत्या के लिए बनाए गए लकड़ी के हथियार काफी वजनी थे. वहीं हरवंत की कथित प्रेमिका और एक अन्य साथी इस हत्याकांड में सीधे रूप जुड़े थे या नहीं, इस की जांच चल रही थी.

पुलिस ने हरवंत व उस के साथियों को घटनास्थल पर ले जा कर क्राइम सीन क्रिएट कर के भी जांच की थी. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद इस हत्याकांड से जुड़े आरोपियों को अदालत में पेश कर जिला जेल भेज दिया गया.द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य- सत्यकथा, नवंबर 2019

मानसिक विकृति की इंतिहा

अंधेरा घिर आया था. रुखसार घर में कामकाज में लगी थी. रात 8 बजने के बाद भी जब बाहर खेलने गया उस का बेटा फैजान घर वापस नहीं आया तो उस ने बड़ी बेटी रुखसाना से कहा कि फैजान को बुला लाए, खाना खा लेगा. फैजान मध्य प्रदेश के शहर रतलाम के राजेंद्र नगर इलाके में रहने वाले मोहम्मद जफर कुरैशी का 5 साल का बेटा था.

जफर पेशे से दरजी था. उस की दुकान हाट की चौकी के पास थी. जफर के 4 से 10 साल तक की उम्र के 4 बच्चे थे. जिस में से फैजान तीसरे नंबर का था. वह रतलाम के गांधी मेमोरियल उर्दू स्कूल में केजी वन में पढ़ रहा था.

चंचल स्वभाव का फैजान स्कूल से आते ही बस्ता फेंक कर मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलने के लिए निकल जाता था. फिर वह तब तक घर नहीं आता था, जब तक उसे कोई बुला कर न लाए.

मां के कहने पर रुखसाना फैजान को बुलाने गई लेकिन मैदान में खेल रहे बच्चों में उसे फैजान दिखाई नहीं दिया. वह घबराई हुई घर आई और अपनी अम्मी को फैजान के न मिलने की बात बता दी.

बेटी की बात सुन कर फैजान की मां रुखसार खुद उन बच्चों के पास पहुंची जो मैदान में खेल रहे थे. उस ने बच्चों से फैजान के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि फैजान तो यहां से काफी देर पहले जा चुका है. यह 13 अप्रैल, 2019 की बात है.

इतना सुनते ही वह घबरा गई. उस ने उसी समय यह जानकारी पति जफर कुरैशी को दे दी जो उस समय अपनी टेलरिंग शौप पर था. बेटे के गुम होने की जानकारी मिलते ही जफर भी घर पहुंच गया. जफर के साथसाथ मोहल्ले के कुछ लोग भी फैजान को इधरउधर खोजने लगे.

आधी रात तक फैजान का पता नहीं चला तो जफर कुरैशी अपने रितेदारों और दोस्तों के साथ हाट की पुलिस चौकी पहुंच गया. 5 वर्षीय बच्चे का लापता हो जाना गंभीर मामला था, इसलिए चौकीप्रभारी ने तत्काल इस बात की जानकारी माणक चौक थाने के टीआई रेवल सिंह बरडे को दे दी.

टीआई बरडे, एसआई दिनेश राठौर के साथ हाट की चौकी पर पहुंच गए. जफर से पूछताछ के बाद फैजान के अपहरण का मामला दर्ज कर टीआई ने टीम के साथ रात में ही उस की तलाश प्रारंभ कर दी. परंतु सुबह 8 बजे तक भी फैजान की कोई सूचना नहीं मिली.

दूसरे दिन रतलाम के एसपी गौरव तिवारी ने माणक चौक के टीआई रेवल सिंह बरडे को फैजान की खोज निकालने में तेजी लाने के निर्देश दिए. फैजान के परिवार वाले भी उस की तलाश में भटक रहे थे. पुलिस के पूछने पर जफर कुरैशी ने बता दिया था कि उस की व उस के परिवार की किसी से भी कोई दुश्मनी नहीं है.

किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए पुलिस आसपास के कुओं, नालों आदि को भी तलाश कर चुकी थी पर फैजान का कोई सुराग नहीं मिला. इस के बाद एसपी गौरव तिवारी ने एएसपी इंद्रजीत सिंह बाकलवार के नेतृत्व में सीएसपी मान सिंह ठाकुर, टीआई (माणक चौक) रेवल सिंह बरडे, टीआई (दीनदयाल नगर) वी.डी. जोशी, टीआई (नामली) किशोर पाटनवाल और एसआई दिनेश राठौर सहित 14 सदस्यीय एसआईटी का गठन कर उन्हें फैजान को खोजने की जिम्मेदारी सौंप दी.

इस टीम ने हाट रोड पर फैजान के घर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, जिस में फैजान शाम लगभग 5 बजे सड़क पर दौड़ कर एक तरफ जाता दिखाई दिया. लेकिन इस के बाद वह किसी भी कैमरे की रेंज में नहीं आया.

इस फुटेज से केवल इतना ही पता चला कि उस समय वह पास की एक दुकान पर टौफी खरीदने के लिए गया था. पुलिस ने दुकानदार से पूछताछ करने के अलावा सीसीटीवी कैमरों में कैद हुए वाहनों के नंबर के आधार पर उन के मालिकों से भी पूछताछ की लेकिन कुछ  हाथ नहीं आया. धीरेधीरे समय बीतने पर जहां लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा था, वहीं फैजान के परिवार वालों का रोरो कर बुरा हाल था.

फैजान के गायब हुए 7 दिन बीत चुके थे. वह किस के साथ कहां चला गया, इस सवाल का किसी को कोई उत्तर नहीं मिल रहा था. इधर रतलाम रेंज के डीआईजी गौरव राजपूत ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया और एसपी से अपराधियों के खिलाफ सख्त काररवाई करने के निर्देश दिए.

टीआई रेवल सिंह बरडे ने थाना क्षेत्र के कई बदमाशों को पूछताछ के लिए उठाया. इस के अलावा उन्होंने क्षेत्र के मोबाइल टावरों के संपर्क में आए हजारों मोबाइल नंबरों की भी जांच की.

दूसरी तरफ फैजान को लापता हुए लंबा समय बीत जाने पर भी न तो उस की कोई खबर मिली और न ही किसी ने फिरौती की मांग की तो पुलिस ने अपनी जांच जफर कुरैशी के परिवार की तरफ मोड़ दी.

जफर और उस के आसपास रहने वाले लोगों की गतिविधियों पर नजर रखते हुए पुलिस उन से पूछताछ करने लगी. लेकिन फिर भी कुछ हाथ नहीं आया. जिस के चलते घटना से 8 दिन बाद मामले की कमान एसपी गौरव तिवारी ने अपने हाथ में ले ली.

नौवें दिन 22 अप्रैल, 2019 को एसपी रतलाम पूरी टीम ले कर उस इलाके में पहुंचे, जहां से फैजान गायब हुआ था. इस टीम ने हाट रोड, गौशाला रोड, तोपखाना रोड, राजेंद्र नगर, कंबल पट्टी, मदीना कालोनी और सुभाष नगर इलाके के चप्पेचप्पे में फैजान को ढूंढा.

साथ ही एक बार फिर परिवार के लोगों से पूछताछ की. अब तक लगभग डेढ़ सौ लोगों से पूछताछ की जा चुकी थी. लेकिन इस के बाद भी फैजान का पता नहीं चल पा रहा था.

घटना के 11वें दिन यानी 23 अप्रैल को पूरे मामले में चौंका देने वाला नाटकीय मोड़ आ गया. एक दिन पहले एसपी गौरव तिवारी स्वयं अपनी टीम के साथ हाट रोड के चप्पेचप्पे में फैजान की खोज कर चुके थे. मगर अगले ही दिन फैजान के घर से महज 100 कदम दूर नाले में पुलिस को एक संदिग्ध बोरा मिला.

बोरे से आ रही बदबू से पुलिस समझ गई कि बड़ा खुलासा हो सकता है. हुआ भी वही. प्लास्टिक के उस बोरे को खोल कर देखा गया तो उस के अंदर 5 साल के मासूम फैजान का सड़ा हुआ शव निकला.

फैजान के मुंह और हाथोंपैरों पर टेप चिपका था. लाश को देखने से ही लग रहा था कि फैजान की हत्या हफ्ते भर पहले की जा चुकी थी.

मामला गंभीर था, इसलिए एसपी के निर्देश पर मैडिकल कालेज से एफएसएल अधिकारी डा. एन.एस. हुसैनी और जिला एफएसएल अधिकारी डा. अतुल मित्तल भी मौके पर पहुंच गए. बारीकी से जांच करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई.

इस घटना से पुलिस के सामने एक बात तो साफ हो गई कि फैजान का हत्यारा इसी बस्ती में आसपास कहीं छिपा हुआ है. क्योंकि जिस जगह पर लाश मिली थी, एक दिन पहले वहां वह बोरी नहीं थी. लापता होते समय फैजान ने टीशर्ट और हाफ पैंट पहन रखी थी. जबकि लाश के शरीर पर टीशर्ट तो वही थी, जबकि हाफ पैंट की जगह शव को जींस पहना दी गई थी. इसलिए मामले में शक की सुई परिवार की तरफ भी मुड़ रही थी.

लेकिन जिस परिवार का मासूम इस तरह दुनिया छोड़ गया हो, उस परिवार पर सीधे शक नहीं किया जा सकता. इसलिए एसपी गौरव तिवारी ने एसआईटी को मोहल्ले में रहने वाले हर शख्स की पिछले 15 दिनों की कुंडली बनाने के निर्देश दिए.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हो चुका था कि फैजान की मौत करीब 10 दिन पहले यानी उसी रोज हो चुकी थी, जिस रोज वह गायब हुआ था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मासूम के साथ दुष्कर्म किए जाने की बात सामने आई थी.

मतलब साफ था कि फैजान की हत्या करने के बाद कातिल ने शव घर में ही छिपा कर रखा था, लेकिन पुलिस की सक्रियता के कारण उसे शव को ठिकाने लगाने का मौका नहीं मिल पाया था. लेकिन जब लाश से तेज बदबू आने लगी तो उसे ठिकाने लगाना कातिल की मजबूरी हो गई थी.

फैजान का शव जिस बोरी में मिला था, उस में धागों के टुकड़े मिले थे. बोरी का मुंह भी कपड़े की चिंदी से बांधा गया था. फैजान के घर में भी सिलाई का काम होता था. इस के अलावा मोहल्ले में अधिकांश घरों में टेलरिंग का काम होता था. इसलिए सुराग की तलाश में पुलिस ने करीब 200 घरों की गहनता से तलाशी ली.

पुलिस को पता चला कि फैजान के पड़ोस में रहने वाला 19 वर्षीय सोहेल अंसारी उर्फ मोनू घटना वाले दिन रतलाम में अपने घर पर ही था. 2 दिन बाद वह बहन की शादी में शामिल होने खंडवा चला गया था, जहां से वह 22 अप्रैल को वापस आया था.

उस के लौटने के अगले दिन ही 23 अप्रैल को सोहेल के घर से कुछ ही दूर नाले में फैजान का शव मिला था. इसलिए पुलिस ने सोहेल को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. ऐसा नहीं कि पुलिस ने सोहेल से पहले पूछताछ न की हो. घटना के ठीक बाद भी पुलिस उसे उठा कर थाने लाई थी लेकिन उस समय उस की बहन की शादी की वजह से उसे थाने से भेज दिया था.

फैजान का परिवार सोहेल पर खूब भरोसा करता था. घटना के ठीक बाद जब पुलिस मोहल्ले में घरों की तलाशी ले रही थी, तब फैजान के पिता ने खुद सोहेल के घर की तलाशी लेने से पुलिस को यह कह कर रोका था कि यह हमारे घर का ही आदमी है. अब उसी सोहेल को पुलिस ने पुख्ता शक के आधार पर हिरासत में लिया था. लेकिन सोहेल इस मामले में खुद को निर्दोष साबित करने पर तुला था.

अब तक पुलिस को इस बात की जानकारी मिल चुकी थी कि सोहेल को नशा करने के अलावा मोबाइल पर अश्लील फिल्में देखने की लत थी. फैजान के साथ भी अप्राकृतिक दुष्कृत्य की पुष्टि हुई थी. इसलिए पुलिस ने सोहेल के खून का सैंपल डीएनए जांच के लिए सागर भेज दिया. इस दौरान पुलिस ने उस के घर की तलाशी ली, उस के घर में पुलिस को वैसा ही एक प्लास्टिक का बोरा मिला, जिस तरह के बोरे में फैजान का शव नाले में पाया गया था.

30 अप्रैल, 2019 को पुलिस को डीएनए की रिपोर्ट मिल गई, जिस से साफ हो गया कि फैजान के साथ दुष्कृत्य करने वाला सोहेल ही था. पुलिस ने उस के साथ सख्ती बरती तो उस ने न केवल अपना अपराध स्वीकार कर लिया बल्कि यह भी बता दिया कि उस ने फैजान की लाश घर में छिपा कर रखी थी. लाश को छिपाते समय उसे उस की बड़ी बहन कश्मीरा ने देख लिया था.

लेकिन कश्मीरा ने यह जानकारी किसी को देने के बजाए भाई को बचाने की कोशिश की. इतना ही नहीं, 22 अप्रैल की रात में लगभग 8 बजे सोहेल ने कश्मीरा की मदद से ही फैजान की लाश नाले में फेंकी थी.

इस जानकारी के बाद पुलिस ने कश्मीरा को भी गिरफ्तार कर लिया. जिस के बाद पूरी कहानी इस प्रकार सामने आई.

रतलाम के हाट रोड पर बसी बस्ती में ज्यादातर परिवार सिलाई के काम से जुड़े हैं. जफर कुरैशी भी यही काम करता था. जफर का इसी बस्ती में घर भी है, जिस के पड़ोस में सोहेल का परिवार रहता है. सोहेल आवारा किस्म का युवक था. बताया जाता है कि उसे 12 साल की उम्र से ही नशा और सैक्स की आदत पड़ चुकी थी.

उस के मोबाइल में तमाम देशीविदेशी अश्लील फिल्में रहती थीं, जिन्हें वह देखता रहता था. कई बार वह नाबालिग लड़कियों की अश्लील फिल्म दिखाते हुए अश्लील हरकतें कर चुका था. जिन में से कुछ ने उस के घर जा कर इस की शिकायत भी की थी. जिस के चलते मोहल्ले में कुछ लोगों से विवाद भी हो चुका था.

उस ने पुलिस को बताया कि उन दिनों उस की छोटी बहन की शादी खंडवा में होने जा रही थी, जिस के चलते उस का पूरा परिवार 12 अप्रैल, 2019 को खंडवा चला गया था. सोहेल को भी साथ जाना था लेकिन वह 14 अप्रैल को दोस्तों के संग आने की बात कह कर घर पर रुक गया था.

13 अप्रैल को सोहेल ने पहले तो जी भर कर नशा किया फिर अपने फोन पर अश्लील फिल्में देखनेलगा. फिल्म देखतेदेखते वह इतना उत्तेजित हो गया कि गली में किसी लड़की की तलाश करने लगा. दुर्भाग्य से इसी बीच फैजान उसे अकेला दुकान की तरफ जाते दिखा.

फैजान को देख कर उस के दिमाग का शैतान जाग उठा. उस ने फैजान को आवाज दे कर अपने घर में बुला लिया. फैजान उसे भाईजान कह कर बुलाता था, इसलिए आसानी से उस के बुलाने पर नजदीक चला गया. उसे ले कर सोहेल अंदर गया और दरवाजा बंद कर उस से मीठीमीठी बातें करते हुए उस के कपड़े उतारने लगा.

मासूम फैजान कुछ समझ नहीं सका. लेकिन इतना तो जानता था कि इस तरह से कपड़े नहीं उतारे जाते. उस ने विरोध करना चाहा तो सोहेल ने घर में पड़े टेप से उस के हाथपैर बांध दिए. वह चिल्ला न सके, इस के लिए उस ने मुंह पर भी टेप चिपका दिया. फिर वह उस मासूम के साथ अप्राकृतिक रूप से अपनी वासना शांत करने में जुट गया.

उस दौरान सोहेल इतना पागल हो चुका था कि उस ने इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि टेप से फैजान की नाक भी बंद हो गई है. इसलिए जब तक सोहेल की वासना की आग शांत हुई, मासूम फैजान की धड़कनें भी शांत हो चुकी थीं.

यह देख कर सोहेल डरा नहीं बल्कि उस ने उसी हालत में फैजान का शव उठा कर वाशिंग मशीन में डाल दिया और खुद बाहर घूमने निकल गया. इस के बाद जब मोहल्ले में फैजान के लापता होने का हल्ला हुआ तो वह भी उस के घर पहुंच गया. सब के साथ मिल कर उस ने फैजान को खोजने का नाटक किया.

दूसरे दिन बात बढ़ी तो पुलिस ने शक के आधार पर मोहल्ले के कई बदमाशों के साथ सोहेल को भी पूछताछ के लिए उठा लिया. यह खबर उस की बहन की शादी के लिए खंडवा गए उस के परिवार को पता चली तो वहां से उस की बड़ी बहन कश्मीरा रतलाम आई.

कश्मीरा घर पहुंची तो उस ने वाशिंग मशीन में रखा फैजान का शव देख लिया. लेकिन उस ने न तो इस बात की खबर पुलिस को दी और न ही किसी अन्य को. उलटे थाने जा कर छोटी बहन की शादी के नाम पर सोहेल को अपने साथ छुड़ा लाई और उसे ले कर खंडवा चली गई.

खंडवा से पूरा परिवार 22 अप्रैल को वापस रतलाम आया, जिस के बाद कश्मीरा और सोहेल ने मिल कर रात में लगभग ढाई बजे फैजान का शव बोरी में भर कर नाले में फेंक दिया. चूंकि फैजान का परिवार सोहेल पर काफी भरोसा करता था, इसलिए दोनों को विश्वास था कि पुलिस उन के ऊपर कभी शक नहीं करेगी.

लेकिन मोहल्ले में सोहेल 22 अप्रैल को वापस आया था और 23 को शव उस जगह मिला, जहां पहले ही पुलिस कई बार तलाश कर चुकी थी, इसलिए वह शक के घेरे में आ गया. बाकी का काम डीएनए रिपोर्ट के मिलान हो जाने से पुलिस को पुष्टि हो गई, जिस के बाद पुलिस ने दोनों भाईबहनों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.

 

सौजन्य- सत्यकथा, सितंबर 2019

कैक्टस के फूल

इंसुलिन भरे इंजेक्शन की छोटी सुई लगते ही रघुबीर के मुंह से सिसकारी निकल गई थी. यह उन्हें रोज सहन करना पड़ता था, क्योंकि इंसुलिन ही अब उन की जिंदगी की डोर थी. वैसे भी अब तो सावित्री के साथ जीने की लालसा ने इस कष्ट को सामान्य कर दिया था. उन की इस सिसकारी पर सावित्री ने कहा, ‘‘इतने सालों से इंजेक्शन ले रहे हो, पर सिसकारी भरना नहीं भूले. कोई छोटे बच्चे तो हो नहीं, जो इंजेक्शन लगते ही सिस्स…सिस्स… करने लगते हो.’’

‘‘सावित्री, तुम्हें मैं बड़ा लगता हूं?’’  रघुबीर ने हमेशा की तरह सावित्री से॒  कहा.  अब उन के लिए तो सावित्री ही सर्वस्व थीं. एक मित्र, साथी और प्रेमी. हां प्रेमी भी. इसीलिए तो…जबजब सावित्री चश्मा चढ़ी अपनी आंखों को फैला कर इंजेक्शन भरने लगतीं, रघुबीर एकटक उन के चेहरे को ताकते रहते और जब वह इंजेक्शन लगातीं, रघुबीर सिसकारी जरूर भरते. सावित्री को पता था रघुबीर ऐसा जानबूझ कर करते हैं. फिर भी वह यह जरूर कहतीं, ‘‘सच में इंजेक्शन से बहुत दर्द होता है?’’

इस के बाद रघुबीर के ‘न’ के साथ शुरू हुआ संवाद सावित्री की जिंदगी की डोर था.  दसदस साल बीत गए थे रघुबीर और सावित्री को इस वृद्धाश्रम में आए. यहां पहला कदम रखने का दुख अब हृदय के किसी कोने में दब कर रह गया था. जब ये आए थे, तब दोनों के पैर साथ चलते थे और अब हृदय की धड़कन भी साथ चलने लगी थी. जैसे एक की थम जाएगी तो दूसरे की भी.

‘‘मैं भी बैठ जाऊं?’’ सावित्री ने पार्क में लगे झूले पर बैठे रघुबीर से पूछा. पर रघुबीर का ध्यान तो कहीं और था. वह सामने रखे गमले में लगे कैक्टस को एकटक ताक रहे थे.

‘‘मैं भी बैठ जाऊं यहां?’’ सावित्री ने दोबारा पूछा. इस बार भी कोई जवाब नहीं मिला तो सावित्री झूले पर बैठ गईं. थोड़ी देर झूले के साथ मौन भी झूलता रहा. उस ने अचानक पैरों को जमीन पर रख कर झूले को रोक कर पूछा, ‘‘आप केवल कैक्टस को ही क्यों देखते हैं?’’

‘‘मुझे लगता है इस जीवन में मैं ने कैक्टस ही बोए हैं, इसीलिए कैक्टस मुझे अच्छा लगता है. शायद इसी वजह से यहां हूं भी.’’ अचानक झूले के रुकने से रघुबीर जैसे नींद से जगे थे.

‘‘कैक्टस में भी फूल खिलते हैं. हो सकता है यह आश्रम भी तुम्हारे लिए कैक्टस बन जाए.’’ सावित्री ने आशावादी विचार व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘कभीकभी कैक्टस से भी संबंध की शुरुआत हो सकती है.’’

रघुबीर जब से इस आश्रम में आए थे, उन के चेहरे पर उदासी छाई रहती थी. आश्रम में रहने वालों से भी वह बहुत कम बातचीत करते थे. हमेशा अकेले ही बैठे रहते थे. एक दिन रात के 2 बजे सावित्री ने झूले पर बैठे देखा. शायद उस आश्रम में सावित्री ही एक ऐसी थीं, जिन से रघुबीर कभीकभार दोचार बातें कर लिया करते थे. सावित्री ने उन के पास जा कर पूछा, ‘‘इस समय यहां क्या कर रहे हो?’’

‘‘नींद नहीं आ रही थी, इसलिए यहां आ कर बैठ गया.’’ रघुबीर ने जवाब में कहा.

‘‘नींद क्यों नहीं आ रही?’’ सावित्री ने पूछा. शायद वह उन से बातें करना चाहती थीं.

‘‘हर चीज की वजह नहीं होती.’’

‘‘होती तो है. बस हम जानना नहीं चाहते.’’ सावित्री ने रात की हवा में मिली नमी जैसी आवाज में कहा, ‘‘आप अपने मन की बात कह दीजिए, इस से मन हलका हो जाएगा. बात सुन लेने के बाद शायद मैं वजह खोज सकूं.’’

‘‘मैं मेजर डिप्रेशन का रोगी नहीं था.’’ रघुबीर ने रात को खुले आकाश में फैले अनगिनत सितारों को ताकते हुए कहा.

‘‘तो..?’’ सावित्री ने छोटा सा सवाल किया. उन्होंने डिप्रेशन शब्द न सुना हो, ऐसा नहीं था. सावित्री अध्यापिका थीं. स्वभाव से आशावादी. हर परिस्थिति को मुसकराते हुए स्वीकार करती थीं. सावित्री के इस सवाल से रघुबीर उत्तेजित हो कर बोले, ‘‘तो क्या… तो यह कि इसी बीमारी की वजह से आज मैं यहां इस वीरान वृद्धाश्रम में हूं. मैं ने अपने पोते पर हाथ उठा दिया था और जानती हो क्यों?’’ कहते हुए रघुबीर का शरीर कांप रहा था. आंखें चौड़ी और लाल हो गई थीं. उन की आंखों में ठहरी बातें पाला तोड़ कर बह रही थीं.

‘‘केवल…उस से मेरे इंसुलिन की सीरिंज टूट गई थी. मैं…मैं अभी भी उस दृश्य को देख रहा हूं, क्योंकि वह दृश्य मेरी आंखों के सामने नाचता रहता है. वह दृश्य मेरा पीछा नहीं छोड़ता.

उसी की वजह से बेटे ने मुझे अस्पताल में भरती कराया और अस्पताल से सीधे इस वीरान आश्रम में छोड़ गया. मैं ने अपने पोते पर हाथ उठाया?’’ रघुबीर ने यह अंतिम वाक्य इस तरह कहा, जैसे खुद से ही सवाल कर रहे हों. इतना कहतेकहते उन की सांस फूलने लगी थी.

उन्होंने एक लंबी सांस ले कर आगे कहा, ‘‘वह मेरा कितना खयाल रखता था, मेरे साथ कितना खुश रहता था. अपनी दादी के जाने के बाद वही एक सहारा था मेरा. मेरी लाठी था.

आप को पता है, वह रोजाना मेरे साथ मंदिर जाता था. मेरे पास बैठ कर होमवर्क करता था. कोई भी बात होती ‘दादाजी… दादाजी’ कह कर पहले मुझे बताता और मैं ने? मैं ने यह क्या किया? उस की दादी का खालीपन मुझे खा गया. अकेलापन मुझ से सहन नहीं हुआ.’’

इतना कह कर रघुबीर रोने लगे. सावित्री ने भी उन्हें रोने दिया. उन्हें तब तक देखती और उन की बातें सुनती रहीं, जब तक रघुबीर के मन की भड़ास न निकल गई. किसी को इस तरह सुनना भी एक कला है. यह कला सब के पास नहीं होती.

उस रात के बाद सावित्री रघुबीर का खयाल ही नहीं रखने लगीं, बल्कि हर तरह से उन की देखभाल भी करने लगीं. वह उन की देखभाल में कोई कसर नहीं रखती थीं. रोजाना याद कर के उन की दवाएं देना, इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना, सब वही करतीं. दोनों साथ बैठ कर भगवदगीता का पाठ करते, उस का अर्थ समझने के लिए दोनों साथसाथ लंबे समय तक पार्क में टहलते हुए चर्चा करते.

कभीकभी बातों में विरोधाभास होता तो ‘तुम ही सच्चे हो, मैं गलत हूं.’ पर बात खत्म हो जाती. इस तरह दोनों में रसीला झगड़ा भी होता. इस तरह सालों बाद रघुबीर के लिए अब यह वीरान आश्रम रंगबिरंगा, फूलों से हराभरा लगने लगा था.

एक दिन सावित्री का बेटा उन से मिलने आया. उस ने मां से घर चलने को कहा, पर वह घर जाने को राजी नहीं हुईं. उस समय रघुबीर को पता चला कि सावित्री स्वेच्छा से आश्रम में रहने आई थीं. वह तो अपने गांव में ही रहना चाहती थीं, पर उन का बेटा गांव का सब कुछ बेच कर शहर में रहना चाहता था. सावित्री सादगी से जीने की आदी थीं, इसलिए उन्होंने बेटे से कहा था, ‘‘मैं वृद्धाश्रम में रहूंगी.’’

बेटे और बहू ने बहुत समझाया कि समाज में उन की बड़ी बदनामी होगी, पर वह नहीं मानीं और वृद्धाश्रम में रहने आ गई थीं. एकांत उन की प्रवृत्ति थी. वह रहती भी एकांत में ही थीं.

पर सावित्री और रघुबीर को कहां पता था कि वृद्धाश्रम में आने के बाद उन्हें एक साथी मिल जाएगा, जिस से निरंतर बातें की जा सकेंगी, नाराज भी हुआ जा सकेगा और मनाया भी जा सकेगा. इतने सालों से साथ रहतेरहते उन के बीच सात्विक प्रेम का सेतु बंध गया था. दोनों एक बार फिर युवा हो गए थे. उन में फिर से प्रेम हो गया था और जिंदगी एक बार फिर से प्रेममय हो गई थी. प्रेम तो कभी भी कितनी भी बार हो सकता है. पर प्रेम व्यक्ति से नहीं, उस के व्यक्तित्व से होता है.

रघुबीर कभी फूल तोड़ कर सावित्री को देते तो कभी कोई माला बना कर जूड़े में लगाते थे. यह सब करने में वह जरा भी नहीं शरमाते थे. उसी तरह सावित्री भी प्रेमभाव से यह सब स्वीकार करतीं. ऐसा करते हुए वे सहज हंस भी देते. इतना ही नहीं, अब दोनों एक ही थाली में साथसाथ खाना खाने लगे थे. ऐसे में एकदूसरे को खिला भी देते. बस, एक ही कौर में पेट भर जाता.

उन दोनों के प्रेम को देख कर वृद्धाश्रम के लोग तरहतरह की बातें करने लगे थे. पर उन की बातों पर न सावित्री ध्यान दे रही थीं और न रघुबीर. दोनों खुद में ही मस्त थे. लोग कहते, ‘इस उम्र में इन्हें यह सब करते शर्म भी नहीं आती. जिस उम्र में भगवान का नाम लेना चाहिए, इन्हें देखो, ये प्रेम गीत गा रहे हैं.’

शायद उन लोगों को सावित्री और रघुबीर जो कर रहे थे, उस बात पर गुस्सा नहीं था, उन्हें उन दोनों का साथ रहना खल रहा था. उन्हें इस बात तक की ईर्ष्या थी कि उन के साथ ऐसा क्यों नहीं है.

इसी ईर्ष्या की वजह से एक बार सावित्री और रघुबीर की जिंदगी में कैक्टस उग आया था. उन लोगों ने संचालक से शिकायत की कि इस उम्र में ये दोनों यह क्या तमाशा कर रहे हैं? एक वृद्ध ने तो कहा कि अगर किसी ने इन दोनों को एक साथ देख लिया तो आश्रम को लोग जो चंदा देते हैं, देना बंद कर देंगे.

इन्हीं लोगों की बातों में आ कर संचालक ने रघुबीर और सावित्री को फोन कर के सारी बात बताई. रघुबीर के घर से तो कोई जवाब नहीं आया, कहा गया कि आप को उन के बारे में जो निर्णय लेना हो, लीजिए.

हम लोगों से कोई मतलब नहीं है. जबकि सावित्री का बेटा तो उन्हें घर ले जाना चाहता था. पर इस बार भी उन्होंने मना कर दिया. तब बेटे ने कहा, ‘‘मुझे पता नहीं था कि मम्मी इसलिए अकेली रहना चाहती थीं.’’

अंत में निर्णय लिया गया कि किसी भी तरह रघुबीर और सावित्री को आश्रम से बाहर करना है. और किया भी वही गया. निर्णय सुन कर दोनों में से किसी ने भी कारण नहीं पूछा. उन्होंने तो तय कर लिया था, कुछ भी हो, दोनों साथ रहेंगे.

आर्थिक रूप से वे सुदृढ़ थे ही, केवल शरीर से ही कमजोर थे. लेकिन दोनों के मन मजबूत थे, इसलिए तन की चिंता नहीं थी. वे खुश थे, दोनों एकदूसरे की सांस थे.

सावित्री ने आश्रम के गेट से निकलते हुए कहा, ‘‘आगे का रास्ता अब शायद कैक्टस के फूल की तरह होगा.’’

सावित्री और रघुबीर एकदूसरे का हाथ थामे आगे बढ़ते गए, बिना किसी परवाह के अनंत प्रेम की यात्रा पर…

कहानी सौजन्यसत्यकथा,  जुलाई 2019

हैवानियत में 2 मासूमों की बलि

आरिफ से हिना को 2 बच्चे महक व अर्श हुए. आरिफ दकियानूसी विचारों वाला था. जबकि हिना खुले विचारों की थी. फलस्वरूप दोनों में अकसर मनमुटाव होने लगा. इसी के चलते सन 2015 में उन का तलाक हो गया था. तलाक के बाद हिना अपने बच्चों के साथ हरिद्वार के कस्बा मंगलौर के मोहल्ला पठानपुरा में मुशर्रत के मकान में किराए पर रहने लगी थी.

पति से अलग होने के बाद हिना के सामने अपना और बच्चों का खर्च चलाने की समस्या खड़ी हो गई. इस के लिए वह शादीविवाह में डांस करने लगी. डांस के लिए उसे बच्चों को अकेला छोड़ कर जाना होता था, इसलिए उस ने अपनी छोटी बहन आरजू को अपने पास बुला लिया, ताकि वह बच्चों का ध्यान रख सके.

पहली जनवरी, 2019 को हिना मुजफ्फरनगर गई थी. घर पर उस के दोनों बच्चों के अलावा छोटी बहन आरजू थी. उसी रात हिना जब वहां से घर लौटी तो दोनों बच्चे घर पर नहीं थे. उस ने आरजू से बच्चों के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि शाम के समय अर्श और महक पास की दुकान से चौकलेट लेने गए थे, तब से वापस नहीं लौटे.

यह सुन कर हिना के होश उड़ गए. वह बोली, ‘‘वहां से कहां गए? तूने उन्हें ढूंढा नहीं?’’

‘‘मैं ने उन्हें बहुत ढूंढा, लेकिन उन का पता नहीं चला.’’ आरजू बोली.

तब तक रात के 10 बज चुके थे. इतनी रात को वह बच्चों को कहां ढूंढे, यह हिना की समझ में नहीं आ रहा था. जिस दुकान पर वे गए थे वह भी बंद हो चुकी थी. 4 साल के बेटे अर्श और 6 साल की बेटी महक की चिंता में हिना रात भर लिहाफ ओढ़े बैठी रही. बच्चों की चिंता में भूखप्यास तो दूर, उसे नींद तक नहीं आई. उस ने सारी रात जागते हुए गुजारी.

सुबह होते ही वह बच्चों की खोज में जुट गई. परचून की दुकान खुलने पर वह दुकान वाले के पास गई. दुकानदार ने बताया कि दोनों बच्चे उस की दुकान पर आए तो थे, लेकिन जब वह चौकलेट ले कर अपने घर लौट रहे थे तो उसी वक्त वहां 2 युवक आए थे. उन दोनों ने बच्चों को गोद में उठा लिया था. इस के बाद वे उन्हें एक सफेद रंग की कार में बैठा कर उन्हें ले गए. बच्चे उन के साथ इस तरह चले गए थे, मानो वे दोनों युवक उन के परिचित हों.

यह सुन कर हिना घबरा गई. उस ने सोचा कि ऐसा कौन परिचित हो सकता है, जो बच्चों को कार में बैठा कर ले गया. हिना को अपने तलाकशुदा पति आरिफ पर शक हुआ. फिर भी उस ने अपनी सभी रिश्तेदारियों में बच्चों को ढूंढा. पूरे दिन बच्चों को यहांवहां तलाशने के बाद भी जब उन का कहीं पता न चला तो हिना 2 जनवरी को ही शाम के समय हरिद्वार की कोतवाली मंगलौर पहुंच गई.

वहां मौजूद इंसपेक्टर गिरीश चंद्र शर्मा को उस ने बच्चों के गायब होने की बात बता दी.

‘‘कल शाम बच्चों का अपरहण हुआ था, वारदात को 24 घंटे होने वाले हैं. तुम ने और तुम्हारी बहन ने घटना की सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने नाराजगी भी जाहिर की.

‘‘सर, हम पहले तो बच्चों को आसपास ढूंढते रहे, इस के बाद सुबह से हम बच्चों को अपने रिश्तेदारों के घर जा कर ढूंढते रहे. जब वे वहां भी नहीं मिले तब हम यहां आए हैं.’’ हिना बोली.

‘‘ठीक है, तुम बच्चों के फोटो दे दो ताकि उन्हें तलाश करने में आसानी हो.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने कहा तो हिना ने अपने पर्स से दोनों बच्चों के फोटो निकाल कर दे दिए. हिना की तहरीर पर इंसपेक्टर गिरीश चंद्र शर्मा ने 4 वर्षीय अर्श उर्फ चांद और 6 वर्षीय महक के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर ली.

इस की जानकारी उन्होंने सीओ (मंगलौर) मनोज कत्याल, एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा व एसएसपी जन्मेजय खंडूरी को भी दे दी.

एक ही परिवार के 2 बच्चों के अपहरण की सूचना पा कर सीओ मनोज कत्याल और एसपी देहात मणिकांत मिश्रा कुछ देर में ही मंगलौर कोतवाली पहुंच गए. एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा ने इंसपेक्टर शर्मा को बच्चों के अपहरण के मामले में तेजी से काररवाई करने के निर्देश दिए.

इस के बाद कोतवाल शर्मा ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालनी शुरू कर दीं. उस वक्त शाम के 6 बज चुके थे. उसी समय हिना 2 युवकों के साथ कोतवाली पहुंची. हिना ने अपने साथ आए एक युवक का परिचय कराते हुए बताया कि इन का नाम ताबीज है. यह पास के ही गांव बुक्कनपुर में रहते हैं और मेरे पारिवारिक मित्र हैं.

दूसरे युवक का नाम हिना ने आजम बताया. वह भी गांव बुक्कनपुर में रहता था. हिना ने बताया कि वे दोनों अकसर उस के घर पर आते रहते हैं. यदाकदा उस की मदद भी करते हैं. इस के बाद इंसपेक्टर शर्मा हिना, ताबीज व आजम को ले कर एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा व सीओ मनोज कत्याल के पास पहुंचे.

उन के हावभाव से एसपी (देहात) को उन पर शक हुआ तो उन्होंने दोनों युवकों से बच्चों के अपहरण की बाबत पूछताछ की. दोनों ने बताया कि जब बच्चे गायब हुए थे तो वे अपने घरों पर थे. उन्हें बच्चों के गायब होने की जानकारी हिना से मिली थी.

काफी पूछताछ के बाद भी उन से बच्चों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. इस पर मणिकांत मिश्रा ने तत्काल उस दुकानदार को थाने बुलवाया, जिस के सामने 2 युवकों द्वारा दोनों बच्चों को गोद में उठा कर कार में ले जाया गया था.

जब दुकानदार वहां आया तो उस ने थाने में आए ताबीज व आजम को देख कर कहा कि ये दोनों ही अर्श व महक को अपने साथ ले गए थे. दुकानदार के यह बताते ही ताबीज व आजम की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. ताबीज ने पुलिस को बताया कि वे दोनों बच्चों को अपने साथ ले तो गए थे, लेकिन बच्चों को चौकलेट दिलवा कर उन्हें उन के घर के पास छोड़ दिया था.

हिना ने भी दोनों अधिकारियों को बताया कि वे दोनों उस के परिवार के हितैषी हैं. ये उस के बच्चों का अपहरण नहीं कर सकते. इस के बाद जब एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा ने हिना की बहन आरजू से फोन पर बात की तो उस ने बताया कि बच्चे चौकलेट ले कर एक बार घर आए थे. उस के बाद ही वे लापता हुए थे.

इस से पुलिस को आरजू की बातों पर भी शक होने लगा, क्योंकि उस ने पहले बताया था कि बच्चे दुकान से चौकलेट ले कर घर लौटे ही नहीं थे. इस तरह ताबीज और आजम के साथ आरजू भी संदेह के दायरे में आ गई. अधिकारियों ने उस समय उन से और पूछताछ नहीं की, बल्कि उन सभी को घर भेज दिया. इस मामले की जांच एसआई चंद्रमोहन सिंह को सौंप दी गई.

एसआई चंद्रमोहन सिंह ने एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा को बताया कि जहां से हिना के बच्चों का अपहरण होना बताया जा रहा है, वह स्थान सीसीटीवी कैमरे की रेंज में नहीं है. चूंकि ताबीज व आजम शक के घेरे में थे, इसलिए उन्होंने एसआई चंद्रमोहन सिंह को निर्देश दिए कि उन दोनों से अलगअलग वीडियो रिकौर्डिंग के साथ पूछताछ करें.

3 जनवरी, 2019 को पुलिस ताबीज व आजम को थाने ले आई. दोनों ने पुलिस को बताया कि वे पहली जनवरी को अपनी कार से हिना के घर आए थे. हिना उस वक्त घर पर नहीं थी. घर पर हिना की बहन आरजू थी. अर्श व महक को चौकलेट दिलाने के बाद वे वापस अपने घर चले गए थे.

जिस तरह से दोनों युवकों ने बताया उस से पुलिस को ऐसा लगा वे दोनों रटीरटाई बात बोल रहे हों. इसलिए कोतवाल शर्मा ने एसआई चंद्रमोहन को निर्देश दिए कि वह ताबीज को अलग कमरे में ले जा कर पूछताछ करें. खुद कोतवाल आजम से पूछताछ करने लगे.

दूसरे कमरे में जाते ही ताबीज ने स्वीकार कर लिया कि उस ने आजम के साथ हिना के दोनों बच्चों का अपहरण कर उन्हें गंगनहर में फेंक दिया था. आजम ने भी यह अपराध स्वीकार कर लिया. दोनों से पूछताछ के बाद बच्चों के अपरहण की जो कहानी सामने आई, वह प्यार की बुनियाद पर रचीबसी निकली—

मंगलौर में रहते हुए घर का खर्च चलाने के लिए हिना शादियों में डांस करने लगी थी. एक दिन हिना पिरान कलियर में एक निकाह में डांस कर रही थी. इस निकाह में गांव बुक्कनपुर निवासी ताबीज भी शामिल था. हिना को डांस करते देख ताबीज उस की अदाओं पर फिदा हो गया.

डांस समाप्त होने के बाद ताबीज ने हिना के डांस की तारीफ की. इस के बाद उस ने हिना से उस का मोबाइल नंबर भी ले लिया. इस के बाद वह जबतब हिना से बात करने लगा. कुछ दिनों बाद ताबीज ने हिना के घर भी आनाजाना शुरू कर दिया. वह जब भी जाता, हिना व उस के बच्चों के लिए कुछ न कुछ ले कर जाता था.

हिना से दोस्ती के बाद ताबीज ने उस के साथ निकाह करने के सपने भी देखने शुरू कर दिए. ताबीज के परिजन भी उस से हिना का निकाह कराने को तैयार थे लेकिन वह हिना के पहले शौहर के बच्चों को नहीं अपनाना चाहते थे.

ताबीज अच्छी तरह जानता था कि अगर उसे हिना से निकाह करना है तो हिना के बच्चों को रास्ते से हटाना होगा. इस बारे में उस ने हिना की छोटी बहन आरजू से बात की. आरजू भी दूसरी बार बहन का घर बसाने के लालच में ताबीज की इस दरिंदगी में शामिल हो गई.

घटना वाले दिन ताबीज अपनी वैगनआर कार से अपने दोस्त आजम के साथ हिना के घर के बाहर पहुंचा. वहां पर आरजू ने अर्श व महक को चौकलेट लेने के बहाने बाहर भेज दिया. बच्चे चूंकि ताबीज को पहचानते थे, इसलिए वे खुश हो कर उस के साथ कार में बैठ गए. उन मासूमों को क्या पता था कि वे दोनों उन्हें कार में बैठा कर घुमाने नहीं बल्कि मौत के घाट उतारने ले जा रहे हैं.

थोड़ी देर बाद आजम ने अर्श व महक को नशीली गोलियां मिली हुई चौकलेट खाने के लिए दीं. उस वक्त उन की कार मुजफ्फरनगर की ओर जा रही थी. कुछ ही देर में दोनों बच्चे नशे में बेसुध हो गए. जैसे ही कार गांव कुम्हेड़ा के पास गंगनहर पुल पर पहुंची तो ताबीज ने कार से दोनों बेसुध बच्चों को गंगनहर में फेंक दिया.

पुलिस ने आरजू को भी गिरफ्तार कर लिया और बच्चों के शवों की तलाश के लिए गोताखोरों की मदद ली. कई दिनों तक की खोजबीन के बाद भी दोनों बच्चों में से किसी का शव गोताखोरों को नहीं मिला. पुलिस ने ताबीज की निशानदेही पर उस के घर से अपहरण में इस्तेमाल की गई वैगनआर कार भी बरामद कर ली.

10 जनवरी, 2019 को मुजफ्फरनगर के थाना जानसठ के अंतर्गत पड़ने वाली गंगनहर की चित्तौड़ झाल पर तैनात कर्मचारी ने एक बच्ची का शव झाल में फंसा हुआ देखा, जिस की उम्र 5-6 साल थी.

उसे अखबारों की खबरों से यह पहले ही पता था कि हरिद्वार के मंगलौर थाने से 2 बच्चों का अपहरण कर उन्हें गंगनहर में फेंक दिया गया था, जिन की लाशें गोताखोर भी नहीं ढूंढ पाए थे. इसलिए उस ने फोन कर के बच्ची की लाश मिलने की सूचना फोन द्वारा मंगलौर कोतवाली को दे दी.

यह खबर मिलते ही एसआई चंद्रमोहन चित्तौड़ झाल पर पहुंचे. शव को उन्होंने पहचान लिया. वह शव महक का ही था. जरूरी काररवाई कर के उन्होंने उसे पोस्टमार्टम के लिए राजकीय अस्पताल मुजफ्फरनगर भेज दिया. बाद में पुलिस को महक की जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली, उस में उस की मौत का कारण पानी में डूबना बताया गया.

पुलिस ने ताबीज, आजम और आरजू से पूछताछ के बाद कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक ताबीज, आजम व आरजू जेल में बंद थे. पुलिस को अर्श का शव नहीं मिला था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य- सत्यकथामार्च 201

फरेबी चाहत : पत्नी ने दिया धोखा

घटना 31 दिसंबर, 2018 की है. 31 दिसंबर होने के कारण इंदौर के शाजापुर क्षेत्र में आधी रात के समय लोग शराब के नशे में डूब कर नए साल का स्वागत करने में जुटे थे. काशीनगर क्षेत्र के एक मकान से पतिपत्नी के झगड़े की तेज आवाज आ रही थी. वह आवाज सुन कर पड़ोसी डिस्टर्ब होने लगे तो एक पड़ोसी श्याम वर्मा ने कोतवाली में फोन कर झगड़े की सूचना दे दी.

जिस घर से झगड़े की तेज आवाज आ रही थी, वह मकान बलाई महासभा युवा ब्रिगेड के जिला अध्यक्ष और प्रौपर्टी डीलर रहे रमेशचंद्र उर्फ मोनू का था. उस की पत्नी मंजू भी भाजपा की सक्रिय कार्यकत्री थी.

नए साल में लड़ाईझगड़े की संभावना को देखते हुए पुलिस भी अलर्ट थी, इसलिए झगड़े की खबर सुनते ही कुछ ही देर में शाजापुर कोतवाली की मोबाइल वैन मौके पर पहुंच गई. लेकिन यह मामला पतिपत्नी के पारिवारिक झगडे़ का था तथा पतिपत्नी दोनों ही सम्मानित व जानेमाने लोग थे. इसलिए पुलिस दोनों को समझाबुझा कर थाने लौट गई.

पुलिस के जाने के बाद पतिपत्नी ने दरवाजा बंद कर लिया, जिस के बाद मकान से झगड़े की आवाज आनी बंद हो गई. फिर पड़ोसी भी अपनेअपने घरों में चले गए. लेकिन 45 मिनट बाद मोनू लहूलुहान अपने घर से निकला और पड़ोस में रहने वाले एक परिचित को ले कर शाजापुर के जिला अस्पताल पहुंचा.

मोनू के पेट से खून बह रहा था. पूछने पर मोनू ने डाक्टर को बताया कि ज्यादा नशे में होने की वजह से वह गिर गया और चोट लग गई. डाक्टर ने रमेश उर्फ मोनू को अस्पताल में भरती कर लिया. परंतु सुबह रमेश उर्फ मोनू की हालत और बिगड़ जाने के कारण उसे इंदौर के एमवाईएच अस्पताल रेफर कर दिया. उस समय मोनू के पास इतना पैसा भी नहीं था कि उसे इलाज के लिए इंदौर ले जाया जा सके, इसलिए मोनू के दोस्तों ने आपस में चंदा जमा कर कुछ रकम जुटाई और वह मोनू को इंदौर ले गए.

बलाई महासभा के युवा ब्रिगेड के बड़े नेता के घायल हो जाने की बात सुन कर समाज के लोग बड़ी संख्या में अस्पताल पहुंचने लगे. रमेश के परिवार वाले भी उस के जल्द ठीक होने की कामना करने लगे. परंतु होनी को कुछ और ही मंजूर था. 6 जनवरी की सुबह मोनू की मौत हो गई. रमेश की मौत से मामला एकदम बदल गया.

5 दिन से अस्पताल में मौजूद उस के पिता गंगाराम बेटे की मौत की खबर सुन कर टूट गए. वह रोते हुए बेटे की मौत का आरोप अपनी बहू मंजू पर लगाने लगे. उन का यह आरोप सुन कर अस्पताल के एमएस ने संयोगितागंज थाने में खबर कर दी. सूचना पा कर थाना पुलिस अस्पताल पहुंच गई. पुलिस ने जरूरी काररवाई पूरी कर के रमेश का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

प्रारंभिक पूछताछ में रमेश के पिता गंगाराम व बुआ गीता बलाई ने पुलिस को बताया कि रमेश ने खुद उन्हें बताया था कि उसे उस की पत्नी मंजू ने चाकू मारा है. लेकिन समाज में बदनामी के डर से वह गिर कर चोट लगने की बात कहता रहा.

पुलिस ने उन से मंजू के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि मंजू तो घटना के बाद से एक बार भी अपने पति को देखने अस्पताल नहीं आई. वह पति को देखने अस्पताल क्यों नहीं आई, यह बात पुलिस की समझ में नहीं आ रही थी. इस से पुलिस का मंजू पर शक गहरा गया.

संयोगितागंज थाना पुलिस ने अपने यहां जीरो एफआईआर दर्ज कर के डायरी शाजापुर कोतवाली भेज दी. यहां रमेश की हत्या किए जाने की बात सामने आने पर बलाई समाज के लोगों में भारी आक्रोश फैल गया.

समाज के लोग बड़ी संख्या में एकत्र हो कर एसपी शैलेंद्र चौहान से मिले और रमेश की पत्नी मंजू को गिरफ्तार करने की मांग करने लगे. जिस पर एसपी ने बलाई समाज के लोगों को आश्वासन दिया कि जल्द ही आरोपी को गिरफ्तार कर लिया जाएगा. तब कहीं जा कर रमेश का अंतिम संस्कार किया गया.

रमेश की चिता की आग शांत होने के बाद आरोपी की गिरफ्तारी को ले कर लोगों में गुस्से की आग फिर भड़क उठी. चूंकि मंजू भी भाजपा नेत्री थी, इसलिए पुलिस भी जल्दबाजी में कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहती थी, जिस से मामला उलटा पड़ जाए.

कोतवाली इंसपेक्टर के.एल. दांगी बड़ी ही सावधानी से एकएक कदम बढ़ा रहे थे. वरिष्ठ अधिकारियों से मशविरा करने के बाद उन्होंने मृतक रमेश की पत्नी मंजू को हिरासत में ले लिया. जब उस से रमेश की हत्या के संबंध में पूछताछ की गई तो उस ने रमेश चंद्र की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

शाजापुर के मध्यमवर्गीय बलाई परिवार में जन्मे रमेशचंद्र उर्फ मोनू की मां का देहांत उस समय हो गया था, जब रमेश बाल्यावस्था में था. मां के बिना रमेश गलत संगत में पड़ गया, जिस से मिली पिता की डांट से नाराज हो कर वह सन 1995 में घर से भाग कर गुजरात के भावनगर चला गया और वहां के एक होटल में नौकरी करने लगा.

वहां उस की मुलाकात मुंबई के एक जैन व्यापारी से हुई. होटल का काम छोड़ कर वह जैन व्यापारी के साथ चला गया. उसी दौरान उस ने ड्राइविंग सीख ली और जैन व्यापारी की कार चलाने लगा. जैन व्यापारी उन दिनों श्वेतांबर जैन संत सुरेशजी महाराज के भक्त थे और अकसर उन की सेवा करने जाया करते थे. इस दौरान रमेश भी अपने सेठ के साथ रहता था.

संयोग से एक रोज सुरेशजी महाराज ने सेठ से उन के ड्राइवर रमेश को कुछ दिन अपने साथ रखने को ले लिया. सेठजी भला अपने गुरुजी की बात कैसे टाल सकते थे. लिहाजा उन्होंने रमेश को महाराज के हवाले कर दिया. सुरेशजी महाराज के संपर्क में आ कर रमेश ने जैन धर्म को नजदीक से जाना.

धर्म में उस की रुचि देख कर सुरेशजी महाराज ने उसे दीक्षा दी और उस का नाम तरुणजी महाराज रख दिया. इस तरह रमेश की योग्यता और संयम देख कर उसे स्थानक वासी की पदवी दी गई. जिस के बाद वह देश भर में घूमघूम कर धार्मिक प्रवचन देने लगा.

उस के पिता को जब पता चला कि बेटा संत हो गया है तो वह बहुत खुश हुए. धर्म के मामले में असाधारण योग्यता के चलते रमेश ने समाज में काफी सम्मानित स्थान हासिल कर लिया था.

लेकिन उस की लाइफ काफी एक्सीडेंटल निकली. अचानक ही मालूम नहीं उस के मन को क्या आया कि वह त्याग का मार्ग छोड़ कर वापस सांसारिक दुनिया में आ गया. वह अपने घर लौट आया. बेटे के वापस घर लौटने पर पिता खुश थे.

शाजापुर आ कर रमेश ने प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया. वह ज्ञानी और धार्मिक प्रवृत्ति का था और सत्य के मार्ग पर चलने वाला भी, इसलिए लोग उस पर आसानी से भरोसा कर लेते थे. देखते ही देखते रमेश का बिजनैस चल निकला, जिस से कुछ ही समय में उस की गिनती समाज और शहर के संपन्न लोगों में होने लगी.

उसी दौरान शहर के एक थाने में पदस्थ सजातीय पुलिसकर्मी की नजर रमेश पर पड़ी. वह रमेश के साथ अपनी बेटी मंजू की शादी करना चाहता था. उस पुलिसकर्मी ने इस बारे में रमेश के पिता से बात की. लड़की सुंदर थी जो रमेश को भी पसंद थी. लिहाजा दोनों तरफ से बातचीत हो जाने के बाद रमेशचंद्र और मंजू की शादी हो गई.

मंजू खूबसूरत तो थी ही, साथ ही पढ़ीलिखी और समझदार भी थी. उन की गृहस्थी हंसीखुशी से चलती रही. इसी बीच मंजू 2 बेटों की मां बन गई. जब रमेश ने बलाई समाज की राजनीति में दखल देना शुरू किया तो अपने दोनों बेटों के बड़े हो जाने के बाद मंजू भी भाजपा से जुड़ कर उभरती नेत्री के रूप में पहचानी जाने लगी.

लेकिन रमेश की जिंदगी ने फिर एक बार करवट ली. समाज की राजनीति में ज्यादा समय देने के कारण उस का अपना बिजनैस एक तरह से ठप हो गया, जिस पर उस ने पहले तो ध्यान नहीं दिया और जब ध्यान दिया तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

धीरेधीरे स्थिति बिगड़ती गई, जिस के चलते कभी समाज को शराब जैसी बुराई से दूर रहने का उपदेश देने वाला जैन स्थानक वासी रमेश खुद शराब की गिरफ्त में आ गया. जिस के चलते रमेश की पहचान एक शराबी के रूप में बन गई.

मंजू को यह कतई उम्मीद नहीं थी कि उस का पति शराबी भी हो सकता है. लेकिन अब तो यह बात सड़कों पर भी जाहिर हो चुकी थी. इसलिए खुद की सामाजिक पहचान कायम कर चुकी मंजू के लिए यह बात असहनीय थी. उस ने पति के शराब पीने का विरोध किया तो दोनों में आए दिन झगड़ा होने लगा, जिस की आवाज धीरेधीरे उन के घर के बाहर भी गूंजने लगी.

फिर एक बार यह आवाज बाहर आई तो यह रोज का क्रम बन गया. ऐसे में एक तरफ जहां मंजू का परिवार टूट रहा था तो वहीं दूसरी ओर पार्टी में उस की पकड़ मजबूत होती जा रही थी.

दोनों के अहं टकराने लगे, जिस से रमेश और भी ज्यादा शराब पीने लगा. राजनीति में सक्रिय होने के कारण मंजू देर रात तक घर से बाहर रहती थी. ऐसे में जब कभी रमेश शराब पी कर पत्नी के घर वापस आने से पहले लौट आता तो पत्नी के देर से वापस आने पर उस पर उलटेसीधे आरोप लगाकर उस से झगड़ना शुरू कर देता.

अब मंजू को अपना राजनैतिक भविष्य स्वर्णिम दिखाई देने लगा था. उसे दूर तक जाने का रास्ता साफ दिख रहा था, इसलिए उस का वापस लौटना भी संभव नहीं था. पति के विरोध को दरकिनार कर वह राजनीति में और ज्यादा सक्रिय हो गई. हाल ही में संपन्न हुए प्रदेश के विधानसभा चुनावों में मंजू ने पार्टी के हित में दिनरात मेहनत की.

जाहिर है राजनीति में शामिल कई महिलाओं के अच्छेबुरे किस्से अकसर चर्चा में बने रहते हैं, इसलिए रमेश भी पत्नी पर इसी तरह के आरोप लगाने लगा. वह उस के राजनीति में सक्रिय रहने पर ऐतराज करता था.

इस से दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि वे एक ही छत के नीचे अलगअलग कमरों में रहने लगे. इस से दिन में तो शांति रहती लेकिन रात को रमेश के शराब पी कर आने पर सारी शांति कलह में बदल जाती थी. दोनों में रोजरोज रात में अकसर विवाद होने लगा.

31 दिसंबर, 2018 को रात 11 बजे के करीब रमेश ने शराब के नशे में आ कर घर का दरवाजा खटखटाया तो मंजू ने काफी देर बाद दरवाजा खोला. इस से रमेश को शक हो गया कि मंजू तो यह सोच कर बैठी होगी कि आज साल का आखिरी जश्न होने के कारण मैं रात भर घर वापस नहीं लौटूंगा, इसलिए उस ने किसी और के साथ पार्टी करने की योजना बना ली होगी. मंजू के देर से दरवाजा खोलने पर रमेश को शक हो गया कि मंजू के साथ घर में कोई और है.

दरवाजा खोलते ही वह पत्नी पर उलटेसीधे आरोप लगा कर मारपीट करने लगा. इस से विवाद इतना बढ़ गया कि उस का शोर पड़ोसियों के कानों तक पहुंच गया. उसी समय पड़ोसी श्याम वर्मा ने पुलिस को फोन कर दिया. पुलिस ने आ कर दोनों का मामला सुलझा दिया और वापस लौट गई.

लेकिन पुलिस के जाने के बाद एक बार फिर दोनों में विवाद गहरा गया और इस दौरान मंजू ने मोनू की जेब में हमेशा रखा रहने वाला खटके वाला चाकू निकाल कर उस के पेट में घोंप दिया. चाकू काफी गहरा जा घुसा जिस से वह गंभीर रूप से घायल हो गया. लेकिन शराब के नशे में उसे घाव की गंभीरता का अहसास नहीं हुआ इसलिए वह अपने कमरे में जा कर लेट गया.

कुछ देर बाद रमेश के पेट में दर्द बढ़ा तो पड़ोस में रहने वाले अपने परिचित के साथ वह अस्पताल गया, जहां से सुबह उसे इंदौर भेज दिया गया. लेकिन वहां भी इलाज के दौरान 6 जनवरी को उस की मौत हो गई.

थानाप्रभारी के.एल. दांगी ने मंजू से पूछताछ के बाद हत्या में प्रयुक्त चाकू भी बरामद कर लिया. इस के बाद उसे गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य- सत्यकथामार्च 2018

खून में डूबा प्यार का दामन

18वर्ष की वैष्णवी दरमियाने कद की सुंदर युवती थी. उस के पिता हरीराम गुप्ता अपने सब बच्चों से ज्यादा उसे प्यार करते थे. चूंकि वह जवान थी, इसलिए सतरंगी सपने उस के दिल में आकार लेने लगे थे. वह अपने भावी जीवनसाथी के बारे में सोचती रहती थी. कभी खयालों में तो कभी कल्पनाओं में वह उस के वजूद को आकार देने की कोशिश करती रहती.

वैष्णवी उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के संडीला कस्बे के मोहल्ला इमलिया बाग में रहने वाले हरीराम गुप्ता की बेटी थी. हरीराम के 3 बेटे थे, वेद प्रकाश उर्फ उत्तम, ज्ञानप्रकाश उर्फ ज्ञानू, सर्वेश उर्फ शक्कू और 2 बेटियां वैष्णवी और लक्ष्मी थीं.

वेदप्रकाश उर्फ उत्तम ने घर में ही बनी दुकान में किराने की दुकान खोल रखी थी. हरीराम और ज्ञानू उस की मदद करते थे. हरीराम ने तीसरे बेटे सर्वेश को एक पिकअप गाड़ी खरीद कर दे दी थी. वह उसी में सवारियां ढो कर अच्छेखासे पैसे कमा लेता था.

एक दिन वैष्णवी की मुलाकात गांव के ही रहने वाले गोविंदा से हुई तो वह उसे देखती रह गई. वह बिलकुल वैसा ही था, जैसा अक्स उस के ख्वाबोंखयालों में उभरता था. गोविंदा से निगाहें मिलते ही उस के शरीर में सनसनी सी फैल गई.

उधर गोविंदा का भी यही हाल था. वैष्णवी के मुसकराने का अंदाज देख कर उस का दिल भी जोरों से धड़क उठा. मन हुआ कि वह आगे बढ़ कर उसे अपनी बांहों में ले ले, मगर यह मुमकिन नहीं था, इसलिए वह मन मसोस कर रह गया. होंठों की मुसकराहट ने दोनों को एकदूसरे के आकर्षण में बांध दिया था. उस दिन के बाद उन के बीच आंखमिचौली का खेल शुरू हो गया.

गोविंदा भी संडीला के मोहल्ला अशरफ टोला में रहने वाले दिलीप सिंह का बेटा था. दिलीप सिंह के परिवार में पत्नी सुशीला के अलावा 2 बेटियां और 2 बेटे थे, जिस में गोविंदा तीसरे नंबर का था. दिलीप सिंह चाय का स्टाल लगाते थे.

सन 2002 में दिलीप बीमार हो कर बिस्तर से लग गए. उस समय उन के दोनों बेटे गोविंदा और आकाश पढ़ रहे थे. पिता के बीमार होने से घर की आर्थिक स्थिति खस्ता हो गई तो दोनों भाइयों को पढ़ाई छोड़नी पड़ी.

घर की जिम्मेदारी संभालने के लिए दोनों भाई कस्बे की एक गारमेंट शौप पर नौकरी करने लगे. दिलीप सिंह की बड़ी बेटी का विवाह हो चुका था. 2 बेटे और एक बेटी अविवाहित थे.

नजरें चार होने के बाद गोविंदा रोजाना वैष्णवी के घर के कईकई चक्कर लगाने लगा. वैष्णवी को भी चैन नहीं था. वह भी उस का दीदार करने के लिए जबतब बाहरी दरवाजे की चौखट पर आ बैठती.

जब नजरें मिलतीं तो दोनों मुसकरा देते. इस से उन के दिल को सुकून मिल जाता था. यह उन की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन गया था.

दिन यूं ही गुजरते जा रहे थे. दिलों ही दिलों में मोहब्बत जवान होती जा रही थी. लब खामोश थे, मगर निगाहें बातें करती थीं और दिल का हाल बयान कर देती थीं. लेकिन आखिर ऐसा कब तक चलता.

गोविंदा चाहता था कि वह वैष्णवी से बात कर के अपने दिल का हाल बता दे. पर यह बात सरेआम नहीं कही जा सकती थी. आखिर एक दिन गोविंदा को मौका मिल गया तो उस ने अपने दिल की बात उस से कह दी. चूंकि वैष्णवी भी उसे चाहती थी इसलिए मुसकरा कर उस ने नजरें झुका लीं.

प्यार स्वीकार हो जाने पर वह बहुत खुश हुआ. जैसे आजकल अधिकांश लड़के लड़कियों के पास स्मार्टफोन होता है तो वे दूसरों को दिखाने के लिए उसे हाथ में पकड़े रहते हैं. ऐसा करते हुए उस ने वैष्णवी को नहीं देखा था. फिर भी उस ने मौका मिलने पर एक दिन वैष्णवी से उस का मोबाइल नंबर मांगा. वैष्णवी ने उसे बता दिया कि उस के पास फोन नहीं है.

‘‘कोई बात नहीं, मैं जल्द ही एक फोन खरीद कर तुम्हें दे दूंगा.’’ गोविंदा ने कहा.

इतना सुन कर वैष्णवी मन ही मन खुश हुई. अगले ही दिन गोविंदा ने एक मोबाइल खरीद कर वैष्णवी को दे दिया. वैष्णवी ने उसे पहले ही बता दिया था कि मोबाइल इतना बड़ा ले कर आए, जिसे वह आसानी से छिपा कर रख सके, इसलिए गोविंदा उस के लिए बटन वाला फीचर मोबाइल ले कर आया था. उस मोबाइल को वैष्णवी ने छिपा कर रख लिया. जब उसे समय मिलता, वह गोविंदा से बात कर लेती.

दोनों ही फोन पर काफीकाफी देर तक प्यारमोहब्बत की बातें करते थे. उन की मोहब्बत दिनोंदिन बढ़ती गई. दोनों जब तक बात नहीं कर लेते, तसल्ली नहीं होती थी. उन्हें मोहब्बत के सिवाय कुछ और नजर नहीं आता था. दोनों शादी के फैसले के अलावा यह भी तय कर चुके थे कि वे साथ जिएंगे, साथ ही मरेंगे.

बात 2 जनवरी, 2019 की है. दोपहर के समय गोविंदा अपने घर आया. उस समय वह कुछ परेशान था. उस ने खाना भी नहीं खाया. गोविंदा ने अपनी छोटी बहन सोनम से सारी बातें बता देता था. उस ने वैष्णवी और अपने प्यार की बात सोनम को बता दी थी. उस दिन छोटी बहन ने गोविंदा से उस की परेशानी की वजह पूछी तो उस ने अपनी परेशानी बता दी. साथ ही उसे कसम दी कि इस बारे में घर वालों को कुछ न बताए.

इतना कह कर वह अपराह्न 3 बजे के करीब घर से चला गया. जब वह देर रात तक घर नहीं लौटा तो मां सुशीला और भाई आकाश ने उसे सारी जगह खोजा, लेकिन उस का कोई पता नहीं चला.

4 जनवरी, 2019 को सीतापुर के थाना संदना की पुलिस ने एक अज्ञात युवक की लाश बरामद की. चूंकि लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी थी, इसलिए इस की सूचना आसपास के जिलों की पुलिस को भी भेज दी गई.

गोविंदा के भाई आकाश के किसी दोस्त को वाट्सऐप पर एक लाश की फोटो मिली तो वह उस फोटो को पहचान गया. वह लाश गोविंदा की थी. उस ने वह फोटो आकाश को वाट्सऐप कर के फोन भी कर दिया. आकाश ने जैसे ही भाई गोविंदा की लाश देखी तो वह फफक कर रो पड़ा. घर के सदस्यों को पता चला तो वह भी गमगीन हो गए.

गोविंदा की छोटी बहन सोनम ने रोते हुए मां और भाई को बताया कि गोविंदा इमलिया बाग मोहल्ले में रहने वाले हरीराम की बेटी वैष्णवी से प्यार करता था. 2 जनवरी को वैष्णवी का मोबाइल उस के घर वालों ने छीन लिया था. यह बात गोविंदा को पता चली तो वह वैष्णवी के घर गया था. गोविंदा ने सोनम को कसम दी थी कि वह यह बात किसी को न बताए.

आकाश पता कर के किसी तरह वैष्णवी के घर पहुंचा तो हरीराम घर पर ही मिल गया. उस ने गोविंदा के घर पर आने की बात से साफ इनकार कर दिया.

तब गोविंदा की मां सुशीला कोतवाली संडीला पहुंच गई. उस ने इंसपेक्टर जगदीश यादव को पूरी बात बता दी. इंसपेक्टर यादव ने सुशीला से कहा कि पहले सीतापुर के संदना थाने जा कर बरामद की गई लाश देख लें. हो सकता है वह गोविंदा की न हो कर किसी और की लाश हो.

सुशीला अपने बेटे आकाश को ले कर थाना संदना, सीतापुर पहुंच गई. थानाप्रभारी ने मांबेटों को मोर्चरी में रखी लाश दिखाई तो उन्होंने उस की शिनाख्त गोविंदा के रूप में कर दी. पोस्टमार्टम के बाद गोविंदा की लाश उन्हें सौंप दी गई.

5 जनवरी की देर रात सुशीला ने संडीला कोतवाली के इंसपेक्टर जगदीश यादव को एक तहरीर दी. तहरीर के आधार पर पुलिस ने हरीराम गुप्ता और उस के बेटों वेदप्रकाश गुप्ता, ज्ञानप्रकाश गुप्ता, सर्वेश गुप्ता के अलावा दोनों बेटियों वैष्णवी और लक्ष्मी के खिलाफ भादंवि की धाराओं 147, 148, 302, 201, 342 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

चूंकि रिपोर्ट नामजद थी, इसलिए अगले ही दिन एएसपी ज्ञानंजय सिंह के निर्देश पर इंसपेक्टर यादव ने हरीराम गुप्ता, वेदप्रकाश गुप्ता और ज्ञानप्रकाश गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया. उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने आसानी से स्वीकार कर लिया कि उन्होंने ही गोविंदा की हत्या की थी. इस के बाद उन्होंने उस की हत्या के पीछे की सारी कहानी बता दी.

गोविंदा और वैष्णवी एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे. उन्होंने अपनी मोहब्बत की कहानी को घर वालों और जमाने से छिपाने की बहुत कोशिश की थी, परंतु कामयाब नहीं हो सके. उन के प्रेम संबंधों की खबर किसी तरह वैष्णवी के घर वालों को लग गई. इस के बाद वे उस पर निगाह रखने लगे.

एक दिन वैष्णवी घर पर अकेली थी. गोविंदा ने वैष्णवी को मोबाइल दे ही रखा था. उस दिन वैष्णवी ने गोविंदा को फोन कर के घर आने को कह दिया. गोविंदा उस के दरवाजे पर पहुंच गया. जैसे ही गोविंदा ने दस्तक दी, वैष्णवी ने दरवाजा खोल दिया. गोविंदा को सामने देख वह खुशी से झूम उठी.

वह उसे घर के अंदर ले गई. गोविंदा के अंदर दाखिल होते ही वैष्णवी ने दरवाजा बंद कर दिया और उस से लिपट गई. वैष्णवी की आंखों में आंसू छलक आए. गोविंदा ने उस से पूछा, ‘‘क्या हुआ वैष्णवी?’’

‘‘गोविंदा, घर में सब को हमारे संबंधों का पता चल गया है. मेरे घर वाले हमें कभी एक नहीं होने देंगे.’’ वह बोली.

‘‘ऐसा नहीं होगा वैष्णवी. तुम मेरे ऊपर विश्वास रखो. मैं जल्द तुम्हें यहां से कहीं दूर ले जाऊंगा. वहां सिर्फ हम दोनों होंगे, हमारा प्यार होगा और हमारी खुशियां होंगी.’’ गोविंदा ने भरोसा दिया.

‘‘सच कह रहे हो?’’ आश्चर्यचकित होते हुए बोली.

‘‘एकदम सच.’’ गोविंदा ने कहा. इस के बाद दोनों ने एकदूसरे को बांहों में लिया तो तनहाई के आलम में उन्हें बहकते देर नहीं लगी.

उस दिन गोविंदा काफी देर तक वैष्णवी के घर में रहा. दोनों ने जी भर कर बातें कीं और भावी जिंदगी के सपने बुने. फिर गोविंदा अपने घर चला गया.

उन की इस मुलाकात की जानकारी किसी तरह हरीराम और उस के बेटों को हो गई. वे सभी गुस्से से भर उठे और अपने घर की इज्जत नीलाम करने वाले को सबक सिखाने की ठान ली.

2 जनवरी, 2019 को हरीराम ने वैष्णवी को मोबाइल पर बात करते पकड़ लिया. हरीराम को समझते देर नहीं लगी कि वह गोविंदा से बात कर रही है और मोबाइल भी उसी का दिया हुआ है. हरीराम ने उस से मोबाइल छीन कर तोड़ दिया और उसे कई तमाचे जड़ दिए.

दूसरी ओर गोविंदा को फोन पर वैष्णवी के पिता की गुस्से से भरी आवाज सुनाई दे गई थी, क्योंकि जिस समय वैष्णवी की गोविंदा से बात चल रही थी, उसी समय हरीराम कमरे में आया था. बेटी को फोन पर बात करते देख वह दरवाजे से ही दहाड़ा था.

पिता के दहाड़ने की आवाज सुन कर गोविंदा को समझते देर नहीं लगी कि वैष्णवी के पिता ने उसे बातें करते पकड़ लिया है. वह परेशान हो उठा.

वह घर पहुंचा तो काफी परेशान था. मां सुशीला ने गोविंदा से खाना खा लेने को कहा, लेकिन उस ने खाना नहीं खाया. छोटी बहन सोनम को समझते देर नहीं लगी कि जरूर कोई बात है.

उस ने पूछा तो गोविंदा ने वैष्णवी के मोबाइल पर बात करते पकड़े जाने की बात बता दी और कहा कि वह वैष्णवी के घर जा रहा है. जाते समय उस ने सोनम को कसम दी कि यह बात किसी को न बताए. इस के बाद वह घर से निकल गया.

गोविंदा सीधे वैष्णवी के घर पहुंचा. घर पर हरीराम मिला तो वह उस से लड़ने लगा. शोर सुन कर हरीराम के तीनों बेटे वेदप्रकाश, ज्ञानप्रकाश और सर्वेश बाहर निकल आए. उन्होंने उसे दबोच लिया और पिटाई शुरू कर दी. फिर उस के मुंह पर टेप चिपकाने के बाद उस के हाथपैर बांध कर जिंदा ही बोरे में बंद कर दिया. यह सब वैष्णवी और लक्ष्मी के सामने हुआ था.

देर रात साढ़े 10 बजे सभी ने बोरे में बंद गोविंदा को सर्वेश की पिकअप गाड़ी में रख लिया. फिर वे सीतापुर की तरफ रवाना हो गए. सीतापुर के संदना थाना क्षेत्र में एक सुनसान जगह पर उन्होंने हाथपैर बंधे गोविंदा को बोरे से निकाला और साथ लाए बांके से उस का गला रेत दिया. उस की हत्या करने के बाद उन लोगों ने उस का पर्स, आधार कार्ड और बोरे को जला दिया. लेकिन वह पूरी तरह नहीं जल पाए थे.

हरीराम, वेदप्रकाश व ज्ञानप्रकाश से पूछताछ करने के बाद इसंपेक्टर यादव ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त बांका और पिकअप गाड़ी भी बरामद कर ली. इस के बाद तीनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया.

फिर 23 जनवरी, 2019 को इंसपेक्टर यादव ने वैष्णवी और सर्वेश को भी गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक लक्ष्मी की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. बाकी अभियुक्त जेल में थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य- सत्यकथामार्च 2018)

संबंधो की टेढ़ी लकीर : बिगड़ते रिश्तें

वनवारीलाल कुशवाह

उत्तर प्रदेश का शहर फिरोजाबाद चूड़ी उद्योग के रूप में पूरे विश्व में जाना जाता है. इस शहर के लाइनपार इलाके की लेबर कालोनी में 42 वर्षीय दिलीप शर्मा अपनी पत्नी आरती और बेटी के साथ रहता था. निहायत सीधासादा और मेहनती दिलीप एक चूड़ी कारखाने में काम करता था. इस से उस के परिवार की ठीक से गुजरबसर हो जाती थी.

30 दिसंबर, 2018 को वह रोजाना की तरह खाना खाने के बाद रात करीब 10 बजे टहलने के लिए घर से निकला. पति के जाते समय आरती ने कहा कि सर्दी हो रही है जल्दी घर आ जाना. इस बीच आरती लिहाफ ओढ़ कर बिस्तर पर लेट गई. लिहाफ की गर्माहट में उसे कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला.

अचानक आरती की आंखें खुलीं तो देखा पति बिस्तर पर नहीं है. दिलीप को टहलने गए हुए काफी देर हो चुकी थी. उस के घर न लौटने पर उसे चिंता हुई. उस ने फोन कर यह बात अपने जेठ अनिल शर्मा को बता दी. अनिल भाजपा का यूथ अध्यक्ष था. वह शहर की ही नई बस्ती में रहता था.

देर रात तक दिलीप के घर नहीं लौटने पर भाई व उस के परिवार के लोग चिंतित हो गए. उन्होंने मिल कर रात में ही दिलीप की तलाश शुरू कर दी. रात ढाई बजे तक वे उसे इधरउधर खोजते रहे. लेकिन उस का कोई पता नहीं चला.

अगले दिन सुबह लगभग साढे़ 7 बजे कुछ लोगों ने लेबर कालोनी के पीछे रेलवे लाइन के किनारे एक युवक की खून से सनी लाश पड़ी देखी. उन्होंने इस की सूचना जीआरपी और थाना लाइनपार को दे दी. सूचना मिलने पर फिरोजाबाद रेलवे स्टेशन से जीआरपी पुलिस वहां पहुंच गई. कुछ देर बाद थाना लाइन पार के थानाप्रभारी संजय सिंह भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस ने रेलवे लाइनों के पास पड़ी युवक की लाश का निरीक्षण किया तो उस के शरीर पर किसी नुकीले हथियार के घाव मिले. हत्यारों ने उस के गुप्तांग के साथ हाथ की उंगली भी काट दी थी. पुलिस ने जब मृतक के कपड़ों की तलाशी ली तो पैंट की जेब से उस का आधार कार्ड  मिला. इस से उस की पहचान दिलीप शर्मा पुत्र रामप्रकाश शर्मा, निवासी लेबर कालोनी फिरोजाबाद के रूप में हुई.

पुलिस ने यह सूचना दिलीप के घर भिजवाई तो रोतेबिलखते उस के घर वाले लाइन किनारे पहुंच गए. घर वालों ने उस की शिनाख्त दिलीप शर्मा के रूप में की. चूंकि मामला भाजपा कार्यकर्ता के भाई की हत्या का था. इसलिए स्थानीय विधायक से ले कर पार्टी के कई पदाधिकारी वहां पहुंच गए.

सूचना मिलने पर एसपी (सिटी) राजेश कुमार सिंह, सीओ (सदर) अजय सिंह चौहान भी वहां आ गए. जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया.

पुलिस ने जब मृतक के घर वालों से बातचीत की तो भाई ललित शर्मा ने पुरानी रंजिश के चलते 5 लोगों राजू, पवन, हरिओम निवासी नई बस्ती, फिरोजाबाद, डब्बू उर्फ दीनदयाल और गोपाल निवासी बीमलपुर, जनपद इटावा पर शक जताया. पुलिस ने ललित शर्मा की तरफ से इन 5 लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 147, 148, 149, 302 के अंतर्गत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने नामजद आरोपियों की तलाश शुरू कर दी. ललित शर्मा ने भाई की हत्या की वजह रंजिश बताई थी. जबकि लाश का मुआयना कर पुलिस को मामला अवैध संबंधों का लग रहा था. नामजद आरोपियों के बारे में कोई सूचना नहीं मिल रही थी, इसलिए पुलिस ने दूसरे एंगल से केस की जांच शुरू कर दी.

सदर विधायक मनीष असीजा ने केस का जल्द खुलासा करने के लिए एसएसपी सचिंद्र पटेल से भी मुलाकात की. दिलीप की हत्या का मामला पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन गया था. एसएसपी ने केस खोलने के लिए तेजतर्रार पुलिस कर्मियों के अलावा सर्विलांस टीम को भी लगा दिया था. एसएसपी सचिंद्र पटेल खुद इस केस का सुपरविजन कर रहे थे.

पुलिस ने दिलीप की पत्नी आरती के मोबाइल को भी खंगाला. उस के फोन नंबर की काल डिटेल्स से एक नंबर शक के दायरे में आया, जिस पर सब से ज्यादा बातें होती थीं. जब पुलिस ने उस नंबर को ट्रेस किया तो हैरानी और बढ़ गई.

जांच में वह नंबर जिला मैनपुरी के गांव रामपुरा कुर्रा निवासी गौरव का निकला. पुलिस ने गौरव की जांच की तो जानकारी मिली कि गौरव आरती की मैनपुरी में रहने वाली बुआ की ननद का बेटा है, जो रिश्ते में आरती का भाई लगता है.

पुलिस को यह भी पता चला कि गौरव का दिलीप के घर काफी आनाजाना था. लेकिन रिश्ता भाईबहन का होने के चलते पुलिस पूरी तरह संतुष्ट होना चाहती थी. इस के लिए पुलिस ने आरती की निगरानी बढ़ा दी. साथ ही वह आरती और गौरव की गहराई से जांच करने लगी. जांच में पुलिस को पता चला कि मृतक दिलीप की पत्नी आरती के गौरव से अवैध संबंध थे.

थानाप्रभारी (लाइनपार) संजय सिंह को 15 जनवरी, 2019 की सुबह मुखबिर से सूचना मिली कि आरती और उस का प्रेमी गौरव कहीं भागने की फिराक में रेलवे स्टेशन पर खड़े हैं.

इस सूचना पर थानाप्रभारी संजय सिंह कांस्टेबल प्रदीप कुमार, शिवप्रकाश व महिला कांस्टेबल प्रभादेवी को ले कर रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए. मुखबिर की सूचना सही निकली. आरती व गौरव रेलवे स्टेशन पर बुकिंग विंडो के पास मिल गए.

पुलिस दोनों को ले कर थाने आ गई. थानाप्रभारी ने आरती व गौरव से पूछताछ की. दोनों पुलिस को कुछ भी बताने को तैयार नहीं थे. चूंकि पुलिस के पास इन के खिलाफ ठोस सबूत थे, इसलिए उन से सख्ती से पूछताछ की. साथ ही उन्हें कालडिटेल्स भी दिखाई.

अंतत: गौरव ने स्वीकार कर लिया कि उस के आरती से अवैध संबंध हैं. दिलीप की हत्या क्यों की गई, इस बारे में दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने हत्या की जो कहानी बताई इस प्रकार निकली—

करीब 9 साल पहले दिलीप शर्मा की शादी फिरोजाबाद जनपद के कस्बा आसफावाद की रहने वाली आरती के साथ हुई थी. दिलीप और आरती की उम्र में काफी अंतर था. दूसरी ओर शादी से पहले से ही गौरव के साथ आरती के शारीरिक संबंध बन गए थे, जो शादी के बाद भी बने रहे.

आरती ने पति को बता रखा था कि गौरव उस का भाई है, इस के बावजूद दिलीप यही सोचता था कि आखिर वह उस के घर डेरा क्यों डाले रहता है. उस ने बातों ही बातों में कई बार गौरव को टोका भी था पर गौरव पर इस का कोई फर्क नहीं पड़ा था.

पति के ज्यादा टोकाटाकी करने पर आरती समझ गई कि अब दिलीप को उन पर शक हो गया है. इस बात को ले कर दिलीप ने एक दिन घर में काफी हंगामा भी किया.

तब आरती ने अपनी सफाई में कहा, ‘‘यह मेरा भाई है, कभीकभी घर आ जाता है तो इस में गलत क्या है?’’ इस पर दिलीप शांत हो गया. उस ने सोचा कि आरती जो कह रही है हो सकता है सच हो और वह जो सोच रहा है, वह गलत हो.

अब आरती कोई ऐसा उपाय खोजने लगी कि किसी न किसी बहाने से गौरव वहां रहता रहे. लिहाजा उस ने एक दिन गौरव से कहा, ‘‘देखो गौरव तुम्हारे बिना मेरा  यहां बिलकुल भी मन नहीं लगता. ऐसा करो कि तुम अपने जीजा से कह कर यहीं कोई नौकरी कर लो. इस से हमें मिलने में भी आसानी रहेगी.’’

एक दिन बातोंबातों में गौरव ने दिलीप से कह दिया, ‘‘जीजाजी, मेरे लायक कोई काम हो तो दिलवा दो.’’

दिलीप ने कहा कि वह कोशिश करेगा. दिलीप के सामने ही गौरव कई बार आरती से हंसीमजाक करता था. भाईबहन होने के नाते दिलीप ने इस पर ध्यान नहीं दिया.

लेकिन एक दिन किसी काम से दिलीप अचानक घर आ गया. उस समय गौरव और आरती दुनिया से बेखबर एकदूसरे में समाए हुए थे. उन्हें आपत्तिजनक स्थिति में देख कर दिलीप सन्न रह गया.

उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि भाईबहन के बीच ऐसा नाजायज रिश्ता भी होगा. उस का खून खौल उठा. वह चीखा तो दोनों के होश उड़ गए. इस बीच गौरव तेजी से वहां से भाग गया.

दिलीप ने गुस्से में पत्नी की पिटाई कर दी और हिदायत दी कि यदि उस ने गौरव को दोबारा घर में देख लिया तो परिणाम अच्छा नहीं होगा. आरती ने माफी मांग कर बात खत्म कर दी.

अब दिलीप पत्नी पर निगाह रखने लगा. वह बिना बताए कभी भी घर आ जाता था. इस से आरती परेशान हो उठी. क्योंकि अब उसे गौरव से मिलने का मौका नहीं मिल पा रहा था. एक दिन पति के शहर से बाहर जाने पर आरती ने गौरव को फोन कर बुला लिया.

आरती ने गौरव को बताया, ‘‘गौरव, अब दिलीप हम लोगों को कभी मिलने नहीं देगा. लेकिन मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. वह जबतब मेरी पिटाई कर देता है. अब हमें कुछ करना पड़ेगा, नहीं तो यह पीटपीट कर मेरी जान ही ले लेगा.’’

गौरव कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘बताओ, इस का उपाय क्या है?’’

‘‘करना क्या है, इसे रास्ते से हटाना पड़ेगा, नहीं तो वह हम दोनों को जुदा कर देगा.’’ आरती ने कहा.

‘‘ठीक है इस का इंतजाम कर लेंगे.’’ गौरव ने भरोसा दिया.

इस के बाद आरती और गौरव ने दिलीप को ठिकाने लगाने की योजना बना ली. योजना के अनुसार 30 दिसंबर, 2018 को आरती ने फोन पर गौरव को बुला लिया.

दिलीप खाना खाने के बाद करीब 10 बजे रोज की तरह टहलने के लिए निकला. योजना के अनुसार गौरव उसे वहीं मिल गया.

दिलीप गौरव से खुंदक खाए हुए था, लिहाजा उस ने दिलीप के पैर पकड़ कर उस से माफी मांग ली. दिलीप शांत हो गया. गौरव उसे अपनी बातों में उलझा कर लेबर कालोनी के पीछे रेलवे ट्रैक के पास ले गया. इस बीच योजना के अनुसार दिलीप के पीछेपीछे आरती भी वहां पहुंच गई.

मौका देखते ही गौरव ने आरती के सामने ही दिलीप पर चाकू से ताबड़तोड़ वार किए. जान बचने के लिए दिलीप ने जब भागने की कोशिश की तो आरती ने उस के बाल पकड़ कर गिरा दिया. ट्रेनों की आवाजाही में दिलीप की चीख गुम हो गई.

हत्या के बाद घटना को दूसरा रूप देने के लिए गौरव ने उस का लिंग और हाथ की अंगुली भी काट ली. उस की लाश वहीं रेलवे लाइन के पास डालने के बाद गौरव मैनपुरी भाग गया जबकि आरती अपने घर चली गई.

आरती और गौरव से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल छुरी और हत्या के वक्त पहने हुए दस्ताने बरामद कर लिए.उन से पूछताछ के बाद पुलिस जब उन्हें जेल ले कर जा रही थी तो आरती रोने लगी. वह बोली, ‘‘हम दोनों को जेल में साथसाथ ही रखना. हम अलग नहीं रह पाएंगे.’’

आरती ने जिस के साथ सात फेरे लिए साजिश के तहत उसे ही अपने प्रेमी के साथ मिल कर मौत की नींद सुला दिया. एक सीधासादा पति अपनी पत्नी के अवैध संबंधों की भेंट चढ़ गया. आरती और गौरव ने भाईबहन के रिश्ते को कलंकित कर दिया.

साथ ही अपना बसाबसाया घर भी उजाड़ लिया. आरती के इस कृत्य से उस की बेटी को मांबाप का प्यार नहीं मिल सकेगा. फिलहाल ननिहाल वाले उसे अपने साथ ले गए.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य- सत्यकथा, नवंबर 2018

6 महीने भी न चल सका 7 जन्मों का रिश्ता

अब हमें शादी कर लेनी चाहिए. क्योंकि अब मेरा तुम्हारे बिना रहना संभव नहीं है. अगर तुम ने शादी में देर कर दी तो कहीं मेरे घर वाले किसी दूसरे से मेरी शादी न कर दें.’’

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के निशातगंज की रहने वाली स्मिता विशाल से प्यार करती थी और उस से शादी करना चाहती थी. जबकि विशाल और स्मिता की उम्र में करीब 8 साल का अंतर था. विशाल देखने में स्लिम था, इसलिए उस की उम्र का पता नहीं चलता था.

विशाल को स्मिता से शादी करने में कोई दिक्कत नहीं थी. लेकिन वह चाहता था कि स्मिता अपनी पढ़ाई पूरी कर ले और उस की उम्र शादी लायक हो जाए. क्योंकि दोनों की जातियां अलगअलग थीं. इसलिए दोनों के ही घर वाले इस शादी के लिए राजी नहीं थे. उन्हें कोर्ट में शादी करनी पड़ती, जिस के लिए स्मिता का बालिग होना जरूरी था.

स्मिता के घर वालों को जैसे ही विशाल और उस के प्यार के बारे में पता चला था, उन्होंने स्मिता के लिए घरवर की तलाश शुरू कर दी थी. वे उस की शादी जल्द से जल्द कर देना चाहते थे. इसी से स्मिता चिंतित थी और विशाल पर शादी के लिए दबाव डाल रही थी.

विशाल उत्तर प्रदेश के जिला लखीमपुर के गोला गोकरणनाथ स्थित बताशे वाली गली के रहने वाले आशुतोष सोनी का बेटा था. आशुतोष सोनी की वहां ज्वैलरी की दुकान थी. विशाल का छोटा भाई विकास पिता के साथ दुकान संभालता था, जबकि बड़ा भाई गौरव लखनऊ में रहता था. वह वहां किसी स्कूल में अध्यापक था.

विशाल और स्मिता की दोस्ती, जो प्यार में बदल गई विशाल खुद अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता था, इस के लिए उस ने गहने बनाने का काम सीखा और लखनऊ की एक ज्वैलरी शौप में नौकरी कर ली. निशातगंज की जिस दुकान में विशाल काम करता था, स्मिता वहां आतीजाती थी. इसी आनेजाने में दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई तो जल्दी ही उन में दोस्ती हुई और फिर यही दोस्ती प्यार में बदल गई.

स्मिता जब विशाल पर शादी के लिए कुछ ज्यादा ही दबाव डालने लगी तो उस ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘स्मिता हमें आज नहीं तो कल शादी करनी ही है. जबकि हमें पता है कि हमारी शादी का हमारे घर वाले विरोध कर रहे हैं. मैं अपने घर वालों की उतनी चिंता नहीं करता, जितनी तुम्हारे घर वालों की करता हूं. अगर हम ने घर वालों की इच्छा के विरुद्ध जा कर शादी कर ली तो मुझे तुम्हारे सहयोग की जरूरत पडे़गी. क्योंकि शादी के बाद तुम्हारे घर वाले पुलिस में शिकायत कर सकते हैं. तब तुम बदल तो नहीं जाओगी?’’

‘‘तुम्हारे घर वाले भले ही इस शादी का विरोध न करें, पर मेरे घर वाले इस शादी के लिए कतई तैयार नहीं हैं. रही बात बदल जाने की तो कान खोल कर सुन लो, मैं इस जन्म की ही बात नहीं कर रही, 7 जन्मों तक तुम्हारा साथ नहीं छोडूंगी.’’ इतना कह कर स्मिता ने विशाल को गले लगा लिया.

स्मिता बालिग हो गई तो कुछ दिनों तक तैयारी कर के स्मिता और विशाल ने अप्रैल, 2017 में लवमैरिज कर ली. विशाल के घर वाले तो केवल उस से नाराज ही हुए, स्मिता के घर वालों ने तो उस से रिश्ता ही खत्म कर लिया, वे विशाल को धमकियां भी देने लगे. विशाल और स्मिता के एकजुट होने से धीरेधीरे उन का विरोध तो खत्म हो गया, पर उन दोनों का ही अपनेअपने घर वालों से कोई संबंध नहीं रह गया.

स्मिता और विशाल का प्यार जब कलह में बदल गया शादी के बाद विशाल और स्मिता अकेले पड़ गए थे. घर वालों से पूरी तरह से संबंध खत्म होने की वजह से गृहस्थी के खर्च का सारा बोझ विशाल के कंधों पर आ गया था. घर के किराए से ले कर खानेपहनने की पूरी व्यवस्था विशाल को अकेले करनी पड़ रही थी, जिस की वजह से उसे दुकान पर ज्यादा से ज्यादा काम करना पड़ रहा था.

विशाल मेहनती और व्यवहारकुशल तो था ही, गंभीर भी था. जबकि स्मिता उस के उलट चंचल स्वभाव की थी. वह अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी, इसलिए विशाल को उस की पढ़ाई का भी खर्च उठाना पड़ रहा था. जबकि स्मिता ने कोई जिम्मेदारी नहीं उठा रही थी. वह खाना भी बाहर से ही मंगाती थी. शादी के बाद उस के शौक भी बढ़ गए थे.

नहीं बैठ सका विशाल और स्मिता में सामंजस्य विशाल को घर खर्च के अलावा स्मिता की पढ़ाई, उस के शौक और अन्य दूसरे खर्चे भी उठाने पड़ रहे थे. स्मिता को घर के कामकाज भी नहीं आते थे, जिस से विशाल को काफी परेशानी होती थी. परेशान हो कर एक दिन विशाल ने कहा, ‘‘स्मिता रोजरोज बाजार का खाना ठीक नहीं है. तुम कुछ भी बना लिया करो. मुझे दुकान पर जाना होता है. घर में खाना न बनने से बाजार से पूड़ीसब्जी मंगाता हूं. बाहर से खाना मंगाता हूं तो दोस्त कहते हैं कि घर में बीवी है, फिर भी बाजार का खाना खाते हो.’’

लेकिन स्मिता पर विशाल की इन बातों का कोई असर नहीं हुआ. वह सुबह देर तक सोती रहती थी. अकसर वह विशाल के दुकान पर जाने के बाद ही सो कर उठती थी. रात में 9 बजे वह घर आता तो स्मिता उस से बाहर चल कर खाने को कहती.

उस के इस व्यवहार से विशाल को गुस्सा तो बहुत आता था, पर वह कुछ कह नहीं पाता था. कभी कुछ कहता तो स्मिता सीधे कहती, ‘‘शादी से पहले तो तुम रोज बाहर खाने के लिए कहते थे. अब मैं बाहर खाने के लिए कहती हूं तो नाराज हो जाते हो.’’

‘‘स्मिता, शादी से पहले हम कुछ देर साथ रहने के लिए खाना खाने के लिए बाहर जाते थे. अब हम साथसाथ रहते हैं तो हमें घर पर ही खाना बनाना चाहिए. घर में बना कर खाने से पैसे भी कम खर्च होेते हैं और स्वास्थ्य भी ठीक रहता है.’’

‘‘विशाल, तुम तो जानते हो कि मुझे खाना बनाना नहीं आता. दाल खराब बन गई तो मैं खुद ही खाना नहीं खा पाऊंगी. इसलिए बाहर खा लेना ही ठीक रहेगा.’’ स्मिता कहती.

न चाहते हुए विशाल को स्मिता की बात माननी पड़ती. शादी से पहले स्मिता का जो व्यवहार विशाल को अच्छा लगता था, अब वही खराब लगने लगा था. वह स्मिता की बातों से तनाव में आ जाता, जिस की वजह से दोनों में झगड़ा होने लगता.

शादी के बाद धीरेधीरे पतिपत्नी के बीच जहां सामंजस्य बैठता है, वहीं विशाल और स्मिता के बीच तनाव और टकराव रहने लगा था. खर्च बढ़ने की वजह से विशाल को साथियों से कर्ज लेना पड़ा. वह परेशान रहता था कि अगर खर्च इसी तरह होता रहा तो वह कहां से पूरा करेगा.

खर्च को ले कर ही विशाल और स्मिता के बीच झगड़ा बढ़ता गया. खर्च पूरा होता न देख, स्मिता विशाल से वह नौकरी छोड़ कर कहीं ज्यादा वेतन वाली नौकरी करने को कहने लगी. एक दिन तो स्मिता ने विशाल के मालिक को फोन कर के कह भी दिया कि अब विशाल उन के यहां नौकरी नहीं करेगा.

विशाल को यह बात अच्छी नहीं लगी. इस से वह काफी परेशान हो उठा. स्मिता की हरकतों से तंग आ कर उस ने अपने साथियों को अपने घर वालों के मोबाइल नंबर नोट करा दिए कि अगर कभी उसे कुछ हो जाता है तो वे उस के घर वालों को खबर कर देंगे.

इस तरह सब खत्म हो गया   26 सितंबर, 2017 की सुबह की बात है. विशाल दुकान पर जाने को तैयार हो रहा था, तभी स्मिता उस से लड़ने लगी. गुस्से में उस ने विशाल का फोन छीन कर उस की दुकान के मालिक को फोन कर दिया कि आज से विशाल उन की दुकान पर काम नहीं करेगा.

मालिक ने दूसरी ओर से कहा, ‘‘तुम विशाल से मेरी बात कराएं, क्योंकि तुम्हारी बात पर मुझ से यकीन नहीं है.’’

विशाल फोन मांगता रहा, पर स्मिता ने उसे फोन नहीं दिया. विशाल को यह बात काफी बुरी लगी. नाराज हो कर वह बाजार गया और वहां से नैप्थलीन की गोलियां खरीद लाया. उस ने स्मिता के सामने ही कई गोलियां निगल लीं. इस से स्मिता घबरा गई. उस की समझ में नहीं आया कि अब वह क्या करे?

गोलियों ने अपना असर दिखाना शुरू किया. विशाल के मुंह से झाग निकलने लगा. घबराई स्मिता ने विशाल की दुकान के मालिक को फोन कर के बता दिया कि विशाल ने जहर खा लिया है.

इतना कह कर स्मिता ने तुरंत फोन काट दिया. इस के बाद दुकान के मालिक ने फोन किया तो उस ने फोन रिसीव नहीं किया, जिस से दुकान का मालिक भी घबरा गया. उस ने तुरंत दुकान पर काम करने वाले 2 लड़कों को स्मिता की मदद के लिए उस के घर भेज दिया. लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि विशाल रहता कहां है. जब तक पूछतेपूछते वे विशाल के घर पहुंचे, उस की हालत खराब हो चुकी थी.

स्मिता को कुछ समझ में नहीं आया तो डर कर उस ने भी बची हुई गोलियां खा लीं. विशाल के साथ काम करने वाले प्रदीप और नसीम जब उस के घर पहुंचे तो मकान मालिक को विशाल के जहर खाने वाली बात बताई. मकान मालिक दोनों को साथ ले कर पहली मंजिल पर स्थित विशाल के कमरे पर पहुंचा तो दरवाजा अंदर से बंद मिला.

किसी तरह उन्होंने दरवाजा खोला तो विशाल और स्मिता फर्श पर बेहोश पड़े मिले. स्मिता की चूडि़यां कमरे की फर्श पर बिखरी पड़ी थीं. दोनों के मोबाइल फोन और चप्पलें पड़ी थीं. एक मोबाइल फोन टूटा पड़ा था. नैप्थलीन की कुछ गोलियां फर्श पर बिखरी पड़ी थीं. प्रदीप और नसीम ने यह बात दुकान के मालिक अनुराज अग्रवाल को बताई तो उन्होंने पुलिस को फोन कर दिया.

पूरा न हुआ 7 जन्मों तक साथ निभाने का वादा घटना की सूचना पा कर थाना गाजीपुर के एसएसआई ओ.पी. तिवारी, एसआई कमलेश राय अपनी टीम के साथ विशाल के कमरे पर पहुंचे तो दोनों को मरा समझ कर ले जाने लगे. लेकिन तभी उन्हें लगा कि विशाल की सांसे चल रही हैं. इस के बाद उन्हें रामनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया. घटना की सूचना थानाप्रभारी गिरिजाशंकर त्रिपाठी को दी गई तो वह भी अस्पताल पहुंच गए.

शादी के 6 महीने के अंदर ही युवा दंपत्ति द्वारा इस तरह जान देने की बात पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा था. पुलिस ने जांच शुरू की तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि उन की मौत नेप्थलीन की गोलियां खाने से हुई थी. इस के बाद पुलिस ने मान लिया कि दोनों ने आत्महत्या ही की है. पुलिस ने इस मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी.

विशाल के भाई का कहना था कि विशाल ने अपनी परेशानी कभी किसी से नहीं बताई. शादी के बाद वह तनाव में रहता था, यह बात उन्हें विशाल के दोस्तों से पता चली थी. जिस स्मिता के लिए विशाल ने अपना घरपरिवार छोड़ कर 7 जन्मों तक साथ निभाने का वादा किया था, वह उस के साथ 6 महीने भी नहीं बिता सका.

कई बार प्यार में अंधे हो कर लोग ऐसे बंधन मे बंध जाते हैं कि उस को निभाना मुश्किल हो जाता है. प्यार करने वाले अगर शादी करते हैं तो उन्हें स्थितियों से निपटने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.

प्यार में एकदूसरे का साथ देने की कसमें खाना तो आसान है, लेकिन शादी के बाद जिम्मेदारियां पड़ती हैं तो पता चलता है कि प्यार के बाद शादी क्या चीज होती है. इसलिए काफी सोचसमझ कर ही प्यार के बाद शादी करनी चाहिए.   ?

सौजन्य- सत्यकथा, नवंबर 2017

तलाक के बाद : परिवार कैसे हुआ बर्बाद

साधु आश्रम रोड पर पनैठी से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर जली हुई एक कार खड़ी है, जिस में एक लाश पड़ी है. सूचना मिलते ही डा. विनोद कुमार उस स्थान पर पहुंच गए, जहां जली हुई कार खड़ी होने की बात बताई गई थी.

जहां वह जली हुई कार खड़ी थी, वह इलाका सुनसान था. दूरदूर तक कोई बस्ती नहीं थी. शाम होते ही उधर आनाजाना बंद हो जाता था. इस से थानाप्रभारी ने अंदाजा लगाया कि इस कार को कहीं बाहर से ला कर यहां जलाया गया है. घटनास्थल के निरीक्षण में उन्हें कार से कुछ दूरी पर शराब और पैट्रोल की बोतलें पड़ी मिलीं. इस से लगा कि वारदात को अंजाम देने में कई लोग शामिल थे.

इस से पुलिस को लगा कि हत्यारे मृतक के दोस्त रहे होंगे. किसी बात पर आपस में झगड़ा हुआ होगा और मारपीट में इस की मौत हो गई होगी. अपराध छिपाने के लिए इसे यहां ला कर कार सहित जला दिया गया होगा. कार की नंबर प्लेट सलामत थी. डा. विनोद कुमार ने घटना की जानकारी एसएसपी राजेश पांडेय को दे दी थी. इस के बाद कार के नंबर के आधार पर मृतक के बारे में पता किया गया.

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मृतक का नाम रिजवान था. वह दिल्ली का रहने वाला था, जहां उस का बिल्डिंग बनाने का कारोबार था. शिनाख्त होने के बाद घटना की जानकारी उस के घर वालों को दे दी गई थी. इस के बाद उसी दिन घटना की सूचना देने वाले अर्जुन सिंह की ओर से अपराध संख्या 445/2017 पर धारा 302, 201, 427 के अंतर्गत रिजवान की हत्या का मुकदमा थाना हरदुआगंज में दर्ज हो गया.

सूचना पा कर मृतक रिजवान के घर वाले अलीगढ़ पहुंच गए थे. पुलिस को कार की तलाशी में लाश के साथ एक जला हुआ मोबाइल फोन मिला था. घर वालों के पहुंचने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर कार में मिला सामान जब्त कर लिया था.

पुलिस ने घर वालों से पूछताछ शुरू की. घर वालों का कहना था कि उन्हें पता नहीं कि रिजवान यहां कैसे पहुंचा. वह तो अलीगढ़ जाने की बात कह कर घर से निकला था. उस ने कहा था कि अलीगढ़ में उसे किसी से डेढ़ लाख रुपए लेने हैं.

पूछताछ में पुलिस को पता चला कि रिजवान ने 2 शादियां की थीं. दोनों पत्नियों से उस का तलाक हो चुका था. दूसरी पत्नी शाजिया परवीन से विवाद के कारण तलाक हो गया था. शाजिया ने रिजवान के खिलाफ थाने में रिपोर्ट भी दर्ज करा रखी थी, जिस से रिजवान को जेल जाना पड़ा था. 16 दिन पहले ही वह जमानत पर जेल से बाहर आया था.

रिजवान की 2-2 तलाकशुदा बीवियों की जानकारी मिलने पर पुलिस की जांच का दायरा बढ़ गया. दोनों ही बीवियां शक के घेरे में थीं. रिजवान की दूसरी बीवी शाजिया परवीन अध्यापिका थी, जिस की पोस्टिंग उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर के एक सरकारी स्कूल में थी.

घर वालों से थानाप्रभारी डा. विनोद कुमार ने विस्तार से पूछताछ की. शाजिया परवीन और उस के घर वालों से भी पूछताछ की गई. पुलिस ने मृतक रिजवान की पहली पत्नी नाजरीन के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया था. क्योंकि उस की हरकतों से पुलिस को उस पर शक हो गया था. पुलिस की समझ में आ गया था कि कातिल इलाके की भौगोलिक स्थिति से परिचित थे, इसीलिए उन्होंने घटना को यहां अंजाम दिया था.

सर्विलांस द्वारा पुलिस को पता चला कि नाजरीन की सोनू से लगातार फोन पर बातें हो रही हैं. सोनू गाजियाबाद का रहने वाला है. पुलिस ने दोनों की बातचीत सुन कर पुलिस को पता चल गया कि सोनू नाजरीन का प्रेमी है. घर वालों ने भी इस की पुष्टि कर दी थी. पुलिस के सामने कुछ नाम और भी आए, जिस में एक शाहरुख था, जो नाजरीन का भाई था. इस के अलावा अफरोज और आशु के नाम भी थे.

थानाप्रभारी ने गाजियाबाद पुलिस से संपर्क किया तो पता चला कि सोनू और अफरोज 25 आर्म्स एक्ट के तहत अपनी गिरफ्तारी दे चुके हैं, जिन में से अफरोज को जेल भेजा जा चुका था. डा. विनोद कुमार ने तुरंत सोनू को जेल भेजने से रुकवाया और गाजियबाद पहुंच कर उसे हिरासत में ले लिया. सोनू को ले कर पुलिस हरदुआगंज आ गई.

सोनू से सख्ती से पूछताछ की गई तो पता चला कि रिजवान की हत्या में उस की प्रेमिका और रिजवान की पूर्वपत्नी नाजरीन भी शािमल थी.

इस के बाद पुलिस ने नाजरीन को भी हिरासत में ले लिया. पूछताछ में पहले तो वह इधरउधर की बातों से पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करती रही, लेकिन जब उसे बताया गया कि सोनू गिरफ्तार हो चुका है और उस ने सच्चाई बता दी है. यह पता चलते ही वह डर गई और उस ने हकीकत बता दी. दोनों से की गई पूछताछ के बाद रिजवान की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी—

मोहम्मद सुलतान मूलरूप से आलमबाग, अलीगढ़ के के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे और 5 बेटियां थीं. रोजीरोटी के सिलसिले में करीब 25 साल पहले वह दिल्ली आ गए थे. दिल्ली की एक कंपनी में सुरक्षागार्ड की नौकरी कर के वह अपने परिवार का पालनपोषण करने लगे.

बच्चे जवान हुए और कारोबार से लग गए. बड़ा बेटा रिहान उबेर कैब में टैक्सी चलाने लगा तो रिजवान ने बिल्डिंग बनाने का काम शुरू कर दिया, फरहान किसी कंपनी में नौकरी करने लगा. बेटों के काम पर लगने से सुलतान का परिवार सुखी और संपन्न हो गया. उस ने मुरारी रोड बटला हाउस में अपना मकान बनवा लिया. परिवार में सब कुछ ठीकठाक था, लेकिन समय कब करवट ले ले, इस की खबर किसी को नहीं होती.

बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन के काम से रिजवान की अच्छी कमाई हो रही थी. उस के लिए रिश्ते की तलाश शुरू हुई. किसी के माध्यम से दक्षिणपूर्वी दिल्ली के शाहीनबाग निवासी साबिर अली की बेटी नाजरीन से शादी का प्रस्ताव आया. दोनों तरफ से बातचीत के बाद उन का रिश्ता तय हो गया. फिर जल्दी ही रिजवान और नाजरीन का निकाह हो गया. यह सन 2008 की बात है.

निकाह के कुछ दिनों बाद ही नाजरीन के व्यवहार में बदलाव आ गया, जिस की वजह से घर में कलह रहने लगी. दरअसल, नाजरीन पति के संयुक्त परिवार से अलग रहना चाहती थी. इसी बात को ले कर वह रिजवान से लड़तीझगड़ती रहती थी, जबकि रिजवान घर वालों से अलग नहीं होना चाहता था. पर पत्नी की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा. उस की बात मानते हुए उस ने ओखला विहार में किराए का एक फ्लैट ले लिया और उसी में नाजरीन के साथ रहने लगा.

नाजरीन और रिजवान भले ही संयुक्त परिवार से अलग रहने लगे थे, पर उन के रिश्ते मधुर नहीं हो पाए. इस की वजह यह थी कि रिजवान को नाजरीन का किसी से मिलनाजुलना या बातचीत करना पसंद नहीं था. रिजवान नाजरीन पर अंकुश लगाना चाहता था, जबकि नाजरीन को अपनी आजादी में रिजवान का दखल पसंद नहीं था. इसी वजह से उन के दांपत्य में तनाव रहने लगा. उसी बीच नाजरीन एक बेटी की मां बन गई. उस का नाम रखा गया फलक.

रिजवान फलक से बेहद प्यार करता था, पर बेटी के आने के बाद भी मांबाप के रिश्ते नहीं सुधर पाए. धीरेधीरे दोनों के रिश्ते टूटने की कगार पर आ गए.

आखिर नाजरीन ने रिजवान से साफ कह दिया कि वह उस के साथ नहीं रह सकती. रिजवान ने उसे समझाने की कोशिश की और बेटी के भविष्य की दुहाई दी. लेकिन नाजरीन कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी.

आखिर कुछ रिश्तेदार बीच में पड़े और पंचायतें हुईं. फिर भी बात नहीं बनी और दोनों का तलाक हो गया. रिजवान ने अपनी प्रौपर्टी से अपनी बेटी फलक के भरणपोषण के लिए और सुखद भविष्य के लिए अपना दादरी वाला 900 वर्गगज का प्लौट और एक फ्लैट उस के नाम कर दिया. यह सन 2012 की बात है.

फिर शाजिया आई रिजवान की जिंदगी में तलाक के बाद नाजरीन अपने मांबाप के साथ रहने लगी. अब रिजवान तनहा हो गया. वह अपने कारोबार में मन लगाने की कोशिश करने लगा. इस बीच घर के लोग उस के लिए फिर से रिश्ता तलाश करने लगे. 2 साल तक बात नहीं बनी तो रिजवान शादी डौटकौम के जरिए अपने लिए जीवनसाथी खोजने लगा.

मार्च, 2014 में शादी डौटकौम के जरिए रिजवान की मुलाकात शाजिया परवीन से हुई, जो विधवा थी. वह एक बेटी की मां भी थी. लेकिन वह पढ़ीलिखी और काफी खूबसूरत थी. बातचीत में भी काफी सलीके वाली थी. वह सरकारी स्कूल में अध्यापिका भी थी. उस की पोस्टिंग उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में थी.

आपस में बातचीत के बाद दोनों निकाह कर दांपत्य में बंधने को तैयार हो गए. शाजिया परवीन के पहले पति की मृत्यु सन 2010 में हो गई थी. वह अपने मांबाप और बेटी के साथ दिल्ली के वजीराबाद में रहती थी. बाद में उस की उत्तर प्रदेश में अध्यापक के पद पर नौकरी लग गई थी. बेटी को मांबाप के पास छोड़ कर वह सीतापुर में रह कर नौकरी करती थी.

निकाह के बाद शाजिया परवीन रिजवान के साथ ओखला विहार दिल्ली में रहने लगी. लेकिन 15 दिनों बाद ही वह अपनी नौकरी करने सीतापुर चली गई. जब स्कूल की छुट्टियां होतीं, तभी वह दिल्ली में पति के साथ रहती थी. रिजवान से निकाह कर के शाजिया को लगता था कि उसे और उस की बेटी को सहारा मिल गया है. निकाह के बाद कुछ दिनों तक सब ठीकठाक चला, लेकिन उस के बाद शाजिया को लगने लगा कि रिजवान में बदलाव आ रहा है.

रिजवान शाजिया की तनख्वाह अपने पास रखना चाहता था. यह बात शाजिया को बिलकुल पसंद नहीं थी. उस ने रिजवान से निकाह इसलिए किया था कि उस की बेटी को पिता का प्यार मिलेगा. पर जैसा उस ने सोचा था, हालात वैसे नहीं थे. अत: पतिपत्नी के रिश्तों में दरार पैदा होने लगी.

कुछ दिनों बाद शाजिया को पता चला कि रिजवान अपनी तलाकशुदा पत्नी नाजरीन के पास आनेजाने लगा है. यह बात शाजिया को अच्छी नहीं लगी. शाजिया ने रिजवान से पूछा तो उस ने वादा किया कि अब वह नाजरीन के पास नहीं जाएगा.

नाजरीन अपने प्रेमी सोनू से निकाह करना चाहती थी. इस के लिए सोनू भी तैयार था. सोनू को पता था कि नाजरीन की 7 साल की बेटी फलक के नाम रिजवान ने 900 वर्गगज का प्लौट और एक फ्लैट किया हुआ है तो वह कुछ और ही हिसाब लगाने लगा.

नाजरीन भी इस प्रौपर्टी को समय से पहले भुनाना चाहती थी. अत: सोनू के साथ मिल कर वह सोचने लगी कि यह प्रौपर्टी उसे कैसे मिले.

तलाक के बाद नाजरीन को रिजवान से कुछ भी नहीं मिला था, जो भी मिला था, फलक को मिला था. इसलिए नाजरीन सोनू के साथ मिल कर षडयंत्र रचने लगी. इस के बाद षडयंत्र के तहत एक दिन उस ने रिजवान को फोन कर के मिलने को बुलाया. रिजवान नाजरीन से मिलने पहुंचा तो उस ने अपने व्यवहार पर दुख प्रकट करते हुए कहा कि जो कुछ भी हुआ, वह उसे भूल जाए. मैं अब भी तुम से मोहब्बत करती हूं.

इस पर रिजवान को कोई आपत्ति नहीं थी. उस समय उस की दूसरी पत्नी शाजिया से उस के रिश्ते ठीक नहीं थे. नाजरीन के इरादों से बेखबर रिजवान का उस के घर आनाजाना शुरू हो गया. वह शाजिया से किया वादा भी भूल गया. उसे साथ ले कर वह घूमता भी था, जिस का पता शाजिया को चल गया. शाजिया को यह कतई पसंद नहीं था कि उस का पति अपनी तलाकशुदा पत्नी से संबंध बनाए रखे. शाजिया को अब महसूस होने लगा कि रिजवान से निकाह कर के उस ने बहुत बड़ी भूल की है.

रिजवान की एक आदत गलत यह थी कि वह शाजिया की तनख्वाह पर अपना अधिकार समझता था. वह जबतब सीतापुर पहुंच जाता और उस से पैसे मांगता. पैसे न देने पर उस से मारपीट, गालीगलौज करता. कुल मिला कर शाजिया उस से काफी परेशान रहने लगी थी.

आखिर शाजिया ने रिजवान से तलाक लेने का फैसला कर लिया. 13 सितंबर, 2016 को उस ने मुसलिम रीतिरिवाज के अनुसार रिजवान से तलाक ले लिया. रिजवान से तलाक ले कर शाजिया ने राहत की सांस ली. पर यह मुक्ति स्थाई नहीं थी.

शाजिया के न्यूड फोटो बांट दिए रिश्तेदारों में

रिजवान जबतब उसे फोन करता और पैसे की मांग करता. तलाक होने के बाद भी वह शाजिया के पास सीतापुर पहुंच जाता था. वह उसे धमकाता, जिस से शाजिया परेशान रहने लगी थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

एक दिन रिजवान ने उस से 15 लाख रुपयों की मांग की. शाजिया ने पैसे देने से साफ मना कर दिया. तब रिजवान ने उस पर पिस्टल तान दी. वह उसे जान से मारने की धमकी देने लगा.

किसी तरह नाजरीन को जब इस बात का पता चला तो वह आग में घी डालने का काम करने लगी. वह रिजवान को और भड़काने लगी. शाजिया मानसिक रूप से काफी परेशान थी. अचानक रिजवान ने उस की परेशानी और बढ़ा दी. उस ने शाजिया के न्यूड फोटो उस के कुछ रिश्तेदारों को भेज दिए.

शाजिया को जब यह पता चला तो वह सन्न रह गई. अब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा था. इतना ही नहीं, रिजवान ने शाजिया को फोन कर धमकी दी कि वह उस का वीडियो भी उस के रिश्तेदारों को भेजेगा. इस के बाद तो शाजिया की घबराहट और बढ़ गई.

नाजरीन ने रची खूनी साजिश शाजिया ने अपने रिश्तेदारों से सलाह की तो सब ने पुलिस से शिकायत करने का सुझाव दिया. इस के बाद वह थाना तिमारपुर पहुंची और थानाप्रभारी को सारी बात बताई.

थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच एसआई मीनाक्षी को सौंप दी. एसआई मीनाक्षी ने जांच में मामला सही पाया और इस मामले की रिपोर्ट पहली जून, 2017 को थानाप्रभारी को सौंप दी.

इस के बाद पुलिस ने रिजवान के खिलाफ भादंवि की धारा 384, 354, 506 के तहत मामला दर्ज कर रिजवान को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद उसे अदालत में पेश किया, जहां से जेल भेज दिया था.

नाजरीन को रिजवान से हमदर्दी जताने का यह अच्छा मौका मिल गया था. विश्वास बढ़ाने के लिए वह जेल में रिजवान से मिलने भी जाने लगी. सोनू के साथ वह केस की पैरवी भी कर रही थी. इस से रिजवान को लगा कि नाजरीन उस की अपनी है, जो बुरे वक्त में उस के साथ है. जबकि नाजरीन के मन में तो कुछ और ही था.

नाजरीन सोनू से निकाह कर के अपनी जिंदगी को व्यवस्थित करना चाहती थी. इस के लिए उसे पैसों की भी जरूरत थी. वह यही चाह रही थी कि फलक के नाम लिखी प्रौपर्टी किसी तरह उसे मिल जाए.

रिजवान की जमानत के लिए उस के बहनोई जाकिर हुसैन ने काफी भागदौड़ की. आखिर 26 अक्तूबर, 2017 को यानी हत्या के 16 दिन पहले उसे जमानत मिल गई. रिजवान के जेल से बाहर आने पर घर वालों ने राहत की सांस ली. नाजरीन, सोनू और उस के साथी यह सोच रहे थे कि शाजिया और रिजवान की दुश्मनी को किस तरह भुनाए.

आखिर योजना के अनुसार, 10 नवंबर, 2017 को सोनू ने रिजवान को फोन कर के वैशाली मैट्रो स्टेशन पर मिलने के लिए बुलाया. रिजवान वहां अपनी कार से पहुंचा तो सोनू ने कहा कि वे लोग अलीगढ़ घूमने जा रहे हैं. वह भी उन के साथ चले तो ठीक रहेगा. रिजवान काफी समय तक जेल में रहा था, इसलिए मन बहलाने के लिए वह खुशीखुशी उन के साथ जाने को तैयार हो गया.

रिजवान ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह खुद को खतरे में डाल रहा है. सोनू, शाहरुख, अफरोज और आशू के साथ रिजवान चल पड़ा. रिजवान की कार के अलावा उन लोगों के पास एक कार और थी. बुलंदशहर आने के बाद उन्होंने रास्ता बदल लिया. अनूपशहर होते हुए वे लोग हरदुआगंज पहुंचे.

रास्ते में उन्होंने रिजवान को जम कर शराब पिलाई, जिस से वह एक तरह से बेहोश सा हो गया था. रास्ते में ही उन्होंने प्लास्टिक की बोतलों में एक पैट्रोल पंप से पैट्रोल ले लिया था. नाजरीन और सोनू मोबाइल के जरिए एकदूसरे के संपर्क में बने थे.

रात 12 बजे के करीब सभी अलैहदादपुर पहुंचे. रिजवान अपनी कार में बेसुध सीट पर गरदन टिकाए लेटा था. ऐस में ही सोनू और आशू ने उस का गला घोंट दिया. इस के बाद उन्होंने बोतलों में भरा पैट्रोल रिजवान पर डाल दिया और आग लगा दी. रिजवान के साथसाथ कार भी धूधू कर जलने लगी. सुनसान इलाका होने की वजह से किसी को पता नहीं चला कि वहां क्या हुआ था. चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था. सभी अपने काम को अंजाम दे कर अपनी कार से चले गए. नाजरीन और उस के साथियों ने सोचा था कि पुलिस उन तक पहुंच नहीं पाएगी, लेकिन यह उन की भूल थी.

रात साढ़े 10 बजे रिजवान का फोन बंद हो गया तो घर वाले परेशान हो उठे. उन्होंने नाजरीन को भी फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. घर वालों ने थाने में गुमशुदगी की तहरीर भी दे दी, लेकिन रिजवान का कुछ पता नहीं चला.

अगले दिन घर वालों को अलीगढ़ पुलिस से रिजवान की जली हुई लाश और कार मिलने की खबर मिली. घर वाले अलीगढ़ पहुंचे. उन के साथ नाजरीन भी थी. घर वालों ने रिजवान की झुलसी हुई लाश की पुष्टि कर दी, इस के बाद भी नाजरीन के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी. वह अंदर ही अंदर सुकून महसूस कर रही थी.

डा. विनोद कुमार ने अभियुक्तों से पूछताछ कर के उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. फलक अपने दादादादी के पास है. 7 साल की फलक अनाथ हो चुकी है. पिता की हत्या कर दी गई है और मां जेल में है. कथा लिखने तक नाजरीन अपने साथियों के साथ जेल में थी.  ?