12 लाख के पैकेज वाले बाल चोर – भाग 1

19 जून, 2017 को मनोज चौधरी की बेटी की शादी थी. वह रीयल एस्टेट के एक बड़े कारोबारी हैं. गुड़गांव में उन का औफिस है. उन्होंने बेटी की शादी एक संभ्रांत परिवार में तय की थी. अपनी और वरपक्ष की हैसियत को देखते हुए उन्होंने शादी के लिए दक्षिणपश्चिम दिल्ली के बिजवासन स्थित आलीशान फार्महाउस ‘काम्या पैलेस’ बुक कराया था.

बेटी की शादी के 3 दिनों बाद ही उन के बेटे की भी शादी थी. बेटे की लगन का दिन भी 19 जून को ही था, इसलिए उस का कार्यक्रम भी उन्होंने वहीं रखा था.

मनोज चौधरी की राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक क्षेत्र के लोगों से अच्छी जानपहचान थी, इसलिए बेटे की लगन और बेटी की शादी में सैकड़ों लोग शामिल हुए थे. मेहमानों के लिए उन्होंने बहुत अच्छी व्यवस्था कर रखी थी. वह आने वाले मेहमानों का बड़ी ही गर्मजोशी से स्वागत कर रहे थे.

बारात के काम्या पैलेस में पहुंचने से पहले ही उन्होंने बेटे की लगन का कार्यक्रम निपटा दिया था. इस के बाद जैसे ही बारात पहुंची, मनोज चौधरी और उन के घर वालों ने धूमधाम से उस का स्वागत किया. रीतिरिवाज के अनुसार शादी की सभी रस्में पूरी होती रहीं. रात करीब पौने 12 बजे फेरे की रस्में चल रही थीं. उस समय तक बारात में आए ज्यादातर लोग सो चुके थे. ज्यादातर मेहमान खाना खा कर जा चुके थे.

फेरों के समय केवल कन्या और वरपक्ष के खासखास लोग ही मंडप में बैठे थे. मंडप के नीचे बैठा पंडित मंत्रोच्चारण करते हुए अपना काम कर रहा था. जितने लोग मंडप में बैठे थे, पंडित ने सभी की कलाइयों में कलावा बांधना शुरू किया. वहां बैठे मनोज चौधरी ने भी अपना दाहिना हाथ पंडित की ओर बढ़ा दिया. कलावा बंधवाने के बाद उन्होंने पंडित को दक्षिणा दी. तभी उन का ध्यान बगल में रखे सूटकेस की तरफ गया. सूटकेस गायब था.

सूटकेस गायब होने के बारे में जान कर मनोज चौधरी हडबड़ा गए. वह इधरउधर सूटकेस को तलाशने लगे, क्योंकि उस सूटकेस में 19 लाख रुपए नकद और ढेर सारे गहने थे.

कलावा बंधवाने में उन्हें मात्र 4 मिनट लगे थे और उतनी ही देर में किसी ने उन का सूटकेस उड़ा दिया था. परेशान मनोज चौधरी मंडप से बाहर आ कर सूटकेस तलाशने लगे. इस काम में उन के घर वाले भी उन का साथ दे रहे थे. सभी हैरान थे कि जब मंडप में दरजनों महिलाएं और पुरुष बैठे थे तो ऐसा कौन आदमी आ गया, जो सब की आंखों में धूल झोंक कर सूटकेस उड़ा ले गया.

बहरहाल, वहां अफरातफरी जैसा माहौल बन गया. जब उन का सूटकेस नहीं मिला तो उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना देने के साथ लैपटौप से औनलाइन रिपोर्ट दर्ज करा दी. कुछ ही देर में पीसीआर की गाड़ी वहां पहुुंच गई. पुलिस कंट्रोल रूम से मिली सूचना के बाद थाना कापसहेड़ा से भी पुलिस काम्या पैलेस पहुंच गई. मनोज चौधरी ने पूरी बात पुलिस को बता दी.

चूंकि मामला एक अमीर परिवार का था, इसलिए पुलिस अगले दिन से गंभीर हो गई. दक्षिणपश्चिम जिले के डीसीपी सुरेंद्र कुमार ने थाना कापसहेड़ा पुलिस के साथ एंटी रौबरी सेल को भी लगा दिया. उन्होंने औपरेशन सेल के एसीपी राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर सतीश कुमार, सुबीर ओजस्वी, एसआई अरविंद कुमार, प्रदीप, एएसआई राजेश, महेंद्र यादव, राजेंद्र, हैडकांस्टेबल बृजलाल, उमेश कुमार, विक्रम, कांस्टेबल सुधीर, राजेंद्र आदि को शामिल किया गया.

पुलिस ने सब से पहले फार्महाउस काम्या पैलेस में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इन में एक फुटेज में एक छोटा बच्चा मनोज चौधरी के पास से सूटकेस उठा कर बाहर गेट की ओर ले जाता दिखाई दिया. इस के कुछ सैकेंड बाद दूसरा बच्चा भी उस के पीछेपीछे जा रहा था. उस के बाद काले रंग की टीशर्ट पहने एक अन्य लड़का सीट से उठ कर उन दोनों के पीछे जाता दिखाई दिया. सभी फुरती से बाहरी गेट की तरफ जाते दिखाई दिए थे.

पुलिस ने उन तीनों बच्चों के बारे में मनोज चौधरी और उन के घर वालों से पूछा. सभी ने बताया कि ये तीनों लड़के उन के परिवार के नहीं थे. ये शाम 8 बजे के करीब काम्या पैलेस में आए थे. कार्यक्रम में ये बहुत ही बढ़चढ़ कर भाग ले रहे थे. डीजे पर भी ये ऐसे नाच रहे थे, जैसे शादी इन के परिवार में हो रही है. जब ये परिवार की लड़कियों और महिलाओं के डीजे पर जाने के बावजूद भी वहां से नहीं हटे तो परिवार के एक आदमी ने इन से डीजे से उतरने के लिए कहा था.

मनोज ने पुलिस को बताया कि छोटा वाला बच्चा महिलाओं के कमरे के पास भी देखा गया था. वह समझ रहे थे कि ये बच्चे शायद किसी मेहमान के साथ आए होंगे. बहरहाल, उन्होंने उन की तरफ कोई खास ध्यान नहीं दिया था और उसी बच्चे ने उन का सूटकेस साफ कर दिया था. उन के कार्यक्रम में जो फोटोग्राफर और वीडियोग्राफर थे, उन के द्वारा खींचे गए फोटो में भी वे बच्चे दिखाई दिए थे.

पुलिस टीम ने उन्हीं फोटो की मदद से सूटकेस चोरों का पता लगाना शुरू किया. पुलिस ने वे फोटो अलगअलग लोगों को दिखाए. उन फोटो को पहचान तो कोई नहीं सका, पर कुछ लोगों ने यह जरूर बता दिया कि ये बच्चे मध्य प्रदेश के हो सकते हैं.

एटीएम कार्ड की क्लोनिंग, विदेशी ठगों का मायाजाल

इसी 25 फरवरी की बात है, दोपहर का समय था. जयपुर के महेशनगर पुलिस थाने में ड्यूटी अफसर अपनी सीट पर बैठे थे, तभी करीब 22-24 साल का एक युवक थाने पहुंचा. वह सीधा ड्यूटी अफसर के पास पहुंचा और अपना परिचय दे कर बोला, ‘‘सर, मेरा नाम महेशराज मीणा है और मैं महेशनगर में रहता हूं.’’

‘‘बताइए, थाने कैसे आना हुआ?’’ ड्यूटी अफसर ने पूछा.

‘‘साहब, मेरे बैंक खाते से 15 हजार रुपए निकाल लिए गए, जबकि एटीएम कार्ड मेरे पास है.’’ महेशराज ने घबराए लहजे में कहा, ‘‘साहब, मेरे मोबाइल पर ट्रांजैक्शन का मैसेज आया, तब पता चला कि मेरे खाते से पैसे निकल गए हैं.’’

ड्यूटी अफसर ने महेशराज को कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारे पास मैसेज कब आया?’’

‘‘साहब, मैसेज तो आज ही आया है.’’ महेशराज ने कहा, ‘‘आश्चर्य की बात यह है कि आज मैं किसी एटीएम से पैसे निकालने भी नहीं गया, फिर भी मेरे एकाउंट से 15 हजार रुपए निकल गए.’’

ड्यूटी अफसर महेशराज से उस के खाते से पैसे निकलने के बारे में जानकारी ले रहे थे, इसी दौरान 2-3 और लोग थाने पहुंच गए. ड्यूटी अफसर ने उन लोगों के आने का कारण पूछा तो पता चला महेश की तरह उन के एकाउंट से भी पैसे निकल गए हैं.

थाने पहुंचे दिनेश कुमार ने बताया कि उस के खाते से 20 हजार रुपए निकाल लिए गए हैं. चंद्रलता नवल ने 40 हजार रुपए निकलने की बात बताई. अर्जुन अग्रवाल के खाते से भी 30 हजार रुपए निकाले गए थे.

ड्यूटी अफसर इन लोगों से बातचीत कर ही रहे थे कि 2 लोग और थाने पहुंच गए. इन में कमलेश कुमारी मीणा ने बताया कि उस के खाते से 10 हजार रुपए निकाले गए हैं जबकि प्रदीप ने 20 हजार रुपए निकलने की बात कही. इस तरह उस दिन 3-4 घंटे में ही 10-11 लोग इस तरह की शिकायत ले कर थाने पहुंचे कि उन के खाते से बिना एटीएम कार्ड के रकम निकाल ली गई. ड्यूटी अफसर ने इन लोगों से अलगअलग बात कर के तह में जाने की कोशिश की तो पता चला कि इन लोगों के खाते से रकम दिल्ली में निकाली गई थी.

यह बात भी सामने आई कि ये सभी ट्रांजैक्शन उस दिन दोपहर 1 से 2 बजे के बीच हुए थे. पीडि़त लोगों ने पुलिस को बताया कि उन्होंने कुछ दिनों पहले महेशनगर फाटक और 80 फुटा रोड पर लगे 3 एटीएम से पैसे निकाले थे. इस के बाद एटीएम से कोई ट्रांजैक्शन नहीं किया था.

ड्यूटी अफसर को मामला गंभीर लगा. उन्होंने थानाप्रभारी जयसिंह और अपने उच्चाधिकारियों को इस तरह के मामले होने की सूचना दी. इसी के साथ पुलिस ने सभी पीडि़तों से लिखित में रिपोर्ट ले ली. पुलिस ने इन लोगों को जल्द से जल्द अपने एटीएम कार्ड ब्लौक करवाने की भी हिदायत दी, ताकि उन के खाते से और रकम न निकाली जा सके.

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उस दिन शाम तक 10 ऐसे पीडि़तों ने महेशनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई. इन लोगों के खातों से करीब ढाई लाख रुपए निकाले गए थे. इस में 3 हजार रुपए से ले कर 40 हजार रुपए तक की रकम शामिल थी. इन पीडि़तों में 2 बैंक कर्मचारी भी शामिल थे. भारतीय स्टेट बैंक में सहायक चेतराम मीणा के खाते से दिल्ली में आईसीआईसीआई बैंक के एटीएम से 30 हजार रुपए निकाल लिए गए थे. बैंक कर्मचारी अतेंद्र मीणा के खाते से भी 30 हजार रुपए निकाले गए थे.

जयपुर पुलिस कमिश्नरेट की क्राइम ब्रांच भी सक्रिय हो गई. महेशनगर थाना पुलिस और क्राइम ब्रांच ने पीडि़तों से बातचीत की तो यह बात साफ हो गई कि इन वारदातों को एटीएम कार्ड की क्लोनिंग कर के अंजाम दिया गया था. क्योंकि सारे पीडि़त जयपुर के थे. वे दिल्ली गए भी नहीं थे और दिल्ली के एटीएम से उन के खातों से पैसे निकाल लिए गए थे.

पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू भी नहीं की थी कि अगले दिन यानी 26 फरवरी को सुबह से ही महेशनगर थाने पर लोगों का जमावड़ा होने लगा. ये लोग भी अपने खाते से रकम निकाले जाने की शिकायत दर्ज कराने थाने पहुंचे थे. उस दिन शाम तक 28 पीडि़त और सामने आ गए. इन में राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला के वैज्ञानिक सुशील शर्मा के खाते से 3 बार में 10-10 हजार रुपए निकाले गए थे. चार्टर्ड एकाउंटेंट गजेंद्र शर्मा ने पुलिस को बताया कि उन्होंने 21 फरवरी को जयपुर के किशनपोल बाजार स्थित पीएनबी के एटीएम से 5 हजार रुपए निकाले थे. इस के 3 घंटे बाद ही उन के खाते से 10,500 रुपए निकालने का मैसेज आ गया.

सीए गजेंद्र शर्मा के भाई देवेंद्र शर्मा के खाते से 4 बार में 38 हजार रुपए निकाल लिए गए थे. इन के अलावा मीना कंवर के खाते से 16 हजार, देवेंद्र सिंह के खाते से 25 हजार, चंद्रप्रकाश शर्मा के खाते से 40 हजार, रामप्रताप शर्मा के खाते से 30 हजार, सरमया थौमस के खाते से 40 हजार, मयंक गौड़ के खाते से 18,500, चुन्नीलाल गुप्ता के खाते से 40 हजार रुपए निकाले गए.

इस के अलावा सुशीला तंवर के खाते से 40 हजार, सुशील कुमार राज के खाते से 30 हजार, सुशीला राठौड़ के खाते से 5 हजार, अजय कुमार के खाते से 2 हजार, योगेंद्र कुमार के खाते से 26500, दुर्गेश दवे के खाते से 5 हजार, लख्मीचंद के खाते से 40 हजार, राखी सिंह के खाते से 30 हजार, ललतेश सिंह के खाते से 70 हजार और रामअवतार बुनकर के खाते से 40 हजार रुपए सहित अन्य कई लोगों के खातों से भी पैसे निकाले गए थे.

2 दिन में 38 लोगों के बैंक खातों से रकम निकाले जाने से पुलिस भी हैरान थी. पुलिस ने जांच शुरू की तो सामने आया कि बदमाशों ने महेशनगर में 80 फुटा रोड पर एसबीआई, पीएनबी और इंडसइंड बैंक के एटीएम में स्किमर लगाए थे. ये स्किमर 24 फरवरी तक लगे हुए थे, क्योंकि उन्हीं एटीएम कार्ड धारकों के पैसे निकाले गए, जिन्होंने एक सप्ताह के भीतर इन एटीएम से ट्रांजैक्शन किया था. इन से डाटा चोरी कर 2 दिन में करीब 40 लोगों के खातों से 7 लाख रुपए से ज्यादा निकाल लिए गए थे. जांच में पता चला कि बदमाशों ने क्लोन कार्ड से दिल्ली में जनकपुरी व पालम इलाके में रकम निकाली थी.

पुलिस ने उन तीनों एटीएम के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज बैंक प्रबंधकों से मांगी. इस के अलावा सभी पीडि़तों से उन के एटीएम कार्ड के पासवर्ड बदलने को भी कहा. पीडि़तों के संबंधित बैंक खातों का स्टेटमेंट, उन्होंने 2 महीने में किसकिस एटीएम से पैसे निकाले थे, आदि की जानकारी एकत्र की. बदमाशों ने दिल्ली में जिसजिस एटीएम से रकम निकाली, उन की वीडियो फुटेज हासिल करने के लिए एक टीम दिल्ली भेजने का निर्णय लिया गया.

लगातार पीडि़तों के सामने आने से यह संख्या बढ़ती जा रही थी. करीब एक सप्ताह में ही जयपुर के महेशनगर, जवाहर सर्किल, बजाजनगर व ज्योतिनगर पुलिस थाने में इस तरह की वारदात के 88 मामले दर्ज हो गए. इन में पीडि़तों से 27 लाख 32 हजार रुपए से ज्यादा की धोखाधड़ी की गई थी.

जयपुर काफी समय से साइबर ठगों के निशाने पर रहा है. दिल्ली, नोएडा, झारखंड व छत्तीसगढ़ के ठग आए दिन बैंक अधिकारी या बीमा अधिकारी बन कर अथवा अन्य कोई प्रलोभन दे कर लोगों के बैंक खातों से ठगी करते रहे हैं.

नोटबंदी के बाद कैशलेस का प्रचलन बढ़ने से साइबर ठगों को अपना शिकार ढूंढने में आसानी हो गई है. जयपुर कमिश्नरेट में सन 2011 में साइबर क्राइम के केवल 88 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2012 में यह संख्या घट कर 74 रह गई. इस के बाद 2013 में साइबर क्राइम के 123, सन 2014 में 373, सन 2015 में 574, सन 2016 में 531 और 2017 में 643 मामले दर्ज हुए.

अब साइबर क्राइम का नया रूप सामने आ गया था. एटीएम कार्ड की क्लोनिंग के जरिए फरजी एटीएम कार्ड तैयार कर के इतनी बड़ी संख्या में लोगों से धोखाधड़ी के सामने आने पर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल चिंतित हो उठे. उन्होंने अपने मातहत अधिकारियों की बैठक बुलाई और बदमाशों का जल्द से जल्द पता लगाने को कहा.

कमिश्नर अग्रवाल ने अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (प्रथम) प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन और पुलिस उपायुक्त (अपराध) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में एक टीम गठित की. इस टीम में क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर मुकेश चौधरी, महेश नगर थानाप्रभारी जय सिंह, महेश नगर थाने के सबइंसपेक्टर सुनील, क्राइम ब्रांच के सबइंसपेक्टर धर्म सिंह और मनोज कुमार के साथ कई कांस्टेबलों को शामिल किया गया.

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पुलिस टीम ने संबंधित बैंकों से रिकौर्ड हासिल किया. एटीएम बूथों की सीसीटीवी फुटेज जांची. आवश्यक तकनीकी जांचपड़ताल के बाद एक टीम दिल्ली भेजी गई. इस के अलावा पुलिस ने देश भर में ऐसे गिरोहों की जानकारी जुटाई, जो एटीएम कार्ड की क्लोनिंग के अपराध से जुड़े रहे हैं.

इस में पता चला कि एक गिरोह के बदमाशों ने पिछले साल देहरादून में एटीएम कार्ड के क्लोन बना कर जयपुर से रुपए निकाले थे. इस मामले में देहरादून एसटीएफ ने गिरोह के मास्टरमाइंड रामवीर को सितंबर 2017 में पुणे से गिरफ्तार किया था. रामवीर हरियाणा के बहादुरगढ़ का रहने वाला था. इस गिरोह में महिलाएं भी थीं.

उधर जयपुर से दिल्ली गई पुलिस टीम ने उन एटीएम की वीडियो फुटेज हासिल की, जिन से जयपुर के लोगों के एटीएम कार्ड की क्लोनिंग कर के रकम निकाली गई थी. इन फुटेज के आधार पर पुलिस ने 7 मार्च को दिल्ली से 3 विदेशी साइबर ठगों को पकड़ लिया.

इन में रोमानिया के काटनेस्कू, डुयिका बोगडन निकोलेई और सियोबानू शामिल थे. ये तीनों पर्यटक वीजा पर दिल्ली आए थे और वापस रोमानिया जाने की तैयारी में थे.

दरअसल, पुलिस को जयपुर में एटीएम की वीडियो फुटेज में हेलमेट पहने लोग स्किमर लगाते नजर आए थे. इन फुटेज में उन के चेहरे नहीं दिख रहे थे. हां, शरीर का अंदाजा हो रहा था. दिल्ली में पुलिस ने जो वीडियो फुटेज हासिल किए, उन में इन के चेहरे साफ दिखाई दिए. चेहरों से पता चला कि ये बदमाश विदेशी हैं. इस पर पुलिस ने वीजा खंगाले तो फोटो और वीडियो फुटेज से इन का मिलान हो गया. इस के बाद पुलिस ने इन लोगों को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने इन तीनों विदेशी साइबर ठगों से करीब 53 लाख 50 हजार रुपए नकदी के अलावा क्लोनशुदा विभिन्न बैंकों के 5 एटीएम कार्ड, एक मल्टीपरपज कार्ड रीडर, एक हौटस्पौट, एक स्पाई कैमरा, एक माइक्रो चिप, एक लैपटौप, 4 काले रंग के मास्क, एक कैप, 2 पासपोर्ट व आईडी, 4 मोबाइल फोन आदि बरामद किए.

इन विदेशी ठगों से पूछताछ में पुलिस को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा, क्योंकि ये केवल टूटीफूटी अंगरेजी बोलते थे. सख्ती करने पर ‘आई डोंट नो आई डोंट नो’ कह कर चुप हो जाते थे.

  पुलिस की पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है—

रोमानिया के रहने वाले काटनेस्कू, डुयिका बोगडन निकोलेई और सियोबानू अलगअलग समय पर दिल्ली आए थे. सब से पहले डुयिका बोगडन निकोलेई सितंबर में दिल्ली आया. इस के बाद काटनेस्कू दिसंबर में और बाद में सियोबानू दिल्ली पहुंचा. इन्होंने दिल्ली में ग्रेटर कैलाश में 7 हजार रुपए महीने के किराए पर एक फ्लैट लिया. दिल्ली में इन के साथ एक महिला मित्र भी थी. दिल्ली में इन्होंने तुर्की के बदमाशों से स्किमिंग डिवाइस खरीदी थी. दिल्ली से ये लोग कई दूसरे शहरों में भी वारदात करने के लिए गए. बीच में डुयिका बोगडन निकोलेई करीब एक महीने तक मुंबई और 3 सप्ताह तक आगरा में ठहरा. तीनों साथी दिल्ली में कुछ दिन रुके. फिर महिला मित्र को छोड़ कर ये जयपुर आ गए.

जयपुर में त्रिवेणीनगर में इन्होंने इंटरनेट पर बुकिंग करा कर 22 हजार रुपए महीने के किराए पर एक अपार्टमेंट में फ्लैट लिया. मकान मालिक ने सीआईडी के लिए सी फार्म पर इस की औनलाइन जानकारी दी थी. जयपुर में घूमने के लिए इन्होंने एमआई रोड से 300 रुपए प्रतिदिन किराए पर 2 एक्टिवा स्कूटी लीं.

जयपुर में घूम कर इन्होंने एटीएम बूथों को चिह्नित किया. चिह्नित किए गए एटीएम बूथों पर अलसुबह जा कर इन्होंने स्किमर और कैमरे लगा दिए. एटीएम मशीन पर जहां कार्ड स्वाइप किया जाता है, वहां इन्होंने एक चिप लगाई और जहां पर पिन नंबर लिया जाता है, उस जगह के ऊपर माइक्रो कैमरे फिट किए. इन बदमाशों ने एटीएम बूथ पर स्किमर व कैमरे लगाते समय अपने चेहरों पर हेलमेट लगा रखे थे. इस से इन के चेहरे वीडियो फुटेज में नजर नहीं आए.

जब कोई उपभोक्ता एटीएम बूथ में एटीएम कार्ड को स्वाइप करता तो चिप उसे पढ़ लेती थी और उस कार्ड की सारी जानकारी चिप में चली जाती थी. जब रुपए निकालने के लिए पिन नंबर डाला जाता था तो पासवर्ड वाली जगह के ऊपर लगे माइक्रो कैमरे से ठगों को उस एटीएम कार्ड का पिन नंबर पता चल जाता था. बाद में वे एटीएम कार्ड का क्लोन बना कर दूसरी जगह के किसी एटीएम से रकम निकाल लेते थे.

इन ठगों ने फरवरी के पहले सप्ताह में जयपुर में महेशनगर, जवाहर सर्किल, बजाज नगर और ज्योतिनगर में 8 एटीएम बूथों पर स्किमर और माइक्रो कैमरे लगाए थे. 20 फरवरी के आसपास ये लोग जयपुर में एटीएम बूथों पर लगाए स्किमर व माइक्रो कैमरे निकाल कर दिली चले गए.

दिल्ली में इन्होंने स्किमर व माइक्रो कैमरे से डाटा निकाल कर एटीएम कार्ड की क्लोनिंग की. इस के बाद विभिन्न स्थानों पर अलगअलग बैंकों के एटीएम से उन फरजी एटीएम कार्ड के जरिए लोगों के बैंक खातों से रकम निकाल ली.

इन साइबर ठगों ने पूछताछ में बताया कि वे 12 मार्च को रोमानिया जाने वाले थे. इस से पहले वे बैंक खातों से फरजीवाड़े से निकाली गई 50 लाख रुपए से ज्यादा की रकम को बिटकौइन में बदलनी थी, ताकि दिल्ली एयरपोर्ट पर इतनी बड़ी रकम के साथ न पकड़े जाएं. इन्होंने यूरोप समेत 6 देशों में कार्ड क्लोनिंग कर लोगों के बैंक खातों से रकम निकालने की बात बताई. भारत में इन्होंने जयपुर के अलावा आगरा व मुंबई में वारदात करने की बात भी कही है. पुलिस इन मामलों की पुष्टि करने में जुटी है.

गिरफ्तार सियोबानू के खिलाफ रोमानिया में हत्या समेत कई आपराधिक मामले दर्ज हैं. जयपुर पुलिस ने रोमानिया के दूतावास को ये सारी जानकारियां दे कर तीनों आरोपियों का आपराधिक ब्यौरा भी मंगाया गया है.

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गिरफ्तारी के बाद रिमांड अवधि के दौरान इन तीनों विदेशी साइबर ठगों से जयपुर के अशोक नगर में पूछताछ की जा रही थी. इस बीच एक दिन आरोपी डुयिका बोगडन निकोलेई ने पुलिस की मौजूदगी में थाने से भागने का प्रयास किया. हालांकि पुलिस ने उसे तुरंत दबोच लिया. इस संबंध में अशोक नगर थाने के रोजनामचे में रपट लिखी गई.

इन ठगों से बरामद 53 लाख रुपए में से करीब 28 लाख रुपए की ठगी के मामले जयपुर के विभिन्न थानों में दर्ज हैं. जयपुर पुलिस ने आगरा व मुंबई पुलिस से इस तरह की ठगी के मामलों की जानकारी मांगी थी, लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला. अगर जल्दी ही किसी राज्य की पुलिस ने कोई दावा नहीं किया तो बाकी के 25 लाख रुपए की राशि अदालत से आदेश ले कर सरकारी खजाने में जमा कराई जाएगी.

हालांकि जयपुर पुलिस ने साइबर ठगों को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल कर ली, लेकिन देश भर में ऐसे पचासों गिरोह सक्रिय हैं, जो रोजाना किसी न किसी तरीके से लोगों के बैंक खातों से पैसे निकाल रहे हैं. ऐसे मामलों में उपभोक्ताओं को ज्यादा सतर्क रहने की आवश्यकता है.

भारत में एटीएम कार्ड क्लोनिंग के अभी बहुत कम मामले सामने आए हैं. चिंता की बात यह है कि ऐसे गिरोह से महिलाएं भी जुड़ी हुई हैं. पिछले साल देहरादून में 97 लोगों के एटीएम क्लोनिंग के आरोप में पकड़े गए साइबर ठगों के गिरोह में हरियाणा के सोनीपत की अनिल कुमारी भी शामिल थी. इस गिरोह ने जयपुर में रकम निकाली थी. जयपुर पुलिस द्वारा पकड़े गए विदेशी साइबर ठगों के साथ भी उन की महिला मित्र थी. हालांकि अभी उस महिला की आपराधिक संलिप्तता सामने नहीं आई है. फिर भी पुलिस उस की तलाश कर रही है.

साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक क्रैडिट व डेबिट कार्ड पर एक चुंबकीय पट्टी होती है, जिस में खाताधारक और उस के खाते की डिटेल की कोडिंग होती है. इस मैगनेट टेप से डाटा कौपी करने की प्रक्रिया को स्किमिंग कहते हैं.

इस के लिए इलैक्ट्रौनिक डिवाइस स्किमर लगा कर चुंबकीय पट्टी में दर्ज जानकारी कौपी हो जाती है. इस से एटीएम कार्ड का क्लोन तैयार किया जाता है.

रिजर्व बैंक ने पिछले साल जुलाई में औनलाइन बैंकिंग लेनदेन में ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी से संबंधित नियमों में बदलाव किया था. इस के मुताबिक कार्ड क्लोनिंग से संबंधित मामलों में बैंक नुकसान की भरपाई करने के लिए जिम्मेदार है.

कार्ड क्लोनिंग का पता चलने पर होम ब्रांच को सूचना दे कर 3 दिन में पुलिस में एफआईआर दर्ज कराएं. बैंक में स्टैंडर्ड औपरेटिंग प्रोसीजर फौर्म भरें. इस फौर्म पर बैंक की कमेटी नुकसान की भरपाई का फैसला लेगी. औनलाइन फ्रौड से बचने के लिए बीमा भी करा सकते हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अंधविश्वास का अंधेरा : समाज क्यों इनसे घिरता जा रहा है

जून की दहकती दोपहर का दहला देने वाला दृश्य था. बीहड़ सरीखे सघन जंगल के बीच बने विशाल मंदिर के बाहर लंबेचौड़े दालान में एकत्र सैकड़ों स्त्रीपुरुषों की भीड़ टकटकी लगाए उस लोमहर्षक मंजर को देख रही थी. सुर्ख अंगारों की तरह दहकती आंखों और शराब के नशे में धुत अघोरी जैसे लगने वाले 2 भोपे (ओझा) बेरहमी के साथ 4 युवतियों की जूतों से पिटाई कर रहे थे.

अंगारे सी बरसती धूप की चुभन और दर्द से बेहाल युवतियां चीखतीचिल्लाती तपते आंगन में लोटपोट हुई जा रही थीं. धूप से बचने के लिए तमाशाई आंगन के ओसारों की छाया में सरक आए थे. जिस निर्विकार भाव से लोग इस जल्लादी जुल्म का नजारा देख रहे थे, उस से लगता था कि यह सब उन के लिए नया नहीं था.

लगभग एक घंटे तक अनवरत चलने वाली इस दरिंदगी से युवतियां बुरी तरह लस्तपस्त और निढाल हो चुकी थीं. उन पर गुर्राते और गंदी गालियों की बौछार करते भोपे उन्हें बालों से घसीटते हुए फिर से खड़ा करने की मशक्कत में जुट गए.

नारकीय यातना का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा, अब उन्हें पीठ के बल रेंगतेघिसटते मंदिर की तपती सुलगती 200 सीढि़यां तय करनी थी.

जल्लादी जुल्म ढाने वाले आतताइयों को भी मात करने वाले इन दरिंदों की चाबुक सरीखी फटकार के आगे बेबस युवतियों ने यह काम भी किया. तब तक उन के कपड़े तारतार हो चुके थे, पीठ और कोहनियां छिलने के साथ बुरी तरह लहूलुहान हो गई थीं. हांफती, कराहती, बिलखती युवतियों पर कहर अभी थमा नहीं था.

यातना का दुष्चक्र उन्हें मारे जाने वाले जूतों के साथ आगे बढ़ता रहा. पांव उठाने तक में असमर्थ इन युवतियों को जूते सिर पर रख कर और मुंह में दबा कर 2 किलोमीटर नंगे पांव चलते देखना तो और भी भयावह था. और इस से भी कहीं ज्यादा दर्दनाक और दयनीय दृश्य था, उन जूतों में भर कर पीया जाने वाला जलकुंड का गंदा पानी.

आतंक और भय से थर्राई हुई युवतियों को जूतों में भर कर पानी पिलाया जाने वाला पानी कैसा था, इस की कल्पना मात्र ही विचलित करने वाली थी. बांक्याराणी मंदिर परिसर में ही बना है हनुमान मंदिर. इस के निकट बने जलकुंड में दिन भर में लगभग 300 से ज्यादा महिलाएं स्नान करती हैं.

समझा जा सकता है कि कुंड का पानी कितना मैला रहा होगा. इसी गंदे पानी को युवतियों को जूतों में भर कर पीने को बाध्य किया गया और वह भी एक बार नहीं लगातार 7 बार.

मंदिर की जिन सीढि़यों पर महिलाओं को पीठ के बल रेंग कर उतरना होता है, वह सफेद संगमरमर की है, जो गर्मियों में भट्ठी की तरह सुलगती हैं. नतीजतन औरतों की पीठ न केवल छिल जाती है, बल्कि उस पर फफोले भी पड़ जाते हैं.

जुल्म की इंतहा तो तब होती है, जब सीढि़यां उतर चुकने के बाद भोपा उन्हें अपने सामने ज्वाला मंदिर में बिठाता है और लहूलुहान और निढाल युवतियों पर एक बार फिर जूते बरसाता है. पीड़ा से रोतीबिलखती युवतियों की दहला देने वाली चीखपुकार जब वहां मौजूद उन के परिजन ही नहीं सुनते तो और कौन सुनेगा?

भोपों के रूप में अंधविश्वास का क्रूर चेहरा

राजस्थान में अंधविश्वास का यह वीभत्स और क्रूर चेहरा सिर्फ भीलवाड़ा जिले के बांक्याराणी मंदिर का ही नहीं है, बल्कि राजसमंद, बांसवाड़ा और चित्तौड़गढ़ भी महिलाओं को डायन घोषित कर के उन के कथित निवारण के नाम पर असहनीय अत्याचार के अड्डे बन गए हैं.

अंधविश्वास की वजह से किसी को डायन बता कर भयानक यातनाएं देना और मार डालना सिद्ध करता है कि राजस्थान के पूर्वोत्तर समाज का एक बड़ा हिस्सा आदिम युग में जी रहा है.

इस सूबे का आदिवासी समुदाय आज भी आधुनिकता और बर्बरता के बीच असहज अस्तित्व में फंसा हुआ है. आदिवासी बहुल इलाकों में स्त्रियों को डायन घोषित कर उन्हें प्रताडि़त करना, यहां तक कि मार डालना सदियों पुराना चलन है.

प्रेत निवारण की परंपरा का मूल स्वरूप क्या था और उस की शुरुआत कैसे हुई? यह जानने के लिए हमें राजस्थान के आदिवासी बहुल बांसवाड़ा के गांवों में अपने दिवंगत पूर्वजों के नाम पर पत्थर गाड़ने की परंपरा को जानना होगा, जिसे ‘चीरा’ कहा जाता है. गाजेबाजे के साथ गाड़े गए ‘चीरे’ पर लोकदेवता की तसवीर उकेरी जाती है और विधिवत परिवार के पूर्वज का नाम अंकित किया जाता है.

ये चीरे आमतौर पर खुली जगहों में होते हैं, लेकिन कहींकहीं टापरों में स्थापित किए जाते हैं. चीरे मृत स्त्रियों के नाम पर भी गाड़े जाते हैं, लेकिन बहुत कम. इन को ‘मातोर’ कह कर पूजा जाता है. ऐसे कई शिलाखंडों पर तो साल, नाम आदि भी खुदे होते हैं. जिस गांव में चीरा स्थापित किया जाना होता है, उस स्थान पर गांव की कुंवारी कन्या दूध, जल आदि से ‘बावजी’ को स्नान कराती है और कुमकुम आदि से पूजा करती है.

संभवत: ‘बावजी’ शब्द लोक देवता के लिए इस्तेमाल किया जाता है. गांव के बाहर निर्धारित स्थल ‘गोदरा’, जहां चीरे स्थापित किए जाने होते हैं, उस जगह के जानकार को खत्री कहा जाता है. खत्री चीरे के भूतवंश की पूरी जानकारी कवितामय लहजे में सुनाता है. शिलाखंडों में कथित रूप से रह रही आत्मा के आह्वान की अलग प्रक्रिया है.

खत्री ही मृतात्माओं से संवाद स्थापित करता है. उस समय खत्री के हावभाव और बोली असामान्य हो जाती है, फिर शुरू होता है भविष्य कथन और कष्ट निवारण का क्रम. मृतात्मा, जिसे खाखरिया देव माना जाता है, खत्री उस का इन शब्दों के साथ आह्वान करता है, ‘कूंकड़ो बोल्यो, नेकालू साल्यो, कालू देवती, सोनावाला ने भला, वैसे हैं भाई कारूदेव, जोड़ी रा हुंकार है…’

इस अवसर पर निकट बैठे भोपों द्वारा कांसे की थाली और ढोलमजीरों से विशेष तरह का संगीत पैदा किया जाता है, जिस की सम्मिलित ध्वनि वातावरण को अजीब माहौल में बदल देती है. आदिवासियों की प्रचलित परंपराओं को समझें तो इन देवरों के भोपे अपनी जानकारी के मुताबिक लोगों की समस्याओं के निवारण के लिए विशेष गणित का सहारा लेते हैं. यही है आदिवासियों की अपने पुरखों को ‘देव स्वरूप’ में सम्मानित करने की परंपरा.

लेकिन अब ये सारी परंपराएं नष्ट हो चुकी हैं और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों ने भोपों का रूप धारण कर नशे के उन्माद में लूटखसोट और यौनाचार को अपना कारोबार बना लिया है. अन्यथा आदिवासियों में चीरा प्रथा व्याधियों का उपचार करने, समस्याओं का निवारण करने और पूर्वजों की मृत आत्माओं का आह्वान करने की है.

बावजी आदिवासियों के लोकदेवता को कहा जाता है. कुछ अरसा पहले बांसवाड़ा के पड़ारिया गांव में तैनात एक शिक्षक ने चीरे की परंपरा को वृक्षारोपण से जोड़ दिया था, लेकिन यह सब तभी तक चला, जब तक शिक्षक का दूसरी जगह स्थानांतरण नहीं हो गया. चीरों के निकट काफी संख्या में दरख्त बन चुके फलदार पेड़ इस बात की तसदीक करते हैं. दूसरी ओर सरकार ने यहां कुछ भी संवारने की पहल तक नहीं की.

डायन के नाम पर मौत का नंगा नाच

आदिवासी जिलों में अब तक 105 स्त्रियों को डायन का बाना पहना कर अभिशप्त घोषित किया जा चुका है, जबकि 8 महिलाओं की पीटपीट कर हत्या की जा चुकी है. साथ ही 2 दरजन महिलाओं को मारपीट कर गांवों से निकाला जा चुका है.

स्वस्थ महिलाओं को डायन बनाने के ये आंकड़े पिछले 4 साल के हैं, लेकिन क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े 4 तक भी नहीं पहुंचते. काला जादू के नाम पर भोपे आज भी आदिवासी इलाकों में अपना सिक्का जमाए हुए हैं. आस्था यहां अकसर बदला लेने का हथियार बन चुकी है.

प्रेतों से मुक्ति पाने की कहानी जहां से शुरू होती है, उसे देखना ही दहशत पैदा करता है. पीडि़त महिलाओं के परिजन ही मंदिर पहुंच कर उन्हें भोपों के हवाले कर देते हैं. भोपा इन्हें उलटे पांवों चला कर मंदिर परिसर में ले आता है. महिला को पीठ मंदिर की तरफ रखनी होती है तथा हथेलियों को प्रणाम की मुद्रा में रखना होता है.

महिला को सुलगती जमीन पर नंगे पांव चलना होता है. भोपों के बारे में कहा जाता है कि निर्दयता और दुर्दांतता में इन का कोई सानी नहीं होता. अपने जल्लादी काम में ये प्रोफेशनल की तरह पारंगत होते हैं. इन की फीस कोई निश्चित नहीं होती, हालांकि 5 सौ से हजार रुपए में ये अपनी सेवाएं उपलब्ध कराते हैं. इन भोपों को नकदी के साथ दारू भी देनी होती है, अपना काम ये नशे में धुत्त हो कर ही करते हैं. भोपों के कारोबार में मर्द और औरतें दोनों शामिल होते हैं.

बांक्याराणी मंदिर एक ट्रस्ट के अधीन है, लेकिन इस वीभत्स कारोबार में ट्रस्ट के अध्यक्ष की कोई भूमिका नहीं होती. अलबत्ता ट्रस्ट के अध्यक्ष नारायणलाल गुर्जर की मजबूरी चौंकाती है. उन का कहना है, ‘भोपों की मनमानी मंदिर ट्रस्ट के लिए मुसीबत बनी हुई है.’

नारायणलाल कहते हैं, ‘महिलाओं को इतनी दारूण यातना देना पूरी तरह अमानवीय और शैतानी कृत्य है. ट्रस्ट पूरी तरह इस के खिलाफ है. लेकिन फिर भी ये लोग डराधमका कर मनमानी पर उतारू हैं.’

बांक्याराणी मंदिर में प्रेत बाधा निवरण के नाम पर स्त्रियों के भयावह उत्पीड़न की खबरें मीडिया में सुर्खियां बनीं तो राजस्थान महिला आयोग की अध्यक्ष सुमन शर्मा बांक्याराणी मंदिर पहुंचीं भी, लेकिन पुलिस अधिकारियों को फटकार लगाने के अलावा वह कुछ नहीं कर सकीं. भोपों की भयावह कारस्तानियों का खुलासा होने पर हाईकोर्ट ने संज्ञान ले कर पुलिस प्रशासन को फटकार लगाते हुए जवाब मांगा कि बताएं कितने भोपों पर काररवाई की गई.

हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ के न्यायाधीश गोपालकृष्ण व्यास ने इस बात पर हैरानी जताई कि महिलाओं को कोई डायन कैसे बता सकता है? कानून होने के बाद भी इस तरह के मामले क्यों हो रहे हैं?

विद्वान न्यायाधीश ने तो यहां तक कहा, ‘भोपे किसी महिला को डायन न बना पाएं और उन्हें प्रताडि़त न कर सकें, इस के लिए जागरुकता अभियान चलाया जाए.’ लेकिन हाईकोर्ट की इस हिदायत पर अमल नहीं हुआ.

नतीजतन भोपों के हौसले आज भी बुलंद हैं और महिलाएं आज भी जूते मुंह में दबाए उत्पीड़न का दर्द सहने को मजबूर हैं. घिनौनी आस्था के मल कुंड में डूबे लोगों का रूझान तब बुरी तरह चौंकाता है, जब नवरात्रों में भोपों के दरबार में लोगों की भीड़ का सैलाब उमड़ने लगता है.

हाईकोर्ट की सख्ती और पुलिस की दबिश का भोपों की मनमानी पर कोई असर तो क्या होता, इस के उलट वे और बेलगाम हो गए. अब तक प्रदेश के आदिवासी इलाकों में ही अंधविश्वास की परत मोटी करने वाले इन भोपों को फिल्म ‘पद्मावत’ विवाद से उफान में आए चेतन मृत्यु प्रकरण ने शहरी इलाकों में घुसपैठ करने का अवसर दे दिया.

खबरिया चैनलों ने टीवी स्क्रीन पर जो फुटेज दिखाए, उस का वर्णन करें तो नशे की तरंग और उन्माद में डूबे उन्मत्त भोपे पूरे दबदबे के साथ लोगों को डरा रहे थे और सूबे पर अंधविश्वास की काली चादर फैलाने में जुटे थे. तांत्रिकों का उत्पात और हवा में तलवारें भांजते हुए उन का डरावना अट्टहास. बदहवास लोग खबरिया चैनलों पर चकित भाव से देख रहे थे. इशारा साफ था कि भोपों को चेतन की घटना ने मौत का नाच दिखाने का अवसर दे दिया था.

भोपे अपना उन्मादी चेहरा तब दिखा रहे थे, जब तत्कालीन पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह यह कह कर हटे ही थे कि हम ने भोपों के गिर्द शिकंजा सख्त कर दिया है. लेकिन कथित तांत्रिक चेतन के आत्मघात की घटना पर उन्मत्त भोपों ने भयाक्रांत करने वाली उछलकूद मचा कर इस बात को हवा में उड़ा दिया.

सवाल है कि भीलवाड़ा जिले के गांव निंबाहेड़ा जाटान की महिला भोपी झूमरी जीभ लपलपाते हुए कैसे तलवार चमकाने का दुस्साहस कर रही थी? सिगरेट के धुआंधार कश लगाती हुई झूमरी अपने आप को 9 देवियों का अवतार बता रही थी. कांता भोपी तो निरंतर भाला घुमाते हुए अपना दरबार लगाए हुए थी. जाहिर है कि कानून इन के ठेंगे पर था.\

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आतंक का गहराता साया

डायन बता कर उत्पीड़न की ज्यादातर घटनाएं भीलवाड़ा और राजसमंद जिलों में हुई हैं. भीलवाड़ा के भोली गांव के दबंगों की बेटी बीमार हुई तो रामकन्या को डायन घोषित कर दिया गया. लगभग एक महीने तक दबंगों की कैद में रहने के बाद बमुश्किल छुड़ाई गई रामकन्या को 6×4 फीट की अंधेरी कोठरी में बंद कर के रखा गया था. गांव के दबंग जाट शिवराज की 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी पूजा बीमार हुई तो भोपे के कहने पर नजला रामकन्या पर गिरा.

भोपे का कहना था, ‘इसे डायन खा रही है.’ भोपे की बात पर शिवराज का शक रामकन्या पर गया, जिस का घर पूजा के स्कूल के पास ही था. नतीजतन रामकन्या को डायन करार दे दिया गया.

जिस बदतर हालत में रामकन्या को दबंगों की कैद से छुड़ाया गया, उसे देख कर डाक्टर का कहना था कि ये जिंदा कैसे बच गई? इस की हालत तो बहुत खराब है.

भीलवाड़ा में महिलाओं की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां 20 साल में डायन प्रताड़ना के 87 मामले आ चुके हैं और इन में एक दरजन से ज्यादा महिलाओं की मौत हो चुकी है. तंत्रमंत्र की ओट में इन भोपों की व्यभिचारी मानसिकता को समझें तो चित्तौड़गढ़ जिले के पुरोली गांव का बाबा सिराजुद्दीन महिलाओं के शरीर से डायन निकालने के करतबी तरीकों में निर्लज्जता के साथ उन के प्राइवेट पार्ट्स को टटोलता है.

भीलवाड़ा जिले के भुवास गांव के भोपा देवकिशन की दरिंदगी तो देखने वालों के शरीर में सिहरन पैदा कर देती है. यह भोपा महिलाओं की पीठ पर पूरी निर्ममता से कोड़े बरसाता है और देखने वाले उफ्फ भी नहीं करते.

भीलवाड़ा जिले की सुहाणा तहसील के आगरपुरा गांव की विधवा महिला रामगणी के पति और 2 बेटों की मौत के बाद उस की पुश्तैनी जमीन हथियाने के लिए पड़ोसियों ने रामगणी समेत परिवार की सभी महिलाओं को डायन घोषित कर दिया था.

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कितने ही मामले संपत्ति के लिए

राजसमंद जिले के रणका गांव के दबंग परिवार में एक मौत क्या हुई, डोलीबाई को डायन बता कर उसे जगहजगह गरम सलाखों से दागा गया. राजसमंद के थाली का तलागांव की केशीबाई को डायन बता नंगा कर के गधे पर बिठा कर पूरे गांव में घुमाया गया. दबंगों की नजर उस की संपत्ति पर थी.

भीलवाड़ा जिले के बालवास गांव की नंदू देवी का पूरा परिवार पिछले साढ़े 4 साल से गांव के बाहर रहने को मजबूर है. पड़ोसी डालू का बेटा क्या बीमार हुआ, भोपे ने इस का इलजाम नंदू देवी पर डाल दिया. इस के बाद तो पूरे गांव ने मिल कर उसे पीटा और गांव से बाहर कर दिया. नंदू देवी गांव आने वाले हर अजनबी से पूछती है, ‘मैं डायन होती तो क्याआज मेरा पूरा परिवार जीवित रहता?’

भीलवाड़ा की करेड़ा तहसील के ऊदलपुरा गांव की गीता बलाई की जिंदगी उसी के परिजनों ने छीन ली. पति के मंदबुद्धि होने के कारण घर और खेती का सारा काम गीता ही संभाल रही थी, जो उस की जेठानी को बरदाश्त नहीं हुआ.

गीता पर डायन होने का आरोप लगा कर जेठानी उसे घनोप माता मंदिर ले गई, जहां नवरात्रों में उसे 11 दिनों तक भूखाप्यासा रखा गया. बाद में गीता जब कुएं से पानी निकाल रही थी तो जेठानी ने उसे धक्का दे दिया. कुएं में एक पेड़ पर गीता का शव 10 दिनों तक लटका रहा.

चाहे भोपा हो या भोपी, शराब के नशे में धुत्त ये डरावने चेहरे डायन निकालने के नाम पर पूरी हैवानियत पर उतारू रहते हैं. भोपों के ठौरठिकानों को अंधविश्वास की अदालतों का नाम दिया जाए तो गलत नहीं होगा.

अंधविश्वास की परत दर परत दबे इन आदिवासी इलाकों में यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि आखिर महिलाएं ही डायन क्यों बनती हैं? और ऐसी कौन सी वजह होती है कि महिलाओं को सामान्य जीवनयापन करतेकरते एकाएक डायन करार दे दिया जाता है? सूत्र बताते हैं कि डायन प्रताड़ना के अधिकांश मामलों में संपत्ति और जमीन हड़पने के लिए उन के नातेरिश्तेदार ही ऐसी साजिश रचते हैं. कई मामलों में लोगों ने अदावत और रंजिश के चलते महिलाओं को डायन करार दे दिया.

अलबत्ता यह एक कड़वी सच्चाई यह है कि डायन बनने का नजला अधिकांशत: उन्हीं महिलाओं पर गिरता है, जो गरीब, निराश्रित या दलित वर्ग से होती हैं. स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों इन आदिवासी इलाकों में अंधविश्वास का अंधेरा इतना घना हो गया है कि डायन से निजात पाने के लिए आने वाली महिलाओं की कतार नहीं थमती और न ही उन के परिजन उन्हें दहशत के तंदूर में धकेलने से बाज आते हैं?

एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि कुछ मामलों में तो डायन बता कर की गई हत्याएं भूमाफिया का काम है. बेइंतहा दर्द की ऐसी ढेरों अंतहीन कथाएं हैं, जिन में भोपों का कहर टूटा और सामान्य जीवनयापन करने वाली औरतों को यातनाएं भुगतने के लिए छोड़ दिया गया. वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीचंद पंत कहते हैं, ‘इन घटनाओं से अगर हमारी नसें नहीं चटखीं और दिल बेचैन नहीं हुआ तो मानवीय रिश्तों की बंदिशें कैसे बच पाएंगी?’

गे संबंधों का ट्रायंगल

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के औबेदुल्लागंज में रहने वाले पुराने कपड़ा व्यापारी देवेंद्र कोठारी का 45 वर्षीय एकलौता बेटा नीरज उर्फ मोनू रात को साढ़े 9 बजे अपनी स्कूटी से घर से यह कह कर निकला था कि ‘कुछ देर में घूम कर आता हूं.’

मगर रात के 12 बज गए और नीरज घर नहीं लौटा. इंतजार करतेकरते नीरज की पत्नी शिवांजलि ने जब नीरज को फोन लगाया तो उस का फोन स्विच्ड औफ था.

शिवांजलि समझ नहीं पा रही थी कि पति का फोन बंद क्यों है. पति के बारे में सोचसोच कर बुरा हाल था. परेशान हो कर शिवांजलि ने अपने 15 वर्षीय बेटे को यह बात बताने के लिए अपने ससुर के कमरे में भेजा.

पोते से नीरज के अभी तक घर न पहुंचने की बात सुनते ही 70 साल के देवेंद्र कोठारी बेचैन हो गए. उन्हें यह बात समझ नहीं आ रही थी कि इतनी रात गए नीरज आखिर कहां गया होगा.

निशांत भी पिता के दोस्तों को फोन लगा कर उन की जानकारी जुटाने की कोशिश करने लगा. काफी मशक्कत के बाद जब नीरज के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो आधी रात को ही दादा और पोते नीरज को खोजने निकल पड़े. यह बात 16 फरवरी, 2022 की है.

पूरी रात शहर में कई जगहों पर खोजबीन के बाद भी नीरज के बारे में कोई खबर नहीं मिली तो देवेंद्र कोठारी दूसरे दिन 17 फरवरी की सुबह औबेदुल्लागंज थाने पहुंच गए.

उन्होंने टीआई संदीप चौरसिया को पूरे घटनाक्रम की जानकारी देते हुए नीरज की गुमशुदगी दर्ज करा दी. कुछ ही घंटों में नीरज के गायब होने की खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी थी.

नीरज के पिता शहर के पुराने कपड़ा व्यापारी थे. उन की अपनी खेती की जमीन होने के साथ ही नीरज प्रौपर्टी डीलर के तौर पर काम कर रहा था. नीरज के इस तरह गायब होने से लोग तरहतरह के कयास लगा रहे थे.

शहर में एक चर्चा यह भी थी कि नीरज जमीन में छिपी दौलत को खोजने के चक्कर में कहीं गया होगा. लोगों का यह अनुमान इसलिए भी था कि नीरज तंत्रमंत्र और ज्योतिषियों के चक्कर में पड़ कर बिना मेहनत किए दौलत कमाना चाहता था.

कुछ साल पहले सड़क किनारे बैठने वाले किसी ज्योतिषी ने नीरज को बताया था कि उसे जमीन में गड़ा अकूत धन मिलेगा. तभी से नीरज इसी चक्कर में पड़ा रहता था. वह अकसर यही सोचता था कि कभी तो ज्योतिषी की भविष्यवाणी सच निकलेगी.

नीरज के इस तरह गायब होने की यह चर्चा बेवजह नहीं थी. 16 फरवरी को अमावस्या की रात थी और नीरज को घर से जूट के बोरे स्कूटी में रखते हुए उस के बेटे ने देखा था. इस वजह से लोगों का अनुमान था कि तंत्रमंत्र के जरिए जमीन में गड़े धन को बोरे में भर कर लाया जाएगा.

नीरज की गुमशुदगी को टीआई संदीप चौरसिया ने गंभीरता से लेते हुए घटना की जानकारी रायसेन जिले के एसपी विकास कुमार सेहवाल, एडीशनल एसपी अमृत मीणा, एसडीपीओ मलकीत सिंह को दे दी और खुद नीरज की खोजबीन में जुट गए.

पुलिस अधिकारियों को यह भी शक था कि नीरज का कहीं अपहरण तो नहीं हो गया. क्योंकि नीरज के पिता औबेदुल्लागंज के करोड़पति कारोबारी हैं. पुलिस ने नीरज की गुमशुदगी की सूचना समीप के भोपाल, होशंगाबाद और विदिशा जिले के पुलिस थानों को भी दे दी. शहर में इस घटना को ले कर चर्चाओं का बाजार गर्म था और पुलिस अलगअलग एंगिल से मामले की जांच कर रही थी. औबेदुल्लागंज के एसडीपीओ मलकीतसिंह ने 4 पुलिस थानों की एक टीम जांच के लिए गठित की.

टीम को इलाके की तलाशी के दौरान 18 फरवरी को होशंगाबाद रोड पर बने शगुन वाटिका मैरिज गार्डन के पीछे रेल पटरियों के किनारे झाडि़यों में एक लाश मिल गई. लाश को आवारा कुत्तों ने नोच दिया था, जिस की वजह से पुलिस को शिनाख्त करने में मुश्किल हो रही थी.

पुलिस टीम ने जब नीरज के घर वालों को घटनास्थल पर बुलाया तो कपड़ों के आधार पर घर वालों ने शव की पहचान कर बताया कि शव नीरज का ही है. नीरज की पत्नी और बेटे का रोरो कर बुरा हाल था. नीरज के पिता भी दुखी मन से बहू और पोते को ढांढस बंधा रहे थे. घटनास्थल पर भारी भीड़ जमा हो चुकी थी.

नीरज का शव अर्द्धनग्न अवस्था में मिला था, उस की पेंट और अंडरवियर कमर के नीचे घुटनों तक सरके हुए थे. शव की हालत देख कर पुलिस का शक अवैध संबंधों की वजह से हत्या की ओर जा रहा था.

नीरज का शव बरामद होने की सूचना मिलते ही रायसेन के एसपी के निर्देश पर एडीशनल एसपी अमृत मीणा घटनास्थल पर आ चुके थे. लाश का पंचनामा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. औबेदुल्लागंज थाने के टीआई संदीप चौरसिया को जांच के दौरान कुछ लोगों ने बताया कि नीरज छोटी उम्र के लड़कों से दोस्ती रखने का शौकीन था और उन के साथ गे रिलेशनशिप रखता था. कुछ ही घंटों में पुलिस को कई लड़कों के नाम मिल गए, जिन से नीरज के गे संबंध थे.

शक के आधार पर कुछ लड़कों से पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि पिछले कुछ महीनों से नीरज की दोस्ती 23 साल के मनोज कटारे और 17 साल के राजू (परिवर्तित नाम) से चल रही थी.

राजू को अकसर ही नीरज की स्कूटी पर बैठे देखा जाता था. मनोज और राजू रेलवे स्टेशन के पास एक नमकीन की दुकान पर काम करते थे. पुलिस ने जब मनोज और राजू की तलाश शुरू की तो पता चला कि 16 फरवरी के बाद वे दुकान ही नहीं पहुंचे.

पुलिस ने साइबर सेल की मदद से मनोज और राजू की मोबाइल लोकेशन की जांच की तो राजधानी भोपाल के नादिरा बसस्टैंड की मिल रही थी. पुलिस को अब पूरा यकीन हो गया था कि दोनों नीरज की हत्या कर भागने की फिराक में हैं.

पुलिस की एक टीम तुरंत भोपाल के नादिरा भेजी गई, जहां से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. सख्ती से की गई पूछताछ में दोनों ने नीरज की हत्या करने की बात कुबूल कर ली. उस के बाद जो दिलचस्प कहानी सामने आई, वह ट्रायंगल गे रिलेशनशिप पर रचीबसी निकली—

23 साल का मनोज कटारे बरखेड़ा पुलिस चौकी क्षेत्र के पिपलिया गांव का रहने वाला है. वह रेलवे स्टेशन रोड पर स्थित एक नमकीन की दुकान पर काम करता है. इसी दुकान पर 17 साल का राजू भी काम करता था. राजू देखने में गोरा, चिकना और लड़कियों की तरह शरमीला था.

दुकान पर काम के दौरान खाली समय में मनोज राजू को पकड़ कर उस के शरीर के नाजुक अंगों को छूने की काशिश करता तो राजू को अजीब सा लगता. राजू किशोरावस्था की दहलीज पर था, उसे अच्छेबुरे का ज्यादा इल्म नहीं था.

मनोज के इस तरह छूने से उसे अच्छा लगता. मनोज तो राजू का दीवाना हो गया था, उसे छूते ही मनोज को कुछ इस तरह का अहसास होता था जैसे वह किसी लड़की के बदन को छू रहा हो. जब दोनों के बीच दोस्ती हो गई तो मनोज राजू को अपने घर ले जाने लगा.

एक दिन काम से छुट्टी मिलने पर अपने ही घर में दोपहर के समय एकांत पा कर मनोज ने राजू से कहा, ‘‘राजू, तू बहुत खूबसूरत है. यदि तू लड़की होता तो मैं तुझ से ही शादी कर लेता.’’

इतना कह कर मनोज ने राजू को चूमना शुरू कर दिया. मनोज के हाथ कभी उस के गालों पर, कभी उस की छाती पर तो कभी उस के प्राइवेट पार्ट को टच करने लगे. राजू के पूरे शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई.

उसे मनोज का इस तरह छूना अच्छा लग रहा था. लिहाजा राजू ने भी मनोज पर प्यार जताते हुए कहा, ‘‘मनोज, तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो. जी चाहता है जिंदगी भर तुम्हारे साथ रहूं.’’

मनोज ने धीरेधीरे राजू के बदन से कपड़े उतारने शुरू कर दिए और राजू का हाथ अपने निजी अंग पर ले जा कर रख दिया. और राजू से बोला, ‘‘राजू, तू हमेशा इसी तरह मेरे साथ रहे तो मैं किसी लड़की से कभी शादी नहीं करूंगा.’’

मनोज की बात सुन कर राजू ने भी मनोज से वादा किया कि वह हमेशा जीवनसाथी बन कर उसी के साथ रहेगा.

धीरेधीरे राजू ने भी मनोज के कपड़े उस के शरीर से हटाना शुरू कर दिया. देखते ही देखते दोनों निर्वस्त्र हो कर अप्राकृतिक सैक्स का आनंद लेने लगे. दोनों के संबंध इतने मजबूत हो गए थे कि एक दिन भी दोनों का एकदूसरे के बिना रहना मुश्किल हो गया था.

दोनों के बीच गे रिलेशनशिप अब रोज की बात हो गई थी. दुकान से छूटते ही जब भी उन्हें मौका मिलता, वे आनंद के सागर में डूब कर गोता लगाते.

दोनों गे सैक्स का भरपूर आनंद लेने के लिए बदलबदल कर प्रेमीप्रेमिका की भूमिका निभाते थे. कभी राजू मनोज की प्रेमिका का रोल निभाता तो कभी मनोज राजू की प्रेमिका बन कर उस से संबंध बना कर उसे भी खुश कर देता.

एक दिन नीरज कोठारी शाम के वक्त नमकीन लेने उन की दुकान पर आया था, तभी राजू और मनोज के बीच हंसीमजाक देख कर उस का ध्यान राजू की तरफ गया. राजू लड़कियों की शक्लसूरत जैसा खूबसूरत लड़का था.

कुछ ही दिनों में नीरज को इस बात का पता चल गया कि मनोज और राजू के बीच समलैंगिक संबंध हैं. इस के बाद तो नीरज राजू से मिलने को बेताब हो उठा.

दरअसल, नीरज भी गे सैक्स का शौकीन था. नीरज इसी फिराक में रह कर किसी भी तरह वह राजू से नजदीकियां बढ़ाना चाहता था, मगर राजू मनोज के प्रेम में इस तरह पागल था कि वह नीरज को भाव नहीं दे रहा था.

एक दिन नीरज ने राजू और मनोज को संबंध बनाते देख लिया और अपने मोबाइल फोन से वीडियो बना ली. इस के बाद वह राजू को वीडियो दिखा कर धमकाने लगा.

राजू डर के मारे नीरज के फैलाए जाल में फंस गया. नीरज अकसर ही नमकीन की दुकान पर आने लगा. वह राजू को स्कूटी पर घुमाने के बहाने अपने साथ ले जाने लगा. राजू को मनोज के साथ रहते गलत कामों की लत पड़ चुकी थी, ऐसे में नीरज की संगत पा कर उसे भी वही मजा मिलने लगा.

धीरेधीरे राजू और नीरज रोजरोज ही मिलने लगे. वे आपस में एकदूसरे को चूमते तो कभी मोबाइल से फोटो लेते. नीरज राजू से उम्र में काफी बड़ा था. राजू को मनोज के साथ संबंध बनाने में जो मजा आता था, वह नीरज के साथ नहीं आता था. यही वजह थी कि वह नीरज से दूरियां बनाने लगा था.

मगर नीरज वीडियो वायरल करने की धमकी दे कर उस से बारबार संबंध बनाने की जिद करता था. किसी लव ट्रायंगल फिल्मी स्टोरी की तरह राजू के नीरज के साथ घूमनेफिरने से मनोज के अंदर शक का कीड़ा कुलबुलाने लगा.

मनोज ने जब एक दिन राजू से नीरज के साथ नजदीकियों के बारे में पूछा तो नीरज की हरकतों की सच्चाई राजू ने मनोज को बता दी, ‘‘नीरज मुझे खेत पर बुला कर जबरन संबंध बनाता है और मना करने पर हम दोनों का वीडियो वायरल करने की धमकी देता है.’’

यह सुन कर मनोज का खून खौल उठा. जैसे एक प्रेमी अपनी प्रेमिका का किसी गैर से संबंध बरदाश्त नहीं कर पाता, वैसे ही मनोज के दिल में नीरज के प्रति नफरत की आग जलने लगी.

मनोज को जब पता चला कि नीरज उस के दोस्त राजू को ब्लैकमेल कर रहा है और जबरदस्ती संबंध बना रहा है तो उस ने नीरज को रास्ते से हटाने की सोची.

नीरज के पास उन का अश्लील वीडियो था, इस वजह से मनोज को डर था कि उस की दोस्तों में बदनामी हो जाएगी. चारों तरफ से निराश हो कर मनोज ने नीरज की हत्या करने की योजना बनाई. मनोज की बनाई योजना के मुताबिक, राजू ने 16 फरवरी की रात साढ़े 9 बजे नीरज को फोन कर के मिलने को बुलाया.

नीरज यूं तो करोड़पति बाप का इकलौता बेटा था, मगर अपने हमउम्र लड़कों के साथ अवैध संबंध रखने के शौक की वजह से वह किशोरास्था में ही बदनाम हो गया था.

नीरज के जवान होते ही उस के पिता ने उस की शादी कर दी. वक्त गुजरने के साथ नीरज का बेटा भी 15 साल का हो गया था, मगर नीरज का लड़कों से सैक्स संबंध बनाने का शौक खत्म नहीं हुआ था.

16 फरवरी, 2022 की रात साढ़े 9 बजे नीरज घर पर खाना खा कर मोबाइल देख रहा था, तभी राजू की फोन काल देख कर उस का चेहरा खुशी से खिल उठा. राजू ने उसे खुला आमंत्रण देते हुए कहा, ‘‘आज मेरा मन तुम्हारे साथ कुछ करने का हो रहा है. जल्दी से आ जाओ.’’

अंधा क्या चाहे 2 आंखें. नीरज ने हामी भरते हुए कहा, ‘‘मैं आता हूं तू चौक पर मिलना.’’

इतना कहते ही फोन डिसकनेक्ट कर उस ने घर से जूट के 2 बोरे स्कूटी की डिक्की में रखे और पत्नी से कुछ देर में आने की बोल कर घर से निकल पड़ा. करीब पौने 10 बजे राजू उसे चौक पर ही मिल गया.

नीरज उसे स्कूटी पर बिठा कर शगुन वाटिका मैरिज गार्डन के पीछे रेलवे स्टेशन के नजदीक सुनसान जगह पर ले गया. स्कूटी खड़ी कर अंधेरे का फायदा उठा कर झाडि़यों के बीच घुस कर अपने साथ लाए जूट के बोरे बिछा कर दोनों पास में बैठ गए.

अमावस्या की रात के स्याह अंधेरे का पूरा लुत्फ नीरज उठाना चाहता था, इसलिए अपने कपड़े घुटने के नीचे सरका कर वह राजू के साथ प्रेमालाप करने लगा. मगर उसे पता नहीं था कि आज वह राजू को नहीं, अपनी मौत को सुनसान जगह ले कर आया है.

नीरज और राजू का सैक्स गेम चल ही रहा था कि मनोज उन का पीछा करते हुए दबेपांव वहां पहुंच गया. मनोज ने देखा कि नीरज राजू के ऊपर था, तभी उस ने पीछे से नीरज का गला पकड़ लिया.

नीरज कुछ समझ पाता, इस के पहले राजू भी मनोज का साथ देने लगा. दोनों पूरी ताकत से नीरज का गला दबाने लगे. कुछ ही देर में नीरज छटपटा कर ढेर हो गया. इस के बाद दोनों ने उस के हाथ की नस काट कर और गले को चाकूनुमा कटर से गोद कर इस बात की पूरी तसदीक कर ली कि नीरज जिंदा तो नहीं है.

नीरज की हत्या करने के बाद मनोज और राजू ने उस के शव को उठा कर घनी झाडि़यों के बीच फेंक दिया और नीरज का मोबाइल ले कर उसी की स्कूटी पर सवार हो कर दोनों भाग खड़े हुए.

रात में ही दोनों होशंगाबाद पहुंचे, जहां वे मनोज की बहनबहनोई के घर पर रुके. सुबह होते ही मनोज अपनी बहन से बोला, ‘‘दीदी, हम लोग जरूरी काम से भोपाल जा रहे हैं.’’

स्कूटी वहीं छोड़ कर दोनों बस में सवार हो भोपाल पहुंच गए. दोनों भोपाल के नादिरा बस स्टैंड से कहीं दूर भागने की फिराक में थे, तभी औबेदुल्लागंज थाने के टीआई संदीप चौरसिया की टीम ने उन्हें दबोच लिया.

पकड़े जाने पर उन के पास नीरज की हत्या कुबूल करने के अलावा कोई चारा नहीं था. दोनों ने नीरज की हत्या के पीछे यही कारण बताया कि नीरज उन के सैक्स संबंधों का वीडियो वायरल करने की धमकी दे कर राजू को ब्लैकमेल कर बारबार संबंध बनाने का दबाव डाल रहा था. यह बात मनोज को नागवार गुजरी.

दोनों की निशानदेही पर नीरज की स्कूटी, मोबाइल और हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकूनुमा कटर भी बरामद कर लिया. पुलिस ने दोनों को भादंवि धारा 302,120बी के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से मनोज को जेल और राजू को बाल सुधार गृह भेज दिया गया.

गे सैक्स के शौक ने एक शादीशुदा रईस कारोबारी नीरज को मौत की नींद सुला दिया तो मनोज और राजू जैसे नौजवानों को अपराध करने पर मजबूर कर दिया.              द्य

—कथा मीडिया रिपोर्ट और पुलिस सूत्रों पर आधारित

इज्जत का अपहरण : बदनामी का बदला

अपराह्न के साढ़े 3 बजे थे. कुलदीप के ट्यूशन जाने का समय हो गया था लेकिन अब तक वह दोस्तों के साथ खेल कर घर नहीं आया था. घर वालों ने कुलदीप को तलाशना शुरू किया, लेकिन उस का कोई पता नहीं चला.

कुलदीप ताजमहल के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध आगरा के थाना इरादत नगर के गांव हरजूपुरा निवासी किराना व्यापारी गब्बर सिंह का 9 वर्षीय बेटा था. गांव में जब वह कहीं नहीं मिला तो घर वालों को चिंता सताने लगी. कुलदीप दोपहर में गांव के मंदिर के पास अपने दोस्तों के बीच खेलने को कह कर गया था. वह गांव में आयोजित एक तेरहवीं के भोज में भी देखा गया था. इस के बाद उस का कोई पता नहीं चला. यह बात 23 जनवरी, 2022 की है.

उन दिनों उत्तर प्रदेश में चुनावी शोरगुल चल रहा था. गांव में चुनाव प्रचार के लिए विभिन्न पार्टियों के प्रत्याशी, उन के  कार्यकर्ता आजा रहे थे. ऐसी आशंका व्यक्त की गई कि कुलदीप कहीं चुनाव पार्टी वालों के साथ तो दूसरे गांव में नहीं चला गया?

कई घंटे तक तलाश करने के बाद भी जब कुलदीप का पता नहीं लगा तब घर वालों ने पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने गुमशुदगी दर्ज कर कुलदीप की तलाश शुरू कर दी. किराना व्यापारी के मासूम बेटे कुलदीप के अचानक लापता होने से गांव वाले भी परेशान थे.

कुलदीप को लापता हुए 6 दिन हो गए थे. गांव वालों के साथ घर वाले तथा पुलिस की 4 टीमें भी उस की तलाश में लगीं थीं. इस के साथ ही सीसीटीवी कैमरों के फुटेज देखने के साथ ही रेलवे स्टेशनों और बस स्टेशनों पर भी एक टीमें लगाई गईं.

उस दिन गांव में आयोजित तेरहवीं के भोज में बड़ी संख्या में लोग आए थे. कुलदीप को साथ के बच्चों ने तेरहवीं में जाते हुए देखा था. तेरहवीं में आए लोगों की सूची बनाने का काम पुलिस की एक टीम ने शुरू कर दिया.

इन दिनों प्रत्याशी विधानसभा चुनाव के लिए गांव में वोट मांगने आ रहे थे. दबाव बनाने के लिए परिवार के लोगों के साथ ही ग्रामीणों ने उन से लापता बालक कुलदीप को ढूंढ कर लाने पर ही मतदान करने की शर्त भी रखी थी.

कुलदीप पूरे परिवार का दुलारा था. अपनी आखों के तारे कुलदीप को 6 दिनों से न देख पाने से किसी अनहोनी की आशंका से मां मनोरमा देवी और दादी कमला देवी की आंखों के आंसू रोरो कर सूख चुके थे. मां दरवाजे की ओर टकटकी लगाए थी. हर आहट व हलचल पर दरवाजे से बाहर की ओर दौड़ जाती है कि कहीं उस का बेटा कुलदीप तो नहीं आ गया.

कुलदीप का छोटा भाई विहान भी रोरो कर मां से बारबार भाई के बारे में पूछता. उधर पिता गब्बर सिंह भी पुलिस से बारबार अपने बेटे को लाने की गुहार लगा रहे थे.

कुलदीप की गुमशुदगी पुलिस के लिए चुनौती बनी हुई थी. जिस के बाद पुलिस ने एक योजना के तहत 5 फरवरी, 2022 को कुलदीप के घर वालों की ओर से उस का सुराग देने वाले को 5 लाख रुपए का ईनाम देने की बात प्रसारित कर दी. इस के साथ ही इस संबंध में पर्चे छपवा कर गांव में बंटवा दिए.

इस का नतीजा दूसरे दिन यानी 6 फरवरी को ही सामने आ गया. गब्बर के घर के बाहर स्थित उस के घेर में 35 लाख की फिरौती का पत्र मिला. घेर के मौखले से पत्र फेंका गया था. फिरौती न देने पर बच्चे को बेचने और जान से मारने की धमकी दी गई थी.

पत्र में दिए गए पते पर पिता गब्बर सिंह लाल रंग के बैग में रुपए ले कर पहुंचे और बताए अनुसार बैग को पेड़ पर लटका दिया. लेकिन बैग को लेने कोई नहीं आया. ऐसा 2 दिन किया गया.

दूसरा पत्र 9 फरवरी को और तीसरा पत्र 11 फरवरी को मिला था. इस पत्र के साथ कुलदीप का टोपा (कैप) भी था. उस लेटर को भी रात में किसी ने घेर के अंदर फेंका था. पत्रों में पुलिस को जानकारी देने अथवा कोई चालाकी करने पर बच्चे की हत्या करने की धमकी दी गई थी.

जब परिजनों ने कुलदीप का टोपा देखा तो उन का माथा ठनका. इस संबंध में पुलिस को पूरी जानकारी दी.

गांव में आने का एक ही रास्ता था. मगर जब पत्र मिले, तब गांव में कोई बाहरी व्यक्ति नहीं आता दिखाई दिया था. इस से पुलिस को गांव के ही किसी व्यक्ति के शामिल होने का शक हुआ. पुलिस ने गब्बर से पुरानी रंजिश आदि के बारे में पूछा, लेकिन गब्बर सिंह ने किसी से भी दुश्मनी होने की बात नकार दी.

अपहर्त्ताओं ने पहले पत्र में जहां फिरौती के रूप में 35 लाख की मांग की थी, वहीं बाद के पत्रों में रकम घटा कर 25 लाख कर दी गई थी. मगर तीनों पत्रों में एक बात समान थी, वह यह कि फिरौती की रकम ले कर आने की जगह नहीं बदली गई थी.

तीनों ही पत्रों में अपहर्त्ताओं ने जगनेर के सरैंधी में पैट्रोल पंप के पास एक शीशम के पेड़ पर फिरौती की रकम को एक लाल रंग के बैग में रख कर टांगने के लिए कहा था.

पिता गब्बर व उन के जीजा सुरेंद्र सिंह  को शक हुआ कि फिरौती मांगने वालों के तार जरूर सरैंधी व उस के आसपास के गांव से जुड़े हुए  हैं. इस के बाद गांव के लोगों के बारे में गोपनीय तरीके से जानकारी करनी शुरू कर दी कि कितने लोगों के सगेसंबंधी सरैंधी के आसपास के गांवों में रहते हैं.

जानकारी करने पर पता चला कि गब्बर के घर के सामने रहने वाले आशु उर्फ कालिया का एक संबंधी सरैंधी के पास वाले गांव में रहता है. जबकि कुछ अन्य लोगों के रिश्तेदार फिरौती वाली जगह से दूर रहते थे.

इतनी जानकारी मिलने के बाद आशु के उस रिश्तेदार के बारे में छानबीन की गई तो पता चला कि वह भाड़े पर गाड़ी चलाता है.

जानकारी मिलने के 3 दिन बाद सुरेंद्र सिंह आशु के उस रिश्तेदार के गांव पहुंचा और दूसरे दिन खेरागढ़ जाने के लिए गाड़ी बुक करने की बात कही. इस बीच बातचीत के दौरान कुलदीप के बारे में बात की. इस पर रिश्तेदार चिंतित नजर आया. सुरेंद्र उसे सौ रुपए एडवांस दे कर आटो स्टैंड के लिए चल दिया.

सुरेंद्र के जाते ही रिश्तेदार ने सुरेंद्र सिंह का आटो स्टैंड तक लगातार पीछा किया. सुरेंद्र सिंह आटो स्टैंड पहुंचा और एक आटो में बैठ कर चल दिया. इस बीच उसे पता चल गया था कि आशु का रिश्तेदार उस की रेकी कर रहा है. करीब 100 मीटर दूर जाने के बाद सुरेंद्र आटो से उतर कर वापस आटो स्टैंड आ गया.

उस समय वहां पर वह रिश्तेदार किसी से मोबाइल पर बात कर रहा था. सुरेंद्र बिना बताए चुपचाप वहां खड़ा हो गया. देखा कि वह फोन पर बात करते समय घबराया हुआ था. सुरेंद्र सिंह यह सब जानकारी पाने के बाद गब्बर सिंह के पास पहुंचा और आशु पर शक जताते हुए पुलिस को हकीकत बताई और आशु से पूछताछ करने को कहा.

पुलिस को भी जांच के दौरान पहले ही आशु पर शक हो रहा था. लेकिन कुलदीप के परिजनों द्वारा उस पर कोई शक नहीं जताने तथा आशु के कुलदीप की तलाश में परिजनों के साथ सबसे आगे होने पर पुलिस उस से पूछताछ करने से हिचक रही थी.

इस के बाद पुलिस ने जानकारी जुटा कर कड़ी से कड़ी जोड़ी और एसओजी प्रभारी कुलदीप दीक्षित तथा थानाप्रभारी अवधेश कुमार गौतम की टीम ने आशु को हिरासत में ले लिया. थाने ला कर उस से कड़ाई से पूछताछ की.

पूछताछ के दौरान पता चला कि अपहरण में उस के 2 और साथी कन्हैया और मुकेश शामिल थे. अपहरण वाले दिन ही उन्होंने कुलदीप की हत्या करने के बाद उस की लाश जंगल में दफना दी थी.

पुलिस ने 17 फरवरी, 2022 की रात को गब्बर सिंह के पड़ोस में रहने वाले तीनों आरोपी आशु, मुकेश व कन्हैया को गिरफ्तार कर लिया. तीनों ने कुलदीप का अपहरण करने के बाद उस की हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया.

एसएसपी सुधीर कुमार सिंह ने प्रैस कौन्फ्रैंस में कुलदीप के अपहरण और हत्याकांड के 26 दिन बाद मामले का परदाफाश करते हुए बताया कि कुलदीप की हत्या के पीछे रंजिश का मामला निकल कर आया है. उन्होंने तीनों हत्यारोपियों को गिरफ्तार  करने की जानकारी दी.

पुलिस ने हत्यारों की निशानदेही पर गब्बर के घर से एक किमी दूर जंगल में दफनाए गए कुलदीप के शव को बरामद कर लिया. कुलदीप की हत्या अपहरण करने वाले दिन ही अंगौछे (गमछा) से गला घोट कर दी गई थी. पुलिस ने गमछा, फावड़ा व अन्य सामान भी बरामद कर लिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी हत्या का कारण गला घोटना बताया गया था. इस अपहरण और हत्या के पीछे जो कहानी निकल कर आई वह चौंकाने वाली थी—

आरोपी आशु 2 साल पहले मृतक के पिता गब्बर सिंह के घर चोरी करते पकड़ा गया था. तब उसे अपमानित किया गया था. पंचायत ने आशु को गांव से बाहर रहने का फैसला सुनाया था. पंचायत के फैसले के बाद आशु अपनी बहन के घर खेरागढ़ चला गया था. उस की रिश्तेदारी गांव सरैंधी में भी है. इस बीच वह सरैंधी में रिश्तेदार के यहां भी रहा.

करीब 5 माह पहले आशु फिर से वापस गांव आ गया. आरोपी आशु को कुलदीप चोरचोर कह कर चिढ़ाता था. वह गब्बर व उस के बेटे कुलदीप से चिढ़ने लगा और दोनों से दिली रंजिश मानने लगा.

आरोपी मुकेश और कन्हैया, गब्बर सिंह के दूर के रिश्तेदार हैं. मुकेश लंबे समय से गब्बर के घर में ही किराए पर रहता था. मुकेश की एक बहन थी. ससुराल में उस की मौत हो गई. ससुरालीजनों ने समझौते की जो रकम दी थी, वह गब्बर सिंह ने रख ली थी और मांगने पर भी वह रकम वापस नहीं कर रहा था.

साथ ही पिछले दिनों गब्बर ने उस से अपना मकान भी खाली करा लिया था. इस से मुकेश भी गब्बर से रंजिश मानने लगा था. वर्तमान में मुकेश तीसरे आरोपी कन्हैया के घर में किराए पर रह रहा था.

मुकेश मथुरा के फरह का मूल निवासी है. वह 2 फरवरी को दिल्ली में फैक्ट्री में काम करने के लिए चला गया था. लेकिन उसे बहाने से आशु ने बुला लिया था.

तीनों ने गब्बर सिंह से बदला लेने के लिए साजिश रची. घटना वाले दिन 23 जनवरी को गांव में एक जगह तेरहवीं के भोज का आयोजन होने व विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए विभिन्न पार्टी नेताओं के आने से गहमागमी थी. इस का फायदा उठाते हुए हत्यारोपियों ने साजिश के तहत कुलदीप का बहाने से अपहरण कर लिया.

कुलदीप गिल्ली डंडा खेलने का शौकीन था. गिल्ली डंडा के लिए लकड़ी लेने के बहाने मुकेश कुलदीप को जंगल की ओर ले गया. रास्ते में उस के साथी कन्हैया और आशु मिल गए.

तीनों उसे गांव से करीब एक किलोमीटर दूर जंगल में ले गए. कन्हैया और मुकेश ने कुलदीप के पैर पकड़े और आशु ने अपने गमछे से गला घोट कर उस की हत्या कर दी. तीनों ने वहीं गड्ढा खोद कर शव को दबा दिया और गांव आ गए.

हत्यारोपियों ने अपने दुश्मन के बेटे के अपहरण के दिन ही उस की हत्या कर दी थी. इतना ही नहीं, आशु, कन्हैया और मुकेश हत्याकांड को अंजाम देने के बाद पीडि़त परिजनों के साथ कुलदीप की खोजबीन का नाटक भी करते रहे.

जब बेटे का कोई सुराग नहीं मिला तो गब्बर सिंह ने 5 लाख का ईनाम देने की घोषणा कर दी. तब तीनों हत्यारों के मन में लालच जाग गया. तीनों ने फिरौती मांगने की योजना बनाई जो उन के पकड़े जाने का सबब बनी.

आरोपी कन्हैया का घर गब्बर सिंह के घर से लगा हुआ है. जबकि आशु का घर गब्बर सिंह के घर के सामने है. गब्बर सिंह के घर के बाहर स्थित घेर की दीवार में 4 मोखले बने हुए हैं. इन मोखलों से कन्हैया पत्र फेंक देता था. जबकि फिरौती मांगे जाने के बाद पुलिस गांव में आने वाले हर व्यक्ति पर नजर रख रही थी.

इस के साथ ही वह गब्बर सिंह के घर के सामने से गुजरने वालों पर भी निगरानी कर रही थी. लेकिन आरोपी इतने शातिर थे कि पुलिस और परिजनों की आंख से काजल चुरा रहे थे. लगातार फिरौती के पत्र आने से पुलिस इतना तो समझ गई थी कि फिरौती मांगने वाले गांव के ही किसी व्यक्ति का हाथ है.

एसएसपी सुधीर कुमार सिंह ने बताया कि पत्रों में लिखी हैंड राइटिंग की जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला से रिपोर्ट मंगाई जाएगी. केस में मजबूत साक्ष्य पुलिस के पास हैं. 3 पत्र डाले गए थे. हैंड राइटिंग का मिलान कराया तो पता चल कि वो पत्र कन्हैया ने लिखे थे.

इस के साथ ही कुलदीप का टोपा (कैप) भी भेजा गया था. वहीं जहां शव दफनाया गया था, वहां पर फावड़ा मिला था. गला घोटने वाला गमछा भी बरामद कर लिया गया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी हत्या का कारण दम घुटना बताया गया था. गिरफ्तार किए गए तीनों हत्यारोपियों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

अपराधी कितना भी चालाक क्यों न हो, अपने पीछे कोई न कोई सुराग जरूर छोड़ जाता है. कुलदीप अपहरण और हत्याकांड की इस दिल दहलाने वाली वारदात में भी यही हुआ.

आरोपियों ने फूलप्रूफ प्लान बनाया था. लेकिन लालच के वशीभूत हो कर उन के द्वारा भेजे गए फिरौती के पत्रों व कुलदीप की कैप से ही पुलिस और परिजन हत्यारों तक पहुंच गए.  द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अंधविश्वास का भंवर : समाज में कैसे बढ़ रहा है इसका कहर

घने और देवदार के लंबे वृक्षों से आच्छादित पहाड़ों के बीचोबीच एक आदिवासी गांव पहाड़गांव आम टोला. यह गांव झारखंड के गुमला जिले के कामडारा थाना क्षेत्र में आता है. गांव में एक ऐतिहासिक शिव मंदिर है इसीलिए इस गांव का नाम दूरदूर तक प्रसिद्ध है.

सावन का महीना हो या फिर महाशिवरात्रि पर्व, भक्तों की यहां भीड़ उमड़ती है. हालांकि पहाड़गांव में नक्सली संगठन पीएलएफआई काफी सक्रिय है. कई बार पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ भी हो चुकी है. इसलिए भी पहाड़गांव पूरे जिले में चर्चित है.

इसी गांव में 60 वर्षीय किसान निकोदिन तोपनो अपनी पत्नी जोसविना तोपनो (55 साल), बेटे भिनसेट तोपनो (35 साल), बहू शीलवंती तोपनो (30 साल) और पोते अलबिन तोपनो (5 साल) के साथ हंसीखुशी रहते थे.

बापबेटे मिल कर इतनी मेहनत कर लेते थे कि खेतों में साल भर के खाने से ज्यादा अनाज पैदा हो जाता था. साल भर खाने के लिए अनाज घर में रख कर बाकी का बाजार में बेच कर पैसे कमा लेते थे. इसी से उन का जीवनयापन होता था.

बात 23 फरवरी की है. रात में निकोदिन तोपनो पत्नी, बेटा, बहू और पोते एक साथ बैठ कर खाना खाने के बाद सोने चले गए. रात 9 बजतेबजते निकोदिन और उन का पूरा परिवार खर्राटे भरने लगा था. उन का मकान कच्ची मिट्टी और घासफूस का बना था.

अगली सुबह निकोदिन तोपनो का भतीजा अमृत तोपनो अपने घर के बाहर नीम का दातून कर रहा था. उसी समय गांव का एक आदमी दौड़ताहांफता उस के पास पहुंचा और बोला, ‘‘गजब हो गया अमृत, गजब हो गया.’’

‘‘अरे, क्या गजब हो गया भाई? थोड़ा सांस तो ले लो, फिर कहो जोे कहना

चाहते हो.’’ दातून मुंह से निकालते हुए अमृत बोला.

‘‘अरे भाई, सुनेगा तो तेरे भी होश उड़ जाएंगे. घर के बाहर तेरे बड़े पिता…’’

‘‘क्या हुआ बड़े पिताजी को..?’’

‘‘किसी ने पूरे परिवार को मार डाला. उन को और तेरी बड़ी मां को मार कर घर के बाहर फेंक दिया है. दोनों की लाशें बाहर पड़ी हैं.’’

अमृत ने इतना ही सुना था कि वह जिस अवस्था में था, वैसे ही दातून एक ओर फेंकता हुआ दौड़ताचिल्लाता ताऊ निकोदिन के घर पहुंचा. सचमुच वहां बड़े पिता और बड़ी मां की थोड़ी दूरी पर खून में डूबी लाशें पड़ी थीं. बड़ी बेरहमी से किसी ने उन के गले और सिर पर धारदार हथियार से वार कर मार डाला था.

फिर वह घबराया हुआ घर के अंदर गया. वहां का दिल दहला देने वाला दृश्य देख कर उस का कलेजा कांप उठा. एक ही बिस्तर पर भाई भिनसेट, भाभी शीलवंती और भतीजा अलबिन की खून से सनी लाशें पड़ी हुई थीं. अलबिन के पास उस का खिलौना खून में सना पड़ा था.

उस के बड़े पिता के परिवार को जड़ से ही खत्म कर दिया था. यह सोच कर अमृत की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे. उस के चीखनेचिल्लाने की आवाज सुन कर गांव वाले मौके पर जमा हो गए.

तभी किसी ने इस हृदयविदारक घटना की सूचना कारडामा थाने को दे दी. घटना की सूचना पा कर कारडामा थाने के थानाप्रभारी बैजू उरांव पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए थे.

हत्यारों ने बड़ी बेरहमी से सारे कत्ल किए थे. जिस में 5 साल के अलबिन की लाश देख कर ग्रामीणों का कलेजा मुंह को आ गया. आखिर इस मासूम ने किसी का क्या बिगाड़ा था, जो इसे भी नहीं बख्शा.

थानाप्रभारी बैजू उरांव ने मौका मुआयना करने के बाद घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. दिल दहला देने वाली घटना की सूचना जैसे ही अधिकारियों को मिली, कुछ ही देर बाद वे मौके पर पहुंच गए थे.

मौके पर पहुंचे अधिकारियों में उपायुक्त शिशिर कुमार सिन्हा, विधायक जिग्गा सुसारन होरो, एसपी पी. हृदीप जनार्दन, एसडीपीओ दीपक कुमार, एसडीओ संजय पीएम कुजूर, रवींद्र कुमार पांडेय, फोरैंसिक टीम, डौग स्क्वायड और कई थानों के थानेदार शामिल थे.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल की सूक्ष्मता से जांच की. कहीं से यह घटना नक्सली नहीं लग रही थी. नक्सली घटना होती तो मृतकों के शरीर गोलियों से छलनी हुए होते, किंतु मृतकों के शरीर पर जगहजगह धारदार हथियारों से हमला होना नजर आ रहा था.

जांचपड़ताल से पता चला कि यह घटना किसी रंजिश के कारण अंजाम दी गई है. खैर, पुलिस ने पांचों शव पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल गुमला भिजवाए और अमृत तोपनो की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 148, 149, 302 और डायन प्रथा प्रतिशोध अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर आवश्यक काररवाई शुरू कर दी थी.

इस घटना की खबर डीजीपी नीरज सिन्हा तक पहुंच गई थी. उन्होंने एसपी पी. हृदीप जनार्दन को आदेश दिया कि 24 घंटों के भीतर हत्यारे जेल की सलाखों के पीछे होने चाहिए. चाहे वे कितने ही ताकतवर क्यों न हों. उन के चेहरे पर कानून का भय दिखना चाहिए.

एसआईटी ने जांच शुरू की तो पासपड़ोस से पूछताछ में उन्हें पता चला कि तोपनो परिवार बेहद सीधा सरल था. किसी से उन की कोई रंजिश भी नहीं थी. तो क्यों हत्यारों ने उन के पूरे परिवार का खात्मा कर दिया? यह सोचने वाली बात थी.

आखिरकार, पुलिस की कड़ी मेहनत रंग लाई. 26 फरवरी की दोपहर में एक वीडियो क्लिप जांच अधिकारियों के हाथ लग गई. वीडियो क्लिप घटना से एक दिन पूर्व 23 फरवरी की थी. वीडियो में स्पष्ट दिख रहा था कि दिन में लगभग 11-12 बजे गांव के बाहर फुटबाल के मैदान में एक बैठक का आयोजन हुआ.

बैठक में 50 से अधिक लोग शामिल थे, जिन में लगभग 50 वर्षीय एक व्यक्ति मुंडारी भाषा में चिल्ला कर एक बुजुर्ग (मृतक निकोदिन तोपनो) से कह रहा है, ‘‘तुम लोग गांव में डायन हो. तुम बताओ और 4 लोग कौनकौन हैं, जो गांव में तबाही मचाए हैं. हम लोग इतना सबूत दे रहे हैं… लेकिन तुम नहीं समझ रहे हो…’’

उस व्यक्ति ने बुजुर्ग को बैठक में उपस्थित लोगों से हाथ जोड़ कर माफी मांगने को कहा और इस के बाद बुजुर्ग को 3-4 थप्पड़ जड़ दिए. इस घटना के 10-12 घंटे बाद ही निकोदिन तोपनो को परिवार सहित मार डाला गया था.

पुलिस को यह समझते देर न लगी कि मामला डायन बिसाही से जुड़ा हुआ है. इस के बाद राज से परदा खुलता चला गया. घटना का मूल दोषी गांव का पुजारी मथुरा तोपनो था. पुलिस ने पुजारी को गिरफ्तार किया तो एकएक कर के 8 आरोपी सामने आए, जिन्होंने बेहरमी से तोपनो दंपति सहित पूरे परिवार को मौत की नींद सुला दिया था.

अगले दिन 27 फरवरी को आठों आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए थे. जिन के नाम सुनील तोपनो, सोमा तोपनो, सलीम तोपनो, फिरंगी तोपनो, फिलिप तोपनो, अमृत तोपनो, सावन तोपनो और दानियल तोपनो थे. मुख्य आरोपी सुनील तोपनो से पुलिस ने जब कड़ाई से पूछताछ की तो उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया और हत्या की पूरी कहानी पुलिस को बता दी.

पुलिस पूछताछ में जो कहानी सामने आई, सभ्य समाज के विकृत चेहरे को उजागर करने वाली थी.

सुनील तोपनो मूलरूप से गुमला जिले के कामडारा इलाके के पहाड़गांव आमटोला का रहने वाला था. खेतीबाड़ी और मेहनतमजदूरी कर के अपना और अपने परिवार का भरणपोषण करता था. सुनील जिस गांव का मूल निवासी था, वह इलाका आदिवासियों का इलाका कहा जाता है. इस गांव में ज्यादातर लोग अशिक्षित और बेरोजगार हैं, जो दूसरों के यहां मेहनत कर के अपना जीवनयापन करते हैं और अंधविश्वास की दुनिया में जीते हैं.

यहां अंधविश्वास की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं, जिसे दूर करना तो दूर की बात, उस की जड़ों को टटोल पाना टेढ़ी खीर साबित होती है.

सुनील ने एक देशी गाय और बैल पाल रखा था. दिन भर जानवरों की सेवा में वह लगा रहता था. अचानक उस के दोनों जानवर बीमार पड़ गए और कुछ दिनों बाद दोनों मर गए. जानवरों की अचानक हुई मौत से सुनील दुखी रहने लगा था. किसी काम में उस का मन ही नहीं लग रहा था.

सुनील के जानवरों की मौत के बाद गांव में एकएक कर के कई जानवर असमय काल के गाल में समा गए थे. यह देख कर सुनील के साथ सोमा तोपनो, सलीम, फिरंगी, फिलिप सावन और दानियल सभी परेशान थे. वे समझ नहीं पा रहे थे अचानक क्या हो गया, क्यों जानवर मरने लगे.

सुनील तोपनो गांव के बाकी लोगों को साथ ले कर पुजारी मथुरा तोपनो से मिलने उस के घर आया. पुजारी ने सुनील और उस के साथ आए सभी लोगों की बातें सुनीं. सब की बातें सुनने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि गांव में कोई डायन पाले हुए है. वही सब कुछ करा रहा है, इसीलिए गांव के जानवर एकएक कर के मर रहे हैं.

पुजारी मथुरा तोपनो ने गांव वालों से कहा कि निकोदिन तोपनो ही वह व्यक्ति है, जिस ने अपने घर में डायन पाल रखी है. वही सब को नुकसान पहुंचा रहा है. उस के साथ भी डायन जैसा व्यवहार होना चाहिए.

पुजारी मथुरा तोपनो के कथन ने आग में घी का काम किया. सुनील तोपनो और गांव वालों के दिमाग में यह बात बैठ गई कि निकोदिन तोपनो की वजह से ही उन के और पशुओं की मौत हुई है. डायन बन कर वह एकएक को खा रहा है. जब तक जिंदा रहेगा, मार कर ऐसे ही खाता रहेगा.

सुनील तोपनो ने इस को ले कर 23 फरवरी को गांव के बाहर फुटबाल मैदान में एक पंचायत आयोजित की. 50 से ज्यादा लोग इस में उपस्थित थे. इस बैठक में निकोदिन के बेटे भिनसेट तोपनो को शामिल नहीं होने दिया गया था.

3-4 घंटे तक चली इस बैठक का वीडियो एक शख्स ने बना लिया था. बैठक में पुजारी मथुरा तोपनो मुंडारी भाषा में चिल्ला कर निकोदिन तोपनो से कह रहा था, ‘‘तुम लोग गांव में डायन हो… तुम बताओ और 4 लोग कौनकौन हैं, जो गांव में तबाही मचाए हैं. हम लोग इतना सबूत दे रहे हैं…लेकिन तुम नहीं समझ रहे हो…’’

उस व्यक्ति ने बुजुर्ग निकोदिन को बैठक में उपस्थित लोगों से हाथ जोड़ कर माफी मांगने को कहा, जिस के बाद उसे 3-4 थप्पड़ जड़ दिए.

बुजुर्ग निकोदिन तोपनो समझ नहीं पा रहे थे कि उन्हें किस गुनाह की सजा दी गई थी. उन से ऐसा क्या गुनाह हुआ, जो भरी पंचायत में पुजारी ने थप्पड़ मारे. पुजारी की इस धृष्टता से निकोदिन सहम गए थे.

साधारण तरीके से जीने वाले निकोदिन पर डायन पालने का झूठा आरोप लगाया जा रहा था. जबकि उस ने पंचायत में चीखचीख कर कहा था कि उस पर लगाया जा रहा आरोप बेबुनियाद है. लेकिन पंच न तो उस की बात सुनने को तैयार थे और न ही मानने को.

बैठक खत्म होने के बाद निकोदिन तोपनो दुखी मन से घर पहुंचे. उन के बुझे हुए चेहरे को देख कर पत्नी, बेटे और बहू समझ गए कि पंचायत में जरूर कुछ बुरा हुआ है तभी इन का चेहरा लटका हुआ है. फिर निकोदिन ने परिवार के सामने सारी सच्चाई बता दी.

थप्पड़ वाली बात सुन कर सभी का कलेजा कांप उठा. वे मन मसोस कर रह गए, इस के अलावा वे और कुछ कर भी नहीं सकते थे.

इधर बैठक के बाद से ही सुनील तोपनो निकोदिन तोपनो को सजा देने के लिए फड़फड़ा रहा था. बस घटना को अंजाम देने की देरी थी.

रात 10 बजे तक गांव में सन्नाटा पसर गया था. हथियारों के साथ सुनील अपनी मोटरसाइकिल पर सोमा को पीछे बैठा कर निकोदिन के घर पहुंचा. एक दूसरी मोटरसाइकिल पर सवार सलीम और फिरंगी उस का साथ दे रहे थे.

चारों मोटरसाइकिल से नीचे उतरे और आपस में कुछ बात की. उस के बाद चारों अलगअलग दिशाओं में धारदार हथियार ले कर फैल गए.

सुनील निकोदिन तोपनो के घर की ओर बड़ा. दरवाजा खटखटा कर उस ने निकोदिन को बाहर आने को कहा. दरवाजा खटखटाने की आवाज सुन कर निकोदिन और उन की पत्नी की आंखें खुल गईं और वे बिस्तर पर उठ कर बैठ गए. दोबारा दरवाजे पर थाप की आवाज सुन कर निकोदिन यह देखने के लिए दरवाजे की ओर लपका कि बाहर कौन है, जो उसे बुला रहा है.

जैसे ही बुजुर्ग निकोदिन दरवाजा खोल कर बाहर निकले, सुनील और सोमा ने उन्हें कमरे से बाहर खींच लिया. जिस से निकोदिन के मुंह से चीख निकल पड़ी. पति की दर्दनाक चीख सुन कर जोसविना भी चिल्लाती हुई बाहर दौड़ी.

बाहर निकली तो देखा सुनील और सोमा कुल्हाड़ी और आरी से उस के पति को मार रहे थे. पति को बचाने के लिए जोसविना हत्यारों से भिड़ गई. हत्यारों ने उसे भी नहीं बख्शा और कुल्हाड़ी से प्रहार कर मौत के घाट उतार दिया.

दोनों बुजुर्गों की हत्या करने के बाद चारों हत्यारे बुरी तरह डर गए थे. वे इस बात से परेशान थे कि निकोदिन के बेटे और बहू जिंदा हैं. कहीं उन्होंने मुंह खोल दिया तो सारी जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ेगा. इसलिए इन्हें भी रास्ते से हटा दें, न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी.

फिर क्या था इंसान से हैवान बन चुके चारों कमरे में घुसे और गहरी नींद में सो रहे भिनसेट, उस की पत्नी शीलवंती और मासूम अलबिन को कुल्हाड़ी और लोहे की आरी से प्रहार कर मौत के घाट उतार दिया और फरार हो गए.

लेकिन खून की होली खेलने वाले दरिंदे कानून के हाथों से ज्यादा देर बच नहीं सके. आखिरकार पुलिस ने उन्हें पकड़ ही लिया.

पुलिस ने 27 फरवरी को आरोपी सुनील तोपनो, सोमा तोपनो, सलीम तोपनो, फिरंगी तोपनो, फिलिप तोपनो, अमृत तोपनो और दानियान तोपनो से पूछताछ करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

आशा के एक सर्वे के अनुसार, झारखंड में डायन बिसाही के नाम पर एक दशक के अंदर करीबन 700 महिलाओं की हत्या की जा चुकी है और यह सिलसिला अभी भी जारी है.

—कथा जनचर्चाओं और पुलिस सूत्रों पर आधारित

उजले लोगों का ये है काला धंधा – भाग 3

फ्लैट का सौदा करने दोनों में ही दोस्ती हो गई तो जल्दी ही दोनों में अनैतिक संबंध भी बन गए. बिल्डर के खिलाफ वकील ने इस्तगासा पेश करने की धमकी दी तो मीडियाकर्मी ने खबर चलाने की धमकी दी. गिरोह के इशारे पर रवनीत ने उस से एक करोड़ रुपए मांगे.

अंत में उस से 35 लाख रुपए वसूले गए. इस के बाद रवनीत को मोहरा बना कर गिरोह ने एक बिल्डर से 50 लाख, एक एक्सपोर्टर से 23 लाख, एक डाक्टर से एक करोड़ 5 लाख, प्रौपर्टी व्यवसाई से 80 लाख और रिसौर्ट मालिक के बेटे से 45 लाख रुपए वसूले.

ब्लैकमेलिंग से मोटी रकम मिली तो रवनीत ने हांगकांग जा कर अपने मातापिता को उन से लिए 8 लाख रुपए लौटा दिए. उस ने अपने घर वालों को बताया कि वह जयपुर में नौकरी करती है. उस ने उन से कोटा के अपने प्रेमी के बारे में भी बता दिया था.

उसी बीच रवनीत कौर उर्फ रूबी का गिरोह के लोगों से पैसों के बंटवारे को ले कर विवाद हो गया. इस की वजह यह थी कि गिरोह के सदस्य शिकार से तो मोटी रकम ऐंठते थे, लेकिन रवनीत को काफी कम पैसे देते थे. इसी बात को ले कर दिसंबर, 2015 के आखिर में रवनीत ने गिरोह छोड़ दिया.

इस के बाद रवनीत ने सन 2016 के शुरू में कोटा निवासी अपने प्रेमी रोहित से शादी कर ली. शादी के बाद वह कोटा चली गई, जहां वह महावीरनगर तृतीय में ससुराल वालों के साथ रहने लगी. बाद में उस ने कोटा की एक कोचिंग इस्टीट्यूट में नौकरी कर ली. उस इंस्टीट्यूट को छोड़ कर उस ने दूसरे कोचिंग इंस्टीट्यूट में करीब 4 महीने ही नौकरी की थी कि एसओजी ने उसे गिरफ्तार कर लिया था. रवनीत की गिरफ्तारी तक उस की ससुराल वालों को उस के कारनामों का पता नहीं था.

एसओजी ने उसे अदालत में पेश कर सुबूत जुटाने के लिए रिमांड पर लिया. उस की हैंडराइटिंग और हस्ताक्षरों के नमूने लिए, ताकि उस का शिकार बने लोगों को लिखित में दिए गए स्टांप पेपरों की लिखावट से मिलान किया जा सके.

स्टांप पर रवनीत कौर अपने हाथों से लिख कर हस्ताक्षर करती थी. स्टांप पर लिखे समझौतों और हस्ताक्षरों की मिलान के लिए अदालत में रवनीत कौर से लिखवा कर हस्ताक्षर कराए गए. इस के बाद इन्हें जांच के लिए विधिविज्ञान प्रयोगशाला भेजा गया.

इस गिरोह की दूसरी हसीना रीना शुक्ला और उस के सहयोगियों ने एक चार्टर्ड एकाउंटैंट से 70 लाख रुपए ऐंठे थे. हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह का खुलासा होने पर एसओजी में इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई है. इसी के बाद एसओजी ने रीना शुक्ला, शंभू सिंह और किशोरीलाल को गिरफ्तार किया था.

किशोरीलाल सीए का दोस्त था. शंभू सिंह जयपुर के मानसरोवर में प्रौपर्टी का कारोबार करता था, जबकि रीना शुक्ला गरीब बच्चों का एक एनजीओ चलाती थी. रीना ने एक मासिक अखबार का रजिस्ट्रेशन भी करा रखा था. आरोपियों ने इसी अखबार के प्रैस कार्ड भी बनवा रखे थे. इन लोगों से पूछताछ में पता चला कि शंभू सिंह के प्रौपर्टी के व्यवसाय को वही सीए संभालता था.

रीना सन 2008 से शंभू सिंह के संपर्क में थी. शंभू सिंह के मार्फत रीना की दोस्ती सीए से हुई. रीना की मौसी कोटा में रहती थी. उस के पड़ोस में अनीता रहती थी. रीना ने अनीता को नौकरी दिलाने के बहाने सन 2013 में जयपुर बुलाया और सीए के माध्यम से एक कंपनी में नौकरी दिलवा दी, साथ ही रहने के लिए जयपुर के प्रतापनगर में एक फ्लैट किराए पर दिलवा दिया.

नवंबर, 2013 में रीना के रिश्तेदार की शादी में शरीक होने के लिए शंभू सिंह और अनीता राजस्थान के प्रतापगढ़ शहर गए. वहीं पर सीए अनीता के बीच अनैतिक संबंध बन गए. इस के सबूत रीना और अनीता ने एकत्र कर लिए. उन्हीं सबूतों के आधार पर उन्होंने सीए को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया.

रीना ने सीए से अनीता को एक लाख रुपए दिलवा कर कोटा भेज दिया. इस के बाद भी रीना और शंभू सिंह ने सीए को ब्लैकमेल करना जारी रखा. उन्होंने 6 महीने में उस से 10 लाख रुपए वसूल लिए.

किशोरीलाल को पता था कि रीना और शंभू सिंह सीए को ब्लैकमेल कर रहे हैं. उसी बीच सीए ने मानसरोवर स्थित अपना एक प्लौट सवा करोड़ रुपए में बेचा. किशोरीलाल ने सीए के प्लौट बेचने की बात रीना और शंभू सिंह को बता दी. सीए के पास मोटी रकम देख कर शंभू सिंह और रीना को लालच आ गया. उन्होंने सीए को धमकी दी कि अनीता कोर्ट में दुष्कर्म का इस्तगासा दर्ज करवा रही है. अगर समझौता करना हो तो वह एक करोड़ रुपए मांग रही है. उस ने मीडिया में भी मामला उजागर करने की धमकी दी.

इन धमकियों से सीए परेशान हो गया. वह आत्महत्या करने की सोचने लगा. इस के बाद शंभू सिंह के साथ मिल कर किशोरीलाल ने 70 लाख रुपए में सौदा करवा दिया. सीए ने अपने दोस्त किशोरीलाल को यह मामला निपटाने के लिए 70 लाख रुपए दे दिए. किशोरीलाल शंभू सिंह और रीना के साथ अनीता को यह रकम देने कोटा गया.

वहां उस ने 20 लाख रुपए खुद रखे और 50 लाख रुपए शंभू सिंह और रीना को दे दिए. रीना और शंभू सिंह ने अनीता को होटल में बुला कर एक समझौता पत्र तैयार किया. इस के बाद रीना ने समझौता पत्र और रुपए के साथ अनीता की एक फोटो ले ली.

शंभू सिंह और रीना ने अनीता को बताया कि सीए ने कोटा में कोई प्रौपर्टी खरीदी है, ये रुपए उन्हीं के हैं. वे प्रौपर्टी खरीदने के लिए सीए के दोस्त के साथ कोटा आए हैं. अनीता को बातों में उलझा कर रीना और शंभू सिंह ने उसे मात्र 10 हजार रुपए दे कर घर भेज दिया, बाकी रुपए दोनों ने अपने पास रख ली और सीए को समझौता पत्र और फोटो दे कर बता दिया कि समझौता हो गया.

एसओजी ने रीना और शंभू सिंह से अनीता के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि अनीता की 6 महीने पहले कैंसर से मौत हो गई है. एसओजी अधिकारियों को आशंका है कि कहीं मामले का खुलासा होने के डर से अनीता की हत्या तो नहीं कर दी गई. इस बात की जांच शुरू हुई. इस जांच में शंभू सिंह के बैंक लौकर से 15 से ज्यादा सीडियां मिली हैं, जिन्हें पुलिस ने देखा तो उन में तमाम लोगों की आपत्तिजनक फिल्में थीं. इस से स्पष्ट हो गया कि इन लोगों ने अन्य लोगों से भी पैसे ऐंठे हैं.

जांच में रीना और शंभू सिंह के उस झूठ का परदाफाश हो गया कि अनीता मर चुकी है. एसओजी ने कोटा निवासी अनीता चौहान को गुजरात के अहमदाबाद शहर से जीवित बरामद कर लिया.

पूछताछ में अनीता ने बताया कि वह अपने पति के साथ पिछले 3-4 महीने से अहमदाबाद में रह रही थी. उसे शंभू सिंह और रीना शुक्ला द्वारा उस के नाम पर सीए से 70 लाख रुपए ऐंठने की जानकारी नहीं थी. पूछताछ के बाद पुलिस ने अनीता को छोड़ दिया था. वह इस मामले में गवाह बन गई है.

जयपुर में इस तरह की ब्लैकमेलिंग करने वाले नएनए गिरोह सामने आ रहे हैं. एक अन्य गिरोह में तो एक सरकारी वकील के साथ कई लड़कियां शामिल थीं. उन्होंने स्पा मसाज सैंटर के नाम पर रईसों से मोटी रकम ऐंठी. एसओजी ने इस गिरोह की 2 लड़कियों वंदना भट्ट और पूनम कंवर को 11 फरवरी को गिरफ्तार किया.

इन्होंने एक साल में 6 रईसों से 60 लाख रुपए वसूल करने की बात स्वीकार की है. ये लड़कियां रईसों को मसाज पार्लर में बुला कर फांसती थीं. अनैतिक संबंध बनने के बाद थाने में शिकायत दर्ज करा कर वकील और उस के साथी उस रईस को फोन कर धमकाते थे और समझौता कराने के नाम पर 10 से 15 लाख रुपए ऐंठ लेते थे.

सौदा होने के बाद ये लोग पीडि़त को स्टांप पर समझौता लिख कर देते थे. एसओजी की जांच में सामने आया है कि हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह ने ढाई साल में करीब 45 लोेगों से 20 करोड़ रुपए वसूले हैं.

इन में गिरोह के सरगना एक वकील और कुख्यात अपराधी आनंदपाल के साथी आनंद शांडिल्य के हिस्से में 2-2 करोड़ रुपए आए हैं. रवनीत कौर के हिस्से में डेढ़ करोड़ रुपए आए थे. बाकी रकम अन्य सदस्यों में बांटी गई थी. गिरोह के सरगना वकील ने 8 वारदातों के बाद आनंद शांडिल्य को अलग कर दिया था. इस का कारण यह था कि आनंद शांडिल्य ब्लैकमेलिंग की राशि लाता था तो उस में से 15-20 लाख रुपए पहले  ही खुद रख लेता था. इस के बाद लाई गई रकम में भी हिस्सा लेता था. इस बात का पता गिरोह के दूसरे सदस्य वकील को चल गया था.

इस हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह में 4 वकील, 2 फरजी पत्रकार एवं एनआरआई युवती सहित करीब 30 लोग शामिल थे. गिरोह के सरगना वकील को एसओजी ने 9 फरवरी को गोवा से गिरफ्तार किया था. वहां भी उस के साथ एक युवती थी. उस युवती के बारे में जांच की जा रही है.

एक वकील को जयपुर से एक दिन पहले ही एसओजी ने गिरफ्तार किया था. फरार आरोपियों की तलाश में एसओजी जुटी हुई है. जयपुर बार एसोसिएशन ने गिरोह में शामिल वकीलों की सदस्यता रद्द कर दी है. बार कौंसिल के चेयरमैन एम.एम. लोढा ने 12 फरवरी को कहा है कि दुष्कर्म के झूठे केस में फंसा कर रुपए ऐंठने वाले वकीलों की सदस्यता बार कौंसिल से भी समाप्त कर दी जाएगी.

– कथा पुलिस सूत्रों व अन्य रिपोर्ट्स पर आधारित