अफसाना एक दीपा का – भाग 2

दीपा ने किशोरावस्था में कदम रखा ही था कि उस के दीवाने भंवरों की तरह ज्ञान टेकरी और जेल रोड पर मंडराने लगे थे. खूबसूरत होने के साथसाथ दीपा अल्हड़ भी थे, इसलिए मांबाप और चिंतित रहने लगे थे. दीपा के 2 छोटे भाई भी घर में थे. लड़की मांबाप की इज्जत समझी जाती है. इस से पहले कि बेटी की वजह से मांबाप की इज्जत पर कोई आंच आए, मांबाप उस की शादी के लिए लड़का ढूंढने लगे.

अभी दीपा की उम्र महज 14 साल थी. मांबाप ने उस की शादी के लिए देवास जिले के गांव जलालखेड़ी में एक लड़का देख लिया, जिस का नाम राकेश वर्मा था. बात पक्की हो जाने पर उन्होंने राकेश वर्मा से दीपा की शादी कर दी. वह दीपा से 5 साल बड़ा था.

शादी के बाद राकेश की रातें गुलजार हो उठीं. वह दिनरात पत्नी के खिलते यौवन में डूबा रहता था. आमतौर पर भले ही शादी कम उम्र में हो जाए, फिर भी युवक जिम्मेदारी उठानी सीख जाते हैं. लेकिन राकेश के साथ उलटा हुआ. वह दिनरात बिस्तर पर पड़ा दीपा के जिस्म से खेला करता था.

शुरूशुरू में तो राकेश के घर वालों ने यह सोच कर कुछ नहीं कहा कि अभी बच्चा है, जब घरगृहस्थी के माने समझने लगेगा तो रास्ते पर आ जाएगा. लेकिन जब 5-6 साल गुजर गए और राकेश ने खुद कमानेखाने की कोई पहल नहीं की तो घर वाले उसे टोकने लगे.

सुधरने के बजाय राकेश और बिगड़ता चला गया और जल्द ही उसे शराब की लत लग गई. वह रोज शराब पीने लगा था. घर वालों ने उसे घर से तो नहीं निकाला लेकिन घर में ही रखते हुए उस का बहिष्कार सा कर दिया.

चारों तरफ से हैरानपरेशान राकेश अपनी नाकामी और निकम्मेपन की खीझ दीपा पर उतारने लगा. दीपा के जिस संगमरमरी जिस्म को सहलातेचूमते वह कभी थकता नहीं था, उस पर अब राकेश की पिटाई के निशान बनने लगे. दीपा भी कम हैरानपरेशान नहीं थी, पर उस के पास रोज की इस मारपिटाई से बचने का एक ही रास्ता था मायका, क्योंकि राकेश अब उस पर चरित्रहीनता का आरोप भी लगाने लगा था.

10 साल यानी 24 साल की उम्र तक दीपा पति के पास रही, फिर एक दिन अपने मायके आ गई. जिस से दीपा के मांबाप के सिर पर बोझ और बढ़ गया था. लेकिन थोड़ा सुकून उन्हें उस वक्त मिला, जब दीपा ने फ्रीगंज में साड़ी पर फाल लगाने और पीको करने की दुकान खोल ली.

दुकान चल निकली तो दीपा खुद के खर्चे उठाने लगी. पर जैसे ही लोगों को यह पता चला कि वह पति को छोड़ कर मायके में रह रही है तो फिर उस के दीवाने दुकान और घर के आसपास मंडराने लगे.

दिलीप बन गया पार्टटाइम पति

शुरुआत में उस ने कोशिश की कि वह किसी के चक्कर में न पड़े, लेकिन शरीर की मांग के आगे वह बेबस थी. कई लोगों ने प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष तरीके से उसे प्रपोज किया, लेकिन अब तक दीपा काफी सयानी और समझदार हो चुकी थी.

दीपा को एक ऐसे पुरुष की जरूरत थी, जो शारीरिक के साथसाथ भावनात्मक और आर्थिक सहारा और सुरक्षा भी दे सके. आसपास मंडराते लोगों को देख वह समझ जाती थी कि उन का मकसद क्या है.

इसी ऊहापोह में उलझी दीपा की मुलाकात एक दिन दिलीप शर्मा से हुई तो वह उसे हर तरह उपयुक्त लगा. शादीशुदा दिलीप दीपा की खूबसूरती और अदाओं पर मर मिटा था. उस की पत्नी गांव में रहती थी, इसलिए उज्जैन में किसी महिला से मिलनेजुलने पर उसे कोई अड़ंगा या पाबंदी नहीं थी.

दोनों की मेलमुलाकातें बड़े सधे ढंग से आगे बढ़ीं. दोनों ने एकदूसरे की जरूरतों को समझा और दोनों के बीच मौखिक अनुबंध यह हुआ कि दिलीप दीपा का पूरा खर्च उठाएगा, उसे अलग घर दिलाएगा और ज्यादा से ज्यादा वक्त भी देगा. एवज में दीपा उस के लिए हर तरह से समर्पित रहेगी.

दिलीप ने दीपा को किराए के मकान में शिफ्ट करा कर घरगृहस्थी का सारा सामान जुटा दिया और पार्टटाइम पति की हैसियत से रहने भी लगा. दिलीप के पास पैसों की कमी नहीं थी. वह उन लोगों में से था, जो एक पत्नी गांव में और एक शहर में रखना अफोर्ड कर सकते हैं. दीपा के साथ दूसरा फायदा उसे यह था कि उस से उस की पारिवारिक और सामाजिक जिंदगी और प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आ रही थी.

लिवइन के ये 8 साल अच्छे से कटे, लेकिन जैसा कि आमतौर पर ऐसे मामलों में होता है, इन दोनों के साथ भी हुआ. दिलीप का दिल दीपा से भरने लगा तो उस ने उस के पास आनाजाना कम कर दिया. पर अपने इस वादे पर वह कायम रहा कि जिंदगी भर दीपा का खर्च उठाएगा.

दीपा समझ रही थी कि प्रेमी का मन उस से भर चला है लेकिन अभी पूरी तरह उचटा नहीं है. पर दिक्क्त यह थी कि 14 साल की उम्र से ही सैक्स की आदी हो जाने के कारण वह अकसर रोजाना ही सैक्स चाहती थी, जो दिलीप के लिए संभव नहीं था.

इसी साल जनवरी में दिलीप ने उसे माधवनगर इलाके के वल्लभनगर में किराए के मकान में शिफ्ट कर दिया. मकान मालिक लक्ष्मणदास पमनानी को उस ने यही बताया कि दीपा उस की पत्नी है और वह खेतीबाड़ी के सिलसिले में गांव जाता रहता है. पर पड़ोसियों का माथा उस वक्त ठनका, जब कई अंजान युवक दीपा के पास दिलीप की गैरमौजूदगी में आनेजाने लगे. आजकल बिना वजह कोई किसी के फटे में टांग नहीं अड़ाना चाहता, इसलिए लोगों ने दीपा से कहा कुछ नहीं, बस देखते रहते.

दिलीप को इस बात की भनक थी, इसलिए उस ने दीपा को समझाया कि वह फालतू लोगों का अपने यहां आनाजाना बंद करे. लेकिन दीपा नहीं मानी. दिलीप ने भी उस से कोई जबरदस्ती नहीं की. दिलीप को अब दीपा से ज्यादा अपनी इज्जत की चिंता होने लगी थी.

ये सारी बातें जब धर्मेंद्र को पता चलीं तो वह बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं तिलमिलाया. दिलीप दीपा का पति नहीं है, यह जान कर उसे खुशी ही हुई. हैरतअंगेज तरीके से जल्द ही धर्मेंद्र और दिलीप में दोस्ती हो गई और दोनों दीपा के साथ बैठ कर दारूचिकन की दावत उड़ाने लगे.

अब दीपा 2 आशिकों की हो गई थी, जो उसे ले कर बजाय आपस में झगड़ने के उसे साझा कर रहे थे. पर वह यह नहीं समझ पा रही थी कि दोनों उस के शरीर और जवानी को भोग रहे हैं. दोनों में से कोई उसे प्यार नहीं करता. धर्मेंद्र और दिलीप को सहूलियत यह थी कि दीपा अब किसी एक पर भार नहीं थी.

चाहत का वो अंधेरा मोड़ – भाग 2

इश्क और मुश्क कभी छिपाए नहीं रखे जा सकते. यही उन दोनों प्रेमियों के साथ हुआ था. किसी ने गोपी के पति धोलू तक बात पहुंचा दी थी. शांतिप्रिय व खुद में मस्त रहने वाले धोलू के लिए यह खबर विचलित करने वाली साबित हुई.

कोई राह नहीं सूझी तो उस ने अपने बड़े साले इंद्रपाल, जो दबंग प्रवृत्ति का था, के साथ यह बात साझा कर ली. अगले दिन इंद्रपाल माणकथेड़ी पहुंच गया.

उस ने अपनी बहन गोपी को समझाया और राजेंद्र की दुकान पर पहुंच गया. उस ने राजेंद्र को ओछी हरकत से बाज आने व भविष्य में देख लेने की धमकी दे डाली. वहां से लौटते समय इंद्रपाल गोपी का मोबाइल फोन भी छीन ले गया.

दोनों प्रेमियों के बीच कई महीने तक बात होनी तो दूर दर्शन तक दुर्लभ हो गए. होली के दिन रंग में सराबोर हुआ राजेंद्र गोपी तक एक मोबाइल फोन पहुंचाने में सफल हो गया था. अब सावधानी के साथ दोनों प्रेमी 3-4 दिनों के अंतराल से बात करने लगे थे. लेकिन यह बात किसी तरह इंद्रपाल को पता चल गई.

24 जून को इंद्रपाल के ममेरे भाई की शादी थी. बारात में इंद्रपाल, राधेश्याम, मांगीलाल, सोनू आदि दोस्तों की ड्राइवरों के साथ लड़ाई हो गई. उक्त सभी पुलिस से बचने के लिए अपने जीजा धोलू के पास जा पहुंचे. वहां पर बहन और राजेंद्र की हकीकत जान कर इंद्रपाल का खून खौल उठा. पर धोलू ने कोई लफड़ा नहीं करने की हिदायत दे डाली थी.

2 महीने गुजर चुके थे. राजेंद्र की गुस्ताखी उसे अशांत किए हुए थी. पर उसे कोई राह नहीं सूझ रही थी. उस की योजना थी कि राजेंद्र को किसी अज्ञात स्थान पर बुला कर उस की जबरदस्त पिटाई की जाए, पर राजेंद्र को बुलाने की कोई तरकीब नहीं सूझ रही थी.

अगले ही पल उस की आंखें चमक उठीं. संगरिया में उस की एक महिला दोस्त संजू धानक रहती थी. संजू इंद्रपाल के लिए शरीर तो क्या जान देने को भी तैयार रहती थी. उस ने उसी समय संजू को राजेंद्र का मोबाइल नंबर दे कर राजेंद्र को प्रेम जाल में फांसने को कह दिया.

इंद्रपाल ने संजू को यह भी समझा दिया कि वह राजेंद्र को यह विश्वास दिला दे कि गोपी उस की पक्की सहेली है और वह उसी के कहने पर खुद को राजेंद्र को सौंप रही है.

संजू ने उसी समय राजेंद्र को फोन किया. राजेंद्र ने काल रिसीव कर कहा, ‘‘हैलो, कौन बोल रहे हैं? किस से बात करनी है?’’

सामने नारी कंठ की मीठी व आकर्षक आवाज में जवाब मिला, ‘‘प्यारे जीजाजी, घबराओ मत. हम भी आप को चाहने वाले हैं.’’ राजेंद्र की घबराहट भांप कर उस ने खुलासा कर दिया, ‘‘देख यार जीजा, मैं संजू और गोपी 2 बदन एक जान हैं. उसी ने आप का नंबर मुझे दिया है. वह कई दिन आप से संपर्क नहीं कर पाएगी,’’ संजू ने कहा.

‘‘संजू, मैं तो डर गया था. गोपी मेरा कितना खयाल रखती है.’’

‘‘देखो जीजाजी, जब भी आप को महिला बदन की तलब लगे, मुझे घंटी मार देना. लेकिन याद रखना, मैं 10-12 दिन में एक बार ही मिल सकूंगी. मेरी मजबूरी है.’’ संजू ने राजेंद्र को फांसने के लिए पासा फेंक दिया था.

प्रणय निवेदन का पासा फेंकने में संजू वास्तव में गोल्ड मैडलिस्ट थी. हकीकत यह थी कि विवाहिता संजू जो एक बच्चे की मां थी, पति से खटपट होने के कारण 2 साल से संगरिया स्थित पीहर में रह रही थी. गुजरबसर के लिए वह एक कपड़े की दुकान पर सेल्सगर्ल के रूप में काम कर रही थी.

इंद्रपाल के प्लान के मुताबिक, संजू अपने फोन में रिकौर्ड हर बातचीत इंद्रपाल तक पहुंचा देती थी. अब राजेंद्र संजू की सैक्सी बातों से प्रभावित हो कर उस का गुलाम बन चुका था.

इंद्रपाल का प्लान अब सही राह पकड़ चुका था. वह अपनी बहन गोपी का बचाव करने के लिए संजू को मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर रहा था. 16 जुलाई, 2022 को इंद्रपाल ने अपने दोस्तों राधेश्याम जीतराम, सोनू, मांगीलाल व एक नाबालिग प्रेम को अपनी ढाणी में बुला लिया.

इंद्रपाल ने संजू से कह दिया कि वह राजेंद्र को किसी तरह 17 जुलाई को रावतसर स्थित खेतरपाल मंदिर बुला ले. संजू ने ऐसा ही किया. उस ने 17 जुलाई की सुबह ही राजेंद्र को फोन कर कहा, ‘‘यार, आज मिलन का मूड है. मैं फ्री हूं. दोपहर तक रावतसर के खेतरपाल मंदिर पहुंच जाओ. वहां होटल में मौजमस्ती के लिए कमरा आराम से मिल जाता है.’’

हालांकि उस दिन राजेंद्र की शाम के समय एक समारोह की बुकिंग थी पर संजू से मिलने की चाहत में उस ने हां कर दी.

प्यार में धोखा न सह सकी पूजा – भाग 2

आरोपियों की निशानदेही पर शव बरामद

पुलिस ने हत्यारोपी की निशानदेही पर कार, लोहे की रौड और सुहेल की बाइक भी बरामद कर ली थी. सुहेल की हत्या कर शव मुरादाबाद के थाना क्षेत्र छजलैट से बरामद किया गया था. उसी कारण उस के शव का पोस्टमार्टम भी मुरादाबाद में ही किया गया था. पोस्टमार्टम के बाद उस का शव उस के घर वालों को सौंप दिया गया.

पुलिस ने दिनरात एक करते हुए इस मर्डर केस का खुलासा किया तो लोग खुलासे पर भी सवाल उठाने लगे थे. इस खुलासे को ले कर लोगों को मत था कि इस मर्डर में 2 नहीं बल्कि कई लोग मौजूद रहे होंगे.

इसी बात को ले कर सुहेल के घर वालों ने कोतवाली के सामने ही धरनाप्रदर्शन शुरू कर दिया था. उन लोगों की मांग थी कि इस मामले में लिप्त अन्य लोगों को भी शीघ्र गिरफ्तार किया जाए.

धरनाप्रदर्शन को देखते हुए माहौल खराब होने की आशंका के चलते आसपास के थानों और चौकियों से पुलिस फोर्स बुला ली गई. इस दौरान एसपी (क्राइम) डा. जगदीश चंद्र, एसपी (सिटी) हरवंश सिंह व सीओ बलजीत सिंह भी कोतवाली में मौजूद रहे. इस केस के खुलासे के बाद आरोपी भरत आर्या को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया.

भरत आर्या को जेल भेजने के बाद पुलिस इस अपराध में शामिल दिनेश टम्टा की खोज में लग गई. वह भी जल्द ही गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में उस ने अपना अपराध स्वीकारते हुए बताया कि इस मामले में गांव चोरपानी निवासी योगेश बिष्ट उर्फ यूवी बिष्ट व मनोज सिंह उर्फ मुन्नू नेपाली भी शामिल थे.

इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने तीसरे आरोपी योगेश बिष्ट को भी गिरफ्तार कर लिया. जबकि चौथा आरोपी मुन्नू नेपाली घर से फरार हो गया था.

सुहेल की दुकान पर भरत करता था काम

जिंदगी में कभीकभी ऐसा चक्रव्यूह भी बन जाता है जिस में घिर कर इंसान को अपनी जिंदगी भी दांव पर लगाने पर मजबूर होना पड़ता है. यह कहानी भी एक मजदूर से फौजी बनने तक की ऐसी ही कहानी है. जिस अपराध के कारण उस का जीवन संकट में फंस गया.

उत्तराखंड के जिला नैनीताल के कस्बा रामनगर के चोरपानी बुद्ध विहार कालोनी में हरीश राम अपने परिवार के साथ रहते हैं. वह पेशे से लुहार हैं. हरीश राम के 5 बच्चों में 2 बेटियां और 3 बेटे थे. हरीश राम जैसेतैसे लुहार का काम कर के अपने बच्चों का पालनपोषण कर पाते थे.

बच्चे कुछ समझदार हुए तो बाप के काम में हाथ बंटाने लगे थे. जीतोड़ मेहनत करने के बाद हरीश राम ने सब से बड़े बेटे और उस के बाद एक बेटी की शादी कर दी. 2 बच्चों की शादी के बाद तीसरे नंबर की बेटी पूजा और भरत आर्या का नंबर था. पूजा और भरत आर्या ने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर ली थी. इस के बाद हरीश राम ने पूजा की पढ़ाई छुड़ा दी थी.

भरत आर्या का शुरू से ही फौजी बनने का सपना था. लेकिन उस नौकरी के लिए उस की गरीबी आड़े आ रही थी. जिसे पूरा करने के लिए उसे काफी मेहनत की जरूरत थी.

हरीश राम की दुकान के पास ही सुहेल सिद्दीकी ने काफी समय पहले स्टेशनरी की दुकान खोल रखी थी. सुहेल का परिवार रामनगर शहर में ही रहता था. वह 5 भाइयों में तीसरे नंबर का था.

हरीश राम के पास इतना काम नहीं था कि वह अपने सभी बच्चों को दुकान पर रख सकें. घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए भरत आर्या ने सुहेल की दुकान पर काम कर लिया था. साथ ही उस ने आर्मी में जाने के लिए तैयारी भी करनी शुरू कर दी थी.

पूजा की सुहेल से बढ़ गईं नजदीकियां

भरत आर्या का घर दुकान से कुछ दूर था, इसलिए पूजा ही भरत और पिता का खाना पहुंचाती थी. पूजा देखनेभालने में खूबसूरत और पढ़ीलिखी थी. वह जब कभी खाना ले कर आती तो सुहेल की दुकान पर काम में उस का हाथ बंटाने लगती थी.

सुहेल उस वक्त कुंवारा था. जब कभी पूजा उस की दुकान पर आती तो उस की नजरें उसी पर गड़ी रहती थीं. लेकिन पूजा ने उसे कभी भी ऐसी नजरों से नहीं देखा था.

लेकिन सच्चाई तो यह है कि लोहे को लोहे से घिसते रहो तो एक दिन ऐसा भी

आता है कि लोहे में भी निशान बन जाता है. सुहेल ने पूजा को चाहत भरी निगाहों से देखना शुरू किया तो वह उस की मंशा समझ गई.

पूजा एक पढ़ीलिखी और समझदार थी. वह यह भी जानती थी कि सुहेल मुसलमान है. लेकिन जब किसी के प्रति चाहत का बीज अंकुरित हो जाता है तो उसे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. यही पूजा के साथ हुआ.

पूजा उस वक्त नाबालिग थी. लेकिन सुहेल के प्यार की भावनावों में बह कर उस ने कांटों भरा रास्ता चुन लिया था. उसी वक्त भरत आर्या ने आर्मी की तैयारी करने के लिए सुहेल की दुकान का काम छोड़ दिया. फिर उस की जगह पर पूजा ही काम करने लगी थी. भरत आर्या के दुकान से हटते ही सुहेल की तो जैसे चांदी कट गई. अपने भाई के हटते ही पूजा भी टेंशन फ्री हो गई थी.

सुहेल ने मौके का फायदा उठाते हुए पूजा को पूरी तरह से अपने मोहपाश में फांस लिया था. दोनों के बीच प्यार का बीज अंकुरित होते ही प्यार की बेल भी हरीभरी होने लगी थी. पूजा गरीब घर से थी, जबकि सुहेल खातेपीते परिवार से. यही कारण रहा कि पूजा सुहेल के पीछे पागल हो गई थी. सुहेल ने पूजा के साथ शादी करने का वादा करते हुए उसे हसीन सपने दिखाए तो उस ने भी उस के साथ जीनेमरने की कसमें खाई थीं.

सुहेल ने जीवन भर साथ निभाने का किया था वायदा

भावनाओं की नींव पर जमे प्यार के रिश्तों की डोर जितनी मजबूत होती है, उस से कहीं ज्यादा कच्चे धागे की भांति कमजोर भी. यही कारण था कि पूजा ने सुहेल पर पूरा विश्वास किया और उस के साथ जीवन बिताने के लिए वह अपने परिवार से भी टकराने को तैयार हो गई थी. पूजा के घर वालों ने सुहेल के प्रति उस की दीवानगी देखी तो उसे समझाने की कोशिश की.

पूजा का भाई भरत आर्या ही सब से ज्यादा उस के संपर्क में था. क्योंकि उसे पूजा से बहुत प्यार था. कई बार उस ने अपने परिवार की इज्जत को देखते हुए उसे समझाने की कोशिश की. लेकिन उस के समझाने का भी उस पर कोई असर नहीं हुआ. सुहेल के प्रति बढ़ी प्यार की दीवानगी के सामने भाई के प्यार की नसीहत भी काट खाने को दौड़ने लगी थी.

सुहेल ने पूजा पर जादू ही ऐसा कर रखा था कि उस वक्त उसे उस के अलावा कोई नजर नहीं आता था. जब उसे लगने लगा कि पूजा पूरी तरह से उस के प्यार के जाल में फंस चुकी है तब वह अपनी हकीकत पर उतर आया.

एक दिन सुहेल ने पूजा को साथ लिया और एक होटल में पहुंच गया. पूजा ने सोचा कि शायद वह नाश्तापानी करने जा रहा होगा. होटल जा कर उसे पता चला कि उस ने पहले से ही वहां पर एक रूम बुक करा रखा है.

रूम में पहुंचते ही पूजा ने उस से सवाल किया, ‘‘सुहेल, यह क्या? आप मुझे होटल में किस लिए लाए हो?’’

‘‘पूजा, क्या तुम्हें अभी भी मुझ पर विश्वास नहीं? हम दोनों ने एक साथ मिल कर साथ जीनेमरने की कसमें खाई हैं तो फिर तुम परेशान क्यों हो? हम दोनों को अब कोई भी जुदा नहीं कर सकता. फिर हमें एकांत में मिलने से एतराज क्यों? हम थोड़ा नाश्तापानी कर के होटल छोड़ कर चले जाएंगे.’’

प्रेमिका का छलिया प्रेमी से इंतकाम – भाग 2

पुलिस अधिकारियों ने मौके पर डौग स्क्वायड टीम तथा फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. थानाप्रभारी के इशारे पर सिपाही रामवीर ने हथौड़े से कमरे का ताला तोड़ा. उस के बाद पुलिस अधिकारियों ने कमरे में प्रवेश किया.

कमरे में प्रवेश करते ही पुलिस अधिकारी चौंक गए. सिपाही देशदीपक की हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. पूरा शव खून से लथपथ चारपाई पर पड़ा था. उस की गरदन पर किसी तेज धार वाले हथियार से कई वार किए गए थे. जिस से उस की गरदन आधे से ज्यादा कट गई थी. किसी नुकीली चीज से भी वार किया गया था.

देखने से ऐसा लग रहा था कि किसी भारी प्रतिशोध के चलते उस की हत्या की गई थी. मृतक की उम्र 28 वर्ष के आसपास थी.

डौग स्क्वायड टीम ने घटनास्थल पर खोजी कुत्ता छोड़ा तो वह शव व अन्य सामान को सूंघ कर भौकता हुआ कमरे से बाहर निकला और बाजार होता हुआ रेलवे पटरी तक गया. टीम ने वहां हत्या से संबंधित सबूत खोजने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली. उस के बाद टीम वापस आ गई.

मौकाएवारदात पर फोरैंसिक टीम भी मौजूद थी. टीम ने कमरे की सघन तलाशी ली तो शराब की एक खाली बोतल, सैक्सवर्द्धक दवाएं, स्प्रे व कंडोम का पैकेट मिला. मृतक का मोबाइल फोन व पर्स गायब था.

टीम ने बिस्तर, चारपाई, दरवाजे की कुंडी व शराब की बोतल से फिंगरप्रिंट लिए तथा बरामद सामान को सुरक्षित कर लिया. सैक्स उपयोगी सामान मिलने से पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि सिपाही की हत्या शायद अवैध संबंधों के चलते हुई है.

अब तक सिपाही देशदीपक की निर्मम हत्या की खबर कस्बा बिल्हौर में फैल गई थी. भारी भीड़ घटनास्थल पर उमड़ पड़ी थी. सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस अधिकारियों ने बिल्हौर कस्बा में पुलिस फोर्स की गश्त बढ़ा दी थी.

पुलिस टीमें अभी निरीक्षण कर ही रही थीं कि सूचना पा कर मृतक सिपाही के घर वाले घटनास्थल पर आ गए. इस के बाद तो वहां कोहराम मच गया. प्रमोद कुमार व उन की पत्नी शिवाला देवी बेटे का शव देख कर दहाड़ें मार कर रोने लगे. मृतक की पत्नी दिव्या उर्फ अंजलि भी पति का शव देख कर बिलख पड़ी. साथ आए अन्य परिजनों की आंखों से भी आंसू बहने लगे.

रोतेबिलखते घरवालों को एसपी (आउटर) तेजस्वरूप सिंह व डीएसपी (बिल्हौर) राजेश कुमार ने धैर्य बंधाया और बड़ी मुश्किल से शव से दूर किया. एडीजी भानु भास्कर ने मृतक सिपाही के मातापिता से वादा किया कि वह जल्द ही हत्या का परदाफाश कर हत्यारों को हथकड़ी पहनाएंगे.

घटनास्थल की प्रारंभिक काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने सिपाही देशदीपक के शव को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय अस्पताल कानपुर भिजवा दिया. 3 डाक्टरों के एक पैनल ने शव का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम के बाद शव को घर वालों को सौंप दिया गया.

घर वाले देशदीपक के शव को पैतृक गांव दयापुर ले कर आए. पुलिस की टुकड़ी शव के साथ आई थी, जिस ने अंतिम संस्कार से पहले सलामी दी.

इधर एडीजी (कानपुर जोन) भानु भास्कर ने सिपाही हत्याकांड को बड़ी गंभीरता से लिया. हत्या के खुलासे के लिए उन्होंने स्वाट, सर्विलांस टीम सहित 6 टीमों का गठन किया और खुलासे की कमान एसपी (आउटर) तेजस्वरूप सिंह को सौंपी. भानु भास्कर ने हत्या का खुलासा करने वाली टीम को 50 हजार रुपए का ईनाम देने का ऐलान भी किया.

एसपी (आउटर) तेजस्वरूप सिंह ने पुलिस की 2 टीमों के साथ सब से पहले मकान मालिक रमेशचंद्र प्रजापति तथा उस मकान में रहने वाले अन्य किराएदारों से पूछताछ की.

पूछताछ से पता चला कि सिपाही देशदीपक के कमरे से एक युवक व एक युवती को आतेजाते देखा था. युवती दुपट्टे से मुंह ढंके रहती थी, जबकि युवक अंगौछे से. लेकिन किसी ने उन से टोकाटाकी नहीं की थी.

किराएदारों से पूछताछ के बाद एसपी तेजस्वरूप सिंह ने साइबर सेल को सिपाही देशदीपक के मोबाइल फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाने का आदेश दिया. साइबर सेल ने तब पिछले 6 महीने की काल डिटेल्स निकलवाई.

सिपाही देशदीपक के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स का अध्ययन पुलिस की 2 टीमों ने किया. एक टीम को बुधवार दोपहर (यानी पहली जून को) 12:26 बजे एक फोन की लोकेशन देशदीपक के घर के पास मिली. इस संदिग्ध नंबर की जानकारी जुटाई गई तो पता चला कि यह नंबर सीवान (बिहार) का है. इस नंबर पर देशदीपक की अकसर बात होती रहती थी.

पुलिस ने जांच आगे बढ़ाई और उस नंबर की लोकेशन ट्रेस की तो लोकेशन सीवान जिले के बसंतपुर (खोड़ी पाकर) की मिली. टीम ने इस की जानकारी एसपी तेजस्वरूप सिंह को दी.

तेजस्वरूप सिंह ने तब एसआई मंसूर अहमद की अगुवाई में एक पुलिस टीम सीवान (बिहार) भेज दी. लगभग साढ़े 5 सौ किलोमीटर का सफर तय करने के बाद मंसूर अहमद टीम के साथ सीवान जिले के बसंतपुर थाना पहुंचे और थानाप्रभारी मुकेश कुमार को अपने आने का मकसद बताया.

मुकेश कुमार ने उस संदिग्ध नंबर की जानकारी जुटाई तो पता चला यह नंबर लालसा कुमारी पुत्री भृगुनाथ सैनी निवासी बड़वा खुर्द के नाम दर्ज है.

पुख्ता जानकारी मिलने के बाद मंसूर अहमद ने अपनी टीम के साथ थाना बसंतपुर पुलिस के सहयोग से बड़वा खुर्द गांव में भृगुनाथ सैनी के घर छापा मारा और उस की बेटी लालसा कुमारी उर्फ लाली को हिरासत में ले लिया. उस के पास से पुलिस ने मृतक सिपाही देशदीपक का मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया. उसे थाना बसंतपुर लाया गया.

थाने में जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने सिपाही देशदीपक की हत्या करने की बात स्वीकार की और यह भी बताया कि हत्या में उस का साथ भाई के बेटे अभिषेक सैनी ने दिया था.

अभिषेक सैनी सारण जिले के मशरक थाना के दक्षिण टोला का रहने वाला है. यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीम ने दक्षिण टोला (मशरक) से अभिषेक सैनी को भी गिरफ्तार कर लिया.

4 जून, 2022 को एसआई मंसूर अहमद अपनी टीम के साथ सिपाही के हत्यारों को गिरफ्तार कर थाना बिल्हौर लौट आए और गिरफ्तारी की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी. सूचना पाते ही एसपी (आउटर) तेजस्वरूप सिंह तथा डीएसपी राजेश कुमार भी थाना बिल्हौर आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने लालसा कुमारी उर्फ लाली तथा अभिषेक सैनी से पूछताछ की तो दोनों ने सहज ही सिपाही देशदीपक की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. यही नहीं, दोनों ने हत्या में प्रयुक्त चाकू, चापड़ तथा खून से सने कपड़े भी खाली पड़े प्लौट से बरामद करा दिए.

हत्या का खुलासा होते ही एसपी तेजस्वरूप सिंह ने प्रैसवार्ता की और आरोपियों को मीडिया के समक्ष सिपाही देशदीपक की हत्या का खुलासा किया.

चूंकि हत्यारों ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था, अत: थानाप्रभारी अरविंद कुमार सिंह ने मृतक के पिता प्रमोद कुमार को वादी बना कर भादंवि की धारा 302 के तहत लालसा कुमारी तथा अभिषेक के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

मोहब्बत पर भारी पड़ी सियासत – भाग 2

असल में विशाल के परिवार वाले उसे कई बार हिदायत दे चुके थे कि वह वंदना से संबंध तोड़ ले.

विशाल के पिता रेलवे में नौकरी करते थे. रिटायर हो चुके थे. उस के बाद से ही वंदना सिंह के मकान में करीब 3 साल से किराए पर रह रहे थे. वंदना के पति स्व. मनोज कुमार सिंह लोक जनशक्ति पार्टी के नेता थे, जिन की 4 साल पहले आकस्मिक मृत्यु हो चुकी थी. विशाल की वंदना और उस के पति से जानपहचान तभी से थी.

पत्रकारिता के सिलसिले में उन की मुलाकातें अकसर होती रहती थीं. वे उस के लिए खबरों के स्रोत भी थे. इस कारण विशाल उन के राजनीतिक मतलब की खबरें भी छाप दिया करता था.

पति की आकस्मिक मौत के बाद वंदना दिवंगत पति की तरह ही राजनीति में सक्रिय हो गई थी. उस के बाद दोनों का विभिन्न कार्यक्रमों में मिलनाजुलना होने लगा था. इस बीच वे समय निकाल कर अपनी कुछ अंतरंगता की बातें भी कर लेते थे.

वंदना को बातबात पर विशाल से मशविरा लेना अच्छा लगता था. विशाल से बातें करने पर उस के दिल को सुकून मिलता था. छोटेबड़े काम के लिए विशाल को फोन कर दिया करती थी. विशाल भी इनकार नहीं कर पाता था.

इस तरह वंदना विशाल के काफी करीब आ चुकी थी. एक तरह से दोनों के बीच गहरा प्रेम संबंध कायम हो चुका था, जिसे उन्होंने दुनिया की नजरों से छिपाए रखा था. इस की जानकारी सिर्फ विशाल की बहन वैशाली को ही थी.

उस के माध्यम से परिवार के दूसरे लोग भी वंदना और विशाल के प्रेम संबंध के बारे में जान गए थे. उन्हें यह भी मालूम हो गया था कि वंदना और विशाल गुपचुप विवाह बंधन में भी बंध चुके हैं, लेकिन अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के बीच इस का खुलासा नहीं किया था.

उधर जैसेजैसे वंदना और विशाल के बीच निकटता बढ़ती गई, वैसेवैसे दोनों अलग तरह के तनाव में भी घिरने लगे. विशाल कुछ ज्यादा ही तनाव में रहने लगा था. दिनप्रतिदिन वंदना उस पर हावी होती जा रही थी. अपने मतलब की खबरें छपवाने से ले कर कारोबार के सिलसिले में हाथ बंटाने के लिए कहती रहती थी.

यहां तक कि अटके हुए सरकारी कामकाज के लिए विशाल पर संपर्क का फायदा उठाने के लिए भी दबाव बनाती थी. ऐसा नहीं होने पर विशाल को ताने दिया करती थी. कई बार इस संबंध में उन के बीच तूतूमैंमैं भी हो जाती थी.

विशाल को वंदना द्वारा दबाव बना कर काम करवाने का तरीका अच्छा नहीं लगता था. उसे अपने पत्रकारिता के करिअर को ले कर भी चिंता रहती थी, जिसे बेदाग बनाए रखने और किसी भी राजनीतिक दल के समर्थक होने के आरोप से बचाए रखना चाहता था. सब से बड़ी उलझन अनैतिक काम को सहयोग देने से बचने को ले कर भी थी.

उन्हीं दिनों बिचौलिया का काम करने वाले एक व्यक्ति ने किसी खबर को ले कर हद ही कर दी थी. उस ने खबर को नहीं छापने का दबाव बनाया था. खबर अवैध तरीके से शराब की बोतलें छिपाए जाने की थी. इस की भनक मीडिया को लग चुकी थी.

अधिकतर मीडिया वाले इस मसले पर चुप्पी साधे हुए थे. उस  व्यक्ति ने विशाल को खबर को जैसे भी हो, छपने से रोकने के लिए कहा था. जबकि जवाब में विशाल ने बताया कि खबर का छपना, नहीं छपना संपादक पर निर्भर है. वह नहीं लिखेगा तब कोई और लिख देगा.

इस पर उस व्यक्ति ने तेवर दिखाते हुए धमकी दी कि उस के ऊपर वंदना सिंह का हाथ है, तब विशाल भी थोड़ा सहम गया. उस के साथ के संबंध को ले कर बड़ी दुविधा में पड़ गया था. उसे वंदना के बिजनैस, होटल और दुकानों के बारे में पता था. जिन की देखभाल पति के निधन के बाद उस के भाई और दूसरे रिश्तेदार करते थे. इस में विशाल भी अप्रत्यक्ष तौर पर सहयोग करता था.

उसी रोज ही इस खबर को ले कर वंदना और उस के भाइयों के साथ काफी तीखी बहस हो गई थी. बात विशाल के घर तक जा पहुंची. इसी सिलसिले में वंदना अपने भाइयों के साथ विशाल के घर पहुंची. उस ने विशाल के परिवार के सदस्यों को धमकी दी.

खैर, बात आईगई हो गई. खबर किसी तरह की पुलिस काररवाई नहीं होने के कारण नहीं छप पाई. लेकिन दोनों के प्रेम संबंधों में दरार जरूर पड़ गई. वंदना और उस के भाइयों की निगाह में विशाल जरूरत का नहीं लगा. यह बात विशाल ने भी महसूस की कि वंदना न केवल उस से कतराने लगी है, बल्कि आक्रामक तेवर भी दिखाने लगी है. यहां तक कि वह गोलीबंदूक की भी बातें करने लगी थी.

विशाल वंदना के इस बदले हुए व्यवहार को ले कर भी तनाव में रहने लगा था. वह दोहरे मानसिक उत्पीड़न के दौर से गुजर रहा था. एक तरफ प्रेम संबंध के जगजाहिर होने का दिमाग पर पड़ने वाला दबाव था, तो दूसरी ओर वंदना के व्यवहार में बदलाव था. उस ने महसूस किया कि वंदना उसे दूध में गिरी मक्खी समझने लगी है.

इसी बीच विशाल को पता चला कि पति की मौत के पीछे वंदना सिंह का ही हाथ था. साथ ही यह भी मालूम हुआ कि वह किसी और युवक से भी वह प्यार करती है. उस का अफेयर शुभम कुमार सिंह से होने की जानकारी मिलने पर विशाल और भी विचलित हो गया. शुभम डा. कौशल सिंह का छोटा भाई है.

इसे ले कर उस ने वंदना से बात की. वंदना ने विशाल की भावना को ठुकराते हुए कहा कि तुम जब मेरे काम में मुझे मदद नहीं कर सकते तो तुम से कोई उम्मीद कैसे रख सकती हूं. अभी शुभम का इलाज चल रहा है. उस की मुझे जरूरत है, मैं जानती हूं कि आने वाले दिनों में वही मेरे साथ हमदर्दी रखेगा.

यह बात विशाल के दिल में चुभ गई. उस ने भावुक हो कर कह दिया यदि ऐसा हुआ तब वह अपनी जान दे देगा. इसे भी वंदना ने हंसी में उड़ा दिया और बोली, ‘‘जाजा, बहुत देखे हैं तेरे जैसे…!’’

‘‘मैं जो कह रहा हूं कर दूंगा…’’ विशाल गंभीरता से बोला.

तनु की त्रासदी : जिस्म की चाहत ने पहुंचा दिया मौत के पास – भाग 2

चंदन से शादी के बाद उस के 2 साल अच्छे से गुजरे, ठीक वैसे ही जिस तरह से वह पहली शादी के पहले सपने देखा करती थी. पर यह शादी नहीं एक सौदा था, जिस के तहत तनु ने अपने पहले पति से गुजारे के लिए लिए गए 5 लाख रुपए बतौर दहेज चंदन को दे रखे थे.

लेकिन यहां भी दोनों के बीच वादविवाद और झगड़े होने लगे. चंदन का मकसद तनु की जवानी और खूबसूरती भोगना था, जो पूरा हो गया था. एक साल बाद ही इन के यहां एक बेटी हुई, जिस का नाम विनी रखा गया. चंदन का बदलता बर्ताव और बेरुखी देख कर तनु को समझ आने लगा कि इस से अच्छा तो वह दुकानदार पति ही था, जो उस का पूरा ध्यान रखता था.

झगड़े इतने बढ़ गए कि दोनों का साथ रहना दूभर हो गया. ऐसे में सास राजकुमारी ने तनु की परेशानी हल की. उस ने उसे समझाया कि जब चंदन से नहीं पट रही है तो उसे तलाक दे दो और एवज में 10 हजार रुपए हर महीने लेती रहो.

तनु के मायके वालों का जी उस की हरकतों के चलते पहले ही उचट चुका था, लिहाजा उन्होंने उस की दूसरी शादी के विवाद में न कोई दखल दिया और न ही दिलचस्पी दिखाई. चंदन को तलाक दे कर तनु अलग गोयलनगर के अपार्टमेंट अड़ोसपड़ोस के फ्लैट नंबर 103 में बेटी के साथ रहने लगी.

रिश्तों की ऐसी सौदेबाजी टीवी धारावाहिकों में ही देखने को मिलती है. तनु ने पहले पति से एकमुश्त 5 लाख रुपए लिए थे और दूसरे से 10 हजार रुपए महीना ले रही थी. एक तरह से यह देह की या यौनसुख की कीमत वसूलने जैसी बात थी, जिस का कोई अफसोस या ग्लानि उसे नहीं थी.

अब तनु आजाद थी, पर जल्दी ही यह आजादी उसे खलने लगी. इंदौर जैसे औद्योगिक शहर में एक अकेली लड़की का बिना किसी सहारे के रहना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है. गोयलनगर में शिफ्ट होने के बाद भी चंदन उस से मिलने आया करता था.

न जाने किस जादू के जोर से दोनों के बीच के विवाद सुलझ गए थे. अड़ोसपड़ोस अपार्टमेंट के अड़ोसियोंपड़ोसियों से तनु ने चंदन का परिचय पति के रूप में ही कराया था. लिहाजा सभी यह सोचते थे कि दोनों पतिपत्नी हैं और चंदन अकसर काम के सिलसिले में बाहर रहता है.

तन की भूख फिर से दूसरे पति से बुझने लगी तो तनु चंदन के पांवों में बिछने लगी और इस तरह बिछने लगी कि जब चंदन ने अपनी दूसरी शादी की बात उसे बताई तो उस के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई. शिकन तो दूर की बात, सन 2015 की इस अनूठी शादी में विचित्र किंतु सत्य जैसी बात यह हुई थी कि आमंत्रण पत्र में तनु का नाम बतौर चंदन की बहन छपा था.

जाने क्या खिचड़ी तनु, चंदन और राजकुमारी के बीच पकी, जो तनु अपने दूसरे पति की दूसरी शादी में बहन की हैसियत से शामिल हुई और बारात में जम कर नाची भी. इतना ही नहीं, चंदन की सुहाग की सेज भी उस ने अपने हाथों से सजाई. किसी भी तरह के साहित्य में शायद ही ऐसी किसी घटना का वर्णन देखने को मिले, जो इंदौर की इस शादी में घटित हुआ था.

शादी के बाद भी चंदन गोयलनगर में तनु के पास आताजाता रहा और तनु की हर तरह की जरूरत भी पूरी करता रहा. 10 हजार रुपए महीने तो वह उसे दे ही रहा था. तनु अपनी तनहाई से समझौता कर के संतुष्ट हो चली थी. लेकिन चंदन के मन में उसे ले कर कुछ और ही चल रहा था, जो अब तक उस की रगरग से वाकिफ हो चुका था. चंदन का असली धंधा क्या था, इस का अंदाजा तनु को नहीं था. वह तो उसे प्रौपर्टी ब्रोकर समझती रही थी, जिस के एक बड़े कांग्रेसी नेता से अच्छे संबंध थे.

चंदन का एक दोस्त था महिम शर्मा. वह पेशे से वैसा ही पत्रकार था, जैसा कि चंदन नेता यानी कहने भर के लिए. फिर भी दोनों में अपनेअपने धंधे की ठसक भी थी और पैसा भी अच्छाखासा था. दरअसल, चंदन और महिम दोनों मिल कर एक गिरोह चलाते थे, जिस का काम लोगों को, खासतौर से व्यापारियों को फांस कर उन्हें ब्लैकमेल करना था. इस के लिए कई खूबसूरत लड़कियां इन दोनों ने पाल रखी थीं, जिन का काम सोशल मीडिया के जरिए व्यापारियों को फंसाना होता था.

शिकार जब जाल में फंस जाता था तो ये लड़कियां किसी लौज, होटल या फ्लैट में उसे बुलाती थीं और उस के साथ वैसी ही वैरायटी वाली सैक्सी हरकतें करती थीं, जैसी ब्लू फिल्मों में दिखाई जाती हैं. नई तकनीकों से अंजान व्यापारी इन लड़कियों के साथ सैक्स का लुत्फ तो उठाते थे, पर इस बात का अहसास उन्हें नहीं होता था कि उन की हरकतें कैमरे में कैद हो रही हैं, जो एक बार अगर दुनिया के सामने आ जाएं तो उन की इज्जत धूल में मिल जाना तय थी.

इसी से बचने के लिए कितने ही व्यापारी चंदन और महिम को पैसा दे चुके थे, इस का ठीकठाक हिसाबकिताब शायद ही कोई दे पाए, क्योंकि अधिकांश क्या, सभी व्यापारी अपनी ब्लू फिल्में देख कर पसीनेपसीने हो उठते थे और डरते भी थे कि अगर ये वायरल हो गईं तो वे कहीं के नहीं रहेंगे. घरगृहस्थी तो चौपट होगी ही, समाज और रिश्तेदारारी में भी छीछालेदर होगी. इसलिए वे चुपचाप इन दोनों को मुंहमांगा पैसा दे देते थे.

इस काम में एकलौती दिक्कत इन दोनों को यह थी कि जिस लड़की को ये चारे के रूप में इस्तेमाल करते थे, उसे खासी रकम देनी पड़ती थी और एक नया राजदार भी बनाना पड़ता था,जो एक तरह का खतरा ही था. चंदन और महिम ब्लैकमेलिंग के इस धंधे के खासे विशेषज्ञ हो चुके थे और मन ही मन उन अधेड़, जवान और बूढ़ों की हालत पर हंसते भी थे, जो कमसिन लड़कियों के जिस्म की चाहत में आ कर गाढ़ी कमाई उन्हें दे जाते थे.

चंदन का ध्यान जब इस तरफ गया कि अगर तनु उन के गिरोह में शामिल हो कर काम करने को तैयार हो जाए तो बात सोने पे सुहागा वाली होगी. उस पर बुरी तरह मरने वाली तनु न केवल भरोसेमंद थी, बल्कि उस का मांसल सैक्सी जिस्म उस की दूसरी खूबी थी, जिस की ब्लैकमेलिंग के धंधे में खासी अहमियत होती है.

चंदन को यह तो समझ में आ गया था कि पैसों के बाबत तनु ज्यादा मुंह नहीं फाड़ेगी, लेकिन अपनी पूर्वपत्नी को इतना तो वह जानने ही लगा था कि वह इस काम के लिए कभी तैयार नहीं होगी. वह जैसी भी थी, पर उस के अपने कुछ उसूल थे, जिन से ब्लैकमेलिंग की बात मेल नहीं खाती थी. बिस्तर में चंदन के मुताबिक कुलाटियां खाने वाली तनु इस काम के लिए आसानी से तैयार होगी, इस में उसे शक था.

इस के बाद भी उसे कोशिश करने में हर्ज महसूस नहीं हुआ. उस के खुराफाती दिमाग में आइडिया यह आया कि तनु को एक मर्द की जरूरत तो है ही, इसलिए क्यों न महिम का चक्कर उस से चलवा दिया जाए. इस से होगा यह कि अगर महिम और तनु के बीच जिस्मानी ताल्लुक कायम हो गए तो आसानी से तनु को शीशे में उतारा जा सकता है. इस बाबत उस ने पहले महिम का परिचय तनु से करवाया और फिर खुद धीरेधीरे उस से किनारा करने लगा.

कहीं पे निगाहें, कही पे निशाना – भाग 2

पुलिस ने फायजा के मोबाइल के वाट्सऐप को चैक किया तो वह दोनों ही नंबरों पर चैटिंग करती थी. जिस से यह साफ हो गया था कि फायजा एक साथ प्यार की 2 नावों पर सवार हो कर यात्रा कर रही थी. यानी फायजा का एक साथ 2 युवकों के साथ चक्कर चल रहा था.

इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई पूरी कर शव पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि चाकू के हमले से ही शरीर के कई अंग कट गए थे, जो उस की मौत का कारण भी बने थे.

पोस्टमार्टम हो जाने के बाद पुलिस ने उस का शव उस के घर वालों को सौंप दिया था. इस केस में मृतका के अब्बू नन्हे की ओर से हसन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. जिस के बाद पुलिस ने आरोपी की धरपकड़ के लिए 2 पुलिस टीमों का गठन किया.

पुलिस की एक टीम ने उसी वक्त आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए उत्तराखंड के सितारगंज में उस के आवास पर दबिश दी. लेकिन वह घर से फरार मिला. उस के बाद भी पुलिस ने उस की कई संभावित ठिकानों पर छापा मारा. लेकिन वह पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका. फिर पुलिस ने उस की खोजखबर के लिए मुखबिर लगा दिए.

3 अगस्त, 2022 को पुलिस को एक मुखबिर ने सूचना दी. आरोपी हसन कहीं जाने की फिराक में रामपुर के विलासपुर रोड पर पुल के नीचे खड़ा हुआ है. इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने आरोपी को चारों ओर से घेरने के बाद गिरफ्तार कर लिया.

हसन को गिरफ्तार कर पुलिस उसे मिलक थाने ले आई. पुलिस ने उस से इस हत्याकांड की बाबत जानकारी ली. हसन ने पुलिस के सामने आते ही आसानी से अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस पूछताछ के दौरान इस हत्याकांड की जो हकीकत सामने आई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला रामपुर के मिलक कोतवाली क्षेत्र में आता है एक गांव जालिफ नगला. इसी गांव में नन्हे अपने परिवार के साथ रहता था. नन्हे का रेडीमेड कपड़े का कारोबार था. वह आसपास के गांव व शहरों में लगने वाले बाजारों में फड़ लगा कर कपड़े बेचता था. नन्हे की एक ही बेटी थी फायजा.

बीवी आसिफा को मिला कर घर में मात्र 3 प्राणी थे. कपड़े के व्यापार से नन्हे को अच्छी आमदनी थी. उसी आमदनी के सहारे ही नन्हे ने गांव में अच्छा मकान बनवा लिया था.

घर की आर्थिक स्थिति मजबूत होने के कारण नन्हे ने अपनी बेटी फायजा को बहुत ही शौक से पालापोसा था. नन्हे ने बेटी के भविष्य को देखते हुए उसे अच्छी शिक्षा दिलाने की कोशिश की. लेकिन ज्यादा लाड़प्यार में पली होने के कारण वह इंटरमीडिएट तक ही पढ़ पाई थी. उस के बाद उस ने आगे की पढ़ाई बंद कर दी और जौब की तलाश में जुट गई.

फायजा ने कंप्यूटर कोर्स भी कर रखा था, जिस से वह हर वक्त लैपटाप पर कुछ न कुछ करती रहती थी. साल 2021 में उस की मुलाकात एक व्यक्ति से हुई. वह व्यक्ति आयुष्मान कार्ड बनाने वाली एक संस्था से जुड़ा था. उसी के मार्फत फायजा को भी उसी संस्था में आयुष्मान कार्ड बनाने का काम मिल गया. वह उसी संस्था के माध्यम से अलीगढ़ में संविदा पर काम करने लगी थी.

घर छोड़ कर अलीगढ़ काम करना फायजा को उचित नहीं लगा. उस का वहां पर मन नहीं लगा तो एक महीने बाद ही वह अपने घर वापस चली आई थी.

फायजा के गांव में ही हसन का एक दोस्त था राशिद. राशिद के साथ हसन की पक्की दोस्ती थी. उसी दोस्ती के सहारे उस का राशिद के घर आनाजाना था. फायजा के घर के पास ही राशिद का घर था. उसी आनेजाने के दौरान एक दिन उस की नजर फायजा पर पड़ी.

चूंकि फायजा के अब्बू रेडीमेड कपड़े के व्यवसाय से जुड़े थे. इसी कारण वह हर रोज नएनए लिबास में नजर आती थी. फायजा देखने में तो सुंदर थी ही, ऊपर से उस का पहननाओढ़ना  ऐसा था कि उस की खूबसूरती में चार चांद लग जाते थे.

हसन उसे देखते ही मन ही मन चाहने लगा. एक दिन फायजा किसी काम से राशिद के घर गई तो उस वक्त हसन भी आया हुआ था. हसन ने उसे करीब से देखा तो उस का दिल बेकाबू हो गया.

राशिद यह तो जानता था कि हसन फायजा के रंगरूप पर मर मिटा है. उस दिन मौका मिला तो राशिद ने हसन की मुलाकात अपने दोस्त के रूप में कराई. उस के घर से जाते ही हसन अपने दिल को थाम कर बैठ गया. हसन ने राशिद से फायजा का मोबाइल नंबर भी ले लिया था.

अगले ही दिन हसन ने फायजा के मोबाइल पर काल कर के अपना परिचय देते हुए बातचीत आगे बढ़ाई. उस दिन हसन ने काफी देर तक फायजा से मोबाइल पर बात की. दोनों पहले ही राशिद के घर पर एकदूसरे से मुखातिब हो चुके थे. इसी कारण दोनों को आगे बात बढ़ाने में टाइम नहीं लगा था.

बातों ही बातों में हसन ने फायजा के सामने दोस्ती की पेशकश की तो उस ने स्वीकार कर ली. फायजा के दोस्ती कुबूलते ही हसन का दिल बागबाग हो उठा. उसे फायजा से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वह इतनी जल्दी उस से दोस्ती कर लेगी. फिर हसन उस से मिलने के लिए बेताब रहने लगा था.

वह जल्दी ही उस से मिलने की आस लिए राशिद के घर जा पहुंचा. हसन के आने की खबर पाते ही फायजा भी तुरंत उस से मिलने राशिद के घर जा पहुंची. फायजा को सामने पा कर हसन को बहुत खुशी हुई. अब उस के नजरिए में भी पहले के मुकाबले काफी बदलाव आ गया था.

दूसरी मुलाकात में ही दोनों के बीच प्यार अंकुरित हो चुका था. उस के बाद दोनों मोबाइल पर प्यार भरी बातें करने लगे थे. फिर एक दिन ऐसा भी आया कि हसन उस से सीधा मिलने उस के घर भी जाने लगा था.

उस ने अपने अब्बूअम्मी से उस का परिचय देते हुए बताया कि उस की मुलाकात अलीगढ़ में काम करने के दौरान हुई थी. वह अभी भी वहीं पर जौब करता है. वह वहीं पर उस की फिर से जौब लगवाने की कोशिश कर रहा है.

यह सुन कर उस के अब्बूअम्मी को बहुत खुशी हुई. उस के बाद फायजा को अपने घर वालों की तरफ से उस के साथ आनेजाने की पूरी छूट मिल गई थी.

जब प्यार में आया ट्विस्ट – भाग 1

जैसेजैसे दिन ढलता जा रहा था, वैसेवैसे नीतू की चिंता भी बढ़ती जा रही थी. वह बारबार पति अरुण के मोबाइल फोन पर उस से संपर्क करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन फोन बंद होने की वजह से संपर्क नहीं हो पा रहा था. दरअसल, अरुण घर से यह कह कर निकला था कि वह जरूरी काम से किसान नगर तक जा रहा है, घंटे-2 घंटे बाद वापस आ जाएगा.

लेकिन उसे गए 5 घंटे बीत गए थे और वह वापस नहीं आया था. उस का फोन भी बंद था, जिस से नीतू की धड़कनें बढ़ गई थीं. यह 16 जुलाई, 2022 की बात है.

अरुण जब रात 10 बजे तक घर वापस नहीं आया तो नीतू ने जेठ कुलदीप को फोन कर घर बुला लिया. नीतू ने पति के घर वापस न आने की बात कुलदीप को बताई तो उस के माथे पर भी बल पड़ गए. कुलदीप ने अरुण के कुछ खास दोस्तों से फोन पर संपर्क किया, लेकिन अरुण के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. कुलदीप और नीतू रात भर जागते रहे और दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए रहे.

सुबह हुई तो नीतू के अड़ोसपड़ोस वालों को भी जानकारी हुई कि अरुण बीती रात घर नहीं आया. पड़ोसियों ने नीतू को धैर्य बंधाया कि चिंता मत करो, अरुण जल्द ही घर वापस आ जाएगा, लेकिन नीतू को चैन कहां था. उस ने जेठ कुलदीप को साथ लिया और सुबह करीब 9 बजे थाना पनकी पहुंच गई.

थाने में उस समय एसएचओ अंजन कुमार सिंह मौजूद थे. नीतू ने उन्हें बताया कि वह पनकी कलां में अपने पति अरुण कुमार के साथ किराए के मकान में रहती है. उस के पति राजमिस्त्री हैं. कल दोपहर बाद किसी का फोन आने पर वह घर से चले गए थे. उस के बाद वापस घर नहीं आए. उसे किसी अनहोनी की आशंका है.

एसएचओ अंजन कुमार सिंह ने नीतू की बात गौर से सुनी. फिर शक के आधार पर अरुण की गुमशुदगी दर्ज कर ली तथा अरुण के बारे में कुछ खास जानकारी उस के भाई कुलदीप तथा नीतू से हासिल की. उन्होंने अरुण का मोबाइल फोन नंबर भी ले लिया. उस के बाद भरोसा दे कर नीतू को वापस घर भेज दिया.

अंजन कुमार सिंह ने अरुण की गुमशुदगी तो दर्ज कर ली, लेकिन उस का पता लगाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. इस की वजह यह थी कि अरुण कोई मासूम बच्चा तो था नहीं, जो उस के अपहरण की आशंका होती.

दूसरे वह राजमिस्त्री था. सोचा कि वह किसी अन्य राजमिस्त्री के घर जश्न में डूबा होगा. अकसर ऐसी दावतें होती रहती हैं. अरुण भी जश्न मना कर 1-2 दिन में अपने आप आ ही जाएगा.

लेकिन जब 2 दिन बीत जाने पर भी अरुण वापस घर नहीं आया तो पुलिस एक्टिव हुई. अंजन कुमार सिंह ने अरुण के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो एक ऐसा नंबर सामने आया, जिस पर अरुण अकसर बात करता था.

इस मोबाइल नंबर के बारे में जानकारी जुटाई गई तो पता चला कि यह नंबर कानपुर देहात जिले के थाना गजनेर के सपई गांव की युवती सीमा का है.

एसएचओ अंजन कुमार सिंह तब पुलिस टीम के साथ सपई गांव पहुंचे और सीमा से पूछताछ की. सीमा ने बताया कि वह राजमिस्त्री अरुण कुमार को जानती है. अरुण की उस के गांव में रिश्तेदारी है. रिश्तेदार के घर आतेजाते उस की मुलाकात अरुण से हुई थी. मुलाकातें दोस्ती में बदलीं, फिर दोस्ती प्यार में बदल गई.

प्यार परवान चढ़ा तो उन के बीच की दूरियां भी खत्म हो गईं और उन का शारीरिक रिश्ता बन गया. लेकिन उन के प्यार में दरार तब पड़ी, जब अरुण ने उसे धोखा दे कर किसी और लड़की से शादी रचा ली. शादी के बाद उस ने अरुण से दूरियां बना ली थीं.

‘‘लेकिन तुम्हारी फोन पर तो उस से बात होती रहती थी,’’ एसएचओ ने सीमा से पूछा.

‘‘हां सर, फोन पर बात होती रहती थी,’’ सीमा ने जवाब दिया.

‘‘16 जुलाई, 2022 की दोपहर बाद क्या तुम ने अरुण से बात की थी?’’ अंजन कुमार सिंह ने पूछा.

सीमा कुछ क्षण सोचती रही फिर बोली, ‘‘सर, उस रोज मैं ने तो अरुण से बात नहीं की थी, लेकिन संदीप कश्यप ने मेरे फोन से अरुण से बात की थी. वह उसे मकान का ठेका और एडवांस पैसे दिलाने की बात कर रहा था.’’

‘‘यह संदीप कौन है? उस ने तुम्हारे फोन से अरुण को फोन क्यों किया?’’

‘‘सर, संदीप इसी गांव का रहने वाला है. हमारी उस से दोस्ती है. कभीकभी वह उस से मिलने घर आ जाता है. उस दिन वह उस से मिलने घर आया था. तभी उस ने उस के फोन से अरुण से बात की थी. अरुण की दोस्ती संदीप से है. उस का संदीप के घर आनाजाना बना रहता है. लेकिन सर, अरुण के विषय में आप मुझ से क्यों पूछ रहे हैं?’’ सीमा बोली.

‘‘इसलिए कि अरुण को किसी ने फोन कर बुलाया. उस के बाद अरुण घर नहीं पहुंचा. उसी का पता हम लगा रहे हैं.’’ अंजन कुमार सिंह ने सीमा को बताया.

यह सुनते ही सीमा ने सिर पकड़ लिया. उस के मन में तरहतरह की आशंकाएं उमड़ने लगीं.

सीमा ने जो जानकारी दी थी, उस से एक बात साफ थी कि मामला अवैध रिश्तों का है. और अवैध रिश्तों में कुछ भी संभव है. अत: संदीप कश्यप पुलिस की निगाह में चढ़ा तो एसएचओ अंजन कुमार सिंह उस के घर जा पहुंचे.

वह पुलिस जीप से जैसे ही उतरे, वैसे ही चबूतरे पर बैठा एक युवक तेजी से भागा. पुलिस ने पीछा कर कुछ दूरी पर उसे दबोच लिया.

उस युवक ने अपना नाम अमित कुमार कश्यप उर्फ गुड्डू निवासी गांव सपई जनपद कानपुर देहात बताया. दबिश में संदीप कश्यप तो नहीं मिला, लेकिन शक होने पर पुलिस अमित उर्फ गुड्डू को पूछताछ के लिए थाना पनकी ले आई.

अफसाना एक दीपा का – भाग 1

34 वर्षीय दीपा वर्मा का भरापूरा गदराया बदन किसी भी मर्द की नीयत बिगाड़ने के लिए काफी था. वजह यह कि दीपा की आंखों में पुरुषों के लिए एक आमंत्रण सा होता था. जो पुरुष इस आमंत्रण को समझ स्वीकार कर लेता था, वह फिर उस के हुस्न और अदाओं से खुद को आजाद नहीं कर पाता था.

ऐसा ही कुछ उस से उम्र में 8-10 साल छोटे धर्मेंद्र गहलोत के साथ हुआ था. धर्मेंद्र प्रसिद्ध धर्मनगरी उज्जैन के देवास रोड पर अपनी पत्नी के साथ रहता था. पेशे से मांस व्यापारी इस युवक की जिंदगी सुकून से गुजर रही थी. अब से कोई 3 साल पहले वह दीपा से मिला था तो पहली नजर में ही उस पर फिदा हो गया था.

दीपा को देख कर धर्मेंद्र को यह तो समझ आ गया था कि वह शादीशुदा है. उसके गले में लटका मंगलसूत्र और मांग का सिंदूर उस के शादीशुदा होने की गवाही दे रहे थे.

उज्जैन का फ्रीगंज इलाका रिहायशी भी है और व्यावसायिक भी, इसलिए जो भी पहली दफा उज्जैन जाता है वह महाकाल और दूसरे मंदिरों के नामों के साथसाथ फ्रीगंज नाम के मोहल्ले से भी वाकिफ हो जाता है. शहर के लगभग बीचोंबीच बसे इस इलाके की रौनक देखते ही बनती है.

इसी इलाके में दीपा की साडि़यों पर फाल लगाने और पीको करने की छोटी सी दुकान थी, जिस से उसे ठीकठाक आमदनी हो जाती थी. करीब 3 साल पहले एक दिन धर्मेंद्र की पत्नी दीपा को अपनी साड़ी में फाल लगाने और पीको करने के लिए दे आई थी. उसे वहां से साड़ी लाने का टाइम नहीं मिल पा रहा था, इसलिए उस ने साड़ी लाने के लिए अपने पति धर्मेंद्र को भेज दिया. जब धर्मेंद्र दीपा की दुकान पर पहुंचा तो बेइंतहा खूबसूरत दीपा को देखता ही रह गया.

दीपा में कुछ बात तो थी, जो उसे देख धर्मेंद्र का दिल जोर से धड़कने लगा था. सामान्यत: बातचीत के बाद साड़ी ले कर जब उस ने दीपा को पैसे दिए तो उस की हथेली एक खास अंदाज में दबाने से वह खुद को रोक नहीं पाया.

धर्मेंद्र ने उस की हथेली दबा तो दी थी, लेकिन उसे इस बात का डर भी था कि कहीं दीपा इस बात का बुरा मान कर उसे झिड़क न दे.

दीपा ने इस हरकत पर कोई ऐतराज तो नहीं जताया बल्कि हंसते हुए यह जरूर कह दिया, ‘‘बड़े हिम्मत वाले हो जो पहली ही मुलाकात में हाथ दबा दिया.’’

इस जवाब से धर्मेंद्र का डर तो दूर हो गया पर दीपा के इस अप्रत्याशित जवाब से वह झेंप सा गया था. उसे यह समझ आ गया था कि अगर थोड़ी सी कोशिश की जाए तो यह खूबसूरत महिला जल्द ही उस के पहलू में आ जाएगी. कहने भर की बात है कि औरतें पहली नजर में मर्द की नीयत ताड़ जाती हैं पर यहां उलटा हुआ था. पहली ही नजर में धर्मेंद्र दीपा की नीयत ताड़ गया था.

धर्मेंद्र आया दीपा की जिंदगी में

दुकान से जातेजाते उस ने दीपा का मोबाइल नंबर ले लिया और उसे भी अपना नंबर दे दिया था. दीपा के हुस्न में खोए धर्मेंद्र को इस वक्त यह समझाने वाला कोई नहीं था कि वह कितनी बड़ी आफत को न्यौता दे रहा है. यही बात दीपा पर भी लागू हो रही थी, जो धर्मेंद्र के आकर्षक चेहरे और गठीले कसरती बदन पर मर मिटी थी.

जल्द ही दोनों के बीच मोबाइल पर लंबीलंबी बातें होने लगीं. ये बातें निहायत ही रोमांटिक होती थीं. जिस में यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि कौन किस को बहका और उकसा रहा है. दोनों शादीशुदा और खेलेखाए थे, इसलिए जल्द ही एकदूसरे से इतने खुल गए कि मिलने के लिए बेचैन रहने लगे.

सैक्सी बातें करतेकरते दोनों का सब्र जवाब देने लगा था. लेकिन पहल कौन करे, इस पर दोनों ही संकोच कर रहे थे. धर्मेंद्र ने पहल नहीं की तो एक दिन दीपा ने ही उसे फोन पर आमंत्रण भरा ताना मारा, ‘‘फोन पर ही सब कुछ करते रहोगे या फिर कभी मिलोगे भी.’’

बात अंधा क्या चाहे दो आंखें वाली थी. सो धर्मेंद्र ने मौका न गंवाते हुए कहा, ‘‘आ जाओ, आज ही मिलते हैं महाकाल मंदिर के पास.’’

इस मासूमियत पर दीपा जोर से हंस कर बोली, ‘‘मंदिर में क्या मुझ से भजन करवाना है. एक काम करो, तुम मेरे घर आ जाओ.’’ दीपा ने सिर्फ कहा ही नहीं बल्कि उसे अपने घर का पता भी दे दिया.

अब कहनेसुनने और सोचने को कुछ नहीं बचा था. धर्मेंद्र के तो मानो पर उग आए थे. वह बिना वक्त गंवाए दीपा के घर पहुंच गया, जहां वह सजसंवर कर उस का इंतजार कर रही थी. दरवाजा खुलते ही उस ने दीपा को देखा तो अपने होश खो बैठा. एक निहायत खूबसूरत महिला उस पर अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार थी. वह भी बगैर किसी मांग या खुदगर्जी के. यह खयाल ही धर्मेंद्र को और मर्द बनाए दे रहा था.

दरवाजा बंद होते ही दोनों एकदूसरे से कुछ इस तरह लिपटे कि लंबे वक्त तक अलग नहीं हुए और जब अलग हुए तो एक अलग दुनिया में थे, जहां भलाबुरा, नैतिकअनैतिक, जायजनाजायज कुछ नहीं होता. होती है तो बस एक जरूरत जो रहरह कर सिर उठाती है.

चोरीछिपे बनाए गए नाजायज संबंधों का लुत्फ ही कुछ अलग होता है, यह बात दीपा और धर्मेंद्र की हालत देख कर समझी जा सकती थी. जब भी दीपा का मन होता, वह धर्मेंद्र को फोन कर के बुला लेती थी.

कुछ महीनों बाद धर्मेंद्र ने दीपा की निजी जिंदगी में भी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी. उसे हैरानी इस बात की थी कि कोई शादीशुदा औरत कैसे अपने पति के होते हुए उस की आंखों में धूल झोंक कर संबंध बना लेती है. इस दौरान धर्मेंद्र ने दीपा पर काफी पैसा लुटाया था.

दीपा का झूठ आया सामने

अपनी निजी जिंदगी से ताल्लुक रखते सवालों पर दीपा ज्यादा दिन खामोश नहीं रह पाई और उस ने आधी सच्ची और आधी झूठी कहानी धर्मेंद्र को यह बताई कि उस के पति का नाम दिलीप शर्मा है, जो नजदीक के गांव में खेती करते हैं और कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं. जाने क्यों धर्मेंद्र को दीपा झूठ बोलती लगी. अब उस के सामने दिक्कत यह थी कि वह अपनी मरजी या जरूरत के मुताबिक दीपा के पास नहीं जा सकता था क्योंकि उस का पति दिलीप कभी भी आ सकता था.

दीपा का बोला हुआ जो झूठ धर्मेंद्र के दिलोदिमाग में खटक रहा था, वह जल्द ही सामने आ गया. पता चला कि दिलीप शर्मा उस का असली पति नहीं है, बल्कि वह दिलीप की रखैल है, जिसे आजकल की भाषा में लिवइन कहा जाता है. यह खुलासा धर्मेंद्र के लिए एक तरह का झटका ही था, लेकिन जल्द ही इस का भी तोड़ निकल आया.

इस दिलचस्प तोड़ या समाधान को समझने के पहले दीपा की गुजरी जिंदगी जानना जरूरी है, जिसे देख कर कहा जा सकता है कि वह एक बदकिस्मत औरत थी. हालांकि इस बदकिस्मती की एक हद तक जिम्मेदार भी वही खुद थी.

उज्जैन के मशहूर काल भैरव मंदिर से हर कोई वाकिफ है क्योंकि वहां शराब का प्रसाद चढ़ता है. काल भैरव जाने वाला एक रास्ता जेल रोड कहलाता है, जहां जेल बनी हुई है. जेल अफसर भी यहां बनी कालोनी में रहते हैं. दीपा इसी जेल रोड की ज्ञान टेकरी के एक मामूली से परिवार में पैदा हुई थी.

कुदरत ने दीपा पर मेहरबान होते हुए उसे गजब की खूबसूरती बख्शी थी. उसे एक ऐसा रंगरूप मिला था, जिसे पाने के लिए तमाम महिलाएं तरसती हैं.

प्रेमिका का छलिया प्रेमी से इंतकाम – भाग 1

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले का एक बड़ी आबादी वाला कस्बा है भोगांव. इसी भोगांव कस्बे के भीमनगर मोहल्ले में मोहरपाल सिंह सपरिवार रहते थे. उन के परिवार में पत्नी विमला के अलावा 2 बेटे नीरज, सूरज तथा एक बेटी दिव्या उर्फ अंजलि थी. मोहरपाल सिंह गल्ले का व्यापार करते थे. उसी व्यापार से वह परिवार का भरणपोषण करते थे. वह एक इज्जतदार व्यक्ति थे. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

मोहरपाल सिंह तीनों बच्चों में दिव्या उर्फ अंजलि सब से छोटी थी. दिव्या गोरी, तीखे नाकनक्श और बड़ीबड़ी आंखों वाली खूबसूरत लड़की थी. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही उस की शोखियां एवं चंचलता और बढ़ गई थी. उस ने नैशनल पोस्ट ग्रैजुएट कालेज से बीए की डिग्री हासिल कर ली थी. वह सरकारी नौकरी पाना चाहती थी. इस के लिए उस ने तैयारी भी शुरू कर दी थी.

लेकिन एक ग्रामीण कहावत है कि जब बेटी हुई सयानी, फिर पेटे नहीं समानी. मोहरपाल सिंह और उन की पत्नी विमला को भी जवान बेटी दिव्या उर्फ अंजलि की शादी की चिंता सताने लगी थी. वह उस के लिए घरवर ढूंढने लगे थे. कुछ समय बाद एक खास रिश्तेदार के माध्यम से उन्हें एक लड़का देशदीपक पसंद आ गया.

देशदीपक के पिता प्रमोद कुमार, फिरोजाबाद जिले के गांव दयापुर में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी शिवाला देवी के अलावा 2 बेटे देशराज व देशदीपक थे. वह बड़े काश्तकार थे.

बड़े बेटे देशराज की मौत हो चुकी थी. छोटा बेटा देशदीपक अभी कुंवारा था. वह बड़ा ही होनहार था. वर्ष 2018 में वह उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही पद पर भरती हुआ था. हाथरस में प्रशिक्षण पाने के बाद 28 जनवरी, 2019 को उस की पहली तैनाती कानपुर के बिल्हौर थाने में हुई थी.

चूंकि प्रमोद कुमार की आर्थिक स्थिति मजबूत थी और उन का बेटा सरकारी मुलाजिम भी था. इसलिए मोहरपाल सिंह ने देशदीपक को अपनी बेटी दिव्या के लिए पसंद कर लिया. दिव्या और देशदीपक ने भी एकदूसरे को देख कर अपनी सहमति जता दी. उस के बाद 22 अप्रैल, 2022 को दिव्या उर्फ अंजलि का विवाह देशदीपक के साथ धूमधाम से हो गया.

नईनवेली दुलहन बन कर अंजलि ससुराल पहुंची तो खुशियां पैर में घुंघरू बांध कर छमछम कर नाचने लगीं. अंजलि हृष्टपुष्ट स्मार्ट पति पा कर जहां खुश थी, वहीं देशदीपक भी खूबसूरत बीवी पा कर अपने भाग्य पर इतरा उठा था. शिवाला देवी व प्रमोद कुमार भी सभ्य, सुशील व पढ़ीलिखी बहू पा कर खुश थे.

ग्रामीण परिवेश में नईनवेली दुलहन को मर्यादाओं में रहना पड़ता है. जैसे बड़ों के सामने घूंघट डाल कर जाना. नजरें झुका कर धीमी आवाज में बातें करना. झुक कर पैर छूना तथा पति से सब के सामने न बतियाना आदि. अंजलि भी इन मर्यादाओं का पालन करती थी. रात में तो वह अपने कमरे में पति से खुल कर बतियाती थी, लेकिन दिन में उसे सावधानी बरतनी पड़ती थी.

लगभग एक महीने तक अंजलि अपने पति देशदीपक के साथ खूब मौजमस्ती से रही, लेकिन उस के बाद पति की छुट्टियां खत्म हुईं तो वह वापस चला गया. तब अंजलि का दिन तो कामकाज में कट जाता था, लेकिन रात काटे नहीं कटती थी. हालांकि वह दिनरात में कई बार मोबाइल फोन पर पति से बात करती थी और पूछती थी, ‘तुम कहां हो? खाना खाया कि नहीं? अपने कमरे पर हो या ड्यूटी पर?’ पति रूम पर होता तो वह वीडियो कालिंग कर उस से घंटों बतियाती और रस भरी बातें करती.

देशदीपक बिल्हौर थाने से 500 मीटर की दूरी पर ब्रह्मनगर मोहल्ले में रेस्टोरेंट संचालक रमेशचंद्र प्रजापति के मकान में किराए पर रहता था. वह अपनी नईनवेली पत्नी से बहुत प्यार करता था. वह जब रूम पर होता तो वीडियो कालिंग कर उस से खूब बतियाता था.

बातचीत के दौरान अंजलि भावुक होती तो वह कहता, ‘‘अरे पगली, तू रोती क्यों है. जैसे ही छुट्टी मिलेगी, मैं तेरे पास आ जाऊंगा. तू परेशान मत हो.’’

हर रोज की तरह पहली जून, 2022 को भी अंजलि ने दोपहर साढ़े 12 बजे पति से फोन पर बात की और पूछा कि खाना अभी खाया या नहीं. इस पर उस ने जवाब दिया कि वह खाना खाने होटल पर जा रहा है. पति से बातचीत करने के बाद अंजलि घरेलू काम में व्यस्त हो गई.

शाम 3 बजे जब अंजलि आराम करने कमरे में पहुंची तो उस ने फिर से पति को काल लगाई लेकिन इस बार देशदीपक ने काल रिसीव नहीं की. कुछ देर बाद अंजलि ने फिर काल की तो फोन बंद होने का संदेश मिला. अंजलि ने सोचा कि शायद वह खाना खा कर सो गए होंगे और फोन स्विच औफ कर लिया होगा.

पलंग पर लेटी अंजलि कुछ देर करवटें बदलती रही. लेकिन जब उसे सुकून नहीं मिला तो उस ने फिर से मोबाइल फोन पर पति से संपर्क करने का प्रयास किया. पर वह असफल रही. पति का मोबाइल फोन इस बार भी बंद मिला.

अंजलि समझदार भी थी और धैर्यवान भी. लेकिन जब उस का धैर्य जवाब दे गया तो वह अपनी सास के कमरे में जा पहुंची और बोली, ‘‘मम्मी, मैं उन को कई बार काल कर चुकी हूं, लेकिन उन का फोन बंद है. मेरा तो जी घबरा रहा है.’’

सास शिवाला देवी बहू के सिर पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘धैर्य रखो बहू. पुलिस की नौकरी है. कहीं व्यस्त होगा. फोन बंद कर लिया होगा. तुम अच्छा सोचो. बुरे खयाल मन में मत लाओ.’’

शिवाला देवी ने बहू को धैर्य तो बंधा दिया था, लेकिन वह स्वयं भी घबरा गई थीं. शाम 5 बजे जब पति प्रमोद कुमार घर आए तो उन्होंने सारी बात उन्हें बताई. इस पर प्रमोद कुमार ने तुरंत बेटे को काल लगाई. लेकिन उस का फोन बंद था. अंजलि भी काल पर काल कर रही थी. पर सफलता नहीं मिल रही थी.

अब तो ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था, त्योंत्यों घर के लोगों की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. रात 12 बजे तक प्रमोद कुमार 25-30 बार काल कर चुके थे. लेकिन हर बार एक ही संदेश मिल रहा था कि आप जिस नंबर से संपर्क करना चाहते हैं, वह स्विच्ड औफ या बंद है या फिर नेटवर्क एरिया से बाहर है.

प्रमोद कुमार के एक रिश्तेदार नीरज बाबू थे. वह बिल्हौर थाने में एसआई पद पर तैनात थे. सुबह 4 बजे उन्होंने नीरज बाबू के मोबाइल नंबर पर काल की. प्रमोद कुमार ने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘नीरज बाबू, कल दोपहर बाद से देशदीपक से उस के मोबाइल फोन पर बात नहीं हो पा रही है. उस का फोन बंद है. आप पता करो कि वह कमरे पर है या नहीं. हम सब को घबराहट हो रही है.’’

‘‘आप चिंता न करें. हम अभी कमरे पर जा कर उस का पता लगाते हैं,’’ नीरज बाबू ने कहा.

2 जून, 2022 की सुबह 5 बजे एसआई नीरज बाबू एक सिपाही के साथ ब्रह्मनगर स्थित देशदीपक के रूम पर पहुंचे तो उस के कमरे के बाहर ताला लटक रहा था और अंदर कमरे में पंखा चलने की आवाज सुनाई दे रही थी. सिपाही रामवीर ने खिड़की से झांक कर देखा तो उस के मुंह से चीख निकल गई.

चारपाई पर सिपाही देशदीपक का खून से तरबतर शव पड़ा था. नीरज बाबू ने तत्काल सिपाही देशदीपक की हत्या की खबर उस के पिता प्रमोद कुमार तथा पुलिस महकमे को दी.

सिपाही देशदीपक की हत्या की खबर से पुलिस महकमे में सनसनी फैल गई. सूचना पाते ही बिल्हौर के थानाप्रभारी अरविंद कुमार सिंह तथा एसएसआई आलोक तिवारी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पहुंच गए. उन के पहुंचने के कुछ देर बाद ही एसपी (आउटर) तेजस्वरूप सिंह, डीएसपी राजेश कुमार तथा एडीजी (कानपुर जोन) भानु भास्कर भी आ गए.