अधेड़ उम्र का खूनी प्यार

नाजायज रिश्ते में पति की बलि

प्रेमिका के लिए पत्नी का कत्ल

दिल, दौलत और दगाबाज दोस्त

उत्तरी अमेरिका के शहर लास वेगास को दुनिया का फन सिटी माना जाता है. वहां चौबीसों घंटे जुआ खेला जाता है, इसलिए वहां जुआ खेलने वालों का जमघट लगा रहता है. यहां सिर्फ जुआ ही नहीं खेला जाता, सैक्स और फैशनेबल कपड़ों का भी व्यापार होता है. इस की वजह से यहां अपराधी भी बहुत हैं. यहां रातदिन टौपलेस लड़कियों के डांस शो और शराब के साथ जुआ चलता रहता है.

इस शहर की रौनक सालोंसाल से ज्यों की त्यों बनी है. कसीनो में डूबी रातों, स्पा बाथ के जलवे और सैक्स का मजा लूटने यहां तमाम पर्यटक आते हैं. कसीनो में पैसे वाले लोग हजारोंलाखों रुपयों की बाजियों में डूबे रहते हैं. एक तरफ बाजी जीतने वाले को खुशी होती है तो दूसरी ओर हजारों लाखों हारने वाले पर भी ‘जीत’ का नशा छाया रहता है.

कसीनो का मायाजाल ही ऐसा होता है कि हारने का भी गम नहीं होता. वह इसी उम्मीद में रहता है कि कभी उस का भी समय आ सकता है. 17 सितंबर, 1996 की रात निवेडा वैली पर काले बादलों का ऐसा साया मंडराया, जो कभी फीका नहीं पड़ा. निवेडा वासियों के दिल में अब घोड़ों, जुआ और लड़कियों के शौकीन टेड बिनियन की सिर्फ यादें ही रह गई हैं.

स्मार्ट, गणित में माहिर और बेशुमार दौलत का मालिक टेड के पास इतनी दौलत थी कि नोट गिनने वाली मशीन भी थक जाए. खतरों से खेलने वाला, मौत से न डरने वाला, टेड आखिर में मारा गया. जो दौलत उसे जान से प्यारी थी, उसी दौलत की वजह से उसे जान गंवानी पड़ी.

टेड बिनियन लड़कियों का भी खूब शौकीन था. उसे हर रोज एक नई लडक़ी की तलाश होती थी. पैसा उस के पास था ही, इसलिए हर रात उसे नई लडक़ी आसानी से मिल जाती थी. उस रात वह लडक़ी की ही तलाश में चिताह क्लब पहुंचा तो वहां उस की मुलाकात साथ वाली टेबल पर बैठी सैंडी मर्फी से हुई.

टेड बारबार उसी की ओर देख रहा था. उस के इस तरह देखने से सैंडी को अंदाजा हो गया कि वह क्या चाहता है. सैंडी को पता था कि टेड अरबपति है. टेड ने सैंडी को अपनी तरफ खींचने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस ने भाव नहीं दिया.

तब उस ने उसे नोटों की गड्डी दिखाई. लेकिन सैंडी ने उसे लौटाते हुए कहा, “तुम ने मुझे समझा क्या है? तुम्हें क्या लगता है कि पैसे ले कर मैं तुम्हारे साथ चल दूंगी.”

टेड ने सोचा था कि सैंडी भी अन्य लड़कियों की तरह होगी, लेकिन वह वैसी नहीं थी. जबकि यह उस की एक अदा थी, जिस की बदौलत वह टेड को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब हो गई थी. उस के इस अंदाज से टेड अंदर तक घायल हो गया था. लड़कियों को सिर्फ मौजमस्ती की चीज समझने वाले टेड के दिल में सैंडी अपनी इस अदा से उतर गई थी.

जबकि सही बात यह थी कि सैंडी पैसों की तलाश में ही कैलिफोर्निया से लास वेगास आई थी. वह पैसों के लिए क्लबों में टौपलेस डांस करती थी. सैंडी की यह अदा टेड के लिए दिखावा भर थी. वह टेड की अमीरी और खुले दिल से अनजान नहीं थी. वह खुद उसे अपनी ओर खींचना चाहती थी. जिस में वह कामयाब भी हो गई थी.

इस के बाद उन्हें मिलते देर नहीं लगी. उन की मुलाकातें होने लगीं. एक लंबे समय के बाद सैंडी को पता चला कि टेड ही उस कसीनो का मालिक है, जहां वह काम करती थी. 2 सप्ताह में ही सैंडी की जिंदगी बदल गई थी.

टेड की पत्नी को जब पति और सैंडी के प्रेम के बारे में पता चला तो उस की पत्नी डौरिस अपनी 15 वर्षीया बेटी को ले कर चली गई. उस ने तलाक का मुकदमा करने में भी देर नहीं की. टेड शराब तो पीता ही था, पत्नी के जाने के बाद हेरोइन भी लेने लगा.

डोरिस के घर से जाते ही जो सैंडी पैसों की खातिर हर रात क्लबों में जिस्म दिखाने का नाच करती थी, वह अरबपति के घर की मालकिन बन गई. एक तरह से उस के हाथ सोने का अंडा देने वाली मुर्गी लग गई थी. लास वेगास ने उस की जिंदगी बदल दी थी.

टेड सैंडी की अदाओं पर फिदा था. हर रात उस के साथ बाहर जा कर खाना खाता, कसीनो में जुआ खेलता और फिर रात भर सैंडी के साथ मजे लेता. यही उस की जिंदगी का नियम बन गया था.

सैंडी ने जिंदगी में जो चहा था, पा लिया था. अब टेड की बेशुमार दौलत सैंडी के हाथों में थी. उस की जिंदगी ने नया करवट तब लिया, जब उस की जिंदगी में टेबिश आया. रिक टेबिश लास वेगास सन 1991 में आया था. यहां उस ने अपनी ट्रांसपोर्ट कंपनी खोली थी. इस के बाद जल्दी ही उस की गिनती करोड़पतियों में होने लगी थी.

पिएरो रेस्टोरेंट के रौसलेट में रिक की मुलाकात टेड से हुई तो जल्दी ही दोनों गहरे दोस्त बन गए. एक दिन टेड रिक को अपने घर ले गया तो वहां उस ने उसे सैंडी से मिलवाया. इस के बाद अक्सर तीनों की मुलाकातें होने लगीं. टेड बिनियन अपने कारोबार में व्यस्त रहता था, जिस की वजह से सैंडी का झुकाव रिक की ओर हो गया. वह उस के साथ शौङ्क्षपग पर भी जाने लगी. इस तरह दोनों करीब आते गए.

इस के बाद एक शाम जब दोनों घर में अकेले थे तो सैंडी ने कहा, “रिक, क्या तुम्हें नहीं लगता कि हमारे बीच अपनापन इस हद तक बढ़ गया है कि अब इसे रिश्ते का नाम दे दिया जाना चाहिए.”

“कैसा रिश्ता?” रिक ने पूछा.

“प्यार का रिश्ता,” सैंडी ने कहा, “तुम्हारे साथ होने पर दिल में कुछकुछ होने लगता है. सच कहूं, मेरा दिल बिलकुल खाली है. टेड को तो मेरे दिल ने सिर्फ नाम का पति माना है. उस बूढ़े में इतनी ताकत कहां है कि उसे पूरी तरह से पति मान लिया जाए. वह शरीर में आग तो लगा देता है, लेकिन बुझाना उस के वश की बात नहीं है.”

रिक उस के कहने का मतलब समझ गया था. वह तो वैसे ही सैंडी पर फिदा था. इस तरह खुले आमंत्रण पर भला कैसे खुद को रोक पाता. उस ने सैंडी को बाहों में भर लिया. इस का नतीजा यह रहा कि दोनों के बीच जिस्मानी दूरी खत्म होते देर नहीं लगी.

दोनों एकांत के साथी बने तो हर छोटीबड़ी बातों के भी राजदार बन गए. इस सब से बेखबर टेड का भी रिक पर विश्वास बढ़ता गया. यही वजह थी कि एक दिन टेड ने उस से पाॄकग के नीचे बने बेसमेंट में दबी चांदी के सिक्कों की बोरियों को कहीं दूसरी जगह ले जाने के बारे में सलाह मांगी. क्योंकि टेड अपनी बहन की दखलंदाजी से परेशान था. वह उस की दौलत हड़पना चाहती थी.

इस के बाद रिक की सलाह पर टेड ने चांदी के सिक्कों से भरी बोरियां लास वेगास से 60 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव पाहरूपम पहुंचा दी. टेड ने वहां जमीन खरीद कर इंजीनियर्स ग्रुप की मदद से एक तहखाना बनवाया था और उसी में अपनी दौलत रखवा दी थी.

17 सितंबर, 1998 की रात लास वेगास के मेट्रोपैलिटन डिपार्टमेंट में एक फोन आया, जिस में एक औरत कह रही थी कि उस के पति की तबीयत बहुत खराब है. उन्होंने सांस लेना बंद कर दिया है.

उस ने घर का पता बताया था 2406, पोलोकिनो लेन. यह टेड बिनियन का घर था. वह फोन सैंडी ने किया था. थोड़ी देर में घर के बाहर 3 जीपें आ कर रुकीं. इसी के साथ डाक्टरों की 2 टीमों के साथ पुलिस वालों की लाइन लग गई. भीतर से सैंडी चिल्लाई, “आप लोग इन्हें बचा लो, यह मर जाएंगे, इन की सांस रुक गई है.”

एक डाक्टर उसे चुप कराने लगा तो बाकी अंदर चले गए. रेंकल ने बाहर आ कर उस से पूछा, “आप कौन हैं?”

“मैं उन की बीवी हूं.” सैंडी बोली.

“आप की पति से आखिरी बार कब मुलाकात हुई थी?”

“आज सुबह.”

रेंकल सैंडी को वहीं छोड़ कर अंदर टेड के पास पहुंचा. उस की नब्ज टटोली तो रुक चुकी थी. शरीर एकदम ठंडा हो चुका था. साफ था टेड मर चुका था. सैंडी भी आ गई और टेड की लाश से लिपट कर रोने लगी. पुलिसकॢमयों ने उसे पकड़ कर अलग किया और सांत्वना दिया.

टेड को जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया. वहां सैंडी की तबीयत खराब हो गई तो उसे दवा दे कर सुला दिया गया. कुछ देर में रिक भी आ गया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में उस ने बताया कि वह टेड और सैंडी दोनों का दोस्त है. वह कारोबार के सिलसिले में शहर से बाहर जा रहा था. टेड की मौत का पता चला तो एयरपोर्ट से सीधे अस्पताल आ गया.

पुलिस ने अनुमान लगाया कि कैसीनों का लाइसैंस न मिलने से टेड ने आत्महत्या की होगी. सैंडी ने बताया कि देर शाम उस ने टेड के हाथ में बंदूक देखी थी. चाह कर भी उसे नींद नहीं आ रही थी. परेशानी की वजह से उन्होंने हेरोइन की ज्यादा डोज ले ली होगी?

जांच करने वाली टीम ने पाया कि टेड बिनियन की मौत आत्महत्या नहीं थी, बल्कि उसे आत्महत्या दिखाने की कोशिश की गई थी. जांच में उस के कमरे से जो एक्सानेक्स की शीशी मिली थी, उस की अधिक डोज देने से टेड तड़पतड़प कर एक कमरे से दूसरे कमरे में भटका होगा. कमरा बंद होने की वजह से छलांग लगाने का भी कोई रास्ता नहीं था. इस दवा के कारण उल्टी भी हुई होगी, जिसे साफ किया गया होगा.

यह अपराध काफी गहराई तक सोच कर किया गया था. टेड बिनियन की मौत के 2 दिनों बाद 19 सितंबर, 1998 पुलिस को सूचना मिली कि 2 बड़ेबड़े भरे हुए ट्रक पाहरूम से बाहर जाते हुए देखे गए हैं. उन दोनों ट्रकों में से एक को रिक टेबिश चला रहा है, जबकि दूसरे को उस का साथी डेविड मेटसन.

दोनों ट्रकों को पीछा कर के पकड़ लिया गया. उस समय तो रिक बहाना कर के बच गया था. उस ने कहा था कि टेड बिनियन ने उसे ये ट्रक मि. एंथनी के पास पहुंचाने को कहा था. लेकिन आगे की जांच में सैंडी और रिक शक के दायरे में आ गए. इस के बाद 14 जून, 1999 को सैंडी मर्फी और रिक टेबिश को गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में पता चला कि जिस रात टेड का कत्ल हुआ था, दोनों होटल पेनिनसुला में एक साथ दिखाई दिए थे. होटल का कमरा मिस्टर एंड मिसेज टेबिश के नाम से बुक कराया गया था. रात गुजारने के बाद दोनों सुबह वहां से एक साथ घर के लिए निकले थे. लेकिन उस समय सबूत न होने की वजह से वे छूट गए थे.

करीब 4 सालों बाद अक्टूबर, 2004 में सैंडी मर्फी और रिक टेबिश को सबूतों के साथ पेशी के लिए कोर्ट में लाया गया, जहां दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. सैंडी ने माना कि उस ने टेड बिनियन के साथ शादी प्यार की वजह से नहीं, उस की दौलत की वजह से की थी. वह उस की दौलत हासिल करना चाहती थी. इस के बाद रिक उस की जिंदगी में आया तो दोनों ने शादी का फैसला कर लिया.

सैंडी की तरह रिक भी टेड की दौलत हड़पना चाहता था. सैंडी ने जब उस से टेड की दौलत हथिया कर शादी करने को कहा तो वह राजी हो गया. सैंडी जानती थी कि टेड हेरोइन के नशे का आदी है. इस के अलावा वह कई तरह की नशीली गोलियां भी खाता था.

उस ने टेड को मारने के लिए इन्हीं चीजों का सहारा लेने का फैसला किया. रिक भी इस पर सहमत हो गया. घटना वाले दिन पहले दोनों ने दवा की हाई डोज दे कर टेड को मार दिया. उस के बाद दोनों ने जिस्मानी भूख मिटाई.

उन्होंने माना कि टेड बिनियन को जबरदस्ती 12 पैकेट हेरोइन खिलाई गई थी. उस के बाद एक्सानेक्स की 10 गोलियां उस के मुंह में ठूंस दी थी, ताकि उस की अरबों की दौलत के मालिक वे खुद बन सकें.

दोनों के अपराध स्वीकार करने और सबूतों के आधार पर जज ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी. उम्रकैद की सजा मिलने के बाद सैंडी और रिक ने कई बार जमानत की अर्जी दी, लेकिन उन्हे खारिज कर दिया गया.

2 जनवरी, 2010 को फिर सैंडी ने उम्र का हवाला देते हुए जमानत की अर्जी दाखिल की कि अभी उस की उम्र ही क्या है, अपने किए की वह काफी सजा भुगत चुकी है, इसलिए उस के भविष्य को ध्यान में रख कर उसे जमानत दी जाए. लेकिन इस बार भी उसे जमानत नहीं मिल सकी. दोनों की उम्रकैद की सजा बरकरार है. यह प्रकरण इतना विख्यात हुआ था कि हौलीवुड में इस पर फिल्म बनी थी.

जी नहीं पाए प्यार करने वाले

आगरा का एक छोटा सा गांव है नगला लालजीत, जिस की आबादी मुश्किल से 5 सौ होगी. इस में कुशवाहा ज्यादा हैं, जबकि ठाकुरों के सिर्फ 4 घर हैं. इन में एक घर है हुकुम सिंह का. उन के परिवार में पत्नी शांति के अलावा 5 बेटे और एक बेटी थी. उन का सब से छोटा बेटा था नरेश, जो किसी मोबाइल कंपनी में सेल्समैन था.

इसी गांव का रहने वाला गिरिराज कुशवाहा शादीब्याह में खाना बनाने का ठेका लेता था. उस के परिवार में पत्नी जलदेवी के अलावा 3 बेटियां सीमा, रोशनी, भारती और 2 बेटे देवेश तथा योगेश थे. सीमा की शादी उस ने देवी रोड निवासी शैलेंद्र के साथ की थी तो उस से छोटी रोशनी की शादी आगरा के रहने वाले बंटू से. तीसरी बेटी भारती का अभी विवाह नहीं हुआ था. यह कहानी गिरिराज की इसी तीसरी बेटी भारती की है.

एक साल पहले तक हुकुम सिंह और गिरिराज कुशवाहा सुखशांति से रह रहे थे. उन के घरों के बीच ज्यादा दूरी नहीं थी. छोटा सा गांव है, इसलिए गांव का हर कोई एकदूसरे को जानता ही नहीं था, बल्कि सभी रिश्ते की डोर से बंधे थे, चाहे वह किसी भी जाति के हों.

भारती मात्र आठवीं तक पढ़ी थी, क्योंकि इस से आगे वह न पढऩा चाहती थी और न ही गिरिराज उसे पढ़ाना चाहता था. लेकिन एक पढ़ाई वह मांबाप से छिपछिप कर जरूर पढ़ रही थी. और वह थी इश्क की. इस पढ़ाई में उस के साथ था हुकुम सिंह का सब से छोटा बेटा नरेश.

किसी दिन नरेश और भारती की नजरें टकराईं तो उन के दिलों की धडक़नें बढ़ गईं. दोनों अलगअलग जाति के थे, लेकिन इश्क करने वाले कहां इस की परवाह करते हैं. प्यार दोनों को करीब ले आया और वे लुकछिप कर मिलने लगे. उन्हें मिलने में परेशानी भी नहीं होती थी, क्योंकि आजकल लगभग सभी के पास मोबाइल फोन है ही. यही मोबाइल फोन उन की भी मिलने में मदद कर रहा था. उन्हें जब मिलना होता, फोन कर के समय और जगह तय करते, उस के बाद तय समय और जगह पर मिल लेते.

भारती और नरेश प्यार ही नहीं कर बैठे, साथ जीने और मरने की कसमें भी खा लीं, लेकिन उन की जाति अलगअलग थी, इसलिए उन्हें पता था कि उन का यह सपना आसानी से पूरा नहीं होगा. इसलिए कभीकभी भारती नरेश से पूछती भी थी कि समाज के डर से कहीं वह उसे छोड़ तो नहीं देगा?

तब नरेश कहता, “भारती, मैं अपने घर वालों को छोड़ सकता हूं, पर तुम्हें नहीं छोड़ सकता.”

नरेश भले ही भारती को हर तरह से साथ देने का आश्वासन देता था, पर वह जानता था कि यह सब इतना आसान नहीं है. गांव में, वह भी दूसरे जाति की लडक़ी से शादी करना बहुत ही मुश्किल काम है. लेकिन उस का प्यार दीवानगी की हद तक पहुंच चुका था, इसलिए उस की अच्छाबुरा सोचने की समझ ही खत्म हो चुकी थी. न उसे घरपरिवार दिखाई दे रहा था और न समाज. उसे परिणाम की भी चिंता नहीं थी.

नरेश और भारती भले ही लुकछिप कर मिल रहे थे, लेकिन उन का यह प्यार गांव वालों की नजरों से छिपा नहीं रह सका. फिर एक दिन वही हुआ, जिस का डर था. भारती फोन पर नरेश से बातें कर रही थी, तभी गिरिराज ने उस की कुछ बातें सुन लीं. उस ने पूछा, “किस से बातें कर रही है?”

जवाब में भारती कुछ कहती, गिरिराज ने उस के हाथ से मोबाइल छीन लिया. उस में नरेश की फोटो लगी देख कर उस ने अपना सिर पीट लिया. उसे समझते देर नहीं लगी कि बेटी आशिकी में फंस गई है.

“यह सब क्या है?” गिरिराज ने फोटो दिखाते हुए पूछा, “तू नरेश से क्यों बातें करती है?”

भारती अंजान बनते हुए बोली, “पापा मैं तो अपनी सहेली से बातें कर रही थी, कभीकभी नेटवर्क की गड़बड़ी की वजह से किसी दूसरे को फोन ही नहीं लग जाता, बल्कि उस का फोटो भी आ जाता है.”

गिरिराज इतना बेवकूफ नहीं था, जितना भारती समझ रही थी. उस ने पूछा, “पहले तो यह बता, नरेश का नंबर तेरे मोबाइल में कैसे आया?”

“पड़ोसी है, अब पड़ोसी का नंबर मोबाइल में नहीं आएगा तो क्या दूसरे गांव वालों का आएगा?” भारती रुआंसी हो कर बोली.

गिरिराज को लगा कि वह बेटी के साथ ज्यादती कर रहा है. जब मोबाइल है तो उस में नंबर तो होंगे ही. रही बात नरेश की तो वह गांव का ही नहीं है, पड़ोसी भी है. मोबाइल का काम भी करता है. इसलिए उस का नंबर भारती के पास है तो बुरा क्या है. वह चुप हो गया.

गिरिराज भले ही चुप हो गया, लेकिन भारती कहां चुप होने वाली थी. वह उसी दिन नरेश से मिली और पूरी बात बता कर बोली, “आज तो किसी तरह बच गई, लेकिन इस तरह कब तक चलेगा. जो कुछ भी करना है, जल्दी करो.”

नरेश ने कहा, “पहले तो हम घर वालों से कहेंगे कि वे हमारी शादी कर दें. नहीं करेंगे तो मैं तुम्हें ले कर कहीं दूर चला जाऊंगा, जहां घर वाले पहुंच ही नहीं पाएंगे.”

भारती को नरेश पर पूरा विश्वास था, वह उस से अलग होना भी नहीं चाहती थी, इसलिए वह उस के साथ भागने को तैयार थी. लेकिन जब एक दिन गिरिराज ने बेटी को नरेश के साथ देख लिया तो उसे ममझते देर नहीं लगी कि बेटी ने उस से झूठ बोला था.

उस ने पत्नी से कहा, “भारती पर नजर रखो, उस का घर से बाहर निकलना बंद कर दो, वरना यह हमारी नाक कटवाने वाली है.”

इस के बाद भारती पर नजरों के पहरे लग गए. उस का बाहर आनाजाना बंद कर दिया गया. यही नहीं, सोचविचार कर गिरिराज ने बड़े दामाद शैलेंद्र को फोन कर के बुलाया और पूरी बात बता दी. इस पर शैलेंद्र ने कहा, “आप नरेश के पिता से मिलें और उन से कहें कि वह बेटे को समझाएं.”

गिरिराज ने हुकुम सिंह से शिकायत की तो उन्होंने नरेश को समझाने का आश्वासन ही नहीं दिया, बल्कि समझाया भी. लेकिन नरेश को तो जैसे ऐसे ही मौके की तलाश थी. उस ने कहा, “पापा, मैं भारती से प्यार करता हूं और उस से शादी करना चाहता हूं.”

“तुम्हारा दिमाग तो ठीक है,” हुकुम सिंह ने उसे डांटा, “ऐसा कतई नहीं हो सकता. एक तो वह गांव की है, दूसरे दूसरी जाति की है. तुम जानते हो गांव में ठाकुरों के सिर्फ 4 ही घर हैं. कुशवाहा ज्यादा हैं. अगर कुछ उल्टासीधा किया तो इस का खामियाजा पूरे परिवार को भुगतना पड़ेगा.”

बाप की इस बात से नरेश की समझ में आ गया कि भारती को भगा कर ले जाना ठीक नहीं है. क्योंकि अगर वह उसे भगा कर ले गया तो गांव के कुशवाहा उस के घर वालों का जीना हराम कर देंगे. अब उसे गांव में ही रह कर अपने और भारती के घर वालों को मनाना होगा.

नरेश ने गिरिराज को संदेश भिजवाया कि वह भारती से प्यार करता है और शादी करना चाहता है. वह वादा करता है कि भारती को खुश रखेगा. लेकिन जब यह संदेश गिरिराज को मिला तो वह उबल पड़ा. उस ने नरेश को तो कुछ नहीं कहा, लेकिन भारती की जम कर पिटाई कर दी. उस का कहना था कि उसी की वजह से आज उसे यह दिन देखना पड़ा है.

भारती की बहनों और बहनोइयों ने भी उसे समझाया. लेकिन उस ने साफ कह दिया कि वह शादी करेगी तो नरेश से, वरना पूरी जिंदगी कुंवारी रहेगी. हुकुम सिंह और उन की पत्नी शांति भी नरेश को समझा रहे थे कि वह ऐसा कोई काम न करे, जिस से परिवार को परेशानी हो.

इस आशिकी की वजह से दोनों परिवारों में काफी तनाव था. गांव भी इस आशिकी से अंजान नहीं था. गिरिराज ने बदनामी से बचने के लिए दिसंबर के पहले सप्ताह में गांव की पंचायत बुलाई. पंचायत में दोनों ही बिरादरी के लोग शामिल थे. सभी इस शादी के खिलाफ थे, इसलिए सभी ने नरेश और भारती को समझाया कि वे ऐसा न करें. उन के ऐसा करने से गांव की बदनामी तो होगी ही, आने वाली पीढ़ी पर भी इस का बुरा असर पड़ेगा.

लेकिन नरेश और भारती उन की बातों से सहमत नहीं थे. उन का कहना था कि वे नए जमाने के लोग हैं. वे अपनी खुशी देखते हैं, परंपरा नहीं. इस पर बुजुर्गों ने उन्हें डांट कर चुप करा दिया और कहा कि वे जो चाहते हैं, वैसा कतई संभव नहीं है.

“तो फिर ठीक है, आप सभी हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए. हम अपनीअपनी दुनिया में एकदूसरे की यादों के सहारे जी लेंगे.” भारती ने कहा.

इस पर कुशवाहा नाराज हो गए. उन का कहना था कि बेटी को अविवाहित कैसे रखा जा सकता है. लेकिन भारती का बागी सुर मुखर हो उठा, “कुछ भी हो, मैं नरेश के अलावा किसी और से शादी नहीं कर सकती.”

दोनों की जिद को देखते हुए पंचायत ने फैसला किया कि इन्हें गांव से बाहर रिश्तेदारियों में भेज दिया जाए. गिरिराज को लगा कि बेटी ने उस का सिर झुका दिया है, इसलिए उस ने पंचायत के सामने कहा, “अगर ऐसा कुछ हुआ तो वह दोनों को काट कर रख देगा.”

ठाकुरों ने कोई जवाब नहीं दिया. उन का सोचना था कि कुछ दिन दोनों अलग रहेंगे तो सब ठीक हो जाएगा. उस समय यह किसी ने नहीं सोचा था कि गिरिराज ने जो कहा है, वह सचमुच ही वैसा कर डालेगा.

जो छिपा था, इस पंचायत के बाद पूरी तरह खुल गया. नरेश और भारती जो अब तक लुकछिप कर मिलते थे, वे खुलेआम मिलने लगे. शांति को बेटे की जान खतरे में लगी तो उस ने उसे बेटी के पास दिल्ली भेज दिया.

लेकिन पंचायत में जो हुआ था, उस से गिरिराज को लग रहा था कि उस की मूंछें नीची हो गई हैं. मूंछें उठाने के लिए उसे कुछ करना ही होगा. उस ने अपनी जाति के कुछ लोगों से बात की तो उन्होंने कहा कि बेटी को खत्म कर दो, सारा झंझट खत्म हो जाएगा. इज्जत भी बच जाएगी.

गिरिराज ने भारती को खत्म करने का इरादा तो बना लिया, लेकिन उसे लगा कि भारती की हत्या पर नरेश चुप नहीं बैठेगा. क्योंकि वह उसे जान से ज्यादा प्यार करता है. भारती की मौत का संदेह होते ही वह पुलिस के पास पहुंच जाएगा. जब इस बात पर गहराई से विचार किया गया तो उस के बड़े दामाद शैलेंद्र ने कहा, “दोनों को खत्म कर देते हैं. किसी ठाकुर में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह पुलिस के पास जा कर शिकायत करेगा.”

दामाद की बात गिरिराज को भी उचित लगी. लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था. गांव में कत्ल करने पर वे पकड़े जा सकते थे. इसलिए योजना बनी कि कहीं दूर ले जा कर दोनों को मारा जाए. इस के लिए भारती को विश्वास में लेना जरूरी था. घर वालों ने कोशिश भी शुरू कर दी. लेकिन भारती को विश्वास नहीं हो रहा था. उसे विश्वास तब हुआ, जब जलदेवी उस के लिए शादी का जोड़ा खरीद कर ले आई. इस के बाद भारती को लगा कि उस के घर वाले सचमुच शादी को तैयार हैं.

मां ने ही नहीं, पिता ने भी कहा, “हमारी समझ में आ गया है कि तू सचमुच नरेश को बहुत प्यार करती है. फिर इस में बुराई ही क्या है. नरेश है भी तो ऊंची जाति का. मुझे पहले लगता था कि वह धोखा दे देगा. लेकिन अब हमें उस पर भी विश्वास हो गया है. वह तुझ से शादी कर के तुझे सुखी रखेगा.”

भारती को पिता की बातों पर विश्वास तो नहीं हो रहा था, लेकिन उसे उस की बातों में कोई साजिश भी नजर नहीं आ रही थी. वह कुछ नहीं बोली तो गिरिराज ने कहा, “गांव में तो हम तेरी शादी करा नहीं सकते, क्योंकि गांव वाले यह शादी कतई नहीं होने देंगे. तू ऐसा कर, नरेश को प्रिंस के ढाबे पर बुला ले. हम उसे ले कर ग्वालियर के किसी मंदिर चलते हैं और वहीं तुम दोनों की शादी करा देते हैं.

नगला लालजीत गांव ग्वालियर के लिए जाने वाले हाईवे के किनारे बसा है. भारती जानती थी कि गांव वाले उस की शादी का विरोध कर रहे हैं. इसीलिए मम्मीपापा उस की शादी गांव से बाहर किसी मंदिर में करना चाहते हैं. उस ने नरेश को फोन कर के सारी बात बताई तो वह बहुत खुश हुआ.

किसी को कुछ बताए बगैर वह उसी रात प्रिंस के ढाबे पर पहुंच गया. गिरिराज पत्नी और भारती के साथ वहां पहले से मौजूद था. उस ने उसे गाड़ी में बैठाया और चल पड़ा. भारती और नरेश पिछली सीट पर एक साथ बैठे थे. वे सुनहरे भविष्य की कल्पनाओं में इस तरह खोए थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब गाड़ी मौजपुरा के जंगल में पहुंच गई.

वहां पहुंचते ही नरेश समझ गया कि ये लोग उस की शादी कराने नहीं, उन्हें मारने लाए हैं. क्योंकि पीछे से भारती का बहनोई शैलेंद्र मोटरसाइकिल से भी वहां पहुंच गया था. नरेश तो कुछ नहीं बोला, लेकिन भारती फट पड़ी, “तुम लोग इतने बड़े धोखेबाज निकलोगे, मैं ने सोचा भी नहीं था. इस से अच्छा तो तुम लोगों ने पैदा होते ही मेरा गला घोंट दिया होता. “

नरेश और भारती ने जिंदगी के लिए संघर्ष तो बहुत किया, लेकिन उन लोगों ने नरेश को उस के मफलर तथा भारती को उस की शाल से गला घोंट कर मार दिया. दोनों लाशें वहीं छोड़ कर सभी लौट आए. भारती के पास शिनाख्त लायक वैसे भी कुछ नहीं था, नरेश की जेबों से भी सब कुछ निकाल लिया गया था. सभी यह सोच कर निश्चिन्त थे कि पुलिस उन तक पहुंच नहीं पाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

अगले दिन राजस्थान के जिला धौलपुर के थाना मनियां के थानाप्रभारी रतन सिंह को जंगल में 2 लाशें पड़ी होने की सूचना मिली तो सहयोगियों के साथ वह वहां पहुंच गए. उन्होंने शिनाख्त के लिए दोनों लाशों की तलाशी ली तो लड़की के पास से तो कुछ नहीं मिला, लेकिन लड़के की जेब से परिचय पत्र मिल गया, जिस से पता चला कि वह आगरा के गांव नगला लालजीत का रहने वाला है.

लाशों पर चोटों के निशान के अलावा लड़के के गले पर मफलर और लड़की के गले पर शाल कसा हुआ था. इस से पुलिस को लगा कि इन्हें गला घोंट कर मारा गया है. हमउम्र लडक़ा-लड़की की लाशें होने की वजह से यह भी अंदाजा लगाया गया कि यह प्रेमी जोड़ा रहा होगा और घर वालों ने ही इन की हत्याएं की हैं.

राजस्थान पुलिस लाशों की खबर ले कर नगला लालजीत स्थित हुकुम सिंह के घर पहुंची तो हडक़ंप मच गया. वहीं पूछताछ में पता चला कि दूसरी लाश गांव के गिरिराज कुशवाहा की बेटी भारती की थी.

गांव में तो किसी ने कुछ नहीं बताया, लेकिन जब हाईवे पर बने टोल प्लाजा पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज चेक की गई तो उस में गिरिराज और जलदेवी के साथ गाड़ी में बैठे नरेश और भारती दिख गए. इसी के आधार पर थाना मनियां पुलिस ने पतिपत्नी को हिरासत में ले लिया. पोस्टमार्टम के बाद दोनों लाशें घर वालों को सौंप दी गई थीं. गांव ला कर उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया था.

थाने ला कर गिरिराज और जलदेवी से पूछताछ शुरू हुई. वे कोई पेशेवर अपराधी तो थे नहीं, जल्दी ही उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस जानती थी कि केवल ये दोनों नरेश और भारती की हत्या नहीं कर सकते. इस के बाद पुलिस ने उन से शैलेंद्र का भी नाम उगलवा लिया.

लेकिन शैलेंद्र डर के मारे फरार हो चुका था. पुलिस ने गिरिराज की निशानदेही पर नरेश का सामान, वह गाड़ी, जिस से भारती और नरेश को ले जाया गया था, बरामद कर ली थी. इस के बाद दोनों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया था.

कथा लिखे जाने तक शैलेंद्र को भी गिरफ्तार कर के पुलिस ने जेल भेज दिया था. सभी जेल में बंद थे, किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

खतरनाक मंसूबे में शामिल लड़की

दूसरी शादी का दुखद अंत

एक क्रूर औरत की काली करतूत

जिंदादिल आइवी सिंह : वफा की बुलंद इमारत

दोपहर का वक्त था. श्रीमती आइवी सिंह सोफे पर बैठी सोच में गुम थीं. जिंदगी में आए उतारचढ़ाव की कल्पना ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया था. सोच का यह सागर अकसर दस्तक दे ही देता था. वह जिस कमरे में बैठी थीं, वह अस्पतालनुमा था. वह बिस्तर पर बेसुध से लेटे अपने पति आनंद सिंह को एकटक निहारे जा रही थीं. उन के साथ बिताए खुशगवार पलों की यादें एक तरफ खुशी दे रही थीं तो दूसरी तरफ दर्द का एक ऐसा तूफान भी था, जिस के थमने की कोई उम्मीद नहीं थी.

वर्तमान में उन के पास यूं तो हर खुशी थी, लेकिन पति की बीमारी की टीस उन्हें पलपल ऐसा अहसास कराती थी, जैसे कोई नाव किनारों की तलाश में बारबार लहरों से टकरा रही हो. अच्छेबुरे अनुभवों से उन की आंखों के किनारों को आंसुओं ने अपनी जद में ले लिया.

इसी तरह कुछ समय बीता तो उन्हें अपने सिर पर किसी के हाथ की छुअन का अहसास हुआ. आइवी सिंह ने नजरें उठा कर देखा. उन की मां आर. हिगिंस पास खड़ी थीं. बेटी को देख कर उन की भी आंखें नम हो गईं. वह शांत लहजे में बोलीं, ‘‘यूं परेशान नहीं होते बेटा.’’

आइवी ने हथेलियों से आंसू पोंछ कर पलकें उठाईं और मां का हाथ थाम कर बोलीं, ‘‘समझ नहीं आता मां क्या करूं?’’

‘‘सभी दिन एक जैसे नहीं रहते बेटी. एक न एक दिन आनंद ठीक हो जाएंगे, सब्र रखो.’’

‘‘सब्र तो कर ही रही हूं मां, लेकिन डाक्टर तो ना कर चुके हैं.’’

‘‘ऐसा नहीं है. कोई न कोई इलाज जरूर निकलेगा, बस तुम हौसला रखो.’’

आइवी सिर्फ कहने को सुहागन थीं. पति आनंद जीवित तो थे, लेकिन न वह चल फिर सकते थे न बोल सकते थे और न ही कुछ खा सकते थे. किसी अबोध बच्चे की तरह उन की देखभाल करना रोजमर्रा की बात थी.

उन की यह हालत कुछ दिनों या महीनों से नहीं, बल्कि लगातार 25 सालों से बनी हुई थी. दुनिया कितने रंग बदल चुकी है, वक्त का चक्र कैसे घूम रहा है और जिंदगी ने जवानी से बुढ़ापे की राह कैसे पकड़ ली है, आनंद को इस का रत्ती भर भी अहसास नहीं था.

आइवी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसे हालात आ जाएंगे. जिंदगी इस तरह जवानी से बुढ़ापे की ओर बढ़ेगी. पति की ऐसी दशा में सुहागन हो कर भी बेगानी सी जिंदगी का दर्द क्या होता है, यह आइवी ने अनगिनत बार बहुत करीब से महसूस किया था.

विवाह के बाद पति के साथ बिताए गए चंद महीनों की खुशनुमा यादों का महज एक गुलिस्तां आइवी के दिलोदिमाग में था. उसी के सहारे पति को जिंदा रखने की जुगत में जिंदगी अपनी रफ्तार से बीत रही थी. लेकिन उन की जिंदगी का इम्तिहान खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था.

हर इंसान अपनी जिंदगी के खुशगवार होने की उम्मीदों के चिराग रोशन रखता है, लेकिन यह भी सच है कि वह वक्त का गुलाम होता है. दरअसल आइवी के पति पिछले 25 सालों से बिस्तर पर कोमारूपी बीमारी ‘ब्रेन स्टेम’ के शिकार थे. दुनिया में अभी तक कोई चिकित्सक ऐसा नहीं मिला था, जो उन के पति का इलाज कर सके.

ZINDAGI-IMTIHAN

आधुनिक दौर के बिखरते रिश्तों की कुछ कड़वी सच्चाइयों की तरह अगर उन्होंने भी पतिपत्नी के नाजुक रिश्तों को चटका दिया होता तो आनंद न जाने कब दुनिया को अलविदा कह चुके होते. वह हर मुसीबत का सामना कर के पति के लिए अकल्पनीय हालात से लगातार जूझ रही थीं.

इस के बावजूद आइवी ने हिम्मत न हारने की कसम खा ली थी. दुनिया में आइवी सिंह जैसी बहुत कम महिलाएं होती हैं, जो मुसीबत के दौर में उस शख्स से किनारा नहीं करतीं, जिस के साथ उन का दिल की गहराइयों से नाता हो. पतिपत्नी के नाजुक रिश्ते की डोर को अपने समर्पण से न सिर्फ उन्होंने मजबूत कर दिया था, बल्कि अपनी हिम्मत से वफा की एक ऐसी बुलंद इमारत खड़ी कर दी थी, जो किसी के भी दिल को छू जाए.

वफा की यह इमारत उन के लिए दुनिया के हर खजाने से ज्यादा अनमोल थी. वक्त ने आइवी की दुनिया कैसे बदली थी, इस के पीछे भी एक कहानी थी.

आइवी की जिंदगी कभी किसी महकते हुए चमन की तरह थी. वक्त का हर पल जैसे उन के लिए मोती की तरह था. उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर के एक ईसाई परिवार में जन्मी आइवी बी. हिगिंस की एकलौती बेटी थीं. हिगिंस सरकारी मुलाजिम थे. आर्थिक रूप से संपन्न हिगिंस की पत्नी आर. हिगिंस अध्यापिका थीं.

परिवार की माली हालत अच्छी थी, लिहाजा आइवी की परवरिश अच्छे माहौल में हुई. हिगिंस दंपति ने बेटी को अच्छे संस्कार दिए. आइवी को उन्होंने नाजों से पाला था. प्यार, समर्पण व जिम्मेदारियों की पूंजी आइवी को मातापिता से बचपन से ही मिली थी. परिवार पढ़ालिखा था और सभी सदस्य मृदुभाषी थे, इसलिए समाज में उन्हें इज्जत की नजरों से देखा जाता था.

प्राथमिक शिक्षा के बाद आइवी ने उच्च शिक्षा हासिल की. आइवी जीवन के उस मुकाम पर थीं, जहां लड़कियां अकसर अपनी कल्पना के शहजादों को ख्वाबों में देखती हैं.

हर मातापिता की तरह हिगिंस दंपति भी चाहते थे कि वह बेटी को अलग दुनिया बसाने के लिए अपने घर से विदा कर दें. उन्होंने उस के लिए रिश्ते की तलाश शुरू की. जल्द ही उन्हें रिश्तेदारी के माध्यम से एक युवक का पता चला. युवक का नाम था आनंद सिंह.

आकर्षक व्यक्तित्व के आनंद भारतीय नौसेना के इंजीनियरिंग विभाग में कार्यरत थे. आनंद उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद के धारचूला के रहने वाले थे. उन के पिता निर्मल सिंह पादरी थे, जबकि मां पुष्पा सिंह कुशल गृहिणी थीं. आनंद सिंह अपने परिवार की होनहार संतान थे. बचपन से ही वह चाहते थे कि बड़े हो कर देश की सेवा करें, इसलिए उन की राह में बाधा नहीं आई और उन्होंने मेहनत से तैयारी कर के सन 1976 में मनचाही नौकरी पा ली.

आनंद सिंह देहरादून के नेवल हाइड्रोग्राफिक कार्यालय में तैनात थे. दोनों परिवारों के बीच बातचीत हुई तो आइवी का रिश्ता आनंद के साथ तय कर दिया गया. इस रिश्ते से दोनों परिवार भी खुश थे और आइवी व आनंद भी.

22 मई, 1986 को आइवी और आनंद परिणयसूत्र में बंध गए. एकदूसरे को पा कर पतिपत्नी खुश थे. इतने खुश कि उन्हें अपने सामने दुनिया की हर खुशी फीकी नजर आती थी. आनंद ठीक वैसे ही थे, जैसे जीवनसाथी की कल्पना आइवी ने की थी.

आनंद चूंकि नौसेना का हिस्सा थे, इसलिए अनुशासन वहां पहली शर्त थी. उन का जिंदगी जीने का अंदाज दूसरों से जुदा था. वह साफसफाई व नियमबद्ध जीवन के मुरीद थे. आइवी खुद भी ऐसी ही थीं. उन्होंने आनंद के अनुरूप खुद को ढाल लिया था.

दोनों की शादी को कुछ महीने ही बीते थे कि आइवी के पिता बी. हिगिंस का देहांत हो गया. उन की मृत्यु ने आर. हिगिंस को अकेला सा कर दिया. आइवी को भी पिता की मृत्यु से धक्का लगा था. वह मेरठ चली आईं और उन्होंने मां के गम को बांटने की पूरी कोशिश की. करीब 2 महीने बाद वह वापस ससुराल चली गईं. आनंद उन्हें अपने साथ देहरादून अपने तैनाती स्थल पर ले आए. अभी कुछ महीने ही बीते थे कि एक दिन आनंद को इंडियन पीस कीपिंग कोर्स की 6 महीने की ट्रेनिंग के लिए विशाखापट्टनम जाना पड़ा.

उन के ट्रेनिंग पर जाने के बाद आइवी मेरठ आ गईं और कानून की पढ़ाई करने लगीं. उन दिनों चूंकि मोबाइल फोन नहीं होते थे, इसलिए पत्र ही संदेश पहुंचाने का एक जरिया थे. आनंद पत्नी से बराबर पत्राचार करते रहे.

आनंद आईएनएस एंड्रो जहाज पर तैनात थे. श्रीलंका में उन दिनों ताकतवर गुरिल्ला लड़ाकों वाले प्रतिबंधित संगठन लिट्टे का आतंक था. नौसेना भी उन के खिलाफ रणनीति तैयार कर रही थी. आनंद को रहने के लिए अलग कमरा मिला हुआ था. ड्यूटी आनेजाने के लिए वह अपनी बुलेट मोटरसाइकिल का इस्तेमाल करते थे.

किस इंसान के साथ कब क्या हो जाए, कोई नहीं जानता. बुरा वक्त जब खुशियों को ग्रहण लगाता है तो भविष्य के सारे सपने एक झटके में टूट जाते हैं और सपनों के घरौंदे ताश के पत्तों की तरह बिखर जाते हैं. आनंद के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ.

देहरादून स्थित नौसेना के नेवल हाइड्रोग्राफिक कार्यालय में आए एक सिगनल ने सभी की चिंता बढ़ा दी. आनंद के धारचूला स्थित आवास पर नौसेनाकर्मी सुबहसुबह पहुंच गए. उन्होंने जो बताया उसे सुन कर आनंद सिंह के पिता निर्मल सिंह और मां पुष्पा का दिल बैठ गया.

दरअसल, आनंद एक दुर्घटना का शिकार हो गए थे. 12 अगस्त, 1989 की रात जब वह जहाज से वापस अपने कमरे पर जा रहे थे तो रास्ते में एक दुर्घटना का शिकार हो गए. दुर्घटना होते चूंकि किसी ने नहीं देखी थी, इसलिए अंदाजा यही लगाया गया कि बारिश की वजह से शायद उन की मोटरसाइकिल फिसल गई होगी.

आनंद अस्पताल में भरती थे. हताश परेशान निर्मल सिंह यह सूचना देने के लिए तुरंत मेरठ रवाना हो गए. उन्हें अचानक इस तरह आया देख कर आर. हिगिंस व आइवी का दिल धड़क उठा. निर्मल सिंह के चेहरे पर झलक रही परेशानी की लकीरें उन की धड़कनों की रफ्तार बढ़ा रही थीं.  निर्मल सिंह ने उन्हें जो बताया उसे सुन कर आइवी के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई.

हंसती मुसकराती जिंदगी में अचानक ऐसा झटका लगेगा, इस बारे में उन्होंने सोचा भी नहीं था. नौसेना ने आनंद के परिवार को विशाखापट्टनम ले जाने के लिए निजी विमान की व्यवस्था कर दी थी. सभी लोग वहां के लिए रवाना हो गए. आनंद अस्पताल में बेसुध पड़े थे. दुर्घटना गंभीर थी. डाक्टर इसलिए चिंतित थे, क्योंकि उन्हें बाहरी चोटों के अलावा दिमाग में अंदरूनी चोटें भी आई थीं.

आनंद की दिमागी चोटों को जांचने के लिए कोई प्रमुख यंत्र नहीं था. सीटी स्कैन (कंप्यूटर टोमोग्राफी स्कैनर) मशीन वहां नहीं थी, जिस से यह पता लगाया जा सकता कि अंदर क्या चोटें हैं. मस्तिष्क का इलाज करने वाले न्यूरोलौजिस्ट भी वहां नहीं थे. नौसेना ने बाहर से डाक्टरों की टीम को बुलवा कर आनंद की जांच कराई. कई दिनों के बाद भी आनंद होश में नहीं आए और वह कोमा में चले गए.

ऐसी स्थिति में वहां उन का इलाज संभव नहीं था. इसलिए डाक्टरों की राय पर नौसेना ने उन्हें हवाई जहाज से कोलकाता स्थित कमांड अस्पताल भेज दिया. आनंद का वहां भी इलाज किया गया, लेकिन सब से ज्यादा परेशानी की बात यह थी कि वह डीप कोमा में चले गए थे.

यह अवस्था ऐसी होती है, जिस में इंसान की सभी तरह की गतिविधियों का संपर्क दिमाग से टूट जाता है. यानी वह काम करना बंद कर देता है. नौसेना ने उन्हें कोमा से उबारने के लिए 2 डाक्टरों को स्थाई रूप से लगा दिया, परंतु कोई लाभ नहीं हुआ.

आनंद के कोमा में चले जाने से दोनों परिवार सदमे में थे. उन की खुशियों को जैसे किसी की नजर लग गई थी. आइवी इस बेबसी पर आंसू बहा कर रह जाती थीं. उन्हें आनंद की बातें, हंसमुख स्वभाव व यादें रहरह कर परेशान कर रही थीं. जिंदगी ने उन्हें गम के सागर किनारे खड़ा कर दिया था. वह ऐसी दुलहन थीं, जो पति के साथ खुशी के चंद महीने ही बिता पाई थीं.

यह ऐसा वक्त था, जब जिंदगी ने आइवी का इम्तिहान लेना शुरू कर दिया था. निर्मल सिंह व पुष्पा भी उम्मीद खो रहे थे. खूबसूरत आइवी का दुख उन्हें भी साल रहा था. उन्होंने एक दिन आर. हिगिंस से कहा, ‘‘बेटे के साथ ऐसा कुछ होना हमारी किस्मत का पन्ना हो सकता है, लेकिन आइवी के सामने पूरा जीवन पड़ा है. आप चाहें तो उसे दूसरे विवाह की इजाजत दे सकती हैं.’’

हिगिंस को यह बात बहुत नागवार गुजरी, वह बोलीं, ‘‘नहीं भाईसाहब, हम लोग ऐसे नहीं हैं. आनंद आखिर पति है उस का.’’

‘‘पता नहीं आनंद कब तक ठीक होगा…’’

‘‘आप इस की फिक्र मत कीजिए. फिर भी मैं आइवी से बात करूंगी.’’ पुष्पा बोलीं.

इस के बाद पुष्पा और हिगिंस ने आइवी को दूसरा विवाह करने की सलाह दी, लेकिन आइवी ने साफ कह दिया कि वह दूसरा विवाह करने की कभी सोच भी नहीं सकती. वह पति की सेवा कर के उन्हें ठीक करने की कोशिश करेगी.

आनंद की बीमारी कब ठीक होगी, कुछ कहा नहीं जा सकता था. उन की घर ले जाने लायक स्थिति नहीं थी. लेकिन अस्पताल में भी हमेशा नहीं रखा जा सकता था. आइवी उन्हें अपने घर में रखना चाहती थीं.

उन के कहने पर डाक्टरों ने उन्हें घर ले जाने की इजाजत तो दे दी, लेकिन वहां अस्पताल की तरह इंतजाम करने थे. आइवी का घर काफी बड़ा था. एक कमरे को डाक्टरों की मदद से अस्पताल के कमरे जैसा रूप दे दिया गया. वहां पर जरूरी मशीनें भी लगा दी गईं. औक्सीजन के अलावा मिनी वेंटीलेटर मशीन भी वहां लगा दी. इस के बाद वह आनंद को घर ले आईं.

घर पर एक नर्स की व्यवस्था भी कर दी गई. इस तरह उन की घर पर ही देखरेख होने लगी. कभी ज्यादा दिक्कत होती तो आइवी उन्हें अस्पताल ले जाती थीं. साल दर साल बीतते रहे. आदमनी कम होने लगी और खर्च बढ़ने से परिवार की आर्थिक स्थिति भी डगमगाने लगी.

आर. हिगिंस घर के ही एक हिस्से में स्कूल चलाती थीं. उस से उन की आजीविका चलती थी. नौसेना के अधिकारियों ने देशविदेश के कई चिकित्सकों से भी उन का इलाज कराया. लेकिन आनंद की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. आइवी चाहती थीं कि किसी भी तरह आनंद ठीक हो जाएं, इसलिए उन्होंने उन का आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक इलाज भी कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

आइवी की बेटी भूमिका, जो सिर्फ पिता को देखती तो थी लेकिन उन से बात नहीं कर सकती थी. उधर नौसेना ने आनंद को पेंशन देनी शुरू कर दी. भारतीय नौसेना ने कई बार आइवी के सामने नौकरी की पेशकश की, लेकिन पति की देखभाल करने की वजह से उन्होंने उसे ठुकरा दिया.

इस बीच आइवी ने वकालत शुरू कर दी थी. हालांकि इस काम को वह ज्यादा समय नहीं दे पाती थीं. जीवन के इस सफर में उन्होंने बहुत लोगों को बदलते देखा. लेकिन संस्कारों और आत्मविश्वास की पूंजी के हौसलों ने उन के कदमों को कभी डगमगाने नहीं दिया. पति की सेवा करनी थी, इसलिए कई महीने उन्होंने नर्स का प्रशिक्षण हासिल किया.

आनंद की पूरी दुनिया कई सालों से एक कमरे में सिमटी हुई है. वह दिनरात वहां लेटे रहते हैं. लेकिन वह अपनी कोई इच्छा नहीं जता सकते. खुली आंखों से वह शून्य को निहारते रहते हैं. देख कर विश्वास नहीं होता कि कभी फिल्मी हीरो की मानिंद रहा एक नौजवान 25 साल से एक जैसे हालात में बुढ़ापे की तरफ बढ़ चुका है.

आनंद का पालनपोषण किसी बच्चे की तरह किया जाता है. खाने के नाम पर उन्हें उच्च प्रोटीन भोजन व फल तरल रूप में दिए जाते हैं. घर का एक बड़ा कमरा किसी मिनी अस्पताल से कम नहीं है. एक बेड पर आनंद सिंह लेटे रहते हैं.

आनंद की जिंदगी में न जाने कितने डाक्टर आए, लेकिन कोई डाक्टर ऐसा नहीं मिला जो उन के सफल इलाज का फार्मूला जानता हो. एक अलमारी आनंद के अब तक के हुए इलाज के कागजी दस्तावेजों से चुकी है. कमरे में एसी लगा है और अंदर जूतेचप्पल ले जाने की इजाजत नहीं है.

मरीज को बिजली के चले जाने पर कोई परेशानी न हो, इस के लिए जनरेटर भी लगा हुआ है. आनंद को नहलाया नहीं जा सकता. गीले कपड़े से उन के बदन को साफ किया जा सकता है. पति की शेविंग से ले कर सभी काम आइवी ही करती हैं.

भूमिका भी अपनी मां आइवी का हाथ बंटाती है और पिता से बहुत प्यार करती है. यह वक्त का क्रूर मजाक ही है कि भूमिका ने पिता को कभी चलतेफिरते या बोलते नहीं देखा. वह अपने पिता से किसी चीज की इच्छा भी नहीं जता सकती. एक प्रतिष्ठित स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ने वाली भूमिका बहुत होनहार है. बड़ी हो कर वह डाक्टर बनना चाहती है.

कई चिकित्सकों द्वारा अभी आनंद का इलाज किया जा रहा है. आइवी सिंह फिजिशियन डा. विनेश अग्रवाल, डा. ए.के. चौहान, डा. वी.के. बिंद्रा, डा. अनिल चौहान व न्यूरोलौजिस्ट डा. गिरीश त्यागी, संदीप सहगल आदि का विशेष सहयोग बताती हैं. व्यस्त दिनचर्या के बीच भी वह आनंद के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं.

आनंद के इलाज पर इतना अधिक रुपए खर्च हो चुके हैं कि हिसाब से किसी बड़े रजिस्टर के सभी पन्ने भर जाएं. उन के लिए दौलत पति की सेवा और उन की जिंदगी से ज्यादा मायने नहीं रखती.

आइवी अपने स्कूल में खुद भी पढ़ाती हैं और वकालत के लिए कचहरी भी जाती हैं. प्रशिक्षित नर्स की तरह पति का खयाल भी रखती हैं. मन बहलता रहे, इसलिए उन्होंने अपने घर में पालतू परिंदों के अलावा इंसान का वफादार साथी कुत्ता भी पाल रखा है.

आइवी पति के चेहरे के भावों को किसी जौहरी की तरह पहचानते हैं. वह कुछ बोल नहीं पाते, लेकिन वह कब क्या चाहते हैं, वह चेहरा देख कर ही पलभर में जान जाती हैं.

आइवी सिंह कहती हैं कि किसी ऐसे शख्स को जो असहाय हो, बोल भी न सके, उसे छोड़ना आसान नहीं होता और फिर जीवन प्यार और पति का साथ छोड़ने के लिए नहीं होता.

पति की सेवा करते हुए आइवी ने 25 साल गुजार दिए. उन के अंदर गजब का आत्मविश्वास भरा है, जो उन्हें डगमगाने नहीं देता. उन्हें विश्वास है कि कभी तो वह पल आएगा, जब उन की जिंदगी का इम्तिहान खत्म होगा और उन के पति ठीक हो जाएंगे.

—कथा आइवी सिंह के साक्षात्कार पर आधारित

सौतेले बेटे की क्रूरता : छीन लीं पांच जिंदगियां – भाग 5

रात में सभी सो गए, जबकि हरमीत अपने कमरे में जागता रहा. सब के सो जाने के बाद उस ने शराब पी. वह हत्याओं के बारे में सोचने लगा. शराब के नशे के चलते करीब 12 बजे उस की आंख लग गई. दिमाग में चूंकि हत्या का भूत सवार था, इसलिए 3 बजे आंख खुल गई. हरमीत ने एक बार फिर शराब पी और 4 बजे के करीब जय सिंह बाथरूम जाने के लिए उठे तो उसे आहट से पता चल गया.

उस ने ठान लिया कि अब वह एकएक को मार कर ही रहेगा. जय सिंह बाथरूम से वापस आए तो अचानक हरमीत उन के कमरे में पहुंच गया और चाकू से ताबड़तोड़ वार करने लगा.

बेटे का यह रूप देख कर जय सिंह हक्केबक्के रह गए. उन्होंने बचाव के लिए हाथ उठाए तो उस ने हाथों पर भी चाकू मारे. उम्र का तकाजा था, जय सिंह ज्यादा विरोध नहीं कर सके. हरमीत ने पेट से ले कर गर्दन तक कई वार किए तो लहूलुहान हो कर वह दरवाजे के पास गिर गए और दम तोड़ दिया. पिता की हत्या करने के बाद उसे घबराहट होने लगी तो वह अपने कमरे में गया और शराब का एक पैग बना कर पिया.

उस के सिर पर खून सवार था. इस के बाद वह ड्राइंगरूम कम बेडरूम में पहुंचा और वहां सो रही कुलवंत कौर पर हमला बोल दिया. जागने पर वह हरमीत से भिड़ गईं. मामूली संघर्ष के बाद उस ने उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया. उसी बेडरूम में हरजीत भी अपने दोनों बच्चों के साथ सो रही थी. हरमीत ने अगला निशाना उसे बनाया. गर्भवती होने के कारण वह ज्यादा विरोध नहीं कर सकी.

उस की 3 साल की मासूम बेटी सुखमणि को भी उस ने मार दिया. उसी बीच 6 साल के कंवलजीत की आंख खुल गई तो वह बिस्तर से उतर कर रोता हुआ भागा. हरमीत किसी को भी जिंदा नहीं छोड़ना चाहता था. उस ने भागते कंवलजीत की पीठ पर 2 वार किए. दोनों ही वार हलके थे. वह 2 सोफों के बीच छिप कर रोते हुए गिड़गिड़ाने लगा, ‘‘प्लीज मामा, मुझे मत मारो.’’

हरमीत कंवलजीत को प्यार तो करता था, परंतु उस वक्त वह भी उसे अपना दुश्मन नजर आ रहा था. अचानक उसे ख्याल आया कि कंवलजीत को जिंदा छोड़ कर अपने पक्ष में गवाह बनाया जा सकता है कि हत्याएं किसी और ने की हैं. मन में यह ख्याल आते ही उस ने कंवलजीत से गुर्राकर कहा, ‘‘रोना बंद कर और मेरी बात सुन. तुझ से कोई पूछे तो बताना कि 3 नकाबपोश लोगों ने ये हत्याएं की हैं. तू ने सच बताया तो तेरा भी यही हाल करूंगा.’’

कंवलजीत थरथर कांप रहा था, उस ने रोते हुए कहा, ‘‘ठीक है मामा, मैं ऐसा ही कहूंगा. मुझे मत मारो.’’

हरमीत ने उसे छोड़ दिया. लेकिन डर की वजह से वह वहीं छिपा रहा. हरमीत ने सोचा कि सुबह लेगों को बताएगा कि 3 नकाबपोश बदमाशों ने पूरे परिवार की हत्या की है. गवाह के तौर पर वह कंवलजीत को सामने कर देगा. कहानी को सच बनाने के लिए उस ने अपने हाथ पर चाकू मार लिया.

घर में खून का दरिया बहाने वाले का अपना थोड़ा खून बहा तो उस ने हाथ पर रूमाल बांध लिया. अपनी खून सनी कमीज उस ने उतार कर रख दी और चाकू भी फेंक दिया. हरमीत अपने कमरे में गया और एक बार और शराब पी. नशा अधिक होने के चलते हरमीत आगे की कोई प्लानिंग नहीं कर सका. उसे किसी अंजाम की परवाह भी नहीं रही. इसी बीच वह सो गया.

सुबह नौकरानी आई तो वह हड़बड़ा कर उठा और राजो को टालने की कोशिश की. परंतु वह दोबारा आई तो वह सिर पकड़ कर बरामदे में बैठ गया. लोग आए तो कंवलजीत भी बाहर आ गया. लोगों के पूछने पर उस ने कुछ नहीं बताया. पुलिस को भी उस ने हरमीत द्वारा समझाई गई बात ही बताई, लेकिन पिता के आने पर उस का डर कम हुआ तो उस ने सच बता दिया.

इस के बाद निर्दयी हरमीत को हिरासत में ले लिया गया. पुलिस ने उस की मां अनीता और भाई को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की, लेकिन हत्या या षडयंत्र में उन का कोई हाथ नहीं निकला. जांच के लिए हरमीत के फिंगरप्रिंट व खून का नमूना ले कर प्रयोगशाला भिजवा दिया, ताकि घटनास्थल पर मिले सुबूतों से उस का मिलान किया जा सके.

पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों को भी हरमीत की कू्ररता चौंका गई. जय सिंह के शरीर पर 24, कुलवंत के शरीर पर 9, हरजीत के शरीर पर 7 और सुखमणि के शरीर पर चाकू के 5 घाव पाए गए थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार हरजीत के गर्भ में पलने वाला बच्चा लड़का था.

अगले दिन लक्खीबाग श्मशान घाट पर गमगीन माहौल में सभी का अंतिम संस्कार कर दिया गया. हत्याओं के चश्मदीद गवाह मासूम कंवलजीत के बाल मन पर डरावने मंजर का गहरा असर पड़ा था. वह गुमशुम था. हरमीत के प्रति लोगों में गुस्सा था. हर कोई उसे कोस रहा था, जबकि हरमीत को इन हत्याओं का कोई अफसोस नहीं था.

पुलिस ने गर्भस्थ शिशु की मौत के मामले में उस के खिलाफ धारा 316 भी लगा दी थी. पुलिस ने उसे विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया. उसे देखने के लिए अदालत में काफी भीड़ लगी थी. लोगों के गुस्से को देखते हुए सुरक्षा की काफी व्यवस्था थी. इस के बावजूद लोगों ने उसे पीटने का प्रयास किया. अदालत ने उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

अपनी बिगड़ैल प्रवृत्ति, संपत्ति के लालच व नफरत में हरमीत इतना अंधा हो गया कि अपनों का ही हत्यारा बन बैठा. कथा लिखे जाने तक वह सलाखों के पीछे था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित