Social Story: यहां मिलती है किराए पर दुल्हन

Social Story: अमित सहराना ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह सौदा इतना महंगा पड़ेगा कि जान पर बन आएगी. दिल्ली में एक नामी कंपनी में बतौर सौफ्टवेयर इंजीनियर काम कर रहे युवा अमित की शादी कहीं नहीं हो पा रही थी. दिक्कत यह थी कि उस की बंजारा बिरादरी में उतनी खूबसूरत लड़कियां होती नहीं, जितनी कि आजकल बगल में चिपका कर ले जा कर महफिल में भभका डाला जाता है. दूसरे उस के साथ घरपरिवार की भी कुछ समस्याएं भी थीं.

दिखने में ठीकठाक अमित की सैलरी दिल्ली जैसे महानगर के हिसाब से खासी अच्छी थी, लेकिन जाति आड़े आने से उसे मनपसंद जीवनसंगिनी नहीं मिल पा रही थी. लंबी भागादौड़ी करने के बाद भी बात कहीं बनी नहीं तो एक दिन अमित ने मध्य प्रदेश के शिवपुरी का रुख किया. उस ने सुन रखा था कि यहां एक तयशुदा रकम देने के एवज में एक साल तक के लिए किराए पर बीवी मिलती है.

दिल्ली से शिवपुरी तक के सफर में उस का दिल हालांकि घोड़ी पर बैठे दूल्हे की तरह बल्लियों उछल रहा था, लेकिन कुछ आशंकाएं भी उसे घेर लेती थीं. मसलन क्या पता कैसे लोग मिलेंगे वहां, पसंद की बीवी मिले या नहीं और मिली भी तो ज्यादा नखरे वाली न हो. लेकिन अगर अच्छी निकली तो फिर लाइफ बन जाएगी.

वह 29 जनवरी, 2022 की सुबह थी जब अमित शिवपुरी पहुंचा. चंबल ग्वालियर इलाके की हाड़ कंपा देने वाली ठंड से उस के इरादे और फैसले पर कोई फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि अब वे अरमानों में तब्दील हो चुके थे. लाल लंहगा पहने, हाथ में जयमाला लिए एक सकुचाई सी दुलहन उस के जेहन में मुकम्मल जगह बना चुकी थी, जिस के लिए कोई भी कीमत अदा करने को उस की जेब और बैंक एकाउंट में पैसा था. दोपहर में तैयार हो कर वह उस जगह पहुंचा, जहां किराए की दुलहन मिलती हैं. लेकिन जैसा उस ने सुना था, वैसा माहौल देखने में नहीं आया कि बहुत सी लड़कियों की मंडी लगी है और देश भर से आए लोग उन का मोलभाव कर रहे हैं और तरहतरह से लड़कियों की नापातौली कर रहे हैं.

पूछतेपूछते वह एक अधपके मकान में जा पहुंचा, जहां लड़की सीमा (बदला नाम) और उस के घर वाले होने वाले टेंपरेरी दामाद का इंतजार कर रहे थे.

औपचारिक हायहैलो के बाद मुद्दे की बात पैसों की शुरू हुई. सीमा को देखते ही रवि को लगा कि यही है उस के सपनों की रानी. पेशेवर अंदाज में सीमा के घर बालों ने जो कीमत मांगी, वह बहुत ज्यादा तो नहीं थी पर रवि ने सुन रखा था कि यहां भावताव बहुत होता है इसलिए कुछ कम कराने की कोशिश करना, जोकि उस ने की. किसी सधे हुए व्यापारी की तरह अमित ने अपनी कीमत बता दी, जिस पर सहमति नहीं बनी तो वह वहां से चलता बना.

वह चला तो गया, लेकिन दिल तो पहली ही नजर में सीमा की अदाओं का दीवाना हो चुका था. इस के बाद भी उस ने सब्र से काम लिया. नहीं तो एक मन कह रहा था कि बेकार भावताव में उलझ गया, मुंहमांगी रकम दे देता तो सीमा दिल्ली में उस के घर बैडरूम में होती और वह सुहागरात मना रहा होता. सजेधजे कमरे में फूलों की सुगंध महक रही होती, वह बिस्तर पर पसरा होता, तभी सीमा दूध का गिलास ले कर कमरे में दाखिल होती तो वह उस का आंचल खींच कर अपने आगोश में ले लेता. फिर कमरे की लाइट बंद हो जाती.

अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं था, लिहाजा दूसरे दिन वह फिर सीमा के घर जा पहुंचा. जिस के सयाने घर वाले समझ गए कि पंछी नया है, लिहाजा इसे तबियत से निचोड़ लिया जाए. जितनी समझदारी अमित दिखा रहा था, वह दरअसल अव्वल दरजे की नादानी और नातजुर्बेकारी इन खेलेखाए खिलाडि़यों के सामने थी. इस बार बात कुछ बनती दिखी. लेकिन फिर पैसों पर अटक गई तो अमित फिर वापस चला आया. इतना तो उसे समझ आ गया था कि इन लोगों को पैसों की सख्त जरूरत है. लिहाजा बेकार की हड़बड़ाहट दिखाते ज्यादा पैसा क्यों दिया जाए. दूसरे माहौल को ले कर उस का डर भी खत्म हो गया था कि यहां से किसी खासतौर से पुलिस वालों को कोई मतलब नहीं. इस बार भी वह अपनी औफर प्राइस दे कर चला आया.

इस तरह आतेजाते फरवरी का पूरा महीना निकल गया इस दौरान वह कई बार दिल्ली से शिवपुरी आया. आखिरकार सौदा पट ही गया. सीमा के घर वाले 20 हजार रुपए में मान गए, जो अमित के लिहाज से मामूली रकम थी. 3 मार्च, 2022 को उस की और सीमा की शादी हो गई. शिवपुरी की इस तरह की शादियों में कोई मंडप बारात और दूसरी रस्में नहीं होतीं, बल्कि विकसित देशों को भी मात करती ये शादियां स्टांप पेपर पर होती हैं. यानी कोई होहल्ला नहीं, तामझाम नहीं, बस लड़के और लड़की की सहमति काफी होती है. सहूलियत के लिए इन्हें कौन्ट्रैक्ट मैरिज कहा जा सकता है.

अमित और सीमा की शादी में तो स्टांप पेपर की भी जरूरत नहीं पड़ी, बल्कि लिखापढ़ी सादे कागज पर ही कर ली गई. जिस के मसौदे में खास इतना भर था कि दोनों रजामंदी से एकदूसरे को पतिपत्नी स्वीकार करते हैं, लेकिन इन की शादीशुदा जिंदगी की मियाद केवल एक साल होगी. सीमा पत्नी की तरह अमित के साथ रहेगी और वे तमाम सुख उसे देगी, जो एक पत्नी अपने पति को देती है. इस बाबत तय रकम 20 हजार रुपए अमित ने सीमा के घर वालों को दे दी है. एक साल बाद यह करार खत्म हो जाएगा और अमित सीमा को वापस यहीं छोड़ जाएगा.

अमित की नजर में ये शर्तें मामूली थीं और वैसी ही थीं जैसी वह चाहता था कि कोई झंझट नहीं. सब कुछ यूज एंड थ्रो जैसा है. अगर मन करे और दोनों पक्ष राजी हों तो यह एग्रीमेंट आगे भी बढ़ाया जा सकता है, जिस की कीमत उसी वक्त तय की जाएगी. कुछ साल पहले तक इस करार के मसौदे को शादी के फेरों के सात वचन की तरह दोनों पक्ष निभाते थे, लेकिन अब गड़बड़ होने लगी है, जैसी कि अमित के मामले में हुई.

सीमा जैसी सैकड़ों किराए की दुलहनें शिवपुरी में बेहद सहूलियत से और सस्ती मिलती हैं और जिन लोगों की शादी किसी भी वजह से नहीं होती है, वे यहां से साल भर तक के लिए किराए पर दुलहन ले जाते हैं. दुलहन का किराया उस की सेहत और उम्र पर निर्भर करता है कि वह कितना होगा.

मोटे तौर पर यह 25 हजार से ले कर एक लाख रुपए तक होता है. इसे ‘धडीचा प्रथा’ कहा जाता है, जो सदियों से इस इलाके में है और कोई इस का विरोध नहीं करता. सरकार ने कानूनन इस रिवाज को गैरकानूनी घोषित किया हुआ है, लेकिन दोटूक कहें तो यह देह व्यापार का एक अनूठा तरीका है, लेकिन इस पर देह व्यापार की ही तरह कोई रोक लगाना मुमकिन नहीं.

शिवपुरी के एक बुजुर्ग नागरिक के मुताबिक, इस रिवाज की शुरुआत अंगरेजों के जमाने में ही हो गई थी. इस की वजह पिछड़ापन, शोषण, गरीबी और जातिगत भेदभाव ज्यादा समझ आते हैं. क्योंकि किराए पर जाने वाली अधिकतर लड़कियां छोटी जाति की होती हैं. पहले आसपास के जिलों के ही लोग यहां बीवी किराए पर लेने आते थे, लेकिन अब दूरदराज के प्रदेशों से भी आने लगे हैं. क्योंकि इस की चर्चा देश भर में होने लगी है. यह सच है कि कुछ साल पहले तक लड़कियों की नीलामी बोली लगा कर होती थी, पर अब ऐसा कम ही देखने में आता है. लोग सीधे लड़की के घर जाते हैं और सौदा कर लेते हैं.

किराए और शादी की लिखापढ़ी स्टांप पेपर पर होती है, जिस के कोई खास कानूनी माने नहीं होते. यह भी ‘धडीचा प्रथा’ का एक चला आ रहा पहलू है. पैसा लड़की के घर वाले रख लेते हैं, यही उन की रोजीरोटी है. जाहिर है निकम्मे मर्दों की वजह से लड़कियां यहां बिकती हैं, जिस में किसी को शर्म नहीं आती, क्योंकि इसे सभी ने अपना भाग्य या नियति जो भी कह लें, मान रखा है.

बात हैरत की इस लिहाज से भी नहीं है कि लड़कियों की खरीदफरोख्त का रिवाज देश में हर कहीं किसी न किसी शक्ल में है. मध्य प्रदेश के ही निमाड़ इलाके के मंदसौर और नीमच जिलों में बांछड़ा समुदाय के लोग खुलेआम लड़कियों से देह व्यापार करवाते हैं, लेकिन वह कुछ घंटों या एक रात का होता है साल भर का नहीं.

औरतों की यूं खरीदफरोख्त सभ्य समाज के लिए कलंक है और कानून के लिए चुनौती  भी है. धडीचा के तहत पत्नी बनी महिला के कोई कानूनी अधिकार और घरगृहस्थी नहीं होते. वह एक के बाद एक कर बिकती ही रहती है. जो बच्चे कौन्ट्रैक्ट मैरिज से पैदा होते हैं, उन को न तो किसी पिता का नाम मिलता और न ही इन बच्चों का कोई भविष्य होता है. बड़े हो कर वे भी इसी गंदगी का हिस्सा बन कर दलाली करने लगते हैं.

औरतों को जायदाद समझने का गुनाह वेद पुराणों के जमाने से होता रहा है, वह देश के कुछ हिस्सों में आज भी दिखता है. फसाद की जड़ अगर गरीबी और शोषण है तो उस का कोई हल अभी तक नहीं ढूंढा जा सका है. इस कुप्रथा में बिकी औरतों को बीच में करार तोड़ने का हक होता है. लेकिन ऐसा करने से पहले उन्हें ली गई कीमत अपने टेंपरेरी पति को लौटानी पड़ती है. ऐसा तभी होता है जब कोई दूसरा मर्द उन्हें ज्यादा पैसा देता है.

शिवपुरी का पिछड़ापन किसी सबूत का मोहताज नहीं रहा. नशा और देह व्यापार यहां खुलेआम होता है, लेकिन हालत कालगर्ल्स की भी अच्छी नहीं है. धडीचा में कोई उन का मुफ्त में इस्तेमाल नहीं कर सकता, यह अगर खुश होने वाली बात है तो क्या खा कर इस पर खुशी मनाई जाए.

यह भी कम हैरत की बात नहीं कि अभी तक किसी नाबालिग के बिकने की शिकायत सामने नहीं आई है, जबकि बिकने वाली औरतों में कुंवारी लड़कियों से ले कर उम्रदराज शादीशुदा औरतें भी होती हैं, जिन्हें पति कुछ हजार रुपए के लिए खुशीखुशी किराए पर दे देता है. मुमकिन है कि नाबालिग भी किराए पर चलती हों और कोई इस की शिकायत करने की जरूरत नहीं समझता हो. कोई काररवाई अगर होनी होती तो वह बालिगों की बिक्री पर भी हो सकती है, जो खुलेआम भाजीतरकारी की तरह होती है. अब जबकि शिकायतें सामने आने लगी हैं, तब भी जिम्मेदार लोगों के कान पर जूं नहीं रेंग रही.

सीमा से शादी के महज 23 दिन बाद ही अमित शिवपुरी के एसपी के औफिस में अपना दुखड़ा रोने गया था. जिस ने सोचा यह भी था कि महज 2 हजार रुपए महीने पर न केवल चौबीसों घंटे सैक्स सुख देने वाली बीवी मिल रही है, बल्कि मुफ्त के भाव की नौकरानी भी मिल रही है जो खाना बनाएगी, घर की साफसफाई करेगी, बरतन और कपड़े भी धोएगी.

दिल्ली में ऐसी नौकरानी लगभग 7 हजार रुपए महीना पगार लेती है. इस लिहाज से उस ने घाटे का सौदा नहीं किया था. लेकिन जल्द ही उसे समझ आ गया कि यह बेहद घाटे का सौदा था. शादी के बाद एक हफ्ता भी वह किराए की बीवी के साथ सुकून से नहीं गुजार पाया था कि सीमा के घर वालों ने उसे परेशान करना शुरू कर दिया. वे उस से मकान दिलाने के लिए दबाब बनाने लगे. मना करने पर 5 लाख रुपए की एफडी और हर महीने 20 हजार रुपए मांगने लगे. इस में भी उस ने असर्मथता जाहिर की तो उसे जान से मारने की धमकियां दी जाने लगीं.

इस पर घबराया अमित पुलिस के पास गया पर बात आईगई हो गई. जिस उत्साह से वह एक साल पहले दिल्ली से शिवपुरी आया था, उस से भी ज्यादा मायूसी और निराशा ले कर वह शिवपुरी से दिल्ली वापस लौट गया. उम्मीद है कि जल्द ही वह इस हादसे को भूल कर परमानेंट बीवी ले आएगा और सुखचैन से जिएगा.  Social Story

Crime News: रिश्तों का कत्ल – बेटी बनी कातिल

Crime News: 31दिसंबर, 2022 की रात का दूसरा पहर अभी शुरू ही हुआ था. समूचा शहर 2022 की विदाई और नए साल के आगमन के जश्न में डूबा हुआ था. उसी दौरान फूल सिंह राठौर नाम के एक शख्स ने ग्वालियर के थाना हजीरा में मोबाइल फोन द्वारा सूचना दी थी कि उस के गदाईपुरा स्थित मकान में किराएदार 45 वर्षीय ममता कुशवाहा की किसी ने हत्या कर दी है.

मकान मालिक के जरिए हत्या की सूचना मिलते ही एसएचओ संतोष सिंह एसआई, एएसआई और महिला हवलदार को साथ ले कर कुछ देर में ही घटनास्थल पर पहुंच गए. दिल दहला देने वाली इस घटना की खबर उन्होंने एसएसपी अमित सांघी और सीएसपी रवि भदौरिया सहित फोरैंसिक विशेषज्ञ अखिलेश भार्गव को दे दी थी. कुछ ही देर में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी वहां पहुंच गए.

घटनास्थल पर पुलिस ने देखा कि हत्यारे ने महिला को चाकू से बुरी तरह से गोद कर मारने के बाद उस की लाश कंबल में लपेट कर पलंग के नीचे छिपा दी थी. खून से लथपथ कंबल में लिपटी लाश का निरीक्षण करने के बाद एसएचओ संतोष सिंह भदौरिया ने मकान मालिक फूल सिंह राठौर और उन के मकान में रहने वाले अन्य किराएदारों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया मृतका ममता की शादी भिंड जिले के सुकांड गांव में हुई थी. लेकिन पति ने शादी के 6-7 साल बाद ममता को छोड़ दिया था, तभी से वह अपनी नाबालिग बेटी के साथ ग्वालियर में किराए पर कमरा ले कर पति से अलग रह रही थी.

किराएदारों ने यह भी बताया कि ममता के साथ रहने वाली उस की 17 वर्षीय बेटी कल्पना इस घटना के बाद से नजर नहीं आ रही है. संतोष भदौरिया ने यह महत्त्वपूर्ण जानकारी पाने के बाद अपना सारा ध्यान मृतका की बेटी पर लगा दिया, क्योंकि उस के पकड़े जाने पर ममता की हत्या के रहस्य से परदा उठ सकता था. उच्चाधिकारियों के जाने के बाद पुलिस ने घटनास्थल की कागजी काररवाई पूरी की. इस के बाद ममता की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. फिर एसएचओ ने मकान मालिक फूल सिंह राठौर की तहरीर के आधार पर भादंवि की धारा 302, 34 के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी.

ममता हत्याकांड का खुलासा करने के लिए एसएसपी अमित सांघी ने सीएसपी रवि भदौरिया और एसएचओ संतोष सिंह के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. इस के बाद दोनों पुलिस अधिकारियों ने एक बार फिर से घटनास्थल का दौरा कर स्थिति को समझने का प्रयास किया. परिस्थितियां बता रही थीं कि ममता की हत्या सुनियोजित ढंग से की गई है. घटनास्थल को देख कर यह स्पष्ट तौर पर लग रहा था कि हत्या के इस मामले में मृतका का कोई करीबी ही शामिल हो सकता है. इतना ही नहीं, वह घर के चप्पेचप्पे से वाफिक रहा होगा, क्योंकि हत्यारा अपना काम कर के चुपचाप वहां से निकल गया और पड़ोस में रहने वाले किराएदारों तक को भनक नहीं लगी.

पुलिस के लिए अब उस शख्स को तलाश करने की सब से बड़ी चुनौती थी. इस काम के लिए भरोसेमंद मुखबिरों को भी लगा दिया गया.

जांच के दौरान ही एक मुखबिर ने एसएचओ को चौंकाने वाली जानकारी दी. उस ने बताया कि ममता का अपनी बेटी कल्पना से उस के प्रेम संबंधों को ले कर पिछले 2 सालों से काफी मनमुटाव चल रहा था. कल्पना अपने 25 वर्षीय प्रेमी सोनू ओझा के साथ 2 बार घर से भाग भी चुकी थी, जिस पर ममता ने बेटी के प्रेमी सोनू के खिलाफ अगवा कर दुष्कर्म करने का मामला दर्ज करवाया था.

तब पुलिस ने ममता की बेटी कल्पना और उस के प्रेमी सोनू को एक बार गुजरात और दूसरी बार भिंड से बरामद कर लिया था. पड़ोसियों ने बताया कि कल्पना अपने प्रेमी सोनू ओझा से शादी करना चाहती थी और ममता इस के लिए कतई तैयार नहीं थी. बेटी कल्पना के दूसरी बार अपने प्रेमी के साथ घर से भागने पर ममता ने बेटी के नाबालिग होने का हवाला देते हुए सोनू के खिलाफ अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी. इस के बाद पुलिस ने जल्दी ही भिंड से कल्पना को ढूंढ निकाला.

अपनी मां के इस कदम से बेटी मां के खिलाफ हो गई. हालांकि उस वक्त कल्पना ने अपने प्रेमी सोनू को जेल जाने से बचाने के लिए अपना मैडिकल परीक्षण कराने से इंकार कर दिया था.

इस पर ममता ने तत्कालीन एसएचओ पर आरोपी की मदद करने का आरोप लगा कर न्यायालय में याचिका दायर कर एसएचओ को कड़ी फटकार लगवा कर बेटी का मैडिकल करवाने के बाद सोनू को आईपीसी की धारा 376 के तहत जेल भिजवा दिया था. मगर शातिरदिमाग कल्पना ने उल्टे अपनी मां पर गलत काम करने का आरोप लगा कर सनसनी फैला दी थी. प्रारंभिक जांच के दौरान एसएचओ संतोष सिंह ने कल्पना का मोबाइल नंबर हासिल कर के उस की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स देख कर उन के होश उड़ गए. उस के फोन पर एक पखवाड़े में एक ही नंबर से साढ़े 3 सौ से अधिक बार बात हुई थी. घटना से पहले एक घंटे के दरम्यान में भी 12 बार काल की थी.

अत: उक्त नंबर शक के घेरे में आ गया. पुलिस ने उस नंबर की काल डिटेल्स का सारा डाटा निकलवाया तो वह नंबर सोनू ओझा निवासी प्रसाद नगर का निकला. जांच अधिकारी ने बिना समय गंवाए उसी समय सोनू के घर पर दबिश दी तो सोनू और कल्पना वहीं मिल गए. पुलिस दोनों को ही पूछताछ के लिए हजीरा थाने ले आई. कहते हैं कि पुलिस जब अपनी पर आ जाती है तो अपराधी से सच उगलवा ही लेती है.

एसएचओ संतोष सिंह ने जब सोनू से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया. उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि कल्पना की मां मुझे मरवाने की धमकी देती थी. यहां तक कि ममता जब भी घर से बाहर जाती थी तो घर के दोनों दरवाजों पर बाहर से ताला लगा कर कल्पना को अंदर रोता हुआ छोड़ जाती थी.

ऐसी स्थिति में हम दोनों एकदूसरे से दिल खोल कर मेलमुलाकात नहीं कर पा रहे थे. इसलिए कल्पना के कहने पर उस की मां ममता का गला दबाने के बाद पेट में चाकू मार कर हत्या की थी. सोनू ने बताया कि वह कल्पना के साथ शादी कर के अपना घर बसाना चाहता था, मगर ममता इस के लिए तैयार नहीं हो रही थी. इसलिए दोनों ने मिल कर उस की हत्या करने की योजना बनाई.

यह सुन कर एसएचओ चौंक गए, क्योंकि देखने में नाबालिग और भोलीभाली लगने वाली मृतका की बेटी नागिन से भी ज्यादा जहरीली निकली, जिस ने इश्क के नशे में अपनी मां को डंस लिया. कल्पना के कमसिन चेहरे से मासूमियत का नकाब उतर गया था. इस के बाद कल्पना ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. उस ने बताया कि सोनू से मेलमुलाकात पर बंदिश लगा देने से उस का उस के प्रेमी से मिलनाजुलना बंद हो गया था.

वह सोनू से मिलने के लिए बहुत ही बेचैन रहने लगी, जिस से उसे अपनी मां दुश्मन नजर आने लगी और घर कैदखाना लगने लगा था. वह चाह रही थी कि किसी तरह मौका हाथ लगते ही अपने प्रेमी से मिलने जेल चली जाए. जैसे ही उसे पता चला 15 दिसंबर को सोनू की रिहाई हो गई है तो उस ने सोनू से मुलाकात कर मां की हत्या की योजना बनाई.

योजना के अनुसार, उस ने सोनू द्वारा लाई गई नींद की गोलियां 30 दिसंबर की रात मां के खाने में मिला दीं. गोलियों का असर होते ही मां जल्द गहरी नींद में सो गई तो उस ने रात के तकरीबन 2 बजे अपने प्रेमी सोनू को फोन कर के घर के पिछले दरवाजे से कमरे में बुला लिया. हत्या करने के दौरान मां की आवाज किसी को सुनाई न दे, इसलिए कल्पना ने मां का मुंह अपने दोनों हाथों से कस कर बंद कर लिया. इस के बाद सोनू ने मां का मुंह तब तक दबाए रखा, जब तक कि उन की सांस नहीं थम गई. वह जीवित न बच जाए, इसलिए उन के पेट पर चाकू से वार कर दिए.

नब्ज टटोलने के बाद जब मरने की संतुष्टि हो गई, उस के बाद सोनू अपने घर चला गया. सोनू के जाने के बाद कल्पना ने मां की लाश कंबल में लपेट कर बैड के नीचे छिपा दी. सवेरा होने पर तैयार हो कर कमरे में ताला लगा कर वह अपने प्रेमी से मिलने उस के कमरे पर चली गई. सारे दिन प्रेमी के साथ मौज करने के बाद शाम को ताला खोल कर सोनू के पास प्रसाद नगर चली गई थी.

चूंकि कल्पना अब बालिग हो चुकी थी, इसलिए उस से और उस के प्रेमी सोनू से विस्तार से पूछताछ करने के बाद एसएचओ संतोष सिंह ने दोनों को न्यायलय में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में कल्पना परिवर्तित नाम है.

ExtraMarital Affair: अवैध संबंधों ने उजाड़ दिया परिवार

ExtraMarital Affair: विश्वप्रसिद्ध पर्यटनस्थल मांडू के नजदीक के एक गांव तारापुर में पैदा हुई पिंकी को देख कर कोई सहसा विश्वास नहीं कर सकता था कि वह एक आदिवासी युवती है. इस की वजह यह थी कि पिंकी के नैननक्श और रहनसहन सब कुछ शहरियों जैसे थे. इतना ही नहीं, उस की इच्छाएं और महत्वाकांक्षाए भी शहरियों जैसी ही थीं, जिन्हें पूरा करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठाने से कतराती नहीं थी.

बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेमगाथा कहने वाले मांडू के आसपास सैकड़ों छोटेछोटे गांव हैं, जहां की खूबसूरत छटा और ऐतिहासिक इमारतें देखने के लिए दुनिया भर से प्रकृतिप्रेमी और शांतिप्रिय लोग वहां आते हैं. वहां आने वाले महसूस भी करते हैं कि यहां वाकई प्रकृति और प्रेम का आपस में गहरा संबंध है.

यहां की युवतियों की अल्हड़ता, परंपरागत और आनुवांशिक खूबसूरती देख कर यह धारणा और प्रबल होती है कि प्रेम वाकई प्रेम है, इस का कोई विकल्प नहीं सिवाय प्रेम के. नन्ही पिंकी जब मांडू आने वाले पर्यटकों को देखती और उन की बातें सुनती तो उसे लगता कि जैसी जिंदगी उसे चाहिए, वैसी उस की किस्मत में नहीं है, क्योंकि दुनिया में काफी कुछ पैसों से मिलता है, जो उस के पास नहीं थे.

मामूली खातेपीते परिवार की पिंकी जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे यौवन के साथसाथ उस की इच्छाएं भी परवान चढ़ती गईं. जवान होतेहोते पिंकी को इतना तो समझ में आने लगा था कि यह सब कुछ यानी बड़ा बंगला, मोटरगाड़ी, गहने और फैशन की सभी चीजें उस की किस्मत में नहीं हैं. लिहाजा जो है, उसे उसी में संतोष कर लेना चाहिए.

लेकिन इस के बाद भी पिंकी अपने शौक नहीं दबा सकी. घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने के उस के सपने दिल में दफन हो कर रह गए थे. घर वालों ने समय पर उस की शादी धरमपुरी कस्बे के नजदीक के गांव रामपुर के विजय चौहान से कर दी थी. शादी के बाद वह पति के साथ धार के जुलानिया में जा कर रहने लगी थी.

पेशे से ड्राइवर विजय अपनी पत्नी की इस कमजोरी को जल्दी ही समझ गया था कि पिंकी के सपने बहुत बड़े हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए बहुत दौलत चाहिए. उन्हें कमा कर पूरे कर पाना कम से कम इस जन्म में तो उस के वश की बात नहीं है. इस के बाद भी उस की हर मुमकिन कोशिश यही रहती थी कि वह हर खुशी ला कर पत्नी के कदमों में डाल दे.

इस के लिए वह हाड़तोड़ मेहनत करता भी था, लेकिन ड्राइवरी से इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि वह सब कुछ खरीदा और हासिल किया जा सके, जो पिंकी चाहती थी. इच्छा है, पर जरूरत नहीं, यह बात विजय पिंकी को तरहतरह से समयसमय पर समझाता भी रहता था.

लेकिन अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की आदी होती जा रही पिंकी को पति की मजबूरी तो समझ में आती थी, लेकिन उस की बातों का असर उस पर से बहुत जल्द खत्म हो जाता था. शादी के बाद कुछ दिन तो प्यारमोहब्बत और अभिसार में ठीकठाक गुजरे. इस बीच पिंकी ने 2 बेटों को जन्म दिया, जिन के नाम हिमांशु और अनुज रखे गए.

विजय को जिंदगी में सब कुछ मिल चुका था, इसलिए वह संतुष्ट था. लेकिन पिंकी की बेचैनी और छटपटाहट बरकरार थी. बेटों के कुछ बड़ा होते ही उस की हसरतें फिर सिर उठाने लगीं. बच्चों के हो जाने के बाद घर के खर्चे बढ़ गए थे, लेकिन विजय की आमदनी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ था.

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अकसर अपनी नौकरी के सिलसिले में विजय को लंबेलंबे टूर करने पड़ते थे. इस बीच पिंकी की हालत और भी खस्ता हो जाती थी. पति इस से ज्यादा न कुछ कर सकता है और न कर पाएगा, यह बात अच्छी तरह उस की समझ में आ गई थी. अब तक शादी हुए 17 साल हो गए थे, इसलिए अब उसे विजय से ऐसी कोई उम्मीद अपनी ख्वाहिशों के पूरी होने की नहीं दिखाई दे रही थी.

लेकिन जल्दी ही पिंकी की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आ गया, जो अंधा भी था और खतरनाक भी. यह एक ऐसा मोड़ था, जिस का सफर तो सुहाना था, परंतु मंजिल मिलने की कोई गारंटी नहीं थी. इस के बाद भी पिंकी उस रास्ते पर चल पड़ी. उस ने न अंजाम की परवाह की न ही पति और बच्चों की. इस से सहज ही समझा जा सकता है कि इच्छाओं और गैरजरूरी जरूरतों के सामने जिम्मेदारियों ने दम तोड़ दिया था. पिंकी को संभल कर चलने के बजाय फिसलने में ज्यादा फायदा नजर आया.

विजय का एक दोस्त था दिलीप चौहान. वह बेरोजगार था और काम की तलाश में इधरउधर भटक रहा था. काफी दिनों बाद दोनों मिले तो विजय को उस की हालत पर तरस आ गया. उस ने धीरेधीरे दिलीप को ड्राइविंग सिखा दी. धार, मांडू और इंदौर में ड्राइवरों की काफी मांग है, इसलिए ड्राइविंग सीखने के बाद वह गाड़ी चलाने लगा. दोस्त होने के साथसाथ विजय अब उस का उस्ताद भी हो गया था.

ड्राइविंग सीखने के दौरान दिलीप का विजय के घर आनाजाना काफी बढ़ गया था. एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा हो गया था. जब विजय दिलीप को ड्राइविंग सिखा रहा था, तभी पिंकी दिलीप को जिस्म की जुबान समझाने लगी थी. उस के हुस्न और अदाओं का दीवाना हो कर दिलीप दोस्तीयारी ही नहीं, गुरुशिष्य परंपरा को भी भूल कर पिंकी के प्यार में कुछ इस तरह डूबा कि उसे भी अच्छेबुरे का होश नहीं रहा.

ऐसे मामलों में अकसर औरत ही पहल करती है, जिस से मर्द को फिसलते देर नहीं लगती. दिलीप अकेला था, उस के खर्चे कम थे, इसलिए वह अपनी कमाई पिंकी के शौक और ख्वाहिशों को पूरे करने में खर्च करने लगा. इस के बदले पिंकी उस की जिस्मानी जरूरतें पूरी करने लगी. जब भी विजय घर पर नहीं होता या गाड़ी ले कर बाहर गया होता, तब दिलीप उस के घर पर होता.

पति की गैरहाजिरी में पिंकी उस के साथ आनंद के सागर में गोते लगा रही होती. विजय इस रिश्ते से अनजान था, क्योंकि उसे पत्नी और दोस्त दोनों पर भरोसा था. यह भरोसा तब टूटा, जब उसे पत्नी और दोस्त के संबंधों का अहसास हुआ.

शक होते ही वह दोनों की चोरीछिपे निगरानी करने लगा. फिर जल्दी ही उस के सामने स्पष्ट हो गया कि बीवी बेवफा और यार दगाबाज निकला. शक के यकीन में बदलने पर विजय तिलमिला उठा. पर यह पिंकी के प्रति उस की दीवानगी ही थी कि उस ने कोई सख्त कदम न उठाते हुए उसे समझाया. लेकिन अब तक पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था.

चूंकि पति का लिहाज और डर था, इसलिए पिंकी खुलेआम अपने आशिक देवर के साथ रंगरलियां नहीं मना रही थी. फिर एक दिन पिंकी कोई परवाह किए बगैर दिलीप के साथ चली गई. चली जाने का मतलब यह नहीं था कि वह आधी रात को कुछ जरूरी सामान ले कर प्रेमी के साथ चली गई थी, बल्कि उस ने विजय को बाकायदा तलाक दे दिया था और उस की गृहस्थी के बंधन से खुद को मुक्त कर लिया था.

कोई रुकावट या अड़ंगा पेश न आए, इस के लिए वह और दिलीप धार आ कर रहने लगे थे. पहले प्रेमिका और अब पत्नी बन गई पिंकी के लिए दिलीप ने धार की सिल्वर हिल कालोनी में मकान ले लिया था. मकान और कालोनी का माहौल ठीक वैसा ही था, जैसा पिंकी सोचा करती थी.

यह पिंकी के दूसरे दांपत्य की शुरुआत थी, जिस में दिलीप उस का उसी तरह दीवाना था, जैसा पहली शादी के बाद विजय हुआ करता था. पति इर्दगिर्द मंडराता रहे, घुमाताफिराता रहे, होटलों में खाना खिलाए और सिनेमा भी ले जाए, यही पिंकी चाहती थी, जो दिलीप कर रहा था. खरीदारी कराने में भी वह विजय जैसी कंजूसी नहीं करता था.

यहां भी कुछ दिन तो मजे से गुजरे, लेकिन जल्दी ही दिलीप की जेब जवाब देने लगी. पिंकी के हुस्न को वह अब तक जी भर कर भोग चुका था, इसलिए उस की खुमारी उतरने लगी थी. लेकिन पत्नी बना कर लाया था, इसलिए पिंकी से वह कुछ कह भी नहीं सकता था. प्यार के दिनों के दौरान किए गए वादों का उस का हलफनामा पिंकी खोल कर बैठ जाती तो उसे कोई जवाब या सफाई नहीं सूझती थी.

जल्दी ही पिंकी की समझ में आ गया कि दिलीप भी अब उस की इच्छाएं पूरी नहीं कर सकता तो वह उस से भी उकताने लगी. पर अब वह सिवाय किलपने के कुछ कर नहीं सकती थी. दिलीप की चादर में भी अब पिंकी के पांव नहीं समा रहे थे. गृहस्थी के खर्चे बढ़ रहे थे, इसलिए पिंकी ने भी पीथमपुर की एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. क्योंकि अपनी स्थिति से न तो वह खुश थी और न ही संतुष्ट.

इस उम्र और हालात में तीसरी शादी वह कर नहीं सकती थी, लेकिन विजय को वह भूल नहीं पाई थी, जो अभी भी जुलानिया में रह रहा था. पिंकी को लगा कि क्यों न पहले पति को टटोल कर दोबारा उसे निचोड़ा जाए. यही सोच कर उस ने एक दिन विजय को फोन किया तो शुरुआती शिकवेशिकायतों के बाद बात बनती नजर आई.

ऐसा अपने देश में अपवादस्वरूप ही होता है कि तलाक के बाद पतिपत्नी में दोबारा प्यार जाग उठे. हां, यूरोप जहां शादीविवाह मतलब से किए जाते हैं, यह आम बात है. विजय ने दोबारा उस में दिलचस्पी दिखाई तो पिंकी की बांछें खिलने लगीं. पहला पति अब भी उसे चाहता है और उस की याद में उस ने दोबारा शादी नहीं की, यह पिंकी जैसी औरत के लिए कम इतराने वाली बात नहीं थी.

crime

वह 28 जुलाई की रात थी, जब दिलीप रोजाना की तरह अपनी ड्यूटी कर के घर लौटा. उसे यह देख हैरानी हुई कि उस के घर में धुआं निकल रहा है यानी घर जल रहा है. उस ने शोर मचाना शुरू किया तो देखते ही देखते सारे पड़ोसी इकट्ठा हो गए और घर का दरवाजा तोड़ दिया, जो अंदर से बंद था.

अंदर का नजारा देख कर दिलीप और पड़ोसी सकते में आ गए. पिंकी किचन में मृत पड़ी थी, जबकि विजय बैडरूम में. जाहिर है, कुछ गड़बड़ हुई थी. हुआ क्या था, यह जानने के लिए सभी पुलिस के आने का इंतजार करने लगे. मौजूद लोगों का यह अंदाजा गलत नहीं था कि दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं.

हैरानी की एक बात यह थी कि आखिर दोनों मरे कैसे थे? पुलिस आई तो छानबीन और पूछताछ शुरू हुई. दिलीप के यह बताने पर कि मृतक विजय उस की पत्नी पिंकी का पहला पति और उस का दोस्त है, पहले तो कहानी उलझती नजर आई, लेकिन जल्दी ही सुलझ भी गई.

दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस वालों ने दिलीप से पूछताछ की तो उस की बातों से लगा कि वह झूठ नहीं बोल रहा है. उस ने पुलिस को बताया था कि वह काम से लौटा तो घर के अंदर से धुआं निकलते देख घबरा गया. उस ने मदद के लिए गुहार लगाई. इस के बाद जो हुआ, उस की पुष्टि के लिए वहां दरजनों लोग मौजूद थे.

दरवाजा सचमुच अंदर से बंद था, जिसे उन लोगों ने मिल कर तोड़ा था. सभी ने बताया कि पिंकी की लाश जली हालत में किचन में पड़ी थी और विजय की ड्राइंगरूम में. उस के गले में साड़ी का फंदा लिपटा था. पिंकी के चेहरे पर चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे.

जल्दी ही इस दोहरे हत्याकांड या खुदकुशी की खबर आग की तरह धार से होते हुए समूचे निमाड़ और मालवांचल में फैल गई, जिस के बारे में सभी के अपनेअपने अनुमान थे. लेकिन सभी को इस बात का इंतजार था कि आखिर पुलिस कहती क्या है.

धार के एसपी वीरेंद्र सिंह भी सूचना पा कर घटनास्थल पर आ गए थे. उन्होंने घटनास्थल का बारीकी से जायजा लिया. पुलिस को दिए गए बयान में पिंकी की मां मुन्नीबाई ने बताया था कि पिंकी और विजय का वैवाहिक जीवन ठीकठाक चल रहा था, लेकिन दिलीप ने आ कर न जाने कैसे पिंकी को फंसा लिया.

जबकि दिलीप का कहना था कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस की गैरमौजूदगी में पिंकी पहले पति विजय से मिलतीजुलती थी या फोन पर बातें करती थी. पिंकी के भाई कान्हा सुवे ने जरूर यह माना कि उस ने पिंकी को बहुत समझाया था, पर वह नहीं मानी. पिंकी कब विजय को तलाक दे कर दिलीप के साथ रहने लगी थी, यह उसे नहीं मालूम था.

तलाक के बाद दोनों बेटे विजय के पास ही रह रहे थे. विजय के भाई अजय के मुताबिक हादसे के दिन विजय राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल सांवरिया सेठ जाने को कह कर घर से निकला था.

वह छोटे बेटे अनुज को अपने साथ ले गया था. अनुज को उस ने एक परिचित की कार में बिठा कर अपनी साली के पास छोड़ दिया था, जो शिक्षिका है.

अब पुलिस के पास सिवाय अनुमान के कुछ नहीं बचा था. इस से आखिरी अंदाजा यह लगाया गया कि विजय पिंकी के बुलाने पर उस के घर आया था और किसी बात पर विवाद हो जाने की वजह से उस ने पिंकी की हत्या कर के घर में आग लगा दी थी. उस के बाद खुद भी साड़ी का फंदा बना कर लटक गया. फंदा उस का वजन सह नहीं पाया, इसलिए वह गिर कर बेहोश हो गया. उसी हालत में दम घुटने से उस की भी मौत हो गई होगी.

बाद में यह बात भी निकल कर आई कि विजय पिंकी से दोबारा प्यार नहीं करने लगा था, बल्कि उस की बेवफाई से वह खार खाए बैठा था. उस दिन मौका मिलते ही उस ने पिंकी को उस की बेवफाई की सजा दे दी. लेकिन बदकिस्मती से खुद भी मारा गया.

सच क्या था, यह बताने के लिए न पिंकी है और न विजय. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक दोनों की मौत दम घुटने से हुई थी, लेकिन पिंकी के पेट पर एक धारदार हथियार का निशान भी था, जो संभवत: तवे का था. विजय के सिर पर लगी चोट से अंदाजा लगाया गया कि खुद को फांसी लगाते वक्त वह गिर गया था, इसलिए उस के सिर में चोट लग गई थी.

यही बात सच के ज्यादा नजदीक लगती है कि विजय ने पहले पिंकी को मारा, उस के बाद खुद भी फांसी लगा ली. लेकिन क्यों? इस का जवाब किसी के पास नहीं है. क्योंकि वह वाकई में पत्नी को बहुत चाहता था, पर उस की बेवफाई की सजा भी देना चाहता था. जबकि पिंकी की मंशा उस से दोबारा पैसे ऐंठने की थी. शायद इसी से वह और तिलमिला उठा था.

पिंकी समझदारी से काम लेती तो विजय की कम आमदनी में करोड़ों पत्नियों की तरह अपना घर चला सकती थी. पर अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की जिद और ख्वाहिशें उसे महंगी पड़ीं, जिस से उस के बच्चे अनाथ हो गए. अब उन की चिंता करने वाला कोई नहीं रहा.

दिलीप कहीं से शक के दायरे में नहीं था. उस का हादसे के समय पहुंचना भी एक इत्तफाक था. परेशान तो वह भी पिंकी की बढ़ती मांगों से था, जिन से इस तरह छुटकारा मिलेगा, इस की उम्मीद उसे बिलकुल नहीं रही होगी. ExtraMarital Affair

Love Crime: प्रेमिका के प्लान में बच्चे बने गवाह

Love Crime: राजधानी दिल्ली से सटे गजियाबाद के कवि नगर थाने की पुलिस 35 वर्षीय महेंद्र राणा नाम के व्यक्ति की मौत को ले कर उलझ गई थी. उस की लाश की स्थिति और डबडबाए आंसुओं से भरी पत्नी समेत रोतेबिलखते बच्चों को देख कर पुलिस ने शुरुआत में आत्महत्या का मामला समझ लिया था.

दरअसल, उस की पत्नी कविता 30 नवंबर,2022 की रात अपने पति महेंद्र राणा को गाजियाबाद के सर्वोदय अस्पताल में ले कर पहुंची थी. वह उसी अस्पताल में नर्स थी.

महेंद्र राणा की हालत देखते ही इमरजेंसी में तैनात डाक्टर ने कहा, ‘‘क्या कविता, इतनी समझदार नर्स हो कर भी तुम ने इसे लाने में देर क्यों कर दी?’’

‘‘सर! मैं इन की हालत देख कर घबरा गई थी…कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं?’’ कविता रूआंसी हो कर बोली.

‘‘ठीक है, ठीक है! अब जल्द से वार्डबौय को बुला कर औक्सिजन लाने को बोलो.’’ कह कर डाक्टर ने महेंद्र के सीने को दोनों हथेलियों से दबा कर दिल को पंपिंग करना शुरू कर दिया.

डाक्टर के ऐसा करते ही महेंद्र के मुंह से कुछ निकलने लगा. तभी डाक्टर ने कहा, ‘‘अरे, यह क्या, इस के मुंह में गुटखा भरा है!… आ कर निकालो इसे!’’

‘‘जी सर!… यही तो मुसीबत है!! बारबार कह कर मैं थक गई हूं. इन का गुटखा छूटता ही नहीं है!’’ कविता बोली.

‘‘ठीक है! ठीक है!! तुम्हारा पति जल्द अच्छा हो जाएगा… उस के बाद इसे समझा देना… गुटखा तो एकदम बंद कर दे…! और क्याक्या नशा करता है तुम्हारा पति?’’ डाक्टर जांच के साथसाथ सवाल भी करते जा रहा था.

जैसे ही कविता आधी रात के करीब बेहोशी की हालत में अपने पति को इमरजेंसी के गेट पर ले कर आई, उस के साथ काम करने वाले दूसरी नर्स और स्टाफ वाले चौंक गए. उन्होंने कविता के पति को आटो से स्ट्रेचर पर लिटाने और इमरजेंसी वार्ड में पहुंचाने में मदद की.

वहां तैनात डाक्टरों ने भी देरी किए बगैर कविता के पति का इलाज शुरू कर दिया. तबतक कविता ने मरीज की भरती का पर्चा बनवा लिया था.

डाक्टर ने वार्डबौय की मदद से फटाफट बेहोश महेंद्र की नाक में औक्सिजन लगाई. इमरजेंसी जांच के लिए हर्टबीट जांचने वाली मशीन भी लगा दी गई… लेकिन मशीन में दिल की धड़कनों का जरा भी संकेत नहीं मिला. जब डाक्टर हथेलियों से उस के सीने पर दबाव बनाते तब मशीन की स्क्त्रीन पर थोड़ी हरकत होती लेकिन फिर बंद हो जाती.

डाक्टर के साथसाथ कविता भी अपने पति की नब्ज टलोलने लगी. नब्ज में उसे भी कोई गति नहीं मिली…फिर वह मायूसी से डाक्टर के चेहरे को देखने लगी…डाक्टर ने भी उस के चेहरे को देखा और इतना ही बोल पाया,‘‘ही इज नो…!’’

‘‘समझ गई डाक्टर साहब…’’ कहती हुई वह रोने लगी. साथ खड़ी दूसरी नर्स और स्टाफ ने उसे सहारा दिया. वहीं कुरसी पर बिठाया.

‘‘अब क्या कर सकती हो कविता, उस की जिंदगी यहीं तक थी…!’’

‘‘जी डाक्टर!’’ कहती हुई कविता की आंखों से आंसू बह निकले. इमरजेंसी वार्ड में थी…वहां खुलकर रो भी नहीं सकती थी. साथी नर्सों ने उस के आंसू पोछे. वह बारबार दुपट्टे से आंसू पोछती रही और सुबकती रही.

कुछ मिनट बाद डाक्टर ने कहा, ‘‘अस्पताल की फर्मालिटी पूरी कर लो. डेथ सर्टिफिकेट बनवाने के लिए जरूरी हैं. मरीज की मौत आकस्मिक है. मरने वाले की उम्र भी काफी कम है. कानूनी प्रक्त्रिया भी पूरी करनी होगी…’’

‘‘… नहींनहीं डाक्टर! उतना सबकुछ करने की जरूरत नहीं है…मरने वाला तो हमें छोड़ कर चला गया…बच्चों को अनाथ बना गया…अब वह सब क्यों?…उस से वह लौट तो नहीं आएगा न!’’ बोलती हुई कविता फिर रोने लगी.

‘‘देखो अस्पताल का रूल तो तुम्हें भी मालूम है, वह तो पूरा करना ही होगा.’’ डाक्टर ने समझाया.

‘‘नहींनहीं! वह सब करेंगे. तब पुलिस पोस्टमार्टम करवाएगी. मैं नहीं चाहती कि मेरे पति की मरने के बाद चीरफाड़ हो.’’

‘‘लेकिन, उस के बगैर अस्पताल का प्रशासन  लाश को यहां से बाहर जाने नहीं देगा…और श्मशान तक पुलिस तुम से सवालजवाब करेगी. उसी सब के लिए तो नियम और कानून हैं…’’ डाक्टर ने फिर एक बार समझाया.

तब तक सीनियर डाक्टर भी वहां आ गए. उन के साथ और दूसरे डाक्टर और प्रशासनिक अधिकारी भी थे. कविता उन से लाश ले जाने की विनती करने लगी. किंतु उन्होंने भी वही कहा जो इलाज करने वाले डाक्टर ने कहा.

कविता की लाख मिन्नतों के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने प्रोटोकाल का पालन करते हुए पुलिस को सूचना दे दी. पुलिस ने प्राथमिकी में डाक्टर के उपचार से पहले उसे भरती के समय की स्थिति से अवगत करवाते हुए सारे दस्तावेजों की जांचपरख की. मौत संदिग्ध हालत में हुई थी.

मृतक का मुंह गुटखे से भरा था और शराब की गंध भी आ रही थी. इसे देखते हुए एसएचओ ने इस पूरे मामले के बारे में एसपी (सिटी) निपुण अग्रवाल  को सूचना दे दी. वहां से मिले आदेश के मुताबिक मृतक का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. इसी बीच कविता के रोते बिलखते दोनों बच्चे भी वहां पहुंच गए. अपने पिता को मृत पा कर वे और जोरजोर से रोने लगे. कविता ने बच्चों को चुप करवाते हुए अपनी बाहों में लेने की कोशिश की लेकिन वे मां से छिटक कर अलग दीवार से लग गए.

वहां मौजूद लोगों के साथसाथ पुलिस को भी यह अजीब लगा कि बच्चे गम की घड़ी में मां से अलग क्यों चले गए. मृतक का अगले रोज ही पोस्टर्माटम हो गया और उस की लाश कविता और उस के घर वालों को सौंप दी गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक पुलिस ने कविता को शहर से कहीं भी बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी.

महेंद्र राणा अपनी पत्नी कविता और 2 बच्चों के साथ गाजियाबाद के थाना कवि नगर क्षेत्र में स्थित शास्त्री नगर के एसजे-50 में रहता था. कविता पास के ही सर्वोदय अस्पताल में नर्स थी. उस की मौत को ले कर आसपास के लोग हैरान थे. पुलिस भी हैरान थी कि अच्छा भला स्वस्थ दिखने वाले महेंद्र की अचानक मृत्यु कैसे हो सकती है. जबकि मैडिकल रिपोर्ट में वैसी किसी खास बीमारी का भी जिक्र नहीं था. और तो और, रिपोर्ट के अनुसार वह भरती के समय बेहोशी की हालत में था. उस की सांसें भी नहीं चल रही थीं. उस की नब्ज और चेहरे की रंगत देख कर ही डाक्टर उसे मृत समझ गए थे, फिर भी उन्होंने प्राथमिक उपचार शुरू कर दिया था…और जल्द ही उन्होंने मृत घोषित कर दिया.

पुलिस को इसे ले कर संदेह पैदा हो गया था क्योंकि अस्पताल के कुछ स्टाफ ने ही बताया था कि कविता ने अपने पति को मृत हालत में दाखिल करवाया था. उसे मृत घोषित किए जाने के बाद उस ने लाश का पोस्टमार्टम नहीं करवाने और मामले को पुलिस में नहीं जाने देने की पूरी कोशिश की थी. 2 दिन बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई, जिसे पढ़ कर पुलिस चौंक गई, क्योंकि महेंद्र की मौत सांस रुकने के कारण हुई थी, और उस का गला दबाया गया था. इस रिपोर्ट से साफ था कि उस की हत्या की गई थी. इसी नजरिए से जांच शुरू की गई, जो एक ब्लाइंड मर्डर का मामला था.

ऐसे मामले में अकसर पहला संदेह घर के सदस्य ही बनते आए हैं और उन्हीं में कोई न कोई अपराधी निकल आता है. इस लिहाज से कविता शक के दायरे में आ गई. उसे पूछताछ के लिए थाने बुलाया गया. साथ में नाबालिग बच्चों को भी बुलाया. कविता से पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली गई, जबकि बच्चों को अलग कमरे में बिठाकर तरह तरह के वैसे घरेलू सवाल पूछे गए, जिन से उन्हें कविता और महेंद्र के बीच अनबन या तनाव की कोई बात मालूम हो सके.

बच्चों ने पूछताछ में जल्द ही बता दिया कि उस की मां और पिता के बीच अकसर लड़ाईझगड़े होते रहते थे. पापा शराब पी कर घर आते थे. उन के घर आते ही मां (कविता) उन से झगड़ने लगती थी. कोई न कोई कारण और बहाना बना कर काफी समय तक बहस करती थी. यहां तक कि कई बार उन के बीच हाथापाई तक हो जाती थी. बच्चों का एक बयान पुलिस के लिए महत्वपूर्ण  बन गया. कविता की 13 साल की बेटी ने बताया कि घटना की रात उस की मां पिता के सीने पर बैठी थी और उस का हाथ पिता की  गरदन पर था. इस पर जब उस ने पूछा कि वह क्या कर रही है तब कविता गुस्से में बोली थी, ‘तेरे बाप के मुंह से गुटखा निकाल रही हूं.’

उस के कुछ समय बाद ही कविता परेशान हो गई थी और जल्दी से पिता को अस्पताल ले जाने की तैयारी करने लगी थी. यहां तक कि आटो में बिठाने के समय उस के पिता में कोई हलचल नहीं थी. उसे दोनों ने टांगकर आटो में बिठाया था. उस के एक घंटे बाद ही मां का फोन आया कि उस के पिता की हार्टअटैक से मौत हो गई है. दूसरी तरफ कविता से भी सख्ती के साथ पूछताछ की गई. उस का मोबाइल ले कर वाट्सऐप मैसेज चेक किए गए. उस आधार पर भी उस से पूछताछ की गई.

उस ने मैसेज के मुताबिक घुमावदार जवाब दिए. कुछ मैसेज विनय शर्मा के भी थे. उस के कई मैसेज बेहद करीबी और राजदार बनने की गवाही दे रहे थे. जब कि पुलिस ने पाया कि महेंद्र की अस्पताल में भरती से लेकर 3-4 दिनों तक उस का कोई अतापता नहीं था. विनय शर्मा से उस के संबंध के बारे में पूछा गया. पहले तो कविता ने उसे ले कर मना किया कि वह उसे नहीं जानती. जल्द ही पुलिस के सवालों के जाल में वह फंस गई और उस ने सच उगलते हुए कह दिया कि विनय उस का एक खास दोस्त है. जहां कविता काम करती थी वहां विनय इंश्योरेंस का काम देखता था.

महेंद्र को विनय शर्मा और कविता से संबंध की भनक लग गई थी. इसे ले कर उस ने पत्नी पर आरोप भी लगाए थे, तब उलटे कविता ने ही उस पर जवाबी हमला बोल दिया था. उस के बाद से महेंद्र और अधिक शराब पीने लगा था. रात को एकदम से मदहोशी में घर आता था. घटना की रात भी महेंद्र की हालत वैसी ही थी. उस दिन भी वह लड़खड़ाते कदमों से घर आया और अपने कमरे जा कर सीधे बेड पर लेट गया था. कविता को लगा कि मौका अच्छा है और उसे गालियां सुनाती हुई कमरे का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया था, उस ने दरवाजे की कुंडी नहीं लगाई थी.

कुछ देर बाद उस की बेटी ने देखा कि कमरे से मां के झगड़े की आवाज आनी बंद हो गई है तब उस ने कमरे में झांक कर देखा था. उस ने पाया कि उस की मां पिता के सीने पर बैठी उन का गला दबा रही है. विनय शर्मा भी शक के दायरे में आ गया और उसे भी पूछताछ के लिए थाने बुलाया गया. कड़ाई से पूछताछ और नौकरी जाने के भय से उस ने स्वीकार कर लिया कि उस के कविता के साथ प्रेम संबंध थे, लेकिन महेंद्र की मौत के बारे में कुछ नहीं जानता है.

विनय शर्मा द्वारा प्रेम संबंध स्वीकारे जाने के बाद कविता ने बताया कि वह विनय को बहुत प्यार करती थी. लेकिन उन दोनों के अवैध संबंधों की जानकारी पति महेंद्र को हो गई थी. जिस के बाद महेंद्र रोजरोज उस के साथ क्लेश करता था. इतना ही नहीं, वह उस की पिटाई भी कर देता था. पति की रोजरोज की कलह से वह परेशान हो चुकी थी और उस से छुटकारा पाना चाहती थी. एक बार अपने दिल की बात उस ने प्रेमी विनय को भी बता दी थी. जब विनय से पति की शराब पीने की लत का जिक्र किया था, तब उस ने महेंद्र को रास्ते से हटाने की योजना बताई थी.

विनय ने कविता को यह भी बताया कि महेंद्र की मौत से उसे दोहरा फायदा होगा.  एक तो उसे शराबी पति से छुटकारा मिल जाएगा, दूसरा लाभ उस की मौत के बाद वह उस के इंश्योरेंस का पैसा भी दिलवा देगा. फिर क्या था कविता की आंखों में चमक आ गई, और उस ने प्रेमी के कहे मुताबिक पति को रास्ते से हटाने की योजना को अंजाम तक पहुंचा दिया. फिर को कविता ने शराब में धुत पति महेंद्र राणा की गला दबाकर हत्या कर दी और उस के मुंह में गुटखा भर दिया.

इस के बाद वह उसे उसी अस्पताल में ले गई, जहां वह नौकरी करती थी. उस ने सोचा कि वहां से वह परिचित डाक्टर से पति की हार्टअटैक से हुई मौत लिखवा लेगी. लेकिन ऐसा नहीं हो सका. बल्कि मामला संदिग्ध होने पर डाक्टर ने ही पुलिस को सूचना दे दी. इस तरह से पुलिस को मोबाइल से कुछ वाट्सऐप चैट और रिकौर्डिंग के जरिए महेंद्र की हत्या की गुत्थी सुलझाने में सफलता मिल गई.

विनय ग्रेटर नोएडा के कुड़ी खेड़ा गांव का रहने वाला है. पूरी जांचपड़ताल के बाद कविता को हत्या का और विनय को हत्या का षड्यंत्र रचने का आरोपी बनाया गया. पुलिस ने कविता और विनय से पूछताछ कर ने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया. जहां से  दोनों को  जेल भेज दिया. Love Crime

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित)

Hindi Story: कर्मों का फल – कैसे बदली सुनील की जिदंगी

Hindi Story: हजारीबाग की हरीभरी वादियों में बसे टनकपुर गांव की गिनती आदर्श गांवों में होती थी. झिलिया नदी के तट पर बसे इस गांव की आबादी तकरीबन सवा सौ परिवारों की थी.अयोध्या राम गांव के अमीर लोगों में से एक थे. मजबूत कदकाठी के चलते उन की अलग पहचान थी. उन के पास खेतखलिहान, नौकरचाकर थे.

वर्तमान समय में किसी चीज की कमी नहीं थी. लेकिन पर्वत्योहार के मौके पर उन की स्वर्गीय पत्नी सुलोचना की याद ताजा हो जाती थी, जिन्होंने बेटे सुनील को जन्म देने के बाद अस्पताल में ही दम तोड़ दिया था.सुनील का लालनपालन अयोध्या राम ने खुद किया था. पुत्र मोह में उन्होंने दूसरी शादी नहीं की थी. पता नहीं सौतेली मां कैसी मिलेगी, यह सोच कर उन्होंने अपने लिए आए हर रिश्ते को मना कर दिया था.

टनकपुर में हर साल हाई स्कूल के निकट बने मंदिर में भारी मेला लगता था, जिस में गांवदेहात में बनी चीजों से ले कर शहर में बने फैंसी सामान तक बिकते थे. 3 दिन के इस मेले में झूले, जादू घर, मौत का कुआं, कठ घोड़वा जैसे मनोरंजन के साधन थे, जो मेला देखने वालों के आकर्षण का केंद्र थे. बच्चों के लिए तरहतरह के खिलौने, औरतों के लिए सजनेसंवरने की चीजें भी खूब बिकती थीं.

टनकपुर के आसपास के लोग भी मेले में पहुंचते थे. गांव के लोग बहती झिलिया नदी में स्नान कर मंदिर में पूजाअर्चना करते और मेले में से सामान खरीद कर घर लौट जाते. वहीं बगल में मवेशियों का हाट लगा हुआ था, जहां तरहतरह के मवेशी बिकने के लिए आए हुए थे. मेले में भेड़, बैल, बकरा, मुरगा की लड़ाई की प्रतियोगिता भी होती थी. जीतने वाले पशु मालिकों को नकद इनाम आयोजकों द्वारा दिया जाता था. पशुओं की सेहत व सुंदरता की परख भी की जाती थी.

अयोध्या राम अपने बैलों को नहला कर और रंगबिरंगे रंगों से सजा कर सजी हुई बैलगाड़ी में जोत कर मेले में पहुंचे. बैलगाड़ी को एक पेड़ की छाया में खड़ा कर बापबेटा लिट्टी की दुकान पर चले गए और वहां गरमागरम लिट्टीचोखा और हरी मिर्च का स्वाद लिया. लिट्टी खाते समय सुनील की नजर बकरी के एक नटखट खस्सी पर जा पड़ी. उस का सफेद रंग, शीशे जैसी चमचमाती आंखें, खड़़े कान, उस का उछलनाकूदना और मचलना बहुत ही मनभावन था. सुनील अपने पिता से वह खस्सी खरीदने की जिद करने लगा.

अयोध्या राम ने भी सोचा कि बेटा घर में अकेला रहता है. खस्सी का साथ मिलेगा, तो उस का समय अच्छा कट जाएगा. उन्होंने बिना मोलभाव किए उस खस्सी को 1,000 रुपए में खरीद लिया. घर के अहाते में ला कर खस्सी को छोड़ दिया. सुनील खस्सी के साथ इतना घुलमिल गया कि अब वह उसे अपने बिछावन पर सुलाने लगा. देखते ही देखते 4 साल में वह खस्सी बकरा बन गया. सुनील ने उस की निडरता को देख कर उस का नाम शेरा रख दिया था, साथ ही उस के गले में पीतल की एक घंटी भी बांध दी थी.

जब शेरा उछलताकूदता तो घंटी की ‘टनटन’ की मधुर आवाज सब का मन मोह लेती. पूरे गांव में शेरा की चर्चा होने लगी थी. गांव के मंदिर में फिर मेला लगा और उस में मवेशियों की प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिस में शेरा ने भी भाग लिया. उस ने खस्सी मुकाबला, परेड और दौड़ में पहला नंबर पाया. दूसरे खस्सी उस का मुकबला नहीं कर सके. तीनों प्रतियोगिताओं में सुनील को 3,000 रुपए मिले. शेरा की यह बढ़त कई साल तक जारी रही.

अब टनकपुर के लोग शेरा को इतना प्यार करते, जैसे वह उन के घर का सदस्य हो. वह दिनरात सुनील के साथ रहता, उस के साथ खातापीता और घूमता था. इधर सुनील ने अपने गांव के स्कूल से मैट्रिक पास कर ली थी. अयोध्या राम ने उस का दाखिला रांची के नामीगिरामी कालेज में करा दिया था. कालेज के होस्टल में उस के रहने का इंतजाम हो गया था.

कालेज में सीधासादा सुनील बुरे लड़कों की संगत में पड़ गया. गबरी गाय का दूधदही खाने वाला सुनील अब कालेज में नशा करने लगा था. इतना ही नहीं, अब सुनील स्मैक की सप्लाई करने लगा था. वह अपनी फुजूलखर्ची को पूरा करने के लिए अपने पिता से और ज्यादा रुपयों की मांग करता था.

सुनील के ड्रग्स लेने की जानकारी कालेज के शिक्षकों द्वारा प्रिंसिपल तक पहुंच गई. नतीजतन, पहले उसे चेतावनी दी गई और बाद में जब वह नहीं माना, तो प्रिंसिपल ने उसे कालेज से निकाल दिया.

सुनील कालेज से अपना सामान समेट कर अपने घर टनकपुर पहुंचा. बेटे को देख कर अयोध्या राम ने कालेज छोड़ने की वजह पूछी, तो सुनील ने उन्हें बताया कि कोरोना काल में कालेज बंद हो गया है. कालेज की पढ़ाई औनलाइन घर पर होगी. इसी बहाने सुनील ने लैपटौप खरीदने के लिए अपने पिता से 65,000 रुपए झटक लिए. पैसा मिलते ही सुनील रांची चला गया. वहां उस ने 15,000 रुपए में एक पुराना लैपटौप खरीदा और बाकी रुपयों की उस ने स्मैक और नशे की गोलियां खरीद लीं.

रांची से लौटने के बाद वह घर में भी नशा करने लगा. जब उसे नशा हो जाता, तो वह शेरा को भी भूल जाता. शेरा को पहले जैसा प्यारदुलार नहीं दे पाता, जिस का आभास शेरा को हो चुका था. जब अयोध्या राम को सुनील के नशेड़ी होने की बात मालूम हुई, तो उन्होंने सुनील के जेबखर्च पर रोक लगा दी. तब सुनील ने अपना लैपटौप पतंग के भाव में बेच डाला. लेकिन, वह पैसा भी खत्म होने के बाद सुनील अपना सिर धुन रहा था कि स्मैक के लिए पैसा कहां से लाए. पास में बैठा शेरा उस को निरीह आंखों से देख रहा था.

गांव के एक कसाई जुम्मन की नजर शेरा पर थी. वह शेरा को खरीदने के लिए मौके की तलाश में था. एक दिन वह सुनील के पास पहुंचा और बोला, ‘‘सुनील बाबू, आप को कुछ पैसे चाहिए क्या?’’ चाहिए तो, पर कौन देगा पैसे? मेरे पास अब बेचने को है ही क्या?’’

सरकार अभी तो आप के पास खजाना है,’’ जुम्मन अपनी चाटुकारिता पर उतर आया. कैसा खजाना? क्यों मजाक करते हो जुम्मन भाई.’’‘हुजूर, शेरा तो आप का खजाना ही है. कहिए तो इस के लिए 12,000 रुपए अभी गिन दूं…’’12,000…’’ यह सुन कर सुनील का मुरझाया मन खिल उठा. उस की नजरें शेरा पर जा कर ठहर गईं. उस ने शेरा को देखा और जुम्मन से बोला, ‘‘अच्छा, लाओ रुपए.’’ जुम्मन ने रुपए निकालने में देर न की. उस ने तुरंत अपनी झोली में हाथ डाला और नोट सुनील के हाथों पर रख दिए.

अब जुम्मन शेरा के पास आया और उस के पुट्ठे पर हाथ फेरा. साथ ही, उस की कमर को ऊपर उठा कर वजन का अंदाजा लगाया. उस ने बिना देर किए शेरा को ले जाने के लिए उस की गरदन में रस्सी बांध कर खींचा, मगर शेरा अपनी जगह से हिला तक नहीं.जब जुम्मन ने पूरा जोर लगा कर शेरा को खींचा, तो वह मिमियाने लगा. पर सुनील को कोई खास फर्क नहीं पड़ा.

उस का ध्यान तो जेब में रखे पैसों पर था. लेकिन रात को उसे शेरा की खूब याद आई और वह अगली ही सुबह बाजार में जुम्मन की दुकान पर जा पहुंचा. उस ने अपनी जेब से 12,000 रुपए निकाल कर जुम्मन की तरफ बढ़ाए, तो जुम्मन ने शेरा के कटे हुए सिर व टंगे हुए धड़ को दिखाया.

यह देख कर सुनील बेकाबू हो गया और वह एकाएक जुम्मन पर टूट पड़ा. उस ने जुम्मन का चाकू छीन लिया. उन दोनों में मारपीट होने लगी कि इसी दौरान वे एक दीवार से टकरा गए. दीवार सुनील के ऊपर भरभरा कर गिर पड़ी और वह गंभीर रूप से घायल हो कर बेहोश हो गया.

आसपास के लोगों ने सुनील को मलबे से बाहर निकाला. इस घटना की खबर अयोध्या राम को दी गई. वे एक डाक्टर और पंचायत के मुखिया के साथ वहां पहुंचे. डाक्टर ने सुनील के प्राथमिक उपचार के बाद उसे रांची ले जाने की सलाह दी.

अयोध्या राम की हिम्मत ने जवाब दे दिया. तब मुखियाजी ने एक एंबुलैंस मंगवाई और सुनील को ले कर रांची रवाना हुए.

अस्पताल के बड़े डाक्टर जल्दी ही वहां पहुंचे और स्ट्रैचर पर ही सुनील का चैकअप करते हुए बोले, ‘‘आप लोगों ने लाने में देर कर दी. यह लड़का अब इस दुनिया में नहीं है…’’

इतना सुनते ही उस माहौल में अयोध्या राम के चीखने की आवाज गूंजने लगी. गांव के मुखिया उन्हें समझाने में लगे हुए थे. वे किसी तरह उन्हें ले कर कार में बैठे और गांव जाने के लिए रवाना हो गए. Hindi Story

Crime Story: बेटी के नाम पर कलंक है हरमीत कौर

Crime Story: पंजाब के जिला गुरदासपुर के कस्बाथाना धारीवाल के रहने वाले जाट सरदार पलविंदर सिंह के परिवार में पत्नी परमजीत कौर के अलावा 20 साल की बेटी हरमीत कौर थी. वह पंजाब पुलिस में हवलदार थे और इन दिनों पीएसी की 75वीं बटालियन की ओर से धार्मिक गुरु बाबा भनियार वाले की सुरक्षा में तैनात थे.

वह शरीफ, ईमानदार और जांबाज सिपाही थे. पलविंदर सिंह एक जिम्मेदार पिता और पति ही नहीं, समाजसेवक भी थे. उन्होंने कई रक्तदान कैंप अपने खर्चे पर लगवाए थे और जरूरतमंद लोगों के लिए सैकड़ों यूनिट खून जमा करा कर प्रशासन को दिया था. बाबा भनियार वाले की सुरक्षा में तैनाती के बाद से वह काफी व्यस्त हो गए थे. वह महीने, डेढ़ महीने में ही घर आ पाते थे.

28 अगस्त, 2016 को वह 4 दिनों की छुट्टी ले कर घर आए थे. सोमवार की रात को खाना खा कर वह आंगन में ही चारपाई डाल कर सो गए थे, जबकि पत्नी और बेटी अपनेअपने कमरों में जा कर सो गई थीं. रात करीब 2 बजे कमरे में सो रही परमजीत कौर को आंगन में सो रहे पति के कराहने की आवाज सुनाई दी तो वह कमरे से निकल कर पति के पास आ गई. उस समय पलविंदर सिंह तड़पते हुए छाती को जोरजोर से मसल रहे थे.

परमजीत कौर को लगा कि पति को हार्ट अटैक आया है, वह भी उन के सीने को सहलाने लगी. तभी उन्होंने देखा कि पति के नाक और मुंह से खून निकल रहा है. यह देख कर वह घबरा गईं और जल्दी से जा कर पड़ोस में रहने वाले जेठ मंगल सिंह को बुला लाई. पत्नी के साथ वह तुरंत आ गए. लेकिन जब वह आए तो पलविंदर एकदम शांति से बिस्तर पर लेटे थे. उन्होंने उन्हें हिलाडुला कर भी देखा. ऐसा लगा, जैसे उन में जान ही नहीं है. अब तक मंगल सिंह का बेटा और पलविंदर की बेटी हरमीत कौर भी वहां आ गई थी.

पलविंदर को उठा कर गाड़ी में डाल कर गुरदासपुर के सिविल अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने चैकअप कर के उन्हें मृत घोषित कर दिया. घर वालों ने बताया था कि यह मौत हार्ट अटैक से हुई है, लेकिन चैकअप करने वालों डाक्टरों को यह मौत हार्ट अटैक से नहीं लगी तो उन्होंने इस की सूचना थाना धारीवाल पुलिस को दे दी. सूचना मिलने के कुछ देर बाद ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर कुलवंत सिंह अधीनस्थों के साथ सिविल अस्पताल पहुंच गए थे.

पलविंदर की लाश कब्जे में ले कर कुलवंत सिंह ने परमजीत कौर से पूछताछ की तो उन्होंने उन से भी बताया कि रात में सोने के दौरान उन की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी. इस के बाद कुलवंत सिंह ने सीआरपीसी की धारा 174 के तहत काररवाई करते हुए मौत की पुष्टि के लिए लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी में रखवा दिया.

पर परमजीत कौर का कहना था कि उस के पति की मौत हार्ट अटैक से हुई है तो पोस्टमार्टम कराने की क्या जरूरत है, अंतिम संस्कार के लिए लाश उन के हवाले कर दी जाए. इस बात को ले कर परमजीत कौर और हरमीत कौर ने अस्पताल में अच्छाखासा हंगामा भी किया, लेकिन कुलवंत सिंह ने यह कह कर उन्हें शांत करा दिया कि सच्चाई का पता लगाने के लिए यह जरूरी है. यह 30 अगस्त, 2016 की बात है.

सिविल अस्पताल के डाक्टरों ने एक पैनल बना कर उसी दिन पलविंदर सिंह की लाश का पोस्टमार्टम कर के रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी, जो काफी चौंकाने वाली थी. रिपोर्ट के अनुसार मृतक का गला किसी तेजधार हथियार से काटा गया था. श्वांस नली कटने से पलविंदर की मौत हुई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से कुलवंत सिंह को यह मामला काफी संदिग्ध लगा. उन्हें परमजीत का बयान रहस्यमय लगने लगा, इसलिए उन्होंने तुरंत एएसआई जसबीर सिंह और हैडकांस्टेबल गुरमुख सिंह को मृतक पलविंदर सिंह के घर भेज कर घटनास्थल को सील करा दिया, जिस से घटनास्थल पर किसी चीज से छेड़छाड़ न की जा सके. इस के बाद उन्होंने इस घटना की सूचना अपने अधिकारियों को दे दी थी.

चूंकि मामला विभाग के एक पुलिसकर्मी की रहस्यमयी मौत का था,इसलिए सूचना मिलते ही एसएसपी जगदीप सिंह, एसपी प्रदीप मलिक, डीएसपी ए.डी. सिंह मृतक पलविंदर सिंह के घर पहुंच गए थे. क्राइम टीम, डौग स्क्वायड को भी बुलवा लिया गया था.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया तो उन्हें यह मामला हत्या का लगा. क्योंकि पलविंदर सिंह जिस बिस्तर पर सोए थे, वह खून से तर था. नाक और कान से इतना खून नहीं निकल सकता था.

एसएसपी जगदीप सिंह के आदेश पर थाना धारीवाल पुलिस ने पलविंदर सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. कुलवंत सिंह को लगा था कि परमजीत कौर को या तो कुछ पता नहीं है या फिर वह झूठ बोल रही है. क्योंकि हार्ट अटैक से हुई मौत और हत्या में जमीनआसमान का फर्क होता है.

उन्होंने एएसआई जसबीर सिंह, विजय कुमार, हैडकांस्टेबल ओंकार सिंह, गुरमुख सिंह, कुलविंदर सिंह, कांस्टेबल मंजीत को मिला कर एक टीम बनाई और उसे सच्चाई का पता लगाने के लिए लगा दिया. पड़ोसियों से की गई पूछताछ में कुलवंत सिंह को पता चला कि पलविंदर सिंह की बेटी हरमीत कौर से किसी बात को ले कर अकसर कहासुनी होती रहती थी.

ऐसी ही एक हैरान करने वाली जानकारी यह भी मिली कि हरमीत कौर का किसी लड़के से प्रेमसंबंध चल रहा था और वह उस से शादी करना चाहती थी. जबकि पलविंदर सिंह इस शादी के लिए राजी नहीं थे, लेकिन उन की पत्नी परमजीत कौर राजी थी. इसी बात को ले कर अकसर घर में झगड़ा होता रहता था.

कुलवंत सिंह ने इस बात को ध्यान में रख कर जांच शुरू की. महिला सिपाही सुरजीत कौर ने हरमीत कौर से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि अपने प्रेमी के साथ मिल कर उसी ने वासनापूर्ति के लिए जिस बाप ने अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया, पढ़ालिखा कर समाज में जीने का मकसद दिया, उसी को मार दिया था.

इस के बाद परमजीत कौर ने भी स्वीकार कर लिया था कि उस ने भी बेटी को बचाने के लिए झूठ बोला था. कुलवंत सिंह ने उसी दिन हरमीत कौर की निशानदेही पर गांव दोस्तपुर से हरमीत कौर के प्रेमी गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी तथा उस के दोस्त मनजिंदर सिंह को गिरफ्तार कर सभी को जिला मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर विस्तृत पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था.

रिमांड अवधि के दौरान सभी से हुई पूछताछ में पलविंदर सिंह की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह अधिक लाडप्यार में बिगड़ी औलाद और स्वार्थ की खोखली नींव पर टिके रिश्ते की कहानी थी—

हरमीत कौर बचपन से ही पलविंदर सिंह की बेहद लाडली थी. वह बेटी को दुनिया की तमाम खुशियां देना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने उस की पढ़ाई महंगे स्कूलों में कराई. वह चाहते थे कि हरमीत कौर उच्च शिक्षा हासिल कर आईपीएस बने. लेकिन कालेज में कदम रखते ही हरमीत कौर उन के अरमानों पर पानी फेर कर आधुनिकता के रंग में रंग कर आशिकी के चक्कर में पड़ गई.

हरमीत कौर सुंदर तो थी ही, उस की बातचीत की शैली और व्यक्तित्व भी काफी प्रभावशाली था. उस के चाहने वाले तो बहुत थे, पर उस का दिल गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी पर आ गया.  धीरेधीरे उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. नजदीकियां बढ़ीं तो दोनों में शारीरिक संबंध भी बन गए. फिर तो हरमीत को इस का ऐसा चस्का लगा कि वह गुरप्रीत से बाहर तो मिलती ही थी, घर भी बुलाने लगी.

क्योंकि घर में उसे पूरी तरह एकांत मिलता था. उस की मां का अलग कमरा था. वह ज्यादातर अपने कमरे में ही रहती थीं. पलविंदर महीने, डेढ़ महीने में आते थे. ऐसे में हरमीत मरजी की मालिक बन गई थी. यही नहीं, वह दिन पर दिन जिद्दी भी होती जा रही थी.

अपने इसी जिद्दी स्वभाव की वजह उस ने तय कर लिया था कि वह शादी करेगी तो गुरप्रीत से ही करेगी. पलविंदर सिंह बेटी के इस फैसले और हरकत से अंजान उस के भविष्य को संवारने के लिए एकएक पैसा जोड़ रहे थे. जिस दिन उन्हें हरमीत की इस आवारगी का पता चला, गहरा आघात लगा.

पहले तो उन्होंने पत्नी परमजीत को आड़े हाथों लिया, उस के बाद हरमीत कौर की खबर ली. उन्होंने साफसाफ कह दिया कि इश्कमुश्क और शादीब्याह को दिमाग से निकाल कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. अब अगर उन्होंने सुन लिया कि वह उस लड़के से मिली है तो ठीक नहीं होगा.

लेकिन जिद्दी हरमीत कौर ने पिता की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया और बेहिचक पहले की ही तरह गुरप्रीत से मिलती रही. ऐसे में ही किसी दिन उस ने गुरप्रीत से कहा, ‘‘पापा के जीते जी तो हम दोनों कभी शादी कर नहीं सकते, क्यों न हम दोनों भाग कर शादी कर लें?’’

‘‘घर से भाग कर शादी करने के लिए काफी रुपयों की जरूरत होती है, जो हमारे पास नहीं है.’’ गुरप्रीत ने कहा तो हरमीत ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘तुम रुपयों की चिंता मत करो. मेरे पापा ने मेरे भविष्य के लिए बहुत रुपए जमा कर रखे हैं.’’

हरमीत कौर ने गुरप्रीत के साथ भागने की कई बार कोशिश की, लेकिन हर बार वह यह सोच कर शांत बैठ गई कि अंजान जगह पर अंजान लोगों के बीच वह कैसे रह पाएगी? एक दिन किसी ने पलविंदर को हरमीत और गुरप्रीत के मिलने की जगह और समय बता दिया तो पलविंदर ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया.

इस बार उस ने हरमीत कौर को लताड़ा ही नहीं, 2-4 थप्पड़ जड़ कर हाथ जोड़ कर रोते हुए कहा, ‘‘मेरे सपने और अपना भविष्य बरबाद मत कर बेटी. मैं यह सब सह नहीं पाऊंगा और आत्महत्या कर लूंगा.’’

हरमीत कौर को पिता पर दया आने के बजाय घृणा हो गई. उस के मन में आया कि पिता की सर्विस रिवौल्वर से गोली मार उन्हें खत्म कर दे. बाद में कह देगी कि किसी बदमाश ने उन पर हमला किया है. इस के बाद दिनरात वह केवल एक ही बात सोचने लगी कि प्रेम कहानी में रोड़ा बन रहे पिता को कैसे रास्ते से हटाया जाए?

एक दिन पलविंदर सिंह पत्नी के साथ सो रहा था, तभी रात 1 बजे उसे हरमीत कौर के कमरे से खटरपटर की आवाजें आती सुनाई दीं. वह उठ कर बाहर आया तो उस के कमरे से एक साए को निकल कर दीवार फांदते देखा.

पलविंदर सिंह समझ गया कि वह गुरप्रीत ही था. अगले दिन ड्यूटी पर जाने से पहले पलविंदर ने हरमीत को खूब समझाया. अंत में उस ने यह भी बताया कि रात को उस ने सब कुछ देख लिया है. वह यह सब बंद कर दे, वरना परिणाम बहुत भयानक होगा.

बस, उसी दिन हरमीत कौर ने तय कर लिया कि अब चाहे कुछ भी हो, वह पिता को जिंदा नहीं छोड़ेगी. उसी दिन गुरप्रीत से मिल कर उस ने पिता की हत्या की योजना बना डाली.

चूंकि गुरप्रीत यह काम अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने जिगरी दोस्त मनजिंदर सिंह को अपने साथ मिला लिया. उस ने इस काम के लिए उसे कुछ पैसे भी देने को कहा. हरमीत कौर ने कुछ रुपए गुरप्रीत को दिए, जिस से उस ने एक तेजधार वाला दातर खरीदा और कुछ रुपए मनजिंदर को दे दिए.

अब उन्हें इंतजार था पलविंदर सिंह के छुट्टी आने का. 29 अगस्त को वह छुट्टी पर घर आए और हरमीत कौर पर नजर रखने के लिए अपना बिस्तर आंगन में लगाया.

हरमीत कौर ने रात 9 बजे गुरप्रीत को पिता के घर आने और आंगन में सोने की सूचना दे दी. रात करीब 1 बजे हरमीत कौर ने उठ कर बाहर के दरवाजे की कुंडी खोल दी, जिस से गुरप्रीत को अंदर आने में परेशानी न हो. रात 2 बजे के करीब गुरप्रीत अपने दोस्त मनजिंदर के साथ हरमीत के घर पहुंचा तो वह उसे बरामदे में खड़ी मिली.

बिना आवाज किए तीनों पलविंदर सिंह की चारपाई के पास पहुंचे. मनजिंदर और हरमीत कौर ने गहरी नींद सो रहे पलविंदर सिंह के हाथपैर पकड़ लिए तो गुरप्रीत ने दातर से उस की श्वांस नली काट दी, जिस से उस की तुरंत मौत हो गई. पलविंदर सिंह की हत्या कर के गुरप्रीत और मनजिंदर चले गए तो हरमीत कौर मां के साथ मिल कर पिता की हार्ट अटैक से हुई मौत का नाटक करने लगी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने वह दातर बरामद कर लिया था, जिस से पलविंदर सिंह की हत्या की गई थी. इस के बाद 3 सितंबर, 2016 को सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

इस तरह स्वार्थी रिश्तों ने खून को पानी बना दिया और एक कानून के रक्षक की बेटी यह भी नहीं सोच सकी कि चाहे कितना भी झूठ क्यों न बोला जाए, सच से आखिर परदा उठ कर ही रहता है. Crime Story

 – कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: हम मर जाएंगे – परिवार वालों ने किया जुदा

Crime Story: 22 फरवरी की सुबह 6 बजे रामपुर गांव के कुछ लोग मार्निंग वाक पर निकले तो उन्होंने पानी की टंकी के पास लिंक मार्ग से 50 मीटर दूर खेत में एक युवक को बुरी तरह से जख्मी हालत में पड़े देखा. युवक की जान बचाने के लिए उन में से किसी ने थाना खानपुर पुलिस को सूचना दे दी.

सूचना प्राप्त होते ही खानपुर थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को भी सूचित कर दिया था. विश्वनाथ यादव जिस समय वहां पहुंचे, उस समय ग्रामीणों की भीड़ जुटी थी. भीड़ को परे हटाते हुए वह खेत में पहुंचे, जहां युवक जख्मी हालत में पड़ा था. युवक की उम्र 24 साल के आसपास थी. उस के सिर में गोली मारी गई थी, जो आरपार हो गई थी. उस के एक हाथ में पिस्टल थी तथा दूसरी पिस्टल उस के पैर के पास पड़ी थी.

जामातलाशी में उस के पास से 2 मोबाइल फोन, आधार कार्ड तथा पुलिस विभाग का परिचय पत्र मिला, जिस में उस का नामपता दर्ज था. परिचय पत्र तथा आधार कार्ड से पता चला कि युवक का नाम अजय कुमार यादव है तथा वह बभरौली गांव का रहने वाला है. तुरंत उस के घर वालों को सूचना दे दी गई.

इंसपेक्टर विश्वनाथ यादव अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह, एएसपी गोपीनाथ सोनी तथा डीएसपी राजीव द्विवेदी आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा युवक के पास से बरामद सामान का अवलोकन किया. देखने से ऐसा लग रहा था कि युवक ने आत्महत्या का प्रयास किया था. अब तक अजय के पिता रामऔतार यादव भी घटनास्थल आ गए थे. वह आत्महत्या की बात से सहमत नहीं थे.

चूंकि अजय यादव मरणासन्न स्थिति में था, अत: पुलिस अधिकारियों ने उसे इलाज हेतु तत्काल सीएचसी (सैदपुर) भिजवाया लेकिन वहां के डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और उसे बीएचयू ट्रामा सेंटर रैफर कर दिया. इलाज के दौरान अजय यादव की मौत हो गई. चूंकि अजय यादव सिपाही था, अत: उस की मौत को एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह ने गंभीरता से लिया. उन्होंने जांच के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया, जिस में क्राइम ब्रांच, सर्विलांस टीम तथा स्वाट टीम को शामिल किया गया.

इस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया, फिर बरामद सामान को कब्जे में लिया. सर्विलांस सेल प्रभारी दिनेश यादव ने अजय के पास से बरामद दोनों फोन की काल डिटेल्स निकाली तो पता चला कि 22 फरवरी की रात 3 बजे एक फोन से अजय के फोन पर एक वाट्सऐप मैसेज भेजा गया था, जिस में लिखा था, ‘तत्काल मिलने आओ, नहीं तो हम मर जाएंगे.’

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जिस मोबाइल फोन से मैसेज भेजा गया था, उस फोन की जानकारी की गई तो पता चला कि वह मोबाइल फोन इचवल गांव निवासी राजेश सिंह की बेटी सोनाली सिंह के नाम दर्ज था. जबकि फोन मृतक अजय की जेब से बरामद हुआ था. अजय और सोनाली का क्या रिश्ता है? उस ने 3 बजे रात को अजय को मैसेज क्यों भेजा? जानने के लिए पुलिस टीम सोनाली सिंह के गांव इचवल पहुंची और उस के पिता राजेश सिंह से पूछताछ की.

राजेश सिंह ने बताया कि उस की बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह आज सुबह से गायब है. हम ने सैदपुर कैफे से उस की औनलाइन एफआईआर भी कराई है. राजेश सिंह ने एफआईआर की कौपी भी दिखाई. राजेश सिंह की बात सुन कर पुलिस टीम का माथा ठनका. राजेश सिंह को गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज करानी थी, तो थाना खानपुर में करानी चाहिए थी. आनलाइन रिपोर्ट क्यों दर्ज कराई? दाल में जरूर कुछ काला था. यह औनर किलिंग का मामला हो सकता था. संभव था अजय और सोनाली सिंह प्रेमीप्रेमिका हों और इज्जत बचाने के लिए राजेश सिंह ने अपनी बेटी की हत्या कर दी हो.

ऐसे तमाम प्रश्न टीम के सदस्यों के दिमाग में आए तो उन्होंने शक के आधार पर राजेश सिंह के घर पर पुलिस तैनात कर दी. साथ ही पुलिस सानिया उर्फ सोनाली सिंह की भी खोज में जुट गई. अजय का मोबाइल फोन खंगालने पर उस का और सोनाली सिंह का विवाह प्रमाण पत्र मिला, जिस में दोनों की फोटो लगी थी.

प्रमाण पत्र के अनुसार दोनों 5 नवंबर, 2018 को कोर्टमैरिज कर चुके थे. इस प्रमाण पत्र को देखने के बाद पुलिस टीम का शक और भी गहरा गया. पुलिस टीम ने सोनाली सिंह के पिता राजेश सिंह व परिवार के 4 अन्य सदस्यों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. 23 फरवरी, 2021 की सुबह पुलिस टीम को इचवल गांव में राजेश सिंह के खेत में एक युवती की लाश पड़ी होने की सूचना मिली. पुलिस टीम तथा अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे और लाश का निरीक्षण किया.

मृतका राजेश सिंह की 25 वर्षीय बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह थी. उस के सिर में गोली मारी गई थी. चेहरे को भी कुचला गया था. निरीक्षण के बाद पुलिस ने सोनाली सिंह के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल गाजीपुर भेज दिया. शव के पास से पिस्टल या तमंचा बरामद नहीं हुआ, लेकिन एक जोड़ी मर्दाना चप्पल तथा टूटी हुई चूडि़यां जरूर मिलीं. चप्पलों की पहचान मृतक सिपाही अजय के घर वालों ने की. उन्होंने पुलिस को बताया कि चप्पलें अजय की थीं.

पुलिस टीम ने हिरासत में लिए गए राजेश सिंह से बेटी सोनाली सिंह की हत्या के संबंध में पूछताछ की तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो वह टूट गया और उस ने सोनाली सिंह तथा उस के प्रेमी अजय यादव की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. यही नहीं, उस ने हत्या में इस्तेमाल अजय यादव की बाइक यूपी81 एसी 5834 भी बरामद करा दी.

राजेश सिंह ने बताया कि उस की बेटी सानिया सिपाही अजय यादव से प्यार करती थी और दोनों ने कोर्ट में शादी भी कर ली थी. तब अपनी इज्जत बचाने के लिए उस ने दोनों को मौत की नींद सुलाने की योजना बनाई. इस योजना में उस ने अपने पिता अवधराज सिंह, बेटे दीपक सिंह, भतीजे अंकित सिंह तथा पत्नी नीलम सिंह को शामिल किया. इस के बाद पहले सानिया की हत्या की फिर अजय की. उस के बाद दोनों के शव अलगअलग जगहों पर डाल दिए.

पुलिस अजय की हत्या को आत्महत्या समझे, इसलिए उस के एक हाथ में पिस्टल थमा दी तथा बेटी का मोबाइल फोन अजय की जेब में डाल दिया, ताकि लगे कि अजय ने पहले सोनाली सिंह की गोली मार कर हत्या की फिर स्वयं गोली मार कर आत्महत्या कर ली. बेटी के शव के पास अजय की चप्पलें छोड़ना, सोचीसमझी साजिश का ही हिस्सा था. राजेश के बाद अन्य आरोपियों ने भी जुर्म कबूल कर लिया.

थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव ने डबल मर्डर का परदाफाश करने तथा आरोपियों को गिरफ्तार करने की जानकारी एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह को दी तो उन्होंने पुलिस लाइन स्थिति सभागार में प्रैसवार्ता की और आरोपियों को मीडिया के समक्ष पेश कर डबल मर्डर का खुलासा कर दिया.

चूंकि आरोपियों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव ने मृतक के पिता रामऔतार यादव की तहरीर पर धारा 302 आईपीसी के तहत राजेश सिंह, अवधराज सिंह, दीपक सिंह, अंकित सिंह तथा नीलम सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा सभी को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में जो कहानी प्रकाश में आई, उस में दोनों की हत्याओं की वजह मोहब्बत थी.

गाजीपुर जिले के खानपुर थाना अंतर्गत एक गांव है इचवल कलां. इसी गांव में ठाकुर राजेश सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी नीलम सिंह के अलावा बेटा दीपक सिंह तथा बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह थी. राजेश सिंह के पिता अवधराज सिंह भी उन के साथ रहते थे. पितापुत्र दबंग थे. गांव में उन की तूती बोलती थी. उन के पास उपजाऊ जमीन थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

राजेश सिंह की बेटी सोनाली उर्फ सानिया सुंदर, हंसमुख व मिलनसार थी. पढ़ाई में भी तेज थी. वह पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजकीय डिग्री कालेज सैदपुर से बीए की डिग्री हासिल कर चुकी थी और बीएड की तैयारी कर रही थी. दरअसल, सानिया टीचर बन कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. इसलिए वह कड़ी मेहनत कर रही थी.

सानिया उर्फ सोनाली के आकर्षण में गांव के कई युवक बंधे थे. लेकिन अजय कुमार यादव कुछ ज्यादा ही आकर्षित था. सानिया भी उसे भाव देती थी. सानिया और अजय की पहली मुलाकात परिवार के एक शादी समारोह में हुई थी. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे के प्रति आकर्षित हो गए थे. इस के बाद जैसे जैसे उन की मुलाकातें बढ़ती गईं, वैसेवैसे उन का प्यार बढ़ता गया.

अजय कुमार यादव के पिता रामऔतार यादव सानिया के पड़ोस के गांव बभनौली में रहते थे. वह सीआरपीएफ में कार्यरत थे. लेकिन अब रिटायर हो गए थे और गांव में रहते थे. उन की 5 संतानों में 4 बेटियां व एक बेटा था अजय कुमार. बेटियों की वह शादी कर चुके थे और बेटा अजय अभी कुंवारा था. रामऔतार यादव, अजय को पुलिस में भरती कराना चाहते थे, सो वह उस की सेहत का खास खयाल रखते थे. अजय बीए पास कर चुका था और पुलिस भरती की तैयारी कर रहा था. उस ने पुलिस की परीक्षा भी दी.

एक दिन अजय ने सानिया के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह गहरी सोच में डूब गई. कुछ देर बाद वह बोली, ‘‘अजय, मुझे तुम्हारा शादी का प्रस्ताव तो मंजूर है, लेकिन मुझे डर है कि हमारे घर वाले शादी को कभी राजी नही होंगे.’’

‘‘क्यों राजी नही होंगे?’’ अजय ने पूछा.

‘‘क्योंकि मैं ठाकुर हूं और तुम यादव. मेरे पिता कभी नहीं चाहेंगे कि ठाकुर की बेटी यादव परिवार में दुलहन बन कर जाए. मूंछ की लड़ाई में वह कुछ भी अनर्थ कर सकते हैं.’’

‘‘घर वाले राजी नहीं होंगे, फिर तो एक ही उपाय है कि हम दोनों कोर्ट में शादी कर लें.’’

‘‘हां, यह हो सकता है.’’ सानिया ने सहमति जताई.

इस के बाद 5 नवंबर, 2018 को सानिया उर्फ सोनाली और अजय कुमार ने गाजीपुर कोर्ट में कोर्टमैरिज कर के विवाह प्रमाण पत्र हासिल कर लिया. कोर्ट मैरिज करने की जानकारी सानिया के घर वालों को नहीं हुई, लेकिन अजय के घर वालों को पता था. उन्होंने सानिया को बहू के रूप में स्वीकार कर लिया.

दिसंबर, 2018 में अजय का चयन सिपाही के पद पर पुलिस विभाग में हो गया. ट्रेनिंग के बाद उस की पोस्टिंग अमेठी जिले के गौरीगंज थाने में हुई. अजय और सानिया की मुलाकातें चोरीछिपे होती रहती थीं. मोबाइल फोन पर भी उन की बातें होती रहती थीं. कोर्ट मैरिज के बाद उन का शारीरिक मिलन भी होने लगा था. इस तरह समय बीतता रहा.

जनवरी, 2021 के पहले हफ्ते में राजेश सिंह को अपनी पत्नी नीलम सिंह व बेटे दीपक सिंह से पता चला कि सानिया पड़ोस के गांव बभनौली के रहने वाले युवक अजय यादव से प्रेम करती है और दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली है. दरअसल, नीलम सिंह ने बेटी को देर रात अजय से मोबाइल फोन पर बतियाते पकड़ लिया था. फिर डराधमका कर सारी सच्चाई उगलवा ली थी. यह जानकारी नीलम ने पति व बेटे को दे दी थी.

राजेश सिंह ठाकुर था. उसे यह गवारा न था कि उस की बेटी यादव से ब्याही जाए, अत: उस ने सानिया की जम कर पिटाई की और घर से बाहर निकलने पर सख्त पहरा लगा दिया. नीलम हर रोज डांटडपट कर तथा प्यार से बेटी को समझाती लेकिन सानिया, अजय का साथ छोड़ने को राजी नहीं थी. 21 फरवरी को अजय की चचेरी बहन की सगाई थी. वह 15 दिन की छुट्टी ले कर अपने गांव बभनौली आ गया. सिपाही अजय के आने की जानकारी राजेश सिंह को हुई तो उस ने अपने पिता अवधराज सिंह, बेटे दीपक सिंह, भतीजे अंकित सिंह तथा पत्नी नीलम के साथ गहन विचारविमर्श किया.

जिस में तय हुआ कि पहले अजय व सानिया को समझाया जाए, न मानने पर दोनों को मौत के घाट उतार दिया जाए. अवैध असलहा घर में पहले से मौजूद था. योजना के तहत 22 फरवरी की रात 3 बजे राजेश सिंह व नीलम सिंह ने सानिया को धमका कर सिपाही अजय यादव के मोेबाइल फोन पर एक वाट्सऐप मैसेज भिजवाया, जिस में लिखा, ‘तत्काल मिलने आओ, नहीं तो हम मर जाएंगे.’

अजय ने मैसेज पढ़ा, तो उसे लगा कि सानिया मुसीबत में है. अत: वह अपनी मोटरसाइकिल से सानिया के गांव इचबल की ओर निकल पड़ा. इधर मैसेज भिजवाने के बाद राजेश सिंह, नीलम सिंह, दीपक सिंह, अवधराज सिंह व अंकित सिंह ने सानिया उर्फ सोनाली को अजय का साथ छोड़ने के लिए हर तरह से समझाया. लेकिन जब वह नहीं मानी तो राजेश सिंह ने उसे गोली मार दी. फिर लाश को घर में छिपा दिया.

कुछ देर बाद अजय आया, तो उसे भी समझाया गया. लेकिन वह ऊंचे स्वर में बात करने लगा. इस पर वे सब अजय को बात करने के बहाने गांव के बाहर अंबिका स्कूल के पास ले गए. वहां अजय सानिया को अपनी पत्नी बताने लगा तो उन सब ने उसे दबोच लिया और पिस्टल से उस के सिर में गोली मार दी और मरा समझ कर रामपुर गांव के पास सड़क किनारे खेत में फेंक दिया. एक पिस्टल उस के हाथ में पकड़ा दी तथा दूसरी उस के पैर के पास डाल दी. सानिया का मोबाइल फोन भी अजय की पाकेट में डाल दिया. इस के बाद वे सब वापस घर आए और सानिया का शव घर के पीछे गेहूं के खेत में फेंक दिया. अजय की चप्पलें भी शव के पास छोड़ दीं.

सुबह राजेश व नीलम ने पड़ोसियों को बताया कि उन की बेटी सानिया बिना कुछ बताए घर से गायब है. फिर सैदपुर कस्बा जा कर कैफे से औनलाइन एफआईआर दर्ज करा दी. उधर रामपुर गांव के कुछ लोगों ने युवक को मरणासन्न हालत में देखा तो पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने काररवाई शुरू की तो डबल मर्डर की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

24 फरवरी, 2021 को थाना खानपुर पुलिस ने अभियुक्त राजेश सिंह, दीपक सिंह, अंकित सिंह, अवधराज सिंह तथा नीलम सिंह को गाजीपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: जिद्दी बीवी – पत्नी का कातिल पति

चेतन घोरपड़े और अर्चना घोरपड़े कोई नवदंपति नहीं थे. कई साल हो गए थे दोनों की शादी को. पतिपत्नी पिछले 3 सलों से कोल्हापुर जिले के तालुका शिरोल बाईपास स्थित जयसिंह सोसायटी में रह रहे थे. दोनों ही एमआईडीसी परिसर की एक गारमेंट कंपनी में काम करते थे.

कंपनी 2 शिफ्टों में चलती थी इसलिए उन दोनों का काम अलगअलग शिफ्टों में था. अर्चना सुबह 8 बजे काम पर जाती और शाम 5 बजे तक घर आ जाती थी. लेकिन चेतन का काम ऐसा नहीं था. उस को कभीकभी दोनों शिफ्टों में काम करना पड़ता था. दोनों खुश थे. उन की लवमैरिज की जिंदगी सुकून से गुजर रही थी. मगर इसी बीच कुछ ऐसा हुआ जो नहीं होना चाहिए था. दरअसल, 20 फरवरी, 2021 को अचानक 2 बजे के करीब एक ऐसी लोमहर्षक घटना घटी कि जिस ने भी देखा, उस का कलेजा मुंह को आ गया. कामकाज का दिन होने की वजह से सोसायटी के सभी पुरुष और महिलाएं अपनेअपने कामों के कारण घरों से बाहर थे.

सोसायटी में सिर्फ बच्चे, कुछ बुजुर्ग महिलाएं और पुरुष ही थे. दोपहर का खाना खा कर सभी अपनेअपने घरों में आराम कर रहे थे कि तभी चीखनेचिल्लाने और बचाओ… बचाओ की आवाजें आने लगीं. आवाजें पड़ोस के रहने वाले चेतन घोरपड़े के घर से आ रही थीं. लोगों को आश्चर्य हुआ क्योंकि पतिपत्नी दोनों अकसर अपने काम पर रहते थे. अर्चना घोरपड़े के चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर लोग अपनेअपने घरों से बाहर आए तो उन्होंने देखा कि दरवाजा अंदर से बंद था. लोगों ने दरवाजा थपथपाया, आवाजें दीं. लेकिन अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई.

इस से लोगों ने समझा कि हो सकता है पतिपत्नी का कोई मामला हो, जिसे ले कर दोनों के बीच झगड़ा हो गया हो. वैसे भी पतिपत्नी के झगड़े आम बात होते हैं. बहरहाल, उन्होंने पतिपत्नी का आपसी मामला समझ कर खामोश ही रहना उचित समझा. तभी बाहर शांति देख कर चेतन घोरपड़े ने धीरे से दरवाजा खोला. उस के कपड़ों पर खून लगा था. इस के पहले कि पड़ोसी कुछ समझ पाते, चेतन दरवाजे की कुंडी लगा कर तेजी से सोसायटी के बाहर निकल  गया और वहां से सीधे शिरोल पुलिस थाने पहुंचा.

थाने की ड्यूटी पर तैनात एपीआई शिवानंद कुमार और उन के सहायकों ने थाने में चेतन घोरपड़े को देखा तो वह स्तब्ध रह गए. उस का हुलिया और उस के कपड़ों पर पड़े खून के छींटे किसी बड़ी वारदात की तरफ इशारा कर रहे थे. एपीआई शिवानंद कुमार उस से कुछ पूछते, उस के पहले ही उस ने उन्हें जो कुछ बताया, उसे सुन कर उन के होश उड़ गए.

मामला काफी गंभीर था. एपीआई शिवानंद कुमार और उन के सहायकों ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया. साथ ही साथ उन्होंने इस की जानकारी अपने सीनियर अधिकारियों के साथ पुलिस कंट्रोल रूम जयसिंहपुर को भी दे दिया.

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शिवानंद पुलिस टीम ले कर घटनास्थल की ओर निकल ही रहे थे कि अचानक चेतन घोरपड़े की तबीयत बिगड़ने लगी. उस की बिगड़ती तबीयत को देख कर एपीआई शिवानंद कुमार ने अपने सहायकों के साथ उसे तुरंत स्थानीय अस्पताल भेज दिया और खुद हैडकांस्टेबल डी.डी. पाटिल और सागर पाटिल को ले कर घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.

जिस घर में घटना घटी थी, वहां पर काफी भीड़ एकत्र थी, जिसे हटाने में पुलिस टीम को काफी मशक्कत करनी पड़ी. भीड़ को हटा कर इंसपेक्टर शिवानंद कुमार जब घर के अंदर गए तो वहां का दृश्य काफी मार्मिक और डरावना था. फर्श पर एक लहूलुहान युवती का शव पड़ा था. उस के पास ही 2 महिलाएं बैठी छाती पीटपीट कर रो रही थीं. पूछताछ में मालूम हुआ कि वे दोनों महिलाएं मृतका की मां और सास थीं, जिन का नाम वसंती पुजारी और आशा घोरपड़े था. पुलिस टीम ने दोनों महिलाओं को सांत्वना दे कर घर से बाहर निकला और अपनी काररवाई शुरू कर दी.

अभी पुलिस घटना के विषय में पूछताछ कर ही रही थी कि वारदात की जानकारी पा कर कोल्हापुर के एसपी शैलेश वलकवड़े मौकाएवारदात पर आ गए. उन के साथ 2 फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो के लोग भी थे. घर के अंदर का मंजर दिल दहला देने वाला था. पूरे फर्श पर खून ही खून फैला हुआ था. बैडरूम में युवती का शव पड़ा था, जिस की हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस की कलाई और गालों पर किसी तेज धारदार वाले हथियार से वार किए गए थे.

गले में मोबाइल चार्जर का वायर लिपटा था, जिसे देख कर सहज अंदाजा लगाया जा सकता था कि उस का गला घोंटने में इसी वायर का इस्तेमाल किया गया था. फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो का काम खत्म होने के बाद एसपी शैलेश वलकवड़े ने अपने सहायकों के साथ घटनास्थल की बारीकी से जांच की. इस के बाद उन्होंने जांचपड़ताल की सारी जिम्मेदारी एपीआई शिवानंद कुमार को सौंपते हुए उन्हें जरूरी निर्देश दिए.

एपीआई शिवानंद कुमार ने अपने सहायकों के साथ घटनास्थल पर पड़े ब्लेड और मोबाइल चार्जर के वायर को अपने कब्जे में ले लिया और मृतका अर्चना घोरपड़े के शव को पोस्टमार्टम के लिए जयसिंहपुर के जिला अस्पताल भेज दिया. वहां की सारी कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के शिवानंद पुलिस थाने आ गए. साथ ही घटनास्थल पर आई मृतका की मां बसंती पुजारी को भी पुलिस थाने ले आए और उन की शिकायत पर अर्चना घोरपड़े के पति चेतन घोरपड़े के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया.

आगे की जांच के लिए उन्हें चेतन घोरपड़े के बयान का इंतजार था जो अभी अस्पताल में डाक्टरों की निगरानी में था. पत्नी की हत्या के बाद अपराधबोध के कारण उस ने आत्महत्या के लिए घर में रखा कीटनाशक फिनायल पी लिया था और फिर पुलिस थाने आ गया था. डाक्टरों के अथक प्रयासों के बाद चेतन घोरपड़े को जब होश आया तो उस से पूछताछ की गई. उस ने जो कुछ बताया, उस से घटना का विवरण सामने आया.

25 वर्षीय अर्चना पुजारी जितनी सुंदर और स्वस्थ थी, उतनी ही खुले मन और आधुनिक विचारों वाली थी. वह किसी से भी बेझिझक बातें करती और उस के साथ घुलमिल जाती थी, लेकिन अपनी हद में रह कर. उस की मीठी और सीधीसरल बातें हर किसी के मन को मोह लेती थीं. यही वजह थी जो उस की मौत का कारण बनी. उस के पिता रामा पुजारी की मृत्यु हो गई थी. घर की सारी जिम्मेदारी मां बसंती पुजारी के कंधों पर थी. घर की आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी, इसलिए उस की शिक्षादीक्षा ठीक से नहीं हो पाई थी.

30 वर्षीय चेतन मनोहर घोरपड़े ने सजीसंवरी अर्चना पुजारी को अपने एक दोस्त की पार्टी में देखा था और उस का दीवाना हो गया था. जब तक वह उस पार्टी में रही, तब तक चेतन की आंखें उसी पर टिकी रहीं.

देर रात पार्टी खत्म होने के बाद चेतन घोरपड़े ने जब घर के लिए आटो लिया तब अपने दोस्त के कहने पर अर्चना पुजारी को उस के घर तक छोड़ते हुए गया. उस रात आटो के सफर में दोनों ने एकदूसरे को जानासमझा. दोनों ने बेझिझक एकदूसरे से बातें कीं. घर पहुंचने के बाद अर्चना पुजारी ने चेतन का शुक्रिया अदा किया और अपना मोबाइल नंबर उसे दे दिया और उस का भी ले लिया.

घर पहुंचने के बाद दोनों की एक जैसी ही स्थिति थी. रात भर दोनों सोच के दायरे में एकदूसरे के व्यक्तित्व को अपनेअपने हिसाब से टटोलते, तौलते रहे. दोनों की ही आंखों से नींद कोसों दूर थी. सारी रात उन की आंखों के सामने एकदूसरे का चेहरा नाचता रहा, जिस का नतीजा यह हुआ कि वे दोनों जल्दी ही एकदूसरे के करीब आ गए. फोन पर लंबीलंबी बातों के बाद मुलाकातों से शुरू हुई दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई और कुछ महीनों बाद दोनों ने शादी का निर्णय ले लिया.

उन के इस निर्णय से अर्चना पुजारी की मां को तो कोई ऐतराज नहीं था लेकिन चेतन की मां को इस शादी से आपत्ति थी. वह गैरजाति की लड़की को अपनी बहू बनाने के पक्ष में नहीं थी, लेकिन चेतन घोरपड़े की पसंद के कारण मां की एक नहीं चली. 2013 के शुरुआती महीने में अर्चना बहू बन कर चेतन के घर आ गई. चेतन ने अपने कुछ रिश्तेदारों की उपस्थिति में अर्चना से लवमैरिज कर ली.

लवमैरिज के बाद दोनों का सांसारिक जीवन हंसीखुशी से शुरू तो जरूर हुआ लेकिन कुछ ही दिनों के लिए. शादी के बाद से ही अर्चना और चेतन की मां की किचकिच शुरू हो गई थी. चेतन अकसर दोनों को समझाबुझा कर शांत कर देता था. लेकिन कब तक, आखिरकार उन के झगड़ों से परेशान हो कर चेतन घोरपड़े अपनी मां का घर छोड़ कर अर्चना के साथ जयसिंहपुर में किराए के घर में आ कर रहने लगा.

किराए के घर में आने के बाद अर्चना भी उसी कंपनी में सर्विस करने लगी, जिस में चेतन काम करता था. इस घर में आने के कुछ दिन बाद ही अर्चना का रहनसहन बदल गया था. हाथों में महंगा मोबाइल फोन, महंगे कपड़े उस के शौक बन गए. घूमनाफिरना, शौपिंग करना, ज्यादा समय फोन पर बातें करना उस की हौबी बन गई थी. चेतन जब भी उसे समझाने की कोशिश करता तो वह उस से उलझ जाती और उस की बातों पर ध्यान नहीं देती थी.

अर्चना की आए दिन की इन हरकतों से परेशान हो कर चेतन को लगने लगा था जैसे वह अर्चना से शादी कर के फंस गया है. अर्चना जैसी दिखती थी, वैसी थी नहीं. यह सोचसोच कर उस का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा था, जिसे शांत करने के लिए वह दोस्तों के साथ शराब पीने लगा था. इस से उस के घर का माहौल और खराब होने लगा था. अर्चना का खुले विचारों का होना और कंपनी के लोगों से हिलमिल जाना आग में घी का काम कर रहा था, जो अर्चना के चरित्र को कठघरे में खड़ा करता था.

इसी सब को ले कर चेतन घोरपड़े शराब के नशे में अर्चना के साथ अकसर झगड़ा और मारपीट करने लगा था. इस से परेशान हो कर अर्चना अपने मायके शिरोल चली जाती थी और वहीं से काम पर कंपनी आती थी. यह दूरियां तब और बढ़ गईं जब अर्चना अपनी शादी की सालगिरह के एक हफ्ते पहले चेतन से लड़ कर अपनी मां के पास चली गई और फिर वापस नहीं आई. इस बार चेतन घोरपड़े ने अर्चना से माफी मांग कर उसे घर लौट आने के लिए कहा लेकिन अर्चना ने उसे इग्नोर कर दिया.

वह अपने मायके शिरोल से लंबी दूरी तय कर के कंपनी आती थी लेकिन चेतन घोरपड़े की लाख मिन्नतों के बाद भी उस के पास नहीं आई और न ही शादी की सालगिरह की बधाई का फोन ही उठाया. लाचार हो कर चेतन घोरपड़े ने अर्चना को शादी की सालगिरह का मैसेज भेज कर शुभकामनाएं दीं. लेकिन उस का भी कोई जवाब नहीं आया तो मजबूरन शादी की सालगिरह के 2 दिन बाद वह अर्चना के मायके गया. जहां उस का स्वागत अर्चना की मां बसंती पुजारी ने किया और चेतन को काफी खरीखोटी सुनाई. साथ ही उसे पुलिस थाने तक ले जाने की धमकी भी दी.

फिर भी चेतन घोरपड़े ने अर्चना से अपनी गलतियों की माफी मांगते हुए उसे अपने घर चलने के लिए कहा. मगर अर्चना पर उस की माफी का कोई असर नहीं पड़ा. नाराज हो कर चेतन अपने घर लौट आया. जब इस बात की जानकारी उस के दोस्तों को हुई तो उन्होंने उस के जले पर नमक छिड़क दिया, जिस ने आग में घी का काम किया था. उन्होंने बताया कि अर्चना का किसी कार वाले से अफेयर चल रहा है जो उसे अपनी कार से कंपनी लाता और ले कर जाता है. इस से चेतन के मन में अर्चना के प्रति उपजे संदेह को और हवा मिल गई.

वह जितना अर्चना के बारे में गहराई से सोचता, उतना ही परेशान हो जाता. इस का नतीजा यह हुआ कि उस के मन में अर्चना के प्रति घोर नफरत भर गई. उसके प्यार का दर्द छलक गया और उस ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया. अपने निर्णय के अनुसार, घटना वाले दिन चेतन कंपनी में गया और अर्चना को कंपनी के बाहर बुला कर कुछ जरूरी काम के लिए घर चलने के लिए कहा. कंपनी में तमाशा न बने, इसलिए अर्चना बिना कुछ बोले उस के साथ घर आ गई.

घर आने के बाद दोनों के बीच जोरदार झगड़ा हुआ तो पहले से ही तैयार चेतन ने अपनी जेब से ब्लेड निकाल कर अर्चना के हाथों की कलाई काट दी. जब अर्चना चिल्लाई तो उस के गालों पर भी ब्लेड मार कर पास पड़े मोबाइल चार्जर से उस का गला घोंट कर उसे मौत के घाट उतार दिया. अर्चना घोरपड़े की जीवनलीला खत्म करने के बाद अब उस के जीने का कोई मकसद नहीं बचा था. उस ने अपने जीवन को भी खत्म करने का फैसला कर अपनी चाची को फोन कर सारी कहानी बताई. फिर साफसफाई के लिए घर में रखी फिनायल पी कर पुलिस थाने पहुंच गया.

जांच अधिकारी एपीआई शिवानंद कुमार और उन की टीम ने चेतन मनोहर घोरपड़े से विस्तृत पूछताछ करने के बाद मामले को भादंवि की धारा 302, 34 के तहत दर्ज कर के चेतन को न्यायिक हिरासत में जयसिंहपुर जेल भेज दिया. Hindi Crime Story

Love Crime: देवर-भाभी का खूनी प्यार

Love Crime: पहली अप्रैल, 2021 को सुबह के करीब पौने 8 बज रहे थे. राजस्थान के अलवर जिले के बहरोड़ थाने  के थानाप्रभारी विनोद सांखला को फोन पर सूचना मिली कि जखराना बसस्टैंड के पास एक बाइक और स्कौर्पियो गाड़ी की भिड़ंत हो गई है. सूचना मिलते ही विनोद सांखला पुलिस टीम ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल पर काफी भीड़ जमा थी. पुलिस को देखते ही भीड़ थोड़ा हट गई. पुलिस ने देखा कि वहां एक व्यक्ति की दबीकुचली लाश सड़क पर पड़ी थी. थोड़ी दूरी पर मृतक की मोटरसाइकिल गिरी पड़ी थी.

घटनास्थल पर प्रत्यक्षदर्शियों ने पुलिस को बताया कि नीमराना की तरफ से स्कौर्पियो गाड़ी आई थी. स्कौर्पियो में सवार लोगों ने जानबूझ कर मोटरसाइकिल को टक्कर मारी थी. बाइक सवार स्कौर्पियो की टक्कर से उछल कर दूर जा गिरा. तब स्कौर्पियो यूटर्न ले कर आई और बाइक से गिरे युवक को कुचल कर चली गई.

गाड़ी के टायर युवक के सिर से गुजरे तो सिर का कचूमर निकल गया. जब स्कौर्पियो सवार निश्चिंत हो गए कि बाइक सवार की मौत हो गई है, तब वे वापस उसी रोड से भाग गए.वहां मौजूद लोगों ने थानाप्रभारी विनोद सांखला को बताया कि यह दुर्घटना नहीं बल्कि हत्या है. स्कौर्पियो में सवार अज्ञात लोगों ने बाइक सवार को जानबूझ कर टक्कर मार कर हत्या की है. थानाप्रभारी ने घटना की खबर उच्च अधिकारियों को दे दी. खबर पा कर बहरोड़ के सीओ और एसडीएम घटनास्थल पर आ गए. बाइक सवार युवक की पहचान कृष्णकुमार यादव निवासी भुंगारका, महेंद्रगढ़, हरियाणा के रूप में हुई.

कृष्णकुमार यादव वर्तमान में राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय जखराना में अपर डिविजन क्लर्क के पद पर कार्यरत था. कृष्णकुमार के एक्सीडेंट होने की खबर पा कर विद्यालय के प्रधानाचार्य ने बताया कि कृष्णकुमार यादव अपने पिताजी की औन ड्यूटी मृत्यु होने पर उन की जगह मृतक आश्रित कोटे से नौकरी पर लगा था. कृष्णकुमार अपने मांबाप का इकलौता बेटा था. वह अपने गांव भुंगारका से रोजाना बाइक द्वारा ड्यूटी आताजाता था. सीओ देशराज गुर्जर ने भी घटनास्थल का मुआयना किया और उपस्थित लोगों से जानकारी ली. जानकारी में यही सामने आया कि कृष्णकुमार की हत्या की गई है.

पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज निकाले. फुटेज से पता चला कि प्रत्यक्षदर्शियों ने जो बातें बताई थीं, वह सच थीं. हत्यारे कृष्णकुमार की हत्या को दुर्घटना दिखाना चाह रहे थे. मगर लोगों ने यह सब अपनी आंखों से देखा था. मृतक के परिजनों को भी हत्या की खबर दे दी गई. खबर मिलते ही मृतक के घर वाले एवं रिश्तेदार घटनास्थल पर आ गए. उन से भी पुलिस ने पूछताछ की और शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद वह परिजनों को सौंप दिया. मृतक के परिजनों की तरफ से कृष्णकुमार की हत्या का मामला बहरोड़ थाने में दर्ज करा दिया गया.

थानाप्रभारी विनोद सांखला, एसआई सुरेंद्र सिंह और अन्य पुलिसकर्मियों की टीम ने सीसीटीवी फुटेज और स्कौर्पियो गाड़ी के नंबरों के आधार पर जांच शुरू की. पुलिस ने स्कौर्पियो गाड़ी का नंबर दे कर सभी थानों से इस नंबर की गाड़ी की जानकारी देने को कहा. तभी जयपुर पुलिस ने सूचना दी कि इस नंबर की स्कौर्पियो गाड़ी पावटा जयपुर में खड़ी है. पुलिस टीम ने पावटा पहुंच कर वहां से स्कौर्पियो गाड़ी सहित 2 युवकों अशोक और पवन मेघवाल को भी हिरासत में ले लिया. गाड़ी के मालिक अजीत निवासी भुंगारका सहित कुछ और संदिग्ध युवकों को भी पुलिस ने पूछताछ के लिए उठा लिया.

थाने में इन सभी से पूछताछ की. अशोक व पवन मेघवाल एक ही रट लगाए थे कि उन की कृष्णकुमार से कोई दुश्मनी नहीं थी. अचानक वह गाड़ी से टकरा गया था. बाइक के एक्सीडेंट के बाद हड़बड़ाहट में गाड़ी घुमाई तो कृष्णकुमार पर गाड़ी चढ़ गई.

उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात का डर लग रहा था कि लोग उन्हें पकड़ कर मार न डालें, इस डर के कारण वे गाड़ी भगा ले गए. मगर आरोपियों की यह बात पुलिस के गले नहीं उतर रही थी. भुंगारका निवासी अजीत ने पुलिस को बताया कि उस ने अपनी स्कौर्पियो गाड़ी एक लाख 80 हजार रुपए में सन्नी यादव को बेच दी. सन्नी ने अशोक के नाम पर यह गाड़ी खरीदी थी.

अजीत ने पुलिस को सन्नी का नाम बताया. तब तक पुलिस को लग रहा था कि अजीत का इस मामले से कोई संबंध नहीं है. अशोक और पवन मेघवाल 4 दिन तक पुलिस को एक ही कहानी बताते रहे कि अचानक बाइक से गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया था. पुलिस को भी लगने लगा था कि मामला कहीं दुर्घटना का ही तो नहीं है. मगर सीसीटीवी फुटेज में जो एक्सीडेंट का दृश्य था, वह बता रहा था कि कृष्णकुमार की साजिश के तहत हत्या की गई थी. हत्या को उन्होंने साजिश के तहत दुर्घटना का रूप देने की कोशिश की थी.

तब पुलिस अधिकारियों ने अपना पुलिसिया रूप दिखाया. बस फिर क्या था. पुलिस का असली रूप देख कर वे टूट गए और स्वीकार कर लिया कि उन्होंने जानबूझ कर कृष्णकुमार यादव की हत्या की थी, फिर उन्होंने हत्या की कहानी बता दी.

हरियाणा के नांगल चौधरी इलाके के भुंगारका गांव में कृष्णकुमार यादव अपनी पत्नी कुसुमलता (35 वर्ष) के साथ रहता था. कृष्णकुमार की 4 बहनें हैं, जिन की शादी हो चुकी थी. वे सब अपनी ससुराल में हैं. पिता की औनड्यूटी मृत्यु होने के बाद आश्रित कोटे के तहत कृष्णकुमार की क्लर्क पद पर सरकारी स्कूल में नौकरी लग गई थी. वह अपने मातापिता का इकलौता बेटा था.

कृष्णकुमार के पड़ोस में उस के चाचा मुकेश यादव रहते थे. उन का बड़ा बेटा सन्नी 10वीं कक्षा में फेल हो गया तो उस ने स्कूल छोड़ दिया. वह कोई कामधंधा नहीं करता था. कृष्णकुमार के परिवार के ठाठबाट देखता तो उसे जलन होती थी. क्योंकि कृष्णकुमार के पास करोड़ों रुपए की संपत्ति थी.

कृष्णकुमार के नाम करीब 50 बीघा जमीन थी. जोधपुर, राजस्थान के फलोदी में 17 बीघा जमीन, बहरोड़ में 2 कामर्शियल प्लौट, भुंगारका गांव में 32 बीघा जमीन व आलीशान मकान था. यह सब कृष्णकुमार के नाम था. सन्नी ने योजना बनाई कि अगर कुसुमलता को वह प्यार के जाल में फंसा क र कृष्णकुमार को रास्ते से हटा दे तो वह कुसुमलता से विवाह कर के उस की करोड़ों की प्रौपर्टी का मालिक बन सकता है.

आज से करीब 3 साल पहले सन्नी ने कुसुमलता पर डोरे डालने शुरू किए. कुसुमलता रिश्ते में उस की भाभी लगती थी. सन्नी से कुसुमलता उम्र में 10 साल बड़ी थी. मगर वह जायदाद हड़प कर करोड़पति बनने के चक्कर में अपने से 10 साल बड़ी भाभी के आसपास दुम हिलाने लगा. कृष्णकुमार ड्यूटी पर चला जाता तो कुसुमलता घर में अकेली रह जाती थी. कृष्णकुमार की गैरमौजूदगी में सन्नी उस की बीवी के पास चला आता था. सन्नी कुसुमलता के चाचा ससुर का बेटा था.

वह भाभी से हंसीमजाक करतेकरते उसे बांहों में भर कर बिस्तर तक ले आया. कुसुमलता भी जवान देवर की बांहों में खेलने लगी. वह सन्नी की दीवानी हो गई. सन्नी की मजबूत बांहों में कुसुमलता को जो शारीरिक सुख का चस्का लगा, वह दोनों को पतन के रास्ते पर ले जा रहा था.

सन्नी ने कुसुमलता को अपने रंग में ऐसा रंगा कि वह उस के लिए पति के प्राण तक लेने पर आमादा हो गई. आज से करीब डेढ़ साल पहले सन्नी ने कुसुमलता से कहा, ‘‘कुसुम, तुम रात में कृष्णकुमार को बिजली के करंट का झटका दे कर मार डालो. इस के बाद हम दोनों के बीच कोई तीसरा नहीं होगा. पति की जगह तुम्हारी नौकरी भी लग जाएगी. फिर मैं तुम से विवाह कर लूंगा और फिर हम मौज की जिंदगी जिएंगे.’’

‘‘ठीक है सन्नी, मैं पति को रास्ते से हटाने का इंतजाम करती हूं.’’ कुसुमलता ने हंसते हुए कहा. वह देवर के प्यार में पति की हत्या करने करने का मौका तलाशने लगी. एक दिन कृष्णकुमार रात में गहरी नींद में था. तब कुसुमलता ने उसे बिजली का करंट दिया. करंट का कृष्णकुमार को झटका लगा तो वह जाग गया. तब बीवी ने कूलर में करंट आने का बहाना बना दिया. कृष्णकुमार को करंट का झटका लगा जरूर था, मगर वह मरा नहीं.

यह सुन कर सन्नी बोला, ‘‘कुसुम, जल्द से जल्द कृष्ण का खात्मा करना होगा.’’  ‘‘तुम ही यह काम किसी से करा दो. मैं तुम्हारे साथ हूं मेरी जान.’’ कुसुमलता बोली.कुसुमलता और सन्नी जल्द से जल्द कृष्णकुमार को रास्ते से हटाना चाहते थे. कृष्ण के ड्यूटी जाने के बाद वाट्सऐप कालिंग पर दोनों बातचीत करते थे. सन्नी ने अपने छोटे भाई की शादी कर दी थी. खुद शादी नहीं की थी. उस का मकसद तो करोड़ों की मालकिन कुसुमलता से शादी करना था. सन्नी भाभी से शादी कर के वह जल्द से जल्द करोड़पति बनना चाहता था.

एक दिन सन्नी और कुसुमलता के संबंधों की जानकारी किसी ने कृष्णकुमार को दे दी. बीवी और चचेरे भाई के संबंधों की बात सुन कर कृष्णकुमार को बहुत गुस्सा आया. उस ने अपनी बीवी से इस बारे में बात की तो वह त्रियाचरित्र दिखाने लगी. आंसू बहाने लगी. मगर कृष्णकुमार के मन में संदेह पैदा हुआ तो वह उन दोनों पर निगाह रखने लगा.

इस के बाद कुसुमलता ने सन्नी को सचेत कर दिया. दोनों छिप कर मिलने लगे. मगर उन्हें हर समय इसी बात का डर लगा रहता कि कृष्णकुमार को कोई बता न दे. कृष्णकुमार ने सन्नी से भी कह दिया था कि वह उस के घर न आए. यह बात कृष्ण, कुसुम और सन्नी के अलावा कोई नहीं जानता था. किसी को पता नहीं था कि कृष्ण अपनी बीवी और सन्नी पर शक करता है.

ऐसे में कुसुमलता और सन्नी ने उसे एक्सीडेंट में मारने की योजना बनाई ताकि उन पर कोई शक भी न करे और राह का कांटा भी निकल जाए. सन्नी ने इस काम में कुछ खर्चा होने की बात कही तो कुसुमलता ने खुद के नाम की 4 लाख रुपए की एफडी मार्च 2021 के दूसरे हफ्ते में तुड़वा दी. 4 लाख रुपए कुसुम ने सन्नी को दे दिए.

सन्नी ने योजनानुसार 18 मार्च, 2021 को भुंगारका के अजीत से एक लाख 80 हजार रुपए में एक स्कौर्पियो गाड़ी एग्रीमेंट के तहत अशोक कुमार के नाम से खरीदी. अशोक को उस ने 2 छोटे मोबाइल व सिम दिए. इन्हीं सिम व मोबाइल के जरिए अशोक की बात सन्नी से होती थी. कृष्णकुमार को मारने के लिए सन्नी ने अशोक को डेढ़ लाख रुपए भी दे दिए.

उसी स्कौर्पियो गाड़ी से अशोक ने सन्नी के कहने पर कृष्णकुमार का एक्सीडेंट करने की कई बार कोशिश की मगर वह सफल नहीं हुआ. तब 26 मार्च, 2021 को राहुल अपने दोस्त पवन मेघवाल को भुंगारका के हरीश होटल पर ले आया. यहां अशोक से पवन की जानपहचान कराई.

रात में तीनों शराब पी कर खाना खा कर होटल पर रुके और सुबह चले गए. 30 मार्च, 2021 को अशोक ने पवन से कहा कि मुझे स्कौर्पियो से एक आदमी का एक्सीडेंट करना है. तुम मेर साथ गाड़ी में रहोगे तो मैं तुम्हें 40 हजार रुपए दूंगा.

पवन की अशोक से नई दोस्ती हुई थी और वैसे भी पवन को सिर्फ गाड़ी में बैठे रहने के 40 हजार रुपए मिल रहे थे, इसलिए 40 हजार रुपए के लालच में पवन ने हां कर दी. 31 मार्च, 2021 को अशोक और पवन मेघवाल स्कौर्पियो गाड़ी ले कर जखराना आए लेकिन उस दिन कृष्णकुमार ड्यूटी पर नहीं गया.अशोक रोजाना की बात सन्नी को बता देता था. सन्नी अपनी प्रेमिका भाभी कुसुमलता को सारी बात बता देता था. पहली अप्रैल 2021 को सुबह साढ़े 7 बजे कृष्णकुमार अपने गांव भुंगारका से ड्यूटी पर जखराना निकला. यह जानकारी कुसुमलता ने अपने देवर प्रेमी सन्नी को दी. सन्नी ने अशोक को यह सूचना दे दी. अशोक कुमार गाड़ी में पवन को ले कर जखराना बसस्टैंड पहुंच गया. जैसे ही कृष्णकुमार मोटरसाइकिल से जखराना बसस्टैंड से स्कूल की ओर जाने लगा, तभी अशोक ने स्कौर्पियो से कृष्णकुमार को सीधी टक्कर मार दी. टक्कर लगते ही कृष्णकुमार उछल कर दूर जा गिरा.

इस के बाद अशोक ने गाड़ी को यूटर्न लिया और कृष्णकुमार के ऊपर एक बार चढ़ा दी, जिस के बाद उस की मौके पर ही मौत हो गई. इस के बाद सूचना पा कर बहरोड़ पुलिस आई. प्रत्यक्षदर्शियों ने इसे हत्या बताया. तब पुलिस ने जांच कर हत्या के इस राज से परदा हटाया.

अशोक कुमार और पवन मेघवाल से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने इस हत्याकांड में शामिल रहे सन्नी और उस की प्रेमिका कुसुमलता को भी गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों ने भी कृष्णकुमार की हत्या में शामिल होने का अपराध स्वीकार कर लिया.

पूछताछ के बाद कुसुमलता, सन्नी यादव, अशोक यादव और पवन मेघवाल को बहरोड़ कोर्ट में पेश किया, जहां से सभी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया. Love Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Domestic Dispute: स्पीड पोस्ट से आया तलाक

Domestic Dispute: यह जनवरी, 2016 की दोपहर की बात है. कड़ाके की सर्दी पड़ने की वजह से आफरीन रहमान जयपुर स्थित अपने घर पर ही थीं. उन का खाना खाने का मन नहीं था, इसलिए कुरसी पर बैठ कर वह सोचने लगीं कि अब क्या किया जाए, क्योंकि घर के सारे काम वह पहले ही निपटा चुकी थीं. वह कुरसी पर बैठी थीं कि तभी उन की नजर सामने सैंटर टेबल पर पड़ी पत्रिका पर पड़ गई.

उसे एक दिन पहले ही वह बाजार से खरीद कर लाई थीं. रात को वह उसे पढ़ रही थीं, तभी उन्हें नींद आ गई थी. तब मैगजीन सैंटर टेबल पर रख कर वह सो गई थीं. मैगजीन देख कर आफरीन को उस कहानी की याद आ गई, जिसे वह पढ़ रही थीं. वह एक महिला की कहानी थी, जिसे पति ने घर से निकाल दिया था. इस समय वह महिला मायके में भाइयों के साथ रह रही थी.

आफरीन ने उसी कहानी को पढ़ने के लिए मैगजीन उठा ली. वह पन्ने पलट रही थीं, तभी डोरबैल बजी. आफरीन सोच में पड़ गईं कि इस समय दोपहर में कौन आ गया? उन्होंने बैठेबैठे ही आवाज लगाई, ‘‘कौन..?’’

बाहर से जवाब आने के बजाय दोबारा डोरबैल बजी तो आफरीन मैगजीन मेज पर रख कर अनमने मन से उठीं और दरवाजे पर जा कर दरवाजा खोलने से पहले एक बार फिर पूछा, ‘‘कौन है?’’

‘‘मैडम, मैं पोस्टमैन.’’ बाहर से आवाज आई.

आफरीन ने दरवाजा खोला तो बाहर खाकी वर्दी में पोस्टमैन खड़ा था. उस ने एक लिफाफा आफरीन की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप के यहां आफरीन रहमान कौन हैं? यह स्पीड पोस्ट आई है.’’

‘‘मैं ही आफरीन रहमान हूं.’’ उन्होंने कहा.

‘‘मैडम,’’ पोस्टमैन ने एक कागज आफरीन की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘इस पर दस्तखत कर दीजिए.’’

कागज थाम कर आफरीन ने पोस्टमैन की ओर देखा तो उस ने अपनी जेब से पैन निकाल कर उस की ओर बढ़ा दिया. आफरीन ने उस कागज पर दस्तखत कर दिए तो पोस्टमैन ने एक लिफाफा उन्हें थमा दिया. आफरीन ने दरवाजा बंद किया और कमरे में आ कर उस लिफाफे को उलटपलट कर देखने लगी. वह स्पीड पोस्ट उन्हीं के नाम थी. पत्र भेजने वाले की जगह अशहर वारसी, इंदौर लिखा था.

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इंदौर से अशहर का पत्र देख कर आफरीन खुश हो गईं लेकिन तुरंत ही अपनी उस खुशी को झटक कर वह सोचने लगीं कि अगर अशहर को उस की जरूरत होती तो वह खुद आता या फोन करता. पत्र भेजने की क्या जरूरत थी? आफरीन के मन में तरहतरह की आशंकाएं उपजने लगीं. 5-6 महीने बाद उस ने इस तरह क्यों याद किया? यह चिट्ठी क्यों भेजी, वह भी स्पीड पोस्ट से?

आफरीन का मन बैठने सा लगा. उन्होंने कांपते हाथों से स्पीडपोस्ट का वह लिफाफा खोला. उस में से एक कागज निकला. उन्होंने वह कागज खोला तो उस पर लिखा था ‘तलाक…तलाक… तलाक…’. उन्होंने एक बार फिर उस कागज पर लिखी इबारत पढ़ी. उस पर वही लिखा था, जो उन्होंने पहले पढ़ा था.

आफरीन ने उस कागज पर लिखे शब्दों को कई बार पढ़ा. उस तलाकनामा को देख कर उन की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. वह कुरसी पर बैठ गईं. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि उन की खुशियों को इतनी जल्दी ग्रहण कैसे लग गया? उन्हें जो खुशियां मिली थीं, वे इतनी जल्दी कैसे छिन गईं?

उन्होंने तो ऐसी कोई गलती भी नहीं की थी कि उस गलती की इतनी बड़ी सजा मिल रही हो. करीब डेढ़, दो साल पहले अशहर से रिश्ता तय होना, उस की बेगम बन कर जयपुर से इंदौर जाना, कुछ ही दिनों में ससुराल वालों की ओर से दहेज के लिए उन पर अत्याचार करना और फिर एक दिन उन्हें घर से निकाल देने की एकएक घटना उस के जेहन में फिल्म की तरह चलने लगी.

सन 2014 के मईजून महीने की बात रही होगी. जयपुर की रहने वाली 23 साल की आफरीन रहमान अपनी एमबीए की पढ़ाई पूरी कर नौकरी तलाश रही थी. उस के पिता मोहम्मद नसीर की सन 2009 में कौर्डियक अटैक से मौत हो गई थी. उस के बाद परिवार की जिम्मेदारी आफरीन के 2 भाइयों पर आ गई थी.

परिवार में आफरीन, मां और 2 भाई थे. भाई चाहते थे कि आफरीन का जल्द से जल्द निकाह हो जाए. वैसे भी आफरीन शादी लायक हो चुकी थी. उस की पढ़ाई भी पूरी हो चुकी थी. भाई उस के लिए रिश्ता तलाश रहे थे. उसी बीच एक मैट्रीमोनियल वेबसाइट के माध्यम से अशहर वारसी और आफरीन में जानपहचान हुई.

अशहर वारसी मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के रहने वाले थे. वह वकालत करते थे. जानपहचान हुई तो बात शादी की चली. अशहर ने आफरीन को देखा और आफरीन ने अशहर को. दोनों ही एकदूसरे को पसंद आ गए. इस के बाद घर वालों की रजामंदी से नातेरिश्तेदारों की मौजूदगी में रिश्ता तय हो गया.

रिश्ता तय होने पर आफरीन अपने सपनों के राजकुमार अशहर के साथ भविष्य के सपने बुनने लगी. अशहर जवान थे और खूबसूरत भी. आफरीन ने पहले ही तय कर लिया था कि वह किसी अच्छे पढ़ेलिखे लड़के से ही शादी करेगी. अशहर वकालत की पढ़ाई कर के प्रैक्टिस कर रहे थे.

सब कुछ ठीकठाक था, इसलिए आफरीन के भाई और मां इस बात से बेफिक्र थे कि नाजनखरों में पली उन की लाडली को ससुराल में कोई परेशानी नहीं होगी. आफरीन की मां को केवल इसी बात का दुख था कि आफरीन जयपुर से सैकड़ों किलोमीटर दूर इंदौर चली जाएगी.

मां की इस बात पर आफरीन के भाई यह कह कर उन्हें सांत्वना देते थे कि आजकल इतनी दूरी कुछ भी नहीं है. सुबह जा कर रात में जयपुर आया जा सकता है. अशहर के घर वाले चाहते थे कि निकाह धूमधाम से हो. उन की चाहत को देखते हुए आफरीन के भाइयों ने शादी की तैयारी शुरू कर दी.

बहन की शादी के लिए उन्होंने इधरउधर से कर्ज भी लिया. लेकिन भाइयों ने शादी 4 सितारा होटल में की. 24 अगस्त, 2014 को आफरीन रहमान और अशहर वारसी की शादी धूमधाम से हो गई. आफरीन की शादी में उस के भाइयों ने अपनी हैसियत से ज्यादा दहेज दिया, ताकि उन की बहन को ससुराल में कोई परेशानी न हो.

शादी के बाद आफरीन इंदौर चली गई. शुरुआती दिन हंसीखुशी में निकल गए. अशहर भी खुश था और आफरीन भी. आफरीन को अपने शौहर के वकील होने का फख्र था तो अशहर को भी अपनी बेगम के उच्च शिक्षित होने की खुशी थी. न तो आफरीन को कोई गिलाशिकवा था और ना ही अशहर को.

दोनों मानते थे कि पढ़ालिखा होने से वे अपनी जिंदगी को खुशहाल बना लेंगे. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. लेकिन आफरीन की खुशियां ज्यादा दिनों तक टिकी नहीं रह सकीं. शादी के 3-4 महीने बाद ही अशहर और उस के घर वालों का व्यवहार बदलने लगा. जो अशहर आफरीन से प्यारमोहब्बत की बातें करते नहीं थकता था, वह उसे आंखें तरेर कर बातें करने लगा.

ससुराल वालों का भी व्यवहार बदल गया था. वे दहेज और अन्य बातों को ले कर ताने मारने लगे थे. आफरीन समझ नहीं पा रही थीं कि यह सब क्यों होने लगा? मौका मिलने पर वह अशहर को समझाने की कोशिश करती, लेकिन अशहर समझने के बजाय उन्हें ही दोषी ठहराता.

आफरीन पढ़ीलिखी और समझदार थीं. वह जानती थीं कि इन बातों का परिणाम अच्छा नहीं होगा. वह भाइयों की स्थिति को भी जानती थीं. अब वे इस हालत में नहीं थे कि बहन की ससुराल वालों की दहेज की मांग पूरी कर सकते. वह यह भी जानती थीं कि अगर एक बार इन की दहेज की मांग पूरी भी कर दी गई तो क्या गारंटी कि ये आगे कुछ नहीं मांगेंगे. उन्हें परेशान नहीं करेंगे.

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यही सोच कर आफरीन ससुराल वालों के अत्याचार सहती रहीं. वह जब भी अकेली होतीं, उस समय को कोसती रहतीं, जब उन की अशहर से जानपहचान हुई थी. उन का सोचना था कि शायद कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा. लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. ससुराल वालों के अत्याचार लगातार बढ़ते ही गए. अब उन के साथ मारपीट भी होने लगी थी, जिसे वह यह सोच कर सहन करती रहीं कि एक न एक दिन यह सब ठीक हो जाएगा.

अशहर घर वालों के कहने पर चल रहा था. वह आफरीन से सीधे मुंह बात भी नहीं करता था. बात सिर से गुजरने लगी तो आफरीन ने अपनी परेशानी भाइयों को बताई. भाई इंदौर गए और अशहर तथा उस के घर वालों को समझाया. अपनी आर्थिक स्थिति भी बताई.

इस के बाद महीना, 15 दिन तक आफरीन के प्रति ससुराल वालों का रवैया ठीक रहा, पर इस के बाद फिर वे उसे परेशान करने लगे. यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा. शादी के करीब एक साल बाद अगस्त, 2015 में अशहर और उस के घर वालों ने पैसे और कई तरह का अन्य सामान लाने की बात कह कर आफरीन से मारपीट की और उन्हें घर से धक्के मार कर निकाल दिया.

आफरीन सब के सामने गिड़गिड़ाती रहीं और कहती रहीं कि उन के भाइयों की इतनी हैसियत नहीं है कि वे उन की मांगें पूरी कर सकें. ससुराल वालों ने उन की एक भी बात नहीं सुनी. आफरीन क्या करती? वह जयपुर भाइयों के पास आ गईं. भाइयों ने अशहर और उन के घर वालों से बात की. नातेरिश्तेदारों से दबाव डलवाया.

आखिर 7-8 दिनों बाद आफरीन के ससुराल वाले आ कर उन्हें इंदौर ले गए. आफरीन भी यह सोच कर उन के साथ चली गईं कि शायद अब इन्हें अक्ल आ गई होगी. लेकिन जल्दी ही ससुराल में उन के साथ फिर वैसा ही व्यवहार होने लगा. अशहर और उन के घर वाले फिर दहेज की मांग करते हुए उन के साथ मारपीट करने लगे. ऐसा कोई दिन नहीं होता था, जिस दिन उन्हें ससुराल न मारा जाता रहा हो.

आफरीन ने एक बार फिर अशहर को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. सितंबर, 2015 में अशहर और उस के घर वालों ने एक बार फिर मारपीट कर आफरीन को घर से निकाल दिया. आंखों से आंसू लिए आफरीन एक बार फिर जयपुर स्थित अपने मायके आ गईं. आफरीन अपने भाइयों पर बोझ नहीं बनना चाहती थीं.

आफरीन पढ़ीलिखी थीं, इसलिए अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थीं. जयपुर में वह नौकरी की तलाश करने लगीं. उसी बीच उन पर दुखों का एक और पहाड़ टूट पड़ा. अक्तूबर, 2015 में जयपुर से जोधपुर जाते समय सड़क दुर्घटना में आफरीन की मां की मौत हो गई. हादसे में उन्हें भी चोटें आई थीं.

आफरीन की ससुराल वालों को सूचना भेजी गई. अशहर जयपुर आया जरूर, लेकिन 2-3 दिन रुक कर चला गया. उस ने आफरीन को ले जाने की बात एक बार भी नहीं की. आफरीन के भाइयों ने कहा भी तो उस ने कोई जवाब नहीं दिया. आफरीन जयपुर में रहते हुए अपने भविष्य के बारे में सोच रही थीं.

कभीकभी उन्हें लगता था कि सब कुछ ठीक हो जाएगा. अशहर को जिस दिन उस की अहमियत का अहसास होगा, वह जयपुर आ कर उसे ले जाएगा. लेकिन उन का यह सोचना केवल मन को तसल्ली देने वाली बात थी. जयपुर में रहते हुए आफरीन को पता नहीं था कि उस के शौहर अशहर के मन में क्या चल रहा है? जनवरी, 2016 के आखिरी सप्ताह में स्पीडपोस्ट से अशहर का भेजा तलाकनामा आ गया.

तलाकनामा में 3 बार लिखे ‘तलाक…तलाक…तलाक…’ को पढ़ कर आफरीन की आंखों में आंसू आ गए. वह सोचने लगीं कि अब क्या किया जाए? उन्होंने अपने भाइयों तथा मिलनेजुलने वालों से राय ली. सभी ने उन की हिम्मत बढ़ाई. वह कुछ महिला संगठनों, मुसलिम संगठनों एवं वकीलों से मिलीं. आखिर उन्होंने 3 तलाक के सिस्टम को ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया.

इस बीच, अप्रैल 2016 में आफरीन के बड़े भाई फहीम की दुर्घटना में मौत हो गई. एक तरफ आफरीन का विवाह टूट रहा था और दूसरी ओर 7 महीने के अंदर मां और बड़े भाई की हादसों में हुई मौत ने उन्हें तोड़ कर रख दिया था. परिवार में भाभी और एक छोटा भाई ही बचा था.

इस के बावजूद आफरीन ने अपना दिल कड़ा किया. 3 तलाक के खिलाफ अपने वकील के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने मई, 2016 में आफरीन की यह याचिका स्वीकार कर ली.

3 तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली आफरीन देश की दूसरी महिला थीं.

इस से पहले उत्तराखंड के काशीपुर की शायरा बानो ने फरवरी, 2016 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 3 तलाक और बहुविवाह को खत्म करने का आग्रह किया था.

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आफरीन का कहना है कि 3 तलाक पूरी तरह से नाइंसाफी है. उन की तलाक की इच्छा थी या नहीं, यह उन से एक बार भी नहीं पूछा गया. इस तरह चिट्ठी के जरिए तलाक देना अपने आप में क्रूरता है. इस तरह तलाक दे कर महिलाओं के अधिकारों और इच्छाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाता है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अब आफरीन पति से मेहर की रकम और गुजारा भत्ता चाहती हैं.

दर्द के दरिया में डूबी मुमताज

उत्तर प्रदेश के झांसी के थाना सीपरी के इलाके की आवास विकास कालोनी की रहने वाली मुमताज बेगम का निकाह 21 दिसंबर, 2003 को वहीं के रहने वाले वारिस उज्जमा के साथ हुआ था. शादी के बाद वह जल्दी ही गर्भवती भी हो गई. लेकिन उस के पति और ससुराल वालों ने कहना शुरू कर दिया कि उन्हें बेटा चाहिए.

जब दिसंबर, 2004 में मुमताज बेटी की मां बनी तो उस पर मुसीबतें टूट पड़ीं. उत्पीड़न के साथ पति और ससुराल वाले उस पर यह कह कर मायके से 5 लाख रुपए लाने के लिए दबाव डालने लगे कि उस की बेटी मायके की है. उस की शादी के लिए पैसे की जरूरत पड़ेगी.

बात बेटी की शादी बचाने की थी. पूरा हालहवाल जान कर मायके वालों ने यह कह कर कि जब बेटी बड़ी हो जाए तो प्लौट बेच कर उस की शादी कर दी जाएगी. मुमताज के नाम एक प्लौट की रजिस्ट्री करा दी गई. कुछ समय शांति रही. इस बीच मुमताज एक बेटे और एक बेटी की मां बनी. इस के बावजूद फिर से मुमताज के साथ बदसलूकी शुरू हो गई. मारपीट भी होने लगी.

जल्दी ही वह दिन भी आ गया, जब 3 तलाक कह कर वारिस उज्जमा ने उसे घर से निकाल दिया. बाद मे उस ने बाकायदा लिख कर शरिया हिसाब से उसे तलाक दे दिया.

मुमताज ने समाज के ठेकेदारों से न्याय दिलाने की मांग की. मुसलिम पर्सनल लौ बोर्ड  से संबंद्ध अदालत के काजी (जज) से संपर्क किया.  लेकिन सब ने एक ही बात कही कि यह धर्म का मामला है, तलाक हो चुका है. इसलिए कुछ नहीं किया जा सकता. औल इंडिया पर्सनल लौ बोर्ड से संबंद्ध दारुल कजा शरई अदालत के मुफ्ती सिद्दीकी नकवी ने कहा कि बेशक तलाक का तरीका गलत है, पर तलाक तो हो ही गया है, इसलिए कुछ नहीं किया जा सकता.

अब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद मुमताज को न्याय मिल सकेगा. अभी तक वह न्याय के लिए धर्म के ठेकेदारों के पास भटकती रही, जिन्होंने उसे दिलाशा देना तक उचित नहीं समझा. Domestic Dispute